अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
आपस्तम्बस्मृतिः ॥
९
सर्वंशुद्ध्यतितोयेन तोयमर्केणशुद्ध्यति ॥ ६ ॥
सूर्यरश्मिनिपातेन मारुतस्पर्शनेनच ।
गवाम्मूत्रपुरीषेण तत्तोयन्तेनशुद्ध्यति ॥ ७ ॥
अस्थिचर्मादियुक्तं त खरश्वानोपदूषितम् ।
उद्धरेदुदकंसर्वं शोधनंपरिमार्जनम् ॥ ८ ॥
कूपोमूत्रपुरीषेण यवनेनापिदूषितः ।
श्वशृगालखरोष्ट्रैश्च क्रव्यादैश्चजुगुप्सितः ॥ ९ ॥
उद्धृत्यैवचत्ततोयं सप्तपिंडान्समुद्धरेत् ।
पंचगव्यंमृदापूतं कूपेतच्छोधनंस्मृतम् ॥ १० ॥
वापीकूपतडागानां दूषितानांचशोधनम् ।
कुंभानांशतमुद्धृत्य पंचगव्यंततःक्षिपेत् ॥ ११ ॥
यच्चकूपादपिबेत्तोयं ब्राह्मणःशवदूषितात् ।
कथंतत्रविशुद्धिःस्या-दितिमेसंशयोभवेत् ॥ १२ ॥
अक्लिन्नेनचाभिन्नेन केवलंशवदूषिते ।
से शुद्ध होते हैं और वह जल किससे शुद्ध होता है ॥ ६ ॥ सूर्य की किरणों के पड़ने से और पवन के लगने से तथा गौओं के मूत्र और गोबर से वह जल शुद्ध होता है ॥ ७ ॥ जिस जलके पात्रमें हाड-वा चाम पड़ा हो अथवा गधा कुत्ता इनसे अपवित्र हो उस कूपादि के सब जल को निकाल कर उस को अच्छे प्रकार साफ करे ॥ ८ ॥ मूत्र-विष्ठा इनके पड़ने से और यवन के जल भरने से-कुत्ता, गीदड़ गधा ऊंट और मांस के खाने वालों से कूप भी दूषित (अशुद्ध) होजाता है ॥ ९ ॥ उस कूपके जलको निकाल कर सात मिट्टीके पिंड (ढले) कूपमें से निकाले और पञ्चगव्य तथा पवित्र मिट्टी उसमें डालदे यह कुएका शोधन कहा है ॥ १० ॥ बावड़ी-कूप-तालाब ये यदि अपवित्र होजांयं तो सौ १०० घड़ा जल निकाल कर पंचगव्य डालदे ॥ ११ ॥ जो ब्राह्मण शव (मुर्दा) से अशुद्ध कुए के जलको पीले तब शुद्धि कैसे हो यदि यह संदेह मुझे होय तो ॥ १२ ॥ जो मुर्दा (रुधिर से भीगा नहीं) जिसका कोई
८ भाषार्थसहिता ॥
पीत्वाकूपादहोरात्रं पंचगव्येनशुद्ध्यति ॥ १३ ॥
क्लिन्नेभिन्नेशवेचैव तत्रस्थयदि तत्पिबेत् ।
शुद्धिश्चांद्रायणंतस्य तप्तकृच्छ्रमथापिवा ॥ १४ ॥
इत्यापस्तम्बीये द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥
अंत्यजातिरविज्ञातो निवसेद्यस्यवेश्मनि ।
तस्यज्ञात्वातुकालेन द्विजाःकुर्वन्त्यनुग्रहम् ॥ १ ॥
चान्द्रायणंपराकोवा द्विजातीनांविशोधनम् ।
प्राजापत्यंतुशूद्रस्य शेषंतदनुसारतः ॥ २ ॥
यैर्भुक्तं तत्रपक्वान्नं कृच्छ्रंतेषांप्रदापयेत् ।
तेषामपिचयैर्भुक्तं कृच्छ्रपादंप्रदापयेत् ॥ ३ ॥
कूपैकपानैर्दुष्टानां स्पर्शसंसर्गदूषणात्।
तेषामेकोपवासेन पंचगव्येनशोधनम् ॥ ४ ॥
बालोवृद्धस्तथारोगी गर्भिणीवायुपीडिता ।
अंग टूटा हो) ऐसे मुर्दासे कूप अशुद्ध होतो उस कुए के जल को पीकर दिन १ रात उपवास करके पंचगव्य से शुद्ध होता है ॥ १३ ॥ यदि रुधिर से भीगा और टूटे अंग वाला मुर्दा जिस कूप में पड़ा हो और उसके जलको पीले तो चांद्रायण अथवा तप्त कृच्छ्र से शुद्धि होती है ॥ १४॥ बिना जाना अन्त्यजाति चाण्डालादि जिस मनुष्य के घर में बसे और फिर यह जान पड़े तो ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य उस अंत्यज पर दया करें अर्थात् दंड न दें ॥ १॥ और द्विजाति चांद्रायण अथवा पराक व्रत करें और शूद्र प्राजापत्य और शेष जाति (सूत आदि) अपनी २ जातिके अनुसार प्रायश्चित्त करें ॥ २॥ और जिन्होंने वहां पक्कान्न खाया हो उनको कृच्छ्र व्रत देना चाहिये । और वहां पक्कान्न खाने वालों का जिन्होंने खाया हो उन को चौथाई कृच्छ्रव्रत करावें ॥ ३॥ नीचों के स्पर्श और समागम के दोष से तथा एक कुए का जल पीने से जो अशुद्ध हुये हैं उन का एक उपवास और पंचगव्य शोधक है ॥ ४॥ बालक, वृद्ध, रोगी, और वायु की पीड़ा वाली गर्भवती स्त्री इन को रात्रि भर व्रत
आपस्तम्बस्मृतिः ॥ ५
तेषांनक्तं प्रदातव्यं बालानांप्रहरद्वयम् ॥ ५ ॥ अशीतिर्यस्यवर्षाणि बालोवाप्यूनषोडशः । प्रायश्चित्तार्द्धमर्हन्ति स्त्रियोव्याधितएवच ॥ ६ ॥ न्यूनैकादशवर्षस्य पञ्चवर्षाधिकस्यच । चरेद्गुरुःसुहृद्वापि प्रायश्चित्तंविशोधनम् ॥ ७ ॥ अथैतैः क्रियमाणेषु येषामार्त्तिःप्रदृश्यते । शेषसंपादनाच्छुद्धि-र्विपत्तिर्नभवेद्यथा ॥ ८ ॥ क्षुधाव्याधितकायानां प्राणोयेषांविपद्यते । येनरक्षांतवक्तार-स्तेषांतत्किल्विषंभवेत् ॥ ९ ॥ पूर्णेऽपिकालनियमे नशुद्धिर्ब्राह्मणैर्विना । अपूर्णेष्वपिकालेषु शोधयन्तिद्विजोत्तमाः ॥ १० ॥ समाप्तमितिनोवाच्यं त्रिषुवर्णेषुकर्हिचित् ।
