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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,079 पृष्ठ

नवम लम्बक ६११

नवम लम्बक ६११ ऐसा कहकर और पत्नी को घर छोड़कर चन्द्रस्वामी अपने दोनों बच्चों—पुत्र महीपाल और पुत्री चन्द्रवती को लेकर ससुराल की ओर गया ॥१८-१९॥ जाते हुए उसे तीन चार दिनों के अनन्तर अगम्य मार्ग में एक बड़ा जंगल मिला। उस जंगल की रेत सूर्य की किरणों से तप रही थी और उसमें कहीं-कहीं धूप और काठ-कुट ही बस दीख रहे थे ॥२०॥ चन्द्रस्वामी प्यास से व्याकुल उन दोनों बच्चों को एक छायावान् स्थान पर बैठाकर उनके लिए जल की खोज में दूरतक चला गया ॥२१॥ जाते हुए उसे सामने भीलों का राजा सिंहदंष्ट्र अपने सेवकों के साथ कहीं जाता हुआ अकस्मात् मिल गया ॥२२॥ उस भीलराज ने उस ब्राह्मण को देखकर और पूछकर और उसे स्वाभिमानी समझकर अपने सेवकों से इशारा करके कहा—'इसे ले जाकर शान्ति दिलाओ' ॥२३॥ यह सुनकर उसके दर्प-हीन सरदार ने उसके भाव को समझकर उस सीधे-सादे विद्वान् ब्राह्मण को अपने गाँव में ले जाकर और बाँधकर रख दिया ॥२४॥ उस सेवक द्वारा बन्धन के लिए जाल का बिछा हुआ जानकर चन्द्रस्वामी उस जंगल में भर छोड़ हुए अपने दोनों बच्चों की चिन्ता करने लगा ॥ २५॥ 'हाय महीपाल! हाय चन्द्रवती! मैंने तुम्हें सूखा जंगल में छोड़कर रख और बाघों का भोजन बना डाला और चोरों से काटना भी चाहा होगा। अब यह दिल नहीं समझ रहा है। इस प्रकार शोच-चिन्तित उस ब्राह्मण ने आकाश में चारी नेत्र को देखा ॥ २६-२७॥ हाय! अब मैं मोह-छोड़ कर इसी आज उस देव को शरण में जाता हूँ'—यह सोचकर वह ब्राह्मण सूर्य की स्तुति करने लगा—॥ २८॥ हे उदय आकाश में उड़ने चन्द्रहासे पद्म शशाङ्क-नयन उषा आत्मीय और छाया अपरंपार का नष्ट करनेवाले तुम्हें नमस्कार है ॥ २९ ॥ सुदृढितों का प्रहार से बचाना विष्णु हैं तू ही कल्याणों का दान लिए हुए है। मात्र सब विश्व का कार्य प्रवृत्त कर संसार-राज्य प्रकाशित करने में प्रणाम है ॥३०॥ इसप्रकार स्तोत्र और बारम्बार प्रणाम करने से दुर्दान्त-रूप उस राजा ने अपने तेज समेटकर वहाँ प्रकट हुआ [२९/३१/३८ २२१॥] हे चक्रवाकबन्धु चन्द्रमा! ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ...

१४ कथासरित्सागर

१४ कथासरित्सागर तद्रक्ष शरणापन्नं त्रैलोक्यैकप्रदीप माम्। हृदं दुःखाधकारं मे विदारय दयां कुरु॥३३॥ इत्यान्दिभिस्तदा वाक्यैर्भक्त्या स्तुवततो रविम्। चन्द्रस्वामिद्विजस्यास्य गगनादुच्चचार वाक्॥३४॥ तुष्टोऽस्मि चन्द्रस्वामिंस्तं न त्वं वधमवाप्स्यसि। मत्प्रसादाच्च पुत्रादिसङ्गमस्ते भविष्यति॥३५॥ इत्युक्तो दिव्यया वाचा जाताश्वस्तस्तत्र तस्थिवान्। चन्द्रस्वामी स शबरापहृतस्नानभोजनः॥३६॥ तावच्च स महीपालं स्वस्रा युक्तमरण्यगम्। पित्र्यैनायरयाक्रन्दविधुरं शङ्किताशुभम्॥३७॥ ददर्श तेन मार्गेण सार्थवाहः समागतः। महान् सार्थधरो नाम वृत्तान्तं पृच्छति स्म च॥३८॥ स तमाश्वास्य कृपया शिशुं दृष्ट्वा सुलक्षणम्। सार्थवाहो निनाय स्वं देशं स्वसुतसन्नितम्॥३९॥ तत्रासीत् स महीपालो बाल्येऽप्यग्निक्रियारतः। सन्ते तस्य वणिजः पुत्रस्नेहेन पश्यतः॥४०॥ एकदा नृपतेर्मन्त्री तारापुरनिवासिनः। ताराधर्माभिधानस्य कायातेनागतः पथा॥४१॥ विवेश सार्थवाहस्य तस्य मित्रं द्विजोत्तमः। गृहाननन्तस्वामीति सहस्त्रहयपदातिकः॥४२॥ स विश्रान्तोऽत्र तं दृष्ट्वा महीपालं शुभाकृतिम्। अपाग्निकार्याविरतं वृत्तान्तं परिपृच्छ्य च॥४३॥ अनपत्यो विदित्वा च सवर्णं सार्थवाहतः। तस्मादयाचत्परयार्थी मन्त्री सद् भगिनीं च ताम्॥४४॥ ततस्तौ तेन वैश्येन दत्वावानाय दारकौ। सार्थवाहेन सानन्तस्वामी तारापुरं ययौ॥४५॥ तत्र पुत्रीकृतस्तेन महीपालः स मन्त्रिणा। तस्थ्यौ सद् भवनेऽप्यस्य विद्याविपुलसम्पदि॥४६॥ अत्रान्तरं च यद्यु तं चन्द्रस्वामिनमेत्य सः। भिल्लाधिपः सिंहदंष्ट्रः पप्रच्छात्तस्याममापतत्॥४७॥

[Header: नवम लम्बक १४१]

[Header: नवम लम्बक १४१]

'हे तीनों लोकों के एकमात्र प्रदीप शरण में आए हुए मेरी रक्षा करो। मेरे इस दुःख-रूपी अंधेरे को नष्ट करो। दया करो' ।।३४।। इत्यादि स्तुति वाक्यों द्वारा भक्ति-भाव से सूर्य की प्रार्थना करते हुए चन्द्रस्वामी ब्राह्मण को आकाशवाणी सुन पड़ी—।।३५।। 'हे चन्द्रस्वामिन् मैं तुझसे प्रसन्न हूँ। तू मारा नही जायगा और मेरी कृपा से पुत्र आदि के साथ तेरा मिलन भी होगा' ।।३५।। दिव्य वाणी द्वारा इस प्रकार कहा गया चन्द्रस्वामी विश्वासपूर्वक वहाँ भीलों द्वारा लाये गये भोजन फल आदि ग्रहण कर वहीं ठहरा रहा ।।३६।। उधर वह महीपाल छोटी बहन के साथ जंगल में बैठा-बैठा पिता के न आने पर किसी सार्थवाह¹ से अशुभ आशंका से रोने लगा ।।३७।। इतने में ही उस मार्ग से व्यापारियों का एक दल आ निकला। उस दल के प्रधान सार्थवाह¹ ने उस बालक से सारा समाचार पूछा ।।३८।। वह व्यापारी उस बालक को शुभ लक्षणोंवाला जानकर धीरज बँधाया और उसे बहन के साथ अपने घर ले गया ।।३९।। वहीं पर बनिये के घर में पुत्र के समान स्नेह को प्राप्त करता हुआ वह महीपाल बाल्यावस्था में ही स्नान सन्ध्या अग्निहोत्र आदि क्रिया में निपुण होने के कारण वैश्य के घर में नित्य-क्रिया करता हुआ रहने लगा ।।४०।। एक बार तारापुर के तारावर्म नामक राजा का मंत्री किसी कार्यवश उसी मार्ग से वहाँ आया ।।४१।। वह श्रेष्ठ ब्राह्मण मंत्री अनन्तस्वामी हाथी घोड़े नौकर चाकर आदि के साथ उसी अपने मित्र व्यापारी के घर विश्राम के लिए ठहर गया ।।४२।। उस घर में ठहरे हुए उसने सुन्दर आकृतिवाले जप अग्निहोत्र आदि में लगे हुए महीपाल को देखा और उसका परिचय पूछा ।।४३।। उस सन्तानहीन मन्त्री ने व्यापारी से उसका परिचय पाकर और उसे ब्राह्मण जानकर, उसे अपना पोष्य-पुत्र बनाने के लिए उसकी बहन के साथ उसे माँग लिया ।।४४।। तब वह मन्त्री अनन्तस्वामी व्यापारी से उन बालकों को लेकर, तारापुर चला आया ।।४५।। वहाँ विधिवत् पुत्र बनाया हुआ महीपाल विद्या और धन से भरे हुए उसके घर में सुखपूर्वक रहने लगा ।।४६।। इसी बीच भीलों का राजा सिंहदंष्ट्र उस ग्राम में आकर और चन्द्रस्वामी के पास जाकर बोला—।।४७।।

