श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
१९० श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ४
१९० श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ४ तस्मै हविषा चरुपुरोडाशादि- | को हवि--चरु-पुरोडाशादि द्रव्यसे द्रव्येण विधेम परिचरेम । विधेः | विधेम-पूजें । परिचर्या (पूजा) ही | जिसका कर्म है ऐसे 'विध' धातुका परिचरणकर्मण एतद्रूपम् ॥१३॥ | यह रूप है* ॥१३॥ परमात्मज्ञानसे शान्ति-प्राप्ति एवं बन्धननाशका पुनः उपदेश परस्यातिसूक्ष्मत्वं जगच्चक्रे | यद्यपि परमात्माके अत्यन्त सूक्ष्मत्व, साक्षित्वेनावस्थितत्वं निखिल- | जगच्चक्रमें साक्षीरूपसे स्थित होने, जगत्स्रष्टृत्वं सर्वात्मकत्वं तत्ता- | सम्पूर्ण जगत्को रचने, सर्वरूप होने दात्म्याज्ञानां मुक्तिश्चेत्येत- | एवं उसके तादात्म्य-ज्ञानसे जीवोंकी द्बहुशोऽधस्तात्प्रतिपादितं यद्यपि | मुक्ति होनेका ऊपर अनेक प्रकारसे तथापि बुद्धिसौकर्यार्थं पुनरप्याह- | प्रतिपादन किया जा चुका है, तथापि | यह सब समझनेमें सुगमता हो जाय | -इसलिये श्रुति फिर भी कहती है- सूक्ष्मातिसूक्ष्मं कलिलस्य मध्ये विश्वस्य स्रष्टारमनेकरूपम् । विश्वस्यैकं परिवेष्टितारं ज्ञात्वा शिवं शान्तिमत्यन्तमेति ॥१४॥ सूक्ष्मसे भी सूक्ष्म, अविद्या और उसके कार्यरूप दुर्गम स्थानमें स्थित,† जगत्के रचयिता, अनेकरूप और संसारको एकमात्र भोग प्रदान करनेवाले शिवको जानकर जीव परम शान्ति प्राप्त करता है ॥१४॥
- यद्यपि 'विध विधाने' (तुदा० पर० सेट् ) धातुसे विधि लिङ्के उत्तम पुरुषके बहुवचनमें 'विधेम' रूप बनता है। तथापि विधानका तात्पर्य परिचर्या (पूजा) में ही है—ऐसा मान लेनेसे अर्थ ठीक हो जाता है। अथवा 'धातु' के अनेक अर्थ होते हैं इस न्यायसे भी परिचर्या अर्थ ठीक ही है। † 'कलिल' शब्दके अर्थमें टीकाकारोंका मतभेद है। प्रस्तुत अर्थ शाङ्कर- भाष्यके अनुसार है। विज्ञानभगवान्ने भी यही अर्थ किया है। नारायणतीर्थ 'कलिलस्य मध्ये' का अर्थ 'तमसो मध्ये'—'अज्ञानके मध्यमें' करते हैं तथा शङ्करा- नन्दजी इस शब्दकी व्याख्या इस प्रकार करते हैं— 'नारीवीर्येण संगतं पौरुषं
अध्याय ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १९१
अध्याय ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १९१
[संस्कृत-भाष्यम्] सूक्ष्मेति । पृथिव्याद्यव्याकृ- तान्तमुत्तरोत्तरं सूक्ष्मसूक्ष्मतरमपे- क्ष्येश्वरस्य तदपेक्षया सूक्ष्मतमत्व- माह—सूक्ष्मातिसूक्ष्ममिति । कलिलस्याविद्यातत्कार्यात्मकदुर्ग- स्य गहनस्य मध्ये । शेषं व्या- ख्यातम् ॥१४॥
[भाषार्थ] 'सूक्ष्मातिसूक्ष्मम्' इत्यादि । 'सूक्ष्मातिसूक्ष्मम्' इस पदसे श्रुति पृथिवीसे लेकर अव्याकृतपर्यन्त जो उत्तरोत्तर सूक्ष्म और सूक्ष्मतर हैं उनकी अपेक्षा भी ईश्वरकी सूक्ष्मतमता बतलाती है । कलिलके मध्यमें अर्थात् अविद्या और उसके कार्यरूप दुर्ग-- गहन [ स्थान ] के मध्यमें । शेष अंशकी पहले व्याख्या हो चुकी है ॥१४॥
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[अवतरणिका] [संस्कृत] परस्य साक्षिरूपेणावस्थितत्वं सनकादिभिर्ब्रह्मादिदेवैश्चाधिकारिपुरुषैरप्यात्मतया प्राप्यत्वं साधनचतुष्टयादियुतास्मदादीनां मोक्षसिद्धिं चाह— [हिन्दी] अब परमात्माके साक्षिरूपसे स्थित होने, सनकादि और ब्रह्मादि देवताओं एवं अधिकारी पुरुषोंद्वारा आत्मस्वरूपसे प्राप्तव्य होने तथा साधनचतुष्टयादिसे सम्पन्न होनेपर हम लोगोंको भी मोक्ष प्राप्त होनेका प्रतिपादन किया जाता है--
[मूल मन्त्र] स एव काले भुवनस्य गोप्ता विश्वाधिपः सर्वभूतेषु गूढः । यस्मिन्युक्ता ब्रह्मर्षयो देवताश्च तमेवं ज्ञात्वा मृत्युपाशांश्छिनत्ति ॥१५॥
[मन्त्रार्थ] वही अतीत कल्पोंमें विश्वका रक्षक था, वही विश्वका स्वामी और सम्पूर्ण भूतोंमें स्थित है । [ ऐसे ] जिस परमात्मामें ब्रह्मर्षि और देवगण
[पाद-टिप्पणी] वीर्यमल्पकालस्थं कलिलमित्युच्यते । 'अथवा जगदारम्भकाणामपां बुद्बुदस्य पूर्वा- वस्था कलिलमित्युच्यते । फेनिलान्युदकानीत्यर्थः' अर्थात् स्त्रीके रजसे मिला हुआ पुरुषका वीर्य कुछ काल स्थित रहनेपर 'कलिल' कहा जाता है । अथवा जगत्की रचना करनेवाले जलके बुलबुलेकी पूर्वावस्था 'कलिल' कही जाती है अर्थात् फेनयुक्त जल ।
१९२ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ४
