अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
(70) अगस्त्य-संहिता सत्याय मत्यै सात्विताय सत्यै नमो वदेत्।।26।। शौरये च क्षमायै च शूराय परमायै नमः। जनार्दनाय चोमायै ततः स्याद् भूधराय च।।27।। क्लेदिन्यै च विश्वमूर्त्यै क्लिन्नायै तदनन्तरम्। वैकुण्ठाय नमस्तद्वद् वसुदायै नमस्ततः।।28।। पुरुषोत्तमाय वसुधायै बलिनेऽपराजितायै। तथा बलानुजाय परायणायै नम इतीरयेत्।।29।। वृषभाय च सूक्ष्मायै वृषाय सन्ध्यायै नमः। हंसाय च प्रज्ञायै वराहाय प्रभायै तथा।।30।। विमलाय निशायै च नृसिंहाय तदन्तरम्। अमोघायै नमस्तद्वद् वैष्णवीं मातृकां न्यसेत्।।31।। क्रमेण कामबीजं च मातृकाक्षरमेव च। 1केशवं चापि कीर्तिं च नमोऽन्तं विन्यसेत् पुनः।।32।। 2शिरोवदनवृत्तादिस्थानेष्वेवं विधिः स्मृतः। 1 ॐ क्लीं कं चक्रिणे विजयायै केशवाय कीर्त्यै नमः। 2 ॐ क्लीं खं गदिने दुर्गायै केशवाय कीर्त्यै नमः। 3 ॐ क्लीं गं शार्ङ्गिणे प्रभायै केशवाय कीर्त्यै नमः। 4 ॐ क्लीं घं खङ्गिने सत्यायै केशवाय कीर्त्यै नमः। 5 ॐ क्लीं ङं शङ्खिने चण्डायै केशवाय कीर्त्यै नमः। 6 ॐ क्लीं चं हलिने वाण्यै केशवाय कीर्त्यै नमः। 7 ॐ क्लीं छं मुसलिने विलासिन्यै केशवाय कीर्त्यै नमः। 8 ॐ क्लीं जं शूलिने जयायै केशवाय कीर्त्यै नमः। 9 ॐ क्लीं झं पाशिने विरजायै केशवाय कीर्त्यै नमः। 10 ॐ क्लीं ञं अङ्कुशिने विश्वायै केशवाय कीर्त्यै नमः। 11 ॐ क्लीं टं मुकुन्दाय विमदायै केशवाय कीर्त्यै नमः। 12 ॐ क्लीं ठं नन्दजाय सुनन्दायै केशवाय कीर्त्यै नमः। 13 ॐ क्लीं डं नन्दिने स्मृतये केशवाय कीर्त्यै नमः। 14 ॐ क्लीं ढं नराय ऋद्धयै केशवाय कीर्त्यै नमः। 15 ॐ क्लीं णं नरकजिते समृद्धयै केशवाय कीर्त्यै नमः। 1.-2. घ. में अनुपलब्ध।
द्वादशोऽध्यायः (71) 16 ॐ क्लीं तं हरये शुद्धौ केशवाय कीर्त्यै नमः। 17 ॐ क्लीं थं कृष्णाय तुष्ट्यै केशवाय कीर्त्यै नमः। 18 ॐ क्लीं दं सत्याय मत्यै केशवाय कीर्त्यै नमः। 19 ॐ क्लीं धं सात्विताय सत्यै केशवाय कीर्त्यै नमः। 20 ॐ क्लीं नं शौरये क्षमायै केशवाय कीर्त्यै नमः। 21 ॐ क्लीं पं शूराय परमायै केशवाय कीर्त्यै नमः। 22 ॐ क्लीं फं जनार्दनाय उमायै केशवाय कीर्त्यै नमः। 23 ॐ क्लीं बं भूधराय क्लेदिन्यै केशवाय कीर्त्यै नमः। 24 ॐ क्लीं भं विश्वमूर्तये क्लिन्नायै केशवाय कीर्त्यै नमः। 25 ॐ क्लीं मं वैकुण्ठाय वसुदायै केशवाय कीर्त्यै नमः। 26 ॐ क्लीं यं पुरुषोत्तमाय वसुधायै केशवाय कीर्त्यै नमः। 27 ॐ क्लीं रं बलिने अपराजितायै केशवाय कीर्त्यै नमः। 28 ॐ क्लीं लं बलानुजाय परायणायै केशवाय कीर्त्यै नमः। 29 ॐ क्लीं वं वृषध्वाय च सूक्ष्मायै केशवाय कीर्त्यै नमः। 30 ॐ क्लीं शं वृषाय सन्ध्यायै केशवाय कीर्त्यै नमः। 31 ॐ क्लीं षं हंसाय च केशवाय कीर्त्यै प्रज्ञायै नमः। 32 ॐ क्लीं सं वराहाय प्रभायै केशवाय कीर्त्यै नमः। 33 ॐ क्लीं हं विमलाय निशायै केशवाय कीर्त्यै नमः। 34 ॐ क्लीं क्षं नृसिंहाय अमोघायै केशवाय कीर्त्यै नमः। इस प्रकार वैष्णव मन्त्रों से मातृकान्यास करें। क्रम से कामबीज (क्लीं) एवं मातृका के अक्षर बोलकर केशवाय कीर्त्यै नमः यह जोड़कर न्यास करें। शिर, मुखवृत्त आदि स्थानों में यह विधि कही गयी है। (केशवादिन्यास के स्थल पर मूल 'क' पाण्डुलिपि का वाचन कष्टसाध्य होने के कारण पाठोद्धार के लिए म. म. गोविन्द ठाकुर (14वीं शती) कृत पूजा-प्रदीप के केशवादिन्यास का सहयोग लिया गया है, जो परम्परा की दृष्टि से प्रामाणिक है तथा पाण्डुलिपि 'क' के अनुरूप है। ये सम्पादित अंश कोष्ठ के अन्तर्गत हैं। बंगाल से प्रकाशित प्रति घ. में यह केशवादिन्यास बहुधा भिन्न है, अतः इसे पृथक् उद्धृत किया जा रहा है— [चक्रिणे दयायै च गदिने शार्ङ्गिणे तथा।।21।। दुर्गायै च प्रभायै च खङ्गिने विन्यसेदथ।
(72) अगस्त्य-संहिता सत्यायै शङ्खिने चैव चण्डायै च नमो नमः ।।२२।। हलिने वाण्यै दद्याच्च तथा मुषलिने वदेत्। विलासिन्यै शूलिने विजयायै तदनन्तरम् ।।२३।। पाशिने विरजायै च तथा चाङ्कुशिने वदेत्। विश्वायै च मुकुन्दाय विनदायै नमस्ततः ।।२४।। नन्दजाय सुनन्दायै नन्दिने स्मृतये नमः। नराय ऋद्ध्यै च तथा तद्वन्नरकजिते तथा ।।२५।। समृद्ध्यै हरये शुद्ध्यै कृष्णाय बुद्धये तथा। सत्याय भुक्त्यै सात्वताय मत्यै नम इतीरयेत् ।।२६।। शौराय च क्षमायै च शूराय रमायै नमः। जनार्दनाय चोमायै ततः स्याद् भूधराय च ।।२७।। क्लेदिन्यै च विश्वमूर्त्यै क्लिन्नायै तदनन्तरम्। वैकुण्ठाय नमस्तद्वद् वसुदायै नमस्ततः। पुरुषोत्तमाय वसुधायै बलिने परायै ततः ।।