बतावे और बालकों को दो पहर का उपवास ॥ ५ ॥ अस्सी वर्ष का वृद्ध और सोलह वर्ष से न्यून अवस्था का बालक-स्त्री और रोगी-ये सब आधे प्रायश्चित्त के योग्य होते हैं ॥ ६ ॥ ग्यारह वर्ष से कम और पांच वर्ष से अधिक जिसकी अवस्था है ऐसे बालक की शुद्धि करने वाले प्रायश्चित्त को गुरु अथवा मित्र करे ॥ ७ ॥ यदि ये (बालक) ही अपना प्रायश्चित्त करें और बीच में इन को कष्ट प्रतीत होय तो शेष प्रायश्चित्त को गुरु आदि करें अथवा जैसे इन को विपत्ति दुःख विशेष न हो वैसे ही प्रायश्चित्त को ये करें ॥ ८ ॥ प्रायश्चित्त के करने से क्षुधा से पीड़ित होकर जिन का प्राण निकल जाय अर्थात् मर जावे तो जो लोग धर्म (प्रायश्चित्त आदि) के उपदेश करने वाले हैं जो उन के प्राणों की रक्षा नहीं करते अर्थात् शक्ति के अनुसार उन्हें प्रायश्चित्त नहीं बताते तो यह पाप उन उपदेश करने वालों को ही लगता है ॥ ९ ॥ यदि समय का नियम पूरा भी हो जाय तो भी ब्राह्मणों के कहे बिना शुद्धि नहीं होती और काल का नियम पूरा न भी हो तो ब्राह्मण शुद्ध कर देते हैं अर्थात् शुद्धि ब्राह्मणों के वचन में है ॥ १० ॥ क्योंकि प्राणों का संशय उत्पन्न होने पर कर्म का
२
१० भाषार्थसहिता ॥
विप्रसंपादनंकर्म उत्पन्ने प्राणसंशये ॥ ११ ॥ संपादयन्तियेविप्राः स्नानतीर्थफलप्रदम् । सम्यक्कर्तुरपापंस्याद् व्रतीचफलमाप्नुयात् ॥ १२ ॥ इत्यापस्तम्बीये तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥ चांडालकूपभांडेषु योऽज्ञानात्पिवतेजलम् । प्रायश्चित्तंकथंतस्य वर्णवर्णैविधीयते ॥ १ ॥ चरेत्सांतपनंविप्रः प्राजापत्यंतुभूमिपः । तदर्धंतुचरेद्वैश्यः पादंशूद्रस्यदापयेत् ॥ २ ॥ मुक्तोच्छिष्टस्त्वनाचान्त-श्चांडालैःश्वपचेनवा । प्रमादात्स्पर्शनंगच्छे-त्तत्रकुर्याद्विशोधनम् ॥ ३ ॥ गायत्र्यष्टसहस्रंतु द्रुपदांवाशतंजपेत् । जपंस्त्रिरात्रमनश्न-न्पंचगव्येनशुद्ध्यति ॥ ४ ॥
संपादन (पूर्णता) ब्राह्मण ही कर सकता है इस से तीनों वर्ण (क्षत्रिय वैश्य शूद्र) के विषय में कभी भी कोई पुरुष किसी के कर्म को समाप्त (पूरा) हो गया ऐसे न कहे ॥ ११॥ जो ब्राह्मण तीर्थ स्नान के फल को देने वाला स्नान किसी अन्य की शुद्धि के लिये किसी अन्य पुरुष से करवाते हैं वहां प्रायश्चित्त करने वाला सम्यक् शुद्ध होता और व्रती (जिस को प्रायश्चित्त करना था) वह उस के फल को पाता है ॥ १२ ॥ इत्यापस्तम्बीये तृतीयोध्यायः ॥ चांडाल के कुए अथवा पात्र में यदि अज्ञान से जल पीले तो उस पाप का प्रत्येक वर्ण कैसे प्रायश्चित्त करे ॥ १ ॥ ब्राह्मण सांतपन-क्षत्रिय प्राजापत्य, वैश्य आधा प्राजापत्य, और शूद्र चौथाई प्राजापत्य व्रत करे ॥ २ ॥ भोजन कर के उच्छिष्ट ब्राह्मण आचमन करने से पूर्व यदि चांडाल या श्वपच से भूल कर छू जाय तो वहां विशोधन (प्रायश्चित्त) करे ॥ ३ ॥ आठ ८००० हज़ार गाय- त्री अथवा सौ १०० द्रुपदा मंत्र को जपे और जपता हुआ तीन दिन उपवा- स करके पंचगव्य से शुद्ध होता है ॥ ४ ॥ विष्ठा और मूत्र त्याग किये पश्चात
आपस्तम्बस्मृतिः ॥ ११
चांडालेनयदास्पृष्टो विण्मूत्रे कुरुते द्विजः ।
प्रायश्चित्तं त्रिरात्रंस्या-द्भुक्तोच्छिष्टः षडाचरेत् ॥ ५ ॥
पाने मैथुनसंपर्के तथा मूत्रपुरीषयोः ।
संपर्क यदिगच्छेत्तु उदक्याचांत्यजैरतथा ॥ ६ ॥
एतैश्चयदास्पृष्टः प्रायश्चित्तं कथं भवेत् ।
भोजने च त्रिरात्रंस्या-त्पाने तु त्र्यहमेव च ॥ ७ ॥
मैथुने पादकृच्छ्रंस्या-त्तथा मूत्रपुरीषयोः ।
दिनमेकं तथा मूत्रे पुरीषे तु दिनत्रयम् ॥ ८ ॥
एकाहंतत्र निर्दिष्टं-दंतधावनभक्षणे ।
वृक्षारूढे तु चांडाले द्विजस्तत्रैव तिष्ठति ॥ ९ ॥
फलानि भक्षयंस्तस्य कथं शुद्धिर्विधीयते ।
ब्राह्मणान्समनुज्ञाप्य सवासाः स्नानमाचरेत् ॥ १० ॥
एकरात्रोषितोभूत्वा पंचगव्येन शुद्ध्यति ।
येनकेनचिदुच्छिष्टो ह्यमेध्यं स्पृशेद्विजः ॥ ११ ॥
यदि द्विज को चांडाल स्पर्श करले तो तीन दिन का उपवास और भोजन के अनंतर उच्छिष्ट को छूले तो छः दिन का उपवास करे ॥ ५ ॥ जलपान-मैथुन मूत्रविष्ठा करते हुये इन मौकों पर यदि रजस्वला वा अंत्यज इनका स्पर्श हो जाय॥ ६ ॥ अथवा ये छूले तो प्रायश्चित्त कैसे हो ? रजस्वलाशादि का स्पर्श भोजन के समय हो तो तीन दिन और जलपान में भी तीन दिन उपवास ॥ ७ ॥ मैथुन में पाद कृच्छ्र वैसेही मूत्र और विष्ठा करने में क्रम से एक दिन और तीन दिन उपवास ॥ ८ ॥ और दातौन करने में एक दिन उपवास करे। जिस वृक्ष पर चांडाल चढ़ा हो यदि उसी वृक्ष पर द्विज चढ़ा हुआ ॥ ९ ॥ फल खारहा हो तो उसकी कैसे शुद्धि होनी चाहिये ? ब्राह्मणों की आज्ञा लेकर सचैल स्नान करे॥ १० ॥और एक दिन उपवास करके पंचगव्य पीने से शुद्ध हो जाता है। जिस किसी वस्तु के खाने से उच्छिष्ट द्विज अपवित्र (मल आदि) वस्तु को यदि छूले ॥ ११ ॥