१९२ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ४ ꕥꕥꕥꕥꕥꕥꕥꕥꕥꕥꕥꕥꕥꕥ अभिन्नरूपसे स्थित हैं उसे इस प्रकार जानकर पुरुष मृत्युके पाशोंको काट डालता है ॥१५॥ स एवेति । स एव प्रकृतः | 'स एव' इत्यादि । वह प्रकृत कालेऽतीतकल्पेषु जीवसञ्चित- | परमेश्वर ही कालमें—अतीत कल्पों- में अर्थात् जीवोंके सञ्चित कर्मोंके कर्मपरिपाकसमये भुवनस्य गोप्ता | फलोन्मुख होते समय भुवनका गोप्ता तत्तत्कर्मानुगुणतया रक्षिता । | यानी विभिन्न जीवोंके कर्मानुसार उनका रक्षक था। वह विश्वाधिप— विश्वाधिपः विश्वस्य स्वामी । सर्व- | विश्वका स्वामी, समस्त भूतोंमें गूढ भूतेषु गूढो ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तेषु | अर्थात् ब्रह्मासे लेकर स्तम्बपर्यन्त साक्षिमात्रतयावस्थितः । यस्मिं- | समस्त प्राणियोंमें साक्षीरूपसे स्थित है। श्चिद्घनानन्दवपुषि परे युक्ता | जिस चिद्घनानन्दविग्रह परमात्मामें युक्त—ऐक्यभावको प्राप्त हैं; कौन ? ऐक्यं प्राप्ताः । ते के ? ब्रह्मर्षयः | सनकादि ब्रह्मर्षि और ब्रह्मादि सनकादयः । देवता ब्रह्मादयः । | देवगण । उसी ईश्वरको जानकर तमेवेश्वरं ज्ञात्वा ब्रह्माहमस्मीत्य- | अर्थात् 'मैं ब्रह्म हूँ' इस प्रकार साक्षात्कार कर [ पुरुष ] मृत्युके परोक्षीकृत्य मृत्युपाशान् मृत्यु- | पाशोंको काट डालता है । अविद्या रविद्या तमो रूपादयश्च पाशाः | अर्थात् तम ही मृत्यु है तथा रूपादि विषय पाश हैं, क्योंकि उनमें ही पाश्यन्त इति पाशास्तान् “मृत्युर्वै | जीव पाशित ( बद्ध ) होते हैं, अतः तमः” (बृ० उ० १ । ३ । २८) | वे पाश हैं; श्रुति कहती है—"अज्ञान इति श्रुतेः । तत्कार्यकाम- | मृत्यु ही है।” उस ( अज्ञान ) कर्मच्छिनत्ति नाशयति । ऐक्य- | के कार्य काम और कर्मादिको काट डालता यानी नष्ट कर देता है; रूपस्वप्रकाशाग्निना दहतीत्यर्थः | अर्थात् ऐक्यरूप स्वप्रकाशाग्निसे भस्म ॥ १५ ॥ | कर देता है ॥ १५ ॥ ─━⊱༻☬༺⊰━─
[अध्याय ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १९३
[अध्याय ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १९३
(बाएँ) परस्यात्यन्तातिसूक्ष्मतमत्वमा- (दाएँ) अब श्रुति परमात्माका अत्यधिक (बाएँ) नन्दातिशयवत्त्वं निर्दोषवत्त्वं (दाएँ) सूक्ष्मतम, अतिशय आनन्दवान् और (बाएँ) जीवेष्वतिसूक्ष्मतया स्वरूपेणा- (दाएँ) निर्दोष होना, जीवोंमें अत्यन्त सूक्ष्म- (बाएँ) वस्थितत्वं सर्वस्यापि सत्तादि- (दाएँ) रूपसे स्थित होना, सबको सत्तास्फूर्ति (बाएँ) प्रदतया व्यापित्वं तदेकत्वज्ञानात् (दाएँ) देनेवाला होनेसे व्यापक होना तथा (बाएँ) पाशहानिं च दर्शयति— (दाएँ) उसके एकत्वज्ञानसे बन्धनका नाश होना दिखलाती है—
घृतात्परं मण्डमिवातिसूक्ष्मं ज्ञात्वा शिवं सर्वभूतेषु गूढम् । विश्वस्यैकं परिवेष्टितारं ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः ॥१६॥
घृतके ऊपर रहनेवाले उसके सार भागके समान अत्यन्त सूक्ष्म शिवको भूतोंमें अन्तर्यामीरूपसे स्थित जानकर तथा विश्वके एकमात्र भोगप्रद उस देवका साक्षात्कार कर पुरुष समस्त बन्धनोंसे मुक्त हो जाता है ॥१६॥
(बाएँ) घृतादिति । घृतोपरि विद्य- (दाएँ) 'घृतात्' इत्यादि । जिस प्रकार (बाएँ) मानं मण्डं सारस्तद्वतामतिप्रीति- (दाएँ) घृतके ऊपर रहनेवाला मण्ड— (दाएँ) उसका सारभाग घृतवालोंकी अत्यन्त (बाएँ) विषयो यथा तथा मुमुक्षूणामति- (दाएँ) प्रीतिका विषय होता है उसी प्रकार (दाएँ) परमात्मा मुमुक्षुओंको साररूप (बाएँ) साररूपानन्दप्रदत्वेन निरतिशय- (दाएँ) अत्यन्त आनन्द प्रदान करनेके (दाएँ) कारण उनकी निरतिशय प्रीतिका (बाएँ) प्रीतिविषयः परमात्मा तद्वद् (दाएँ) विषय है । उस घृतके सारके समान (बाएँ) घृतसारवदानन्दरूपेणात्यन्तसूक्ष्मं (दाएँ) आनन्दरूपसे अत्यन्त सूक्ष्म शिवको, (दाएँ) 'शिव' शब्दकी व्याख्या पहले की (बाएँ) ज्ञात्वा शिवमित्येतद्व्याख्यातम्। (दाएँ) जा चुकी है, समस्त भूतोंमें—ब्रह्मासे (बाएँ) सर्वभूतेषु गूढं ब्रह्मादिस्तम्ब- (दाएँ) लेकर स्तम्बपर्यन्त समस्त जीवोंमें
१९४ श्वेताश्वतरोपनिषद् [अध्याय ४
१९४ श्वेताश्वतरोपनिषद् [अध्याय ४ ❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦ पर्यन्तेषु जन्तुषु कर्मफलभोग- | गूढ जानकर कर्मफलभोगके साक्षी- | रूपसे प्रत्यक्षतया वर्तमान रहते साक्षित्वेन प्रत्यक्षतया वर्तमान- | हुए भी उन (काम-कर्मादि) के | द्वारा उसका ईश्वरत्व तिरस्कृत हो मपि तैस्तिरस्कृतेश्वरभावम्। उत्त- | गया है [ इसलिये उसे गूढ कहा | जाता है]। उत्तरार्धकी व्याख्या रार्धं व्याख्यातम् ॥१६॥ | की जा चुकी है ॥१६॥
