अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
(52) अगस्त्य-संहिता ———————————————————————————— श्रीरामद्वारपीठाङ्गपरिवारतया स्थिताः। ये सुरास्तानिह स्तौमितन्मूलाः सिद्धयो यतः। श्रीराम के द्वार पर, पीठ पर, अङ्ग के रूप में तथा परिवार के रूप में जो देवगण उल्लिखित हैं, उनकी स्तुतियाँ मैं करता हूँ; क्योंकि सिद्धियाँ उन्ही के द्वारा प्राप्त होतीं हैं। वन्दे गणपतिं भानुं त्रिलोकस्वामिनं शिवम्।।३।। क्षेत्रपालं तथा धात्रीं विधातारमनन्तरम्। गृहाधीशं गृहं गङ्गां यमुनां कुलदेवताम्।।४।। प्रचण्डचण्डौ च तथा शंखपद्मनिधी अपि। वास्तोष्पतिं द्वारलक्ष्मीं गुरुं वागधिदेवताम्।।५।। सर्वप्रथम गणेश, सूर्य, तीनों लोकों के स्वामी शिव, क्षेत्रपाल तथा धात्री की पूजा करें। इसके बाद ब्रह्मा की पूजा करें। फिर वास्तु के स्वामी, वास्तु, गंगा, यमुना और कुलदेवता की पूजा करें। प्रचण्डा, चण्ड, शंख, पद्म, निधि, वास्तोष्पति, द्वारलक्ष्मी, गुरु और वाक् की देवता सरस्वती की पूजा करें। एताः संपूज्य भक्त्याहं श्रीरामद्वारदेवताः। महामण्डूककालाग्निरुद्राभ्यां प्रणमाम्यहम्।।६।। आधारशक्तिकूर्माभ्यां नागाधिपतये तथा। पृथिव्यै च तथा लक्ष्म्यै सागराय¹ नमो नमः।।७।। श्वेतद्वीपाय रत्नाद्रौ कल्पवृक्षाय ते नमः। सुवर्णमण्डपायाथ पुष्पकाय महार्हते।।८।। विमानायाष्टरत्नाय सम्यक्सिंहासनाय च। उद्यदादित्यसंशोभिपद्माय तदनन्तरम्।।९।। श्रीराम के इन द्वार-देवताओं की पूजा कर प्रार्थना करें- 'महामण्डूक और कालाग्निरुद्र को प्रणाम करता हूँ। आधारशक्ति और कूर्मदेव को प्रणाम। शेषनाग को प्रणाम। पृथ्वी, लक्ष्मी और सागर को प्रणाम। श्वेतद्वीप और रत्नपर्वत पर स्थित कल्पवृक्ष को प्रणाम। सुवर्ण-मण्डप और विशाल पुष्पक विमान को प्रणाम। आठो रत्नों को और सुन्दर सिंहासन को प्रणाम। इसके बाद उगते हुए सूर्य के समान शोभायमान कमल पुष्प को प्रणाम।
- क. क्षीरसागराय
दशमोऽध्यायः (53) नमामि धर्मज्ञानाभ्यां वैराग्याद्यग्नितः क्रमात्। ऐश्वर्याय नमो धर्मज्ञानाभ्यां पूर्वतस्तथा।।10।। अवैराग्याय च तथानैश्वर्याय नमो नमः। इसके बाद धर्म, ज्ञान, वैराग्य और ऐश्वर्य को अग्निकोण से आरम्भ चारो कोणों में प्रणाम। पूर्व में धर्म और अज्ञान, दक्षिण में ज्ञान और अवैराग्य पश्चिम में वैराग्य और अनैश्वर्य तथा उत्तर में ऐश्वर्य और अधर्म को प्रणाम। अं अर्कमण्डलायाहमुपुर्युपरि सर्वदा।।11।। सत्त्वाय रजसे नित्यं तमसेपि नमो नमः। चं चन्द्रमण्डलमिति ध्यात्वाध्यात्वा नमाम्यहम्।।12।। रमग्निमण्डलायेति सम्पूज्यैव प्रयत्नतः। विमलोत्कर्षिणीज्ञानाक्रियायोगाभ्य इत्यपि।।13।। नमामि प्रह्वीसत्याभ्यामीशानायै दलान्तरे। पूर्वावितोऽनुग्रहायै प्रणमामि तदन्तरे।।14।। यन्त्र पर सूर्यमण्डल के ऊपर हमेशा सत्त्व, रजस् और तमस् को प्रणाम। चन्द्रमण्डल को बार-बार ध्यान कर प्रणाम। ‘रं’ स्वरूप अग्निमण्डल को प्रणाम। इस प्रकार यत्नपूर्वक पूजित दलों के मध्य में- विमला, उत्कर्षिणी, ज्ञाना, क्रिया, योगा, प्रह्वी, सत्या और ईशाना' को पूर्व से प्रारम्भ कर प्रणाम। इसके बाद अनुग्रहा को प्रणाम। नमो भगवते तद्वद् विष्णवे तदनन्तरम्। सर्वभूतात्मने चेति वासुदेवाय इत्यपि¹।।15।। ततः सर्वात्मकायेति योगपीठात्मने नमः।। प्रणवादिनमोऽन्ताय मन्त्रपीठात्मने नमः।।16।। इसके बाद भगवान् विष्णु को प्रणाम। प्रत्येक प्राणी की आत्मा में रहनेवाले वासुदेव को प्रणाम। तब सभी की आत्मा के स्वरूप योगपीठ स्वरूप सिंहासन को प्रणाम। आदि में प्रणव (ॐकार) और अन्त में ‘नमः’ से युक्त मन्त्र पीठस्वरूप को प्रणाम। यजामहे स्वरामोँ ह्रीं आत्मना संव्यवस्थितौ। नमोऽन्ताय रामाय ससीताय नमो नमः।।17।।
- घ. इत्यथ। Rarest Archiver
(54) अगस्त्य-संहिता
सान्निध्याधारयोगेन नियतेन षडात्मना। व्यवस्थिताय रामाय नमोऽनन्ताय विष्णवे¹।।18।। श्रीबीजाद्योऽपि सीतायै स्वाहान्तोऽयं षडक्षरः। तदेतन्मन्तरूपाय रामाय ज्योतिषे नमः।।19।। ॐ रां रां यजामहे, ॐ ह्रीं आत्मने नमः, ॐ रामाय नमः, ॐ ससीताय नमः। सान्निध्य और आधार के संयोग से नियत रूप में जो छह स्वरूपों में स्थित हैं, ऐसे श्रीराम को प्रणाम। ॐ अनन्ताय नमः, ॐ विष्णवे नमः, ॐ श्रीं सीतायै स्वाहा ये षडक्षर मन्त्र हैं। इन मन्त्रों के स्वरूप ज्योतिःस्वरूप राम को प्रणाम। सानुस्वारस्वरान्ताय वह्नये हृदयाय च। नमश्चैव स्वरान्ताय स्वाहान्ताय कृशानवे।।