भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
५४६ भक्तिसुधा देहभावनासे ही देहकी सत्ता और मनके कारण ही जगद्विभ्रम स्वप्नके बाल्य, वार्धक्यके समान ही एक-एक अनुभवांशमें सहस्रों प्रपंच प्रतीत होते हैं। चित्त ही चिद्रूप परमानन्द हो जाता है। जैसे सिकताके अन्दर तैल नहीं है, वैसे ही वस्तुतः चित्तके भीतर जगत् नहीं है। चित्तमें चिद्भाग ही परमार्थ है। अचित् जड़भाग ही सर्वानर्थ है। जैसे स्वप्नद्रष्टा अविद्यमान ही स्वाप्निक प्रपंचको देखता है, वैसे ही जाग्रदादि सभी प्रपंच केवल द्रष्टाका स्वप्न ही है। सम्पूर्ण दृश्य उसी प्रकार चित्स्वरूपसे व्याप्त है, जिस प्रकार मृगतृष्णाका जल मरु-मरीचिकासे व्याप्त होता है। चित्तरूपी बालक अबोधके कारण मिथ्या ही जगद्रूपी यक्षको देखता है। बोध होते ही निरामय, निर्विकार ब्रह्मको देखने लगता है। चित्तके द्वारा ही वासिष्ठोक्त दस ऐन्दव ब्राह्मण पृथक्-पृथक् दस ब्रह्माण्डोंकी कल्पना करके ब्रह्मत्वको प्राप्त हो गये। एक-एकके ब्रह्माण्डमें इसी प्रकार पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश, चन्द्र, सूर्य, नक्षत्र, सुमेरु, समुद्रादि सभी प्रत्यक्ष देखकर इस ब्रह्माण्डके ब्रह्माको आश्चर्य हुआ। मन ही जगत्का कर्ता है। मनसे कृत ही मुख्य रूपसे कृत समझा जाता है। देहभावनाके कारण ही प्राणी देहधर्मसे बाधित होता है। देह-भावनाके बाधित होनेपर प्राणी देहधर्मसे लिप्त नहीं होता। बाह्यदृष्टिवाला प्राणी ही सुख- दुःखको प्राप्त होता है। अन्तर्मुख होनेसे योगी सुख- दुःख, प्रिय-अप्रिय कुछ भी नहीं जानता। मनके कारण ही विविध प्रकारका जगद्विभ्रम होता है। इसी सम्बन्धमें 'वासिष्ठरामायण' में इन्द्र- अहल्याका आख्यान है। मगध देशमें इन्द्रद्युम्न राजा था। चन्द्रबिम्बके तुल्य उसकी कमललोचना रानी अहल्या थी। उसी नगरमें एक इन्द्र नामका विप्रकुमार था। अहल्याने कथाप्रसंगमें सुना कि पूर्वकालमें इन्द्रको अहल्या बहुत प्रिय थी। बस, फिर तो वह इन्द्रकी परमानुरागिणी हो गयी और वह इसलिये विह्वल हो उठी कि 'मैं अहल्या हूँ, फिर इन्द्र मेरे पास क्यों नहीं आते ?' मृणालतुल्य शीतल आस्तरणपर भी उसे विश्राम नहीं मिलता था। समग्र राजविभूतियाँ उसके लिये व्यर्थ प्रतीत होने लगीं। दिव्य राजकीय ऐश्वर्यमें भी वह जलविद्युत्, निदाघतप्ता मछलीके समान सन्तप्त हो रही थी। भावनाके परिपाकसे अहल्याको चारों ओर इन्द्र परिलक्षित होता था और विवशतासे लज्जाविहीन होकर इन्द्रके सम्बन्धमें ही वह प्रलाप करने लगी। उसकी प्रिय वयस्या (सखी)- ने उसे विकल देखकर कहा—'मैं तुम्हारे प्रिय इन्द्रको ला देती हूँ, तुम धैर्य धारण करो।' अहल्या दीन होकर उसके चरणोंमें गिर पड़ी। सखीने इन्द्र नामक द्विजकुमारके पास जाकर सब वृत्तान्त कहा और उसे लाकर अहल्यासे मिलाया। दोनों ही परस्पर प्रेमसे अनुरक्त हो गये और प्रेमके प्रकर्षके कारण ही रानी समस्त गुणोंसे परिपूर्ण, सर्वैश्वर्यसम्पन्न अपने राजाको भूल गयी और उस विप्रकुमार इन्द्रमें अनुरक्त होकर सम्पूर्ण विश्वको ही इन्द्रमय देखने लगी। इन्द्र भी पूर्णरूपसे उसके अनुरागमें अनुरक्त हो गया। इन्द्रके ध्यानमें भी अहल्याका मुख पूर्णचन्द्रके द्वारा प्रफुल्लित कैरवके तुल्य शोभित होता था। इन्द्रके भी अन्तःकरण, अन्तरात्मा तथा रोम-रोममें अहल्या भरपूर हो गयी और क्षणभर भी उसके बिना वह नहीं रह सकता था। इस तरह अति सघन स्नेहके कारण उनके व्यवहार निरावरण हो गये। राजा इन्द्रद्युम्नको यह वृत्तान्त विदित हो गया, राजाने उन दोनोंको ही विविध प्रकारका दण्ड दिया। शीतकालमें दोनोंको शीतल सलिलमें डाल दिया। दोनों सर्वथा अखिन्न होकर, प्रसन्न हो हँस रहे थे। राजाने पूछा—'तुम दोनों खिन्न न होकर हँस क्यों रहे हो?' वे परस्पर कान्तियुक्त, अनिन्दित मुखका स्मरण करते हुए बोले—'हम दोनों परस्पर प्रेमके कारण रूढ़भाव होकर देहादिका स्मरण ही नहीं करते, अब स्व- स्वांगोंके छिन्न-भिन्न होनेपर भी हमलोगोंको कुछ भी
माँके श्रीचरणोंमें ५४७ कष्ट नहीं होता।' राजाने उन दोनोंको भ्राष्ट्र (भाड़)- में डाल दिया तो भी दोनों एक-दूसरेको निहारते हुए प्रसन्न थे। उन्नत गजेन्द्रके पैरोंतले दोनोंको बाँधा गया। दोनोंको कोड़े लगवाये गये, फिर भी वे प्रसन्न थे। इन्द्रने कहा—'राजन्! मुझे तो सम्पूर्ण संसार प्रिय अहल्याके ही रूपमें दिखलायी देता है और अहल्याको सब कुछ मैं ही प्रतीत होता हूँ। अतः कोई दुःख हम दोनोंको बाधा नहीं पहुँचा सकते। जहाँ-जहाँ रहता हूँ, निपतित होता हूँ, वहाँ प्रिय-संगमसे भिन्न मुझे कुछ भी अनुभूत नहीं होता।' वस्तुतः पुरुष मनोमात्र ही है। देहादि प्रपंच उसीका विकार है। इस तरह सहस्रों दण्ड-विधानोंसे भी उनके मनको बदलनेमें राजा असमर्थ रहा। वस्तुतः दृढ़ निश्चयवाले मनको भिन्न करनेकी शक्ति किसीमें नहीं है। शरीर भले ही वृद्धिको प्राप्त हो, भले कभी कण-कण विदीर्ण हो जाय, दृढ़ निश्चयवाला मन भावित अर्थमें स्थिर ही रहता है। अभीष्ट अर्थमें आविष्ट मनको बाधा पहुँचानेमें शरीरस्थ भाव समर्थ नहीं होते। तीव्र वेगसे मन जिस भावका चिन्तन करता है, उसे ही देखने लगता है। वर-शापादि कोई भी क्रिया उस मनको विचलित नहीं कर सकती। जैसे मृग महापर्वतको विचलित नहीं कर सकते, वैसे ही तीव्र वेगसे भावित अर्थसे मनको कोई भी शक्तियाँ विचलित नहीं कर सकतीं। महोत्सेध देवागारमें भगवतीके समान यह असितापांगी मेरे मनःकोशमें प्रतिष्ठित है, अतः जीवनाधिका प्रियतमासे रक्षित होनेके कारण मुझे कोई भी दुःख नहीं व्यापते। जैसे मेघमालासे प्रावृत पर्वतमें ग्रीष्म, दावाग्निका दाह नहीं व्यापता, वैसे ही प्रियासे व्याप्त मनमें कोई कष्ट नहीं व्यापता। धीर प्राणीके मेरुतुल्य एकनिष्ठ मनको वर-शाप आदिसे भी विचलित नहीं किया जा सकता— एककार्यनिविष्टो हि मनो धीरस्य भूपते। न चाल्यते मेरुरिव वरशापबलैरपि ॥ वर-शापसे देहमें अन्यथात्व हो सकता है, परंतु विजिगीषु मनपर उनका प्रभाव नहीं पड़ता। इन्द्रने कहा—'राजन्! मन ही मुख्य वस्तु है। उसके रहनेपर सहस्रों देह उत्पन्न होते रहते हैं। उसके नष्ट होनेपर कुछ भी नहीं रह जाता। अंकुर रहनेसे ही पल्लवादि होते हैं, अंकुर न रहनेपर पल्लवादि नहीं होते। राजन्! दिशाओं- विदिशाओंमें मैं उसी हरिणाक्षीको ही देखता हूँ। मेरा मन तन्मय होनेसे अन्य दुःखादि मुझे कुछ भी प्रतीत नहीं होता।' राजाने अपने समीप विराजमान भरतमुनिसे अनुरोध किया कि वे इन दुर्मतियोंको शाप देकर नष्ट कर दें। भरतमुनिने भी विचारकर उन्हें शाप दे दिया कि 'तुम दोनों ही विनष्ट हो जाओ।' शाप सुनकर इन्द्र और अहल्याने कहा— 'आपके इस शापसे हमलोगोंका कुछ भी नहीं बिगड़ेगा। केवल आपकी तपस्याका मात्र क्षय हो गया।' घनस्नेहसे दोनोंका ही मन सम्बद्ध था। उसी घनस्नेहसे सम्बद्धमनस्क दोनोंकी देह नष्ट हो गयी और दोनों ही मृगयोनिमें उत्पन्न हुए। वहाँ भी दोनों ही परस्पर प्रेमासक्त थे। अनन्तर विहंग हुए। वहाँ भी वही लोकोत्तर अनुरागोद्रेक हुआ। पुनः दोनों ही परम तपस्वी ब्राह्मण-दम्पती हुए। उनके अकृत्रिम प्रेम-रसानुविद्धस्नेहको देखकर वृक्ष भी रसानुविद्ध होकर शृंगारचेष्टाकुलित होते हैं— अकृत्रिमप्रेमरसानुविद्धं स्नेहं तयोस्तं प्रतिवीक्ष्य कान्तम्। वृक्षा अपि प्रेमरसानुविद्धा शृङ्गारचेष्टाकुलिता भवन्ति॥ (योगवासिष्ठ, उत्पत्ति० ९०।१४) इस तरह चित्तकी कल्पना ही संसार है। चित्ताकाश, महाकाश (भूताकाश), चिदाकाश—ये तीनों ही अनन्त हैं। चिदाकाशमें ही दोनोंका पर्यवसान होता है।
५४८ भक्तिसुधा शक्तिपीठ-रहस्य
एक विदुषी पाश्चात्य महिलाने इस आशयके कुछ प्रश्न किये थे कि '५१ तीर्थ होते हैं, इस ५१ संख्याका क्या अभिप्राय है ? सतीके शरीरके ५१ टुकड़े हुए, वे टुकड़े जहाँ-जहाँ गिरे; वहाँ-वहाँ मन्दिर और तीर्थ बन गये। यहाँ सतीके शरीरके टुकड़े होनेका अभिप्राय क्या है ? यह कथा किस तत्त्वको समझानेके लिये बतलायी गयी है ? विष्णुने चक्रसे सतीका शव काट दिया, ऐसा उन्होंने क्यों किया ? पार्वतीका शव शिव ले जाते हैं, उनके दुःखसे पृथ्वी नष्ट हो जाती है, इन बातोंका क्या अभिप्राय है ? यह घटना किस तत्त्वकी, किस सिद्धान्तकी द्योतक है ? शिवका अपमान होनेसे सती मर गयी, यह क्यों ? क्या लज्जासे ? सती कौन है ? उनकी मृत्यु किस तत्त्वके नष्ट हो जानेकी द्योतक है ? सतीका पुनरुज्जीवन कब और कैसे होता है ?' उपर्युक्त विषयोंपर कहना यही है कि अनन्त शक्तियोंकी केन्द्रभूता महाशक्ति ही 'सती' हैं और अनन्त ब्रह्माण्डाधीश्वर शुद्ध ब्रह्म ही 'शंकर' हैं। ब्रह्मासे ही माया-सम्बन्धके द्वारा सृष्टि हुई है। ब्रह्माने दक्षादि प्रजापतियोंका निर्माणकर उन्हें सृष्टिके लिये नियुक्त किया। दक्षने भी मानसी सृष्टि-शक्तिसे बहुत- सी सन्तानें बनायीं। परंतु वे सब-की-सब श्रीनारदके उपदेशसे विरक्त हो गयीं। ब्रह्मादि सभी चिन्तित थे। किसी समय ब्रह्मासे एक परम मनोरम पुरुष उत्पन्न हुआ। उसके सौन्दर्यादि गुणोंपर सभी