९२ भाषार्थसहिता ॥
अहोरात्रोषितोभूत्वा पञ्चगव्येनशुद्ध्यति ॥ १२ ॥
इत्यापस्तम्बीयेचतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥
चांडालेनेयदास्पृष्टो द्विजवर्णःकदाचन । अनभ्युक्ष्यपिबेत्तोयं प्रायश्चित्तंकथंभवेत् ॥ १ ॥
ब्राह्मणस्तुत्रिरात्रेण पञ्चगव्येनशुद्ध्यति । क्षत्रियस्तुद्विरात्रेण पञ्चगव्येनशुद्ध्यति ॥ २ ॥
अहोरात्रेणवैश्यस्तु पञ्चगव्येनशुद्ध्यति । चतुर्थस्यतुवर्णस्य प्रायश्चित्तं कथंभवेत् ॥ ३॥
व्रतं नास्तितपोनास्ति होमो नैवचविद्यते । पञ्चगव्यंनदातव्यं तस्यमंत्रविवर्जनात् ॥ ४ ॥
ख्यापयित्वाद्बिजानांतु शूद्रोदानेनशुद्ध्यति । ब्राह्मणस्ययदोच्छिष्ट-मश्नात्यज्ञानतोद्विजः ॥ ५ ॥ अहोरात्रंतुगायत्र्या जपंकृत्वाविशुद्ध्यति ।
तो एक दिन रात उपवास करके पञ्चगव्य पीने से शुद्ध होता है ॥ १२ ॥
॥ इत्यापस्तम्बीये चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥
यदि कदाचित् द्विज वर्णों को चांडाल स्पर्श करले और वह द्विज स्नान किये बिना ही जल पीले तो प्रायश्चित्त कैसे हो ? ॥१॥ ब्राह्मण तीन दिन में और क्षत्रिय दोदिन में क्रम से उपवास करके पञ्चगव्य पीने से शुद्ध होते हैं ॥२॥ और वैश्य एक दिनरात उपवास करके पञ्चगव्य पीनेसे शुद्ध होता है-चौथे वर्ण (शूद्र) का प्रायश्चित्त कैसे हो ? ॥३॥ शूद्र को व्रत नहीं तप नहीं होम नहीं और इसको वेदका अधिकार नहोने से पञ्चगव्य भी नहीं देना चाहिये ॥४॥ परन्तु शूद्र निज अपराध को ब्राह्मणों को विदित कराकर दानदेने से शुद्ध होता है-यदि द्विज अज्ञान से ब्राह्मण के उच्छिष्ट (जूठा) को खाले ॥५॥ तो एक दिन रात गायत्री का जप करके अच्छे प्रकार शुद्ध होता है और यदि
आपस्तम्बस्मृतिः ॥ १३
उच्छिष्टं वैश्यजातीनां भुंक्तेऽज्ञानाद्द्विजोयदि ॥ ६ ॥
शंखपुष्पीपयःपीत्वा त्रिरात्रेणैवशुद्ध्यति ।
ब्राह्मण्यासहयोश्नीया-दुच्छिष्टंवाकदाचन ॥ ७ ॥
नतत्रदोषं मन्यंते नित्यमेवमनीषिणः ।
उच्छिष्टमितरस्त्रीणा-मश्नीयात्स्पृशतेपिवा ॥८॥
प्राजापत्येनशुद्धिःस्या-द्भगवानंगिरोब्रवीत् ।
अंत्यानांभुक्तशेषंतु भक्षयित्वा द्विजातयः॥९॥
चांद्रायणंतदधार्धं ब्रह्मक्षत्रविशांविधिः ।
विण्मूत्रभक्षणेविप्र-स्तप्तकृच्छ्रं समाचरेत् ॥ १० ॥
श्वकाकोच्छिष्टगोभिन्नं प्राजापत्यविधिःस्मृतः ।
उच्छिष्टः स्पृशते विप्रो यदि कश्चिदकामतः ॥ ११ ॥
शुनःकुक्कुटशूद्रांश्च मद्यभांडंतथैव च ।
पक्षिणाधिष्ठितंयच्च यद्यमेध्यंकदाचन ॥ १२ ॥
अहोरात्रोषितोभूत्वा पंचगव्येनशुद्ध्यति ।
वैश्यों के उच्छिष्ट को अज्ञान से द्विज खाले ॥ ६ ॥ तो शंखपुष्पी के जल को पीकर तीन दिन में शुद्ध होता है-जो कदाचित् ब्राह्मणी के संग उच्छिष्ट को ब्राह्मण खाले ॥ ७ ॥ उस में विद्वान् मनुष्य कभी भी दोष नहीं मानते-और यदि अन्य स्त्रियों के उच्छिष्ट को खाले अथवा छूले ॥८॥ तो प्राजापत्य व्रत से शुद्धि होती है यह भगवान् (ऐश्वर्य वाले) अंगिरा ऋषि ने कहा है-यदि अन्त्यजों के भोजन से बचे अन्न को द्विजाति खालें ॥९॥ तो चांद्रायण-अर्द्धकृच्छ्र-पादकृच्छ्र-ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य क्रमशः करें-और विष्ठा वा मूत्र वा दोनोंके भक्षण में ब्राह्मण तप्त कृच्छ्रव्रत करें १०॥कुत्ता-काक और गौओं के उच्छिष्ट का भक्षण करले तो प्राजापत्य करना चाहिये-यदि कोई उच्छिष्ट ब्राह्मण अज्ञान से॥११॥कुत्ता मुरगा-शूद्र-मदिरा का पात्र-और जिस पर पक्षि बैठा हो ऐसे अपवित्र वस्तु इन का कदाचित्स्पर्शकरले॥१२॥ तो एकदिनरात उपवा
१४ भाषार्थसहिता ॥
वैश्येनचयदास्पृष्ट उच्छिष्टेनकदाचन ॥ १३ ॥
स्नानंजप्यं चत्रैकाल्यं दिनस्यांतेविशुध्यति ।
विप्रोविप्रेणसंस्पृष्ट उच्छिष्टेनकदाचन ॥ १४ ॥
स्नानांतेचविशुद्धिःस्या-दापस्तम्बोऽब्रवीन्मुनिः ।
इत्यापस्तंबीये पंचमोऽध्यायः ॥
अतऊर्ध्वंप्रवक्ष्यामि नीलीवस्त्रस्ययोविधिः ।
स्त्रीणांक्रीडार्थसंभोगे शयनीयेनदुष्यति ॥ १ ॥
पालनेविक्रयेचैव तद्वृत्तेरुपजीवने ।
पतितस्तुभवेद्विप्र-स्त्रिभिःकृच्छ्रैर्विशुद्ध्यति ॥ २ ॥
स्नानंदानंजपोहोमः स्वाध्यायःपितृतर्पणम् ।
पंचयज्ञावृथास्तस्य नीलीवस्त्रस्यधारणात् ॥ ३ ॥
नीलीरक्तंयदावस्त्रं ब्राह्मणोऽगेषुधारयेत् ।
अहोरात्रोषितोभूत्वा पंचगव्येनशुद्ध्यति ॥ ४॥