परमात्मसाक्षात्कारके साधन निर्भेदसुखैकतानात्मनो विश्व- | अब भेदशून्य सुखैकरस आत्माके | विश्वकर्तृत्व एवं विश्वव्यापित्वका तथा कृत्त्वं तद्व्यापित्वं संन्यासिभि- | संन्यासियोंद्वारा प्राप्तव्य मोक्ष- राप्तव्यमोक्षरूपत्वं चाह— | स्वरूपताका वर्णन करते हैं-- एष देवो विश्वकर्मा महात्मा सदा जनानां हृदये संनिविष्टः । हृदा मनीषा मनसाभिक्लृप्तो य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति ॥१७॥ यह सर्वव्यापी देव जगत्कर्ता और सर्वदा समस्त जीवोंके हृदयमें स्थित है। यह प्रपञ्चनिषेधके उपदेश, आत्मानात्मविवेक-बुद्धि और एकत्वज्ञानके द्वारा प्रकाशित होता है, इसे जो जानते हैं वे अमर हो जाते हैं ॥१७॥ एष इति । एष प्रकृतो देवो | 'एष देवो' इत्यादि । यह प्रकृत | देव—द्योतनात्मक परमात्मा विश्वकर्मा द्योतनात्मको विश्वकर्मा। महदादि | है। महदादि विश्व कर्म, है, यह | किया जाता है इसलिये कर्म है; विश्वं कर्म क्रियत इति कर्म माया- | मायाके संसर्गवश विश्वरूप कार्य | इसीका है इसलिये यह विश्वकर्मा वेशाद्विश्वरूपं कार्यमस्येति विश्व- |
अध्याय ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १९५
[मूल/संस्कृत भाष्य]
कर्मा । महांश्चासावात्मेति महात्मा सर्वव्यापोत्यर्थः । सदा सर्वदा जनानां हृदये परमे व्योम्नि हृदा- काशे जलाद्युपाधिषु सूर्यप्रति- विम्बवन्निविष्टः सम्यक्स्थित इत्येतत् । स एव साक्षिरूपेण हृदा ‘हृञ् हरणे’ इति स्मरणाद्धर- तीति हृत्तेन हृदा नेति नेतीति निषेधोपदेशेन मनीषायां पुरुषा- र्थोऽयमपुरुषार्थोऽयमात्मायमना- त्मेत्येतया विवेकबुद्ध्या मनसा विचारसाध्यैकत्वज्ञानेन चाभि- कॢप्तः प्रकाशितोऽखण्डैकरसत्वे- नाभिव्यक्त इत्येतत् । ये जनाः साधनचतुष्टयसंपन्नाः संन्यासिन एतत्तत्त्वमस्यादि- वाक्यप्रतिपाद्यैकरूपमखण्डैकरस- मिति यावद्विदुर्ब्रह्माहमस्मीत्य- परोक्षीकुर्युस्ते यथोक्तज्ञानिनो- ऽमृता भवन्त्यमरणधर्माणः पुनरा- वृत्तिरहिता भवन्तीत्यर्थः ॥१७॥
[भाष्यार्थ / हिन्दी अनुवाद]
है । तथा महान् और आत्मा होनेके कारण यह महात्मा अर्थात् सर्वव्यापी है । यह सर्वदा जीवोंके हृदय— परव्योम यानी हृदयाकाशमें जलादि उपाधियोंमें सूर्यप्रतिबिम्बके समान निविष्ट अर्थात् सम्यक्रूपसे स्थित है ! वही साक्षिरूपसे हृदा—‘हृञ् हरणे’ ( ‘हृ’ धातु हरणार्थक है ) ऐसी [ धातुसूत्ररूप ] स्मृति होनेके कारण जो हरण करे उसका नाम हृत् है उसके द्वारा यानी ‘नेति- नेति’ इत्यादि निषेधोपदेशसे, मनीषा —‘यह पुरुषार्थ है और यह अपुरुषार्थ है, यह आत्मा है और यह अनात्मा है’ इस प्रकारकी विवेकबुद्धिसे तथा मनसा—विचार- साध्य एकत्वज्ञानसे अभिकॢप्त— प्रकाशित होता—यानी अखण्डैक- रसस्वरूपसे अभिव्यक्त होता है । जो जन अर्थात् साधनचतुष्टय- सम्पन्न संन्यासिगण इसे ‘यह ‘तत्त्व- मसि’ आदि वाक्योंसे प्रतिपादित अखण्डैकरसरूप है’ इस प्रकार जानते हैं अर्थात् ‘मैं ब्रह्म हूँ’ इस प्रकार इसका साक्षात्कार करते हैं वे इस तरह बतलाये हुए ज्ञानीलोग अमृत—अमरणधर्मा अर्थात् पुनरा- वृत्तिशून्य हो जाते हैं ॥ १७ ॥
१९६ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ४
१९६ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ४
ज्ञानसे द्वैत-निवृत्तिका उपदेश
कालत्रयेऽपि मुक्तौ प्रलयादौ | तीनों ही कालमें तथा मुक्ति और च परमात्मा कूटस्थ इति निश्चया- | प्रलय आदिमें भी परमात्मा कूटस्थ | ही है—ऐसा निश्चय होनेसे जाग्रत् जाग्रत्स्वप्नयोरपि भ्रान्त्या सद्द्वि- | और स्वप्नमें भी भ्रान्तिसे ही द्वैत- | प्रतीति होती है; वस्तुतः तो तीयत्वावभासः । वस्तुतस्तु सदा | सर्वदा अभेद ही है—यह बात श्रुति निर्भेद एवेत्याह— | बतलाती है—
यदातमस्तन्न दिवा न रात्रि- र्नसन चासञ्छिव एव केवलः । तदक्षरं तत्सवितुर्वरेण्यं प्रज्ञा च तस्मात्प्रसृता पुराणी ॥१८॥
जिस समय अज्ञान नहीं रहता उस समय न दिन रहता है न रात्रि और न सत् रहता है न असत्, एकमात्र शिव रह जाता है; वह अविनाशी और आदित्यमण्डलाभिमानी देवका भजनीय है तथा उसीसे पुरातन प्रज्ञा (गुरुपरम्परागत ज्ञान) का प्रसार हुआ है ॥१८॥
यदेति । यदा यस्यामवस्था- | 'यदा' इत्यादि । जिस अवस्थामें | अतम—जिसमें तम (अज्ञान) यामतमो न तमोऽस्येत्यतमस्तत्त्व- | नहीं है ऐसा अतम रहता है मादिवाक्यजन्यज्ञानेन दीपस्था- | अर्थात् जब दीपकरूप तत्त्वमस्यादि- | वाक्यजनित ज्ञानसे अविद्या दग्ध नीयेन दग्धाविद्या तत्कार्यरूपतम- | हो जाती है, क्योंकि वह अपने | कार्यरूप तमवाली है, उस समय स्कत्वात्तदा तत्काले न दिवा | न दिन—दिनका आरोप होता दीवारोपोऽपि नास्ति न रात्रिस्त- | है और न रात्रि—रात्रिका ही
अध्याय ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १९७
