अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)
Adbhut Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र) द्वारा
स्रोत: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (उद्गम)
(१२२) अद्भुतरामायण [त्रयोविंशति-
दीर्घजंघा महारावा मुंडमालाविभूषणा ॥ अस्थिकंकिणिका भीमा भीमवेगपराक्रमा ॥ ९ ॥ खरस्वरा महाघोरा विकृता विकृतानना, ॥ चतुर्भुजा दीर्घतुंडा शिरोऽलंकरणोज्ज्वला ॥ १० ॥
दीर्घजंघा महाशब्दवाली मुण्डमालाके भूषणोंवाली हड्डियोंकी क्षुद्रघण्टिका पहरे भीम वेग पराक्रमवाली ॥ ९ ॥ तीक्ष्ण शब्दवाली महाघोर विकृतमुखवाली चार भुजा दीर्घतुण्ड उज्ज्वल शिरके भूषण पहरे ॥ १० ॥
ललज्जिह्वा जटाजूटैर्मण्डिता चण्डरोमिका ॥ प्रलयांभोदकालाभा घंटापाशविधारिणी ॥ ११ ॥ अवस्कंद्य ॐ रथात्तूर्णं खड्गखर्परधारिणी ॥ श्येनीव रावणरथे पपात निमिषान्तरे ॥ १२ ॥
चलायमानजिह्वा जटाजूटसे मण्डित चण्डरोमवाली प्रलयसागर और कालके समान घंटापाशको धारण करनेवाली ॥ ११ ॥ पुष्पकसे शीघ्रतासे उतरकर खड्ग खर्पर धारण किये वाजिनीके समान रावणके रथपर टूट पडी ॥ १२ ॥
शिरांसि रावणस्याशु निमेषान्तरमात्रतः ॥ खड्गेन तस्य चिच्छेद सहस्राणीह लीलया ॥ १३ ॥ अन्येषां योद्धृवीराणां शिरांसि नखरेण हि ॥ भिन्ना निपातयामास भूमौ तेषां दुरात्मनाम् ॥ १४ ॥
एक निमेषमात्रमेंही लीलासे रावणके सहस्र शिर खड्गसे काट डाले ॥ १३। और भी वीर योध्दाओंके शिर नखोंसे तोड तोडकरं पृथिवीमें डाल दिये ॥ १४ ॥
केषांचित्पाटयामास नख कोष्ठानि जानकी ॥ खड्गेन चाच्छिनत्कांश्चित्क्रूरान्यादांश्च चिच्छिदे ॥ १५ ॥ खण्डं खण्डं चकारान्यांस्तिलशः कांश्चिदेव हि ॥ अन्त्राण्यन्यस्याचकर्ष पादाघातेन कांश्चन ॥ १६ ॥
किन्हींके कोष्ठ नखोंसे चीर डाले, किन्हींके चरण आदि अंग खड्गसे काट डाले ॥ १५ ॥ किन्हींके अंग खड्गसे तिलके वरावर काटकर चूर्णकर दिये, किसीको चरणाघात कर आंतें निकालकर खेंचन लगी ॥ १६ ॥
पार्श्वेन निजघानान्यान्याष्णिनान्यानपोथयत् ॥ कांश्चिच्छरीरवातेन दृष्ट्वाप्यन्यानपातयत् ॥ १७ ॥ प्रलयं कुर्वती सीता राक्षसानां भयंकरी ॥ निजघानाट्टहासेन कांश्चित्पृष्ठे द्विधाकरोत् ॥ १८ ।
* पुष्पादित्यर्थः । सम्पार पुष्पकं रथमित्यत्र पुष्पंके रथशब्द प्रयोगात् ।
सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (१२३)
सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (१२३)
पार्श्वभागसे इधर उधरके राक्षसोंको प्रहार करने लगी, किन्हींको शरीरकी पवनोंसे नष्ट करती हुई ॥ १७ ॥ वह राक्षसोंको भयदायक प्रलय करने लगी, किसीको अट्टहास कर पृष्ठभागसे दो टुकडे करती हुई ॥ १८ ॥
कांश्चित्केशांन्समाकृष्य निष्पिपेष महीतले ॥ सारथान्सगजान्सा-
श्वान्सगदासहतोमरान् ॥ १९ ॥ कांश्चिद्योधान्समाकृष्य मज्जया-
मास वारिधौ ॥ गले चोद्वेष्ट्य केषांचित्प्राणाञ्जग्राह जानकी ॥२०॥
किन्हींके केश पकडकर पीस डालती हुई रथ हाथी घोडे तोमरोंसहित ॥ १९ ॥ खैंचकर किसीको सागरमें डुबाती हुई, किसीका गला घोटकर जानकीने प्राण हरण कर लिये ॥ २० ॥
केषांचित्स्कंध आरुह्य शिरांस्युत्पाटितानि हि ॥ हुंकारेणाट्टहासेन
कांश्चित्प्राणानहापयत् ॥ २१.॥ कांश्चित्प्रचूर्ण्य वदनं पशुमारम-
मारयत् ॥ तान्सर्वान्निमिषेणैव निहत्य जनकात्मजा ॥ २२ ॥
किन्हींके कंधेपर कूदकर शिर तोड़ती हुई, किन्हींके प्राण अट्टहास और हुंकारसे हरण कर लिये ॥ २१ ॥ किन्हींके वदनको चूर्ण कर पशुओंके समान मार डाला. इस प्रकार एक निमेषमात्रमें जानकी उन सबको मारकर ॥ २२ ॥
तेषामंत्रेण शिरसां मालाभिः कृतभूषणा ॥ रावणस्य शिरांस्यु-
ग्राण्यादाय रणमूर्द्धनि ॥ २३ ॥ कंदुकक्रीडनं कर्तुं मनश्चक्रे मन-
स्विनी ॥ एतस्मिन्नंतरे तस्यां रोमकूपेभ्य उद्गताः ॥ २४ ॥
उनके शिरोंकी माला बनाकर धारण करती हुई और रणस्थलमें वे रावणके शिर लेकर ॥ २३ ॥ उनसे वह मनस्विनी गेंदका खेल करनेकी इच्छा करने लगी इसी अवसरमें उसके रोमकूपसे निकलकर ॥ २४ ॥
मातरो विकृताकाराः साट्टहासाः समाययुः ॥ सह कंदुकलीलार्थं
सीतया ताः सहस्रशः २५ ॥ तासां कासांचिदाख्यास्ये नामानि
शृणुसुव्रत ॥ याभिर्व्याप्तास्त्रयो लोकाः कल्याणीभिश्चराचराः । २६
विकृत आकारवाली माताएँ हँसती हुई प्राप्त हुईं, वह सहस्रों कंदुक क्रीडामें जानकीको सहायता देने लगीं ॥ २५ ॥ हे सुव्रत उनमें किन्हींके नाम मैं कहता हूं, जिन कल्याणियोंसे त्रिलोकी व्याप्त रही है ॥ २६ ॥
(१२४) अद्भुतरामायण [ त्रयोविंशति-
प्रभावती विशालाक्षी पालिता गोनसी तथा ॥ श्रीमती बहुला चैव तथैव बहुपुत्रिका ॥ २७ ॥ अप्सुजाता च गोपाली बृहदंबालिका तथा ॥ जयावती मालतिका ध्रुवरत्ना भयंकरी ॥ २८ ॥
प्रभावती विशालाक्षी पालिता गोनसी श्रीमती बहुला बहुपत्रिका ॥ २७ ॥ अप्सुजाता गोपाली बृहदम्बालिका जयावती मालतिका ध्रुवरत्ना भयंकरी २८
वसुदामा सुदामा च विशोका नंदिनी तथा ॥ एकचूडा महाचूडा चक्रनेमिश्चटीतमा ॥ २९ ॥ उत्तेजनी जया सेना कमलाक्ष्यथ शोभना ॥ शत्रुंजया तथा चैव क्रोधना शलभी खरी ॥ ३० ॥
सुदामा वसुदामा विशोका नंदिनी एकचूडा चक्रनेमि चटीतमा ॥ २९ ॥ उत्तेजनी तया सेना कमलाक्षी शोभना शत्रुञ्जया क्रोधना शलभी खरी ॥ ३० ॥
माधवी शुभ्रवस्त्रा च तीर्थसेनी जटोज्ज्वला ॥ गीतप्रिया च कल्याणी कद्रुरोमामिताशना ॥ ३१ ॥ मेघस्वना भोगवती सुभ्रूश्च कनकावती ॥ अलाताक्षी वेगवती विद्युज्जिह्वा च भारती ॥ ३२ ॥
