१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
(२२) "खाया हुआ अन्न तीन प्रकार का हो जाता है। उसका जो स्थूल भाग है वह मल बनता है, जो मध्यम भाग है, वह मांस बनता है और जो सूक्ष्म भाग है सो मन बन जाता है। पिया हुआ जल तीन प्रकार का हो जाता है। उसका जो स्थूल भाग है वह मूत्र हो जाता है, जो मध्यम भाग है वह रक्त हो जाता है, जो सूक्ष्म भाग है, वह प्राण हो जाता है।......हे सौम्य ! मन अन्नमय है। प्राण जलमय है। वाक् तेजोमय है।" —छान्दोग्य, अध्याय ६, खण्ड ५ "अन्न ही बल से बढ़कर है। इसी से यदि दस दिन भोजन मिले तो प्राणी को समस्त शक्तियाँ क्षीण हो जाती हैं और वे फिर तभी लौटती हैं जब वह पुनः भोजन करने लगे। तुम अन्न की उपासना करो। यह अन्न ही ब्रह्म है।" --छान्दोग्य, अध्याय ६, खण्ड ६ "आहार मे अभक्ष्य त्याग देने से चित्त शुद्ध हो जाता है। आहार शुद्धि से चित्त की शुद्धि स्वयमेव हो जाती हैं। जब चित्त शुद्ध हो जाता है तो क्रम से ज्ञान होता जाता है और अज्ञान की ग्रन्थियां टूटती जाती हैं।" --पाशुपत ब्रह्मोपनिषद् "आहार शुद्ध होने से अन्तःकरण की शुद्धि होती है। अन्तःकरण शुद्ध होने से भावना दृढ़ हो जाती है और भावना की स्थिरता से हृदय की समस्त गांठें खुल जाती हैं।" --छान्दोग्य तैत्तरीय उपनिषद में इस सम्बन्ध में अधिक प्रकाश डाला गया है और आत्मकल्याण के इच्छुकों को आहार-शुद्धि का विशेष रूप से ध्यान रखने का निर्देश किया गया है।
अन्नाद्वै प्रजाः प्रजायन्ते । याश्च पृथिवी ँश्रिताः । अथो अन्ने नैव जीवन्ति । अथैनदपियन्त्यन्ततः । अन्नः ँहि भूतानां जेष्ठम् । तस्मात्सर्वौषधमुच्यते । सर्वं वै तेऽन्नमाप्नुवन्ति येऽन्नं ब्रह्मोपासते । "इस पृथिवी पर रहने वाले समस्त प्राणी अन्न से ही उत्पन्न होते हैं । फिर अन्न से ही जीते हैं । अन्त में अन्न में ही विलीन हो जाते हैं । अन्न ही सबसे श्रेष्ठ है । इसलिये वह औषधि रूप कहा जाता है । जो साधक अन्न को ब्रह्म रूप में उपासना करते हैं, वे उसे प्राप्त कर लेते हैं । तस्माद्वा एतस्मादन्नरसमयादन्योऽन्तर आत्मा प्राणमयः । तेनैष पूर्णः । सवा एष पुरुष विध एव । —तैत्तरीय २।२ "इस अन्न रसमय शरीर के भीतर जो प्राणमय पुरुष है, वह अन्न से व्याप्त है । यह प्राणमय पुरुष ही आत्मा है । अन्नं न निन्द्यात् । तद् व्रतम् । प्राणो वा अन्नम् । शरीरमन्नादम् । प्राणे शरीरं प्रतिष्ठितम् । शरीरे प्राणः प्रति- ष्ठितः । तदेतदन्नमन्ने प्रतिष्ठितम् । स य एतदन्नमन्ने प्रतिष्ठितं वेद प्रतितिष्ठति । अन्नवानन्नादो भवति । महान भवति । प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेन । महान कीर्त्या । —तैत्तरीय ३।७ "अन्न की निन्दा न करे । यह व्रत है । प्राण ही अन्न है । शरीर प्राण पर आधारित है । इसलिये वह अन्न में ही स्थित है । जो मनुष्य यह जान लेता है कि मैं अन्न में ही प्रतिष्ठित हूँ वह प्रतिष्ठावान् हो जाता है । अन्नवान हो जाता है । प्रजावान् हो जाता है, पशुवान् भी । वह ब्रह्मतेज से सम्पन्न होकर महान् बनता है । कीर्ति से सम्पन्न होकर भी महान् बनता है ।