अध्याय ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १९७
दारोपोऽपि नास्तीति सर्वत्रा- | आरोप होता है—इस प्रकार 'आरोप' नुषङ्गः । न सन्सत्तारोपोऽपि । | शब्दका सबके साथ सम्बन्ध लगाना चाहिये । नासन्नभावारोपोऽपि । | और न सत्—सत्ताका आरोप रहता है न असत्—अभाव- तर्हि तत्त्वं सर्वत्र शून्यमेव | का आरोप ही रहता है । जातमिति बौद्धमताविशेषमाश- | तब तो सर्वत्र शून्य ही तत्त्व रहा—इस प्रकार बौद्धमतके सादृश्य- ङ्कयाह—शिव एवेति । शिव | की आशङ्का करके श्रुति कहती है —'शिव एव' इत्यादि । उस समय एव शुद्धस्वभावो न शून्यमिति | शिव यानी शुद्धस्वभाव परमात्मा ही रहता है, शून्य नहीं रहता—यह अर्थ निपातार्थः । केवलोऽविद्यावि- | निपातसे ध्वनित होता है । वह केवल अर्थात् अविद्यारूप विकल्पसे रहित, कल्पशून्यः । तदक्षरं तदुक्तस्वरूपं | अक्षर—उसके स्वरूपका क्षय नहीं होता इसलिये अक्षर यानी नित्य, तत् न क्षरतीत्यक्षरं नित्यं तत्तत्पद- | —तत्पदका लक्ष्यार्थ तथा सविता —आदित्यमण्डलाभिमानी देवताका लक्ष्यं सवितुरादित्यमण्डलाभि- | वरेण्य—वरणीय यानी सम्यक् प्रकार- से भजनीय है । उस शुद्धत्वके हेतुसे मानिनो वरेण्यं संभजनीयम् । | प्रज्ञा--गुरुके उपदेशसे 'तत्त्वमसि' आदि वाक्यसे उत्पन्न होनेवाली बुद्धि प्रज्ञा गुरुपदेशातत्त्वमादिवाक्यजा | प्रसृत हुई है अर्थात् नित्य पदार्थके विवेकादिसे सम्पन्न संन्यासियोंमें बुद्धिः, चकार एवकारार्थः, | पूर्णत्वरूपसे व्याप्त हुई है । वह पुराणी यानी ब्रह्मासे आरम्भ करके परम्परासे तस्माच्छुद्धत्वहेतोः प्रसृता नित्य- | प्राप्त हुई है अर्थात् अनादिसिद्धा है । यहाँ चकार एवके अर्थमें है ॥१८॥ विवेकादिमत्सु संन्यासिषु व्याप्ता पूर्णत्वाकारेण पुराणी ब्रह्माण- मारभ्य परम्परया प्राप्तानादि- सिद्धा ॥१८॥
१९८ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ४ ब्रह्मके अनुपम एवं इन्द्रियातीत स्वरूपका वर्णन कूटस्थस्य ब्रह्मण ऊर्ध्वादिषु अब श्रुति यह बतलाती है कि दिक्षु केनाप्यपरिग्राह्यत्वमद्वितीय- कूटस्थ ब्रह्म ऊर्ध्वादि दिशाओंमें किसी- से भी ग्राह्य नहीं है, अद्वितीय होनेके त्वात्केनाप्यतुलितत्वं कालदिगा- कारण कोई उसके समान नहीं है, तथा वह काल-दिगादिसे अनवच्छिन्न द्यनवच्छिन्नयशःस्वरूपत्वं चाह— यशःस्वरूप है— नैनमूर्ध्वं न तिर्यञ्चं न मध्ये परिजग्रभत् । न तस्य प्रतिमा अस्ति यस्य नाम महद्यशः ॥१९॥ उसे ऊपरसे, इधर-उधरसे अथवा मध्यमें भी कोई ग्रहण नहीं कर सकता । जिसका नाम महद्यश है ऐसे उस ब्रह्मकी कोई उपमा भी नहीं है ॥१९॥ नैनमिति । एनं प्रकृतमपरि- ‘नैनम्’ इत्यादि । अपरिच्छिन्न, च्छिन्नरूपत्वान्निरंशत्वान्निरवयव- निरंश और निरवयव होनेके कारण त्वाच्चोर्ध्वादिषु दिक्षु कश्चिदपि इस प्रकृत ब्रह्मको ऊर्ध्वादि दिशाओंमें न परिजग्रभत्परिग्रहीतुं न शक्नु- कोई ग्रहण करनेमें समर्थ नहीं है । यात् । तस्य तस्यैवेश्वरस्याखण्ड- अखण्डानन्दानुभवरूप होनेसे उसके सुखानुभवत्वादेतादृशद्वितीयाभा- समान कोई दूसरा न होनेसे उस वात्प्रतिमोपमा नास्ति । यस्य ईश्वरकी कोई प्रतिमा—उपमा नहीं नाम महद्यशो यस्येश्वरस्य नामा- है । जिसका नाम महद्यश है अर्थात् भिधानं महद्दिगाद्यनवच्छिन्नं जिस ईश्वरका नाम—अभिधान महत् सर्वत्र परिपूर्णं यशः कीर्तिः॥१९॥ —दिगादिसे अपरिमित यानी सर्वत्र पूर्ण यश—कीर्ति है* ॥१९॥
- अर्थात् 'वह दिगाद्यनवच्छिन्न कीर्तिवाला' है ।
अध्याय ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १९९
अध्याय ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १९९ ❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦ ईशस्येन्द्रियाद्यविषयतां प्रत्य- | अब श्रुति ईश्वरकी इन्द्रियादिकी ग्रूपतां तदैक्यज्ञानान्मोक्षतां | अविषयता, प्रत्यग्रूपता और उसके | साथ आत्माके एकत्वका ज्ञान होनेसे चाह— | मोक्षप्राप्तिका वर्णन करती है— न संदृशे तिष्ठति रूपमस्य न चक्षुषा पश्यति कश्चनैनम् । हृदा हृदिस्थं मनसा य एन- मेवं विदुरमृतास्ते भवन्ति ॥२०॥ इसका स्वरूप नेत्रादिसे ग्रहण करनेयोग्य स्थानमें नहीं है, इसे कोई भी नेत्रद्वारा नहीं देख सकता। जो इस हृदयस्थित परमात्माको शुद्ध बुद्धि यानी मनसे इस प्रकार जान लेते हैं वे अमर हो जाते हैं ॥२०॥ न संदृश इति । अस्य प्रकृते- | 'न संदृशे' इत्यादि । इस प्रकृत श्वरस्य रूपं स्वरूपं रूपाादिरहितं | ईश्वरका रूप अर्थात् रूपाादिरहित निर्विशेषं खप्रकाशारखण्डसुखानु- | निर्विशेष स्वप्रकाश अखण्डानन्दा- भवं संदृशे चक्षुरादिग्रहणयोग्य- | नुभवमय स्वरूप संदृश—नेत्रादि प्रदेशे न तिष्ठति तद्विषयो न | इन्द्रियोंसे ग्रहण करनेयोग्य प्रदेशमें भवतीत्येतत् । इन्द्रियागोचरत्वा- | स्थित नहीं है, अर्थात् यह उनका द्वेवैनं प्रकृतं चक्षुरित्युपलक्षणम् । | विषय नहीं होता । इन्द्रियोंका विषय | न होनेसे ही इस प्रकृत परमात्माको सर्वेन्द्रियैरपि कश्चन कोऽपि न | कोई भी नेत्रसे—नेत्र यहाँ समस्त | इन्द्रियोंको उपलक्षित करता है, अतः पश्यति तद्विषयतया ग्रहीतुं न | किसी भी इन्द्रियसे नहीं देख सकता | अर्थात् इसे इन्द्रियोंके विषयरूपसे शक्नुयात् । "यच्चक्षुषा न पश्यति | ग्रहण नहीं कर सकता । "जिसे कोई | नेत्रद्वारा नहीं देख सकता अपि तु
२०० श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ४
२०० श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ४ येन चक्षूंषि पश्यति" (के० उ० | जिसकी सत्तासे नेत्र देखता है" १।६) इत्यादिश्रुतेः । हृदा | इत्यादि श्रुति इसमें प्रमाण है । जो शुद्धबुद्धयैतद्व्याख्यातं मनसेति | साधनचतुष्टयादिसम्पन्न संन्यासी यानी हृदिस्थं हृदाकाशगुहास्थं प्रत्य- | योग्य अधिकारी हृदयस्थित—हृदया- क्तया तत्रावस्थितं ये साधन- | काशरूप गुहामें स्थित अर्थात् वहाँ चतुष्टयादियुक्ताः संन्यासिनो | प्रत्यक्रूपसे विद्यमान इस प्रकृत योग्याधिकारिण एनं प्रकृतं ब्रह्मा- | ब्रह्मरूप आत्माको हृदय—शुद्धबुद्धि- त्मानमेवमित्थं ब्रह्माहमस्मीत्य- | से, इसीकी व्याख्या करके कहते हैं परोक्षेण विदुर्जानान्ति तेऽपरोक्षी- | 'मनसे' इस प्रकार प्रत्यक्षरूपसे जानते करणमहिम्नामृता भवन्त्यमरण- | हैं कि 'मैं ब्रह्म हूँ' वे उस साक्षात्कार- धर्माणो भवन्ति । मरणहेत्वविद्या- | की महिमासे अमृत—अमरणधर्मा देस्तत्त्वज्ञानाग्निना दग्धत्वात्पुन- | हो जाते हैं । तात्पर्य यह है कि र्देहान्तरं न भजन्तीत्यर्थः ॥२०॥ | मरणके हेतुभूत अज्ञानादिका तत्त्व- ज्ञानरूप अग्निसे दाह हो जानेके कारण वे पुनः अन्य देह धारण नहीं करते ॥२०॥ परमेश्वरका स्तवन इदानीं तत्प्रसादादेवेष्टप्राप्ति- | अब यह मानकर कि उसीकी परिहाराविति मत्वा तमेव परमेश्वरं | कृपासे इष्टप्राप्ति और अनिष्टनिवृत्ति हो सकती हैं दो मन्त्रोंसे उस परमे- प्रार्थयते मन्त्रद्वयेन— | श्वरकी ही स्तुति करते हैं— अजात इत्येवं कश्चिद्भीरुः प्रपद्यते । रुद्र यत्ते दक्षिणं मुखं तेन मां पाहि नित्यम् ॥२१॥ हे रुद्र ! तुम अजन्मा हो, इसलिये कोई [मुझ-जैसा] संसारभयसे कातर पुरुष तुम्हारी शरण लेता है [और कहता है कि] तुम्हारा जो दक्षिण मुख है उससे मेरी सर्वदा रक्षा करो ॥ २१ ॥
अध्याय ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ २०१
अध्याय ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ २०१ ꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤ अजात इति । इतिशब्दो | 'अजातः' इत्यादि । मूलमें 'इति' हेत्वर्थः । यस्मात्त्वमेवाजातो ज- | शब्द हेतुवाचक है । क्योंकि तुम्हीं न्मजराशनायापिपासाधर्मवर्जितः । | अजात यानी जन्म, जरा, क्षुधा, इतरत्सर्वं विनाशि दुःखान्वितम्, | पिपासादि धर्मोंसे रहित हो, और सब तस्माज्जन्मजरामरणाशनायापिपा- | तो नाशवान् एवं दुःखी हैं, इसलिये जो साशोकमोहान्वितात्संसाराद्भीरु- | जन्म-जरा-मरण, क्षुधा-पिपासा एवं र्भीतः सन्कश्चिदेक एव परतन्त्र- | शोक-मोहादिपूर्ण संसारसे डरा हुआ है स्त्वामेव शरणं प्रपद्ये मादृशो वा | ऐसा कोई एक मैं परतन्त्र जीव कश्चित्प्रपद्यत इति प्रथमपुरुष- | तुम्हारी ही शरण लेता हूँ; अथवा मन्वधीयते । हे रुद्र यत्ते दक्षिणं | कोई मुझ-जैसा शरण लेता है— मुखमुत्साहजननं ध्यातॄणामाह्लाद- | इस आशयसे इस क्रियाका प्रथम करम् । अथवा दक्षिणस्यां दिशि | पुरुषसे सम्बन्ध किया जा सकता भवं दक्षिणं मुखं तेन मां पाहि | है । अतः हे रुद्र ! तुम्हारा जो नित्यं सर्वदा ॥२१॥ | उत्साहजनक दक्षिण मुख है, | जो ध्यान करनेपर आनन्द पैदा | करनेवाला है अथवा दक्षिण दिशामें | होनेके कारण जो दक्षिण मुख है | उससे तुम नित्य—सर्वदा मेरी रक्षा | करो ॥२१॥ ———•••——— किञ्च— | तथा— मा नस्तोके तनये मा न आयुषि मा नो गोषु मा नो अश्वेषु रीरिषः । वीरान्मा नो रुद्र भामितो वधी- र्हविष्मन्तः सदमित्त्वा हवामहे ॥२२॥ हे रुद्र ! तुम कुपित होकर हमारे पुत्र, पौत्र, आयु, गौ और अश्वोंमें क्षय न करना और हमारे वीर सेवकोंका भी वध न करना । हम हव्य- सामग्रीसे युक्त होकर सर्वदा ही तुम्हारा आवाहन करते हैं ॥२२॥
२०२ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ४