माधवी शुभ्रवस्त्रा तीर्थसेना जटा उज्ज्वला गीतप्रिया कल्याणी कद्रुरोमा अमिताशना ॥ ३१ ॥ मेघस्वना भोगवती सुभ्रू कनकावती अलाताक्षी वेगवती विद्युज्जिह्वा भारती ॥ ३२ ॥
पद्मावती सुनेत्रा च गंधरा बहुयोजना ॥ सन्नालिका महाकाली कमला च महाबला ॥ ३३ ॥ सुदामा बहुदामा च सुप्रभा च यशस्विनी ॥ नृत्यप्रिया परानन्दा शतोदूखलमेखला ॥ ३४ ॥
पद्मावती सुनेत्रा गंधरा बहुयोजना सन्नालिका महाकाला कमला महाबला ३३ सुदामा बहुदामा सुप्रभा यशस्विनी नृत्यप्रिया परामंदा शतोदूख-मलमेखरा ॥ ३४ ॥
शतघंटा शतानंदा आनन्दा भवतारिणी ॥ वपुष्मती चंद्रसीता भद्रकाली सटामला ॥ ३५ ॥ झंकारिकानिष्कुटिका रामा चत्वरवासिनी ॥ सुमला सुस्तनवति वृद्धिकामा जयप्रिया ॥ ३६ ॥
शतघंटा शतानन्दा आनन्दा भवतारिणी वपुष्मती चन्द्रसीता भद्रकाली सठामला ॥ ३५ ॥ झंकारिका निष्कुटिका रामा चत्वरवासिनी सुमला सुस्तनम्रती वृद्धिकामा जयाप्रिया ॥ ३६ ॥
सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (१२५)
सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (१२५)
धना सुप्रसादा च भवदा च जनेश्वरी ॥ एडी भेडी समेडी च वेतालजननी तथा ॥ ३७ ॥ कंदुतिः कंदुका चैव वेदमित्रा सुदेविका ॥ लम्बास्या केतकी चैव चित्र सेना चलाचला ॥ ३८ ॥
धनदा सुप्रसादा भवदा जनेश्वरी एडी समेडी भेडी वेतालजननी ॥ ३७ ॥ कंदुति कन्दुका वेदमित्रा सुदेविका लम्बास्या केतकी चित्रसेना चला अचला ३८
कुक्कुटिका शृंखलिका तथा शंकुलिका हडा ॥ कन्दालिका काकलिका कुंभिकाथ शतोदरी ॥ ३९ ॥ उत्क्राथिनी जवेला च महावेगा च कंकिनी ॥ मनोजवा कटकिनी प्रघसा पूतना तथा । ४० ।
कुक्कुटिका शृंखलिका संकुलिखा हडा कंदालिका काकलिका कुंभिका शतोदरी ॥ ३९ ॥ उत्क्राथिनी जवेला महावेगा कंकिनी मनोजवा कटकिनी प्रघसा पूतना ॥ ४० ॥
खेशया चातिद्रढिमा क्रोशनाथत दित्प्रभा ॥ मंदोदरी च तुंडीच कोटरा मेघवाहिनी ॥ ४१ ॥ सुभगा लंबिनी लंबा बहुचूडा विकत्थिनी ॥ ऊर्ध्ववेणीधरा चैव पिंगाक्षी लोहमेखला ॥ ४२ ॥
खेशया अतिद्रढिमा क्रोशना तडित्प्रभा मन्दोदरी तुंडी कोटरा मेघवाहिनी ॥ ४१ ॥ सुभगा लम्बिनी लम्बा वहुचूडा विकत्थिनी ऊर्ध्ववेणीधरा पिंगाक्षी लोहमेखला ॥ ४२ ॥
पृथुवक्त्रा मधुलिहा मधुकुंभा तथैव च ॥ यक्षाणिका मत्सरिका जरायुर्जर्जरानना ॥ ४३ ॥ ख्यातां डहडहा चैव तथा धमधमा द्विजा ॥ खंडखंडा पृथुश्रोणी पूषणामणि कुट्टिका ॥ ४४ ॥
पृथुवक्त्रा मधुलिहा मधुकुंभा यक्षणिका मत्सरिका जरायु जर्जरानना ॥ ४३ । ख्याता दहपहा धमधमा खण्डखण्डा पृथुश्रेणी पूषणा मणिकुट्टिका ॥ ४४ ॥
अम्लोचा चैव निम्लोचा तथा लंबपयोधरा ॥ वेणुदीणाधरा चैव पिंगाक्षी लोहमेखला ॥ ४५ ॥ शशोलूकमुखी दृष्ट्वा खरजंघा महाजरा ॥ शिशुमारमुखी श्वेता लोहिताक्षी विभीषणा ॥ ४६ ॥
अम्लोचा निम्लोचा पलोधरा वेणुवीणाधरा पिंगाक्षी लोहमेखला ॥ ४५ ॥ शशोलूकमुखी हृष्टा खरजंघा महाजरा शिशुरामुखी श्वेता लोहिताक्षी बिभीषणा ॥ ४६ ॥
( १२६ ) अद्भुतरामायण [ त्रयोविंशति-
जटालीका कामचरी दीर्घजिह्वाबलोत्कटा ।। कालाहिकाया मालीका मुकुटामुकुटेश्वरी ।। ४७ ।। लोहिताक्षी महाकाया हवि- ष्पिण्डा च पिण्डिका ।। एकत्वचा सुकूर्म्मा च कुल्लाकर्णि च कर्णिका ।४८
जटालीका कामचारी दीर्घजिह्वा बलोत्कटा कालाहिका मालीका मुकुटा मुकुटेश्वरी ॥ ४७ ॥ लोहिताक्षी महाकाया हविष्पिण्डा पिण्डिका एकत्वचा सुकूर्मा कुल्लाकर्णी कर्णिका ॥ ४८ ॥
सुरकर्णी चतुष्कर्णी कर्णप्रावरणा तथा ।। चतुष्पथनिकेता च गोकर्णी महिषानना ।। ४९ ।। खरकर्णी महाकर्णी भेरीस्वनमहा- स्वना ।। शंखकुंभश्रवा चैव भगदा च महाबला ।। ५० ।।
सुरकर्णी चतुष्कर्णी कर्णप्रावरणा चतुष्पथ निकेता गोकर्णी महिषानना ॥ ४९ ॥ खरकर्णी महाकर्णी भेरीस्वना महास्वना शंखकुम्भश्रवा भगदा महाबला ॥ ५० ॥
गणा च सुगणा चैव कामदाप्यथ कन्यका ।। चतुष्पथरता चैव भूतितीर्थान्यगोचरा ।। ५१ ।। पशुदा विबुदा चैव सुखदा च महा- यशाः ।। पयोदा गोमहिषदा सुविशाला चतुर्भुजा ।। ५२ ।।
गणा सुगणा कामदा कन्यका चतुष्पथ रता भूतितीर्था अन्यगोचरा ॥ ५१ ॥ पशुदा विबुदा सुखदा महयशा पयोदा गोमहिषदा सुविशाला चतुर्भुजा ॥ ५२ ॥
प्रतिष्ठा सुप्रतिष्ठा च रोचमाना सुलोचना ।। नौकर्णी मुखकर्णी च विशिरा मंथिनी तथा ।। ५३ ।। एकवक्त्रा मेघरवा मेघवामा द्विरो- चना ।। एताश्चान्याश्च बहवो मातरः कोटिकोटिशः ।। ५४ ।।
प्रतिष्ठा सुप्रतिष्ठा रोचमाना सुलोचना नौकर्णी मुखकर्णी विशिरा मंथिनी ॥ ५३ ॥ एकमुखी मेघरवा मेघवामा द्विरोचना इसके सिवाय और भी अनेकों मातायें थीं ॥ ५४ ॥
असंख्याताः समाजग्मुःक्रीडितुं सीतया सह ।। दीर्घवक्ष्यो दीर्घदंत्यो दीर्घतुंड्यो द्विजोत्तम ।। ५५ ।। सरसा मधुराश्चैव यौवनस्थाः स्वलं- कृताः ।। माहात्म्येन च संयुक्ताः कामरूपधरास्तथा ।। ५६ ।।
वे असंख्य जानकीके साथ क्रीडा करनेको आई, दीर्घ वक्षस्थलवाली, दीर्घ दांतोंवाली, दीर्घनासिकावाली ॥ ५५ ॥ सरस मधुर यौवनमती स्वलंकृत- महिमासे संयुक्त कामरूपधारिणी ॥ ५६ ॥
सर्ग ] हिन्दीटीकासहित ( १२७)
सर्ग ] हिन्दीटीकासहित ( १२७)
निर्मांसगात्र्यः श्वेताश्च तथा कांचनसंनिभाः ॥ कृष्णमेघ- निभाश्चान्या धूम्राश्च द्विजपुङ्गव ॥ ५७ ॥ अरुणाभा महाभागा दीर्घकेश्यः सिताम्बराः ॥ ऊर्ध्ववेणीधराश्चैव पिंगाक्ष्यो लंब- मेखलाः ॥ ५८ ॥ निर्मांस गात्रेवाली, श्वेता, कांचनके समान, कृष्णमेघके समान कोई धूम्रवर्ण वाली ॥ ५७ ॥ अरुणाभा, महाभागा, दीर्घवालोंवाली, श्वेतवस्त्र पहरे, ऊर्ध्ववेणी धारे, पिंगाक्षी, लम्बायमान मेखला ॥ ५८ ॥
