भारतकोश
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अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished387 पृष्ठ

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अष्टाङ्गहृदये

शोधन कर्म एवं उसके भेद—शोधन-चिकित्सा वह है, जो शरीर स्थित दोषों ( मलों ) को बाहर निकाल देती है। यह शोधन-चिकित्सा पाँच प्रकार की होती है। जैसे—१. निरुह्णबस्ति, २. वमन, ३. विरेचन, ४. शिरोविरेचन ( नस्य ) तथा ५. रक्तव्राण ॥५॥

न शोधयति यद्दोषान् समाप्नोदीरयत्यपि। समीकरोति विषमान् शमनं तच्च सप्तधा ॥६॥ पाचनं दीपनं क्षुतुङ्घ्यायामातपमारुताः।

शमन के लक्षण एवं भेद—जो चिकित्सा बड़े हुए वात आदि दोषों का शोधन न करे, समदोषों की वृद्धि भी न करे और विषम दोषों को सम करे, उसे 'शमन-चिकित्सा' कहते हैं। यह सात प्रकार की होती है। यथा—१. पाचन ( आमदोषों को पचाने वाली ), २. दीपन ( जठराग्नि को प्रदीप्त करने वाली ), ३. क्षुतु ( भूखा रहना, उपवास या लंघन करना ), ४. तुङ्घ ( प्यासा रहना ), ५. व्यायाम ( किसी प्रकार का शारीरिक परिश्रम करना ), ६. आतप ( धूप में रहना या आग संकना ) तथा ७. मारुत ( शुद्ध वायु का सेवन करना ) ॥६॥

बृंहणं शमनं त्वेव वायोः पित्तानिलस्य च ॥७॥

बृंहण के लक्षण—बृंहण नामक जो शोधन-प्रकार है, वह लंघन से अधिक उपयोगी होता है, क्योंकि बृंहण द्रव्यों को भी शोधन कहते हैं। अतः वे द्रव्य, जो स्वतन्त्र वातदोष तथा पित्तयुक्त वातदोष का शमन करते हैं, वे बृंहण कहे जाते हैं ॥७॥

बृंहयेद्व्याधिर्नैषज्यमद्यस्त्रीशोकर्शितान्। भाराध्वोरःक्षतक्षीणरूक्षदुर्बलवातलान् ॥८॥ गर्भिणीसूतिकाबालवृद्धान् ग्रीष्मेऽपरानपि।

सन्तर्पण योग्य रोग-रोगी—ज्वर आदि रोगों से, मद्यपान करने से, अधिक स्त्री-सहवास करने से अथवा शोक से जो कृश हो गये हों उनकी; अधिक भार ढोने से, रास्ता चलने से अथवा उरःक्षत से जो क्षीण हो गये हों उनकी; रूक्ष शरीर वालों की, दुर्बलों की, वातरोगियों की, गर्भवती की, प्रसूता की, बालकों तथा वृद्धों की एवं ग्रीष्म ऋतु में सभी की बृंहण ( सन्तर्पण ) चिकित्सा करनी चाहिए ॥८॥

मांसक्षीरसितासर्पिर्मधुरस्निग्धबस्तिभिः ॥९॥ स्वप्नशय्यासुखाभ्यङ्गस्नाननिर्वृतिहर्षणिः।

सन्तर्पण-चिकित्सा के उपादान—मांस, दूध, मिर्ची, घी, मधुररस-प्रधान पदार्थ ( मुनक्का, किशमिश, बादाम, काजू, चिरौजी आदि ), मधुर एवं स्निग्ध पदार्थों द्वारा निर्मित बस्तियों का प्रयोग, सुबद शय्या में सुखपूर्वक सोना, अभ्यंग ( उबटन ), स्नान, निश्चिन्तता तथा प्रवक्ष रहना ॥९॥

मेहमादोषातिस्निग्धज्वरोहस्तम्भकुष्ठिनः ॥१०॥

विसर्पविद्रधिष्ठीहशिरःकण्ठाक्षिरोगिणः। स्थूलांश्च लङ्घ्येन्नित्यं शिशिरे त्वपरानपि ॥११॥ अपतर्पण योग्य रोग-रोगी—प्रमेह, आमदोष ( आमज्वर, आमातिसार तथा आमवात आदि ), अतिस्निग्ध, ज्वररोगी, ऊहस्तम्भ, कुष्ठरोगी, विसर्प, विद्रधि, ष्ठीहरोगी, शिरोरोगी, गल्गरोगी, नेत्ररोगी ( आमाभिष्यन्द ) तथा स्थूलता रोग से पीड़ितों की शिशिर ऋतु में और इस प्रकार के अन्य रोगियों की भी अपतर्पण चिकित्सा करनी चाहिए ॥१०-११॥

तत्र संशोधनेः स्थौल्यबलपित्तकफाधिकान्। आमदोषज्वरच्छर्दिरतीसारहृदामयैः ॥१२॥ विवन्धगौरवोद्गारहूलासादिभिरातुरान्। मध्यस्थौल्यवादिकान् प्रायः पूर्व पाचनदीपनैः ॥१३॥ एभिरेवामयैरातान् हीनस्थौल्यबलादिकान्। क्षुत्तुष्णानिग्रहैर्दौर्घस्वार्तान् मध्यबलैर्दृढान् ॥१४॥ समीरणातपायसैः किमुताल्पबलैरान्।

शोधन-शमन के योग्य रोग-रोगी—पहले पद्यों में शोधन तथा शमन भेद से दो प्रकार का लंघन ( हल्का करने का उपाय ) कहा गया है। यहाँ शोधन का विवेचन किया जा रहा है—संशोधन-चिकित्सा

द्विविधोपक्रमणीयाध्यायः १४ ]

सूत्रस्थानम्

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विधि से अधिक स्थूलता ( मोटापा ) से पीड़ित, अधिक बलवान्, अधिक पित्त तथा कफ वालों की चिकित्सा करनी चाहिए।

आमदोष, ज्वर, वमन, अतिसार, हृद्दोष, विबन्ध, भारीपन, उद्वार ( डकार ), जी मिचलाना आदि रोगों से पीड़ितों की तथा मध्यम कोटि की स्थूलता, मध्यमबल, मध्यम पित्त तथा कफ वाले रोगियों की पहले पाचन तथा दीपन नामक चिकित्साविधियों से चिकित्सा करें।

उक्त आमदोष आदि रोगों से पीड़ित किन्तु हीन कोटि की स्थूलता, बल आदि वालों की चिकित्सा भूख-प्यासनग्रह नामक अपतर्पणों से करें।

मध्यम कोटि के बल वाले उपर्युक्त आमदोष आदि रोगों से पीड़ित किन्तु बलवान् रोगियों की चिकित्सा वातसेवन, आतप ( धूप ) सेवन तथा व्यायाम आदि अपतर्पणों से करें।

अल्प बल वाले आमदोष आदि ऊपर कहे गये रोगों से पीड़ित अल्प बल वाले रोगियों की चिकित्सा वातसेवन, धूपसेवन तथा व्यायाम आदि अपतर्पणों से करें ॥ ११-१४ ॥

बक्तव्य —यहाँ सन्तर्पण तथा अपतर्पण विधियों से चिकित्सा का निर्देश किया गया है। इस प्रसंग में ऊपर कहे गये रोगों एवं रोगियों में से कुछ रोग-रोगी वे हैं जिन्हें शोधन नामक अपतर्पण और कुछ को शमन नामक अपतर्पण का प्रयोग करायी जाता है। चिकित्सा काल में इस ओर भी ध्यान देना चाहिए।

न बृंहयेल्लङ्घनीयान्—

सन्तर्पण का निषेध —लंघन ( अपतर्पण ) कराने के योग्य ( प्रमेहरोगी, आमदोष युक्त आदि ) रोगियों को बृंहण ( सन्तर्पण ) योगों का प्रयोग न करायें।

—बृंहांस्तु मृदु लङ्घयेत् ॥ १५ ॥

युक्त्या वा देशकालादिवल्लतस्तानुपाचरेत्।

अपतर्पण-निर्देश —जो व्यक्ति सन्तर्पण के योग्य हैं, उनको अपतर्पण ( लंघन ) दिया जा सकता है। अथवा उनकी देश, काल आदि ( सात्य्य ) का विचार करके चिकित्सा की जा सकती है ॥ १५ ॥

बक्तव्य —कब कहाँ क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए, इस सम्बन्ध में भगवान् पुनर्वसु के निर्देशों पर ध्यान दें—ज.सि. २।२५-२७ अर्थात् जो शास्त्र में बतलाया गया है बुद्धिमान् चिकित्सक को वैसा ही करना है, किसी प्रकार का दुराग्रह नहीं करना चाहिए। अपितु उसे चाहिए कि स्वयं भी तर्क-वितर्क करके अपने कर्तव्य का निश्चय करे, क्योंकि देश, काल तथा रोग बल एवं रोगी के बल के अनुसार कभी ऐसी भी अवस्था आ जाती है, जिसमें अकार्य भी करना पड़ता है और कार्यविधि को भी छोड़ना पड़ जाता है। जैसे—छर्दि, हृद्दोष तथा गुल्मरोगों में वमन करना सामान्य रूप से निषिद्ध है, किन्तु जहाँ-जहाँ इनकी स्वतन्त्र चिकित्सा कही गयी है वहाँ परिस्थिति-विशेष में वमन कराने का विधान मिलता है। इसी प्रकार कुष्ठरोगी के लिए बस्तिकर्म निषिद्ध है, परन्तु अवस्था-विशेष में निरुहणबस्ति देने का विधान किया गया है।

बृंहिते स्याद्वलं पुष्टितस्त्याध्यामयसङ्घ्रयः ॥ १६ ॥

सन्तर्पण के लाभ —भलीभाँति सन्तर्पण-विधि के हो जाने पर शरीर बलवान् एवं पुष्ट हो जाता है और सन्तर्पण-विधि द्वारा साध्य रोगों का क्षय भी हो जाता है ॥ १६ ॥

विमलेन्द्रियता सर्गो मलानां लाघवं र्विचिः। क्षुत्तुसहोदयः शुद्धहृदयोद्वाकरकण्ठता ॥ १७ ॥ व्याधिमार्ववमुत्साहस्तन्नानाशश्च लङ्घिते।

अपतर्पण के लाभ —भलीभाँति अपतर्पण के हो जाने पर इन्द्रियों में निर्मलता, मल-मूत्र आदि का सुख से निकलना, शरीर में हलकापन, भोजन के प्रति रुचि का होना, भूख तथा प्यास का साथ-साथ

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अष्टाङ्गहृदय

लगना, हृदय, उद्गार ( डकार ) तथा कण्ठप्रदेश का शुद्ध होना, रोगों का घट जाना, उत्साह की वृद्धि एवं तन्त्र का नाश—ये लक्षण होते हैं ॥ १७ ॥

अनेपेक्षितमात्रादिसेविते कुरुतस्तु ते ॥ १८ ॥ अतिस्यौल्यातिकार्थ्यादीन्, वक्ष्यन्ते ते च सौषधाः ।

योग, अतियोग, हीनयोग—अनेपेक्षित ( जितनी आवश्यकता नहीं है उतने ) सन्तर्पणकारक द्रव्यों का सेवन करने से अतिस्यूलता ( मोटापा ) आदि रोग हो जाते हैं तथा अधिक अपतर्पणकारक द्रव्यों या विधियों का सेवन करने से अत्यन्त कुशता आदि रोग हो जाते हैं। आगे इन रोगों का चिकित्सा सहित वर्णन किया जायेगा ॥ १८ ॥

रूपं तैरेव च जेयमतिबृंहितलङ्घिते ॥ १९ ॥

उनके लक्षण—उक्त अतिस्यूलता तथा अतिकुशता आदि लक्षणों द्वारा क्रमशः यह जान लेना चाहिए कि अतिस्यूल में अतिसन्तर्पण तथा अतिकुश में अतिअपतर्पण हो गया है ॥ १९ ॥

अतिस्यौल्यापचीमेहज्वरोदरभगन्दरात् । काससन्त्यासकृच्छ्रामकृच्छ्रादीनतिदारुणान् ॥ २० ॥

अतिस्यूलता आदि रोग—अतिसन्तर्पण ( बुंहण ) के कारण होने वाले रोगों के नाम—अतिस्यूलता ( मोटापा ), अपची, प्रमेह, ज्वर, उदररोग, भगन्दर, कास, सन्त्यास, मूत्रकृच्छ्र, आमवात, कृच्छ्र आदि अत्यन्त कष्टदायक रोग हो जाते हैं ॥ २० ॥

तत्र मेदोऽनिलस्लेष्मनाशनं सर्वमिष्यते ।

चिकित्सा-सूत्र—उक्त स्यूलता आदि रोगों में मेदोधातु, वातदोष तथा कफदोष को नष्ट करने वाले आहार-विहारों तथा औषधों का प्रयोग करना चाहिए।