20।। शिरसेऽप्यग्नये चान्तः शिखायै वषडात्मने।। ऐमस्त्राय हृदे नित्यं कवचाय हुं ते नमः²।।21।। चतुर्दशस्वरान्ताय सानुस्वाराय वह्नये।। नेत्राभ्यां वौषडान्ताय परोऽस्त्राय, फडत्मने।।22।। अनुस्वार के साथ अन्त में रेफ लगाकर वह्निदेव से न्यस्त हृदय को प्रणाम। वृद्धि के स्वामी अग्नि को प्रणाम। (एधेश्वराय कृशानवे स्वाहा) शिर पर न्यस्त वकार सहित अग्नि को प्रणाम (वं अग्नये शिरसे स्वाहा) वषट्कार जो शिखा पर न्यस्त हैं उन्हें प्रणाम। (‘शिखायै वषट्’) ऐं सहित वह्नि, जो नित्य कवच स्वरूप हैं उन्हें प्रणाम (ऐं वह्नये कवचाय हुम्) अनुस्वार सहित चतुर्दश स्वरों के साथ वह्नि जो वौषट् स्वरूप दोनों नेत्रों में न्यस्त हैं उन्हें प्रणाम (अं आं इं ईं उं ऊं ऋं ॠं लृं लॄं एं ऐं ओं औं वह्नये नेत्राभ्यां वौषट्) इसके बाद फट् स्वरूप अस्त्र को प्रणाम (अस्त्राय फट्) एवं नमः षडङ्गाय रामाय ज्योतिषे नमः। आत्मान्तरात्मपरमज्ञानात्मभ्योऽग्नितः क्रमात्।।23।। इस प्रकार आत्मा, अन्तरात्मा, परमात्मा, ज्ञानात्मा स्वरूप जो ज्योतिः स्वरूप राम क्रमशः अग्नि, नैर्ऋत्य, वायव्य और ईशान कोण में स्थित हैं, उन्हें प्रणाम। निवृत्त्यै च प्रतिष्ठायै विद्यायै ते नमाम्यहम्। शान्त्यै चात्मादिशक्तित्वे स्थित्यै तद्रूपिणे नमः।।24।।
- घ. वह्नये। 2. घ. हुमेव च।
दशमोऽध्यायः (55) वासुदेवाय ते नित्यं तथा संकर्षणाय च। प्रद्युम्नायानिरुद्धाय श्रियै शान्त्यै नमो नमः।।25।। प्रीतै रत्यै नमो राम द्वितीयावरणात्मने। निवृति, प्रतिष्ठा, विद्या और शान्ति जो आत्मा आदि चारों की शक्तियाँ हैं, उन्हें प्रणाम। वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न, अनिरुद्ध इन चारो को प्रणाम। पुनः श्रीः, शान्ति, प्रीति और रति जो इनकी शक्तियाँ हैं, उन्हें द्वितीयावरण में प्रणाम। अग्रे हनूमान् सुग्रीवो भरतश्च विभीषणः ।।26।। लक्ष्मणोऽप्यङ्गदश्चैव शत्रुघ्नो जाम्बवाँस्तथा। धृष्टिर्जयन्तो¹ विजयः सुराष्ट्रो राष्ट्रवर्द्धनः ।।27।। अकोपो धर्मपालश्च सुमन्तश्चाष्टमन्त्रिणः। एतेभ्यो रामरूपेभ्यो युष्मभ्यं प्रणमाम्यहम् ।।28।। आगे में हनूमान्, सुग्रीव, भरत, विभीषण, लक्ष्मण, अंगद, शत्रुघ्न, जाम्बवान्, धृष्टि, जयन्त, विजय, सुराष्ट्र, राष्ट्रवर्द्धन, अकोप, धर्मपाल और सुमन्त ये आठ मन्त्री हैं। ये सोलह, जो रामस्वरूप हैं, उन्हें प्रणाम। इन्द्राग्नियमदेवेभ्यो सायुधेभ्यो नमो नमः। नमो निर्ऋतये तुभ्यं वरुणाय नमो नमः।।29।। वायवे धनदायाथ रुद्रायेशाय ते नमः। ब्रह्मणेऽनन्तरूपाय दिक्पालायात्मने नमः।।30।। अपने अपने अस्त्र-शस्त्रों के साथ इन्द्र, अग्नि, यम, निर्ऋति, वरुण, वायु, कुबेर, रुद्र, ब्रह्मा और अनन्त इन दश दिक्पालों को प्रणाम। तदायुधाय वज्राय शक्तये दण्डकाय च। नमः खड्गाय पाशाय ध्वजाय च गदात्मने ।।31।। त्रिशूलायाम्बुजायाथ चक्राय सततं नमः। इनके अस्त्र-शस्त्र स्वरूप वज्र, शक्ति, दण्ड, खड्ग, पाश, ध्वज, गदा, त्रिशूल, कमल और चक्र को सदा प्रणाम। वसिष्ठो वामदेवश्च जाबालिर्गौतमस्तथा।।32।। भरद्वाजः कौशिकश्च वाल्मीकिर्नारदस्तथा।
- घ. धृतिर्जयन्तो ।
(56) अगस्त्य-संहिता
वसिष्ठ, वामदेव, जाबालि, गौतम, भरद्वाज, कौशिक, वाल्मीकि और नारद ये आठ पार्षद ऋषि हैं। नलं नीलं च गवयं गवाक्षं गन्धमादनम् ।।33।। सुरभिश्चापि मैन्दं च द्विविदं च जपेत् क्रमात् ।¹ नल, नील, गवय, गवाक्ष, गन्धमादन, सुरभि, मैन्द और द्विविद का भी क्रमशः जप करना चाहिए। शङ्खचक्रगदापद्मशार्ङ्गबाणात्मने नमः ।।34।। गरुत्मते नमस्तुभ्यं विष्वक्सेनादिकाश्च ये। शंख, चक्र, गदा, पद्म, शार्ङ्ग और बाण इन शस्त्रास्त्रों को प्रणाम। हे गरुड़ आपको प्रणाम, शार्ङ्ग धारण करने वाले विष्वक्सेन आदि को प्रणाम। सर्वैश्वर्यस्वरूपाय ज्योतिषे सततं नमः ।।35।। मनोवाक्कायसहितं कर्म यद् वा शुभाशुभम् ।। तत्सर्वं प्रीतये भूयान्नमो रामाय शार्ङ्गिणे ।।36।। सभी प्रकार के ऐश्वर्य के स्वरूप तथा प्रकाशस्वरूप श्रीराम को प्रणाम। मेरे मन, वचन तथा शरीर से जो भी शुभ अथवा अशुभ कर्म किये गये हैं उन सबसे श्रीराम प्रसन्न हों। शार्ङ्ग धनुषधारी श्रीराम को प्रणाम। एतद् रहस्यं सततं प्रत्यूषसि समाहितः। यः पठेद् राममाहात्म्यं सर्वैश्वर्यनिधिर्भवेत् ।²।37।। विनाशयेदसौभाग्यं दारिद्र्यौघं निकृन्तयेत्। उपद्रवांश्च शमयेत् सर्वलोकं वशं नयेत् ।।38।। यः पठेत् प्रातरुत्थाय ब्रह्मार्पणधियान्वहम्। स याति शाश्वतं ब्रह्म पुनरावृत्तिदुर्ल्लभम् ।।39।। जो प्रतिदिन प्रातःकाल इस रहस्यमय राम माहात्म्य का पाठ करते हैं, वे सभी ऐश्वर्यों के भण्डार बन जाते हैं। यह माहात्म्य दुर्भाग्य का विनाश करता है; दरिद्रताओं को काटता है, उपद्रवों को शान्त करता है, सबको वश में ला देता है। जो प्रातःकाल उठकर ब्रह्म को समर्पित करने की बुद्धि से प्रतिदिन स्तोत्र का पाठ करते हैं। वे उस अविनाशी ब्रह्म को पा लेते हैं, जहाँ से पुनर्जन्म नहीं होता।