२०२ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ४
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मा न इति । मा रीरिष इति | ‘मा नः’ इत्यादि । ‘मा रीरिषः’ सर्वत्र संबध्यते । मा रीरिषः । | इस क्रियापदका सबके साथ सम्बन्ध रेषणं मरणं विनाशं मा कार्षीः । | है । मा रीरिषः-रेषण—मरण यानी नोऽस्माकं तोके पुत्रे तनये | विनाश न करो । हमारे ‘तोके’—पुत्रमें, पौत्रे न आयुषि मा नो | ‘तनये’—पौत्रमें, आयुमें तथा गौ और गोषु मा नोऽश्वेषु शरीरिषु । | अश्व आदि शरीरधारियोंमें भी क्षय न ये चास्माकं वीरा विक्रामन्तो | करो । हमारे जो वीर—विक्रमशील भृत्यास्तान्हे रुद्र भामितः क्रोधितः | सेवक हैं, हे रुद्र ! तुम क्रोधित होकर सन्मा वधीः । कस्मात् ? यस्मा- | उनका भी वध न करो । क्यों ? द्धविष्मन्तो हविषा युक्ताः सदम् | क्योंकि हम हविष्मान्—हविसे युक्त इत् त्वा हवामहे सदैव रक्षणार्थ- | होकर सदा ही तुम्हारा आवाहन माह्वयाम इत्यर्थः ॥२२॥ | करते हैं अर्थात् तुम्हें रक्षाके लिये | सर्वदा ही पुकारते हैं ॥२२॥
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इति श्रीमद्गोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यपरमहंसपरिव्राजकाचार्य- श्रीमच्छङ्करभगवत्प्रणीते श्वेताश्वतरोपनिषद्भाष्ये चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥
पञ्चम अध्याय
पञ्चम अध्याय
—-—:00:00:00:—-- अक्षराश्रित विद्या-अविद्या और उनके शासक परमेश्वरके स्वरूप तथा माहात्म्यका वर्णन चतुर्थाध्यायशेषमपूर्वार्थं प्रति- | चतुर्थ अध्यायमें अवशिष्ट रहे अपूर्व विषयका प्रतिपादन करनेके पादयितुं पञ्चमोऽध्याय आर- | लिये 'द्वे अक्षरे' इत्यादि मन्त्रसे पञ्चम अध्याय आरम्भ किया भ्यते द्वे अक्षरे इत्यादिना-- | जाता है-- द्वे अक्षरे ब्रह्मपरे त्वनन्ते विद्याविद्ये निहिते यत्र गूढे । क्षरं त्वविद्या ह्यमृतं तु विद्या विद्याविद्ये ईशते यस्तु सोऽन्यः ॥ १ ॥ हिरण्यगर्भसे उत्कृष्ट अविनाशी और अनन्त परब्रह्ममें जहाँ विद्या और अविद्या दोनों परिच्छिन्नभावसे स्थित हैं [ उनमें ] क्षर अविद्या है और अमृत विद्या है तथा जो इन विद्या और अविद्या दोनोंका शासन करता है वह इनसे भिन्न है ॥१॥ द्वे विद्याविद्ये यस्मिन्नक्षरे | जिस अविनाशी एवं अनन्त यानी ब्रह्मणो हिरण्यगर्भात्परे ब्रह्मपरे | देश, काल या वस्तुसे अपरिच्छिन्न ब्रह्म- परस्मिन्वा ब्रह्मण्यनन्ते देशतः | परमें—ब्रह्मा यानी हिरण्यगर्भसे उत्कृष्ट कालतो वस्तुतो वापपरिच्छिन्ने । | अथवा परब्रह्ममें विद्या और अविद्या यत्र यस्मिन्द्वे विद्याविद्ये निहिते | ये दोनों गूढ यानी अव्यक्तभावसे स्थापिते गूढे अनभिव्यक्ते । | स्थित हैं। उन विद्या और अविद्याको विद्याविद्ये विविच्य दर्शयति— | अलग-अलग करके दिखाते हैं—
२०४ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ५
२०४ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ५
क्षरं त्वविद्या क्षरणहेतुः संसृति- | उनमें क्षर—क्षरणकी हेतु यानी कारणम् । अमृतं तु विद्या मोक्ष- | संसारकी कारण तो अविद्या है और हेतुः । यस्तु पुनर्विद्याविद्ये ईशते | अमृत यानी मोक्षकी हेतु विद्या नियमयति स ताभ्यामन्यस्त- | है । और जो विद्या और अविद्याका त्साक्षित्वात् ॥ १ ॥ | शासन करता है वह उनका साक्षी | होनेसे उन दोनोंसे भिन्न है ॥१॥ ------------------oo:x:oo------------------ कोऽसावित्याह— | वह कौन है ? सो बतलाते हैं— यो योनिं योनिमधितिष्ठत्येको विश्वानि रूपाणि योनीश्च सर्वाः । ऋषिं प्रसूतं कपिलं यस्तमग्रे ज्ञानैर्बिभर्ति जायमानं च पश्येत् ॥ २ ॥ जो अकेला ही प्रत्येक स्थान तथा सम्पूर्ण रूप और समस्त योनियों ( उत्पत्तिस्थानों ) का अधिष्ठान है, तथा जिसने सृष्टिके आरम्भमें उत्पन्न हुए कपिल ऋषि ( हिरण्यगर्भ ) को ज्ञानसम्पन्न किया था और जन्म लेते हुए भी देखा था [ वही विद्या और अविद्यासे भिन्न उनका शासक है ]॥२॥ यो योनिमिति । यो योनिं | ‘यो योनिम्’ इत्यादि । जो योनिं स्थानं स्थानं “यः | योनि-योनिको—स्थान-स्थानको अर्थात् पृथिव्यां तिष्ठन्” (बृ०उ० ३ । | “जो पृथिवीमें स्थित होकर [पृथिवी- ७।३) इत्यादिनोक्तानि पृथिव्या- | का शासन करता है ]” इत्यादि दीन्यधितिष्ठति नियमयति । | मन्त्रसे कहे हुए पृथिवी आदिको एकोऽद्वितीयः परमात्मा विश्वानि | अधिष्ठित—नियमित करता है तथा रोहितादीनि रूपाणि योनीश्च | जो एक—अद्वितीय परमात्मा प्रभवस्थानान्यधितिष्ठति । ऋषिं | लोहितादि सम्पूर्ण रूपोंको और | योनियों-उत्पत्तिस्थानोंको अधिष्ठित | करता है; [ जिसने ] ऋषि यानी
