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भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

४६ भक्तिसुधा ब्रह्ममहेन्द्रप्रभृति देवाधिदेवसे लेकर खग, मृग, वन, गिरि, सरित, सरोवर, वृक्ष-लताओंमें भी उस मधुर मनोरम मंगलमय स्वरूपदर्शन-स्पर्शसे आनन्दोद्रेकमें पुलकावली और आनन्दाश्रुओंका संचार होता है। तभी व्रजांगनाओंने कहा है— का स्त्र्यङ्ग ते कलपदायतमूर्च्छितेन सम्मोहितार्यचरितान्न चलेत्रिलोक्याम्। त्रैलोक्यसौभगमिदं च निरीक्ष्य रूपं यद गोद्विजद्रुममृगाः पुलकान्यबिभ्रन्॥ (श्रीमद्भा० १०।२९।४०) हे जीवनधन! वृन्दावनचन्द्र मनमोहन! आपके अमृतमय मुखचन्द्रसे निःसृत कलपदायत गीत-मूर्च्छनासे कौन स्त्री आर्यचरितसे चलायमान नहीं हो सकी, त्रैलोक्यसौभग जिस मंगलमय वपुका निरीक्षण करके गौ, द्विज, मृगद्रुमोंमें भी पुलकावलीका संचार होता है, जहाँ प्राणियोंका मन प्राकृत शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्धकी ओर आकर्षित होता था, वहाँ अपनी दिव्यलीला शक्तिसे अशब्द, अस्पर्श, अरूप, वेदान्तवेद्य सदानन्दघन भगवान् ही निखिलरसामृतमूर्ति धारणकर अपने दिव्य ब्रह्मरसात्मक शब्द-स्पर्श-रूप-रस-गन्धोंसे हठात् प्राणियोंके मनको आकर्षित करते हैं। जो भगवान् भक्तोंके सर्वस्व एवं ज्ञानियोंके एकमात्र परमतत्त्व हैं, वे ही नास्तिक-से-नास्तिकके भी सब कुछ हैं, भेद इतना ही है कि वे अपने सर्वस्वमें निरतिशय प्रेम करते हुए भी उन्हें पहचानते नहीं। यद्यपि यह बात असम्भव-सी प्रतीत होती है, परंतु विवेचन करनेमें अत्यन्त स्पष्ट हो जाती है। चाहे कैसा भी नास्तिक क्यों न हो, वह अपने अभाव (या मरने)- से घबड़ाता है। वह यही चाहता है कि मैं सदा रहूँ। जब किसी साधारण-से-साधारणकी आत्मरक्षा और अस्तित्वके लिये व्यग्रता होती है, तब एक मनुष्य, चाहे नास्तिक ही क्यों न हो, क्या अपना अस्तित्व नहीं चाहता? क्या वह अपने अस्तित्वको मिटाना पसन्द करेगा? यदि नहीं तो फिर ब्रह्म अस्तित्वका पूर्णानुरागी हुआ या नहीं? अब यह बात दूसरी है कि वह अपने-आप कौन है, जिसका अस्तित्व चाहता है। यदि सौभाग्यवश कभी इस ओर दृष्टि जायगी, बस तभी वह समझ लेगा कि विनश्वर देह, इन्द्रिय, मन, बुद्धि, अहंकार—ये सभी दृश्य हमारे हैं। हम इनसे पृथक् इनके द्रष्टा हैं और उसी निर्विकार स्वरूप स्वात्माका ही सदा अस्तित्व चाहते हैं। विवेचन करनेसे यह विदित हो जाता है, स्वप्रकाश दृक्‌का अस्तित्व तत् स्वरूप ही है, अतएव आत्मा स्वप्रकाश कहा जाता है। इसलिये जगत्‌को अनेकानेक वस्तुओंमें चाहे जितना भी संदेह, विपर्यय या अज्ञान हो, परंतु स्वात्मा है या नहीं या नहीं ही है, इस प्रकार आत्मविषयक संदेहादि किसीको नहीं है। जीवनगत परमेश्वर, धर्म, कर्म सभीका अभाव साबित करनेवाले शून्यवादीको भी अनिच्छया स्वात्माका अस्तित्व मानना पड़ेगा; क्योंकि जो सबके अभावका सिद्ध करनेवाला है, अगर वह रह गया, तब तो स्वातिरिक्त ही सबका अभाव सिद्ध होगा। अपना अभाव नहीं हो सकता, सर्व निराकर्ता सर्व निषेधकी अवधि एवं साक्षिभूतके अस्वीकार करनेपर शून्य भी अप्रामाणिक होगा। अतः वही अत्यन्त अबाधित, सर्व-बाधका अधिष्ठान एवं साक्षिभूत, अस्तित्व या सत्ता भगवान्‌का रूप है, साथ ही बोध और प्रकाशके लिये प्राणीमात्रमें उत्सुकता दिखायी देती है, पशु- पक्षी भी स्पर्शसे, आघ्राणसे, किसी-न-किसी तरहसे ज्ञानके प्रेमी हैं। यह ज्ञानकी वांछा प्राणीमें उत्तरोत्तर बढ़ती दिखायी देती है कि हमें अब अमुक तत्त्वका ज्ञान हो, अब अमुकका ज्ञान हो। इतिहास, भूगोल, खगोल, भूततत्त्व एवं अधिभूत, अध्यात्म, अधिदैव सभी तत्त्वोंको जाननेके लिये मन चाहता है, किं बहुना, सर्वज्ञता बिना ज्ञानसे संतोष नहीं होता। पूरी-पूरी सर्वज्ञता कहाँ हो सकती है, यह विवेचन करनेसे स्पष्ट हो जाता है कि सर्व (पदार्थ) जिस स्वप्रकाश अखण्ड विशुद्ध भान (बोध)-में कल्पित है, वही सर्वावभासक एवं सर्वज्ञ हो सकता है; क्योंकि प्रकाश या भान अत्यन्त असंग एवं

निरवयव और अनन्त है, दृश्यके साथ सिवाय आध्यात्मिक सम्बन्धके और संयोग, समवाय आदि सम्बन्ध नहीं हो सकता, अतः यदि सर्वज्ञ होनेकी वांछा है तो सर्वावभासक सर्वाधिष्ठान विशुद्ध अखण्ड बोध होनेकी क्या वांछा है? यह अखण्ड बोध ही सच्चिदानन्द भगवान्‌का चिद्रूप है। जैसे पूर्वोक्त अखण्ड अनन्त स्वप्रकाश सत्ता या अस्तित्व ही अपना तथा सबका निजी रूप है, वैसे ही यह अबाध्य अखण्ड बोध भी सबका अन्तरात्मा है। आनन्दकी अभिलाषा इसी तरह आस्तिक-नास्तिक ही नहीं, किंतु पशु-कीटपर्यन्त भी आनन्दके लिये व्यग्र हैं, प्राणिमात्रके देह, इन्द्रिय, मन, बुद्धि, अहंकार आदिकी जितनी चेष्टाएँ एवं हलचलें हैं, वे सभी आनन्दके लिये हैं। बिना किसी प्रयोजनके किसीकी भी प्रवृत्ति नहीं होती, किं बहुना उन्मत्त भी, चाहे भ्रान्ति या अज्ञानसे ही सही, आनन्दके लिये ही समस्त चेष्टाएँ करता है, समस्त वस्तुओंमें संदिहान एवं भ्रान्त होता हुआ भी प्राणी, जिसके लिये नाना चेष्टाएँ करता है, उसके विषयमें उसे संदेह या भ्रम अथवा अज्ञान हो, यह कैसे कहा जा सकता है। इस तरह जिसके लिये समस्त चेष्टाएँ हो रही हैं, वह आनन्द अत्यन्त प्रसिद्ध है। संसारभरकी समस्त वस्तुओंमें प्रेम जिसके लिये हो और जो स्वयं निरतिशय एवं निरुपाधिक प्रेमका आस्पद हो, अर्थात् जो अन्यके लिये प्रिय न हो, वही आनन्द होता है। देखते ही हैं कि समस्त आनन्दके साधनोंमें प्रेम अस्थिर होता है। स्त्री-पुत्रादिमें प्रेम तभीतक है, जबतक वे अनुकूल हैं, प्रतिकूल होते ही वे द्वेष्य हो जाते हैं, परंतु सुख और आनन्द सदा ही प्रिय रहता है। कभी किसीको भी आनन्दसे द्वेष हो, यह नहीं कहा जा सकता। इस तरह नास्तिकसे-भी-नास्तिक, आनन्दको चाहता है, उसकी प्राप्तिके लिये प्रयत्नशील होता है और उसके लिये लालायित होता है, परंतु उसमें पहचाननेकी ही कमी है; क्योंकि जिस आनन्द और सुखके लिये नास्तिक व्यग्र है, उसे पहचानता नहीं। वह तो सुख-साधन, स्त्री-पुत्रादि, शब्द-स्पर्श आदि सम्भोगमें ही सुखकी भ्रान्तिसे फँसकर उसमें ही सन्तुष्ट हो जाता है। विवेचन करनेसे विदित हो जाता है कि जिनमें कभी प्रेम, कभी द्वेष होता है, वह सुख नहीं है, सदा ही जिसमें निरतिशय एवं निरुपाधिक प्रेम होता है, वही सुख है। जागतिक सम्भोग- साधन-पदार्थ ऐसे हैं नहीं, अतः वे सुखरूप नहीं हैं, किंतु अभिलषित पदार्थकी प्राप्तिमें तृष्णा-प्रशमनके अनन्तर, जिस शान्त अन्तर्मुख मनपर सुखका आभास पड़ता है, उस आभास या प्रतिबिम्बका निदान या बिम्बभूत जो शुद्ध अन्तरात्मा है, वही आनन्द है; क्योंकि जो लक्षण आनन्दका है वही अन्तरात्माका है। जैसे सब कुछ आनन्दके लिये प्रिय है, आनन्द और किसीके लिये प्रिय नहीं होता, ठीक ऐसे ही समस्त वस्तु आत्माके लिये प्रिय होती है, आत्मा किसी दूसरेके लिये प्रिय नहीं होता; अतः अन्तरात्मा ही आनन्द है और निरतिशय निरुपाधि परप्रेमका आस्पद है, उसीका आभास अन्तर्मुख अन्तःकरणपर पड़नेसे अहं सुखी इत्यादि व्यवहार होता है। यही सुख किंवा अन्तरात्मा है। इसीके लिये समस्त कार्य- करण-संघातकी प्रवृत्ति होती है, यही सुख-दुःख- मोहात्मक संघातसे विलक्षण, सुख-दुःख-मोहातीत, असंहत, असंग, अद्वितीय तत्त्व ही—सच्चिदानन्दका आनन्दरूप है एवं प्राणीमात्र स्वतन्त्रता (बन्धनसे छूटना) चाहता है। एक चींटीको भी पकड़नेपर वह व्याकुलताके साथ हाथ-पैर चलाती है, शुक-सारिका आदि विहंगम सुवर्णके भी पिंजरमें रहकर सुन्दर मधुर भक्ष्य-पेयको नहीं पसन्द करते, किंतु बन्धनमुक्त होकर स्वतन्त्रतासे वनमें खट्टे फलको भी खाकर जीवन बिताना अच्छा समझते हैं, इस तरह प्राणीमात्र बन्धनसे छूटने तथा स्वतन्त्रताके लिये लालायित हैं। ऐसी स्थितिमें कौन नास्तिक बन्धनमुक्ति और स्वतन्त्रता न चाहेगा, परंतु स्वतन्त्रताका वास्तविक रूप विवेचन करनेसे स्पष्ट होगा कि यह भी