लंबोदर्यो लम्बकर्ण्यस्तथा लम्बपयोधराः ॥ ताम्राक्ष्यस्ताम्र- वर्णाश्च हर्यक्ष्यश्च तथापराः ॥ ५९ ॥ शत्रूणां विग्रहे नित्यं भय- दास्ता भवन्त्यपि ॥ कामरूपधराश्चैव जवे वायुसमास्तथा ॥ ६० ॥ लम्बे पेट, लम्बे कानवाली लम्बे पयोधरवाली, ताम्रवर्णके नेत्रवाली हर्यक्षी ॥ ५९ ॥ शत्रुओंके विग्रहमें नित्य भय देनेवाली होती हैं वे कामरूप धारिणी वेगमें वायुके समान हैं ॥ ६० ॥
शिरांसि रक्षसां गृह्य गंडशैलोपमान्यपि ॥ चिक्रीडुः सीतया सार्द्धं तस्मिन् रणधरातले ॥ ६१ ॥ मुंडमालाधराश्चैव काश्चिन्मुण्ड विभू- षणाः । रणांगणे महाघोरे गृध्रकंकशिवान्विते ॥ ६२ ॥ पर्वतशिखरके समान राक्षसोंके शिरको ग्रहण कर धरातलमें जानकीके साथ क्रीडा करने लगीं ॥ ६१ ॥ कोई मुण्डमाला धारण किये कोई मुण्डोंके भूषण पहरे महाघोर रणस्थल जो कि गृध्र कंक और गीदडोंसे युक्त था। ६२।
मांसासृक्पंकिले घोरे तत्र तत्र पुरोपमे ॥ ननर्त जानकी देवी घोर काली महाबला ॥ ६३ ॥ तदा चकंपे पृथिवी नौरिवानिलचालिता ॥ चेलुश्च भूधराः सर्वे समुद्राश्च चकंपिरे ॥ ६४ ॥ तथा मांस रुधिरके कीचसे युक्त उस पुरके समान उस रणस्थलमें महाकाली महाबला महाघोर जानकी देवी नृत्य करने लगी ॥ ६३ ॥ तब नौकाके समान चलायमान हो पृथिवी कंपित होने लगी, सब पर्वत चलायमान और सागर कंपित होगये ॥ ६४ ॥
स्वर्गिणां च विमानानि खात्पेतुर्भयतो द्विज ॥ सूर्यस्य दुद्रुवुर्भीता वाजिनो मुक्तरश्मयः ॥ ६५ ॥ यदा न सेहे जानक्याः भारं सोढुं वसुंधरा ॥ गंतुमैच्छत पातालं सीतापादाग्रपीडिता ॥ ६६ ॥
(१२८) अद्भुतरामायण [ त्रयोविंशति
डरसे देवताओंके विमान आकाशसे गिरने लगे, सूर्यके घोडे मार्ग त्यागने लगे ॥ ६५ ॥ जब पृथ्वी जानकीका भार सहनेको समर्थ न हुई और सीताके चरणग्रसे पीडित हो पातालमें जाने लगी ॥ ६६ ॥
अट्टहासेन सीताया मातृणां हुंकृतेन च ।। प्रलयं मेनिरे लोकाः किमेतदिति विह्वलाः ॥६७॥ धरापातालगमनं वितर्क्य सुरसत्तमैः ।। संप्रार्थितो महादेवः स्वयमायाद्रणाजिरम् ॥ ६८ ॥
सीताके अट्टहास और मातृकाओंके हुंकारसे यह क्या हुआ इस प्रकार कहते लोक प्रलय मानने लगे ॥ ६७ ॥ देवता धराको पातालमें जाता देख महादेवसे प्रार्थना करने लगे, तब वे संग्रामस्थलमें आये ॥ ६८ ॥
जानक्याः पादविन्यासे शवरूपधरो हरः ।। आत्मानं स्तंभयामास धरणीधृतिहेतवे ॥ ६९ ॥ सर्वभारसहो देवः सीतापादतले स्थितः शवरूपो विरूपाक्षः स्थिताभूद्धरातदा ॥ ७० ॥
तब शवके समान रूप धारण कर शिव पृथ्वी थामनेको जानकीके नीचे स्थित हुए, और अपनेको स्थित किया ॥ ६९ ॥ सीताके पगतलमें स्थित हो देव सम्पूर्ण भार सहन करने लगे तब शवरूपधारी पृथ्वी स्तंभित हुई ॥ ७० ॥
तथाप्युपरिगा लोका न स्थातुं सेहिरे क्षणम् ।। सीतायाः पादशब्देन शिरसा हुंकृतेन च ।। निःश्वासवातसंघातैर्दुःस्थिता भूर्भुवादयः। ७१। धरणीतनयया यद्धीमनृत्यं धरण्यां कृतमिह मनसा तंर्त्तिचतयंतो द्विजेन्द्राः ।। जयति जयति सीतेत्याहुरिंद्रादिदेवाः सपदि भुवन भंगं मन्यमाना विषेदु ॥ ७२ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रा. वाल्मीकीये आदि. अद्भु. भाषाटीकायां सहस्रवदन-रावणवधो नाम त्रयोविंशतितमः सर्गः ।। २३ ।।
परन्तु ऊपरके लोक उस समय भी स्थित न हो सके, सीताके चरणशब्द और शिरके हुंकारसे तथा निश्वासकी पवनसे भूर्भवः स्व आदि लोक अस्वस्थ हो गये ॥ ७१ ॥ धरणीतनयाने जो भयंकर नृत्य पृथ्वीपर किया, उसके मनमें विचार करते द्विजेन्द्र इन्द्रादिक देवता जय जय करने लगे और संसार भंग होगा ऐसा मानने लगे ॥ ७२ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रा. वाल्मीकीये आदिकाव्ये अद्भुतोत्तरकाण्डे भाषाटीकायां सहस्रवदनरावणवधो नाम त्रयोविंशतितमः सर्गः ॥ २३ ॥
सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (१२९)
सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (१२९)
चतुर्विंशति सर्ग
देवतोंका रामको आश्वासन करना
संरंभवेगं सीताया वीक्ष्य ब्रह्मपुरो गमाः ॥ सलोकपालास्त्रिदशा ऋषिभिः पितृभिः सह ॥ १ ॥
प्रसादयितुमुद्युक्ताः सीतां ते तुष्टुवुः सुराः ॥ कृताञ्जलिपुटा देवाः प्रणम्य च पुनः पुनः ॥ २ ॥
तब सीताका इस प्रकार वेग और क्रोध देखकर लोकपाल देवता और पितर तथा ब्रह्माजी ॥ १ ॥ वे सीताके प्रसन्न करनेको युक्त हो उन्हें सन्तुष्ट करने लगे, देवता हाथ जोड वारवार प्रणाम कर ॥ २ ॥
ब्रह्माद्याः स्तोतुमारब्धाः सीतां राक्षसनाशिनीम् ॥ या सा माहेश्वरी शक्तिर्ज्ञानरूपायिलालसा ॥ ३ ॥
अनन्या निष्कले तत्त्वे संस्थिता रामवल्लभा ॥ स्वाभाविकी च त्वन्मूला प्रभा भानोस्तथामला ॥ ४ ॥
राक्षसनाशिनी जानकीकी ब्रह्मादिदेवता स्तुति करने लगे, जो यह माहेश्वरी शक्ति ज्ञानरूपा अतिलालसायुक्त है ॥ ३ ॥ यह रामवल्लभा अनन्य और निष्फल तत्त्वमें स्थित है. वह स्वाभाविकी शक्ति आपहीसे होती है, जैसे सूर्यकी कांति निर्मल होती है ॥ ४ ॥
एका सा वैष्णवी शक्ति रणे कोपाधिवेगतः ॥ परापरेण रूपेण क्रीडन्ती रामसन्निधौ ॥ ५ ॥
सेव्यं करोति सकलं तस्याः कार्यमिदं जगत् ॥ न कार्यं चापि करणमीश्वरस्येति निश्चयः ॥ ६ ॥