कुलत्यजूर्णश्यामाकथवमुद्गमधुदकम् ॥ २१ ॥

मस्तुदण्डाहारिष्टचित्ताशोधनजागरम् । मधुना त्रिफलां लिह्यादुद्गुभीमभयां घनम् ॥ २२ ॥

रसाञ्जनस्य महतः पञ्चमूलस्य गुग्गुलोः । शिलाजतुप्रयोगश्च सप्तिमन्यरसो हितः ॥ २३ ॥

विडङ्गं नागरं क्षारः काललोहरजो मधु । यवामलकचूर्णं च योगोऽतिस्यौल्यादोषजित् ॥ २४ ॥

विशेष चिकित्सा—खान-पान—कुलथी ( गहूत या धीत ), ज्वार, सार्वी, जौ, मूंग, मधु मिला हुआ जल, दही का पानी, मठा, आसव, अरिष्ट, चित्ता करना, शोधन ( वमन-विरचन ) और रात्रि में जागना—इनका सेवन करना चाहिए।

औषध-प्रयोग—त्रिफलाचूर्ण को, गुरुच का स्वरस, केवल हीरीतकी के चूर्ण को अथवा नागरमोथा के चूर्ण को मधु के साथ मिलाकर चाटना चाहिए।

रसाञ्जन ( रसवत ) का, बिल्वादि महापञ्चमूल ( बेल, अरणी, सोनापाठा, गम्भार, पाङ्गल ) का, शुद्ध गुग्गुल का अथवा शुद्ध शिल्पजीत का सेवन अरणी की छाल के क्वाथ ( काढ़ा ) के साथ बहुत समय तक करना चाहिए।

विडंगदि योग—वायविडंग, सोठ, जौबार अथवा कोई भी क्षार, कालायस भस्म, जौ का चूर्ण और आँवला का चूर्ण—इन सबको मधु के साथ मिलाकर सेवन करने से अतिस्यूलता का विनाश होता है ॥ २१-२४ ॥

व्योषकद्रवीराशिगुविडङ्गातिविषास्थिराः । हिङ्गुसौवर्चलाजाजीयवानीधात्यचित्रकाः ॥ २५ ॥

निशे बृहत्यौ हृपुषा पाठा मूलं च केम्बुकात् । एषां चूर्णं मधु घृतं तैलं च सद्रशांशकम् ॥

सक्तुभिः षोडशगुणैर्युक्तं पीतं निहन्ति तत् । अतिस्यौल्यादिकान् सर्वान् रोगानन्यांश्च तद्विधान् ॥

हृद्दोषकामलाधित्रवशसाकासगलग्रहान् । बुद्धिमेधास्मृतिकरं सन्नस्याग्रेष्ठं दीपनम् ॥ २८ ॥

व्योषादि योग-फलश्रुति—व्योष ( सोठ, मरिच, पीपल ), कट्बी ( कुटकी ), वरा ( हरड, बहेड़ा, आँवला ), सहजन के बीज, वायविडंग, अतीस, शाल्मणी, हींग, सोचरनमक, जीरा, अजवाइन, धनियां,

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सूत्रस्थानम्

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चीता, हल्दी, दाहहल्दी की छाल, कण्टकारी, वनभण्टा, हपुषा, पाठा और करेम् की जड़—इन सब द्रव्यों का कपडछन किया हुआ समानभाग चूर्ण १ तोला; मधु, घृत तथा तिलतैल १-१ तोला और जी का सत् १६ तोला लेकर भलीभाँति मिलाकर जल में घोलकर प्रतिदिन पीना चाहिए। इसका सेवन अतिस्थूलता आदि रोगों तथा सन्तर्पण सेवन के कारण उत्पन्न होने वाले और इस प्रकार के अन्य रोगों को नष्ट करता है। हृद्दोग, कामला, श्वेतत्र, श्वास, कास तथा गल्यह ( देखें—च.सू. १८१२ ) रोगों को नष्ट करता है। बुद्धि, मेधा तथा स्मृतिवर्धक एवं मन्द अग्नि को प्रदीप्त करता है ॥ २५-२८ ॥

अतिकार्श्य भ्रमः कासस्तुष्णाधिक्यमरोचकः। स्नेहाग्निनिद्रादृक्श्रोत्रशुक्रौजःशुक्त्वरक्षयः ॥ बस्तिहृन्मूर्ध्निजङ्घोरुत्रिकपाश्चरुजा ज्वरः। प्रलापोर्ध्वानिलग्लानिच्छर्द्विपर्वास्थिभेदनम् ॥ वर्चोमूत्रग्रहाद्याश्च जायन्तेऽतिबिलङ्कृतात्।

कुशता आदि रोग—अधिक लंघन अथवा अधिक अपतर्पण करने से अधिक कुशता, भ्रम ( चक्करों ) का आना, कास, प्यास का अधिक लगना तथा भोजन के प्रति अरुचि का होना—ये लक्षण होते हैं। स्नेह, जठराग्नि, निद्रा, दुष्टि, श्रोत्र, शुक्र, ओजस, भूख तथा स्वर का क्षय हो जाता है। बस्ति ( मूत्राशय ), हृदय, मूर्धा, जंघा, ऊरु, त्रिक ( स्फिकसन्ध्याः पृष्ठवशास्थन्योः सन्धिस्तत् त्रिक मतम् ) तथा पसलियों में पीड़ा, ज्वर, प्रलाप, ऊपर की ओर को वातदोष का प्रकोप होना, ग्लानि ( हर्षक्षय ), वमन, पर्वा ( पोरों ) तथा अस्थियों में फटने की-सी पीड़ा का होना, मल एवं मूत्र की प्रवृत्ति में रुकावट आदि विकार अधिक लंघन करने से हो जाते हैं ॥ २९-३० ॥

काश्यमेव वरं स्थौल्यात् न हि स्थूलस्य भेषजम् ॥ ३१ ॥ बृंहणं लङ्घनं वाऽलमतिमेदोऽग्निवातजित्।

स्थूलता से कुशता श्रेष्ठ—स्थूल होने से कुश होना अच्छा है, क्योंकि स्थूलता की कोई सरल चिकित्सा नहीं है। क्योंकि स्थूलता रोग में मेदोधातु, जठराग्नि एवं वातदोष अधिक बढ़ जाते हैं, इनको घटाने ( कम करने ) के लिए न बृंहण-चिकित्सा ही समर्थ है और न लंघन ही समर्थ हैं ॥ ३१ ॥

बलव्य—चरक ने स्थौल्य के सम्बन्ध में विचार करते हुए कहा है—‘स्थौल्यकाश्यं वरं काश्यं समोप-करणो हितो’। ( च.सू. २१।१७ ) अर्थात् स्थूल पुरुष की सद्यःफलदायक कोई चिकित्सा नहीं है। देखें—यदि जठराग्नि और बढ़े हुए वातदोष की शान्ति के लिए हम सन्तर्पण द्रव्यों का प्रयोग करते हैं, तो इससे मेदोधातु अधिक बढ़ जायेगा। यदि हम अपतर्पण-चिकित्सा करते हैं तो यह मेदस्वी पुरुष उसे सहन नहीं कर सकता, अतएव कहा गया है—‘स्थूल होने की अपेक्षा कुश होना ही अच्छा है’। कुश रोगी को यथास्थिति में लाना सरल है, स्थूल को अपेक्षाकृत कुश करना कठिन होता है। यह अपने लिए तथा दूसरों के लिए बोझ होने के साथ-ही-साथ भूषार भी होता है। इसलिए चरक ने इसकी गणना ‘अष्टौ निन्दितौयाध्यायं’ में की है। तथापि इनकी चिकित्सा का वर्णन इसी के आगे किया जा रहा है।

मधुरस्निग्धसौहित्यैर्यत्सीस्थेन च नश्यति ॥ ३२ ॥ क्रशिमा स्थविमाऽत्यन्तविपरीतनिषेवर्णः।

कुशता-चिकित्सा—मधुर तथा घी-तेल से बने हुए आहारों को सदा भरपेट खाते रहने से तथा सुखमय जीवन बिताने से कुशता दूर हो जाती है।

स्थूलता-चिकित्सा—स्थूलता जिन कारणों से उत्पन्न हुई है, उनके सर्वथा विपरीत आहार-विहारों का चिरकाल तक सेवन करने से दूर की जा सकती है। इसी को आयुर्वेदशास्त्र ने ‘निदान-परिजन’ चिकित्सा भी कहा है ॥ ३२ ॥

योजयेद्वृंहणं तत्र सर्वं पानात्रभेषजम् ॥ ३३ ॥

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अष्टाङ्गहृदये

कृशता-चिकित्सा—इसमें पान ( पेय—दूध आदि ), अन्न ( आहार—स्निग्ध पदार्थ, खीर अथवा मांस आदि ) तथा भेषज ( असगन्ध आदि ) बृंहण पदार्थों का नियमित सेवन करे ॥ ३३ ॥

अचिन्तया हर्षणेन ध्रुवं सन्तर्पणेन च । स्वप्नप्रसङ्गान्नच कृशो वराह इव पुष्यति ॥ ३४ ॥

चिन्ता ( सोच-फिकर ) न करने से, प्रसन्न रहने से, सन्तर्पण पदार्थों का निरन्तर सेवन करते रहने से और अधिक सोने से कृश मनुष्य सूअर की भाँति मोटा हो जाता है ॥ ३४ ॥

न हि मांससमं किञ्चिदव्यदेहबृहत्त्वकृतं । मांसादमांसं मांसेन सम्भूतत्वाद्दिशेषतः ॥ ३५ ॥

मांस की महत्ता—बृंहण ( सन्तर्पण ) कारक द्रव्यों में मांस के समान ऐसा कोई द्रव्य नहीं है, जो शरीर को शीघ्र मोटा कर सके। उसमें भी कच्चा मांस को खाने वाले प्राणियों का अपना मांस भी मांस को खाने के कारण ही मोटा होता है, अतः इस प्रकार के प्राणियों का मांस और भी अधिक मांसवर्धक होता है ॥ ३५ ॥

गुरु चातर्पणं स्थूले विपरीतं हितं कृशे । यवगोधूममुभयोस्तद्योग्याहितकल्पनम् ॥ ३६ ॥

स्थूलता एवं कृशता की चिकित्सा—स्थूलता में गुरु ( देर में पचने वाले ) पदार्थों का आधा पेट भोजन करना हितकारक होता है और कृशता में लघु पदार्थों का सन्तर्पण ( भरपेट खाना ) लाभकर होता है। जो तथा गेहूँ के विविध पदार्थों की स्थूल एवं कृश के योग्य कल्पना करके दिये गये आहार दोनों के लिए लाभदायक होते हैं ॥ ३६ ॥

वक्तव्य—यद्यपि चाणक्य ने कहा है कि—‘मांसान्मांसं प्रवर्धते’। यह सत्य है, परन्तु निरामिषभोजी समाज भी स्वस्थ, हृष्ट-पुष्ट देखा जाता है और निरामिषभोजी आमिषभोजियों की अपेक्षा आध्यात्मिक दृष्टि से अधिक सुखी जीवन बिताते हैं।

भगवान् पुनर्वसु ने जो लंघन तथा बृंहण की परिभाषा दी है, वह अत्यन्त निष्प्रान्त है। देखें—‘यत् किञ्चिल्लाघवकरं देहे तल्लङ्घनं स्मृतम्। बृहत्वं यच्छरीरस्य जनयेत् तच्च लङ्घनम्’ ॥ ( व.सू. २२।१ ) अर्थात् जो आहार-विहार तथा औषधोपचार शरीर में हलकापन उत्पन्न करता है, उसे लंघन कहते हैं और जो गुरुता ( भारीपन ) पैदा करता है, उसे ‘बृंहण’ कहते हैं।

दोषगत्याऽतिरिच्यन्ते ग्राहिभेद्यादिभेदतः । उपक्रमं न ते द्वित्वाद्भिन्ना अपि गदा इव ॥ ३७ ॥

इति श्रीवैद्यपतिसिंहगुप्तसूनुश्रीमद्वाग्भटविरचितायामष्टाङ्गहृदयसंहितायां प्रथमे सूत्रस्थाने द्विविधोपक्रमणीयं नाम चतुर्दशोऽध्यायः ॥ १४ ॥


यद्यपि दोषों की गतिभेद के अनुसार ग्राही एवं भेदी आदि भेदों से चिकित्सा के भी अनेक भेद होते हैं और तदनुसार उनकी व्यवस्था भी की जाती है; फिर भी वे सभी चिकित्सा सम्बन्धी भेद सन्तर्पण एवं अपतर्पण के भीतर उसी प्रकार आ जाते हैं जैसे रोगों के अनेक भेद होने पर भी वे साम तथा निराम भेद से दो प्रकार के ही होते हैं ॥ ३७ ॥

