भारतकोश
संग्रह पर लौटें

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished387 पृष्ठ

दिनचर्याध्यायः २ ]

सूत्रस्थानम्

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विशिष्ट अवसर—राजसम्मान, विद्वत्सम्मान, रतिकाल, युद्ध आदि में जाते समय इसके सेवन का विशेष महत्त्व है। अन्य अवसर भी अनेक हैं, उन्हें लोकव्यवहार से समझें।

सेवनविधि—पान के जड़ की डण्डी और आगे का भाग काट देना चाहिए, तभी उसमें कृता-कल्याण सुगंधी आदि मसाले डालकर मुख में लें। इसकी पहली पीक को थूककर फिर इसका रसपान करते रहें। सुर्ती आदि आधुनिक मसाले हानिकर होते हैं, इनसे दंत कमजोर हो जाते हैं और इनसे मुख का अल्सर होता देखा गया है। देखिए 'भावप्रकाश'—'दिनचर्या-प्रकरण'।

ताम्बूलं क्षतपित्तस्रद्धश्लोकुपितचक्षुषाम्। विषमूर्च्छाभदार्तानामपथ्यं शोषिणामपि ॥७॥

ताम्बूलसेवन-निषेध—ऊपर छठे पद्य में ताम्बूल का सेवन सभी को करना चाहिए, ऐसा निर्देश करने के बाद अब यहाँ इसका सेवन किनको नहीं करना चाहिए, इस विषय का निर्देश किया जा रहा है—क्षत तथा उरःक्षत से पीड़ित, पित्तविकार, रक्तविकार (रक्तपित्त) से पीड़ित, हृद्द शरीर वाले, नेत्ररोगी, विषविकार से पीड़ित, मूर्च्छा एवं भदाल्य आदि रोगों से पीड़ित तथा शोषरोगी को ताम्बूल का सेवन नहीं करना चाहिए ॥७॥

वक्तव्य—ताम्बूलसेवन का निषेध जिन रोगियों के लिए किया गया है, उसमें कारण हैं—ताम्बूलपत्र के वे गुण-धर्म होते हैं—तीक्ष्ण, उष्णवीर्य, रुचिकारक, कषाय, सर, तित्तक, क्षारीय गुणयुक्त, चरपरा तथा लघु। यह कामवासना, रक्तधातु तथा पित्तधातु को बढ़ाता है। इसका अधिक सेवन करना एक प्रकार का दुर्घसन है। इसे भूले पेट में तथा शौच के अन्त में कदापि सेवन न करें।

अभ्यङ्गमाचरेन्नित्यं, स जराश्रमवातहा। दृष्टिप्रसादपुष्ट्यायुःस्वप्नसुत्वक्त्वदादर्घकृत् ॥८॥

अभ्यङ्गसेवन-विधान—प्रतिदिन अभ्यंग (मालिश) करना या कराना चाहिए, क्योंकि वह जरा (बुढ़ापा), श्रम (थकावट) तथा वातज विकारों को नष्ट करता है, दृष्टि को स्वच्छ करता है, शरीर को पुष्ट करता है, आयु को बढ़ाता है, गहरी नींद लाता है, त्वचा के सौन्दर्य को स्थिर बनाये रखता है और मांसपेशियों को दृढ़ एवं सुडील (गठीली) बनाता है ॥८॥

वक्तव्य—अभ्यंग = मालिश, उबटन, फोहा रखना, कान में तेल डालना तथा लेप लगाना, इसे अलंकरण भी कहा गया है। इसका विस्तृत क्षेत्र इस प्रकार है—दंतों या आँखों पर तेल लगाना, स्नेहमिश्रित काजल लगाना, स्नेहमय लेप या महहम लगाना आदि। उक्त विषय के लिए देखें—सु.सू. २१।१० तथा सु.चि. २४।३०-३७। साथ ही उक्त श्लोकों पर आचार्य डल्हन द्वारा लिखी गयी टीका को भी देखें। अभ्यंग के लिए घी से आठ गुना अधिक तेल लाभदायक होता है, अवसर-विशेष पर घी आदि अन्य स्नेहों द्वारा भी मालिश की जाती है।

सुश्रुत-चि. २४।३० श्लोक पर की गयी आचार्य डल्हन की टीका में अभ्यंग के सम्बन्ध में ये तीन पद्य मिलते हैं—'रोमान्तेष्वनुदेहस्य स्थित्वा मात्राशतत्रयम्। ततः प्रविशति स्नेहश्चतुर्भिर्गच्छति त्वचाम् ॥ रक्तं गच्छति मात्राणां शतैः पञ्चभिरेव तु। षड्भिर्मांसं प्रपद्येत मेदः मत्तभिरेव च ॥ शतैरष्टाभिरेस्थीनि मज्जानं नवभिर्ब्रजैतु। तत्रास्याञ्च शमयेद्वोगान् वातपित्तकफात्मकान् ॥ अर्थात् प्राचीन विद्वानों का अनुमान है और अभ्यंगप्रिय पहलवानों का अनुभव है कि अभ्यंग द्वारा प्रयोग किया गया तेल ३०० मात्रा समय तक वह रोमकूपों में रहता है; फिर ४०० मात्रा समय तक त्वचा में, फिर ५०० मात्रा समय तक रक्त में, फिर ६०० मात्रा समय तक मांस में, ७०० मात्रा समय तक मेदस् में, ८०० मात्रा समय तक अस्थि में और ९०० मात्रा समय तक मज्जा में व्याप्त होकर उन-उन धातुओं में उत्पन्न वातज, पित्तज तथा कफज रोगों को शान्त कर देता है। उक्त डल्हन कृत टीका से मालिश के सम्बन्ध में उद्धृत श्लोकों में व्याकरण की दृष्टि ये प्रयोग महत्त्वपूर्ण हैं। देखें—त्वचाम्, रक्तं, मांसं, मेदः, अस्थीनि तथा मज्जानं। आप ध्यान दें—'कालाध्वनोरत्यन्तसंयोगे द्वितीया' (अ. २।३।५) सूत्र के नियमानुसार 'त्वचाम्' आदि प्रयोग बतला

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अष्टाङ्गहृदये

रहे हैं कि मालिश ऐसी होनी चाहिए कि मसलते-मसलते उस तेल का अत्यन्त संयोग उन-उन घातुओं तक हो जाय, तभी मालिश का पूरा-पूरा लाभ मिलता है।

यहाँ जो ३०० तथा ५०० आदि मात्रा शब्द का प्रयोग किया है, इस मात्रा नामक काल की अवधि का प्रमाण है—हृस्व स्वर अ, इ या उ आदि किसी एक को उच्चारण करने में जितना समय लगता है, उतने मात्र समय को कालविभागज्ञों ने 'मात्रा' कहा है। ध्यान दें—मात्रा हृस्व, दीर्घ तथा प्लुत भेद से तीन प्रकार की होती है। यहाँ केवल हृस्व स्वर वाली मात्रा से तात्पर्य है। अश्र्यंग का रहस्य पहलवान लोग जानते हैं, वे बड़े चाव से मालिश करते तथा कराते हैं और उसका लाभ भी उठाते हैं। अश्र्यंग कराने वाले को चर्मरोग कभी नहीं होते हैं।

शिरःश्रवणपादेषु तं विशेषेण शीलयेत्।

अश्र्यंग के प्रमुख स्थान—अश्र्यंग सम्पूर्ण शरीर में करना चाहिए, यह आठवें पद्य में कह दिया है। अब अश्र्यंग के विशेष स्थलों का निर्देश किया जा रहा है। यथा—सिर, कानों तथा पैरों के तलुओं में विशेष रूप से अश्र्यंग करना चाहिए।

वक्तव्य—यहाँ 'शीलयेत्' क्रिया का अर्थ है—'अश्र्यसेत्' अर्थात् बार-बार इसका अभ्यास करे। इस निर्देश की गुणवत्ता वाग्भट ने अष्टांगसंग्रह-सू. ३।५१-६० में इस प्रकार बतलाई है—'सिर पर तेलमालिश करते रहने से वह केशों का हित करता है अर्थात् उन्हें बढ़ाता है, मुखायम तथा चिकना बनाये रखता है। इससे शिरः कपालस्थियों और इन्द्रियों ( आंख, कान, नाक ) का तर्पण होता रहता है। कान के छेद में गुनगुना तेल डालते रहने से हनुमन्धियों ( गण्ड, कर्ण, श्रव, वर्त्म, नेत्र तथा हनु से सम्बन्धित ११ अस्थियों ) का, मन्त्राओं ( गरदन के अलग-बगल में दिखलायी देने वाली दोनों ओर की धमनियों ) का, सिर तथा कानों का शुल शान्त हो जाता है। पैरों पर अश्र्यंग करते रहने से पाँवों में स्थिरता आती है, निद्रा आती है और दृष्टि प्रसन्न रहती है। पैरों का मुन पड़ जाना, श्रम, स्तम्भ ( जकड़न ), सिकुड़न, विवाई फटना—ये कष्ट दूर हो जाते हैं।

वज्योऽभ्यङ्गः कफप्रस्तकृतसंशुद्धजोर्णिभिः ॥९॥

अश्र्यंग का निषेध—प्रतिशय आदि कफज विकारों से पीड़ित रोगी, जिन्होंने शरीरशुद्धि के लिए वमन-विरचन आदि किया हो तथा जो जोर्णरोग से ग्रस्त हों, वे अश्र्यंग का प्रयोग न करें ॥९॥

वक्तव्य—शास्त्रीय विचार विधि-निषेधमय होते हैं, क्योंकि उनके निर्देश सभी अवस्थाओं के लिए दिये जाते हैं, अतएव वे सर्वांगीण होते हैं। इस प्रकरण में सबसे पहले प्रतिदिन अश्र्यंग करने का सामान्य निर्देश दिया था, यह निषेधात्मक निर्देश विशेष परिस्थिति के लिए है। सुश्रुत का अनुसरण करने वाले आचार्य हेमाद्रि ने कहा है—'कृतसंशुद्धस्तदहरेव निषिद्धः'। अर्थात् जिसने वमन आदि का जिस दिन प्रयोग किया हो उस दिन अश्र्यंग न करे। इसी विषय को स्पष्ट रूप से सुश्रुत ने चिकित्सास्थान २।४।३५-३७ में कहा है।

लाघवं कर्मसामर्थ्यं दीप्तोऽग्निर्मैदसः क्षयः। विभक्तघनपात्रत्वं व्यायामादुपजायते ॥१०॥

व्यायाम का विधान—व्यायाम करने से कार्य करने की शक्ति बढ़ती है, जठराग्नि या पाचकाग्नि प्रदीप्त होती है, मेदम् ( स्थूलता ) का क्षय होता है अर्थात् मोटापा घटता है, अंग-प्रत्यंग ( मांसपेशियों ) स्पष्ट दिखलायी देते हैं और वे ठोस हो जाते हैं ॥१०॥

वक्तव्य—अष्टांगसंग्रह में इसकी परिभाषा इस प्रकार दी है—'शरीरायामजनकं कर्म व्यायाम उच्यते'। ( अ.सं. ३।६२ ) अर्थात् जिससे शरीर में थकावट पैदा हो, उसे 'व्यायाम' कहते हैं। इस परिभाषा से सभी शारीरिक परिश्रम व्यायाम कहे जा सकते हैं, किन्तु भगवान् पुनर्वसु के शब्दों में व्यायाम की परिभाषा इस प्रकार है—'शरीरचेष्टा या चेष्टा स्वीयार्थं बलवर्द्धिनी। देहव्यायामसङ्ख्याता मात्रया तां समाचरेत्' ॥ ( च.सू. ७।३१ ) अर्थात् जो भी शरीर की चेष्टा ( कर्म ) अपने मन को अच्छी लगे, जो शरीर को स्थिरता

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सूत्रस्थानम्

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प्रदान करती हो और बल को बढ़ाती हो, उसे 'व्यायाम' कहते हैं। उसे मात्रा के अनुसार करना चाहिए। यह व्यायाम की परिभाषा सर्वोत्तम है।

संसार में व्यायाम के अनेक प्रकार देखे जाते हैं, वे भी विभिन्न दृष्टियों से व्यायाम ही हैं। यथा—दण्ड, बैठक, शीर्षासन, कुश्ती, तैरना, हाकी, क्रिकेट आदि। इसी प्रसंग में आगे कहा जायेगा कि किनको व्यायाम नहीं करना चाहिए। पहलवान बनने की इच्छा हो तो उत्तम (पौष्टिक) खान-पान की व्यवस्था होनी चाहिए। जो प्रत्येक नर-नारी घरेलू कार्य करते हैं उनसे भी थकावट आती ही है, किन्तु वास्तव में इनकी गणना व्यायाम के रूप में नहीं होती। शरीर को स्वस्थ रखने के लिए शारीरिक श्रम अति आवश्यक है।

वातपित्तामयी बालो वृद्धोऽजीर्णी च तं त्यजेत्।

व्यायाम का निषेध —वातज तथा पित्तज रोगों से पीड़ित रोगी, बालक, वृद्ध तथा अजीर्णरोग से पीड़ित मनुष्य 'व्यायाम' न करें।

