अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
३० वसिष्ठस्मृतिः ॥
पैशुन्यंनिर्दयत्वंच जानीयाच्छूद्रलक्षणम् ॥ २४ ॥
किंचिद्वेदमयंपात्रं किंचित्पात्रंतपोमयम् ।
पात्राणामपितत्पात्रं शूद्रान्नंयस्यनोदरे ॥ २५ ॥
शूद्रान्नरसपुष्टाङ्गो ह्यधीयानोऽपिनित्यशः ।
जुह्वन्वाऽपिजपन्वाऽपि गतिमूर्ध्वां नविन्दति ॥ २६ ॥
शूद्रान्नेनोदरस्थेन यःकश्चिन्म्रियतेद्विजः ।
सभवेत्सूकरोग्राम्यस्तस्यवाजायतेकुले ॥ २७ ॥
शूद्रान्नेनतुभुक्तेन मैथुनंयोऽधिगच्छति ।
यस्यान्नंतस्यतेपुत्रा नचस्वर्गार्हकोभवेत् ॥ २८ ॥
स्वाध्यायोत्थैर्द्यानिमन्तंप्रशान्तं वैतानस्थंपापभीरुंबहुज्ञम् ।
स्त्रीषुक्षान्तंधार्मिकंगोशरण्यं वृतैःक्षान्तंतादृशंपात्रमाहुः ॥२९॥
आमपात्रेयथान्यस्तं क्षीरंदधिघृतंमधु ।
मिथ्या भाषण, ब्राह्मण या वेद को दोष लगाना, चुगली करना, निर्दयी होना इन सबको शूद्र के लक्षण जानो अर्थात् ऐसे लक्षण ब्राह्मणादि में हों तो जान लो कि उसकी उत्पत्ति में संकरतादि दोष है ॥ २४ ॥ कोई सदा ही वेद के पढ़ने विचारने में तत्पर वेदरूप सुपात्र और कोई प्रायः तप करनेवाला तपस्वी सुपात्र कहाता है परन्तु सब में उत्तम सुपात्र वह है जिसके पेट में शूद्र का अन्न न जाता हो ॥ २५ ॥ शूद्र के अन्न से बने रस से जिसका शरीर हष्ट पुष्ट हुआ है वह भले ही नित्यशः वेद पढ़ता हो, अग्निहोत्र करता और गायत्र्यादि का जप भी भले ही करता हो तो भी स्वर्ग को प्राप्त नहीं होता ॥२६॥ शूद्र का अन्न पेट में विद्यमान होते हुए जो ब्राह्मण मरता है वह जन्मान्तर में या तो गांव का सुअर होता अथवा उसी यजमान शूद्र के कुल में उत्पन्न होता है ॥ २७ ॥ शूद्र का अन्न खाकर जो मैथुन करता है तो जिसका अन्न खाया उसी के वे पुत्र होते हैं और वह स्वर्ग को जाने योग्य नहीं होता ॥२८॥ वेद के स्वाध्याय से बढ़े हुए, आन्तिर्ज्ञान, कुलीन, श्रौतस्मार्त्त अग्निहोत्री, पापों से डरनेवाले, बहुतजाननेवाले, स्त्रियों में क्षमा शील, धर्मात्मा, गो सेवा में तत्पर, व्रत करर के कृश दुबले हुए ऐसे ब्राह्मण को ऋषि लोग सुपात्र कहते हैं ॥ २९ ॥ जैसे मट्टी के कच्चे पात्र में गिराये हुए दूध दही घी शहद आदि
भाषाधर्मसंहिता ॥ ३१
विनश्येत्पात्रदौर्बल्यात्तच्चपात्रंरसाश्चते ॥ ३० ॥
एवंगांचहिरण्यंच वस्त्रमश्वंमहींतिलान् ।
अविद्वान्प्रतिगृह्णानो भस्मीभवतिदारुवत् ॥ ३१ ॥
नाङ्गनखवादनं कुर्यान्ननखैश्च भोजनादौ ॥३२॥ न चा-
पोऽञ्जलिना पिबेत् ॥३३॥ न पादेन पाणिना वा जलमभिह-
न्यान्न जलेन जलम् ॥ ३४ ॥ नेष्टकाभिः फलानि पातयेत्
॥ ३५ ॥ न फलेन फलंन कल्केन कुहको भवेत् ॥३६॥ नम्ले-
च्छभाषां शिक्षेत ॥ ३७ ॥ अथाप्युदाहरन्ति ॥ ३८ ॥
नपाणिपादचपलो ननेत्रचपलोभवेत् ।
नस्यादङ्गचपलोविप्र इतिशिष्टिस्यगोचरः ॥ ३९ ॥
पारंपर्यागतोयेषां वेदःसपरिवृंहणः ।
तेशिष्टाब्राह्मणा ज्ञेयाःश्रुतिप्रत्यक्षहेतवः ॥४०॥
यन्नसन्तंनचासन्तं नाश्रुतंनबहुश्रुतम् ।
वस्तु पात्र के निर्बल होने से वह पात्र और दूध आदि रस नष्ट होजाते हैं ॥ ३० ॥ ऐसे ही गौ सुवर्ण वस्त्र घोड़ा भूमि और तिल आदि पदार्थों का दान लेता हुआ मूर्ख ब्राह्मण काष्ठ के तुल्य भस्म होजाता है ॥ ३१ ॥ शरीर के अङ्गों तथा नखों को न बजावे । दांतों से नखों को न काटे ॥ ३२ ॥ अञ्जलि से जल न पीवे ॥ ३३ ॥ पांव वा हाथ से जल को न पीटे न ताड़ना करे और न जल से जल की ताड़ना करे ॥३४॥ ईंटों से फलों को न गिरावे ॥३५॥ फल से फल को झाड़के न गिरावे दम्भ वा पाप में तत्पर हो के धर्म से शून्य न होवे ॥३६॥ फारसी आदि म्लेच्छ भाषा को न सीखे ॥३७॥ इस पर श्लोक कहते हैं ॥३८॥ हाथ पांव आंखें तथा शरीर के अन्य अङ्गों द्वारा चपलता दिखाने वाला ब्राह्मण न हो, यही शिष्ट होने का मार्ग है ॥ ३९ ॥ जिन के यहां कुल परम्परा से वेद वेदाङ्गों के पढ़ने जानने की परिपाटी निष्कारण धर्म बुद्धि से चलीआती है वे श्रुति को ही साक्षात्प्रमाण मानने वाले ब्राह्मण शिष्ट कहाते हैं ॥ ४० ॥ जो कोई धनादि के होने न होने को, विद्वान् अविद्वान् को और सदाचारी दुराचारी को कुछ नहीं जानता इत्यादि को अभेद दृष्टि से देखता
| ३२ | वसिष्ठस्मृतिः ॥ |
|---|
नसुवृत्तंनदुर्वृत्तं वेदकश्चित्सब्राह्मणोब्राह्मण ॥इति ॥४९॥
इति वासिष्ठे धर्मशास्त्रे षष्ठोऽध्यायः ॥६॥
चत्वार आश्रमा ब्रह्मचारिगृहस्थवानप्रस्थपरिव्राजकाः ॥ १ ॥ तेषां वेदमधीत्य वेदौ वा वेदान्वाऽविशीर्णब्रह्मचर्यो यमिच्छेत्तमाश्रयेत् ॥ २ ॥ ब्रह्मचार्याचार्यं परिचरेत् ॥ ३ ॥ आशरीरविमोक्षात् ॥ ४॥ आचार्ये प्रमातेऽग्निं परिचरेत् ॥५॥ विज्ञायते हि तत्राग्निरार्चायोइति ॥ ६ ॥ संयतवाक्चतुर्थषष्ठाष्टमकालभोजी भैक्षमाचरेत् ॥ ७ ॥ गुर्वधीनो जटिलः शिखाजटो वा गुरुं गच्छन्तमनुगच्छेत् ॥ ८ ॥ आसीनं च तिष्ठञ्शयानं चासीन उपासीत ॥ ९ ॥ आहूताध्यायी सर्वं लब्धं निवेद्य तदनुज्ञया भुञ्जीत ॥ १० ॥ खट्वाशयनदन्तप्रक्षालनाञ्जनाभ्यञ्जनापानच्छत्रवर्जी तिष्ठेदहनि रात्रावासीत
शान्तस्वरूप पूर्णतत्त्वज्ञानी वैराग्यवान् पूरा वा उत्तम कोटिका ब्राह्मण है ॥४९॥
यह वासिष्ठ धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में छठा अध्याय पूरा हुआ ॥ ६ ॥
ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यासी ये चार आश्रम कहाते हैं ॥१॥ प्रथम एक दो वा तीनों वेदों को अङ्गों सहित पढ़ जानके ब्रह्मचर्य जिस का स्खलित न हुआ हो ऐसा हो कर जिस आश्रम में रहने की इच्छा हो उसी में ठहरे ॥ २ ॥ यदि ब्रह्मचारी रहे तो आचार्य की सेवा करे इसी में अपने इष्ट की पूर्ण सिद्धि माने ॥ ३ ॥ जीवन भर गुरुसेवा करे ॥ ४ ॥ गुरु का स्वर्गवास हो जाने पर अग्नि की सेवा करे ॥ ५ ॥ क्योंकि श्रुति में लिखा है कि ( तेरा आचार्य अग्नि है ) ॥६॥ वाणी को वश में रक्खे । चौथे छठे वा आठव प्रहर में एकबार भोजन करे ॥ ७ ॥ गुरु के अधीन रहे । सब जटा रखावे वा केवल शिखामात्र रक्खे । चलते हुए गुरु जी के पीछे २ चला करे ॥८॥ गुरु बैठे हों तब खड़ा रहे और लेटे हों तो बैठाहुआ उपासना करे ॥ ९ ॥ पढ़ने को गुरु बुलावे तब जा कर गुरु के समीप में पढ़े । प्राप्तहुए भिक्षादि सब पदार्थों को गुरु की सेवा में निवेदन करके गुरु की आज्ञा होने पर भोजन करे ॥१०॥ खटिया पर सोना, दातौन करना, आंखों में अञ्जन, शरीर में तेल लगाना, जूता और छाता इन सब का त्याग रक्खे । विशेष कर दिनमें खड़ा रहे रात्रि
भाषार्थसहिता ॥ ३३
॥ ११ ॥ त्रिःकृत्वोऽभ्युपेयादपोऽभ्युपेयादपः । इति ॥१२॥
इति वासिष्ठे धर्मशास्त्रे सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥
गृहस्थो विनीतक्रोधहर्षो गुरुणाऽनुज्ञातः स्नात्वाऽस-
मानार्षामस्पृष्टमैथुनां यवीयसीं सदृशीं भार्यां विन्देत ॥१॥
पञ्चमीं मातृबन्धुभ्यः सप्तमीं पितृबन्धुभ्यः ॥ २ ॥ वैवाह्य-
मग्निमिन्धीत ॥ ३ ॥ सायमागतमतिथिं नावरुन्ध्यात् ॥४॥
नास्यानश्नन् गृहे वसेत् ॥ ५ ॥
यस्यनाश्नातिवासार्थी ब्राह्मणोगृहमागतः ।
सुकृतंतस्ययत्किंचित्सर्वमादायगच्छति ॥ ६ ॥
एकरात्रंतु निवसन्मतिथिर्ब्राह्मणःस्मृतः ।
अनित्यंहिस्थितोयस्मात्तस्मादतिथिरुच्यते ॥ ७ ॥
नैकग्रामीणमतिथिं विप्रंसांगतिकंतथा ।
में बैठा रहा करे ॥ ११ ॥ सायं प्रातःकाल ओर मध्यान्ह में तीनोंकाल जला-
शय के निकट जा कर शौचाचमनादिपूर्वक सन्ध्योपासनादि किया करे ॥१२॥
यह वासिष्ठ धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में सातवां अध्याय पूरा हुआ ॥ ७ ॥
यदि वह गृहस्थाश्रम में रहे तो गुरु की आज्ञा से समावर्त्तन स्नान क-
रके अधिक क्रोध हर्षका त्याग करताहुआ रागद्वेष रहित होके जिसका किसी
पुरुष से संग न हुआ हो जो अपने गोत्र की न हो ऐसी युवति अपने तुल्य
कुल सम्पत्तिआदि वाली स्त्री से विवाह करे ॥१॥ मातृकुल की पांचवीं पीढ़ी
की अथवा पितृ कुल की सातवीं पीढ़ी की कन्या से भी विवाह हो सकता
है ॥ २ ॥ फिर गृह्याग्नि को विवाह की वेदी से ला कर विधिपूर्वक स्थापित
करे ॥ ३ ॥ सायंकाल में आये अभ्यागत का अनादर न करे ॥ ४ ॥ विना भो-
जन किया अतिथि गृहस्थ के घर पर भूखा न पड़ा रहे ॥ ५ ॥ जिस के घर में
ठहरने को आया ब्राह्मण भोजन मिले बिना भूखा रहता है। उस गृहस्थ के
जन्मभर में किये सब पुण्य को लेजाता है ॥ ६ ॥ एक दिन निवास करने से
अनित्य स्थिति होने के कारण ब्राह्मण अतिथि कहाता है ॥ ७ ॥ अपने ही
गांव में रहने वाला तथा पहिले से मेली मिलापी ब्राह्मण अतिथि नहीं क-
३२ वसिष्ठस्मृतिः ॥
नसुवृत्तंनदुर्वृत्तं वेदकश्चित्सब्राह्मणोब्राह्मण ॥ इति ॥४१॥
इति वासिष्ठे धर्मशास्त्रे षष्ठोऽध्यायः ॥६॥
चत्वार आश्रमा ब्रह्मचारिगृहस्थवानप्रस्थपरिव्राजकाः ॥ १ ॥ तेषां वेदमधीत्य वेदौ वा वेदान्वाऽविशीर्णब्रह्मचयर्यो यमिच्छेत्तमावसेत् ॥ २ ॥ ब्रह्मचार्याचार्यं परिचरेत् ॥ ३ ॥ आशरीरविमोक्षात् ॥ ४॥ आचार्ये प्रमीतेऽग्निं परिचरेत् ॥५॥ विज्ञायते हि तत्राग्निरारचार्यइति ॥ ६ ॥ संयतवाक्चतुर्थषष्ठाष्टमकालभोजी भैक्षमाचरेत् ॥ ७ ॥ गुर्वधीनो जटिलः शिखाजटो वा गुरुं गच्छन्तमनुगच्छेत् ॥ ८ ॥ आसीनं च तिष्ठञ्शयानं चासीन उपासीत ॥ ९ ॥ आहूताध्यायी सर्वं लब्धं निवेद्य तदनुज्ञया भुञ्जीत ॥ १० ॥ खट्वाशयनदन्तप्रक्षालनाञ्जनाभ्यञ्जनापानच्छत्रवर्जी तिष्ठेदहनि रात्रावासीत
शान्तस्वरूप पूर्णतत्त्वज्ञानी वैराग्यवान् पूरा वा उत्तम कोटिका ब्राह्मण है ॥४१॥
यह वासिष्ठ धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में छठा अध्याय पूरा हुआ ॥ ६ ॥
ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यासी ये चार आश्रम कहाते हैं ॥१॥ प्रथम एक दो वा तीनों वेदों को अङ्गों सहित पढ़ जानके ब्रह्मचर्य जिस का स्खलित न हुआ हो ऐसा हो कर जिस आश्रम में रहने की इच्छा हो उसी में ठहरे ॥ २ ॥ यदि ब्रह्मचारी रहे तो आचार्य की सेवा करे इसी में अपने इष्ट की पूर्ण सिद्धि माने ॥ ३ ॥ जीवन भर गुरुसेवा करे ॥ ४ ॥ गुरु का स्वर्गवास हो जाने पर अग्नि की सेवा करे ॥ ५ ॥ क्योंकि श्रुति में लिखा है कि ( तेरा आचार्य अग्नि है ) ॥६॥ वाणी को वश में रक्खे। चौथे छठे वा आठव प्रहर में एकबार भोजन करे ॥ ७ ॥ गुरु के अधीन रहे। सब जटा रखावे वा केवल शिखामात्र रक्खे। चलते हुए गुरु जी के पीछे २ चला करे ॥८॥ गुरु बैठे हों तब खड़ा रहे और लेटे हों तो बैठाहुआ उपासना करे ॥ ९ ॥ पढ़ने को गुरु बुलावें तब जा कर गुरु के समीप में पढ़े। प्राप्तहुए भिक्षादि सब पदार्थों को गुरु की सेवा में निवेदन करके गुरु की आज्ञा होने पर भोजन करे ॥१०॥ खटिया पर सोना, दातौन करना, आंखों में अञ्जन, शरीर में तैल लगाना, जूता और छाता इन सब का त्याग रक्खे। विशेष कर दिनमें खड़ा रहे रात्रि