लोग मोहित हो उठे। ब्रह्माने उसे काम, कन्दर्प, पुष्पधन्वा आदि नामसे सम्बोधित किया। दक्षकन्या रतिके साथ उसका उद्वाह हुआ। वसन्त, मलय, कोकिला, प्रमदा आदि उसको सहायक मिले। ब्रह्माने उसे वरदान दिया कि तुम्हारे हर्षण, मोहन, मादन, शोषण आदि पंच पुष्पबाण अमोघ होंगे। मैं, विष्णु, रुद्र, ऋषि, मुनि सभी तुम्हारे वशीभूत होंगे, तुम राग उत्पन्नकर प्राणियोंको सृष्टि बढ़ानेके लिये प्रोत्साहित करो। कामने वर प्राप्तकर वहीं उसकी परीक्षा करनी चाही। उसी क्षण दैवात् ब्रह्मासे एक अत्यन्त लावण्यवती सन्ध्या नामकी कन्या उत्पन्न हुई। कामने अपने पुष्पमय धनुषको तानकर ब्रह्मापर बाण चलाया। ब्रह्माका मन विचलित हो उठा और वे सन्ध्यापर मोहित हो उठे। सन्ध्यामें भी कामके वेगसे हाव-भाव आदि प्रकट हुए। श्रीशंकरभगवान्ने इन सबकी चेष्टाओंको देखकर उन्हें प्रबोध कराया। ब्रह्मा लज्जित हो उठे और कामको शाप दिया—'तुम शंकरकी कोपाग्निसे भस्म हो जाओगे'। कामने कहा— 'महाराज! आपने ही तो मुझे ऐसा वरदान दिया है, फिर मेरा क्या दोष ?' ब्रह्माने कहा—'कन्या-जैसे अयोग्य स्थानमें मुझे तुमने मोहित किया, इसीलिये तुम्हें शाप हुआ। अस्तु, अब तुम शिवको वशीभूत करो।' कामने कहा कि 'शिव-शृंगारयोग्य, उन्हें मोहित करनेवाली स्त्री संसारमें कहाँ है ?' ब्रह्माने दक्षको आज्ञा दी—'तुम महामाया भगवती योगनिद्राकी आराधना करो। वह तुम्हारी पुत्रीरूपसे अवतीर्ण होकर शंकरको मोहित करें।' दक्ष भगवतीकी आराधनामें लग गये। ब्रह्मा भी भगवतीकी स्तुतिमें संलग्न हुए। भगवती प्रकट हुईं और कहा—'वरदान माँगो।' ब्रह्माने कहा—'देवि! भगवान् शिव अत्यन्त निर्मोह एवं अन्तर्मुख हैं। हम सब कामवश हैं, एक उन्हींपर कामका प्रभाव नहीं है। बिना उनके मोहित हुए सृष्टिका काम नहीं चल सकता। मैं उत्पादक हूँ, विष्णु पालक हैं और वे संहारक हैं। तीनोंके सहयोग बिना सृष्टिकार्य असम्भव है। सृष्टिके विघ्नरूप दैत्योंके हननमें भी कभी विष्णुका, कभी शिवका प्रयोजन होगा, कभी शक्तिसे यह काम होगा। अतः उनका कामासक्त होना आवश्यक है।' देवीने कहा— 'ठीक है, मेरा भी विचार उन्हें मोहनेका था, परंतु अब तुम्हारे प्रोत्साहनसे मैं अधिक प्रयत्नशील होऊँगी। मेरे बिना शंकरको कोई मोहित नहीं कर सकता। मैं
शक्तिपीठ-रहस्य ५४९
दक्षके यहाँ जन्म लेकर जब अपने दिव्यरूपसे शंकरको मोहित करूँगी, तभी सृष्टि ठीक चलेगी।' यह कहकर देवीने दक्षके यहाँ जाकर उन्हें वर दिया और उनके यहाँ सतीरूपसे प्रकट हुईं। किंचित् बड़ी होते ही वे शिवप्राप्तिके लिये तप करनेमें लग गयीं। इतनेमें ही ब्रह्मा, विष्णु आदि देवताओैंने जाकर शंकरकी स्तुति की और उन्हें विवाहके लिये राजी किया। उधर सतीकी आराधनासे शंकर प्रसन्न हुए और उन्हें वरदान दिया कि 'हम तुम्हारे पति होंगे।' फिर उनका सानन्द विवाह सम्पन्न हुआ और सहस्रों वर्षोंतक सती और शिवका श्रृंगार हुआ। उधर दक्षके यज्ञमें शिवका निमन्त्रण न होनेसे और उनका अपमान जानकर सतीने उस देहको त्यागकर हिमवत्पुत्री पार्वती होकर शिवपत्नी होनेका निश्चय किया और योगबलसे देह त्याग दिया। शिवजीको समाचार विदित होनेपर बड़ा क्षोभ और मोह हुआ और दक्षयज्ञको नष्ट करके सतीके शवको लेकर शिवजी घूमते रहे। सम्पूर्ण देवताओंने या सर्वदेवमय विष्णुने शिवमोहशान्ति एवं साधकोंके सिद्धि आदि कल्याणके लिये शवके भिन्न-भिन्न अंगोंको भिन्न-भिन्न स्थलोंमें गिरा दिया, वे ही ५१ पीठ हुए। हृदयसे ऊर्ध्वभागके अंग जहाँ पतित हुए, वहाँ वैदिक एवं दक्षिण मार्गकी सिद्धि होती है और हृदयसे निम्नभागके अंगोंके पतनस्थलोंमें वाममार्गकी सिद्धि होती है। इक्यावन शक्तिपीठ सतीके विभिन्न अंग कहाँ-कहाँ गिरे और उनसे कौन-कौन-से पीठ बने, इसका विवरण इस प्रकार है— १. सतीकी योनिका जहाँ पात हुआ, वहाँ कामरूप नामक पीठ हुआ, वह 'अकार' का उत्पत्तिस्थान एवं श्रीविद्यासे अधिष्ठित है। यहाँ कौलशास्त्रसे अणिमादि सिद्धियाँ सिद्ध होती हैं। लोमसे उत्पन्न इसके वंश नामक दो उपपीठ हैं, वहाँ शाबर-मन्त्रोंकी सिद्धि होती है। २. स्तनोंके पतनस्थलमें काशिकापीठ हुआ और वहाँसे 'आकार' उत्पन्न हुआ। वहाँ देहत्याग करनेसे मुक्ति प्राप्त होती है। सतीके स्तनोंसे दो धाराएँ निकलीं, वही असी और वरणा नदी हुई। असीके तीरपर दक्षिण सारनाथ उपपीठ है एवं वरुणाके उत्तरमें उत्तर सारनाथ उपपीठ है, वहाँ क्रमशः दक्षिण एवं उत्तर मार्गके मन्त्रोंकी सिद्धि होती है। ३. गुह्यभाग जहाँ पतित हुआ, वहाँ नेपालपीठ हुआ, वहाँसे 'इकार' की उत्पत्ति हुई। वह पीठ वाममार्गका मूलस्थान है। वहाँ ५६ लाख भैरव- भैरवी, दो हजार शक्तियाँ, तीन सौ पीठ एवं चौदह श्मशान सन्निहित हैं। वहाँ चार पीठ दक्षिणमार्गके सिद्धिदायक हैं, उनमें भी चारमें वैदिक मन्त्र सिद्ध होते हैं। नेपालसे पूर्वमें मलका पतन हुआ, अतः वहाँ किरातोंका निवास है। तीस हजार देवयोनियोंका वहाँ निवास है। ४. वाम नेत्रका पतनस्थान रौद्रपर्वत है, वह महत्पीठ हुआ, 'ईकार' की उत्पति वहाँसे हुई। वामाचारसे वहाँ मन्त्रसिद्धि होकर देवताका दर्शन होता है। ५. वाम कर्णके पतनस्थानमें काश्मीरपीठ हुआ, वह 'उकार' का उत्पत्तिस्थान है। वहाँ सर्वविध मन्त्रोंकी सिद्धि होती है। वहाँ अनेक अद्भुत तीर्थ हैं, किंतु कलिमें सब म्लेच्छोंद्वारा आवृत कर दिये जायेंगे। ६. दक्षिण कर्णके पातस्थलमें कान्यकुब्जपीठ हुआ और 'ऊकार' की उत्पत्ति हुई। जहाँ गंगा- यमुनाके मध्यमें अन्तर्वेदी नामक पवित्र स्थलमें ब्रह्मादि देवोंने स्व-स्वतीर्थोंका निर्माण किया है। वहाँ वैदिक मन्त्रोंकी सिद्धि होती है। उस कर्णके मलके पतनस्थानमें यमुनातटपर इन्द्रप्रस्थ नामक उपपीठ हुआ, उसके प्रभावसे ब्रह्माजीको विस्मृत वेद वहाँ पुनः उपलब्ध हुए। ७. नासिकाके पतनस्थानमें पूर्णगिरिपीठ है, वह 'ऋकार' का उत्पत्तिस्थल है। वहाँ योगसिद्धि होती है और मन्त्राधिष्ठातृदेव प्रत्यक्ष दर्शन देते हैं।
५५० भक्तिसुधा ८. वाम गण्डस्थलकी पतनभूमिपर अर्बुदाचलपीठ हुआ और 'ऋकार' का प्रादुर्भाव हुआ। वहाँ अम्बिका नामकी शक्ति है, यहाँ वाममार्गकी सिद्धि होती है तथा दक्षिणमार्गमें विघ्न होते हैं। ९. दक्षिण गण्डस्थलके पतनस्थानमें आम्रातकेश्वर पीठ हुआ, 'लृकार'-की उत्पत्ति हुई। वह धनदादि यक्षिणियोंका निवासस्थान है। १०. नखोंके निपतनस्थलमें एकाग्रपीठ हुआ, 'ॡकार'-की उत्पत्ति हुई। वह पीठ विद्याप्रदायक है। ११. त्रिवलिके पतनस्थलमें त्रिस्रोतपीठ हुआ और वहाँ 'एकार' का जन्म हुआ। वस्त्रके तीन खण्ड उसके पूर्व, पश्चिम तथा दक्षिणमें गिरे, वे तीन उपपीठ हुए। गृहस्थ द्विजको पौष्टिक मन्त्रोंकी सिद्धि वहाँ होती है। १२. नाभिकी पतनभूमि कामकोटिपीठ हुई, वहाँ 'ऐकार' का प्रादुर्भाव हुआ, समस्त काममन्त्रोंकी सिद्धि वहाँ होती है, उसके चारों दिशाओंमें चार उपपीठ हैं, जहाँ अप्सराएँ निवास करती हैं। १३. अंगुलियोंके पतनस्थल हिमालयपर्वतमें कैलासपीठ हुआ, 'ओकार' का प्राकट्य हुआ। अंगुलियाँ लिंगरूपमें प्रतिष्ठित हुईं, वहाँ करमालासे मन्त्रजप करनेपर तत्क्षण सिद्धि होती है। १४. दन्तोंके पतनस्थलमें भृगुपीठ हुआ, वहाँसे 'औकार' का प्रादुर्भाव हुआ। वैदिकादि मन्त्र वहाँ सिद्ध होते हैं। १५. दक्षिण करतलके पतनस्थानमें केदारपीठ हुआ, वहाँ 'अं' की उत्पत्ति हुई। उसके दक्षिणमें कंकणके पतनस्थानमें अगस्त्याश्रम नामक सिद्ध उपपीठ हुआ और उसके पश्चिममें मुद्रिकाके पतनस्थलमें इन्द्राक्षी उपपीठ हुआ। उसके पश्चिममें वलयके पतनस्थलमें रेवती-तटपर राजराजेश्वरी उपपीठ हुआ। १६. वाम गण्डकी निपातभूमिपर चन्द्रपुरपीठ हुआ, 'अः' की उत्पत्ति हुई। सभी मन्त्र वहाँ सिद्ध होते हैं। १७. जहाँ मस्तकका पतन हुआ, वहाँ श्रीपीठ हुआ और 'ककार' का प्रादुर्भाव हुआ। कलिमें पापी जीवोंका वहाँ पहुँचना दुर्लभ है। उसके पूर्वमें कर्णाभरणके पतनसे उपपीठ हुआ, जहाँ ब्रह्मविद्या- प्रकाशिका ब्राह्मी शक्तिका निवास है। उससे अग्निकोणमें कर्णार्द्धाभरणके पतनसे दूसरा उपपीठ हुआ, जहाँ मुखशुद्धकरी माहेश्वरी शक्ति है। दक्षिणमें पत्रवल्लीकी पातभूमिमें कौमारी शक्तियुक्त तीसरा उपपीठ हुआ। नैर्ऋत्यमें कण्ठमालके निपातस्थलमें ऐन्द्रजालविद्या- सिद्धिप्रद वैष्णवीशक्ति-समन्वित चौथा उपपीठ हुआ। पश्चिममें नासा-मौक्तिकके पतनस्थानमें वाराही शक्त्यधिष्ठित पाँचवाँ उपपीठ हुआ। वायुकोणमें मस्तकाभरणके पतनस्थानमें चामुण्डा शक्तियुक्त क्षुद्रदेवता-सिद्धिकर छठा उपपीठ हुआ और ईशानमें केशाभरणके पतनसे महालक्ष्मीसे अधिष्ठित सातवाँ उपपीठ हुआ। १८. बाहुके पतनस्थलमें अमरकण्टकपर्वतपर ओंकारक्षेत्रपीठ हुआ। वहाँ 'खकार' का प्रादुर्भाव हुआ। वह पीठ नर्मदासे अधिष्ठित है, वहाँ तप करनेवाले महर्षि जीवन्मुक्त हो गये। उसके ऊपरमें कंचुकीकी पतनभूमिमें उपपीठ हुआ, जो ज्योतिर्मन्त्र- प्रकाशक एवं ज्योतिष्मतीसे अधिष्ठित है। १९. वक्षःस्थलके पतनस्थलमें एक पीठ हुआ और 'गकार' की उत्पत्ति हुई। अग्निने वहाँ तपस्या की और देवमुखत्वको प्राप्त होकर वे ज्वालामुखीसंज्ञक उपपीठमें स्थित हुए। २०. वामस्कन्धके पतनस्थानमें मालवपीठ हुआ, वहाँ 'घकार' की उत्पत्ति हुई। गन्धर्वोंने रागज्ञानके लिये तपस्याकर वहाँ सिद्धि पायी। २१. दक्षिण कक्षका जहाँ पात हुआ, वहाँ कुलान्तकपीठ हुआ एवं 'ङकार' की उत्पत्ति हुई। विद्वेषण, उच्चाटन, मारणके प्रयोग वहाँ सिद्ध होते हैं। २२. जहाँ वाम कक्षका पतन हुआ, वहाँ कोट्टकपीठ हुआ और 'चकार' का प्राकट्य हुआ। वहाँ राक्षसोंने सिद्धि प्राप्त की है। २३. जठरदेशके पतनस्थलमें गोकर्णपीठ हुआ