२८।। बलानुजाय परायणायै नम इतीरयेत्। महाबलाय सूक्ष्मायै नमः स्यात्तदनन्तरम्। वृषघ्नाय सन्ध्यायै वृषाय प्रज्ञायै नमः ।।२९।। हंसाय च प्रभायै वराहाय निशायै तथा। विमलाय अमोघायै नृसिंहाय तदन्तरम्। विद्युतायै नमस्तद्वद् वैष्णवी मातृकां न्यसेत् ।।३०।। क्रमेण कामबीजञ्च मातृकाक्षरमेव च।] ¹ॐकारं कामबीजं च मातृकाक्षरमेव च ।।३३।। ²एकं देवं तथा शक्तिमेकां नम इति क्रमः। ॐकार, कामबीज, मातृकाक्षर इसके बाद एक देव एक शक्ति तथा इसके बाद नमः बोलें यहीं क्रम है। केशवादिरयं न्यासो न्यासमात्रेण देहिनाम् ।।३४।। अच्युतत्वं ददात्येव सत्यं सत्यं न संशयः। यह केशवादि न्यास कहलाता है। केवल इस न्यास से प्राणियों को अच्युतत्व मिल जाता है, यह सत्य है, इसमें सन्देह नहीं। 1.-2. घ. में अनुपलब्ध।
द्वादशोऽध्यायः (73) सुतीक्ष्ण तत्त्वं बक्ष्यामि तत्त्वन्यासमतः शृणु ।।३५।। यत्तत्त्वन्यासमात्रेण तत्त्वमेव प्रजायते। मादयः प्रतिलोमेन कान्ताः स्युस्तत्त्वसंज्ञया।।३६।। हे सुतीक्ष्ण! अब मैं तत्त्व को बतलाता हूँ। इसलिए तत्त्वन्यास सुनो। केवल तत्त्वन्यास से तत्त्व उत्पन्न होता है। मकार से प्रारम्भ कर 'क' से अन्त कर किया गया न्यास तत्त्वन्यास कहलाता है। नमः पराय पूर्वन्तु प्रणवान्ते व्यवस्थिताः। जीवः प्राणाश्च बुद्धिश्चाहंकारो मनस्तथा।।३७।। सर्वाङ्गे हृदि विन्यस्य श्रोत्रादीनीन्द्रियाण्यपि।¹ मूर्ध्नि घ्राणे च हृदयेऽप्युपस्थे पादयोरपि।।३८।। ‘नमः पराय’ इस मन्त्र को सबसे पहले प्रणव के बाद जोड़कर जीव, प्राण, बुद्धि, अहंकार एवं मन को सर्वाङ्ग एवं हृदय में न्यास कर श्रोत्र आदि पाँच इन्द्रियों को भी मूर्द्धा, घ्राण, हृदय, उपस्थ एवं दोनों पैरों में न्यास करें। श्रोत्रत्वक्चक्षुर्जिह्वा च घ्राणरूपाणि देहिनाम्। ज्ञानेन्द्रियाणि पञ्चापि तत्तत्स्थाने न्यसेत् पुनः।।३९।। वाक्पाणिपायुपादांश्च कर्माख्यानि ह्युपस्थकम्। तथैव तत्तत् स्थानेषु तत्तदेव प्रविन्यसेत्।।४०।। दोनों कान, त्वचा, दोनों आँखें, जीभ, और नासिका, ये पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ है तथा वाणी, दोनों हाथ, दोनों पैर, गुदा, और जननेन्द्रिय, ये पाँच कर्मेन्द्रिय हैं। उन उन स्थानों में न्यास करें। इसी क्रम से उन उन स्थानों उन उन तत्त्वों का न्यास करें। शिरोमुखे च हृदये तथा गुह्येपि पादयोः। आकाशानिलतेजांसि सलिलं पृथिवी तथा।।४२।। विन्यसेत् पूर्ववच्चैव न्यासविद्भिरुदीरितम्।² शिर, मुख, हृदय, गुह्य एवं दोनों पैरों में क्रमशः आकाश, वायु, तेज, जल एवं पृथिवी का न्यास पूर्ववत् मन्त्र के साथ न्यास के ज्ञानियों के द्वारा कही गयी विधि से करें।
- घ. शब्दादीनि ततः परम्। 2. घ. ०रुदाहृतम्।
(74) अगस्त्य-संहिता
सहौ शरौ च यश्चापि षश्च लश्च वलावपि। । 43 ।। क्षौं चेति दश वर्णांश्च प्रणवान्ते च पूर्ववत्।¹ स एवं ह, श एवं र, य, ष, ल, व, ल तथा क्षौं ये दश वर्ण हैं, जो पूर्वोक्त विधि से प्रणव ॐकार के बाद लगाये जायेंगे। हृत्पद्मे सोमसूर्याग्नित्वकलायुक्तमण्डलम् ।। 44 ।। त्रयं हृद्येव विन्यस्य वासुदेवादयस्तथा। परमेष्ठी च पुरुषो विश्वस्यापि निवर्तकः ।²। 45 ।। नारायणो नृसिंहश्च सर्वकोपाख्यपूर्वकौ। मूर्द्धास्ये हृदि गुह्ये च पादयोर्व्यापकं तथा ।। 46 ।। तदात्मने नम इति तत्तत्स्थाने न्यसेत् ततः। हृदय रूपी कमल में, अपनी कलाओं के साथ सोममण्डल, सूर्यमण्डल एवं अग्निमण्डल की कल्पना कर इन तीनों का हृदय में ही न्यास करें और वासुदेवादि न्यास करें। वासुदेव, परमेष्ठी, पुरुष, विश्वनिवर्तक, नारायण और नृसिंह, ये छह देव हैं। यहाँ दोनों प्रकार के न्यासों में कोप-मन्त्र (हुम्) को पूर्व में व्यवहार करें। इसमें 'तदात्मने नमः' यह योग कर मूर्द्धा, मुख, हृदय, गुह्य, दोनों पैर एवं सर्वांग में न्यास करें। जैसे- ॐ हुं वासुदेवाय मूर्द्धात्मने नमः इति मूर्ध्नि। ॐ हुं परमेष्ठिने मुखात्मने नमः इति मुखे। ॐ हुं पुरुषाय हृदयात्मने नमः इति हृदि। ॐ हुं विश्वनिवर्तकाय गुह्यात्मने इति गुह्ये। ॐ हुं नारायणाय पादात्मने इति पादयोः। ॐ हुं नृसिंहाय सर्वाङ्गात्मने नमः इति सर्वाङ्गे। अतत्त्वस्याप्यपूज्यस्य तत्प्राप्तेर्हेतुना³ पुनः ।। 47 ।। तत्त्वन्यासमिदं प्राहुर्न्यासं तत्त्वविदो बुधाः। जो तत्त्व नहीं है और पूज्य भी नहीं है उसकी प्राप्ति के लिए कारण के साथ उन तत्त्वों के न्यास को मनीषियों ने तत्त्व-न्यास कहा है। यः कुर्यात् तत्त्वविन्यासं स एव भवति ध्रुवम् ।। 48 ।। तदात्मनानुप्रविश्य भगवानिह तिष्ठति। यतः स एव तत्त्वानि तस्मिन् सर्वं प्रतिष्ठितम् ।। 49 ।।