इस प्रकार वैद्यरत्न पण्डित तारादत्त त्रिपाठी के पुत्र डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी द्वारा विरचित निर्मला हिन्दी व्याख्या, विशेष वक्तव्य आदि से विभूषित अष्टाङ्गहृदय-सूत्रस्थान में द्विविधोपक्रमणीय नामक चौदहवाँ अध्याय समाप्त ॥ १४ ॥


पञ्चदशोऽध्यायः

अथातः शोधनादिगणसङ्ग्रहमध्यायं व्याख्यास्यामः ।

इति ह स्माहुरात्रेयादयो महर्षयः ।

अब हम यहाँ से शोधनादिगणसंग्रह नामक अध्याय की व्याख्या करेंगे। जैसा कि आत्रेय आदि महर्षियों ने कहा था।

उपक्रम—द्विविधोपक्रमणीय नामक अध्याय का वर्णन करने के बाद अब यहाँ से शोधनादिगणसंग्रह नामक अध्याय का आरम्भ किया जा रहा है। इसके पूर्व अध्याय में अनेक प्रकार की चिकित्सा-विधियों का वर्णन सूत्र रूप में किया गया था। अब इस प्रकरण में शोधन आदि कर्म के उपयोगी औषधगणों के संग्रह की चर्चा की जायेगी।

संक्षिप्त सन्दर्भ-संकेत—ज.सू. ४; सु.सू. ३७, ३८, ३९ एवं अ.सं.सू. १४, १५, १६ में देखें।

मदनमधुकलम्बानिम्बविम्बोविशालात्रपुसकुटजमूवदिवदालीकुमिन्म ।

विदुलदहनचित्राः कोशवत्यौ करजः कणलवणवचैलासर्पपाञ्चर्दनानि ॥ १ ॥

वमनकारक द्रव्य—मैनफल, मुलेठी, लम्बा ( कटुमुम्बी ), निम्ब ( नीम ), विम्बो ( कड़वी तुण्डिकेरी ), इन्द्रायण, त्रपुस ( काली निशोध, अन्यत्र खीरा ), कुटज, मूर्वा, देवदाली ( बन्दालडोडा ), वायविडंग, जलवैतस, चित्रक, कडुआ परबल, कोशातकी, राजकोशातकी, करज, पिपली, लवण, बालवच, इलायची तथा सफेद ( पीली ) सरसों ॥ १ ॥

वक्तव्य—ऊपर निर्दिष्ट औषधद्रव्यों को वमनकारक कहा गया है, किन्तु इनमें कतिपय द्रव्य ऐसे हैं, जिनके स्वतन्त्र गुण वामक नहीं हैं। जैसे—मधुक ( मुलेठी ), एला ( इलायची ) तथा त्रपुस का अर्थ जिन्होंने 'खीरा' किया है, वह भी। इसके बाद एक प्रकाश की किरण दिखलायी पड़ी, वह है—सुश्रुत की अमुतोपम वाणी—'समस्तं वर्गमर्धं वा यथालभमथापि वा। प्रपुञ्जीत भिषक् प्राज्ञो यथोद्दिष्टेषु कर्मसु' ॥ ( सु.सू. ३७।३४ ) अर्थ स्पष्ट है। इस गण में कहे गये द्रव्यों के स्वतन्त्र गुणों के विवेचन की आवश्यकता नहीं पड़ती, अपितु इनका प्रयोग मिलाकर किया जाता है, क्योंकि यह सुश्रुत का सिद्धान्त-वाक्य मिश्रक वर्ग का है। मदनद्रव्य वमनकारक द्रव्यों में अग्रणी है, अतएव इस गण में उसकी सर्वप्रथम गणना की गयी है।

निकुम्भकुम्भत्रिफलागवाक्षीस्तुक्शङ्खिनीनोलितितिल्कानि ।

शम्याककम्पिलकहेमदुधा दुग्धं च मूत्रं च विरेचनानि ॥ २ ॥

विरेचनकारक द्रव्य—दन्ती ( जमालगोटा ) की जड़, निसोत की जड़, त्रिफला, इन्द्रायण की जड़, थूहर का दूध, शंखिनी, नील के बीज, तिल्क ( लोघ की छाल ), अमलतास की गुद्दी, कबीला, स्वर्णक्षीरी, दूध तथा मूत्र ( गोमूत्र ) आदि द्रव्य विरेचक होते हैं ॥ २ ॥

वक्तव्य—'तिल्कस्यककाम्पिल्यकपाटलीत्वकः' । ( अ.सं.सू. १४३ ) उक्त विषय को अ.हू.सू. १५।२ में देखें। बुद्धवाग्भट ने कबीला की त्वचा का प्रयोग विरेचनार्थ लेने का निर्देश दिया है, उस विषय का संशोधन हृदय में किया गया है। इसका ग्राह्य अंग सामान्य रूप से फलरज है। इसकी त्वचा का प्रयोग कुष्ठ में किया जाता है। परिचय—'इष्टिकाचूर्णसङ्काशः चन्द्रिकाढ्योऽल्परेचनः । सौराष्ट्रदेशे वृक्षस्य फलरेचुः कपिलकः' ॥ देखें—शिवदत्त-निघण्टु। इतना होने पर भी बुद्धवाग्भट का निर्देश परीक्षणीय है।

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अष्टाङ्गहृदये

मदनकुटजकुच्छदेवदालीमधुकवचादशमूलदारुशस्ताः । यवमिशिकृतवेधनं कुल्ल्या मधु लवणं त्रिवृता निरुहणानि ॥ ३ ॥

निरुहणोपयोगी द्रव्य—मैनफल, कुटज की छाल, कूठ, बन्दालडोडा, मुलेठी, बालवच, दशमूल (दोनों पञ्चमूल), देवदारु, रासना, जौ, सौफ या सोया, कृतवेधन (धामार्गव तरोई), कुल्ल्या के बीज, मधु, लवण और निसोत—इन द्रव्यों का उपयोग निरुहणवस्ति के लिए करना चाहिए ॥ ३ ॥

वेल्लापामार्गव्योषदाबीसुराला बीजं शैरीषं बाहृतं शैग्रवं च । सारो माधूकः सैन्धवं ताभ्यंशैलं त्रुट्यौ पृथ्वीका शोधयन्त्युत्तमाङ्गम् ॥ ४ ॥

शिरोविरिचनोपयोगी द्रव्य—वायविंडंग, अपामार्ग, व्योष (सोत, मरिच, पीपल), दारुहल्दी, सफेद राल, सिरौष के बीज, वनभण्टा के बीज, सहजन के बीज, महुआ का सार, संधानमक, ताभ्यंशैल (सूखा रसाञ्जन), छोटी तथा बड़ी इलायची और पृथ्वीका (हिंगुपत्री)—ये द्रव्य शिरोविरिचक होते हैं। ये रूक्ष विरिचक द्रव्य हैं। इनकी नस्य देने से सिर के भीतर जमा हुआ कफ बाहर निकल आता है ॥ ४ ॥

भद्रदारु नतं कुच्छं दशमूलं बलाद्रयम् । वायुं वीतरदिदश्च विदार्पादिश्च नाशयेत् ॥ ५ ॥

वातनाशक द्रव्य—देवदारु, तगर, कूठ, दशमूल (दोनों पञ्चमूल), बला, अतिबला, वीरतर आदि गण (आगे २४वाँ श्लोक देखें) तथा विदार्पादि गण (आगे ९-१०वाँ श्लोक देखें) ये द्रव्य वातनाशक हैं ॥ ५ ॥

दूर्वाऽनन्ता निम्बवासाऽस्तमगुप्ता गुन्दाऽभीरः शीतपाकी प्रियङ्गुः । न्यग्रोधादिः पद्मकादिः स्थिरे द्वे पद्यं वयं सारिवादिश्च पित्तम् ॥ ६ ॥

पित्तनाशक द्रव्य—दूब, जवासा, नीम, अहूसा, केबीच, गुन्दा (पटेरक), शतावरो, शीतपाकी (काकण्तिका-भेद), प्रियंगु (श्यामा), न्यग्रोधादि गण (श्लोक ४१), पद्मकादि गण (श्लोक १२), शालपर्णी, पुष्टपर्णी, कमल, नागरमोथा तथा सारिवादि गण (श्लोक ११)—इनका सेवन पित्तदोषनाशक होता है ॥ ६ ॥

आरुण्वाधिरकादिर्मुष्ककाद्योऽसनादिकः । सुरसादिः समुस्तादिवत्सकादिवल्लासजित् ॥ ७ ॥

कफनाशक द्रव्य—आरुण्वादि गण (श्लोक १७), अर्कादि गण (श्लोक २८), मुष्ककादि गण (श्लोक ३२), असनादि गण (श्लोक १९), सुरसादि गण (पद्य ३०), मुस्तादि गण (पद्य ४०) एवं वत्सकादि गण (पद्य ३३) इन गणों में वर्णित द्रव्य कफनाशक होते हैं ॥ ७ ॥

जीवन्ती काकोल्यौ मेदे द्वे मूद्रमाषपर्ण्यां च । ऋषभकजीवकमधुकं चेति गणो जीवनीयाख्यः ॥

जीवनीय गण—जीवन्ती, काकोली, क्षीरकाकोली, मेदा, महामेदा, मुदगपर्णी, माषपर्णी, ऋषभक, जीवक तथा मुलेठी—ये दस द्रव्य जीवनी शक्ति को बढ़ाने वाले हैं ॥ ८ ॥

विदारिपञ्चाङ्गुलवृश्चिकालीवृश्रोवदेवाहृष्यूर्पण्यः ।

कण्डूकरी जीवनहृत्संज्ञे द्वे पञ्चके गोपसुता त्रिपादा ॥ ९ ॥

विदार्पादिरयं हृद्यो बृंहणो वातपित्तहा । शोषगुल्माङ्गमर्दोर्वश्वसासकसहरो गणः ॥ १० ॥

विदार्पादि गण—विदारीकन्द, एरण्ड, मेडासिंगी, पुनर्वा, देवदारु, मुदगपर्णी, माषपर्णी, केबीच, जीवनपञ्चमूल (अ.हृ.सू. ६।१७०), लघुपञ्चमूल (अ.हृ.सू. ६।१६९), सारिवा तथा हंसराज—ये द्रव्य विदार्पादिगण के कहे गये हैं। यह गण हृदय के लिए हितकर, शरीर को पुष्ट करने वाला, वात तथा पित्त-दोषनाशक, शोष, गुल्म, अंगमर्द, ऊर्ध्वश्वस तथा कास रोगों का विनाशक है ॥ ९-१० ॥

सारिवोशरीरकाश्मर्यमधुकशशिश्चिरद्वयम् । यष्टौ परुषकं हन्ति बाहृपिताम्रतृङ्खरान् ॥ ११ ॥

शोधनादिगणसङ्ग्रहाध्यायः १५ ]

सूत्रस्थानम्

११९

सारिवादि गण—सारिवा, खस, सम्भार, महुआ, सफेदचन्दन, लालचन्दन, मुलेठी तथा फालसा—ये द्रव्य सारिवादि गण के हैं। इन द्रव्यों का प्रयोग करने से दाह, पित्तज रोग, रक्तज रोग, तुषा (प्यास) तथा ज्वर का नाश हो जाता है ॥ ११ ॥

पञ्चकपुष्पौ वृद्धितुगर्धः शुद्धयमृता दश जीवनसंज्ञाः ।

स्तन्यकरा धन्तरीणपित्तं प्रीणनजीवनबहुणवृष्याः ॥ १२ ॥

पञ्चादि गण—पञ्चाकण्ठ, पुष्प (प्रपीण्डरीक), वृद्धि (महाश्रावणी), वंशलोचन, कृद्धि, काकडसिंगी, गुरुच तथा जीवनीय गण के दस द्रव्य (देखें—परा ८वीं)—इसे पञ्चादि गण कहते हैं। यह दूध को बढ़ाता है, वातज, पित्तज रोगों को नष्ट करता है, तृप्तिकारक है, जीवनीय शक्ति को बढ़ाता है, शरीर को पुष्ट करता है तथा वीर्यवर्धक है ॥ १२ ॥

परुषकं वरा द्राक्षा कटफलं कतकात् फलम् । राजाहं दाडिमं शाकं तृणमृत्रामयवातजित् ॥ १३ ॥

परुषकादि गण—फालसा, त्रिफला, दाख या मुनक्का, कायफल (काफल), निर्मली के बीज, खिरनी के फल, दाडिम (अनार) तथा सागवान के फल—इनका प्रयोग प्यास लगाने में, मूत्रज तथा वातज विकारों का शमन करता है ॥ १३ ॥