भाषार्थसहित ॥ ३३
॥ ११ ॥ त्रिःकृत्वोऽभ्युपेयादपोऽभ्युपेयादपः । इति ॥ १२॥
इति वासिष्ठे धर्मशास्त्रे सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥
गृहस्थो विनीतक्रोधहर्षो गुरुणाऽनुज्ञातः स्नात्वाऽस-
मानार्षामस्पृष्टमैथुनां यवीयसीं सदृशीं भार्यां विन्देत ॥१॥
पञ्चमीं मातृबन्धुभ्यः सप्तमीं पितृबन्धुभ्यः ॥ २ ॥ वैवाह्य-
मग्निमिन्धीत ॥ ३ ॥ सायमागतमतिथिं नावरुन्ध्यात् ॥४॥
नास्यानश्नन् गृहे वसेत् ॥ ५ ॥
यस्यनाश्नातिवासार्थी ब्राह्मणोगृहमागतः ।
सुकृतंतस्ययत्किंचित्सर्वमादायगच्छति ॥ ६ ॥
एकरात्रंतु निवसन्मतिथिर्ब्राह्मणःस्मृतः ।
अनित्यंहि स्थितोयस्मात्तस्मादतिथिरुच्यते ॥ ७ ॥
नैकग्रामीणमतिथिं विप्रंसांगतिकांस्तथा ।
में बैठा रहा करे ॥ ११ ॥ सायं प्रातःकाल और मध्यान्ह में तीनोंकाल जला-
शय के निकट जा कर शौचाचमनादिपूर्वक सन्ध्योपासनादि किया करे ॥१२॥
यह वासिष्ठ धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में सातवां अध्याय पूरा हुआ ॥ ७ ॥
यदि वह गृहस्थाश्रम में रहे तो गुरु की आज्ञा से समावर्त्तन स्नान क- रके अधिक क्रोध हर्षका त्याग करताहुआ रागद्वेष रहित होके जिसका किसी पुरुष से संग न हुआ हो जो अपने गोत्र की न हो ऐसी युवति अपने तुल्य कुल सम्पत्तिआदि वाली स्त्री से विवाह करे ॥१॥ मातृकुल की पांचवीं पीढ़ी की अथवा पितृ कुल की सातवीं पीढ़ी की कन्या से भी विवाह हो सकता है ॥ २ ॥ फिर गृह्याग्नि को विवाह की वेदी से ला कर विधिपूर्वक स्थापित करे ॥ ३ ॥ सायंकाल में आये अभ्यागत का अनादर न करे ॥ ४ ॥ बिना भो- जन किया अतिथि गृहस्थ के घर पर भूखा न पड़ा रहे ॥ ५ ॥ जिस के घर में ठहरने को आया ब्राह्मण भोजन मिले बिना भूखा रहता है । उस गृहस्थ के जन्मभर में किये सब पुण्य को लेजाता है ॥ ६ ॥ एक दिन निवास करने से अनित्य स्थिति होने के कारण ब्राह्मण अतिथि कहाता है ॥ ७ ॥ अपने ही गांव में रहने वाला तथा पहिले से मेली मिलापी ब्राह्मण अतिथि नहीं क-
३४ वसिष्ठस्मृतिः ॥
कालेप्राप्तेअकालेवा नास्यानश्नन्गृहेवसेत् ॥ ८ ॥
श्रद्धाशीलोऽस्पृहयालुरलमग्न्याधेयाय नानाहिताग्निः स्यात् ॥९॥ अलं च सोमपानाय नासोमयाजी स्यात् ॥ १० ॥
युक्तः स्वाध्याये प्रजनने यज्ञे च ॥ ११ ॥ गृहेष्वभ्यागतं प्रत्युत्थानासनशयनवाक्सूनूताऽनसूयाभिर्मानयेत् ॥१२॥ यथाशक्ति चान्नेन सर्वभूतानि ॥ १३ ॥
गृहस्थ एवयजते गृहस्थस्तप्यतेतपः ।
चतुर्णाम्याश्रमाणांतु गृहस्थस्तुविशिष्यते ॥ १४ ॥
यथानदीनदाःसर्वे समुद्रेयान्तिसंस्थितिम् ।
एवमाश्रमिणःसर्वे गृहस्थेयान्तिसंस्थितिम् ॥ १५ ॥
यथामातरमाश्रित्य सर्वेजीवन्तिजन्तवः ।
एवंगृहस्थमाश्रित्य सर्वेजीवन्तिभिक्षवः ॥ १६ ॥
होता है । अतिथि पुरुष समय कुसमय कभी आने पर बिना भोजन किये गृहस्थ्य के घर पर भूखा न वसे ॥ ८ ॥ निर्लोभ श्रद्धालु गृहस्थ अग्निस्थापन करने योग्य होता है । गृहस्थ पुरुष अनाहिताग्नि न रहे । किन्तु यथासम्भव अग्नि को अवश्य स्थापन करे ॥९॥ और वेषा गृहस्थ सोमयाग करने योग्य भी होता है इस से सोमयाग ( अग्निष्टोमादि ) भी करे ॥१०॥ वेदाध्ययन में यज्ञ करने में और सन्तानों के उत्पन्न करने में तत्पर रहे ॥ ११ ॥ अपने घर पर आये अभ्यागत को देखके उठना, आसन देना, लेटने को शय्या देना, कोमल वाणी बोलना और स्तुति प्रशंसा करना इत्यादि प्रकार से उसका मान्य करे ॥१२॥ यथाशक्ति अन्न देकर अन्य प्राणियों का भी आदर करे ॥१३॥ गृहस्थ ही यज्ञकरता, और गृहस्थ तप करता है इस कारण चारो आश्रमों में विशेष कर गृहस्थ उत्तम है ॥ १४ ॥ जैसे सब नद और नदियां इधर उधर चलती हुई समुद्र में जा कर ठहरती हैं वैसे ही जहां तहां घूमते हुए सब साधु संन्यासी ब्रह्मचारी गृहस्थ के यहां आ कर ठहर जाते हैं ॥१५॥ जैसे सब जीव अपनी अपनी माता का आश्रय लेकर जीवित रहते हैं । ऐसे ही सब भिक्षुक लोग गृहस्थ का आश्रय लेकर भोजनादि से जीविका निर्वाह करते हैं ॥१६॥
भाषार्थसहिता ॥ ३५
नित्योदकी नित्ययज्ञोपवीती नित्यस्वाध्यायी पतितान्न- वर्जी । ऋतौ च गच्छन्विधिवच्च जुह्वन्न ब्राह्मणश्च्यवते ब्रह्म- लोकान्, ब्रह्मलोकादिति ॥ १७ ॥ इति वासिष्ठे धर्मशास्त्रेऽष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥
वानप्रस्थो जटिलश्चीराजिनवासा ग्रामं च न प्रविशेत् ॥ १॥ न फालकृष्टमधिनिष्ठेत् ॥२॥ अकृष्टं मूलफलं संचिन्वी- त, ऊर्ध्वरेताः क्षमाशयः ॥ ३ ॥ मूलफलभैक्षेणाऽऽश्रमागत- मतिथिमभ्यर्चयेत् ॥ ४ ॥ दद्यादेव न प्रतिगृह्णीयात् ॥ ५ ॥ त्रिषवणमुदकमुपस्पृशेत् ॥६॥ श्रावणकेनाग्निमाधायाऽऽहि- ताग्निः स्याद्वृक्षमूलिकः ॥ ७ ॥ ऊर्ध्वं षड्भ्यो मासेभ्योऽन- ग्निरनिकेतः ॥ ८ ॥ दद्याद्देवपितृमनुष्येभ्यः स गच्छेत्स्वर्ग- मानन्त्यमानन्त्यम् ॥ ९ ॥ इति वासिष्ठे धर्मशास्त्रे नवमोऽध्यायः ॥ ९ ॥
यज्ञोपवीत, एक जलपात्र गृहस्थ नित्य साथ रक्खे नीच वा पतितों के अन्न का त्याग रक्खे, नित्य वेदाध्ययन करे, ऋतुकाल में पत्नी से संग करे और शास्त्रोक्त विधि से नित्य होम करे ऐसा गृहस्थ ब्राह्मण ब्रह्मलोक को जन्मान्तर में प्राप्त होता है फिर वहां से च्युत नहीं होता ॥ १७ ॥
