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संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ

अध्याय ४५ ] वामन-अवतारकी कथा १६७

अध्याय ४५ ] वामन-अवतारकी कथा १६७ सजलं हेमकलशं गृहीत्वोत्थाय भक्तितः। | इस प्रकार आज्ञा देनेपर स्वयं राजा बलि जलसे भरे हुए यावत्स वामनकरे तोयं दातुमुपस्थितः॥ ३५ | सुवर्णकलशको लेकर भक्तिपूर्वक खड़े हो गये और | ज्यों ही वामनजीके हाथमें जल देनेको उद्यत हुए, त्यों तावच्छुक्रः कलशगो जलधारां रुरोध ह। | ही शुक्राचार्यने [योगबलसे] कलशमें घुसकर गिरती ततश्च वामनः क्रुद्धः पवित्राग्रेण सत्तम॥ ३६ | हुई जलधारा रोक दी। सत्तम! तब वामनजीने क्रुद्ध | होकर पवित्र (कुश)-के अग्रभागसे कलशके छेदमें उदके कलशद्वारि तच्छुक्राक्षिमवेधयत्। | जल निकलनेके मार्गपर स्थित हुए शुक्राचार्यकी एक ततो व्यपगतः शुक्नो विद्धैकाक्षो नरोत्तम॥ ३७ | आँख छेद डाली। नरोत्तम! एक आँख छिद जानेपर | शुक्राचार्य उसमेंसे निकल भागे॥ ३४-३७॥ तोयधारा निपतिता वामनस्य करे पुनः। | करे निपतिते तोये वामनो ववृधे क्षणात्॥ ३८ | तत्पश्चात् वामनजीके हाथमें जलकी धारा गिरी। | हाथपर जल पड़ते ही वामनजी क्षणभरमें ही बहुत बड़े पादेनैकेन विक्रान्ता तेनैव सकला मही। | हो गये। सत्तम! उन्होंने एक पगसे यह सम्पूर्ण पृथ्वी नाप अन्तरिक्षं द्वितीयेन द्यौस्तृतीयेन सत्तम॥ ३९ | ली, द्वितीय पगसे अन्तरिक्षलोक तथा तृतीय पगसे | स्वर्गलोकको आक्रान्त कर लिया। फिर अनेक दानवोंका अनेकान् दानवान् हत्वा हृत्वा त्रिभुवनं बलेः। | संहार करके बलिसे त्रिभुवनका राज्य छीन लिया और पुरंदराय त्रैलोक्यं दत्त्वा बलिमुवाच ह॥ ४० | यह त्रिलोकी इन्द्रको अर्पितकर पुनः बलिसे कहा— यस्मात्ते भक्तितो दत्तं तोयमद्य करे मम॥ | 'तुमने भक्तिपूर्वक आज मेरे हाथमें संकल्पका जल अर्पित तस्मात्ते साम्प्रतं दत्तं पातालतलमुत्तमम्॥ ४१ | किया है, इसलिये इस समय मैंने तुम्हें उत्तम पाताललोकका | राज्य दिया। महाभाग! वहाँ जाकर तुम मेरे प्रसादसे राज्य तत्र गत्वा महाभाग भुङ्क्ष्व त्वं मत्प्रसादतः। | भोगो; वैवस्वत मन्वन्तर व्यतीत हो जानेपर तुम पुनः वैवस्वतेऽन्तरेऽतीते पुनरिन्द्रो भविष्यसि॥ ४२ | इन्द्रपदपर प्रतिष्ठित होओगे'॥ ३८-४२॥ प्रणाम्य च ततो गत्वा तलं भोगमवाप्तवान्॥ ४३ | | तब बलिने भगवान्‌को प्रणाम करके पातालतलमें शुक्रोऽपि स्वर्गमारुह्य प्रसादाद्वामनस्य वै। | जाकर वहाँ उत्तम भोगोंको प्राप्त किया। राजन्! शुक्राचार्य समागतस्त्रिभुवनं राजन् देवसमन्वितः॥ ४४ | भी भगवान् वामनकी कृपासे त्रिभुवनकी राजधानी स्वर्गमें | आकर सब देवताओंके साथ सुखपूर्वक रहने लगे। जो यः स्मरेत्प्रातरुत्थाय वामनस्य कथामिमाम्। | मनुष्य प्रातःकाल उठकर भगवान् वामनकी इस कथाका सर्वपापविनिर्मुक्तो विष्णुलोके महीयते॥ ४५ | स्मरण करता है, वह सब पापोंसे मुक्त होकर विष्णुलोकमें इत्थं पुरा वामनरूपमास्थितो | प्रतिष्ठित होता है। नृप! इस प्रकार पूर्वकालमें भगवान् हरिर्बलेर्हृत्य जगत्त्रयं नृप। | विष्णुने वामनरूप धारणकर त्रिभुवनका राज्य बलिसे ले कृत्वा प्रसादं च दिवौकसाम्पते- | लिया और उसे कृपापूर्वक देवराज इन्द्रको अर्पित कर र्दत्त्वा त्रिलोकं स ययौ महोदधिम्॥ ४६ | दिया। तत्पश्चात् वे क्षीरसागरको चले गये॥ ४३-४६॥ इति श्रीनरसिंहपुराणे वामनप्रादुर्भावे पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः॥ ४५॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'वामनावतार' विषयक पैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ४५॥ In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth

१६८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ४६

१६८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ४६ छियालीसवाँ अध्याय परशुरामावतारकी कथा

मार्कण्डेय उवाच अतः परं प्रवक्ष्यामि प्रादुर्भावं हरेः शुभम्। जामदग्न्यं पुरा येन क्षत्रमुत्सादिंतं शृणु॥ १ पुरा देवगणैर्विष्णुः स्तुतः क्षीरोदधौ नृप। ऋषिभिश्च महाभागैर्जमदग्नेः सुतोऽभवत्॥ २ परशुराम इति ख्यातः सर्वलोकेषु स प्रभुः। दुष्टानां निग्रहं कर्तुमवतीर्णो महीतले॥ ३ कृतवीर्यसुतः श्रीमान् कार्तवीर्योऽभवत् पुरा। दत्तात्रेयं समाराध्य चक्रवर्त्तित्वमाप्तवान्॥ ४ स कदाचिन्महाभागो जमदग्न्याश्रमं ययौ। जमदग्निस्तु तं दृष्ट्वा चतुरङ्गबलान्वितम्॥ ५ उवाच मधुरं वाक्यं कार्तवीर्यं नृपोत्तमम्। मुच्यतामत्र ते सेना अतिथित्वं समागतः। वन्यादिकं मया दत्तं भुक्त्वा गच्छ महामते॥ ६ प्रमुच्य सेनां मुनिवाक्यगौरवात् स्थितो नृपस्तत्र महानुभावः। आमन्त्र्य राजानमलङ्घ्यकीर्ति- र्मुनिः स धेनुं च दुदोह दोग्ध्रीम्॥ ७ हस्त्यश्वशाला विविधा नराणां गृहाणि चित्राणि च तोरणानि। सामन्तयोग्यानि शुभानि राजन् समिच्छतां यानि सुकाननानि॥ ८ गृहं वरिष्ठं बहुभूमिकं पुनः समन्वितं साधुगुणैरुपस्करैः। दुग्ध्वा प्रकल्पन् मुनिराह पार्थिवं गृहं कृतं ते प्रविशेह राजन्॥ ९ इमे च मन्त्रिप्रवरा जनास्ते गृहेषु दिव्येषु विशन्तु शीघ्रम्। हस्त्यश्वजात्यश्च विशन्तु शालां भृत्याश्च नीचेषु गृहेषु सन्तु॥ १०

मार्कण्डेयजी बोले—राजन्! अब मैं भगवान् विष्णुके जामदग्न्य (परशुराम) नामक शुभ अवतारका वर्णन करता हूँ, जिसने पूर्वकालमें क्षत्रियवंशका उच्छेद किया था; उस प्रसङ्गको सुनो॥ १॥ नरेश्वर! पहलेकी बात है, क्षीरसागरके तटपर देवताओं और महाभाग ऋषियोंने भगवान् विष्णुकी स्तुति की; इससे वे जमदग्नि मुनिके पुत्रके रूपमें अवतीर्ण हुए। वे भगवान् सम्पूर्ण लोकोंमें 'परशुराम' नामसे विख्यात थे और दुष्ट राजाओंका नाश करनेके लिये ही इस भूतलपर अवतीर्ण हुए थे। उनके अवतारसे पूर्व राजा कृतवीर्यका पुत्र 'कार्तवीर्य' हुआ था, जिसने दत्तात्रेयजीकी आराधना करके सार्वभौम राज्य प्राप्त कर लिया था। एक समय वह महाभाग नरेश जमदग्नि ऋषिके आश्रमपर गया। उसके साथ चतुरङ्गिणी सेना थी। उस राजाको चतुरङ्गिणी सेनाके साथ आश्रमपर आया देख जमदग्निने नृपवर कार्तवीर्यसे मधुर वाणीमें कहा—'महामते! आप मेरे अतिथि होकर यहाँ पधारे हैं; अतः आज अपनी सेनाका पड़ाव यहीं डालिये और मेरे दिये हुए वन्य फल आदिका भोजन करके कल यहाँसे जाइयेगा' ॥ २–६॥ महानुभाव राजा कार्तवीर्य मुनिके वाक्यका गौरव मानकर अपनी सेनाको वहीं ठहरनेका आदेश दे वहाँ रह गया। इधर अलङ्घ्य यशवाले मुनिने राजाको आमन्त्रित करके अपनी कामधेनु गौका दोहन किया। राजन्! उन्होंने अनेकानेक गजशाला, अश्वशाला, मनुष्योंके रहनेयोग्य विचित्र गृह और तोरण (द्वार) आदिका दोहन किया। सामन्त नरेशोंके रहनेयोग्य सुन्दर भवन, जिनमें बगीचे आदिकी इच्छा रखनेवालोंके लिये सुन्दर उद्यान थे, दोहनद्वारा प्रस्तुत किये। फिर अनेक मंजिलोंका श्रेष्ठ महल, जिसमें सुन्दर एवं उपयोगी सामान संचित थे, गोदोहनके द्वारा उपलब्ध करके मुनिने भूपालसे कहा—'राजन्! आपके लिये महल तैयार है। आप इसमें प्रवेश कीजिये। आपके ये श्रेष्ठ मन्त्री तथा और लोग भी शीघ्र ही इन दिव्य गृहोंमें प्रवेश करें। विभिन्न जातियोंके हाथी और घोड़े आदि भी गजशाला और अश्वशालामें रहें तथा भृत्यगण भी इन छोटे घरोंमें निवास करें' ॥ ७–१०॥

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अध्याय ४६ ] परशुरामावतारकी कथा १६९

इत्युक्तमात्रे मुनिना नृपोऽसौ मुनिके इस प्रकार कहते ही राजा कार्तवीर्यने उस गृहं वरिष्ठं प्रविवेश राजा। उत्तम गृहमें प्रवेश किया। फिर दूसरे लोग दूसरे-दूसरे अन्येषु चान्येषु गृहेषु सत्सु गृहोंमें प्रविष्ट हुए। इस प्रकार सबके यथास्थान स्थित मुनिः पुनः पार्थिवमाबभाषे॥ ११ हो जानेपर मुनिने पुनः राजा कार्तवीर्यसे कहा—'नरेश्वर! आपको स्नान करानेके लिये मैंने इन सौ उत्तम स्त्रियोंको स्नानप्रदानार्थमिदं मया ते नियत किया है। जैसे स्वर्गमें देवराज इन्द्र अप्सराओंके प्रकल्पितं स्त्रीशतमुत्तमं नृप। नृत्य-गीत सुनते हुए स्नान करते हैं, उसी प्रकार आप स्नाहि त्वमद्यात्र यथाप्रकामं भी इन स्त्रियोंके नृत्य-गीतसे आनन्दित हो इच्छानुसार यथा सुरेन्द्रो दिवि नृत्यगीतैः॥ १२ स्नान कीजिये'॥ ११-१२॥ स स्नातवांस्तत्र सुरेन्द्रवन्नृपो भूप! (मुनिकी आज्ञासे) वहाँ राजा कार्तवीर्यने गीत्यादिशब्दैर्मधुरैश्च वाद्यैः। इन्द्रकी भाँति मधुर वाद्यों और गीत आदिके शब्दोंसे स्नातस्य तस्याशु शुभे च वस्त्रे आनन्दित होते हुए स्नान किया। स्नान कर लेनेपर मुनिने ददौ मुनिर्भूप विभूषिते द्वे॥ १३ उन्हें दो सुन्दर सुशोभित वस्त्र दिये। धौतवस्त्र पहन और ऊपरसे चादर ओढ़कर राजाने नित्य-नियम करनेके परिधाय वस्त्रं च कृतोत्तरीयः बाद भगवान् विष्णुकी पूजा की। फिर उन मुनिवरने कृतक्रियो विष्णुपूजां चकार। गौसे अन्नमय महान् पर्वतका दोहन करके राजा तथा मुनिश्च दुग्ध्वान्नमयं महागिरिं राजसेवकवृन्दको अर्पित किया। नृप! राजा तथा उनके नृपाय भृत्याय च दत्तवानसौ॥ १४ भृत्यगणोंने जबतक भोजनका कार्य सम्पन्न किया, तबतक सूर्यदेव अस्ताचलको चले गये। तब उन्होंने रातको भी यावत्स राजा बुभुजे सभृत्य- मुनिके बनाये हुए उस भवनमें गीत आदि विनोदोंसे स्तावच्च सूर्यो गतवान् नृपास्तम्। आनन्दित हो शयन किया॥ १३-१५॥ रात्रौ च गीतादिविनोदयुक्तः शेते स राजा मुनिनिर्मिते गृहे॥ १५ तदनन्तर निर्मल प्रभातकाल होते ही स्वप्नमें मिली ततः प्रभाते विमले स्वप्नलब्धमिवाभवत्। हुई सम्पत्तिके समान सब कुछ लुप्त हो गया। फिर वहाँ भूमिभागं ततः कंचिद् दृष्ट्वासौ चिन्तयन्नृपः॥ १६ केवल कोई भूभागमात्र ही अवशिष्ट देख राजाने मन- ही-मन विचार किया और अपने पुरोहितसे पूछा— किमियं तपसः शक्तिर्मुनेरस्य महात्मनः। 'महाभाग पुरोहितजी! यह महात्मा जमदग्नि मुनिके सुरभ्या वा महाभाग ब्रूहि मे त्वं पुरोहित॥ १७ तपकी शक्ति थी या कामधेनु गौकी? इसे आप मुझे बताइये।' कार्तवीर्यके इस प्रकार पूछनेपर पुरोहितने इत्युक्तः कार्तवीर्येण तमुवाच पुरोहितः। उससे कहा—'राजन्! मुनिमें भी सामर्थ्य है, परंतु यह मुनेः सामर्थ्यमप्यस्ति सिद्धिश्चेयं हि गोर्नृप॥ १८ सिद्धि तो गौकी ही थी। तो भी नरेश्वर! आप लोभवश उस गौका अपहरण न करें; क्योंकि जो उसे हर लेनेकी तथापि सा न हर्तव्या त्वया लोभान्नराधिप। इच्छा करता है, उसका निश्चय ही विनाश हो जाता यस्त्वेतां हर्तुमिच्छेद वै तस्य नाशो ध्रुवं भवेत्॥ १९ है'॥ १६-१९॥