अञ्जनं फलिनी मांसी पद्योत्पलसाञ्जनम् । सैलामधुकनागाहं विषान्तर्दाहपित्तनूत् ॥ १४ ॥

अञ्जनादि गण—काला सुरमा, सफेद सुरमा (इन दोनों को प्रोतोज्जन तथा सौवीराञ्जन भी कहते हैं), फलिनी (प्रियंगु), जटामांसी, कमल, नीलकमल, रसवत, बड़ी इलायची, मुलेठी और नागकेसर—इनका प्रयोग विषविकार, अन्तर्दाह (भीतरी जलन) तथा पित्तविकारों का शमन करता है ॥ १४ ॥

पटोलकटुरोहिणीचन्दनं मधुस्रवगुड्डीचपाठान्वितम् ।

निहन्ति कफपित्तकुष्ठज्वरान् विषं वमिमरोचकं कामलाम् ॥ १५ ॥

पटोलादि गण—परबल, कुटकी, सफेदचन्दन, मधुस्रव (सुरंगी), गुरुच तथा पाठा—यह गण कफज रोग, पित्तज रोग, कुष्ठरोग, ज्वर, विषविकार, वमन, अरोचक तथा कामला रोगों का शमन करता है ॥ १५ ॥

वक्तव्य—मधुस्रव शब्द के 'वैद्यकशब्दसिन्धु' में अनेक पर्याय इस प्रकार मिलते हैं—मधुक वृक्ष, मोरटलता, मूर्वा, चोरमूर्वा, हंसपदी, पिण्डबजूर का वृक्ष, जीवन्ती, मधुयष्टि, जटामांसी, लाल लज्जालु।

गुड्डीचपद्यकारिष्टधानकारक्तचन्दनम् । पित्तन्तेष्पज्वरच्छद्विदाहतुष्णाधन्मग्निकृत् ॥ १६ ॥

गुड्डीयादि गण—गुरुच, पथकाष्ठ, नीम की छाल, धनियाँ तथा लालचन्दन—यह गण पित्तज विकार, कफज विकार, ज्वर, वमन, दाह, प्यास का लगाना; इन विकारों को दूर करता है एवं जठराग्नि को प्रज्वलित करता है ॥ १६ ॥

आरग्वधैन्द्रयवपाटलिकाकित्तिकानिम्बाभूतामधुरसास्रववृक्षपाठाः ।

भूनिम्बसैर्यकपटोलकरञ्जयुष्मसत्तच्छदाग्निमुषवीफलबाणघोण्टाः ॥ १७ ॥

आरग्वधादिर्जयति छद्विकुष्ठविषज्वरान् । कफं कण्डू प्रमेहं च दुष्टव्रणविशोधनः ॥ १८ ॥

आरग्वधादि गण—अमलतास, इन्द्रजी (कुटजबीज), पादूल, करंज, नीम, गुरुच, मूर्वा, सुवृक्ष (या सुवतह—विकेकत वृक्ष), पाठा, चिरायता, कटसैर्या, परबल, लताकरंज, करंज (कजू या डिठोरी), छतिवन, चित्रक, कलौजी, मैनफल, सहचर तथा सुपारी; यह गण वमन, कुष्ठ, विषविकार, ज्वर, कफज रोग, खुजली तथा प्रमेहरोग को नष्ट करता है एवं दूषित व्रण को शुद्ध करता है ॥ १७-१८ ॥

असतनतिनिशभूजैवेतवाहप्रकीर्याः खदिरकदरभण्डशिंशिपामेषशुद्ध्याः ।

त्रिहिमतलपलाशा जोद्धकः शाकशाली क्रमुकधवकलिङ्गच्छागकर्णाश्रकर्णाः ॥ १९ ॥

२००

अष्टाङ्गहृदये

असनादिविजयते भित्रकुष्ठकफक्रिमीन्। पाण्डुरोगं प्रमेहं च मेदोदोषनिबर्हणः ॥ २० ॥

असनादि गण—विजयसार, तिनिश, भोजपत्र, अर्जुन, डिठोरी, बैरसार, श्वेतसार, सिरस, शीशम, मेदासिंगी, सफेदचन्दन, लालचन्दन, दारुहल्दी, ताड़, पलाश, अगुह, सागवान, सालवृक्ष, सुपारी, धव, इन्द्रजी, अजकर्ण एवं अश्चकर्ण—यह गण शिवत्र ( सफेद कोढ़ ), कुष्ठरोग, कफज रोग, क्रिमिरोग, पाण्डुरोग, प्रमेह तथा मेदोदोष ( मोटापा ) इन विकारों को नष्ट करता है ॥ १९-२० ॥

वरुणसैर्यक्युभ्यश्चातावरोदहनमोरटबिल्वविषाणिकाः ।

द्विवृहतीद्विकरञ्जयाद्र्यं बहूलपल्लवदर्भरुजाकराः ॥ २१ ॥

वरुणादिः कफं मेदो मन्दाग्नित्वं नियच्छति। आद्यवार्तां शिरःशूलं गुल्मं चान्तः सविद्रधिम् ॥

वरुणादि गण—वरुण ( वरना ), लाल फूल वाली कटसरेया, सफेद फूल वाली कटसरेया, शतावर, चित्रक, मूर्वा, बेल, काकड़ासिंगी, कण्टकारी, वनभण्टा, करंज, पूतिकरंज, अरणी, हँरें, सहजन, दर्भ ( कुशभेद ) तथा रुजाकर ( हिन्ताल )—यह गण कफज विकार, मेदोविकार, मन्दाग्नि, ऊरुस्तम्भ, शिरःशूल, गुल्मविकार तथा विद्रधि ( भीतर की ओर मुँह वाला फोड़ा ) को नष्ट करता है ॥ २१-२२ ॥

ऊषकस्तुत्युत्कं हिङ्गु कासीसद्वयसैन्धवम्। सशिलाजतु कुन्तूशमगुल्ममेदःकफापहम् ॥ २३ ॥

ऊषकादि गण—ऊषक ( कल्लर ), तूतिया ( औषध-प्रयोग में इसे भूत कर लिया जाता है ), हाँग, हरा कासीस, संधानमक तथा शिलाजीत—यह गण मूत्रकुन्तु, अश्मरी ( पथरी ), गुल्म, मेदोविकार एवं कफज विकार को शान्त करता है ॥ २३ ॥

वेल्तन्तरारणिकबूकवृषाशमभेदगोकण्टकेकटसहाचरबाणकाशाः ।

वृक्षादनीनलकुशद्वयगुण्टगुन्दाभल्लूकमोरटकुरण्टकरम्भपार्थः ॥ २४ ॥

वर्गां वीरतराद्योऽयं हन्ति वातकृतान् गदान्। अश्मरीशर्करामूत्रकुन्तूशघातरुजाहरः ॥ २५ ॥

वीरतरादि गण—वीरतरु, अग्निमन्य ( अरणि ), बूक ( ईश्वरमलिका ), अडूसा, पाषाणभेद, गोखरु, इत्कर, सहचर, बाण ( नीले फूल वाली कटसरेया ), काश, वन्दा, नलसर ( नरकट ), कुश, दर्भ ( डाभ ), गुण्ट ( कुन्ड्र ), गुन्दा ( पटेरक ), भल्लूक ( सोनापाठा ), मोरट ( क्षीरमोरट ), कुरण्ट ( सिलियारा ), करम्भ ( उत्तम अरणि ) और पार्थ ( सुवर्चला—हलुडल )—यह गण वातज विकारों, अश्मरी ( पथरी ), शर्करा, मूत्रकुन्तु तथा मूत्राघात की पीड़ा का शमन करता है ॥ २४-२५ ॥

रोधश्राबरकरोधपलाशा जिङ्गिणीसरलकटफलयुक्ताः ।

कृत्सिताम्बकदलीगत्तशोकाः सैलवालुपरिपैलवमोचाः ॥ २६ ॥

एष रोधादिको नाम मेदःकफहरो गणः। योनिदोषहरः स्तम्भी वण्यौ विषविनाशनः ॥ २७ ॥

रोधादि गण—लोघ, पठानीलोघ, पलाश, जिगिणी ( काला सेमल ), सरल ( चौड़ वृक्ष ), कायफल, रासना, कदम्ब, केला, अशोक, ऐलवालुक, मोथा एवं मोच ( सलई )—यह गण मेदोदोष, कफज रोग, योनिविकारनाशक, मलस्तम्भक, वर्ण को उज्ज्वल करने वाला तथा विषविकार को नष्ट करता है ॥ २६-२७ ॥

अकालिकां नागदन्ती विशल्या भाङ्गीं रास्ता वृश्चिकाली प्रकीर्या ।

प्रत्यक्पुष्पी पीततैलोदकीर्या श्वेतायुग्मे तापसानां च वृक्षः ॥ २८ ॥

अयमर्कादिको वर्गः कफमेदोविषापहः। कृमिकुष्ठप्रशमनो विशेषाद्वन्नशोधनः ॥ २९ ॥

अर्कादि गण—आक ( मदार ), अलर्क ( सफेद फूल वाला मदार ), नागदमन, कलिहारी, भारंगी, रासना, ऊंटकटारा, करंज, अपामार्ग ( चिरचिटा ), मालकाँगुनी, डिठौरी, दोनों श्वेता ( किणही, पालिन्दी ) तथा तापसवृक्ष ( इंगुदी )—यह गण कफज विकार, मेदोरोग, विषविकार, क्रिमिरोग तथा कुष्ठरोग नाशक है; विशेष करके यह दुष्टव्रणों का शोधक है ॥ २८-२९ ॥

शोधनादिगणसङ्ग्रहाध्यायः १५ ]

सूत्रस्थानम्

२०१

सुरसयुगफणिज्जं कालमाला विडङ्गं खरबुसवृषकर्णीकटुफलं कासमर्दः।

क्ष्वकसरसिभाङ्गीर्कामुर्काः काकमाची कुलहलविषमुष्टीभूस्तुणो भूतकेशी ॥ ३० ॥

सुरसादिर्गणः श्लेष्मसेदःकृमिनिवृदनः। प्रतिश्यायाहृचिश्वासकासज्ज्ञो ब्रणशोधनः ॥ ३१ ॥

सुरसादि गण—सफेद तुलसी, काली तुलसी, मरुवा, कालमाला (कुटेरक), वायविंडा, खरबुस (तुलसी), मूसाकर्णी, कायफल, कासमर्द (कसौंदी), नकछिंकनी, जलधनियाँ, भारंगी, कामुका (रक्तमंजरी), मकोय या गुडफला, कुलहल (भूकदम्ब), कुचिला, सुरगन्धितुण तथा जटामांसी—यह गण कफज विकार, मेदोरोग, क्रिमिज रोग, प्रतिश्याय, भोजन के प्रति अरुचि, श्वास एवं कास रोग का शमन करता है; विशेषकर यह ब्रणशोधक होता है ॥ ३०-३१ ॥

मुष्ककस्तुग्ग्वराद्वीपिलाशधवशिंशिपाः। गुल्ममेहाशमरीपाण्डुमेदोशःकफशुक्रजित् ॥ ३२ ॥

मुष्ककादि गण—मोखा, सेहुण्ड, त्रिफला, चित्रक, पलाश, धव तथा शीशम—यह गण गुल्म, प्रमेह, अशमरी (पथरी), पाण्डुरोग, मेदोरोग, बवासीर, कफज विकार एवं शुक्र (वीर्य) सम्बन्धी दोषों को दूर करता है ॥ ३२ ॥

वत्सकमूर्वाभाङ्गीकटुका मरीचं घुणप्रिया च गण्डीरम्।

एला पाठाऽजाजी कदङ्गफलजमोदसिद्धार्थवचाः ॥ ३३ ॥

जीरकहिङ्गुविडङ्गं पशुगन्धा पञ्चकोलकं हन्ति। चलकफमेदःपीनसगुल्मज्वरशूलदुर्नात्मः ॥

वत्सकादि गण—कुटज, मूर्वा, भारंगी, कुटकी, कालीमरिच, अतीस, धूर, इलायची, पाठा, जीरा, सोनापाठा, मैनफल, अजवाइन, पीली सरसों, बालवच, कालाजीरा, हाँग, वायविंडा, अजमोद और पंचकोल (पीपल, पीपलामूल, चब्य, चित्रक तथा सोठ)—यह गण वातज विकार, कफज विकार, मेदोरोग, पीनस, गुल्म, ज्वर, शूल एवं बवासीर रोगों को नष्ट करता है ॥ ३३-३४ ॥