यह वासिष्ठ धर्म शास्त्र के भाषानुवाद में आठवां अध्याय पूरा हुआ ॥ ८ ॥
वानप्रस्थ पुरुष जटाधारी, फटे चिथरा वस्त्र वा मृग चर्म को ओढ़े, गांव में न घुसे ॥ १ ॥ हल से जोती हुई भूमि पर न बैठे लेटे ॥ २ ॥ बिन जोती भूमि से उत्पन्न हुए मूल तथा फलों को भोजन के लिये लाया करे । ऊर्ध्वरेता (जिसका वीर्य नीचे को कदापि न गिरे) रहे पृथिवी पर सोया लेटा करे ॥ ३ ॥ कन्द मूल फल रूप भिक्षा से अपने आश्रम पर आये अतिथि का सत्कार करे ॥ ४ ॥ दिया ही करे किसी से कुछ न लेवे ॥ ५॥ सायं प्रातःकाल और मध्याह्न में तीनोंकाल स्नान सन्ध्यादि कृत्य किया करे ॥ ६ ॥ श्रावणक द्वारा अग्निस्थापन करके आहिताग्नि हो जावे । वृक्षों की जड़ों पर वृक्षों के नीचे निवास किया करे ॥ ७ ॥ फिर छः महिनों के बीतने पर अग्नि और एक स्थान का निवास त्याग देवे ॥८॥ देवयज्ञ, पितृयज्ञ, और अतिथियज्ञ द्वारा देव पितर और मनुष्यों को दिया करे तो वह अनन्त मोक्ष के आनन्द को प्राप्त होता है ॥ ९॥
यह वासिष्ठ धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में नवम अध्याय पूरा हुआ ॥ ९ ॥
५
३६ वसिष्ठस्मृतिः ॥
परिव्राजकः सर्वभूताभयदक्षिणां दत्त्वा प्रतिष्ठेत ॥ १ ॥
अथाप्युदाहरन्ति ॥ २ ॥
अभयं सर्वभूतेभ्यो दत्त्वाचरतियोमुनिः ।
तस्यापिसर्वभूतेभ्यो नभयंजातुविद्यते ॥ ३ ॥
अभयंसर्वभूतेभ्यो दत्त्वायस्तुनिवर्तते ।
हन्तिजातानजातांश्च द्रव्याणिप्रतिगृह्यच ॥ ४ ॥
संन्यसेत्सर्वकर्माणि वेदमेकंनसन्न्यसेत् ।
वेदसंन्यसनाच्छूद्रस्तस्माद्वेदंनसन्न्यसेत् ॥ ५ ॥
एकाक्षरंपरंब्रह्म प्राणायामः परन्तपः ।
उपवासात्परंभैक्षं दयादानाद्विशिष्यते ॥ ६ ॥
मुण्डोऽममोऽपरिग्रहः सप्तागारण्यसंकल्पितानि चरेद्भैक्षं विधूमे सन्नमुसले ॥ ७ ॥ एकशाटीपरिवृतोऽजिनेन
अब इस दशम अध्याय में संन्यास धर्म कहते हैं । संन्यासी होता हुआ ब्राह्मण सब प्राणियों को निर्भयरूप दक्षिणा देकर एक स्थान वा संसार के पदार्थों से प्रस्थान करे ॥ १ ॥ यहां श्लोक प्रमाण कहते हैं ॥ २ ॥ सब प्राणियों को अभयदान देकर जो मुनि संन्यासी विचरता है उसको भी सब प्राणियों से कदापि कहीं भय नहीं है ॥ ३ ॥ सब प्राणियों को अभय दान देकर जो निवृत्ति मार्ग में चलता है। वह द्रव्यादि को ग्रहण करके भी होचुके वा होनेवाले सब दोषों को नष्ट कर देता है ॥ ४ ॥ विरक्त संन्यासी पुरुष संसार के सब कामों को त्याग देवे परन्तु एक वेद कात्याग न करे क्योंकि वेद का त्याग करने से शूद्र होजाता है तिससे वेद को न त्यागे ॥ ५ ॥ एक अक्षर ओंकार परमोत्तम वेद है, प्राणायाम उत्तम तप है । भिक्षा मांगकर परिमित सूक्ष्म भोजन करना उपवास करने से अच्छा और दान धर्म से दया बड़ी है ॥ ६ ॥ संन्यासी शिर के तथा दाढ़ी मूंछों के सब बाल मुंड़ाया करे, ममता को त्यागे, संसारी सुख के पदार्थों का संचय वा रक्षा न करे, गृहस्थों के घरों में धानादि कूटने पीसने खाने पकाने के समाप्त होजाने पर पहिले से जिनका संकल्प न किया हो ऐसे सात घरों से संन्यासी पकाये अन्न की भिक्षा मांगलावे और एकान्त में जाकर खावे ॥ ७ ॥ कौपीन (लंगोट.) के ऊपर एक धोती संन्यासी पहने उसी में से आधी ओढ़ लिया करे, अथवा मृग चर्म से श-
भाषार्थसहिता ॥ ३९
वा गोप्रलूनेस्तृणैर्वेष्टितशरीरः स्थण्डिलशाय्यनित्यां वसतिं वसेत् ग्रामान्ते देवगृहे शून्यागारे वृक्षमूले वा मनसा ज्ञानमधीयमानः ॥ ८ ॥ अरण्यनित्यो न ग्राम्यपशूनां संदर्शने विहरेत् ॥ ९ ॥ अथाप्युदाहरन्ति ॥ १० ॥
अरण्यनित्यस्यजितेन्द्रियस्य सर्वेन्द्रियप्रीतिनिवर्त्तकस्य ।
अध्यात्मचिन्तागतमानसस्य ध्रुवाह्यनावृत्तिरुपेक्षकस्याइति ११
अव्यक्तलिङ्गो व्यक्ताचारः, अनुन्मत्त उन्मत्तवेषः॥१२॥
अथाप्युदाहरन्ति ॥ १३॥
नशब्दशास्त्राभिरतस्यमोक्षो नचापि लोकग्रहणेरतस्य ।
नभोजनाच्छादनतत्परस्य नचापिरम्यावसथप्रियस्य ॥१४
नचोत्पातनिमित्ताभ्यां ननक्षत्राङ्गविद्यया ।
शीर की ढांपे। गौओं के खाने से बची घास शरीर में लपेटे । स्थण्डिल भूमि भागपर सोवे । किसी एक स्थान में अधिक दिनों तक न बसे, गांव के समीप में, देवस्थान (शिवालय आदि) में, किसी सूने घर में, अथवा वृक्षों के नीचे इनमें से किसी अनुकूल निर्विघ्न स्थान में मन से तत्त्वज्ञान का स्मरण वा पाठ करता हुआ बसे ॥ ८ ॥ नित्य ही एकान्त वन आदि में रहे । गांव के पशुओं के देखने में मनको भ्रमण न करे ॥ ९ ॥ इस पर श्लोक का प्रमाण कहते हैं ॥ १० ॥ सब इन्द्रियों को उनर के विषय भुगाने द्वारा प्रसन्न करने से निवृत्त हुए जितेन्द्रिय हो के नित्य एकान्त में बसनेवाले, अध्यात्म चिन्ता में जिस का मन लगा हो ऐसे उपेक्षावृत्तिवाले संन्यासी को मोक्ष से पुनरावृत्ति नहीं होती है ॥ ११ ॥ महात्मा पन के चिन्ह प्रकट न करे पर शुद्ध आचार प्रकट रक्खे, ऊपरी वेष से उन्मत्त जान पड़े, अर्थात् उन्मत्तों कासा वेष रक्खे और भीतरी विचारों में उन्मत्त न रहे ॥ १२ ॥ इस पर श्लोकों का प्रमाण कहते हैं ॥ १३ ॥ व्याकरण के पढ़ने पढ़ाने, वाद विवाद में, तथा संसारी मनुष्यों को प्रसन्न रखने में, अच्छे२ भोजन वस्त्रों की प्राप्ति में, अच्छे घर में निवास करने में, तत्पर संन्यासी का मोक्ष नहीं हो सकता है ॥ १४ ॥ उत्पात (होने वाली भयंकर घटना) बताने, काम सिद्ध होने के निमित्त बताने, ज्योतिष