४८ भक्तिसुधा भगवान्का ही स्वरूप है; क्योंकि बिना असंग सच्चिदानन्द भगवान्‌को प्राप्त किये, बन्धनमुक्ति स्वतन्त्रताकी कल्पना अत्यन्त ही निरालम्बन है। जबतक स्थूल, सूक्ष्म तथा कारणदेहका सम्बन्ध विद्यमान है, तबतक स्वतन्त्रता कैसी ? भले ही कोई माता, पिता, गुरुजनों तथा वेद-शास्त्रकी आज्ञाओंको न माने और उनसे अपनेको स्वतन्त्र मान ले, परंतु जन्म, जरा, व्याधि, दरिद्रता, विपत्ति, मृत्यु आदिके परतन्त्र तो प्राणिमात्रको होना ही पड़ता है; क्योंकि जबतक कुछ स्वतन्त्रताको त्यागकर शास्त्रों एवं गुरुजनोंके परतन्त्र होकर कर्म, उपासना तथा ज्ञानद्वारा, मल-विक्षेप-आवरणको शरीरत्रय बन्धन किंवा जीव भावसे मुक्त होकर, निजी निर्विकार स्वरूपको न प्राप्त कर लें, तबतक पूर्ण स्वातन्त्र्य मिल सकता नहीं। विवेचनसे स्पष्ट होता है कि सर्वोपाधिविनिर्मुक्त असंग-अनन्त-स्वप्रकाश-प्रत्यगभिन्न सच्चिदानन्द भगवान्का ही स्वरूप है। ऐसे ही प्राणीमात्रको यह भी रुचि होती है कि सब कुछ हमारे अधीन हो और मैं स्वाधीन रहूँ, यहाँतक कि माता, पिता, गुरुजनोंके प्रति भी यही रुचि होती है कि ये सब हमारी प्रार्थना मान लिया करें और सब तरहसे मेरे अनुकूल रहें। यही स्थिति देवताओंके प्रति भी होती है। यह सभी भाव जीव भावके रहते नहीं हो सकते, समस्त कल्पित पदार्थ कल्पनाके अधिष्ठानभूत भगवान्‌के ही परतन्त्र हो सकते हैं, इस तरह परमार्थतः पूर्ण अस्तित्व, पूर्ण बोध, पूर्ण आनन्द, पूर्ण स्वातन्त्र्य एवं पूर्ण नियामकत्व भगवान्‌में ही होता है। जब आस्तिक- नास्तिक, सभी पूर्ण स्वातन्त्र्य, पूर्ण नियामकत्व, पूर्ण बोध, पूर्णानन्द, पूर्ण अबाध्यतया सत्ताके लिये व्यग्र तथा इनकी प्राप्तिके लिये जी-जानसे प्रयत्न करते हैं, तब कौन कह सकता है कि अज्ञानी किंवा नास्तिक जिसकी प्राप्तिके लिये व्यग्र हैं, वह तत्त्व भक्तों और ज्ञानियोंके ध्येय-ज्ञेय परमाराध्य परब्रह्म भगवान् नहीं हैं, क्योंकि प्राणीमात्र किंवा तत्त्वमात्रके अन्तरात्मा भगवान् ही हैं, फिर उनसे विमुख होकर निःसत्त्व, निःस्फूर्ति कौन होना चाहेगा? इसी आशयसे श्रीवाल्मीकिकी उक्ति है कि ‘लोके नहि स विद्येत यो न राममनुव्रतः' लोकमें ऐसा कोई हुआ नहीं, जो रामका अनुगामी न हो। निजी सर्वस्वके बिना किसीको भी कैसी विश्रान्ति ? अतएव तरंगकी जैसे समुद्रानुगामिता है, ठीक वैसे ही प्राणीमात्रकी भगवदनुगामिता है, भेद यही है कि ज्ञानी अपने प्रियतमको जानकर प्रेम करता है, दूसरे उसीके लिये व्यग्र होते हुए भी उसे जानते नहीं। भागवतके द्वितीय स्कन्धमें भी विराट् आदि भगवान्‌के स्थूलरूपके ध्यानके अनन्तर, अनन्तकोटि ब्रह्माण्डनायक प्रभुकी मधुर मंगलमयी मूर्तिका ध्यान बतलाया गया है। ध्यानसे चित्तकी पूर्ण एकाग्रता होनेपर भगवान्‌के अनन्त अखण्ड स्वप्रकाश बोधस्वरूपका साक्षात्कार कहा गया है। उक्त स्वरूपमें दृढ़ निष्ठाके लिये भगवान्‌के मधुरस्वरूपके श्रीचरणोंका पुनः ध्यान और अनुरागसहित परिरम्भण कहा गया है—‘हृदोपगुह्यार्हपदं पदे पदे॥' (श्रीमद्भा० २।२।१८) भगवान्‌के अचिन्त्य अनन्त मधुर मंगलमय स्वरूपमें प्रेम और भजन सर्व साधन तथा सर्व फलस्वरूप है। अतएव इसमें साधकों तथा सिद्धों दोनोंकी ही प्रवृत्ति होती है। साधन सिद्धि राम पग नेहू। मोहि लखि परत भरत मत एहू ॥ (रा०च०मा० २।२८९।८) भक्तियोगके विधानके लिये भगवान्‌का अवतरण प्रभुके श्रीचरणारविन्द सौगन्ध्यामृत सिन्धुके एक बिन्दुके भी समास्वादन करनेसे सनकादिक शुकादिक- जैसे ब्रह्मनिष्ठ महामुनीन्द्र भी मुग्ध हो जाते हैं। तस्यारविन्दनयनस्य पदारविन्द- किञ्जल्कमिश्रतुलसीमकरन्दवायुः । अन्तर्गतः स्वविवरेण चकार तेषां सङ्क्षोभमक्षरजुषामपि चित्ततन्वोः ॥ (श्रीमद्भा० ३।१५।४३) अतएव श्रीजनकजी-जैसे विदेह तत्त्वनिष्ठोंकी

'साक्षान्मन्मथमन्मथः' ४९ यह अनुभूतियाँ हैं— इन्हहि बिलोकत अति अनुरागा। बरबस ब्रह्मसुखहि मन त्यागा॥ सहज बिरागरूप मनु मोरा। थकित होत जिमि चंद चकोरा॥ (रा०च०मा० १।२१६।५, ३) ठीक ही है, तभी तो यह कहा जाता है कि अमलात्मा परमहंस महामुनीन्द्रोंको ही भक्तियोग विधान करनेके लिये अदृश्य, अग्राह्य, अचिन्त्य, अव्यपदेश्य भगवान् अद्भुत-सौन्दर्यमाधुर्यसुधाजलनिधि दिव्यमूर्ति धारण करते हैं, अन्यथा छोटे कार्योंके लिये प्रभुका अवतार ऐसा ही अनुचित होगा, जैसे मशक-निवारणार्थ भुशुण्डीका प्रयोग (मच्छर हटानेके लिये तोप चलाना) अनुचित होता है, परंतु समस्त नामरूपक्रियात्मकप्रपंचसे व्यावृतमनस्क अमलात्मा परमहंसोंको भजनानन्द प्रदान करनेके लिये प्रभुका दिव्य स्वरूप धारण परमावश्यक है। अद्वैत ब्रह्मनिष्ठ परमहंसोंको भक्तियोग प्रदानकर उन्हें श्रीपरमहंस बनाना, यही प्रभुके प्राकट्यका मुख्य प्रयोजन है। जैसे मिश्रित क्षीर-नीरका हंस विवेचन करता है, वैसे सांख्य सिद्धान्तके अनुसार प्रकृति प्राकृत प्रपंचसे पृथक्, असंग अनन्त चेतन तत्त्वका विवेचन कर लेनेवाले हंस कहे जा सकते हैं, परंतु वेदान्त सिद्धान्तके अनुसार तो दृक्-दृश्य, आत्मा- अनात्मा, परात्पर पूर्णतम सर्वभासक भगवान् और प्रकृति प्राकृत प्रपंचका ऐसा सम्बन्ध है, जैसे दिव्य मणिमाला और उसमें कल्पित सर्पका, अर्थात् सत्य एवं अनृतका जैसे आध्यासिक सम्बन्ध है, वैसे ही दृश्य प्रकृति और उसके भासक एवं अधिष्ठानभूत भगवान्‌का आध्यासात्मिक सम्बन्ध है। अतः सत्यानृतके विवेचनसे जैसे सत्य ही अवशिष्ट रहता है, अनृतका सर्वथा अभाव हो जाता है, इसी तरह दृक्-दृश्यका भी विवेचन करनेपर अनृत स्वरूप दृश्य प्रकृतिका अभाव हो जाता है, केवल सर्वदृक् भगवान् ही अवशेष रहते हैं। ऐसे वेदान्तसिद्धान्तानुसार सत्यानृतरूप क्षीर- नीरका विवेचन है, नीर-स्थानीय दृश्यको मिटाकर परमसत्य भगवान्‌में ही स्थित होनेवाले परमहंस कहे जा सकते हैं, परंतु 'नैष्कर्म्यमप्यच्युतभाववर्जितं न शोभते ज्ञानमलं निरञ्जनम्।' (श्रीमद्भा० १।५।१२) 'सोह न राम पेम बिनु ग्यानू।' (रा०च०मा० २।२७७।५) इत्यादि अभियुक्तोक्तियोंके अनुसार विदित होता है कि बिना भगवान्‌के मधुर मंगलमय स्वरूपमें पूर्णानुराग हुए उनका ज्ञान भी सुशोभित नहीं होता। अतः भक्तियोगसे ज्ञानको सुशोभित करके परमहंसोंको श्रीपरमहंस बना देना, बस यही मुख्य प्रयोजन प्रभुके मधुर मंगलमय स्वरूप धारण करनेका है; क्योंकि भजनीयके बिना भक्तियोग बन ही नहीं सकता। भगवत्तत्त्वसे भिन्न प्रपंच जिनकी दृष्टिमें है ही नहीं, उनका भजनीय सिवा भगवान्‌के और क्या हो सकता है ? रहा भगवान्‌का अचिन्त्य अनन्त अव्यपदेश्य निराकार स्वरूप, सो उस स्वरूपमें तो वे परिनिष्ठित ही हैं, महावाक्यजन्य परब्रह्माकारवृत्तिके साथ ब्रह्मका सम्बन्ध जानकर मन-बुद्धि एवं सर्वेन्द्रियाँ तथा रोम-रोम भी प्रभुके साथ सम्बन्धके लिये लालायित हैं। इन्द्रियाँ स्वयम्भूसे पराङ्मुख रची जाकर अपनी हिंसा किया जाना इसीलिये समझती हैं कि उन्हें उनके प्रियतमसे बहिर्मुख कर दिया गया है—'पराञ्चि खानि व्यतृणत्स्वयम्भूः।' महर्षि आदिकवि भी यही कहते हैं कि जिसने स्नेहभरी दृष्टिसे श्रीरामचन्द्रको नहीं देखा और श्रीरामचन्द्रने अनुकम्पाभरी दृष्टिसे जिसे नहीं देखा, वह सर्वलोकमें निन्दित है और उसकी स्वात्मा भी उसकी विगर्हणा करती है—'यश्च रामं न पश्येत्तु रामो यं नाभिपश्यति। निन्दितः सर्वलोकेषु स्वात्माऽप्येनं विगर्हति॥' जैसे कमलनयन पुरुषके वे अतिशोभन नयन व्यर्थ हैं, यदि कभी उनके रूपदर्शनमें उनका उपयोग न हुआ, वैसे ही ज्ञानीके भी प्रारब्धभोगपर्यन्त अनिवार्य रूपसे रहनेवाले देह, इन्द्रिय, मन, बुद्धि, अहंकार आदि व्यर्थ और नीरस ही रहे, यदि उन सबका सदुपयोग प्रभुके सौन्दर्य, माधुर्य, सौरस्यामृत आदिके समास्वादनमें न हुआ। इसीलिये श्रीव्रजांगनाओंने भी कहा है कि नेत्रवानोंके नेत्रादि करणग्रामोंकी