बचाजलददेवाह्वानगरातिविषाभयाः। हरिद्राद्रव्ययष्टघ्राहकलशीकुटजोद्भवः ॥ ३५ ॥

बचाहरिद्रादिगणावामातीसारनाशनी। मेदःकफादघपवनस्तन्यदोषनिबर्हणो ॥ ३६ ॥

बचादि गण—बालवच, नागरमोथा, देवदारु, सोठ, अतीस तथा हरीतकी (हरड या हरै)।

हरिद्रादि गण—हल्दी, दाहहल्दी (किरमोड़ा की छाल), मुलहठी, पुष्टपर्णी तथा इन्द्रजी।

उक्त दोनों गण के ये द्रव्य आमातिसार, मेदोरोग, कफजरोग, आढ्यवात (ऊरुस्तम्भ) एवं स्तन्यदोषों को नष्ट करते हैं ॥ ३५-३६ ॥

प्रियङ्गुपुष्पाञ्जनयुग्मपद्याः पद्याद्रजो योजनवल्लघनन्ता।

मानद्वमो मोचरसः समङ्गा पुत्रागशतीं मदनीयेतुः ॥ ३७ ॥

अम्बछा मधुकं नमस्कारी नन्दीवृक्षपलाशकच्छुराः।

रोधं धातकिबिल्वपेशिके कदङ्गः कमलोद्भवं रजः ॥ ३८ ॥

गणो प्रियङ्गुवम्बच्छादी पक्वातीसारनाशनी। सन्धानीयो हितो पिते ब्रणानामपि रोपणी ॥ ३९ ॥

प्रियंग्वादि गण—प्रियंगु (गोदनी) या प्रियंगुपुष्प (प्रियंगु के फूल), पुष्प (जस्ता का लावा या फूल, जिसे जयपुरी सफेदा भी कहते हैं), अञ्जनयुग्म (काला तथा सफेद सुरमा), पद्या (पद्मचारिणी), कमल का केसर, मजीठ, जवासा, सेमल, सेमल की गोद, नमस्कारी (लज्जावन्ती), नागकेशर, सफेदचन्दन तथा धाय के फूल।

अम्बछादि गण—अम्बछा (पाठा), मुलहठी, लज्जावन्ती, पारसपीपल, पलाश, धमासा, लोघ, धाय के फूल, बेल की गिरी, सोनापाठा एवं कमल का केसर।

२०२

अष्टाङ्गहृदये

उक्त दोनों गण पक्वातीसार को नष्ट करते हैं, अस्थिभंग को जोड़ते हैं, पित्तज विकारों में हितकर होते हैं तथा व्रणरोपण ( फोड़ा के घाव को भरने वाले ) होते हैं ॥ ३७-३९ ॥

मुस्तावचाग्निद्विनिशाद्वितित्ताभल्लातपाठात्रिफलाविषाख्याः ।

कुष्ठं वृटी हैमवती च योनिस्तन्यामयघ्ना मलपाचनाश्च ॥ ४० ॥

मुस्तादि गण—नागरमाथा, बालवच, चित्रक, हल्दी, दाहहल्दी, द्वितित्ता ( कुटकी, यवतित्ता ), भिलावा, पाठा, त्रिफला, विषाख्या ( अतिविषा = अतीस ), कूठ, इलायची तथा सफेद वच—यह गण योनिरोग तथा स्तन्यरोग को नष्ट करता है और यह मल का पाचन करता है ॥ ४० ॥

न्यग्रोधिपिप्लसदाफलरोधयुग्मं जम्बूद्वयार्जुनकपीतनसोमवलकाः ।

फक्षाप्रवजुलुपियाप्ललाशनन्दीकोलीकदम्बरिलामधुक् मधुकम् ॥ ४१ ॥

न्यग्रोधार्दिगणो व्रणः सङ्ग्राही भ्रम्रासधनः । मेदःपित्ताद्यतुद्वाहयोनिरोगनिबर्हणः ॥ ४१ ॥

न्यग्रोधादि गण—बरगद, पीपल, गूलर, लोघ, पठानीलोघ, जम्बूद्वय ( जामुन, कठजामुन ), अर्जुन, आमड़ा, कायफल ( काफल ), पाकर ( पिप्लन ), आम, वेत, चिरौजी, पलाश, पारसपीपल, बेर, कदम्बर, तेंदु, मुलेठी तथा महुआ—यह गण व्रण का शोधन एवं रोपण, ग्राही, टूटी हुई अस्थि को जोड़ने वाला, मेदोरोग, पित्तज रोग, रक्तविकार, तुषा, दाह तथा योनिरोगों का विनाशक है ॥ ४१-४२ ॥

एलायुग्मतुरुष्ककुष्ठफलिनीमांसीजलध्यामकं

स्पृक्काचोरकचोचपत्रतगरस्थोणेयजातीरसाः ।

शक्तिव्याघ्रनखोऽमराह्मगुहः श्रीवासकः कुङ्कुमं

चण्डागुग्गुलुदेवधूपखपुराः पुत्रागनागाहयम् ॥ ४३ ॥

एलादिको वातकफो विषं च विनियच्छति । वर्षणप्रसादनः कण्डूपिटिकाकोठनाशनः ॥ ४४ ॥

एलादि गण—एलायुग्म ( बड़ी इलायची, छोटी इलायची ), लोहवान या कुत्रिम गोद या रूमी मस्तगी, कूठ, गन्धप्रियंगु, जटामांसी, नेत्रबाला, सुगन्धितुण, स्पृक्का ( देवी ), ग्रन्थिपर्ण, दालचीनी, तेजपत्ता, तगर, धुनेर, बोल, सौप, नाबूना, देवदारु, अगुह, श्रीवासक ( गन्धाविरोजा ), केशर, चण्डा ( चोर नामक गन्धद्रव्य—वै.श.सि. ), गुग्गुल, राल, कुन्दरू, गोद, लाल नागकेसर तथा नागकेसर—यह गण वातज विकार, कफज विकार तथा विषज विकार को नष्ट करता है; वर्षण को स्वच्छ करता है, खुजली, पिडका तथा कौठ रोग को भी नष्ट करता है ॥ ४३-४४ ॥

श्यामादन्तीद्रवन्तीक्रमुककुटरणाशङ्खिनीचर्मसाहा-

स्वर्णधीरीगवाक्षीशखिरिजनकच्छिन्नरोहकारज्जाः ।

बस्तान्ती व्याधिघातो बहलबहुससतीक्ष्णवृक्षा फलानि

शयःमाद्यो हन्ति गुल्मं विषमश्चिकफो हृदुं मूत्रकृच्छ्रम् ॥ ४५ ॥

श्यामादि गण—काली निसोत, दन्ती ( जमाल्योटा ), द्रवन्ती ( मूसाकर्णी ), सुपारी, सफेद निसोत, यवतित्ता ( कालमेघ ), सातला, सत्यानाशो, इन्द्रायण, अपामार्क, कबीला, गुरुच, करंज, बस्तान्ती ( वृषगन्धा ), अमलतास, बहल ( बहुफल ), बहुस ( ईख ) तथा पीलु—यह गण गुल्मरोग, विषज विकार, भोजन के प्रति अरुचि, कफज विकार, हृदोग तथा मूत्रकृच्छ्ररोग को नष्ट करता है ॥ ४५ ॥

त्रयस्त्रिंशदिति प्रोक्ता वर्गस्तेषु त्वलाभतः । युज्यात्तद्विधमन्यच्च द्रव्यं जह्यादयौगिकम् ॥ ४६ ॥

द्रव्यग्रहण-निर्देश—यहाँ तक तैतीस द्रव्यवर्ग अर्थात् द्रव्यगण कहे गये हैं। इन गणों में परिगणित यदि कोई द्रव्य किसी कारण न मिल सके, तो वहाँ उसके समान गुण-धर्मों वाला दूसरा द्रव्य ले लेना

शोधनादिगणसङ्ग्रहाध्यायः १५ ]

सूत्रस्थानम्

२०३

चाहिए और यदि उस गण में कोई ऐसा द्रव्य हो जो रोग की दृष्टि से अयोग्य हो तो उसे निकाल देना चाहिए ॥ ४६ ॥

वक्तव्य —प्राचीन संहिताकारों ने इस प्रकार गणों का वर्णन कर मात्रा एवं दिशा निर्देश किया है। जो द्रव्य नहीं मिलता उसके स्थान पर प्रायः उसके समान गुण वाला द्रव्य लें। जो अनुपयोगी द्रव्य हो उसे हटा दें अथवा दूसरा कोई द्रव्य उपयोगी प्रतीत हो रहा हो तो उसे जोड़ दें। यह सब 'वृद्धवैद्योपदेशतः' अर्थात् उस-उस विषय में विशेष अनुभवों वैद्य को ही यहाँ 'वृद्ध' कहा है, न केवल आयु से बड़े को। इसकी चर्चा अत्यन्त भी की गयी है, जैसे—ज्यवनप्राश के निर्माण अष्टवर्ग में वैकल्पिक द्रव्यों का निर्देश मिलता है। इस मत का समर्थन भगवान् पुनर्वसु ने च.वि. ८।१४९ में किया है, इसका अवलोकन करें।

एते वर्गा द्रोषद्व्याघ्यपेक्ष्य कल्कक्वाथस्तेहेहादियुक्ताः।

पाने नत्येऽन्वासनेऽन्तर्बहिर्वा लेपाभ्यङ्गैर्जर्न्मिति रोगान् सुकृच्छ्रान् ॥ ४७ ॥

इति श्रीवैद्यपतिसिंहगुप्तसूत्रश्रीमद्वाग्भटविरचितायामष्टाङ्गहृदयसंहितायां

प्रथमे सूत्रस्थाने शोधनादिगणसङ्ग्रहो नाम पञ्चदशोऽध्यायः ॥ १५ ॥


प्रयोग-विधियाँ —इस अध्याय में कहे गये वर्गों (गणों) का वात आदि दोषों, रस-रक्त आदि द्रव्यों तथा मल-मूत्र आदि मलों के अनुरूप विचार करके इन्हें कल्क (चटनी), क्वाथ (काढ़ा), स्नेहपाक, लेह (अवलेह) आदि के रूप में तैयार करके पीने, सूँघने, अनुवासन तथा निरुह्ण बस्ति के रूप में भीतरी प्रयोग अथवा लेप, अभ्यंग आदि बाहरी प्रयोगों द्वारा कष्टसाध्य रोगों को भी नष्ट किया जा सकता है ॥ ४७ ॥

वक्तव्य —महर्षि वाग्भट ने उक्त गणों का संग्रह सु.सू. ३८ एवं ३९ से किया है। द्रव्यों के संग्रह में इन्होंने कहीं कुछ द्रव्य छोड़ दिये हैं और कहीं कुछ बढ़ा दिये हैं, यह अधिकार संग्रहकर्ता को प्राप्त है। अच्छा होता यदि वे औषध-द्रव्यों के रख-रखाव की विधि का भी उल्लेख कर देते, किन्तु वह नहीं किया है, अतः आप स्वयं देख लें—सु.सू. ३८।८१। सुश्रुत ने जो भेषजागार की विधि बतलाई है, उसे भी देखें—सु.सू. ३६।१७ और इसके अनुसार आप भी अपना भेषजागार बनायें। इसमें औषधद्रव्यों का संग्रह करके रखें।

इस प्रकार वैद्यरत्न पण्डित तारादत्त त्रिपाठी के पुत्र डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी द्वारा विरचित

निर्मला हिन्दी व्याख्या, विशेष वक्तव्य आदि से विभूषित अष्टाङ्गहृदय-सूत्रस्थान में

शोधनादिगणसंग्रह नामक पन्द्रहवाँ अध्याय समाप्त ॥ १५ ॥


षोडशोऽध्यायः

अथातः स्नेहविधिमध्येयार्थं व्याख्यास्यामः ।

इति ह स्माहुरात्रेयादयो महर्षयः ।

अब हम यहाँ से स्नेहनविधि नामक अध्याय की व्याख्या करेंगे। जैसा कि इस विषय में आत्रेय आदि महर्षियों ने कहा था।

उपक्रम—शोधन आदि गणों के पश्चात् अब यहाँ स्नेहाध्याय का आरम्भ किया जा रहा है। क्योंकि शास्त्रीय परम्परा के अनुसार शोधन-चिकित्सा स्नेहन तथा स्वेदन करने के पश्चात् ही की जाती है, इसीलिए यहाँ स्नेहन तथा स्वेदन का उपक्रम किया जा रहा है।

संक्षिप्त सन्दर्भ-संकेत—च.सू. १३; सु.चि. ३१ एवं अ.सं.सू. २५ में देखें।

गृहशीतसरस्निग्धमन्दसुधममुद्रद्वबम्। औषधं स्नेहनं प्रायो, विपरीतं विरुक्षणम्॥१॥

स्नेहन एवं रक्षण वर्णन—जो औषधद्वय गुरु, शीत, सर, स्निग्ध, मन्द, सुधम, मुद्र एवं द्रव होता है वह प्रायः स्नेहन होता है। जो औषध उक्त गुणों के विपरीत होता है, वह प्रायः रक्षण होता है॥१॥