| ३८ | वसिष्ठस्मृतिः ॥ |
|---|
नानुशासनवादाभ्यां भिक्षांलिप्सेतकहिंचित् ॥ १५ ॥
अलाभेनविषादीस्याल्लाभं चैव न हर्षयेत् ।
प्राणयात्रिकमात्रःस्यान्मात्रासङ्गाद्विनिर्गतः ॥१६॥
नकुट्यांनोदकेसङ्गो नचैले नत्रिपुष्करे ।
नाऽऽगारेनासनेनाऽन्ने यस्यवैमोक्षवित्तमः । इति ॥१७॥
ब्राह्मणकुले वा यल्लभेत्त तद्भुञ्जीत, सायं प्रातर्मधुमांस-
परिवर्जम् ॥ १८ ॥ यतीन्साधूंश्च गृहस्थान्सायं प्रातश्चतर्पये-
त् ॥ १९ ॥ ग्रामे वा वसेत् ॥ २०॥ अजिह्योऽशरणोऽसङ्कुसु-
को नचेन्द्रियसंयोगं कुर्वीत केनचित् ॥ २१ ॥ उपेक्षकः सर्व-
भूतानां हिंसानुग्रहपरिहारेण ॥ २२ ॥ पैशुन्यमत्सराभिमा-
नाहंकाराश्रद्धाऽनार्जवात्मस्तवपरगर्हादम्भलोभमोहक्रोधाऽसू-
विद्या, वा अङ्ग विद्या, धर्मादि का उपदेश और वाद विवाद करने द्वारा संन्यासी उत्तम भिक्षादि मिलने की इच्छा कदापि न करे ॥ १५ ॥ भिक्षादि न मिलने पर दुःख न माने और भिक्षादि के लाभ का हर्ष भी न करे प्राणों के निर्वाहमात्र के लिये कुछ थोड़ा सा अन्न जैसा मिले खालिया करे । इतना तथा ऐसा ही भोजनादि मिले ऐसा विचार न रक्खे ॥ १६ ॥ ॥ उत्तम कुटी, जलाशय, वस्त्र, स्वर्ग, उत्तम स्थान ( बगीचा आदि ) उत्तम आसन इत्यादि किसी से भी जो आसक्त नहीं वह यति होकर मोक्ष पद को जाननेवाला है ॥१७ ॥ अथवा ब्राह्मण के घर से मधु मांस का अंश छोड़के अन्य जो मिलजाय वही सायंप्रातः दोवार खा लेवे ॥ १८ ॥ साधु यतियों और अकल गृहस्थों को सायं प्रातःकाल अपनी मङ्गलमूर्ति के दर्शन देकर तृप्तकरे ॥ १९ ॥ अथवा ग्राम में वसे ॥ २० ॥ कुटिलतान करे, चित्त वा शरीर की चंचलता त्यागे, किसी का सहारा न लेवे और किसी विषयके साथ इन्द्रियों का संग न करे ॥२१॥ किसी को दुःख देने वा अनुग्रह की चेष्टा न करता हुआ सब प्राणियों से उदासीन भाव रक्खे ॥२२॥चुगली मत्सरता, अभिमान, अहंकार, अश्रद्धा अविश्वास, कठोरता निर्दयता, आत्मश्लाघा ( अपनी प्रशंसा ) परनिन्दा, दम्भ, लोभ, मोह, क्रोध, अन्य के शुभ गुणों में भी दोषारोप करना रूप असूया, इन चुगली आदि का सर्वथा
भाषाधर्मसंहिता ॥ ३९
याविवर्जनं सर्वाश्रमिणां धर्म-इष्टः ॥ २३ ॥ यज्ञोपवीत्युदक- कमण्डलुहस्तः शुचिर्ब्राह्मणो वृषलान्नवर्जी न हीयते ब्रह्म- लोकाद्ब्रह्मलोकादिति ॥ २४ ॥ इति वासिष्ठे धर्मशास्त्रे दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥
षडर्हा भवन्ति, ऋत्विग् विवाह्यो राजा पितृव्यमातु- लस्नातकाश्च ॥ १ ॥ वैश्वदेवस्य सिद्धस्य सायं प्रातर्गृह्या- ग्नौ जुहुयात् ॥ २ ॥ गृहदेवताभ्यो बलिं हरेत् ॥ ३ ॥ श्रोत्रिया- याऽऽगताय भागं दत्त्वा ब्रह्मचारिणे वाऽनन्तरं पितृभ्यो दद्यात् ॥ ४ ॥ ततोऽतिथिं भोजयेत्, श्रेयांसं श्रेयांसमानुपूर्व्येण स्वगृह्याणां कुमारबालवृद्धतरुणप्रभृतींस्ततोऽपरान्गृह्यान् ॥ ५ ॥
परित्याग करना चारो आश्रम वाले ब्राह्मणादिका परम कर्त्तव्य है ॥ २३ ॥ यज्ञोपवीत धारण किये, जल सहित कमण्डलु हाथ में लिये, शूद्रादि नीचोंका अन्न न खाने वाला शुद्ध ब्राह्मण ब्रह्मलोक को प्राप्त होके वहां से च्युत नहीं होता है ॥ २४ ॥
यह वसिष्ठ प्रोक्त धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में दशवां अध्याय पूरा हुआ ॥ १०
ऋत्विज्, विवाह के समय वर, राजा, चाचा, मामा, और ब्रह्मचर्य को समाप्त करने वाला स्नातक ये छः पुरुष सत्कार विधि से पूजा करने योग्य होते हैं ॥ १ ॥ विश्वेदेवों के निमित्त पकाये नैत्यक भोजन में से सायं प्रातः काल अपने गृह्यसूत्रोक्त मन्त्रों से गृह्याग्नि में देवयज्ञ नामक होम करे ॥ २ ॥ तदनन्तर गृहाभिमानी पूर्वादिदिग् के इन्द्रादि देवताओं के लिये बलि नाम ग्रास धरना रूप भूतयज्ञ करे ॥ ३ ॥ आये हुए वेदपाठी ब्राह्मण को वा भिक्षार्थ आये ब्रह्मचारी को भाग देकर पश्चात् पितरों को बलि देवे वा इसी अवसर में पितरों को जल देना रूप तर्पण करे (इस तर्पण में देवयज्ञ ऋषियज्ञ और पितृयज्ञ तीनों के अंग संमिलित जाते हैं) ॥ ४ ॥ तदनन्तर अतिथि को भोजन करावै । उन में भी जो २ विशेष मान्य हों उन २ को पहिले २ क्रमशः भोजन कराके अपने घर के कुमार बालक, वृद्ध, और तरुण आदि को क्रम से जिमावै । तदनन्तर घरके अन्य लोगों को जिमावै ॥ ५ ॥ कुत्ता, चाण्डाल, पतित और
४० | वसिष्ठस्मृतिः ॥
श्वचाण्डालपतितवायसेभ्यो भूमौ निर्वपेत् ॥६॥ शूद्रायोच्छिष्टमनुच्छिष्टं वा दद्यात् ॥७॥ शेषं दम्पती भुञ्जीयाताम् ॥८॥ सर्वोपयोगेन पुनःपाकः ॥९॥ यदि निरुप्ते वैश्वदेवेऽतिथिररागच्छेद्विशेषेणास्माअन्नं कारयेत् ॥१०॥ विज्ञायते हि ॥ ११ ॥ वैश्वानरः प्रविशत्यतिथिर्ब्राह्मणो गृहम् । तस्मादपआनयन्त्यन्नं वर्षाभ्यस्तां हि शान्तिं जना विदुरिति ॥१२॥ तं भोजयित्वोपासीताऽऽसीमान्तमनुव्रजेत्, आऽनुज्ञानाद्वा ॥ १३॥ अपरपक्ष ऊर्ध्वं चतुर्थ्याः पितृभ्यो दद्यात्पूर्वेद्युर्ब्राह्मणान्सन्निपात्य यतीन् गृहस्थान् साधून् वा परिणतवयसोऽविकर्मस्थाञ् श्रोत्रियानशिष्यानन्तेवासिनः शिष्यानपि गुणवतो भोजयेत् ॥१४॥ विलग्नशुक्लक्लीबान्धश्यावदन्तकुष्ठिकुनखिवर्जम् ॥१५॥ अथाप्युदाहरन्ति ॥ १६ ॥