- घ. प्रणम्यान्ते च पूर्ववत्। 2. घ. विश्वकोऽपि निवृत्तिकः। 3. क. तत्प्राप्तौ हेतना।
द्वादशोऽध्यायः (75)
जो तत्त्वविन्यास करता है, वह तत्त्व ही हो जाता है। इन स्थानों में आत्मस्वरूप में प्रवेश कर भगवान् अवस्थित होते हैं; क्योंकि तत्त्व वही है, जिसमें सबकुछ अवस्थित है। तन्मूर्तिपञ्जरं न्यासस्तस्य तन्मूर्तिसिद्धये। आकर्ण्यैकचित्तः सन् यतोऽस्ति न फलान्तरम् ।। ५० ।। भगवान् मूर्तिरूपी शरीर का यह न्यास उनके स्वरूप की सिद्धि के लिए एकाग्र होकर सुनो; क्योंकि इससे अधिक फल कही भी नहीं है। नमो भगवते ब्रूयाद् वासुदेवाय इत्यथ। ॐआदिरस्य¹ मन्त्रस्य आदायैकाक्षरं ततः ।। ५१ ।। एकैकमक्षरं तद्वत् श्रीरामाख्यमनोरपि। द्विरावृत्याक्षरादानं विष्णोर्द्वादशनामसु ।। ५२ ।। नामैकैकमुपादाय सूर्यस्यापि च नामसु। सबसे पहले ॐ नमो भगवते कहें। इसके बाद वासुदेवाय कहें। फिर इस मन्त्र के ॐकारसहित इस मन्त्र के एक एक अक्षर लें। इसी प्रकार श्रीराम के षडक्षर मन्त्र दो-दो बार लेकर विष्णु के बारह नामों में से एक-एक नाम जोड़कर फिर सूर्य के बारह नामों में से भी एक-एक नाम लगाकर मन्त्र बनायें। ओमन्तश्च स्वरस्तद्वद् वासुदेवाक्षरं ततः ।। ५३ ।। श्रीराममन्त्रवर्णश्च ततः स्युः केशवादयः। धात्रादयो नमोऽन्तोयं न्यस्तव्यो न्यासयोगतः ।। ५४ ।। इस मन्त्र में सबसे पहले ॐकार, तब स्वर-वर्ण, तब उसी प्रकार वासुदेव- मन्त्र के वर्ण, तब श्रीराममन्त्र के वर्ण तब केशव आदि बारह नाम, तब धाता आदि सूर्य के नाम तब अन्त में नमः लगाकर न्यास के योग से अङ्गन्यास करें। ललाटे नाभिहृदये कण्ठपार्श्वांशकन्धरे। पार्श्वान्तरांशे स्कन्धे च पृष्ठे ककुदि च क्रमात् ।। ५५ ।। इस मन्त्रों को क्रमशः ललाट, नाभि, हृदय, कण्ठ, पार्श्वभाग, कन्धर, वामपार्श्व, दक्षिणपार्श्व, स्कन्ध, पृष्ठ, ककुत् में न्यास करें।
- घ. ओमादावस्य मन्त्रस्य। Rarest Archiver
(76) अगस्त्य-संहिता केशवस्य ततो ब्रूयान्नारायण इति स्वयम्। माधवश्चैव गोविन्दो विष्णुश्च मधुसूदनः ।। ५६ ।। त्रिविक्रमो वामनश्च श्रीधरो नवमः स्मृतः । हृषीकेशः पद्मनाभस्तथा दामोदरः प्रभुः ।। ५७ ।। विष्णोर्द्वादशनामानि चेमानि मुनिसत्तम । हे मुनिश्रेष्ठ! भगवान् विष्णु के ये बारह नाम हैं- केशव, नारायण, माधव, गोविन्द, विष्णु, मधुसूदन, त्रिविक्रम, वामन, श्रीधर, हृषीकेश, पद्मनाभ, दामोदर। धातार्यमा च मित्रः वरुणो हंसो भगस्तथा।¹ ।। ५८ ।। विवश्वदिन्द्रः पूषा च पर्जन्यः दशमः स्मृतः। त्वष्टा च विष्णुरित्येवं नामानि द्वादशात्मनः ।। ५९ ।। तन्मूर्तिपंजरन्यासोऽभिहितः परमेष्ठिना। द्वादशात्मन् सूर्य के ये बारह नाम हैं- धाता, अर्यमा, मित्र, वरुण, हंस, भग, विवस्वान्, इन्द्र, पूषा, पर्जन्य, त्वष्टा, विष्णु। इस प्रकार मूर्तिपंजर-न्यास ब्रह्मा ने कहा है। इस न्यास के मन्त्र इस प्रकार बनते हैं- ॐ अ ॐ ॐ केशवाय द्वादशात्मने नमः। इति ललाटे ॐ आ न रा नारायणाय धात्रे नमः। इति नाभौ ॐ इ मो मा माधवाय अर्यम्णे नमः। इति हृदये ॐ ई भ य गोविन्दाय मित्राय नमः। इति कण्ठे ॐ उ ग न विष्णवे वरुणाय नमः। इति श्वासे ॐ ऊ व मः मधुसूदनाय शोभगाय नमः। इति प्रश्वासे ॐ ऋ ते ॐ त्रिविक्रमाय विवस्वते नमः। इति कन्धे ॐ लृ वा रा वामनाय इन्द्राय नमः। इति ललाटे वामपार्श्वे ॐ ए सु मा श्रीधराय पूषणे नमः। इति ललाटे दक्षिणपार्श्वे ॐ ऐ दे य हृषीकेशाय पर्जन्याय नमः। इति ललाटे स्कन्धे ॐ ओ वा न पद्मनाभाय त्वष्ट्रे नमः। इति ललाटे पृष्ठे ॐ औ य मः दामोदराय विष्णवे नमः। इति ललाटे ककुदि
- घ. वरुणोऽहंशुभगस्तथा, क. वरुणोसोभगस्तथा।
त्रयोदशोऽध्यायः (77) शिरोभूमध्यहृदयनाभिगुह्यपदस्थले ।।60।। मूलमन्त्राक्षरैर्न्यासं षडङ्गमपि विन्यसेत्। इसके अतिरिक्त मूलमन्त्र के अक्षरों से शिर, भ्रूमध्य, हृदय, नाभि, गुदा एवं दोनों पैरों में षडङ्गन्यास भी करें। जैसे- ॐ नमः पराय इति शिरसि। रा नमः पराय भ्रूमध्ये मा नमः पराय हृदये य नमः पराय नाभौ न नमः पराय गुदायाम्। मः नमः पराय पादयोः। एवं विन्यस्य विधिवत् साक्षान्नारायणो भवेत् ।।61।। जरारोगाभिचाराद्याः¹ प्रलयं यान्ति नान्यथा। भूतप्रेतपिशाचाश्च तथैव ब्रह्मराक्षसाः ।।62।। कूष्माण्डाश्चैव डाकिन्यो नैव द्रष्टुमपि क्षमाः। य एवं विन्यसेद्धीमान् रामः साक्षात् स्वयं भवेत् ।।63।। ²नातः परतरं किञ्चित् पावनं पुण्यमस्ति हि। इस प्रकार का न्यास कर वह साधक प्रत्यक्ष नारायणस्वरूप हो जाता है। बुढ़ापा, रोग, दूसरे के द्वारा किये गये अभिचार आदि नष्ट हो जाते हैं। भूत, प्रेत, पिशाच, ब्रह्मराक्षस, कूष्माण्ड, डाकिनी आदि तो उसे देखने में भी समर्थ नहीं होते हैं। जो बुद्धिमान् इस प्रकार न्यास करते हैं, वे साक्षात् श्रीराम-स्वरूप हो जाते हैं। इससे अधिक पवित्र पुण्य कुछ भी नहीं है। इत्यगस्त्यसंहितायां परमरहस्ये शरीरन्यासे द्वादशोऽध्यायः। अथ त्रयोदशोऽध्यायः अगस्त्य उवाच सुतीक्ष्ण पात्राण्यासाद्य ततः पूजार्थमादरात्। शङ्खमन्त्रेण संशोध्य सदाधारे निधाय च।।1।।