१ सौदागरों का मुखिया सरदार। ८१

६४२ कथासरित्सागर

६४२ कथासरित्सागर ब्रह्मन् स्वप्नेऽहमाविष्टस्तथा देवेन भानुना। यथा सम्पूज्य भोक्तव्यो न हन्तव्यो मया भवान् ॥४८॥ तदुत्तिष्ठ व्रज स्वच्छमित्युक्त्वा स मुमोष तम्। प्रत्तमुक्तामृगमद क्लृप्तारण्यानुयायिकम् ॥४९॥ सोऽप्य मुक्तस्ततश्चन्द्रस्वामी तमनुजामृतम्। अप्राप्यारभ्यत पुत्रं महीपाल गवेषयन् ॥५०॥ भ्रमन्नब्धेस्तटे प्राप्य नाम्ना जलपुरं पुरम्। प्रविबेशातिथीभूत्वा गृहं विप्रस्य कस्यचित् ॥५१॥ तत्र मुक्तोत्तराख्यातस्ववृत्तान्तं समासतः। तं स विप्रो गृहपतिश्चन्द्रस्वामिनमभ्यधात् ॥५२॥ वणिक्कनकवर्माख्योऽतीतेष्वगाद्दिनेष्विह । तेनाटव्यां स्वसूनुस्त प्राप्तो ब्राह्मणदारकः ॥५३॥ तौ चादायातिभव्यौ द्वौ दारको स इतो गतः। नारिकेलमहाद्वीपे नोक्तं तन्नाम तेन तु ॥५४॥ तच्छ्रुत्वा मामकावेव नूनं ताविति चिन्तयन्। चन्द्रस्वामी मतिं चक्रे गन्तुं द्वीपवरं सवम् ॥५५॥ नीत्वा च रात्रिमन्विष्य वणिजा विष्णुवर्मणा। स व्यधात् सङ्गतिं द्वीप नारिकेलं प्रमास्यता ॥५६॥ तेनैव च सहारुह्य यानपात्रं जगाम सः। चन्द्रस्वामी सुतस्नेहाद् द्वीपमब्धिपथेन तम् ॥५७॥ तत्र पृच्छन्तमूचुस्तं वणिजस्सनिवासिनः। वणिक्कनकवर्माख्यः काममासीदिहागतः ॥५८॥ सुरूपारटवीप्राप्तावादाय द्विजदारकौ। गतः कटाहद्वीप तु तद्युक्तः स इतोऽधुना ॥५९॥ तच्छ्रुत्वा स ततो विप्रो वणिजा दानवर्मणा। पोतेन गच्छता साकं कटाहद्वीपमभ्यगात् ॥६०॥ तत्रापि स द्विजोऽशृण्वीद् गतं तं वणिजं ततः। द्वीपात् कनकवर्म्माणं द्वीप कर्पूरमंगलम् ॥६१॥ एवं क्रमेण कर्पूरसुवर्णद्वीपसिंहलान्। वणिग्भिः सह गत्वापि न प्राप वणिजं स तः ॥६२॥

नवम लम्बक ६४५

नवम लम्बक ६४५ हे ब्रह्मदेव मुझे स्वप्न में भगवान् भास्कर ने आदेश दिया है कि मैं तुम्हें सत्कृत करके छोड़ दूँ। तुम्हारा वध न करूँ ॥४८॥ इसलिए, उठो और जहाँ चाहो जाओ। ऐसा कहकर भील ने चन्द्रस्वामी को मोती और कस्तूरी देकर जंगल में मार्ग बतलानेवाले सेवकों के साथ आदरपूर्वक विदा कर दिया ॥४९॥ तब वह चन्द्रस्वामी छोटी बहन के साथ अपने पुत्र महीपाल को ढूँढ़ता हुआ उन्हें जंगल में न पाकर घूमते-घामते समुद्र के किनारे जलपुर नामक नगर में जा पहुँचा। वहाँ जाकर वह किसी ब्राह्मण के घर में अतिथि के रूप में ठहर गया ॥५०-५१॥ वहाँ पर भोजन के उपरान्त अपना वृत्तान्त सुनाते हुए चन्द्रस्वामी से गृह के स्वामी ब्राह्मण ने कहा—॥५२॥ 'पिछले दिनों में कनकवर्मा नाम का एक व्यापारी बनिया यहाँ आया था। उसने जंगल में छोटी बहन के साथ एक ब्राह्मण बालक को प्राप्त किया। वह उन दोनों अति सुन्दर बच्चों को लेकर यहाँ से नारिकेल-द्वीप में गया है किन्तु उसने उस बालक का नाम नहीं बताया' ॥५३-५४॥ यह सुनकर और वे अवश्य ही मेरे बालक हैं ऐसा सोचकर चन्द्रस्वामी ने नारिकेल- द्वीप जाने का विचार किया ॥५५॥ किसी प्रकार रात्रि व्यतीत कर उसने प्रातःकाल ही नारिकेल-द्वीप जाते हुए वणिक विष्णुवर्मा से अपना साथ-मेल बैठाया ॥५६॥ और, उसी के साथ नाव में बैठकर चन्द्रस्वामी बच्चों के प्रेम से समुद्र-मार्ग द्वारा नारिकेल-द्वीप को गया ॥५७॥ वहाँ पर कनकवर्मा को पूछते हुए उसे वहाँ के व्यापारी बनियों ने बताया कि कनकवर्मा नाम का व्यापारी जंगल से मिले हुए दो सुन्दर ब्राह्मण-बालकों को लेकर यहाँ आया अवश्य था किन्तु इस समय वह उन बच्चों के साथ यहाँ से कटाह-द्वीप को चला गया ॥५८-५९॥ व्यापारियों से इस प्रकार सुनकर चन्द्रस्वामी जलयान द्वारा कटाह-द्वीप जाते हुए व्यापारी दानवर्मा के साथ कटाह-द्वीप को गया ॥६०॥ वहाँ भी उसे ब्राह्मण से ज्ञात कि कनकवर्मा यहाँ से कर्पूर-द्वीप को चला गया। उसी क्रम से कर्पूर सुवर्ण और सिंहल-द्वीपों में वैश्यों के साथ जाने पर भी वह कनकवर्मा को न पा सका ॥६१-६२॥