सार्थकता और इनका चरमफल यही है कि श्रीव्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्णचन्द्रके अनुरागभरे कटाक्ष- पातसे युक्त, वेणुचुम्बित अमृतमय मुखचन्द्रके सौन्दर्य- माधुर्यामृतका निर्निमेषनयनोंसे पान किया जाय और घ्राणसे सौगन्ध्यामृतका, त्वक्से सुस्पर्शामृतका आस्वादन किया जाय, अन्यथा इन करणग्रामोंका होना बिलकुल व्यर्थ ही है। 'अक्षण्वतां फलमिदं न परं विदामः।' इस प्रकार अन्तरात्मा, अन्तःकरण, प्राण, इन्द्रिय, देह तथा रोम-रोमको अपने दिव्य रससे सरस और मंगलमय बनानेके लिये भगवान्‌का प्रादुर्भाव है। यद्यपि सर्वोपाधिविनिर्मुक्त ब्रह्म निरतिशय परप्रेमास्पद और परमानन्दरूप है, उससे अधिक प्रेमास्पदता और परमानन्दरूपताकी कल्पना कहीं नहीं हो सकती तथापि जबतक प्रारब्धका अवशेष है, तबतक ज्ञानीको भी अन्तःकरणरूप उपाधिपर ही ब्रह्मका दर्शन होता है। अन्तःकरणसे ब्रह्मदर्शन वैसा ही समझना चाहिये, जैसे नेत्रसे सूर्यदर्शन, परंतु जैसे दूरवीक्षण यन्त्रकी सहायतासे नेत्रद्वारा सूर्यका अतिदिव्य एवं स्पष्ट रूप दिखायी देता है, वैसे ही दिव्य लीलाशक्तिसे परम मनोहर सगुणरूपमें, प्रकट तत्त्वमें, अन्तःकरणसे और विलक्षण चमत्कार अनुभूत होता है, परंतु प्रारब्धक्षय हो जानेपर, सर्वोपाधियोंके मिटनेपर, साक्षात् सूर्यरूप हो जानेपर, जो सूर्यका रूप आत्मरूप उपलब्ध होता है, वह तो सर्वथा ही अनुपमेय है। जैसे श्रीवृषभानुनन्दिनी दर्पणमें अपने मुखचन्द्रकी मधुरिमाका अनुभव करती हैं, अस्वच्छ दर्पण आदिकी अपेक्षा स्वच्छ आदर्शपर, किंवा श्रीकृष्णके वक्षस्थलपर, उन्हें अपने मुखचन्द्रकी मधुरिमा अधिक भासित होती है, परंतु उनके मुखचन्द्रका जो मुख्य माधुर्य है, वह तो उनके अन्तरात्माभूत प्रियतम श्रीकृष्णको ही विदित हो सकता है, किंचित् भी व्यवधान होनेपर रसास्वादमें कमी ही रहती है। अतएव भावुकोंका कहना है कि यदि मधुर रूपमें ही चक्षु हो, तब ही रूपमाधुर्यका और यदि पुष्पमें ही घ्राण हो, तब ठीक गन्ध माधुर्यका अनुभव हो सकता है। यद्यपि वस्तु वही है तथापि अचिन्त्य दिव्यलीलाशक्तिके अद्भुत प्रभावसे ज्ञानियोंका भी मन प्रभुके इस मधुर स्वरूपमें बलात् आकर्षित हो जाता है। जैसे फल, वृक्ष, अंकुर, बीज यद्यपि भूमिके ही स्वरूपविशेष हैं तथापि फलमें भूमि, बीज, अंकुर, वृक्ष इन सभीकी अपेक्षा विलक्षण सौन्दर्य-माधुर्य-सौगन्ध्य- सौरस्य होता है एवं गुलाबके बीज या नालमें जैसे शाखा, उपशाखा, कण्टक, पत्र आदिके उत्पादन करनेकी शक्ति है, वैसे ही पुष्पके उत्पादन करनेकी शक्ति है, परंतु जैसे कण्टकादि-उत्पादिनी शक्तिकी अपेक्षा सौन्दर्य-माधुर्य-सौगन्ध्य-सम्पन्न पुष्प-उत्पादन करनेकी शक्ति विलक्षण होती है, उसी तरह भगवान्‌की महाशक्तिमें जैसे प्रपंचोत्पादिनी शक्ति है, वैसे ही उससे परम विलक्षण परात्पर पूर्णतम भगवान्‌की स्वरूपभूता, मधुर मनोहर मंगलमयी मूर्तिके प्रादुर्भाव करनेवाली शक्ति भी है। उसी अचिन्त्य दिव्य लीलाशक्तिके योगसे निराकार भगवान् उसी तरह साकार होते हैं, जैसे शैत्यके योगसे निर्मल जल बर्फरूप अथवा संघर्षविशेषसे अव्यक्त अग्नि या विद्युत् दाहक और प्रकाशरूपमें व्यक्त होता है। निराकार ब्रह्मकी अपेक्षा भी भगवान्‌की मधुर मूर्तिमें वैसे ही चमत्कार भासित होता है, जैसे इक्षु (ईख)-दण्ड और चन्दन वृक्ष ही मधुर और सुगन्धित होते हैं, यदि कदाचित् इक्षुमें सुमधुर फल और चन्दन वृक्षमें अति सुन्दर और सुगन्धित पुष्प प्रकट हो, तब उनकी मधुरता और उनके सौगन्ध्यकी जितनी बड़ाई की जाय, उतनी ही कम है। इसी तरह अनन्त ब्रह्माण्डान्तर्गत आनन्दबिन्दु उद्गमस्थान, अचिन्त्य, अनन्त, परमानन्द घन ब्रह्म ही अद्भुत रसमय है, फिर उसके फलरूप मधुर मंगल स्वरूपमें कितना चमत्कार हो सकता है, यह सहृदय ही जान सकते हैं। इक्षुरससार शर्करा सिता आदिका सार जैसे कन्द होता है, वैसे ही औपनिषद् परब्रह्म रससार भगवान्‌का मधुर मनोहर सगुण स्वरूप है। तभी किसीने श्रीकृष्णको देखकर कल्पना की