( २४ ) CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri आगे चल कर अष्टम अनुवाक में और भी निर्देश है— अन्नं न परिचक्षीत । तद व्रतम्............अन्नं बहु कुर्वीत तद् व्रतम् । “ अन्न की अवहेलना न करे । यह व्रत है । अन्न को बहुत बढ़ावे । यह व्रत है ।” हाइवु, हाइवु, हाइवु । अहमन्नमहमन्नमहमन्नम् । अह मन्नादो ऽहमन्नादो ऽहमन्नादः । —तैत्तिरीय ३।१० “आश्चर्य ! आश्चर्य ! ! आश्चर्य ! ! ! मैं अन्न हूँ । मैं अन्न हूँ । मैं अन्न हूँ। मैं ही अन्न का भोक्ता हूँ । मैं ही अन्न का भोक्ता हूँ, मैं ही अन्न का भोक्ता हूँ ।” आहार शुद्धौ सत्वशुद्धिः सत्वशुद्धौ ध्रुवा स्मृतिः । स्मृति- लब्ध्ये सर्व ग्रन्थीनां विप्र मोक्ष स्तस्यै मृदित कषायाय तमसस्पा- दर्शयति भगवान सनत्कुमारः । “जब आहार शुद्ध होता है तब सत्व यांनी अन्तःकरण शुद्ध होता है अन्तःकरण शुद्ध होने पर विवेक बुद्धि ठीक काम करती है । उस विवेक से अज्ञानजन्य बन्धन-ग्रन्थियां खुलती हैं। फिर परम-तत्व का साक्षात्कार हो जाता है । यह ज्ञान नारद को भगवान् सनत्कुमार ने दिया ।” अथर्ववेद में अनुपयुक्त अन्न को त्याज्य ठहराया गया है । प्राचीनकाल में हर व्यक्ति आहार ग्रहण करने से पूर्व यह देखता था कि यह अन्न किस प्रकार के व्यक्ति द्वारा उपार्जित एवं निर्मित है । उसमें थोड़ा भी दोष होने पर उसे त्याग दिया जाता था । केवल पुण्यात्माओं का अन्न ही लोग स्वीकार करते Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi
थे। किसी के पुण्यात्मा होने की एक कसौटी यह भी थी कि लोग उसका अन्न ग्रहण करते हैं या नहीं। अथर्ववेद ८।६। २५ में कहा गया है:— सर्वौ वा एष जग्ध पाप्मा यस्यान्रमश्नन्ति । ‘अर्थात्, वही व्यक्ति पुण्यात्मा है जिसका अन्न दूसरे खाते हैं।” आज भी पुरानी वह प्रथा देहाती क्षेत्रों में किसी रूप में प्रचलित है कि जिसके आचरण अनुचित समझे जायें, उसके यहाँ का अन्न जल ग्रहण न किया जाय। जातिच्युत होने में यही दण्ड मुख्य होता है। वाल्मीकि रामायण में अन्तःकरण को देवता के रूप में प्रस्तुत करते हुए इसी प्रकार का प्रतिफल किया गया है, लिखा है:— “यदन्न पुरुषो भवति तदन्ना स्तस्य देवताः ।” “अर्थात् मनुष्य जैसा अन्न खाता है वैसा ही उसके देवता खाते हैं।” कुधान्य खाकर साधना करने से साधक का इष्ट भी भ्रष्ट हो जाता है और उससे जिस प्रतिफल की आशा की गई थी, वह प्रायः नहीं ही प्राप्त होता । प्राण और उसका निग्रह ब्रह्म की उपासना में प्राण साधना का अत्यधिक महत्व है। आत्मा ईश्वर का अंश होने से साक्षी, दृष्टा और निर्लिप्त है। उसकी शक्ति प्राण है और इस प्राण-शक्ति के आधार पर ही जीव का सारा जीवनक्रम संचालित होता है। जैसे निर्लिप्त ब्रह्म की क्रिया-शक्ति माया या प्रकृति है, उसी प्रकार जीव की सक्रियता प्राण-शक्ति में सन्निहित है।
(२६) जिस प्रकार पंचतत्वों के हेर-फेर से शरीर में विविध प्रकार के परिवर्तन होते हैं, उसी प्रकार आत्मिक क्षेत्र में प्राण की स्थिति में हेर-फेर होने से मनोभूमि में महत्वपूर्ण परिवर्तन होते है। चूंकि अनेक जन्मों के संग्रहीत कुसंस्कारों के कारण मन में कितनी ही विकृतियां भरी रहती हैं और वे साधक को पथभ्रष्ट करने के लिये निरन्तर दुरभिसंधि करती रहती हैं। मन का उच्चाटन, जहाँ घूमना, निर्दिष्ट लक्ष पर स्थिर न होना आदि विघ्नों के शमन का एक महत्वपूर्ण उपाय प्राणों का निरोध है। इसी प्रकार जो कुसंस्कार मन को सन्मार्ग पर चलने से डराते और कुमार्ग की ओर ललचाते हैं, उन्हें नियंत्रित करने का सुनिश्चित शस्त्र भी प्राण-संयम ही है। सत्संग, स्वाध्याय, चिन्तन, मनन से कुविचारों को बहुत हद तक शान्त किया जा सकता है, पर अन्तर्मन के प्रसुप्त क्षेत्र में जो कुसंस्कारों की ग्रन्थियाँ जमी होती हैं, वे अवसर पाते ही पुनः जाग्रत हो जाती हैं और सत्संग आदि से संग्रहीत ज्ञान देखते-देखते तिरोहित हो जाता है। कई बार ज्ञानी गुरु कहे जाने वाले लोग भी कुमार्ग- गामी होते देखे गये हैं। इसका कारण यही है कि उसने सद्- विचारों को सुना समझा तो बहुत था पर प्राण-निग्रह द्वारा गुप्त मन की संस्कार-ग्रन्थियों का शमन नहीं किया था। फल- स्वरूप वे अवसर पाते ही सजीव हो उठीं और आँधी-तूफान जिस प्रकार घास के ढेर को उड़ा ले जाता है, उसी प्रकार कुसंस्कारों का प्रवाह उस संग्रहीत ज्ञान को उड़ा ले गया। मनोभूमि को शोधने और चिर संचित कुसंस्कारों का उन्मूलन करने के लिये प्राणायाम का बड़ा महत्व है। उपनिषदों में वर्णित साधना विधान में प्राणायाम को प्रमुख स्थान दिया