- घ. ज्वररोगाभिचाराद्याः। 2. क. में अनुपलब्ध।
(78) अगस्त्य-संहिता पूजयेदग्निसूर्येन्दुबीजैस्तत्तत्कलान्वितैः । तत्तत्कलानां संख्या च दश द्वादश षोडश।।२।। अगस्त्य बोले- हे सुतीक्ष्ण पूजा-पात्रों को एकत्रित कर पूजा के लिए आदर पूर्वक शंख को अस्त्र-मन्त्र से शोधित कर उसे सुन्दर आधार पर रखकर कलाओं के साथ अग्निबीज (रं) सूर्यबीज (सं) एवं चन्द्रबीज (सं) से पूजा करें। उनकी कलाएँ क्रमशः दस, बारह एवं सोलह हैं। आधारशङ्खतीर्थेषु तत्तन्मण्डलमर्चयेत्।¹ तीर्थावाहनमन्त्रैश्च तीर्थान्यावाह्य पूजयेत्।।३।। गन्धपुष्पाक्षतैर्धूपैर्दीपाद्यैरति भक्तितः। शङ्खे पाणितलं दत्त्वा जपेन्मन्त्रं षडक्षरम्।।४।। आधार शंख के जल में उन उन मण्डलों की पूजा करें। तीर्थावाहन मन्त्रों से तीर्थों का आवाहन कर गन्ध, पुष्प, अक्षत, धूप, दीप आदि से अत्यन्त भक्तिपूर्वक पूजा करें। इसके बाद शंख के ऊपर तलहथी रखकर षडक्षर मन्त्र का जप करें। चिन्मयं चिन्तयेत्तीर्थमानीयाङ्कुशमुद्रया। ब्रह्माण्डोदरतीर्थाभ्यां धेनुमुद्रां प्रदर्श्य च।।५।। शङ्खमुद्रां चक्रमुद्रां गरुडाख्याञ्च दर्शयेत्। ब्रह्माण्ड के उदर से तथा पवित्र तीर्थों से अंकुश मुद्रा के द्वारा तीर्थों का धेनु-मुद्रा दिखाकर शंखमुद्रा, चक्रमुद्रा और गरुडमुद्रा दिखावें। परमीकृत्य यत्नेन पावनं² तद्विचिन्तयेत्।।६।। देवस्य मूर्ध्नि तत्सिञ्चेत् पूजाद्रव्येषु चात्मनः। . इस प्रकार यत्न पूर्वक अमृतीकरण कर उस शंख जल को परम पवित्र मानें और उसे देवता के मस्तक पर, पूजा सामग्रियों पर तथा अपने ऊपर छिड़कें। अवेक्षणं प्रोक्षणञ्च वीक्षणं ताडनं तथा।।७।। अर्चनं चैव सर्वेषां पावनत्वं प्रकल्पयेत्। पूतमेवाखिलं पूजायोग्यं भवति सार्थकम्।।८।। उस शंखजल के दर्शन की क्रिया में प्रोक्षणमुद्रा दिखाकर तथा पुनः दर्शन में ताड़न मुद्रा दिखावें किन्तु दोनों क्रियाओं में अर्चन मुद्रा दिखाकर उसकी पवित्रता की कल्पना करें।
- क. तत्तदात्मानमर्चयेत्। 2. घ. परमं
त्रयोदशोऽध्यायः (79) अर्घ्यपाद्यप्रदानार्थं • मधुपर्कार्थमप्यथ। तथैवाचमनार्थञ्च न्यसेत् पात्रचतुष्टयम्।।9।। आत्मनः पुरतः शङ्खं पूर्वतः साधयेत्ततः। अर्घ्यपात्रे पाद्यपात्रे सम्पूर्य^1 सलिलं शुभम्।।10।। तथार्घ्यपात्रे दातव्याः गन्धपुष्पयवाक्षताः। कुशाग्रतिलदूर्वाश्च सर्षपाश्चार्थसिद्धये।।11।। अर्घ्य, पाद्य, मधुपर्क एवं आचमन समर्पण के लिए चार पात्र स्थापित करें। अपने सामने में शंख को पूर्व दिशा से रखें। अर्घ्यपात्र और पाद्यपात्र में पवित्र जल भरकर अर्घ्य पात्र में चन्दन, पुष्प, यव, अक्षत, कुश का अगला भाग, तिल, दूर्वा और सरसो कामनाओं की पूर्ति के लिए डालें। पाद्यपात्रे प्रदातव्यं श्यामाकं दूर्वमेव च। अब्जं च विष्णुक्रान्तां च पाद्यसिद्धयै प्रयोजयेत्।।12।। पाद्यपात्र में साँवा, दूर्वा, कमल एवं अपराजिता ये पाद्य के प्रयोजन के लिए डालें। तथाचमनपात्रेऽपि दद्याज्जातीफलं मुने। लवङ्गमपि कङ्कोलं शस्तमाचमनीयकम्।।13।। दध्ना च मधुसर्पिभ्यां मधुपर्को भविष्यति। आचमनपात्र में जायफल, लौंग, कंकोल डालें जो आचमन के लिए प्रशस्त हैं। दही, मधु और घृत मिलकर मधुपर्क बनता है। स्नानं पुरुषसूक्तेन शुद्धशङ्खोदकेन च।।14।। क्षीरदध्याज्यमधुभिः खण्डेन च पृथक् पृथक्। नारिकेरोदकेनापि तथान्यञ्च फलाम्बुना।^2।।15।। शुद्ध शंख जल से, दूध, दही, घी, मधु और शर्करा से पृथक् पुरुषसूक्त से स्नान कराना चाहिए। अथवा नारियल के जल से तथा अन्य फलों के रस से। ^3क्षीरस्नानं प्रकुर्वन्ति ये नराः राममूर्द्धनि। शताश्वमेधजं पुण्यं बिन्दुना बिन्दुना शतम्।।16।।
- घ. संपूज्य। 2. घ. तथा तालफलाम्बुभिः। 3. यहाँ से श्लोक सं. 16 एवं 17 'घ' में अनुपलब्ध।
(80) अगस्त्य-संहिता