वह एकही वैष्णवी शक्ति रणमें बडे वेगसे और क्रोधसे परापररूप किये रामके निकट क्रीडा करती है ॥ ५ ॥ यही सब जगत् करके अपना कार्य करके विहरती है कि, ईश्वरको कार्य करनेकी आवश्यकता नहीं है ॥ ६ ॥
चतस्रः शक्तयो देव्याः स्वरूपत्वेन संस्थिताः ॥ अधिष्ठान वशादस्या जानक्या रामयोषितः ॥ ७ ॥
शांतिर्विद्या प्रतिष्ठा च निवृत्तिश्चेति ताः स्मृताः ॥ चतुर्व्यूहस्ततो देवः प्रोच्यते परमेश्वरः ॥ ८ ॥
९
( १३० ) \qquad अद्भुतरामायण \qquad [ चतुर्विंशति
देवीकी चार शक्ति स्वरूपसे स्थित हैं अधिष्ठानके वशसे जानकी रामकी स्त्री हैं ॥ ७ ॥ शांति विद्या प्रतिष्ठा और निवृत्ति यह परमेश्वर देव चतुर्व्यूह रूपसे कहा जाता है ॥ ८ ॥
अनया परया देवः स्वात्मानंदं समश्नुते ॥ यत्त्वस्त्यनादिसंसिद्धमैश्वर्यमतुलं महत् ॥ ९ ॥ त्वत्संबन्धादवाप्तं तद्रामेण परमात्मना ॥ सैषा सर्वेश्वरी देवी सर्वभूतप्रवर्तिका ॥ १० ॥
इसी पराशक्तिसे देवका स्वात्मानन्द जाना जाता है, जो अनादिसंसिद्ध अतुल महत् ऐश्वर्य है ॥ ९ ॥ वही परमात्मा रामद्वारा तुम्हारे सम्बन्धसे प्राप्त किया जाता है, यह सर्वेश्वरी देवी सब भूतोंकी प्रवर्त्त करनेवाली है १०
त्वयेदं भ्रामयेदीशो मायावी पुरुषोत्तमः ॥ सैषा मायात्मिका शक्तिः सर्वाकारा सनातनी ॥ ११ ॥ वैश्वरूपं महेशस्य सर्वदा संप्रकाशयेत् ॥ अन्याश्च शक्तयो मुख्यास्त्वया देवि विनिर्मिता ॥ १२ ॥
तुमसेही यह मायावी पुरुषोत्तम भ्रमण कराये जाते हैं यह मायात्मिका शक्ति सर्वाकारा सनातनी है ॥ ११ ॥ यह महेश्वरका विश्वरूप सदा प्रकाशित करती है. हे देवि ! और भी मुख्य शक्ति तुमनेही निर्माण की है ॥ १२ ॥
ज्ञानशक्तिः क्रियाशक्तिः प्राणशक्तिरिति त्रयम् ॥ सर्वासामेव शक्तीनां शक्तिमन्तो विनिर्मिता ॥ १३ ॥ एका शक्तिः शिवोप्येकः शक्तिमानुच्यते शिवः ॥ अभेदं चानुपश्यंति योगिनस्तत्त्वदर्शिनः १४
ज्ञानशक्ति, क्रियाशक्ति, प्राणशक्ति यह सम्पूर्णशक्ति और उनके शक्तिमान् निर्माण किये हैं ॥ १३ ॥ वास्तविक एकही शक्ति और एकही शक्तिमान शिव हैं, तत्त्वदर्शी योगी इनमें भेद नहीं मानते हैं ॥ १४ ॥
शक्तयो जानकी देवी शक्तिमन्तो हि राघवः ॥ विशेषः कथ्यते चायं पुराणे तत्त्ववादिभिः ॥ १५ ॥ भोग्या विश्वेश्वरी देवी रघूत्तमपतिव्रता ॥ प्रोच्यते भगवान्भोक्ता रघुवंशविवर्द्धनः ॥ १६ ॥
संपूर्ण शक्तियोंका स्वरूप जानकी देवी, शक्तिमान् राम हैं. तत्त्ववादियोंने पुराणोंमें यह विशेषतासे कहा है ॥ १५ ॥ रघुराजकी पतिव्रता देवी योग्या है, और रघुवंशविवर्द्धन भगवान् भोक्ता कहलाते हैं ॥ १६ ॥
मंता रामो मतिः सीता मन्तव्या च विचारतः ॥ एकं सर्वगतं सूक्ष्मं कूटस्थ मचलं ध्रुवम् ॥ १७ ॥ योगिनस्तत्प्रपश्यंति तव देव्याः परं पदम् ॥ अनंतमजरं ब्रह्म केवलं निष्कलं परम् ॥ १८ ॥
सर्ग ] · हिन्दीटीकासहित (१३१)
सर्ग ] · हिन्दीटीकासहित (१३१)
मन्ता राम हैं और मति सीता है इनको विना विचारे मानना उचित है एकही सर्वगत सूक्ष्म अचल और ध्रुव हैं ।। १७ ।। योगी उसको देखते हैं वही देवीका परमपद है वह अनन्त अजर ब्रह्म केवल निष्कल और परे है ।। १८ ।।
योगिनस्तत्प्रपश्यन्ति तव देव्याः परं पदम् ।। सा त्वं धात्रीव परमा यानन्दनिधिमिच्छताम् ।। १९ ।। संसारतापानखिलान्हरसीश्वर-संश्रयात् ।। नेदानीं भूतसंहारस्त्वया कार्यो महेश्वरि ।। २० ।।
हे देवि ! आपके उस पदको योगी देखते हैं वह तुमही परमधात्री हो आनंदसागरकी इच्छा करनेवालोंको ।। १९ ।। ईश्वरके संश्रयसे संसारके संपूर्ण तापोंको दूर करती हो. हे महेश्वरि ! इस समय तुमको प्राणियोंका संहार न करना चाहिये ।। २० ।।
रावणो सगणं हत्वा जगतां सुखमाहितम् ।। किं पुनर्नृत्यकलया जगत्संह्रियते त्वया ।। २१ ।। एतच्छ्रुत्वाविशालाक्षी ब्रह्मणोऽभ्यर्थनं वचः ।। प्रीता सीता तदा प्राह ब्रह्माणं सहदैवतम् ।। २२ ।।
गणसहित रावणको मारकर जगत्को सुखी किया है फिर अब नृत्यके व्याजसे सब जगत्का संहार क्यों करती हो ।। २१ ।। वह विशाला श्रीब्रह्माजी-की यह प्रार्थना सुनकर प्रसन्न हो ब्रह्मादि देवतोंसे कहने लगी ।। २२ ।।
पतिर्मे पुंडरीकाक्षः पुष्पकोपरि राघवः ।। विद्धः क्षुरप्रेण हृदि शेते मृतकवत्प्रभुः ।। २३ ।। तस्मिन्नेव स्थिते देवाः किमिच्छामि जगद्धितम् ।। ग्रासमेकं करिष्यामि जगदेतच्चराचरम् ।। २४ ।।
हमारे पति कमललोचन राम पुष्पकविमान पर तीक्ष्ण बाणसे विद्ध हुए मृतकके समान सोते हैं ।। २३ ।। हे देवताओ ! उनके ऐसे होनेमें जगत्के हितकी किस प्रकार इच्छा कर सकती हूं, इस चराचर जगत्का एकही ग्रास कर जाऊंगी ।। २४ ।।
श्रुत्वैतद्वचनं देव्याः संरंभसहित सुराः ।। हाहाकारं प्रचक्रुस्ते संचचाल च मेदिनी ।। २५ ।। ततो ब्रह्मा सुरैः सार्द्धं पुष्पकं रथमा-स्थितम् ।। श्रीरामं ग्राहयामास स्मृतिं स्पृष्ट्वा स्वपाणिना ।। २६ ।।
संरम्भसहित देवता देवीके यह वचन सुनकर हाहाकार करने लगे, और पृथ्वी चलायमान होगई ।। २५ ।। तब ब्रह्माजीने देवताओंसहित पुष्पकमें स्थित श्रीरामको हाथसे स्पर्श कर स्मृति दिवाई ।। २६ ।।
(१३२) अद्भुतरामायण [चतुर्विंशति-
उत्तस्थौ च महाबाहू रामः कमललोचनः ॥ रे रावण सुदुष्ट- स्त्वमद्य मद्बाणभेदितः ॥ २७ ॥ द्रक्ष्यस्याशु यमस्यास्यं भ्रुकुटी- भीषणाकृति ॥ ब्रुवन्नेवं धनुर्गृह्य ह्यपश्यन्त्रिदशान्पुरः ॥ २८ ॥