'साक्षान्मन्मथमन्मथः' ५१ थी कि क्या यह श्रीव्रजांगनाओंका प्रेमरससारसमूह है अथवा सात्वतवृन्दका मूर्तिमान् सौभाग्य है, किंवा श्रुतियोंका गुप्तवित्त ब्रह्म ही श्यामल महोमयी मूर्तिको धारण करके प्रकट हुआ है— पुञ्जीभूतं प्रेम गोपाङ्गनानां मूर्तीभूतं भागधेयं यदूनाम्। एकीभूतं गुप्तवित्तं श्रुतीनां श्यामीभूतं ब्रह्म मे सन्निधत्ताम्॥ इस तरह— शृणु सखि कौतुकमेकं नन्दनिकेताङ्गणे मया दृष्टम्। गोधूलिधूसरिताङ्गो नृत्यति वेदान्तसिद्धान्तः॥ परममिममुपदेशमाद्रियध्वं निगमवनेषु नितान्तखेदखिन्नाः। विचिनुत भवनेषु बल्लवीना- मुपनिषदर्थमुलूखले निबद्धम्॥ कुछ महानुभाव निगमाटवीके ब्रह्मतत्त्वान्वेषकोंके परिश्रमपर दयार्द्र होकर, उनके अन्वेष्टव्य ब्रह्मको श्रीयशोदाके उलूखलमें बँधा बतला रहे हैं तो कुछ श्रीमन्नन्दरायके प्रांगणमें धूलि-धूसरित वेदान्तसिद्धान्तके नृत्यका कौतुक बता रहे हैं, परमकौतुकी प्रभुमें यह कौतुक ही तो है। इतनेपर भी लोगोंके प्रश्न होते हैं कि निराकार भगवान् साकार कैसे हो सकता है? परंतु इस ओर उनका ध्यान नहीं जाता कि जब कौतुकी कृपालुकी लीलासे निराकार जीव साकार होता है (क्योंकि सर्व मतसे जीव निराकार तथा निरवयव है) और स्पर्शविहीन आकाश, स्पर्शयुक्त वायुके रूपमें अवतीर्ण होता है तथा रूपरहित वायु रूपवान् तेजके रूपमें और रसगन्धविहीन तेज और जलका क्रमेण रसयुक्त जल और गन्धवती पृथिवी रूपमें प्रादुर्भाव होना सम्भव है, तब क्या वह निराकार होकर भी साकाररूपमें नहीं प्रकट हो सकते? ज्ञानीके निर्वृत्तिक मनपर अविषयरूपसे प्रकट वही वेदान्तवेद्य सच्चिदानन्दघन भगवान् अनन्तकोटि- कन्दर्पके दर्पको दूर करनेवाले, दिव्य सौन्दर्य-माधुर्य सुधा-जलनिधि, मधुरातिमधुर स्वरूपसे प्रकट होकर अपने स्नेहद्वारा भावुकके द्रवीभूत अन्तःकरणको अपने रंगमें रँग देते हैं। ठीक सौन्दर्यका आस्वादन हो सकता है, यह बात तो ठीक नहीं घटती है कि परमानन्दसारसर्वस्व श्रीकृष्ण ही अपनी मधुरिमा (माधुर्याधिष्ठात्री श्रीवृषभानुनन्दिनी)-का अनुभव करते हैं। ऐसे ही काल्पनिक भेदसे ज्ञानी अपने स्वरूपभूत भगवान्‌के मधुररूपका अनुभव करते हैं। भावुकके द्रुत चित्तपर निखिलरसामृतमूर्ति भगवान्‌का प्राकट्य ही भक्ति पदका अर्थ होता है। आशय यह है कि अन्तःकरण लाक्षाके समान कठिन द्रव्य है, परंतु तापक अग्निके साथ सम्बन्ध होनेसे जैसे लाक्षा पिघलती है, वैसे ही स्नेह-रागादि तापक भावोंके साथ सम्बन्ध होनेसे अन्तःकरण भी पिघलता है। यही कारण है कि रागास्पद कामिनी तथा द्वेषास्पद सर्पादि पदार्थोंको ग्रहण करता हुआ चित्त पिघलकर अपनेमें उन पदार्थोंके स्वरूपोंको अंकित कर लेता है, इसीके लिये उनका विस्मरण न होकर पुनः-पुनः स्मरण होता है। उपेक्ष्य तृण आदिकी स्मृति इसलिये कम होती है कि उनमें राग, द्वेष या भय आदि नहीं हुए, अतः चित्तकी द्रुति वहाँ नहीं हुई। भावुकोंका कहना है कि लाक्षा जबतक पिघली नहीं होती है, तबतक उसमें कोई रंग व्यापक और स्थिर नहीं होता। अतः तापक अग्निके सम्बन्धसे लाक्षा इतनी पिघलायी जाय कि सौ परतके तंजेबमें छाननेलायक हो जाय, तब गंगाजलके समान निर्मल और द्रुत उस लाक्षामें जो रंग छोड़ा जायगा, वह लाक्षाके अणु-अणुमें सर्वांगमें व्यापक तथा स्थिर हो सकेगा। फिर तो यदि लाक्षा चाहे कि मैं अपनेसे रंगको पृथक् कर दूँ, या रंग ही चाहे कि मैं पृथक् हो जाऊँ तो भी दोनों ही पृथक् होनेमें असमर्थ हैं। ठीक इसी तरह भगवद्विषयक राग आदि गंगाजलके समान निर्मल और द्रवीभूत चित्तमें परमानन्दघन भगवान्‌का प्राकट्य होनेपर पिघली हुई लाक्षामें रंगकी तरह सर्वांशमें व्यापक तथा स्थिररूपसे भगवान्‌की

५२ भक्तिसुधा स्थिति होती है। भावनाके प्रभावसे इसका अपरिच्छिन्न अनन्त आन्तर विस्तार अन्तःकरणप्राण तथा रोम- रोममें फैल जाता है, तब तो आन्तररूपसे तथा बाह्यरूपसे सर्वथा ही भगवान्‌का अनुभव होने लगता है। अपने प्रियतम भगवान्‌के स्वरूपमें होनेवाले तीव्रराग और उनके विरह-व्यथामय तीव्र तापसे, भावुकके गुणरूप सर्वकोशोंका भस्मीभाव हो जाने और भावनामय भगवत्सम्मिलन सौख्यरससे मन, प्राण, इन्द्रिय, देह तथा रोम-रोमके आप्यायन होनेपर, बाह्य-आभ्यन्तर सर्व रूपसे भगवत्तत्त्वका अवगाहन होता है। इस तरह अनिमित्ता भागवती भक्ति गुणमय कोशोंको जला देती है, तभी निरुपाधिक एवं निरावरण होकर भावुक अपने भगवान्‌से मिल सकता है, भगवद्-विरहव्यथा तापमयी भक्तिसे जिसके अन्नमयादि पंचकोशोंके त्रिविध तनु नहीं तप्त हुए, वे परम तत्त्वामृतके समास्वादनके अधिकारी नहीं हो सकते। यही ‘अतप्ततनूर्न तदामोऽश्नुते दिवं’ इस श्रुतिका आशय है। ‘तपसा कृच्छ्रादिना भगवद्विरह- जन्यतीव्रतापेन भक्तिपरिणामभूतेन ज्ञानाग्निना वा न तप्ता तनूर्यस्य स दिवमपरमात्मतत्त्वामृतं नाश्नुते।’ कृच्छ्रादि तपसे तथा भगवद्विरहजन्य तीव्र तापसे और भक्तिके परिणामभूत ज्ञानाग्निसे जिसके स्थूल-सूक्ष्म-कारण-ये तीनों तनु नहीं सन्तप्त हुए, वे परमतत्त्वका आस्वादन कैसे कर सकते हैं? इसलिये अनिमित्ता भागवती भक्तिको सिद्धिसे भी श्रेष्ठ कहा जाता है, जैसे भोजनको जठराग्नि पचा डालती है, वैसे ही अनिमित्ता भक्ति पंचकोशोंको जीर्ण कर देती है। अनिमित्ता भागवती भक्तिः सिद्धेर्गरीयसी। जरयत्याशु या कोशं निर्गीणमनलो यथा॥ भक्तिका ज्ञानरूपमें परिणमन भक्ति ही ज्ञानरूपमें परिणत होकर मूलाविद्याका भी विध्वंस करती है। भट्टोजिदीक्षित ‘क्लृपि सम्पद्यमाने च’ इस वार्तिकके उदाहरणरूपमें कहते हैं— ‘भक्तिर्ज्ञानाय कल्पते, ज्ञानाकारेण परिणमते।’ श्रीमद्भागवतके माहात्म्यमें ज्ञान-वैराग्य श्रीभक्तिके ही पुत्र हैं, माता योग्य पुत्रकी उत्पत्तिसे ही सौभाग्यवती समझी जाती है और पुत्र माताकी भक्तिसे ही सौभाग्यवान् होता है, अतः जहाँ ज्ञान भक्तिका फल है, वहाँ भक्ति ज्ञान तथा ज्ञानियोंकी भी परम पूज्या एवं भजनीय देवता है। ज्ञान, भगवत्प्राप्ति, मुक्ति आदि यद्यपि भक्तिके फल हैं तथापि फलकी अपेक्षा साधनमें ही अधिक प्रीति युक्त होती है। यह देखते ही हैं कि यद्यपि धनका फलभोग धर्म और मोक्ष ही है तथापि लोभी धनके संग्रह और रक्षाके सामने भोग, धर्म, मोक्ष सभी पुरुषार्थोंकी तिलांजलि दे देते हैं; क्योंकि उनकी यही दृढ़ धारणा है कि यदि साधन रहेगा, तब स्पष्ट ही सब साध्य सहजमें ही सिद्ध हो सकेंगे। द्रवीभूत लाक्षामें एक हुए रंगकी तरह भक्तके प्रेमार्द्र हृदयमें एक हुए भगवान् यदि चाहें तो भी पृथक् नहीं हो सकते। विसृजति हृदयं न यस्य साक्षा- द्धरिरवशाभिहितोऽप्यघौघनाशः । प्रणयरशनया धृताङ्‌घ्रिपद्मः स भवति भागवतप्रधान उक्तः॥ (श्रीमद्भा० ११।२।५५) बरबस भी जिसके मंगलमय नामसे बड़ी-से- बड़ी पापराशि नष्ट हो जाती है, ऐसे परमस्वतन्त्र सर्व- शक्तिसम्पन्न भगवान् जिसके अन्तःकरणमें स्नेहार्द्रता- रूप प्रणयपाशमें बँधकर निकल न सकें, वही प्रधान भागवत होते हैं। तभी तो किसी प्रेमीने रागसे पिघले हुए अपने अन्तःकरणमें उसी द्रवावस्थारूप प्रणयपाशसे प्रभुको बाँधकर उनकी सर्वज्ञता, सर्वशक्तिमत्ता, महाशक्तिको भी कुण्ठित करके निःशंक होकर कहा है, अच्छा यदि आप मेरे हृदयसे निकल सकें तो मैं आपके पौरुषको देखूँगा— हस्तमुत्क्षिप्य यातोऽसि बलात्कृष्ण किमद्भुतम्। हृदयाद्यदि निर्यासि पौरुषं गणयामि ते॥ ऐसे ही अगर भक्त भगवान्‌को अपने हृदयसे