काक इन के नाम से भूमि पर एक २ ग्रास घरे ॥६॥ शूद्रको उच्छिष्ट वा जो उच्छिष्ट न हो वैसा भोजन यथेच्छ देवे ॥७॥ शेष बचे अन्नको स्त्री पुरुष खावें ॥८॥ यदि सभी भोजन अन्यों को देने में ही चुक जावे तो फिर से अपने लिये पकावे ॥ ९ ॥ यदि वैश्वदेव करलेने पर अतिथि आजावे तो विशेष कर उन के लिये भोजन करावे ॥ १० ॥ श्रुति से जाना जाता है कि ॥११॥ “अतिथि ब्राह्मण वैश्वानर के रूप से गृहस्थ के घर पर आता है। उन के सत्कारार्थ जल और अन्न गृहस्थ लोग उपस्थित करते हैं। एक वर्ष अभ्यास की अतिथि सेवा परम शान्ति सुख देने वाली होती ऐसा विद्वान् लोग जानते मानते हैं” ॥ १२ ॥ उस अतिथि को भोजन कराके समीप बैठे। जब अतिथि चले तो गांव की सीमातक पीछे २ चले अथवा जहां से लौटने की आज्ञा करे वहां से लौट आवे ॥ १३ ॥ कृष्ण पक्ष में चतुर्थी तिथि के पश्चात् पितरों का श्राद्ध करे। श्राद्ध से पहिले दिन यति, गृहस्थ, साधु शुभकर्मी, शिष्यों से भिन्न समीपवर्ती वा वृद्ध ब्राह्मणों को अथवा गुणी विद्वान् शिष्यों को भी निमन्त्रित करके श्राद्धकाल में भोजन करावे ॥ १४ ॥ विषयी, श्वेतकुष्ठी, नपुंसक, अन्धे, काले दांतों वाले, कुष्ठी और जिन के नख बिगड़े हों ऐसों को श्राद्ध में भोजन न करावे ॥ १५ ॥ इस पर श्लोक भी प्रमाण में कहते हैं कि
भाषाऽर्थसहिता ॥ ४१
अथचेन्मन्त्रविद्युक्तः शारीरैःपङ्क्तिदूषणैः ।
अदूष्यंतंयमःप्राह पङ्क्तिपावनएवसः ॥ १७ ॥
श्राद्धेनोद्वासनीयानि उच्छिष्टान्यादिनक्षयात्
श्रोतन्तेहिसुधाधारास्ताःपियन्त्यकृतोदकाः ॥ १८ ॥
उच्छिष्टंनप्रमृज्यात्तु यावन्नास्तमितोरविः ।
क्षीरधारास्ततोयान्ति,अक्षय्याः पङ्क्तिभागिनः ॥१९॥
प्राक्संस्कारप्रमीतानां स्ववंश्यानामितिश्रुतिः ।
भागधेयंमनुःप्राह उच्छिष्टोच्छेषणेउभे ॥ २०॥
उच्छेषणंभूमिगतं विकिरंल्लेपसोदकम् ।
अन्नंप्रेतेषुविसृजेदप्रजानामनायुषाम् ॥ २१ ॥
उभयोःशाखयोर्मुक्तं पितृभ्योऽन्नंनिवेदितम् ।
तदन्तरंप्रतीक्षन्ते ह्यसुरादुष्टचेतसः ॥ २२ ॥
तस्मादशून्यहस्तेन कुर्यादन्नमुपागतम् ।
॥१६॥ यदि वेदवेत्ता ब्राह्मण अङ्गहीन होना आदि पङ्क्ति में दूषित शरीर वाला भी हो तो भी महर्षि यमने उसको निर्दोष पङ्क्तिपावन ही कहा है ॥१७॥ श्राद्ध में भोजन कराये ब्राह्मणों की जूठन को सूर्यास्त होने समय तक न उठावे। क्योंकि अमृत की धारा झरती हैं उनको वे पितर पीते हैं जिन ने जल दान नहीं किया ॥ १८ ॥ जब तक सूर्य अस्त नहीं तब तक उच्छिष्ट को उठाके स्थान की शुद्धि न करे क्योंकि उस से अक्षय दूध की धारा पङ्क्तिभागी पितरों को प्राप्त होती हैं ॥ १९ ॥ पिण्ड बनाये अन्नका शेष लेप और ब्राह्मणों के भोजन का उच्छिष्ट ये दोनों उपनयन संस्कार होने से पहिले मरे अपने वंशवालों के भाग मनुजी ने कहे हैं ॥२०॥ पात्र में लिया वा भूमि पर गिरा उच्छेषणभाग को निर्वंश होकर कम आयु में मरों के अन्नको जल सहित प्रेतों के निमित्त छोड़े ॥ २१ ॥ दोनों ओर की अंगुलियों से छोड़े पितरों को निवेदन किये अन्न के पात्र में पहुंचने से पहिले दुष्ट विचार वाले असुर लोग बीच में मारखाने की प्रतीक्षा करते हैं ॥ २२ ॥ तिस से कुश हाथ में ले कर कुशों के सहारे से अन्न का निवेदन करे। अथवा भोजन का स्पर्श करके दोनों प्रकार के शेष
४२ वसिष्ठस्मृतिः ॥
भोजनंवासमालभ्य तिष्ठेतोच्छेषणेउभे ॥ २३ ॥
द्वौदैवेपितृकृत्ये त्रीनेकैकमुभयत्रवा ।
भोजयेत्सुसमृद्धोऽपि नप्रसज्येतविस्तरे ॥ २४ ॥
सत्क्रियां देशकालौच शौचं ब्राह्मणसम्पदः ।
पञ्चैतान्विस्तरोहन्ति तस्मात्तं परिवर्जयेत् ॥ २५ ॥
अपिवाभोजयेदेकं ब्राह्मणं वेदपारगम् ।
श्रुतशीलोपसंपन्नं सर्वलक्षणवर्जितम् ॥ २६ ॥
यद्येकंभोजयेच्छ्राद्धे देवंतत्रकथंभवेत् ।
अन्नंपात्रे समुद्धृत्य सर्वस्यप्रकृतस्यतु ॥ २७ ॥
देवतायतनेकृत्वा ततःश्राद्धंप्रवर्त्तयेत् ।
प्रास्येदग्नौतदन्नंतु दद्याद्वाब्रह्मचारिणे ॥ २८ ॥
यावदुष्णंभवत्यन्नं यावदश्नन्तिवाग्यतः ।
तावद्धिपितरोऽश्नन्ति यावन्नोक्ताहविर्गुणाः ॥२९॥
भागों की यथास्थान रक्षा करे ॥२३॥ विश्वेदेव सम्बन्धी दो और तीन पितृ ब्राह्मणों को वा दोनों में एक २ ब्राह्मण को भोजन करावे । धनाढ्य हो तो भी अधिक विस्तृत पांति को भोजन कराने को तत्पर न हो ॥२४॥ क्योंकि सत्कार, देश, काल, शुद्धि और सुपात्र ब्राह्मणों का मिलना इन पांचों को बहुतों का भोजन कराना नष्ट करता है तिस से श्राद्ध में बड़ी पांति करने की चेष्टा न करे ॥२५॥ अथवा वेद पारंगत, शास्त्राभ्यासी, सौम्य स्वभाव युक्त, सब कुलक्षणों से रहित, धर्म कर्म निष्ठ एक ही ब्राह्मण को श्राद्ध में भोजन करावे ॥ २६ ॥ यदि एक ही ब्राह्मण को श्राद्ध में जिमावे तो वही एक विश्वेदेवों और पितरों दोनों के लिये कैसे होगा ? । इसका समाधान यह है कि पकाये हुए सब अन्न में से विश्वेदेवों के निमित्त एक पात्र में अन्न परोस कर ॥ २७ ॥ किसी देवस्थान मन्दिरादि में सुरक्षित रख कर श्राद्ध करे पश्चात् उस विश्वेदेवों के भोजन को अग्नि में होम करदे वा किसी ब्रह्मचारी को देदेवे ॥ २८ ॥ जब तक भोजन गर्म रहता और जबतक निमन्त्रित ब्राह्मण मौन हो कर भोजन करते हैं तथा जबतक भोज्य पदार्थों के गुण वर्णन नहीं कहेगये तभी तक ब्राह्मणों के साथ पितर लोग भोजन करते हैं ॥२९॥
भाषार्थसहिता ॥ ४३
हविर्गुणानवक्तव्याः पितरोयावदतर्पिताः ।