६४४ कथासरित्सागर

६४४ कथासरित्सागर सिंहलेभ्यस्तु शुश्राव गतः स वणिजं निजम्। देशं कनकवर्माणं चित्रकूटामिधं पुरम् ॥६३॥ ततः कोटीश्वराख्येन वणिजा स समं ययौ। चन्द्रस्वामी चित्रकूटं तत्पोतोत्तीर्णवारिधिः ॥६४॥ तस्मिन् कनकवर्माणं वणिजं तमवाप सः। शशंस चाखिलं तस्मै स्वोदन्तं दारकोत्सुकः ॥६५॥ चैतं कनकवर्मा तौ भ्रातराविति सोऽस्य दारको। दर्शयामास यौ तेन लब्ध्वा नीतावटव्यतः ॥६६॥ चन्द्रस्वामी च तौ यावदीक्षते दारकावुभौ। तावन्नैव तदीयौ तौ तावन्यावेव कौचन ॥६७॥ ततः सबाष्पं शोकार्तों निराशो विललाप सः। इयद् भ्रान्त्वापि हा नाप्तो न पुत्रो न सुता मया ॥६८॥ धात्रा कुप्रभुणेवाशा दर्शिता मे न पूरिता। भ्रामितोऽस्मि च मिथ्यैव दूराद्दूरं दुरात्मना ॥६९॥ इत्यादि शोचन् वणिजा क्रमात् कनकवर्मणा। आश्वासितः स सेनाद्य चन्द्रस्वामी शुचाऽब्रवीत् ॥७०॥ वत्सरेणारमजो तौ चेन्न प्राप्स्यामि भुवं भ्रमन्। ततस्त्यक्ष्यामि तपसा गङ्गातीरे शरीरकम् ॥७१॥ इत्युक्तवन्तं तमथो ज्ञानी कोऽपि तमभ्यधात्। नारायण्या प्रभावात्तौ प्राप्स्यस्येवात्मजौ व्रज ॥७२॥ तच्छ्रुत्वा स प्रहृष्टात्मा भास्करानुग्रहं स्मरन्। वणिग्भिः पूजितः प्रायाच्चन्द्रस्वामी पुरात्ततः ॥७३॥ ततोऽग्रहारान् ग्रामांश्च चिन्वन् स नगराणि च। भ्रमन् प्रापैकदा सायं वनं प्रांशुबहुद्रुमम् ॥७४॥ तत्र क्षपयितुं रात्रिं कृत्वा वृत्तिं फलाम्बुभिः। स तस्थौ तरुमारुह्य सिंहव्याघ्रादिनाङ्किताम् ॥७५॥ अथाद्रवन् निशीथेऽत्र दृप्तं रा तरोरधः। महन्नारायणीमुख्यं मानुषञ्च रामागतम् ॥७६॥ उपहारान् समाहृत्य नानारूपान्द्विजातिताम्। प्रतीक्षमाणं देवस्य भैरवस्य बिलागमम् ॥७७॥

नवम लम्बक ४४५

नवम लम्बक ४४५ सिंहल-द्वीपवासियों से उसने सुना कि कनकवर्मा अपने देश चित्रकूट को चला गया। तब चन्द्रस्वामी कोटीश्वर नामक वैश्य के साथ सिंहल से समुद्र पार करके चित्रकूट को आया ॥६३-६४॥ और, यहाँ आकर उसने कनकवर्मा वैश्य को ढूँढ़ लिया। उसके पास जाकर बच्चों के लिए उत्सुक उसने अपना सारा वृत्तान्त सुना दिया ॥६५॥ उसकी बेचैनी का अनुभव करके कनकवर्मा ने उन दोनों बालकों को उसे दिखा दिया जिन्हें वह जंगल से लाया था ॥६६॥ चन्द्रस्वामी ने उन दोनों बच्चों को देखा तो वे उसके बच्चे नहीं थे बल्कि दूसरे ही कोई थे ॥६७॥ तब शोक-सन्तप्त और निराश चन्द्रस्वामी रो पड़ा और विलाप करने लगा—हाय! मैं इतना घूमने पर भी न लड़का पाया न लड़की ॥६८॥ दुष्ट स्वामी के समान भाग्य ने आशा दी किन्तु पूरी न की। इस दुराशा ने व्यर्थ ही दूर से दूर भटकाया ॥६९॥ इस प्रकार सोचते हुए चन्द्रस्वामी को कनकवर्मा ने धीरे-धीरे धीरज बँधाया। तब चन्द्रस्वामी शोक से बोला—॥७०॥ सारी पृथ्वी पर घूमते-भटकते हुए मैंने यदि एक वर्ष के भीतर उन दोनों बच्चों को नहीं पाया तो मैं गंगा-तीर पर तपस्या करके शरीर त्याग दूँगा' ॥७१॥ इस प्रकार कहते हुए चन्द्रस्वामी से वहाँ बैठे हुए किसी ज्ञानी ने कहा—'नारायणी की कृपा से तू बच्चों को प्राप्त करेगा जा' ॥७२॥ यह सुनकर प्रसन्नचित्त चन्द्रस्वामी सूर्य भगवान् की कृपा का स्मरण करता हुआ कनकवर्मा द्वारा सत्कार किये जाने पर चित्रकूट नगर से चला ॥७३॥ वह चन्द्रस्वामी अग्रहारों ग्रामों और नगरों में भटकता-मचलता सायंकाल बहुत ऊँचे ऊँचे और घने वृक्षोंवाले एक जंगल में पहुँचा ॥७४॥ वहाँ रात बिताने के लिए, फल और जल से तृप्ति पाकर सिंह बाघ आदि पशुओं के भय से वह एक वृक्ष पर चढ़कर बैठ गया ॥७५॥ उसे नींद नहीं आई और जागते ही जागते उसने आधी रात के समय उस वृक्ष के नीचे देखा कि नारायणी की प्रसन्नता से एक मातृचक्र वहाँ आया ॥७६॥ वह मातृचक्र नाना प्रकार के अपने योग्य आहार लाकर भैरव देव की प्रतीक्षा करने लगा ॥७७॥

६४४ कथासरित्सागर

६४४ कथासरित्सागर चिरयस्यथ किं देव इति तत्र च मातरः । नारायणीमथापृच्छन् सा जहासा शु नाब्रवीत् ॥७८॥ अतिनिर्बन्धपृष्टा च ताभिस्सा प्रत्युवाच सा । लज्जावहं यदप्येतत् सख्यस्तदपि वच्म्यहम् ॥७९॥ अस्ताह सुरसेनाख्यो राजा सुरपुरे पुरे । तस्य विद्याधरी नाम ख्यातरूपास्ति चात्मजा ॥८०॥ प्रदमायाश्च तेनास्या राज्ञा रूपसमं श्रुतं । विमलाख्यस्य तनयो राज्ञो नाम्ना प्रभाकरः ॥८१॥ तस्मै दित्सति तां तस्मिन् राज्ञि तेनापि सा श्रुता । विमलेन सुता तस्य निजपुत्रानुरूपिका ॥८२॥ ततः स विमलस्तस्मात् सुरसेनादयाचत । विद्याधरीं दूतमुखात् पुत्रार्थे तां तदात्मजाम् ॥८३॥ सोऽप्यपेक्षितसम्पत्त्या तत्सुताय सुतामदात् । प्रभाकराय तस्मै तां सुरसेनो यथाविधि ॥८४॥ तत सा प्राप्य विमलपुराख्यं श्वशुरं पुरम् । विद्याधरी समं भर्त्रा शयनीयमगात्निशि ॥८५॥ तत्रासम्भोगसुप्तं सा पतिं सोल्का प्रभाकरम् । यावन्निरीक्षते तावत्तमपश्यन्नपुंसकम् ॥८६॥ हा हताऽस्मि कथं षण्डः पतिः प्राप्तो मयेति सा । शोचन्ती छतसा रात्रिं राजपुत्री निनाय ताम् ॥८७॥ नपुंसकाय दत्ताहमन्विष्य कथं त्वया । इति लेखं लिखित्वा च पित्रे सा प्रहिणोत् ततः ॥८८॥ स दूत वाचायित्वैव विमलेनास्मि वञ्चितः । छद्मनाप्यगमत् क्रोधं तत्पिता विमलं प्रति ॥८९॥ सुतां नपुंसकायाहं यद्ब्याजाद्ग्राहितस्त्वया । पुत्राय तत्फलं मूढश्वः पश्य त्वामद्य हन्म्यहम् ॥९०॥ इति तस्मै स्वलङ्घनं सन्दिश्य स भूपतिः । शूरमना बलोद्रिक्तो विमलाय महीक्षित् ॥९१॥ विमलस्तदधिक्षिप्यत तस्येत्यार्यं गताश्रवः । विमृशन् दुजयं तन्निग्रहाय कञ्चिदन्बछत ॥९२॥