पृथक् करना चाहें तो भी नहीं कर सकता। इसीलिये तो व्रजांगना श्रीकृष्णसे अपना मन हटानेके लिये उनमें दोषानुसंधान करती हैं। हे सखि! असितों (कालों)- से सख्य नहीं करना चाहिये, परंतु क्या करें, श्यामसुन्दर श्रीव्रजेन्द्रनन्दनकी कथा और कथार्थ तो हमलोगोंके लिये दुस्त्यज ही है। एक सखी श्रीकृष्ण- प्रेममें मूर्च्छित अपनी प्रियतमा सखीके उपचारमें लगी हुई थी, इतनेमें ही कोई सखी आकर कुछ कृष्णकी चर्चा चलाने लगी, उपचारमें लगी हुई सखी वारण करती कहती है— सन्त्यज सखि तदुदन्तं यदि सुखल्वमपि समीहसे सख्याः। स्मारय किमपि तदितर- द्विस्मारय हन्त मोहनं मनसः॥ हे सखि! यदि अपनी प्रिय सखीको विश्रान्ति लेने देना चाहती है तो यहाँ उन (श्रीव्रजराजकुमार)- की चर्चा न चला, अपितु किसी औरकी याद दिलाकर किसी तरह मनमोहनको भुला दे। महामुनीन्द्रगण जिन श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दमें मन लगानेके लिये बाह्य विषयोंमें दोषानुसंधानद्वारा मनको हटाते हैं, ये व्रजदेवियाँ अपने मनमोहन श्रीकृष्णसे मन हटाकर अन्य विषयोंमें लगाना चाहती हैं। योगीन्द्रगण अपने हृदयमें जिसके स्फूर्तिलेशके लिये लालायित हैं, उन्हीं सर्वप्राणि-परप्रेमास्पद जीवनधन प्रभुको वे हृदयसे निकालना चाहती हैं। ठीक ही है, पूर्णद्रवीभूत लाक्षा और उसमें स्थायीभावापन्न रंग इन दोनोंका इतना अद्भुत घनिष्ठ सम्बन्ध हो जाता है कि दोनोंका ही परस्पर पृथक् होना असम्भव है। उसी तरह भगवद्भावनासे द्रवीभूत अन्तःकरणपर भगवान्‌की स्थायीभावापत्ति होनेसे फिर परस्परका पार्थक्य असम्भव हो जाता है। यद्यपि जीवका भगवान्‌के साथ स्वाभाविक सम्बन्ध इससे भी बहुत अधिक घनिष्ठ है, जैसे तरंगोंकी समुद्रके बिना स्थिति ही नहीं है, ऐसे भगवान्‌के बिना जीवकी सत्ता ही नहीं है। सो तैं ताहि तोहि नहिं भेदा। बारि बीचि इव गावहिं बेदा॥ (रा०च०मा० ७।१११।६) और यहाँ ही मुख्य प्रीति है तथापि स्वरूप- साक्षात्कारके पहले यह स्वाभाविक निरुपाधिक प्रीति असम्भव है। अतः स्वाभाविक प्रीति यह सभी उस द्रावावस्थारूप प्रणयनके यहाँ ही अन्तर्गत है।

श्रीवृन्दावनमें वर्षा और शरद्

श्रीमद्भागवतमें वर्णित वर्षा एवं शरद्-ऋतुकी शोभा श्रीमद्भागवत, दशम स्कन्ध, अध्याय २० में वर्षा तथा शरद्‌का बड़ा सुन्दर वर्णन मिलता है। श्रीमद्वृन्दारण्यधाममें भी प्राणियोंको उद्भूत करनेवाली वर्षा-ऋतु प्रकट हुई, गर्जन और दामिनीसे युक्त सान्द्र नीलाम्बुदके द्वारा नभोमण्डल आच्छन्न हो गया। सूर्य, चन्द्र, नक्षत्र आदि ज्योतियाँ भी स्पष्ट नहीं दीख पड़तीं। यह स्थिति उस तरहकी है, जैसे निर्गुण ब्रह्मरूप जीव सत्त्व, रज, तम आदि गुणोंसे आच्छन्न हो जाता है और उसकी स्वरूपभूत ज्योति अनुभूत नहीं होती। किंवा निरभ्र ज्योतिर्मय आकाश गर्जन, विद्युत्, नीलाम्बुद आदिसे आच्छन्न और अस्पष्ट- ज्योति हो गया, जैसे निष्प्रपंच ज्योतिर्मय ब्रह्म सत्त्व, रज, तमके प्रपंचसे आवृत होकर अस्पष्ट ज्योति-सा हो जाता है। किंवा आकाश मेघादिसे आवृत होकर वैसे शोभित होने लगा, जैसे निर्गुण ब्रह्म सगुण साकार श्रीकृष्णरूपमें शोभित होता है। चिक्कण, सजल, जलद, नीलाम्बुदके समान श्रीकृष्णके अवयव व्यक्त हुए और विद्युत्‌के समान पीताम्बर तथा मन्दगर्जनके समान वेणुनाद। जैसे आकाशकी सूर्यादि ज्योतियाँ स्पष्ट नहीं दीखतीं, वैसे ही श्रीकृष्णका स्वप्रकाश, तेजोमय स्वरूप वस्त्र, भूषण एवं व्रजांगनाओंसे आवृत होनेके कारण स्पष्ट नहीं दिखलायी देता।

सूर्यने आठ महीने अपनी तिग्म रश्मियोंके द्वारा भूमिसे खींचे हुए जलको यथोचित समयपर छोड़ना (देना) आरम्भ किया, जैसे राजा प्रजासे कर लेकर यथासमय उसे पुनः प्रदान करता है। जैसे कृपालु लोग तप्त प्राणियोंको देखकर दयार्द्र हो उनके रक्षण, आप्यायनके लिये अपने जीवनतकका उत्सर्ग कर देते हैं, वैसे ही दामिनीयुक्त बड़े-बड़े मेघ अपने तड़िद्रूप नेत्रोंसे विश्वको तप्त देखकर वायुरूप दयासे कम्पित होकर विश्वका आप्यायन करनेके लिये जीवन (उदक) बरसने लगे। ग्रीष्मसे तप्त और कृशा, दुर्बला पृथ्वी पर्जन्यकी वर्षासे पुष्ट हो उठी, जैसे कामनासे तपस्या करनेवाले तपस्वीका शरीर काम-प्राप्तिसे पुष्ट हो जाता है। सायंकालमें अन्धकारके कारण खद्योतों (जुगनुओं)- का प्रकाश होने लगा, परंतु चन्द्र, शुक्र आदि ग्रहोंका प्रकाश नहीं, जैसे कलियुगमें पापके कारण पाखण्डों (वेदविरुद्ध आगमों)-का विस्तार होता है, वेदोंका नहीं। बादलोंके निनादको सुनकर प्रथम प्रसुप्त मण्डूकोंने बोलना आरम्भ कर दिया, जैसे नित्य ध्यान, जपादि नियमके पश्चात् आचार्यके निनादको सुनकर शिष्य लोग वेदाध्ययन करने लगते हैं। क्षुद्र नदियाँ कभी बढ़नेपर उत्पथगामिनी होती हैं या शुष्क हो जाती हैं, सत्पथगामिनी नहीं होतीं, जैसे इन्द्रिय परतन्त्र या निरंकुश प्राणीकी देह, द्रव्य-सम्पत्तियाँ या तो उच्छृंखल अपात्रगामिनी होती हैं अथवा नष्ट हो जाती हैं। भूमि बालतृणोंसे हरित, इन्द्रगोपों (लालरंगके कीटविशेषों)- से रक्त और शिलीन्ध्रों (छत्राकों)-की छायासे पीत वर्णकी होकर ऐसी लगती है, जैसे राजाकी सेना- सम्पत्ति सुशोभित होती है। वृष्टिके लगातार होनेपर क्षेत्र सस्य-सम्पत्तिसे युक्त होकर 'सब कुछ देवाधीन है' ऐसा न जाननेवाले धनिक कृषकोंको सुख देते हैं, वृष्टि-विच्छेद होनेपर सूखते हुए अनुताप पहुँचाते हैं। नव जलके निषेवणसे जल-स्थलके सभी जीवोंने रुचिर रूप धारण कर लिया, जैसे परमधर्ममय, सुखमय श्रीहरिकी सेवासे सभी सद्यः परम रुचिर हो जाते हैं। सरिताओंसे संगत होकर वातसे उद्भूत तरंगोंद्वारा सिन्धु क्षुब्ध हो उठा, जैसे कामवासनासे युक्त अपक्व योगीका चित्त विषयोंके योगसे चंचल हो उठता है। वर्षाकी धाराओंसे हन्यमान होते हुए भी पर्वत, नदी विचलित नहीं होते, जैसे भगवद्भक्त भगवान्‌के ध्यानमें तल्लीन चित्तवाले होनेके कारण विविध व्यसनों (दुःखों)-से अभिभूत होनेपर भी चलायमान नहीं होते। तृणोंसे आच्छन्न और असंस्कृत होनेसे मार्ग सन्दिग्ध हो उठे, जैसे ब्राह्मणोंद्वारा अभ्यास न किये जानेसे कलिकालके प्रभावसे श्रुतियाँ हत-सी हो जाती हैं। वर्षामें पथिकोंके गमनागमन बन्द हो जाने और तृणोंसे आच्छन्न होनेसे मार्गोंमें सन्देह होने लगता है, जैसे ब्राह्मणोंके पुनः-पुनः आवर्तन (अभ्यास) न करनेसे कुछ कालमें श्रुतियाँ विस्मृत हो जाती हैं। सर्व प्राणियोंको जीवनभूत जल प्रदान करनेवाले महोपकारक लोकबन्धु मेघोंमें विद्युतोंका सौन्दर्य स्थिर नहीं है, जैसे गुणवान् पुरुषोंमें भी कामिनी स्थिर प्रीति नहीं कर सकती। निर्गुण (रूपगुणसे रहित) इन्द्रधनुष गुणवान् (गर्जन शब्दरूप गुणसम्पन्न) आकाशमें शोभित होता है, जैसे गुणमिश्रणमय व्यक्त प्रपंचमें निर्गुण पुरुष शोभित होता है। अपनी ज्योत्स्ना (चन्द्रिका)-से ही प्रकाशित बादलोंद्वारा आच्छन्न होकर चन्द्रमा पार्थक्यसे स्पष्ट प्रतीत नहीं होता, जैसे आत्माकी ज्योतिसे ही भासित (प्रकाशित) 'अहं विद्वान्', 'अहं दाता', 'अहं शूरः' इत्यादि अहं मतिसे आच्छन्न पुरुष सर्वपृथक् रूपसे स्पष्ट नहीं प्रकाशित होता- न रराजोडुपश्छन्नः स्वज्योत्स्नाराजितैर्घनैः। अहंमत्या भासितया स्वभासा पुरुषो यथा॥ (श्रीमद्भा० १०।२०।१९) मेघके आगमोत्सवमें मयूर प्रसन्न हो उठे, जैसे गृहमें तप्त, विरक्तचित्त पुरुष अच्युत भक्तके आगमनमें प्रसन्न हो उठते हैं- मेघागमोत्सवा हृष्टाः प्रत्यनन्दञ्छिखण्डिनः। गृहेषु तप्ता निर्विण्णा यथाच्युतजनागमे॥ (श्रीमद्भा० १०।२०।२०)