रोमकूपैर्यदागच्छेदसो नील्यास्तुकर्हिचित् ।
स करके पंचगव्यपीने से शुद्ध होता है। यदि कदाचित उच्छिष्ट वैश्य ब्राह्मणको छूवे ॥१३॥ तो त्रिकाल स्नान और जप करके दिन के अंत में शुद्ध होता है और जो कदाचित ब्राह्मण को उच्छिष्ट ब्राह्मण ही छूवे ॥१४॥ तो स्नान के अंत में शुद्ध होता है यह आपस्तंब मुनिनेकहा है ॥ ५ ॥
इत्यापस्तम्बीयधर्मशास्त्रे पञ्चमोऽध्यायः ॥
अब आगे नीले वस्त्र की विधि कहते हैं-स्त्रियों के संग क्रीड़ा के लिये भोग में और शय्या पर नीले वस्त्र का दोष नहीं ॥ १ ॥ नील के पालने, वेचने, और जीविका से ब्राह्मण पतित होता है और वह तीन व्रतकृच्छ्र करने से शुद्ध होता है ॥ २ ॥ जो नीले वस्त्र को धारण करे उस के-स्नान-दान-जप होम-वेद का पाठ-पितरोंका तर्पण और पंचमहायज्ञ करनेवृथा हैं॥३॥नीले रंगे वस्त्र को यदि ब्राह्मण अंगमें धारण करेतो एकदिनरात उपवास करके पंचगव्य से शुद्ध होता है ॥४॥ यदि कदाचित रोमकूपों के द्वारा नील का रस अंगमें च-
आपस्तम्बस्मृतिः ॥ १५
पतितस्तुभवेद्विप्रस्त्रिभिः कृच्छ्रैर्विशुद्ध्यति ॥ ५ ॥
नीलीदारुयदाभिन्द्या-द्ब्राह्मणस्यशरीरकम् ।
शोणितंदृश्यतेतत्र द्विजश्चांद्रायणंचरेत् ॥ ६ ॥
नीलीमध्येयदागच्छे-त्प्रमादाद्ब्राह्मणःक्वचित् ।
अहोरात्रोषितोभूत्वा पंचगव्येनशुद्ध्यति ॥ ७ ॥
नीलीरक्तेनवस्त्रेण यदन्नमुपनीयते ।
अभोज्यंतद्विजातीनां भुक्त्वाचांद्रायणंचरेत् ॥८॥
भक्षयेच्चनीलींतु प्रमादाद्ब्राह्मणःक्वचित् ।
चांद्रायणेनशुद्धिःस्या-दापस्तंबोऽब्रवीन्मुनिः ॥ ९ ॥
यावत्यांवापितानीली तावतीर्वऽशुचिर्मही ।
प्रमाणंत्द्वादशाव्दानि अलमूर्ध्वंशुचिर्भवेत् ॥ १० ॥
इत्यापस्तंबीयेषष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥
स्नानंरजस्वलायास्तु चतुर्थेहनिशस्यते ।
लाजाय तो ब्राह्मण पतित होजाता है और तीन कृच्छ्रव्रत करने से शुद्ध होता है ॥ ५ ॥ यदि नील की लकड़ी ब्राह्मण के शरीर में घाव करदे और उस घाव में रुधिर निकल आवे तो चांद्रायण व्रत करे ॥ ६ ॥ यदि अज्ञान से ब्राह्मण नील के खेत के बीच में गमन करे तो एक दिनरात उपवास करके पंचगव्य से शुद्ध होता है ॥ ७ ॥ नील से रंगे वस्त्र को पहन कर जो अन्न परसा जाता है वह अन्न द्विजातियों को अभोज्य है और उसे खालें तो चांद्रायणव्रत करें ॥८॥ यदि अज्ञान से ब्राह्मण कदाचित् नील को खाले तो चांद्रायणव्रत से शुद्धिहोती । है यह आपस्तम्ब मुनि ने कहा है ॥९॥ जितनी पृथ्वी में नील बोया हो उतनी पृथ्वी बारह १२ वर्ष तक अशुद्ध होजाती है बाद शुद्ध होती है ॥१०॥
इत्यापस्तम्बीये षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥
रजस्वला स्त्री का स्नान चौथे दिन श्रेष्ठ है रज के निवृत्त होने पर स्त्री संग
१६ माधवार्य्यसंहिता ॥
निवृत्ते रजसिगम्यास्त्री नानिवृत्ते कथंचन । रोगेणयद्रजःस्त्रीणा-मत्यर्थंहिप्रवर्तते । अशुद्धास्तास्तु नैवैह तासां वैकारिकोमदः ॥ २ ॥ साध्वाचारानतावत्स-रजोयावत्प्रवर्त्तते । वृत्तेरजसिसाध्वीस्याद् गृहकर्मणिचेंद्रिये ॥ ३ ॥ प्रथमेऽहनिचांडाली द्वितीयॆब्रह्मघातिनी । तृतीयेरजकीप्रोक्ता चतुर्थेऽहनि शुद्ध्यति ॥ ४ ॥ अंत्यजातिश्वपाकेन संस्पृष्टावैरजस्वला । अहानितान्यतिक्रम्य प्रायश्चित्तं प्रकल्पयेत् ॥ ५ ॥ त्रिरात्रमुपवासः स्या-त्तपञ्चगव्यंविशोधनम् । निशां प्राप्यतुतांयोनिं प्रजाकाशांचकामयेत् ॥६॥ रजस्वलांत्यजैःस्पृष्टा शुनाचश्वपचेनच ।
के योग्य होती है रज के निवृत्त न होने पर कभी नहीं होती ॥ १ ॥ जो किसी रोग से स्त्रियों के अत्यन्त रज (रुधिर) निकलता है वे स्त्री उस रज से अशुद्ध नहीं होतीं क्योंकि वह उन का मद विकार से है ॥ २ ॥ जब तक रजोदर्शन रहे तब तक उत्तम आचरण न करे क्योंकि रजोदर्शन की निवृत्ति होने पर ही घर के काम और संग करने योग्य होती है ॥ ३ ॥ प्रथम दिन चांडाली संज्ञा द्वितीय दिन ब्रह्महत्यारी तृतीय दिन रजकी (धोबिन) होती और चौथे दिन शुद्ध होती है ॥ ४ ॥ यदि रजस्वला स्त्री को अंत्यज और श्वपाक स्पर्श करलें तो रजोदर्शन के दिनों को बिताकर प्रायश्चित्त करे ५ तीन दिन उपवास और पंचगव्य का पीना उसका प्रायश्चित्त है। फिर उसी शुद्ध होने की रात्रि में पुरुष का संग करे ॥ ६ ॥ यदि रजस्वला स्त्री को अन्त्यज-कुत्ता-और श्वपच ये स्पर्श करलें तो तीन दिन उपवास के अनन्तर पंचगव्य
प्रथमेऽहनिषड्रात्रं द्वितीयेतुत्र्यहंस्तथा ।
॥ आपस्तम्बस्मृतिः ॥ १७
त्रिरात्रोपोषिताभूत्वा पञ्चगव्येनशुद्ध्यति ॥७॥