नवम लम्बक ६४७

नवम लम्बक ६४७ आज भैरव देव क्यों विलम्ब कर रहे हैं इस प्रकार माताओं ने नारायणी देवी से पूछा। किन्तु वह हंसती थी कुछ बोलती न थी ॥७८॥ उन माताओं द्वारा अत्यन्त आग्रह के साथ पूछे जाने पर नारायणी ने कहा- 'यद्यपि यह लज्जाजनक बात है फिर भी सहेलियों मैं तुमसे कहती हूँ' ॥७९॥ शूरपुर नगर में शूरसेन नाम का राजा है। सौन्दर्य में प्रसिद्ध उसकी विद्याधरी नाम की कन्या है ॥८०॥ उसे देने की इच्छा करनेवाले राजा शूरसेन ने सुना कि उसके रूप के समान सुन्दर राजा विमल का पुत्र प्रभाकर है ॥८१॥ राजा शूरसेन प्रभाकर को कन्या देना चाहता है यह राजा विमल ने भी सुना। और, उस कन्या को अपने पुत्र के समान ही सुन्दर जानकर राजा विमल ने राजा सेनपुर में दूत भेजकर, उसकी पुत्री विद्याधरी की अपने पुत्र प्रभाकर के लिए माँग की ॥८२-८३॥ शूरसेन ने भी आवश्यक सम्मति के साथ विमल के पुत्र प्रभाकर को विधिवूर्वक अपनी कन्या प्रदान कर दी ॥८४॥ तब बहूरूपा विद्याधरी अपने श्वशुर के नगर विमलपुर में आकर अपने पति प्रभाकर के साथ रात्रि में मिली ॥८५॥ वहाँ उत्कण्ठिता विद्याधरी ने जब पति प्रभाकर को बिना किसी चेष्टा के सोया देखा तब उसने आश्चर्य से उसकी परीक्षा की और उसे नपुंसक पाया ॥८६॥ 'हाय! हाय! मैं मारी गई, मुझे नपुंसक पति मिला' इस प्रकार सोचती हुई राजकुमारी ने किसी प्रकार रात्रि व्यतीत की ॥८७॥ प्रातः काल ही उसने पत्र लिखकर अपने पिता के पास भेजा कि तुमने बिना जाँच किये ही मुझे नपुंसक को कैसे दे दिया ॥८८॥ उस पत्र को पढ़कर राजा शूरसेन ने सोचा कि राजा विमल ने मुझे ठग लिया है। इसलिए उसे क्रोध आ गया और उसने विमल के प्रति क्रोध प्रकट करते हुए उसे यह लिखित सन्देश भेजा कि तूने छल से अपने नपुंसक लड़के के लिए जो मेरी पुत्री को बियाह दिया है अब उसका फल भोगो। मैं सेना लेकर आता हूँ और तुझे मार डालता हूँ ॥८९॥ बल के मद से उन्मत्त शूरसेन ने राजा विमल के लिए इस प्रकार सन्देश भेज दिया। राजा विमल भी इस सन्देश को पाकर मन्त्रियों के साथ उसके लेख का तत्त्व विचारने लगा क्योंकि शूरसेन बल में विमल से अधिक होने के कारण उसके लिए अजेय था ॥९१-९२॥

१४८ कथासरित्सागर

१४८ कथासरित्सागर

ततस्तं पिङ्गलदासाख्यो मन्त्री विमलमभ्यधात्। एक एवास्त्युपायोऽत्र तं देव शृणु साम्प्रतम्॥९३॥ अस्ति स्थूलशिरा नाम यक्षस्तस्य च वद्म्यहम्। मन्त्रमाराधनं येन वरमिष्टं ददाति सः॥९४॥ तेनोपास्तेन मन्त्रेण यक्षमाराध्य सम्प्रति। लिङ्गं याचस्व पुत्रार्थं सद्यः शाम्यतु विग्रहः॥९५॥ इत्युक्तो मन्त्रिणा तस्मान्मन्त्रमादाय तं नृपः। सुतार्थं यक्षमाराध्य स तं लिङ्गमयाचत॥९६॥ तेन सम्प्रति दत्तं च लिङ्गं यक्षेण तत्सुतः। पुमांस्प्रभाकरः सोऽभूद्यक्षस्त्वासीन्नपुंसकः॥९७॥ सा तु विद्याधरी दृष्ट्वा पुमांसं तं प्रभाकरम्। तेन परया सहावाप्तरससौख्या व्यचिन्तयत्॥९८॥ भ्रान्ताहं मददोषेण न मे भर्त्ता नपुंसकः। पुमानेवैष सुभगो नात्र कार्यान्यथा मतिः॥९९॥ इत्यालोच्यैनमेवार्थं लिखित्वा लज्जिता पुनः। पित्रे सा प्राहिणोल्लेखं शमं भेजे च तेन सः॥१००॥ एतत् ज्ञात्वा च वृत्तान्तं भैरवेणाथ कुप्यता। मानाम्य स स्थूलशिराः शप्तो देवेन गुह्यकः॥१०१॥ लिङ्गत्यागेन यच्छश्वद्भावितं मत्प्रिया ततः। षण्ढ एव भवाजीवं पुमान् सोऽस्तु प्रभाकरः॥१०२॥ एवं नपुंसकीभूतो गुह्यकः सोऽथ दुःसहाम्। प्रभाकरश्च पुरुषीभूतो भोगसुखाय सः॥१०३॥ तदेतेनाथ कार्येण देवस्यागमने मनाक्। जातो विलम्बः क्षिप्राच्च जानीतायन्तमेव तम्॥१०४॥ इति नारायणी देवी मातृभिरिदमब्रवीत् सा। देवश्चण्डेश्वरस्तावदाययौ सोऽत्र भैरवः॥१०५॥ सम्पूजितश्च सर्वाभिरुपहारैः स मातृभिः। ताण्डवेन क्षणं नृत्यंश्चक्रीडेयोगिनीसखः॥१०६॥ तञ्च सर्वं तरोः पृष्ठाच्चन्द्रस्वामी विलोकयन्। मारायच्या वदर्शाका शासी सापि तमक्षत॥१०७॥