शक्तिपीठ-रहस्य ५५१ तथा 'छकार' की उत्पत्ति हुई। २४. त्रिवलियोंमेंसे प्रथम वलिका जहाँ निपात हुआ, वहाँ मातुरेश्वरपीठ होकर 'जकार' की उत्पत्ति हुई, वहाँ शैवमन्त्र शीघ्र सिद्ध होते हैं। २५. अपर वलिके पतनस्थानमें अट्टहासपीठ हुआ, 'झकार' का प्रादुर्भाव हुआ, वहाँ गणेश- मन्त्रोंकी सिद्धि होती है। २६. तीसरी वलिका जहाँ पतन हुआ, वहाँ विरजपीठ हुआ और 'ञकार' की उत्पत्ति हुई। वह पीठ विष्णु-मन्त्रोंका सिद्धिप्रदायक है। २७. जहाँ बस्तिपात हुआ और 'टकार' की उत्पत्ति हुई, वहाँ राजगृहपीठ हुआ। राजगृहमें वेदार्थज्ञानकी प्राप्ति होती है। नीचे क्षुद्रघण्टिकाके पतनस्थलमें घण्टिका नामक उपपीठ हुआ, वहाँ ऐन्द्रजालिक मन्त्र सिद्ध होते हैं। २८. नितम्बके पतनस्थलमें महापथपीठ हुआ तथा 'ठकार' की उत्पत्ति हुई। जातिदुष्ट ब्राह्मणोंने वहाँ शरीर अर्पित किया और दूसरे जन्ममें कलियुगमें देह- सौख्यदायक वेदमार्ग-प्रलुप्तक अघोरादि मार्गको चलाया। २९. जघनका जहाँ पात हुआ, वहाँ कौछगिरिपीठ हुआ और 'डकार' की उत्पत्ति हुई। वन-देवताओंके मन्त्रोंकी वहाँ सिद्धि शीघ्र होती है। ३०. दक्षिण ऊरुके पतनस्थलमें एलापुरपीठ हुआ, 'ढकार' का प्रादुर्भाव हुआ। ३१. वाम ऊरुके पतनस्थानमें कालेश्वरपीठ हुआ, 'णकार' की उत्पत्ति हुई, वहाँ आयुर्वृद्धिकारक मृत्युंजयादि मन्त्र सिद्ध होते हैं। ३२. दक्षिण जानुके पतनस्थानमें जयन्तीपीठ होकर 'तकार' की उत्पत्ति हुई, वहाँ धनुर्वेदकी सिद्धि अवश्य होती है। ३३. वाम जानु जहाँ पतित हुआ, वहाँ उज्जयिनीपीठ हुआ 'थकार' प्रकट हुआ, वहाँ कवचमन्त्रोंकी सिद्धि होकर रक्षण होता है। अतः उसका नाम 'अवन्ती' है। ३४. दक्षिण जंघाके पतनस्थानमें योगिनीपीठ हुआ, 'दकार' की उत्पत्ति हुई। वहाँ कौलिक मन्त्रोंकी सिद्धि होती है। ३५. वामजंघाके पतनस्थानपर क्षीरिकापीठ होकर 'धकार' का प्रादुर्भाव हुआ। वहाँ वैतालिक तथा शाबर-मन्त्र सिद्ध होते हैं। ३६. दक्षिण गुल्फके पतनस्थानमें हस्तिनापुरपीठ हुआ, 'नकार' की उत्पत्ति हुई। वहीं नूपुरका पतन होनेसे नूपुरार्णवसंज्ञक उपपीठ हुआ, वहाँ सूर्य- मन्त्रोंकी सिद्धि होती है। ३७. वामगुल्फके पतनस्थलमें उड्डीशपीठ होकर 'पकार' का प्रादुर्भाव हुआ। उड्डीशाख्य महातन्त्र वहाँ सिद्ध होता है। जहाँ दूसरे नूपुरका पतन हुआ, वहाँ डामर उपपीठ हुआ। ३८. देहरस (अस्थि)-के पतनस्थानमें प्रयागपीठ हुआ, 'फकार' की उत्पत्ति हुई, वहाँ मृत्तिका श्वेतवर्णकी दृष्टिगोचर होती है। वहाँ अन्यान्य अस्थियोंका पतन होनेसे अनेक उपपीठोंका प्रादुर्भाव हुआ। गंगाके पूर्वमें बगलोपपीठ एवं उत्तरमें चामुण्डादि उपपीठ, गंगा-यमुनाके मध्यमें राजराजेश्वरीसंज्ञक, यमुनाके दक्षिण तटपर भुवनेशी नामक उपपीठ हुआ। इसीलिये प्रयाग तीर्थराज एवं पीठराज कहा गया है। ३९. दक्षिण पृश्निके पतन-स्थानमें षष्ठीशपीठ हुआ एवं 'बकार' का प्रादुर्भाव हुआ। यहाँ पादुका- मन्त्रकी सिद्धि होती है। ४०. वाम पृश्निका जहाँ पात हुआ, वहाँ मायापुरपीठ हुआ, 'भकार' की उत्पत्ति हुई, समस्त मायाओंकी सिद्धि वहाँ होती है। ४१. रक्तके पतनस्थानमें मलयपीठ हुआ एवं 'मकार' की उत्पत्ति हुई। रक्ताम्बरादि बौद्धोंके मन्त्र यहाँ सिद्ध होते हैं। ४२. पित्तकी पतनभूमिपर श्रीशैलपीठ हुआ तथा 'यकार' का प्रादुर्भाव हुआ। विशेषतः वैष्णव-मन्त्र यहाँ सिद्ध होते हैं। ४३. मेदके पतनस्थानमें हिमालयपर मेरुपीठ हुआ एवं 'रकार' की उत्पत्ति हुई। स्वर्णाकर्षण
५५२ भक्तिसुधा भैरवकी सिद्धि वहाँ होती है। ४४. जहाँ जिह्वाग्रका पतन हुआ, वहाँ गिरिपीठ हुआ तथा 'लकार' की उत्पत्ति हुई। यहाँ जप करनेसे वाक्सिद्धि होती है। ४५. मज्जाके पतनस्थानमें माहेन्द्रपीठ हुआ, वह 'वकार' के प्रादुर्भावका स्थान है, जहाँ शाक्त- मन्त्रोंके जपसे अवश्य सिद्धि होती है। ४६. दक्षिण अंगुष्ठके पातस्थानमें वामनपीठ हुआ एवं 'शकार' की उत्पत्ति हुई, यहाँ समस्त मन्त्रोंको सिद्धि होती है। ४७. वामांगुष्ठके निपतन-स्थानमें हिरण्यपुरपीठ हुआ, वहाँ 'षकार' की उत्पत्ति हुई। वहाँ वाममार्गसे सिद्धिलाभ होता है। ४८. रुचि (शोभा)-के पतन-स्थानमें महा- लक्ष्मीपीठ हुआ एवं 'सकार' का प्राकट्य हुआ। यहाँ सर्वसिद्धियाँ प्राप्त होती हैं। ४९. धमनीके पतनस्थानमें अत्रीपीठ हुआ, वहाँ 'हकार' उत्पन्न हुआ और यावत् सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं। ५०. छायाके सम्पातन स्थानमें छायापीठ हुआ एवं 'ळकार' की उत्पत्ति हुई। ५१. केशपाशके पतनस्थलमें क्षत्रपीठका प्रादुर्भाव हुआ, यहीं 'क्षकार' का उद्गम हुआ। यहाँ समस्त सिद्धियाँ शीघ्रतापूर्वक उपलब्ध होती हैं। वर्णमालाएँ अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ, ॠ, ऌ, ॡ, ए, ऐ, ओ, औ, अं, अः। क, ख, ग, घ, ङ। च, छ, ज, झ, ञ। ट, ठ, ड, ढ, ण। त, थ, द, ध, न। प, फ, ब, भ, म। य, र, ल, व, श, ष, स, ह, ळ, क्ष— यही ५१ वर्णोंकी वर्णमाला है। यहाँ अन्तका ल 'ळ' रूपसे उच्चरित होता है तथा अन्तिम 'क्ष' अक्षमालाका सुमेरु है। इसी मालाके आधारपर सतीके भिन्न-भिन्न अंगोंका पात हुआ है। एतावता इतनी भूमि वर्ण- समाम्नायस्वरूप ही है। भिन्न-भिन्न वर्णोंकी शक्तियाँ और देवता भिन्न हैं। इसीलिये उन-उन वर्णों, पीठों, शक्तियों एवं देवताओंका परस्पर सम्बन्ध है, जिसके ज्ञान और अनुष्ठानसे साधकको शीघ्र ही सिद्धि होती है। मायाद्वारा ही परब्रह्मसे विश्वकी सृष्टि होती है। सृष्टि हो जानेपर भी उसके विस्तारकी आशा तबतक नहीं होती, जबतक चेतन पुरुषकी उसमें आसक्ति न हो। अतएव, सृष्टि-विस्तारके लिये कामकी उत्पत्ति हुई। रजःसत्त्वके सम्बन्धमें द्वैतसृष्टिका विस्तार होता है, परंतु तम कारणरूप है, वहाँ द्वैतदर्शनकी कमीसे मोहकी कमी होती है।* सत्त्वमय सूक्ष्मकार्यरूप विष्णु एवं रजोमय स्थूलकार्यरूप ब्रह्माके मोहित हो जानेपर भी कारणात्मा शिव मोहित नहीं होते। परंतु जबतक कारणमें भी मोह नहीं, तबतक सृष्टिकी पूर्ण स्थिति नहीं होती। इसीलिये स्थूल-सूक्ष्म कार्यचैतन्योंकी ऐसी रुचि हुई कि कारणचैतन्य भी मोहित हो। परंतु यह अघटितघटनापटीयसी महामायाके ही वशकी बात है। इसीलिये सबने उसीकी आराधना की। देवी प्रसन्न हुई, वह भी अपने पतिको स्वाधीन करना चाहती थी। स्वाधीनभर्तृका स्त्री ही परम सौभाग्यशालिनी होती है। वही हुआ, महामायाने शिवको स्वाधीन कर लिया, फिर भी पिताद्वारा पतिका अपमान होनेपर उसने उस पितासे सम्बन्धित शरीरको त्याग देना उचित समझा। महाशक्तिका शरीर उसका लीलाविग्रह ही है। जैसे निर्विकार चैतन्य शक्तिके योगसे साकार विग्रह धारण करता है, वैसे ही शक्ति भी अधिष्ठान चैतन्ययुक्त हो साकार विग्रह धारण करती है। इसीलिये शिव-पार्वती दोनों मिलकर अर्द्धनारीश्वरके रूपमें व्यक्त होते हैं। अधिष्ठान चैतन्यसहित महाशक्तिका
- 'तमस्त्वज्ञानजं विद्धि मोहनं सर्वदेहिनाम्' (गीता १४।८)-के अनुसार तमस् अज्ञानसमुद्भूत और मोहक है तथापि रजोयुक्त तमस् ही अध्यासमें हेतु होनेसे मोहक है। स्वतः 'प्रमादालस्यनिद्राभिस्तन्निबध्नाति' (गीता १४।८)-के अनुसार गाढ़ तमस् निद्रादिमें हेतु होनेसे द्वैतदर्शनका विलोप करनेवाला होनेसे अध्यासमूल अज्ञानात्मक है। वस्तुतः रजोगुणके नियामकका नाम ब्रह्मा है, सत्त्वगुणके नियामकका नाम विष्णु है और तमोगुणके नियामकका नाम शिव या रुद्र है। समष्टि रजस्, सत्त्व और तमस्का नियामक सनातन गुणातीत सर्वेश्वर ही हो सकता है। लक्षण-साम्यसे वस्तुसाम्यके कारण त्रिदेवमें सर्वेश्वरता चरितार्थ होनेसे एकरूपता है।