बक्तव्य —यहाँ बालक तथा वृद्ध के लिए व्यायाम करने का निषेध किया है, अतः इनकी आयुसीमा का निर्देश करते हुए वारम्भट के टीकाकार श्री अरुणदत्त कहते हैं—'बालः आपोऽशवर्षात्', 'वृद्धः सप्ततैरुद्ध्वम्' अर्थात् सोलह वर्ष तक की अवस्था वाला बालक कहा जाता है और सत्तर वर्ष से ऊपर की अवस्था वाला वृद्ध होता है।

अर्धशक्त्या निषेव्यस्तु बलिभिः स्निग्धभोजिभिः ॥ ११ ॥

शीतकाले वसन्ते च, मन्दमेव ततोऽव्यदा।

अर्धशक्ति तथा काल-निर्देश —बलवान् तथा स्निग्ध (घी-तेल आदि से बने हुए तथा बादाम, काजू आदि) पदार्थों को खाने वाले मनुष्य शीतकाल (हेमन्त-शिशिर ऋतु) में एवं वसन्त ऋतु में आधी शक्ति भर व्यायाम करें, इससे अन्य ऋतुओं में और भी कम व्यायाम करें ॥ ११ ॥

बक्तव्य —अर्धशक्ति का परिचय—व्यायाम करते-करते हृदयस्थान में स्थित वायु जब मुख की ओर आने लगे अर्थात् जब व्यायाम करने वाला हाँफता हुआ मुख से साँस लेने लगे तो यह बलाघर्ष या अर्धशक्ति का लक्षण है। इस स्थिति में यह सोच लेना चाहिए कि इस समय आधा बल समाप्त हो चुका है। देखें—सु.चि. २४४७। और लक्षण भी देखें—काँखों में, माथे पर, नासिका के ऊपर, हाथों-पैरों तथा सभी मधियों में पसीना आने लगे और मुख सूखने लगे तब समझना चाहिए कि आधी शक्ति समाप्त हो चुकी है। उस समय व्यायाम करना छोड़ दें। स्वयं बैठकर अपने शरीर के अवयवों को मसलें। सर्दी के दिनों में अर्धशक्ति पर्यन्त व्यायाम करने की शास्त्र की आज्ञा है, उसके बाद और भी कम व्यायाम करना चाहिए, यही 'मन्दमेव' शब्द का अभिप्राय है।

तं कृत्वाऽनुसुखं देहं मर्दयेच्छ समन्ततः ॥ १२ ॥

शरीरमर्दन-निर्देश —व्यायाम के बाद का कर्म—व्यायाम कर लेने के बाद सम्पूर्ण शरीर का अनुलोम सुखद मर्दन कर्म चारों ओर से करना चाहिए अथवा क्रमशः सभी अंगों को मसलना चाहिए ॥ १२ ॥

बक्तव्य —सुश्रुत के टीकाकार जैज्जट का कथन है कि मर्दन (मसलना) यह क्रिया भी व्यायाम का ही एक अंग है। यह मर्दन कर्म भी ऐसा न हो जो शरीर को कष्टकारक हो, अतएव महर्षि वारम्भट ने इसका एक विशेषण 'अनुसुखं' दिया है अर्थात् जो सुख के अनुकूल हो।

तृष्णा क्षयः प्रतमको रक्तपित्तं श्रमः क्लमः। अतिव्यायामतः कासो ज्वरश्छर्दिविश्व जायते ॥

अतिव्यायाम से हानि —अधिक व्यायाम करने से प्यास का लगना, क्षय (राजयक्ष्मा), प्रतमक श्वास, रक्तपित्त, श्रम (थकावट), क्लम (मानसिक दुर्बलता या मुस्ती), कास, ज्वर तथा छर्दि (वमन) आदि रोग हो जाते हैं अथवा हो सकते हैं ॥ १३ ॥

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वक्तव्य —प्रायः देखा गया है कि जो बहुत दिनों तक व्यायाम करते रहे, बाद में जिन्होंने एकाएक व्यायाम करना छोड़ दिया, उन्हें वृद्धावस्था में आमवात, ऊहस्तम्भ, अर्शरोग ( बवासीर ) अथवा अण्डवृद्धि ( पोता का बढ़ जाना ) आदि रोग हो जाते हैं।

व्यायामजागराध्वस्तीहास्यभाष्यादि साहसम् । गजं सिंहं इवाकर्पन् भजन्नति विनश्यति ॥ १४ ॥

व्यायाम आदि का निषेध —व्यायाम, जागरण, मार्गगमन, मैथुन, हैसना, बोलना ( जोर-जोर से चिल्लाना ) तथा साहसिक कार्य का अधिक सेवन करने से शक्ति युक्त मनुष्य का भी उस प्रकार विनाश हो जाता है जैसे सिंह अपने द्वारा मारे हुए हाथी को खींचकर ले जाने का दुःसाहस करता है, तो वह स्वयं मर जाता है ॥ १४ ॥

वक्तव्य —व्यायाम आदि का युक्तियुक्त सेवन सुखद होता है, किन्तु इनका अधिक सेवन न करे, यही ग्रन्थकार का अभिप्राय है। इसीलिए शक्तिमान् सिंह भी यदि अपने द्वारा मारे गये हाथी को खींचकर ले जाना चाहेगा तो वह भी मर जायेगा। यह एक दुःसाहस का उदाहरण है। जागरण ( रात में अधिक जागना ), अधिक मार्ग चलना, जो कभी नहीं चलता उसके लिए थोड़ा चलना भी बहुत है, इस प्रकार विचार कर लें। ऐसे ही अन्य उदाहरण भी हैं। दुःसाहस का अधिक प्रयोग करने से उरःक्षत हो जाता है।

अधिक व्यायाम करने से 'क्षय' हो जाता है, यह ऊपर कहा गया है। तन्त्रकार की एक अपनी शैली होती है, वह है—सूत्र तथा व्याख्यान शैली। क्षय या राज्यक्षमा के सम्बन्ध में महर्षि पुनर्वसु के उद्गार—'राज्यक्षमा रोगसमूहानाम्' तथा 'अयथाबलमारम्भः प्राणोपरोधिनाम्' । ( च.सू. २५।४० ) उक्त १४ वें श्लोक का आधार है—'व्यायाम'... 'मात्रया' ( च.सू. ७।३४ )।

उद्भूतं कफहरं मेदसः प्रविलायनम् । स्थिरीकरणमङ्गानां त्वचप्रसादकरं परम् ॥ १५ ॥

उबटन के गुण —व्यायाम के बाद उबटन करना चाहिए, इससे कफ का नाश होता है। यह मेदोघातु को पिघला कर उसे मुखा देता है, अंगों को स्थिर ( मजबूत ) करता है और त्वचा को कान्तियुक्त करता है ॥ १५ ॥

वक्तव्य —जो या चना का आटा अथवा सरसों को पीसकर उसमें तेल तथा हल्दी मिलाकर शरीर पर मसलने को उद्भूतन, उत्सादन या उबटन कहा जाता है। इस विधि से रोमकूपों में जमी हुई मैल भलीभाँति निकल जाती है। इससे त्वचा चिकनी तथा कोमल हो जाती है। इसका प्रयोग छोटे बच्चों के शरीर पर भी किया जाता है। इसके बाद गुनगुने पानी से स्नान करना चाहिए। परन्तु इस वैज्ञानिक युग में ये सात्विक सुख कहीं सुलभ है ?

दीपनं वृष्यमायुष्यं स्नानमूर्जाबलप्रदम् । कण्डूमलश्रमस्वेदतन्नातुइदाहपाभजित् ॥ १६ ॥

स्नान के गुण —स्नान करने से जठराग्नि प्रदीप्त होता है, यह वृष्य ( वीर्यवर्धक ) है, आयु को बढ़ाता है, उत्साहशक्ति तथा बल को बढ़ाता है; कण्डू ( खुजली ), मल ( त्वचा का मैल ), थकावट, पसीना, ऊँचाई, प्यास, दाह ( जलन ) तथा पाप ( रोग ) का नाश करता है ॥ १६ ॥

वक्तव्य —स्नान करने से ऊपर जिन लाभों का वर्णन किया है, उनका यहाँ स्पष्टीकरण प्रस्तुत किया जा रहा है। स्नान वृष्य है, देखें—अ.हू.उ. ४०।३५। स्नान कर लेने से मन प्रसन्न होता है, अतः यह वृष्य है।

उष्णाम्बुनाऽधःकायस्य परिषेको बलावहः । तेनैव तूतमाङ्गुस्य बलहृत्केशचक्षुषाम् ॥ १७ ॥

उष्ण-शीत जलप्रयोग —उष्ण ( गरम ) जल से अधःकाय ( गरदन से नीचे के शरीर ) का परिषेक ( स्नान ) बल को बढ़ाता है। यदि उसी ( गरम जल ) से सिर को घोया जाय अर्थात् गरम पानी से शिरःस्नान किया जाय तो इससे बालों तथा आँखों की शक्ति घटती है ॥ १७ ॥

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सूत्रस्थानम्

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स्नानमर्दितनेत्रास्यकर्णरोगातिसारिषु। आध्यानपीनसाजोर्णभुक्तवत्सु च गृहितम्॥१८॥

स्नान का निवेश— अर्दित ( मुखप्रदेश का लकवा ), नेत्ररोग, मुखरोग, कर्णरोग, अतिसार, आध्यान ( अफरा ), पीनस, अजीर्ण रोगों में तथा भोजन करने के तत्काल बाद स्नान करना हानिकारक होता है॥१८॥

वक्तव्य— स्नान करने के बाद बालों को मुँह अंगोछा से पोछकर उनमें तेल लगाकर कंघी कर लें और स्वच्छ वस्त्रों को धारण करें। दिनचर्या के अनेक कृत्यों का उल्लेख इसमें नहीं हो पाया है, उन्हें आप चरक-सुश्रुत से संग्रह कर लें। अ.सं.अ. ३ में दिनचर्या से सम्बन्धित अन्य अनेक विषय दिये गये हैं, आप उन्हें भी देखें।

जोर्णं हितं मितं चाद्यान्न वेगनीरयेद्वलात्। न वेगितोऽन्यकार्यः स्यान्नजित्वा साध्यमामयम्॥

भोजन आदि कर्तव्य— स्नान कर लेने के बाद तथा पहले किये हुए भोजन के पच जाने के पश्चात् जो हितकर भोजन हो उसे मात्रा के अनुसार खाये; मूत्र, पुरीष के वेगों को बलपूर्वक न उभाईं। यदि मल-मूत्र का वेग मालूम पड़े तो उन्हें दबाकर अन्य कर्मों में न लग जाय। साथ ही यदि किसी प्रकार का साध्यरोग हो तो उसकी चिकित्सा किये बिना भी किसी दूसरे कार्य में नहीं लग जाना चाहिए॥१९॥

वक्तव्य— स्मृतियों में कथित दिनचर्या से आयुर्वेदीय दिनचर्या सर्वथा भिन्न है और होनी भी चाहिए, क्योंकि दोनों के उद्देश्य भिन्न-भिन्न हैं। स्मृतिनिर्दिष्ट चर्या मनु. ४।१२-१३ में आप ही देखिए—कहाँ स्नान के बाद सन्ध्या और कहीं सीधे भोजन, वह भी जब पहले का पच गया हो। हितं मितं— हितकारक वह भोजन है जिसमें धारण तथा पोषण करने की शक्ति हो। देखें—'डुधाद्धारपोषणयोः' धातु से त्त प्रत्यय जोड़कर बना हुआ शब्द—धा + त्त + हित। इसके बाद ऋतु, देश, काल का विचार करके जो साल्प्य हो, उसे हित कहते हैं। मितं—नपा-तुला, परिमित या थोड़ा। 'न वेगितोऽन्यकार्यः स्यात्—'इस विषय का विशेष व्याख्यान आप चरकसंहिता सू.अ. ७ में विस्तारपूर्वक देखें। अथवा अ.हृ.सू. अध्याय ४ का अवलोकन करें। 'नजित्वा साध्यमामयम्—'यह वाग्भट का उपदेश विशेष करके आशुकारी रोगों के लिए है। अन्यथा प्रमेह तथा अर्श ( बवासार ) आदि अनेक रोग ऐसे हैं, जिनमें रोगी चिकित्सा के साथ अन्य कार्यों को भी करता ही रहता है। यदि साध्य एवं आशुकारी रोगों की उपेक्षा कर रोगी अन्य कार्य करने लगता है, तो वह रोग असाध्य हो सकता है। भोजनविधि का वर्णन अ.सं.सू. ३।७६-८० तक को भी देख लें। यह भोजनविधि का आर्य स्वरूप है।

सुखार्थाः सर्वभूतानां मताः सर्वाः प्रवृत्तयः। सुखं च न विना धर्मात्तस्माद्धर्मपरो भवेत्॥२०॥

सुख का साधन धर्म— सभी प्राणी चाहते हैं कि हमें सुख मिले, अतएव उनकी प्रवृत्तियाँ ( कार्य करने की लगन ) सुख पाने के लिए होती है और सुख की प्राप्ति धर्म के बिना नहीं होती। अतः सभी को धर्म-कार्य करने में तत्पर रहना चाहिए॥२०॥