गया है। साधना खंड के अधिकांश उपनिषदों में किसी न किसी रूप में प्राणायाम का वर्णन हुआ है। यद्यपि वह संक्षिप्त है और विविध प्राणायामों को पूरा साधन-विधान जानने के लिये अनुभवी गुरु अथवा तत्सम्बन्धी अन्य विवेचनात्मक ग्रन्थों के पढ़ने की आवश्यकता होती है, तो भी यह निर्विवाद है कि उपनिषदों का साधना-विज्ञान प्राणायाम को अपनी साधना में सम्मिलत रखने के लिये प्रत्येक ब्रह्मपरायण व्यक्ति पर जोर देता है। किस प्रयोजन के लिये, किस विधि विधान के साथ कौन-सा प्राणायाम कितनी मात्रा में, किस समय किया जाय, यह प्रश्न साधकों की व्यक्तिगत स्थिति की भिन्नता पर निर्भर है। इसलिये उसकी एक विधि बता देना भी कठिन था। उप- निषद्कारों ने इस कठिनाई को समझते हुये प्राण विद्या की साधना विषयक विविध प्रक्रियाओं की बारीकी में जाना उचित नहीं समझा है और इस कार्य को गुरु शिष्य के परस्पर विचार विनिमय एवं विवेक पर छोड़ दिया है। पर एक बात पर पूरा- पूरा जोर दिया है कि हर साधक किसी न किसी रूप में प्राणा- याम की साधना नियमित रूप से किया करे। प्राणायाम का प्रभाव कुसंस्कारी के शमन और मन के निग्रह तक ही सीमत नहीं है, वरन् आरोग्य की वृद्धि, मानसिक विकास, आत्मिक प्रगति तथा अनेकों प्रकार की आध्यात्मिक चमत्कारी सिद्धियाँ भी उससे सम्बन्धित हैं। प्राणायाम करने से अनेकों प्रकार के रोग दूर हो सकते है। षट्चक्रों, सूक्ष्म ग्रन्थियों तथा उपत्यिकाओं का जागरण होने से दिव्य सिद्धियां उपलब्ध होती हैं, लौकिक सुख सम्पदाओं का द्वार खुलता है और जो बन्धन आत्मा को निविड़ पाश में जकड़े हुये हैं, उनका कटना सहज हो जाता है।
इस प्रकार की अनेकों विवेचनाएँ उपनिषदों में पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध होती हैं। उनमें से कुछ नीचे देखिए:— “स्वर्णादि धातुओं का मल उन्हें तपाने से दूर होने के समान ही इन्द्रियों द्वारा प्राप्त दोष प्राणायाम से दूर हो जाते हैं। प्राणायाम से दोषों को और धारणा से पापों को जला डालें........जिस साधक का प्राण इस मण्डल को वेध कर मस्तक में पहुँच जाता है, उसकी कहीं भी मृत्यु नहीं होती वह पुनर्जन्म के चक्र में नहीं पड़ता।” —अमृतनादोपनिषद् "प्राणायाम पाप रूपी ईंधन के लिए अग्निस্বরূপ है और संसार सागर से पार होने के लिये सेतु के समान है। आसन से रोगों का नाश होता है और प्राणायाम से पापों का । योगी के मन के विकार प्रत्याहार से दूर हो जाते हैं। धारणा से मन में धैर्य आता है, समाधि द्वारा अद्भुत चैतन्य की प्राप्ति होती है" —योगचूड़ामणि उपनिषद् 'प्राणायाम का अभ्यास होने से सब रोग दूर हो जाते हैं। हिचकी, खांसी श्वास, शिर, कान और आँख की पीड़ा आदि विविध प्रकार के रोगों का कारण वायु का विकार ही होता है। जिस प्रकार सिंह, हाथी, व्याघ्र आदि को धीरे-धीरे वश में किया जाता है उसी प्रकार वायु को भी क्रमशः वश में करना चाहिए । —योगचूड़ामणि उपनिषद् इस प्रकार तीन वर्ष तक प्राणायाम करने वाला योग- सिद्ध हो जाता। वह योगी वायु को जीतने वाला, जितेन्द्रिय,
