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अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

Abhijnanashakuntalam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाकवि कालिदास / डॉ. श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished540 पृष्ठ

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इन्होंने अभिधा शक्ति का प्रयोग न कर व्यंजना शक्ति से ही काम लिया है। इससे इनकी कविता में और भी चमत्कार आ जाता है।

जब अङ्गिरा ऋषि हिमालय के पास आकर कहने लगे कि अपनी पुत्री पार्वती का विवाह भगवान् सदाशिव के साथ कर दीजिए। उस समय पार्वती का वर्णन करते हुए अन्तर्जगत् के पारखी कालिदास कहते हैं कि—अङ्गिरा ऋषिके इस प्रकार कहने समय अपने पिता हिमालय के पास खड़ी हुई पार्वती लज्जावश मुँह नीचे करके हाथ में लिए लीलाकमल के पत्तों को गिनने लगी—

एवं वादिनि देवर्षौ पार्श्वे पितुरधोमुखी।
लीलाकमलपत्राणि गणयामास पार्वती॥ ६।८४

इस श्लोक में कवि ने लज्जा शब्द का प्रयोग नहीं किया है; किन्तु लज्जा के उदय होने पर पार्वती ने जो कार्य किया है, उसी का वर्णन किया है, वही कार्य हृदयगत लज्जाभाव को व्यक्त कर देता है।

कालिदास की प्रियवस्तुयें

पर्वतों में हिमालय, नगरियों में उज्जयिनी, देवताओं में शिव, छन्दों में मन्दक्रान्ता, अलङ्कारों में उपमा, रसों में शृङ्गार और ऋतुओं में वसन्त कालिदास को परम प्रिय थे।

संस्कृत साहित्य के लक्षणकार आचार्यों ने गौडी पाञ्चाली, वैदर्भी और लाटी नाम की चार रीतियाँ तथा माधुर्य, ओज और प्रसाद ये ३ गुण माने हैं गौडी रीति में बड़े-बड़े समास तथा पाञ्चाली में छोटे-छोटे समास होते हैं। वैदर्भी रीति में समास प्रायः नहीं के बराबर होते हैं। गौडी में ओज गुण, पाञ्चाली में माधुर्य गुण और वैदर्भी में प्रसाद गुण की प्रधानता होती है।

कालिदास की कविता में वैदर्भी रीति और प्रसाद गुण ओत-प्रोत है। प्रसाद गुण का प्राधान्य होने के कारण कालिदास की कविता शीघ्र ही समझ में आ जाती है।

कालिदास का भाषा पर पूर्ण अधिकार है। इनकी भाषा व्याकरण से परिष्कृत सरल, सरस एवं सुबोध होती है। ये—‘च, तु, हि, वै, किल, खलु’ आदि का प्रयोग केवल पाद की पूर्ति के लिए नहीं करते हैं; किन्तु उनका जहाँ प्रयोग करते हैं वहाँ वे सार्थक होते हैं। इनके शब्द नपे-तुले होते हैं, और इनके वाक्यों में क्रियापद प्रायः स्पष्ट होते हैं। ये किसी बात को घुमा-फिरा कर कहने की अपेक्षा सीधे कह देना अधिक पसन्द करते हैं। थोड़े शब्दों में अधिक अर्थ व्यक्त करने की प्रवृत्ति इनमें विशेषरूप से दीख पड़ती है।

जैसे भिन्न-भिन्न वर्णों के उच्चारण के लिए भिन्न-भिन्न कण्ठ-ताल्वादि के आघातों के भेद हैं और भिन्न-भिन्न वर्ण, भिन्न-भिन्न रस, भाव एवं अलङ्कारों के व्यञ्जक हैं वैसे ही विभिन्न रसों को व्यक्त करने के लिए विभिन्न छन्द भी हैं। शृङ्गार रस के व्यञ्जक वर्णों के द्वारा ही शृङ्गार रस की पुष्टि तथा वीर रस के व्यञ्जक वर्णों से वीर रस की पुष्टि हो सकती है, अन्य वर्णों से नहीं। तथापि केवल शब्द योजना ही काव्य में रस सिद्धि के लिए पर्याप्त नहीं है उसके लिये छन्द की योजना भी अपेक्षित है। क्षेमेन्द्र ने अपने सुवृत्ततिलक में कहा है कि काव्य में रस तथा वर्णनीय वस्तु के अनुसार छन्दों का विनियोग करना चाहिये—

काव्ये रसानुसारेण वर्णनानुगुणेन च।
कुर्वीत सर्ववृत्तानां विनियोगं विभाववित्॥

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कालिदास का छन्द-विषयक ज्ञान भी गम्भीर और पूर्ण है। इन्होंने अपने काव्यों में प्रायः सभी प्रमुख छन्दों का प्रयोग किया है। ये छन्दों का चुनाव रस और वर्ण्य वस्तु के अनुकूल ही करते हैं। कालिदास मन्दाक्रान्ता छन्द के सिद्धहस्त कवि माने जाते हैं।

इन्होंने अपने खण्ड काव्य मेघदूत को केवल मन्दाक्रान्ता छन्द में ही लिखा है—

सुवशा कालिदासस्य मन्दाक्रान्ता प्रवल्गति ।
सदश्वस्य दमस्येव कम्बोजतुरगाङ्गना ॥

कालिदास की विशेषता

प्रत्येक कवि में किसी न किसी विषय की खास एक विशेषता रहती है। कविवर कालिदास उपमा अलंकार के आचार्य माने जाते हैं। तत्तत् कवियों की विशेषता व्यक्त करते हुए एक आलोचक ने बहुत ठीक कहा है—

उपमा कालिदासस्य भारवेरर्थगौरवम् ।
दण्डिनः पदलालित्यं त्रयोऽप्येकैकतोऽधिकाः ॥

उपमा की छटा

कालिदास की उपमायें एक से एक बढ़कर हैं। इन्होंने नई-नई उपमाओं की उद्भावना की है। इनकी उपमाओं के विशेष चमत्कार का कारण यह है कि प्रायः इनकी उपमायें अन्तर्जगत् और बाह्य जगत् दोनों से ली गई हैं। इन्होंने उपमाओं में उपमान तथा उपमेय के वचन और लिंग तक का भी विचार किया है। रघुवंश के षष्ठ सर्ग में इन्दुमती के स्वयंवर में उपस्थित राजाओं की दशा का वर्णन करते हुए कालिदास लिखते हैं—स्वयम्बर में उपस्थित जिन-जिन राजाओं को छोड़कर जब इन्दुमती आगे बढ़ जाती थी तब वे राजे दीपशिखा के द्वारा छोड़े गये महलों के समान प्रतीत होते थे। यहाँ निराश राजाओं की विषण्णता तथा खिन्नता की अभिव्यक्ति इस उपमा के द्वारा बड़ी सुन्दरता से दी गई है।

सञ्चारिणी दीपशिखेव रात्रियं यं व्यतीयाय पतिम्बरा सा ।
नरेन्द्रमार्गाट्ट इव प्रपेदे विवर्णभावं स स भूमिपालः ॥ ६।६७

इस श्लोकमें इन्दुमती की उपमा स्त्रीवाची दीपशिखा शब्द से दी गई है और राजा की उपमा पुंलिङ्ग अट्ट शब्द से दी गई है। लिंग की समता के साथ-साथ वचन की समता भी दर्शनीय है। इसी उपमासौष्ठव पर मुग्ध होकर साहित्यिक विद्वत्समुदाय ने इस महाकवि को दीपशिखा कालिदास कहना आरम्भ कर दिया।

रघुवंश के द्वितीय सर्ग में सायंकाल के समय जब दिलीपं वसिष्ठजी की गाय नन्दिनीको चराकर आश्रम की ओर लौटते हैं और लाल रंग की गाय आगे आगे है, शुभ्रवस्त्रधारी दिलीप पीछे पीछे हैं हरितवस्त्र धारिणी सुदक्षिणा उनकी प्रतीक्षां करती हुई स्वागत करने के लिए खड़ी है, दोनों के बीच में स्थित नन्दिनी की शोभा जैसी प्रतीत हो रही है जैसे दिन और रात के मध्य रक्तवर्णा सन्ध्या।

पुरस्कृत्य वर्त्मनि पार्थिवेन प्रत्युद्गता पार्थिवधर्मपत्न्या ।
तदन्तरे सा विरराज धेनुर्दिनक्षपामध्यगतेव सन्ध्य ॥ २।२०

यहाँ राजा की उपमा दिनसे, सुदक्षिणा की उपमा रात्रि से और गाय नन्दिनी की उपमा लाल सन्ध्या से दी गई है। और भी देखिए—

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शरीरसादादसमग्रभूषणा मुखेन सालक्ष्यत लोध्रपाण्डुना ।
तनुप्रकाशेन विचेयतारका प्रभातकल्पा शशिनेव शर्वरी ॥ ३।२

शरीर की दुर्बलता के कारण कुछ ही आभूषण पहनी हुई उस सुदक्षिणा की लोध्रपुष्प सदृश पीले मुख से ऐसी शोभा हुई जैसे प्रातःकाल टिमटिमाते हुए ताराओं से युक्त रात की शोभा पीले वर्ण के चन्द्रमा से होती है। यह भाव व्यक्त करने के लिए कवि ने लोध्रपाण्डु मुख से चन्द्रमा की एवं एकाध तारायुक्त प्रभातकल्पशर्वरी से सुदक्षिणा की उपमा देते हुए कितने सुन्दर ढङ्ग से पूर्णोपमा व्यक्त की है। इस प्रकार कालिदास की कविता में स्थल-स्थल पर अनूठी उपमा का चमत्कार मिलता है। इनकी उपमाओं में स्वाभाविकता का उत्कर्ष है जिससे पाठक का हृदय सहसा चमत्कृत हो उठता है।

कुमारसंभव में तपस्या के लिए आभूषणों का परित्याग कर केवल वल्कल वस्त्र धारण करने वाली पार्वती चन्द्रमा तथा ताराओं में मण्डित अरुणोदय युक्त रजनी के समान बतलाई गई है। स्तनों के भार से कुछ झुकी हुई आतप सदृश लालवस्त्र धारण की हुई पार्वती फूलों के गुच्छों से झुकी हुई नवीन लाल पल्लवों से सुशोभित संचारिणी लता के समान प्रतीत होती थी—

पर्याप्तपुष्पस्तनभारनम्रा सञ्चारिणी पल्लविनी लतेव ।

रघुवंश के प्रथम सर्ग में कवि की उपमा देखने योग्य है। वशिष्ठ की नन्दिनी गौ का शरीर नये पत्तों के समान कोमल एवं लाल है, उसके मस्तक पर भूरे बालों की वक्र रेखा बनी हुई है जिससे वह ऐसी शोभा पा रही है जैसे लाल सन्ध्या के भाल पर द्वितीया का चन्द्रमा चढ़ आया हो—

ललाटोदयमाभुग्नं पल्लवस्निग्धपाटला ।
बिभ्रती श्वेतरोमाङ्कं सन्ध्येव शशिनं नवम् ॥ १।८३
श्रुतेरिवार्थं स्मृतिरन्वगच्छत् २।२, जुगोप गोरूपधरामिवोर्वीम् । २।३