- घ. ये चार चरण में अनुपलब्ध। 2. घ. विश्वैश्वर्य० Rarest Archiver
एकादशोऽध्यायः (57) ———————————————————————————————— नारदीयमिदं स्तोत्रं सुतीक्ष्ण मुनिसत्तम। पठितव्यं प्रयत्नेन रामार्चनपरायणैः।।40।। हे मुनिश्रेष्ठ सुतीक्ष्ण! यह नारदोक्त स्तुति है जिसे श्रीराम की उपासना करनेवालों को प्रयत्नपूर्वक पढ़ना चाहिए। गणपत्यादयः सर्वे द्वाराङ्गावृत्तिरूपिणः। प्रणवादिचतुर्थ्यादिनमोन्ताः स्वस्वनामभिः।।41।। पूजनीयाः प्रयत्नेन गन्धपुष्पाक्षतादिभिः। उपचारैः षोडशभिः तथैकादशभिर्मुने¹।।42।। पंचभिर्वा प्रयत्नेन स्वशक्त्यानुरूपतः। गणपति आदि सभी जो द्वारदेवता, अङ्ग देवता और चारो ओर फेरा लगानेवाले (परिक्रमा करनेवाले) देवता हैं, उनकी पूजा गन्ध, पुष्प, अक्षत आदि से प्रणव (ॐकार) आरम्भ में तथा नमः अन्त में लगाकर अपने अपने नाम के चतुर्थ्यन्त पद से पंचोपचार, एकादशोपचार तथा षोडशोपचार से अपनी शक्ति के अनुसार करें। गणपत्यादयोऽप्येवं पूजनीयाः प्रयत्नतः।। ²गणपत्यादयो ह्येते पूजिताः पूजयन्त्यपि।।43।। ³तस्मात् सर्वप्रयत्नेन स्तोत्रमेतत् समभ्यसेत्।।44।। इसी प्रकार गणपति आदि की भी पूजा करनी चाहिए। ये गणपति आदि पूजित होकर स्वयं श्रीराम की पूजा करते हैं, अतः सभी उपायों से इस स्तोत्र का अभ्यास करना चाहिए। इत्यगस्त्यसंहितायां परमरहस्ये पूजाविधिर्नाम दशमोऽध्यायः।
- घ. पुनः। 2.-3. घ. में अनुपलब्ध।
(58) अगस्त्य-संहिता एकादशोऽध्यायः अगस्त्य उवाच शरीरं शोधयेदादावधिकारार्थमन्वहम्। तीर्थावगाहनं बाह्येऽप्यन्तर्भूतविशोधनम्।।1।। मातृकान्यासयोगैश्च शोधयेद् विध्यनुष्ठितः। अगस्त्य बोले- प्रतिदिन पूजा के अधिकारी बनने के लिए सबसे पहले शरीर की शुद्धि करें। बाह्य शोधन के लिए जल में डुबकी लगावें तथा आन्तरिक शोधन के लिए विधिपूर्वक मातृकावर्णों का न्यास करें। पूजाद्रव्याणि च ततः शोधयेत् प्रोक्षणादिभिः।।2।। पूजापात्राणि शङ्खञ्च शोधयेत् क्षालनादिना। शुद्धश्च शुद्धद्रव्यैश्च पूजयेत् पुरुषोत्तमम्।।3।। एवमाराधितो देवः सम्यगाराधितो भवेत्। न चेन्निरर्थकं सर्वं सिन्धुसैकतवृष्टिवत्।।4।। इसके बाद पोंछकर पूजा में प्रयुक्त सामग्रियों का शोधन करें। पूजा की थाली, लोटा, शंख, आदि को जल से धोवें। पवित्र पात्रों और सामग्रियों से पुरुषोत्तम की पूजा करनी चाहिए। इस प्रकार आराधना करने से देवता अच्छी तरह प्रसन्न होते हैं, नहीं तो समुद्र की रेत पर हुई वर्षा के समान सब कुछ व्यर्थ हो जाता है। शौचाचमनहीनस्य स्नानसन्ध्यादिकाः क्रियाः। निष्फलाः स्युर्यथा चेतो ह्यन्तरेण भवेत्तथा।।5।। शौच और आचमन किये विना जो स्नान, सन्ध्या आदि करते हैं, उनकी समस्त क्रियाएँ व्यर्थ हो जाती हैं, जैसे चेतन के विना सब कुछ व्यर्थ हो जाता है। संशोध्य पूजाद्रव्याणि स्वस्यापि बहिरन्तरम्। शङ्खञ्च पूजयेत् पूर्वं पूज्यं पूजार्हतां व्रजेत्।।6।। पूजा-सामग्रियों को पवित्र कर स्वयं भी बाहर और भीतर से पवित्र होकर शंख की पूजा करें। पहले पूजित शंख पूजा का साधन बनने योग्य होता है।
एकादशोऽध्यायः (59) पूजकस्याथ पूज्यस्यापावनस्य कृतं वृथा। अपावनान्यपूज्यानि साधनानि विवर्जयेत्।।7।। अपवित्र पूजक और पूज्य दोनों द्वार किए गये कार्य व्यर्थ हो जाते हैं। अतः अपवित्र एवं अपूज्य साधन का त्याग कर देना चाहिए। अतः स्नात्वा प्रकुर्वीत भूतशुद्धिं विधाय च। विन्यस्य मातृकां पूर्वं वैष्णवीं केशवादिकाम्।।8।। इसलिए स्नान करके भूत-शुद्धि कर पहले वैष्णव और केशव की मातृका का न्यास करें। विधाय तत्त्वन्यासञ्च न्यासं तन्मूर्तिपञ्जरम्। तदृषिच्छन्दसोन्यासं¹ तथा तन्मन्त्रदेवताम्।।9।। विन्यस्यैव षडङ्गानि तत्तद्बीजाक्षराणि च। इसके बाद तत्त्वन्यास, मूर्ति-पंजरन्यास, ऋषि-न्यास, छन्दोन्यास, मन्त्र- न्यास तथा देवता-न्यास करें। इस छह अंगों का न्यास कर उनके बीजाक्षरों का भी न्यास करें। अथातो देवताध्यानं ततः पूजनमन्ततः।।10।। ततो निवेद्य तत्सर्वं जपेन्मन्त्रमनन्यधीः। ततो विज्ञाप्य देवेशं परिवारांश्च पूजयेत्।।11।। एवं सम्पूजितो देवः सर्वान् कामान् प्रयच्छति। इसके बाद देवता का ध्यान कर पूजन करें। इसके बाद सब कुछ निवेदित कर अनन्यचित्त होकर मन्त्र का जप करें। तब मुख्य देव श्रीराम को सबकुछ ज्ञापित कर श्रीराम के परिजनों की पूजा करें। इस प्रकार पूजित देव सभी कामनाओं की पूर्ति करते हैं। बाह्यपूजां ततः कुर्यादैहिकाभ्युदयाय वै।।12।। विलिप्य वेदिकां सम्यङ्मण्डलं तत्र कारयेत्। तब सांसारिक उन्नति के लिए बाह्य पूजा करें। तब वेदिका को लीप कर वहाँ उचित रीति से यन्त्र का निर्माण करावें।