अल्प आहार, स्वल्प निद्रा वाला, तेजस्वी तथा बलवान होता है। अकाल मृत्यु का भय मिट कर दीर्घ आयु प्राप्त होती है। .........सामान्य प्राणायाम से व्याधि और पापों का नाश होता है। विमेष से महाव्याधियाँ तथा पाप-रोग मिटते हैं, उत्कृष्ट से अल्प मूत्र, अल्प मल, शरीर की लघुता, अल्प भोजन होता है। इन्द्रियाँ और बुद्धि तीव्र हो जाती हैं और तीनों काल का ज्ञान हो जाता है। नाभिकन्द में प्राण धारण करने से कुक्षि रोग नष्ट होते हैं। नासाग्र में धारण करने से दीर्घायु और देह की लाघवता प्राप्त होती है। ब्रह्ममुहूर्त में जिह्वा से वायु को खींचकर पीने से वाक् सिद्धि प्राप्त होती है। शरीर का जो अङ्ग रोग पीड़ित हो, उसमें वायु को धारण करने से वह निरोग हो जाता है। जिसका प्राण वायु क्रम से चलता है, वह प्राणजित हो जाता है; फिर वह दिन, रात्रि, पक्ष, मास, अयन आदि के काल भेद को अन्तर्मुख होकर जानने लगता है।" —त्रिशिखब्राह्मणोपनिषद् "उज्जायी प्राणायाम से मस्तक की उष्णता, गले का कफ और अन्य अनेक रोग दूर होते हैं। देह की अग्नि की वृद्धि होती है। इससे नाड़ी सम्बन्धी जलोदर और धातु सम्बन्धी रोग भी दूर हो जाते हैं। शीतली प्राणायाम से गुल्म, प्लीहा, पित्त, ज्वर, तृष्णा आदि दूर होते हैं। भस्त्रिका प्राणायाम से कण्ठ की जलन मिटती है, शरीर की अग्नि बढ़ती है, कुण्डलिनी जागती है और पुण्यप्रद, पाप-नाशक, शुभ तथा सुखदायक है।" —योगकुण्डल्युपनिषद्
( ३० ) "हृदय के पाँच देव सुषि ( छिद्र ) हैं। जो पूर्व दिशा- वर्ती छिद्र है, सो प्राण है। जो उसकी उपासना कपता है, वह तेजस्वी और अन्न का भोक्ता होता है। दक्षिण छिद्र व्यान है। जो उसकी उपासना करता है, वह श्रीमान और यशस्वी होता है। पश्चिचम छिद्र अपान है। जो उसकी उपासना करता है, वह ब्रह्म-तेजस्वी और अन्न का भोक्ता है। इसका उत्तरी छेद 'समान' है। जो इसकी उपासना करता है, वह कीर्तिमान और कान्तिमान होता है। उर्ध्वंछिद्र उदान है। जो उसकी उपासना करता है, वह ओजस्वी और तेजस्वी होता है। यह पांच प्राण ब्रह्मपुरुष के द्वारपाल हैं। जो उन्हें जानता है, उसके कुल में वीर उत्पन्न होता है। उसे स्वर्गलोक प्राप्त होता है।" —छान्दोग्य, अध्याय ३, खण्ड १३
"जैसे हाथों से इधर-उधर फेंकी हुई गेंद दौड़ती रहती है, उसी प्रकार प्राण और अपान वायु के फेंकने से जीव को कहीं विश्राम-स्थल नहीं मिलता। अपान, प्राण को खींचता है और प्राण, अपान को खींचता है, उसी प्रकार जैसे रस्सी से बँधा हुआ पक्षी खोंच लिया जाता है। इस रहस्य को जो जानता है, वह योगी है।" —ध्यानबिन्दु उपनिषद्
"चित्त की चंचलता के भाग होते हैं, एक वासना दूसरा प्राण। इनमें से एक के वश में होने से दूसरा वश में हो जाता है। इनमें से पहले प्राण को वश में करना चाहिये।" —योगकुण्डल्युपनिषद्
CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri “हे सौम्य, जिस प्रकार डोरी से बँधा हुआ पक्षी अनेक दिशाओं में घूमकर फिर अपने बन्धन स्थान पर ही लौट आता है, उसी प्रकार यह मन भी अनेक दिशाओं में घूमकर भी कहीं आश्रय नहीं पाता और अन्त में प्राण का ही सहारा लेता है क्योंकि यह मन प्राण से ही बँधा हुआ है।” —छान्दोग्य उपनिषद् ‘योग वाशिष्ठ’ आदि अन्य ग्रन्थों में भी प्राणायाम द्वारा मन का निग्रह एवं आत्मिक प्रगति का मार्ग प्रशस्त होने का प्रतिपादन किया गया है। यथा:— अभ्यासेन परिस्पन्दे प्राणानां क्षयमागते । मनःप्रशममायाति निर्वाणमवशिष्यते । —योगवाशिष्ठ ५।७८।४६ “अभ्यास के द्वारा प्राणों की गति रुक जाने पर मन शान्त हो जाता है और तब केवल निर्वाण ही शेष रहता है।” तालवृन्तस्य संस्पन्दे शान्ते शान्तो यथानिलः। प्राणानिल परिस्पन्दे शान्ते शान्तं तथा मनः। —योगवाशिष्ठ ६।६६।४१ “जैसे पंखा बन्द कर देने से हवा की गति रुक जाती है, वैसे ही प्राण के निरोध से निश्चय ही मन शान्त हो जाता है।” प्राण शक्तौ निरुद्धायां मनो राम विलीयते । द्रव्यच्छायानु तद्द्रव्यं प्राणरूपं हिनसम् । —योगवाशिष्ठ ५।१३।८३ “हे राम, प्राण शक्ति का निरोध होने से मन का निरोध Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi
( ३२ ) हो जाता है। जैसे अन्य पदार्थों की अपनी छाया होती है, बस ही प्राण की छाया मन है।" राज्यादि मोक्षपर्यन्ताः समस्ता एव सम्पदः। देहानिलविधेयत्वात्साध्याः सर्वस्य राघव । —योगवाशिष्ठ ६।८०।३५ "हे राम, प्राणों को वश में कर लेने से मनुष्य राज्य-प्राप्ति से लेकर मोक्ष-प्राप्ति तक की सतस्त सिद्धि सम्पदाएँ प्राप्त कर सकता है।" द्वेबीजे चित्त वृक्षस्य प्राणस्पन्दन वासने । एकस्मिंश्च तयोः क्षीणेक्षिप्रं द्वे अपिनश्यतः । —योगवाशिष्ठ चित्त रूपी वृक्ष के दो बीज हैं—एक प्राण दूसरा वासना। इन दोनों में से एक क्षीण ( सूक्ष्म ) होने से दूसरा भी वैसा ही हो जाता है।" "चले वाते चलञ्चित्तं निश्चले निश्चलं भवेत् ।" "प्राण वायु चलने से मन चंचल रहता है और प्राण के निश्चल होने पर मन निश्चल हो जाता है।" निष्कलं तं विजानीयात् श्वासोयत्र लयं गतः। यन्मनो विलयं याति तद् विष्णोर्परम पदम् । "छब श्वास का लय हो जाता है तो वह स्थिति निष्कल कहलाती है। मन का लय होना ही विष्णु का परमपद है।" ज्ञानं कुतो मनसि संभवतीह तावत्, प्राणोऽपि जीवति मनो म्रियते न यावत् । प्राणोमनोद्वयमिदं विलयं नयेद्यो, मोक्षं स गच्छति नरो नकथञ्चिदन्यः। Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi
( ३३ ) 'जब तक ज्ञान कैसे प्राप्त होगा जब तक कि मन न मरेगा ? और मन के साथ साथ प्राण भी जीवित रहता है। जो प्राण और मन दोनों का विलय कर देता है, वही मोक्ष प्राप्त कर सकता है और कोई नहीं । पवनोलीयते यत्र मनस्तत्र विलीयते । "जब प्राण वायु संयम में आ जाता है,तब मन भी स्थिर हो जाता है।" प्राणवृत्तौ विलीनायां मनो वृत्तिर्विलीयते । -बोधसार प्राणवृत्ति के विलीन होने से मनोवृत्ति भी विलीन हो जाती है।" ――― साधना में गुरु की आवश्यकता और उपयोगिता यों सभी महत्वपूर्ण विद्याएँ गुरु के माध्यम से प्राप्त की जाती हैं, पर ब्रह्मविद्या का प्रवेश-द्वार तो अनुभवी मार्ग-दर्शक के द्वारा ही खुलता है। अक्षरारम्भ यद्यपि हमारी दृष्टि में एक सामान्य सी बात है पर छोटा बालक उस कार्य को अध्यापक की सहायता के बिना अकेला ही पूर्ण करना चाहे तो नहीं कर सकता, भले ही वह कितना ही मेधावी क्यों न हो । गणित, शिल्प, सर्जरी, साइन्स, यंत्र-निर्माण आदि सभी महत्वपूर्ण कार्य अनुभवी अध्यापक ही सिखाते हैं । कोई छात्र शिक्षक की आवश्यकता न समझे और स्वयं ही यह सब सीखना चाहे तो
( ३४ ) CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri उसे कदाचित ही सफलता मिले। रोगी को अपनी चिकित्सा कराने के लिये किसी अनुभवी चिकित्सक की शरण लेनी पड़ती है, यदि वह अपने आप ही इलाज करने लगे तो उसमें भूल होने की संभावना रहेगी क्योंकि अपने सम्बन्ध में निर्णय करना हर व्यक्ति के लिये कठिन होता है। अपनी निज की त्रुटि, अपूर्णता बुराई, स्थिति एवं प्राप्ति के बारे में कोई विरला ही सही अनुमान लगा सकता है। जिस प्रकार अपना मुंह अपनी आंखों से नहीं देखा जा सकता, उसके लिये दर्पण की या किसी दूसरे से पूछने की सहायता लेनी पड़ती है, तभी कुछ जान सकना सम्भव होता है, उसी प्रकार अपने दोष-दुर्गुणों