नवम लम्बक ६४९

नवम लम्बक ६४९ जब उसे कोई उपाय नहीं सूझा तब पिंगदत्त नामक मन्त्री ने राजा विमल से कहा- 'स्वामिन् एक ही उपाय कल्याण के लिए है। उसे करो ॥१९३॥ स्थूलशिरा नाम का एक यक्ष है। उसका मन्त्र और आराधना-विधि मैं जानता हूँ जिससे वह अभीष्ट वर देता है ॥१९४॥ उसके मन्त्र को ग्रहण करके उससे पुत्र के लिए जननेन्द्रिय की याचना करो। इससे विरोध दूर होजायगा' ॥१९५॥ मन्त्री के इस प्रकार कहने पर राजा ने उससे मन्त्र ग्रहण किया और उससे यक्ष की आराधना करके पुत्र के लिए जननेन्द्रिय की याचना की ॥१९६॥ उस यक्ष द्वारा जननेन्द्रिय प्राप्त हो जाने पर वह नपुंसक पुत्र प्रभाकर पूर्ण पुरुष हो गया किन्तु वह यक्ष नपुंसक हो गया ॥१९७॥ अब वह विद्याधरी प्रभाकर को पुरुषत्व से युक्त देखकर और उसके साथ यौन सुख का आनन्द लेकर सोचने लगी- ॥१९८॥ मैं अपने यौवन-मद में भूल कर गई। मेरा पति नपुंसक नहीं है। यह तो पूर्ण पुरुष है। अतः इसके सम्बन्ध में विपरीत मति नहीं करनी चाहिए ॥१९९॥ इस प्रकार विचार कर और इसी बात को पुनः पिता को लिखकर, साथ ही लज्जित होकर भी उसने यह सन्देश भेजा जिससे उसका पिता शान्त हो गया ॥२००॥ यह समाचार सुनकर आज क्रुद्ध हुए भैरव ने स्थूलशिरा यक्ष को बुलाकर शाप दिया-॥२०१॥ कि जननेन्द्रिय का त्याग करने से तूने नपुंसकता धारण की है अतः अब तू आजीवन नपुंसक ही बना रहेगा और वह प्रभाकर सदा के लिए पुरुष हो जायगा ॥२०२॥ इसलिए नपुंसक बना हुआ यह यक्ष आज बहुत दुःखी है और प्रभाकर भार्या-सुख के लिए पुरुष बनकर सुखी है॥२०३॥ इसी काम में आज भैरव का आने में कुछ विलम्ब होगया है। फिर फिर भी उन्हें आया ही समझो ॥२०४॥ कात्यायनी देवी जबतक उन योगिनी महात्मा से कह ही रही थीं कि इतने में ही भयङ्कर भैरवदेव आ ही गये और उन योगिनियों ने नाना प्रकारके उपहारों से उनका पूजन किया। भैरव ने भी कुछ समय तक उन योगिनियों के साथ मोद-प्रमोद किया ॥२०५॥ चन्द्रस्वामी ने वन पर बैठ बैठकर यह सब कुछ दृश्य देखा। वह कात्यायनी की एक दासी को देखा। उसने भी चन्द्रस्वामी को देखा॥२०६॥ ८२

६५० कथारित्सागर

६५० कथारित्सागर अन्योन्यसामिलाषौ च दयावृद्धौ तौ बभूवतुः। सा च नारायणी देवी तथामूतौ विवेद तौ ॥१०८॥ गतेऽथ मातृसहिते भैरवे सा विलम्ब्य तम्। नारायणी पादपस्थं चन्द्रस्वामिनमाह्वयत् ॥१०९॥ मवरुह्यागतं स च स्वदासीं सां च सा ततः। पप्रच्छ कश्चिदन्योन्यमभिलाषोऽस्ति वामिति ॥११०॥ अस्ति देवीति विज्ञप्ता ताभ्यां तथ्यं ततश्च सा। देवी विमुक्तकोपा तं चन्द्रस्वामिनमभ्यधात् ॥१११॥ सत्येनोक्तेन तुष्टाऽहं युवयोर्न शपामि वाम्। ददाम्येतां सु दासीं ते भवतं निर्वृतौ युवाम् ॥११२॥ तच्छ्रुत्वा सोऽब्रवीद्विप्रो देवि यद्यपि चञ्चलम्। मनो रुणध्मि तदपि स्पृशामि न परस्त्रियम् ॥११३॥ मनसः प्रकृतिश्चैषा रक्ष्यं पापं तु कायिकम्। इत्यूचिवांसं तं धीरं विप्रं देवी जगाद सा ॥११४॥ प्रीतास्मि ते वरश्चायं पुत्रादीञ्शीघ्रमप्स्यसि। इदं चोत्पलम्मम्लानं विपादिघ्नं गृहाण मे ॥११५॥ इत्युक्त्वा नीरजं दत्त्वा चन्द्रस्वामिद्विजस्य सा। नारायणी सदासीका देवी तस्य तिरोदधे ॥११६॥ स च प्राप्तोत्पलो रात्रौ क्षीणायां प्रस्थितस्ततः। तारापुरं तन्नगरं प्राप विप्रः परिभ्रमन् ॥११७॥ यत्रास्य स स्थितः पुत्रो महीपालः सुता च सा। अनन्तस्वामिनस्तस्य गृहे विप्रस्य मन्त्रिणः ॥११८॥ तत्र गत्वा स तस्यैव मन्त्रिणो भोजनेप्सया। द्वारे प्राग्र्यमनं चक्रे भूत्वा तमतिथिं प्रियम् ॥११९॥ स च मन्त्री प्रतीहारैराज्ञेयान्तः प्रवेशितम्। न्यमन्त्रयत दृष्ट्वैव विद्वांसं भोजनाय तम् ॥१२०॥ निमन्त्रितोऽथ स श्रुत्वा तत्र पापहरं सरः। चन्द्रस्वामी ययौ स्नातुमगस्त्यह्रदसंज्ञकम् ॥१२१॥ आगच्छति ततः स्नात्वा यावत्तावत्समन्ततः। हाकष्टशब्दं शुश्राव नगरे तत्र स द्विजः ॥१२२॥

नवम लम्बक ६५१

नवम लम्बक ६५१ दैवयोग से वे दोनों परस्पर अभिलाषा-युक्त हो गये और नारायणी देवी ने दोनों के भाव को ताड़ लिया ॥१८॥ तदनन्तर, माताओं के साथ भैरव के चले जाने पर नारायणी कुछ विलम्ब करके वहीं रुक गई और उसने वृक्ष पर बैठे हुए चन्द्रस्वामी को बुलाया ॥१९॥ नारायणी देवी ने वृक्ष से उतरकर आये हुए चन्द्रस्वामी तथा उस दासी दोनों से पूछा कि क्या तुम दोनों को परस्पर मिलने की अभिलाषा है? ॥११०॥ 'हाँ देवि है। ऐसा उन दोनों ने सत्य-सत्य कह दिया।' तब नारायणी देवी ने क्रोध-रहित होकर चन्द्रस्वामी से कहा—'तुम लोगों ने सत्य कहा इसलिए शाप नहीं देती हूँ वरन् तुझे यह दासी देती हूँ। तुम दोनों सुखी रहो' ॥१११-११२॥ यह सुनकर वह ब्राह्मण बोला— भगवती यद्यपि मैं चंचल मन को रोकता हूँ। किसी परस्त्री का स्पर्श नहीं करता। यद्यपि चंचलता मन की प्रकृति है तथापि शारीरिक पाप से उसकी रक्षा करनी चाहिए। इस प्रकार कहते हुए उस धीर ब्राह्मण से नारायणी देवी ने कहा—'बेटा तुझ पर प्रसन्न हूँ और मेरा तो कहना है कि अपने बच्चों को प्राप्त कर और यह कभी न म्लान होनेवाला कमल तुझे देती हूँ जो विष आदि को दूर करता है। इसे ले' ॥११३-११५॥ इस प्रकार कहकर और चन्द्रस्वामी को कमल देकर वह नारायणी देवी दासी के साथ अन्तर्धान हो गई ॥११६॥ वह चन्द्रस्वामी देवी के दिये हुये कमल को पाकर और रात्रि के व्यतीत होने पर वहाँ से चलकर घूमते-फिरते तारापुर नगर पहुँचा ॥११७॥ वहाँ पर उसका पुत्र महीपाल और कन्या राजा के ब्राह्मण-मन्त्री अनन्तस्वामी के यहाँ ठहरे हुए थे ॥११८॥ इस नगर में जाकर वह चन्द्रस्वामी उसी मन्त्री के घर भोजन प्राप्त करने की इच्छा से गया और उसे अतिथि-प्रिय जानकर उसके द्वार पर बैठकर वेदपाठ करने लगा। द्वारपालों द्वारा सूचना देकर अन्दर ले जाये गये चन्द्रस्वामी को मन्त्री अनन्तस्वामी ने भोजन के लिए आमन्त्रित किया ॥११९-१२०॥ वह निमन्त्रित चन्द्रस्वामी पाप हरण करनेवाले अनन्तह्रद नामक सरोवर में स्नान करने के लिए गया ॥१२१॥ जब वह स्नान करके आया तब इतने में ही उसे 'हाय! हाय! बहुत दुख है' सारे नगर में इस प्रकार का कोलाहल सुनाई पड़ा ॥१२२॥