- घ. छन्दसौऽभ्यासं।
(60) अगस्त्य-संहिता
शालितण्डुलचूर्णैश्च नीलपीतसितासितैः।।13।। लिखेदष्टदलं पद्मं चतुरस्रसमावृतम्। षट्कोणं कर्णिकामध्ये कोणाग्रे वृत्तसंवृतम्।।14।। धान के चावल के चूर्ण से नीला, पीला, सफेद और अन्य रंगों से चौकोर भूपुर सहित अष्टदल कमल बनायें और कर्णिका पर षट्कोण बनाकर उसके कोणाग्रभाग पर वृत्त बनाएँ। साध्यमेतत् ततो शोभारेखाभिरुपशोभितम्। सम्पूज्य मण्डलं चैव तत्र सिंहासनं न्यसेत्।।15।। बीच में साध्य लिखकर सुन्दर रेखाओं से शोभित मण्डल की पूजा कर वहीं श्रीराम और श्रीसीताजी का सिंहासन रखें। चन्द्रोदयपताकैश्च तोरणैरपि सर्वतः। विचित्रं तत्र तत्रापि भित्तिस्तम्भस्थलादिषु।।16।। चाँदोवा, पताका और बंदनवार से सर्वत्र अनेक प्रकार से सुन्दर ढंग से दीवाल खम्भा आदि को सजायें। एवं सुशोभितस्थाने सर्वमङ्गलसंयुते। पुण्यस्त्रीभिर्गृहस्थैश्च परितो व्यवहर्तृभिः।।17।। गायद्भिरपि नृत्यद्भिर्वदद्भिः स्तुतिपूर्वकम्।¹ भेरीमृदङ्गवंश्यादिकांस्यतालादिभिर्बहु² ।।18।। ³वादयद्भिश्च बहुधा सम्यगाराधितो यदि। रघुनाथः स्वयं तत्र प्रसन्नो भगवान् भवेत्।।19।। इस प्रकार शुभ वस्तुओं से सुशोभित, पुण्यवती स्त्रियों और गृहस्यों पूजा- सामग्रियों को लानेवाले लोगों, गायकों, नर्तकों और अनेक स्तुति करनेवालों, तुरही, मृदङ्ग, बाँसुरी, झाल आदि बजानेवालों से घिरे हुए स्थान में सम्यक् पूजित होकर श्रीराम स्वयं वहाँ प्रसन्न होते हैं। संपाद्य विविधैः पुष्पैः पूजयेच्चारुडालिकाम्।⁴ तुलसी पद्मजात्याद्यैर्माल्यैर्बहुविधैरपि।।20।। अनेक प्रकार के फूलों, कमल, जूही, विभिन्न प्रकार की माला तथा तुलसीदल आदि से भरी सुन्दर डाली (चंगेरी) की पूजा करें।
- घ. स्तुतिरूपकम्। 2. घ. ºर्मुहुः। 3. घ. में अनुपलब्ध। 4. पूजयेत्पुष्पचंदनीम्।
एकादशोऽध्यायः (61) स्वपुरो दक्षिणे तीर्थशुद्धवारिसुपूरितम्। कलशं स्वपुरो वामभागे तु विनियोजयेत्।।21।। अन्यानि पूजाद्रव्याणि पुरस्तादेव निक्षिपेत्। इसे अपने आगे दाहिने भाग में रखें तथा तीर्थ के जल से भरा हुआ कलश अपने आगे वायें भाग में रखें। पूजा की अन्य सामग्रियाँ सामने में ही रखें। आराधनाय देवस्य वेदिकाधः सुखासने।।22।। कुशास्तरणवैव्याघ्रचर्मवासो - विनिर्मिते । उपविश्य शुचिर्मौनी भूत्वा पूजां समाचरेत्।।23।। देव की आराधना के लिए वेदी के नीचे सुख से बैठने योग्य आसन, जो कुश, व्याघ्रचर्म या कपड़े का बना हुआ हो उसपर मौन होकर बैठें और पूजा का आरम्भ करें। तुलसीकाष्ठघटितैः रुद्राक्षाकारकारितैः। शङ्खचक्रगदापद्मपादुकाकारकारितैः ।।24।। निर्मितां मालिकां कण्ठे¹ निधायार्चनमाचरेत्। रुद्राक्ष, शङ्ख, चक्र, गदा, पद्म या पादुका की आकृति की बनी हुई तुलसीकाष्ठ की माला कण्ठ में धारण कर पूजा प्रारम्भ करें। तथामलकमालां च सम्यक् पुष्करमालिकाम् ।।25।। निर्माल्य तुलसीमालां शिरस्यपि निधाय वै। साथ ही, आँवले के पुष्प की माला, या कमल की सुन्दर माला या तुलसी की माला शिर पर रखकर पूजा आरम्भ करें। निर्लिप्य² चन्दनेनाङ्गमङ्कयेत् तस्य नामभिः। तस्यायुधानि बाह्वोश्च तेनैव द्विजसत्तम। अंगों पर चन्दन से श्रीराम के नामों का लेखन करें तथा बाहों पर उनके धनुष, बाण, गदा आदि आयुधों का अंकन उसी चन्दन से करें। पापिष्ठो वाप्यपापिष्ठः सर्वज्ञोऽप्यज्ञ एव वा।।27।। भवेदेवाधिकारोऽत्र पूजाकर्मण्यसंशयः।
- घ. कर्णे। 2. घ. निर्माल्य। Rarest Archiver
(62) अगस्त्य-संहिता