श्रीवृन्दावनमें वर्षा और शरद् ५५ वर्षा में वृक्ष पादोंसे जल पानकर नाना रूपवाले शाखा, पल्लव, पुष्प, फल आदिसे समन्वित हो उठे, जैसे पहले तपस्यासे दुर्बल तपस्वी कामोंके सेवनसे अनेक रूप देहवाले हो जाते हैं, पंककण्टकादियुक्त अशान्त सरोवरोंपर भी सारस, चक्रवाकादि टिके हुए हैं। जैसे अशान्त, उल्बण कर्मवाले गृहोंमें भी वैषयिक सुख-लेशकी आशासे कुटुम्बी लोग टिके रहते हैं। पर्जन्यकी वर्षामें जलौघोंसे सेतु छिन्न-भिन्न वैसे ही हो जाते हैं, जैसे कलियुगमें पाखण्डियोंके असद्वादोंसे वेदमार्ग, वर्णाश्रम-धर्म छिन्न-भिन्न हो जाते हैं। वायुकी प्रेरणासे मेघ प्राणियोंके लिये अमृतमय जल देते हैं, जैसे ब्राह्मणोंकी प्रेरणासे राजा लोग अर्थियोंको अभीष्ट अर्थ प्रदान करते हैं। पुनः शरद्के प्रभावसे कमलोंकी उत्पत्तिसे जल स्वच्छ, प्रकृतिस्थ हो गया, जैसे भ्रष्ट लोगोंका चित्त योगसेवासे पुनः स्वस्थ, शान्त हो जाता है। शरद्-ऋतुने आकाश, भूत, पृथ्वी और जलके बादल, शवलता (सांकर्य), पंक और मलिनताको हर लिया, जैसे कृष्णकी भक्ति चारों आश्रमियोंके अशुभोंको हर लेती है। मेघ अपने सर्वस्वभूत जलको छोड़कर शुभ्र तेजयुक्त होकर शोभित होते हैं, जैसे सर्वैषणाओंसे विनिर्मुक्त होकर मुक्तकिल्विष मुनि शान्त होते हैं— सर्वस्वं जलदा हित्वा विरेजुः शुभ्रवर्चसः । यथा त्यक्तैषणाः शान्ता मुनयो मुक्तकिल्बिषाः ॥ (श्रीमद्भा० १०।२०।३५) पर्वत कहीं निर्मल जल दे रहे हैं, कहीं नहीं, जैसे—ज्ञानी लोग यथावसर ज्ञानामृत देते हैं अथवा नहीं देते— गिरयो मुमुचुस्तोयं क्वचिन्न मुमुचुः शिवम्। यथा ज्ञानामृतं काले ज्ञानिनो ददते न वा॥ (श्रीमद्भा० १०।२०।३६) गाध (छिछले) जलमें रहनेवाले मीनादि क्षीयमाण (सूखते हुए) जलको नहीं जानते, जैसे कुटुम्बी प्रतिदिन क्षीण होती हुई आयुको नहीं जानता। थोड़े जलके मीन शरद्के सूर्यतापसे तप्त होने लगे, जैसे दरिद्र, कृपण, अजितेन्द्रिय कुटुम्बी क्षुधादि (भूख आदि) प्रयुक्त तापोंसे तप्त होता है। स्थल शनैः-शनैः पंकको और वीरुध (वृक्षादि) अपक्वताको छोड़ने लगे, जैसे धीर पुरुष शरीरादि अनात्माओंमें शनैः- शनैः अहंता और ममताको छोड़ता है। शरद्के आगमनमें समुद्रका जल निश्चल हो गया, जैसे मनके उपरत हो जानेपर मुनि आगमोंके अभ्याससे उपरत होकर तूष्णी (चुप) हो जाता है। कृषक लोगोंने दृढ़ सेतुओंद्वारा जलको खेतोंमें रोक लिया, जैसे इन्द्रियोंका निरोध करके मुनिलोग उनके द्वारा बहते ज्ञानको रोकते हैं। रात्रिमें उदित होकर चन्द्रमा भूतोंके अर्कतापोंको हर लेते हैं, जैसे बोध (ज्ञान) प्राणियोंके देहाभिमानको हर लेता है। किंवा जैसे मुकुन्द व्रजयोषितोंके तापोंको हर लेते हैं। शरद्के विमल तारकोंसे युक्त निर्मेघ आकाश शोभित होने लगा, जैसे शब्दब्रह्मके अर्थको प्रकाश करनेवाला सत्त्वयुक्त चित्त शोभित होता है। व्योम (आकाश)- में उडुगणोंके साथ चन्द्रमा अखण्ड मण्डल होकर शोभित होता है, जैसे वृष्णिचक्रों (यादवमण्डल)- से आवृत यदुपति कृष्ण शोभित होते हैं। समशीतोष्ण प्रसून-वन-मारुतका आश्लेष करके सब लोगोंने ताप छोड़ दिया, परंतु कृष्णहतचेता व्रजांगनाएँ तप्त ही रहीं। गौ, खग, मृग, नारी शरद्के सम्बन्धसे पुष्पिणी होकर अपने वृषों (पतियों)-से अन्वीयमान हुईं, जैसे ईशकी सभी क्रियाएँ फलसे युक्त होती हैं। सूर्योत्थानमें कुमुदको छोड़कर सभी कमल खिल उठे, जैसे योग्य राजासे दस्युको छोड़कर सभी लोग निर्भय होते हैं। वणिक्, मुनि, नृप, स्नातक सभी वर्षासे रुके थे, शरद् आनेपर वे अपने-अपने अर्थोंको प्राप्त होते हैं, जैसे सिद्ध (मुक्तिको प्राप्त जीव) प्रलयकालके अनन्तर सृष्टिके समय अपने पूर्वार्जित कर्मानुसार शरीरोंको प्राप्त होते हैं— वणिङ्मुनिनृपस्नाता निर्गम्यार्थान् प्रपेदिरे। वर्षरुद्धा यथा सिद्धाः स्वपिण्डान् काल आगते॥ (श्रीमद्भा० १०।२०।४९)

५६ भक्तिसुधा श्रीरामचरितमानसमें वर्षा एवं शरद्-ऋतुका वर्णन इन्हीं भावोंको लेकर गोस्वामी श्रीतुलसीदासजीने रामायण किष्किन्धाकाण्डमें वर्षाके अन्त और शरद्के आगमनका वर्णन किया है— दामिनि दमक रह न घन माहीं। खल कै प्रीति जथा थिर नाहीं॥ बरषहिं जलद भूमि निअराएँ। जथा नवहिं बुध बिद्या पाएँ॥ भूमि परत भा ढाबर पानी। जनु जीवहि माया लपटानी॥ हरित भूमि तृन संकुल समुझि परहिं नहिं पंथ। जिमि पाखंड बाद तें गुप्त होहिं सदग्रंथ॥ दादुर धुनि चहुँ दिसा सुहाई। बेद पढ़हिं जनु बटु समुदाई॥ नव पल्लव भए बिटप अनेका। साधक मन जस मिलें बिबेका॥ अर्क जवास पात बिनु भयऊ। जस सुराज खल उद्यम गयऊ॥ ससि संपन्न सोह महि कैसी। उपकारी कै संपति जैसी। ऊषर बरषइ तृन नहिं जामा। जिमि हरिजन हियँ उपज न कामा॥ जहँ तहँ रहे पथिक थकि नाना। जिमि इंद्रिय गन उपजें ग्याना। कबहुँ दिवस महँ निबिड़ तम कबहुँक प्रगट पतंग। बिनसइ उपजइ ग्यान जिमि पाइ कुसंग सुसंग॥ बरषा बिगत सरद रितु आई। लछिमन देखहु परम सुहाई॥ उदित अगस्ति पंथ जल सोषा। जिमि लोभहि सोषइ संतोषा॥ सरिता सर निर्मल जल सोहा। संत हृदय जस गत मद मोहा॥ रस रस सूख सरित सर पानी। ममता त्याग करहिं जिमि ग्यानी॥ बिनु घन निर्मल सोह अकासा। हरिजन इव परिहरि सब आसा॥ कहुँ कहुँ बृष्टि सारदी थोरी। कोउ एक पाव भगति जिमि मोरी॥ चले हरषि तजि नगर नृप तापस बनिक भिखारि। जिमि हरिभगति पाइ श्रम तजहिं आश्रमी चारि॥ (रा०च०मा० ४।१४।२-३, ६ दो० १४; १५।१-३, ५, १०, १२ दो० १५ (ख); १६।१, ३-५, ९-१० दो० १६) वेणुरव वेणुवादन—भगवान्‌की मंगलमयी लीला वेणुरवमें ही श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दका स्वरूप और उनकी मंगलमयी लीला है, अतः उसके वर्णनमें प्रभुका वर्णन है। पहले तो श्रीकृष्ण ही रसामृतमूर्ति हैं, उनमें भी साधनता और साध्यता दोनों हैं। श्रीहस्त, श्रीचरणारविन्दादि अन्यान्य अंगोंमें साध्यता है और साधनता भी, किंतु आनन्द केवल साध्य ही है, सब उसीके लिये है, पर वह किसीके लिये नहीं। यही तो ब्रह्मका भी लक्षण है, अतः दोनों एक ही हैं। शब्दादि सर्व-पदार्थ जैसे आनन्दके लिये हैं, वैसे ही आत्माके लिये हैं, 'आत्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियं भवति।' (बृहदारण्यक० २।४।५) जैसे आनन्द निरतिशय, निरुपाधिक परप्रेमास्पद है, वैसे आत्मा भी निरतिशय, निरुपाधिक परप्रेमास्पद है। जिसमें कभी प्रेम हो कभी नहीं, वह अपर प्रेमास्पद है। ऐसा जो नहीं, वह प्रेमास्पद है। औपाधिक अपर और स्वाभाविक पर है। औपाधिक उपाधिके अधीन होता है, स्वाभाविक उपाधिके अधीन नहीं होता, वह मिटता नहीं है। संसारके सब प्रेम औपाधिक हैं, जैसे स्त्री-पुत्रादि प्रेम। इतना ही नहीं, संसारमें देवतापर भी प्रेम तब होता है, जब वह अनुकूल होता है। मन्त्रोंमें भी कोई अरिमन्त्र, कोई मध्यम मन्त्र होते हैं। जिससे अनुकूल फल नहीं, वह अरिमन्त्र होता है। इसी विचारसे कहा है कि जब समान तत्त्व और समान साधक मिलें, तब मन्त्रसिद्धि ठीक होती है। अस्तु, सारांश यह कि जब देवता भी आत्मानुकूल हों, तब उनमें प्रेम होता है। देखा जाता है कि शैव वैष्णवसे और वैष्णव शैवसे द्वेष करते हैं। वास्तवमें पूर्णतम पुरुषोत्तम प्रभु एक ही है, पर व्यर्थ उनमें द्वेषास्पदता-रागास्पदताकी कल्पना करते हैं। रामभक्तोंको रामायणमें जो मिठास प्रतीत होती है, वह इतर ग्रन्थोंमें नहीं। वृन्दावनमें तो कृष्णमें भी भेद मानते हैं। एक बायें मुकुटवाले श्रीकृष्ण, दूसरे दायें मुकुटवाले श्रीकृष्ण। वास्तवमें बायें-दायेंमें भी कुछ रहस्य है, कुछ भाव अवश्य है। वेणुगीत प्रसंगमें बायें मुकुटवाले ही श्रीकृष्ण हैं। 'वामबाहुकृतवामकपोलः' (श्रीमद्भा० १०।३५।२) श्रीभगवान्‌की ललित मूर्तिमें मुकुट बायीं ओर ही झुकता है। कहते हैं, जहाँ वामांगमें