पितृभिस्तर्पितैःपश्चाद् वक्तव्यंशोभनं हविः ॥ ३० ॥
नियुक्तस्तुयदाश्राद्धे दैवेमांसंसमुत्सृजेत् ।
यावन्तिपशुरोमाणि तावन्नरकमृच्छति ॥ ३१ ॥
त्रीणिश्राद्धे पवित्राणि दौहित्रःकुतपस्तिलाः ।
त्रीणिचात्रप्रशंसन्ति शौचमक्रोधमत्वराम् ॥ ३२ ॥
दिवसस्याष्टमेभागे मन्दीभवतिभास्करः ।
सकालःकुतपोनाम पितॄणांदत्तमक्षयम् ॥ ३३ ॥
श्राद्धंदत्त्वाचभुक्त्वाच मैथुनंयोऽधिगच्छति ।
भवन्तिपितरस्तस्य तन्मासंरेतसोभुजः ॥ ३४ ॥
यस्ततोजायतेगर्भो दत्त्वाभुक्त्वाचपैतृकम् ।
नसविद्यांसमाप्नोति क्षीणायुश्चैवजायते ॥ ३५ ॥
जबतक पितृगण तृप्त नहीं तबतक हविष्य भोज्य पदार्थों के गुण वर्णन न करे। पितरों के तृप्त होजाने पश्चात् कहे कि हविष्यान्न बहुत उत्तम बना है ॥ ३० ॥ जब श्राद्धमें निमन्त्रण स्वीकार करके यजमान के यहां किसी कारण मांस बनाया परोषा जाय और उस को त्याग देवे तो पशु के शरीर में जितने रोम होते उतने वर्षों तक नरक में वसता है ॥ ३१ ॥ श्राद्ध में तीन वस्तु विशेष पवित्र होते हैं एक दौहित्र (पुत्री का पुत्र) द्वितीय कुतप (दिन का आठवां भाग) और तिल। तथा शुद्धि, क्रोधका त्याग और शीघ्रता न करना ये तीनों ठीक २ करे तो प्रशंसा के योग्य श्राद्ध होगा ॥ ३२ ॥ दिन के आठवें भाग में चार घड़ी दिन शेष रहे सूर्य का तेज मन्द हो जाता है उस चार घड़ी काल को कुतप कहते हैं उस काल में पितरों के निमित्त श्राद्ध करने से अक्षय फल होता है ॥ ३३ ॥ श्राद्ध जिमाने वाला तथा जीमने वाला इन में से जो कोई श्राद्ध की समाप्ति में उसी दिन मैथुन करता है उस के पितर उस एक महीने तक वीर्य को खाने वाले होते हैं ॥ ३४॥ श्राद्ध में भोजन करने कराने वालों के उसी दिन किये मैथुन से जो सन्तान होता है वह विद्या को समाप्त नहीं कर पाता और थोड़ी आयु में नष्ट हो जाता है ॥ ३५ ॥
६
४४ वसिष्ठस्मृतिः ॥
पितापितामहश्चैव तथैवप्रपितामहः ।
उपासतेसुतंजातं शकुन्ताइवपिप्पलम् ॥ ३६ ॥
मधुमांसैश्चशाकैश्च पयसापायसेनवा ।
एषनोदास्यतिश्राद्धं वर्षासुचमघासुच ॥ ३७ ॥
संतानवर्द्धनं पुत्र मुद्यतं पितृकर्मणि ।
देवब्राह्मणसंपन्नमभिनन्दन्तिपूर्वजाः ॥ ३८ ॥
नन्दन्तिपितरस्तस्य सुवृष्टैरिवकर्षकाः ।
यद्गयास्थोददात्यन्नं पितरस्तेनपुत्रिणः ॥ ३६ ॥
श्रावण्याग्रहायण्योरन्वष्टक्यां च पितृभ्यो दद्याद्
द्रव्यदेशब्राह्मणसन्निधाने वा, न कालनियमः ॥४०॥ अवश्यं च
पिता पितामह और प्रपितामह ये तीनों उत्पन्न हुए पुत्र के शरीर पर रहते हुए ऐसे ही वाट देखते हैं कि जैसे पीपल आदि वृक्षों पर रहते हुए पक्षी लगने वाले फलों की आशा रखते हैं ॥३६॥ कि सहत, मांस, शाक, दूध, खीर, वा खोया से यह सन्तान हमारे लिये पिण्ड देगा श्राद्ध करेगा। और विशेषकर वर्षा ऋतु के मघा नक्षत्र में दिया श्राद्ध विशेष सन्तोष जनक होता है ॥ ३७ ॥ देवता और ब्राह्मण से युक्त, पितरों के श्राद्धकर्म में उद्यत अपने कुल की सन्तति बढ़ाने वाले पुत्र को उनके पूर्वज लोग धन्यवाद देते हैं कि तू कुलतारक कुलदीपक कुल को तारनेवाला है ॥ ३८ ॥ जैसे अच्छी वर्षा होने से किसान लोग प्रसन्न ...न होते वैसे उस सुपुत्र के पितर लोग आनन्द मानते हैं । जो गया क्षेत्र ...कर पितृश्राद्ध करता है पितर लोग उससे अपने को पुत्रवाला मानते ... ॥ ३९ ॥ श्रावण तथा मार्ग शीर्ष महिने की पौर्णमासी, माघ कृष्ण पक्ष की तिथि वा आठ अन्वष्टका में पितरों का श्राद्ध करे । अथवा जब कभी श्राद्ध के यो-ग्य शास्त्रोक्त उत्तम स्थान और सुपात्र ब्राह्मण प्राप्त हों तभी श्राद्ध करे काल का नियम होने पर भी साधनों की ठीक २ प्राप्ति ही उत्तम कक्षा के श्राद्ध का ... है । इस कारण काल नियम से साधन संचय बलवान् है ॥ ४० ॥ ब्राह्मणा... अग्नियों का विधिपूर्वक स्थापन अवश्यमेव करे । दर्शेटि, पौर्ण-मासेष्टि, आग्रयण ( नवान्नेष्टि ) वैश्वदेवपर्व-वरुणप्रघासपर्व-साकमेधपर्व-
भावार्थसंहिता ॥ ४५
ब्राह्मणोऽग्नीनादधीत, दर्शपूर्णमासाग्रयणेष्टिचातुर्मास्यपशु- सोमैश्च यजेत नैयमिकं ह्येतदृणसंस्तुतं च ॥ ४१ ॥ विज्ञा- यते हि त्रिभिर्ऋणैर्ऋणवान् ब्राह्मणो जायते । इति ॥ ४२ ॥ यज्ञेन देवेभ्यः, प्रजया पितृभ्यः, ब्रह्मचर्येण ऋषिभ्य इत्येष वाऽनृणो यज्वा यः पुत्री ब्रह्मचर्यवानिति ॥ ४३ ॥ गर्भाष्ट- मेषु ब्राह्मणमुपनयीत, गर्भेकादशेषु राजन्यं, गर्भद्वादशेषु वै- श्यम् ॥४४॥ पालाशो बैल्वो वा दण्डो ब्राह्मणस्य, नैयग्रोधः क्षत्रियस्य वा, औदुम्बरो वा वैश्यस्य ॥४५॥ केशसंमितो ब्रा- ह्मणस्य, ललाटसंमितः क्षत्रियस्य, घ्राणसंमितो वैश्यस्य ॥४६॥ मौञ्जी रशना ब्राह्मणस्य, धनुर्ज्या क्षत्रियस्य, शणतान्तवी वै- श्यस्य ॥ ४७ ॥ कृष्णाजिनमुत्तरीयं ब्राह्मणस्य, रौरवं क्षत्रि-