तब तत्काल महाबाहु राम उठ बैठे, और बोले अरे रावण ! तू आज मेरे बाणसे भेदित होकर ॥ २७ ॥ अवश्य भयंकर भौंवाले यमराजका मुख देखेगा, जब यह कहकर धनुष ग्रहण किया तब देवताओंको अपने सम्मुख स्थित देखा ॥ २८ ॥
नापश्यज्जानकीं तत्र प्राणेभ्योपि गरीयसीम् ॥ नृत्यतीं चापरां कालीमपश्यच्च रणांगणे ॥ २९ ॥ चतुर्भुजां चलज्जिह्वां खङ्गखर्पर- धारिणीम् ॥ शवरूपमहादेवहृत्संस्थां च दिगंबराम् ॥ ३० ॥
परन्तु प्राणप्यारी जानकीको वहां नहीं देखा युद्धस्थलमें नृत्य करती हुई महाकालीको देखा ॥ २९ ॥ और स्थितिके निमित्त शवरूपधारी महा-देवको देखा चार भुजा चलजिह्वा खड्गखर्परधारिणी जानकीको देखा ॥ ३० ॥
पिबन्तीं रुधिरं भीमां कोटराक्षीं क्षुधातुराम् ॥ जगद्ग्रासे कृतो- त्साहां मुण्डमालाविभूषणाम् ॥ ३१ ॥ भीमाकाराभिरन्याभिः क्रीडंतीं रणमूर्द्धनि ॥ मुण्डै राक्षसरांजस्य खेलंतीं कंदुकं मुदा ॥ ३२ ॥
वह कोटराक्षी महाभयंकर खङ्ग खर्पर धीरण किये दिगम्बर जगत्के ग्रासमें उत्साह करती मुण्डमालाके गहना पहरे ॥ ३१ ॥ और दूसरी भयंकर कन्दुक मूर्ति धारण किये हुए मृतकाओंके साथ रणभूमिमें क्रीडा करते देखा, और राक्षसराजके शिरके संग कन्दुक क्रीडा करते देखा ॥ ३२ ॥
प्रलयध्वांतधाराभां सदा घर्घरनादिनीम् ॥ अन्त्रमुण्डकरोटचक्ष- कृतमालां चलत्पदाम् ॥ ३३ ॥ कबन्धान्राक्षसानां च तया सह विनृ- त्यतः ॥ रथवाजिगजानां च शकलानि व्यलोकयत्यय् ॥ ३४ ॥
प्रलयकालके अन्धकारके समान सदा घर्घर शब्द करनेवाली आँते शिर हाथ नेत्रोंकी माला बनाये पद चलाती ॥ ३३ ॥ मृतक राक्षसोंके कबन्धोंके साथ नृत्य करती, रथ घोडे हाथियोंको टुकडोंको देखती हुई ॥ ३४ ॥
नैकोपि राक्षसो यत्र करपादशिरोयुतः ॥ कबन्धा ये च नृत्यंति तेषां पादाः प्रतिष्ठिताः ॥ ३५॥ कबन्धं रावणस्यापि नृत्यन्तं च व्यलोक- यत् ॥ तद्दृष्ट्वा मुमहाघोरं प्रेतराजपुरोपमम् ॥ ३६ ॥
सर्ग ] हिन्दीटीकासहित ( १३३ )
सर्ग ] हिन्दीटीकासहित ( १३३ )
कोई भी राक्षस हाथ पैर शिरसे युक्त नहीं था, जो कबन्ध नृत्य करते थे केवल उन्हींके चरण स्थित थे ॥ ३५ ॥ रावणका कबन्धभी नृत्य करते देखा वह स्थान महाघोर प्रेतराजके पुरके समान देखकर ॥ ३६ ॥
कालीं च वीक्ष्य नृत्यंतीं मातृभिः सहितां द्विज । पपात हस्ताद्रामस्य वेपताः सशरं धनुः ॥ ३७ ॥ भयाच्च निमिमीलाशुः रामः पद्मविलोचने ॥ इत्येवं विस्मितं दृष्ट्वा ब्रह्मोवाच रघूत्तमम् ॥ ३८ ॥
हे द्विज ! मातृकाओंके सहित महाभयंकर कालीको नृत्य करती देख कम्पित हुए रामके हाथसे धनुष बाण गिरपड़ा ॥ ३७ ॥ और डरसे रामचन्द्रने अपने दोनों कमलकेसे नेत्र मीच लिये. इस प्रकार विस्मित देखकर रामचन्द्रसे ब्रह्माजी कहने लगे ॥ ३८ ॥
त्वां दृष्ट्वा विह्वलं सीता क्रुद्धं चापि च रावणम् ॥ रथादवस्कन्द्य- सती पपात रणमूर्द्धनि ॥ ३९ ॥ भीमां च मूर्त्तिमालम्ब्य रोमकूपाश्च मातृकाः ॥ निर्माय ताभिः सहिता हत्वा रावणमग्रतः ॥ ४० ॥
जानकी आपको विह्वल और रावणको क्रुद्ध देखकर तत्काल युद्धस्थलमें विमानसे कूद पडी ॥ ३९ ॥ और उस भयंकर मूर्त्तिका अवलम्बन कर अपने रोमकूपसे मातृका उत्पन्न कर तनकें सहित क्रीडा कर रावणका वध किया । ४०
रक्षसां निधनं कृत्वा नृत्यंतीयं व्यवस्थिता ॥ अनया सहितो राम सृजस्यवसि हंसि च ॥ ४१ ॥ नानया रहितो राम किंचित्कर्तुमपि क्षमः ॥ इति बोधयितुं सीता चकार तद निंदिता ॥ ४२ ॥
अब यह राक्षसोंका वधकर व्यवस्थित हो नृत्य करती हैं, हे राम ! इनके सहित आप जगत् उत्पन्न कर नष्ट कर देते हैं ॥ ४१ ॥ हे राम ! इनके बिना आप कुछभी नहीं कर सकते हो यही दिखानेको जानकीने यह कार्य किया है ४२
पश्यैतां जानकीं राम त्यज भीतिं महाभुजा ॥ निर्गुणां सगुणां साक्षात्सदसद्यक्तिवर्जिताम् ॥ ४३ ॥ इत्येतद्द्रुहिणवचो निशम्य रामः श्रुतिमुखमात्महितं पराभिमर्दि ॥ शुचमनुविजहौ विचार्य किंचिज्जनकसुतामनुपश्यति स्म पश्चात् ॥ ४४ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणेवाल्मीकीये आदिकाव्ये अद्भुतोत्तरकाण्डे रामा- श्वासनं नाम चतुर्विंशतितमः सर्गः ॥ २४ ॥
हे राम ! आप इन जानकीको देखिये भय त्यागन कीजिये, यह साक्षात् निर्गुण सत् असत् व्यक्तिसे रहित हैं ॥ ४३ ॥ इस प्रकार ब्रह्माजीके वचन
(१३४) अद्भुतरामायण [ पंचविंशति-
सुनकर रघुनन्दन राम जो कानोंके सुख देनेवाले आत्माको हितकारक शत्रु-नाशक थे रामने शोक त्याग किया पीछे जानकीको देखा ॥ ४४ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वा. अदिका. अद्भु. ज्वालाप्रसादमिश्रकृतभाषा-टीकायांरामाश्वासनं नाम चतुर्विंशतितमः सर्गः ॥ २४ ॥
पंचविंशति सर्ग
रामचन्द्रका सहस्रनामसे जानकी की स्तुति करना
ब्रह्मणो वचनं श्रुत्वा रामः कमललोचनः । प्रोन्मील्य शनकैरक्ष वेपमानो महाभुजः ॥ १ ॥ प्रणम्य शिरसा भूमौ तेजसा चापि विह्वलः ॥ भीतः कृतांजलिपुटः प्रोवाच परमेश्वरीम् ॥ २ ॥
का त्वं देवि विशालाक्षि शशांका वयवांकिते ॥ न जाने त्वां महादेवि यथावद् ब्रूहि पृच्छते ॥ ३ ॥ रामस्य वचनं श्रुत्वा ततः सा परमेश्वरी ॥ व्याजहार रघुव्याघ्रं योगिनामभयप्रदा ॥ ४ ॥
कमललोचन राम ब्रह्माजीके वचन सुनकर शनैः २ नेत्र खोल कम्पित होते हुए महाभुज ॥ १ ॥ भूमिमें शिर झुकाय प्रणाम कर उनके तेजसे विह्वल हो भीतके समान हाथ जोड परमेश्वरीसे बोले ॥ २ ॥ हे चन्द्रखण्डसे अंकित विशाललोचनी ! तुम कौन हो ? हे महादेवि ! हम तुमको नहीं जानते पूछते हुए अपनेको वर्णन करो ॥ ३ ॥ तब वह परमेश्वरी रामके वचन सुनकर योगियोंको अभय देनेवाली रघुनाथजीसे बोली ॥ ४ ॥