सत्कारणं च पृच्छन्तं तमयमवदज्जनः। इह स्थितो महीपालो नाम ब्राह्मणपुत्रकः ॥१२३॥ अटव्यां सार्थवाहेन प्राप्तः सार्थभरेण सः। तस्मात् सुलक्षणो दृष्ट्वा याचित्वा भगिनीसखः ॥१२४॥ अनन्तस्वामिना यत्नादिहानीतः स मन्त्रिणा। पुत्रीकृतश्चापुत्रेण स तेन प्रियतां गतः ॥१२५॥ तारावर्मनृपस्येह राष्ट्रस्यास्य च सद्गुणः। सोऽद्य कृष्णाहिना दष्टस्तेन हाहारवः पुरे ॥१२६॥ एतच्छ्रुत्वा स एष स्यान्मत्पुत्र इति चिन्तयन्। आययौ त्वरितश्चन्द्रस्वामी मन्त्रिगृहं स तत् ॥१२७॥ तत्र सर्वैर्वतं दृष्ट्वा परिज्ञाय च तं सुतम्। मन्वति स्म स हस्तस्थममृतागदोत्पलम् ॥१२८॥ अढौकयच्च नासायां महीपालस्य तस्य सत्। नीलोत्पलं सद्यैवाभूत्सद्गन्धेन स निर्विषः ॥१२९॥ उत्तस्थौ च महीपालो निद्रायुक्त इवास्त सः। पुरे चात्रोत्सवं चक्रे जनः सर्वः सराजकः ॥१३०॥ चन्द्रस्वामी च स तदा देवांशः कोऽप्यसाविति। अनन्तस्वामिना पौरैः राज्ञा चाप्यतिपूज्यत ॥१३१॥ तस्थौ च तत्रैव सुखं मन्त्रिवेश्मनि सोऽर्चितः। पश्यन्पुत्रं महीपालं सुतां चन्द्रवतीं च ताम् ॥१३२॥ परिज्ञायापि चान्योन्यं तूष्णीं तस्थुस्त्रयोऽपि ते। कुर्वन्त्यकालेऽभिव्यक्तिं न कार्यापेक्षिणो वृथा ॥१३३॥ अथ तस्मै महीपालायान्तः सन्तोषतो गुणैः। राजा बन्धुमतीं नाम तारावर्मा ददौ सुताम् ॥१३४॥ प्रदत्तनिजराज्यार्धं तस्मिन्नेव व्यधात्तथा। सुखी राज्यभरं कृत्स्नं स नृपोऽन्यमपुत्रकः ॥१३५॥ महीपालोऽपि स प्राप्तराज्यः प्रख्याप्य तं निजम्। पितरं स्वानुजां स्थाने वरत्वा तस्थौ यथासुखम् ॥१३६॥ एकदा च पिता चन्द्रस्वामी स्वैरमभाषत। एहि स्वदेशं गच्छावो मातुरानमनाय ते ॥१३७॥

नवम लम्बक ३५३

नवम लम्बक ३५३ इसका कारण पूछने पर लोगों ने उसे बताया कि यहाँ महीपाल नाम का एक ब्राह्मण कुमार रहता है। उसे व्यापारी सार्थवाह ने शून्य जंगल में पाया था। उसके अच्छे लक्षणों को देखकर उसकी बहन के साथ उसे मन्त्री अनन्तस्वामी व्यापारी से माँग लाये थे और पुत्रहीन मन्त्री ने उसे अपना पुत्र बना लिया था। इसलिए वह उसका बहुत प्रिय हो गया था ॥१२४-१२५॥ वह सर्वगुण बालक यहाँ के राजा का बहुत प्रिय था। उसे आज काले साँप ने काट लिया इसलिए आज सारे नगर में हाहाकार मच रहा है ॥१२६॥ यह समाचार सुनकर चन्द्रस्वामी ने सोचा कि यह तो मेरा ही पुत्र है। इस प्रकार सोचता हुआ चन्द्रस्वामी शीघ्र ही मन्त्री के घर पर आया ॥१२७॥ वहाँ सब लोगों से घिरे हुए उसे देखकर और पहचानकर हाथ में देवी के दिये हुए ओषधि-रूप कमल को लिया हुए चन्द्रस्वामी प्रसन्न हुआ ॥१२८॥ उसने उस कमल को महीपाल की नाक में लगा दिया जिससे वह बालक उसी समय विष हीन हो गया ॥१२९॥ और, इस प्रकार उठ बैठा मानों नींद में सो रहा था। तब उस नगर में उसके जीवित होने का उत्सव राजा-सहित सारी प्रजा ने मनाया ॥१३०॥ तदनन्तर, चन्द्रस्वामी भी किसी देवता का अवतार है ऐसा समझा जाकर जनता से और राजा से धन आदि द्वारा सम्मान किया गया ॥१३१॥ वह चन्द्रस्वामी मन्त्री के घर पर अपने पुत्र महीपाल और कन्या चन्द्रवती को देखता हुआ सम्मान के साथ रहने लगा ॥१३२॥ वे तीनों परस्पर एक दूसरे को पहचानते हुए भी मौन रहे। कार्य की अपेक्षा करके बुद्धिमान् व्यक्ति असमय में प्रकट नहीं होते ॥१३३॥ कुछ दिनों के अनन्तर महीपाल के गुणों से मुग्ध राजा तारावर्मा ने उसे तारावती नाम की अपनी कन्या दे दी ॥१३४॥ और साथ ही उस पुत्रहीन राजा ने अपने राज्य का आधा भाग और सारे राज्य का भार भी उसे देकर स्वयं शान्ति प्राप्त की ॥१३५॥ महीपाल भी राज्य प्राप्त करके और चन्द्रस्वामी को अपना वास्तविक पिता घोषित करके तथा अपनी छोटी बहन का योग्य पात्र के साथ विवाह कराके सुखपूर्वक रहने लगा ॥१३६॥ एकबार महीपाल के पिता चन्द्रस्वामी ने उससे कहा-‘चलो अपनी माता को लाने के लिए अपने गाँव को चल ॥१३७॥