का, मनोभूमि का, आत्मिक-स्तर का एवं प्रगति का भी पता अपने आप नहीं चलता, कोई अनुभवी ही इस सम्बन्ध में विशेषण कर सकता है और उसी के द्वारा उद्धार एवं कल्याण का मार्ग-दर्शन किया जा सकता है। जिसने कोई रास्ता स्वयं देखा है, कोई मंजिल स्वयं पार की है, वही उस रास्ते की सुविधा-असुविधाओं को जानता है, नये-पथिक के लिये उसी की सलाह उपयोगी हो सकती है। बिना किसी से पूछे स्वयं ही अपना रास्ता आप बनाने वाले सम्भव है मंजिल पार करलें, निश्चित रूप से उन्हें कठिनाई बहुत उठानी पड़ेगी और देर भी बहुत लगेगी। इसलिये जब तक सर्वथा असम्भव ही न हो जाय तब तक मार्ग-दर्शक की तलाश करना ही उचित है। उसी के सहारे अध्यात्मिक यात्रा सुविधापूर्वक पूर्ण होती है। भौतिक शिक्षाओं के शिक्षक अपने विषय की जानकारी देकर अपना कर्तव्य पूरा कर लेते हैं, पर अध्यात्म-मार्ग में इतने से ही काम नहीं चल सकता। वहाँ शिक्षा ही पर्याप्त नहीं, वरन् गुरु द्वारा दिया हुआ आत्मबल भी दान या प्रसाद रूप में उपलब्ध Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi
( ३५ ) करना पड़ता है । जिस प्रकार कोई रोगी चिकित्सक की शिक्षा मात्र से अच्छा नहीं हो सकता, उसे चिकित्सक से औषधि भी प्राप्त करनी पड़ती है, उसी प्रकार सच्चे गुरु न केवल आत्म- कल्याण का मार्ग बताते हैं वरन् उस पर चल सकने योग्य साहस, बल और उत्साह भी देते हैं । यह देन तभी सम्भव है जब गुरु के पास अपनी संचित आत्म-सम्पदा पर्याप्त मात्रा में हो । इसलिये गुरु का चयन और वरण करते समय उसकी विद्या ही नहीं आत्मिक-स्तर और तप की संग्रहीत पूँजी को भी देखना पड़ता है । यदि यह सभी गुण न हों तो कोई व्यक्ति आध्यात्म-मार्ग का उपदेष्टा भले ही कहा जा सके पर गुरु नहीं बन सकता । गुरु के पास साधना, तपस्या, विद्या एवं आत्मबल की पूँजी पर्याप्त मात्रा में होनी चाहिये । साधक को ऐसा गुरु तलाश करना पड़ता है और उसी के मार्ग दर्शन में अपना रास्ता बनाना पड़ता है । गुरु की महत्ता एवं योग्यता, शिष्य की पवित्रता एवं कुपात्रता, गुरु के प्रति भक्ति-भावना रखना, उनके आदर्श का अनुसरण करना आदि आवश्यक तथ्यों पर उपनिषदों में अनेक प्रसंग मिलते हैं । वे सभी माननीय एवं विचारणीय हैं । देखिये :- "वेद सम्पन्न आचार्य, ईश्वर भक्त, मत्सरता रहित, योग-ज्ञाता, योग-निष्ठा वाला, योगात्मा, पवित्रतायुक्त, गुरुभक्त, परमात्मा में विशेष रूप से लीन इन लक्षणों से युक्त गुरु कहा जाता है । 'गु' शब्द का अर्थ है अन्धकार । और 'रु' शब्द का अर्थ है-रोकने वाला । अन्धकार को दूर करने से गुरु होता है । गुरु ही परब्रह्म है । गुरु ही परमगति है । गुरु ही
( ३६ ) पर विद्या है। गुरु ही परायण योग्य है। गुरु ही पराकाष्ठा है। गुरु ही परम धन है। वह उपदेष्टा होने के कारण श्रेष्ठ से भी श्रेष्ठ है।” —अद्वयतारक उपनिषद् “जो इन्द्रियों को जीतने वाला, ब्रह्मचारी गुरुभक्त हो, उसी के सम्मुख यह रहस्य प्रकट करना उचित है।” —हंसोपनिषद् जो शिक्षा प्राप्त करके भो मन, कर्म, बचन से भी गुरुजनों का आदर नहीं करते, उनके अन्न को कोई कल्याण- इच्छुक स्वीकार नहीं करता। न गुरुजन और न यती ही उस कृतघ्नी के अन्न को खाते हैं। गुरु ही परम धर्म है। गुरु ही परमगति है। जो उनका सम्मान नहीं करता, उसकी विद्या, तपस्या सभी धीरे-धीरे ऐसे क्षीण हो जाती है जैसे कच्चे घड़े में जल। जैसी भक्ति देव में वैसी ही गुरु में होने से ब्रह्मज्ञानी परमपद को प्राप्त करता है ऐसा वेदानुशासन है, ऐसा ही वेद-विधान है।” —शाटचायनोयोपनिषद् “गुरु जो आदेश दे उसका पालन शिष्य को बिना विचारे संतोषयुक्त भाव से करना चाहिए। इस विद्या को गुरु से प्राप्त करें। गुरु की सदा सुश्रूषा करें इसी से मनुष्य का सच्चा-कल्याण होता है।••••••••श्रुति में कहा गया है कि गुरु ही साक्षात हरि है, कोई अन्य नहीं । यह विद्या उसी को देनी चाहिए जो गुरु का सच्चा भक्त ही, नित्य भक्ति परायण रहे। अन्य किसी को नहीं देनी चाहिए। यदि कोई देगा तो देने वाला नरक को जायगा और सिद्धि भी नहीं मिलेगी।” —ब्रह्मविद्या उपनिषद्