प्रथमेऽहनिषड्रात्रं द्वितीयेतुत्र्यहंस्तथा ।
तृतीयेचोपवासस्तु-चतुर्थेवह्निदर्शनात् ॥८॥
विवाहेविततेयज्ञे संस्कारेनकृतेतथा ।
रजस्वलाभवेत्कन्या संस्कारस्तुकथंभवेत् ॥९॥
स्नापयित्वातदाकन्या-मन्यैर्वस्त्रैरलंकृताम् ।
पुनर्मेध्याहुतिंहुत्वा शेषंकर्मसमाचरेत् ॥१०॥
रजस्वलातुसंस्पृष्टा प्लवकुक्कुटवायसैः ।
सात्रिरात्रोपवासेन पञ्चगव्येनशुद्ध्यति ॥११॥
रजस्वलातुयानारी अन्योन्यं-स्पृशतेयदि ।
तावत्तिष्ठेन्निराहारा स्नात्वाकालेनशुद्ध्यति ॥१२॥
उच्छिष्टेनतुसंस्पृष्टा कदाचित्स्त्रीरजस्वला ।
कृच्छ्रेणशुद्ध्यतेविप्रा शूद्रादानेनशुद्ध्यति ॥१३॥
पीने से शुद्ध होती है ॥ ७ ॥ रजस्वला स्त्री रजोदर्शन के प्रथम दिन अंत्यज आदि स्त्री का स्पर्श कर ले तो छः दिन, दूसरे दिन छुवे तो तीन दिन, तीसरे दिन स्पर्श करले तो एक दिन, उपवास करे और यदि चौथे दिन छूले तो अग्नि के देखने से शुद्ध होती है ॥ ८ ॥ विवाह में यज्ञ हो रहा हो और कुछ संस्कार भी हो चुका हो बीच में ही यदि वह कन्या रजस्वला हो जाय तो शेष संस्कार कैसे हो ॥ ९ ॥ उस समय कन्या को स्नान कराकर अन्य वस्त्रों से शोभायमान करे और फिर पवित्र आहुति देकर शेष कर्म को करे ॥ १० ॥ जिस रजस्वला को बानर-मुरगा कौआ छूवें तो वह तीन, दिन उपवास करने और पंचगव्य पीने से शुद्ध होती है ॥११॥ यदि दो रजस्वला स्त्री परस्पर एक दूसरी को छूवें तो शुद्धि के दिन तक उपवासी रह कर स्नान से शुद्ध होती हैं ॥ १२ ॥ यदि कदाचित् रजस्वला स्त्री को कोई उच्छिष्ट पुरुष स्पर्श करले तो ब्राह्मणी स्त्री कृच्छ्र व्रत करने से और शूद्र जाति की स्त्री दानसे शुद्ध होती है ॥१३॥
३
१८ भाषार्थसहिता ॥
एकशाखासमारूढाः चांडालावा रजस्वला ।
ब्राह्मणेनसमंतत्र सवासाःस्नानमाचरेत् ॥१४॥
रजस्वलायाः संस्पर्शः कथंचिज्जायतेशुना ।
रजोदिनानांयच्छेषं तदुपोष्यविशुद्ध्यति ॥१५॥
अशक्ताचोपवासेन स्नानंपश्चात्समाचरेत् ।
तथाप्यशक्ता चैकेन पंचगव्येनशुद्ध्यति॥ १६ ॥
उच्छिष्टस्तुयदाविप्रः स्पृशेन्मद्यं रजस्वलाम् ।
मद्यंस्पृष्ट्वाचरेत्कृच्छ्रं तदर्द्धंतु रजस्वलाम् ॥ १७ ॥
उदक्यांसूतिकांविप्र उच्छिष्टःस्पृशतेयदि ।
कृच्छ्रार्द्धं तुचरेद्विप्रः प्रायश्चित्तंविशोधनम् ॥१८॥
चांडालःश्वपचोवापि आत्रेयींस्पृशतेयदि ।
शेषान्हाफालकृष्टेन पंचगव्येनशुद्ध्यति॥ १९ ॥
उदक्याब्राह्मणीशूद्रा-मुदक्यांस्पृशतेयदि ॥
यदि एक वृक्ष की शाखा पर चांडाल-रजस्वला और ब्राह्मण बैठे हों तो ब्राह्मण एक बार सचैल स्नान करे तब शुद्ध होता है ॥ १४ ॥ यदि रजस्वला स्त्री का कुत्ते से किसी प्रकार स्पर्श होजाय तो रज के जो शेष दिन हों उन में उपवास करने से सम्यक् प्रकार शुद्ध होजाती है ॥१५॥ यदि उपवास करनेमें अशक्त हो तो एक उपवास करके स्नान करले और जो स्नान में भी असमर्थ हो तो एक उपवास और पंचगव्य पीने से शुद्ध होती है ॥ १६ ॥ यदि उच्छिष्ट ब्राह्मण मदिरा को अथवा रजस्वला स्त्री को स्पर्श-करले तो क्रमसे कृच्छ्र और अर्द्ध कृच्छ्र व्रत करै ॥ १७ ॥ यदि उच्छिष्ट ब्राह्मण ऐसी रजस्वला को छूले जो सूतिका ( जिसके बालक जन्मा हो ) हो तो ब्राह्मण कृच्छ्रार्द्ध व्रत करै क्योंकि प्रायश्चित्त ही शुद्ध करने वाला है ॥१८॥ यदि चांडाल अथवा श्वपच आत्रेयी (रजस्वला) का स्पर्श करलें तो वह रजस्वला स्त्री शेष रहे दिन के उपवास और पंचगव्य से शुद्ध होती है ॥ १९ ॥ यदि रजस्वला
आपस्तम्बस्मृतिः ॥ १९
अहोरात्रोषिताभूत्वा पंचगव्येनशुद्ध्यति॥ २० ॥ एवंतुक्षत्रियावैश्या ब्राह्मणीचेद्रजस्वला । सचैलंप्लवनंकृत्वा दिनस्यांतेघृतं पिवेत् ॥ २१ ॥ सवर्णेषुतुनारीणां सद्यःस्नानंविधीयते ॥ एवमेवविशुद्धिःस्या-दापस्तंबोब्रवीन्मुनिः ॥ २२ ॥ इत्यापस्तंबीयेसप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥ भस्मनाशुद्ध्यते कांस्यं सुरायान्नन्लिप्यते । सुराविण्मूत्रसंस्पृष्टं शुद्ध्यतेतापलेखनैः ॥ १ ॥ गवाघ्रातानि कांस्यानि शूद्रोच्छिष्टानियानितु । दशभस्मभिःशुद्ध्यन्ति श्वकाकोपहतानिच ॥ २ ॥ शौचं सुवर्णनारीणां वायुसूर्येंदुरश्मिभिः । रेतःस्पृष्टंशवस्पृष्टं मात्रिकंतुप्रदुष्यति ॥ ३ ॥ अद्भिर्मृदाचतन्मात्रं प्रक्षाल्यचविशुद्ध्यति ।
ब्राह्मणी रजस्वला शूद्रा का स्पर्श करले तो एक दिन रात्र उपवास करके पंच- गव्य से शुद्ध होती है ॥ २० ॥ इसी प्रकार क्षत्रिया वैश्या ब्राह्मणीये रजस्वला भी परस्पर एक दूसरी का स्पर्श करले तो सचैल स्नान करके संध्या को घी पीवें ॥ २१ ॥ अपने वर्ण की रजस्वला के छूने में तत्काल ही स्नान कहा है इसी प्रकार शुद्धि होती है यह आपस्तम्ब मुनिने कहा है ॥ २२ ॥
