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अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

सूत्र-७६ 441 बुधे यमे च गन्धर्वे तद्रूपा च द्वितीयका। शोषे क्षये च रोगे च कोष्ठागारं तथादिमम् ॥ ३२ ॥ जिनका मुख उत्तर-दक्षिण दिशाओं की ओर बनाना प्रशस्त कहा गया है, जो सभी कामनाओं को पूर्ण करने वाला है और सौम्य वास्तु पद के अन्त में हस्तिनिवेश अर्थात् गजशाला (हाथी के ठाण) हो और उसके द्वार के परे दूसरी ओर दक्षिण दिशा के वास्तुपद विन्यास के बुध, यम और गन्धर्व पद भाग पर भी वैसा ही दूसरा द्वार भी उसी के अनुरूप बनाए और वास्तुपद विन्यास के शोष, पापयक्ष्मा और रोग के पद भाग पर बड़ा-सा कोठार बनाएँ जो आरम्भ से ही भरा-पूरा भण्डार गृह हो। पित्रिमृगभृङ्गेषु च कोष्ठागारं द्वितीयकम्। गोष्ठागारं कार्यमित्थं प्रोक्तं च विश्वकर्मणा ॥ ३३ ॥ इसी तरह से वास्तुपद विन्यास के दक्षिण-पश्चिम कोण में स्थित पितर, मृग, और भृङ्ग पद भाग पर भी दूसरा वैसा ही विशाल कोठार या भण्डारगृह बनाएँ। उसी के पास ऐसा ही गोठ (आमोद-प्रमोद हेतु गोष्ठागार) भी बनाया जाना चाहिए— ऐसा भगवान् विश्वकर्मा¹ ने कहा है। ईशादितिदितिषु च भाण्डागारमापार्धतः। पुष्पागारं सवित्रर्धे ह्याग्नौ भृत्यान्तरिक्षयोः ॥ ३४ ॥ तृणशाला प्रकर्तव्या प्रशस्ता शुभकर्मणा। पूर्वोक्त वास्तुपद विन्यास क्षेत्र के उत्तर-पूर्वी कोण पर स्थित ईश, दिति और अदिति के पद भाग पर बड़ा भाण्डागार अर्थात् भण्डार बनाए जाए। उत्तर-पूर्व कोण पर आप के पद के आधे भाग पर पुष्पागार और दक्षिण-पूर्व के सवित्र-पद के आधे में, अग्नि, भृत्य और अन्तरिक्ष पद भाग पर तृणशाला बनाई जाए, जो सभी शुभ कार्यों में प्रशस्त कही गई है। पर्जन्ये चाधिकरणं राज्ञः कार्यं पराङ्मुखम् ॥ ३५ ॥ शुभा प्रतोली माहेन्द्रे जये श्रीकरणादिकम्। आदित्ये वप्रकरणं सम्मुखं श्रीकरादिषु ॥ ३६ ॥ धर्माधिकरणं सत्ये कर्तव्यं चापराङ्मुखम्। वास्तुपद विन्यास के पूर्व की ओर पर्जन्य के पद पर अधिकरण हो, राजा का कार्य पराङ्मुख होगा। माहेन्द्र पद पर सुन्दर प्रतोली होगी। जय के पदस्थान पर

  1. यहाँ ग्रन्थकार आद्य विश्वकर्मा के ग्रन्थ का स्मरण करता है। सम्भवतः यह ग्रन्थ विश्वकर्मप्रकाश हो अथवा विश्वकर्मीय शिल्पशास्त्र हो। समराङ्गण में भी राजनिवेश में ऐसा निर्देश आया है।

442 राजकार्य के लिए (श्रीकरणादिकं) कार्यालय भवन हो, वप्रकरण व सन्मुख सूर्य पद भाग पर कोषाधिकारी तथा सत्य पद भाग पर धर्माधिकारी का भवन भी दूसरी ओर मुख किए हुए बनाएँ अर्थात् सत्य पद भाग और श्री मन्दिर, परकोटे के साथ न्यायालय के भवन (धर्माधिकरण) बनाएँ जाएँ। कर्णोर्ध्वे भूमिश्चैव तदग्रार्धे चतुष्किका ॥ ३७॥ जयस्य बाह्यपक्षे तु कुर्यात् कारागृहं तथा। कात्यायनी च माहेन्द्रे प्रतोल्याः ¹पुरतबुधः ? ॥ ३८ ॥ इसके पास ही वास्तुपद विन्यास के कोने के आधे भाग में ऊँची भूमि पर चौकी बनाकर जय पद भाग के बाहर की ओर कारागृह भवनों का निर्माण कराएँ और पूर्व दिशा में (महेन्द्र पद ?) प्रतोली या पोल बनाएँ जिसके पास कात्यायनी देवी का मन्दिर भी बनाएँ- ऐसा विद्वानों का मत है। आदित्याग्रे च बाह्ये तु कुर्याद् द्वयकरणाद्यकम् ? । रूपकं दुःसाध्यकानां चतुष्कं तु राजादिकम् ? ॥ ३९ ॥ इसी प्रकार वास्तुपद विन्यास क्षेत्र के सूर्य पद भाग के बाहर की ओर आगे दोनों कोनों पर दो लेखागार भवन (दस्तावेजों के लिखित प्रमाणीकरण हेतु बनाएँ अर्थात् आधुनिक पञ्ज्यक कार्यालय भवन की तरह के दो भवन बनाएँ) जिसके चौक में दुःसाध्य को अर्थात् गुण्डे-बदमाशों को राजादिकों अर्थात् राजकर्मचारियों, पुलिस विभाग के अधिकारियों द्वारा बन्दी बनाए और दण्डित करने की अवस्था में बेड़ी, हथकड़ी युक्त दशा में दिखाए जाएँ- ऐसी मूर्तियाँ बनाएँ। ऐसी मूर्तियों से रूपकों से दुःसाहसी गुण्डे बदमाशों में भय उत्पन्न हो सके और राजतन्त्र का दब-दबा प्रकट हो सके। मरीचिस्थ गर्भोत्तरे देवी राजकुलार्चिता। पृथ्वीयजाख्यः प्रासादस्तेजःप्रतापवर्धकः ॥ ४० ॥ वास्तुपद विन्यास क्षेत्र के गर्भभाग अर्थात् ब्रह्म क्षेत्र के उत्तर-पूर्व (मरीचिस्थ) भाग में राजकुल की अर्चिता देवी की प्रतिमा स्थापित की जाए। उसका नाम पृथ्वीजय प्रासाद रखें जो राजा के प्रताप और तेज का वर्धक स्वरूप हो। इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां महाराजवेशाधिकारो नाम षट्सप्ततितमं सूत्रम्॥ ७६ ॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में महाराज निवेश अधिकार नामक छिहत्तरवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ ७६ ॥

  1. 'पुरतबधुः ?' इति प्रकाशित पाठः।

सूत्र-७७ 443 सभाष्टकवेदीनिर्णयो नाम सप्तसप्ततितमं सूत्रम् ॥ 77 ॥ विश्वकर्मोवाच – नन्दा-भद्रा-जया-पूर्णा-दिव्या-यक्षी च रत्नजा । उत्पला तदनुज्ञेया सभा अष्टौ प्रकीर्तिताः ॥ 1 ॥¹ विश्वकर्मा बोले कि आठ सभाएँ होती हैं, जिनके नाम हैं— (1.) नन्दा, (2.) भद्रा, (3.) जया, (4.) पूर्णा, (5.) दिव्या, (6.) यक्षी, (7.) रत्नजा और (8.) उत्पला। सभा निर्माण प्रकारलक्षणञ्च – चतुरश्रीकृते क्षेत्रे द्विरष्टपदभाजिते । मध्यमपदचतुष्केण चतुष्कोऽलिन्दशेषतः ॥ 2 ॥ सभाओं के लिए किसी चौकोर क्षेत्र को सोलह भागों में विभाजित करें। मध्य के चार पदों की चौकड़ी के बाद शेष चार अलिन्द या चबूतरे हो जाते हैं। नन्दा नाम समाख्याता सर्वकामफलप्रदा । चतुष्के भद्रविस्तार एकोभागश्च निर्गमः ॥ 3 ॥ इनमें नन्दा नाम से विख्यात् सभा में चौकड़ी की दीवार का एक भाग निर्गम, द्वार युक्त होता है। यह सभी सर्वकाम फलप्रद करने वाली होती है। भद्रा त्वेवं समाख्याता तेजःप्रतापवर्धका । भद्रं भद्रं चतुष्के तु जया नित्यं जयावहा ॥ 4 ॥ इसी तरह भद्रा नाम की सभा भी तेज और प्रताप को बढ़ाने वाली होती है। उसके समान ही जया नामक सभा के भी प्रत्येक दीवार में निर्गम, द्वार होते हैं जो नित्य ही जय कराने वाले कहे गए हैं। अलिन्दैर्वेष्टितं सर्वं निर्यूहाच्छाद्यकं तथा । तथा पूर्णा भवत्येवं सर्व कल्याणकारिका ॥ 5 ॥ पूर्णा नामक सभा के सभी ओर के अलिन्दों, बरामदों में निर्व्यूह निकले होते हैं जिन पर छज्जे बने होते हैं। ऐसी सभा भी सर्व कल्याणकारक होती है। नवांशानुसारेण सुन्दरीशालाः – चतुरश्रं समं क्षेत्रं विभक्तं च नवांशकैः । केवला नवशालाश्च दिव्या नामापि सुन्दरी ॥ 6 ॥