श्रीवृषभानुनन्दिनी विराजमान हैं, वहाँ श्यामसुन्दर श्रीकृष्ण परमानन्दका वामांगकी ओर ही झुकाव है। इसीलिये उस परिस्थितिमें मुकुटका बायीं ओर झुकाव स्वाभाविक है। जहाँ श्रीकृष्ण और बलराम हैं, वहाँ दक्षिणमें। जहाँ नन्दबाबा दक्षिणमें और वाममें श्रीनन्दरानी, मध्यमें बलराम नन्दरायके पास, श्रीकृष्ण यशोदाके पास, उस समय मुकुटका दायें बलरामकी ओर झुकाव होता है। यही वास्तवमें रहस्य है। अस्तु, विषय यह है कि आनन्द निरतिशय, निरुपाधिक, परप्रेमास्पद है और अन्य औपाधिक एवं सातिशय। आनन्द और आत्मा एक ही वस्तु है। आनन्दसे जैसे कभी शत्रुता नहीं होती, वैसे ही आत्मासे कभी शत्रुता नहीं होती। सर्वद्रोह हो सकता है, पर आत्मद्रोह नहीं होता। श्रीकृष्ण निखिलरसामृतमूर्ति आनन्दसारसर्वस्व हैं। वे साध्य-ही-साध्य हैं, साधन नहीं, अतः परप्रेमास्पद हैं। इनमें भी कुछ भावुक तारतम्य मानते हैं, कहते हैं कि उनमें भी अमृतमय मुखचन्द्रकी सुधा केवल साध्य ही है; किसीकी साधन नहीं, पर भावुक कहते हैं कि उसमें भी देवभोग्या अधरसुधा भगवद्भोग्या अधरसुधाका साधन है और वह भी सर्वाभोग्या अधरसुधाका साधन है। परस्पर भावापत्तिपूर्वक वह सर्वाभोग्या अधरसुधा केवल साध्यमात्र है, किसीका साधन नहीं है। वह रवसे अभिव्यक्त होती है, अतः प्राधान्यतः यहाँ रव-वर्णन किया गया है। उसमें श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्द और उनकी लीला भी निहित है। इसलिये 'भागवत' में श्रीशुकदेवजी कहते हैं— इति वेणुरवं राजन् सर्वभूतमनोहरम्। श्रुत्वा व्रजस्त्रियः सर्वा वर्णयन्त्योऽभिरेभिरे॥ (श्रीमद्भा० १०।२१।६) वेणुध्वनि-श्रवणका विलक्षण प्रभाव इस वेणुरवमें अमृतत्वका उपलम्भ होता है, जिससे ब्रह्मा, शक्र, सनकादि भी मोहित होते हैं— 'शक्रशर्वपरमेष्ठिपुरोगाः' 'कश्मलं ययुरनिश्चिततत्त्वाः॥' (श्रीमद्भा० १०।३५।१५) इस रवका प्राधान्य इसीलिये है कि उससे पूर्णतम पुरुषोत्तम प्रभु प्रकट होते हैं। वैसे तो प्रभु सर्वत्र हैं ही, पर जब व्यंजक नहीं, तब क्या हो? इसलिये भावुक व्यक्ति भगवान्‌से भी अधिक व्यंजक नामको बड़ा मानते हैं। अरबोंकी सम्पत्ति घरमें भरी हो, पर यदि वह विदित नहीं तो उसका क्या उपयोग? घरवाला हल ही चलाता रहेगा। नाम या निधिका—खजानेका—बीजक है, पूर्णब्रह्म पुरुषोत्तम प्रभु निधि हैं और नाम उनका बीजक है। यही बात श्रीतुलसीदासजीने कही है— 'नाम निरूपन नाम जतन तें। सोउ प्रगटत जिमि मोल रतन तें॥' (रा०च०मा० १।२३।८) नामद्वारा प्रयत्न करनेपर प्रभु प्रकट होते हैं। अतः कहा है कि 'कहेउँ नामु बड़ ब्रह्म राम तें॥' (रा०च०मा० १।२३।५), 'राम एक तापस तिय तारी। नाम कोटि खल कुमति सुधारी॥' (रा०च०मा० १।२४।३) नाम मूल-चिकित्सा है और राम पल्लव-चिकित्सा। 'राम भालु कपि कटकु बटोरा। सेतु हेतु श्रमु कीन्ह न थोरा॥ नामु लेत भवसिंधु सुखाहीं। करहु बिचारु सुजन मन माहीं॥' (रा०च०मा० १।२५।३-४) श्रीरामने भालु, बन्दरोंको लेकर प्राकृत शतयोजन समुद्र पार किया, किंतु नाम लेनेसे अपार भवसिन्धु सूख जाता है, अतः नाम सबसे बड़ा है। वेदान्त भी कहते हैं कि वाक्य-श्रवणसे तत्त्व-साक्षात्कार होता है। भक्त भी भगवत् साक्षात्कारका मूल श्रवण ही मानते हैं। निर्गुण साक्षात्कारमें भी श्रवणकी ही अपेक्षा है। व्रजांगनाओंको भी उद्बुद्ध उभयविध श्रृंगार रसात्मा श्रीकृष्णके लिये वेणुरव ही अपेक्षित है। इसलिये वे मूल वेणुरवको पकड़ती हैं कि उसीसे श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्द व्यक्त होंगे। जैसे हृदयमें प्रथमसे ही विराजमान निर्गुण परब्रह्म तत्त्वका साक्षात्कार श्रवण, मनन, निदिध्यासनद्वारा महावाक्यसे ही होता है, वैसे ही सगुण, साकार सच्चिदानन्द परब्रह्मका भी साक्षात्कार उनके चरित्रों एवं गुणगणोंके श्रवणसे ही होता है। चरित्रश्रवणसे प्रथम चरित्रनायक भगवान्‌का मानस- रूप प्रकट होता है। उसी मानसी भगवदीय प्रतिमाका

ध्यान करते-करते ही माया-यवनिकाके, जिससे कि भगवान् आवृत होते हैं—अपसारणसे भगवान्‌का दिव्य रूप प्रकट होता है, इस तरह शब्दसे ही भगवान्‌का प्राकट्य होता है। फिर जब भगवान्‌के चरित्रों और भगवन्नामोंसे भगवान्‌का प्राकट्य होता है, तब साक्षात् भगवान्‌के मुखचन्द्रसे निर्गत वेणुगीत-पीयूषके पानसे भगवान्‌का प्राकट्य होना स्वाभाविक ही है। शब्द प्रकाशक और अर्थ प्रकाश्य होता है। अतः शब्द ब्रह्म रूपमें व्यक्त भगवदधरसुधासे भगवान्‌का प्राकट्य होना स्वाभाविक है। समस्त प्रवाह अपनेसे संसृष्ट पदार्थको गन्तव्य स्थलकी ओर ले जाते हैं, परन्तु वेणुध्वनिका विलक्षण प्रवाह अपनेमें संसृष्ट तत्त्वको अपने उद्गम- स्थान श्रीकृष्णकी ओर ही ले जाता है— सर्वः प्रवाहः सर्वत्र स्वानुकूल्येन कर्षकः। वेणुध्वनिप्रवाहस्तु प्रातिकूल्येन कर्षति॥ आश्चर्यसे सबका ही उधर आकर्षण होता है,