इत्यापस्तम्बीये सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥
जिस कांसे के पात्र में मदिरा का स्पर्श न हुआ हो वह भस्म से और जिस से मदिरा विष्ठा मूत्र का स्पर्श हुआ हो वह तपाने और रितवाने से शुद्ध होता है ॥ १ ॥ गौके सूंघे-शूद्र के उच्छिष्ट तथा कुत्ता काक के छुये जो कांसेके पात्र हैं वे दशवार भस्म से मांञने से शुद्ध होते हैं ॥ २ ॥ सोना और स्त्रियों की शुद्धि वायु सूर्य और चन्द्रमा की किरणों से होती है और वीर्य तथा मुर्दा का स्पर्श जिस में हुआ हो ऐसा उनका वस्त्र दूषित (अशुद्ध) है ॥ ३ ॥ परन्तु जल औ र मिट्टी से जितने में वीर्य आदि लगे हों उतने वस्त्र को धोकर सम्यक् प्रकार
| २० | भाषार्यसंहिता ॥ |
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शुष्कमन्नमपेयञ्च पंचरात्रेणजीर्यति ॥४॥
अन्वेव्यं जनसंयुक्तं मर्द्धमासेनजीर्यति ।
पयस्तु दधिमासेन षण्मासेनघृतंतथा ॥५॥
संवत्सरेणतैलंतु कोष्ठेजीर्यतिवानवा ।
भुंजतेयेतुशूद्रान्नं मासमेकॅनिरंतरम् ॥६॥
इहजन्मनिश्शूद्रत्वं जायंतेते इतःशुनि ।
शूद्रान्नं शूद्रसम्पर्कः शूद्रेणैवसहासनम् ॥ ७ ॥
शूद्राज्ज्ञानागमःकश्चिज्ज्वलंतमपिपातयेत् ।
आहिताग्निस्तुयोविप्रश्शूद्रान्नान्ननिवर्तते ॥ ८॥
तथातस्यप्रणश्यन्ति आत्माब्रह्मत्रयोग्नयः ।
शूद्रान्नेनतुभुक्तेन मैथुनंयोधिगच्छति ॥ ९ ॥
यस्यान्नं तस्यतेपुत्रा अन्नाच्छुक्रस्यसंभवः ।
शूद्रान्नेनोदरस्थेन यःकश्चिन्म्रियतेद्विजः ॥ १० ॥
संभवेच्छूकरो ग्राम्यस्तस्यवाजायतेकुले ।
शुद्ध होती है। अभेद्य (शूद्र) का अन्न पांच दिन में पचता है ॥४॥ जिसमें व्यंजन (शाक लवण) मिला हो वह अन्न आधे महीने में तथा दुग्ध दधी एक महीने में और घी छः महीने में ॥५॥ तेल एक वर्ष में पेट में पचता है अथवा नहीं भी और जो शूद्र के अन्न को एक मास पर्य्यन्त निरंतर खाते हैं ॥६॥ वे इस संसार में शूद्र होते हैं और मरण के अनन्तर कुत्ते की योनि में उत्पन्न होते हैं—शूद्र का अन्न तथा संसर्ग शूद्र के संग एक आसन पर बैठना ॥ ७ ॥ शूद्र से किसी विद्या का ग्रहण करना ये प्रतापी पुरुष को भी पतित करदेते हैं। जो अग्निहोत्री ब्राह्मण शूद्र के अन्न को नहीं त्यागता ॥ ८ । उस के आत्मा (जीव) वेद तीनों अग्नि ये सब नष्ट होजाते हैं शूद्र के अन्नको खाकर जो मैथुन (स्त्री का संग) करता है ॥९ । जिसका वह अन्न है उसी के वे पुत्र हैं क्योंकि अन्न से ही वीर्य्य होता है—शूद्र के अन्न के पेट में रहते हुए जो द्विज मरता है ॥१०॥ वह गांव का सूकर होता वा शूद्र के ही कुल में पैदा होता
आपस्तम्बस्मृतिः ॥ २१
ब्राह्मणस्यसदाभुंक्ते क्षत्रियस्यतुपर्वणि ॥११॥
वैश्यस्ययज्ञदीक्षायां शूद्रस्यनकदाचन ।
अमृतंब्राह्मणस्यान्नं क्षत्रियस्यपयःस्मृतम् ॥ १२ ॥
वैश्यस्याप्यन्नमेवान्नं शूद्रस्यरुधिरंस्मृतम् ।
वैश्वदेवेनहोमेन देवताभ्यर्चनैर्जपैः ॥ १३ ॥
अमृतंतेनविप्रान्न-मृग्यजुःसामसंस्कृतम् ।
व्यवहारानुरूपेण धर्मेणच्छलवर्जितम् ॥ १४ ॥
क्षत्रियस्यपयस्तेन भूतानांयच्चपालनम् ।
स्वकर्मणाचवृपभै-रनुसृत्याद्यशक्तितः ॥ १५ ॥
खलयज्ञातिथित्वेन वैश्यान्नंतेनसंस्कृतम् ।
अज्ञानतिमिरांधस्य मद्यपानरतस्यच ॥ १६ ॥
रुधिरंतेनशूद्रान्नं विधिमंत्रविवर्जितम् ।
आमंमांसंमधुघृतं धानाःक्षीरंतथैवच ॥ १७ ॥
है ब्राह्मण का अन्न सदा खाना क्षत्रिय का पर्व (अमावस आदि) में ॥ ११ ॥
वैश्य का अन्न यज्ञ की दीक्षा में और शूद्र का कभी न खावे-ब्राह्मण का अन्न अ-
मृत रूप क्षत्रिय का अन्न दूध रूप ॥ १२ ॥ वैश्य का अन्न अन्नही है और शूद्र
का अन्न रुधिर रूप है। अग्निवैश्व देव होम देवताओं का पूजन जप इन से॥१३॥
और ऋग्वेद यजुर्वेद सामवेद के मन्त्रों से संस्कृत (शुद्ध) हुआ ब्राह्मण का
अन्न अमृत है। व्यवहार के अनुकूल धर्म करने से छल रहित ॥ १४ ॥ सर्व प्रा-
णियों का पालक क्षत्रिय है इस से क्षत्रिय का अन्न दूध है। अपनी शक्ति
के अनुसार अपने कर्म से, पशुओं की रक्षा से ॥१५॥ और खल (खरियान) स-
म्बन्धी यज्ञ से संस्कार (शुद्धि) को प्राप्त हुए वैश्य का अन्न अन्न ही है। अज्ञान
के अंधकार से अन्धे और मदिरा के पीने में तत्पर ॥ १६ ॥ विधि और मन्त्र
से वर्जित शूद्र का अन्न रुधिर होता है। कच्चा मांस महुत घी भुंजे जौ और दूध॥१७॥
२२ | भाषार्थसहितः ॥