  1. सभादि का वर्णन समराङ्गणसूत्रधार (अध्याय 27, 1) में भी आया है।

444 अपराजितपृच्छा (उक्त शालाओं के अतिरिक्त यदि) चौकोर क्षेत्र को नौ भागों में विभाजित किया जाए तो केवल नवशालाएँ बनती हैं। इसका नाम सुन्दरी दिव्या है। निष्कान्ता च चतुर्भद्रैर्यक्षी कार्या सुशोभना। भद्रे भद्रे दिशालानि सा मता रत्नसम्भवा ॥ 7 ॥ यक्षी सभा के चारों ओर की दीवारों में निकलने के लिए सुन्दर सुशोभन द्वार बनाने चाहिए। रत्नसम्भवा नामक सभा की प्रत्येक दीवार से सटी हुई दो शाला अर्थात् कमरे बने हुए होते हैं। तस्याश्च प्रत्येकशालं प्रतिभद्रविभूषितम्। उत्पला च समाख्याता महाराजेन्द्रवल्लभा ॥ 8 ॥ उत्पला नामकी सभा की भी प्रत्येक दीवार पर एक-एक शाला (प्रतिभद्र) से शोभा बढ़ाई जाती है, ऐसी सभा महाराजाओं को बड़ी प्रिय लगती है। लम्बिन्याख्यवितानानि विचित्राणि च मध्यतः। अनेकाकाररूपाश्च राजक्रीडोचिताः स्थिताः ॥ 9 ॥ इन सभाओं के ऊपर लम्बिनाख्य वितान अर्थात् झालरदार चन्दोवों से छतों की सजावट और बड़े ही विचित्र, विविध प्रकारों से सभा मध्य में की जाती है जिनमें अनेक तरह के रूपाकार जो राजक्रीड़ाओं से सम्बन्धित विषयाधारित होते हैं। शालभञ्ज्यादि प्रतिमा स्तम्भविमानसम्भवाः। मुक्तलूमच्छाद्योपरि घण्टाकूटैरलङ्कृताः ॥ 10 ॥ उन सभाओं के स्तम्भों पर शालभञ्जिका (शालद्रुम की शाखा तोड़ती युवती) की मूर्तियों से सजावट होती है। स्तम्भशीर्षों पर विमानों की रचना और छत से लटकती हुई मुक्तलूम अर्थात् मोतियों की मालाओं के लूम-लुम्बक लटकते हुए और घण्टा, घण्टियों के समूह से सजे हुए बनाए जाते हैं। दिव्यसौवर्णकलशैर्मत्तवारणसम्युताः । सुरसद्मोपमाश्चैव नृपसद्माग्रमण्डपाः ॥ 11 ॥ इति सभाष्टकम् ।

  1. समराङ्गणसूत्रधार में आठ सभाओं के नाम आए हैं किन्तु नामों में भेद है, भाविता, दक्षा, प्रवरा व विदुरा— ये चार अन्य नाम हैं और इनमें नन्दादि चार के लिए क्षेत्र को सोलह भागों में और भावितादि के लिए क्षेत्र को छह भागों में विभाजित कर कर्णभित्ति करने विभाजित करने का निर्देश है— नन्दा भद्रा जया पूर्णा सभा स्याद्भाविता तथा। दक्षा च प्रवरा तद्वद् विदुरा चाष्टमी मता ॥ चतुरश्रीकृते क्षेत्रे ततः षोढा विभाजिते। मध्ये पदचतुष्कं स्यात् सीमालिन्दस्तु भागिकः ॥ तद्वाह्योऽलिन्दकस्तद्वद् भवेत्

सूत्र-७७ 445 उन सभाओं के द्वारों पर चमकदार स्वर्ण के घड़े हुए कलशों से कुम्भों से सजे हुए मत्तवारण शोभायमान होते हैं जिससे ये राजमहलों के आगे बने मण्डप स्वर्ग के सुन्दर मण्डपों की समानता करते हुए उपमा लिए प्रतीति देते हैं। इत्यमनन्तर वेदीलक्षणं - तन्मध्ये याम्यभद्रे तु वेदी सिंहासनान्विता। श्रीधर्याद्या तथा चैव वैराजकुलसम्भवा ॥ 12 ॥ इन सभाओं के मध्य में दक्षिणी भद्र या दीवार से सटी हुई वेदी बनाई जाए जिस पर सिंहासन रखा हुआ हो। ये श्रीधरादि वैराज्यकुल से उत्पन्न होने वाली वेदियाँ कही जाती हैं। स्वस्तिका भद्रिका चैव श्रीधरी पद्मिनी तथा। चतुर्विधा भवेद् वेदी सर्वशान्तिकरी नृणाम् ॥ 13 ॥ वेदियाँ चार प्रकार की हैं- (1.) स्वस्तिका, (2.) भद्रिका, (3.) श्रीधरी और (4.) पद्मिनी। ये राजाओं को सभी प्रकार से सुख-शान्ति प्रदान करने वाली हैं। स्वस्तिका चतुरश्रा स्याद् भद्रिका भद्रसम्युता। श्रीधरी विंशतिकोणा प्रतिभद्रैर्विभूषिता ॥ 14 ॥ पद्मिनी वै पद्मदला ह्यष्टकोणैर्विभूषिता। इन वेदियों में स्वस्तिका वेदी चौकोर होती है; भद्रिका वेदी भद्रों सहित अर्थात् दीवारों वाली होती है; श्रीधरी वेदी बीस कोणों वाली होती है और उसका प्रत्येक भद्र या दीवार अलंकृत होती है। पद्मिनी वेदी पद्म-कमल की आठ पङ्खुड़ियों के आकार वाली अर्थात् आठ कोणों से अलंकृत होती है। वर्णानुसारेण वेदीप्रमाणमाह - विप्राणां सप्तहस्ता₇ च क्षत्रियाणां तु षट्करा₆ ॥ 15 ॥ ¹वैश्यानां पञ्चहस्ता₅ च शूद्राणां वेदहस्तिका₄। प्रतिसराभिधः। प्राग्ग्रीवाख्यस्तृतीयश्च बहिः क्षेत्राच्चतुर्दिशम्॥ निसृष्टसौर्ध(धे) यैर्वा स्यादेकस्यां वा यदा दिशि। नन्दा भद्रा जया पूर्णा क्रमेण स्युः सभास्तदा॥ षड्भागभाजिते क्षेत्रे कर्णीभित्तिं निवेशयेत्। सभा स्याद् भाविता नाम सप्राग्ग्रीवात्र पञ्चमी॥ स्तम्भान् षट्त्रिंशदेतासु पञ्चस्वपि निवेशयेत्। स्तम्भान् प्राग्ग्रीवसम्बद्धान पृथगेभ्यो विनिर्दिशेत्॥ दक्षेति षष्ठी परितस्तृतीयालिन्दवेष्टिता। प्रवरा सप्तमी द्वारैर्युक्तेषा परिकीर्तिता॥ प्राग्ग्रीवद्वारसंयुक्ता विदुरेत्यष्टमी सभा। सभानामिदमष्टानां लक्षणं समुदाहृतम्॥ इत्यष्टानां लक्ष्म सम्यक् सभानामेतत् प्रोक्तं दिग्भवालिन्दभेदात्। तद्वद् द्वारालिन्दसंयोगतश्च ज्ञातेऽत्र स्याद् भूभृतां स्थानयोगः॥ (समराङ्गण. 27, 1-9)

  1. विप्रेषु सप्तहस्ता च षड्हस्ता क्षत्रियेषु। पञ्चहस्ता भवेद्वैश्ये शूद्रे वेदाः प्रकीर्तिताः॥ इति पाठः।