मां विद्धि परमां शक्तिं महेश्वरसमाश्रयाम्।अनन्यामव्ययामेकां यां पश्यन्ति मुमुक्षवः ॥ ५ ॥ अहं वै सर्वभावानामात्मा सर्वांतरा शिवा ॥ शाश्वती सर्वविज्ञाना सर्वमूर्तिप्रवर्तिका ॥ ६ ॥
मुझे महेश्वरके आश्रितवाली परमशक्ति जानों, मैं अनन्य अविनाशी एक हूँ, मुमुक्षुजन मुझको देखते हैं ॥ ५ ॥ मैं सब भावोंकी आत्मा सबके अन्तमें स्थित शिवा हूँ, मैं ही निरन्तर रहनेवाली सब विज्ञान और सब मूर्ति प्रवृत्त करनेवाली हूँ ॥ ६ ॥
अनंतानंतमहिमा संसारार्णवतारिणी ॥ दिव्यं ददामि ते चक्षुः पश्य मे पदमैश्वरम् ॥ ७ ॥ इत्युक्त्वा विररामैषा रामोऽपश्यच्च तत्पदम् ॥ कोटिसूर्यप्रतीकाशं विश्वक्तेजोनिराकुलम् ॥ ८ ॥
• सर्ग ] हिन्दीटीकासहित ( १३६ )
मैं अनन्त अनन्तमहिमावाली संसारसागरसे तारनेवाली हूँ, तुमको दिव्य-नेत्र देती हूं मेरा ईश्वरसंबन्धी पद देखो ॥ ७ ॥ यह कह वह मौन हुई, और रघुनाथ उनकें पदको देखने लगे, जो करोड सूर्यके समान सब ओरसे परिपूर्ण था ॥ ८ ॥
ज्वालावलीसहस्राढ्यं कालानलशतोपमम् ॥ तदंष्ट्राकरालं दुर्धर्षं जटामण्डलमंडितम् ॥ ९ ॥ त्रिशूलवरहस्तं च घोररूपं भयावहम् ॥ प्रशाम्यत्सौम्यवदनमनंतैश्वर्यसंयुक्तम् ॥ १०॥ चन्द्रावयवलक्ष्माढ्यं चन्द्रकोटिसमप्रभम् ॥ किरीटिनं गदाहस्तं नूपुरैरुपशोभितम् ॥ ११ ॥ दिव्यमाल्याम्बरधरं दिव्यगंधानुलेपनम् ॥ शंखचक्रकरं काम्यं त्रिनेत्रं कृत्तिवाससम् ॥ १२ ॥
सहस्रों ज्वालासमूहोंसे व्याप्त, कालानल सौके समान दंष्ट्राकरालसे दुर्धर्ष, जटामंडलासे मंडित ॥ ९ ॥ त्रिशूल हाथमें लिये घोर रूप भयावने प्रशांत सौम्यवदन अनन्त ऐश्वर्यसे संयुक्त ॥ १० ॥ चन्द्रके खण्ड और लक्ष्मीसे युक्त करोड चन्द्रमाकेसमान कान्तिमान् किरीट गदा हाथमें लिये, नूपुरोंसे शोभित ॥ ११ ॥ दिव्य माला वस्त्र धारणकिये, दिव्य गंधका अनुलेपन लगाय, शंख चक्र हाथमें लिये, त्रिनेत्र, कृत्ति-वा ॥ १२ ॥
अन्तःस्थं चांडबाह्यस्थं बाह्याभ्यंतरतःपरम् ॥ सर्वशक्तिमयं शांतं सर्वाकारं सनातनम् ॥ १३॥ ब्रह्मेन्द्रोपेंद्रयोगींद्रैरीड्यमानपदांबुजम् ॥ सर्वतः पाणिपादं तत्सर्वतोक्षिशिरोमुखम् ॥ १४ ॥
अन्तरमें स्थित तथा अण्डकोशके बाह्यमें स्थित, बाहर भीतरसे परे सर्वशक्तिमान शान्त सर्वाकार सनातन ॥ १३ ॥ ब्रह्मा इन्द्र उपेंद्र योगीन्द्रोंसे प्रार्थित चरण कमल, सब ओरसे चरण नेत्र और शिरवाले ॥ १४ ॥
- सर्वमावृत्य तिष्ठन्तं ददर्श पदमैश्वरम् ॥ दृष्ट्वा च तादृशं रूपं दिव्यं माहेश्वरं पदम् ॥ १५ ॥ तयैव च समाविष्टः स रामो हृतमानसः ॥ आत्मन्याधाय चात्मानमोंकारं समनुस्मरन् ॥ १६ ॥
सबको आवृत्त कर स्थित होते हुए उस ईश्वरसम्बन्धी पदका दर्शन किया. इस प्रकारका उस दिव्य माहेश्वरके पदको देखकर ॥ १५ ॥ रामचंद्र मनके हरण हो जानेमें उनसे आविष्ट हो हृतमन होकर आत्माको आत्मामें ध्यान कर ॐ कारका स्मरण कर ॥ १६ ॥
(१३६) अद्भुतरामायण [ पंचविंशति-
नाम्नामष्टसहस्रेण तुष्टाव परमेश्वरम् ।। ॐ सीतोमा परमा शक्तिरनंता निष्कलामला ।। १७ ।। शांता माहेश्वरी नित्या शाश्वती १० परमाक्षरा ।। अचिन्त्या केवलानंता शिवात्मा परमात्मिका ।। १८ ।। १००८ एक हजार आठ नामसे परमेश्वरीकी स्तुति करने लगे, ॐ सीता, उमा परमा, शक्ति, अनन्ता, निष्कला, अमला ।। १७ ।। शांता, माहेश्वरी, शाश्वती, १०, परमाक्षरा, अचिंत्या, केवला, अनंता, शिवात्मा, परमात्मिका १८।
अनादिरव्यया शुद्धा देवात्मा २० सर्वगोचरा ।। एकानेकविभा- गस्था मायातीता सुनिर्मला ।। १९ ।। महामाहेश्वरी शक्ता महादेवी निरंजना ।। काष्ठा ३० सर्वांतरस्था च चिच्छक्तिरति लालसा ।। २० ।। अनादि, अव्यया, शुद्धा देवात्मा २० सर्वगोचरा, एक अनेक विभागमें स्थित मायासे परे निर्मल ।। १९ ।। महामाहेश्वरी, शक्ता, महादेवी, निरंजना, काष्ठा ३० सर्वांतरस्था, चिच्छक्ति, अति लालसा ।। २० ।।
जानकी मिथिलानंदा राक्षसांताविधायिनी ।। रावणांतकरी रम्या रामवक्षःस्थलालया ।। २१ ।। उमा सर्वात्मिका ४० विद्या ज्योतीरू- पाऽयुताक्षरी ।। शांतिः प्रतिष्ठा सर्वेषां निवृत्तिरमृतप्रदा ।। २२ ।। जानकी, मिथिलाके जनोंको आनंदकी देनेवाली, राक्षसोंका अंत करनेवाली, रावणका अंत करनेवाली, मनोहर रामके वक्षस्थलमें विहार करनेवाली ।। २१ । उमा, सर्वात्मिका ४०, विद्या, ज्योतिरूपा, अयुताक्षरी, शांति, सबकी प्रतिष्ठा, निवृत्ति, अमृत देनेवाली ।। २२ ।।
व्योममूर्तिर्व्योममयी व्योमाधारा ५० ऽच्युतातलता ।। अनादि- निधना योषा कारणात्मा कलांकुला ।। २३ ।। नंदप्रथमजा नाभिर- मृतस्यांतसंश्रया ।। प्राणेश्वरप्रिया ६० मातामही महिषवाहना २४ व्योममूर्ति, व्योममयी, व्योमाधारा ५० अच्युता, लता, आदिअन्तरहिता, योषा, कारणात्मा, कुलाकुला ।। २३ ।। नन्दके यहां प्रथम उत्पन्न होनेवाली नाभिमें अमृतके आश्रयवाली, प्राणेश्वरप्रिया ६०, मातामही महिषवाहन- वाली ।। २४ ।।
प्राणेश्वरी प्राणरूपा प्रधानपुरुषेश्वरी ।। सर्वशक्तिः कला काष्ठा ज्योत्स्नेन्दो ७० र्महिमास्पदा ।। २५ ।। सर्वकार्यनियंत्री च सर्वभूते- श्वरीश्वरी ।। अनादिरव्यक्तगुणा महानन्दा सनातनी ।। २६ ।।
सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (१३७)
सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (१३७)