शक्तिपीठ-रहस्य ५५३ उस लीलावग्रह सती-शरीरसे तिरोहित हो जाना ही सतीका मरना है। प्राणीको तपस्या एवं आराधनासे ही शक्तिको जन्म देनेका सौभाग्य एवं उसे परमेश्वरसे सम्बन्धितकर अपनेको कृतकृत्य करनेका सौभाग्य प्राप्त होता है, परंतु यदि बीचमें प्रमादसे अहंकार उत्पन्न हो जाता है तो शक्ति उससे सम्बन्ध तोड़ लेती है और फिर उसकी वही स्थिति होती है, जो दक्षकी हुई। सतीका शरीर यद्यपि मृत हो गया तथापि वह महाशक्तिका निवास-स्थान था, श्रीशंकर उसीके द्वारा उस महाशक्तिमें रत थे, अतः मोहित होनेके कारण भी फिर उसको छोड़ न सके। यद्यपि परमेश्वर सदा स्वरूपमें ही प्रतिष्ठित होते हैं, फिर भी प्राणियोंके अदृष्टवश उनके कल्याणके लिये सृष्टि, पालन, संहरण आदि कार्योंमें प्रवृत्त-से प्रतीत होते हैं। उन्हींके अनुरूप महामायामें उनकी आसक्ति और मोहकी भी प्रतीति होती है। इसी मोहवश शंकर महाशक्तिके अधिष्ठानभूत उस प्रिय देहको लेकर घूमने लगे। देवताओं और विष्णुने शिवका मोह मिटानेके लिये उस देहको उनसे वियुक्त करना चाहा। साथ ही अनन्त शक्तियोंकी केन्द्रभूता महाशक्तिके अधिष्ठानभूत उस देहके अवयवोंसे लोकका कल्याण हो, यह भी सोचकर भिन्न-भिन्न स्थानोंमें विभिन्न अंगोंको गिराया। भिन्न-भिन्न शक्तियोंके अधिष्ठानभूत भिन्न-भिन्न अंग जिन स्थानोंमें पड़े, वहाँ उन शक्तियोंकी सिद्धि सरलतासे होती है। जैसे कपोत और सिंहके मांस आदिमें भी उनकी विशेषता प्रकट होती है, वैसे ही सतीके भिन्न-भिन्न अवयवोंमें भी उनकी विशेषता प्रकट होती है। इसीलिये जैसे हिंगुके निकल जानेपर भी उसके अधिष्ठानमें उसकी गन्ध या वासना रहती है, वैसे ही सतीकी महाशक्तियोंके अन्तर्हित होनेपर भी उन अधिष्ठानोंमें वह प्रभाव रह गया। जैसे सूर्यकान्तमणिपर सूर्यकी रश्मियोंका सुन्दर प्राकट्य होता है, वैसे ही उन शक्तियोंके अधिष्ठानभूत अंगोंमें उनका प्राकट्य बहुत सुन्दर होता है। यहाँतक कि जहाँ-जहाँ उन अंगोंका पात हुआ, वे स्थान भी दिव्य शक्तियोंके अधिष्ठान माने जाते हैं। वहाँ भी शक्तितत्त्वका प्राकट्य अधिक है। अतएव उन पीठोंपर शीघ्र ही सिद्धि प्राप्त होती है। अंग-सम्बन्धी कोई अंश या भूषण-वसनादिका जहाँ पात हुआ, वहीं उपपीठ हैं। उनमें भी उन-उन विशेष शक्तितत्त्वोंका आविर्भाव होता है। अनन्त शक्तियोंकी केन्द्रभूता महाशक्तिका जो अधिष्ठान हो चुका है, वह एवं तत्सम्बन्धी समस्त वस्तुओंमें शक्तितत्त्वका बाहुल्य होना ही चाहिये। वैसे तो जहाँ भी कहीं, जिस किसी भी वस्तुमें जो भी शक्ति है, उन सबका ही अन्तर्भाव महामायामें ही है— यच्च किञ्चित्क्वचिद्वस्तु सदसद्वाखिलात्मिके ॥ तस्य सर्वस्य या शक्तिः सा त्वं किं स्तूयसे तदा। (श्रीदुर्गासप्तशती १।८२-८३) अपनी-अपनी योग्यता और अधिकारके अनुसार इष्ट देवता, मन्त्र, पीठ, उपपीठके साथ सम्बन्ध जोड़नेसे सिद्धिमें शीघ्रता होती है। तथा च— अनादिनिधनं ब्रह्म शब्दरूपं यदक्षरम्। विवर्ततेऽर्थभावेन प्रक्रिया जगतो यतः ॥ —इत्यादि वचनोंके अनुसार प्रणवात्मक ब्रह्म ही निखिल विश्वका उपादान है। वही शक्तिमय सती-शरीररूपमें और निखिल वाङ्मय-प्रपंचके मूलभूत एकपंचाशत् वर्णरूपमें व्यक्त होता है। जैसे निखिल विश्वका शक्तिरूपमें ही पर्यवसान होता है, वैसे ही वर्णोंमें ही सकल वाङ्मय-प्रपंचका अन्तर्भाव होता है; क्योंकि सभी शक्तियाँ वर्णोंकी आनुपूर्वीविशेषमात्र हैं। शब्द-अर्थका, वाच्य-वाचकका असाधारण सम्बन्ध किंबहुना अभेद ही होता है, अतएव एकपंचाशत् वर्णोंके कार्यभूत सकल वाङ्मय-प्रपंचका जैसे एकपंचाशत् वर्णोंमें अन्तर्भाव किया जाता है, वैसे ही वाङ्मय-प्रपंचके वाच्यभूत सकल अर्थमयप्रपंचका उसके मूलभूत एकपंचाशत् शक्तियोंमें अन्तर्भाव करके वाच्य-वाचकका अभेद प्रदर्शित किया गया है। यही ५१ पीठोंका रहस्य है।
५५४ भक्तिसुधा श्रीरामजन्म-रहस्य जिस समय संसारमें दुराचार, दुर्विचारका परितः प्रसार होने लगता है; अहिंसा, सत्य, अस्तेय, धैर्य, न्याय आदि मानवोचित सद्गुणोंका अपमान होने लगता है, दम्भका ही साम्राज्य तथा वेद-शास्त्रोक्त वर्णाश्रम-धर्मका विलोप होने लगता है, दैत्य-दानवों या दैत्यप्राय कुपुरुषोंसे धरा व्याकुल हो जाती है, सत्पुरुष तथा देवगण अनीतिसे उद्विग्न हो उठते हैं, उस समय सर्वपालक भगवान् किसी-न-किसी रूपमें प्रकट होकर श्रुति-सेतुका पालन करते और अपने मनोहर, मंगलमय, परम पवित्र चरित्रोंका विस्तार करके प्राणियोंके लिये मोक्षका मार्ग प्रशस्त कर देते हैं। अभिज्ञोंका मत है कि यदि भगवान्का विशुद्ध, सत्त्वमय, परम मनोहर, मधुर स्वरूप प्रकट न होता तो अदृश्य, अग्राह्य, अव्यपदेश्य परब्रह्मके साक्षात्कारकी बात ही जगत्से मिट जाती। भगवान्की मधुर मूर्ति एवं चरित्रोंमें मनके आसक्त हो जानेपर उसकी निर्मलता और एकाग्रता सहजमें ही सिद्ध हो जाती है। निर्मल एवं एकाग्र चित्त ही भगवान्के अचिन्त्य रूपके चिन्तनमें समर्थ होता है। जैसे अंजनद्वारा शुद्ध नेत्रसे सूक्ष्म वस्तुका परिज्ञान सुगमतासे हो जाता है, वैसे ही भगवच्चरित्र एवं उनके मधुर स्वरूपके परिशीलनसे निर्मल होकर चित्त सूक्ष्म-से-सूक्ष्म भगवदीय रहस्योंको समझ लेता है। इसके अतिरिक्त अमलात्मा परमहंस महामुनीन्द्रोंको प्रेमयोग प्रदान करनेके लिये भी प्रभुके लीला- विग्रहका आविर्भाव होता है। इन्हीं सब भावोंको लेकर मधुमास (चैत्र)-के शुक्लपक्षकी नवमीको मर्यादा-पुरुषोत्तम भगवान् श्रीरामचन्द्रका जन्म हुआ। अनन्तकोटिब्रह्माण्डनायक, सर्वान्तरात्मा, सर्व- शक्तिमान् भगवान्की भ्रुकुटीके संकेतमात्रसे उनकी मायाशक्ति विश्वप्रपंचका सर्जन, पालन तथा संहार करती है। जैसे अयस्कान्त (चुम्बक)-के सान्निध्यसे लौहमें हलचल होती है, वैसे ही भगवान्के सान्निध्यमात्रसे मायाशक्तिको चेतना प्राप्त होती है। जैसे झरोखोंमें सूर्य-किरणोंके सहारे निरन्तर परिभ्रमण करते हुए अपरिगणित त्रसरेणु दिखायी देते हैं, वैसे ही प्रकृतिपारदृश्वा लोकोत्तरपुरुष-धौरेयोंको भगवान्के सन्निधानमें अनन्त विश्व दिखायी देते हैं—'यत्सन्निधौ चुम्बकलोहवद्धि जगन्ति नित्यं परितो भ्रमन्ति॥' भगवान् अपने पारमार्थिक रूपसे निराकार, निर्विकार, निष्कल, निरीह, निर्गुण होते हुए भी मायाशक्ति- युक्तरूपसे अनादिबद्ध, स्वांशभूत जीवोंपर कृपा करके उनके कल्याणार्थ विश्वके सर्जन एवं संहारादि लीलाओंमें प्रवृत्त होते हैं। मनीषी बड़े कुतूहलसे सकल विरुद्धधर्माश्रय भगवान्के इस कौतुकको देखकर कहते हैं— त्वत्तोऽस्य जन्मस्थितिसंयमान् विभो वदन्त्यनीहादगुणाद्विक्रियात् । त्वयीश्वरे ब्रह्मणि नो विरुध्यते त्वदाश्रयत्वादुपचर्यते गुणैः॥ (श्रीमद्भा० १०।३।१९) अर्थात् हे नाथ! विज्ञजन निर्गुण, निरीह, अविक्रियेसे ही इस विविधवैचित्र्योपेत विश्वकी जन्म, स्थिति तथा संहार बतलाते हैं। भला जो निरीह तथा सर्वथा निष्क्रिय है, वही निरन्तर चांचल्यपूर्ण विश्वकी सृष्टि करनेवाला—यह कैसे? परंतु भगवान्के ईश्वर तथा ब्रह्म—इन दो रूपोंमें इन विरुद्ध धर्मोंके सामंजस्य होनेमें कोई भी आपत्ति नहीं है। मायायुक्त ऐश्वररूपमें विश्वनिर्माणके उपयुक्त निखिल क्रियाएँ हैं, परंतु मायारहित ब्रह्मरूपमें निरीहता एवं निष्क्रियता ही है। अर्थात् मायाशक्तिके सहारे होनेवाले समस्त व्यवहारोंका मायाधिष्ठान, स्वप्रकाश, विशुद्ध ब्रह्ममें उपचार होता है। अस्तु, वही व्यापक ब्रह्म निरंजन, निर्गुण, विगत-विनोद, भक्तप्रेमवश श्रीमद्राघवेन्द्र रामचन्द्ररूपमें श्रीकौसल्याम्बाके मंगलमय अंकमें व्यक्त होता है।
श्रीरामजन्म-रहस्य ५५५ निखिल ब्रह्माण्ड-मण्डल जिसके परतन्त्र है, वह मायापति भगवान् भास्वती भगवती श्रीकृपादेवीके पराधीन है और वे अनुकम्पा महारानी भी दीनताके परतन्त्र हैं। भगवान्के यहाँ दोनोंकी खूब सुनवायी होती है। जगद्विधेयं ससुरासुरं ते भवान् विधेयो भगवत् कृपायाः। सा दीनताया नमतां विधेया ममास्त्ययत्नोपनतैव सेति॥ जो दीनता अन्यत्र अवहेलनाकी दृष्टिसे देखी जाती है, वही भगवान्के यहाँ परमादरणीया है। शोक, मोह, जरा, मरण, आधि-व्याधि, दारिद्र्य-दुःखोंसे उत्पीड़ित प्राणियोंके यहाँ दीनताकी कमी नहीं है। उसीका दुखड़ा सर्वत्र गाया जाता है, परंतु दुर्भाग्यवश वह गाया जाता है ऐसी जगह, जहाँ कुछ मिलना- जुलना तो दूर रहा, फूटे मुँहसे सहानुभूतिका भी एक शब्द नहीं निकलता। वहाँ तो दीनको अवहेलनाओंका ही पात्र बनना पड़ता है। परंतु 'दीनानाथ' होनेके नाते भगवान् दीनताके ग्राहक हैं। उनके सामने दीनता प्रकट करनेमें तो कृपणता न होनी चाहिये। जैसे संघर्षके द्वारा व्यापक अग्निका सगुण-साकाररूपमें प्राकट्य होता है, किंवा शैत्यके सम्बन्धसे जलका ओला हो जाता है, वैसे ही प्रेमियोंके प्रेमप्राखर्यसे विशुद्ध सत्त्वमयी श्रीकौसल्याम्बासे पूर्णतम पुरुषोत्तम- भगवान्का प्राकट्य होता है। यज्ञपुरुषद्वारा समर्पित चरुके ही विभागानुसार भगवान्का ही श्रीराम, लक्ष्मण, भरत एवं शत्रुघ्नरूपमें आविर्भाव होता है। भगवान्का आविर्भाव चार रूपोंमें कुछ महानुभावोंका मत है कि सांगोपांग शेषशायी भगवान्का आविर्भाव चार रूपमें होता है। साक्षात् भगवान् श्रीरामरूपमें और शेष, शंख, चक्र-ये लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्नरूपमें प्रकट होते हैं। आधे अंशमें राम और आधेमें लक्ष्मण प्रभृति तीनों भ्राता। दूसरे शब्दोंमें यह भी कहा जा सकता है कि सप्रपंच ब्रह्मका भरतादि तीन रूपमें प्राकट्य हुआ और निष्प्रपंच ब्रह्मका श्रीराम-रूपमें आविर्भाव हुआ। प्रणवके 'अ' 'उ' 'म्' इन तीन मात्राओंके वाच्य विराट्, हिरण्यगर्भ, अव्याकृतका शत्रुघ्न, लक्ष्मण तथा भरत-रूपमें और अर्धमात्राका अर्थ तुरीयपाद या वाच्यवाचकातीत, सर्वाधिष्ठान परमतत्त्वका श्रीराम- रूपमें प्रादुर्भाव हुआ। निष्प्रपंच अर्धमात्राका अर्थ तुरीय तत्त्व ही चरुके अर्ध अंशसे और शेष तीन मात्राओंके अर्थ सप्रपंच तीनों तत्त्व चरुके अर्ध अंशसे व्यक्त हुए हैं। प्रणवकी जैसे साढ़े तीन मात्रा मानी गयी है, वैसे ही सोलह मात्रा भी मानी जाती है। 