नादसौन्दर्य की प्रसूतिके लिए अनुप्रास अलङ्कार की योजना उनकी रचनाओं में नितान्त मनोरम बन गई है। जैसे रघुवंश में—

जीवन् पुनः शश्वदुपप्लवेभ्यः प्रजाः प्रजानाथ ! पितेव पासि ॥ २।४८

अर्थान्तरन्यास का उदाहरण शकुन्तला में देखिए—

इयमधिकमनोज्ञा वल्कलेनापि तन्वी ।
किमिव हि मधुराणां मण्डनं नाकृतीनाम् ॥ १।१६

रघुवंश में इन्दुमती स्वयंम्बर में—

नासौ न काम्यो न च वेद सम्यग्द्रष्टुं न सा भिन्नरुचिहि लोकः । ६।३०

पूर्वमेघ में—

इत्यौत्सुक्यादपरिगणयन् गुह्यकस्तं ययाचे ।
कामार्ता हि प्रकृतिकृपणाश्चेतनाचेतनेषु ॥ ५ ॥

उत्तरमेघ में—

कस्यात्यन्तं सुखमुपनतं दुःखमेकान्ततो वा ।
नीचैर्गच्छत्युपरि च दशा चक्रनेमिक्रमेण ॥ ५२ ॥

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शकुन्तला के प्रथम अंक में हरिण भाग रहा है। राजा दुष्यन्त उसका पीछा कर रहा है। उसके धनुष पर बाण चढ़ा हुआ है। तपस्वी राजा को रोकते हुए कहता है—राजन् ! पुष्पराशि की तरह सुकोमल शरीर वाला यह हरिण आपके अग्नितुल्य बाणों को क्या बर्दाश्त कर सकेगा। अहह, कहाँ बेचारों हरिणों का अति चंचल प्राण और कहाँ तीक्ष्ण प्रहार करने वाले वज्र के समान कठोर आपके बाण। अतः आप इस पर बाण प्रहार न करें—

न खलु न खलु बाणः सन्निपात्योऽयमस्मिन् मृदुनि मृगशरीरे पुष्पराशाविवाग्निः। क्व बत हरिणकानां जीवितं चातिलोलं क्व च निशितनिपाता वज्रसाराः शरास्ते ॥ १०

इसी प्रकार शकुन्तला को पुष्पित लता के समान बतलाकर कालिदास ने उसके सौन्दर्य में कितनी मादकता भर दी है। राजा दुष्यन्त की दृष्टि में शकुन्तला लता से जरा भी कम नहीं है। उसके अनुपम सौन्दर्य की छटा अत्यन्त लोभनीय है। शकुन्तला का अधरोष्ठ नव पल्लव के समान लाल है, दोनों भुजायें कोमल शाखाओं के सदृश हैं। इसके अङ्गों में फूल की तरह लुभावना यौवन व्याप्त है।

अधरः किसलयरागः कोमलविटपानुकारिणौ बाहू। कुसुममिव लोभनीयं यौवनमङ्गेषु सन्नद्धम् ॥ १२१

इस प्रकार प्रायः कालिदास सभी प्रचलित अलङ्कारों के प्रयोग में दक्ष हैं किन्तु उपमा अलंकार पर इनका चमत्कारिक अधिकार है। केवल संस्कृत के ही नहीं, अपितु विश्व का भी कोई ऐसा कवि नहीं है। जो इनकी उपमा कला की समता कर सके। इनकी रचनाओं में उपमा की प्रचुरता के साथ ही उसका सौष्ठव भी देखते ही बनता है। इनकी उपमाओं की रसपेशलता अत्यन्त हृदयावर्जक है। सन्दर्भ को सुन्दर बनाने की कला में वे पारङ्गत हैं।

कालिदास के अध्ययन-स्थल की कल्पना

प्राचीन काल में विविध विद्याओं के गम्भीर अध्ययन के लिए भारत में अनेक विद्या-पीठ थे पंजाब में तक्षशिला, मगध में नालन्दा, सौराष्ट्र में वलभी और मालवा में उज्जैन। इनके अतिरिक्त जगह-जगह विद्वान् ब्राह्मणों द्वारा स्थापित अनेक गुरुकुल थे, जिनमें वेद, वेदाङ्ग, व्याकरण, ज्योतिष, धर्मशास्त्र दर्शन आदि का अध्ययन ही नहीं होता था बल्कि सुधामधुर काव्यों के निर्माण के लिए भी प्रोत्साहन मिलता था। कालिदास के ग्रन्थों के अनुशीलन से प्रतीत होता है कि उनकी शिक्षा भी ऐसे ही किसी गुरुकुल में हुई होगी। क्योंकि वे आश्रमों का वर्णन साङ्गोपाङ्ग करते हैं। कालिदास ने एक स्थल पर कहा है कि ऐसे गुरुकुलों में चौदह विद्याओं का अभ्यास कराया जाता है। याज्ञवल्क्यस्मृति में चार वेद, शिक्षा, व्याकरण आदि छः अङ्ग, पुराण, न्याय, मीमांसा तथा धर्मशास्त्र ये मिलकर धर्म के मूलभूत चौदह विद्याएँ हैं—

पुराणन्यायमीमांसा धर्मशास्त्राङ्गमिश्रिताः। वेदाः स्थानानि विद्यानां धर्मस्य च चतुर्दश ॥

कालिदास के विचार

कालिदास को वैदिक धर्म पर पूर्ण विश्वास है और ये वर्णाश्रम व्यवस्था को पूर्णरूप

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से मानते हैं। इन्हें धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष पर अपार श्रद्धा है। ये सभी को त्याग और तपस्या की शिक्षा देते हैं। इनको नगर निवास की अपेक्षा तपोवन का जीवन बहुत अच्छा लगता है।

ये आशुतोष भगवान् सदाशिव के परम उपासक महाकवि हैं। इन्होंने अपने तीनों नाटकों में भगवान् शङ्कर का ही स्मरण किया है और रघुवंश के मङ्गलाचरण में शिव पार्वती की वन्दना की है इनके सभी ग्रन्थों में शिव की महिमा विशेष रूप से वर्णित पाई जाती है। इनके नाटकों के भरतवाक्य से मालूम होता है कि ये भगवान् सदाशिव से विश्व कल्याण की कामना रखते थे। ये व्यक्ति की अपेक्षा समाज को अधिक महत्त्व देते हैं और सभी को लोककल्याणार्थ कार्य करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। ये आशावादी कवि हैं, निराशावादी नहीं। ये सत्कार्यों के सम्पादन द्वारा परलोक मार्ग को सुगम बनाना मानव जीवन का वास्तविक सदुपयोग और अन्तिम लक्ष्य समझते हैं। अभिज्ञानशाकुन्तल के भरत वाक्य में भगवान् सदाशिव से पुनर्जन्म को दूर करने के लिए प्रार्थना करते हुए कहते हैं—

“ममापि च क्षपयतु नीललोहितः पुनर्भवं परिगतशक्तिरात्मभूः।”

कवि ने कुमारसंभव के द्वितीय सर्ग में देवताओं की प्रार्थना का उत्तर देते समय स्वयं ब्रह्मा जी से कहवाया है मुझे और विष्णु को भी शिवजी के प्रभाव का ज्ञान नहीं होता—

स हि देवः परं ज्योतिस्तमः पारे व्यवस्थितम्। परिच्छिन्नप्रभावर्द्धि न मया न च विष्णुना ॥ २।१५

अतः कालिदास के शिवोपासक होने में किसी प्रकार का सन्देह नहीं है।

कालिदास भारतीय संस्कृति के सच्चे उपासक महाकवि थे। इसका आभास उनके काव्यों में स्थान-स्थान पर मिलता है। जैसे रघुवंश महाकाव्य में कालिदास ने रघुवंशी राजाओं को निमित्त बनाकर उदारचरित पुरुषों का स्वभाव पाठकों के समक्ष रखा है और उनकी योग्यता का वर्णन करने के बहाने कितने ही प्रकार के रमणीय उपदेश प्राणिमात्र के लिए दिये हैं। चक्रवर्ती राजा दिलीप द्वारा २१ दिन महर्षि वशिष्ठ की नन्दिनी गौ की सेवा कराकर वरदान के रूप में पुत्रप्राप्तिरूप मनोरथ सिद्धि एवं इन्द्र द्वारा दिलीप के आश्वमेधिक अश्वहरण के बाद गोमूत्र को नेत्र में लगाते ही रघुको दिव्य दृष्टि प्राप्त करना आदि से गो-सेवा का अलौकिक फल दिखाकर संसार को गो-सेवा से अपने-अपने मनोरथ को पूर्ण करने का निर्देश किया है, और गो-सेवा की अपूर्व महिमा बतलाई है। इसी प्रकार महर्षि वरतन्तु के शिष्य कौत्स को अपार धनराशि देकर अज को पुत्र रूप में प्राप्त करना ब्राह्मणभक्ति एवं दानशक्ति का अनुपम उदाहरण है। श्रीराम के चरित्र के समान भारतीय संस्कृति के आदर्श का दिग्दर्शन तो कहीं अन्यत्र उपलब्ध ही नहीं हो सकता है। महाराजा रघु द्वारा कौत्सको सत्कार तथा अपार धनराशि देकर भारतीयों का अनुपम आदर्श अतिथि-सत्कार और विद्या-दान के प्रति अटल श्रद्धा व्यक्त की है। कुमारसम्भव में दिव्य नायक का दिव्य चरित्र वर्णित है, किन्तु लौकिक काम और शृङ्गार रस की सूक्ष्म भावनाओं का वर्णन करने के लिए उन्होंने खण्डकाव्य मेघदूत लिखा है।

अपने अभिज्ञानशाकुन्तल नाटक में तो इन्होंने आदर्श राजा दुष्यन्त तथा आदर्श नारी शकुन्तला का मार्मिक चित्र खींचकर यह दिखा दिया है कि भारतीय नारी किसी कारण-वश पति द्वारा अपमानित होने पर भी उसका अपमान नहीं करती अपितु संयमद्वारा पुनः

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उसे अनुकूल कर लेती है। शकुन्तला में कुलपति कण्व के उपदेश-सन्देश में लोक कल्याण की कामना का भाव तो सार्वभौम ही है।

यद्दुष्करं यद् दुरापं यद् दुर्गं यच्च दुस्तरम् ।
तत्सर्वं तपसा साध्यं तपो हि दुरतिक्रमः ॥

कुमारसम्भव में तीव्र तपस्या के द्वारा पार्वती के शिव विषयक मनोरथ की सफलता का वर्णन करते हुए कविवर कालिदास ने तपस्या में अपना अटल विश्वास व्यक्त किया है। इनका मत है कि जो वस्तु किसी प्रकार से भी प्राप्त नहीं हो सकती, वह तपस्या द्वारा ही प्राप्त की जा सकती है।