पापी हो या निष्पाप, विद्वान् हो या मूर्ख, श्रीराम की पूजा में सबका अधिकार है, इसमें सन्देह नहीं। पद्मस्वस्तिकभद्रादिरूपेणाकुञ्च्य पद्द्वयम् ।।२८।। पद्मासन, भद्रासन या स्वस्तिकासन के रूप में दोनों पैरों को मोड़कर बैठें। विनायकं नमस्कृत्य सव्यांशे च सरस्वतीम्। दक्षिणांशे पूर्ववच्च दुर्गां च क्षेत्रपं पुनः ।।२९।। प्रणम्याथ गुरून् भूयो नत्वा गुरुपरम्पराम्। गणेशजी को प्रणाम कर बायें भाग में सरस्वती को तथा पूर्ववत् दायें भाग में पर दुर्गा का न्यास कर पुनः वहीं क्षेत्रपाल का न्यास कर उन्हें प्रणाम करें। गुरु को प्रणाम कर अपनी गुरु-परम्परा को प्रणाम करें। ततो देवं नमस्कृत्य कुर्यात् तालत्रयं पुनः ।।३०।। तारमस्त्राय¹ फट् प्रोक्ता भ्रामयेद् दक्षिणं करम्। तब देवता को प्रणाम कर तीन ताल की क्रिया (तेताला) करें। तब “ॐ अस्त्राय फट्” इस मन्त्र से दाहिने हाथ को घुमावें। ततस्तु चिन्तयेद्देवमन्तःस्थानत्रयान्तरे ।।३१।। ज्योतिर्मयमनःपूतं सत्यं ज्ञानसुखात्मकम्। तब ज्योतिःस्वरूप, प्राणियों में पवित्र, सत्य, ज्ञान और सुख-स्वरूप देवता का ध्यान अन्तःकरण के तीनों में करें। आत्मनः परितो वह्निं प्राकारं त्राणाय च ।।३२।। भूतप्रेतपिशाचेभ्यो विधाय तदनन्तरम्। अद्भिः पुण्याक्षतैश्चैव वह्निबीजास्त्रमन्त्रितैः ।।३३।। प्रक्षिपेत् परितो मन्त्री भयविघ्ननिवृत्तये। इसके बाद घर की रक्षा के लिए अपने चारों ओर अग्नि का पूजन करें। तब भूत, प्रेत और पिशाच के लिए जल, अक्षत लेकर वह्निबीज (रं) एवं अस्त्र- मन्त्र ‘फट्’ से अभिमन्त्रित कर भय और विघ्न के नाश के लिए चारों ओर छिड़के। हृदम्बुजे ब्रह्मकन्दसम्भूते ज्ञाननालके ।।३४।। ऐश्वर्याष्टदलोपेते ज्ञानवैराग्यकर्णिके।² आराग्रमात्रो जीवस्तु चिन्तनीयो मनीषिभिः ।।३५।।
- क. ॐ कारश्चास्त्राय। 2. घ. परे वैराग्यकर्णिके।
एकादशोऽध्यायः (63) हृदय रूपी कमल के ब्रह्म रूपी कन्द से निकले हुए ज्ञान रूपी नाल पर ऐश्वर्य आदि आठ दलों वाला कमल है, जिसकी कर्णिका (कमल का मध्य भाग) ज्ञान और वैराग्य की है, इस कमल पर आरे की नोंक के समान सूक्ष्म जीव अवस्थित है, इस प्रकार का ध्यान मनीषियों को करना चाहिए। नेतव्यो हंसमन्त्रेण द्वादशान्तः स्थितः परः। तेन संयोज्य विधिवत् भूतशुद्धिमथाचरेत्।।36।। द्वादशार चक्र से इसे 'हं सः' इस मन्त्र से ऊपर लाना चाहिए और उससे शरीर का संयोजन कर भूत-शुद्धि करना चाहिए। भूतानि चाथ¹ पृथिवी जलं तेजो मरुद् वियत्। यद्यतो जायते तस्मिन् प्रलयोत्पादनं पुनः।।37।। पृथिवी, जल, अग्नि, वायु और आकाश ये पाँच भूत हैं, जहाँ से सृष्टि की उत्पत्ति होती है और पुनः उसी से जा मिलती है और पुनः उत्पन्न होती है। शरीराकारभूतानां भूतानां शोधनं विदुः। मरुदग्निसुधाबीजैः पञ्चाशन्मातृमात्रकैः।।38।। प्राणान्निरुध्यात्मदेहं शोधयेत् तत्पुनर्दहेत्। तं देहं पुनराप्लाव्य पुनर्जीवमिहानयेत्।।39।। शरीर के आकार में स्थित इन पाँच भूतों की शुद्धि ही भूतशुद्धि है। वायुबीज (यं) अग्निबीज (रं) और सुधाबीज (वं) के साथ पचास मातृकाओं से यह क्रिया करें। इसमें सबसे पहले प्राणवायु को रोककर अपने सूक्ष्म शरीर का शोधन करें, फिर उस अध्यात्म रूप सूक्ष्म शरीर को अग्नि में जलावें, फिर उसे जल मे डुबोकर जीव को शरीर में प्रविष्ट करावें। जीवने पुनरात्मानं चिन्तयेत् पुरुषाप्तये। जीवस्य तत्त्वसिद्धयै च तस्याप्यात्मत्वसिद्धये।।40।। जीवन में फिर पुरुषस्वरूप की प्राप्ति के लिए जीव के तत्त्व की सिद्धि तथा आत्मत्व की सिद्धि के लिए आत्मतत्त्व का चिन्तन करें। नयनानयनार्थं च हंसः सोऽहमितीरयेत्। भूतशुद्धिरियं नाम कर्त्तव्या मनसार्थकत्²।।41।।
- घ. नाम। 2. घ. भूतसाक्ष्यकृत्।
(64) अगस्त्य-संहिता
शरीर से जीव को अलग करने और लाने के लिए क्रमशः 'ॐ हंसः' और 'ॐ सोऽहम्' इन मन्त्रों का प्रयोग करें। यह भूतशुद्धि कहलाती है, जो मन से करनी चाहिए। इससे प्रयोजन की सिद्धि होती है। भूतशुद्धिं विना यस्य तपहोमादिकाः क्रियाः।¹ भवन्ति निष्फलाः सर्वाः प्रकारेणाप्यनुष्ठिताः।।42।। भूत शुद्धि के बिना जो तप, होम आदि क्रियाएँ करते हैं, उनकी सभी क्रियाएँ विधानपूर्वक करने के बाद भी निष्फल होती हैं। गृहोपसर्पणं चैव तथानुगमनं हरेः। भक्त्या प्रदक्षिणं चैव पादयोः शोधनं विदुः²।।43।। भगवान् के गृह (मन्दिर) जाना, श्रीहरि का अनुगमन करना तथा भक्ति पूर्वक प्रदक्षिणा करना ये तीन पैरों की शुद्धि है। पूजार्थं पत्रपुष्पाणां भक्त्यैवोत्तोलनं हरेः। करयोः सर्वशुद्धीनामियं शुद्धिविशिष्यते।।44।। श्रीहरि की पूजा के लिए पत्र-पुष्प पहुँचाना हाथों की अनेक प्रकार की शुद्धियों में विशिष्ट मानी जाती है। तन्नामकीर्तनं चैव गुणानामपि कीर्तनम्। भक्त्या श्रीरामचन्द्रस्य वचसः शुद्धिरिष्यते।।45।। भक्तिपूर्वक श्रीरामचन्द्र के नाम और गुणों का कीर्तन वाणी की शुद्धि मानी जाती है। तत्कथाश्रवणं चैव तस्योत्सवनिरीक्षणम्। श्रोत्रयोर्नेत्रयोश्चैव शुद्धिः सम्यगिहोच्यते।।46।। उनकी कथा को सुनना, उत्सवों को देखना कानों और आँखों की सम्यक् शुद्धि कही गयी है। पादोदकस्य निर्माल्यं मालानामपि धारणम्। उच्यते शिरसः शुद्धिः प्रणतस्य हरेः पुनः।।47।। भगवान् के चरणोदक, निर्माल्य और माला का धारण तथा शिर झुकाकर प्रणाम करना शिर की शुद्धि है।