'अकारो वै सर्वा वाक्।' समस्त वाक्योंका अन्तर्भाव अकारमें ही होता है और समस्त वाक्योंका आविर्भाव प्रणवसे ही होता है। अतः प्रणवमें ही सोलह मात्राकी कल्पना करके उसके सोलह वाच्य स्थिर किये गये हैं। जाग्रत्-अवस्थाका अभिमानी व्यष्टि विश्व और समष्टि स्थूल प्रपंचका अभिमानी विराट् होता है। सूक्ष्मप्रपंच और स्वप्नावस्थाका अभिमानी तैजस और हिरण्यगर्भ एवं कारणप्रपंच, सुषुप्ति-अवस्थाका अभिमानी प्राज्ञ और अव्याकृत होता है। इन सभी कल्पनाओंका अधिष्ठान शुद्ध ब्रह्म तुरीय तत्त्व होता है। फिर इन एक-एकमें भी चार-चार भेद बतलाये गये हैं। जाग्रत्-अवस्थामें स्पष्ट विषयबोध 'जाग्रत्-जाग्रत्' कहलाता है और जाग्रत्-कालमें मनोराज्यादि करते समय 'जाग्रत्- स्वप्न' कहा जाता है। शोक, मोह या हर्ष- विशेषमें शून्यता या स्तब्धताके समय 'जाग्रत्- सुषुप्ति' एवं जाग्रत्-कालमें ही निष्प्रपंच ब्रह्म- दर्शन-कालमें 'जाग्रत्-तुरीय' कहा जाता है। इसी तरह स्वप्नमें स्पष्ट व्यवहार 'स्वप्न-जागर', स्वप्नमें स्वप्न 'स्वप्न-स्वप्न' और स्वप्नमें सुषुप्ति 'स्वप्न- सुषुप्ति' और स्वाप्निक ब्रह्मानुभूति 'स्वप्न-तुरीय' है। सुषुप्तिमें भी सात्त्विकी, राजसी और तामसी भेदसे 'सुषुप्ति-जागर', 'सुषुप्ति-स्वप्न' और 'सुषुप्ति- सुषुप्ति' होती है। निद्राके प्रभावसे विश्व-विस्मरण- कालमें अभ्यासियोंको निष्प्रपंच ब्रह्म-दर्शन ही 'सुषुप्ति तुरीय' है। स्थूल प्रपंचभासक सर्वानुस्यूत (ओत)
आत्मा 'तुरीय विराट्' है और सूक्ष्म प्रपंच-भासक 'अनुज्ञा आत्मा' तुरीय हिरण्यगर्भ है। इसी तरह कारण-भासक अनुज्ञाता आत्मा 'तुरीय अव्याकृत' है और सर्वभास्यादि प्रपंच-वर्जित अविकल्प आत्मा 'तुरीय-तुरीय' है। इस पक्षमें 'तुरीय विराट्' शत्रुघ्न, 'तुरीय हिरण्यगर्भ' लक्ष्मण, 'तुरीय अव्याकृत' भरत और 'तुरीय-तुरीय' श्रीमद्राघवेन्द्र रामचन्द्ररूपमें प्रकट होते हैं और उनकी माधुर्याधिष्ठात्री महाशक्ति श्रीजनकनन्दिनीरूपमें प्रकट होती हैं। सर्वथाऽपि पूर्णतम पुरुषोत्तम वेदान्तवेद्य भगवान्का ही श्रीरामचन्द्ररूपमें प्राकट्य होता है, तभी तो उनके दर्शन, स्पर्श, श्रवण, अनुगमनमात्रसे प्राणियोंकी परमगति हो जाती है— स यैः स्पृष्टोऽभिदृष्टो वा संविष्टोऽनुगतोऽपि वा। कोसलास्ते ययुः स्थानं यत्र गच्छन्ति योगिनः॥ (
श्रीरामभद्रका ध्यान ५५७ शीतल सुकोमल अमृतमयी चन्द्रिका छिटकी हो। सौन्दर्य-माधुर्य-सुधासे भरपूर प्रेमानन्दरस बरसानेवाले लोकोत्तर अभिनव नील नीरदसे भी शतकोटिगुणित प्रभुके मंगलमय श्रीअंगमें सौन्दर्य, माधुर्य, सौरस्य सुधा है, जिससे पारावारविहीन अलौकिक प्रेमा- नन्दामृतकी वर्षा होती है। जब नीर प्रदान करनेवाले नव जलधरमें दीप्तिमत्ता, विशिष्ट श्यामलता, गम्भीरता तथा तापापनोदकता है, तब फिर प्रभुके श्रीअंगमें अद्भुत आकर्षकता, अद्भुत श्यामलता, गम्भीरता एवं तापापनोदकताका कहना ही क्या है! भावुकोंने भगवान्को श्रृंगार-रससार-सागर, आनन्द-रससार-सागर किंवा पूर्णानुराग-रससार-सागरसे समुद्भूत निर्मल निष्कलंक लोकोत्तर चन्द्रमा कहा है। भावुकोंने मधुरताके लिये अनन्तकोटिब्रह्माण्डान्तर्गत आनन्दबिन्दुके उद्गम-स्थान अचिन्त्य, अनन्त, परमानन्द-सुधासार-सरोवर-समुद्भूत पंकजका उपमान युक्त कहा है; क्योंकि जैसे क्षीर-सागरका पंक क्षीरसारनवनीत होता है, वैसे पूर्णानुराग-रस-सार सरोवरमें पंक उसका सार ही होगा और पंकज उसका भी सार होगा। माधुर्याधिष्ठात्री प्रभुकी हृदयेश्वरीके सम्बन्धमें महानुभावोंने कहा है कि यदि छबिसुधापयोनिधि हो उसमें निमग्न, परमरूपमय कच्छप हो, एवं उसी परम रूपके आश्रित श्रृंगारमय मन्दर हो, शोभामयी रज्जु हो और इन सामग्रियोंसे युक्त साक्षात् लोक-विलक्षण मन्मथ अपने करकमलोंसे मन्थन करे तो फिर उसमेंसे जो सुन्दरतासुखमूलमयी लक्ष्मी निकले—वही कथंचित् प्रभुकी हृदयेश्वरीका उपमान हो सकती है अथवा सुषमा- कामधेनुसे श्रृंगार-रससार दुग्धको दुहकर कामदेवने अपने दिव्य करकमलोंसे अमृतमय दही जमाया हो और उसका मन्थन करनेपर जो नवनीत निकले, उसीसे श्रीजनकनन्दिनी और श्रीरामचन्द्रजीको रचा गया है। भालपर सहस्रों सूर्योंकी दिव्य दीप्तियोंका तिरस्कार करनेवाला सुन्दर मुकुट शोभित हो रहा है। उसमें नाना प्रकारके नील, पीत, हरित परम प्रकाशमय मणि और मुक्ताएँ लगी हैं। मोतियोंकी मनोहर लड़ियाँ सुन्दर रूपमें लटक रही हैं। ऊपरकी स्निग्ध, सचिक्कण, श्यामल अलकावलियाँ मुकुटकी दिव्य दीप्तिसे वैदूर्यके समान नाना छबिसे परिप्लुत हो रही हैं। कपोल प्रान्तके स्निग्ध श्यामल कुटिल कुन्तल अति दिव्य कुण्डलोंकी दीप्तिसे देदीप्यमान हो रहे हैं। महानुभावोंका कहना है कि प्रभुके अमृतमय मुखचन्द्रके समीप दोनों कुण्डल तथा दिव्य किरीटके नील और लाल रत्नोंके साथ वे श्यामल स्निग्ध केश-समूह ऐसे शोभित होते हैं, जैसे अन्धकार-सार-समूह शुक्र-बृहस्पति एवं भौम और शनिको आगे लेकर चन्द्रमासे वैर मिटाकर मिलने चला हो। यहाँ दोनों कुण्डल शुक्र, बृहस्पतिके समान, नील तथा रक्त रत्न शनि एवं मंगलके समान और केश अन्धकार-सारके समान हैं। मुखचन्द्रकी दिव्य द्युतिसे कुण्डल और मुकुट जगमगा रहे हैं। मुकुट तथा कुण्डलोंकी आभा मुखचन्द्रपर शोभित हो रही है। भुजमूलतक लम्बायमान मयूरके आकारवाले कलकुण्डल अद्भुत शोभा बढ़ा रहे हैं। कुण्डलोंकी आभा कुटिल कुन्तलोंपर बड़ी सुहावनी लगती है, मानो दो कामदेव हरके डरसे प्रभुके कानोंमें लगकर मेरुकी बात कर रहे हैं। अत्यन्त स्निग्ध, सचिक्कण, श्यामल अलका- वलियाँ मुखचन्द्रपर ऐसी शोभित होती हैं, जैसे नागोंके छोटे-छोटे चमकीले श्यामल शिशु चन्द्रमापर अमृत पानेके लोभसे विराज रहे हों। चंचलताके समय मानो नागशिशु चन्द्रमासे लड़ते हैं और स्थिरताके समय मानो सौन्दर्य-माधुर्य अमृतका पान करके लोटपोट हो रहे हैं अथवा अमृतमय मुखचन्द्र और नयनकमल एवं अलकावलीका सामंजस्य ऐसा सुन्दर लगता है, मानो पूर्णचन्द्रके समक्ष कमलदल देखकर कौतुकसे विपुल अलिवृन्द आ गये हों। किंवा नीलमणीन्द्रमय मुखचन्द्रमें कमलदल-सरीखे आयत नयनोंको देखकर मानो आश्चर्यसे अलकावलीके छद्मसे भ्रमरवृन्द आये हों अथवा मानो भगवान्का मुख एक अद्भुत पद्म है, जो पूर्वोक्त प्रकारसे श्रृंगार, पूर्णानुराग या आनन्दसार-सरोवरसे उत्पन्न है अथवा
चन्द्रसार-सरोवरसे उत्पन्न अद्भुत दीप्तिसम्पन्न लोकोत्तर नीलकमल है, जिसके सौन्दर्य-माधुर्यमय मादक मधुका पान करनेके लिये अलिकुलमाला अलकावलीके व्याजसे घेरे है। मानो मादक मधुर मधुका पानकर मत्त हुए भ्रमर गुंजार और चांचल्य छोड़कर विभोर हो रहे हैं। किंवा यह अलकावलीके छद्मसे 'अलं अत्यर्थं ब्रह्मात्मकं सुखं येषां ते अलकाः' इस व्युत्पत्तिके अनुसार ब्रह्मविद् ही प्रभुके मुखपद्मके मादक माधुर्य-मधुका पानकर लोट-पोट हो रहे हैं। मनोहर भालपर सूर्यकी दो दिव्य किरणोंके समान किंवा विद्युत्की दो रेखाओंके समान कुंकुम- तिलक ऐसा शोभित होता है, मानो कामदेवने भ्रुकुटिरूप मरकत धनुषको तानकर दो तेजोमय कनकशर तमःस्तोकके लिये संधान किये हों। कामधनुषको भी लजानेवाली दिव्य श्यामल स्निग्ध भ्रुकुटी बड़ी ही सुन्दर है। किंचित् अरुणिमाको लिये हुए नील कमलदलके सरीखे सुन्दर नयन कर्णपर्यन्त शोभा दे रहे हैं। किंचित् अरुण और सित नयनोंके कोने बड़े मनोहर हैं। उनकी अरुणिमा मानो भक्तोंके मनोरथोंको रचनेवाली रजोगुणात्मिका और स्वच्छता भक्तोंके अभिलषित पदार्थोंकी रक्षा करनेवाली सत्त्वात्मिका माया है। शुकतुण्डको लजानेवाली बड़ी ही सुन्दर नासिका है। मानो नासिकापर ही मनोहर मुकुट और अलक एवं भालपर तिलककी शोभा आकर रुकी है। अति ललित गण्डमण्डल और विशाल भालपर सुन्दर तिलककी झलक निराली ही है। मंजु मुख-मयंकपर सुन्दर भौंहें सुन्दर अंकके समान भासित होती हैं। वंक भौंहें और भालमें विराजमान मनोहर कुंकुमरेखा अद्भुत शोभा सरसा रही है। नासिकामें सुन्दर मौक्तिककी शोभा अद्भुत ही है। अति मनोहर पद्मकोषके समान मुख बन्धूकपुष्प, बिम्बाफलके समान अत्यन्त सुन्दर दीप्तिमत्ता विशिष्ट अरुण अधर और ओष्ठ शोभित होते हैं। दाडिमबीज एवं कुन्दकलीके समान सुन्दर दन्तावली अत्यन्त मनोहर लगती है। स्वभावसे स्निग्ध और स्वच्छ दशनावली अधर तथा ओष्ठकी दिव्य अरुणिमासे अरुण हो रही है। जैसे अधर-ओष्ठकी अरुण दीप्तिसे दशनावलीमें स्निग्ध अरुणिमाकी आभा है, वैसे ही दशनावलीकी भी दिव्य स्निग्ध दीप्ति अधरोंपर प्रकट हो रही है अथवा जैसे अरुण पंकज-कोषमें मोतियोंकी अतिसुन्दर देदीप्यमान पंक्ति शोभित हो, वैसे ही भगवान्के मुखपंकजमें दशनावलीकी शोभा है। दोनों कपोल, चिबुक और भालपर्यन्त समस्त मुख तो नीलमणीन्द्रमय चन्द्रमा, किंवा अद्भुत-दीप्ति- सम्पन्न श्यामल महोमय श्रृंगार-रससार-सरोवर-समुद्भूत नील पंकजके समान है। परंतु मुख्य मुख तो पूर्णानुराग-रससार-सरोवर-समुद्भूत सरोज ही है; क्योंकि उसमें अरुण दीप्तिका प्राधान्य है और अनुराग भी अरुण ही है। अतः तत्सार-सरोजमें अति अरुणिमाका सामंजस्य हो सकता है। पूर्णानुराग-रससार-सरोवर-समुद्भूत अरुण मुख-पंकजमें ही वह अधर-सुधा है, जो अन्तरंग भावुक जनोंके तथा प्रभु-प्राणेश्वरीके निरतिशय निरुपाधिक रागका आस्पद है। अधर-ओष्ठमें तो यों ही अद्भुत सरसता, स्निग्धता एवं दीप्तिमत्ता-विशिष्ट अरुणिमा है, दूसरे वह भावुकोंके रागसे महानुराग- रस-रंजित हो उठती है। अधरकी सूक्ष्म रेखाओंसे ताम्बूलका कुछ चटकीला रस और ही शोभा दरसा रहा है। बाल सूर्यकी कोमल रश्मियोंसे अतसी-पुष्पमें जैसे स्वच्छतायुक्त अद्भुत श्यामता है, उससे भी शतकोटिगुणित स्वच्छतायुक्त मधुरता श्रीभगवान्के अंगकी है। उसमें विकसित नील-कमल-कोषके समान कपोल बड़े ही सुडौल और गोल हैं। उनपर दिव्य मुक्तामणि रत्नोंसे जटिल सुवर्ण मणिमय कुण्डलोंकी अद्भुत झलक विराजमान है। कुण्डलों और मुकुटकी झलकसे नाना प्रकारकी दीप्तियोंसे युक्त स्निग्ध श्यामल कुन्तलोंकी भी आभा पड़ रही है। शोभा तथा छबिकी सीमा चिबुककी चमकीली श्यामलता विलक्षण