उग्र तपस्या द्वारा प्राप्त शक्ति से उद्दण्ड होकर संसार को दुःख देनेवाले वज्रनाभ के पुत्र दुर्दान्त तारकासुर को मारने के लिए देवताओं का प्रयास विश्व-कल्याण की भावना की ओर संकेत करता है।

कालिदास के ग्रन्थों का अनुशीलन करने से प्रतीत होता है कि उन्होंने धर्म, दर्शन, पुराण, ज्योतिष समाजशास्त्र, राजनीति, शिक्षा आदि विविध शास्त्रों का गम्भीर मनन किया था जिसके प्रभाव से पाठक चमत्कृत हो उठता है। अन्त में यही कहना पड़ता है कि लोकोत्तर महापुरुषों के हृदय को कौन जान सकता है—

लोकोत्तराणां चेतांसि को नु विज्ञातुमर्हति ।

शकुन्तलानाटक में रसविमर्श

रसव्यञ्जना की दृष्टि से अभिज्ञानशाकुन्तल का महत्त्व सर्वोपरि है। शकुन्तला में संभोग तथा विप्रलम्भ दोनों तरह का शृङ्गार है। दोनों शृंगारों की ऐसी ललित एवं हृदय-स्पर्शी मन्दाकिनी इसमें प्रवाहित हुई है कि सहृदय भावुक उसमें अवगाहन करते नहीं अघाता। फिर भी संभोग शृङ्गार अङ्गी और विप्रलम्भ शृंगार, वीर, अद्भुत, करुण, हास्य, भयानक, रौद्र, वत्सल और शान्तरस अङ्ग हैं। कुछ लोगों का कहना है कि इसमें विप्रलम्भ शृंगार अधिक व्याप्त होने के कारण उसे ही अङ्गी रस मानना चाहिए। पर यह मत ठीक नहीं है, क्योंकि संस्कृत के नाटक दुःखान्त नहीं होते, वे सुखान्त ही होते हैं।

तृतीय और सप्तम अङ्क में सम्भोग शृंगार है। शृङ्गार-रस के नाटक विप्रलम्भपूर्वक अवश्य होते हैं क्योंकि विप्रलम्भ के बाद आने वाला सम्भोग अधिक आनन्ददायक होता है। नाटक की समाप्ति पर जिस रस का मन पर प्रभाव हो उसे ही प्रधान रस मानना सम्प्रदाय सिद्ध है। अन्तिम सप्तम अङ्क में होने वाले नायक-नायिका के स्थायी मिलन के सुख का प्रभाव प्रेक्षकों के मन पर अधिक काल तक स्थायी रहता है। अतः अभिज्ञानशाकुन्तल को सम्भोग शृङ्गार-रस प्रधान ही मानना तर्कसंगत और न्यायोचित प्रतीत होता है। पहले के तीन अङ्कों में शृंगार का साम्राज्य है फिर भी प्रसङ्ग से अनेक रसों का उसमें मिश्रण है। जैसे—

प्रथम अङ्क के आरम्भ में दुष्यन्त के सामने अपनी जान बचाने के निमित्त भगाते हुए मृग के तथा अन्त में सैनिक गज द्वारा किये गये उपद्रव में भयानक रस, द्वितीय अङ्क में विदूषक के विनोदी भाषण एवं अङ्गभङ्ग में हास्य रस, पुनः तृतीय अङ्क के अन्त में राक्षसों के विघ्नवर्णन में भयानक रस का शृंगार में मिश्रण हुआ है। चतुर्थ अङ्क में आकाशवाणी तथा वनदेवता द्वारा दिये गये वस्त्र और आभूषणों के वर्णन में अद्भुतरस की छटा है।

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किन्तु उस अंक का प्रधान रस करुण ही है। पाचवें अंक में दुष्यन्त तथा शकुन्तला के वाक्कलह के मनोरम प्रसंग के साथ-साथ राजा के निराकरण से सन्तप्त शकुन्तला के भाषण में रौद्र रस, आगे उसके असहाय स्थिति में करुण तथा अन्त में अप्सरातीर्थ के पास उसके अदृश्य हो जाने से अद्भुतरस है। छठे अंक में करुण तथा विप्रलम्भ शृंगार का परिपोष उत्तम हुआ है। राजा के करुण शृंगार को विदूषक के हास्य रस में जोड़ दिया गया है। अन्त के सप्तम अङ्क में सर्वदमन एवं राजा दुष्यन्त की भेंट के प्रसंग में अद्भुत और वत्सल तथा अन्त में कश्यप ऋषि के सान्निध्य में अनेक रसों का अनुभव करने पर भी शान्त रस में पर्यवसान हो जाता है।

कालिदास का प्रकृति प्रेम

कालिदास के काव्यों में प्रकृति की छवियों के मनोरम एवं प्रभावशाली चित्रण उपलब्ध होते हैं।

कालिदास प्रकृति को सजीव एवं सचेतन मानते हैं। मेघदूत में अचेतन मेघ दौत्य कर्म ही नहीं करता, बल्कि वहिः प्रकृति विरही यक्ष विरहिणी यक्षप्रिया की समस्त मर्मद्रावक वेदना को परस्पर बाँट देता है। कालिदास की पार्वती और शकुन्तला प्रकृति सुकुमारियां हैं। प्रकृति और मनुष्य का आत्मीयता बोध कालिदास के अनेक सन्दर्भों में व्यक्त हुआ है।

कालिदास प्रकृति को मनुष्य जीवन से भिन्न वस्तु नहीं समझते। उनके विचार में दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। उन्हें मनुष्य जीवन में प्रकृति का तथा प्रकृति में मनुष्य जीवन का दर्शन मिलता है। कालिदास की कुमारियां लता-पादपों को स्नेह से सींचती हैं, और विनोदपूर्ण संलाप भी करती रहती हैं। निसर्गसुन्दरी शकुन्तला के सान्निध्य में उन्हें आम्रवृक्ष लता-युक्त दिखाई पड़ता है। अभिज्ञान शाकुन्तल के प्रथम अङ्क में प्रियम्वदा कहती है—सखि शकुन्तले ! थोड़ी देर यहाँ ही ठहरो तुम्हारे पास रहने से यह आम्र का वृक्ष लता-सनाथ सा दीखता है—त्वया समीपस्थितया लतासनाथ इव अयं चूतवृक्षः प्रतिभाति। वे नवमल्लिका तथा सहकार वृक्ष में वरवधू का सम्बन्ध बताते हैं—अनसूया शकुन्तला से कहती है—सखि शकुन्तले ! यह नवमल्लिका आम्र वृक्ष की स्वयम्वरवधू है। तुम्हीं ने तो इसका नाम वनज्योत्स्ना रखा है, क्या तू इसे भूल गई ? हला शकुन्तले इयं स्वयम्वरवधूः सहकारस्य त्वया कृतनामधेया वनज्योत्स्नेति नवमल्लिका एनां विस्मृतासि ?

पुनः अनसूया कहती है—अरी शकुन्तले ! मैं समझती हूँ कि पिताजी इन आश्रम के पौधों को तुमसे अधिक प्यार करते हैं, नहीं तो चमेली कली जैसे कोमल अङ्गवाली तुम्हें इनके थालों में पानी भरने का काम नहीं देते। इस पर शकुन्तला कहती है—में केवल पिताजी को आज्ञा से ही इन्हें नहीं सींचती हूँ, किन्तु मैं भी इन्हें सहोदर जैसा प्यार करती हूँ—न केवलं तातनियोग एव ममापि एतेषु सहोदरस्नेहः।

शकुन्तला केसर के वृक्ष को देखकर पुनः कहती है—सखि ! यह केसर का वृक्ष पवन के झोंके से हिलती हुई पत्ती रूपी अङ्गुलियों से मुझे बुला रहा है। जाऊँ, इसका भी मन रख दूँ—एष वातेरित पल्लवाभिरङ्गुलिभिः किमपि व्याहरतीव मां चूतवृक्षः। शकुन्तला के चतुर्थ अंश में तो प्रकृति और मनुष्य दोनों एकदम समीप आ गये हैं। महर्षि कण्व ने तपोवन के वृक्षों से शकुन्तला के उनके प्रति मधुर स्नेह का स्मरण करते हुए

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अनुरोध किया है कि वे उसे पतिगृह जाने की अनुमति प्रदान करें—सेयं याति शकुन्तला पतिगृहं सर्वैरनुज्ञायताम्। अनन्तर शकुन्तला वनज्योत्स्ना लता को याद कर उनके निकट जाकर कहती है—वनज्योत्स्ने ! आम्रसंगता होने पर भी आज तुम अपनी शाखा रूपी भुजाओं को इधर फैलाकर एक बार मेरा प्रत्यालिङ्गन करो। आज मैं तुमसे बहुत दूर जा रही हूँ। शकुन्तला जाते समय वनज्योत्स्ना को अपनी दोनों सहेलियों के हाथ सौंपती है—हला ! एषा द्वयोर्युवयो हस्ते निक्षेपः ।

कालिदास के मत से प्रकृति की गोद में विहार करते समय मनुष्य के जीवन का पूरा आनन्द मिलता है और प्रकृति के सच्चे सौन्दर्य का दर्शन होता है। शकुन्तला के प्रथम दर्शन के समय राजा दुष्यन्त के मुख से सहसा निकल पड़ता है कि यदि महलों के लिए दुर्लभ यह स्वरूप आश्रमवासिनी बालिकाओं में दीख रहा है तो मानो वनलताओं ने अपने गुणों से उद्यान की लताओं को जीत कर लिया है—

शुद्धान्तदुर्लभमिदं वपुराश्रमवासिनो यदि जनस्य ।
दूरीकृता खलु गुणैरुद्यानलता वनलताभिः ॥

इनके मत से कृत्रिम वातावरण की अपेक्षा वन के प्राकृतिक वातावरण में अधिक सौन्दर्य है। कालिदास के विचार से प्रकृति जड़ पदार्थ नहीं है उन्हें वह भी चेतनों सा व्यवहार करती दिखाई पड़ती है। जैसे चेतन प्राणी दूसरे के सुख-दुःख में सहायता करते हैं वैसे ही प्रकृति भी करती है। शकुन्तला की विदाई के समय तपोवन के वृक्ष विविध प्रकार के वस्त्र एवं आभूषण देकर कण्व का सहयोग करते हैं। पर्वतों के वर्णन में कालिदास अधिक सावधान हैं। मेघदूत में रामगिरि और अलका के मध्यमार्ग में पड़ने वाले पर्वतों का रम्य वर्णन है। कुमारसम्भव में भी हिमालय के वर्णन में उन्होंने कमाल कर दिया है। इसी प्रकार नदी वन आश्रमों के वर्णन में वे तन्मय दिखाई पड़ते हैं। गंगानुराग उन्हें उल्लसित कर देता है। वृक्षों के वर्णन में इन्हें आनन्द मिलता है। कुसुमों की सुषमा से वे अभिभूत हैं। कालिदास का प्रकृतिज्ञान केवल सहानुभूति मूलक ही नहीं है, अपितु सूक्ष्मतया सटीक है। हिमालय की हिमराशि, पवन का सङ्गीत, एवं गंगा की शक्तिशालिनी धारा ही नहीं, किन्तु छोटी-छोटी सरिताएँ विटप पुष्प भ्रमर आदि भी उनकी सृष्टिव्यापिनी दृष्टि से ओझल नहीं हैं। कालिदास के आराध्यदेव भगवान् सदाशिव हैं उन्हें उनका दर्शन भी प्रकृति के आठ रूपों में ही होता है। इसीलिए उन्होंने शकुन्तला के मङ्गलाचरणमें अष्टमूर्ति भगवान् शङ्कर से ही विश्वकल्याण की कामना के साथ-साथ अपना भी कल्याण चाहा है—