क्षीरं दशगुणं दध्ना घृतञ्चैव दशोत्तरम्। घृताद् दशगुणं क्षौद्रं क्षौद्राद्दशगुणोत्तरम् ।।17 ।। जो मनुष्य श्रीराम की मूर्द्धा पर दूध से अभिषेक करते हैं, वे प्रत्येक बूँद से सौ सौ अश्वमेध यज्ञ के फल को प्राप्त करते हैं। दही से अभिषेक की अपेक्षा दुग्धाभिषेक दश गुणा फलदायी है तथा घृताभिषेक सौ गुणा। घृताभिषेक का दशगुणा मधु-अभिषेक का फल है। गन्धद्रव्यैश्च बहुभिस्तथा गन्धोदकेन च। ऐक्षवेणोदकेनापि कर्पूरादिसुगन्धिना ।।18 ।। कदलीपनसाम्रोत्थजलेनापि सुगन्धिना। शतं सहस्रमयुतं भक्त्या¹ चाप्यभिषेचयेत् ।।19 ।। चन्दन आदि सुगन्धित पदार्थों से चन्दन मिश्रित जल से अभिषेक करना चाहिए। ईख का रस, कर्पूर आदि सुगन्धित पदार्थ से अथवा केला, कटहल, आम आदि के सुगन्धित रस से सौ बार, हजार बार और दस हजार बार भक्तिपूर्वक अभिषेक करना चाहिए। शङ्खं सम्पूर्य तेनैव सपुष्पेण रघूत्तमम्। सकृष्णागुरुधूपेन धूपयेदन्तरात्मना ।।20 ।। ततः शुद्धजलेनैव स्नापयेत् तमनन्यधीः। राज्यार्थी राज्यसिद्ध्यर्थमैवं वत्सरमादरात् ।।21 ।। एवमेवाभिषिञ्चेत राजा भवति नान्यथा। शंख को उन रसों से भरकर उसमें फूल डालकर अभिषेक करें। गुग्गुल का धूप बीच बीच में हृदय से अर्पित करे। तब शुद्ध जल से राज्य की कामना से एकाग्र होकर स्नान कराएँ। इस प्रकार, राज्यसिद्धि के लिए आदरपूर्वक एक वर्ष तक अभिषेक करे, तो वह राजा होता है, इसमें सन्देह नहीं। दत्वाप्याचमनीयं च वाससी परिधापयेत् ।।22 ।। ततो भूषणदानञ्च सोत्तरीयेण वाससा। यज्ञोपवीतं दत्वा च दद्याच्चन्दनमादरात् ।।23 ।। इसके बाद आचमन समर्पित कर जोड़ा वस्त्र पहनावें। तब आभूषण आदि देकर दुपट्टा के साथ वस्त्र चढ़ावें। फिर यज्ञोपवीत देकर आदरपूर्वक चन्दन दें।
- घ. शक्त्या।
त्रयोदशोऽध्यायः (81) पुष्पाणि पुष्पमाल्यानि विविधानि समर्पयेत्। धूपं दीपञ्च नैवद्यं ताम्बूलं च प्रदक्षिणम्।।24।। नमस्कारञ्च पूजायामुपचास्तु षोडश। अनेक प्रकार के पुष्प और पुष्पमालाएँ समर्पित करें। तब धूप, दीप, नैवेद्य देकर प्रदक्षिणा (चार बार परिक्रमा) करें। पूजा के क्रम में अन्त में प्रणाम करें; ये षोडश उपचार हैं। आवाहनादिकाश्चैव तथैकादश पञ्चधा।।25।। भवन्त्येवोपचारास्तैः पूजां कुर्यादहर्निशम्। आवाहन आदि एकादशोपचार और पञ्चोपचार भी होते हैं। इनसे भी दिन रात पूजा करें। स्नानाद्यैरपि गन्धाद्यैः भक्त्योपकल्पितैः।।26।। द्वारपीठामरानादौ अभ्यर्च्यैव पुनस्ततः। राममाराध्य विधिना सर्वैरप्युपचारकैः।।27।। अङ्गावरणदेवाश्च सम्पूज्यान्यायुधानि च। स्नान आदि से तथा चन्दन आदि से सामर्थ्यानुसार भक्तिपूर्वक द्वार और पीठ के देवताओं की पूजा करके ही विधिपूर्वक सभी उपचारों से श्रीराम की पूजा कर अंग देवताओं तथा आवरण की पूजा कर, श्रीराम के सभी शस्त्रास्त्रों की पूजा करें। एवं सम्यक् समाराध्य साङ्गावरणवाहनम्।।28।। स्तोतव्यमपि यत्नेन रामं शश्वत्प्रणम्य च। यन्त्रस्था अपि मन्त्रैश्च सम्यक् पूज्या प्रयत्नतः।।29।। इस प्रकार प्रतिदिन अंगदेवताओं, आवरण देवताओं तथा वाहनों के साथ श्रीराम की पूजा कर बार बार प्रणाम कर श्रीराम की स्तुति करें तथा यन्त्र पर अवस्थित देवताओं की पूजा मन्त्रों से अच्छी तरह करें। एवमेव यजेदग्नौ होमादावपि राघवम्। तर्पणादावपि¹ जलेष्येवमाराध्य तर्पयेत्।।30।। इसी प्रकार होम आदि में भी पहले श्रीराम की पूजा अग्नि में करें। तर्पण आदि के क्रम में भी जल में इसी प्रकार पूजा कर तर्पण करें।
- घ. दर्पणादा
(82) अगस्त्य-संहिता ────────────────────────────────────────── शालग्रामशिलायां च तुलसीदलकल्पिता। पूजा श्रीरामचन्द्रस्य कोटिकोटिगुणाधिका।।31।। प्रतिमायां च यन्त्रे वा भूमावग्नौ विवस्वति। तले वा हृदये वापि विधायाराधयेद्¹ रहः।।32।। शालग्राम की शिला पर तुलसीदास से श्रीराम की पूजा करोड़ो करोड़ गुणा फल देती है। प्रतिमा पर अथवा यन्त्र पर, भूमि पर अथवा अग्नि में, सूर्य में, हाथ की तलहथी पर अथवा अपने हृदय में श्री राम की पूजा एकान्त में करें। कालेनैवोपचाराणां² पूजयेत्तुलसीदलैः। घण्टां च वादयेद् दद्याद् देवायाचमनीयकम्।।33।। मध्ये मध्ये च तद्वच्च नत्वा नत्वा समर्पयेत्। समयानुसार सभी उपचारों के स्थान में तुलसीदल डालें; घंटा बजावें तथा देवता को आचमनीय समर्पित करें। बीच बीच में उन अर्घ्य वस्तु को नमन कर समर्पित करें। मुकुलैः पतितैश्चैव खण्डितैः शोषितैरपि।।34।। अनर्हैरपि पुष्पैश्च दलैः पत्रैंश्च नार्चयेत्।³। मुरझाए हुए, गिरे हुए, टूटे हुए, सूखे हुए तथा पूजा के अयोग्य पुष्प, पत्र और दल से पूजा न करें। येन केनापि पुष्पेण पत्रेणापि फलेन वा।।35।। यतः कुतश्चिदानीय यत्रकुत्रोद्भवेन च। भवार्थं जीवितार्थं च नोऽर्चयेद् गर्हितस्थले।।36।। जिस किसी भी फूल, पत्र एवं फल से जो इधर उधर जन्में हों और इधर उधर से अर्थात् अपवित्र स्थान से लाये गये हों, उनसे अशुभ स्थान में सांसारिक सुख और जीवन के लिए पूजा नहीं करनी चाहिए। गंगायां गोप्रदानेन दिव्यवर्षशतत्रयम्। तत्फलं प्राप्यते नित्यमाराध्याप्नोति तद्धरिम्।।37।। गंगा के तट पर गोदान करने से जो तीन सौ दिव्य वर्ष तक स्वर्गवास का फल मिलता है वही फल उसे भी मिलता है जो प्रतिदिन श्री हरि की पूजा करें। ──────────────────────────────────────────