श्रीरामभद्रका ध्यान [५५९]
ही है। भावुकोंने तो कपोल और चिबुकपर कस्तूरिका और कुंकुमसे मकरीपत्र और कल्पवृक्षके मनोहर चित्र भी बनाये हैं, जो कि मनको बरबस खींच लेते हैं। अधरकी मनोहर अरुणिमासे स्वच्छ मोती भी विद्रुमके समान प्रतीत होने लगता है। नयनोंसे निरीक्षण-कालमें नयन-पुतरियोंकी दीप्तिसे मोती गुंजाके समान प्रतीत होने लगता है। जब यह कुतूहल देखकर वे हँस देते हैं, तब ब्रह्मस्मित चन्द्रिकाके सम्पर्कसे वह मोती हो जाता है। यह स्मित चन्द्रिका या उदार हास मानो हृदयस्थ अनुग्रहचन्द्रकी ही अमृतमयी दिव्य दीप्ति है। इस उदार हास दिव्य कलचन्द्रिकासे तो मानो नभोमण्डल धौत हो जाता है। सौगन्ध्य-लोभसे आये हुए भ्रमरवृन्द भी अपनी नीलिमा खोकर स्वच्छ रूप धारण कर बैठते हैं। उदार हास वक्षःस्थलपर हारके समान शोभायमान होता है। मनोहर मुखपंकजमें स्मित चन्द्रिका और उदार हास ऐसे शोभित होते हैं, मानो किसी अद्भुत नील कुवलयमें विलक्षण चन्द्रमा कभी छिपता है और कभी प्रकट होता है। विशेष स्वादकी बात यह है कि अरुण अधरमें मधुर बोलते समय दशनावली दामिनीके समान चमकती है। सुन्दर हास और मनोहर चितवन तो मनको लुभा लेती है। अरुण अधरके मध्यमें स्निग्ध दशन-पंक्ति और मनोहर हास मनोहर लगता है, मानो विद्रुमके विमानपर सुर-मण्डली बैठकर फूल बरसा रही हो अथवा अरुणतर अधरोंमें मनोहर हासयुक्त दशन- पंक्ति ऐसी शोभित होती है, जैसे सुवर्णके कमलमें तड़ितोंके साथ कुलिशोंने निवास किया हो। कमलदल-सरीखे दोनों नयनोंमें पुतलियाँ मधुकरके समान प्रतीत होती हैं। नासिका शुकतुण्डके समान मानो लड़ती हुई धनुषरूपी अवलियोंमें बचाव करनेके लिये प्रकट हुई है। सुषमाके अयन नयन और कुंचित केश, कलकुण्डल और नासिका ऐसी सुहावनी लगती है, मानो चन्द्रबिम्बके मध्यमें कमल तथा मीन और खंजनको देखकर भ्रमर-मकर अपनी-अपनी गाँव ताककर आये हों। शंखके सदृश कण्ठ बड़े ही शोभित हो रहे हैं। निर्मल पीताम्बर ऐसे शोभित होते हैं मानो नवनीलनीरदपर दामिनी दमकती है। अथवा सुचन्दन-चर्चित श्यामल श्रीअंगपर पीत दुकूल ऐसी छबि देता है, जैसे नील जलदपर चन्द्रिकाकी चमक देखकर दामिनी दमकती हो। अतः दामिनीको विनिन्दित करनेवाला, सुषमा-सदन मदनको भी मोहनेवाला सौन्दर्य-सार-सर्वस्व सुन्दर पीताम्बर प्रभुके श्रीअंगपर बड़ा ही सुहावना लगता है। श्रीवक्षःस्थलपर मनोहर सुन्दर श्यामल तरुण तुलसीदल-मालसहित मुक्तावली ऐसी शोभित होती है, जैसे महेन्द्रमणि-शिखरपर हंसकी पंक्तियोंसे युक्त श्रीरविनन्दिनी विराजमान हों। रुचिर उपवीत तथा अनेक प्रकारकी मुक्ताओंकी मालाएँ ऐसी मालूम पड़ती हैं, जैसे इन्द्रधनुष नक्षत्रोंके साथ तिमिर-राशिपर विराजमान हो। उसे देखकर अश्विनीकुमार, मदन, सोम सभी लज्जित होते हैं। भूषण तो ऐसे ज्ञात हो रहे हैं, मानो तरुण शृंगारतरु सुन्दर फलोंसे भरपूर हो अथवा कन्दर्प ही भूषणके छद्मसे शोभासार सुधाजलनिधि श्रीप्रभुके अंगसे शोभा लेने आये हों। पर वे लोभी लोभवश वहीं रह गये; जा न सके। प्रभुके श्रीअंगपर रोम-रोमपर अनन्तकोटि सोम और काम न्योछावर किये जा सकते हैं। श्रीभगवान्की मनोहर भुजाएँ चमकीली और मनोहर श्यामतासे युक्त हैं। उनमें कुंकुम-मिश्रित हरिचन्दनका विलिम्पन है और वे नाना प्रकारके अंगद, कंकण, मुद्रिकाओंसे भूषित हैं। कुछ भावुकोंका कथन है कि श्रीभगवान्की भुजाएँ श्रीजीके स्नेहरूप वरवेलिवेष्टित वटतरु हैं। प्रेमबन्ध ही वटवारि है। मंजुल मंगल मूल ही उसका मूल है। अँगुलियाँ मनोहर शाखाएँ, रोमावली ही पत्रावली, नख ही सुमन और सुजनोंके अभीष्ट ही सुफल हैं। उसकी अविचल, अमल, अनामय, सान्द्र, ललित, छद्मरहित, शुभ छाया समस्त सन्ताप, राग, मोह, मान, मद, मायाको शमन करनेवाली है। पवित्र मुनि-भृंग-विहंग ही इसका सेवन करते हैं।
५६० भक्तिसुधा उरमें सुन्दर भृगुचरण और श्रीवत्स तथा लक्ष्मीका सुन्दर चिह्न है। दक्षिण वक्षःस्थलमें दक्षिणावर्त विसतन्तुके समान स्वच्छ स्निग्ध रोमोंकी राजि है। मध्यमें भृगुचरण और वाम वक्षःस्थलमें वामावर्त सुवर्णवर्ण रोमोंकी राजि है। यही दोनों रोम-राजियाँ श्रीवत्स और लक्ष्मीके चिह्न हैं। अनेक भूषणोंसे भूषित, प्रलम्ब, श्यामल, चमकीली भुजाएँ पीताम्बरसंयुक्त होकर अद्भुत शोभा बढ़ा रही हैं। सुन्दर कौंधनी (करधनी) नितम्ब-बिम्बपर ऐसी शोभित होती है, मानो कनककमलकी अति सुहावनी पंक्ति मरकत- मणिशिखरके मध्यमें जाकर विराजमान हो अथवा मुखचन्द्रके भयसे ऊपर न जाकर वहीं नमितमुख होकर विकस रही हो। अति गम्भीर नाभि-सरोवर यमुना-भँवरके समान है। उसके ऊपरकी रेखाएँ बड़ी ही मनोहर हैं। दामिनीको लजानेवाले दिव्य पीताम्बरसे समावृत चमकीले श्यामल जानु और ऊरु अद्भुत छविमय सम्पन्न हो रहे हैं। नाना मुक्तामणिगण-जटित नूपुर ऐसा सुहावना लगता है, मानो मधुमत्त अलिगण युगल चरणकमलको देखकर झूम रहे हों। श्रीभगवान्के चरणपृष्ठ श्यामल, तल अरुण और नखश्रेणि कुछ स्वच्छ है। यह मानो यमुना, गंगा तथा सरस्वतीका संगम है, जिसमें अंकुश, कुलिश, कमल, ध्वज आदि चिह्न ही सुन्दर भँवर-तरंग हैं अथवा यह जो चक्र है, वह मानो भक्तजनके अरिषड्वर्गको नाश करनेके लिये है। कमल ध्यातृचित्तरूपी द्विरेफ (भ्रमर)- को मोहित करनेके लिये है, ध्वज भक्तजनके सर्वानर्थका नाशक वज्र है, वह भक्तके पापाद्रि-भेदनार्थ ही है। पाष्णिमध्यमें जो अंकुश है, वह मानो भक्तचित्तेभको वशमें करनेके ही लिये है। कमलदल-सरीखी अंगुलियोंपर नखमणि-श्रेणी ऐसी शोभित होती है, मानो कमलदलपर अरुणिमासे रंजित तुषारके कण रंजित होते हैं। किंवा नखोंमें सुन्दर अरुण ज्योतिःसम्पन्न नख-श्रेणी ऐसी मनोहर लगती है, मानो कमलदलोंपर दस मंगल सुन्दर सभा बनाकर अचल होकर बैठे हों। उन्नत चरण- पृष्ठ कदली-स्तम्भके समान, दोनों जंघा काम- तूणीरके समान सुहावने लगते हैं। इसी तरह भावुकोंने अनेक प्रकारसे भगवान् श्रीरामचन्द्रके अद्भुत दिव्य रूपका वर्णन किया है। भगवदवतारका प्रयोजन श्रीभगवान्के अवतार ग्रहण करनेके अनेक प्रयोजन हैं—धर्मग्लानि, अधर्माभ्युत्थानका निवर्तन, धर्मका संस्थापन, सन्मार्गानुगामी साधुओंका रक्षण, दुष्कृतियोंका संहार करना इत्यादि—ये सब प्रयोजन साक्षात् श्रीमुखने ही कहे हैं। कुन्ती महारानीका कहना है कि अमलात्मा परमहंस महामुनीन्द्रोंको भक्तियोगविधान करनेके लिये भगवान्का अवतार होता है— तथा परमहंसानां मुनीनाममलात्मनाम् । भक्तियोगविधानार्थं कथं पश्येम हि स्त्रियः ॥ (श्रीमद्भा० १।८।२०) अर्थात् परमहंसोंके प्रत्यक्चैतन्याभिन्न विशुद्ध ब्रह्मके अपरोक्ष साक्षात्कारको भक्तियोगद्वारा सरस एवं सुशोभित बनाकर उन्हें श्रीपरमहंस बनानेके लिये आपका प्रादुर्भाव होता है। भगवत्प्रीतिका बिना नैष्कर्म्यज्ञानकी शोभा नहीं होती— नैष्कर्म्यमप्यच्युतभाववर्जितं न शोभते ज्ञानमलं निरञ्जनम्। (श्रीमद्भा० १।५।१२) 'सोह न राम पेम बिनु ग्यानू।' (रा०च०मा० २।२७७।५) वेदान्तवेद्य, अदृश्य, अग्राह्य, भगवान् अपनी अचिन्त्य दिव्यलीलाशक्तिसे परममनोहर, सगुण, साकार सच्चिदानन्दघनरूपमें व्यक्त होकर अमलात्मा परमहंसोंके भजनीय बनकर उनके भक्तियोगके विधायक बनते हैं। ऐसे ही अन्यान्य अनेक प्रयोजन भगवान्के अवतारके
भगवदवतारका प्रयोजन ५६१