प्रत्यक्षाभिः प्रपन्नस्तनुभिरवतु वस्ताभिरष्टाभिरीशः ।

इन्होंने रघुवंश में समुद्र से नदियों के मिलने का दृश्य अत्यन्त सरस चित्रित किया है। जैसे दूसरे लोग केवल स्त्रियों का अधर पान करते हैं, अपना अधर उन्हें नहीं पिलाते, किन्तु समुद्र का ढंग निराला है, क्योंकि जब नदियाँ ढीठ होकर अपना मुँह इसके सामने बढ़ाती हैं तब यह बड़ी चतुरता से अपना तरङ्गरूपी अधर उन्हें पिलाता है उनका अधर स्वयं पीता है—

मुखार्पणेषु प्रकृतिप्रगल्भाः स्वयं तरङ्गाधरदानदक्षः ।
अनन्यसामान्यकलत्रवृत्तिः पिबत्यसौ पाययते च सिन्धुः ॥

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कालिदास का शास्त्रीय ज्ञान

महाकवि कालिदास की रचनाओं के अनुशीलन से ज्ञात होता है कि उन्हें संस्कृत साहित्य के मौलिक ग्रन्थों का पर्याप्त ज्ञान था। उनकी कृतियों में यत्र-तत्र प्रसंगवश उपनिषद्, पुराण, महाभारत, दर्शन, धर्मशास्त्र, ज्योतिष, व्याकरण, साहित्यशास्त्र आदि के सिद्धान्तों के स्पष्ट उल्लेख उपलब्ध होते हैं। महाकाव्य रघुवंश के मङ्गलाचरण—

वागर्थाविव सम्पृक्तौ वागर्थप्रतिपत्तये।
जगतः पितरौ वन्दे पार्वतीपरमेश्वरौ॥

में उन्होंने काव्य का लक्षण “शब्दार्थौ काव्यम्” निर्दिष्ट किया है। इसी प्रकार वे अपने व्याकरण ज्ञान की प्रौढता को भी व्यक्त करते चलते हैं। वागार्थाविव इस अंश में ‘इवेन सह समासो विभक्त्यलोपश्च’ इस वार्तिक का तथा ‘पितरौ’ में “पिता मात्रा १।२।७०” इस पाणिनीय सूत्र का स्मरण दिलाते हुए वे अपनी व्याकरण विदग्धता को प्रदर्शित करते हैं। इसी प्रकार पन्द्रहवें सर्ग में बालिवध के प्रसङ्ग पर व्याकरण में उपमा की हृदयाकर्षक छटा दिखाते हैं—

स हत्वा बालिनं वीरस्तत्पदे चिरकाङ्क्षिते।
धातोः स्थान इवादेशं सुग्रीवं सन्न्यवेशयत्॥ १२।५८

अर्थात् उस राम ने बालि को मारकर धातु के स्थान पर आदेश के समान (अस् धातु के स्थान पर ‘अस्तेर्भू’ सूत्र से विहित भू आदेश के समान तथा पा धातु से पाघ्राध्मा सूत्र से विहित आदेश के समान) सुग्रीव को चिरकाल से अभिलषित उस बालि के स्थान पर रखा। रघुवंश के तृतीय सर्ग में उनका ज्योतिष विषयक परिपक्व ज्ञान परिलक्षित होता है—

ग्रहैस्ततः पञ्चभिरुच्चसंश्रयैरसूर्यगैः सूचितभाग्यसम्पदम्।
असूूत पुत्रं समये शचीसमा त्रिसाधना शक्तिरिवार्थमक्षयम्॥ ३।१३

अर्थात् अनन्तर इन्द्राणी के समान रानी सुदक्षिणा ने प्रसव का समय (दसवां महीना) होने पर उच्च स्थान में स्थित सूर्य के सान्निध्य से अस्त को नहीं प्राप्त हुए पांच ग्रहों के द्वारा जिसकी भाग्य सम्पत्ति सूचित हो रही है। ऐसे पुत्र को प्रभाव, उत्साह एवं मन्त्र इन तीन उपायों से सम्पन्न होने वाली शक्ति जैसे अक्षय अर्थ को उत्पन्न करती है वैसे ही उत्पन्न किया।

शकुन्तला के पञ्चम अङ्क में रानी हंसपदिका के सस्वर गीत को सुनकर राजा दुष्यन्त उसकी प्रशंसा करते हुए कहते हैं कि ‘अहो रागपरिवाहिणी गीतिः’ रघुवंश के प्रथम सर्ग में रानी सुदक्षिणा और राजा दिलीप को अपने कुलगुरु महर्षि वशिष्ठ के आश्रम में जाते समय कवि ने अपनी संगीत विदग्धता का परिचय देते हुए कहा है—

मनोऽभिरामा शृण्वन्तौ रथनेमिस्वनोन्मुखैः।
षड्जसंवादिनीः केका द्विधाभिन्ना शिखण्डिभिः॥ १ ३६

अर्थात्—रथ के चक्रप्रान्ति के शब्द को सुनकर ऊपर मुख किये हुए मयूरों द्वारा दो प्रकार की हुई षड्ज स्वर का अनुसरण करने वाली तथा मन को प्रसन्न करने वाली वाणी को सुनते हुए वे दोनों सुदक्षिणा और दिलीप चले।

कुमार संभव के द्वितीय सर्ग में ब्रह्म और जगत् की एकात्मकता, ब्रह्म की जगत् रूप

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कार्य के रूप में परिणत आदि बातें बड़ी चारुता के साथ काव्यात्मक सरल शैली में वर्णित की गई हैं। जैसे—

नमस्त्रिमूर्तये तुभ्यं प्राक् सृष्टेः केवलात्मने । गुणत्रयविभागाय पश्चात् भेदमुपेयुषे ॥ २।४

अर्थात् हे भगवन् ! संसार को रचने के पहले एक ही रूप में रहने वाले पर, जब संसार रचने लगते थे उस समय सत्त्व, रज एवं तम तीन गुण उत्पन्न करके ब्रह्मा, विष्णु और महेश नाम से तीन रूप के बन जाने वाले आपको प्रणाम है।

इसी प्रकार रघुवंश के प्रथम सर्ग में—

वैवस्वतो मनुर्नाम माननीयो मनीषिणाम् । आसीन्महीक्षितामाद्यः प्रणवश्छन्दसामिव ॥ १।११

आदि श्लोकों से वे यज्ञ आदि-कर्मकलाप के ज्ञान के साथ ही वेदोच्चारणविधि का प्रचार भी सूचित करते हैं तथा उनकी कृतियों में नीतिशास्त्र, अर्थशास्त्र तथा पुराणों की प्रधान प्रधान बातें यथावसर व्यक्त होती रहती हैं । रघुवंश में रघु और इन्द्र के साथ युद्ध से तथा अभिज्ञानशाकुन्तल के सप्तम अङ्क में विदूषक पर आक्रमण के समय दुष्यन्त के शब्दवेधी बाण चलाने की कला से कविवर कालिदास के युद्धविषयक ज्ञान की सूचना मिलती है । तथा शकुन्तला के षष्ठ अङ्क में तूलिका से दुष्यन्त द्वारा चित्रित शकुन्तला विषयक चित्रकला और मूर्तिकला अनुशीलन करने पर कालिदास की चित्रकला का पर्याप्त ज्ञान प्रतीत होता है । इस प्रकार रघुवंश कुमारसम्भव शकुन्तला आदि में विभिन्न शास्त्रों के ज्ञान के पर्याप्त उदाहरण भरे पड़े हैं ।

संस्कृत नाटकों के उद्भव तथा विशेषता का विवेचन

संस्कृत साहित्य में नाटकों की एक विशिष्ट परम्परा रही है। लोकप्रियता के कारण भारत में नाट्यकला का प्रयोग अत्यन्त प्राचीन काल से होता चला आया है। ऋग्वेद के सूक्तों में सोमविक्रय के समय मनोरञ्जनात्मक अभिनय का संकेत प्राप्त होता है । पुरुरवा-उर्वशी, यम-यमी, इन्द्र-इन्द्राणी, वृषाकपी आदि के संवाद सूक्तों में नाटकीय कथनोपकथन उपलब्ध होते हैं। यजुर्वेद में शैलूष शब्द का स्पष्ट उल्लेख है, जो नट अथवा अभिनेता का समानार्थी है। वाल्मीकीय रामायण में नट, नर्तक तथा शैलूष शब्दों का उल्लेख है ।

इस प्रकार तत्कालीन जन जीवन में धार्मिक अवसर, संगीत समारोह तथा नृत्योत्सवों से नाटक का विशेष सम्बन्ध था ।

उत्तरवर्ती साहित्य में नाट्यकला की शिल्पविधियों का पूरा इतिहास दिखाई देता है । रामायण के एक प्रसंग में कहा गया कि नटों, नर्तकों और गायकों की मण्डलियों की कर्ण सुखद वाणियों को जनता पूरी तन्मयता से सुनती थी—

नटनर्तकसंघानां गायकानां च गायताम् । यतः कर्णसुखा वाचः शुश्राव जनता ततः ॥

महाभारत में नट, नर्तक, गायक, सूत्रधार आदि का निर्देश है । हरिवंश पुराण में रामचरित नाटक प्रदर्शित किये जाने का संकेत है । महाभारत के अनुसार प्रद्युम्नविवाह के प्रसंग में वसुदेव जी के यज्ञ के अवसर पर भद्रनामक नट ने अपने आकर्षक नाट्य-प्रदर्शन से उपस्थित ऋषि-महर्षियों को प्रसन्न किया था जिसके फलस्वरूप उसने आकाश-

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विचरण तथा स्वेच्छया रूप धारण करने का वरदान प्राप्त किया था। महर्षि पाणिनी ने अपनी अष्टाध्यायी में शिलालि तथा कृशाश्व के द्वारा रचित नाट्य सूत्रों का उल्लेख किया है। भगवान् पतञ्जलि ने अपने महाभाष्य में कंसवध तथा बालिवध नामक नाटकों के अभिनय का वर्णन किया है। वात्स्यायन ने अपने कामसूत्र में नागरिकों के मनोवर्णन करते हुए नटों के द्वारा अभिनीत नाटकों के प्रदर्शन का उल्लेख किया है। कौटिल्य के अर्थशास्त्र के अध्ययन से पता चलता है कि ललित कला की शिक्षा के लिए उस समय राज्य की ओर से पूर्ण प्रबन्ध था। इन बातों से प्रमाणित होता है कि वैदिक काल से ईसा की प्रथम शताब्दी तक हमारे देश में नाटकों का अभिनय क्रमशः चला आ रहा था।