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१७० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ४६

१७० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ४६ अथ मन्त्रिवरः प्राह ब्राह्मणो ब्राह्मणप्रियः। | यह सुनकर राजाके प्रधान मन्त्रीने कहा—'महाराज! राजकार्यं न पश्येद् वै स्वपक्षस्यैव पोषणात्॥ २० | ब्राह्मण ब्राह्मणका ही प्रेमी होता है, वह अपने पक्षका | पोषण करनेके कारण राजाके कार्यकी कोई परवाह नहीं हे राजंस्त्वयि तिष्ठन्ति गृहाणि विविधानि च। | करता। राजन् ! उस गौको पाकर आपके पास तत्काल तथा सुवर्णपात्राणि शयनादीनि च स्त्रियः॥ २१ | गुप्त हो जानेवाले नाना प्रकारके घर, सोनेके पात्र, | शय्यादि तथा सुन्दरी स्त्रियाँ—ये सब सामान प्रस्तुत तां धेनुं प्राप्य राजेन्द्र लीयमानानि तत्क्षणात्। | रहेंगे, जिन्हें हम लोगोंने वहाँ प्रत्यक्ष देखा है। इस उत्तम अस्माभिस्तत्र दृष्टानि नीयतां धेनुरुत्तमा॥ २२ | धेनुको आप अवश्य ले चलें। महामते राजेन्द्र! यह गौ | आपके ही योग्य है। भूपाल! यदि आपकी इच्छा हो तवेयं योग्या राजेन्द्र यदीच्छसि महामते। | तो मैं स्वयं जाकर इसे ले आऊँगा। आप केवल मुझे गत्वाहमानयिष्यामि आज्ञां मे देहि भूभुज॥ २३ | आज्ञा दीजिये'॥ २०—२३॥ इत्युक्तो मन्त्रिणा राजा तथेत्याह नृपोत्तम। | नृपवर! मन्त्रीके इस प्रकार कहनेपर राजाने 'बहुत सचिवस्तत्र गत्वाथ सुरभिं हर्तुमारभत्॥ २४ | अच्छा' कहकर अनुमति दे दी। फिर राजमन्त्री आश्रमपर | जाकर गौका अपहरण करने लगा। तब जमदग्नि मुनिने वारयामास सचिवं जमदग्निः समन्ततः। | उसे सब ओरसे मना किया, किंतु उसने उनकी बात न राजयोग्यामिमां ब्रह्मन् देहि राज्ञे महामते॥ २५ | मानते हुए कहा—'महाबुद्धिमान् ब्राह्मण! यह गौ राजाके | योग्य है; अतः इसे राजाको ही दे दीजिये। आप तो साग त्वं तु शाकफलाहारी किं धेन्वा ते प्रयोजनम्। | और फल खानेवाले हैं; आपको इस गायसे क्या काम इत्युक्त्वा तां बलाद्धृत्वा नेतुं मन्त्री प्रचक्रमे॥ २६ | है?' यों कहकर मन्त्री उस गौको बलपूर्वक ले जाने | लगा। राजन्! तब उस मुनिने स्त्रीसहित आकर उसे पुनः पुनः सभार्यः स मुनिर्वारयामास तं नृपम्। | रोका। इसपर उस दुष्टात्मा और ब्रह्महत्यारे मन्त्रीने उस ततो मन्त्री सुदुष्टात्मा मुनिं हत्वा तु तं नृप॥ २७ | मुनिका वध करके गौको ज्यों ही ले जाना चाहा, त्यों | ही वह दिव्य गौ आकाशमार्गसे चली गयी और राजा ब्रह्महा नेतुमारेभे वायुमार्गेण सा गता। | मन-ही-मन क्षुब्ध होकर माहिष्मती नगरीको लौट राजा च क्षुब्धहृदयो ययौ माहिष्मतीं पुरीम्॥ २८ | आया॥ २४—२८॥ मुनिपत्नी सुदुःखार्ता रोदयन्ती भृशं तदा। | राजन्! उस समय मुनिकी पत्नी दुःखसे पीडित त्रिस्सप्तकृत्वः स्वां कुक्षिं ताडयामास पार्थिव॥ २९ | होकर अत्यन्त विलाप करने लगी और प्राण त्याग देनेकी | इच्छासे अपनी कुक्षि (उदर) में उसने इक्कीस बार तच्छृण्वन्नागतो रामो गृहीतपरशुस्तदा। | मुक्का मारा। माताका विलाप सुनकर परशुरामजी वनसे पुष्पादीनि गृहीत्वा तु वनान्मातरमब्रवीत्॥ ३० | फूल आदि लेकर हाथमें कुल्हाड़ी लिये उसी समय आये | और मातासे बोले—'मा! इस प्रकार छाती पीटनेकी अलमम्ब प्रहारेण निमित्ताद् विदितं मया। | आवश्यकता नहीं है। मैं सब कुछ शकुनसे जान गया हूँ। हनिष्यामि दुराचारमर्जुनं दुष्टमन्त्रिणम्॥ ३१ | उस दुष्ट मन्त्रीवाले दुराचारी राजा अर्जुनका मैं अवश्य वध | करूँगा। मातः! चूँकि तुमने अपनी कुक्षिमें इक्कीस बार त्वयैकविंशवारेण यस्मात्कुक्षिश्च ताडिता। | प्रहार किया है, इसलिये मैं इस भूमण्डलके क्षत्रियोंका त्रिस्सप्तकृत्वस्तस्मात्तु हनिष्ये भुवि पार्थिवान्॥ ३२ | इक्कीस बार संहार करूँगा'॥ २९—३२॥ In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth

अध्याय ४७ ] श्रीरामवावतारकी कथा — श्रीरामके जन्मसे लेकर विवाहतकके चरित्र १७१ इति कृत्वा प्रतिज्ञां स गृहीत्वा परशुं ययौ । | इस प्रकार प्रतिज्ञा करके फरसा लेकर वे वहाँसे माहिष्मतीं पुरीं प्राप्य कार्तवीर्यमथाह्वयत् ॥ ३३ | चल दिये और माहिष्मती पुरीमें जाकर उन्होंने राजा युद्धार्थमागतः सोऽथ अनेकाक्षौहिणीयुतः । | कार्तवीर्य अर्जुनको ललकारा। तब वह अनेक अक्षौहिणी तयोर्युद्धमभूत्तत्र भैरवं लोमहर्षणम् ॥ ३४ | सेनाके साथ युद्धके लिये आया। वहाँ उन दोनोंमें पिशिताशिजनानन्दं शस्त्रास्त्रशतसंकुलम् । | महाभयानक रोमाञ्चकारी युद्ध हुआ, जो सैकड़ों अस्त्र- ततः परशुरामोऽभून्महाबलपराक्रमः ॥ ३५ | शस्त्रोंके प्रहारसे व्याप्त तथा मांस खानेवाले प्राणियोंको परं ज्योतिरचिन्त्यात्मा विष्णुः कारणमूर्तिमान् । | आनन्द देनेवाला था। उस समय परशुरामजी अपनेमें कार्तवीर्यबलं सर्वमनेकैकः क्षत्रियैः सह ॥ ३६ | अचिन्त्यस्वरूप, परम ज्योतिर्मय, कारणमूर्ति भगवान् हत्वा निपात्य भूमौ तु परमाद्भुतविक्रमः । | विष्णुकी भावना करके महान् बल और पराक्रमसे कार्तवीर्यस्य बाहूनां वनं चिच्छेद रोषवान् । | सम्पन्न हो गये। उन्होंने परम आश्चर्यमय पौरुष प्रकट छिन्ने बाहुवने तस्य शिरश्चिच्छेद भार्गवः ॥ ३७ | करते हुए कार्तवीर्यकी असंख्य क्षत्रियोंसे युक्त सम्पूर्ण विष्णुहस्ताद्वधं प्राप्य चक्रवर्ती स पार्थिवः । | सेनाको मारकर भूमिपर गिरा दिया और रोषसे भरकर दिव्यरूपधरः श्रीमान् दिव्यगन्धानुलेपनः ॥ ३८ | कार्तवीर्यकी समस्त भुजाएँ काट डालीं। उसके बाहुवनका दिव्यं विमानमारुह्य विष्णुलोकमवासवान् । | उच्छेद हो जानेपर भृगुनन्दन परशुरामने उसका मस्तक क्रोधात्परशुरामोऽपि महाबलपराक्रमः ॥ ३९ | भी धड़से अलग कर दिया ॥ ३३-३७॥ त्रिसप्तकृत्वो भूम्यां वै पार्थिवान्निजघान सः । | इस प्रकार वह चक्रवर्ती राजा कार्तवीर्य श्रीभगवान् क्षत्रियाणां वधात्तेन भूमेर्भारोऽवतारितः ॥ ४० | विष्णुके हाथसे वधको प्राप्त होकर दिव्यरूप धारण करके, भूमिश्च सकला दत्ता कश्यपाय महात्मने । | श्रीसम्पन्न एवं दिव्य चन्दनोंसे अनुलिप्त होकर, दिव्य इत्येष जामदग्न्याख्यः प्रादुर्भावो मयोदितः ॥ ४१ | विमानपर आरूढ़ हो, विष्णुधामको प्राप्त हुआ। फिर यश्च तच्छृणुयाद्भक्त्या सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ ४२ | महान् बल और पराक्रमवाले परशुरामजीने भी इस पृथ्वीके अवतीर्य भूमौ हरिरेष साक्षात् | क्षत्रियोंका इक्कीस बार संहार किया। इस प्रकार क्षत्रियोंका त्रिसप्तकृत्वः क्षितिपान्निहत्य सः । | वध करके उन्होंने भूमिक भार उतारा और सम्पूर्ण पृथ्वी क्षात्रं च तेजो प्रविभज्य राजन् | महात्मा कश्यपजीको दान कर दी ॥ ३८-४० १/२ ॥ रामः स्थितोऽद्यापि गिरौ महेन्द्रे ॥ ४३ | इस प्रकार मैंने तुमसे यह 'जामदग्न्य' (परशुराम) नामक अवतारका वर्णन किया। जो भक्तिपूर्वक इसका श्रवण करता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। राजन्! इस तरह पृथ्वीपर अवतीर्ण होनेके बाद ये साक्षात् भगवान् विष्णुस्वरूप परशुरामजी इक्कीस बार क्षत्रियोंको मारकर, क्षत्रियतेजको छिन्न-भिन्न करके आज भी महेन्द्र पर्वतपर विराजमान हैं ॥ ४१-४३॥ इति श्रीनरसिंहपुराणे परशुरामप्रादुर्भावो नाम षट्चत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४६ ॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'परशुरामावतार' नामक छियालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४६ ॥ ━━━━━━━━━━━━━━━━ सैंतालीसवाँ अध्याय श्रीरामावतारकी कथा - श्रीरामके जन्मसे लेकर विवाहतकके चरित्र श्रीमार्कण्डेय उवाच | श्रीमार्कण्डेयजी बोले - राजन् ! अब मैं भगवान् शृणु राजन् प्रवक्ष्यामि प्रादुर्भावं हरेः शुभम् । | विष्णुके उस शुभ अवतारका वर्णन करूँगा, जिसके द्वारा निहतो रावणो येन सगणो देवकण्टकः ॥ १ | देवताओंके लिये कण्टकस्वरूप रावण अपने गणोंसहित मारा गया। तुम [ध्यान देकर] सुनो ॥ १ ॥ In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth

१७२ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ४७

१७२ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ४७ ब्रह्मणो मानसः पुत्रः पुलस्त्योऽभून्महामुनिः । तस्य वै विश्रवा नाम पुत्रोऽभूत्तस्य राक्षसः ॥ २ तस्माज्जातो महावीरो रावणो लोकरावणः । तपसा महता युक्तः स तु लोकानुपाद्रवत् ॥ ३ सेन्द्रा देवा जितास्तेन गन्धर्वाः किंनरास्तथा । यक्षाश्च दानवाश्चैव तेन राजन् विनिर्जिताः ॥ ४ स्त्रियश्चैव सुरूपिण्यो हृतास्तेन दुरात्मना । देवादीनां नृपश्रेष्ठ रत्नानि विविधानि च ॥ ५ रणे कुबेरं निर्जित्य रावणो बलदर्पितः । तत्पुरीं जगृहे लङ्कां विमानं चापि पुष्पकम् ॥ ६ तस्यां पुर्यां दशग्रीवो रक्षसामधिपोऽभवत् । पुत्राश्च बहवस्तस्य बभूवुरमितौजसः ॥ ७ राक्षसाश्च तमाश्रित्य महाबलपराक्रमाः । अनेककोटयो राजन् लङ्कायां निवसन्ति ये ॥ ८ देवान् पितॄन् मनुष्यांश्च विद्याधरगणानपि । यक्षांश्चैव ततः सर्वे घातयन्ति दिवानिशम् ॥ ९ संत्रस्तं तद्भयादेव जगदासीच्चराचरम् । दुःखाभिभूतमत्यर्थं सम्बभूव नराधिप ॥ १० एतस्मिन्नेव काले तु देवाः सेन्द्रा महर्षयः । सिद्धा विद्याधराश्चैव गन्धर्वाः किंनरास्तथा ॥ ११ गुह्यका भुजगा यक्षा ये चान्ये स्वर्गवासिनः । ब्रह्माणमग्रतः कृत्वा शङ्करं च नराधिप ॥ १२ ते ययुर्हतविक्रान्ताः क्षीराब्धेस्तटमुत्तमम् । तत्राराध्य हरिं देवास्तस्थुः प्राञ्जलयस्तदा ॥ १३ ब्रह्मा च विष्णुमाराध्य गन्धपुष्पादिभिः शुभैः । प्राञ्जलिः प्रणतो भूत्वा वासुदेवमथास्तुवत् ॥ १४ ब्रह्मोवाच नमः क्षीराब्धिवासाय नागपर्यङ्कशायिने । नमः श्रीकरसंस्पृष्टदिव्यपादाय विष्णवे ॥ १५ नमस्ते योगनिद्राय योगान्तर्भाविताय च । तार्क्ष्यासनाय देवाय गोविन्दाय नमो नमः ॥ १६