हैं। उनकी इयत्ताका निर्णय कोई नहीं कर सकता। हरि अवतार हेतु जेहि होई। इदमित्थं कहि जाइ न सोई॥' (रा०च०मा० १।१२१।२) भगवदवतरणके विभिन्न प्रयोजनोंके विविध अभिप्राय इन एक-एक प्रयोजनोंके अनेक अभिप्राय हैं, परंतु यहाँ इनमें एक-दो प्रयोजनोंपर ही विचार करना है। श्रीशुकदेवजीने कहा है कि— नृणां निःश्रेयसार्थाय व्यक्तिर्भगवतो नृप। अव्ययस्याप्रमेयस्य निर्गुणस्य गुणात्मनः ॥ (श्रीमद्भा० १०।२९।१४) अर्थात् अव्यय, अप्रमेय, निराकार, निर्विकार, निर्गुण एवं गुणागार भगवान् अनन्तकोटिकन्दर्पमदमोचन श्रीकृष्णचन्द्रकी परमानन्दकन्दरूपमें अभिव्यक्ति जन- साधारणके कल्याणार्थ होती है। इस श्लोकमें 'नृणाम्' शब्दका 'नरमात्राभिमानी अज्ञानी' अर्थ विवक्षित है, जैसा कि 'न कर्म लिप्यते नरे' इस मन्त्रका व्याख्यान करते हुए श्रीमच्छंकरभगवत्पादने कहा है। जो विशुद्ध सच्चिदानन्दघन परब्रह्मात्माको पहचान चुका है, वह तो नर, नाग, देव, गन्धर्वादि कार्यकारणसंघातोंसे पृथक् अन्तरात्माको देखता है, वह नरमात्राभिमानी नहीं होता। जो स्वधर्मानुष्ठान, उपासना एवं श्रवण, मनन, निदिध्यासनादिद्वारा अपने शुद्ध स्वरूपका साक्षात्कार कर चुके हैं, वे तो निःश्रेयसरूप ही हैं। परंतु जो उसमें असमर्थ हैं, उनके निःश्रेयसार्थ भगवान् श्रीकृष्णरूपमें प्रकट हुए हैं। अतएव अत्यन्तबहिर्मुख प्राणियोंका भी, जिनका कि अदृश्य, अग्राह्य, अलक्षण, अचिन्त्य, अव्यपदेश्य, ब्रह्मसाक्षात्कार या उपासनामें चित्त ही नहीं लगता, भगवान्के मनोहरस्वरूपमें चित्त निविष्ट हो सकता है। अतएव काम, क्रोध, भय, स्नेहसे या ऐक्यभावसे यथाकिञ्चित् भगवान्में मनका प्रवेश करके प्राणी संसारसे छूटकर भगवद्रूप हो जाता है। कामं क्रोधं भयं स्नेहमैक्यं सौहृदमेव च। नित्यं हरौ विदधतो यान्ति तन्मयतां हि ते ॥ (श्रीमद्भा० १०।२९।१५) कंस भयसे, शिशुपाल द्वेषसे, कुब्जा कामसे श्रीकृष्णमें लीन हो गयी; मारनेकी इच्छासे पूतना कालकूटविषलिप्त स्तन्य पिलाकर भी कृतकृत्य हो गयी। कुछ व्रजांगनाएँ उन्हीं पूर्णतम पुरुषोत्तम भगवान्का जारबुद्धिसे चिन्तनकर तल्लीन हो गयीं। कहा जा सकता है कि यदि वे व्रजांगनाएँ बिना तत्त्वसाक्षात्कार किये ही श्रीकृष्णको जार समझती हुई ही ब्रह्मलीन हो गयीं, तब तो ज्ञानकी आवश्यकता ही न रह जायगी। ऐसी स्थितिमें 'नैनमविदितो देवो भुनक्ति।', 'ऋते ज्ञानान्न मुक्तिः।' इत्यादि श्रुतियोंका यह कहना विरुद्ध होगा कि भगवान् बिना प्रत्यक् चेतनरूपसे साक्षात्कार किये साधकका पालन नहीं करते और बिना ज्ञानके मुक्ति नहीं होती। यदि कहा जाय कि वस्तुतः श्रीकृष्ण ब्रह्म हैं, अतः उनके ज्ञानकी अपेक्षा नहीं है। विष जानमें या अनजानमें यथाकथंचित् सेवन करनेसे भी अपना फल देता है। अमृत भी ज्ञानमें, अज्ञानमें सर्वथा अपना फल देता ही है। वैसे ही श्रीकृष्ण ब्रह्म हैं, चाहे ब्रह्मबुद्धिसे, चाहे जारबुद्धिसे उनका सेवन किया जाय, अवश्य उसका फल होगा। परंतु इसपर यह कहा जाता है कि वस्तुदृष्टिसे यह समस्त विश्व ही ब्रह्म है, फिर तो सभीके पति, पुत्र, शत्रु, मित्र ब्रह्म ही हैं, उनका चिन्तन करनेसे भी मुक्ति होनी चाहिये। अतः इस ब्रह्माकारवृत्तिसे मूलाज्ञानके नष्ट होनेपर निरावरण ब्रह्मका साक्षात्कार ही मोक्षका कारण है। बिना निरावरण ब्रह्मका अनुभव हुए पति, पुत्रादि प्रीति सावरण एवं भिन्न-भिन्न प्रपंचाकारमेंसे विवर्तित ब्रह्मकी प्रीति मोक्षका हेतु नहीं बन सकती। इसपर अभिज्ञोंका कहना है कि यह ठीक है कि निरावरण ब्रह्मका अनुभव ही मोक्षका कारण है और उसके लिये ब्रह्माकारवृत्ति या ब्रह्मविज्ञान अपेक्षित है, परंतु श्रीकृष्ण लौकिक पति-पुत्रादिकोंके समान सावरण ब्रह्म या विवर्तित ब्रह्म नहीं हैं, किंतु वे तो निर्गुण, निरावरण, शुद्ध ब्रह्म ही हैं। अतः उनका अनुभव, उनके मनकी आसक्ति अवश्य ही मुक्तिका मूल है। 'ऋते ज्ञानान्न मुक्तिः' इत्यादि श्रुतियाँ वहाँके लिये
५६२ | भक्तिसुधा
हैं, जहाँ सावरण ब्रह्मका सम्बन्ध है। श्रीकृष्ण तो निरावरण ब्रह्म हैं, अतः यहाँ तो जैसे विषबुद्धिसे भी पान करनेपर अमृत अमृतत्वको प्रदान करता है, वैसे ही जारबुद्धि या शत्रुबुद्धिसे भी निरावरण ब्रह्मात्मक श्रीकृष्णका भजन मोक्षका मूल है—'वस्तु-शक्ति ज्ञानकी अपेक्षा नहीं रखती।' जैसे चिन्तामणिमें यदि दीपक-बुद्धिसे प्रवृत्ति हो तो भी लाभ चिन्तामणिका ही होगा, वैसे ही निरावरण ब्रह्म श्रीकृष्णमें शत्रु या जारबुद्धिसे भी प्रवृत्ति होनेपर प्रवृत्तको शुद्ध ब्रह्मकी ही प्राप्ति होगी, जार या शत्रु की नहीं। कहा जा सकता है कि शुद्ध ब्रह्म तो कूटस्थ एवं अदृश्य है, अतः विशुद्धसत्त्व या अचिन्त्य दिव्यलीला-शक्तिके योगसे ही उसकी श्रीकृष्णरूपमें अभिव्यक्ति माननी पड़ेगी। ऐसी स्थितिमें शक्तिका व्यवधान होनेसे आवरण अवश्य ही मानना पड़ेगा, फिर श्रीकृष्ण निर्गुण एवं निरावरण कैसे हुए? इसका उत्तर यह है कि जैसे बादल आदिके सम्बन्धमें सूर्यस्वरूप आवृत होता है; वैसे ही राजस, तामस उपाधियोंके सम्बन्धसे ब्रह्मस्वरूप आवृत हो जाता है। प्रपंचरूपमें विवर्तित ब्रह्म राजस, तामस उपाधियोंके सम्बन्धसे आवृत रहता है, परंतु विशुद्धसत्त्व दिव्यलीलाशक्ति तो अत्यन्त स्वच्छ है। जैसे शुद्ध काँच दूरवीक्षण यन्त्र या उपनेत्रके सम्बन्धसे सूर्यस्वरूप आवृत नहीं होता, किंतु निरावरण सूर्यकी अपेक्षा स्पष्ट-सूर्यका दर्शन होता है, वैसे ही लीलाशक्तिके सम्बन्धसे श्रीकृष्णरूपमें प्रकट परब्रह्म आवृत नहीं होता, अपितु निरावरण ब्रह्मकी अपेक्षा भी सुन्दर, मधुर एवं मनोहर होकर व्यक्त होता है। जैसे शीतलताके सम्बन्धसे बर्फरूपमें परिणत जल निरावरण ही समझा जाता है, वैसे ही श्रीकृष्णरूपमें व्यक्त ब्रह्म गुणकृत आवरण एवं प्रभावसे विनिर्मुक्त होनेके कारण निर्गुण और निरावरण समझा जाता है। इसी अभिप्रायसे 'हरिर्हि निर्गुणः साक्षात्।' इत्यादि उक्तियाँ हैं। ऊपर कहा गया है कि निर्गुण, गुणागार, अव्यय, अप्रमेय परब्रह्मकी ही श्रीकृष्णरूपमें अभिव्यक्ति प्राणियोंके कल्याणार्थ है। उनके मंगलमय श्रीअंगकी सुन्दरता, सरसता, मधुरता हठात् प्राणियोंके मनको खींच लेती है और पाषाण तथा वज्रके समान हृदयको पिघलाकर नवनीतके समान कोमल एवं सरस बना देती है। सौन्दर्य-माधुर्य-सौरस्य-सौगन्ध्यसुधाजलनिधि श्रीअंगमें इन्द्रियों और मनकी स्वाभाविकी आसक्ति हो जाती है। अमृतमय मुखचन्द्रमें मन और नयनकी ऐसी आसक्ति होती है कि वे लौटना तो भूल ही जाते हैं। जो मन विषयोंसे एक क्षणके लिये पृथक् नहीं हो सकता, वही भगवान्में आसक्त होकर विषयोंको भूल जाता है। फिर ज्ञान-विज्ञान-अपेक्षित सभी दिव्य गुण सेवाके लिये व्यग्र हो उठते हैं। ऐसे परम मधुर मनोहर भगवान्में प्रीति-आसक्तिका होना स्वाभाविक ही है। यदि प्रीति न भी हुई तो काम, द्वेष, ईर्ष्या, क्रोध आदि हो गया तो भी प्राणियोंका कल्याण हो जाता है। जो जारबुद्धि अन्यत्र घोर नरकका मूल है, वही भगवान्में परम कल्याणका मूल हो जाती है। जैसे सुवर्णमुद्रिका और दिव्य रत्नका सम्बन्ध बनानेके लिये लाखका भी मूल्य बढ़ जाता है, वैसे ही भावुक और भगवान्का सम्बन्ध सुस्थिर करनेके लिये जारबुद्धि भी बहुमूल्य हो जाती है। अन्यत्र 'जार' का अर्थ 'जयति सर्वान् गुणान् धर्मस्वर्गापवर्गान् जारः' इस व्युत्पत्तिके अनुसार यह अर्थ होता है कि सब गुणोंको या धर्म, स्वर्ग, अपवर्ग आदिको नष्ट करनेवाला। परंतु यहाँ 'जरयति अविद्या तत्कार्यात्मकं बन्धमविद्याग्रन्थिं कामान् वा इति जारः' इस व्युत्पत्तिके अनुसार यह अर्थ होता है कि जो अविद्याग्रन्थिको जला दे, अविद्या—तत्कार्यात्मक बन्धको नष्ट कर दे अथवा समस्त कामवासनाओंको जलाकर नष्ट करनेवाला परमात्मा ही जार है। इस तरह साधारण-से-साधारण, उल्बण-से- उल्बण प्राणियोंकी सद्गतिके लिये ही श्रीभगवान्का अवतार है। कुछ अभिज्ञोंका कहना है कि भगवान् अपने ही सौशील्य, औदार्य, वात्सल्य आदि गुणगणोंकी सफलताके लिये इस मर्त्यलोकमें अवतीर्ण होते हैं।
भारतमें ही अवतार क्यों ? ५६३ यदि ऐसा न हो तो उनके पतितपावनत्वादि गुणगण व्यर्थ और वन्ध्य हो जायँगे। अपनी अनन्तता, अनन्तकोटिब्रह्माण्डनायकताको भुलाकर बन्दरोंके साथ मिल-जुलकर आत्मीयताका व्यवहार करना यही अद्भुत सौशील्य है- प्रभु तरु तर कपि डार पर ते किए आपु समान। तुलसी कहूँ न राम से साहिब सीलनिधान ॥ (रा०च०मा० १।२९(क)) गृध्रराजको अपने अंकमें लेकर अपने ही हस्तारविन्दसे उनके अंगका मार्जन करना, नयनाश्रुओंसे अभिषेक करना, 'तात-तात' मधुर वचनामृत सुनाकर उनको सुरेन्द्रादिस्पृहणीय दिव्यगतिको प्रदान करना मनोहर मुखचन्द्रका दर्शन देना। विभीषण, सुग्रीवादिके संग मैत्री जोड़ना, श्रीहनुमान्के ऋणी रहना- 'सुनु सुत तोहि उरिन मैं नाहीं।' (रा०च०मा० ५।३२।७) प्रति उपकार करौं का तोरा। सनमुख होइ न सकत मन मोरा ॥ (रा०च०मा० ५।३२।६) एकैकस्योपकारस्य प्राणान् दास्यामि ते कपे। शेषस्येहोपकाराणां भवाम ऋणिनो वयम्॥ -ये सब ऐसे कार्य हैं, जिनका होना साकेतलोक, गोलोकमें एवं निराकार निर्गुणरूपमें असम्भव है। श्रीदामासे पराजित होकर उसका घोड़ा बनना, व्रजांगनाओंके छछियाभर छाछपर नाच नाचना, वेदवचन मुनिमन अगम होकर भी चित्रकूटके कोल-भिल्लोंके वचनोंको बड़े चावसे सुनना ('बेद बचन मुनि मन अगम ते प्रभु करुना ऐन। बचन किरातन्ह के सुनत जिमि पितु बालक बैन ॥' रा०च०मा० २।