इसलिए यह निर्विवाद सत्य है कि संस्कृत साहित्य में नाटकों के निर्माण की परम्परा बहुत पुरानी है और आदि काल से ही भारतीय जन जीवन के मनोरंजन के लिए नाटकों को श्रेष्ठ माध्यम के रूप में अपनाया जाता था।

भरत मुनि ने अपने नाट्यशास्त्र में जो नाटकीय कला की उत्पत्ति का विवरण उपस्थित किया है उसके अनुसार इन्द्रादि-देवताओं के अनुरोध पर स्वयं ब्रह्माजी ने ऋग्वेद से पाठ, यजुर्वेद से अभिनय, सामवेद से गान, और अथर्ववेद से रस लेकर नाट्यवेद नामक पञ्चम वेद की रचना की तथा धर्म, क्रीडा, हास्य, युद्ध आदि भावों का प्रदर्शन इसका विषय कह कर इसे देवता और दैत्य दोनों के लिए ग्राह्य बताया और नाट्यशास्त्र में अभिनय के लिए वर्ग, आयत, या त्रिभुज के आकार वाले प्रेक्षागृहों के निर्माण की नियमविधि का उल्लेख किया है। इस प्रकार नाट्यकला का मूल सम्बन्ध धर्म से था, आगे चलकर इसने स्वतन्त्र साहित्यिक रूप ग्रहण कर लिया। संस्कृत के नाटककारों ने अपने नाटकों की कथावस्तु धर्म ग्रन्थों से लेकर जनता की रुचि में ढालकर देश, काल और परिस्थितियों के अनुसार जनरञ्जन की दृष्टि से नाटकों की योजना की। भरत मुनि के मतानुसार नाट्य तीनों लोकों के भावों का अनुकरण है त्रैलोक्यस्य सर्वस्य नाट्यं भावानुकीर्तनम्। भरतमुनि का सिद्धान्त है कि नाटक में सभी प्रकार का ज्ञान, शिल्प, विद्याएं और शास्त्र समन्वित रहते हैं। वह वेदविद्या है इतिहास है और उसमें योग सदाचार एवं समाज को विनोद प्रदान करने के साधन विद्यमान हैं। इस मत का अनुमोदन महाभाष्य के कंसवध और बालिवध के अभिनय के वर्णन में किया गया है—

न तज्ज्ञानं न तच्छिल्पं न सा विद्या न सा कला। न स योगो न तत्कर्म नाट्येऽस्मिन् यन्न दृश्यते ॥ १।१०६

पाश्चात्य विद्वानों ने इस परम्परानुमोदित मान्यता को अस्वीकार करते हुए अन्यान्य मूल कारणों की उद्भावना की। डा० कीथ के मतानुसार प्राकृतिक परिवर्तनों को जन-साधारण के सामने मूर्तरूप दिखाने की अभिलाषा से ही नाटकों का प्रादुर्भाव हुआ।

जर्मनी के विद्वान् पिशेल ने नाटकों की उत्पत्ति पुत्तलिका नृत्य से बताई है। उसके कथनानुसार उस नृत्य की उत्पत्ति भारतवर्ष में हुई और यहां से इसका प्रचार एवं प्रसार अन्य देशों में हुआ। सूत्रधार एवं स्थापक जैसे शब्दों से इस मत की पुष्टि की गई है। डा० लूडर्स के मत से नाटकों की उत्पत्ति छाया-नाटकों से हुई। इसका समर्थन दूताङ्गद नाम छाया-नाटक से किया गया। नेपाल आदि देशों में प्रचलित इन्द्रध्वज महोत्सव से नाटकों की उत्पत्ति मानी। अनेकों ने सम्वाद सूत्रों से नाट्य का उद्गम प्रतिपादित किया है।

वस्तुतः संस्कृत नाटक भारतीय प्रतिभा की स्वतन्त्र सूझ है और अभिनय की कला में

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भी वह स्वतन्त्र उद्भावना के आश्रित रहा है। संस्कृत के प्राचीन नाटकों के रंगमञ्च पर बालकों के द्वारा नियोजन किये जाने के उदाहरण उपलब्ध हैं। जैसे शकुन्तला का सर्वदमन शेर के बच्चे से खेलते हुए दिखाया गया है। संस्कृत नाटकों में विभिन्न पात्रों के लिए विभिन्न प्रकार की भाषाओं का उपयोग है। नायक तथा प्रमुख पात्र संस्कृत बोलते हैं लेकिन स्त्रियां एवं निम्नकोटि के पात्र प्राकृत के भिन्न-भिन्न रूपों का व्यवहार करते हैं। इस प्रकार की व्यवस्था विश्व के किसी अन्य नाटक परम्परा में प्राप्त नहीं होती।

समीक्षकों ने महाकाव्यों के अनन्तर संस्कृत नाटकों का प्रादुर्भाव भास कवि के स्वप्नवासवदत्तम् तथा प्रतिज्ञायौगन्धरायण नामक नाटकों से माना है। जिनके कथानक रामायण और महाभारत से लिये गये हैं। नाटकों की निर्माण परम्परा में भास कवि के अनन्तर कालिदास का नाम आता है। कालिदास ने अपने मालविकाग्निमित्र की प्रस्तावना में भास, सौमिल्ल, कविपुत्र आदि प्रागवर्ती नाटककारों की चर्चा की है।

संस्कृत साहित्य के उपवन में कालिदास का आगमन एक वसन्त दूत के रूप में माना गया है जिसके कारण उपवन का कोना-कोना पुष्पित हो उठा है। इन्होंने नई साज सज्जाएँ, नई दिशाएँ नये विचार अभिनव भाव, नई-नई पद्धतियाँ प्रस्तुत की हैं ये संस्कृत में सबसे बड़े कवि और सर्वश्रेष्ठ नाटककार हुए हैं।

नाटकों के क्षेत्र में कालिदास ने तीन नाटकों का प्रणयन किया है—मालविकाग्निमित्र, विक्रमोर्वशीय और अभिज्ञानशाकुन्तल। इनमें मालविकाग्निमित्र कवि की आरम्भिक कृति है, जिसमें नाटक नियमों की दृष्टि से कथानिर्वाह, घटनाक्रम, पात्रयोजना आदि सभी नाटककार के असाधारण कौशल की छाप है। अभिज्ञानशाकुन्तल उनकी अन्तिम कृति है, किन्तु उसकी गणना आज विश्व साहित्य की पहली कृति के रूप में की जाती है। प्रेम और सौन्दर्य का ऐसा सरस, हृदयग्राही एवं मर्मस्पर्शी चित्रण अन्यत्र देखने को नहीं मिलता। उसमें ओज के साथ मनोज्ञता और लघुत्व के साथ प्राञ्जलता का अद्भुत समन्वय हैं। शकुन्तला की सरलता अपराध में, दुःख में, अज्ञानता में, धैर्य में और क्षमा में परिपक्व है गम्भीर तथा स्थायी है। गेटे की आलोचना के अनुसार शकुन्तला के आरम्भिक तरुण सौन्दर्य ने मंगलमय परम परिणत सफलता लाभ करके मर्त्य को स्वर्ग के साथ संमिलित कर दिया है।

गणदास ने कहा है कि यह नाट्य देवताओं के नेत्रों का प्रसाधन करने वाला यज्ञ है। स्वयं शिवजी ने उमा से विवाह करके अपने शरीर में इसके अपने शरीर दो भाग कर दिये एक ताण्डव और दूसरा लास्य। इनमें सत्त्व, रज और तम तीनों गुण भी दिखाई पड़ते हैं। और अनेक रसों में लोकचरित लक्षित होते हैं। इसलिए भिन्न भिन्न रुचि वालों के लिए प्रायः नाटक ही एक ऐसा उत्सव है, जिससे सबको समान आनन्द मिलता है—

देवानामिदमामनन्ति मुनयः शान्तं क्रतु चाक्षुषं रौद्रेणैतदुमाकृतव्यतिकरे स्वाङ्गे विभक्तं द्विधा। त्रैगुण्योद्भवमत्र लोकचरितं नानारसं दृश्यते नाट्यं भिन्नरुचेर्जनस्य बहुधाप्येकं समाराधकम् ॥

अभिज्ञानशाकुन्तल का उत्कर्ष

कालिदास का काव्य सरस्वती का सर्वोत्कृष्ट प्रसाद अभिज्ञान शाकुन्तल है। सौन्दर्य

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की मादकता, प्रेम की निश्चलता, प्रकृतिजन्य सरलता, ऋषिकुल की उदारता, महर्षि कण्व का आदर्श वात्सल्य, दुर्वासा का निर्ममदण्ड, वासना का प्रक्षालन, आत्मा का निर्मलीकरण तथा संस्कृति के पीयूष संमिलन, श्रेयस् एवं प्रेयस् मनोग्राही ग्रन्थिबन्ध इन सभी उपादानों को एक साथ मिश्रित कर कविवर कालिदास ने अभिज्ञानशाकुन्तल में जो प्रपाणक रस तैयार किया है वह भारतीय जीवन के निमित्त नितान्त मूल्यवान् है। इस नाटक के प्रथम चार अंकों को भोग-भूमि पाँच एवं छः दो अंकों को दण्डभूमि और अन्तिम सप्तम अंक को सिद्धभूमि माना गया है। इस प्रकार यह नाटक कवि की प्रतिभा का अनुपम फल है।

अभिज्ञानशाकुन्तल में कवि की निपुणकला भारतीय संस्कृति के सौरभ में सनकर अधिक अभिराम तथा प्रभविष्णु बन गई है। महाभारत की चालाक तथा बिना शील वाली युवती शकुन्तला नाटक में लजीली सम्मानपूर्ण करुणोत्पादक नायिका में रूपान्तरित हो गई है। इसी प्रकार स्वार्थपरायण राजा दुष्यन्त जो महाभारत में नीति के अनुरोध से उसे न पहचानने का व्याज करता है वही यहां नाटक में ऐसी विस्मृति से अभिभूत चित्रित किया गया है, जिसके लिए उसकी भर्त्सना नहीं की जा सकती, उसका नैतिक चरित्र ऊँचा उठ गया है और वह पराई स्त्री सम्पर्क से विमुख एक आदर्श राजा बन गया है।

अपनी काव्यात्मक प्रतिभा के सहारे कालिदास को दो रूपों सफलता मिली है। प्रथमतः वे काव्योचित भावों के धनी हैं, जिन्हें वे बड़ी निपुणता से चरित्र के साथ मिला देते हैं तथा द्वितीयतः उनमें संयम एवं सन्तुलन की काव्यात्मक भावना है जो किसी नाटककार के लिए सफलता की आवश्यक हेतु हैं। विद्वानों का कथन है कि कालिदास ने अपने नाटकों में नाट्य शास्त्रों के विधानों का प्रायः अनुसरण किया है उनकी रचनाओं में अधिकांश नियमों का प्रतिबिम्ब झलकता है।