वक्तव्य— धर्म शब्द को लेकर धार्मिक नेताओं तथा राजनीतिक नेताओं ने बड़ा हंगामा चलाया है, अस्तु। वास्तव में प्राणिमात्र का यह धर्म है कि वह अपनी तथा अपने उपकारक पदार्थों की रक्षा करे। इसमें किसी को किसी प्रकार का मतभेद नहीं है। इसी प्रकार की व्युत्पत्ति हमारे शास्त्रचिन्तकों ने धर्म शब्द की की है। देखें—'प्रियते लोकः अनेन इति धर्मः' अथवा 'धरति लोकम् असौ इति धर्मः'। आज वास्तविक धर्म का आचरण न करने के कारण देश में जो दुर्बलथा फैली है, इसको कोई नहीं देख रहा है। मनु आदि धर्माचार्यों ने धर्म का आचरण करने की सभी को आज्ञा दी है तथा सभी के अलग-अलग धर्मों का उपदेश दिया है। संक्षेप में इन स्थलों का अवलोकन करें। मनु. २।१२, २।११२. ४।२३८, २४१, २४२; ६।९२, ८।१५ तथा १७। उक्त उद्धरणों के अतिरिक्त महामानव मनु ने 'धर्म' शब्द की एक परिभाषा और भी दी है—'सत्तेर्केणाऽनुसन्धत्ते स धर्मं वेद नेतः'। ( मनुः १।२।०६ ) अर्थात् जो तर्कबुद्धि से अनुसन्धान ( विचार ) करता है, वही धर्म को समझता है, यह एक पक्ष है। दूसरा पक्ष यह भी है—'अतर्क्यं वै

३ अ० हू०

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अष्टाङ्गहृदये

धर्मः' अर्थात् धर्म के विषय में तर्क न करे। क्योंकि शास्त्र तीन प्रकार के होते हैं— १. प्रभुसम्मित, २. मुहूर्तसम्मित तथा ३. कान्तासम्मित। ये वेद आदि धर्मशास्त्र 'प्रभुसम्मित शास्त्र' के अन्तर्गत आते हैं, अतः ये अतर्क्य हैं; राजशासन के समान कठोर होते हैं।

सारांशः —जो सत्कर्म अपनी तथा दूसरों को धारण करता है, उसका नाम 'धर्म' है। उसी को कोषकारों ने पुण्य, श्रेयस्, मुक्त तथा वृष पर्यायों से कहा है। शुभ कर्म को 'धर्म' और अशुभ कर्म को 'अधर्म' या पाप कहा है। ऐसे कर्म या कर्मों से स्वास्थ्य-लाभ होता है और मनःसन्तोष प्राप्त होता है। यही कारण है कि आयुर्वेद में विधि-निषेधक्रम से धर्म की शिक्षा दी जाती है। आयुर्वेद में कहा गया सम्पूर्ण सद्बुत धर्म का आकर है। इसी को सदाचार कहा गया है और सत् आचार को ही चरक ने 'आचाररसायन' कहा है। अन्य आयुर्वेदीय रसायन व्ययसाध्य हैं, किन्तु 'आचाररसायन' संयमसाध्य है।

भक्त्या कल्याणमित्राणि सेवेतेतरदूरगः।

मित्र-अमित्र सेवन-विचार —अच्छे मित्रों ( शुभचिन्तक, अच्छी सलाह देने वालों ) का श्रद्धा-भक्ति से सेवन करे। इनसे विपरीत चरित्र वालों से दूर रहे अर्थात् सावधान रहे, क्योंकि इनका सेवन करने से हानि हो सकती है।

हिंसास्तेयात्यथाकामं पैशुन्यं परुषानुते ॥ २१ ॥

सम्भिन्नालापं व्यापादमभिध्यां दृग्निपर्ययम्। पापं कर्मेति दशधा कायवाङ्मानसैत्यजेत् ॥ २२ ॥

पापकर्मों का त्याग —नीचे लिखे गये दस प्रकार के पापकर्मों का मन, वचन तथा कर्म से सदैव परित्याग करे— १. हिंसा ( मार-पीट या किसी के मन को दुःखाना आदि ), २. स्तेय ( चोरी, लूट ), ३. अन्ध्याकाम ( अनुचित हंग से सुखभोग करना; जैसे—अगम्यागमन आदि )—इन शारीरिक दुष्कर्मों का शरीर से परित्याग करे। ४. पिशुनता ( ज़ुगुलखोरी ), ५. परुषवाक्य ( कठोर या अप्रियवचन ), ६. अनूत ( झूठी बात ) तथा ७. सम्भिन्न आलाप ( कभी कुछ और कभी कुछ कहना, जिसे दोगलापन कहते हैं )—वाणी सम्बन्धी इन पापकर्मों का वाणी द्वारा परित्याग करे अर्थात् ऐसी बातें न कहे। ८. व्यापाद ( किसी को मार डालने या मरवा डालने की योजना ), ९. अभिध्या ( दूसरे की सम्पत्ति को हड़प जाने की इच्छा करना ) तथा १०. दृग्निपर्यय ( शास्त्र के निर्देशों के विपरीत सोचना, नास्तिकता, आप्त वाक्यों के विरुद्ध सोचना आदि )—इन मानसिक पापों का मन से परित्याग करे ॥ २१-२२ ॥

अवृत्तिव्याधिशोकार्तननुवर्तते शक्तिः।

अनुकूल व्यवहार-निर्देश —जिनकी कोई आजीविका नहीं है, जो रोग तथा शोक से पीड़ित हैं, उनके साथ अपनी शारीरिक तथा आर्थिक शक्ति के अनुरूप उचित व्यवहार करे अर्थात् आजीविकाहीनों को आर्थिक सहायता, रोगियों को चिकित्सा आदि की सहायता तथा शोकपीड़ितों को उचित आश्वासन देकर उनके अनुकूल व्यवहार करे।

आत्मवत्सलं पश्येदपि कीटपिपौलिकम् ॥ २३ ॥

समदृष्टि का निर्देश —सभी प्राणियों को अपने समान समझें, भले ही कीड़े-मकोड़े, चींटियाँ ही क्यों न हों अर्थात् किसी को क्षुद्र ( छोटा या नीच ) न समझें। उन्हें कष्ट न पहुँचायें, उन पर दया करें ॥ २३ ॥

अर्चयेहेवगोविप्रवृद्धवैद्यनृपातिथीन् ।

सम्मान करने का निर्देश —देवता, गाय, ब्राह्मण, वृद्ध, वैद्य, नृप तथा अतिथि—इनकी पूजा करे अर्थात् इन्हें उचित सम्मान दें तथा इनका सत्कार करे।

वक्तव्य —यहाँ वृद्ध शब्द से माता-पिता तथा गुरुजनों का समावेश भी कर लेना चाहिए।

विमुखात्रार्थिनः कुर्यान्नावमन्येत नाक्षिपेत् ॥ २४ ॥

दितन्त्राध्यायः २ ]

सूत्रस्थानम्

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याचकों की सम्मान-विधि—अर्थियों ( याचकों ) को अपनी शक्ति के अनुसार कुछ देना चाहिए। उन्हें निराश नहीं लौटाना चाहिए, उनका अपमान न करे और न उन्हें झिड़कना ही चाहिए॥ २४॥

उपकारप्रधानः स्यादपकारपरैऽप्यहो ।

उपकार का निर्देश—सदा सबका उपकार करना चाहिए, भले ही अपकार करने के लिए तैयार शत्रु ही सामने क्यों न हो, उसके प्रति भी उपकार करना चाहिए।

वक्तव्य—सामान्य दृष्टिकोण है कि शत्रु के साथ अपकार ही करना चाहिए, किन्तु यहाँ तन्त्रकार का कथन उसके विपरीत है। उसका समर्थन इस प्रकार किया जा रहा है—जैसे वात आदि दोष रोगकारक होते हैं और जब वे सम अवस्था में होते हैं तो वे 'शरीरधारणात् धातवः' कहे जाते हैं, अतएव वे दोष भी हितकारक कहे जाते हैं।

सम्पद्विपत्स्वेकमना, हेतावीर्घ्यस्फले न तु॥ २५॥

समभाव का निर्देश—सम्पत्ति ( सुख ) में तथा विपत्ति ( दुःख ) में समान भाव से रहे। किम कारण से सम्पत्ति मिली है और किस कारण से विपत्ति मिली है, इसका पता करे। जिस कारण से विपत्ति मिली है उस कारण से द्वेष करना चाहिए, न कि विपत्ति से द्वेष करे॥ २५॥

वक्तव्य—यह सम्पत्ति एवं विपत्ति अपने-पराये सब पर आती है। दूसरे की सम्पत्ति को देखकर जलना नहीं चाहिए और दूसरे की विपत्ति को देखकर प्रसन्न नहीं होना चाहिए; अपितु यदि आप सम्पन्न होना चाहते हैं, तो उस कारण का पता लगाइए और वैसा प्रयत्न कीजिए, जिससे आप भी सम्पन्न हो सकें, जलते रहने से कोई लाभ नहीं होता।

काले हितं मितं ब्रूयादविसंवादि पेशलम्।

मधुरभाषण-निर्देश—समय पर बोलें, हितकर बात कहें, थोड़ा ( युक्तियुक्त ) बोलें, ऐसी बात कहें जो अविस्वादि ( जिसका कोई विरोध न करे अर्थात् सत्य ) हो तथा पेशल ( मौठा वचन ) कहें।

पूर्वाभिभाषी, सुमुखः सुशीलः कर्णामृदुः॥ २६॥

नैकः सुखी, न सर्वत्र विश्रब्धो, न च शङ्कितः।

भाषण-विधि—पहले बोलें ( यह प्रतीक्षा न करे कि जब वह बोलेगा तब मैं बोलेगा ) अर्थात् मित्र के मिलते ही उसके बोलने से पहले मैं बोलेगा, यह भाव मन में होना चाहिए और कुशल प्रश्न करने लगे। प्रसन्नचित्त, सभ्य व्यवहार करने वाला, दयालु, सरल स्वाभाव वाला, अकेला सुखी न रहे अर्थात् अपने बन्धु-बान्धव-इष्टमित्रों सहित सुखों का उपभोग करे। सबके साथ विश्वास न करे और सबके साथ अविश्वास भी न करे॥ २६॥

न कञ्चिदात्मनः शत्रुं नात्मानं कस्यचिद्विपुम्॥ २७॥

प्रकाशयेत्तापमानं न च निःस्नेहतां प्रभोः।

विचारों को गुप्त रखें—न अपने को किसी का शत्रु और न दूसरे को अपना शत्रु बतलाये। किसी ने अपना अपमान किया हो, उसका तथा अपने स्वामी, राजा आदि की अपने प्रति स्नेहहीनता का ही वर्णन किसी से न करे॥ २७॥

जनस्याशयमालक्ष्य यो यथा परितुष्यति॥ २८॥

तं तथैवानुवर्तत परराधनपण्डितः।

परच्छन्दानुवर्तन—दूसरे के मन का अभिप्राय समझकर जो व्यक्ति जिस प्रकार सन्तुष्ट होता हो, उसके साथ वैसा ही व्यवहार करना चाहिए, उसे 'परराधनपण्डित' कहते हैं॥ २८॥

३६

अष्टाङ्गहृदये

बक्तव्य—पञ्चतन्त्र में इसी आशय का एक पद्य इस प्रकार आया है—‘लुब्धमर्थेन गृहीयात् स्तब्धमञ्जलिकर्मणा। मूर्ख छन्दानुरोधेन यथार्थत्वेन पण्डितः॥’ (सूक्ति) अर्थात् लोभी को पैसा देकर, क्रोधी को हाथ जोड़कर, मूर्ख को जैसा वह कहता है वैसा ही मानकर और यथार्थ बात को कहकर पण्डित को प्रसन्न करना चाहिए। यह लोकव्यवहार है।

न पीडयेदित्तिद्याणि न चैतान्यति लालयेत्॥ २९॥

इन्द्रिय-व्यवहारविधि—आंख, कान आदि ज्ञानेन्द्रियों को रूप, शब्द आदि अपने-अपने विषयों का उपभोग करने से न रोके, परन्तु उन-उन विषयों में उन्हें अत्यन्त लोलुप्य भी न होने दें॥ २९॥

त्रिवर्गशून्यं नारम्भं भजेत् च विरोधयत्।

त्रिवर्ग-विरोध का निषेध—ऐसा कोई कार्य न करे जिससे त्रिवर्ग (धर्म-अर्थ-काम) की प्राप्ति न हो अथवा त्रिवर्ग का विरोध होता हो।

अनुयायात्प्रतिपदं सर्वधर्मेषु मध्यमास्म॥ ३०॥

सभी धर्मों का आचरण—सभी प्रकार के धर्मों में मध्यम मार्ग से चले, किसी धर्म का घोर समर्थक या घोर विरोधी न बने। यहाँ धर्म शब्द में आयुर्वेदोक्त सदाचार मार्ग में मध्यममार्ग पर चले॥ ३०॥

नीचरोमनखश्चर्मुर्निर्मलाङ्घ्रिमलायनः। स्नानशीलः सुसूरभिः सुवेण्डुन्तुलणोज्ज्वलः॥ ३१॥

शरीरशुद्धि के प्रकार—रोम (लौम), नख तथा श्मश्रु (दाढ़ी-मोछ) इन्हें अधिक न बढ़ाये, इन्हें काटते या कटवाते रहें। पैरों को स्वच्छ रखें, गुद आदि मलमार्गों को भी साफ रखना चाहिए। प्रतिदिन स्नान करें, सुगन्धित पदार्थों (इत्र आदि) का सेवन करें, सुन्दर वस्त्र धारण करें, उद्भूत वेश न बनाये अर्थात् सम्भ्य पुरुषों के आचरणों का अनुकरण करें॥ ३१॥