वक्तव्य—भगवान् पुनर्वसु ने चरकसंहिता-सूत्रस्थान २२।११, १५-१६ में स्नेहन एवं रक्षण द्रव्यों का वर्णन किया है। स्नेह के सेवन की अनुशंसा सुश्रुत ने भी चिकित्सास्थान ३१।३ में की है, इन स्थलों का अवलोकन कर लें।

सर्पिर्मज्जा वसा तैलं स्नेहेषु प्रवरं मतम्। तत्रापि चोत्तमं सर्पिः संस्कारस्यानुवर्तनात्॥२॥

माधुर्यादविदाहित्वाज्जन्माद्येव च शीलनात्।

चार प्रकार के स्नेह—घी, मज्जा, वसा तथा तेल—ये चारों स्नेहों में उत्तम माने गये हैं।

घृत की प्रधानता—उक्त चार प्रकार के स्नेहों में घी सर्वश्रेष्ठ होता है, क्योंकि यह संस्कार के अनुकूल कार्य करता है। यह मधुर होता है, यह विदाहकारक नहीं होता। इसका सेवन जन्मकाल से ही किया जाता है॥२॥

वक्तव्य—उक्त स्नेहों का स्थावर-जंगम भेद से वर्गीकरण—तिलतैल, सार्षप तैल, एण्ड तैल आदि स्थावर स्नेह कहे जाते हैं। घी, वसा, मज्जा की योनि जंगम है, क्योंकि इनकी प्राप्ति जीवित तथा मृत प्राणियों से होती है। घी नामक स्नेह की उत्तमता का कारण एक और भी है कि इसका सेवन जन्मकाल से आरम्भ हो जाता है अथवा कर दिया जाता है। इसके लिए आप देखें—सु.शा. १०।१२, १३, १५ तथा ६८, ६९, ७०। इसके सेवन से शरीर, मेधा, बल एवं बुद्धि बढ़ती है।

पित्तज्नास्ते यथापूर्वमितरन्ना यथोत्तरम्॥३॥

स्नेहों के प्रमुख गुण—ये चारों स्नेह अन्त से आरम्भ की ओर उत्तम पित्तशामक होते हैं तथा उत्तरोत्तर कफ एवं वात दोष का शमन करने में उत्तम होते हैं॥३॥

घृतातैलं गुरु वसा तैलान्मज्जा ततोऽपि च।

उत्तरोत्तर गुरुता—घी से तेल, तेल से वसा तथा वसा से मज्जा ये उत्तरोत्तर पावन में गुरु होते हैं।

द्वाम्भ्यां त्रिभिश्चतुर्भिस्तैर्यमकस्त्रिवृतो महान्॥४॥

स्नेहविधिरध्यायः १६ ]

सूत्रस्थानम्

२०५

स्नेहयोगों के नाम—उक्त स्नेहों की गुरुता के अनुसार घी और तेल इन दो स्नेहों का नाम 'यमक' है। घी, तेल तथा बसा इन तीन स्नेहों का नाम 'त्रिवृत' है और घी, तेल, बसा एवं मज्जा इन चार स्नेहों का नाम 'महान्' है॥४॥

वक्तव्य—इन स्नेहों के उक्त नाम यहाँ सर्वथा पारिभाषिक हैं, अन्यत्र 'यमक' अलंकार, 'त्रिवृत' तीन बार लपेटा हुआ और 'महान्' की तो बात ही क्या है, उसे तो सभी जानते हैं।

स्वेद्यसंशोध्यमद्यस्त्रीव्यायामासक्तचित्तकाः । वृद्धबालाबलकृशा रुक्षाः क्षीणाघ्रतेतसः ॥५॥ वातातैस्यन्दतिमिरदारुणप्रतिबोधिनः । स्नेह्नाः—

स्नेहन-योग्य व्यक्ति—जो स्नेहन तथा संशोधन के योग्य हैं, जो मद्यपान, स्त्रीसहवास तथा व्यायाम करने में आसक्त हैं, जो चिन्तन करने में लगे रहते हैं, जो वृद्ध, बालक तथा कुशा हैं, रुक्षा शरीर वाले हैं, जिनका रक्तधातु एवं शुक्रधातु क्षीण हो गया है, जो वातविकार से पीड़ित हैं, अभिष्यन्द ( नेत्ररोग विशेष ) तथा तिमिर रोग से पीड़ित हैं, जिन्हें आँखों को खोलने या जानने में कष्ट होता है—ये सभी स्नेहन के योग्य होते हैं॥५॥

वक्तव्य—स्वेदन के योग्यों का परिचय १७वें अध्याय में तथा संशोधन के योग्यों का परिचय १८वें अध्याय में आगे देखें।

—न त्वतिमन्दाग्नितीक्ष्णाग्निशून्यलुर्बलाः ॥६॥

ऊरुस्तम्भातिसाराऽऽमगलरोगगरोदरैः । मूर्च्छाच्छर्दरचिन्नेलेभ्यतृष्णामद्यैश्च पीडिताः ॥७॥ अपप्रसूता युक्ते च नस्ये बस्ती विरेचने।

स्नेहन के अयोग्य व्यक्ति—जो अत्यन्त मन्द अग्निवाले अथवा तीक्ष्ण अग्निवाले, जो अत्यन्त मोटे या दुर्बल हैं, जो ऊरुस्तम्भ, अतिसार, आमाजीर्ण, गलरोग, दूषीविष, उदररोग, मूर्च्छा, वमन, अरुचि, कफज रोग, तृष्णा, मदात्यय, गर्भप्राय या गर्भपात वाली स्त्री, जिन्हें अभी-अभी नस्यकर्म, बस्तिकर्म तथा विरेचन कर्म कराया गया हो, इन सबको स्नेहन नहीं कराना चाहिए॥६-७॥

तत्र धीस्मृतिमेधादिकाङ्क्षिणां शस्यते घृतम् ॥८॥

घृतस्नेह के योग्य व्यक्ति—बुद्धि, स्मृति तथा मेधावृद्धि को चाहने वाले व्यक्तियों को घृतस्नेहन देना उत्तम होता है॥८॥

ग्रन्थिनाडीकृमिस्लेष्ममेदोमाश्रुतरोगिषु । तैलं लाघवदादर्यार्थिकूरकोष्ठेषु देहिषु ॥९॥

तैलस्नेह के योग्य व्यक्ति—ग्रन्थिरोग ( मानि. ३८।११ से १७ तक ), नाडीब्रण, क्रिमिरोग, कफज विकार, मेदोविकार तथा वातज विकार वालों के लिए, शरीर में लघुता ( हल्का एवं फुर्तीलापन ) चाहने वालों तथा कूरकोष्ठ वालों ( जिन्हें सामान्य विरेचक औषध-द्रव्यों से विरेचन नहीं होता उनके ) लिए लाभदायक होता है॥९॥

वातातपाधभारस्त्रीव्यायामक्षीणधातुषु । रुक्षकलेशक्षमात्यग्रिवातावृतपथेषु च ॥१०॥ शेषौ—

वसा-मज्जास्नेह के योग्य व्यक्ति—वातदोष के कारण जिसके रस-रक्त आदि धातु क्षीण हो गये हों, आतप ( धूप ) सेवन से, अधिक मार्ग चलने से, बोझा डोने से, स्त्री-सहवास करने से तथा व्यायाम करने से जिसके धातु क्षीण हो गये हों, जो शरीर से रुक्ष हों, जो कष्ट सहन कर सकते में समर्थ हों, जिनकी जठराग्नि अत्यन्त तीक्ष्ण हो, जिनके प्रीतस् वातदोष द्वारा घिरे हों, उनके लिए शेष ( घी-तेल से रहित ) वसा-मज्जा नामक स्नेह लाभदायक होते हैं॥१०॥

२०६

अष्टाङ्गहृदये

—वसा तु सन्ध्यस्थिमर्मकोच्छरुजासु च। तथा दग्धाहृतघ्रष्टयोनिकर्णशिरोरुजि ॥ ११ ॥

वसास्नेह का प्रयोगक्षेत्र—जिसकी सन्धियों ( जोड़ों ), अस्थियों, मर्मों में अथवा कोष्ठ ( आमाशय, पक्वाशय, मूत्राशय, रक्ताशय, हृदय तथा उण्डुक ) में पीड़ा हो रही हो; जो आग से जल गया हो; जो किसी प्रकार के आघात से प्रताड़ित हो, जिसकी योनि ( गर्भाशय ) खिसक कर बाहर आ गयी हो; इसी को योनिघ्रंश भी कहते हैं और जिसके कान एवं सिर में पीड़ा हो उनके लिए वसा का सेवन अधिक लाभदायक होता है ॥ ११ ॥

तैलं प्रावृषि, वर्षान्ते सर्पिरन्यो तु माधवे।

ऋतुभेद से स्नेहन-निर्देश—प्रावृद्ध ऋतु ( आषाढ़-श्रावण ) में तैल का, शरद् ऋतु में घी का और वसन्त ऋतु में वसा तथा मज्जा का सेवन करना चाहिए।

ऋतौ साधारणे स्नेहः शस्तोऽह्वि विमले रवौ ॥ १२ ॥

दिन में स्नेहसेवन-निर्देश—साधारण ऋतुओं में अर्थात् जिन दिनों जाड़ा, गर्मी, वर्षा सामान्य हो ऐसे दिनों में जब सूर्य का प्रकाश स्वच्छ हो तब दिन में स्नेह का प्रयोग करे ॥ १२ ॥

तैलं त्वरायां शीतेऽपि—

शीतकाल में तैल-प्रयोग—यदि चिकित्सा के लिए किसी स्नेहपान की आवश्यकता हो तो अन्य कालों के साथ शीतकाल में भी तैल का प्रयोग किया जा सकता है।

—घर्मैऽपि च घृतं निशि।

रात्रि में घृतपान-विधान—यदि गर्मी के दिनों में तत्काल स्नेहपान कराने की आवश्यकता हो तो रात में भी घृतपान किया जा सकता है।

निश्येव पिते पवने संसर्गे पित्तवत्यपि ॥ १३ ॥

कारण-भेद से रात्रि में घृतपान—न केवल गर्मियों में ही रात को घृतपान करना चाहिए अपितु पित्त के प्रकृपित होने से उत्पन्न पित्तज विकारों में तथा वात के प्रकृपित होने से वातज विकारों में यदि वह स्नेहास्य हो तो रात में भी घृतपान कराया जा सकता है ॥ १३ ॥

निश्यन्थया वातकफाद्रोगाः स्युः पित्तो दिवा।

स्नेहसेवन-विचार—ऊपरनिर्दिष्ट घृत-तैल सेवनकालों के विपरीत शीतकाल की रात्रियों में घृतपान करने से वातज तथा कफज रोग हो सकते हैं और उष्णकाल के दिनों में तैलपान करने से पित्तज विकार हो सकते हैं।

वक्तव्य—घृत अथवा तैलपान कराते समय रोगी की प्रकृति, देश, काल आदि का भी विचार कर लें।

युक्त्याऽवचारयेत्तनेहं भक्ष्याद्यक्षेन बस्तिभिः ॥ १४ ॥

नस्याभ्यजनगण्डूषमूर्द्धकर्णाक्षितर्पणेः ।

स्नेहसेवन की युक्ति—स्नेह का सेवन युक्ति से ( मात्रा, काल, क्रिया, भूमि, देह, दोष तथा स्वभाव का विचार करके ) करना चाहिए।

स्नेहसेवन-प्रकार—भक्ष्य, भोज्य, लैह्य अथवा पेय चतुर्विध आहार के साथ करें या उसमें मिलाकर करें। तीन प्रकार की बस्तियों ( निरुह, अनुवासन तथा उत्तर बस्ति ) का प्रयोग करें। नस्य, अस्थेग, गण्डूष, शिरोबस्ति, कर्णपूर्ण तथा अक्षितर्पण के रूप में करें ॥ १४ ॥

रसभेदैककत्वाभ्यां चतुःषष्टिर्विचाराणाः ॥ १५ ॥

स्नेहस्यान्याभिभूतत्वादल्पत्वाच्च क्रमात्समुताः।

स्नेहविधिरध्याय: १६ ] सूत्रस्थानम्‌ २०७

स्नेह की विचारणाएँ---उपर्यक्त भेदों के अनुसार स्नेह की विचारणाएँ चौंसठ प्रकार की स्वीकार

की गयी है। अ.ह.सू. अध्याय १० में मधुर आदि रसों के जो ६३ भेद बतलाये गये हैं, उन एक-एक

रसभेद के साथ स्नेह को मिलाकर सेवन करने से स्नेह की भी ६३ प्रविचारणाएँ तो हो जाती हैं। नस्य

अथवा अभ्यंग में प्रयुक्त शुद्ध स्नेह का एक भेद और जोड़ देने से इसके ६४ भेद हो जाते हैं। दूसरे विद्वान्‌

बस्ति आदि में प्रयुक्त स्नेह का एक भेद मानते हैं॥ १५॥

वक्तव्य--- प्रविचचारणा' को कल्पनापूर्वक भेद कहा है। आचार्य चक्रपाणि ने इस पद की व्याख्या

इस प्रकार की है--- 'प्रविचार्यते अवचार्यते अनुकल्पेन उपयुज्यते अनयेति प्रविचारणा: ओदनादय: । ( च.सू.