यद्यपि कालिदास ने संस्कृत में तीन नाटक लिखे हैं (१) मालविकाग्निमित्र (२) विक्रमोर्वशीय तथा (३) अभिज्ञानशाकुन्तल, किन्तु नाटककार के रूप में उनकी कीर्ति सर्वाङ्गसुन्दर अभिज्ञानशकुन्तल से स्थिर हो सकी है।

समालोचकों ने चरित्रचित्रण, रसपरिपाक भाषासौष्ठव, संविधान के चातुर्य की दृष्टि से अभिज्ञानशाकुन्तल को संस्कृत नाटकों में सर्वश्रेष्ठ माना है। कलकत्ता हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस सर विलियम जोंस ने एक संस्कृत के पण्डित की सहायता से १७८६ ई० में अभिज्ञानशाकुन्तल नाटक का अंग्रेजी में अनुवाद किया। जिसने यूरोपीय विद्वानों की मनोदृष्टि भारतीय नाट्य प्रतिभा की प्रतीति से चकित एवं मुग्ध कर दिया। उसके अनन्तर कई यूरोपीय भाषाओं में उसके अनुवाद भी हुए। इस समय तो विश्व की कोई भी ऐसी भाषा नहीं है, जिसमें अभिज्ञान शाकुन्तल नाटक का अनुवाद न हुआ हो।

इस नाटक के सप्तम अंक में सर्वदमन का अकृत्रिम हास्य, तोतली बोली का वर्णन तथा शेर के बच्चों के साथ बालक्रीड़ा पढ़कर शेजी नाम के एक फ्रेञ्च विद्वान् को इतना आनन्द आया कि वह नाचने लगा। विश्वविख्यात जर्मनकवि गेटे ने इस नाटक का अनुवाद पढ़कर आनन्द विभोर होकर कहा था कि यदि स्वर्ग और पृथ्वी को बातें एक जगह देखना हो तो अभिज्ञान शाकुन्तल का अध्ययन करो। इस प्रकार अभिज्ञान शाकुन्तल को लोकप्रिय होने के कारण समीक्षकों का यह कहना सर्वथा संगत प्रतीत होता है कि कालिदास के ग्रन्थों में अभिज्ञान शाकुन्तल सर्वोत्कृष्ट है—कालिदासस्य सर्वस्वमभिज्ञानशाकुन्तलम्।

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अनन्त कथारत्नों के सागर महाभारत के आधार पर कालिदास ने इस नाटक की रचना की है। कालिदास के अनुपम रचनाकौशल से यह नाटक लोकोत्तर बन गया है। इस नाटक की भाषा अत्यन्त प्रसाद युक्त और रमणीय है। इसमें उपमा अलंकार, उत्प्रेक्षा, स्वभावोक्ति, अर्थान्तरन्यास, काव्यलिङ्ग आदि अलङ्कारों की बहुलता है। इसमें कहीं भी क्लिष्टता, कल्पना की खींचातानी, दूरान्वय आदि दोष नहीं हैं। प्रत्येक पात्र के अनुरूप भाषा रखने में कवि ने पर्याप्त सावधानी रखी है। शकुन्तला तथा उसकी सखियां हमेशा लता वृक्ष आदिकों के सहवास में खेलने और रहने वाली हैं। इसलिए उनकी उक्तियों में आम्र, अतिमुक्तलता, नवमल्लिका आदि वृक्ष एवं लता का उल्लेख है। 'क इदानीं सहकारमन्तरेणातिमुक्तलतां पल्लवितां सहते' 'को नामोष्णोदकेन नवमल्लिकां सिञ्चति।' महर्षि कण्व हमेशा यज्ञ-याग से निरत और अध्यनाध्यार्पन में निमग्न रहते हैं। अतः वे ऐसे दृष्टान्तों का प्रयोग करते हैं जिनका सम्बन्ध यज्ञ एवं अध्ययन से है—'दृष्ट्या धूमाकुलितदृष्टेः यजमानस्य पावके एवाहुतिः पतिता'; 'वत्से ! सुशिष्यपरिदत्ता विद्येवाऽशोचनीया संवृत्ता।' हमेशा खाद्यलोलुप और विनोदी विदूषक के स्वभाव का प्रतिबिम्ब उसके कथन में पड़ा है—'यथा कस्यापि पिण्डखजूरैरुद्वेजितस्य तिन्तिण्यामभिलाषो भवेत् तथैव स्त्रीरत्नपरिभोगिणो भवत इयमभ्यर्थना।' किसी पात्र के भाषण में छोटे-छोटे चटकीले होने से उनको पढ़ते हुए पाठक के मन प्रसन्न हो जाता है।

तत्र श्लोकचतुष्टयम्

अभिज्ञानशाकुन्तल की विशेषता में समालोचकों का कहना है कि संस्कृत के काव्यों में नाटकों की उत्तमता है। उन सबों में अभिज्ञान शाकुन्तल अत्यन्त रमणीय है। उसमें उसका चतुर्थ अङ्क अत्युत्तम है, उसमें भी चार श्लोक आदर्श पूर्ण हैं—

काव्येषु नाटकं रम्यं तत्रापि च शकुन्तला ।
तत्राप्यङ्कस्तुरीयस्तु तत्र श्लोकचतुष्टयम् ॥

ये चारों श्लोक इस प्रकार हैं—

( १ )

यास्यत्यद्य शकुन्तलेति हृदयं संस्पृष्टमुत्कण्ठया
कण्ठस्तम्भितबाष्पवृत्तिकलुषश्चिन्ताजडं दर्शनम् ।
वैक्लव्यं मम तावदीदृशमिदं स्नेहादरण्यौकसः
पीड्यन्ते गृहिणः कथं नु तनयाविश्लेषदुःखैर्नवैः ॥ ४।२

( २ )

पातुं न प्रथमं व्यवस्यति जलं युष्मास्वपीतेषु या
नादत्ते प्रियमण्डनापि भवतां स्नेहेन या पल्लवम् ।
आद्ये वः कुसुमप्रसूतसमये यस्या भवत्युत्सवः
सेयं याति शकुन्तला पतिगृहं सर्वैरनुज्ञायताम् ॥ ४।८

( ३ )

अस्मान् साधु विचिन्त्य संयमधनानुच्चैः कुलं चात्मनः
त्वय्यस्याः कथमप्यबान्धवकृतां स्नेहप्रवृत्तिं च ताम् ।

( २९ )

सामान्यप्रतिपत्तिपूर्वकमियं दारेषु तदर्हस्या त्वया
भाग्यायत्तमत्तः परं न खलु वाच्यं वधूबन्धुभिः ॥ ४।१६

( ४ )

शुश्रूषस्व गुरून् कुरुप्रियसखीवृत्तिं सपत्नीजने
भर्तुर्विप्रकृतापि रोषणतया मा स्म प्रतीपं गमः ।
भूयिष्ठं भव दक्षिणा परिजने भाग्येष्वनुत्सेकिनी
यान्त्येवं गृहिणीपदं युवतयो वामा कुलस्याधयः ॥ ४।१७

कुछ लोग चार श्लोक इस प्रकार मानते हैं :—

( १ ) यास्यत्यद्य शकुन्तला० ( ४।५ )
( २ ) अस्मान् साधु विचिन्त्य० ( ४।१६ )
( ३ ) शुश्रूषस्व गुरून् ( ४।१७ )
( ४ ) अभिजनवतो भर्तुः श्लाघ्ये स्थिता गृहिणीपदे
विभवगुरुभिः कृत्यैस्तस्य प्रतिक्षणमाकुला ।
तनयमचिरात् प्राचीवार्कं प्रसूय च पावनं
मम विरहजां न त्वं वत्से ! शुचं गणयिष्यसि ॥ ४।१८

अथवा—

भूत्वा चिराय चतुरन्तमहीसपत्नी
दौष्यन्तिमप्रतिरथं तनयं निवेश्य ।
भर्त्रा तदर्पितकुटुम्बभरेण सार्धं
शान्ते करिष्यसि पदं पुनराश्रमेऽस्मिन् ॥ ४।१६

अभिज्ञानशाकुन्तल नामकरण का कारण

हस्तिनापुर के चक्रवर्ती राजा दुष्यन्त ने कुलपति कण्व की पोष्यपुत्री शकुन्तला से उनके आश्रम में ही गान्धर्वविधि से विवाह करके अपनी राजधानी को लौटते समय शकुन्तला को अपने नामाक्षरों से अङ्कित एक अंगूठी देकर कहा था कि प्रिये ! इसमें प्रति-दिन एक-एक अक्षर गिनना, जिस दिन अन्तिम अक्षर आयेगा उसी दिन तुमको लेने के लिए मेरा कोई विश्वासी व्यक्ति आयेगा, तब तुम मेरे पास आ जाना ।

उस समय महर्षि कण्व आश्रम पर उपस्थित नहीं थे । शकुन्तला के निमित्त शान्ति के लिए सोमतीर्थ गये हुए थे । आने पर जब उन्हें शकुन्तला के विवाह का समाचार मिला तब उन्होंने शकुन्तला को राजा के पास भेजवा दिया, किन्तु महर्षि दुर्वासा के शाप के कारण राजा उसे पहचान न सका । शकुन्तला ने राजा की दी हुई अंगूठी दिखाकर उसे बीते हुए वृत्तान्त का स्मरण दिलाना चाहा, किन्तु वह अंगूठी उसकी अंगुलि में नहीं थी, दैवात् मार्ग में शक्रावतार या शचीतीर्थ का वन्दन करते समय जल में गिर चुकी थी । निराश होकर शकुन्तला जब राजमहल से बाहर निकली तो, उसकी माँ मेनका अप्सरा ने, एक तेजोमयमूर्ति बनाकर उसे लेकर किंपुरुषवर्ष में, वर्तमान हेमकूट पर्वत पर महर्षि कश्यप के आश्रम पर रख दिया । बाद वहीं उसे सर्वदमन नाम का पुत्र उत्पन्न हुआ, जिसका पीछे भरत नाम पड़ा ।

१ शा० भू०

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इसके अनन्तर राजपुरुषों को एक धीवर के पास वह अंगूठी मिली, उसे चोर समझ-कर कोतवाल ने उस घटना को राजा के पास उपस्थित किया। उस अंगूठी को देखते ही राजा दुष्यन्त को शकुन्तला के साथ गान्धर्व-विवाह का स्मरण हो आया। उसे अपनी भूल पर पश्चात्ताप होने लगा तथा तब से वह शकुन्तला के विरह में दुःखी रहने लगा। इस प्रकार इस नाटक के पञ्चम अंक में अंगूठी रूपी अभिज्ञान से शकुन्तला के पहचाने जाने के वृत्तान्त होने के कारण इस नाटक को अभिज्ञान शाकुन्तल कहते हैं।