- घ. ध्यानजपहोमार्चनक्रियाः। 2. घ. पुनः
द्वादशोऽध्यायः (65) आघ्राणं गन्धपुष्पादेश्चित्तस्य च तपोधन। विशुद्धिः स्यादनन्तस्य घ्राणस्येहाभिधीयते।।48।। पूजा में प्रयोग किए गये निर्माल्य रूप फूल-चन्दन को सूंघना चित्त और नाक की शुद्धि यहाँ कही गयी है। पत्रं पुष्पादिकं यद्यद् रामपादयुगार्पितम्। विशुद्ध्यै तद् भवत्येव स्वात्मना धार्यते यदि।।49।। श्रीराम के चरणकमलों में अर्पित पुष्प आदि जहाँ हो और उन्हें धारण किया जाए तो वह स्थान शुद्ध हो जाता है। अधुनाप्यथवा पूर्वं यद्यविष्णुसमर्पितम्। तदेव पावनं लोके तद्वि सर्वं विशोधयेत्।।50।। यदि इन समय अथवा पूर्व में विष्णु को समर्पित किए बिना भी पुष्पादि उन्हें समर्पित करने के उद्देश से रखे गये हो और मन से ध्यान किया जाए तो वह स्थान पवित्र हो जाता है। वही इस संसार में पवित्र है अतः इस प्रकार पवित्र करना चाहिए। इत्यगस्त्यसंहितायां पूजाविधिभूतशुद्धिर्नाम एकादशोऽध्यायः।। अथ द्वादशोऽध्यायः अथातो मातृकान्यासक्रमोऽत्र परिपठ्यते। नियम्यासून् ऋषिच्छन्दो देवताबीजपोषिताः।।1।। शिरोवदनहृद्गुह्यपादेषुन्यास उच्यते। कराङ्गुलीनां रेखासु स्वरैरेकं प्रविन्यसेत्।।2।। अब यहाँ मातृकान्यास की विधि बतलायी जा रही है। प्राण वायु को नियमित कर ऋषि, छन्द, देवता और बीज का न्यास शिर, मुख, हृदय, गुह्य एवं पैरों में किया जाता है। हाथ की अंगुलियों की प्रत्येक रेखा पर एक एक स्वर का न्यास होता है।
(66) अगस्त्य-संहिता
विन्यसेत्प्रणवं पाणितलयोः पृष्ठयोरपि। ह्रस्वदीर्घस्वरान्ताद्याः कादयः पञ्चपञ्चकाः।।३।। आम्श्चाद्यं तयोर्यादिक्षान्तश्च दशवर्णकः। अङ्गुष्ठाद्यङ्गुलीनां च तथैव तलपृष्ठयोः।।४।। सबसे पहले दोनों हाथों तथा पैरों के तल और उसके पीछे न्यास ॐकार से करें। ह्रस्व एवं दीर्घ स्वर-वर्ण प्रारम्भ में लगाकर ‘क’ से ‘म’ तक पच्चीस वर्णों का तथा ‘य’ से ‘क्ष’ तक दश वर्णों से अंगुष्ठा से प्रारम्भ कर दोनों हाथों की अंगुलियों तथा करतल और करपृष्ठ में इस प्रकार न्यास करें- अं आं कं खं गं घं ङं अङ्गुष्ठाभ्यां नमः। इं ईं चं छं जं झं ञं तर्जनीभ्यां स्वाहा। उं ऊं टं ठं डं ढं णं मध्यमाभ्यां वषट्। ऋं ॠं तं थं दं धं नं अनामिकाभ्यां हुम्। लृं लॄं पं फं बं भं मं कनिष्ठिकाभ्यां वौषट्। एं ऐं यं रं लं वं करतलाभ्यां फट्। ओं औं शं षं सं हं हौं क्षं करपृष्ठाभ्यां फट्। न्यासस्ततः षडङ्गानां भवत्येवं प्रकल्पना। हृदि मूर्ध्नि शिखायां च सर्वाङ्गे नेत्रयोरपि।।५।। दिक्ष्वस्त्रं च नमः स्वाहा वषट् वौषदप्यथा। अस्त्राय फडित्येवं षडङ्गानाञ्च पल्लवम्।।६।। तत्तत् स्थाने चतुर्थ्यन्ते तत्तत् पल्लवयोगतः। तत्तदङ्गतो न्यासस्तत्तदङ्गो नियोज्यते।।७।। तब षडङ्गन्यास की विधि इस प्रकार करनी चाहिए। हृदय, शिर, शिखा, सर्वाङ्ग और दोनों नेत्रों में। दिशाओं में अस्त्र (फट्), नमः स्वाहा, वषट् तथा वौषट् तथा अस्त्राय फट् से षडङ्गन्यास का विस्तार किया जाता है। इसके बाद अपने बीजों का विस्तार उन अंगों के चतुर्थ्यन्त पद से उन अंगों का विनियोग होता है। जैसे- हृदयाय नमःए शिरसे स्वाहा, शिखायै वषट्, सर्वाङ्गे वौषट्, नेत्रयोः वौषट्, दिक्षु अस्त्राय फट्।
Rarest Archiver
द्वादशोऽध्यायः (67) अथान्तर्मातृकान्यासः कण्ठहृन्नाभिगुह्यके।¹ पायौ भ्रूमध्यके पद्मे षोडशद्वादशच्छदम्।।8।। दशपत्रे च षट्पत्रे चतुःपत्रे द्विपत्रके। पञ्चाशद्वर्णविन्यासः पत्रसंख्याक्रमाद् भवेत्।।9।। एकैकवर्णमेकैकपत्रान्ते विन्यसेन्मुने। इसके बाद अन्तर्मातृकान्यास कण्ठ, हृदय, नाभि, लिंगमूल, गुदा एवं भ्रूमध्य में होता है। क्रमशः षोडशदल कमल, द्वादशदल कमल, दशदलकमल, षड्दलकमल स्वरूप यन्त्र, चतुर्दल कमल तथा द्विदल कमल में दलों की संख्या में पचासों वर्णों का न्यास करना चाहिए। एक एक वर्ण को एक एक दल पर न्यास करें। जैसे- अं आं इं ईं उं ऊं ऋं ॠं लूं लूं एं ऐं ओं औं अं अः षोडशदलकमलाय कण्ठाय नमः। कं खं गं घं ङं चं छं जं झं ञं टं ठं द्वादशदलकमलाय हृदयाय स्वाहा। डं ढं णं तं थं दं धं नं पं फं दशदलकमलाय नाभये वषट्। बं भं मं यं रं लं षड्दलकमलाय लिङ्गमूलाय वौषट्। वं शं षं सं चतुर्दलकमलाय मूलाधाराये गुदायै वौषट्। हं क्षं द्विदलकमलाय भ्रूमध्याय फट्। एवमन्तः प्रविन्यस्य मनसातो बहिर्न्यसेत्।।10।। शिरोवदनवृत्ते च चक्षुश्रोत्रयुगेऽपि च। नासाकपोलयुगलं तथोष्ठाधरयोरपि।।11।। ऊर्ध्वाधो दन्तपङ्क्तौ च मूर्द्धास्ये षोडशस्वरान्।² कचवर्गे द्वयं बाह्वोः पञ्चसन्धिस्थले न्यसेत्।।12 तटवर्गद्वयं पादे सन्ध्यग्रेऽपि तथा न्यसेत्।³ पवर्गं पार्श्वयुगले पृष्ठनाभ्युदरेऽपि च।।13।। हृदोर्मूलककुत्कक्षे⁴ हृदयादिकरद्वयोः।⁵ जठराननयोश्चैव व्यापकं विनियोजयेत्।।14।। पञ्चाशद्वर्णविन्यासः क्रमेणैवं विधीयते।