त्रिहस्ता कर्षकाणां च प्रकृतेर्द्वयेकहस्तिका ॥ 16 ॥ विप्रों के लिए वेदी सात गज के प्रमाण वाली, क्षत्रियों के लिए छह गज, वैश्यों के लिए पाँच गज, शूद्रों के लिए चार गज और कृषकों के लिए तीन गज की हो किन्तु सामान्य जनों के लिए वेदी दो गज की कही जाती है। कार्यानुसारेण वेदीप्रयोगमाह — विवाहेषु च सर्वेषु स्वस्तिका सर्वकामदा। भद्रा भद्रा नरेन्द्राणां सर्वकल्याणकारिका ॥ 17 ॥ देवतास्थापने चैव स्वस्तिका भद्रा श्रीधरी। देवानां च प्रतिष्ठादौ पूजायां चैव पद्मिनी ॥ 18 ॥ सभी प्रकार के वैवाहिक और माङ्गलिक कार्यों के लिए स्वस्तिका वेदी समस्त कामनाओं को पूरी करने वाली कही गई है। भद्रा वेदी राजाओं के लिए सर्वप्रकारेण कल्याणकारक है। देवी-देवताओं के स्थापना कार्य में स्वस्तिका, भद्रा, श्रीधरी वेदी उचित रहती है और देवताओं की प्रतिष्ठादि या पूजा का कार्य हो तो पद्मिनी वेदी उचित ही मानी गई है।¹ सिंहासनं तदूर्ध्वे च भद्रासनमथापि वा। पट्टप्रस्तारिका चैवं गदिकाद्यं तथोत्तरे ॥ 19 ॥ प्रयोजन के अवसर पर वेदिका के ऊपर सिंहासन अथवा भद्रासन लगाया जाए जिस पर महीन चद्दर से ढकी हुई गद्दी उत्तर मुखी लगी हो। अन्यदप्याह — चतुःस्तम्भसमायुक्तं छाद्यत्रयविभूषितम्। ऊर्ध्वे च घण्टाकलशं मत्तवारणशोभितम् ॥ 20 ॥ वेदी के चारों ओर चार स्तम्भों से युक्त तीन चन्दोवे तने हुए हों जिन पर घण्टा, कलश युक्त मत्तवारणों की शोभा होनी चाहिए।

  1. सिद्धान्तशेखर में आया है कि वेदियाँ चतुरस्र, पद्मिनी, श्रीधरी व सर्वतोभद्रा होती हैं। दीक्षा, स्थापनादि अवसरों पर चतुरस्रा का प्रयोग सर्वफलप्रद होता है। तड़ागादि की प्रतिष्ठा के अवसर पर पद्म के आकार वाली पद्मिनी का प्रयोग होगा। राज्याभिषेक के अवसर पर चतुर्भद्रा का प्रयोग होगा, विवाह में श्रीधरी का प्रयोग होगा जो कि बीस कोष वाली, दर्पणोदर जैसी समस्तरीयता लिए होंगी : वेदी चतुर्विधा प्रोक्ता चतरस्रा च पद्मिनी। श्रीधरी सर्वतोभद्रा दीक्षासु स्थापनादिषु ॥ चतुरस्रा चतुःकोणा वेदी सर्वफलप्रदा। तड़ागादिप्रतिष्ठायां पद्मिनी पद्मसंन्निभा॥ राज्ञां स्यात्सर्वतोभद्रा चतुर्भद्राभिषेचने। विवाहे श्रीधरी वेदी विंशत्यस्रसमन्विता॥ दर्पणोदरसङ्काशा निष्प्रोन्नत विवर्जिता। (कुण्डरत्नावली : सम्पादक- मिताली देव, वाराणसी, 2003 ई. पृष्ठ 19)

सूत्र-७८ 447 शुक्लपट्टैश्च शोभाढ्यं पुष्परागविभूषितम् । इन्द्रनीलसमं कान्त्या हेमरत्नैश्च शोभितम् ॥ 21 ॥ ऐसी वेदी के ऊपर राजा का आसन लगाया जाए जो स्वच्छ, श्वेत, रेशमी चद्दरों से ढका हुआ हो और उस पर पुष्पों की सुगन्ध वाला इत्रादि छिड़का हो। उसकी कान्ति इन्द्रनील के समान और स्वर्ण व रत्नों के जड़ाव का अलंकरण होना चाहिए। मुक्ताफलैरनेकश्च सूर्यकान्तिमनोरमैः । एवं पुष्पकमाडं च वेद्यूर्ध्वं च नृपासनम् ॥ 22 ॥ इसी प्रकार उन पर अनेकों मोतियों की मनोरम मालाएँ सूर्य की प्रभा विस्फारित करती प्रतीत होनी चाहिए, ऐसा पुष्पक माड नामक वेदी के ऊपर नृप के बैठने का स्थान होता है। उत्तराभिमुखं कृत्वा याम्यायां स्थापयेद्दिशि । तथाग्रे च समस्ताश्च भक्ता ये स्वामिनः स्थले ॥ 23 ॥ यह आसन उत्तर दिशा की ओर मुख वाला और दक्षिण दिशा की ओर स्थापित होता है और इस वेदिका के आसन के आगे राजा के समस्त भक्त-सेवक अपने स्वामी के स्थल पर सामने ही विराजित होंगे। इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां सभाष्टकवेदीनिर्णयाधिकारो नाम सप्तसप्ततितमं सूत्रम् ॥ 77 ॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में सभा अष्टक वेदी निर्णय अधिकार नामक सतत्तरवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ 77 ॥ महाराजाधिकाराजो नामाष्टसप्ततितमं सूत्रम् ॥ 78 ॥ विश्वकर्मोवाच – सभामध्ये तथा वेदी तत ऊर्ध्वे सिंहासनम्। पौती¹ पुष्पजाड्यकुम्भं सिंहवक्त्रं कनालिकम् ॥ 1 ॥

  1. 'पौती ?' इति प्रकाशित पाठः। पोतिका स्तम्भाङ्ग के रूप में स्वीकृत है। मयमतं, मनुष्यालयचन्द्रिका इत्यादि में बोधिका या पौती जैसे पर्याय इसी सन्दर्भ में आए हैं। पोतिका के विषय में ईशानशिवगुरुदेवपद्धति और वास्तुविद्या प्रभृति ग्रन्थों में विस्तृत उल्लेख पाया जाता है। ईशानशिवगुरुदेवपद्धति में स्तम्भ पर स्थापित की जाने वाली पोतिका के लक्षण बताते हुए कहा गया है कि स्तम्भ के विस्तार से तीन, चार या पाँच गुणा मान प्रमाण वाली पोतिका क्रमशः नीच, मध्यम और उत्तम नाम से जानी जाती है। ये क्रमशः नागवृत्ता, पत्रचित्रा और समुद्रोर्मि संज्ञक होती हैं- तदूर्ध्वं पोतिका स्थाप्या तस्या लक्षणमुच्यते। सा च स्यात्