गुडस्तक्ररसाग्राह्या निवृत्तेनापिशूद्रतः ।
शाकंमांसंमृणालानि तुंबरुःसक्तवस्तिलाः ॥ १८ ॥
रसाःफलानिपिण्याकं प्रतिग्राह्याहिसर्वतः ।
आपत्कालेतुविप्रेण भुक्तं शूद्रगृहेयदि ॥ १९ ॥
मनस्तापेनशुध्येत द्रुपदांवाशतंजपेत् ।
द्रव्यपाणिंश्चशूद्रेण स्पृष्टोच्छिष्टेनकर्हिचित् ॥ २० ॥
तद्द्विजेननभोक्तव्य-मापस्तंबोऽब्रवीन्मुनिः ॥ २१ ॥
इत्यापस्तंबीयेऽष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥
भुंजानस्यतुविप्रस्य कदाचित्स्रवतेगुदम् ।
उच्छिष्टस्याशुचेरतस्य प्रायश्चित्तंकथंभवेत् ॥ १ ॥
पूर्वं शौचंतुनिर्वर्त्य ततःपश्चादुपस्पृशेत् ।
अहोरात्रोषितोभूत्वा पंचगव्येनशुध्यति ॥ २ ॥
अशित्वासर्वमेवान्न-मकृत्वाशौचमात्मनः ।
गुड़ मट्ठा रस इन को निवृत्त पुरुष भी शूद्र से लेले-शाक (भाजी) मांस, कमल की जड़-तुंबरी-सत्तू-तिल ॥ १८ ॥ रस-फल-पिण्याक (खली) इन को सब से ले ले यदि आपत्काल में ब्राह्मण शूद्र के घर में भोजन करले ॥ १९ ॥ तो मन के पश्चात्ताप से शुद्ध होता है अथवा सौ १०० द्रुपदा मन्त्र जपै द्रव्य (अन्न आदि) है हाथ में जिस के ऐसे ब्राह्मण को यदि उच्छिष्ट शूद्र छूवे ॥ २०॥ तो उस अन्नको ब्राह्मण न खावे यह आपस्तंब मुनि ने कहा है ॥ २१ ॥
इत्यापस्तंबीये अष्टमोऽध्यायः ॥
भोजन करते हुये ब्राह्मण का यदि मलत्याग होजाय तो उच्छिष्ट और अशुद्ध हुये उस ब्राह्मण का प्रायश्चित्त कैसे हो ॥ १ ॥ पहिले शौच करके आ-चमन करै पुनः एक दिनरात उपवास करके पंचगव्य पीने से शुद्ध होता है ॥ २ ॥ देह को शुद्ध किये विना अज्ञान से सर्व प्रकार के भोजन को खाकर तीन दिन
आपस्तम्बस्मृतिः ॥ २३
मोहाद्भुक्त्वात्रिरात्रंतु यवान्पीत्वाविशुद्ध्यति ॥३॥
प्रसृतयवसस्येन पलमेकंतुसर्पिषा ।
पलानिपंचगोमूत्रं नातिरिक्तवदाशयेत् ॥ ४ ॥
अलेह्यानामपेयाना-मभक्ष्याणांचभक्षणे ।
रेतोमूत्रपुरीषाणां प्रायश्चित्तंकथंभवेत् ॥ ५ ॥
पद्मोदुंबरबिल्वाश्च कुशाश्चसपलाशकाः ।
एतेषामुदकंपीत्वा षड्रात्रेणविशुद्ध्यति ॥ ६ ॥
येप्रत्यवसिताविप्रा प्रव्रज्याग्निजलादिषु ।
अनाशकनिवृत्ताश्च गृहस्थत्वंचिकीर्षवः ॥ ७ ॥
चरेयुस्त्रीणिकृच्छ्राणि त्रीणिचांद्रायणानिवा ।
जातकर्मादिभिःसर्वं पुनःसंस्कारभागिनः ॥
तेषांसांतपनंकृच्छ्रं चांद्रायणमथापिवा ॥ ८ ॥
यद्दृष्टिटं काकबलाकयोर्वा अमेध्यलिप्तंचभवंच्छरीरम्
श्रोत्रेमुखेचप्रविशेच्चसम्यक् स्नानेनलेपोपहतस्यशुद्धिः ९
ऊर्ध्वनाभेःकरौमुक्त्वा यदंगमुपहन्यते ।
जौ को पीकर सम्यक् प्रकार शुद्ध होता है ॥ ३ ॥ और वे जौ इतने तथा ऐसे पीवे कि एक पस्सा जौ एक पल भर घी और पांच पल गोमूत्र जिन में हों इन से अधिक न खावे ॥४॥ चाटने पीने और खाने के अयोग्य रेत (वीर्य) मूत्र विष्ठा इन के भक्षण में प्रायश्चित्त कैसे हो ॥ ५॥ कमल-गूलर-बेल कुश और ढाक-इन के जल को छः दिन तक पीकर सम्यक् प्रकार शुद्ध होता है ॥ ६ ॥ जो ब्राह्मण पतित हों अथवा संन्यास अग्निहोत्र और तर्पण से निवृत्त हों अर्थात् इन को जिन ने त्यागा हो तथा जो उपवास व्रत से निवृत्त हों परन्तु वे गृहस्थाश्रम में रहना चाहते हों ॥ ७ ॥ वे तो तीन कृच्छ्र अथवा तीन चांद्रायण करें और जातकर्म से लेकर उन का पुनः संस्कार होना चाहिये। यद्वा सांतपन कृच्छ्र वा चांद्रायण करना ॥ ८ ॥ जो शरीर कौवा-बगुला से घेरा हो अथवा अमेध्य (विष्ठा) से लिप्त हो ॥ ९ ॥ अथवा कान वा मुख में अशुद्ध वस्तु प्रविष्ट हो जाय तो जिस में अपवित्र वस्तु लगा हो सम्यक्
२४ भाषाधर्मसंहिता ॥
ऊर्ध्वस्नानमधःशौच मात्रेणैवविशुद्ध्यति ॥१०॥
उपानहावमेध्यंवा यस्यसंस्पृशतेमुखम् ।
मृत्तिकाशोधनस्नानं पंचगव्यंविशोधनम् ॥ ११ ॥
दशाहाच्छुद्ध्यतेविप्रो जन्महानौस्वयोनिषु ।
षड्भिस्त्रिभिस्तथैकेन क्षत्रविट्शूद्रयोनिषु ॥१२॥
उपनीतंयदात्वन्नं भोक्तारंसमुपस्थितम् ॥१३॥
अपोतवत्समुत्सृष्टं नदद्यान्नैवहोमयेत् ।
अन्ने भोजनसम्पन्नं मक्षिकाकेशदूषिते ॥१४॥
अनन्तरंस्पृशेदाप-स्त्वच्छाऽनंभस्मनास्पृशेत् ।
शुष्कमांसमथर्वान्नं शूद्रान्नंचाप्यकामतः ॥१५॥
भुक्त्वाकृच्छ्रं चरेद्विप्रो ज्ञानात्कृच्छ्रत्रयंचरेत् ।
अभुक्तोमुच्यतेयश्च भुक्तोयश्चापिमुच्यते ॥१६॥