धारयेत्सततं रत्नसिद्धमन्त्रमहौषधीः।

रत्न आदि का धारण—रत्न, सिद्ध मन्त्र तथा औषधद्रव्यों को धारण करना चाहिए।

बक्तव्य—रत्न—हीरा, माणिक्य, पुखराज, नीलम आदि। सिद्धमन्त्र—बला, अतिबला, अपराजिता आदि। महौषधि—सहदेवी आदि। इनको वैद्य तथा दैवज्ञ आदि के निर्देशानुसार बाँह तथा गला आदि में धारण करना चाहिए।

सातपत्रपदत्राणो विचरेद्युगमात्रदुकु॥ ३२॥

छाता आदि धारण—छाता लगाकर चले, जूता पहन कर चले तथा चार हाथ आगे तक के मार्ग को देखते हुए चले॥ ३२॥

निशि चात्ययिके कार्ये दण्डी मौली सहायवान्।

दण्ड आदि धारण—रात में यदि कोई आवश्यक कार्य आ जाय तो हाथ में लाठी लेकर चले, सिर में पगड़ी बाँध लें या टोपी पहन लें और किसी को साथ में सहायता के लिए ले लें।

बक्तव्य—ऐसे उपदेश या तो शास्त्र देते हैं अथवा माता-पिता, शुभचिन्तक। पञ्चतन्त्र में भी एक ऐसी कथा आयी है; यथा—‘अपि का पुरुषो मार्गं द्वितीयः क्षेमकारकः’। अर्थात् कैसा भी आदमी हो उसे साथ ले लेना चाहिए, वह कल्याण करता ही है।

चैत्यपूज्यध्वजाशस्तच्छायाभस्मतुषाशुचीन् ॥ ३३॥

नाक्रामेच्छर्करालोष्टबलिस्नानभुवो न च।

गमन-निर्देश—चैत्य (देवता का स्थान, बौद्ध या जैन मन्दिर, समाधि) पर न चढ़े, ध्वजा के डण्डा पर न चढ़े, निन्दित कर्म करने वाले पुरुष की छाया का स्पर्श भी न करे, भस्म (राख) तथा तुष (भूसी) के ढेर पर और अपवित्र स्थान पर न चढ़े और बालू एवं ठेले के ढेर पर चढ़कर न चले॥ ३३॥

दिनचर्याध्यायः २ ]

सूत्रस्थानम्

३७

नदीं तरेन्न बाहुभ्यां, नाधिरुक्तधमभिन्नजेत् ॥ ३४ ॥ सन्दिग्धनावं वृक्षं च नारोहेदुष्प्यानवत् ।

निषिद्ध कार्य—वेगवाली नदी या घहराती हुई नदी को बाँहों से तैरकर पार न करे। अधिरुक्तध (आग के ढेर अथवा ज्वालामुखी) के समीप न जावे। दूषित सवारी पर जैसे कोई नहीं चढ़ता उसी प्रकार सन्दिग्ध नौका (जिसके डूब जाने का भय हो) उसमें न चढ़े और जिस वृक्ष का टूट कर गिर जाने का सन्देह हो उस पर भी न चढ़े ॥ ३४ ॥

नासंतवृतमुखः कुर्यात्सुतिहास्यविजुम्भणम् ॥ ३५ ॥

छीक आदि करने की विधि—मुख को ढके बिना न छीके, न हँसे और न जँभाई ले (यह शिष्टाचार है) ॥ ३५ ॥

नासिकां न विकुण्णीयात्राकस्माद्विलिखेद्वुवम् । नाङ्गैश्चेष्टेत विगुणं, नासीतोक्तटकश्चिरम् ॥

आंगिक चेष्टाओं का निषेध—अकारण नासिका के छिद्रों को अँगुली से न खोदे। अकारण भूमि को अँगुलियों से न खोदे (यह लक्षण विषदाता का कहा गया है)। टोंगों, बाँहों आदि से विकृत चेष्टाएँ न करें; जैसे—मुख बिचकाना, आँखें मटकाना आदि तथा उल्टक आसन से पाँवों के बल न बैठे ॥ ३६ ॥

बक्तव्य—सुश्रुत ने भी इस प्रकार के भावों का निषेध किया है। देखें—सु.चि. २४।९५।

देहवाक्येतसां चेष्टाः प्राक् श्रमाद्विनिवर्तयेत् । नोर्थ्वजानुश्चिरं तिष्ठेत्—

शारीरिक आदि चेष्टाओं की मात्रा—शरीर, मन तथा वाणी की चेष्टाओं (इनके कार्यों) को थकान होने से पहले ही रोक देना चाहिए (इस विषय को वाग्भट ने सद्वृत्त में दिया है, चरक ने इसे व्यायाम के लक्षणों में कहा है) और चिरकाल तक जाँचों को ऊपर की ओर उठाकर लेटा न रहे।

—नक्तं सेवेत न द्रुमम् ॥ ३७ ॥

तथा चत्वरचैत्यान्तश्चतुष्पथसुरालयान् । सूनाट्वीशून्यगृहशमशानानि दिवाऽपि न ॥ ३८ ॥

अन्य सदाचार—रात्रि में वृक्ष के नीचे न रहे तथा चत्वर (तिमुहानी), चैत्य के समीप या भीतर, चतुष्पथ (चौराहा या चौमुहानी) पर, देवमन्दिर या मद्यशाला में, सूना (कसाईघर अथवा फाँसी देने के) स्थान पर, घोर वन में, सुनसान घर में तथा शमशान में दिन में भी न रहे ॥ ३७-३८ ॥

बक्तव्य—'रात में पेड़ के नीचे न रहे'—इस वाक्य के समर्थन में श्री अरुणदत्त कहते हैं—'उस वृक्ष के आश्रय में रहने वाले कीड़ों के मल-मूत्र गिरने से रक्षा होगी। आज का विज्ञान कहता है कि रात्रि में वृक्ष 'कार्बन-डाई-आक्साइड' गैस को छोड़ते हैं, अतः उनसे दूर रहना चाहिए। क्योंकि यह स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होती है।

उक्त ३८वें श्लोक में 'चत्वर' तथा 'चतुष्पथ' दो एकार्थवाचक शब्दों का समावेश हुआ है, अतः इसकी संगति बैठाने के लिए विद्वान् टीकाकारों ने 'चत्वर' का अर्थ 'तिमुहानी' किया है। उसका आधार यह है—'चत्वरं स्यात् पथां श्लेषं' इति हैमः। अर्थात् मार्गों का संगम एकाधिक का हो ही सकता है। फिर भी हमारे विचार से यहाँ 'चत्वर' का अर्थ—स्थण्डिल या आँगन तिमुहानी से अधिक उपयुक्त प्रतीत होता है। इसी तथ्य को श्री अरुणदत्त ने भी स्वीकार करते हुए कहा है—'अन्ये ल्वाहूः—यत्र प्रदेशे नगरनिवासिनो ग्राम्या वा समेत्य नानाविधाः कथाः कुर्वन्ति, स चत्वर उच्यते'। सुरालयान्—'सुर + आलयान्' = देवगृह या मन्दिर। 'सुरा + आलयान्' = मद्यशाला या मधुशाला। ये दो अर्थ उक्त विग्रहों के आधार पर किये गये हैं।

सर्वथेश्वेत नादित्यं, न भारं शिरसा वहेत् । नेश्वेत प्रततं सूक्ष्मं दीप्तामेध्याप्रियाणि च ॥ ३९ ॥

३८

अष्टाङ्गहृदये

अन्य सदाचार—सूर्य को एकटक होकर देखता न रहे, सिर पर बोझ रखकर न ले जाये; मूधम, बमकीले, अपवित्र तथा अप्रिय पदार्थों को लगातार देखना न रहे ॥ ३९ ॥

वक्तव्य—सूर्य को कब न देखे, इस सम्बन्ध में मनुस्मृति का वचन देखें—'उदय तथा अस्त होते हुए, ग्रहणकाल में, जल में प्रतिबिम्बित, आकाश के मध्य में स्थित सूर्य को न देखें। ( मनु. ४३७ )

मद्यविक्रयसन्धानदानानानि नाचरेत्।

मद्य-विक्रय आदि का निषेध—मद्य का विक्रय न करे, मद्य का सन्धान ( निर्माण ) भी न करे और उसका लेन-देन ( व्यापार ) भी न करे तथा उसे पीना भी नहीं चाहिए; केवल 'औषधार्थे सुरां भिबेत्'।

पुरोवातातपरजस्तुधारपरुषानिलान् ॥४०॥

अनुजः क्षवयुद्धारकासस्वप्नास्रमैयुनम्। कूलच्छायां नृपदिष्टं व्यालदंष्ट्रिविपाणिनः ॥४१॥

हीनानार्थातिनिपुणसेवां विग्रहमुत्तमैः। सन्ध्यास्वभ्यवहारस्त्रीस्वप्नाध्ययनचिन्तनम् ॥४२॥

शत्रुसत्रगणार्कीर्णगणिकापणिकाशनम्। गात्रवक्त्रनखैर्वाद्यं हस्तकेशावधूतनम् ॥४३॥

तोयाग्निपूज्यमध्येन यानं धूमं शवाश्रयम्। मद्यातिसर्कितं विश्वम्भस्वातन्त्र्ये स्त्रीषु च त्यजेत् ॥

अन्य निषिद्ध कर्म—पूर्व दिशा की ओर से बहने वाली वायु का, सामने से आने वाली वायु का, क्षुप का, घुल्लि का, तुषार ( ओस तथा बर्फ ) का तथा झोंके से चलने वाली वायु ( आँधी ) का सेवन न करे। जब शरीर की स्थिति सीधी न हो ऐसी अवस्था में न झोंके, न डकार ले, न खाँसे, न सोये, न खाना खाये और न मैयुन करे। कूल ( नदी का किनारा ) की छाया में न बैठे, राजा के शत्रु का साथ न करे। सर्प से, दीतों से काटने वाले कुत्ता आदि प्राणियों से दूर रहे। सींग से मारने वाले साँड़, भैंसा आदि प्राणियों से सदा दूर रहे। नीच, अनार्य ( अधम या कमौना ), अतिनिपुण ( दुष्ट, शैतान ) व्यक्तियों की सेवा ( नौकरी ) न करे। उत्तम ( अपने से बलवान् अथवा सदाचार युक्त ) पुरुषों से झगड़ा ( वैर ) न करे।

सन्ध्याकाल में भोजन, स्त्रीसहवास, सोना, अध्ययन आदि किसी विषय का विचार न करे। यह समय भगवद्भजन करने का होता है। शत्रु का, यज्ञ का, गण ( समुदाय या समाज ) का, आर्कीर्ण ( इधर-उधर बिखरा हुआ ), गणिक ( वेश्याओं ) का तथा पणिक ( दुकान, होटल आदि ) का भोजन न करे। ( ब.सू. ८।२० के अनुसार आर्कीर्ण का अर्थ—बहुजनार्कीर्ण है।) गात्र ( काँख, ताली आदि ) से, मुख से तथा नाखूनों से बाजा बजाने की नकल न करें। हाथों को हिलाना एवं बालों का अवधूतन ( कम्पन ) न करे। ( प्रायः हाथों तथा केशों का कम्पन यह लक्षण उन्मादरोगियों में देखा जाता है। चेतन अवस्था में ये कृत्य शिष्टाचार के विरुद्ध हैं। )

जल, अग्नि तथा पूज्यजनों के बीच में से होकर इधर-उधर नहीं जाना चाहिए। ( इस विषय को चाणक्य ने इस प्रकार कहा है—'विप्रयोर्विप्रवहद्योश्च दम्पत्योः स्वामिभृत्ययोः। अन्तरेण न गन्तव्यं हलस्य तृषभस्य च' ॥—चाणक्यनीति ) श्मशान में चिता के धुँआ से दूर रहे, मद्य ( मादक पदार्थों के सेवन ) का अभ्यासी न बने। स्त्रियों का विश्वास न करे और इन्हें स्वतन्त्रता प्रदान न करे, क्योंकि 'प्रायः साहसिकाः स्त्रियः' ॥ ४०-४४ ॥

वक्तव्य—ऊपर कहा गया सद्वृत्त सत्पुरुषों तथा कुलांगनाओं के आचरण का लेखा-जोखा है। प्रतिदिन के आचरण में उक्त उपदेशों का समावेश अवश्य कर लेना चाहिए। सद्वृत्त में कहे गये विषयों के लिए ब.सू. ५ तथा ८ को और मु.चि. २४ को देखें। यहाँ कहा गया सम्पूर्ण वृत्त सदुत्तम है। इनका व्यावहारिक प्रयोग मनुष्य को सदाचारी एवं सज्जन बनाता है, जिससे समाज उसका आदर करता है और परलोक में उसे शुभ गति प्राप्त होती है।

आचार्यः सर्वचेष्टासु लोक एव हि धीमतः। अनुकुर्यात्तमेवातो लौकिकेऽर्थे परीक्षकः ॥४५॥

दिनचर्याध्यायः २ ]

सूत्रस्थानम्

३९

अन्य सदुपदेश—सभी प्रकार के सांसारिक व्यवहारों को सीखने के लिए बुद्धिमान् मानव का सम्पूर्ण संसार ही आचार्य (गुरु) है, फिर भी सांसारिक अर्थ (स्वार्थ तथा परार्थ) की परीक्षा (क्या करने में हित है और क्या करने में अहित है, इस प्रकार का विचार) करने वाला मनुष्य संसार का अनुकरण करे ॥ ४५ ॥