१३।२५ की टीका में ) इस प्रसंग में चक्रपाणि का यह विचार युक्तिसंगत प्रतीत होता है। यही कारण है

कि चरक ने २४ प्रकार की प्रविचारणाओं को ही स्वीकार किया है, न कि ६४ प्रकार की, अस्तु।

यथोक्तहेत्वभावाज्च नाच्छपेयो विचारणा। १६॥

विचारणा---ऊपर कहे गये कारणों के न होने से अच्छपेय ( केवल स्नेहपान या शुद्ध स्नेहपान )

को विचारणा नहीं कहा गया है। १६॥

स्नेहस्य कल्पः स श्रेष्ठः स्नेहकर्मा शुसाधनात्‌ ।

अच्छपेय के लाभ---इस प्रकार के अच्छपेय को स्नेहपान का उत्तम कल्प माना जाता है, क्योंकि

इस विधि से किया गया स्नेहपान शीघ्र ही शरीर को स्निग्ध ( स्नेहगुणसम्पन्न ) कर देता है।

वक्तव्य---भोजन में मिलाकर सेवन किया गया स्नेह प्रायः मल के साथ निकल जाता है, इसका

आप भी स्वयं अनुभव करें। इसके विपरीत अच्छपेय में प्रयुक्त स्नेह पच जाता है। इसका प्रयोग करने

के पहले यह देख लें कि जिसे स्नेहपान कराया जा रहा है, उसकी जठराग्नि प्रदीप्त है या नहीं, क्योंकि

मन्दाग्नि वाले व्यक्ति को इसका प्रयोग न करायें। भगवान्‌ पुनर्वसु ने अच्छपेय की उत्तम मात्रा की इस

प्रकार प्रशंसा की है---तस्या:****चेतसाम्‌!। ( च.सू. १३।३३-३४ ) उत्तम मात्रा के गुण--विधिपूर्वक

सेवन की गयी स्नेह की यह मात्रा शीघ्र ही रोगों को शान्त करती है। यह तीनों रोगमार्गों में जाती हुई

वहाँ के दोषों को नष्ट करती है। यह बल को बढ़ाती है और शरीर, इन्द्रियों एवं मन को पुनः ताजा

कर देती है। अतएव इसे दोषानुकर्षिणी' कहा है।

द्वाभ्यां चतुर्भिरष्टाभियामिर्जीर्यन्ति या: क्रमात्‌।। १७॥

हृस्वमध्योत्तमा मात्रास्तास्ताभ्यश्व ह्सीयसीम्‌। कल्पयेद्वी क्ष्य दोषादीन्‌ प्रागेव तु हुसीयसीम ।।

स्नेहमात्रा-विचार---स्नेहपान की मात्रा तीन प्रकार की होती है--- १. लघु, २. मध्यम तथा ३. उत्तम |

स्नेह की जो मात्रा दो पहर (६ घण्टे ) तक में पच जाती है, उसे ह्ृस्व या लघु मात्रा कहते हैं। जो

चार पहर (१२ घण्टे ) तक में पचती है, उसे मध्यम कहते हैं और जो मात्रा आठ पहर (२४ घण्टे )

तक में पचती है, उसे उत्तम मात्रा कहते हैं।

चिकित्सक का कर्तव्य है कि वह दोष, देश तथा काल आदि का विचार कर उक्त तीनों मात्राओं

से भी छोटी एक मात्रा की कल्पना करके पहले सबसे छोटी उस मात्रा का प्रयोग करे || १७-१८॥

वक्तव्य--इस अल्पमात्रा के औचित्य का विचार करते हुए वृद्धवाग्भट इसके सम्बन्ध में कहते हैं---

अआ.सं.सू. २५।२३, २५।

हास्तने जीर्ण एवान्ने स्नेहो5चछः: शुद्धये बहुः।

शोधनार्थ स्नेहमात्रा---संशोधन-चिकित्सा के लिए अच्छस्नेह की उत्तम मात्रा का प्रयोग उस समय

करे, जब कल का खाया हुआ भोजन भलीभाँति पच गया हो।

२०८

अष्टाङ्गहृदये

शमनः क्षुद्रतोऽनन्तो मध्यमात्रश्च शस्यते ॥ ११ ॥

शमनार्थ स्नेहमात्रा—शमन-चिकित्सा के लिए अच्छेसे की मध्यम मात्रा का प्रयोग उस समय करे जब भलीभाँति भूख लगी हो। इसे अन्न के साथ कभी न लें ॥ ११ ॥

बृंहणो रसमद्याद्यैः सभक्तोऽल्पः—

बृंहणार्थ स्नेहपान-विधि—इसका प्रयोग शरीर को पुष्ट करने के लिए इस प्रकार किया जाता है—स्नेह की थोड़ी मात्रा को मांसरस में मिलाकर सेवन करे और उसके बाद नियमानुसार मद्यपान करे।

—हितः स च। बालवृद्धपिपासार्तस्तेहृद्भिन्मद्यशीलिषु ॥ २० ॥

स्त्रीस्तेहनित्यमन्दाप्रिसुखितकलेशभीरुषु। मृदुकोष्ठात्पदोषेषु काले चोष्णे कृशेषु च ॥ २१ ॥

बृंहण स्नेहपान के योग्य व्यक्ति—यह अल्पमात्रा में प्रयुक्त बृंहण स्नेहपान बालक, वृद्ध, प्यास से पीड़ित, स्नेहपान न करना चाहने वाले, सदा मद्यपान करने वाले, स्त्री-सहवास करने वाले, प्रतिदिन भोजन के साथ स्नेह का सेवन करने वाले, मन्दाग्नि वाले, सुखी जीवन बिताने वाले, कलेश (कष्ट) से डरने वाले, मृदुकोष्ठ वाले अर्थात् जिन्हें सामान्य विरक्त पदार्थों से भी विरक्त हो जाता है, अल्पदोषों वाले तथा कुश पुरुषों के लिए और उष्णकाल में सबके लिए हितकर होता है ॥ २०-२१ ॥

वक्तव्य—स्नेहपान या स्नेहसेवन विधिभेद से तीन प्रकार का होता है—१. बृंहणस्नेह, २. शमनस्नेह तथा ३. शोधनस्नेह। यद्यपि इनका आशय नाम मात्र से स्पष्ट हो जाता है, फिर भी संक्षेप में यहाँ तीनों का परिचय प्रस्तुत है—१. बृंहणस्नेह का वर्णन ऊपर दिये गये २०-२१ श्लोकों में है, वैसे भी प्रतिदिन दाल में डालकर, रोटियों में चुपड़कर, दाल, शाक आदि को छौंककर जो अल्पमात्रा में स्नेह का प्रयोग होता है, वह बृंहणस्नेह है। २. शमनस्नेह उसे कहते हैं, जो दोषों को शान्त करने के लिए प्रयुक्त होता है और ३. शोधनस्नेह उसे कहते हैं, जिसका प्रयोग दोषों को निकालने के लिए किया जाता है।

प्राइमध्योत्तरभक्तोऽसावधोमध्योर्ध्वदेहजान्। व्याधीजयेद्दलं कुर्यादङ्गानां च यथाक्रमम् ॥ २२ ॥

स्नेहसेवन का प्रभाव—उक्त त्रिविध स्नेहमात्रा भोजन के पहले खाने या पीने से शरीर के निचले भाग के रोगों को, भोजन के बीच में खाने-पीने से शरीर के मध्यभाग के रोगों को और भोजन के अन्त में खाने-पीने से शरीर के ऊपरी भाग के रोगों को नष्ट करता है तथा उन्हीं अवयवों को बलवान् भी करता है ॥ २२ ॥

वार्युणमच्छनु पिबेत् स्नेहे तत्सुखपत्तये। आत्म्योपलेपशुद्धये च, तीवराच्छक्रे न तु ॥ २३ ॥

जीर्णाजीर्णविशुद्ध्यां पुनरुष्णोदकं पिबेत्। तेनोद्भारविशुद्धिः स्यात्तत्तश्च लघुता रुचिः ॥ २४ ॥

विविध स्नेहों के अनुपान—अच्छस्नेह का सेवन करने के बाद अनुपान के रूप में उष्ण जल पीना चाहिए। ऐसा करने से वह स्नेह सुख से पच जाता है तथा इससे स्नेहपान के कारण मुख में होने वाली बिपचिपाहट भी दूर हो जाती है। किन्तु उक्त उष्णजलपान का नियम तुरक (चाल्मोगरा) तथा भिलावा के स्नेह का सेवन करने में नहीं करें अर्थात् इनका सेवन करने के बाद अनुपान के रूप में शीतल जल पीना चाहिए। यदि सेवन किया गया स्नेह पचा या नहीं पचा ऐसी शंका हो तो बाद में फिर उष्णजल पीने के लिए दिया जा सकता है। इस प्रकार गरम पानी पीने से शुद्ध (निर्दोष) डकार आते हैं, शरीर में हलकापन तथा भोजन के प्रति रुचि बढ़ती है ॥ २३-२४ ॥

वक्तव्य—सुप्रसिद्ध वातनाशक एवं विरक्त एरण्डतेल का अनुपान भी उष्ण जल या गरम दूध ही माना गया है। इसके विपरीत घी-तेल में बने पकवानों को खाने के बाद जो प्यास लगती है, उसमें शीतल जल का ही सेवन करना चाहिए।

भोज्योऽन्नं मात्रया पास्यन् श्वः पिबन् पीतवानपि। द्रवोष्णमनभिष्यन्ति नातिस्निग्धमसङ्करम् ॥

स्नेहविधिरध्यायः १६ ]

सूत्रस्थानम्

२०९

स्नेहपानार्थ आहार-विचार—जब कल स्नेहपान कराना हो तो उसके एक दिन पहले, जिस दिन स्नेहपान किया जाय उस दिन और स्नेहपान करने के एक दिन बाद भी ऐसा भोजन करना चाहिए जो उचित मात्रा में हो, अधिक पतला, अधिक गरम तथा जो अभिप्यन्दी न हो, अधिक स्नेहमिश्रित न हो और अनेक प्रकार का मिला हुआ भोजन नहीं करना चाहिए ॥ २५ ॥

उष्णोदकोपचारी स्यादब्रह्मचारी क्षपशयः । न वेगरोधी व्यायामक्रोधशोकहिमातपान् ॥ २६ ॥ प्रवातयानयानाध्वभाष्यात्यासनसंस्थितीः । नीचात्युच्चोपधानाहःस्वप्नधूमरजांसि च ॥ २७ ॥ यान्यहानि पिबेत्तानि तावन्त्ययान्यपि त्यजेत् ।

स्नेहपानार्थ विहार-विचार—जितने दिनों तक स्नेहपान किया जाय उतने दिनों में और उतने ही अगले दिनों में स्नान करने में, पीने में तथा अन्य व.यों में भी गरम पानी का ही प्रयोग करना चाहिए, वह ब्रह्मचारी रहे, रात्रि में ही शयन करे, मल-मूत्र आदि के वेगों को न रोके, व्यायाम, क्रोध, शोक, शीत, धूप ( घाम ), झोंके की हवा, ऊटपटांग सवारियों में बैठकर यात्रा न करे, न अधिक रास्ता चले, अधिक भाषण न करे, अधिक न बैठे, अधिक देर तक खड़ा न रहे, अधिक नीचा या अधिक ऊँचा सिरहाना न रखे, दिन में सोना, धुआँ, धूलि में रहना या साँस लेना छोड़ दें ॥ २६-२७ ॥

सर्वकर्मस्वयं प्रायो व्याधिक्षीणेषु च क्रमः ॥ २८ ॥

सर्वत्र त्याज्य कर्म—ऊपर कहे गये आहार-विहारों को न केवल स्नेहपान में ही अपितु स्वेदन, वमन, विरेचन आदि में भी छोड़ देना चाहिए और यही क्रम व्याधिशीलों ( रोग के कारण जो कुश हो गये हों उन ) में भी त्यागने का ध्यान रखना चाहिए ॥ २८ ॥

उपचारस्तु शमने कार्यः स्नेहे विरिक्तवत् ।

शमन-स्नेहपान में उपचार—शमनस्नेह के सेवनकाल में जिसे विरेचन करा दिया गया हो, उसके समान उपचार ( आहार-विहार ) करना चाहिए। इसे देखें—आगे अ.हृ.सू. १८१८-२९ में।