[हिन्दी अनुवाद]

ब्रह्माजीके मानस पुत्र जो महामुनि पुलस्त्यजी हैं, उनके 'विश्रवा' नामक पुत्र हुआ। विश्रवाका पुत्र राक्षस रावण हुआ। समस्त लोकोंको रुलानेवाला महावीर रावण विश्रवासे ही उत्पन्न हुआ था। वह महान् तपसे युक्त होकर समस्त लोकोंपर धावा करने लगा। राजन्! उसने इन्द्रसहित समस्त देवताओं, गन्धर्वों और किंनरोंको जीत लिया तथा यक्षों और दानवोंको भी अपने वशीभूत कर लिया। नृपश्रेष्ठ! उस दुरात्माने देवता आदिकी सुन्दरी स्त्रियाँ और नाना प्रकारके रत्न भी हर लिये। बलाभिमानी रावणने युद्धमें कुबेरको जीतकर उनकी पुरी लङ्का और पुष्पक-विमानपर भी अधिकार जमा लिया॥ २—६॥

उस लङ्कापुरीमें दशमुख रावण राक्षसोंका राजा हुआ। उसके अनेक पुत्र उत्पन्न हुए, जो अपरिमित बलसे सम्पन्न थे। राजन्! लङ्कामें जो कई करोड़ महाबली और पराक्रमी राक्षस निवास करते थे, वे सभी रावणका सहारा लेकर देवता, पितर, मनुष्य, विद्याधर और यक्षोंका दिन-रात संहार किया करते थे। नराधिप! समस्त चराचर जगत् उसके भयसे भीत और अत्यन्त दुःखी हो गया था॥ ७—१०॥

नरेश! इसी समय जिनका पुरुषार्थ प्रतिहत हो गया था, वे इन्द्रसहित समस्त देवता, महर्षि, सिद्ध, विद्याधर, गन्धर्व, किंनर, गुह्यक, सर्प, यक्ष तथा जो अन्य स्वर्गवासी थे, वे ब्रह्मा और शङ्करजीको आगे करके क्षीरसागरके उत्तम तटपर गये। वहाँ उस समय देवतालोग भगवान्‌की आराधना करके हाथ जोड़कर खड़े हो गये। फिर ब्रह्माजीने गन्ध-पुष्प आदि सुन्दर उपचारोंद्वारा भगवान् वासुदेव विष्णुकी आराधना की और हाथ जोड़, प्रणाम करके वे उनकी स्तुति करने लगे ॥ ११—१४॥

ब्रह्माजी बोले— जो क्षीरसागरमें निवास करते हैं, सर्पकी शय्यापर सोते हैं, जिनके दिव्य चरण भगवती श्रीलक्ष्मीजीके कर-कमलोंद्वारा सहलाये जाते हैं, उन भगवान् विष्णुको नमस्कार है। योग ही जिनकी निद्रा है, योगके द्वारा अन्तःकरणमें जिनका ध्यान किया जाता है और जो गरुड़जीके ऊपर आसीन होते हैं, उन आप भगवान् गोविन्दको नमस्कार है।

अध्याय ४७ ] श्रीरामावतारकी कथा—श्रीरामके जन्मसे लेकर विवाहतकके चरित्र १७३ नमः क्षीराब्धिकल्लोलस्पृष्टमात्राय शार्ङ्गिणे । क्षीरसागरकी लहरें जिनके शरीरका स्पर्श करती हैं, जो नमोऽरविन्दपादाय पद्मनाभाय विष्णवे ॥ १७ 'शार्ङ्ग' नामक धनुष धारण करते हैं, जिनके चरण कमलके समान हैं तथा जिनकी नाभिसे कमल प्रकट भक्तार्चितसुपादाय नमो योगप्रियाय वै । हुआ है, उन भगवान् विष्णुको नमस्कार है। जिनके सुन्दर शुभाङ्गाय सुनेत्राय माधवाय नमो नमः ॥ १८ चरण भक्तोंद्वारा पूजित हैं, जिन्हें योग प्रिय है तथा जिनके अङ्ग और नेत्र सुन्दर हैं, उन भगवान् लक्ष्मीपतिको सुकेशाय सुनेत्राय सुललाटाय चक्रिणे । बारंबार नमस्कार है। जिनके केश, नेत्र, ललाट, मुख और सुवक्त्राय सुकर्णाय श्रीधराय नमो नमः ॥ १९ कान बहुत ही सुन्दर हैं, उन चक्रपाणि भगवान् श्रीधरको सुवक्षसे सुनाभाय पद्मनाभाय वै नमः । प्रणाम है। जिनके वक्षःस्थल और नाभि मनोहर हैं, उन सुभ्रुवे चारुदेहाय चारुदन्ताय शार्ङ्गिणे ॥ २० भगवान् पद्मनाभको नमस्कार है। जिनकी भौंहें सुन्दर, शरीर मनोहर और दाँत उज्ज्वल हैं, उन भगवान् शार्ङ्गधन्वाको चारुजङ्घाय दिव्याय केशवाय नमो नमः । प्रणाम है। रुचिर पिंडलियोंवाले दिव्यरूपधारी भगवान् सुनखाय सुशान्ताय सुविद्याय गदाभृते ॥ २१ केशवको नमस्कार है। जो सुन्दर नखोंवाले, परमशान्त और सद्धिद्याओंके आश्रय हैं, उन भगवान् गदाधरको धर्मप्रियाय देवाय वामनाय नमो नमः । नमस्कार है। धर्मप्रिय भगवान् वामनको बारंबार प्रणाम है। असुरघ्नाय चोग्राय रक्षोघ्नाय नमो नमः ॥ २२ असुर और राक्षसोंके हन्ता उग्र (नृसिंह)-रूपधारी भगवान्को देवानामार्त्तिनाशाय भीमकर्मकृते नमः । नमस्कार है। देवताओंकी पीड़ा हरनेके लिये भयंकर कर्म नमस्ते लोकनाथाय रावणान्तकृते नमः ॥ २३ करनेवाले तथा रावणके संहारक आप भगवान् जगन्नाथको प्रणाम है॥ १५–२३॥ मार्कण्डेय उवाच मार्कण्डेयजी कहते हैं—ब्रह्माजीके द्वारा इस प्रकार इति स्तुतो हृषीकेशस्तुतोष परमेष्ठिना । स्तुति की जानेपर भगवान् हृषीकेश प्रसन्न हो गये और स्वरूपं दर्शयित्वा तु पितामहमुवाच ह ॥ २४ अपना स्वरूप प्रत्यक्ष दिखाकर वे भगवान् ब्रह्माजीसे किमर्थं तु सुरैः सार्धमागतस्त्वं पितामह । बोले—'पितामह ! तुम देवताओंके साथ किसलिये यहाँ यत्कार्यं ब्रूहि मे ब्रह्मन् यदर्थं संस्तुतस्त्वया ॥ २५ आये हो ? ब्रह्मन् ! जो कार्य आ पड़ा हो और जिसके लिये तुमने मेरी स्तुति की है, वह बताओ।' समस्त इत्युक्तो देवदेवेन विष्णुना प्रभविष्णुना । लोकोंको उत्पन्न करनेवाले भगवान् विष्णुके द्वारा इस सर्वदेवगणैः सार्धं ब्रह्मा प्राह जनार्दनम् ॥ २६ प्रकार प्रश्न किये जानेपर सम्पूर्ण देवगणोंके साथ विराजमान ब्रह्माजीने उन जनार्दनसे कहा ॥ २४-२६ ॥ ब्रह्मोवाच ब्रह्माजी बोले—विभो! दुरात्मा रावणने समस्त नाशितं तु जगत्सर्वं रावणेन दुरात्मना । जगत्में भीषण संहार मचा रखा है। उस राक्षसने इन्द्रसहित सेन्द्राः पराजितास्तेन बहुशो राक्षसा विभो ॥ २७ देवताओंको कई बार परास्त किया है। रावणके पार्श्ववर्ती राक्षसैर्भक्षिता मर्त्या यज्ञाश्चापि विदूषिताः । राक्षसोंने असंख्य मनुष्योंको खा लिया और उनके देवकन्या हृतास्तेन बलाच्छतसहस्रशः ॥ २८ यज्ञोंको दूषित कर दिया है। स्वयं रावणने सैकड़ों-हजारों देवकन्याओंका अपहरण किया है। कमलनयन ! चूँकि त्वामृते पुण्डरीकाक्ष रावणस्य वधं प्रति । आपको छोड़कर दूसरे देवता रावणका वध करनेमें समर्थ न समर्था यतो देवास्त्वमतस्तद्वधं कुरु ॥ २९ नहीं हैं, अतः आप ही उसका वध करें ॥ २७–२९ ॥ In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth

१७४ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ४७

१७४ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ४७ इत्युक्तो ब्रह्मणा विष्णुर्ब्रह्माणमिदमब्रवीत्। ब्रह्माजीके इस प्रकार कहनेपर भगवान् विष्णु उनसे शृणुष्वावहितो ब्रह्मन् यद्वदामि हितं वचः॥ ३० यों बोले—'ब्रह्मन्! मैं तुम लोगोंके हितके लिये जो बात कहता हूँ, उसे ध्यान देकर सुनो। पृथ्वीपर सूर्यवंशमें सूर्यवंशोद्भवः श्रीमान् राजाऽऽसीद्भुवि वीर्यवान्। उत्पन्न श्रीमान् दशरथ नामसे प्रसिद्ध जो पराक्रमी राजा हैं, नाम्ना दशरथख्यातस्तस्य पुत्रो भवाम्यहम्॥ ३१ मैं उन्हींका पुत्र होऊँगा। सत्तम! रावणका वध करनेके रावणस्य वधार्थाय चतुर्धांशेन सत्तम। लिये मैं अंशतः चार स्वरूपोंमें प्रकट होऊँगा। विश्वस्रष्टा स्वांशैर्वानररूपेण सकला देवतागणाः॥ ३२ ब्रह्माजी! आप सभी देवताओंको आदेश दें कि वे अपने- वतार्यन्तां विश्वकर्तः स्यादेवं रावणक्षयः। अपने अंशसे वानररूपमें अवतीर्ण हों। इस प्रकार करनेसे ही रावणका संहार होगा।' देवदेव भगवान्‌के यों कहनेपर इत्युक्तो देवदेवेन ब्रह्मा लोकपितामहः॥ ३३ लोकपितामह ब्रह्माजी तथा अन्य देवता उनको प्रणाम देवाश्च ते प्रणम्याथ मेरुपृष्ठं तदा ययुः। करके मेरुशिखरपर चले गये और पृथ्वीतलपर अपने- स्वांशैर्वानररूपेण अवतेरुश्च भूतले॥ ३४ अपने अंशसे वानररूपमें अवतीर्ण हुए॥ ३०-३४॥ अथापुत्रो दशरथो मुनिभिर्वेदपारगैः। तदनन्तर पुत्रहीन राजा दशरथने वेदके पारगामी इष्टिं तु कारयामास पुत्रप्राप्तिकरीं नृपः॥ ३५ मुनियोंद्वारा पुत्रकी प्राप्ति करानेवाले 'पुत्रेष्टि' नामक यज्ञका अनुष्ठान कराया। तब भगवान्‌की प्रेरणासे अग्निदेव ततः सौवर्णपात्रस्थं हविरादाय पायसम्। सुवर्णपात्रमें रखी हुई होमकी खीर हाथमें लिये कुण्डसे वह्निः कुण्डात् समुत्तस्थौ नूनं देवेन नोदितः॥ ३६ प्रकट हुए। मुनियोंने वह खीर ले ली और मन्त्र पढ़ते आदाय मुनयो मन्त्राच्चक्रुः पिण्डद्वयं शुभम्। हुए उसके दो सुन्दर पिण्ड बनाये। उन्हें मन्त्रसे अभिमन्त्रित दत्ते कौशल्याकैकेय्योर्द्वे पिण्डे मन्त्रमन्त्रिते॥ ३७ कर उन दोनों पिण्डोंको कौसल्या तथा कैकेयीके हाथमें दे दिया। महामते! पिण्ड-भोजनके समय उन ते पिण्डप्राशने काले सुमित्राया महामते। दोनों रानियोंने दोनों पिण्डोंमेंसे थोड़ा-थोड़ा निकालकर सौभाग्यवती सुमित्राको दे दिया। फिर उन तीनों रानियोंने पिण्डाभ्यामल्पमल्पं तु सुभागिन्याः प्रयच्छतः॥ ३८ विधिपूर्वक उन क्षीरपिण्डोंका भोजन किया। उन देवनिर्मित ततस्ताः प्राशयामासू राजपत्न्यो यथाविधि। पिण्डोंका भक्षण करनेके कारण उन सभी रानियोंने पिण्डान् देवकृतान् प्राश्य प्रापुर्गर्भाननिन्दितान्॥ ३९ उत्तम गर्भ धारण किये॥ ३५-३९॥ पृथ्वीनाथ! इस प्रकार भगवान् विष्णु लोकहितके एवं विष्णुर्दशरथाज्जातस्तत्पत्निषु त्रिषु। लिये ही राजा दशरथसे उनकी तीनों रानियोंके गर्भसे स्वांशैर्लोकहितायैव चतुर्धा जगतीपते॥ ४० अपने चार अंशोंद्वारा वे राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न नामक चार रूप धारण करके प्रकट हुए। मुनियोंद्वारा रामश्च लक्ष्मणश्चैव भरतः शत्रुघ्न एव च। जातकर्मादि संस्कार हो जानेपर वे मन्त्रयुक्त पिण्डके जातकर्मादिकं प्राप्य संस्कारं मुनिसंस्कृतम्॥ ४१ अनुसार दो-दो एक साथ रहते हुए सामान्य बालकोंकी मन्त्रपिण्डवशाद्योगं प्राप्य चेरुर्यथार्भकाः। भाँति विचरने लगे। इनमें राम और लक्ष्मण सदा एक साथ रहते थे। नरपाल! जातकर्मादि संस्कारोंसे सम्पन्न रामश्च लक्ष्मणश्चैव सह नित्यं विचेरतुः॥ ४२ हो, वे दोनों महान् शक्तिशाली भाई पिताकी प्रसन्नता जन्मादिकृतसंस्कारौ पितुः प्रीतिकरौ नृप। बढ़ाते हुए बढ़ने लगे। उनके शुभ लक्षण अश्रुतपूर्व एवं ववृधाते महावीर्यौ श्रुतिशब्दातिलक्षणौ॥ ४३ वर्णनातीत थे। अथवा वे वेद और व्याकरणादि शास्त्रोंमें पारंगत होनेके शुभलक्षणसे सुशोभित थे। राजन्! भरतः कैकयो राजन् भ्रात्रा सह गृहेऽवसत्। कैकेयीनन्दन भरत अपने अनुज शत्रुघ्नके साथ प्रायः घरपर ही रहते थे। नृपोत्तम! उन्होंने वेदशास्त्र और वेदशास्त्राणि बुबुधे शस्त्रशास्त्रं नृपोत्तम॥ ४४ अस्त्रविद्या भी सीख ली थी॥ ४०-४४॥ In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth

अध्याय ४७] श्रीरामावतारकी कथा — श्रीरामके जन्मसे लेकर विवाहतकके चरित्र १७५ एतस्मिन्नेव काले तु विश्वामित्रो महातपाः । इन्हीं दिनों महातपस्वी विश्वामित्रजीने यज्ञविधिसे यागेन यष्टुमारेभे विधिना मधुसूदनम् ॥ ४५ भगवान् मधुसूदनका यजन आरम्भ किया। परंतु पहले स तु विघ्नेन यागोऽभूद्राक्षसैर्बहुशः पुरा। उस यज्ञमें बहुत बार राक्षसोंद्वारा विघ्न डाला गया था, नेतुं स यागरक्षार्थं सम्प्राप्तो रामलक्ष्मणौ ॥ ४६ नृपश्रेष्ठ! इसलिये इस बार विश्वामित्रजी यज्ञकी रक्षाके विश्वामित्रो नृपश्रेष्ठ तत्पितुर्मन्दिरं शुभम्। लिये राम तथा लक्ष्मणको ले जानेके निमित्त उनके दशरथस्तु तं दृष्ट्वा प्रत्युत्थाय महामतिः ॥ ४७ पिताके सुन्दर महलमें आये। महाबुद्धिमान् दशरथजी अर्घ्यपाद्यादि विधिना विश्वामित्रमपूजयत्। उन्हें देखकर उठ खड़े हुए और अर्घ्य-पाद्यादि उपचारोंद्वारा स पूजितो मुनिः प्राह राजानं राजसंनिधौ ॥ ४८ उन्होंने विधिवत् उनकी पूजा की। इस प्रकार उनके शृणु राजन् दशरथ यदर्थमहमागतः । द्वारा सम्मानित हो, मुनिने अन्य राजाओंके निकट विराजमान तत्कार्यं नृपशार्दूल कथयामि तवाग्रतः ॥ ४९ राजा दशरथसे कहा—'राजसिंह महाराज दशरथ ! सुनो— राक्षसैर्नाशितो यागो बहुशो मे दुरासदैः । मैं जिस कार्यके लिये आया हूँ, वह तुम्हारे सामने यज्ञस्य रक्षणार्थं मे देहि त्वं रामलक्ष्मणौ ॥ ५० निवेदन करता हूँ। मेरे यज्ञको दुर्धर्ष राक्षसोंने अनेक बार नष्ट किया है; अतः उसकी रक्षाके लिये तुम राम और लक्ष्मणको मुझे दे दो' ॥ ४५–५०॥ राजा दशरथः श्रुत्वा विश्वामित्रवचो नृप । नरेश्वर! विश्वामित्रजीकी बात सुननेपर राजा दशरथ- विषण्णवदनो भूत्वा विश्वामित्रमुवाच ह ॥ ५१ के मुखपर विषाद छा गया। वे उनसे बोले—'भगवन् ! बालाभ्यां मम पुत्राभ्यां किं ते कार्यं भविष्यति । मेरे ये दोनों पुत्र अभी बालक हैं। इनसे आपका कौन- अहं त्वया सहागत्य शक्त्या रक्षामि ते मखम् ॥ ५२ सा कार्य सिद्ध होगा? मैं स्वयं आपके साथ चलकर राज्ञस्तु वचनं श्रुत्वा राजानं मुनिरब्रवीत् । यथाशक्ति यज्ञकी रक्षा करूँगा।' राजाकी बात सुनकर रामोऽपि शक्नुते नूनं सर्वान्नाशयितुं नृप ॥ ५३ मुनि उनसे बोले—'नरपाल ! राम भी उन सब राक्षसोंका रामेणैव हि ते शक्या न त्वया राक्षसा नृप। नाश कर सकते हैं, इसमें संशय नहीं है। सच तो यह अतो मे देहि रामं च न चिन्तां कर्तुमर्हसि ॥ ५४ है कि रामके द्वारा ही वे राक्षस मारे जा सकते हैं, तुम्हारे द्वारा नहीं; अतः राजन् ! तुम्हें रामको ही मुझे दे देना चाहिये और किसी प्रकारकी चिन्ता नहीं करनी चाहिये' ॥ ५१–५४॥ इत्युक्तो मुनिना तेन विश्वामित्रेण धीमता । बुद्धिमान् विश्वामित्रमुनिके द्वारा यों कहे जानेपर तूष्णीं स्थित्वा क्षणं राजा मुनिवर्यमुवाच ह ॥ ५५ राजा क्षणभरके लिये चुप हो गये और फिर उन यद्ब्रवीमि मुनिश्रेष्ठ प्रसन्नस्त्वं निबोध मे । मुनीश्वरसे बोले—'मुनिश्रेष्ठ! मैं जो कह रहा हूँ, उसे राजीवलोचनं राममहं दास्ये सहानुजम् ॥ ५६ आप प्रसन्नतापूर्वक सुनें। मैं कमललोचन रामको लक्ष्मणके किं त्वस्य जननी ब्रह्मन् अदृष्टैनं मरिष्यति । सहित आपको दे तो दूँगा, परंतु ब्रह्मन्! इनकी माता अतोऽहं चतुरङ्गेण बलेन सहितो मुने ॥ ५७ इन्हें देखे बिना मर जायगी। इसलिये मुने! मेरा ऐसा आगत्य राक्षसान् हन्मीत्येवं मे मनसि स्थितम् । विचार है कि मैं स्वयं ही चतुरङ्गिणी सेनाके साथ चलकर सब राक्षसोंका वध करूँ' ॥ ५५–५७१/२॥ In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth

१७६ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ४७

१७६ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ४७ विश्वामित्रः पुनः प्राह राजानममितौजसम् ॥ ५८ नाज्ञो रामो नृपश्रेष्ठ स सर्वज्ञः समः क्षमः। शेषनारायणावेतौ तव पुत्रौ न संशयः ॥ ५९ दुष्टानां निग्रहार्थाय शिष्टानां पालनाय च। अवतीर्णौ न संदेहो गृहे तव नराधिप ॥ ६० न मात्रा न त्वया राजन् शोकः कार्योऽत्र चाण्वपि। निःक्षेपे च महाराज अर्पयिष्यामि ते सुतौ ॥ ६१ विश्वामित्रजी यह सुनकर उन अमित-तेजस्वी राजासे पुनः बोले—‘नृपश्रेष्ठ ! रामचन्द्र अबोध नहीं हैं; वे सर्वज्ञ, समदर्शी और परम समर्थ हैं। इसमें संशय नहीं कि तुम्हारे ये दोनों पुत्र राम और लक्ष्मण साक्षात् नारायण एवं शेषनाग हैं। नराधिप ! दुष्टोंको दण्ड देने और सत्पुरुषोंकी रक्षा करनेके लिये ही ये दोनों आपके घरमें अवतीर्ण हुए हैं, इसमें संदेह नहीं है। राजन् ! इनकी माता तथा आपको इस विषयमें थोड़ी-सी भी चिन्ता नहीं करनी चाहिये। महाराज ! ये मेरे पास धरोहरके तौरपर रहेंगे। यज्ञ पूर्ण हो जानेपर मैं इन दोनोंको आपके हाथमें दे दूँगा' ॥ ५८-६१॥ इत्युक्तो दशरथस्तेन विश्वामित्रेण धीमता। तच्छापभीतो मनसा नीतामित्यभाषत ॥ ६२ कृच्छ्रात्पित्रा विनिर्मुक्तं राममादाय सानुजम्। ततः सिद्धाश्रमं राजन् सम्प्रतस्थे स कौशिकः ॥ ६३ तं प्रस्थितमथालोक्य राजा दशरथस्तदा। अनुव्रज्याब्रवीदेतद् वचो दशरथस्तदा ॥ ६४ अपुत्रोऽहं पुरा ब्रह्मन् बहुभिः काम्यकर्मभिः। मुनिप्रसादादधुना पुत्रवानस्मि सत्तम ॥ ६५ मनसा तद्वियोगं तु न शक्ष्यामि विशेषतः। त्वमेव जानासि मुने नीत्वा शीघ्रं प्रयच्छ मे ॥ ६६ बुद्धिमान् विश्वामित्रजीके यों कहनेपर दशरथजी मन-ही-मन उनके शापसे डरते हुए बोले—‘अच्छा, इन्हें ले जाइये।' राजन् ! पिताके द्वारा बड़ी कठिनाईसे छोड़े गये श्रीराम और लक्ष्मणको साथ ले विश्वामित्र मुनि तब अपने सिद्धाश्रमकी ओर प्रस्थित हुए। उन्हें जाते देख उस समय राजा दशरथ कुछ दूर पीछे-पीछे गये और तब मुनिसे इस प्रकार बोले—‘साधुश्रेष्ठ ! ब्रह्मन् ! मैं पहले दीर्घकालतक पुत्रहीन रहा; मुनियोंकी कृपासे अनेक सकाम यज्ञकर्मोंका अनुष्ठान करके अब पुत्रवान् हो सका हूँ। अतः मुने! मैं मनसे भी इन पुत्रोंका अधिक कालतक वियोग नहीं सह सकूँगा, यह बात आप ही जानते हैं; अतः इन्हें ले जाकर फिर यथासम्भव शीघ्र मेरे पास पहुँचा दीजियेगा' ॥ ६२-६६॥ इत्येवमुक्तो राजानं विश्वामित्रोऽब्रवीत्पुनः। समाप्ययज्ञश्च पुनर्नेष्ये रामं च लक्ष्मणम् ॥ ६७ सत्यपूर्वं तु दास्यामि न चिन्तां कर्तुमर्हसि। इत्युक्तः प्रेषयामास रामं लक्ष्मणसंयुक्तम् ॥ ६८ अनिच्छन्नपि राजासौ मुनिशापभयान्नृपः। विश्वामित्रस्तु तौ गृह्य अयोध्याया ययौ शनैः ॥ ६९ उनके यों कहनेपर विश्वामित्रजीने पुनः राजासे कहा—‘अपना यज्ञ समाप्त हो जानेपर मैं पुनः श्रीराम और लक्ष्मणको यहाँ ले आऊँगा तथा अपने वचनको सत्य करते हुए इन्हें वापस कर दूँगा, आप चिन्ता न करें' ॥ ६७ १/२ ॥ विश्वामित्रजीके इस प्रकार आश्वासन देनेपर राजाने उनके शापकी आशङ्कासे भयभीत हो, इच्छा न रहते हुए भी, श्रीराम और लक्ष्मणको उनके साथ भेज दिया। विश्वामित्रजी उन दोनों भाइयोंको साथ ले धीरे-धीरे अयोध्यासे बाहर निकले ॥ ६८-६९॥ सरय्वास्तीरमासाद्य गच्छन्नेव स कौशिकः। तयोः प्रीत्या स राजेन्द्र द्वे विद्ये प्रथमं ददौ ॥ ७० बलामतिबलां चैव समन्त्रे च ससंग्रहे। क्षुत्पिपासापनयने पुनश्चैव महामतिः ॥ ७१ अस्त्रग्राममशेषं तु शिक्षयित्वा तु तौ तदा। आश्रमाणि च दिव्यानि मुनीनां भावितात्मनाम् ॥ ७२ दर्शयित्वा उषित्वा च पुण्यस्थानेषु सत्तमः। गङ्गामुत्तीर्य शोणस्य तीरमासाद्य पश्चिमम् ॥ ७३ राजेन्द्र ! सरयूके तटपर पहुँचकर महामति विश्वामित्रजीने चलते-चलते ही श्रीराम और लक्ष्मणको प्रेमवश पहले 'बला' और 'अतिबला' नामकी दो विद्याएँ प्रदान कीं, जो क्षुधा और पिपासाको दूर करनेवाली हैं। मुनिने उन विद्याओंको मन्त्र और संग्रह (उपसंहार) पूर्वक सिखाया। फिर उसी समय उन्हें सम्पूर्ण अस्त्र-समुदायकी शिक्षा देकर वे साधुश्रेष्ठ मुनि श्रीराम और लक्ष्मणको अनेक आत्मज्ञानी मुनीश्वरोंके दिव्य आश्रम दिखाते और पवित्र तीर्थस्थानोंमें निवास करते हुए गङ्गा नदीको पारकर शोणभद्रके पश्चिम तटपर जा पहुँचे ॥ ७०-७३॥ In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth

यहाँ पृष्ठ का सम्पूर्ण पाठ प्रस्तुत है:

अध्याय ४७ ] | श्रीरामावतारकी कथा — श्रीरामके जन्मसे लेकर विवाहतकके चरित्र | १७७

(संस्कृत श्लोक - वाम स्तम्भ)