- घ. कण्ठहृन्नाड़ीगुह्यके। 2. घ. द्वादशस्वरान्। 3. घ. पुनः। 4. स्कन्धे। 5. घ. हृदयादिकरपद्द्वये।
(68) अगस्त्य-संहिता इस प्रकार अन्तर्मातृका न्यास कर मन ही मन बहिर्मातृकान्यास करें। शिर, मुखवृत्त, दोनों नेत्रों और कानों में, दोनों नाकों और दोनों गालों, अधर, एवं ओष्ठ, ऊर्ध्वदन्त पंक्ति, अधोदन्त पंक्ति, मूर्द्धा एवं मुख इन सोलह अंगों में सोलह स्वरों का न्यास करें। इसके बाद क वर्ग एवं च वर्ग से क्रमशः दक्षिण और वाम बाहु के पाँच सन्धि स्थलों (बाहुमूल, कूर्प्पर, मणिबन्ध, अंगुलिमूल एवं अंगुल्यग्र) में न्यास करें। इस प्रकार ट वर्ग एवं त वर्ग से दक्षिण एवं वामपाद के पाँच सन्धिस्थलों (पादमूल, कूर्प्पर, मणिबन्ध, पादमूल एवं पादमूलाग्र) पर न्यास करें। प वर्ग से क्रमशः दक्षिणपार्श्व, वामपार्श्व, पृष्ठ, नाभि एवं उदर में न्यास करें। हृदय, दक्षिण बाहुमूल, ककुत्, वामबाहुमूल, हृदादिदक्षकर, हृदादिवामकर, हृदादिमुख में क्रमशः य से क्ष तक वर्णों का न्यास करें। पचास मातृकावर्णों का इस प्रकार न्यास विहित है। ॐ माद्यन्तो नमोन्तो वा सबिन्दुबिन्दुवर्जितः ।।15।। मायालक्ष्मीकामबीजपूर्वो न्यस्तव्य उच्यते। केशवाय च कीर्त्यै च तथा नारायणाय च।।16।। कान्त्यै तथा माधवाय तुष्ट्यै नम इति न्यसेत् ।। गोविन्दाय च तुष्ट्यै¹ च विष्णुर्धृत्यै वदेत् ततः।।17।। मधुसूदनाय शान्त्यै च त्रिविक्रमाय क्रियायै च। वामनाय च पुष्ट्यै² च श्रीधराय वदेत्तदा।।18।। मेधायै हृषीकेशाय हृष्ट्यै³ चापि नमस्तथा। पद्मनाभाय श्रद्धायै⁴ तथा दामोदराय च।।19।। लज्जायै वासुदेवाय लक्ष्म्यै संकर्षणाय च। सरस्वत्यै प्रद्युम्नाय प्रीत्यै नम इतीरयेत् ।।20।। अनिरुद्धाय रत्यै च स्वरान्ते प्रवदेदथ। मातृकान्यास में आदि और अन्त में ॐ लगाकर अथवा आदि में ॐ और अन्त में नमः लगाकर, बिन्दु सहित अथवा बिन्दु रहित माया बीज (ह्रीं) लक्ष्मीबीज (श्रीं) एवं कामबीज (क्लीं) आदि में जोड़कर न्यास करें।
-
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं अं केशवाय कीर्त्यै नमः। -
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं आं नारायणाय कान्त्यै नमः।
- घ. पुष्ट्यै। 2. घ. दयायै। 3. हर्षायै। 4. घ. शुद्धायै।
द्वादशोऽध्यायः (69) 3. ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं इं माधवाय तुष्ट्यै नमः। 4. ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ईं गोविन्दाय पुष्ट्यै नमः। 5. ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं उं विष्णवे धृत्यै नमः। 6. ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ऊं मधुसूदनाय शान्त्यै नमः। 7. ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ऋं त्रिविक्रमाय क्रियायै नमः। 8. ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ॠं वामनाय पुष्ट्यै नमः। 9. ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ऌं श्रीधराय मेधायै नमः। 10. ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ॡं हृषीकेशाय हृष्ट्यै नमः। 11. ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं एं पद्मनाभाय श्रद्धायै नमः। 12. ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं दामोदराय लज्जायै नमः। 13. ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ओ वासुदेवाय लक्ष्म्यै नमः। 14. ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं औं संकर्षणाय सरस्वत्यै नमः। 15. ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं अं प्रद्युम्नाय प्रीतये नमः। 16. ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं अः अनिरुद्धाय रत्यै नमः। ये स्वर मातृकाओं के अन्त में बोलें। यहाँ श्लोक संख्या 18 में 'वामनायं' के बाद 'दयायै' शब्द 'क' पाण्डुलिपि में है। ध्यातव्य है कि यहाँ विष्णु के 16 रूपों के साथ षोडशमातृकाओं का उल्लेख हुआ है। 