प्राणेश्वरी, प्राणरूपा, प्रधानपुरुषेश्वरी, सर्वशक्ति, कला काष्ठा, चन्द्रमाकी ज्योत्स्ना ७०, महिमाके स्थानवाली ॥ २५ ॥ सब कार्यकी नियंत्री, सर्वभूतेश्वरोंकी ईश्वरी, अनादि, अव्यक्तगुण, महानंदा, सनातनी ॥ २६ ॥
आकाशयोनियोंनस्था सर्वयोगेगेश्वरेश्वरी ॥ ८० ॥ शवासना चितांतःस्था महेशी वृषवाहना ॥ २७ ॥ बालिकातरुणी वृद्धा वृद्धमाता जरातूरा ॥ महामाया ९० सुदुष्पूरा मूलप्रकृतिरीश्वरी । २८ ।
आकाशसे उत्पन्न होनेवाली, योगमें स्थित सर्वयोगेश्वरोंकी ईश्वरी ८०, शवासना, चिताके अंतमें स्थित, महेशी, वृषवाहनवाली ॥ २७ ॥ बालिका, तरुणी, वृद्धा, वृद्धमाता, जरासे आतुर महामाया ९०, सुदुष्पूर, मूलप्रकृति, ईश्वरी ॥ २८ ॥
संसारयोनिःसकला सर्वशक्तिसमुद्भवा ॥ संसारसारा दुर्बारा दुर्निरीक्ष्यादुरासदा १०० । २९ ॥ प्राणशक्तिः प्राणविद्यायोगिनीपरमा कला ॥ महाविभूतिर्दुर्घर्षा मूलप्रकृतिसम्भवा ॥ ३० ॥
संसारयोनि, सर्वस्वरूपा, सब शक्तिसे उत्पन्न होनेवाली, संसारसारा, दुर्बारा, कठिनतासे नेत्रगोचर होनेवाली, दुरासद १०० ॥ २९ ॥ प्राणशक्ति, प्राणविद्या, योगिनी, परमा, कला, महाविभूति, दुर्धर्षा मूलप्रकृतिसे उत्पन्न होनेवाली ॥ ३० ॥
अनाद्येनन्तविभवा परात्मा पुरुषो बली ॥ ११० ॥ सर्गस्थित्यंतकरणी सुदुर्वाच्या दुरत्यया ॥ ३१ ॥ शब्दयोनिश्र्शब्दमयी नादाख्या नादविग्रहा ॥ प्रधानपुरुषातीता प्रधानपुरुषात्मिका ॥ ३२ ॥
अनादि अनंत ऐश्वर्यंवाली, परमात्मा, पुरुष, बली ११० सृष्टिकी स्थिति और अंत करनेवाली, कहनेमें न आनेवाली, दुरत्यय ॥ ३१ ॥ शब्दसे उत्पन्न होनेवाली, शब्दमयी, नाद नामवाली, तथानादविग्रहवाली, प्रधानपुरुषसे परे, प्रधानपुरुषात्मिका ॥ ३२ ॥
पुराणी १२० चिन्मयी पुंसामादिः पुरुषरूपिणी ॥ भूतांतरात्मा कूटस्था महापुरुषसंज्ञिता ॥ ३३ ॥ जन्ममृत्युजरातीता सर्वशक्तिसमन्विता ॥ व्यापिनी चानवच्छिन्ना १३० प्रधाना सुप्रवेशिनी ॥ ३४ ॥
पुराणी १२० चिन्मयी, पुरुषोंमें आदि पुरुषके रूपवाली, भूतांतरात्मा, महापुरुष नामवाली ॥ ३३ ॥ जन्म मृत्यु जरासे परे, सब शक्तिसे संयुक्त, व्यापिनी, अनवच्छिन्ना १३०, प्रधानमें प्रवेश करनेवाली ॥ ३४ ॥
( १३८ ) अद्भुतरामायण [ पञ्चविंशति-
क्षेत्रज्ञा शक्तिरव्यक्तलक्षणा मलवर्जिता ॥ अनादिमायासंभिन्ना त्रितत्त्वा प्रकृतिर्गुणः १४० ॥ ३५ ॥ महामाया समुत्पन्ना तामसी पौरुषं ध्रुवा ॥ व्यक्ताव्यक्तात्मिका कृष्णा रक्तशुक्लाप्रसूतिका ३६ क्षेत्रकी जाननेवाली, शक्ति अव्यक्तलक्षणा, मलसे वर्जित्, अनादिमायासे संभिन्न, त्रितत्त्वा प्रकृति गुणस्वरूप १४० ॥ ३५ ॥ महामायासे समुत्पन्न तामसी ध्रुव पुरुषार्थवाली, व्यक्त अव्यक्तात्मिका, कृष्णाशुक्लप्रसूतिका ३६
स्वकार्या १५० कार्यजननी ब्रह्मास्या ब्रह्मसंश्रया ॥ व्यक्ता प्रथ- मजा ब्राह्मी महती ज्ञानरूपिणी ॥ ३७ ॥ वैराग्यैश्वर्यधर्मात्मा ब्रह्म मूर्ति १६० हृदिस्थिता ॥ जयदा जित्वरी जैत्री जयश्रीर्जयशालिनी ३८ स्वकार्या १५० कार्यकी जननी, ब्रह्मके आश्रयभूत (ब्रह्मसंश्रयवाली) प्रगट, प्रथम उत्पन्न होनेवाली, ब्राह्मी, महती, ज्ञानरूपिणी ॥ ३७ ॥ वैराग्य, ऐश्वर्य धर्मात्मा, ब्रह्ममूर्ति १६०, हृदयमें स्थित, जयदाता, शीघ्र जीतनेवाली, जैत्री, जयलक्ष्मी, जययुक्त ॥ ३८ ॥
सुखदा शुभदा सत्या शुभा १७० संक्षोभकारिणी ॥ अपां योनिः स्वयंभूतिर्मानसी तत्त्वसंभवा ॥ ३९ ॥ ईश्वराणी च शर्वाणी शंकरा- र्द्धशरीरिणी ॥ भवानी चैव रुद्राणी १८० महालक्ष्मीरथांबिका ४० सुखदायक, शुभदायक, शुभा १७०, संक्षोभ करनेवाली, जलोंकी योनि, स्वयंभूति, मानसी, तत्त्वसंभवा ॥ ३९ ॥ ईश्वराणी, शर्वाणी, शंकरके अर्द्धशरीरवाली भवानी, रुद्राणी १८० महालक्ष्मी, अम्बिका ॥ ४० ॥
माहेश्वरी समुत्पन्ना भुक्तिमुक्तिफलप्रदा ॥ सर्वेश्वरी सर्ववर्णा नित्या मुदितमानसा ॥ ४१ ॥ ब्रह्मेंद्रोपेंद्रनमिता शंकरेच्छानुवर्तिनी १९० ॥ ईश्वराद्धासिनगता रघूत्तमपतिव्रता ॥ ४२ ॥ माहेश्वरी, प्रगट होनेवाली, भुक्ति मुक्तिका फल देनेवाली, सर्वेश्वरी, सुवर्णयुक्ता, नित्या, मुदित मनवाली ॥ ४१ ॥ ब्रह्मा इन्द्र उपेन्द्रसे निमत, शंकरकी इच्छासे वर्तनेवाली १९० ईश्वरके अर्धआसनमें प्राप्त, रघुश्रेष्ठकी पतिव्रता ॥ ४२ ॥
सकृद्विभाविता सर्वा समुद्रपरिशोषिणी ॥ पार्वती हिमवत्पुत्री परमानन्ददायिनी ॥ ४३ ॥ गुणाढ्या योगदा २०० योग्या ज्ञान- मूर्तिर्विकाशिनी ॥ सावित्री कमला लक्ष्मीश्रीननंतोरसि स्थिता ४४ ।
सर्ग] हिन्दीटीकासहित (१३९)
सर्ग] हिन्दीटीकासहित (१३९)
एकही वार सबकी भावना करनेवाली समुद्रकी शोषनेवाली, पार्वती, हिमालयकी पुत्री, परमानन्दकी देनेवाली ॥ ४३ ॥ गुणोंमें श्रेष्ठ, योगदायक २०० योग्या, ज्ञानमूर्तिका विकास करनेवाली, सावित्री, कमला, लक्ष्मी, श्री, अनन्तके हृदयमें स्थित ॥ ४४ ॥
सरोजनिलया शुभ्रा योगनिद्रा १२० सुदर्शना ॥ सरस्वती सर्वविद्या जगज्ज्येष्ठा सुमंगला ॥ ४५ ॥ वासवी वरदा वाच्या कीर्तिः सर्वार्थसाधिका २२० ॥ वागीश्वरी सर्वविद्या महाविद्या सुशोभना ४६
कमलके स्थानवाली, शुभ्र, योगनिद्रा, २१० सुदर्शना, सरस्वती, सर्वविद्या, जगज्ज्येष्ठा, सुमंगला ॥ ४५ ॥ वासवी, वरदाता, वाच्या, सब अर्थ साधनेवाली २२० वागीश्वरी, सर्वविद्या, महाविद्या, सुशोभना ॥ ४६ ॥
गुह्यविद्यात्मविद्या च सर्वविद्यात्मभाविता ॥ स्वाहा विश्वंभरी २३० सिद्धिः स्वधा मेधा धृतिः श्रुतिः ॥ ४७ ॥ नाभिः सुनाभिः सुकृतिर्माधवी नरवाहिनी २४० ॥ पूजा विभावरी सौम्या भगिनी भोगदायिनी ॥ ४८ ॥