शुनासीरीयपर्व ये चारों चातुर्मास्य, निरूढपशुयाग, और सोमयाग (अग्निष्टोम) इतने यज्ञ नियम से करे क्योंकि इन सबका करना ऋण चुकाने की प्रशंसा में परिगणित है ॥ ४१ ॥ श्रुति में लिखा है कि "द्विजत्व के संस्कार को प्राप्त हुआ ब्राह्मण तीन प्रकार के ऋणों से ऋणी हो जाता है,, ॥ ४२ ॥ यज्ञों के द्वारा देवों का, पुत्रोत्पत्ति द्वारा पितरों का, और ब्रह्मचर्याश्रम के नियम धर्म पालन द्वारा पितरों का ऋण चुकावे, यज्ञों का करनेवाला, पुत्रोंवाला और ब्रह्मचर्याश्रम युक्त होने पर तीनों ऋणों से मुक्त हुआ मोक्ष का पूर्णाधिकारी हो जाता है ॥ ४३ ॥ गर्भ से आठवें वर्ष ब्राह्मण का, गर्भ से ग्यारहवें वर्ष क्षत्रिय का, और गर्भ से बारहवें वर्ष में वैश्य के बालक का उपनयन संस्कार करे ॥ ४४ ॥ पलाश (ढांक) का वा विल्व का दण्ड ब्राह्मण ब्रह्मचारी का, (वट बरगद) का क्षत्रिय ब्रह्मचारी का और गूलर का दण्ड वैश्य ब्रह्मचारी का होवे ॥ ४५ ॥ चोटी की बराबर ऊंचा ब्राह्मण का, मस्तक तक क्षत्रिय का और नासिका के मूल तक वैश्य ब्रह्मचारी का दण्ड रखना चाहिये ॥ ४६ ॥ मूंज की मेखला (कन्धनी) ब्राह्मण की, धनुर्ज्या क्षत्रिय की और शण की मेखला वैश्य ब्रह्मचारी के लिये होवे ॥४७॥ काला (कर्णायल) मृगचर्म ब्राह्मण को, रुरु (रोज) मृग का क्षत्रिय को और बैल वा बकरेका चर्म वैश्य ब्रह्मचारी को दुपट्टा के स्थान
४६ वसिष्ठस्मृतिः ॥
यस्य, गव्यं बस्ताजिनं वा वैश्यस्य ॥ ४८ ॥ शुक्लमहतं वासो ब्राह्मणस्य, माञ्जिष्ठं क्षत्रियस्य, हारिद्रं कौशेयं वैश्यस्य, सर्वे- षां वा तान्तवमरक्तम् ॥ ४९ ॥ भवत्पूर्वां ब्राह्मणो भिक्षां याचेत, भवन्मध्यां राजन्यो, भवदन्त्यां वैश्यः ॥ ५० ॥ आ- षोडशाद्ब्राह्मणस्य नातीतः कालः ॥ ५१ ॥ आद्वाविंशात्क्ष- त्रियस्य ॥५२॥ आचतुर्विंशाद्वैश्यस्य ॥५३॥ अतऊर्ध्वं पतितसा- वित्रीका भवन्ति ॥ ५४ ॥ नैतानुपनयेन्नाध्यापयेन्न याजये- न्नैभिर्विवाहयेयुः ॥ ५५॥ पतितसावित्रीक उद्दालकव्रतं चरे- त् ॥५६॥ द्वौ मासौ यावकेन वर्तयेत्, मासं पयसा, अर्धमासमा- मिक्षयाऽष्टरात्रं घृतेन, षड्रात्रमयाचितेन, त्रिरात्रमब्भक्षो
में ओढ़ने को देवे ॥४८॥ जो किसी थान में से फाड़ा न हो किन्तु चीरा सहित बिना हुआ सफेद वस्त्र ब्राह्मण का, मंजीठ से रंगा लाल वस्त्र क्षत्रिय का और हल्दी से रंगा पीला रेशमी वस्त्र वैश्य ब्रह्मचारी का हो अथवा तीनों ब्रह्म- चारियों को बिना रंगे कपास के वस्त्र दिये जावें ॥ ४९ ॥ ब्राह्मण ब्रह्मचारी (भवति! भिक्षां देहि) क्षत्रिय (भिक्षां भवति! देहि) और वैश्य ब्रह्मचारी (भि- क्षां देहि भवति!) ऐसा वाक्य बोल कर अपनी २ माता से प्रथम भिक्षा मांगे ॥ ५० ॥ सोलह वर्ष के आयु तक ब्राह्मण के उपनयन संस्कार का काल अतीत नहीं होता ॥५१॥ बाईस वर्षतक क्षत्रिय के संस्कार का काल है ॥५२॥ और चौबीस वर्ष तक वैश्य के संस्कार का समय है ॥ ५३ ॥ इस से उपरान्त तीनों ही अपने २ सावित्री गुरुमन्त्र से पतित हो जाते हैं ॥ ५४ ॥ तब उन पतित हुए ब्राह्मणादि का न यज्ञोपवीत संस्कार करावे, न वेद पढ़ावे, न यज्ञ करावे और न उन के साथ कन्या का विवाह करे ॥ ५५ ॥ वह पतित सावि- त्रीक ब्राह्मणादि पुरुष निम्न रीति से उद्दालक व्रत करे ॥५६॥ प्रथम दो महिने तक आठ ग्रास कुलत्थ खाताहुआ एकान्त में रहे। एक मास तक दूध से रहे पन्द्रह दिन तक आमिक्षा (गर्म दूधमें दही डालने से फटा दूध) से, आठ दिन गौ के घृत से, छः दिन तक बिन मांगे जो मिले उस से, तीनदिन तक जलमात्र पीकर और एक दिनरात निर्जल उपवास करे । इसप्रकार चार महीने तथा
भाषार्थसंहिता ॥ ४९
ऽहोरात्रमपुवसेत् ॥ ५७ ॥ अश्वमेधावभृथं वा गच्छेत् ॥५८॥
व्रात्यस्तोमेन वा यजेद्वायजेत् ॥ ५६ ॥
इति वासिष्ठे धर्मशास्त्रे एकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥
अथातःस्नातकव्रतानि ॥१॥ स न किंचिद्याचेतान्त्यत्र रा-
जान्तेवासिभ्यः ॥२॥ क्षुधा परीतस्तु किंचिदेव याचेत कृतमकृतं
वा,क्षेत्रं गामजाविकमन्ततो हिरण्यं धान्यमन्नं वा,न तु स्ना-
तकः क्षुधाऽवसीदेदित्युपदेशः॥३॥ न मलिनवाससा सह संवसे-
त,न रजस्व Turn to: लया,नायोग्यया, नकुलं कुलं स्यात्॥४॥ वत्सतन्त्रीं-
विततान्नातिक्रामेत् ॥५॥ नोद्यन्तमादित्यं पश्येत् ॥ ६ ॥ ना-
स्तमयन्तम् ॥ ७ ॥ नाप्सु मूत्रपुरीषे कुर्यात् ॥ ८ ॥ न निष्ठीवे-
त् ॥ ६ ॥ परिवेष्टितशिरा भूमिमयज्ञियैस्तृणैरन्तर्धाय मूत्र-
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तीन दिन ( १२३ दिन ) एकान्त में भजन पूजन करता हुआ व्रत करे ॥५७॥
अथवा अश्वमेध यज्ञ के अवभृथ स्नान के समय ब्राह्मणों की आज्ञा से सब
के साथ स्नान करके शुद्ध होता है ॥ ५८ ॥ अथवा व्रात्यस्तोम यज्ञ करे ॥ ५९॥
यह वासिष्ठ धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में ग्यारहवां अध्याय पूरा हुआ ॥ ११ ॥
अब ब्रह्मचर्य व्रत को समाप्त कर गृहस्थ होने वाले स्नातक के लिये नि-
यम कहते हैं ॥१॥ वह स्नातक राजा और अपने शिष्यों से भिन्न अन्य किसी
से कुछ न मांगे ॥२॥ यदि क्षुधा से पीड़ित हो तो पकाया वा कच्चा थोड़ा अन्न
मांगलेवे । अन्त में यदि कुछ न मिले तो खेत-गौ-बकरी-भेड़, सुवर्ण धान्य
अन्न इत्यादि जो मिले मांग लेवे किन्तु भूखों मरता हुआ दुःख न भोगे यही
उस के लिये शास्त्र का उपदेश है ॥ ३ ॥ मलिन वस्त्रोंवाली, रजस्वला और
बाल्यावस्था की अयोग्य स्त्री के साथ सहवास ( संग ) न करे । नकुल को
कुल ऐसा व्यवहार करे ॥ ४ ॥ विस्तृत फैली हुई बछड़े की रस्सी को लांघकर
न निकले ॥ ५ ॥ उदय होते हुए सूर्य को न देखे ॥ ६ ॥ अस्त होते समय भी
सूर्य को न देखे ॥ ७ ॥ जल में मल मूत्र का त्याग न करे ॥ ८ ॥ जल में न थूके
॥ ९ ॥ शिर पर अंगोछा लपेट कर यज्ञ में काम न आनेवाले सूखे तृणों को