448 अपराजितपृच्छा विश्वकर्मा आगे बोले कि सभा के मध्य में वेदी हो, उस वेदी पर सिंहासन हो और जो कि पोतिका, पुष्प और जाड्यकुम्भ, सिंहमुख और लड़ियों से अलंकृत हो। गजाश्वनरपीठाढ्यं सिंहव्याघ्रैरलंकृतम्। अनेकसिंहरूपैश्च क्रमतो विकृतानना ॥ २ ॥ इस जाड्यकुम्भ के ऊपर के भद्रभाग पर प्रासाद मण्डोवर के अलंकरण की भाँति ही विविध स्तरों पर गजथर, अश्वथर, नरथर, सिंहथर, व्यालथर (रासमुख) अनेक सिंहों के रूप में विकृत भयङ्कर मुखाकृतियों में बने अलंकरण हों। सिंहासने महाराजः शोभते मणिदीप्तिभिः । यथा शक्रः सुरैर्युक्तो बालार्ककिरणोदिती ॥ ३ ॥ ऐसे सिंहासन पर महाराज एक प्रकार से अपनी मणिदीप्ति से ऐसे प्रभविष्णुमयता के विराजित हों, मानों स्वयं इन्द्र अपने देवगणों के मध्य में उदित होते हुए सूर्य की लालिमायुक्त किरणों से प्रकाशित हो रहे हों। चक्रवर्त्यादीनां नृपकोटयः — चक्रवर्त्यर्धपतिश्च भूरिभक्त्या महीपतिः । एते वै तु महाराजा शेषाश्च मण्डलेश्वराः ॥ ४ ॥ स्तम्भविस्तारात् त्रिगुणं वा चतुर्गुणम्॥ दीर्घा पञ्चगुणं वापि नीचमध्योत्तमा स्मृता। नागवृत्ता पत्रचित्रा समुद्रोर्मिश्च पोतिकाः॥ त्रिविधा नामभिर्ज्ञेयास्तासां लक्षणमुच्यते। स्तम्भव्याससमोत्सेधविस्तारा श्रेष्ठपोतिका॥ शरांशोना मध्यमा स्याद्गनद्व्यंशा कनिष्ठिका। भूतेभमकरव्यालरत्नस्रग्विचित्रिता ॥ वल्लीचित्राग्रपट्टा च सा ख्याता चित्रपोतिका। केवलं पत्रवल्लीभिर्विचित्रा पत्रपोतिका ॥ तरङ्गमात्रचित्रा या पोतिका स्यात् तरङ्गिणी। तरङ्गाश्चात्र वेदर्तुव(स्वा? स्वङ्का) शादिसंख्यया॥ कार्यास्तृभयतस्तुल्याः , पट्टिकाछात्रमध्यगाः। त्रिभागे पोतिकोत्सेधे सार्द्धांशेनाग्रपट्टकम् ॥ तदर्धार्धेन तदधः क्षेपच्छायान्वितं भवेत्। तदुच्छ्रार्धात् त्रिभिर्वांशैरंशाभ्यां वात्र कल्पयेत् । स्वव्यासाधत् त्रिपादाद् वा कुर्यात् तास्वग्रमण्डनम् ॥ 'वास्तुविद्या' में इसका नाम 'बोधिका' है। पोतिका अपने न्यूनाधिक विस्तार के अनुसार तीन नामों वाली होती है। ये भित्ति के स्तम्भाग्र के आधार पर दण्डसंज्ञक, स्तम्भाग्र विस्तार के अनुसार उशन्तिदण्ड और चरणाग्रप्रतान से दण्ड नाम वाली हो जाती है। ग्रन्थान्तर में भी कहा गया है। प्रतिलोम क्रम से इनके नाम होते हैं— अधम प्रकार की त्रिदण्ड पोतिका पत्री कही जाती है। मध्यम प्रकार की चतुर्दण्ड पोतिका चित्री नामक और उत्तम प्रकार की पञ्चदण्ड पोतिका महार्णवी संज्ञक होती है— पोतिका तु त्रिधा ज्ञेया नामभेदेन दैर्ध्यतः। त्रिदण्डा च चतुर्दण्डा पञ्चदण्डा यथाक्रमम्॥ महार्णवी च चित्री च पत्री च प्रतिलोमतः। (वास्तुविद्या : सम्पादक - श्रीकृष्ण 'जुगनू', 8, 44-45) पोतिकेत्यादि । 'बोधिके'ति क्वचित् पाठः । नामभेदेन दैर्ध्यत इति। दैर्ध्यस्य न्यूनत्वाधिकत्वाभ्यां कृतेन नामभेदेनेत्यर्थः । तादृशं दैर्घ्यमेवाह- त्रिदण्डेनेत्यादि। इह दण्डप्रमाणं तु 'कुड्यस्तम्भाग्रतारोऽप्यथ तदवयवाकल्पने दण्डसंज्ञः', 'स्तम्भाग्र- विस्तारमृशन्ति दण्डम्', 'चरणाग्रप्रतानो दण्डः' इत्यादि ग्रन्थान्तरोक्तं ग्राह्यम् । त्रिदण्डादीनां संज्ञा आह— महार्णवीत्यादि । प्रतिलोमत इति । प्रतिलोमक्रममनुसृत्येत्यर्थः । तथाच त्रिदण्डा पोतिका पत्री नामधमा। चतुर्दण्डा पोतिका चित्री नाम मध्यमा। पञ्चदण्डा पोतिका महार्णवी नाम उत्तमेति सिद्धम्। (तत्रैव विवृत्ति)

सूत्र-७८ 449 महाराज का विरुद धारण करने वाले राजाओं में चक्रवर्ती अधिपति, भूमि के तीनों भागों को धारण करने वाले (षष्ठांश प्राप्तकर्ता) महीपति कहलाने के अधिकारी हैं। इनसे अतिरिक्त जो शेष भूपाल हैं, मण्डलेश्वर पद के अधिकारी हैं। मण्डलीकोऽधिसामन्तः सामन्तो लघुसञ्ज्ञकः। चतुरंशिकाऽल्पराजाः शेषास्तु राजपुत्रकाः ॥ ५ ॥ इनके नीचे मण्डलीक, उनसे नीचे के सामन्त तथा उनसे नीचे के भी लघु सामन्त कहलाते हैं और चतुर्थ अंश भाग के अधिकारी को अल्पराजा और इनके बाद शेष बचे सभी को केवल राजपुत्रक कहा गया है। स्वके स्वभुक्तानुसारे राज्यं कुर्वन्ति स्वेच्छया। अनेकभोगभोक्तारो राजक्रीडामनेकधा ॥ ६ ॥ ये सभी अपने-अपने प्राप्त भाग के प्रदेश पर अपनी इच्छा के अनुसार राज्य करते हैं और अनेक प्रकार के भोग-आनन्द को भोगते हैं तथा नाना प्रकारेण राजक्रीड़ाओं की मौज-मस्ती मनाते हैं। तपसाराधितः पूर्वं महात्मभिरुमापतिः। तपसोऽर्थानुरूपैश्च राज्यं कुर्वन्ति भूतले ॥ ७ ॥ इन सभी भाग्यवान् महीपतियों ने अपने पूर्व जन्म में तपस्या से उमापति महादेव की जो आराधना का पुण्य अर्जित किया था, उसी के अनुरूप उनको इस जन्म में यह सौभाग्य मिला और वे इस भूतल पर आज राज कर रहे हैं। देवपूजार्चनं दानं पूज्यषड्दर्शनादिकम्। पुराणागमग्रन्थादि राजनीतिरनेकधा ॥ ८ ॥ ऐसे सौभाग्य के लिए अनेक प्रकार की देवपूजा, अर्चन, अनेक प्रकार के दान-पुण्य करने के अवसर, अनेक साधनाओं, षड्दर्शनादि के विधि-विधान, अनेक पुराण और आगम शास्त्र-ग्रन्थादि और अनेक राजनीतिक व्यवस्थाएँ पाई जाती हैं। राज्योत्पतिमाह - पञ्चमातृद्भवं राज्यं नैककलादिकौशलम्। मातु ( ? ) रैकैकोक्तगुणा नटेश्वरसमुद्भवाः ॥ ९ ॥ राज्य की सामान्यतया उत्पत्ति पाँच मातृकाओं से हुई है और उन्हीं से अनेक कला-कौशलों की भी रचना हुई है। ये माताएँ भी अपने एक-एक गुणों के साथ भगवान् शिव-नटेश्वर से समुद्भूत हुई हैं।

450 अपराजितपृच्छा बृहच्छुश्रूषया माता द्वितीया पौरुषोद्भवा। स्त्रीणामङ्गोद्भवा माता गजमाता चतुर्थिका ॥ 10 ॥ पञ्चमी चाश्वमाता च शेषा उपाङ्गवर्त्तिकाः। पञ्चमात्रोद्भवमिति इन्द्रराज्यसमं भवेत् ॥ 11 ॥ इन माताओं के भी विविध नाम हैं— (1.) बृहत् शुश्रूषया माता, (2.) पौरुषोद्भवा माता, (3.) स्त्रीणामङ्गोद्भवा माता, (4.) गज माता और (5.) अश्वमाता। शेष सभी उपाङ्गवर्त्तिका हैं। इस प्रकार यह सब पञ्चमातृकाओं से बना स्वर्ग के इन्द्रलोक के राज्य के समान होता है। बृहत् शुश्रूषया मातायात् राज्ञो दिनचर्यायाः — बृहच्छुश्रूषया वक्ष्ये प्रहरादिन्त्यार्धकम्। प्राप्ते प्रत्यक्षप्रहरे शय्यायां रात्रितो गतौ ॥ 12 ॥¹ अब मैं बृहत् शुश्रूषया माता (आराम देने वाली मातृका, बड़ी तिमारदारी जैसी) के बारे में कहता हूँ जो रात्रि के पहले प्रहर से आरम्भ होकर आधे रात के बीतने तक आराम की नींद निकालने में राजा को सुखदायी होती है। रात्रि के प्रथम प्रहर बीतते ही राजा को शयन के लिए अपनी शय्या पर आराम से नींद लेने हेतु चले जाना चाहिए। शय्यास्थ उद्धवेद्राजा धर्ममूर्तिर्भवेत्सदा। गोदानयुक्त स्वर्णपादं निक्षिपेत् प्रतिभूतलम् ॥ 13 ॥ प्रातः ब्रह्ममुहूर्त में राजा को चाहिए कि वह शय्या से उठ जाए। उस ब्रह्ममुहूर्त काल में जागा हुआ राजा अपनी शय्या से उठकर बैठा हुआ एक प्रकार से धर्ममूर्ति स्वरूप ही होता है। अस्तु, उसे उठते ही सबसे पहला कर्त्तव्य गोदान करना होता