वक्तव्य—भगवान् पुनर्वसु ने उक्त विषय में अत्यन्त स्पष्ट निर्देश इस प्रकार दिया है—‘कृत्स्नो हि लोको बुद्धिमताम् आचार्यः, शत्रुश्च अबुद्धिमताम्’ (च.वि. ८।१४) अर्थात् समझदार नर-नारियों के लिए सम्पूर्ण संसार आचार्य (गुरु या उपदेशक) है, क्योंकि वे उससे अच्छी बातें सीखते हैं और नासमझ लोग उससे बुरी बातें सीखते हैं, अतः संसार को उनका शत्रु कहा गया है।

आद्रसन्तानता त्यागः कायवाकृचेतसां दमः। स्वार्थबुद्धिः परार्थेषु पर्याप्तमिति सद्गतम् ॥ ४६ ॥

सदाचार-सूत्र—सभी प्राणियों पर दयालु होना, दान देना, शरीर, मन तथा वाणी पर नियन्त्रण रखना अर्थात् इन्हें स्वतन्त्र न छोड़ना तथा दूसरों के अर्थों में स्वार्थबुद्धि रखना (उन्हें भी अपने ही जैसा समझना) यह सूत्र रूप में पूर्ण सदाचार माना गया है ॥ ४६ ॥

नक्तंदानानि मे यान्ति कथम्भृतस्य सम्प्रति। दुःखभाङ्गन भवत्येवं नित्यं सन्नहितस्मृतिः ॥ ४७ ॥

विचार-पद्धति—आजकल मेरे रात-दिन कैसे बीत रहे हैं, मैं कैसा होता जा रहा हूँ? इस प्रकार का प्रतिदिन ध्यानपूर्वक विचार करने वाला पुरुष कभी दुःखी नहीं होता है ॥ ४७ ॥

वक्तव्य—महर्षि चाणक्य ने भी इसी प्रकार सोचने के लिए मनुष्य को बाध्य किया है—‘कः कालः कानि मित्राणि को देशः को व्यायामी। कस्याऽहं का च मे शक्तिरिति चिन्त्यं मुहूर्मुहुः’ ॥ (चाणक्यनीति) इस प्रकार विचार करने वाला पुरुष अज्ञानवश हुई अपनी भूलों को सुधार सकता है। इसका परिणाम यह होता है कि वह कभी दुःखी नहीं होता।

इत्याचारः समासेन, यं प्राप्नोति समाचरन्।

आयुरारोग्यमैश्वर्यं यशो लोकांश्च शाश्वतान् ॥ ४८ ॥

इति श्रीवैद्यपतिसिंहगुप्तसुनुश्रीमद्राष्ट्रविरचितायामष्टाङ्गहृदयसंहितायां

प्रथमे सूत्रस्थाने दिनचर्या नाम द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥


सदवृत्त का उपसंहार—इस प्रकार संक्षेप से आचार (सदाचार अथवा सदवृत्त = सज्जों का कर्तव्य) कह दिया गया है। जिसका अपने जीवन में आचरण करता हुआ पुरुष (नर-नारी) दीर्घायु, आरोग्य (उत्तम स्वास्थ्य), ऐश्वर्य (धन-सम्पत्ति), सुयश तथा स्वर्ग आदि सनातन लोकों को प्राप्त करता है ॥ ४८ ॥

वक्तव्य—इस अध्याय में मनुष्यों के हित के लिए सदाचार का संक्षेप से वर्णन किया गया है। यही मनुष्यों का प्रथम अथवा परम धर्म है। इसके सम्बन्ध में मनु ने कहा है। देखें—मनु. १।१०८-११०। इस सदाचार रूपी धर्म से धन-सम्पत्ति की प्राप्ति होती है, इससे सुख मिलता है और इसी से रोगों का नाश होता है। लोक में व्याप्त अन्य धर्मों से सदाचार नामक धर्म सर्वोत्तम है। इसका सेवन करने से मानव-जीवन मङ्गल हो जाता है और इसका आचरण न करने से मनुष्य का विनाश हो जाता है। अतः सभी को सदाचार का सेवन करना चाहिए।

इस प्रकार वैद्यरत्न पण्डित तारादत्त त्रिपाठी के पुत्र डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी द्वारा विरचित

निर्मला हिन्दी व्याख्या, विशेष वक्तव्य आदि से विभूषित अष्टाङ्गहृदय-सूत्रस्थान में

दिनचर्या नामक दूसरा अध्याय समाप्त ॥ २ ॥


तृतीयोऽध्यायः

अथात ऋतुचर्याध्यायं व्याख्यास्यामः ।

इति ह स्माहुरात्रेयादयो महर्षयः ।

अब यहाँ से हम ऋतुचर्या नामक अध्याय की व्याख्या करेंगे, जैसा कि इसके सम्बन्ध में आत्रेय आदि महर्षियों ने कहा था।

उपक्रम— चर्या शब्द का व्याख्यान हमने 'दिनचर्या' प्रकरण में कर दिया था। अब यहाँ 'ऋतु' = दो-दो मास के अनुसार सम्पूर्ण वर्ष को छः भागों में जो बाँटा गया है उनमें किस प्रकार का आहार-विहार होना चाहिए, इस अध्याय में उस विषय का वर्णन किया जायेगा।

संक्षिप्त सन्दर्भ-संकेत— च.सू. ६; च.वि. ८; सु.सू. ६; सु.वि. २४ तथा सु.उ. ६४ एवं अ.सं. ४ में देखें।

मासेन्द्रिसृष्ट्यार्माघाद्यैः क्रमात् षड्वतवः स्मृताः । शिशिरोऽथ वसन्तश्च ग्रीष्मो वर्षाः शरद्विमाः ॥

शिशिराद्यास्त्रिभिस्तेस्तु विद्यादयनमृत्तरम् । आदानं च, तदादत्ते नृणां प्रतिदिनं बलम् ॥ २ ॥

छः ऋतुषु— माघ आदि दो-दो महिनों से क्रमशः छः ऋतुएँ होती हैं। यथा— १. माघ-फाल्गुनः शिशिर ऋतु, २. चैत्र-वैशाख : वसन्त ऋतु, ३. ज्येष्ठ-आषाढ़ : ग्रीष्म ऋतु, ४. श्रावण-भाद्रपद : वर्षा ऋतु, ५. आश्विन-कार्तिक : शरद ऋतु और ६. मार्गशीर्ष-पौष : हेमन्त ऋतु।

उत्तरायण तथा आदानकाल— शिशिर, वसन्त तथा ग्रीष्म नामक तीन ऋतुओं में होने वाले छः मासों का नाम 'उत्तरायण' है; इसी का दूसरा नाम है—'आदानकाल'। क्योंकि इन दिनों में यह काल अपनी प्रकृति से प्रतिदिन प्राणियों के बल को लेता रहता है अर्थात् उनके बल का अपहरण करता रहता है ॥ १-२ ॥

वक्तव्य— तन्त्रकारों की व्याख्यान-सरणियाँ भिन्न-भिन्न होती हैं, तथापि निष्कर्ष प्रायः समान होते हैं। यहाँ छः ऋतुओं तथा उत्तरायण की चर्या की गयी है। यह भारत वर्ष 'भार्यवान्' देश है, यह ऋतु आदि की विविधता यहाँ के निवासियों का ही सौभाग्य है, अन्यत्र ऐसा नहीं है। इसके लिए आप विश्व के भूगोल का अध्ययन करें, अस्तु।

सम्पूर्ण वर्ष में १२ मास, ६ ऋतुएँ और २ अयन होते हैं। यह कालविभाग सौरमासों के अनुसार कहा गया है। ज्योतिष के अनुसार वर्षभर में चान्द्रमासों की भी सत्ता स्वीकार की गयी है। तदनुसार प्रति तीसरे वर्ष १ मास बढ़ जाता है, क्योंकि चान्द्रमास २७ या २८ दिन का होता है, किन्तु ऋतु-विभाजन सौरमासों के अनुसार ही होता है। उक्त चान्द्रमास को समझने के लिए आप देखें—'तैश्चतुर्भिर्होरात्रिश्च, पञ्चदशाहोरात्राः पक्षः। पक्षद्वयं मासः। स शुक्लान्तः'। (अ.सं.सू. ४।४) अर्थात् ४ पहर का दिन और ४ पहर की रात्रि होती है, जिसे मिलाकर १ दिन होता है। १५ दिनों का एक पक्ष होता है, यह कृष्ण तथा शुक्ल भेद से माना गया है। २ पक्षों का एक मास होता है, शुक्लपक्ष की 'पूर्णिमा' के दिन इस मास की पूर्ति होती है।

सूर्यसिद्धान्त के मध्याधिकार श्लोक १२-१३ के अनुसार मास (महीना) दो प्रकार का होता है— १. चान्द्र (ऐन्द्र) मास—इसकी गणना प्रतिपदा से अमावास्या तक १५ दिन का कृष्णपक्ष और पुनः प्रतिपदा से पूर्णिमा तक १५ दिन का शुक्लपक्ष, दोनों को मिलाकर एक मास। २. सौरमास—इसकी गणना मेष (वैशाख),

कृतुचर्याध्यायः ३ ]

सूत्रस्थानम्

४१

वृष ( ज्येष्ठ ) आदि राशियों के अनुसार होती है। इस प्रकार भिन्न-भिन्न राशियों पर सूर्य के संक्रमण को मेघसंक्रान्ति आदि कहते हैं।

सुश्रुत का दृष्टिकोण— ‘इह तु...’प्रावृद्धि’। (सु.सू. ६।१०) अर्थात् यहाँ वर्षा, शरद, हेमन्त, वसन्त, ग्रीष्म, प्रावृद् ये छः ऋतुएँ वात आदि दोषों के संचय, प्रकोप, प्रशमन में कारण हैं। उक्त छः ऋतुएँ भाद्रपद आदि दो-दो मासों को लेकर इस प्रकार मानी गयी हैं—१. वर्षा—भाद्रपद-आश्विन, २. शरद—कार्तिक-मार्गशीर्ष, ३. हेमन्त—पौष-माघ, ४. वसन्त—फाल्गुन-चैत्र, ५. ग्रीष्म—वैशाख-ज्येष्ठ तथा ६. प्रावृद्—आषाढ़-श्रावण। महर्षि सुश्रुत शल्यशास्त्र के आचार्य थे, अतएव उन्होंने वात, पित्त एवं कफ दोषों के संचय, प्रकोप, प्रशम को दृष्टि में रखकर इस प्रकार ऋतुक्रम को व्यवस्थित किया है। कायचिकित्सा-प्रधान चरकसंहिता में ‘प्रावृद्’ नामक ऋतु को स्वीकार न करके अपने क्रम से ‘शिषिर’ ऋतु को माना है। देखें—च.सू. ६।४। फिर भी चरक ने संशोधन-चिकित्सा को ध्यान में रखकर ‘प्रावृद्’ ऋतु की सत्ता को स्वीकारा है। देखें—च.वि. ८।१२५।

मतभेद का समाधान— हमारे ये तन्त्रकार नीरजस्तम, आप्त, शिष्ट, विबुद्ध थे, अतएव इनके सिद्धान्त तीनों काल में मानने योग्य होते हैं, फिर भी जहाँ मतभेद होता है उसका कारण भी होता है। देखें—जिन देशों ( भूखण्डों ) में ठण्ड अधिक पड़ती है वहाँ हेमन्त तथा शिशिर नामक दो ऋतुएँ शीतकाल की होती हैं और जहाँ वर्षा अधिक होती है वहाँ प्रावृद् तथा वर्षा नाम की दो ऋतुएँ मानी जाती हैं। हमारे भारतवर्ष में हिमालय के कई भाग ऐसे भी हैं जहाँ वर्षभर सर्दी बनी रहती है। आसाम आदि कुछ स्थान ऐसे हैं जहाँ वर्षा अधिक होती है तथा दक्षिण के कुछ देश ऐसे भी हैं जहाँ अधिक गर्मी पड़ती है; तथापि ऋतुओं का अपना प्रभाव उन-उन स्थानों पर भी अवश्य पड़ता ही है। इसी दृष्टि से प्राचीन महर्षियों ने भौगोलिक सर्वेक्षण कर अधिकाधिक प्रभावकारी भूभागों को उक्त विभाजन की सूक्ष्म दृष्टियों से देखा है, जो चिकित्सा की दृष्टि से उपादेय है।

सुश्रुत ने पहले ऋतुभेद से जिन वात आदि दोषों के चय, प्रकोप, प्रशम का वर्णन वर्षभर की अवधि में दिखलाया था, उसे दिन-रात के रूप में इस प्रकार कहा है—दिन के पूर्वार्ध में वसन्तऋतु ( कफप्रकोप ) के मध्याह्नकाल में, ग्रीष्मऋतु ( वातसंचय ) के अपराह्न में प्रावृद् ऋतु ( वातप्रकोप ) के प्रदोषकाल ( रात्रि के पूर्वभाग ) में वर्षाऋतु के ( पित्तसंचय ) के आधीरात में शरद ऋतु ( पित्तप्रकोप ) के, रात्रि के अन्तिम भाग ( उषःकाल ) में हेमन्तऋतु ( कफसंचय ) के लक्षण होते हैं। इस प्रकार दिन-रात में भी दोषों के संचय, प्रकोप तथा प्रशम होता है। देखें—सु.सू. ६।१४।