- घ. विधायावाहयेद्रहः। 2. घ. अभावे चोपचाराणां। 3. घ. पत्रैर्न पूजयेत् Rarest Archiver
चतुर्दशोऽध्यायः (83) — — — — — — — — — — — — — — — — — पत्रं पुष्पं फलं वापि रामाराधनसाधनम्। दद्यादाराधितं यो वै तस्य पुण्यफलं शृणु।।38।। कुरुक्षेत्रे च गङ्गायां प्रयागे पुरुषोत्तमे। गोसहस्रप्रदानेन यत्पुण्यं समवाप्यते।।39।। तदेतदखिलं पुण्यं प्राप्नोत्येव न संशयः। समग्रमसमग्रं वा यो दद्यात् पूजितं हरिम्।।40।। कदाचिदपि नित्यं वा पत्रपुष्पादिकं बहून्। किं तीर्थसेवया दानैरन्यैर्बहुभिरीरितैः।।41।। आराधनासमर्थश्चेद् दद्यादर्चनसाधनम्। श्रीराम की आराधना के साधन पत्र, पुष्प, फल आदि जो दान करते हैं उनके पुण्य का फल सुनें। कुरुक्षेत्र, गंगा के तट, प्रयाग क्षेत्र और पुरुषोत्तम क्षेत्र में हजारों गाय दान करने का फल जो मिलता है, वही समग्र फल वह भी प्राप्त करता है, वही समग्र फल वह भी प्राप्त करता है। पूजा की सभी वस्तुएँ अथवा कुछ वस्तुएँ जो प्रतिदिन अथवा कभी कभी अथवा अधिक मात्रा में पत्र-पुष्प आदि जो दान करते हैं, उनके लिए अन्य स्थलों पर विहित दान और तीर्थ में निवास करना सब व्यर्थ है। स्वयं आराधना करने में जो असमर्थ हों वे आराधना के साधनों का दान करें। ¹प्रदातुं वै नरान् कोऽस्ति कुर्यादर्चनदर्शनम्।।42।। निस्ताराय तदेवालं भवाब्धेः मुनिसत्तम। नैकं च यस्य विद्येत सोऽधो यात्येव नान्यथा।।43।। अथवा मनुष्य को दान करने में भी भला कौन समर्थ है! इसलिए आराधना का दर्शन ही करना चाहिए। संसार के समुद्र में पार लगाने के लिए वही पर्याप्त है। इनमें से जो एक भी नहीं करते उनका अधःपतन निश्चित है। नियमव्यतिरेकेण यः कुर्याद् देवतार्चनम्। किञ्चिदप्यस्य न फलं भस्मनीव हुतं मुने।।44।। योऽर्चयेद् विधिवद् भक्त्या परानीतैश्च साधनैः। पूजा फलार्द्धमेवास्य न समग्रफलं लभेत्।।45।।
- घ. में अनुपलब्ध।
(84) ________ अगस्त्य-संहिता नियमों के विपरीत जो देवता की अर्चना करते हैं, उन्हें राख में हवन करने के समान कुछ भी फल नहीं होता है। जो विधानों के अनुसार भक्तिपूर्वक दूसरे के द्वारा लाये गये साधनों से पूजा करते हैं उन्हें आधा फल ही मिलता है; पूरा नहीं। ¹यस्तु भक्त्या प्रयत्नेन स्वयं सम्पाद्य चाखिलम्। साधनं चार्चयेद् विद्वान् समग्रफलभाग् भवेत्।।146।। यो धनव्ययमायासमविचार्यार्चयेद् हरिम्। स्वयं सम्पाद्य तत्सर्वं सवरं तत्फलं लभेत्।²147।। जो भक्तिपूर्वक स्वयं यत्न करके सभी सामग्रियों की व्यवस्था कर अर्चन करते हैं, उन्हें समग्र फल की प्राप्ति होती है। जो धन का व्यय और प्रयत्न दोनों की परवाह किए बिना श्रीहरि की आराधना स्वयं साधन जुटाकर करते हैं तथा उन्हें नैवेद्य आदि अर्पित करते हैं, वे वर के साथ सम्पूर्ण फल पाते हैं। स्वयमानीय चोत्पाद्य पूजोपकरणानि यः। पूजयेत्तद्विधेयं स्यादुत्तमं प्रार्थदं हरिम्।³148।। स्वयं लाकर और स्वयं उगाकर पूजा सामग्रियों से श्रीहरि की पूजा करते हैं वह उत्तम विधि है इससे अच्छी प्रकार प्रयोजनों की सिद्धि होती है। कलत्रपुत्रशिष्यादि⁴ तत्तत् सम्पादितं च यत्। मध्यमं चार्चनं तेन तैः सार्द्धं तत्फलं लभेत्।।149।। पत्नी, पुत्र, शिष्य आदि के द्वारा व्यवस्था किए जाने पर मध्यम प्रकार की पूजा होती है उससे आधा फल मिलता है। अन्यैः सम्पाद्य यद्दत्तं क्रयक्रीतेन तेन वा। गौणमाराधितं तेन पादमात्रफलं लभेत्।।150।। दूसरे के द्वारा व्यवस्था कर दान की गयी सामग्रियों से अथवा खरीदकर की गयी पूजा तुच्छ होती है इससे चौथाई फल ही मिलता है। परारोपितवृक्षेभ्यः पुष्पाणानीय वार्चयेत्। अविज्ञाप्यैव तैर्यस्तु निष्फलं तस्य पूजनम्।।151।। दूसरे के द्वारा लगाये गये वृक्ष से बिना सूचना दिये हुए फूल लाकर जो पूजा करते हैं वह निष्फल होती है।
- चार चरण तक 'क' में अनुपलब्ध। 2. घ. सर्वं तत् सफलं भवेत्। 3. घ. मुनिसत्तम। 4. घ. नियोज्य यत्र शिष्यादि।