१५४ कथासरित्सागर

१५४ कथासरित्सागर राज्यस्य र्खा हि बुद्ध्वा सा रूप सेनास्मि विस्मृता। इति श्रुत्वा शपेज्जातु पुत्रातिचिरकुक्षिता ॥१३८॥ मातापितृभ्यां शप्त सन् जातु सुखमश्नुते। तथा चतां पुरावृत्तां वणिक्पुत्रकथां शृणु ॥१३९॥ चक्रधरगत लोभवत्पुत्रयोः कथा चक्रो नाम वणिक्पुत्रो धवलाख्येऽभवत्पुरे। सोऽनिच्छतोरगात्पित्रो स्वर्णद्वीपं वणिग्गया ॥१४०॥ तत स पञ्चभिर्वर्षैरुपार्जितमहाधनः। आगच्छन्नारुरोहाग्र्यौ वहन रत्नपूरितम् ॥१४१॥ अल्पावशेषे गन्तव्ये वारिधौ तस्य चोन्नदन्। उदतिष्ठन् महावातवर्षवेगाकुलोऽम्बुद ॥१४२॥ पित्राववमन्यैष किमायातः इतीव तम्। क्षोधारप्रवहण तस्य निर्बभञ्जुर्गहोर्मयः ॥१४३॥ तस्या रूडेपि हतास्तोयमकरैः कुत्रपि भक्षिताः। चक्रस्त्वायूर्वलाभीत्वा तीरे क्षिप्तश्च वीचिभिः ॥१४४॥ सत्रस्तो निसह स्वप्न इव रौत्रासिताकृतिम्। पाशहस्त ददर्शैक पुरुष स वणिक्सुत ॥१४५॥ तेनोत्क्षिप्य च नीतोऽभूत्स चक्रः पाशवेष्टितः। दूरं सिंहासनस्थेन पुरुषेणाधिष्ठां सभाम् ॥१४६॥ तस्याज्ञायासनस्थस्य तेनैव स वणिग्युवा। नीत्वा पाशमुता लोहमये गेहे न्यवेश्यत ॥१४७॥ तत्रान्तः पीड्यमानं स चक्रः पुरुषमैक्षत। मूर्ध्नि तप्तेन लोहेन चक्रेण भ्रमतामिधम् ॥१४८॥ कस्स्त्वं केनाधुनेनेव तव जीवस्यहो कथम्। इत्यपृच्छत् स चक्रन्तं सोऽप्येव प्रत्युवाच तम् ॥१४९॥ शृङ्गाख्योऽहं वणिक्पुत्र पित्रोर्यच्च वचो मया। न कृतं तेन सङ्क्रुद्धौ तौ मामशपतां क्रुधा ॥१५०॥ धिट्स्त्वायससन्तप्तचक्रभ्रमी नौ दुनोपि यद्। तदीदृश्येव ते पीडा दुराचार भविष्यति ॥१५१॥ इत्युक्त्वा तौ विरम्पोभौ रुदन्त मामबोधताम्। मा रोदीरेकमेवास्तु मासं पीडा तवेद्‌दृशी ॥१५२॥

नवम लम्बक १५५

नवम लम्बक १५५ तुमको राजा हुए जानकर, उसने मुझे कैसे भुला दिया यह सोचकर चिरदुःखिता माता क्रोध करके कभी तुम्हें शाप न दे दे ।।१३८।। माता और पिता से शापित व्यक्ति कभी सुख नहीं पाता इस सम्बन्ध में एक पुरानी कहानी कहता हूँ सुनो ।।१३९।। चक्र और खड्ग नामक वैश्यपुत्रों की कथा प्राचीन समय में चक्रपुर में चक्र नाम का एक वैश्य-पुत्र था। वह माता-पिता के द्वारा मना किये जाने पर भी उनकी इच्छा के विरुद्ध व्यापार के लिए सुवर्णद्वीप चला गया ।।१४०।। पाँच वर्षों में वहाँ से पर्याप्त द्रव्य उपार्जित करके लौटते हुए वह रत्नों से भरी नाव पर चढ़ा ।।१४१।। जब स्वदेश का किनारा कुछ ही शेष रह गया तब आकाश में सहसा आँधी-पानी की बौछार के साथ भारी बादल-दल उमड़ पड़ा ।।१४२।। यह माता-पिता की आज्ञा के विरुद्ध व्यापार करने क्यों गया मानों इसी क्रोध से समुद्र की ऊँची-ऊँची तरंगों ने उसकी नाव को तोड़-फोड़ डाला ।।१४३।। नाव में बैठे हुए अनेक व्यक्ति पानी में बह गये कितनों को मगर निगल गये और आयु शेष रहने के कारण लहरों ने चक्र को किनारे पर ला पटका ।।१४४।। किनारे पर बेहोश और असहाय पड़े हुए स्वप्न में जैसे उसने हाथ में फांस लिये हुए एक भयंकर पुरुष को देखा ।।१४५।। वह पुरुष चक्र को पाश से बाँधकर एक सभा में ले गया जहाँ दूर पर एक व्यथित सिंहासन पर बैठा था ।।१४६।। उसी सिंहासन पर बैठे हुए व्यक्ति की आज्ञा से पाशधारी पुरुष ने उसे एक लोहे की कोठरी में पटक दिया ।।१४७।। उस कोठरी के अन्दर चक्र ने सिर पर घूमते हुए लोहे के गरम चक्र से पीड़ित एक दूसरे पुरुष को देखा ।।१४८।। और पूछा—'तू कौन है तथा इस कष्ट से किस प्रकार तू जी रहा है? तब उसने कहा—।।१४९।। "मैं खड्ग नाम का वैश्यपुत्र हूँ। मैंने माता-पिता की बात नहीं मानी इससे क्रुद्ध होकर उन्होंने मुझे शाप दिया कि तू सिर पर रखे हुए लोहे के चक्र के समान हम लोगों को त्रास देता है, इसलिए हे दुराचारी तुझे भी ऐसी ही अनुपम पीड़ा होगी ।।१५०-१५१।। ऐसा कहकर और रोते हुए मुझे देखकर वे बोले—'रोओ मत ऐसी पीड़ा तुझे केवल एक मास तक ही होगी' ।।१५२।।

१५६ कथासरित्सागर

१५६ कथासरित्सागर

तच्छ्रुत्वाहं शुचा भीत्या तद्दिनं शयनाशितः । निशि स्वप्न इवाद्राक्षं भीमं पुरपमागतम् ॥१५३॥ सेनादाय बलेनाहमस्मिंल्लोहमये गृहे । क्षिप्तो यस्तं च मे मूर्ध्नि ज्वलच्चक्रमिदं भ्रमतु ॥१५४॥ इति मे पितृशापोऽयं तेन प्राणा न यान्ति मे । स च मासोऽद्य सम्पूर्णो न च मुच्य सभाप्यहम् ॥१५५॥ इत्युक्तवन्तं तं खड्गं स चक्रः सङ्घपोऽब्रवीत् । पित्रोः प्रवसतामार्थे मयापि न कृतं वचः ॥१५६॥ प्राप्तं नङ्क्ष्यति तं वित्तमिति मां शपत स्म तौ । तन्नाम्न मे धनं नष्टं कृत्स्नं द्वीपान्तरार्जितम् ॥१५७॥ एषव वार्तां श्रायत्र तत्सोऽयं जीवितन मे । दह्यतन्मूर्ध्नि मे चक्रं खड्ग शापोऽपयातु ते ॥१५८॥ इति चक्रे वदत्यय वाणी दिव्यात्र शुश्रुवे । खड्ग मुक्तोऽसि चक्रस्य मूर्द्धयेतन्चक्रमपर्यं ॥१५९॥ सञ्छ्रुत्वा चक्रशिरसि न्यस्तचक्रस्तदव सः । खड्गः केनाप्यवृश्यन निन्ये पितृगृहं ततः ॥१६०॥ तत्रासीत् स पुनः पित्रोरनुलङ्घितशासनः । चक्रस्त्वादाम तन्मूर्ध्नि चक्रं तत्रैवमभ्यधात् ॥१६१॥ पापिमोज्येऽपि मुच्यन्तां पृथ्व्यां तत्पातरपि । व्या पापक्षयमेतन्मे चक्रं भ्राम्यतु मूर्धनि ॥१६२॥ इत्युक्तवन्तं तं चक्रं धीरसत्त्वं नभःस्थिताः । पुष्पवृष्टिमुजो देवाः परितुष्ट्येवमब्रुवन् ॥१६३॥ साधु साधु महासत्त्व क्षान्तं कक्षणयानया । पापं ते व्रज वित्तं च तवाक्षम्यं भविष्यति ॥१६४॥ इत्युक्तवत्सु देवेषु चक्रस्य शिरसः क्षणात् । श्वायसं तस्य सचक्र जगाम क्वाप्यदर्शनम् ॥१६५॥ त्क्षमोपेत्याम्बरावेको विद्याधरकुमारकः । तुष्टेनेन्द्रप्रेषितं दत्त्वा महार्हं रत्नसञ्चयम् ॥१६६॥ मङ्के कृर्व्वथ स चक्रं नगरं धवलाभिधम् । निजं तत्प्रापयामास जगाम च यथागतम् ॥१६७॥