व्यहमच्छं मृदौ कोष्ठे क्रूरे सप्तदिनं पिबेत् ॥ २९ ॥

सम्यक्स्निग्धोऽथवा यावदतः सात्य्योभवेत् परम् ।

स्नेहपान की अवधि—मृदुकोष्ठ वाले व्यक्ति को अच्छेस्नेह का सेवन तीन दिन तक करना चाहिए और क्रूरकोष्ठ वाले व्यक्ति को ( अच्छेस्नेह का सेवन ) सात दिन तक करना चाहिए। अथवा जब तक कोष्ठ भलीभाँति स्निग्ध न हो जाय तब तक पीना चाहिए। उसके बाद भी स्नेहपान करते रहने पर उसका स्नेहन सम्बन्धी लाभ नहीं मिलता, क्योंकि उसके बाद वह सात्य्य ( अभ्यस्त ) हो जाता है ॥ २९ ॥

बक्तव्य—सुश्रुत ने स्नेहपान की अवधि का वर्णन इस प्रकार किया है—'पिबेत्ः...सेवितः' । ( मु.वि. ३१।३६ ) अर्थात् स्नेह को तीन दिन, चार दिन, पाँच दिन, छः दिन, अधिक-से-अधिक सात दिन तक सेवन करना चाहिए। इसके आगे सेवन किया गया स्नेह सात्य्य हो जाता है। यही मत भगवान् पुनर्वसु का भी है—'स्नेहस्य'...रात्रकौ' ॥ ( च.सू. १३।५१ )

वातानुलोम्यं दीप्तोऽग्निर्वर्चः स्निग्धमसंहतम् ॥ ३० ॥

स्नेहोद्देशः कलमः सम्यक्स्निग्धे, रुक्षे विपर्ययः । अतिसिन्ध्रे तु पाण्डुत्वं प्राणवक्त्रगुदघ्नवाः ॥

सम्यक् स्निग्ध पुरुष के लक्षण—वातदोष की अनुकूलता, जठराग्नि का प्रदीप्त हो जाना, मल का स्निग्ध हो जाना, मल की गोलों का ढीला पड़ जाना, स्नेहपान के प्रति रुचि का होना तथा मन में थकवाट की प्रतीति का होना—ये लक्षण होते हैं।

रुक्ष रहने ( सम्यक् स्निग्ध न होने ) पर उसके विपरीत लक्षण देखे जाते हैं।

१४ अ० हू०

२१०

अष्टाङ्गहृदये

अतिस्निग्ध के लक्षण—शरीर में पीलापन का होना, नासिका, मुख तथा गुदद्वार से घ्राव का होना ये लक्षण होते हैं। इस घ्राव में उक्त अवयव के मलों के साथ स्नेह भी निकलता है॥ ३०-३१॥

अमात्रयाऽहितोऽकाले मिथ्याहारविहारतः। स्नेहः करोति शोफाशैस्तन्द्रास्तम्भविसंज्ञताः॥

कण्डुकुच्छ्वरोत्क्लेशशूलानाहप्रमादिकान् ।

मिथ्या स्निग्ध के लक्षण—किसको कितनी स्नेहमात्रा देनी चाहिए, इसका विचार किये बिना प्रयुक्त स्नेह, जो जिसके लिए निषिद्ध स्नेह है उसका सेवन करने से, अकाल में (किसको ग्रीष्मकाल में, किसको शीतकाल में कौन-सा स्नेहपान करना चाहिए, इसका विवरण इसी अध्याय में पहले दिया जा चुका है), मिथ्या आहार-विहार करने पर सेवन किया गया स्नेहपान—शोथ, अर्श (बवासीर), हृदयस्तम्भ, बेहोशी, कण्ठ (खुजली), कुष्ठरोग, ज्वर, मिचली, शूल, आनाह, भ्रम, बलक्षय, जड़ता, स्वरभेद आदि अष्टांगसंग्रह में कहे गये रोगों को उत्पन्न कर देता है। इसी को 'स्नेहव्यापद' कहते हैं॥ ३२॥

क्षुत्तुष्णोल्लेखनस्वेदरूक्षपातान्नभेषजम् ॥ ३३ ॥

तक्रारिष्टखलोहालयवश्यामाककोद्रवम् । पिप्पलीत्रिफलाक्षौद्रपथ्यागोमूत्रगुग्गुलु॥ ३४॥

यथास्वं प्रतिरोगं च स्नेहव्यापदि साधनम्।

स्नेहव्यापद की चिकित्सा—भूखा रहना, प्यासा रहना, उल्लेखन (वमन कराना), स्वेदन, रूक्षपान, रूक्ष भोजन तथा रूक्ष औषधद्रव्यों का सेवन, तक्र (मठा) एवं विविध प्रकार के अरिष्टों को पीना, तिल अथवा सरसों की खली का सेवन, जौ, सावों, कोदों, पिप्पली, त्रिफला, शहद, हरड, गोमूत्र, गुग्गुल आदि का श्लोक ३२ में कहे गये रोगों के अनुसार उक्त औषध-द्रव्यों का स्नेहव्यापदरोग में प्रयोग करना चाहिए॥ ३३-३४॥

वक्तव्य—अतिमात्रा में प्रयुक्त स्नेह के कारण उत्पन्न रोगों की यह रूक्षण चिकित्सा अथवा 'निदानपरिवर्जन-चिकित्सा' है।

विरूक्षणं लङ्घनवक्तुतातिकृतलक्षणम्॥ ३५॥

विरूक्षण-निर्देश—ऊपर कहे गये उपचारों द्वारा जब शरीर में रूक्षता उत्पन्न होती है, तो चिकित्सक को ध्यान देना चाहिए। इसमें भी लंघन के समान कृत (मुयोग) तथा अतिकृत (अतियोग) के लक्षण देखे जाते हैं॥ ३५॥

वक्तव्य—लंघन के मुयोग तथा अतियोग के लक्षणों के लिए देखें—अ.ह.सू. १४।

स्निग्धद्रवोष्णधन्वोत्प्लवसभक् स्वेदमाचरेत्। स्निग्धस्थं स्थितः कुर्याद्विरेकं, वमनं पुनः॥ ३६॥

एकाहं दिनमत्यच्च कफमुत्क्लेश्य तत्करैः।

स्वेदन आदि के प्रयोग—सम्यक् स्नेहन होने के बाद स्वेदन कराना चाहिए। स्वेदन कराते समय स्नेहयुक्त, द्रव एवं उष्ण आहार का तथा जांगलदेशीय मृग आदि प्राणियों के मांसरस का सेवन उस व्यक्ति को कराना चाहिए। स्नेहन कराने के तीन दिन बाद विरेचन कराना चाहिए। विरेचन कराने के एक दिन बाद अर्थात् एक दिन रुककर अगले दिन उस व्यक्ति को तिल, माष आदि से निर्मित कफकारक पेया आदि पिलाकर कफ को उभाड़ कर तब वमन कराना चाहिए, जिससे कफ का निर्हरण हो जाय॥ ३६॥

मांसला मेदुरा भूरिन्म्लेष्माणो विषमाद्ययः॥ ३७॥

स्नेहोचिताश्च ये स्नेहास्तान् पूर्वं रूक्षयेततः। संस्नेहा शोधयेदेवं स्नेहव्यापन्न जायते॥ ३८॥

स्नेहन के पूर्व रूक्षण-विधि—जो मनुष्य मांसल (मोटे) हों, जो मेदस्वी हों अर्थात् जिनका मेदोधातु बढ़ा हो, जो अधिक कफ वाले हों, जिनकी जठराग्नि विषम हो और जिन्हें स्नेह माल्य हो ऐसे पुरुषों को यदि स्नेहन कराना हो तो इन्हें पहले रूक्षण-प्रयोग कराये और रूक्षण-विधि के सम्पन्न हो जाने पर

स्नेहविधिरध्यायः १६ ]

सूत्रस्थानम्

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तब इन्हें स्नेहन दें और उसके बाद संशोधन ( वमन या विरंचन ) करायें। इस प्रकार करने से उक्त प्रकार के व्यक्तियों में भी स्नेहव्यापद ( स्नेहसेवन के कारण होने वाले रोग ) नहीं होते ॥ ३७-३८ ॥

अलं मलानीरयितुं स्नेहश्चासात्यतां गतः।

असात्यम् स्नेह की शक्ति—असात्यता को प्राप्त स्नेह ही मलों को अपने स्थान से बाहर निकलने के लिए प्रेरित करने में समर्थ हो जाता है।

बालवृद्धादिषु स्नेहपरिहारासहिष्णुषु ॥ ३९ ॥

योगानिमाननुद्रेगान् सद्यःस्नेहान् प्रयोजयेत्।

सद्यःस्नेहन का निर्देश—बालक, वृद्ध तथा सुकुमार आदि जो स्नेहविधि के प्रयोगकाल में परिहार ( छोड़ने योग्य—शीतल जलपान ) को सहन न कर सकें, उन्हें इन नीचे कहे गये योगों का प्रयोग कराना चाहिए, क्योंकि ये योग सद्यः ( तत्काल ) स्नेहन भी करते हैं और इनके सेवन से किसी प्रकार की घबड़ाहट भी नहीं होती है ॥ ३९ ॥

प्राज्यमांसरसास्तेषु, पेया वा स्नेहर्भजिता ॥ ४० ॥

तिलचूर्णश्च सस्नेहफणिः, कुशरा तथा। क्षीरपेया घृतादघोष्णा, दध्नो वा सगुडः सरः ॥ ४१ ॥

पेया च पञ्चप्रसूता स्नेहेस्तण्डुलपञ्चमैः। सप्तैते स्नेहनाः सद्यः, स्नेहाश्च लवणोत्वर्णाः ॥ ४२ ॥

सात सद्यःस्नेहन योग— १. अधिक घी मिला हुआ मांसरस, २. अधिक घी डालकर छोँकी गयी पेया, ३. तिलचूर्ण ( कक्क ) तथा राब्र घी मिला हुआ, ४. घी डाली गयी खिचड़ी, ५. घी डाली गयी गरम खीर, ६. गुड़ मिलायी गयी दही की मलाई और ७. घी, तेल, वसा, मज्जा एवं चावल ये प्रत्येक एक-एक प्रसूत अर्थात् दो-दो पल ( १ प्रसूत = दो पल = ८ तोला ) मिलाकर पकायी गयी पेया—ये सात योग सद्यः ( शीघ्र ही ) स्नेहन कराने वाले हैं। इन सभी स्नेहों में पर्याप्त लवण मिलाकर देना चाहिए ॥ ४०-४२ ॥

तद्वद्यभिष्यन्चारूक्षं च सूक्ष्ममुष्णं व्यवधि च।

लवण के गुण—वह लवण अभिष्यन्दी है, रुक्षतारहित है अतएव स्निग्ध है, सूक्ष्म है, उष्ण है तथा व्यवयी ( सम्पूर्ण शरीर में फैलने वाला ) होता है।

गुडानूपमिषक्षीरतिलमाषसुरादधि ॥ ४३ ॥

कुष्ठशोफप्रमेहेषु स्नेहार्यं न प्रकल्पयेत्।

स्नेहन-योगों का नियम—गुड़, अनुपदेशज प्राणियों का मांस, दूध, तिल, उड़द द्वारा निर्मित बड़े आदि खाद्य पदार्थ, सुरा और दही—ये पदार्थ स्नेहन में कारण होते हैं। इनका प्रयोग कुष्ठरोग, शोथरोग तथा प्रमेहरोग में स्नेहन करने के लिए नहीं कराना चाहिए ॥ ४३ ॥

त्रिफलापिप्पलीपथ्यागुग्गुल्वादिविपाचितान् ॥ ४४ ॥

स्नेहान् यथास्वमेतेषां योजयेदविकारिणः।

कुष्ठादि के योग्य स्नेह—इन उपर्युक्त कुष्ठ आदि रोगों में स्नेहन के लिए त्रिफला, पिप्पली, हरीतकी तथा गुग्गुलु आदि के संयोग से पकाये गये स्नेहों का प्रयोग करें। क्योंकि ये स्नेह उक्त रोगों में हानिकारक नहीं होते ॥ ४४ ॥

क्षीणानां त्वामयेरश्विदेहसन्धुक्षणक्षमान् ॥ ४५ ॥

क्षीण पुरुषों के योग्य स्नेह—जीर्णज्वर आदि रोगों के कारण क्षीण हुए पुरुषों को स्नेहन देने के लिए उन स्नेहों का प्रयोग करना चाहिए जो स्नेह जठराग्नि को प्रदीप्त करने तथा शरीर को पुष्ट करने में समर्थ हों ॥ ४५ ॥