_________________ चतुर्दशोऽध्यायः (85) राममाराध्य संस्थाप्य संनिरुध्य च मुद्रया।¹ प्रतिष्ठाप्यार्चयेद् विष्णुं न च तन्निष्फलं भवेत् ।।52।। मुद्रा के द्वारा श्रीराम का आराधना स्थापन एवं संनिरोधन कर प्रतिष्ठित कर विष्णु की पूजा करते हैं तो वह निष्फल नहीं होता। ततो² मुद्रान्तराण्यैव दर्शयिच्चैव सादरम्। प्रसाद्य सम्मुखीकृत्य सन्निधाप्य च पूजयेत् ।।53।। सकलीकृत्य प्राणांस्तु तदानीमिन्द्रियाण्यपि। यद्येवं पूजयेद्रामं भुक्तिं मुक्तिं च विन्दति ।।54।। इसके बाद आदरपूर्वक दूसरी मुद्राएँ भी दिखावें। प्रसादजी, सम्मुखीकरणी और सन्निधापनी मुद्रा दिखाकर पूजा करें। उनके प्राण को सकलीकरण कर उनकी इन्द्रियों का भी सकलीकरण करें। यदि इस प्रकार श्रीराम की पूजा करें तो भुक्ति और मुक्ति दोनों प्राप्त करते हैं। इत्यगस्त्यसंहितायां परमरहस्ये रामपूजाविधिर्नाम त्रयोदशोऽध्यायः ।। अथ चतुर्दशोऽध्यायः अगस्त्य उवाच विधिवत् संस्कृतेप्यग्नौ देवमावाह्य पूजयेत्। पूर्वोक्तेनैव विधिना साङ्गावरणवाहनम्³ ।।1।। विधानपूर्वक मार्जन, उल्लेखन आदि से संस्कार की गयी अग्नि में देवती का आवाहन कर पूर्वोक्त विधि से अंग और आवरण के साथ पूजन करें। विधिं तस्य प्रवक्ष्यामि येनेष्टं साध्यतेऽखिलम्। विहितं येऽनुतिष्ठन्ति त एव फलभाजनाः ।।2।। अब इसकी विधि कहूँगा, जिससे सब कुछ सिद्ध होता है। जो विधानपूर्वक अनुष्ठान करते हैं, वे ही सभी इच्छित फलों के भागी होते हैं, अन्यथा नहीं।
- घ. इसके बाद घ. में प्रसाद्य सम्मुखीकृत्य इत्यादि चार चरण हैं।। 2. घ. तत्तन्मुद्रा°। 3. घ. साङ्गावरणमन्वहम्। Rarest Archiver
(86) अगस्त्य-संहिता
सर्वेषामीप्सितार्थानामन्यथा वै तथा नहि। न्यायार्जितैः साधनैश्च दानहोमार्चनादिकम् ।।३।। कुर्यान्न चेदधो याति भक्त्या कुर्वन्नपि द्विजः। न्यायपूर्वक स्वयं अर्जित साधनों से दान, होम, अर्चना आदि करें, नहीं तो भक्तिपूर्वक इन्हें करते हुए भी अधोगति प्राप्त करते हैं। भूमिस्थानं समीकृत्य षट्चतुष्काङ्गुलोत्तरम्¹ ।।४।। तावत् तन्निखनेदन्तश्चतुष्कोणन्तथान्ततः। दिशि दिश्यन्तरञ्चैव पार्श्वस्थलचतुष्टयम् ।।५।। भूमि को समतल कर दश अंगुल ऊँची वेदिका बनाएँ। तब अन्दर की ओर चौकोर खनें। तब चारो दिशाओं और कोणों में भी चार पार्श्व बनावें। (इस प्रकार नीचे अष्टकोण बन जाएगा।) एवं सलक्षणं² कृत्वा बहिः कुर्याच्च मेखलाः। द्वादशाष्टचतुर्मानां स्वाङ्गुलैश्च क्रमान्मुने।।६।। एवमुत्सेध आयामश्चतुराङ्गुलमेव तत्। आयामोत्सेधरूपेण चतुष्काधिक्यतः क्रमात् ।।७।। चतुष्कत्रितयं कुर्यादेवं हि मेखलाक्रमः। इस प्रकार के लक्षणों से कुण्ड बनाकर तब बाहर तीन मेखला क्रमशः बारह अंगुल आठ अंगुल और चार अंगुल मान से बनावें। इस प्रकार उठाकर विस्तार चार अंगुल ही रखें। चौड़ाई और ऊँचाई दोनों क्रमशः चार-चार अंगुल क्रमशः होगी। चार अंगुल की तीन मेखला बनावें; यही क्रम है। कुण्डस्य पश्चिमे भागे योनिं कुर्यात्सलक्षणाम् ।।८।। अश्वत्थपत्रसदृशीं कुण्डे किञ्चित् प्रतिष्ठिताम्। षट्चतुर्द्वयङ्गुलाक्षा³ च क्रमान्निम्ना भवेत्पुनः।।९।। विस्तारेणापि सा योनिर्भवत्येव दशांगुला।⁴ मूलं नालं तथाग्रं च व्युत्क्रमात् षट्चतुस्त्रिकम् ।।१०।। तन्मानाङ्गुलमानं स्यादेतत् कुण्डस्य लक्षणम्। एकहस्तस्य कुण्डस्य⁵ प्रकारोऽयं प्रकाशितः ।।११।।
- घ. षट्चतुर्द्ध्वङ्गुलोत्तरम्। 2. घ. सुलक्षणम्। 3. घ. षट्चतुस्त्र्यङ्गुला सापि। 4. योनिर्भवेत् पञ्चदशाङ्गुला। 5. घ. चतुष्कोणैकहस्तस्य।
चतुर्दशोऽध्यायः (87) कुण्ड के पश्चिम भाग में लक्षण के अनुसार योनि बनावें। पीपल के पत्ते के आकार की योनि कुण्ड पर प्रतिष्ठित करनी चाहिए। छह अंगुल के बाद चार अंगुल, तब दो अंगुल, इस प्रकार क्रमशः योनि आगे की ओर ढालवाली होनी चाहिए। चौड़ाई और दस अंगुल लम्बाई की योनि होती है। योनिमूल में अवस्थित गाल और योनि के अग्रभाग की ऊँचाई नीचे के क्रम में छह अंगुल, चार अंगुल तथा तीन अंगुल की होनी चाहिए। यह कुण्ड का लक्षण है। यह एक हाथ लंबाई- चौड़ाईवाले कुण्ड का प्रकार स्पष्ट किया गया है। द्विहस्तकुण्डमध्येवं द्विगुणीकृत्य मेखलाम्। नाभेरप्यथवा कुण्डमेकमेखलकं भवेत् ।।12।। संक्षेपकर्मसु तथा वर्त्तुलं स्यात् सुलक्षणम्। इसी प्रकार दो हाथ के कुण्ड में मेखला तथा नाभि दो गुनी होगी। अथवा संक्षिप्त कर्म में एक मेखलावाला कुण्ड हो सकता है तथा सभी लक्षणों से सम्पन्न वर्त्तुल कुण्ड का भी निर्माण किया जा सकता है। चतुष्कोणैकहस्तस्य मध्ये कुण्डस्य चाङ्कनम् ।।13।। मध्यान्निधाय सूत्रेण भ्रामयेदभितो मुने। कोणेषु यच्चाप्यधिकं तद्दिक्ष्वेव विनिर्दिशेत् ।।14।। इदञ्च वर्त्तुलं कुण्डं ततः स्यादर्धचन्द्रकम् । दिशि चोत्तरतः कुण्डकोणभागादर्द्धभागतः ।।15।। बहिरैन्द्र्या च वारुण्या यत्नान्मध्ये तु लांछयेत्। संस्थाप्य भ्रामयेदेतदर्द्धचन्द्रं शुभ्रप्रदम् ¹ ।।16।। एक हाथ के चौकोर भूमि के मध्य में कुण्ड का अंकन करना चाहिए। मध्यभाग से एक धागा लेकर उसे चारो ओर घुमावें। कोणों में और दिशाओं में चिह्न लगावें। यह वर्त्तुल कुण्ड कहलाता है। इसके बाद अर्द्धचन्द्र कुण्ड भी होता है। कुण्ड में उत्तर की ओर से कोण के आधे भाग पर पुनः पूर्व दिशा से पश्चिम दिशा तक सूत्र रखकर मध्य में स्थापित कर घुमावें। यह अर्द्धचन्द्राकार कुण्ड शुभ फल देता है। (महामहोपाध्याय मधुसूदन ओझा ने 'यज्ञमधुसूदन' नामक ग्रन्थ में वर्त्तुल कुण्ड बनाने की तीन विधियाँ दी हैं, जिनमें एक विधि के अनुसार चौकोर क्षेत्र में