नवम लम्बक ३५७

नवम लम्बक ३५७ यह सुनकर उस दिन को मैंने बड़े दुःख के साथ बिताया और रात में स्वप्न के समान आये हुए एक भयंकर पुरुष को देखा ॥१५३॥ उस पुरुष ने मुझे बलपूर्वक उठाया और इस लोहे की कोठरी में लाकर पटक दिया और तब मेरे सिर पर इस घूमते हुए गरम चक्र को लगा दिया ॥१५४॥ इस प्रकार, यह मुझे मेरे माता-पिता का शाप है। मेरे प्राण ही नहीं निकल रहे हैं, यद्यपि भयंकर वेदना हो रही है। शाप की अवधि का एक मास आज पूरा होगया फिर भी मैं इस कष्ट से नहीं छूट रहा हूँ" ॥१५५॥ इस प्रकार कहते हुए लब्ध से दयालु चक्र बोला- धन के लिए द्वीपान्तर जाते हुए मैंने माता-पिता की बात नहीं मानी थी तो उन्होंने शाप दिया था कि तेरा कमाया हुआ भी धन नष्ट हो जायगा। इसी कारण द्वीपान्तर से कमाया हुआ मेरा सारा धन समुद्र में डूब गया। ॥१५६-१५७॥ यही वृत्तान्त मेरा है। अब इस जीवन से क्या लाभ है। इस चक्र को मेरे सिर पर रख दो। तुम्हारा शाप नष्ट हो' ॥१५८॥ वह जब इस प्रकार कह ही रहा था कि इतने में उसने आकाशवाणी सुनी कि 'हे लब्ध तू छूट गया। इस चक्र को चक्र के सिर पर रख दे' ॥१५९॥ यह सुनकर अपने सिर से चक्र को चक्र के सिर पर रखकर, लब्ध किसी अदृश्य शक्ति के द्वारा पिता के घर ले जाया गया ॥१६०॥ अब वह अपने घर में माता-पिता की आज्ञा का पालन करता हुआ रहने लगा। उधर चक्र को सिर पर लेकर चक्र ने यह कहा- पृथ्वी पर और जो भी मेरे समान पापी हों वे पाप से छूट जाँय जबतक पापों का नाश न हो तबतक यह चक्र मेरे सिर पर घूमता रहे ॥१६१-१६२॥ इस प्रकार के धैर्यशाली चक्र पर आकाश से देवताओं ने पुष्पों की वर्षा की और वे प्रसन्न होकर बोले-॥१६३॥ 'हे महापुरुष ठीक है ठीक है, तेरी इस अपार करुणा से तेरे पाप नष्ट हो गये। अब जाओ तुम्हारे पास अक्षय धन होगा ॥१६४॥ देवताओं के इस प्रकार कहने पर चक्र के सिर से वह लोहे का जलता चक्र अदृश्य हो गया ॥१६५॥ और, आकाश से उतरकर आये हुए एक विद्याधर ने इन्द्र द्वारा भेजे गये अमूल्य रत्नों का ढेर उसे दिया ॥१६६॥ और, चक्र को पोत में उठाकर, उसे उसके धवलपुर में पहुँचाकर वह विद्याधर जैसे आया था वैसे ही चला गया ॥१६७॥ ८१

६५८ कथासरित्सागर

६५८ कथासरित्सागर सोऽथ चक्रोऽन्तिकं पित्रोः प्राप्यानन्दितबान्धवः। तस्थावाख्यातवृत्तान्तस्तत्र धर्मपरिश्च्युतः॥१६८॥ इत्याख्याय महीपालं चन्द्रस्वाम्यवदत् पुनः। ईदृक्पापफलं पुत्र मातापित्रोर्विरोधनम्॥१६९॥ काममेमुस्तु सद्मभितस्तथाप्येषां कथां शृणु। गर्विणो मुनेः पतिव्रताया धर्मव्याधस्य च कथा आसीत्कोऽपि मुनिः पूर्वं वनचारी महातपाः॥१७०॥ तरुच्छायोपविष्टस्य तस्योपरि बलाकया। विष्ठा कदाचिन्मुक्ताभूत्सोऽथ क्रुद्धो ददर्श ताम्॥१७१॥ दृष्टमात्रैव सा तेन बलाका भस्मसादभूत्। तपःप्रभावाहङ्कारं स च भेजे ततो मुनिः॥१७२॥ एकदा नगरे क्वापि स ब्राह्मणगृहं मुनिः। एकं प्रविश्य गृहिणीं तत्र भिक्षामयाचत॥१७३॥ प्रतीक्षस्व मनाग्भर्तुः परिचर्यां समापये। इति तं सा च गृहिणी निजगाद पतिव्रता॥१७४॥ ततस्तं क्रुद्धया दृष्ट्या वीक्षमाणं विहस्य सा। अभाषत मुने नाहं बलाका मुच्यतामिति॥१७५॥ श्रुत्वैतत्स मुनिस्तस्याश्चक्षुर्विस्मार साऽभूत्। एतत्कथमिव ज्ञातमनयेति विचिन्तयन्॥१७६॥ ततः कृत्वानिकायर्द्धिः शुश्रूषां भर्तुरत्र सा। साध्वी भिक्षां समादाय तस्यागादन्तिकं मुनेः॥१७७॥ सोऽथ बद्धाञ्जलिर्भूत्वा मुनिस्तमब्रवत्सतीम्। कथं बलाकावृत्तान्तः परोक्षोऽपि मम त्वया॥१७८॥ ज्ञात इत्यादितो ब्रूहि भिक्षां गृह्णाम्यहं ततः। इत्युक्तवन्तं तमृषिं साबोचत् पतिवेवता॥१७९॥ न भर्तृभक्तेरपरं धर्मं कञ्चन वेद्म्यहम्। तेन मे तत्प्रसादेन विज्ञानबलमीदृशम्॥१८०॥ किं चेह धर्मव्याधस्य मांसविक्रयजीविनः। गत्वा पश्य ततः श्रेयो निरहङ्कारमाप्स्यसि॥१८१॥ एवं सर्वविदा प्रोक्तः स पतिव्रतया मुनिः। गृहीत्वातिथिभागस्तां प्रणम्य निरगात्ततः॥१८२॥