( ३७ ) “इस पैप्पलाद ऋषि को प्राप्त हुये महाशास्त्र को चाहे जिस किसी को न देना चाहिये । नास्तिक, कृतघ्न, दुर्वृत्त, दुरात्मा, दाम्भिक, नृशंस, शठ, असत्यभाषी को इसे कदापि न दे । जो सुव्रतधारी, सच्चा-भक्त, शुद्धवृति वाला, सुशील, गुरुभक्त, शमदम वाला, धर्मबुद्धि वाला, ब्रह्मचर्य में चित्त लगाने वाला भक्ति-भाबना वाला हो, कृतघ्न न हो उसी को इसे देना चाहिये । यदि ऐसा न मिले तो किसी को न देकर उसकी रक्षा करनी चाहिए।” —शरभोपनिषद् „यह ज्ञान शंकर का महान शास्त्र है । उसे जो कोई नास्तिक, कृतघ्नी, दुराचारी, दुरात्मा हो, उसको नहीं देना । पर जिसका अन्तःकरण गुरु-भक्ति से शुद्ध हो, ऐसे व्यक्ति को एक महीना, छै महीना या वर्ष भर तक परीक्षा करने के उपरान्त ही इस शास्त्र को देना।” —तेजोबिन्दु उपनिषद् “यह ब्रह्म का उपनिषद् उसे नहीं देना चाहिये जो अत्यन्त शान्त न हो, जो पुत्र न हो, शिष्य न हो और एक वर्ष पास न रहा हो । अनजान कुलशील वाले को भी नहीं देना चाहिये और न सुनाना चाहिये । जिसको परमात्मा के ऊपर और परमात्मा के समान ही गुरु के ऊपर परमभक्ति हो उसी के लिये ये वाक्य कहे गये हैं और ऐसी आत्मा को ही ये प्रकाशवान करते हैं।” —सुवाल उपनिषद्
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अन्य ग्रन्थों में भी इस सम्बन्ध में बहुत कुछ कहा गया है । वह भी महत्वपूर्ण नहीं है । गुरु की महत्ता को प्रायः सभी धर्म ग्रन्थों ने एक स्वर से स्वीकार किया है । उत्तिष्ठत ! जागृत ! प्राप्यवरान निरोधक । – ऋग्वेद "उठो, जागो, सद्-गुरुओं द्वारा यथार्थ ज्ञान को प्राप्त करो ।" गुरुपोदेशतो ज्ञेयं नच शास्त्रार्थ कोटिभिः । "केवल शास्त्रों के आधार पर नहीं, इस विद्या को गुरु द्वारा सीखे ।" तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत् । समित्पाणिः श्रोत्रियं ब्रह्म निष्ठम् । "उस ज्ञान की प्राप्ति के लिये वेदज्ञ, ब्रह्मनिष्ठ गुरु के पास हाथ में समिधा लेकर जावे ।" गुरु वरण करने का तात्पर्य उस व्यक्ति की आत्मा के साथ अपनी आत्मा को जोड़ देना है। जिस प्रकार किसी बड़े तालाब के साथ छोटे तालाब को एक नाली के द्वारा जोड़ दिया जाय तो बड़े तालाब का पानी छोटे में भी आने लगता है और वह तब तक नहीं सूखता जब तक कि बड़ा तालाब भी न सूख जाय । तस्मै स विद्वानुपसन्नाय सम्यक् प्रशान्त चित्ताय शमान्विताय । येनाक्षरं पुरुषं वेद सत्यं प्रोवाच तां तत्वतो ब्रह्म विद्याम् । – मुण्डक १।२।१३
( ३२ ) वह ज्ञानी-गुरु उस श्रद्धा पूर्ण, शान्त चित्त एवं तितीक्षा और साधना निष्ठ शिष्य को ब्रह्म-विद्या का उपदेश करे जिससे वह अविनासी सत्स्वरूप आत्मा को जान ले । गुरु शिष्य चाहे शरीर से सदा पास-पास न रहें पर यदि वह सम्बन्ध उचित अध्यात्म विज्ञान के अनुरूप हुआ है तो शिष्य को गुरु की समीपता उपलब्ध रहेगी और वह उसकी समीपता एवं संगति का फल प्राप्त करता रहेगा। गुरु की क्षमता यह होनी ही चाहिये कि वह शिष्य के अन्तःकरण तक अपनी प्रेरणा पहुँचा सकने में समर्थ हो । इसी शक्ति के आधार पर सद्-गुरु अपने शिष्य का कल्याण कर पाते हैं:— दर्शनध्यान संस्पर्शात् मत्सी कूर्मी च पक्षिणीं। शिशून् पालयते नित्यं तथा सज्जन संगतिः । "जिस प्रकार मछली, कछवी तथा चिड़िया अपने बच्चों का दर्शन, ध्यान और स्पर्श से पालन करती है, उसी प्रकार सत्यपुरुषों की संगति से भी शिष्य का पालन होता है।" यादृशैः सन्निवसति यादृशांश्चोपसेवते । या दृगिच्छेच्चभवितुं तादृग्भवति पुरुषः ॥ "जो जिसके साथ रहता है, जिसकी सेवा करता है और जो जैसा होना चाहता है वह वैसा ही हो जाता है।" यदि सन्तं सेवति यद्यसन्तं तपस्विनं यदि वास्तेनमेव । वासो यथा रंग वशं प्रयाति तथा स तेषां वशमभ्युपैति । —महा०शान्ति २६६।३३
“कपड़े जैसे रंग से रङ्ग जावें वैसे ही हो जाते हैं। ऐसे ही जो व्यक्ति संत, असंत तपसी, चोर या जैसों का संग करता है, वह वैसा ही हो जाता है।” राजसूय यज्ञ करने के सम्बन्ध में प्रस्ताव पर विचार विमर्श करते हुये युधिष्ठिर ने श्रीकृष्ण जी से कहा— केचिद्व सौहृदादेव न दोषं परिचक्षते । स्वार्थं हेतोस्तथैवान्ये प्रियमेव वदन्त्युत । प्रियमेव परीप्सन्ते केचिदात्मनियद्धितम् । एवं प्रायाश्चदृश्यन्ते जनवादाः प्रयोजने । त्वं तु हेतूनतीत्यैतान् रागद्वेषौनिरस्य च । परमं यत् क्षम लोके यथावद्वक्तुमर्हसि । —महाभारत “कुछ लोग सौहार्दवश दोषों को नहीं कहते, अन्य लोग स्वार्थवश केवल प्रिय ही बोलते हैं तथा कुछ लोग अपने विषय में हित एवं प्रिय विषय ही श्रवण करना चाहते हैं, अतः तद्- नुरूप ही सुझाव देते हैं। प्रयोजन आने पर प्रायः ऐसे ही जनवाद देखे जाते हैं। तात्पर्य यह है कि किसी न किसी संकोच स्वार्थ या भावना के वशीभूत होकर प्रायः योग यथार्थ की अपेक्षा करके प्रिय ही बोलना जानते हैं त्रुटियों की ओर वे इंगित नहीं कर पाते। किन्तु भगवान् ! तुम तो समस्त हेतुओं से परे रहकर रागद्वेष को दूर भगाकर जो परम समुचित एवं यथार्थ बात है, वही यथावत् बोलते हो। अतः बिना तुम्हारे परामर्श के मैं इतना बड़ा कार्य कैसे करस कता हूँ ?” बुद्धिमान व्यक्ति भी कई अध्यात्म प्रसंगों पर दिग्भ्रान्त हो जाते हैं, तब उन्हें उचित मार्ग दर्शन सद्-गुरु द्वारा ही होता है युधिष्ठिर इस तथ्य को जानते थे इसलिये उन्होंने राजसूय
यज्ञ का प्रसंग आने पर श्रीकृष्ण जी से उसके लिए आवश्यक मार्ग दर्शन मांगा। ऐसा ही मार्ग दर्शन अपनी-अपनी परिस्थि- तियों के अनुरूप सर्व साधारण को भी प्राप्त करना होता है ऐसे अवसरों पर सुलझे हुए विचारों का तथा अध्यात्म और व्यवहार का समन्वय कर सकने वाला अनुभवी मार्ग दर्शक अभीष्ट होता है। उनके सहयोग और परामर्श से शिष्य अनेक समस्याओं को हल करता हुआ अभीष्ट लक्ष तक जा पहुंचता है । निमज्ज्यां मज्जतां घोरे भवाब्धौ परमायनम् सन्तो ब्रह्मविदः शान्ता नौदृंढेवाप्सु मज्जताम् --श्रीमद्भागवत “जैसे जल में डूबते हुओं को नाव ही एक मात्र सहारा है, वैसे ही इस भवसागर में डूबने से बचने के लिये ब्रह्मवेत्ता सन्तों का ही सबसे बड़ा सहारा है।” दुर्लभो विषयेत्यागो दुर्लभं तत्व दर्शनं । दुर्लभो सहजावस्था सद्गुरोःकरुणांविना । “बिना गुरु कृपा के विषयों का त्याग दुर्लभ है, तत्व-दर्शन दुर्लभ है तथा सहजावस्था का प्राप्त होना भी दुर्लभ है।” आत्मज्ञान को उपलब्धि, पापपूर्ण मनोभूमि का परि- शोधन, भ्रम संशयों का उच्छेदन, प्रगति के लिये मार्ग दर्शन, यह सब कार्य उनके लिये सरल ही हो जाते हैं जिन्हें अनुभवी सद्-गुरु की प्राप्ति होजाय । इसके बिना अध्यात्म-मार्ग के पथिक को अन्धकार में ही भटकते रहना पड़ता है। गुरुपदेशशास्त्रत्थै बिना चात्मा न बुध्यते । एतत्संयोगसत्तैव स्वात्मज्ञान प्रकाशिनी । --योगवाशिष्ठ ६।४१।१६