१३६), जिसके छाया-स्पर्शमें भी मार्जनकी अपेक्षा हो उस निषादसे सख्य जोड़ना, महामहापतिताको जगत्पावन बनाना आदि कार्य बिना अवतार ग्रहण किये हो ही नहीं सकते। अतः प्रभु अपने ही प्रयोजनमें इन गुणों एवं अबन्ध्य सफलतासम्पादनके लिये हमलोगोंमें अवतीर्ण होते हैं। पण्डितराजने गंगाजीसे कहा है- 'हे अम्ब ! आपके मनमें बहुत दिनोंसे यह रुचि थी कि कोई ऐसा उत्कट पतित पातकी मिले कि जिसको तारनेमें कोई तीर्थ, तप, जप, व्रत एवं कोई देवता समर्थ न हो तो उसको मैं पावन करूँ। अम्ब! बस, मैं आपकी उसी रुचिको पूरा करने आया हूँ। मुझ-जैसा पातकी, महापतित और कौन कहाँ मिलेगा ? माँ! लो, मुझे तारकर अपना अभिलाष पूरा करो।' ठीक वैसे ही हम-सरीखे पतितों एवं दीनोंसे भरपूर इस मर्त्यलोकमें यदि प्रभु न पधारें तो कम-से-कम उनकी दीनवत्सलता, पतितपावनता आदि गुण तो व्यर्थ ही हो जायँ। अतः उन्हीं सबकी सफलताके लिये श्रीभगवान्का अवतरण होता है। दीनवात्सल्य, पतितपावनता, सौशील्य, औदार्य, कारुण्यसिन्धुत्व आदि गुणोंसे ही प्रेरित होकर प्रभु दीनोंकी, पतितोंकी कल्याणकामनासे ऊपरसे नीचे उतरते हैं। यदि यह सच है तो सचमुच किसीको निराश न होना चाहिये। भारतमें ही अवतार क्यों ? यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥ परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्। धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥ (गीता ४।७-८) हे भारत! जब-जब धर्मकी ग्लानि और अधर्मका अभ्युत्थान होता है, तब-तब मैं आत्माका सृजन अर्थात् अवतार ग्रहण करता हूँ। साधुओंके परित्राणार्थ, पापात्माओंके विनाशार्थ एवं धर्म- संस्थापनके लिये युग-युगमें मैं प्रकट होता हूँ। यहाँ यह विचार उठता है कि भगवान् भारतमें ही धर्मरक्षा आदिके लिये अवतार ग्रहण करके प्रकट
५६४ | भक्तिसुधा होते हैं या अन्यान्य देशोंमें भी ? यदि भारतमें ही, तब वे भगवान् कैसे ? वे तो अखिल विश्वके नियामक और ईश्वर हैं। समस्त विश्वको पाप- पंकसे उद्धृत करके उसे धर्मात्मा बनाना उनका कर्तव्य है। अतः विश्वकी ही धर्मग्लानि, अधर्माभ्युत्थान मिटाकर धर्मसंस्थापनकी आवश्यकता है। विश्वके ही साधुओंके पालन और दुष्कृतियोंके संहारकी आवश्यकता है, फिर भगवान्का उक्त कार्योंके लिये भारतमें ही क्यों अवतार होता है ? समदर्शी, सर्वसम भगवान्को सभी देशोंमें अवतार ग्रहण करके पूर्वोक्त कार्य करना चाहिये। यदि सभी देशोंमें भगवान्के अवतार होते हैं तो वे अवतार-पुरुष कौन-कौन हैं ? साथ ही यह भी स्पष्ट होना चाहिये कि क्या सभी देशोंमें जो प्रचलित धर्म हैं, उनके भी स्थापक और पालक भगवान् ही हैं ? यदि ऐसा ही है तो भिन्न देशों एवं समान देशोंमें भी कालभेदसे विरुद्ध धर्मोंकी स्थापना क्यों की जाती है ? एक सर्वज्ञ सर्वशक्तिमान् भगवान्के प्रतिष्ठापित और पालित धर्मोंमें ऐसा विरोध और भिन्नता क्यों ? एक-एक धर्मके प्रतिष्ठापकोंने दूसरे धर्म-प्रतिष्ठापकोंका विरोध करके, यहाँतक कि दूसरे धर्मोंका नाशतक करके धर्मान्तरोंकी स्थापनाएँ की हैं। ऐसी स्थितिमें वे सभी धर्म हों या उनके प्रतिष्ठापक और पालक भगवान् हों— यह कैसे कहा जाय ? इस प्रश्नपर विचार करते हुए प्रथम यह देखना चाहिये कि गीताके श्लोकमें कौन-सा धर्म विवक्षित है। इसी निर्णयसे यह निर्णय भी हो जायगा कि साधु कौन और दुष्कृति (असाधु) कौन ? कारण भगवत्संस्थापित धर्ममें परिनिष्ठित ही साधु और उससे विमुख असाधु समझ लिये जायेंगे। इसमें सन्देह नहीं कि आजकल गीता और गीतोक्त धर्म-कर्मको सार्वभौम या व्यापक बनानेकी बुद्धिसे बहुत व्यापक अर्थ किया जाता है। यद्यपि गीताकी दृष्टिसे गीतोक्त धर्म-निर्णय करनेमें सरलता है। कारण गीताने ही यह निश्चय कर दिया है कि शास्त्रैकसमधिगम्य कर्म ही गीताको मान्य है तथापि आधुनिक विवेचकोंकी शास्त्रपर भी वही व्यापकताकी भावना है। उनका कहना है कि यदि केवल वेद ही शास्त्र हों और शास्त्रैकसमधिगम्य वर्णाश्रमानुसार श्रौत-स्मार्त कर्म ही धर्म हो, तब तो गीतामें संकीर्णता आ जाती है, जो गीता-जैसे सार्वभौम ग्रन्थके स्वरूपानुरूप नहीं है। इतने बड़े संसारमें छोटा-सा भारतवर्ष, वहाँके भी कुछ समूहोंमें ही वेद-शास्त्र और तदुक्त धर्मोंका आदर और प्रचार है। जब गीताका भी वही शास्त्र और धर्म है, तब तो वह एक देशकी ही वस्तु हो जाती है। फिर वह सार्वभौम एवं सर्वमान्य ग्रन्थ नहीं हो सकता। अतः भिन्न-भिन्न देश, कालकी परिस्थितिके अनुसार बुद्धिमान् विवेचकोंद्वारा निर्धारित किये गये कर्तव्याकर्तव्य- निर्णायक ग्रन्थ ही शास्त्र हैं। उन्हीं शास्त्रोंके अनुसार, नैतिक, आर्थिक, वैयक्तिक, सामूहिक अभ्युदयके अनुकूल चेष्टा या हलचलें ही कर्म या धर्म हैं, या उन-उन देशों एवं कालोंके प्राणियोंके लौकिक- पारलौकिक कल्याणोंके लिये सर्वमान्यप्राय बुद्धिमान् महापुरुषोंद्वारा रचित कार्य-अकार्यके निर्णायक ग्रन्थ ही शास्त्र हैं। उन शास्त्रोंके अनुसार सब तरहके अभ्युदयानुकूल देह, इन्द्रिय, मन, बुद्धिके जो कर्म हैं, वे ही धर्म हैं। ऐसा माननेमें ही गीताकी सर्वमान्यता सुरक्षित रहती है। यद्यपि इन महानुभावोंकी दृष्टि तो अच्छी है, वे गीताको सार्वभौम बनाकर उसका उपकार ही करना चाहते हैं तथापि उसके सिद्धान्त और अभिप्रायको बाँधकर उसे सार्वभौम बनाना सम्भवतः उन्हें वाञ्छनीय न हो। स्वरूपकी रक्षा होते हुए ही उन्नति, उन्नति है। स्वरूपविनाशसे उन्नति, उन्नति कदापि नहीं कही जा सकती।
भारतमें ही अवतार क्यों ? ५६५ धर्माधर्मके निर्णयमें बुद्धिबल नहीं, शास्त्र ही प्रमाण है बुद्धिमानोंको विदित है कि परिमित प्रज्ञा- क्रिया-शक्तिसम्पन्न मनुष्योंके लौकिक हिताहितका विवेचन कुछ अंशोंमें भले ही सम्भव हो, परंतु अलौकिक, पारलौकिक सुखों एवं सुख-साधनोंके विज्ञानकी ओरसे वे सर्वथा अन्धे ही हैं। अर्थ और कामविषयक उद्योगों और नीतियोंमें देशकाल-भेदसे निःसीम परिवर्तन सम्भव हो सकते हैं। अतः उन विषयोंमें नीति-निर्धारण करना मानवके लिये असम्भव नहीं है। परंतु सर्वज्ञकल्प प्रजापति, बृहस्पति, शुक्र, मनु आदि नीतिज्ञोंकी नीतिको आधार मानकर तदनुसार परिवर्तन या अनुवर्तन अधिक सुविधाजनक एवं निरुपप्लव होता है। किन-किन चेष्टाओंसे परलोकमें क्या दुःख और क्या सुख होगा, इसका परिज्ञान अल्पज्ञ जीवके लिये नितान्त असम्भव है। देश, काल, परिस्थितिके अनुसार धर्माधर्मका परिवर्तन निःसीम नहीं है। वस्तुतः अव्यवस्थित परिवर्तन नीतिमें भी असम्भव है, फिर धर्ममें तो वह कथमपि सम्भव ही नहीं है। कहीं भी लक्षणके अनुसार लक्ष्यका निर्णय हुआ करता है। प्रत्यक्ष विषयमें जहाँ लक्षण-निर्धारण करना होता है, वहाँ अव्याप्ति, अतिव्याप्ति, असम्भव दोषोंसे रहित ही लक्षण हुआ करता है। परंतु जो लक्ष्य अप्रत्यक्ष है, उसका निर्णय लक्षणोंके ही अनुसार हुआ करता है। लक्षण (सूत्र) जहाँ नहीं घटता, वह लक्ष्य ही अशुद्ध समझा जाता है। परंतु आज प्राणियोंके आचरणके अनुसार धर्माधर्मका निर्णय किया जाने लगा है। आजकलके लोगोंमें वस्तुस्थितिकी अपेक्षाकर परिवर्तनके अनुवर्तन करनेका स्वभाव हो गया है। धर्मके लक्षणानुसार धर्मका निर्णय करना एक बात है, परिस्थिति और आचरण देखकर तदनुकूल धर्मकी परिभाषा बनाना दूसरी बात है। गीताकी दृष्टिमें यत्किंचित् हलचल या चेष्टा धर्म नहीं है। कारण, वह तो बिना विधान किये भी प्रकृति-सम्भव गुणोंकी प्रेरणासे स्वयं ही होगा। अतः 'कुरु कर्मैव' (गीता ४।१५) इत्यादि वाक्योंमें विहित कर्म वही है, जो रागप्राप्त नहीं है, किंतु शास्त्रसे ही जिनकी कर्तव्यता विदित होती है। इसीलिये कहा गया है कि कार्य-अकार्यकी व्यवस्थामें एक शास्त्र ही प्रमाण है। अतः शास्त्रविधानको जानकर ही कर्म करे—'ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि ॥' (गीता १६।२४) यह शास्त्र भी अव्यवस्थित, समय-समयके समाजसे निर्धारित यत्किञ्चित् नियम नहीं है; क्योंकि समयानुसार कभी भौतिकवादियोंका ही समाज और दल विजयी एवं उन्नत हो सकता है, कभी अध्यात्मवादियोंका ही दल विस्तृत हो सकता है। बहुत-से व्यक्तियोंका ही समाज बन जाता है। व्यक्तियोंकी बुद्धियोंका कोई ठिकाना नहीं रहता, बड़े-से-बड़े व्यक्ति साधारण- से-साधारण विषयमें भ्रान्त हो जाते हैं। उस समय उन्हें यही दृढ़ निश्चय होता है कि हम जो कुछ भी समझ रहे हैं, वह बिलकुल सत्य है। परंतु कालान्तरमें उन्हें अपने भ्रम और प्रमादोंका स्वयं बोध होता है। रज, तमके प्रभावसे बुद्धिसत्त्व आच्छन्न रहता है। बिना परमात्मभाव व्यक्त हुए योगाभ्याससे भी वह अत्यन्त निरावरण नहीं होता। अतः अज्ञान, भ्रम आदि जीवोंके सामने किसी-न-किसी कक्षामें खड़े ही मिलते हैं। व्यक्तियोंके समूहोंमें—समाजमें भी यही दशा होती है। अतः धर्म-अधर्मके निर्णयमें व्यक्ति, समाज या बहुमतका कोई भी मूल्य नहीं है। नैतिक, आर्थिक अभ्युदयमें भी केवल व्यक्ति या समाजकी निर्धारित नीतिके सहारे सदा विजय नहीं हो सकती। अतः वहाँ भी मन्वादि सर्वज्ञोंके आर्थिक, नैतिक विज्ञानके अनुसार ही सफलता होती है। फिर धर्मके विषयमें तो कहना ही क्या है? चिकित्साके विषयमें एक विज्ञ चिकित्सकके सामने दूसरे विषयके लाखों विद्वानोंकी भी सम्मतिका कुछ भी मूल्य नहीं।