इसमें दो अंश हैं—एक अभिज्ञान और दूसरा शाकुन्तल। अभिज्ञान का अर्थ है पहचानने का साधन—अभिज्ञायतेऽनेनेति अभिज्ञानम्। शाकुन्तलं का अर्थ है शकुन्तला विषयक या शकुन्तला सम्बन्धी—शकुन्तलाया इदं शाकुन्तलम्। अभिज्ञानशाकुन्तल की व्युत्पत्ति कई प्रकार से की जाती है (१) अभिज्ञानं=अभिज्ञानभूतं तत् शाकुन्त-लम् इति अभिज्ञान शाकुन्तम्। अर्थात् शकुन्तलाविषयक वह नाटक जो अभिज्ञान स्वरूप हो (२) अभिज्ञानेन स्मृतं शाकुन्तलं=शकुन्तलाविषयकं वृत्तान्तं यस्मिन् तत् अभिज्ञानशाकुन्तलम्—अर्थात् शकुन्तलाविषयक विवाह का वृत्तान्त में जिसमें निशानी के रूप में स्मृत हो आया हो। (३) अभिज्ञानं=परिचयस्वरूपं शाकुन्तलं=शकुन्त-लासम्बन्धिचरितं यत्र=नाटके तत् अभिज्ञानशाकुन्तलम्। अर्थात्, जिस नाटक में शकुन्तला का परिचयमय वैवाहिक वर्णन हो। (४) अभिज्ञानप्रधानं शाकुन्तलं यस्मिन् नाटके तत् अभिज्ञानशाकुन्तलम्। अर्थात् जिस नाटक में शकुन्तला का विवाह आदि वृत्तान्त अभिज्ञान प्रधान हो (५) अभिज्ञानं च शकुन्तलां च अभिज्ञानशकुन्तले ते अधिकृत्य कृतं नाटकमिति अभिज्ञानशाकुन्तलम्। अर्थात् शकुन्तला के विषय में निशानी या परिचय जिस नाटक में निबद्ध हो उसे अभिज्ञानशाकुन्तल कहते हैं। (६) अभिज्ञानेन स्मृता शकुन्तला अभिज्ञानशकुन्तला तामधिकृत्य कृतं नाटकमिति अभिज्ञान शाकुन्तलम्। अर्थात्—जिस नाटक में अभिज्ञान से स्मृत शकुन्तला को विषय बनाकर वर्णन किया गया हो उस नाटक को अभिज्ञानशाकुन्तलं कहते हैं। (७) कुछ प्राचीन प्रतियों में 'अभिज्ञानशकुन्तलम्' इस प्रकार का पाठ मिलता है जिसके अनुसार व्युत्पत्ति होगी अभिज्ञानेन स्मृता=स्मृतिपथमानीता शकुन्तला अभिज्ञानशकुन्तला यस्मिन् तत् अभिज्ञानशकुन्तलम्। अर्थात् जिस नाटक में शकुन्तला निशानी अंगूठी के रूप में स्मृत की गई हो वह नाटक अभिज्ञानशकुन्तलम् है।

आदिकाव्य वाल्मीकीय रामायण में भी अभिज्ञान शब्द पहचान के साधन अर्थ में प्रयुक्त है। सम्भवतः कालिदास ने वहीं से अभिज्ञान पद लेकर इस नाटक में भी प्रयुक्त किया है। सुन्दर काण्ड में हनुमान् जी ने सीता जी से कहा था—देवि ! यदि मेरे साथ आपको चलने की इच्छा नहीं है तो कृपया आप कोई अपनी पहचान ही दे दीजिए जिससे श्रीरामजी यह जान लें कि मैंने आपका दर्शन किया है—

अभिज्ञानं प्रयच्छ त्वं जानीयाद् राघवो यतः । ३८।१०

इसके उत्तर में सीताजी ने कहा—

इदं श्रेष्ठमभिज्ञानं ब्रूयास्त्वं तु मम प्रियम् । ३८।१२

इस प्रकार चित्रकूट पर्वतपर शक्रसुत जयन्त की कथा का स्मरण कराकर मणि देने के पश्चात् सीताजी हनुमानजी से बोलीं: मेरे इस चिह्न को श्रीराम भलीभांति जानते हैं। इसे

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देख कर वे एक ही साथ तीन व्यक्तियों का स्मरण करेंगे-मेरा, माता कौशल्या का तथा महाराज दशरथ का—

मणिं दत्वा ततः सीता हनूमन्तमथाब्रवीत् । अभिज्ञानमभिज्ञातमेतद् रामस्य तत्त्वतः ॥ मणिं दृष्ट्वा तु रामो वै त्रयाणां संस्मरिष्यति । वीरो जनन्या मम च राज्ञो दशरथस्य च ॥ ६६।१-२ ॥

अभिज्ञानशाकुन्तल की कथा का मूल आधार

कविवर कालिदास ने अपने अभिज्ञान शाकुन्तल का कथानक महाभारत के आदिपर्व में वर्णित शकुन्तलोपाख्यान से ग्रहण किया है। अभिज्ञानशाकुन्तल के कथानक का मूल आधार महाभारत है। महाभारत के आदिपर्व ६९ वे अध्याय से ७४ वे अध्याय तक ६ अध्यायों के शकुन्तलोपाख्यान में राजा दुष्यन्त तथा महर्षि कण्व की पुत्री शकुन्तला के कथानक का वर्णन है। पद्मपुराण के स्वर्ग खण्ड में भी दुष्यन्त और शकुन्तला की कथा लिखी गई है, किन्तु पद्मपुराण की कथा की अपेक्षा महाभारत का कथानक प्राचीन सीधा-सादा तथा स्वाभाविक प्रतीत होता है। कविवर कालिदास ने महाभारत के सीधे-सीधे आख्यान को अपनी कला से परिष्कृत कर के एक नया सा रूप दे दिया है। उन्होंने अपनी उद्भावनाओं नाटकीय तत्त्वों से उसमें मनोहरता ला दी है।

पद्म पुराण की कथा में महाभारत तथा अभिज्ञानशाकुन्तल का मिश्रण है। समालोचकों का कहना है कि अभिज्ञानशाकुन्तल के अंशों को जोड़-जोड़कर पद्मपुराण की कथा बनाई गई है। इसके अन्त का भाग कालिदास के शाकुन्तल का सार-मात्र है। यह कथा अभिज्ञान शाकुन्तल से लेकर अपनी शैली में लिख ली गई है। अतः पद्मपुराण का अधिक हिस्सा बाद का रचा प्रतीत होता है। इस प्रकार अभिज्ञानशाकुन्तल के कथानक का आधार महाभारत मानना अधिक संगत है।

महाभारत के आख्यान का संक्षेप—

महाभारत के आदिपर्व में वर्णित शकुन्तलोपाख्यान का सारांश इस प्रकार है। एक बार चन्द्रवंशी राजा दुष्यन्त शिकार खेलते-खेलते कुलपति कण्व के आश्रम में जा पहुँचे, परन्तु उस समय महर्षि कण्व आश्रम में उपस्थित नहीं थे, वे फल लाने के लिए वन में गये हुए थे। उनकी अनुपस्थिति में उनकी पोष्यपुत्री शकुन्तला राजा का स्वागत करती है। उसके अपूर्व सौन्दर्य का अवलोकन कर राजा दुष्यन्त के मन में काम की भावना अङ्कुरित हो उठती है। उनके पूछने पर उसने विश्वामित्र से अपना उत्पत्ति-वृत्तान्त कह सुनाया। जब राजा को यह मालूम हो गया कि वह क्षत्रिय की कन्या है तब उन्होंने उसके प्रति अपना प्रेम व्यक्त किया और प्रलोभनों के साथ विवाह का प्रस्ताव रखा। इस पर शकुन्तला ने शर्त रखी कि आपके बाद मेरे पुत्र को ही राजसिंहासन मिलना चाहिए। राजा यह शर्त स्वीकार कर लेता है कि तुम्हारा पुत्र ही मेरे राज्य का उत्तराधिकारी होगा। परिणामतः दोनों गान्धर्व-विधि से प्रणय-सूत्र में आबद्ध हो जाते हैं। राजा ने उसका पाणिग्रहण कर उसके साथ सहवास किया जिससे वह गर्भवती हो गई। राजा उसके साथ कुछ देर तक रहा, बाद उसे आश्वासन देकर कि मैं नगर पहुँच कर तुम्हें ले जाने के लिए किसी विश्वास-पात्र व्यक्ति को भेजूंगा हस्तिनापुर वापस लौट आता है। मार्ग में वह सोचता जाता है कि ऋषि

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की आज्ञा के बिना ही मैंने उनकी कन्या का पाणिग्रहण कर लिया है, जब यह समाचार उन्हें मालूम होगा, न जाने वे क्या करेंगे ?

राजा के चले जाने के बाद महर्षि कण्व आश्रम पर आये और उन्होंने अपने तपोबल से दुष्यन्त के साथ शकुन्तला के गान्धर्व-विवाह का वृत्तान्त जान लिया और उस पर अपनी स्वीकृति दे दी। इस घटना के तीन वर्ष बाद शकुन्तला को एक पुत्र पैदा हुआ, जिसका विधिवत् जातकर्म आदि संस्कार कण्व जी ने किया और शिशु का पालन पोषण किया। ६ वर्ष की अवस्था में ही उस बालक में बल और पराक्रम स्पष्ट दिखाई देने लगा। वह शेर के बच्चों को पकड़-पकड़कर उनके साथ खेलता था उनका दाँत गिनता था और बलपूर्वक वन्यपशुओं को पकड़कर उन्हें पेड़ों में बाँध देता था। इस अद्भुत पराक्रम को देखकर ऋषि ने उसका नाम सर्वदमन रख दिया। इस प्रकार नौ वर्ष के काल तक शकुन्तला तपोवन में रही। उसे तपोवन में रखना ऋषि को उचित नहीं प्रतीत हुआ। अतः वे पुत्र सहित शकुन्तला को तपस्वियों के साथ राजा के पास हस्तिनापुर भेज देते हैं।

जब शकुन्तला राजा के पास सामने पहुँचती है तब राजा पहचानते हुए भी कह देता है कि मैं तुम्हें नहीं पहचानता; यह पुत्र मेरा नहीं है; तुम स्वतन्त्र हो जहाँ जी चाहे जाओ। राजा की बात सुनकर शकुन्तला अवाक् हो गई उसने सत्य और धर्म की दुहाई दी, किन्तु राजा ने एक भी न मानी। अन्त में निराश होकर वह लौटने लगती है। इतने में आकाशवाणी होती है—राजन् ! शकुन्तला सत्य कहती है यह तुम्हारी भार्या है और यह सर्वदमन तुम्हारा ही पुत्र है तुम इन्हें रख लो और धर्मपूर्वक इनका भरण-पोषण करो—'भरस्व पुत्रं दौष्यन्तिं सत्यमाह शकुन्तला'। इस आकाशवाणी को सुनकर पुरोहित तथा मन्त्रियों से सवाल कर राजा उन दोनों को अपना लिया। इस प्रकार आकाशवाणी के द्वारा देवताओं की स्वीकृति मिल जाने पर शकुन्तला निर्दोष सिद्ध हो गई। बाद में राजा शकुन्तला को पटरानी पद पर प्रतिष्ठित करता है। सर्वदमन का भरत नाम रखकर युवराज पद पर आसीन कर देता है।