  1. 'बृहच्छुश्रूषया वक्ष्ये प्रहरादिज्यार्धकम् ?। प्राप्ते प्रत्यक्षप्रहरे शय्यायां संस्थितो गतौ ?' इति प्रकाशित पाठः। चाणक्य ने राजा की दिनचर्या बड़ी ही जटिल वर्णित की है। प्रशासन के भार को ध्यान में रखकर ही राजा की दिनचर्या निर्धारित करते हुए दिन-रात दोनों को आठ-आठ भागों में बाँट लिया गया था। समय का ध्यान सूर्य द्वारा या समय सूचक जलघड़ी से जाना जाता था। इस प्रकार समय का प्रत्येक विभाजन (नालिका) डेढ़ घण्टे के बराबर होता था। सामान्यतया रात्रि में डेढ़ से तीन बजे तक शयन, तूर्यवादन सुनकर उठना, शास्त्र व अगले दिन के कार्यों पर विचार करना। सुबह तीन से चार बजे तक नीति व योजनाओं का निर्धारण करना और उनके अनुसार अपने गुप्त दूत भेजना। सुबह साढ़े चार से छह बजे तक यज्ञ कराने वाले पुरोहित, राजगुरु व कुलपुरोहित के साथ बैठना, आशीर्वाद लेना इत्यादि...। विष्णुधर्मोत्तरपुराण, मनुस्मृति, शङ्खलिखितस्मृति, वृद्धवशिष्ठस्मृति, याज्ञवल्क्यस्मृति आदि में भी इस प्रकार की दिनचर्या का वर्णन हुआ है।

सूत्र-७८ 451 है। इसलिए भूमि पर पाँव रखने से पूर्व उसे गोदान की स्वर्ण मुद्रा भूमि पर भेंट करके उन पर शय्या से उतरते समय अपना पाँव रखना चाहिए। दन्तकाष्ठादिकं स्नानमौषधादिकसम्भृतम्। ततो देवार्चनं कृत्वा स्नापनालेप्य पुष्षतः ॥ 14 ॥ इसके अनन्तर राजा को दन्तधावन हेतु (नीम या बबूल) का... चाहिए। स्नान के लिए प्रयोजन वाले जल में सुगन्धित द्रव्यों, औषधियों ...ना चाहिए। इसके बाद राजा को चाहिए कि वह देवार्चन करके अपने शरीर पर देवपुष्पों से केसर, कुङ्कुमादि का लेप करे, तिलक छापा लगाएँ। गन्ध-धूप-नैवेद्यैश्च पूजां कृत्वा अरार्त्तिकम्। पुरोहिते ततो दानमपूर्वं ¹स्तुति आदिकम्॥ 15 ॥ गन्ध-पुष्प, धूप, नैवेद्य से भगवान् की मूर्ति की पूजा करके आरती उतारें और पुरोहित से दान के पूर्व की स्तुति आदि करवाएँ। राजा गुरूद्गतं दानं शैवशास्त्रेणपूजनम्। भटेन स्तुतितो बोध्यं येनान्ते दर्शनं भवेत् ॥ 16 ॥ इसके उपरान्त राजा अपने गुरु के सामने दान का सङ्कल्प लेकर गुरु द्वारा प्रदत्त जल को छोड़े, फिर भट अर्थात् पूजा पाठ कराने वाले पण्डित के द्वारा की जाने वाली देवस्तुति को सुनते-समझते हुए साथ-साथ स्तुति करें; उसके बाद ही लोक, प्रजा को दर्शन देवें। गोपूजां च ततः कृत्वा योगिनीं च कुमारिकाम्। अनास्तिके कृपादानं शस्त्रार्थे तु निरो(रु!)पणम् ॥ 17 ॥ इसी बीच, गोपूजा करके योगिनी और कुमारिकाओं व आस्तिक लोगों पर कृपा करता हुआ शस्त्र धारण करने हेतु अर्थात् तलवार, कमरबन्ध आदि से सुसज्जित होने हेतु अग्रसर हो। वस्त्रशृङ्गारकं कृत्वा सिंहासनसुसंस्थितः। चतुष्कतिलकं कृत्वा प्रवृत्तस्तिलकेश्वरः ॥ 18 ॥ साथ ही वस्त्रादि से अपना शृङ्गार करके सिंहासन पर जाकर विराजित हो जाए और चौकोर तिलक लगाने के बाद तिलकेश्वर रूप में प्रवृत्त हो जाएँ।

  1. 'समवादिकम्?' इति प्रकाशित पाठः। विष्णुधर्मोत्तरपुराण में आया है— स्नानं कुर्यात्ततः पश्चाद्दन्तधावनपूर्वकम्। औषधैर्मन्त्रपूतैस्तु पानीयैर्विविधैः शुभैः ॥ सन्ध्यामुपास्य प्रयतः कृतजप्यः समाहितः। (वीरमित्रोदय, राजनीतिप्रकाश पृष्ठ 156)

452 अपराजितपृच्छा नरवीरभटाश्चैव प्रणमन्ति महीपतिम् । धर्मोपदेशं दत्वा च तथा जलसमाकुले ॥ २१ ॥ इस अवसर पर राजा को सभी नरवीर और भटगण (ठाकुर, उमराव, सामन्तादि) प्रणाम करें और अपनी भक्ति-निष्ठा राजा के प्रति व्यक्त करें। इसके बाद, राजा सभी जन समुदाय को धर्मोपदेश (यथोचित आज्ञादि) करें। शृङ्गारं च ततः कृत्वा दिव्यालङ्कारशोभितम् । सभामण्डले गवाक्षे महासिंहासने स्थितम् ॥ २०॥ चतुष्कावसरे चैव वर्तते जनसङ्कुलम् । प्रणिपत्य समस्तैश्च मण्डलेश्वरकादिभिः ॥ २१ ॥ राजा को चाहिए कि वह दिव्य अलङ्कारों से विभूषित होकर, शृङ्गार करके सभा मण्डप के झरोखे में रखे हुए सिंहासन पर विराजित होकर गवाक्ष से राजमहल के चौक में एकत्रित प्रजाजनों के सङ्कुल को दर्शन देकर उनका प्रणाम स्वीकार करें, उनमें यदि कई-एक मण्डलेश्वर भी हों तो उनका भी प्रणाम स्वीकारें। गजयुद्धं मेषयुद्धं विविधं मल्लयुद्धकम् । विधेयं छुरिकायुद्धं माहिषं कौर्कुटादिकम् ॥ २२ ॥ इसी प्रकार अपने आमोद-प्रमोद के लिए गजयुद्ध, मेंढ़ों की भिड़न्त, तरह- तरह के पहलवानों की कुश्ती, तलवार-छुरी की पैंतरे बाजी, भैंसों की भिड़न्त, मुर्गों-लावकों की लड़ाई जैसे अनुरञ्जनकारी आयोजन करके उत्सव जैसा वातावरण बनाए और जनता सहित स्वानन्द लें। पौरुषोद्भव मातायाक्रममाह — एषा पुरुषजा माता स्वीये स्वीये च राज्यके । वाटिकां च समाश्रित्य पूर्बाह्नो देवताश्रमम् ॥ २३ ॥ अब पुरुषजा माता के बारे में कहता हूँ। पूर्वाह्न काल में अपने-अपने राज्यों, ठिकानों से आए समस्त सामन्त-सरदारों, लघु राजा, माण्डलिक बगीचे में बने हुए देवमन्दिर के आङ्गन के आश्रम में एकत्रित हो जाएँ। गजाश्वरथकोष्ट्रासिकिरीटच्छत्रसङ्कुलैः । अलम्बचिह्नपताकैः टका ? स्तम्भैरनेकशः ॥ २४ ॥ उनके साथ आए हुए हाथी, घोड़े, रथ, ऊँट, तलवारों, मुकुटों, छत्रों के समूहों तथा लम्बी-लम्बी ध्वज-पताकाओं, रेशमी पटकों और नाना स्तम्भों से सज- धजकर महोत्सव आयोजित करें।