गुह्यविद्या, आत्मविद्या, सर्वभाविता स्वाहा विश्वम्भरी, २३० सिद्धि, स्वधा, मेधा, धृति श्रुति ॥ ४७ ॥ नाभि, सुनाभि, सुकृति, माधवी, नरवाहिनी २४० पूज्या, विभावरी, सौम्या, भगिनी, भोग देनेवाली ॥ ४८ ॥
शोभा वंशकरी लीला मानिनी परमेष्ठिनी २५० ॥ त्रैलोक्यसुन्दरी रम्या सुन्दरी कामचारिणी ॥ ४९ ॥ महानुभावमध्यस्था महामहिषमर्दिनी ॥ पद्ममालापापहरा विचित्रमुकुटानना ॥ ५० ॥
शोभा, वंशकरी, लीला, मानिनी, परमेष्ठिनी २५० त्रैलोकसुन्दरी, कामचारिणी, ॥ ४९ ॥ महानुभावके मध्यमें स्थित होनेवाली, महामहिषकी मारनेवाली, पद्ममाला. पापकी हरनेवाली, विचित्र मुकुट मुखवाली ॥ ५० ॥
कांता २६० चित्राम्बरधरा दिव्याभरणभूषिता ॥ हंसाख्या व्योमनिलया जगत्सृष्टिविवर्द्धिनी ॥ ५१ ॥ नियंता मन्त्रवाहस्था नंदिनी भद्रकालिका ॥ आदित्यवर्णा २७० कौमारी मयूरवरवाहिनी ॥ ५२ ॥
कान्ता २६० चित्र अम्बर धारण करनेवाली, हंसनामक आकाशमें स्थानवली, जगत्की सृष्टि बढानेवाली ॥ ५१ ॥ नियंता, मंत्रके बाहर स्थित,
(१४०) अद्भुतरामायण [पंचविंशति-
नंदिनी, भद्रकालिका, आदित्यवर्णा, २७० कौमारी श्रेष्ठ मोरपर चढने- वाली ॥ ५२ ॥
वृषासनगता गौरी महाकाली सुरार्चिता ।। अदितिर्नियता रौद्री पद्मगर्भा २८० विवाहना ॥ ५३ ॥ विरूपाक्षी लेलिहाना महासुरविना शिनी ॥ महाफलानवद्यांगी कामपूरा विभावरी ॥ ५४ ॥
वृषके आसनपर स्थित, गौरी, महाकाली देवताओंसे अर्चित, अदिति नियता, रौद्री, पद्मगर्भा, २८० विवाहना ॥ ५३ ॥ विरूपाक्षी, जिह्वासे होठ चाटनेवाली, महाअसुरोंकी नाश करनेवाली, कामफला, निन्दारहित अंग- वाली, कामपूरा विभावरी ॥ ५४ ॥
विचित्ररत्नमुकुटा प्रणतर्द्धिविवर्द्धिनी २९० ।। कौशिकी कर्षिणी रात्रिस्त्रिदशार्त्तिविनाशिनी ॥ ५५ ॥ विरूपा च सुरूपा च भीमा मोक्षप्रदायिनी ॥ भक्तार्त्तिनाशिनी भव्या ३०० भवभावविना-, शिनी ॥ ५६ ॥
विचित्र मुकुटवाली, भक्तोंकी ऋद्धि बढानेवाली, २९० कौशिकी कर्षिणी रात्रि, देवताओंके दुःख नाश करनेवाली ॥ ५५ ॥ विरूपा, सुरूपा, भीमा, मोक्षदाता, भक्तोंके दुःखनाशक, भव्या ३०० भवभावविनाशिनी ॥ ५६ ॥
निर्गुणा नित्यविभवा निःसारा निरपत्रपा ।। यशस्विनी सामगी- तिर्भावांगनिलयालया ॥ ५७ ॥ दीक्षा ३१० विद्याधरी दीप्ता महेंद्र- वनिपातिनी ॥ सर्वातिशायिनी विद्या सर्वशक्तिप्रदायिनी ॥ ५८ ॥
निर्गुणा, नित्यविभाववाली, निःसारा, निरपत्रपा (लज्जारहित), यश- स्विनी, सामगीति, भवांगनिलयालया ॥ ५७ ॥ दीक्षा ३१० विद्याधरी, दीप्ता, महेन्द्रनिपातिनी, सबसे अधिक विद्या, सब शक्तिकी देनेवाली ॥ ५८ ॥
सर्वेश्वरप्रिया तार्क्षी समुद्रान्तरवासिनी ॥ अकलंका निराधारा ३२० नित्यसिद्धा निरामया ॥ ५९ ॥ कामधेनुर्वेदगर्भा धीमती मोहनाशिनी ॥ निःसंकल्पा निरातंका विनया विनयप्रदा ३३० । ६०।
सर्वेश्वरकी प्रिया, तार्क्षी, समुद्रके अन्तरमें निवास करनेवाली, कलंकरहित, निराधारा, ३२० नित्यसिद्धा, निरामया, ॥ ५९ ॥ कामधेनु, वेदगर्भा, धीमती, मोहनाशिनी, निःसंकल्पा, निरातंका, विनयप्रदा ३३० ॥ ६० ॥
सर्ग हिन्दीटीकासहित (१४१)
सर्ग हिन्दीटीकासहित (१४१)
ज्वालामालासहस्राढ्या देवदेवी मनोन्मनी ॥ उर्वी गुर्वी गुरुः श्रेष्ठा सगुणा षड्गुणात्मिका ॥ ६१ ॥ महाभगवती ३४० भव्या वसुदेवसमुद्भवा ॥ महेंद्रोपेंद्रभगिनी भक्तिगम्यपरायणा ॥ ६२ ॥ ज्वालामालासहस्राढ्या, देवदेवी, मनोन्मनी, उर्वी, गुर्वी, श्रेष्ठा, षड्-गुणात्मिका ॥ ६१ ॥ महाभगवती ३४० भव्या, वसुदेवसमुद्भवा, महेन्द्रोपेन्द्र-भगिनी, भक्तिगम्यपरायणा ॥ ६२ ॥
ज्ञानज्ञेया जरातीता वेदांतविषया गतिः ॥ दक्षिणा ३५० दहना बाह्या सर्वभूतनमस्कृता ॥ ६३ ॥ योगमाया विभावज्ञा महामोहा महीयसी ॥ सत्या सर्वसमुद्भूतिर्ब्रह्मवृक्षाश्रया ३६० मतिः ॥ ६४ ॥ ज्ञानज्ञेया, जरातीता, वेदान्तविषया, गति, दक्षिणा, ३५० दहना, बाह्या, सर्वभूतसे नमस्कृत ॥ ६३ ॥ योगमायाका विभाव जाननेवाली, सत्या, सबकी उत्पन्न करनेवाली, ब्रह्मवृक्षकी आश्रय करनेवाली ३६० मति ॥ ६४ ॥
बीजांकुरसमुद्भूतिर्महाशक्तिर्महामतिः ॥ ख्यातिः प्रतिज्ञा चित्सं-विन्महायोगेंद्रशायिनी ॥ ६५ ॥ विकृतिः ३७० शांकरी शास्त्री गंधर्वा यक्षसेविता ॥ वैश्वानरी महाशाला देवसेना गुहप्रिया ॥ ६६ ॥ बीज अंकुरकी उत्पत्तिका कारण, महाशक्ति, ख्याति, प्रतिज्ञा, चित्संवित्, महायोगेन्द्रशायिनी ॥ ६५ ॥ विकृति, ३७० शांकरी, शास्त्री, गन्धर्वा, यक्षसे सेवित, वैश्वानरी, महाशाला, देवसेना, गुहप्रिया ॥ ६६ ॥
महारात्री शिवानंदा शची ३८० दुःस्वप्ननाशिनी ॥ पूज्याऽपूज्या जगद्धात्री दुर्विज्ञेयस्वरूपिणी ॥ ६७ ॥ गुहांबिका गुहोत्पत्तिर्महापीठा मरुत्सुता ॥ हव्यवाहांतरा ३९० गार्गी हव्यवाहसमुद्भवा ॥ ६८ ॥ महारात्रि, शिवानन्द, शची ३८० दुःस्वप्ननाशिनी, पूज्या, अपूज्या, जगद्धात्री, दुर्विज्ञेयस्वरूपिणी ॥ ६७ ॥ गुहाम्बिका, गुहोत्पत्ति, महापीठा, मरुत्सुता, हव्यावाहान्तरा ३९० मार्गी, हव्यवाहसमुद्रवा ॥ ६८ ॥
जगद्योनिर्जगन्माता जगन्मृत्युर्जरातिगा ॥ बुद्धिर्माता बुद्धिमती पुरुषांतरवासिनी । ४०० ॥ ६९ ॥ तपस्विनी समाधिस्था त्रिनेत्रा दिविसंस्थिता ॥ सर्वेंद्रियमनोमाता सर्वभूतहृदिस्थिता ॥ ७० ॥ जगत्की योनी, जगत्की मृत्यु और जराका अतिक्रमण करनेवाली, बुद्धि, माता, बुद्धिमती, पुरुषान्तरवासिनी ४०० ॥ ६९ ॥ तपस्विनी, समाधिमें