अध्याय ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ २०५
अध्याय ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ २०५
सर्वज्ञमित्यर्थः । कपिलं कनक- | सर्वज्ञ प्रसूत—अपनेहीसे उत्पन्न किये कपिलवर्णं प्रसूतं स्वेनैवोत्पादितं | हुए कपिल—सुवर्णसदृश कपिलवर्ण हिरण्यगर्भं जनयामास पूर्वमित्य- | हिरण्यगर्भको पहले जन्म दिया था, स्यैव जन्मश्रवणात् । अन्यस्य | क्योंकि आरम्भमें हिरण्यगर्भका ही चाश्रवणात् । उत्तरत्र “यो ब्रह्माणं | जन्म श्रुति प्रतिपादित करती है, विदधाति पूर्वं यो वै वेदांश्च प्रहि- | अन्य ( महर्षि कपिल ) का जन्म णोति तस्मै” (श्वे० उ० ६।१८) इति | नहीं बतलाती । कारण, आगे यह वक्ष्यमाणत्वात् “कपिलोऽग्रजः” | कहा जायगा कि “जो आरम्भमें इति पुराणवचनात्कपिलो हिरण्य- | ब्रह्माको रचता है और उसके लिये गर्भो वा निर्दिश्यते— | वेदोंको प्रेरित करता है ।” “कपिल | पहले उत्पन्न होनेवाला है” इस | पुराणवचनसे भी कपिल या हिरण्य- | गर्भका ही निर्देश किया गया है । “कपिलर्षिर्भगवतः | “जगत्का मोह नष्ट करनेके सर्वभूतस्य वै किल । | लिये सर्वभूतमय भगवान् विष्णुके विष्णोरंशो जगन्मोह- | ही अंशस्वरूप मुनिवर कपिलने नाशाय समुपागतः ॥” | अवतार लिया है ।” “सर्वभूतात्मा श्रीहरि “कृते युगे परं ज्ञानं | सत्ययुगमें कपिलादिरूप धारण कर कपिलादिखरूपधृत् । | सम्पूर्ण जगत्के लिये हितकर उत्कृष्ट ददाति सर्वभूतात्मा | ज्ञान प्रदान करते हैं ।” “तुम समस्त सर्वस्य जगतो हितम् ॥” | देवताओंमें इन्द्र हो, ब्रह्मवेत्ताओंमें “त्वं शक्रः सर्वदेवानां | ब्रह्मा हो, बलवानोंमें वायुदेवता हो, ब्रह्मा ब्रह्मविदामसि । | योगियोंमें सनत्कुमार हो, ऋषियोंमें वायुर्बलवतां देवो | वसिष्ठ हो, वेदवेत्ताओंमें व्यास हो, योगिनां त्वं कुमारकः॥ | ऋषीणां च वसिष्ठस्त्वं | व्यासो वेदविदामसि । |
२०६ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ५
२०६ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ५ ಌಌಌಌಌಌಌಌಌಌಌಌಌಌಌಌ सांख्यानां कपिलो देवो ज्ञानयोगियोंमें कपिलदेव हो और रुद्रोंमें रुद्राणामसि शङ्करः॥” महादेव हो” इत्यादि पुराणवचनोंमें इति परमर्षिः प्रसिद्धः । कपिल नामसे महर्षि कपिल ही “ततस्तदानीं तु भुवनमस्मि- प्रसिद्ध हैं। न्प्रवर्तते कपिलं कवीनाम् । स अथवा “ततस्तदानीं तु भुवनम- षोडशास्रो पुरुषश्च विष्णोर्विराज- स्मिन् प्रवर्तते कपिलं कवीनाम् । स मानं तमसः परस्तात्” इति श्रूयते षोडशास्रः पुरुषश्च विष्णोर्विराजमानं मुण्डकोपनिषदि । स एव वा तमसः परस्तात् ।” इस मुण्डको- कपिलः प्रसिद्धोऽग्रे सृष्टिकाले । पनिषद्की श्रुतिके अनुसार वह यो ज्ञानैर्धर्मज्ञानवैराग्यैश्वर्यैर्बिभर्ति हिरण्यगर्भ ही पूर्वकालमें सृष्टिके बभार जायमानं च पश्येदपश्य- समय ‘कपिल’ नामसे प्रसिद्ध हुआ दित्यर्थः ॥ २ ॥ जिसे परमात्माने अपने ज्ञानोंसे-- धर्म, ज्ञान, वैराग्य और ऐश्वर्योंसे युक्त किया और उत्पन्न होते देखा ॥२॥ ───००:०:००─── किञ्च— तथा— एकैकं जालं बहुधा विकुर्व- न्नस्मिन्क्षेत्रे संहरत्येष देवः । भूयः सृष्ट्वा पतयस्तथेशः सर्वाधिपत्यं कुरुते महात्मा ॥ ३ ॥ इस संसारक्षेत्रमें यह देव [ सृष्टिके समय ] एक-एक जालको* अनेक प्रकारसे विकृत कर [ अन्तमें ] संहार करता है; तथा यह महात्मा १. यह श्रुति मुण्डकोपनिषद्में नहीं मिलती, अन्यत्र भी उसका पता नहीं चलता । श्रुतिका पाठ भी शुद्ध नहीं जान पड़ता । परम्परासे जैसा पाठ मिला वैसा ही रहने दिया है और अर्थसंगति न लगनेके कारण उसका अनुवाद नहीं किया गया है ।
- 'जाल' शब्दके अर्थ टीकाकारोंने भिन्न-भिन्न प्रकारसे किये हैं । भगवान्
अध्याय ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ २०७ ईश्वर ही [ कल्पान्तरके आरम्भमें ] प्रजापतियोंको पुनः उत्पन्न कर सबका आधिपत्य करता है ॥३॥ एकैकमिति । सुरनरतिर्यगा- | 'एकैकम्' इत्यादि । यह देव दीनां सृजति जालमेकैकं प्रत्येकं | इस मायामय क्षेत्रमें सृष्टिके समय बहुधा नानाप्रकारं विकुर्वन्सृष्टि- | देवता, मनुष्य एवं तिर्यगादिके एक- कालेऽस्मिन्मायात्मके क्षेत्रे संहर- | एक जालको नाना प्रकारसे विकृत त्येष देवः । भूयः पुनर्य लोकानां | करके रचता है और फिर संहार | कर देता है। फिर यह ईश्वर महात्मा, पतयो मरीच्यादयस्तान्सृष्ट्वा तथा | जिस प्रकार इसने पूर्वकल्पमें मरीचि यथा पूर्वस्मिन्कल्पे सृष्टवानीशः | आदि जो लोकाध्यक्ष हैं उन्हें रचा सर्वाधिपत्यं कुरुते महात्मा ॥