प्रकार स्नान करने से उस शरीर की शुद्धि होती है। हाथों को छोड़ कर नाभी से ऊपर जिस अंग में अशुद्ध वस्तु स्पर्श हो जावे ॥ १० ॥ तो स्नान करने से-निचले भाग में होय तो शौच से ही शुद्धि होती है-जिस के मुख में उपानह (जूते, या अपवित्र वस्तु का स्पर्श हो जाय ॥ ११ ॥ तो वह मिट्टी शरीर पर लगावे और स्नान तथा पंचगव्य से शुद्धि होती है। ब्राह्मण अपनी जाति के जन्म और मरण के सूतक से दश दिन में शुद्ध होता है ॥१२॥ क्षत्रिय वैश्य और शूद्र जातियों के सूतक में क्रम से क्रः ६ तीन३-एक दिन में शुद्ध होता है-भोजनार्थ भोक्ता के समीप जो अन्न लाया जाता है ॥१३॥ यदि उस अन्न को भोक्ता वैसे ही छोड़ दे तो वह अन्न मरे के अन्न के तुल्य है इस से उस अन्न को किसी को न दे और न उस से होम करे भोजन के लिये जो अन्न बनाया जाय वह अन्न यदि मक्षिका (मक्खी) या केश से दूषित होजाय ॥१४॥ तो फिर जल का स्पर्श करे और अन्न में भस्म डाल के शुद्ध करे । सूखा मांस तथा अथर्वा (बढ़ई) और शूद्र का अन्न इन को अज्ञान से ॥ १५ ॥ खाकर ब्राह्मण एक कृच्छ्र और जान कर खावे तो तीन कृच्छ्र करे—अभुक्त (खाये बिना) अथवा भुक्त (खाने पर) जो भोजन से छुटाया जाय ॥१६॥
आपस्तम्बस्मृतिः ॥ २५
भोक्ताचमोचकश्चैवपश्चादुरतिदुष्कृतम् । यस्तुभुंजतिभुक्तंवा दुष्टंवापिविशेषतः ॥ १७ ॥ अहोरात्रोषितोभूत्वा पंचगव्येनशुद्ध्यति । उदकेचोदकस्थस्तु स्थलस्थश्चस्थलेशुचिः ॥ १८ ॥ पादौस्थाप्योभयत्रैव आचम्योभयतःशुचिः । उत्तीर्याचामेदूदका-दवतीर्यउपस्पृशेत् ॥ १९ ॥ एवंतुश्रेयसायुक्तोवरुणेनाभिपूज्यते । अग्न्यागारेगवांगोष्ठे ब्राह्मणानांचसन्निधौ ॥ २० ॥ स्वाध्यायंभोजनेचैव पादुकानांविसर्जनम् । जन्मप्रभृतिसंस्कारे श्मशानांतेचभोजनम् ॥ २१ ॥ असर्पिंडैर्नकर्त्तव्यं चूडाकार्य्यविशेषतः । याजकानांनवश्राद्धं संग्रहेचैवभोजनम् ॥ २२ ॥ स्त्रीणांप्रथमगर्भेच भुक्त्वाचांद्रायणंचरेत् ।
भी भोक्ता और छुटानेवाला दोनों पाप के भागी होते हैं-जो खाये हुए जूठे अथवा अत्यन्त दुष्ट वस्तु को खाता है ॥ १७ ॥ वह एकदिन उपवास करके पंचगव्य पीने से शुद्ध होता है-जल में बैठा और स्थल में बैठा शुद्ध होता है ॥१८॥ दोनों स्थानोंपर स्थित पुरुष दोनों स्थानोंपर पग रखकर आचमन करके शुद्ध होता है यदि जल में पग हों तो तटपर निकाल कर आचमन करै प्रयोजन यह कि आधा जल में आधा बाहर बैठ आचमनादि न करे ॥१९॥ ऐसे कल्याण से युक्त पुरुष को वरुण भी पूजता है-अग्नि और गोओं की शा-ला-तथा ब्राह्मणोंके समीप॥२०॥ स्वाध्याय (वेदकापाठ) भोजन इतनेस्थानोंपर खडाउं त्यागदे-जन्म आदि संस्कार-श्मशानांत (मरेकी क्रिया) का भोजन ॥२१॥ असपिण्डों को नहीं करना चाहिये तथा चूड़ाकर्म (मुंडन) में तो विशेष कर नकरें-यज्ञ कराने वाले का अन्न नवश्राद्ध (जो मरने से ११ वें दिन होता है) संग्रह तथा (बहुत मनुष्यों के साथ) में भोजन ॥२२॥ तथा स्त्रियों के प्रथम गर्भाधान में भोजन करके चांद्रायण व्रत करै। ब्रह्मोदन (यज्ञादि जो विशेष भात
४
२६ | भाषार्थसहिता ॥
ब्रह्मौदनेऽवसानेच सीमंतोन्नयनेतथा ॥ २३ ॥ अन्नश्राद्धेमृतश्राद्धे भुक्त्वाचांद्रायणंचरेत् । अप्रजातातुनारीस्या-न्नाश्नीयाद्दैवतेऽगृहे ॥ २४ ॥ अथभुंजीतमोहाद्यः पूयसंनरकंप्रजेत् । अल्पेनापिहिशुल्केन पिताकन्यांददांतियः ॥ २५ ॥ रौरवेबहुवर्षाणि पुरीषंमूत्रमश्नुते । स्त्रीधनानितुयेमोहा-दुपजीवंतिबांधवाः ॥ २६ ॥ स्त्रीणयानानिवस्त्राणि तेपापायांत्यधोगतिम् । राजाऽन्नमोज आदत्ते शूद्रान्नंब्रह्मवर्चसम् ॥ २७ ॥ असंस्कृतंतुयोभुंक्ते सभुंक्ते पृथिवीमलम् । मृतकेसूतकेचैव गृहीते शशिभास्करे ॥ २८ ॥ हस्तिच्छायांतुयोभुंक्ते सपापःपुरुषोभवेत् ।
होताहै ) अवसान (जब ब्राह्मण जीम चुकेहों) और सीमंतोन्नयन (अठवांसा) ॥२३॥ अन्न के श्राद्ध-मरे के श्राद्ध-इन में भोजन करे तो चांदायण व्रत करना चाहिये । जिस स्त्री के संतान न हुआ हो उस के घर भोजन न करे ॥२४॥ जो अज्ञान से खालेवेतो वह पूयस [पीब] के नरक में जाता है-जो पिता कुछ भी शुल्क [मोल] लेकर कन्या को देता है ॥२५॥ वह बहुत वर्षों तक रौरव नरक में विष्ठा मूत्र खाता है-जो कन्या के भाई आदि अज्ञान से स्त्री के धनों से गुजारा करते हैं॥२६॥ तथा स्त्रियों के सोना यान [सवारी] वस्त्र आदि को वर्तते हैं। वे पापी अधोगति (नरक) में जाते हैं-राजा का अन्न बल को और शूद्र का अन्न ब्रह्मतेज को नष्ट करता है ॥ २७ ॥ जो मनुष्य असंस्कृत [ अपवित्र ] अन्न को खाता है वह पृथिवी के मल को खाता है। मरने पर वा जन्म के सूतक में तथा चन्द्रमा और सूर्य के ग्रहण में तथा गजच्छाया * में जो पुरुष खाता है
* जब कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी हो और सूर्य हस्त नक्षत्र पर हों तथा चन्द्रमा मघा नक्षत्र पर हों उसे गजच्छाया योग कहते हैं ।