- घ. सुशोभनम् ।
(88) अगस्त्य-संहिता एक कोण से दूसरे कोण तक की दूरी का आधा कोणार्द्ध कहलाता है। उस कोणार्द्ध का आठवाँ भाग के बराबर की दूरी पर चतुष्कोण में चिह्न लगा लेना चाहिए। तब उन चिह्नों से होकर एक वृत्त बनाना चाहिए। यह वर्तुल कुण्ड कहलाता है। अगस्त्य-संहिता का भी यहीं मत प्रतीत होता है, किन्तु इस स्थल पर पाण्डुलिपि ‘क’ अपठनीय है।) मेखलास्वष्टपत्राणि वर्तुलस्य तपोनिधे। पद्माकारं भवेदेतत् कुण्डं सर्वफलप्रदम्।¹।17।। वर्तुल कुण्ड की मेखलाओं में आठ दल होंगे। इस प्रकार वह कुण्ड कमल के आकार का होगा, जो सभी प्रकार से फलदायक है। शतहोमे रत्निमात्रं तदूर्ध्वं मुष्टिसम्मितम्। सहस्रेप्ययुतेऽप्यर्द्धलक्षे लक्षेऽपि च क्रमात्।।18।। पञ्चपञ्चाङ्गुलाधिक्याद् वर्द्धतेऽरत्निमात्रतः। कुण्डञ्च कोटिहोमेऽपि तदूर्द्धर्वेऽपि कराष्टकम्।।19।। सौ आहुति वाले होम में मुट्ठी बँधे हाथ की लम्बाई के बराबर, इसके ऊपर मुट्ठी खुले हाथ की लम्बाई के बराबर कुण्ड बनावें। हजार, दश हजार और उससे ऊपर लाखों आहुति के लिए क्रमशः मुट्ठी बँधे हाथ की लम्बाई से पाँच पाँच अंगुल क्रमशः बढ़ाते हुए एक हाथ तक बढ़ावें इस प्रकार कोटि होम तक के लिए कुण्ड बनावें। उसके ऊपर आहुति संख्या होने पर आठ हाथ की लंबाई-चौड़ाई वाला कुण्ड बनावें। मुष्ट्यरत्निमिते कुण्डे दशाद्वादशसंख्यया। क्रमेणैवाङ्गुलानां च प्रथमा मेखला भवेत्।।20।। मुट्ठी खोलकर एक हाथ की लम्बाई वाले कुण्ड में बारह अंगुल तथा बन्द मुट्ठी वाले हाथ की लम्बाई के परिमाण के कुण्ड में बारह अंगुल की पहली मेखला होती है। द्वितीये च तृतीये च त्र्यंशे त्र्यंशे विनिर्दिशेत्। सर्वेषामेव कुण्डानामह्लिद्वयवृद्धितः।।21।। प्रथमा मेखला कार्या त्र्यंशेऽप्यन्या तु पूर्ववत्। कण्ठोऽष्टयवमात्रः स्यात् कुण्डे च करमात्रके।।22।। कुण्डे षड्यवमात्रः स्यात् कण्ठो रत्निप्रमाणके। तथा चतुर्यवैः कण्ठो मुष्टिमात्रे विनिर्दिशेत्।।23।।
- घ. में अनुपलब्ध। Rarest Archiver
चतुर्दशोऽध्यायः (89) दूसरी और तीसरी मेखला भी एक तिहाई भाग में होनी चाहिए। सभी प्रकार के कुण्डों में दो-दो अंगुलियाँ बढ़ाकर मेखला बनानी चाहिए। पहली मेखला एक तिहाई भाग में बनावें और अन्य मेखलाएँ पूर्ववत् परिमाण में बनाएँ। एक हाथवाले कुण्ड में कण्ठ का भाग (योनि का अग्रभाग, जो कुण्ड में निराधार स्थापित किया जाये) आठ यव के परिमाण का होगा तथा रत्निप्रमाण (मुट्ठी बँधा हाथ) के कुण्ड में कण्ठ छह यव के परिमाण का होगा तथा मुट्ठी वाले भाग से रहित एक हाथ के प्रमाण वाले कुण्ड में चार यव के परिमाण का कण्ठ बनावें। सर्वेषु कुण्डमानेषु चाङ्गुलिद्वयवृद्धितः। कुण्डो यत्नेन कर्तव्यो भुक्तिमुक्तिफलेप्सुभिः ।।२४।। भोग और मोक्ष की इच्छा रखनेवाले सभी प्रकार के कुण्डों में दो-दो अंगुल बढ़ाकर यत्नपूर्वक कुण्ड का निर्माण करें। सात्त्विकी राजसी चैव तामसी च क्रमाद् भवेत्। प्रथमा च द्वितीया च तृतीया मेखला स्मृता ।।२५।। कुण्ड तीन प्रकार के होते हैं- सात्विकी, राजसी एवं तामसी तथा मेखला भी प्रथमा, द्वितीया एवं तृतीया के नाम से तीन होतीं हैं। योनिः कुण्डानुसारेण कुर्यादाद्यन्तमध्यतः। उक्ताङ्गुलिप्रमाणेण द्विगुणाञ्च चतुर्गुणाम् ।।२६।। होमसंख्यानुविधिना सर्वलक्षणलक्षितम् । स्रुवं बाहुप्रमाणेण होमार्थं विदधीत वै ।।२७।। कुण्ड के परिमाण के अनुसार कुण्ड की योनि आरम्भ, अन्त और मध्य भाग का निर्माण पूर्वोक्त अंगुल के प्रमाण से दो दुना या चारगुना करें। होम- संख्या के अनुसार सभी लक्षणों से सम्पन्न मेखलाओं का निर्माण करें। होम के लिए एक हाथ का स्रुव बनावें। चतुरस्रं विधायादौ सप्तपञ्चाङ्गुलं क्रमात्। तृतीयांशेन गर्तः स्यादन्तर्वृत्तशोभितम् ।।२८।। खनित्वा समं तिर्यगूर्ध्वंवतदधः शोधयेद् बहिः। चतुर्थाशं चाङ्गुलस्य शेषं त्वर्द्धं¹ तदन्ततः ।।२९।।
- घ. शेषाच्चार्द्धम्।