तस्मिन् ह्यत्यर्थतीक्ष्णोरुक्षा मार्गस्वभावतः। आदित्यपवनाः सौम्यान् क्षययन्ति गुणान् भुवः। तिक्तः कषायः कटुको बलिनोऽत्र रसाः क्रमात्। तस्मादादानमाशेयम्—

अग्निगुण-प्रधान आदानकाल— इस उत्तरायण काल में सूर्य के उत्तरमार्ग में चलने के कारण सूर की किरणें अत्यन्त तीक्ष्ण तथा उष्ण ( गरम ) हो जाती हैं। सूर्य की गरमी से तपी हुई हवाएँ भी उष्ण एवं रुक्षा हो जाती हैं अर्थात् लू चलने लगती है। अतएव ये दोनों ( सूर्य तथा हवा ) पुष्टी के सौम्य ( शीतल तथा गीलापन आदि ) गुणों को क्षीण ( नष्ट ) कर देते हैं। यही कारण है कि इन दिनों प्राणियों का भ्रंशारीरिक बल क्षीण हो जाता है। इस उत्तरायण काल में क्रमशः शिशिर ऋतु में तित्करस, वसन्त ऋतु में कषाय रस और ग्रीष्म ऋतु में कटुरस बलवान् ( शक्तिशाली ) हो जाते हैं। यही कारण है कि यह आदानकाल आशेय ( अग्निगुण प्रधान ) कहा गया है॥ ३॥

वक्तव्य— ‘आदित्यपवनाः’ अर्थात् सूर्य की उष्णता से युक्त इधर-उधर बहती हुई हवाएँ इस काल में अपनी भयंकरता से युक्त रहती हैं। वास्तव में हवा का स्वभाव ही ऐसा होता है कि गर्मी में वहाँ ‘लू’ का रूप धारण कर लेती है और जाड़ों में सर्दी का। इस सम्बन्ध में चरक ने कहा है—‘वायु को

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अष्टाङ्गहृदय

योगवाही कहा गया है—जैसा उसे संयोग मिलता है, वैसा उसका स्वभाव हो जाता है'। देखें—च.चि. ३१८। अग्निगुण-प्रधान आदानकाल का वर्णन चरक ने भी प्रायः इसी प्रकार किया है। देखें—च.सू. ६६।

—ऋतवो दक्षिणायनम् ॥ ४ ॥

वर्षादयो विसर्गश्च—

विसर्गकाल-दक्षिणायन—वर्षा, शरद् तथा हेमन्त नामक इन तीन ऋतुओं का नाम दक्षिणायन है, इसी का दूसरा नाम है 'विसर्ग काल'। क्योंकि 'विसुजति ददाति बलम् इति विसर्गः कालः' ॥ ४ ॥

—यद्वन्न विसुजत्ययम्। सौम्यत्वादत्र सोमो हि बलवान् हीयते रविः ॥ ५ ॥

मेघवृष्ट्यचनितैः शीतैः शान्ततापे महतीतले। स्निग्धाश्चैहाम्ललवणमधुरा बलिनो रसाः ॥ ६ ॥

विसर्गकाल-परिचय—यह काल सौम्य होने के कारण प्राणिमात्र को बल देता है। इस काल में सौम्यगुणों वाला सोम ( चन्द्रमा ) बलवान् रहता है और सूर्य का बल क्षीण हो जाता है। इस काल में मेघों ( बादलों ) के छाये रहने के कारण, वर्षा के होते रहने से इन दोनों के कारण शीतल हवा के बहने से भूतल का सन्ताप शान्त हो जाता है। अतः वर्षा ऋतु में स्निग्ध गुण वाला अम्ल रस, शरद् ऋतु में लवण रस तथा हेमन्त ऋतु में मधुररस बलवान् हो जाते हैं। फलतः इस विसर्गकाल ( दक्षिणायन ) में प्राणियों के देह तथा उनका बल बढ़ जाता है, अतएव इसे 'विसर्गकाल' कहते हैं ॥ ५-६ ॥

वक्तव्य—'वि + गुञ् + घञ् = विसर्गः' अर्थात् दान। यह काल प्राणियों को बल का विसर्जन करता है। चरक-सुश्रुत ने भी इस काल की प्रशंसा की है।

शीतैऽग्रघं वृष्टिघमैऽल्पं बलं मध्यं तु शेषयोः।

बल का चयापचय—शीत ऋतुओं ( हेमन्त तथा शिशिर ) में प्राणियों में बल की स्थिति उत्तम रहती है, शेष दो शरद् तथा वसन्त ऋतुओं में शारीरिक बल की स्थिति मध्यम कोटि की तथा वर्षा और ग्रीष्म ऋतुओं में बल की मात्रा अति अल्प हो जाती है।

वक्तव्य—विसर्गकाल में क्रमशः बढ़ा हुआ शारीरिक बल आदानकाल में क्रमशः उस प्रकार घटता जाता है, जैसे शुक्लपक्ष में क्रमशः बढ़ा हुआ चन्द्रमा कृष्णपक्ष में क्रमशः घटता जाता है। अतएव शारीरिक बल के ह्रास-वृद्धि क्रम को हीन, मध्य, उत्तम भेद से तीन भागों में विभाजित किया गया है।

बलिनः शीतसंरोधाद्वेमन्ते प्रबलोऽनन्तः ॥ ७ ॥

भवत्यल्पेन्दनो धातून् स पचेद्वायुनेरितः। अतो हि मेऽस्मिन्सेवेत स्वाद्गम्ललवणात्रसान् ॥ ८ ॥

हेमन्तऋतुचर्या—हेमन्त ऋतु में कालस्वभाव के कारण पुरुष अधिक बलवान् रहता है। क्योंकि शीत के कारण भीतर रुका होने के कारण ( अर्थात् रोमकूपों के शीत से अवरुद्ध होने के कारण ) जठराग्नि ( पाचकाग्नि ) अधिक बलवान् हो जाती है। यदि उसे आहार रूपी ईधन ( जिसे वह जठराग्नि पका या जला सके। ) कम मिल पाता है, तो वह अग्नि वायु द्वारा प्रेरित होकर ( मुलगकर ) रस आदि शरीरस्थ धातुओं को पचाने लगता है। इसलिए हेमन्त ऋतु में वातनाशक मधुर, अम्ल तथा लवण रसयुक्त पदार्थों का पर्याप्त सेवन करना चाहिए ॥ ७-८ ॥

वक्तव्य—यह हेमन्तऋतुचर्या है, कभी-कभी ऐसा भी देखा जाता है कि गर्मी में गर्मी नहीं पड़ती, वर्षा ऋतु में वर्षा नहीं होती और सर्दियों में जाड़ा नहीं पड़ता; इसे ऋतुविपर्यय कहते हैं। ये लक्षण शनि आदि ग्रहों के अतिचार से भी देखे जाते हैं। आजकल राकेट आदि अन्तरिक्ष में छोड़े जा रहे हैं, इनके प्रकोप से भी ये परिवर्तन दिखलायी दे रहे हैं। ऐसी स्थिति में कुशल चिकित्सक देश-काल की सामयिक स्थिति के अनुसार ऋतुचर्या का निर्देश करे।

ऋतुचर्याध्यायः ३ ]

सूत्रस्थानम्

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मुश्रुत के अनुसार हेमन्तचर्या—'हेमन्ते लवणक्षारतिक्रताम्लकटुककोल्कटम्। सर्पिस्तैलमहिममशनं हितमुच्यते' ॥ (सू.उ. ६४१३) अर्थात् हेमन्त ऋतु में नमकीन, तित्त, क्षार, अम्ल, कटु रसों का एवं मर्पात्न घी-तैल का तथा इनसे बने हुए भोज्य पदार्थों का सेवन हितकर होता है। इस काल में वातकारक पदार्थों का सेवन न करे। ऊपर कहे गये तित्त, कटु आदि रस-प्रधान पदार्थ कफदोष के विनाशक होते हैं, क्योंकि इस काल में कफ की वृद्धि स्वभावतः होती है।

देव्याग्निश्रानामतेर्हि प्रातरेव बुभुक्षितः। अवश्यकार्य सम्भाव्य यथोक्तं शीलयेदनु॥ ९ ॥

वातघ्नतेलेरभ्यङ्गं मूर्छि तैले विमर्दनम्। नियुद्धं कुशलैः सार्धं पादाघातं च युक्तिः॥ १० ॥

प्रातःकाल के कर्तव्य—हेमन्त ऋतु में रातें लम्बी होने लगती हैं, अतः प्रातःकाल उठते ही भूख लग जाती है। इसलिए प्रातःकाल समय पर उठकर मल-मूत्र करने के बाद शौच आदि क्रिया से निवृत्त होकर दतवन आदि करके उसके बाद यथोक्त (आठवें पद्य में ऊपर जो कहा है—'सेवेत स्वादम्ललवणान् रसान्') का सेवन करे अर्थात् मधुर, लवण तथा अम्ल रसयुक्त पदार्थों (मिठाई, नमकीन आदि) को खावे अथवा जलपान करे। इस ऋतु में प्रतिदिन वातनाशक तैलों का मालिश करे या कराये। मल्लविद्याकुशल पहलवानों के साथ कुशती करे, यदि सम्भव हो तो पादाघात (लंगड़ी लगाना) आदि को विधिपूर्वक सीखे, अन्यथा कुल व्यायाम अवश्य करे ॥९-१०॥

वक्तव्य—'अवश्यकार्य' की व्याख्या हमने ऊपर कर दी है। 'बुभुक्षितः'—यद्यपि ऊपर कहा गया है कि भूख लगे हुए पुरुष को आवश्यक कार्य करने के बाद खाना चाहिए। इस प्रसंग में च.चि. १५।११७ से २२० तक पद्यों का अनुशीलन करें। इन सबका तात्पर्य यह है कि उसे तत्काल भोजन दें, अन्यथा उपेक्षा करने से उसकी मृत्यु भी हो सकती है। और भी देखें—'आहारकाले सम्प्राप्ते यो न भुव्हते बुभुक्षितः। तस्य सौदति कायाग्निरिन्धन इवानलः' ॥ इन उद्धरणों से बुभुक्षित को भोजन करना ही चाहिए, ऐसा समझें। यहाँ व्यक्ति की स्वास्थ्थ-सम्पत्ति का विचार करके चिकित्सक निर्देश दे कि तत्काल भोजन देना आवश्यक है या शौच आदि करने के बाद।

कषायापहृतस्नेहस्तः स्नातो यथाविधि। कुड्कुमेन सदपेण प्रदिग्धोऽगुहधूपितः॥ ११ ॥

रसान् स्निधान् पलं पुष्टं गौडमच्छसुरां सुराम्। गोधूमपिष्टमाषेषुक्षीरोत्थविकृतीः शुभाः॥

नवमत्रं वसां तैलं, शौचकार्यं सुखोदकम्। प्रावाराजिनकोशेयप्रवेणौकौचवास्तुतम्॥ १३ ॥

उष्णस्वभावैर्लघुभिः प्रावृतः शयनं भजेत्। युक्त्याऽर्किरणान् स्वेदं पादत्राणं च सर्वदा॥ १४ ॥

स्नान आदि विधि—उसके बाद आँवला आदि कमैले द्रव्यों के कल्क (चटनी के समान पैसे हुए द्रव्यों) से पहले किये गये अयंग (मालिश) की चिकनाहट को दूर करे, फिर विधिपूर्वक स्नान करे। उसके बाद शरीर को मोटे तौलिया से पोंछकर कुंकुम, कस्तूरी आदि उष्णगुण-प्रधान द्रव्यों का लेप (तिलक) लगाये और अगुह की धूप की सुवास का सेवन कर तदनन्तर भोजन करे।

भोजन में घी-तैल में भुना गया मांसरस स्वस्थ प्राणियों के मांस का होना चाहिए। गुड से बने पदार्थ, स्वच्छ (उत्तम) मद्य या सामान्य मद्य, गेहूँ का आटा, उड़द की दाल, इक्षुरस, दूध द्वारा निर्मित पदार्थ (दही, मठा, मलाई, रबड़ी, खुरचन आदि), नये चावलों का भात, वसा, तैल का सेवन करे। हाथ धोने आदि के लिए गुनगुना गरम जल का प्रयोग करे।

इन दिनों प्रावार (ऊनी कम्बल आदि), मुगचर्म, रेशमी बिछौना, टाट या कुथक (रंग-बिरंगा कम्बल या गलीचा या गद्दा) बिछाकर रखें। ऊनी हल्के चादर को ओढ़कर सोयें। प्रातःकाल युक्तिपूर्वक सूर्य की किरणों का सेवन करे। स्वेदन कर्म करे तथा जूता-जुराब (मोजे) को सदैव धारण करे ॥११-१४॥

वक्तव्य—कोश-साहित्य में 'नियुद्ध' शब्द का अर्थ है—बाहुयुद्ध। 'पादाघातं च युक्तिः'—यहाँ पादाघात रूपी व्यायाम को थकावट आने से पहले छोड़ दें, यही युक्ति है! 'कषायापहृतः स्नेहः'—मालिश

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अष्टाङ्गहृदये

के समय जो शरीर पर तेल लगा है, उसे कपाय-द्रव्यों से दूर करें, न कि सावून आदि धारयुक्त पदार्थों से। इनके प्रयोग से केशभूमि रूक्ष हो जाती है।