प्रतिष्ठाप्य पुरे प्रीत्या राजगृहे उमापतिम्। कण्ठस्नानादिकं कृत्वा मण्डपे च शनैः स्थितैः ॥ २५ ॥ इसी अवधि में राजा अपने राजमहल में भगवान् उमापति शिव को प्रीतिपूर्वक प्रतिष्ठापित करके कण्ठ तक जल में डुबकी लगाकर स्नान करके धीरे से मण्डप में आकर बैठ जाएँ। प्रेक्षणीयं देवताग्रे वाद्यगीतनृत्यादिकम्। आरात्रिकं ततो दृष्ट्वा प्रदक्षिणविसर्जनम् ॥ २६ ॥ इसी बीच, देवता के आगे जो-जो प्रेक्षणीय वाद्य, गीत, नृत्यादि हों उनको करके भगवान् की आरती उतारकर दर्शन करें और प्रदक्षिणा कर सभा का विसर्जन करें। भुक्ताशनः स्थितो राजाऽग्रवृत्त्या जनसङ्कुलैः। भुक्त्वोत्तरं ततः स्थाने सैन्यावसरवर्त्तनम् ॥ २७ ॥ राजा अपने अग्रवर्ती जनसङ्कुल (सभासद, सामन्तादिगण) आदि के समूह के साथ भुक्तासन में स्थित हों अर्थात् भोजनशाला में जाएँ और पङ्क्ति में बैठकर भोजन करें। इस प्रकार सभी के साथ भोजन ग्रहण कर अपनी सेना के निरीक्षण के लिए सैन्यस्थान या शिविर-छावनी में जाने को (सैन्यावसर वर्त्तन) कार्यक्रम तय करें। स्त्रीणामङ्गोद्भवा मातायात्क्रमाह — स्त्रीणामङ्गोद्भवा माता प्रवृत्तं जनसङ्कुलम्। अबला बाला स्त्रियश्च मुग्धाः प्रौढादिकास्तथा ॥ २८ ॥ एवं शय्यां महाराजः स्त्रीजनैः परिवेष्टितः। निद्रानन्तरतो वत्स वर्तते जागृती दशा ॥ २९ ॥ (अब मैं स्त्रीणामङ्गोद्भवा माता नामक आराम के विषय में बताता हूँ) इसमें प्रवृत्त होने पर राजा अबला, बाला, स्त्रियां, मुग्धा, प्रौढ़ादि विविध वयी महिलाओं की भीड़, जनसङ्कुलादि से घिरा रहता है और इस प्रकार घिरे-घिरे ही आराम के लिए अपनी शय्या पर लेट जाता है। इस प्रकार निद्रा लेकर हे वत्स! राजा पुनः जागता है। तत्र रीत्युपयोग्यं च शृङ्गारं क्रियते पुनः। द्वादशादित्यसङ्काशद्युतितोऽपि महान्नरः ॥ ३० ॥ जागने पर वह पुनः राजरीति के अनुसार उपयुक्त शृङ्गार धारण करता है और द्वादशादित्य की ज्योति के समान अपने तेज से प्रकाशित होकर शोभायमान होता है।

454 अपराजितपृच्छा सभामध्ये समायातः स्थितः सिंहासने तथा। सर्वावसरकं तत्र प्रवृत्तं जनसङ्कुलम्॥ ३१॥ वह सभा के मध्य में आकर अपने सिंहासन पर विराजमान होकर अपराह्न काल में सर्वावसरक अर्थात् राजकीय सभी अवसरों के कार्यों के निस्तारण के लिए एकत्रित राजसभा के जनसङ्कुल में प्रवृत्त होता है। राजसभासदवर्णनं — द्वादशदण्डनायकाः₁₂ प्रतीहारद्वयी₂ तथा। अमात्यराजकरणाः श्रीकरणा वयस्कराः॥ ३२॥ राजा की सभा में, राजा के सामने बारह दण्डनायक, दो प्रतिहारी तथा आमात्य, राज्याधिकारी, कोषाधिकारी व अन्य वयस्क कर्मचारी होने चाहिए। चत्वारो₄ मण्डलेशाश्च मण्डलीकाश्च द्वादश₁₂। महासामन्ता द्विरष्ट₁₆ सामन्ताश्च युगाष्टकाः₃₂॥ ३३॥ इसी प्रकार चार मण्डलेश, बारह मण्डलीक, सोलह महासामन्त तथा बत्तीस सामन्त होने चाहिए।¹ लघवः षष्ट्युत्तरं चतुःशतं₄₆₀ चतुरंशिकाः। शेषास्तु राजपुत्राश्च असङ्ख्यातास्तथैव च॥ ३४॥ इसी प्रकार चार सौ साठ लघु सामन्त जो कि चतुरंशिकाः अर्थात् चौथ जमा कराने वाले या चतुर्थांश के अधिकारी होते और शेष राजपुत्र जिनकी संख्या निश्चित नहीं है, वे इस सभा में आएँगे। स्वर्णालङ्कारखचितैर्नेकरत्नैस्तु सङ्कुलैः। दिव्यशृङ्गारकैः सर्वे महाराजप्रत्यात्मिकाः॥ ३५॥ ये सभी दरबारी जन स्वर्णाभूषणों से अलंकृत, अनेकों रत्नों से जटिल गहनों को धारण करके और दिव्य वस्त्रों से भूषित ऐसे लगते हैं मानों ये सब महाराज के ही प्रतिरूप हों। अथ गजमातायात्क्रम माह — गजाः शृङ्गारयुक्ताश्च आनीतास्तु महोत्कटाः।

  1. मेवाड़ रियासत में सोलह-बत्तीसों की परम्परा रही है। सोलह उमराव और बत्तीस राव सभा में होते थे। इनके ठिकानों को इसी दृष्टि से सम्मान दिया जाता था। महाराणा कुम्भ के काल में यह परम्परा थी। अमरसिंह द्वितीय के शासनकाल में भी इन कोटियों के अधिकार, मर्यादा आदि तय की गई।

सूत्र-७८ 455 युध्यमानास्तथा ¹कुर्यान्तरांश्च मारणे रतान् ॥ ३६ ॥ गजोद्भवा तत्र माता अश्वमाता सन्धोद्गमैः ? । सभा के अवसर पर राजा व सभासद के सामने निरीक्षण के लिए सजे-धजे, आभरणों से भूषित, महोत्कट गजदलों को लाया जाता है जो युद्ध में लड़ने के निमित्त ही तैयार किए हों तथा नरों को मारने में रत रहने के लिए पूरी तरह से सिखाए गए हों। यह चतुर्थ गजोद्भवा माता के बारे में कहा गया, इसी तरह पाँचवीं अश्वमाता के बारे में भी सन्धिकाल को समझें। परराष्ट्रोद्भवा ये च समये तत्र दर्शयेत् ॥ ३७ ॥ तस्यां ? मनोभवः कम्पः स्वराज्यं च स्वर्गा( ?-र्गा )त्पतिः । लघुराष्ट्रोद्भवा ये च प्रसङ्गे दर्शयेदपि ॥ ३८ ॥ इस बीच, सभा में कोई परराष्ट्र में जन्मे व्यक्ति तथा राजदूत आदि दिखाई देते हों तो राजा उनके मनोभाव, कम्प-दशा, उनके राज्य के बारे में जानकारी प्राप्त करने के लिए भेंट करें, उनके पूर्वजों के बारे में भी जानकारी लें। इसी तरह लघु राष्ट्रों में उत्पन्न कोई लोग इस प्रसङ्ग में दिखाई दें तो उनसे भी प्रेमपूर्वक भेंट का अवसर प्राप्त किया जाए। महाराजाधिराजश्च परमेश्वरसञ्ज्ञितः । भुवनैकनाथो महाराजचक्रचूडामणिः ॥ ३९ ॥ क्योंकि, यह ज्ञातव्य है कि महाराजाधिराज एक प्रकार से परमेश्वर स्वरूप हैं जो इस पृथ्वी का एकमेव स्वामी है और महाराज चक्रचूड़ामणि हैं अर्थात् एक चक्रवर्ती, एकछत्र महाराजाधिराज है। भूपालः सर्वकलाकुशलः उमापतिवरलब्धप्रतापतेजाः । तथाऽन्यनृपाद्यमुखदर्पणो धर्मादिप्रशस्यावतारः ॥ ४० ॥ ऐसा भूपाल सब कलाओं में कुशल और उसे उमापति भगवान् शिव का वरदान प्राप्त है और उसी के प्रताप, तेज से तथा अन्य राजाओं के लिए मुखदर्पण की तरह आदर्श रूप है जो धर्मादि के प्रशस्त-मान्य अवतार स्वरूप ही है। इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां महाराजाधिराजाधिकारो नामाष्टसप्ततितमं सूत्रम् ॥ 78 ॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में महाराजाधिराज अधिकार नामक अठहत्तरवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ 78 ॥