३॥ | था उसी प्रकार पुनः रचकर उन | सबका आधिपत्य करता है ॥३॥ किञ्च— | तथा— सर्वा दिश ऊर्ध्वमधश्च तिर्य- क्प्रकाशयन्भ्राजते यद्दनड्वान् । एवं स देवो भगवान्वरेण्यो योनिस्वभावानधितिष्ठत्येकः ॥ ४॥ भाष्यकारने इसका कोई अर्थ नहीं किया । श्रीशङ्करानन्दजी लिखते हैं—'जालं महेन्द्रजालं संसाररूपं प्रतिप्राणिव्यवस्थितमित्यर्थः' अर्थात् 'जाल शब्दका तात्पर्य है प्रत्येक प्राणीसे सम्बन्ध रखनेवाला संसाररूप महान् इन्द्रजाल ।' श्रीनारायणतीर्थ कहते हैं—'जालं कर्मफललक्षणं बन्धम्' अर्थात् 'कर्मफलरूप बन्धन ही जाल है ।' तथा विज्ञानभगवान्का कथन है—'जालं समष्टिरूप कार्यकारणलक्षणानि जालानि पुरुष- मत्स्यानां बन्धनत्वाज्जालवज्जालम्' अर्थात् 'समष्टिरूप भूत और इन्द्रियवर्गरूप जाल ही पुरुषरूप मत्स्योंको बाँधनेवाले होनेसे जालके समान जाल हैं ।'
२०८ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ५
२०८ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ५ जिस प्रकार सूर्य प्रकाशित होता है वैसे ही यह ऊपर, नीचे तथा इधर-उधर समस्त दिशाओंको प्रकाशित करता हुआ देदीप्यमान होता है । इस प्रकार वह द्योतनस्वभाव सम्भजनीय भगवान् अकेला ही कारणभूत पृथिवी आदिका* नियमन करता है ॥४॥
[संस्कृत-भाष्यम्] सर्वा दिश इति । सर्वा दिशः प्राच्याद्या ऊर्ध्वमुपरिष्टादधश्चा- धस्तात्तिर्यक्पार्श्वदिशश्च प्रकाशयन् स्वात्मचैतन्यज्योतिषा प्रकाशते भ्राजते दीप्यते ज्योतिषा यदु अनड्वान्यद्वदादित्यर्थः । यथानड्- वानादित्यो जगच्चक्रावभासने युक्त एवं स देवो द्योतनस्वभावो भगवानैश्वर्यादिसमन्वितो वरेण्यो वरणीयः संभजनीयो योनिः कारणं कृत्स्नस्य जगतः स्वभावान् स्वात्मभूतान्पृथ्व्यादीन्भावानथ वा कारणस्वभावान्कारणभूतान्पृ- थिव्यादीनधितिष्ठति नियमयति । एकोऽद्वितीयः परमात्मा ॥४॥
[हिन्दी-अनुवाद] ‘सर्वा दिशः’ इत्यादि। यह पूर्वादि समस्त दिशाओंको अर्थात् ऊपर- नीचे और इधर-उधरकी दिशाओंको प्रकाशित करता हुआ अपने स्वरूप- भूत चित्प्रकाशसे भ्राजित् यानी दीप्त होता है जैसे कि अनड्वान् । और जिस प्रकार कि अनड्वान् यानी सूर्य जगच्चक्रको प्रकाशित करनेमें लगा हुआ है उसी प्रकार वह देव— द्योतनस्वभाव, भगवान्--ऐश्वर्यादि- सम्पन्न और वरेण्य—वरणीय— सम्भजनीय योनि यानी कारण एक अद्वितीय परमात्मा सम्पूर्ण जगत्के स्वभाव यानी स्वात्मभूत पृथिवी आदि भावोंको [ अधिष्ठित करता है ] । अथवा [ ‘योनिखभावान्’ ऐसा समस्त पद माना जाय तो ] कारण- स्वभाव यानी कारणभूत पृथिवी आदिको अधिष्ठित–नियमित करता है ॥४॥
[पाद-टिप्पणी]
- यह अर्थ मूलपाठ ‘योनिखभावान्’ मानकर किया गया है, जहाँ मूलमें ‘योनिः स्वभावान्’ ऐसा पाठ है वहाँ ‘योनिः’ शब्द भगवान्का विशेषण होगा और ‘स्वभावान्’ का अर्थ ‘स्वात्मभूतान् पृथिव्यादीन् भावान्’ ( अपने स्वरूपभूत पृथिवी आदि भावोंको ) होगा ।
अध्याय ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ २०९
अध्याय ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ २०९ यच्च स्वभावं पचति विश्वयोनिः पाच्यांश्च सर्वान्परिणामयेद्यः । सर्वमेतद्विश्वमधितिष्ठत्येको गुणांश्च सर्वान्विनियोजयेद्यः ॥ ५ ॥ जगत्का कारणभूत जो परमात्मा [ प्रत्येक वस्तुके ] स्वभावको निष्पन्न करता है, जो पाच्यों ( परिणामयोग्य पदार्थों ) को परिणत करता है, जो अकेला ही इस सम्पूर्ण विश्वका नियमन करता है, और जो [सत्त्वादि] समस्त गुणोंको उनके कार्योंमें नियुक्त करता है [ वह परब्रह्म है ] ॥५॥
| संस्कृत-भाष्यम् | हिन्दी-अनुवाद |
|---|---|
| यच्च स्वभावमिति । यच्च | 'यच्च स्वभावम्' इत्यादि । [ यहाँ |
| यश्चेति लिङ्गव्यत्ययः । स्वभावं | वैदिक-प्रक्रियानुसार ] 'यश्च' इस |
| यदग्नेरौष्ण्यं पचति निष्पादयति | पुँल्लिङ्गके स्थानमें 'यच्च' इस प्रकार |
| विश्वस्य जगतो योनिः । पाच्यांश्च | लिङ्गव्यत्यय हुआ है। जो स्वभावको |
| पाकयोग्यान्पृथिव्यादीन्परिणाम- | यानी अग्निके उष्णत्वको पचाता-निष्पन्न |
| येद्यः । सर्वमेतद्विश्वमधितिष्ठति | करता है, विश्व-जगत्का कारण है |
| नियमयत्येकः । गुणांश्च सत्त्वरज- | और पाच्य यानी पाक (परिणाम) योग्य |
| स्तमोरूपान्विनियोजयेद्यः । एवं- | पृथिवी आदिका परिणाम करता है, |
| लक्षणः ॥५॥ | जो अकेला इस सम्पूर्ण विश्वको |
| अधिष्ठित—नियमित करता है तथा | |
| जो सत्त्व, रज एवं तमोरूप गुणोंको | |
| नियुक्त करता है—ऐसे लक्षणोंवाला | |
| परमात्मा है ॥५॥ |
किञ्च— | तथा— तद्वेदगुह्योपनिषत्सु गूढं तद्ब्रह्मा वेदते ब्रह्मयोनिम् ।