स्नानविधि —इसके लिए शास्त्र में दोषी अवगाहन ( टब में लेटकर नहाने ) का विधान है। इसमें गरम पानी भर दिया जाता है, मिर को डुबाये बिना पूरे शरीर का इस प्रकार मुखद स्नान हो जाता है। केशर-कस्तुरी का लेप करने से शरीर सुवासित हो जाता है और शरीर में उष्णता का संचार भी होता है।

भोजन —खाने वाले की रुचि के अनुसार इसका निर्माण किया तथा कराया जाता है। मांस-भोजन मांसभोजियों के लिए है। शाकाहार सबके लिए है। उड़न के बड़े तथा पकीड़े शाकाहारियों के मांस के प्रतिनिधित्वरूप आहारद्रव्य हैं। वसा प्राणिज स्नेह है। गौड शब्द से गूड़ से बने भोज्य पदार्थ या मांस का ग्रहण किया जाता है। प्रबेणी—रंगीन ऊनी वस्त्र। कौचब—रंकित वस्त्रभेद। पाठभेद के अनुसार कुथक—‘कुथ’ का अर्थ अमरकोश में ‘कुश’ दिया है। इसके कुशासन बनते हैं। ये विछाये जाते हैं। धान के पुआल का गढ़ा गरीबों का उत्तम बिस्तर है, किन्तु श्रीचक्रपाणि ने कुथक का अर्थ चित्रकम्बल किया है। इसी अर्थ में माषपण्डित ने भी इस शब्द का प्रयोग किया है। देखें—‘कृयेन नागेन्द्रमिवेन्द्रवाहनम्’ ( शिशुपालवध १।८ ) इसके अतिरिक्त श्रीअत्रिदेव तथा श्रीछायागोत्री ने इसका अर्थ रई का गढ़ा किया है। यह अर्थ प्रसंगोचित होने पर भी विचारणीय है। मूल में ‘कौचब’ शब्द होने पर भी श्रीहेमाद्रि ‘कुथक’ का पर्याय कम्बल दे रहे हैं। अस्तु।

पौवरोहस्तनश्रोण्यः समदाः प्रमदाः प्रियाः । हरन्ति शीतमुष्णाङ्गुचो धूपकुडुकुमयोवनेः ॥ १५ ॥

शीतताशक उपाय —पीन ( स्थूल एवं पुष्ट ) ऊह, स्तन तथा श्रोणिवाली यौवन तथा सुरा के मद से मदमाती हुई प्रिया, कुंकुम के लेप, अगुरु की धूप एवं यौवनमद के कारण उष्ण शरीर वाली नारियाँ ( भोग्या स्त्रियाँ ) शीत को हर लेती हैं ॥ १५ ॥

अङ्गारतापसन्तप्तगर्भभूवेशमचारिणः । शीतपारुष्यजनितो न दोषो जातु जायते ॥ १६ ॥

निवास-विधि —जल्ले हुए अंगारों से तपे हुए मकान के निचले तल में निर्मित कमरे में ( जहाँ बाहर बहने वाली शीतल हवा का प्रवेश न हो ) अथवा गर्भभूवेशम ( घर के भीतर बनी हुई गुफा ) में निवास करने वाले नर-नारियों को शीत के कारण उत्पन्न होने वाली परुषता सम्बन्धी कोई विकार कभी नहीं होता। अतः इन दिनों उक्त प्रकार के घर में निवास करें ॥ १६ ॥

अयमेव विधिः कार्यः शिशिरेऽपि विशेषतः । तदा हि शीतमधिकं रौक्ष्यं चादानकालजम् ॥ १७ ॥

शिशिर ऋतुचर्या —हेमन्त ऋतु में कहीं गयी सभी विधियों का सेवन विशेष करके शिशिर ऋतु में भी करना चाहिए। विशेषता यह है कि इस ऋतु में हेमन्त ऋतु की अपेक्षा शीत अधिक पड़ने लगता है, क्योंकि इस ऋतु में आदानकाल का प्रारम्भ हो जाता है। अतः इसमें रुक्षता आने लगती है ॥ १७ ॥

वक्तव्य —इसमें आदानकाल के प्रारम्भ होने के कारण जो रुक्षता होने लग जाती है, उसकी शान्ति के लिए अश्वंग का सेवन तथा स्निग्ध आहारों का सेवन करना चाहिए। संक्षेप में यही ‘शिशिर ऋतुचर्या’ है। तन्त्रकार का सूत्र रूप में सामान्य-विशेष विधि से वर्णन का प्रकार सर्वत्र दिखाई देता है।

कफश्चित्तो हि शिशिरे वसन्तेऽर्काशुतापितः । हृत्वाऽग्निं कुहते रोगानतस्तं त्वरया जयेत् ॥ १८ ॥

तीक्ष्णैर्विमनस्यार्चैर्लघुरूक्षैश्च भोजनैः । व्यायामोर्द्वतनाघातेर्जित्वा स्लेष्माण्मूल्यणम् ॥ १९ ॥

स्नातोऽनुलिप्तः कर्पूरचन्दनागुरुकुडुकुमैः । पुराणयवगोधूमक्षौद्रजाङ्गूलशूल्यभुक ॥ २० ॥

सहकाररसोन्मिश्रान्तास्वाद्य प्रिययाऽपितान् । प्रियास्यसङ्गसुभोन् प्रियानेत्रोत्पलाङ्कितान् ॥

सौमनस्यकृतो हृद्यान्यस्यैः सहितः पिबेत् । निर्गदानासवारिष्टसौधुमाद्रौकमाधवान् ॥ २१ ॥

शृङ्गबेराम्बु साराम्बु मध्वम्बु जलदाम्बु च ।

ऋतुचर्याध्यायः ३ ]

सूत्रस्थानम्

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वसन्त ऋतुचर्या —शिशिर ऋतु में शीत की अधिकता के कारण स्वाभाविक रूप से कफदोष का संचय हो जाता है। वह कफदोष वसन्त ऋतु में सूर्य की किरणों से सन्तप्त होकर पिघलने लगता है, जिसके कारण पाचकाग्नि मन्द पड़ कर अनेक प्रकार के (प्रतिशय आदि) रोगों को उत्पन्न कर देता है, अतः इस ऋतु में उस कफदोष को शीघ्र निकालने का प्रयत्न करे। ( वमन तथा रुक्ष नस्यों के प्रयोग से इसका निर्हरण करे। ) अन्यत्र कहा भी है—‘हेमन्ते चैतये श्लेष्मा वसन्ते च प्रकुप्यति’। यहाँ हेमन्त शब्द के साहचर्य से शिशिर ऋतु का भी ग्रहण कर लेना चाहिए, क्योंकि दोनों की ऋतुचर्या प्रायः समान है। इसका तात्पर्य यह हुआ कि हेमन्त-शिशिर ऋतु में संचित कफदोष का प्रकोप वसन्त ऋतु में होता है। इसलिए कफदोष को निकालने के लिए तीक्ष्ण वमनकारक द्रव्यों द्वारा वमन कराये और तीक्ष्ण एवं रुक्ष औषधों का प्रतिदिन नश्य लें। लघु ( शीघ्र पचने वाले) तथा रुक्ष ( स्नेहरहित) भोजन करे। व्यायाम, उबटन, आघात ( दण्ड-बैठक ) का प्रयोग करें और कराये, जिससे बढ़ा हुआ कफदोष शान्त हो जाय ( अन्यत्र इस ऋतुचर्या में घूमपान, कवलग्रह का भी विधान है )। उसके बाद स्नान करें; फिर कपूर, अगर, चन्दन, कुंकुम का शरीर में अनुलेप लगाये ( तिलक करे )। भोजन में पुराने जौ, गेहूँ की रोटी आदि बनाकर खाये, मधु का सेवन करें, जांगल देश के प्राणियों के मांस के बड़े बनवाकर खाये, जो लोहे की शलका में पिरोंकर पकाये जाते हैं, अतएव इन्हें ‘शूल्य’ कहा जाता है।

पान-विधि —पके हुए आम का रस निकाल कर, जिसे पहले प्रियतमा ने चबकर अपने प्रियतम को दिया हो, प्रिया के मुख की गन्ध से सुरभित, जिस पर प्रिया के नयनकमलों की छाया पड़ रही हो, जो मन को प्रिय लगने वाला हो, हृदय को शक्ति देने वाला हो; ऐसे आम के रस का मित्रमण्डली के साथ पान करे। ( ध्यान रहे, इन मित्रों के साथ-साथ पली भी अवश्य रहे, नहीं तो ‘प्रियानेतोत्पलाङ्कितान्’ यह विशेषण व्यर्थ हो जायेगा )। दोपरहित आसव, अरिष्ट, सीधु, मुनवका द्वारा निर्मित सुरा तथा महुआ के आसव का सेवन भी मित्रों के साथ बैठकर उचित मात्रा में करे। अदरख का पानी, विजयसार तथा चन्दन का जल, मधुमिथित जल और नागरमोथा का कथित जल इनका भी सेवन करे ॥ १५-२२ ॥

वक्तव्य —ऊपर जो विस्तृत खान-पान व्यवस्था बतलायी है, इसका उद्देश्य यह है कि जिसे जो रुचिकर तथा प्रिय हो उसका वह सेवन करे। अदरख का पानी आदि सभी का क्वाथ कर लें, मध्वम्बु को केवल जल में घोलकर लें। यहाँ तक वसन्त ऋतु की प्रातःकालीन चर्या का वर्णन कर दिया गया है।

दक्षिणानिलशीतेषु परितो जलवाहिषु ॥ २३ ॥

अवृष्टनष्टसूर्येषु मणिकुटिमकान्तिषु। परपुष्टविघृष्टेषु कामकर्मन्तभूमिषु ॥ २४ ॥

विचित्रपुष्पवृक्षेषु काननेषु सुगन्धिषु। गोष्ठीकथाभिश्चित्राभिर्मध्याह्ं गमयेत्सुखी ॥ २५ ॥

मध्याह्नचर्या —जो घने वन दक्षिण दिशा की वायु अर्थात् मलयज पवन से शीतल तथा सुगन्धित हों, जहाँ चारों ओर जलप्रवाह हो रहा हो, जहाँ सूर्य का प्रकाश थोड़ा पड़ रहा हो या वन के घने होने से न हो रहा हो, जहाँ हीरे-मरकत आदि के फर्श बने हों; इनकी कान्ति से युक्त वनों में, जहाँ कोयलें कुक रही हों, सहवास करने योग्य स्थानों में, जहाँ विविध प्रकार के सुगन्धित फूलों वाले वृक्ष हों, ऐसे वनों ( उद्यानों ) में सुख चाहने वाला पुरुष मित्रमण्डली की कथा-मुभाषित युक्त सभाओं द्वारा मध्याह्नकाल को बिताये ॥ २३-२५ ॥

गुरुशीतदिवास्वप्नस्निग्धास्लमधुरास्यजेत् ।

वसन्त ऋतु में अपथ्य —इस ऋतु में गुरु ( देर से पचने वाले भक्ष्य पदार्थ ), शीतल पदार्थ, दिन में सोना, स्निग्ध ( ची-तेल से बने हुए खाद्य ) पदार्थों, अम्ल तथा मधुर रस-प्रधान पदार्थों का सेवन न करें, क्योंकि ये सभी कफवर्धक होते हैं।

४६

अष्टाङ्गहृदये

तीक्षांशुरतितीक्षांशुग्रीष्मे सङ्क्षिप्ततीव यत् ॥ २६ ॥

प्रत्यहं क्षीयते श्वेष्मा तेन वायुश्च बर्धते । अतोऽस्मिन्दुकट्टमूलव्यायामार्ककांस्त्यजेत् ॥ २७ ॥

ग्रीष्म ऋतुचर्या—ग्रीष्म ऋतु में तीक्षांशु ( सूर्य ) अपनी तेज किरणों से संसार के जलीय तत्व को सुखा देता है। ( यहाँ एक दूसरा पाठभेद इस प्रकार मिलता है—'स्नेहमर्काऽतितीक्षांशुः' । यह पाठ अधिक स्पष्ट है, इससे भी चरकोक्त यह पाठ अधिक स्पष्ट है—'मयुखैर्जगतः स्नेहं ग्रीष्मे पेपीयते रविः' । ( च.सू. ६।२७ ) जिसके कारण शरीरस्थित जलीय अंश कफघातु का भी क्षय होने लगता है, फलतः वातदोष की वृद्धि होती जाती है। इसलिए इस ऋतु में लवण, कटु तथा अम्ल रस-प्रधान पदार्थों का, व्यायाम एवं धूप ( घाम ) का सेवन करना छोड़ दें ॥ २६-२७ ॥

भजेन्मधुरमेवात्रं लघु स्निग्धं हिमं द्रवम् ।

सेवनीय पदार्थ—इस ऋतु में अधिक मधुर आहारों का सेवन करें तथा लघु ( शीघ्र पच जाने वाले ), स्निग्ध ( घी-तेल से बने हुए ) पदार्थों, शीतल एवं पेयों का सेवन करें।

बक्तव्य—घी-तेल से बने पदार्थ गुरु होते हैं, अतः 'गुरुणामर्धसौहित्यम्' अर्थात् गुरु पदार्थों को भरपेट न खाकर आधा ही खाना चाहिए, यह शास्त्र की आज्ञा है; नहीं तो पाठकों को सन्देह होगा कि ऊपर पहले लघु ( सुपच ) कहा है, फिर आगे स्निग्ध ?