  1. 'कुर्यान्नृवांश्च' इति प्रकाशित पाठः।

430 ...क्षा गजशालाप्रमाणहस्तिलक्षणकमेकोनाशीतितमं सूत्रम् ॥ 79 ॥ अधुना गजशालार्थं क्षेत्रभक्तिविधिं। विश्वकर्मोवाच — लक्षणं गजशालानां कथयिष्याम्यनुक्रमात् । षट्त्रिंशद्भिः पदैर्भक्तं क्षेत्रं विंशतिभिः करैः ॥ 1 ॥ विश्वकर्मा बोले कि अब मैं अनुक्रम से गजशालाओं (हाथी बान्धने के ठाणों, पीलखाना) के बारे में कहता हूँ और उनके लक्षण बताता हूँ। इसके लिए सर्वप्रथम बीस गज के लम्बे चौड़े क्षेत्र को छत्तीस पदों में विभक्त करें। वेदांशमध्यगर्भाढ्यं गजस्थानं महोत्तमम्। दृढस्तम्भं भवेन्मध्यं घटैर्नवकरैर्युतम् ॥ 2 ॥ उन छत्तीस पदों में मध्य के चार पदों के गर्भस्थान को महोत्तम गजस्थान अर्थात् गज का ठाण समझें। इस गजस्थान के मध्य में नौ गज के पाषाण के घड़े हुए दृढ़ स्तम्भ अर्थात् खुमाल बनाएँ। अलिन्दवेष्टितं भागे भागे भित्त्या च संयुतम्। विस्तरोच्छ्रयतुल्यश्च पट्टानामुदयो भवेत् ॥ 3 ॥ इसके लिए अलिन्द या बरामदा बनाएँ जिसके बाहर भींत बनी हों। उस भींत की ऊँचाई उसके विस्तार के बराबर हो अर्थात् क्षेत्र के दो पद लगभग सात गज (चौदह फीट) हो और उस पर पट्टियों की छवाई की छत बनाई जाएँ। भित्तित्रयसमायुक्तं द्वारमग्रदिशान्तिके। छाद्यत्रयं क्रमयुक्तं घण्टाकलशभूषितम् ॥ 4 ॥ तीन ओर तीन भित्ति हो और आगे का भाग द्वार के रूप में खुला छोड़ें और तीन ओर की छत की छवाई पर गुम्बज और कलश बनाकर उसको सुन्दर रचना प्रदान करें।¹

  1. अमरकोश में गजशाला को वारी कहा गया है— वारी तु गजबन्धनीयत्यमरः। वराहमिहिर ने योगयात्रा में वारी या गजशाला के निर्माण की विधि इस प्रकार दी है— 150 हाथ लम्बा और 120 हाथ चौड़ी चतुष्कोण या वृत्ताकार हस्तिशाला के लिए वृद्धिकारक होती है। दस हाथ ऊँचा, दस हाथ लम्बा व चौड़ा तथा एक हाथ गहरा हस्तिस्थान बनाना चाहिए। हस्तिशाला का द्वार पूर्व दिशा में होना चाहिए, उत्तर में भी द्वार शुभदायक होता है किन्तु दक्षिण या पश्चिम में कभी द्वार नहीं रखना चाहिए। पूर्व व उत्तर दिशा में द्वार स्तम्भ गाड़ना चाहिए। उसमें सुदृढ काष्ठदण्डों को जोड़ना चाहिए तथा पश्चिम से पूर्व और दक्षिण से उत्तर की ओर अर्गला बनानी चाहिए। द्वार का विस्तार दस हाथ चौड़ा और दस हाथ ऊँचा रखना चाहिए। द्वार स्तम्भ के दोनों ओर चार-चार हाथ गड्डा खोदना चाहिए। द्वार के स्तम्भ की ऊँचाई चौदह हाथ से अधिक रखनी चाहिए। हस्तिशाला के द्वार के बाद घेरा बनाने में एक बड़े स्तम्भ

सूत्र-७१ 457 दन्तिन्यादि षड्विधा गजशालाह — दन्तिनी नाम विज्ञेया शाला विघ्नहरी सदा। अलिन्दयुक्तं भूस्थानं भित्तिर्बाह्यो तु भागिका ॥ ५ ॥ तस्या द्वारप्रदेशे तु कर्तव्यौ कूर्परावुभौ । कर्णप्रासादिका कार्या द्वितीयालिन्दसंयुता ॥ ६ ॥ इनमें 'दन्तिनी' नाम की गजशाला सभी विघ्नों को हरने वाली समझी गई है। यह अलिन्द अर्थात् बरामदा युक्त होती है। इसका भूमि स्थान बाहर की ओर भित्तियुक्त होता है। उसके द्वार के प्रदेश में दो कूर्पर अर्थात् खुमाले बनाए जाए, जो दोनों ओर हों। 'कर्णप्रासादिका' नामक गजशाला दूसरे प्रकार की है जिसके भी आलिन्द बने होते हैं। द्वे द्वे वातायने कुर्याद् द्विद्विदिक्षु त्रिभित्तिकाः । प्राग्ग्रीवोऽग्रे भवेच्छाला सुभद्रेयमुदाहृता ॥ ७ ॥ इस गजशाला के दो-दो झरोखे, वातायन प्रत्येक भींत में तीनों ओर की दिशाओं में बनाए जाएँ और उसके पूर्व की ओर एक शाला भी बनाएँ जो सुन्दर भद्र या दीवारों युक्त बनी हों। अस्या एव यदा स्यातां प्राग्ग्रीवौ पार्श्वयोर्द्वयोः । तदा सुभोगदा नाम तृतीया परिकीर्तिता ॥ ८ ॥ ऐसी ही एक अन्य गजशाला के पूर्व की ओर आगे दोनों पाश्र्वों में शाला बनी हो, तो ऐसी गजशाला को 'सुभोगदा' नामक तीसरी गजशाला कहा जाता है। अस्या एव यदा पश्चात् प्राग्ग्रीवः क्रियतेऽपरः । भद्रिका नाम शाला सा तदा द्विरदपुष्टिदा ॥ ९ ॥ के बाद पाँच छोटे-छोटे स्तम्भ स्थापित करने चाहिए। उन स्तम्भों को चार-चार हाथ नीचे गाड़ना चाहिए। उन स्तम्भों में क्रम से छह, सात, आठ, नौ और दस छिद्र बनाने चाहिए और मातृका यानी कील छह अङ्गुल की बनानी चाहिए। इनको क्रमशः वेध योग्य छिद्रों में वेधित करना या ठोंकना चाहिए। इस प्रकार हस्तिशाला का सुदृढ़ द्वार बनाना चाहिए — सार्धं हस्तशतं दैर्घ्या सविंश विपुलाशतम्। चतुरस्राऽथवा वृत्ता वारी वारणवृद्धिदा ॥ दशावगाहेन करा विस्तीर्णा दश चोपरि। अधः खातस्य पदवी हस्तमात्रा प्रकीर्तिता ॥ कर्तव्यं पूर्वतो द्वारमुत्तरं वा शुभावहम्। दक्षिणं पश्चिमं वाऽपि न कर्तव्यं कथञ्चन ॥ मेढकस्तम्भ मातृणां वृक्षाग्रं नावनौ क्षिपेत्। पूर्वाग्रञ्चोत्तराग्राच्च संयोज्या नित्यमर्गला ॥ दश विस्तारतो द्वारं पार्श्वयोस्तस्य मातृकाः। चतुर्दशकरोत्सेधा निःखात्य चतुरः करान् ॥ षट्सप्तमेढान्तरस्थाश्च मेढकाः पञ्च पञ्च च। चतुर्हस्तनिखातास्ते समुच्छ्रायान्वदाम्यतः ॥ षट्सप्ताष्टनवोत्सेधा दश चेति यथाक्रमम्। नव वा दश वा वेधा मातृका याः षडङ्गुलाः ॥ वेधहान्यावशेषाः स्युर्मातृकाः क्रमशोऽपराः। इति द्वारसमासोऽयं वार्य्यासम्मपरिकीर्तितः ॥ (योगयात्रा 10, 2-9)