'पुष्टि' को छोड़कर शेष 15 मातृकाएँ स्पष्ट हैं, अतः यहाँ 'पुष्ट्यै च' पाठ माना जाना चाहिए। चक्रिणे विजयायै च गदिने शार्ङ्गिणे तथा ।।21।। दुर्गायै च प्रभायै च [सत्यायै] खङ्गिने [तथा] । [शंखिने च चण्डायै नमो तदनन्तरं वदेत्] ।।22।। हलिने च तथा वाण्यै नमो मुसलिने वदेत्। विलासिन्यै शूलिने च जयायै तदनन्तरम् ।।23।। पाशिने विरजायै च तथा चाङ्कुशिने वदेत्। विश्वायै च मुकुन्दाय विमदायै नमस्ततः।। 24 ।। नन्दजाय सुनन्दायै नन्दिने स्मृतये नमः। नराय ऋद्ध्यै तद्वच्च नरकजिते तथा वदेत् ।।25।। समृद्धयै हरये शुद्ध्यै कृष्णाय तुष्ट्यै तथा।
(70) अगस्त्य-संहिता सत्याय मत्यै सात्विताय सत्यै नमो वदेत्।।26।। शौरये च क्षमायै च शूराय परमायै नमः। जनार्दनाय चोमायै ततः स्याद् भूधराय च।।27।। क्लेदिन्यै च विश्वमूर्त्यै क्लिन्नायै तदनन्तरम्। वैकुण्ठाय नमस्तद्वद् वसुदायै नमस्ततः।।28।। पुरुषोत्तमाय वसुधायै बलिनेऽपराजितायै। तथा बलानुजाय परायणायै नम इतीरयेत्।।29।। वृषभाय च सूक्ष्मायै वृषाय सन्ध्यायै नमः। हंसाय च प्रज्ञायै वराहाय प्रभायै तथा।।30।। विमलाय निशायै च नृसिंहाय तदन्तरम्। अमोघायै नमस्तद्वद् वैष्णवीं मातृकां न्यसेत्।।31।। क्रमेण कामबीजं च मातृकाक्षरमेव च। 1केशवं चापि कीर्तिं च नमोऽन्तं विन्यसेत् पुनः।।32।। 2शिरोवदनवृत्तादिस्थानेष्वेवं विधिः स्मृतः। 1 ॐ क्लीं कं चक्रिणे विजयायै केशवाय कीर्त्यै नमः। 2 ॐ क्लीं खं गदिने दुर्गायै केशवाय कीर्त्यै नमः। 3 ॐ क्लीं गं शार्ङ्गिणे प्रभायै केशवाय कीर्त्यै नमः। 4 ॐ क्लीं घं खङ्गिने सत्यायै केशवाय कीर्त्यै नमः। 5 ॐ क्लीं ङं शङ्खिने चण्डायै केशवाय कीर्त्यै नमः। 6 ॐ क्लीं चं हलिने वाण्यै केशवाय कीर्त्यै नमः। 7 ॐ क्लीं छं मुसलिने विलासिन्यै केशवाय कीर्त्यै नमः। 8 ॐ क्लीं जं शूलिने जयायै केशवाय कीर्त्यै नमः। 9 ॐ क्लीं झं पाशिने विरजायै केशवाय कीर्त्यै नमः। 10 ॐ क्लीं ञं अङ्कुशिने विश्वायै केशवाय कीर्त्यै नमः। 11 ॐ क्लीं टं मुकुन्दाय विमदायै केशवाय कीर्त्यै नमः। 12 ॐ क्लीं ठं नन्दजाय सुनन्दायै केशवाय कीर्त्यै नमः। 13 ॐ क्लीं डं नन्दिने स्मृतये केशवाय कीर्त्यै नमः। 14 ॐ क्लीं ढं नराय ऋद्धयै केशवाय कीर्त्यै नमः। 15 ॐ क्लीं णं नरकजिते समृद्धयै केशवाय कीर्त्यै नमः। 1.-2. घ. में अनुपलब्ध।
द्वादशोऽध्यायः (71) 16 ॐ क्लीं तं हरये शुद्धौ केशवाय कीर्त्यै नमः। 17 ॐ क्लीं थं कृष्णाय तुष्ट्यै केशवाय कीर्त्यै नमः। 18 ॐ क्लीं दं सत्याय मत्यै केशवाय कीर्त्यै नमः। 19 ॐ क्लीं धं सात्विताय सत्यै केशवाय कीर्त्यै नमः। 20 ॐ क्लीं नं शौरये क्षमायै केशवाय कीर्त्यै नमः। 21 ॐ क्लीं पं शूराय परमायै केशवाय कीर्त्यै नमः। 22 ॐ क्लीं फं जनार्दनाय उमायै केशवाय कीर्त्यै नमः। 23 ॐ क्लीं बं भूधराय क्लेदिन्यै केशवाय कीर्त्यै नमः। 24 ॐ क्लीं भं विश्वमूर्तये क्लिन्नायै केशवाय कीर्त्यै नमः। 25 ॐ क्लीं मं वैकुण्ठाय वसुदायै केशवाय कीर्त्यै नमः। 26 ॐ क्लीं यं पुरुषोत्तमाय वसुधायै केशवाय कीर्त्यै नमः। 27 ॐ क्लीं रं बलिने अपराजितायै केशवाय कीर्त्यै नमः। 28 ॐ क्लीं लं बलानुजाय परायणायै केशवाय कीर्त्यै नमः। 29 ॐ क्लीं वं वृषध्वाय च सूक्ष्मायै केशवाय कीर्त्यै नमः। 30 ॐ क्लीं शं वृषाय सन्ध्यायै केशवाय कीर्त्यै नमः। 31 ॐ क्लीं षं हंसाय च केशवाय कीर्त्यै प्रज्ञायै नमः। 32 ॐ क्लीं सं वराहाय प्रभायै केशवाय कीर्त्यै नमः। 33 ॐ क्लीं हं विमलाय निशायै केशवाय कीर्त्यै नमः। 34 ॐ क्लीं क्षं नृसिंहाय अमोघायै केशवाय कीर्त्यै नमः। इस प्रकार वैष्णव मन्त्रों से मातृकान्यास करें। क्रम से कामबीज (क्लीं) एवं मातृका के अक्षर बोलकर केशवाय कीर्त्यै नमः यह जोड़कर न्यास करें। शिर, मुखवृत्त आदि स्थानों में यह विधि कही गयी है। (केशवादिन्यास के स्थल पर मूल 'क' पाण्डुलिपि का वाचन कष्टसाध्य होने के कारण पाठोद्धार के लिए म. म. गोविन्द ठाकुर (14वीं शती) कृत पूजा-प्रदीप के केशवादिन्यास का सहयोग लिया गया है, जो परम्परा की दृष्टि से प्रामाणिक है तथा पाण्डुलिपि 'क' के अनुरूप है। ये सम्पादित अंश कोष्ठ के अन्तर्गत हैं। बंगाल से प्रकाशित प्रति घ. में यह केशवादिन्यास बहुधा भिन्न है, अतः इसे पृथक् उद्धृत किया जा रहा है— [चक्रिणे दयायै च गदिने शार्ङ्गिणे तथा।।21।। दुर्गायै च प्रभायै च खङ्गिने विन्यसेदथ।