सुशीततोयसिक्ताङ्गो लिङ्गात्सकून् सर्शकरान् ॥ २८ ॥

सत्-सेवनविधि—अत्यन्त शीतल जल ( यह स्वभावशीतल जल पर्वतीय प्रदेशों में मुलभ होता है, कुत्रिम शीतल जल सर्वत्र मिल सकता है, किन्तु गुणवत्ता की दृष्टि से वह निकृष्ट होता है। देखें—'हिमवत्प्रभवाः पथ्याः पुण्या देवर्षिसेविताः' । च.सू. २७।२०९ ) से स्नान करें, चीनी मिलाकर सतुओं को चाटें। ( चाटने योग्य बनाने के लिए उसमें शीतल जल मिला लें ॥ २८ ॥

मद्यं न पेयं, पेयं वा स्वल्पं, सुबहुवारि वा ।

मद्य-सेवनविधि—इन दिनों मद्यपान न करें, यदि पीना ही हो तो थोड़ा पीयें अथवा उसमें बहुत-सा जल मिलाकर पीयें। इतना भी वे पीयें जिन्हें यह अनुकूल पड़ता हो।

अन्यथा शोषशैथिल्यदाहमोहान् करोति तत् ॥ २९ ॥

मद्यपान का निषेध—शास्त्रीय आज्ञा के विरुद्ध किया हुआ मद्यपान शोष ( क्षय ), पाठभेद के अनुसार शोफ = सूजन, शैथिल्य ( शिथिलता = अंगों में ढीलापन ), दाह ( जलन ), बेहोशी आदि विकारों को उत्पन्न कर देता है ॥ २९ ॥

कुन्देन्दुधवलं शालिमशनीयाज्जाङ्गलैः पलैः ।

भोजन-विधान—कुन्द ( चमेली का एक भेद 'मोतिया' ) के समान सफेद तथा इन्दु ( चन्द्रमा ) के समान शीतल ( शीतवीर्य ) शालिचावलों के भात को तीतर, बटेर आदि जांगलदेशीय प्राणियों के मांसरस के साथ खाये।

पिबेदसं नातिघनं रसालां रागखाण्डवौ ॥ ३० ॥

पानकं पञ्चसारं वा नवमूद्राजने स्थितम् । मोचचोचदलैर्युक्तं साम्बं मृन्मयशुक्तिभिः ॥ ३१ ॥

पाटलवासितं चाम्बः सकर्पूरं सुशीतलम् ।

पेय-विधान—अधिक गाढ़े मांसरस का सेवन न करें। रसाला, राग ( रायता ), खाण्डव ( खट्टे, मधुर, नमकीन रसों के घोल ) का पान करें। पञ्चसार का सेवन करें, जो नये मिट्टी के पात्र में बनाया गया हो; इस पात्र की सौधी गन्ध भी उसमें आ जाती है, उसे शीतल करने के लिए कुछ देर केले अथवा

कतुचर्याध्यायः ३ ]

सूत्रस्थानम्

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महृष्ट के पत्तों से ढककर रखे हुए पन्ना या शर्बत को पीयें, जिसमें कुछ खटाई भी मिलायी गयी हो। इसे पीने के लिए मिट्टी का पुरवा या कुल्हड़ या कसोरा होना चाहिए। पीने से पहले इसे पाइल के फूलों तथा कपूर से सुगन्धित कर लेना चाहिए ॥ ३०-३१ ॥

वक्तव्य —इस प्रकरण में आये हुए भक्ष्य, भोज्य, पेय आदि पदार्थों का निर्माण-प्रकार भावप्रकाश के कुतान्नवर्ग में या पूर्ववर्ती संहिताग्रन्थों में देख लेना चाहिए।

पञ्चसार —इसका उल्लेख अ.हू.चि. २।१३ में इस प्रकार दिया है—मधु, खजूर, मुनक्का, फाल्गुमा, मिथ्री तथा जल—इन पाँचों को मिलाकर बनाये गये मन्थ का दूसरा नाम 'पञ्चसार' है।

शशाङ्ककिरणान् भक्ष्यान् रजन्यां भक्षयन् पिवेत् ॥ ३२ ॥

ससितं माहिषं क्षीरं चन्द्रनक्षत्रशीतलम्।

रात्रि में दुग्धपान-विधि —शशांककिरण नामक भोजनों का सेवन करते हुए चन्द्रमा तथा तारों द्वारा शीतल किया गया और मिथ्री मिले हुए घैस के दूध को पीये ॥ ३२ ॥

वक्तव्य —शशांककिरण नामक भोजन का परिचय—'तालीसर्चुण्टटकाः सकर्पूरमितोपलाः। शशाङ्ककिरणग्याश्व भक्ष्या रुचिकराः परम्' (अ.हू.चि. ५।४९)।

अभ्रङ्कपमहाशालतलरुद्दोणरश्मिषु ॥ ३३ ॥

वनेषु माधवीशिलष्टद्वान्नास्तबकशालिषु।

मध्याह्नचर्या —दोपहर के समय धूप में पीड़ित मानव आकाश को छूने वाले अर्थात् बहुत ऊँचे बड़े-बड़े शाल, ताल, तमाल वृक्षों से जहाँ सूर्य की किरणें छिप गयी हों तथा माधवीलताओं से परिवेष्टित, अंगूरों के गुच्छों से युक्त उपवनों में शयन या आराम करें ॥ ३३ ॥

वक्तव्य —यद्यपि इसी प्रकरण के ३६वें पद्य में 'स्वप्न्यात्' क्रिया का समावेश है, जिसका अध्याहार यहाँ भी कर लिया गया है।

सुगन्धिहिमपानीयसिन्धुमानपटालिके ॥ ३४ ॥

कायमाने चित्ते चूतप्रवालफललुम्बिभिः।

शयन-विधान —सुगन्धित एवं शीतल जल से बार-बार सींचे गये पटालिकाओं ( परदों ) वाले आमों के कोमल पत्तों एवं फलों की बन्दनवारों से सुसज्जित, कायमान ( जो ऊँचाई तथा चौड़ाई में निवास करने के इच्छुक नर-नारी के शरीर के नापवाले घर में तथा उसमें बिछे हुए बिस्तर ) में सोयें ॥ ३४ ॥

वक्तव्य —'कायमाने' शब्द की यहाँ जो उपयोगिता है और जो उसका शाब्दिक अर्थ है, वह हमने ऊपर लिखा है। देखें—वी.एस. आण्डे कोश। श्री अरुणदत्त ने 'कायमाने' शब्द का 'वैष्णवादिनिष्पादिते गृहविशेषे' यह जो अर्थ किया है, इस अर्थ को अभिव्यक्त करने की इसमें कितनी शक्ति है, इस पर विचार करना होगा। गर्मियों में बाँस के सहारे सरपत, घास-फूस के घर बनाये जाते हैं, पर उन्हें 'कायमान' संज्ञा कब किसने दी, यह विचारणीय है।

कदलीदलकह्लारमृणालकमलोत्पलैः ॥ ३५ ॥

कोमलैः कल्पिते तलपे हसत्कुसुमपल्लवे। मध्यन्दिनेऽकैतापार्तैः स्वप्न्याद्वारागृहेऽथवा ॥ ३६ ॥

पुस्तत्रौस्तनहस्तात्यप्रवृत्तोशीरवारिणि ।

शयन-विधान —केले के पत्तों, सुगन्धित कह्लारों ( कमलभेदों ), मृणालों ( कमलकन्द = बिसों ), कमलों, नीलकमलों से निर्मित तथा खिले हुए फूलों एवं मुलाधम पत्तों से युक्त कोमल शयन = शय्या पर दोपहर की गर्मी से पीड़ित पुरुष सोए ( यही चर्या स्त्रियों के लिए भी है ) अथवा धारागृह के समीप शयन

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अष्टाङ्गहृदये

करे। जिस घर में शिल्पियों द्वारा स्त्री की आकृति की पुतलियाँ बनायी हों, उसके स्तनों, हाथों तथा मुख पर रखे गये खस से सुगन्धित जल बह रहा हो, तो ऐसे स्थान पर शयन करें ॥ ३५-३६ ॥

वक्तव्य —श्रीमानों के घरों की साज-सज्जा में 'पुरुष-स्त्री' के जैसे अनेक प्रकार के चित्र किंवा मूर्तियाँ उनके शो.नागृह में अथवा उद्यानों में देखी जाती हैं। यह भी विहार का एक प्राचीन प्रकार रहा है। फूलों तथा किसलियों की शय्या रचाने का प्रकार भी प्राचीन ही है।

निशाकरकराकीर्णे सीधपुष्के निशासु च ॥ ३७ ॥

आसना

रात्रिचर्या —रात के समय चूना पुते हुए महल (सींध) की छत पर, जहाँ चन्द्रमा की चाँदनी छिटकी हो, वहाँ बैठना या लेटना चाहिए ॥ ३७ ॥

—स्वस्थचित्तस्य चन्दनाद्वैतस्य मालिनः। निवृत्तकामतन्त्रस्य सुसूक्ष्मतनुवासः ॥ ३८ ॥

जलाद्रास्तालवृन्तानि विस्तृताः पद्मिनीपुटाः। उत्क्षेपाश्च मृदुक्षेपा जलवर्षिहिमानिलाः ॥

कर्पूरमलिकामाला हाराः सहरिचन्दनाः। मनोहरकलालापाः शिशवः सारिकाः शुकाः ॥

मृणालवलयाः कास्ताः प्रोत्फुल्लकमलोज्ज्वलाः। जङ्गमा इव पद्मिन्यो हरन्ति दयिताः कलमम् ॥

मनोहर वाताबरण —इन दिनों चित्त को स्वस्थ बनाये रखें, चन्दन के लेप से शरीर को गीला करें, फूलों एवं रत्नों की माला को धारण करें, स्त्री-सहवास न करें, पतले एवं हल्के वस्त्रों को धारण करें। पानी में भिगोये हुए ताड़ के पंखों की हवा का सेवन करें या कमल के पत्तों की हवा का सेवन करें या मोरपंखों की हवा ले, जो धीरे-धीरे हिलाये जा रहे हों; इन सभी प्रकार के पंखों से शीतल जल की बूँदें गिर रही हों तथा शीतल हवा आ रही हो, कपूर के घोल से सुवासित स्फटिक की मालाओं को धारण करें; इसी को मलिकामाला कहा गया है। हरिचन्दन से सुवासित मोतियों की मालाएँ धारण करें। चारों ओर तुतली वाणी बोलने वाले शिशु ( बालक-बालिकाएँ) खेल रहे हों, सुग्मे ( तोते तथा मैनाएँ कलरव कर रही हों, कमलानले के कंकण धारण की हुई तथा खिले हुए कमलों के समान उज्ज्वल मुखों वाली चल्ती-फिरती हुई कमलिनियों के सदृश नारियों ग्रीष्मकालजनित सुस्ती को दूर कर देती हैं ॥ ३८-४१ ॥

वक्तव्य —सम्पूर्ण ग्रीष्म ऋतु के वर्णन का सारांश यह है कि इन दिनों सभी प्रकार के आहार-विहार शीतल, सुगन्धित एवं मनोहर होने चाहिए। कालिदास ने इन दिनों को 'परिणामरमणीया दिवसाः' कहा है अर्थात् सायंकाल का समय ही इन दिनों सुहावना लगता है। इस वर्णन को देखकर यह विश्वास होता है कि हमारे पूर्वज बहुत ही सम्पन्न एवं रसिक थे, अन्यथा इस प्रकार चित्रण करना और ऐसे साधन जुटा पाना वाणी से भी अगम ही होते हैं।

आदानगलानवपुषामग्निः सन्नोऽपि सीदति। वर्षासु दोषैर्दुष्यन्ति तेषाम्बुलम्बाम्बुदेऽम्बरे ॥ ४२ ॥

सतुषारणे मरुता सहसा शीतलेन च। भूबाष्पेणाम्लपाकेन मलिनैन च वारिणा ॥ ४३ ॥

बहिर्नैव च मन्देन, तेष्वित्यन्योऽच्यदृषिषु। भजेत्साधारणं सर्वमूषणस्तेजं च यत् ॥ ४४ ॥

वर्षाऋतुचर्या —आदानकाल ( शिशिर, वसन्त, ग्रीष्म ) के प्रभाव से दुर्बल शरीर वाले प्राणियों की पहले से ही मन्द हुई अग्नि ( जठराग्नि ) इस ( प्रावृट् एवं वर्षा ) ऋतु में वात आदि दोषों से और भी अधिक मन्द पड़ जाती है, क्योंकि उक्त वे दोष जल के भार से लटकते हुए बादलों द्वारा आकाश में छाये रहने पर तुषार युक्त अतएव शीतल वायु के स्पर्श से, पृथिवी में से निकलने वाली भाप के प्रभाव से, आहार के अस्मविकाप वाले होने से, इस काल में होने वाले मैले जल के प्रयोग से तथा जठराग्नि के मन्द पड़ जाने से ( वे दोष ) कुपित होकर आपस में एक-दूसरे को दूषित करने लगते हैं। ऐसी स्थिति हो जाने पर साधारण आहार-विहार, जो वात आदि दोषों का शमन करने वाला हो, साथ ही जठराग्निवर्धक हो, उसका सेवन करें ॥ ४२-४४ ॥