मुनिधार्मिकसिद्धांश्च पश्यन्तौ रामलक्ष्मणौ। ऋषिभ्यश्च वरान् प्राप्य तेन नीतौ नृपात्मजौ ॥ ७४ ताटकाया वनं घोरं मृत्योर्मुखमिवापरम्। गते तत्र नृपश्रेष्ठ विश्वामित्रो महातपाः ॥ ७५ राममक्लिष्टकर्माणमिदं वचनमब्रवीत्। राम राम महाबाहो ताटका नाम राक्षसी ॥ ७६ रावणस्य नियोगेन वसत्यस्मिन् महावने। तया मनुष्या बहवो मुनिपुत्रा मृगास्तथा ॥ ७७ निहता भक्षिताश्चैव तस्मात्तां वध सत्तम। इत्येवमुक्तो मुनिना रामस्तं मुनिमब्रवीत् ॥ ७८ कथं हि स्त्रीवधं कुर्यामहमद्य महामुने। स्त्रीवधे तु महापापं प्रवदन्ति मनीषिणः ॥ ७९ इति रामवचः श्रुत्वा विश्वामित्र उवाच तम्। तस्यास्तु निधनाद्राम जनाः सर्वे निराकुलाः ॥ ८० भवन्ति सततं तस्मात् तस्याः पुण्यप्रदो वधः। इत्येवं वादिनि मुनौ विश्वामित्रे निशाचरी ॥ ८१ आगता सुमहाघोरा ताटका विवृतानना। मुनिना प्रेरितो रामस्तां दृष्ट्वा विवृताननाम् ॥ ८२ उद्यतैकभुजयष्टिमायतीं श्रोणिलम्बिपुरुषान्त्रमेखलाम् । तां विलोक्य वनितावधे घृणां पन्त्रिणा सह मुमोच राघवः ॥ ८३ शरं संधाय वेगेन तेन तस्या उरःस्थलम्। विपाटितं द्विधा राजन् सा पपात ममार च ॥ ८४ घातयित्वा तु तामेवं तावानीय मुनिस्तु तौ। प्रापयामास तं तत्र नानाऋषिनिषेवितम् ॥ ८५ नानाद्रुमलताकीर्णं नानापुष्पोपशोभितम्। नानानिर्झरतोयाढ्यं विन्ध्यशैलान्तरस्थितम् ॥ ८६ शाकमूलफलोपेतं दिव्यं सिद्धाश्रमं स्वकम्। रक्षार्थं तावुभौ स्थाप्य शिक्षयित्वा विशेषतः ॥ ८७


(हिन्दी अनुवाद - दक्षिण स्तम्भ)

मार्गमें मुनियों, धर्मात्माओं और सिद्धोंका दर्शन करते हुए तथा ऋषियोंसे वर प्राप्तकर, राजकुमार श्रीराम और लक्ष्मण विश्वामित्रजीके द्वारा उस ताड़कावनमें ले जाये गये, जो यमराजके दूसरे मुखके समान भयंकर था। नृपश्रेष्ठ ! वहाँ पहुँचकर महातपस्वी विश्वामित्रने अनायास ही महान् कर्म करनेवाले रामसे कहा—'महाबाहो राम ! इस महान् वनमें रावणकी आज्ञासे 'ताड़का' नामकी एक राक्षसी रहती है। उसने बहुत-से मनुष्यों, मुनिपुत्रों और मृगोंको मारकर अपना आहार बना लिया है; अतः सत्तम ! तुम उसका वध करो' ॥ ७४-७७ १/२ ॥

मुनिवर विश्वामित्रके इस प्रकार कहनेपर रामने उनसे कहा—'महामुने ! आज मैं स्त्रीका वध कैसे करूँ? क्योंकि बुद्धिमान् लोग स्त्रीवधमें महान् पाप बतलाते हैं।' श्रीरामकी यह बात सुनकर विश्वामित्रने उनसे कहा—'राम! उस ताड़काको मारनेसे सभी मनुष्य सदाके लिये निर्भय हो जायँगे, इसलिये उसका वध करना तो पुण्यदायक है' ॥ ७८-८० १/२ ॥

मुनिवर विश्वामित्र इस प्रकार कह ही रहे थे कि वह महाघोर राक्षसी ताड़का मुँह फैलाये वहाँ आ पहुँची। तब मुनिकी प्रेरणासे रामने उसकी ओर देखा। वह मुँह बाये आ रही थी। उसकी छड़ी-सरीखी एक बाँह ऊपरकी ओर उठी थी। कटिप्रदेशमें मेखला (करधनी)-की जगह लिपटी हुई मनुष्यकी अँतड़ी लटक रही थी। इस रूपमें आती हुई उस निशाचरीको देखकर श्रीरामने स्त्रीवधके प्रति होनेवाली घृणा और बाणको एक साथ ही छोड़ दिया। राजन्! उन्होंने धनुषपर बाण रखकर उसे बड़े वेगसे छोड़ा। उस बाणने ताड़काकी छातीके दो टुकड़े कर दिये। फिर तो वह धरतीपर गिरी और मर गयी ॥ ८१-८४ ॥

इस प्रकार ताड़काका वध करवाकर मुनि श्रीराम और लक्ष्मण दोनोंको अपने उस दिव्य सिद्धाश्रमपर ले आये, जो बहुत-से मुनियोंद्वारा सेवित था। वह आश्रम विन्ध्य पर्वतकी मध्यवर्तिनी उपत्यकामें विद्यमान था। वहाँ नाना प्रकारके वृक्ष और लतासमूह फैले हुए थे और भाँति-भाँतिके पुष्प उसकी शोभा बढ़ा रहे थे। वह आश्रम अनेकानेक झरनोंके जलसे सुशोभित तथा शाक एवं मूल-फलादिसे सम्पन्न था। वहाँ उन दोनों राजकुमारोंको विशेषरूपसे शिक्षा देकर मुनिने उनको यज्ञकी रक्षाके लिये नियुक्त कर दिया।


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१७८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ४७

१७८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ४७ ततश्चारब्धवान् यागं विश्वामित्रो महातपाः। | तदनन्तर महान् तपस्वी विश्वामित्रने यज्ञ आरम्भ दीक्षां प्रविष्टे च मुनौ विश्वामित्रे महात्मनि ॥ ८८ | किया॥ ८५-८७१/२ ॥ | महात्मा विश्वामित्र ज्यों-ही यज्ञकी दीक्षामें प्रविष्ट हुए, यज्ञे तु वितते तत्र कर्म कुर्वन्ति ऋत्विजः। | उस यज्ञका कार्य चालू हो गया। उसमें ऋत्विज्गण मारीचश्च सुबाहुश्च बहवश्चान्यराक्षसाः ॥ ८९ | अपना-अपना कार्य करने लगे। तब रावणके द्वारा नियुक्त | मारीच, सुबाहु तथा अन्य बहुत-से राक्षसगण यज्ञ नष्ट आगता यागनाशाय रावणेन नियोजिताः। | करनेके लिये वहाँ आये। उन सबको वहाँ आया जान तानागतान् स विज्ञाय रामः कमललोचनः ॥ ९० | कमलनयन श्रीरामने बाण मारकर 'सुबाहु' नामक राक्षसको | तो धराशायी कर दिया। वह अपने शरीरसे रक्तकी वर्षा- शरेण पातयामास सुबाहुं धरणीतले। | सी करने लगा। इसके बाद 'भल्ल' नामक बाणका प्रहार असृक्प्रवाहं वर्षन्तं मारीचं भल्लकेन तु ॥ ९१ | करके श्रीरामने मारीचको उसी तरह समुद्रके तटपर फेंक | दिया, जैसे वायु पत्तेको उड़ाकर दूर फेंक दे। तदनन्तर प्रताड्य नीतवानब्धिं यथा पर्णं तु वायुना। | श्रीराम और लक्ष्मण दोनोंने मिलकर शेष सभी राक्षसोंका शेषांस्तु हतवान् रामो लक्ष्मणश्च निशाचरान् ॥ ९२ | वध कर डाला॥ ८८-९२॥ | इस प्रकार श्रीरामचन्द्रजीके द्वारा यज्ञकी रक्षा होती रामेण रक्षितमखो विश्वामित्रो महायशाः। | रहनेसे महायशस्वी विश्वामित्रने उस यज्ञको विधिवत् समाप्य यागं विधिवत् पूजयामास ऋत्विजान् ॥ ९३ | पूर्ण करके ऋत्विजोंका दक्षिणादिसे पूजन किया। शत्रुदमन! | उस यज्ञके सदस्योंका भी यथोचित समादर करके सदस्यानपि सम्पूज्य यथार्हं च ह्वारिंदम। | विश्वामित्रजीने श्रीराम और लक्ष्मणकी भी भक्तिपूर्वक रामं च लक्ष्मणं चैव पूजयामास भक्तितः ॥ ९४ | पूजा एवं प्रशंसा की। सत्पुरुषोंमें श्रेष्ठ महाराज! तदनन्तर | उस यज्ञमें मिले हुए भागोंसे सन्तुष्ट देवताओंने भगवान् ततो देवगणस्तुष्टो यज्ञभागेन सत्तम। | रामके मस्तकपर पुष्पोंकी वर्षा की॥ ९३-९५॥ ववर्ष पुष्पवर्षं तु रामदेवस्य मूर्धनि ॥ ९५ | इस प्रकार भाई लक्ष्मणके साथ विनयशील | श्रीरामचन्द्रजी राक्षसोंसे प्राप्त भयका निवारण करके, निवार्य राक्षसभायं कारयित्वा तु तन्मखम्। | विश्वामित्रका यज्ञ पूर्ण कराकर, नाना प्रकारकी पावन श्रुत्वा नाना कथाः पुण्या रामो भ्रातृसमन्वितः ॥ ९६ | कथाएँ सुनते हुए मुनिके द्वारा उस स्थानपर लाये गये, | जहाँ शिला बनी हुई अहल्या थी। राजेन्द्र! पूर्वकालमें तेन नीतो विनीतात्मा अहल्या यत्र तिष्ठति। | इन्द्रके साथ व्यभिचार करनेसे अपने पति गौतमका शाप व्यभिचारान्महेन्द्रेण भर्त्रा शप्ता हि सा पुरा ॥ ९७ | प्राप्तकर अहल्या पत्थर हो गयी थी। उस समय रामका | दर्शन पाते ही वह शापसे मुक्त हो पुनः अपने पति पाषाणभूता राजेन्द्र तस्य रामस्य दर्शनात्। | गौतमके पास चली गयी॥ ९६-९८॥ अहल्या मुक्तशापा च जगाम गौतमं प्रति ॥ ९८ | तदनन्तर विश्वामित्रजीने वहाँ क्षणभर विचार किया विश्वामित्रस्ततस्तत्र चिन्तयामास वै क्षणम्। | कि मुझे कमललोचन रामचन्द्रजीका विवाह करके इन्हें कृतदारो मया नेयो रामः कमललोचनः ॥ ९९ | अयोध्या ले चलना चाहिये। यह सोचकर अनेक शिष्योंसे | घिरे हुए महातपस्वी विश्वामित्रजी श्रीराम और लक्ष्मणको इति संचिन्त्य तौ गृह्य विश्वामित्रो महातपाः। | साथ ले मिथिलाकी ओर चल दिये॥ ९९-१००॥ शिष्यैःपरिवृतोऽनेकैर्र्जगाम मिथिलां प्रति ॥ १००

अध्याय ४७ ] श्रीरामावतारकी कथा - श्रीरामके जन्मसे लेकर विवाहतकके चरित्र १७९ नानादेशादथायाता जनकस्य निवेशनम्। इनके जानेसे पूर्व ही वहाँ सीतासे विवाह करनेकी राजपुत्रा महावीर्याः पूर्वं सीताभिकाङ्क्षिणः ॥ १०१ इच्छावाले अनेक महान् पराक्रमी राजकुमार नाना देशोंसे तान् दृष्ट्वा पूजयित्वा तु जनकश्च यथार्हतः । जनकके यहाँ पधारे थे। उन सबको आया देख राजा यत्सीतायाः समुत्पन्नं धनुर्माहेश्वरं महत् ॥ १०२ जनकने उनका यथोचित सत्कार किया तथा जो सीताके स्वयंवरके लिये ही प्रकट हुआ था, उस महान् माहेश्वर अर्चितं गन्धमालाभी रम्यशोभासमन्विते । धनुषका चन्दन और पुष्प आदिसे पूजन करके उसे रङ्गे महति विस्तीर्णे स्थापयामास तद्धनुः ॥ १०३ रमणीय शोभासे सम्पन्न सुविस्तृत रङ्गमञ्चपर लाकर रखवाया ॥ १०१-१०३ ॥ उवाच च नृपान् सर्वान्स्तोदोच्चैर्जनको नृपः । तब राजा जनकने वहाँ पधारे हुए उन समस्त राजाओंके आकर्षणादिदं येन धनुर्भग्नं नृपात्मजाः ॥ १०४ प्रति उच्च स्वरसे कहा- 'राजकुमारो ! जिसके खींचनेसे तस्येयं धर्मतो भार्या सीता सर्वाङ्गशोभना । यह धनुष टूट जायगा, यह सर्वाङ्गसुन्दरी सीता उसीकी इत्येवं श्राविते तेन जनकेन महात्मना ॥ १०५ धर्मपत्नी हो सकती है।' महात्मा जनकके द्वारा ऐसी बात सुनायी जानेपर वे नरेशगण क्रमशः उस धनुषको ले- क्रमादादाय ते तत्तु सज्जीकर्तुमथाभवन् । लेकर चढ़ानेका प्रयत्न करने लगे; परंतु बारी-बारीसे उस धनुषा ताडिताः सर्वे क्रमात्तेन महीपते ॥ १०६ धनुषद्वारा ही झटके खाकर काँपते हुए वे दूर गिर जाते विधूय पतिता राजन् विलज्जास्तत्र पार्थिवाः । थे। राजन्! इससे उन सभी भूपालोंको वहाँ बड़ी लज्जा तेषु भग्नेषु जनकस्तद्धनुस्त्र्यम्बकं नृप ॥ १०७ हुई। नरेश्वर ! उन सबके निराश हो जानेपर वीर राजा संस्थाप्य स्थितवान् वीरो रामागमनकाङ्क्षया । जनक उस शिव-धनुषको यथास्थान रखवाकर श्रीरामके विश्वामित्रस्ततः प्राप्तो मिथिलाधिपतेर्गृहम् ॥ १०८ आगमनकी प्रतीक्षा में वहाँ ही ठहरे रहे। इतने में विश्वामित्रजी मिथिलानरेशके राजभवनमें आ पहुँचे ॥ १०४-१०८ ॥ जनकोऽपि च तं दृष्ट्वा विश्वामित्रं गृहागतम् । जनकने श्रीराम, लक्ष्मण तथा शिष्योंसे युक्त रामलक्ष्मणसंयुक्तं शिष्यैश्चाभिगतं तदा ॥ १०९ विश्वामित्रजीको अपने भवनमें आया देख उस समय तं पूजयित्वा विधिवत्प्राज्ञं विप्रानुयायिनम् । उनकी विधिवत् पूजा की। फिर ब्राह्मणका अनुसरण रामं रघुपतिं चापि लावण्यादिगुणैर्युतम् ॥११० करनेवाले तथा लावण्य आदि गुणोंसे लक्षित रघुवंशनाथ शीलाचारगुणोपेतं लक्ष्मणं च महामतिम्। बुद्धिमान् श्रीराम एवं शील-सदाचारादि गुणोंसे युक्त पूजयित्वा यथान्यायं जनकः प्रीतमानसः ॥ १११ महामति लक्ष्मणका भी यथायोग्य पूजन करके जनकजी मन-ही-मन बहुत प्रसन्न हुए। तत्पश्चात् सोनेके सिंहासनपर हेमपीठे सुखासीनं शिष्यैः पूर्वापरैर्वृतम्। सुखपूर्वक बैठकर छोटे-बड़े शिष्योंसे घिरे हुए मुनिवर विश्वामित्रमुवाचाथ किं कर्तव्यं मयेति सः ॥ ११२ विश्वामित्रसे वे बोले- 'भगवन् ! अब मुझे क्या करना चाहिये' ॥ १०९-११२ ॥ मार्कण्डेय उवाच मार्कण्डेयजी कहते हैं- राजा जनककी यह बात इति श्रुत्वा वचस्तस्य मुनिः प्राह महीपतिम् । सुनकर मुनिने उनसे कहा- 'महाराज ! ये राजा राम एष रामो महाराज विष्णुः साक्षान्महीपतिः ॥ ११३ साक्षात् भगवान् विष्णु हैं। (तीनों) लोकोंकी रक्षाके रक्षार्थं विष्टपानां तु जातो दशरथात्मजः । लिये ये दशरथके पुत्ररूपसे प्रकट हुए हैं; अतः देवकन्याके अस्मै सीतां प्रयच्छ त्वं देवकन्यामिव स्थिताम् ॥ ११४ समान सुशोभित होनेवाली सीताका ब्याह तुम इन्हींके अस्या विवाहे राजेन्द्र धनुर्भङ्गोमुदीरितम् । साथ कर दो। परंतु राजेन्द्र ! नराधिप ! तुमने सीताके विवाहमें तदानय भवधनुरर्चयस्व जनाधिप ॥ ११५ धनुष तोड़नेकी शर्त रखी है; अतः अब उस शिवधनुषको लाकर यहाँ उसकी अर्चना करो' ॥ ११३-११५ ॥ In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth

१८० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ४७

यहाँ पृष्ठ का पूर्ण एवं यथावत देवनागरी पाठ प्रस्तुत है:

१८० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ४७ [मूल संस्कृत श्लोक - वाम भाग] तथेत्युक्त्वा च राजा हि भवचापं तदद्भुतम्। अनेक भूभुजां भङ्गि स्थापयामास पूर्ववत् ॥ ११६ ततो दशरथसुतो विश्वामित्रेण चोदितः । तेषां मध्यात्समुत्थाय रामः कमललोचनः ॥ ११७ प्रणम्य विप्रान् देवांश्च धनुरादाय तत्तदा। सज्यं कृत्वा महाबाहुर्ज्याघोषमकरोत्त्तदा ॥ ११८ आकृष्यमाणं तु बलात्तेन भग्नं महद्धनुः । सीता च मालामादाय शुभां रामस्य मूर्धनि ॥ ११९ क्षिप्त्वा संवरयामास सर्वक्षत्रियसन्निधौ । ततस्ते क्षत्रियाः क्रुद्धा राममासाद्य सर्वतः ॥ १२० मुमुचुः शरजालानि गर्जयन्तो महाबलाः। तान्निरीक्ष्य ततो रामो धनुरादाय वेगवान् ॥ १२१ ज्याघोषतलघोषेण कम्पयामास तान्नृपान्। चिच्छेद शरजालानि तेषां स्वास्त्रै रथांस्ततः ॥ १२२ धनूंषि च पताकाश्च रामश्चिच्छेद लीलया । संनह्य स्वबलं सर्वं मिथिलाधिपतिस्ततः ॥ १२३ जामातरं रणे रक्षन् पाष्णिग्राहो बभूव ह। लक्ष्मणश्च महावीरो विद्राव्य युधि तान्नृपान् ॥ १२४ हस्त्यश्वाञ्जगृहे तेषां स्यन्दनानि बहूनि च। वाहनानि परित्यज्य पलायनपरान्नृपान् ॥ १२५ तान्निहन्तुं च धावत्स पृष्ठतो लक्ष्मणस्तदा । मिथिलाधिपतिस्तं च वारयामास कौशिकः ॥ १२६ जितसेनं महावीरं रामं भ्रात्रा समन्वितम्। आदाय प्रविवेशाथ जनकः स्वगृहं शुभम् ॥ १२७ दूतं च प्रेषयामास तदा दशरथाय सः। श्रुत्वा दूतममुखात् सर्वं विदितार्थः स पार्थिवः ॥ १२८ सभार्यः ससुतः श्रीमान् हस्त्यश्वरथवाहनः। मिथिलामाजगामाशु स्वबलेन समन्वितः ॥ १२९ जनकोऽप्यस्य सत्कारं कृत्वा स्वां च सुतां ततः । विधिवत्कृतशुल्कां तां ददौ रामाय पार्थिव ॥ १३० अपराश्च सुतास्तिस्रो रूपवत्यः स्वलङ्कृताः । त्रिभ्यस्तु लक्ष्मणादिभ्यः स्वकन्या विधिवद्ददौ ॥ १३१ [हिन्दी अनुवाद - दक्षिण भाग] तब 'बहुत अच्छा' कहकर राजाने अनेक भूपालोंका मान भङ्ग करनेवाले उस अद्भुत शिवधनुषको पूर्ववत् वहाँ रखवाया। तत्पश्चात् कमललोचन दशरथनन्दन राम विश्वामित्रजीके आज्ञा देनेपर राजाओंके बीचसे उठे और ब्राह्मणों तथा देवताओंको प्रणाम करके उन्होंने वह धनुष उठा लिया। फिर उन महाबाहुने धनुषकी डोरी चढ़ाकर उसकी टंकार की। रामके द्वारा बलपूर्वक खींचे जानेसे वह महान् धनुष सहसा टूट गया। तब सीताजी सुन्दर माला लेकर आयीं और उन सम्पूर्ण क्षत्रियोंके निकट भगवान् रामके गलेमें वह माला डालकर उन्होंने उनका विधिपूर्वक पतिरूपसे वरण किया। इससे वहाँ आये हुए सभी महाबली क्षत्रिय कुपित हो गये और श्रीरामचन्द्रजीपर सब ओरसे आक्रमण एवं गर्जना करते हुए उनपर बाण बरसाने लगे। उन्हें यों करते देख श्रीरामने भी वेगपूर्वक हाथमें धनुष ले प्रत्यञ्चाकी टंकारसे उन सभी नरेशोंको कम्पित कर दिया और अपने अस्त्रोंसे उन सबके बाण तथा रथ काट डाले। इतना ही नहीं, श्रीरामने लीलापूर्वक ही उनके धनुष तथा पताकाएँ भी काट डालीं। तदनन्तर मिथिलानरेश भी अपनी सारी सेना तैयार करके उस संग्राममें जामाता श्रीरामकी रक्षा करते हुए उनके पृष्ठपोषक हो गये। इधर, महावीर लक्ष्मणने भी युद्धमें उन राजाओंको मार भगाया तथा उनके हाथी, घोड़े और बहुत-से रथ अपने अधिकारमें कर लिये। अपने वाहन छोड़कर भागे जाते हुए उन राजाओंको मार डालनेके लिये लक्ष्मण उनके पीछे दौड़े। तब उन्हें मिथिलानरेश जनक और विश्वामित्रने मना कर दिया ॥ ११६-१२६ ॥ राजाओंकी सेनापर विजय पाये हुए महावीर श्रीरामको लक्ष्मणसहित साथ ले राजा जनकने अपने सुन्दर भवनमें प्रवेश किया। उसी समय उन्होंने राजा दशरथके पास एक दूत भेजा। दूतके मुखसे सारी बातें सुनकर राजाको सब वृत्तान्त ज्ञात हुआ। तब श्रीमान् राजा दशरथ अपनी रानियों और पुत्रोंको साथ ले, हाथी, घोड़े और रथ आदि वाहनोंसे सम्पन्न हो, सेनाके साथ तुरन्त ही मिथिलामें पधारे। राजन्! जनकने भी राजा दशरथका भलीभाँति सत्कार किया। फिर विधिपूर्वक जिसके पाणिग्रहणकी शर्त पूरी की जा चुकी थी, उस अपनी कन्या सीताको रामके हाथमें दे दिया। तत्पश्चात् अपनी अन्य तीन कन्याओंको भी, जो परमसुन्दरी और आभूषणोंसे अलङ्कृत थीं, लक्ष्मण आदि तीन भाइयोंके साथ विधिपूर्वक ब्याह दिया ॥ १२७-१३१ ॥ In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth

अध्याय ४७ ] श्रीरामवतारकी कथा - श्रीरामके जन्मसे लेकर विवाहतकके चरित्र १८१ एवं कृतविवाहोऽसौ रामः कमललोचनः । भ्रातृभिर्मातृभिः सार्धं पित्रा बलवता सह ॥ १३२ दिनानि कतिचित्तत्र स्थितो विविधभोजनैः । ततोऽयोध्यापुरीं गन्तुमुत्सुकं ससुतं नृपम् । दृष्ट्वा दशरथं राजा सीतायाः प्रददौ वसु ॥ १३३ रत्नानि दिव्यानि बहूनि दत्त्वा रामाय वस्त्राण्यतिशोभनानि । हस्त्यश्वदासानपि कर्मयोग्यान् दासीजनांश्च प्रवराः स्त्रियश्च ॥ १३४ सीतां सुशीलां बहुरत्नभूषितां रथं समारोप्य सुतां सुरूपाम् । वेदादिघोषैर्बहुमङ्गलैश्च सम्प्रेषयामास स पार्थिवो बली ॥ १३५ प्रेषयित्वा सुतां दिव्यां नत्वा दशरथं नृपम् । विश्वामित्रं नमस्कृत्य जनकः संनिवृत्तवान् ॥ १३६ तस्य पत्न्यो महाभागाः शिक्षयित्वा सुतां तदा । भर्तृभक्तिं कुरु शुभे श्वश्रूणां श्वशुरस्य च ॥ १३७ श्वश्रूणामर्पयित्वा तां निवृत्ता विविशुः पुरम् । ततस्तु रामं गच्छन्तमयोध्यां प्रबलान्वितम् ॥ १३८ श्रुत्वा परशुरामो वै पन्थानं संरुरोध ह । तं दृष्ट्वा राजपुरुषाः सर्वे ते दीनमानसाः ॥ १३९ आसीद्दशरथश्चापि दुःखशोकपरिप्लुतः । सभार्यः सपरीवारो भार्गवस्य भयान्नृप ॥ १४० ततोऽब्रवीज्जनान् सर्वान् राजानं च सुदुःखितम् । वसिष्ठश्चोर्जिततपा ब्रह्मचारी महामुनिः ॥ १४१ वसिष्ठ उवाच युष्माभिरत्र रामार्थं न कार्यं दुःखमण्वपि ॥ १४२ पित्रा वा मातृभिर्वापि अन्यैर्भृत्यजनैरपि । अयं हि नृपते रामः साक्षाद्विष्णुस्तु ते गृहे ॥ १४३ जगतः पालनार्थाय जन्मप्राप्तो न संशयः । यस्य संकीर्त्य नामापि भवभीतिः प्रणश्यति ॥ १४४ ब्रह्म मूर्तं स्वयं यत्र भयादेस्तत्र का कथा । यत्र संकीर्त्यते रामकथामात्रमपि प्रभो ॥ १४५ नोपसर्गभयं तत्र नाकालमरणं नृणाम् । इस प्रकार विवाह कर लेनेके पश्चात् कमललोचन श्रीराम अपने भ्राताओं, माताओं और बलवान् पिताके साथ कुछ दिनोंतक नाना प्रकारके भोजनादिसे सत्कृत हो मिथिलापुरीमें रहे। फिर महाराज दशरथको अपने पुत्रोंके साथ अयोध्या जानेके लिये उत्कण्ठित देख राजा जनकने सीताके लिये बहुत-सा धन और दिव्य रत्न देकर श्रीरामके लिये अत्यन्त सुन्दर वस्त्र, क्रियाकुशल हाथी, घोड़े और दास दिये एवं दासीके रूपमें बहुत-सी सुन्दरी स्त्रियाँ भी अर्पित कीं। उन बलवान् भूपालने बहुत-से रत्नमय आभूषणोंद्वारा विभूषित सुन्दरी साध्वी पुत्री सीताको रथपर चढ़ाकर वेदध्वनि तथा अन्य माङ्गलिक शब्दोंके साथ विदा किया। अपनी दिव्य कन्या सीताको विदा कर राजा जनक दशरथजी तथा विश्वामित्र [एवं वसिष्ठ] मुनिको प्रणाम करके लौट आये। तब जनककी अति सौभाग्य-शालिनी रानियाँ भी अपनी कन्याओंको यह शिक्षा देकर कि 'शुभे ! तुम पतिकी भक्ति तथा सास-ससुरकी सेवा करना' उन्हें उनकी सासुओंको सौंप, नगरमें लौट आयीं ॥ १३२-१३७१/२ ॥ कहते हैं, तदनन्तर यह सुनकर कि 'राम अपनी प्रबल सेनाके साथ अयोध्यापुरीको लौट रहे हैं', परशुरामने उनका मार्ग रोक लिया। उन्हें देखकर सभी राजपुरुषोंका हृदय कातर हो गया। नरेश्वर ! परशुरामके भयसे राजा दशरथ भी अपनी स्त्री तथा परिवारके साथ दुःखी और शोकमग्न हो गये। तब उत्कृष्ट तपस्वी ब्रह्मचारी महामुनि वसिष्ठजी दुःखी राजा दशरथ तथा अन्य सब लोगोंसे बोले ॥ १३८-१४१ ॥ वसिष्ठजीने कहा - तुम लोगोंको यहाँ श्रीरामके लिये तनिक भी चिन्ता नहीं करनी चाहिये। पिता, माता, भाई अथवा अन्य भृत्यजन थोड़ा-सा भी खेद न करें। नरपाल ! ये श्रीरामचन्द्रजी साक्षात् भगवान् विष्णु हैं। समस्त जगत्की रक्षाके लिये ही इन्होंने तुम्हारे घरमें अवतार लिया है, इसमें संदेह नहीं है। जिनके नाममात्रका कीर्तन करनेसे संसाररूपी भय निवृत्त हो जाता है, वे परमेश्वर ही जहाँ साक्षात् मूर्तिमान् होकर विराजमान हैं, वहाँ भय आदिकी चर्चा भी कैसे की जा सकती है। प्रभो ! जहाँ श्रीरामचन्द्रजीकी कथामात्रका भी कीर्तन होता है, वहाँ मनुष्योंके लिये संक्रामक बीमारी और अकालमृत्युका भय नहीं होता ॥ १४२-१४५१/२ ॥ In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth

१८२ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ४७

यहाँ पृष्ठ का देवनागरी लिप्यन्तरण प्रस्तुत है:

१८२ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ४७

इत्युक्ते भार्गवो रामो राममाहाग्रतः स्थितम् ॥ १४६ त्यज त्वं रामसंज्ञां तु मया वा संगरं कुरु। इत्युक्ते राघवः प्राह भार्गवं तं पथि स्थितम् ॥ १४७ रामसंज्ञां कुतस्त्यक्ष्ये त्वया योत्स्ये स्थिरो भव। इत्युक्त्वा तं पृथक् स्थित्वा रामो राजीवलोचनः ॥ १४८ ज्याघोषमकरोद्वीरो वीरस्यैवाग्रतस्तदा। ततः परशुरामस्य देहान्निष्क्रम्य वैष्णवम् ॥ १४९ पश्यतां सर्वभूतानां तेजो राममुखेऽविशत् । दृष्ट्वा तं भार्गवो रामः प्रसन्नवदनोऽब्रवीत् ॥ १५० राम राम महाबाहो रामस्त्वं नात्र संशयः । विष्णुरेव भवाञ्ज्ञातो ज्ञातोऽस्यद्य मया विभो ॥ १५१ गच्छ वीर यथाकामं देवकार्यं च वै कुरु। दुष्टानां निधनं कृत्वा शिष्टांश्च परिपालय ॥ १५२ याहि त्वं स्वेच्छया राम अहं गच्छे तपोवनम्। इत्युक्त्वा पूजितस्तैस्तु मुनिभावेन भार्गवः ॥ १५३ महेन्द्राद्रिं जगामाथ तपसे धृतमानसः । ततस्तु जातहर्षास्ते जना दशरथश्च ह ॥ १५४ पुरीमयोध्यां सम्प्राप्य रामेण सह पार्थिवः । दिव्यशोभां पुरीं कृत्वा सर्वतो भद्रशालिनीम् ॥ १५५ प्रत्युत्थाय ततः पौराः शङ्खतूर्यादिभिः स्वनैः । विशन्तं राममागत्य कृतदारं रणेऽजितम् ॥ १५६ तं वीक्ष्य हर्षिताः सन्तो विविशुस्तेन वै पुरीम् । तौ दृष्ट्वा स मुनिः प्राप्तौ रामं लक्ष्मणमन्तिके ॥ १५७ दशरथाय तत्पित्रे मातृभ्यश्च विशेषतः । तौ समर्प्य मुनिश्रेष्ठस्तेन राज्ञा च पूजितः । विश्वामित्रश्च सहसा प्रतिगन्तुं मनो दधे ॥ १५८


[हिन्दी अनुवाद]

वसिष्ठजी इस प्रकार कह ही रहे थे कि भृगुवंशी परशुरामजीने सामने खड़े हुए श्रीरामचन्द्रजीसे कहा— “राम ! तुम अपना यह 'राम' नाम त्याग दो, अथवा मेरे साथ युद्ध करो।” उनके यों कहनेपर रघुकुलनन्दन श्रीरामने मार्गमें खड़े हुए उन परशुरामजीसे कहा—"मैं 'राम' नाम कैसे छोड़ सकता हूँ? तुम्हारे साथ युद्ध ही करूँगा, सँभल जाओ।” उनसे इस प्रकार कहकर कमललोचन श्रीराम अलग खड़े हो गये और उन वीरवरने उस समय वीर परशुरामके सामने ही धनुषकी प्रत्यञ्चाकी टंकार की। तब परशुरामजीके शरीरसे वैष्णव तेज निकलकर सब प्राणियोंके देखते-देखते श्रीरामके मुखमें समा गया। उस समय भृगुवंशी परशुरामने श्रीरामकी ओर देख प्रसन्नमुख होकर कहा—"महाबाहु श्रीराम ! आप ही 'राम' हैं, अब इस विषयमें मुझे संदेह नहीं है। प्रभो! आज मैंने आपको पहचाना; आप साक्षात् विष्णु ही इस रूपमें अवतीर्ण हुए हैं। वीर! अब आप अपने इच्छानुसार जाइये, देवताओंका कार्य सिद्ध कीजिये और दुष्टोंका नाश करके साधु पुरुषोंका पालन कीजिये। श्रीराम! अब आप स्वेच्छानुसार चले जाइये; मैं भी तपोवनको जाता हूँ" ॥ १४६-१५२ १/२ ॥

यों कहकर परशुरामजी उन दशरथ आदिके द्वारा मुनिभावसे पूजित हुए और तपस्याके लिये मनमें निश्चय करके महेन्द्राचलको चले गये। तब समस्त बरातियों तथा महाराज दशरथको महान् हर्ष प्राप्त हुआ और वे (वहाँसे चलकर) श्रीरामचन्द्रजीके साथ अयोध्यापुरीके निकट पहुँचे। उधर सम्पूर्ण पुरवासी मङ्गलमयी अयोध्या नगरीको सब ओर दिव्य सजावटसे सुसज्जित करके शङ्ख और दुन्दुभि आदि गाजे-बाजेके साथ उनकी अगवानीके लिये निकले। नगरके बाहर आकर वे रणमें अजेय श्रीरामजीको पत्नीसहित नगरमें प्रवेश करते हुए देखकर आनन्दमग्न हो गये और उन्हींके साथ अयोध्यामें प्रविष्ट हुए ॥ १५३-१५६ १/२ ॥

तत्पश्चात् मुनिवर विश्वामित्रने श्रीराम और लक्ष्मण—दोनों भाइयोंको अपने निकट आया हुआ देखकर उन्हें उनके पिता दशरथ तथा विशेषरूपसे उनकी माताओंको समर्पित कर दिया। तब राजा दशरथद्वारा पूजित होकर मुनिश्रेष्ठ विश्वामित्र सहसा लौट जानेके लिये उद्यत हुए।

अध्याय ४८ ] श्रीराम-वनवास; राजा दशरथका निधन तथा वनमें राम-भरतकी भेंट १८३ समर्प्य रामं स मुनिः सहानुजं | इस प्रकार महामति मुनि विश्वामित्रजीने छोटे भाई सभार्यमग्रे पितुरेकवल्लभम्। | लक्ष्मण तथा भार्या सीताके साथ श्रीरामजीको, जो अपने पुनः पुनः श्राव्य हसनमहामति- | पिताको एकान्त प्रिय थे, समर्पित कर दिया और उनके जगाम सिद्धाश्रममेवमात्मनः॥ १५९ | समक्ष बारम्बार उनका गुणगान करके हँसते हुए वे | अपने श्रेष्ठ सिद्धाश्रमको चले गये॥ १५७-१५९॥ इति श्रीनरसिंहपुराणे रामप्रादुर्भावे सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४७॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'रामावतारविषयक' सैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४७॥ अड़तालीसवाँ अध्याय श्रीराम-वनवास; राजा दशरथका निधन तथा वनमें राम-भरतकी भेंट मार्कण्डेय उवाच | मार्कण्डेयजी कहते हैं—विवाह करनेके पश्चात् कृतदारो महातेजा रामः कमललोचनः। | महातेजस्वी कमललोचन श्रीराम अयोध्यावासियोंका आनन्द पित्रे सुमहतीं प्रीतिं जनानामुपपादयन्॥ १ | बढ़ाते हुए सब प्रकारके भोगोंसे सम्पन्न हो, पिताके | संतोषके लिये अयोध्यामें ही रहने लगे। नरेश्वर ! जब अयोध्यायां स्थितो रामः सर्वभोगसमन्वितः। | रघुकुलनायक श्रीराम प्रसन्नतापूर्वक अयोध्यामें सानन्द प्रीत्या नन्दत्ययोध्यायां रामे रघुपतौ नृप॥ २ | निवास करने लगे, तब उनके भाई भरत शत्रुघ्नको साथ | लेकर अपने मामाके यहाँ चले गये। तदनन्तर राजा भ्राता शत्रुघ्नसहितो भरतो मातुलं ययौ। | दशरथने अपने ज्येष्ठ पुत्र श्रीरामको अप्रतिम सुन्दर, बलिष्ठ, ततो दशरथो राजा प्रसमीक्ष्य सुशोभनम्॥ ३ | नवयुवक, विद्वान् और राजा बनाये जानेके योग्य समझकर | सोचा कि 'अब श्रीरामको राजपद्पर अभिषिक्त करके युवानं बलिनं योग्यं भूपसिद्धयै सुतं कविम्। | राज्यका भार इन्हें सौंप दूँ और स्वयं भगवान् विष्णुके अभिषिच्य राज्यभारं रामे संस्थाप्य वैष्णवम्॥ ४ | धामको प्राप्त करनेके लिये महान् यत्न करूँ॥ १-४१/२॥ | यह सोचकर राजा इस कार्यमें तत्पर हो गये और पदं प्राप्तुं महद्यत्नं करिष्यामीत्यचिन्तयत्। | समस्त दिशाओंमें रहनेवाले बुद्धिमान् भृत्यों, अधीनस्थ संचिन्त्य तत्परो राजा सर्वदिक्षु समादिशत्॥ ५ | राजाओं तथा मन्त्रियोंको तुरन्त आज्ञा दी—'भृत्यगण! | श्रीरामचन्द्रजीके राज्याभिषेकके लिये जो-जो सामान प्राज्ञान् भृत्यान् महीपालान्मन्त्रिणश्च त्वरान्वितः।| मुनियोंने बताये हैं, वे सब एकत्र करके शीघ्र ही आओ। रामाभिषेकद्रव्याणि ऋषिप्रोक्तानि यानि वै॥ ६ | दूतो और मन्त्रियो ! तुम लोग भी मेरी आज्ञासे सब दिशाओंके | राजाओंको बुलाकर, उन्हें साथ ले, शीघ्र यहाँ आ जाओ। तानि भृत्याः समाहृत्य शीघ्रमागन्तुमर्हथ। | पुरवासिजनो ! तुम इस अयोध्यानागरीको उत्तम रीतिसे सजाकर दूतामात्याः समादेशात्सर्वदिक्षु नराधिपान्॥ ७ | सर्वथा शोभा-सम्पन्न बना दो तथा सर्वत्र नृत्य-गीत आदि | उत्सवका ऐसा प्रबन्ध करो, जिससे यह नगर समस्त आहूय तान् समाहृत्य शीघ्रमागन्तुमर्हथ। | पुरवासियोंको आनन्द देनेवाला हो जाय और सम्पूर्ण देशके अयोध्यापुरमत्यर्थं सर्वशोभासमन्वितम्॥ ८ | निवासियोंको मनोहर प्रतीत होने लगे। तुम सब लोग यह जनाः कुरुत सर्वत्र नृत्यगीतादिनन्दितम्। पुरवासिजनानन्दं देशवासिमनःप्रियम्॥ ९ In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth

१८४ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ४८

१८४ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ४८


[संस्कृत श्लोक - बायाँ स्तम्भ]

रामाभिषेकं विपुलं श्वो भविष्यति जानथ। श्रुत्वेत्थं मन्त्रिणः प्राहुस्तं नृपं प्रणिपत्य च॥ १० शोभनं ते मतं राजन् यदिदं परिभाषितम्। रामाभिषेकमस्माकं सर्वेषां च प्रियंकरम्॥ ११ इत्युक्तो दशरथस्तैस्तान् सर्वान् पुनरब्रवीत्। आनीयन्तां द्रुतं सर्वे सम्भारा मम शासनात्॥ १२ सर्वतः सारभूता च पुरी चेयं समन्ततः। अद्य शोभान्विता कार्या कर्तव्यं यागमण्डलम्॥ १३ इत्येवमुक्ता राज्ञा ते मन्त्रिणः शीघ्रकारिणः। तथैव चक्रुस्ते सर्वे पुनःपुनरुदीरिताः॥ १४ प्राप्तहर्षः स राजा च शुभं दिनमुदीक्षयन्। कौशल्या लक्ष्मणश्चैव सुमित्रा नागरो जनः॥ १५ रामाभिषेकमाकर्ण्य मुदं प्राप्यातिहर्षितः। श्वश्रूश्वशुरयोः सम्यक् शुश्रूषणपरा तु सा॥ १६ मुदान्विता सिता सीता भर्तुराकर्ण्य शोभनम्। श्वोभाविन्यभिषेके तु रामस्य विदितात्मनः॥ १७ दासी तु मन्थरानाम्नी कैकेय्याः कुब्जरूपिणी। स्वां स्वामिनीं तु कैकेयीमिदं वचनमब्रवीत्॥ १८ शृणु राज्ञि महाभागे वचनं मम शोभनम्। त्वत्पतिस्तु महाराजस्तव नाशाय चोद्यतः॥ १९ रामोऽसौ कौसलीपुत्रः श्वो भविष्यति भूपतिः। वसुवाहनकोशादि राज्यं च सकलं शुभे॥ २० भविष्यत्यद्य रामस्य भरतस्य न किंचन। भरतोऽपि गतो दूरं मातुलस्य गृहं प्रति॥ २१ हा कष्टं मन्दभाग्यासि सापत्नयाद्दुःखिता भृशम्। सैवमाकर्ण्य कैकेयी कुब्जामिदमथाब्रवीत्॥ २२ पश्य मे दक्षतां कुब्जे अद्यैव त्वं विचक्षणे। यथा तु सकलं राज्यं भरतस्य भविष्यति॥ २३


[हिन्दी अनुवाद - दायाँ स्तम्भ]