पद्मपुराण के कथानक का सारांश—

पद्मपुराण में भी राजा दुष्यन्त के द्वारा गान्धर्व-विवाह तक की कथा वैसी ही है जैसी महाभारत में। अन्तर केवल इतना ही है कि महाभारत के अनुसार शकुन्तला ने अपने जन्म की कथा को राजा के पूछने पर स्वयं बताया है किन्तु पद्मपुराण के अनुसार शकुन्तला के जन्म की उत्पत्ति उसकी सखी प्रियम्वदा ने बतलाई है। महाभारत के अनुसार राजा ने शकुन्तला को कोई अभिज्ञान नहीं दिया है, पर पद्मपुराण के अनुसार जाते समय राजा ने शकुन्तला को अपनी अंगूठी दे दी है। पुनः पद्मपुराण के अनुसार सात मास का गर्भ होने तक शकुन्तला महर्षि कण्व के तपोवन में ही रही जबकि अभिज्ञानशाकुन्तल नाटक के अनुसार कुलपति कण्व को दुष्यन्त के साथ शकुन्तला का प्रेम-सम्बन्ध और गान्धर्व-विवाह एवं गर्भवती हो जाने का पता लगते ही उन्होंने तत्काल उसे राजा के पास भेज दिया।

पद्मपुराण के अनुसार जब शकुन्तला हस्तिनापुर राजा के पास जाने लगी तो उसके साथ शार्ङ्गरव, शारद्वत तथा गौतमी के साथ प्रियम्वदा भी जाती है। मार्ग में सरस्वती नदी में स्नान करते समय अंगूठी को शकुन्तला ने प्रियम्वदा को दे दिया, यह अंगूठी प्रियम्वदा

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के हाथ से गिर गई। उसने भय के कारण यह बात शकुन्तला से नहीं जनाया और शकुन्तला भी उससे पूछना भूल गई। राजा के पास पहुँचने पर जब उनको विश्वास दिलाने के निमित्त आवश्यकता पड़ी तब शकुन्तला ने प्रियम्वदा से माँगी, पर प्रियम्वदा ने धीरे से उसके कान में कहा कि वह अंगूठी तो नदी में गिर गई है। यह सुनकर शकुन्तला बेहोश हो गई। इसके अतिरिक्त पद्मपुराण का कथानक अभिज्ञानशाकुन्तल के समान ही है। इस प्रकार महाभारत तथा पद्मपुराण के कथानक में अन्तर दिखाई पड़ता है, किन्तु पद्मपुराण की कथा में महाभारत तथा अभिज्ञानशाकुन्तल का मिश्रण है। इस आधार पर कहा जाता है कि यह कथा शकुन्तला से लेकर उसे अपनी शैली में लिख ली गई है।

मूल कथा में परिवर्तन

कालिदास ने मूलकथा महाभारत से ही ली है पर महाभारत के नीरस कथानक में उन्होंने यत्र-तत्र चमत्कारी परिवर्तन करके उसे सरस बनाकर नया रूप दिया है। मूल कथानक के अनुसार राजा दुष्यन्त शिकार खेलते हुए अपनी सेना के साथ महर्षि कण्व के आश्रम के पास पहुँचने पर अपनी सेना बाहर खड़ी करवाके आश्रम में प्रवेश करते हैं; किन्तु अभिज्ञान शाकुन्तल के अनुसार शिकार खेलते समय राजा की सेना पीछे छूट गई, राजा सूत के साथ आश्रम पर पहुँचते हैं फिर भी सहसा प्रवेश नहीं करते। उन्होंने ऐसे समय पर प्रवेश किया जब तपस्विकन्याओ द्वारा उनसे सहायता प्राप्त करने की चर्चा चल रही थी। यह घटना बड़े स्वाभाविक ढंग से प्रस्तुत की गई है। पीछे सेना का भी उपयोग कवि ने अच्छे ढंग से किया है। राजा को न पाकर सेना उसे खोजती हुई आश्रम के पास आगई वहाँ उसने भगदड़ मचाना शुरू कर दिया। उस समय राजा शकुन्तलासहित सखियों के साथ बातें करने में संलग्न था। सेना द्वारा मचाई भगदड़ समाचार सुनकर वे तपस्विकन्यायें कुटी में चली जाती हैं और राजा इन्हें सान्त्वना देकर व्यवस्था करने के लिए बाहर जाता है।

इस प्रकार कवि ने बड़ी सफाई के साथ शकुन्तला के शील, स्वभाव, लज्जा और मुग्धता की रक्षा की योजना कर शकुन्तला-दुष्यन्त के प्रथम मिलन को प्रस्तुत कर प्रथम अङ्क की समाप्ति कर दी है।

मूलकथा के अनुसार जब राजा दुष्यन्त महर्षि कण्व के आश्रम पर पहुँचे तो उस समय महर्षि फल लाने के लिए वन में गये हुए थे। इसलिए उनकी पोष्यपुत्री शकुन्तला ने उनका आतिथ्यसत्कार किया। राजा पूछने पर उसने स्वयं अपनी उत्पत्ति की कथा राजर्षि विश्वामित्र से मेनका में बतायी। राजा के द्वारा विवाह का प्रस्ताव करने पर उसने उनको महर्षि कण्व के वन से लौटने तक रुकने को कहा, किन्तु राजा के जल्दी करने पर उसने एक प्रगल्भा, व्यवहारनिपुणा, स्पष्टवादिनी महिला के समान इस शर्त के साथ विवाह करना स्वीकार कर लिया कि आपके बाद मेरा ही पुत्र राज्य का उत्तराधिकारी बनेगा। एक अपरिचित व्यक्ति के साथ भोली-भाली तपस्विकन्या का खुल कर इस प्रकार बातचीत करना अस्वाभाविक एवं नीरस प्रतीत होता है। इसके विपरीत अभिज्ञानशाकुन्तल की शकुन्तला लजालु एवं सुकुमारता का प्रतीक है।

इस प्रकार कालिदास की शकुन्तला में हृदय पक्ष की प्रबलता है, तो महाभारत की शकुन्तला में मस्तिष्क पक्ष प्रबल प्रतीत होता है जिसमें व्यापार की प्रवणता-प्रतीत होती है। इसलिए कालिदास ने इस घटना को बदल दिया है। महाभारत में महर्षि फल-फूल

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लाने के लिए वन में गये हुए हैं जहाँ से वे शीघ्र ही ३-४ घण्टे में लौट आये होंगे। इतने अल्प समय में राजा दुष्यन्त और शकुन्तला का उस प्रकार का प्रणयपूर्व मिलन सम्भव नहीं प्रतीत होता। कालिदास के नाटक में महर्षि कण्व शकुन्तला के अनिष्ट शान्ति के लिए प्रवास पर सोमतीर्थ गये हुए हैं। इस अन्तराल में घटित होने वाली आश्रम की घटनाओं के लिए पर्याप्त समय दिया गया है, जो स्वाभाविक सा प्रतीत होता है जिससे कथा में सरसता आ जाती है। यज्ञ के रक्षार्थ तपस्वियों का राजा से ठहरने की प्रार्थना करना, दुष्यन्त शकुन्तला के प्रणय का उद्भव विकास तथा दुर्वासा मुनि के शाप की कल्पना, ये सारी बातें महर्षि कण्व के दीर्घकालीन प्रवास में संभव हो सकती हैं।

सुलभकोप महर्षि दुर्वासा के शाप की चर्चा महाभारत में नहीं है, किन्तु कविवर कालिदास ने शाप की योजना कर दुष्यन्त के साधारण चरित को उठाकर एक आदर्शमय सत्पुरुष के समान समुज्ज्वल बना दिया है। महाभारत के कपटी दुष्यन्त तथा उसके चरित को शाप की सहायता से कालिदास ने स्पृहणीय एवं अनुकरणीय बना दिया है।

महाभारत की कथा के अनुसार शकुन्तला महर्षि कण्व के आश्रम पर ही तीन वर्ष के बाद पुत्र को उत्पन्न करती है, उसके ६ वर्ष के बाद कण्व को स्मरण हुआ कि विवाहिता लड़की को अधिक दिनों तक पिता के घर नहीं रहना चाहिए तब उन्होंने पुत्रसहित शकुन्तला को दुष्यन्त के पास हस्तिनापुर भेज दिया। इस कथा को बेतुकी समझ कर कालिदास ने अपने नाटक में बदल दिया है और विश्वसनीय भारतीय परम्परा का अनुवर्तन किया है। नाटक के अनुसार सोमतीर्थ की यात्रा से लौटने के बाद ही अग्निशाला ने आकाशवाणी के द्वारा दुष्यन्त के साथ शकुन्तला के शरीर के सम्बन्ध की बात ज्ञात होते ही महर्षि कण्व ने तत्काल उसी दिन उसे गौतमी तथा शिष्यों के साथ उसके पति के पास भेज दिया। शकुन्तला गर्भिणी अवस्था में ही दुष्यन्त के पास उपस्थित हुई, उसके इनकार कर देने पर उसकी माँ मेनका ने उसे किंपुरुषवर्ष के हेमकूट पर्वत पर महर्षि कश्यप के आश्रम पहुँचा दिया जहाँ ठीक समय पर शकुन्तला ने सर्वदमन को जन्म दिया। इस परिवर्तन से भी कथा में स्वाभाविकता आ गई है महाभारत के अनुसार ९ वर्ष के बाद कण्व का यह कहना कि विवाहिता लड़की को अधिक दिनों तक पिता के घर में न रहना चाहिए—हास्यास्पद हो जाता है।

कालिदास ने अपने कथानक में शाप तथा उसकी निवृत्ति के निमित्त मुद्रिका की योजना की अभिनव उद्भावना की है। महाभारत का दुष्यन्त कामुक तथा स्वार्थी प्रतीत होता है किन्तु नाटक में शापवाली घटना की योजना से उसका चरित्र उज्ज्वल एवं उदात्त हो जाता है। शाप के कारण शकुन्तला का पति के द्वारा तिरस्कृत होना स्वाभाविक है। इस अवस्था में पाठक दुष्यन्त को दोषी नहीं ठहरा पाते, बल्कि, आश्रम की मर्यादा तोड़ने के लिए शकुन्तला को ही दण्डनीय बताते हैं। वस्तुतः नाटक में विप्रलम्भ शृंगार तथा अन्तिम मिलन का जो हृदयस्पर्शी दृश्य का चित्रण हो गया है वह इसी शापवाली घटना का प्रतिफल है। नाटक में शाप के कारण दुष्यन्त को शकुन्तला का भूल जाना तथा शाप की परिसमाप्ति पर स्मृति जागृत होने कि लिए कवि ने अंगूठी वाली घटना को योजित किया है। दुष्यन्त के दरबार में पहुँचने के पहले अंगूठी का गिरना और पुनः प्रत्याख्यान के बाद उसका मिल जाना बाद में उसे देखकर कण्वाश्रम की सारी घटना का स्मरण हो आना ये बातें बड़ी निपुणता एवं स्वाभाविकता के साथ संयोजित की गई है।