ऐसी ही एक अन्य गजशाला के पीछे की ओर प्राग्रीव शाला बनी हो तो उसे 'भद्रिका' नामक गजशाला कहते हैं जो हाथियों को पुष्टि देने वाली मानी जाती है। यह चौथे प्रकार की गजशाला है। पञ्चमी चतुरश्रा स्याद् वर्षिणी नाम पूजिता। प्राग्ग्रीवालिन्दनिर्यूह-हीना षष्ठी तथा परा ॥ 10 ॥ शाला प्रमारिका धान्यधनजीवितहारिणी। तदेतां वर्जयेदन्याः कुर्यात्सर्वार्थसिद्धये ॥ 11 ॥ पाँचवें प्रकार की गजशाला का नाम 'वर्षिणी' है जो भी चौकोर आकार वाली होती है। इसी तरह प्राग्रीव, अलिन्द व निर्यूह से रहित छठवें प्रकार की गजशाला भी होती है जिसका नाम 'प्रमारिका' कहा गया है। ऐसी गजशाला धान्य, धन और जीवन का नाश करने वाली होती है। अस्तु, यह वर्जनीय है। इसे न बनाए और अन्य सभी पाँचों प्रकार की गजशालाएँ सर्वार्थ सिद्धिदायक होती है, अतः उन्हें अवश्य बनाएँ। प्रमाणमिति शालानां हस्तिशालाः क्रमोदिताः। षड्विधच्छन्दजा उक्ता वित्तजीवितवृद्धये ॥ 12 ॥ इति षड्विधा¹ गजशालाः। इस प्रकार मैंने गजशाला का क्रमिक प्रमाण और स्वरूप बताया, जो छह प्रकार के छन्दों में निर्मित होती है और जिनसे धन और जनजीवन की वृद्धि होती है। अधुना भद्रादीनां चतुर्विधा गजलक्षणमाह — अथातः सम्प्रवक्ष्यामि हस्तिनां लक्षणं परम्। गजा भद्रो मृगो मन्द्रः सङ्कीर्णश्च चतुर्विधाः ॥ 13 ॥ अब मैं हाथियों के प्रधान लक्षणों को कहता हूँ। हाथियों के चार प्रकार होते हैं यथा— (1.) भद्र. (2.) मृग. (3.) मन्द्र और (4.) सङ्कीर्ण। मुखन्ये ( स्य ) द्विगुणा दैर्घ्यं दीर्घाजे² जठरं भवेत् ? । जठरार्द्धं भवेद् गात्रं गात्रार्द्धं करमूलतः ॥ 14 ॥ मूलार्द्धं च भवेदग्रं तत्तुल्या दंष्ट्रिकोत्तमा। दंष्ट्रास्थौल्यार्द्धनखाश्च क्रमेण परिकीर्तिताः ॥ 15 ॥

  1. गजशाला का उक्त वर्णन समराङ्गणसूत्रधार से उद्धृत है। (द्रष्टव्य समराङ्गण. अध्याय 32)
  2. दीर्घाद्धे- स्यात्।

सूत्र-७९ 459 हाथी के प्रमाण के लिए उसके मुख को आधार माना गया है। हाथी के मुख से उसकी लम्बाई दुगुणी होती है और लम्बाई का आधा उसका जठर या पेट होता है। जठर का आधा उसका गात्र होता है और गात्र का आधा उसकी सूण्ड का मूल भाग होता है। उसकी सूण्ड के मूल भाग का आधा उसकी सूण्ड का अग्रभाग होता है और उसके बराबर ही उसके दाँत की मोटाई होती है। उसके दाँत की मोटाई से आधा उसका नख भाग होता है, यह सब मैंने क्रमवार बता दिया है। स्थिरास्थिरैर्न्यतस्यास्ता युग्मं कुम्भानुवृत्तोद्भवा ?। तस्याधो चाग्रगर्भे तु वायु(क्तं) कुम्भास्तदोर्ध्वतः ?॥ 16 ॥ (पाठ अस्पष्ट है फिर भी) हाथी के स्वभावानुसार अपने सिर को स्थिर व कभी अस्थिर रखता, इधर-उधर झूमता हुआ, सिर पर दो कुम्भों के समान गोल- गोल कुम्भ स्थल उभरे होते हैं। उन दोनों के नीचे की ओर आगे के गर्भ भाग के एक ओर कुम्भाकार उभार होता है, जो हाथी के ललाट का उभरा हुआ भाग होगा। कुम्भकार¹ललिताङ्गुष्ठावुभौ दंष्ट्रानुमध्यतः ?। निम्न निम्ना दीर्घकरैर्भूत्प्राप्ते कदस्तकुण्डलीकृता ?॥ 17 ॥ इसी तरह हाथी के दाँतों के मध्य भाग में भी दोनों ओर कुम्भ के आकार का उभरा हुआ सुन्दर अङ्ग होता है जो दाँतो के ऊपर होठ का काम करता है और उसके नीचे-नीचे होती हुई एक लम्बी सूण्ड भूमि तक जाती हुई आगे जाकर कुण्डली रूप में मुड़ जाती है। पद्मपत्रस्तदा तुष्टं विपुलं कपोलं गम्भीरतः ?। सौम्यत्तमद गण्डस्थलः श्रवणा शोषपर्णवाकृति ? ॥ 18 ॥ उसके बड़े बड़े कमल पत्तों के समान गम्भीर कपोलों से निकले हुए दो कान होते हैं जिनके पास के गण्डस्थल, ललाट भाग से शीतल मद झरता रहता है, उसके कान बड़े पड्ढे की तरह बने होते हैं। वायुकुम्भोभयपाश्र्वे सूक्ष्म पिङ्गलोद्भवाः ?। हयखुराकारमेतद् दंष्ट्रावर्णश्च चम्पकः ॥ 19 ॥ हाथी के मस्तक के दोनों ओर वायुकुम्भ अर्थात् गलफड़े कुछ-कुछ पीलेपन से युक्त होते हैं जो घोड़े की खुरों के आकार के होते हैं। उनसे ही चम्पक के सफेद रङ्ग के समान रङ्ग वाले दाँत निकले होते हैं।

  1. 'कुम्भाकार'-इति स्यात्।

अग्रे तु तादिसि पुच्छान्त पृष्ठ अर्धोन्नता।¹ ग्रीवास्तु ललिताङ्गाश्च वृत्ता ²पादपोत्तमाः ॥ 20 ॥ सुविस्तीर्णा यस्य कुक्षिरर्धचन्द्राकृतिर्नखः। सामान्यं मेढ्रमूलं च भद्राख्यः सर्वकामदः ॥ 21 ॥ आगे की ओर से पुच्छ के अन्त तक हाथी की पीठ आधे में कुछ उठी हुई होती है और हाथी की ग्रीवा बड़ी सुन्दर अङ्ग की गोल पेड़ के आकार की यानी पादप के गोल स्तम्भ जैसी। हाथी की काँख काफी विस्तीर्ण होती है। पाँवों के नख अर्धचन्द्राकृति के होते हैं। हाथी का मेढ्रमूल (जननेन्द्रिय का मूल) सामान्य होता है— ऐसे स्वरूप या लक्षण वाला 'भद्र' नामक हाथी होता है जो सकल मनोकामना पूर्ण करता है। वादित्रैश्च समुत्साही सङ्ग्रामे चैव दुर्धरः। सदानन्दोद्यतकरः प्रकरे सैन्यके पतिः ॥ 22 ॥ भद्र नामक हाथी गाजे-बाजे, नगारे, रणभेरी आदि वाद्यों के बजने पर बड़ा उत्साही हो जाता है और ऐसी स्थिति में संग्राम स्थल में बड़ा दुर्धर या पराक्रमी हो जाता है। सदा वह आनन्द में अपनी सूण्ड को ऊपर उठाए हुए सेना के समूह का नेतृत्व करता है मानो सेनापति स्वयं हो। अविघ्नाक्षः साधुजने कालः क्रूरजने सदा। महोत्कटो हस्तिबिम्बे नृपदृष्टेऽतिनन्दकृत् ॥ 23 ॥ यह भद्र हाथी बड़ा ही समझदार होता है। यह सज्जनों को कोई विघ्न नहीं पहुँचाता परन्तु क्रूर और दुष्ट जनों के लिए यह कालरूप बन जाता है— यह उसका सदा का ही स्वभाव है। ऐसे महोत्कट, बलवान और समझदार हाथी का बिम्ब अर्थात् शरीर-स्वरूप राजा की दृष्टि को बड़ा आनन्द पहुँचाने वाला होता है अर्थात् राजा ऐसे गुणवान हाथी को देख-देख कर सदा प्रसन्न रहते हैं। पूजनीयः सदा राज्ञः तद्दन्तश्रीमहोत्तमा। तदेवा नृप सङ्कल्पं³ सर्वानन्दकरो भवेत् ॥ 24 ॥ इसलिए ऐसा भद्रक हाथी राजा के लिए सदा पूजनीय है और उसके दाँतों की शोभा बड़ी महान है और उसी के अनुरूप राजा के सभी सङ्कल्प भी सर्वानन्द करने

  1. 'अग्रे त चा द्रिसी पुच्छाद्यं पृष्ठ अर्धोन्नता ?' इति प्रकाशित पाठः।
  2. 'पादकोत्तमाः ?' इति प्रकाशित पाठः।
  3. 'तदेवानप सकलापं ?' इति प्रकाशित पाठः।