जान लो कि कल बड़े समारोहके साथ श्रीरामचन्द्रजीका राज्याभिषेक होगा'॥ ५-९१/२॥ यह सुनकर मन्त्रियोंने राजाको प्रणाम करके उनसे कहा—'राजन्! आपने हमारे समक्ष अपना जो यह विचार व्यक्त किया है, बहुत ही उत्तम है। श्रीरामका अभिषेक हम सभीके लिये प्रियकारक है'॥ १०-११॥ उनके यों कहनेपर राजा पुनः उन सब लोगोंसे बोले—'अच्छा, अब मेरी आज्ञासे अभिषेकके सभी सामान शीघ्र लाये जायँ और समस्त वसुधाकी सारभूता इस अयोध्यापुरीको भी आज ही सब ओरसे सुसज्जित कर देना चाहिये। साथ ही एक यज्ञमण्डपकी रचना भी परम आवश्यक है'॥ १२-१३॥ राजाके यों कहने और बार-बार प्रेरणा करनेपर उन सब शीघ्रकारी मन्त्रियोंने उनके कथनानुसार सब कार्य पूर्ण कर दिये। राजा इस शुभ दिनकी प्रतीक्षा करते हुए बड़े ही आनन्दित हुए। कौशल्या, सुमित्रा, लक्ष्मण तथा अन्य पुरवासी श्रीरामचन्द्रजीके राज्याभिषेकका शुभ समाचार सुनकर आनन्दके मारे फूले नहीं समाये। सास-ससुरकी सेवामें भलीभाँति लगी रहनेवाली सीता भी अपने पतिके लिये इस शुभ संवादको सुनकर बहुत ही प्रसन्न हुईं॥ १४-१६१/२॥ आत्मतत्त्वके ज्ञाता अथवा सबके मनकी बात जाननेवाले भगवान् श्रीरामका अभिषेक दूसरे ही दिन होनेवाला था। इसी बीचमें कैकेयीकी कुबड़ी दासी मन्थराने अपनी स्वामिनी कैकेयीके पास जाकर यह बात कही—'बड़भागिनी रानी! मैं एक बहुत अच्छी बात सुनाती हूँ, सुनो। तुम्हारे पति महाराज दशरथ अब तुम्हारा नाश करनेपर तुले हुए हैं। शुभे! वे जो कौशल्या-पुत्र राम हैं, कल ही राजा होंगे। धन, वाहन और कोश आदिके साथ यह सारा राज्य अब रामका हो जायगा; भरतका कुछ भी नहीं रहेगा। देखो, भाग्यकी बात; इस अवसरपर भरत भी बहुत दूर—अपने मामाके घर चले गये हैं। हाय! यह सब कितने कष्टकी बात है! तुम मन्दभागिनी हो। अब तुम्हें सौतकी ओरसे बहुत ही कष्ट उठाना पड़ेगा'॥ १७-२११/२॥ ऐसी बात सुनकर कैकेयीने कुब्जासे कहा—'बुद्धिमति कुब्जे! तू मेरी दक्षता तो देख—आज ही मैं ऐसा यत्न करती हूँ, जिससे यह सारा राज्य भरतका


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अध्याय ४८ ] श्रीराम-वनवास; राजा दशरथका निधन तथा वनमें राम-भरतकी भेंट १८५ रामस्य वनवासश्च तथा यत्नं करोम्यहम्। हो जाय और रामका वनवास हो'॥ २२-२३१/२॥ इत्युक्त्वा मन्थरां सा तु उन्मुच्य स्वाङ्गभूषणम् ॥ २४ मन्थरासे यों कहकर कैकेयीने अपने अङ्गोंके आभूषण उतार दिये। सुन्दर वस्त्र और फूलोंके हार भी वस्त्रं पुष्पाणि चोन्मुच्य स्थूलवासोधराभवत्। उतार फेंके और मोटा वस्त्र पहन लिया। फिर निर्माल्य निर्माल्यपुष्पधृक्कष्टा कश्मलाङ्गी विरूपिणी ॥ २५ (पूजासे उतरे हुए) पुष्पोंको धारण किया, देहमें राख और धूल लपेट ली और कुरूप वेष बनाकर वह भस्मधूल्यादिनिर्दिग्धा भस्मधूल्या तथा श्रिते। शरीरमें कष्ट और मूर्च्छाका अनुभव करने लगी। वह भूभागे शान्तदीपे सा संध्याकाले सुदुःखिता ॥ २६ भामिनी ललाटमें श्वेत वस्त्र बाँध, संध्याके समय दीपक बुझा, अँधेरेमें ही राख और धूलसे भरे भूभागमें अत्यन्त ललाटे श्वेतचैलं तु बद्ध्वा सुष्वाप भामिनी। दुःखित हो लेट गयी ॥ २४-२६१/२॥ मन्त्रिभिः सह कार्याणि सम्मन्त्र्य सकलानि तु ॥ २७ इधर मन्त्रियोंके साथ सारे कार्योंके विषयमें मन्त्रणा करके, वसिष्ठ आदि ऋषियोंद्वारा पुण्याहवाचन, पुण्याहः स्वस्तिमाङ्गल्यैः स्थाप्य रामं तु मण्डले। स्वस्तिवाचन और मङ्गलपाठादि करवाकर, श्रीरामको ऋषिभिस्तु वसिष्ठाद्यैः सार्धं सम्भारमण्डपे ॥ २८ यज्ञ-सामग्रीसे युक्त मण्डपमें बिठाया और वृद्धि वृद्धिजागरणीयैश्च सर्वतस्तूर्यनादिते। (नान्दीश्राद्ध) एवं जागरण-सम्बन्धी कृत्यके लिये उपयुक्त गीतनृत्यसमाकीर्णे शङ्खकाहलनिःस्वनैः ॥ २९ तथा सब ओर शहनाई एवं शङ्ख, काहल आदिके शब्दोंसे निनादित एवं गान और नृत्यके कार्यक्रमोंसे पूर्ण स्वयं दशरथस्तत्र स्थित्वा प्रत्यागतः पुनः। उस मण्डपमें थोड़ी देरतक स्वयं भी ठहरकर राजा कैकेय्या वेश्मनो द्वारं जरद्भिः परिरक्षितम् ॥ ३० दशरथ वहाँसे लौट आये। राजा कैकेयीसे श्रीरामचन्द्रजीके अभिषेकका शुभ समाचार सुनानेकी इच्छासे कैकेयीके रामाभिषेकं कैकेयीं वक्तुकामः स पार्थिवः। भवनके दरवाजेपर पहुँचे, जहाँ बूढ़े सिपाही पहरा देते कैकेयीभवनं वीक्ष्य सान्धकारमथाब्रवीत् ॥ ३१ थे। कैकेयीके घरको अन्धकारयुक्त देख राजाने कहा ॥ २७-३१॥ अन्धकारमिदं कस्मादद्य ते मन्दिरे प्रिये। 'प्रिये ! आज तुम्हारे मन्दिरमें अन्धकार क्यों है ? रामाभिषेकं हर्षाय अन्त्यजा अपि मेनिरे ॥ ३२ आज तो इस नगरके चाण्डालोंने भी श्रीरामचन्द्रके अभिषेकको आनन्दजनक माना है। सभी लोग अपने गृहालंकरणं कुर्वन्त्यद्य लोका मनोहरम्। घरको सुन्दर ढंगसे सजा रहे हैं। तुमने अपने भवनको त्वयाद्य न कृतं कस्मादित्युक्त्वा च महीपतिः ॥ ३३ क्यों नहीं सुसज्जित किया?'-यों कहकर राजाने घरमें दीप प्रज्वलित कराये; फिर उसके भीतर प्रवेश किया। ज्वालयित्वा गृहे दीपान् प्रविवेश गृहं नृपः। वहाँ कैकेयी धरतीपर पड़ी सो रही थी। उसका प्रत्येक अशोभनाङ्गीं कैकेयीं स्वपन्तीं पतितां भुवि ॥ ३४ अङ्ग अशोभन जान पड़ता था। उसे इस अवस्थामें देख राजाने उठाकर हृदयसे लगाया और उसको प्रिय दृष्ट्वा दशरथः प्राह तस्याः प्रियमिदं त्विति। लगनेवाले ये वचन कहे - 'प्रिये ! मेरी उत्तम बात आश्लिष्योत्थाय तां राजा शृणु मे परमं वचः ॥ ३५ सुनो। सुन्दरि ! जो तुम्हारे प्रति अपनी मातासे भी अधिक प्रेम रखते हैं, उन्हीं श्रीरामचन्द्रका कल राज्याभिषेक स्वमातुरधिकां नित्यं यस्ते भक्तिं करोति वै। होगा' ॥ ३२-३६॥ तस्याभिषेकं रामस्य श्वो भविष्यति शोभने ॥ ३६ In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth

१८६ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ४८

१८६ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ४८ इत्युक्ता पार्थिवेनापि किंचिन्नोवाच सा शुभा । मुञ्चन्ती दीर्घमुष्णं च रोषोच्छ्वासं मुहुर्मुहुः ॥ ३७ तस्थावाश्लिष्य हस्ताभ्यां पार्थिवः प्राह रोषिताम् । किं ते कैकेयि दुःखस्य कारणं वद शोभने ॥ ३८ वस्त्राभरणरत्नादि यद्यदिच्छसि शोभने । तत्त्वं गृहीष्व निश्शङ्कं भाण्डारात् सुखिनी भव ॥ ३९ भाण्डारेण मम शुभे श्रोऽर्थसिद्धिर्भविष्यति । यदाभिषेकं सम्प्राप्ते रामे राजीवलोचने ॥ ४० भाण्डागारस्य मे द्वारं मया मुक्तं निरर्गलम् । भविष्यति पुनः पूर्णं रामे राज्यं प्रशासति ॥ ४१ बहु मानय रामस्य अभिषेकं महात्मनः । इत्युक्ता राजवर्येण कैकेयी पापलक्षणा ॥ ४२ कुमतिर्निर्घृणा दुष्टा कुब्जया शिक्षिताब्रवीत् । राजानं स्वपतिं वाक्यं क्रूरमत्यन्तनिष्ठुरम् ॥ ४३ रत्नादि सकलं यत्ते तन्ममैव न संशयः । देवासुरमहायुद्धे प्रीत्या यन्मे वरद्वयम् ॥ ४४ पुरा दत्तं त्वया राजंस्तदिदानीं प्रयच्छ मे । इत्युक्तः पार्थिवः प्राह कैकेयीमशुभां तदा ॥ ४५ अदत्तमप्यहं दास्ये तव नान्यस्य वा शुभे । किं मे प्रतिश्रुतं पूर्वं दत्तमेव मया तव ॥ ४६ शुभाङ्गी भव कल्याणि त्यज कोपमनर्थकम् । रामाभिषेकजं हर्षं भजोत्तिष्ठ सुखी भव ॥ ४७ इत्युक्ता राजवर्येण कैकेयी कलहप्रिया । उवाच परुषं वाक्यं राज्ञो मरणकारणम् ॥ ४८ वरद्वयं पूर्वदत्तं यदि दास्यसि मे विभो । श्वोभूते गच्छतु वनं रामोऽयं कोशलात्मजः ॥ ४९ द्वादशाब्दं निवसतु त्वद्वाक्याद्दण्डके वने । अभिषेकं च राज्यं च भरतस्य भविष्यति ॥ ५०

राजाके इस प्रकार कहनेपर वह सुन्दरी कुछ भी न बोली। बारम्बार क्रोधपूर्वक केवल लम्बी-लम्बी गरम साँसें छोड़ती रही। राजा अपनी भुजाओंसे उसका आलिङ्गन करके बैठ गये और उस रूठी हुई कैकेयीसे बोले—'सुन्दरी कैकेयि! बताओ, तुम्हारे दुःखका क्या कारण है? शुभे! वस्त्र, आभूषण और रत्न आदि जिन-जिन वस्तुओंकी तुम्हें इच्छा हो, उन सबको बिना किसी आशङ्काके भण्डारघरसे ले लो; परंतु प्रसन्न हो जाओ। कल्याणि! कल जब श्रीरामका राज्याभिषेक सम्पन्न हो जायगा, उस समय उस भाण्डारसे मेरे मनोरथकी सिद्धि हो जायगी। इस समय तो मैंने भण्डारघरका द्वार उन्मुक्त कर रखा है। श्रीरामके राज्य-शासन करते समय वह फिर पूर्ण हो जायगा। प्रिये! महात्मा श्रीरामके राज्याभिषेकको तुम इस समय अधिक महत्त्व और सम्मान दो'॥ ३७-४११/२॥ महाराज दशरथके इस प्रकार कहनेपर कुब्जाके द्वारा पढ़ायी गयी पापिनी, दुर्बुद्धि, दयाहीना और दुष्टा कैकेयीने अपने पति महाराज दशरथसे अत्यन्त क्रूरतापूर्वक निष्ठुर वचन कहा—'महाराज! इसमें संदेह नहीं कि आपके जो रत्न आदि हैं, वे सब मेरे ही हैं; किंतु पूर्वकालमें देवासुर-संग्रामके अवसरपर आपने प्रसन्न हो मुझे जो दो वर दिये थे, उन्हें ही इस समय दीजिये'॥ ४२-४४१/२॥ यह सुनकर राजाने उस अशुभा कैकेयीसे कहा—'शुभे! और किसीकी बात तो मैं नहीं कहता, परंतु तुम्हारे लिये तो जिसे नहीं देनेको कहा है, वह वस्तु भी दे दूँगा। फिर जिसको देनेके लिये मैंने पहले प्रतिज्ञा कर ली है, वह वस्तु तो दी हुई ही समझो। कल्याणि! अब सुन्दर वेष धारण करो और यह व्यर्थका कोप छोड़ दो। उठो, श्रीरामके राज्याभिषेकके आनन्दोत्सवमें भाग लो और सुखी हो जाओ'॥ ४५-४७॥ नृपश्रेष्ठ दशरथके यों कहनेपर कलहप्रिया कैकेयीने ऐसी कठोर बात कही, जो आगे चलकर राजाकी मृत्युका कारण बन गयी। उसने कहा—'प्रभो! यदि आप पहलेके दिये हुए दोनों वर मुझे देना चाहते हों तो (पहला वर मैं यही माँगती हूँ कि) ये कौशल्यानन्दन श्रीराम कल सबेरा होते ही वनको चले जायँ और आपकी आज्ञासे ये बारह वर्षोतक दण्डकारण्यमें निवास करें तथा मेरा दूसरा अभीष्ट वर यह है कि अब राज्य और राज्याभिषेक भरतका होगा'॥ ४८-५०॥