किरातिनियोंका स्मररोग ५९ हृदयकी वस्तु हैं, दोनोंमें परम अन्तरंगता है, इसीलिये कहा है कि 'उभय उभय भावात्मा' हैं। इस प्रकार वह परम तत्त्व भरपूर होकर वेणुरवद्वारा व्यक्त होता है। परमानन्द आनन्दकन्द श्रीकृष्णचन्द्रके अधरसे संश्लिष्ट वंशीके भी सौभाग्यको देखकर स्वयं श्रीवृषभानुनन्दिनी कहती हैं कि 'हे सखि! हम वंश- जन्मकी याचना करती हैं, कुलवधू होना नहीं चाहतीं, क्योंकि वंश-जन्ममें श्रीकृष्ण स्वयं ही आसक्तिसे सदा मिले, परंतु कुलवधू होनेमें तो उनका मिलना दुर्लभ हो जायगा'— याचेऽहं वंशदेहं न तु कुलजवधूदेहमाद्ये हि कृष्णः। तृष्णाभावेन सज्जन् बहुरुचिविहरन् दुर्लभः स्यात्परत्र॥ फिर भला ऐसी वेणुके रवको सुनकर किसका परम कल्याण न होगा? किरातिनियोंका स्मररोग पूर्णाः पुलिन्द्य उरुगायपदाब्जराग- श्रीकुङ्कुमेन दयितास्तनमण्डितेन। तद्दर्शनस्मररुजस्तृणरूषितेन लिम्पन्त्य आननकुचेषु जहुस्तदाधिम्॥ (श्रीमद्भा० १०।२१।१७) 'श्रीमद्भागवत' के 'वेणुगीत' में प्रसंग आया है कि एक बार वृन्दावनधामवासिनी किरातिनियोंने वहाँके हरित घासांकुर, दूर्वा, गुल्म आदिमें संलग्न कुंकुमका दर्शन किया। वह कुंकुम श्रीभगवच्चरणाम्बुज-स्पर्शसे उनमें लगा था। उसके दर्शन, स्पर्श और सौगन्ध्यसे किरातिनियोंके मनमें स्मररूप रोगका उदय हुआ। स्मरका अर्थ काम अथवा उत्कण्ठापूर्वक स्मरण है। भावुकोंके मतानुसार बाह्य रमणमें कामकी अपेक्षा है और आन्तर रमणमें तापकी। यह दूसरी बात है कि भगवद्विषयक काम आधिदैविक दिव्य काम है। जैसे सुवर्णकी मुद्रिकामें दिव्यरत्नके संयोगके लिये लाक्षा अपेक्षित होती है, वैसे ही व्रजांगनाओंको श्रीकृष्ण-सम्बन्धार्थ काम अपेक्षित था और वह यह भूषण था, दूषण नहीं; क्योंकि अन्यत्र काम निन्द्य है, पर भगवच्चरणविषयक होनेसे वही भूषण है। वैसे किसी विरक्तके लिये जागतिक वैषयिक इच्छा या तृष्णाका होना निन्द्य है, परमार्थमें इन सबका न होना ही उत्तम माना गया है—'तृष्णाक्षयः स्वर्गपदं किमस्ति।' तृष्णाका नाश हो जाना सुखका मूल है। परंतु कहींपर यही सन्तोष दूषण भी है। किसीको भगवच्चरित्र-श्रवण, तद्दर्शन आदिमें सन्तोष हो जाय, तो क्या यह दूषण न माना जायगा? यहाँ तो जितना ही अधिक असन्तोष, लोभ, चंचलता आदि हो, उतना ही अच्छा है। किसीने कहा है— कृष्णभावरसभाविता मतिः क्रीयतां यदि कुतोऽपि लभ्यते। तत्र मूल्यमपि लौल्यमेकलं जन्मकोटिसुकृतैर्नु लभ्यते॥ कल्प-कल्पान्तरोंके, जन्म-जन्मान्तरोंके पुण्यपरि- पाकसे श्रीकृष्णविषयक अनुराग होता है। पर वह सीमित न रह जाय, तभी उसका महत्त्व या पूर्णता है। श्रीश्यामसुन्दर व्रजेन्द्रनन्दनकी कोटि-कोटि कन्दर्प- दलन-पटीयसी मनोहारिणी छवि निहारनेके लिये सब प्रपंच भूल जाय, व्याकुलता बढ़ती जाय, मन तड़फड़ाने लगे, अस्वास्थ्य हो जाय, धैर्य छूट जाय, तभी उसका महत्त्व है, तभी सफलता है। यदि कहीं यह संतोष हो कि धीरे-धीरे करते चलो, धैर्य रखो तो फिर अनुचित है। यहाँ तो जितनी अधिक व्याकुलता, व्यग्रता, बेचैनी बढ़ेगी, उतना ही अधिक अनुरागमें उत्कृष्टता आयेगी। अधिकाधिक व्याकुलता होना ही उस मतिका मूल्य है। पुत्र, धन, दारा, गेह, नेहके न मिलनेसे अधैर्य तो सभीको होता है और होना स्वाभाविक है, परंतु भगवदर्थ अधैर्य, व्याकुलता, अस्वास्थ्य होना बहुत ऊँची बात है। अतः जो लोकमें दूषण है, वही यहाँ भूषण है।

६० भक्तिसुधा भगवत्सम्बन्धसे तृष्णा, काम आदि भी भूषण बन जाते हैं भगवत्-सम्बन्धसे तृष्णा, काम, लोभ सब भूषण हैं। भगवच्चरणसरोरुह-सम्मिलनके लिये भावुकका मनोमिलिन्द तड़फड़ाये, उसके लोकोत्तर माधुर्य परागमें लाम्पट्य दिखलाये तो यह उसका महाभूषण है। जिस वृत्तिविशेषसे कामिनी-सम्मिलनके लिये कामुक उत्कण्ठित या व्याकुल हो उठता है, वही स्मर है। ऐसे ही जिस वृत्तिविशेषसे व्रजदेवियोंको श्रीकृष्ण परमात्माके सम्मिलनके लिये उत्कट उत्कण्ठा और व्याकुलता है, वही स्मर या लोकोत्तर प्रणय है, पर बात यह है कि किसी भी वस्तुका महत्त्व उसके स्वरूप, विषय और आश्रयके महत्त्वसे होता है। श्रीकृष्णका चौर्य आश्रयसे उत्तम हो सकता है, परंतु स्वरूपसे वह निन्द्य है। आश्रयकी सरसतासे आश्रितमें सरसता, उत्तमता आ सकती है। क्षारसागरकी लहरी या तरंग क्षार होगी और क्षीरसागरकी लहरें क्षीरमयी मधुर होंगी। ऐसे ही भगवदाश्रित वस्तु तदात्मक होगी। यहाँके चौर्यका महत्त्व आश्रयकी महत्तासे है, अतएव भक्तोंके द्वारा यह खूब गाया गया। साधारण पुरुषोंका चौर्य गाया नहीं जाता, प्रत्युत किसीका चौर्य ज्ञात होनेसे उसके साथ सर्वविध सम्बन्ध त्याग हो जाता है। चोरीके साथ झूठ भी लगा था, बिना उसके चोरीका काम ही नहीं चल सकता। एक बार बालकृष्णने मिट्टी खायी। शिशु सखाओंने व्रजेन्द्रगेहिनी यशोदासे शिकायत कर दी—'मैया! आज लालाने मिट्टी खायी है।' बाललीलोत्सवमुग्ध, परम भाग्यवती यशोदाने कृत्रिम कोपसे श्रीश्यामसुन्दर नन्दनन्दनके सुकोमल छोटे-छोटे दोनों हाथोंको अपने एक हाथमें पकड़ लिया और दूसरे हाथमें छड़ी लेकर बोलीं— 'क्यों लाला, तूने आज मिट्टी खायी?' भगवान् डर गये, सोचा 'अब मार पड़ेगी, इसलिये झूठ बोल दो।' कहने लगे—'माँ! मैंने मिट्टी नहीं खायी'—'नाहं भक्षितवानम्ब'। (श्रीमद्भा० १०।८।३५) यशोदाने घुड़ककर कहा—'तुम्हारे ये सखा लोग जो कह रहे हैं?' तब तो कहने लगे—'सर्वे मिथ्याभिशंसिनः' (श्रीमद्भा० १०।८।३५) 'ये सब झूठ बोल रहे हैं।' भगवान्ने यशोदाको विश्वास दिलाने और अपनी सफाई पेश करनेके लिये कहा—'यदि तुझे विश्वास नहीं तो इन सबके सामने मेरा मुख देख ले' 'समक्षं पश्य मे मुखम्॥' (श्रीमद्भा० १०।८।३५) भगवान्ने सोचा था कि ऐसा कह देनेसे अम्बाको विश्वास हो जायगा और वह मुँह खुलवाकर न देखेगी, परंतु नन्दरानी भी पूरी थी। उसने कहा—'अगर ऐसी बात है तो मुख खोल दे'—'तर्हि व्यादेहि।' (श्रीमद्भा० १०।८।३६) अब तो भगवान् फँस गये। अगत्या व्याधसे डरे पक्षीकी तरह मुख खोल दिया— 'व्यादत्ताव्याहतैश्वर्यः।' (श्रीमद्भा० १०।८।३६) मुखके खुलते ही उसमें सागर, भूधर, वन, पर्वत दीख पड़े। यशुमति डरी, उसके हाथसे छड़ी गिर गयी, वह बेहोश हो गयी। कुछ टीकाकार भगवदुक्तियोंको सत्य ही सिद्ध करते रहनेके कारण 'नाहं भक्षितवान्' की व्याख्या करते हैं—'नाहं किञ्चिद् बाह्यं भक्षितवान् किंतु सर्वं मदन्तस्थमेव' अर्थात् मैंने कोई बाहरकी वस्तु नहीं खायी, सब मेरे उदरमें ही है, परंतु श्रीजीव गोस्वामी आदिका कहना है कि भगवान् झूठ बोले ही और बोलना ही चाहिये था। बात यह है कि भगवान्की दो प्रधान शक्तियाँ हैं—एक माधुर्याधिष्ठात्री महाशक्ति और दूसरी ऐश्वर्याधिष्ठात्री महाशक्ति। उस समय व्रजमें माधुर्याधिष्ठात्री महाशक्तिका साम्राज्य था, भगवान् श्रीमन्नन्दरानी यशोदाके उत्संगमें लालित हो रहे थे। ऐश्वर्याधिष्ठात्री महाशक्ति उस समय रुद्धप्रवेशा थी। वह प्रभुकी सेवाका अवसर ढूँढ़ रही थी। जब उसने देखा कि हाथमें छड़ी लिये यशोदा अब मेरे प्रभुको, प्राणधनको मारे बिना न रहेगी, तब अपने कौशलसे उन्हें बचानेका प्रयत्न किया, यशोदाको श्रीमुखमें अनन्त ब्रह्माण्ड दीख पड़े। भावुकोंकी तो यहाँतक भावना है कि प्रभुने यशोदासे अपने बचनेके लिये सिर्फ कहभर दिया था कि 'समक्षं पश्य मे मुखम्', वास्तवमें वे अपना मुख खोलकर दिखाना

नहीं चाहते थे, क्योंकि मिट्टी तो आखिर खायी ही थी, तब खुल कैसे गया ? तो मातृकोपरविरश्मिद्वारा उनका मुखकमल स्वयं ही विकसित हो गया। तात्पर्य यह है कि लीलारसपोषित ऐसा झूठ दोष नहीं गिना जाता, किंतु गुण ही गिना जाता है। इसी भावकी 'भागवत' में कुन्तीकी स्तुति है— गोप्यादादे त्वयि कृतागसि दाम तावद् या ते दशाश्रुकलिलाञ्जनसम्भ्रमाक्षम्। (श्रीमद्भा० १।८।३१) हे व्रजेन्दनन्दन, श्यामसुन्दर! जब आपकी अघटितघटनापटीयसी मायासे मुग्ध हुई यशोदा रस्सी लेकर बाँधने लगी, उस समय 'वक्त्रं निनीय भयभावनया स्थितस्य' (श्रीमद्भा० १।८।३१) मुख नीचा किया, आँखें डबडबा आयीं, अंजनमिश्रित अश्रु कपोलपर लुढ़क आये, मानो नीलकमलके कोशपर ओसके कण या मुक्ताबिन्दु शोभा पा रहे हैं। 'सा मां विमोहयति भीरपि यद्बिभेति ॥' (श्रीमद्भा० १।८।३१) जिससे काल भी भयभीत होता है, उसका यशोदासे डरना मुझे मुग्ध कर रहा है। यह सब कुछ अप्राकृत तत्त्वमें प्राकृतवत् प्रतीति है, अलौकिकताका भाव है। 'नृणां निःश्रेयसार्थाय व्यक्तिर्भगवतो नृप।' (श्रीमद्भा० १०।२९।१४) उस अचिन्त्य, अनन्त्य, अग्राद्य, अलक्षण, अव्यपदेश्य तत्त्वका सगुण-साकार विग्रहरूपमें इसीलिये प्राकट्य है कि किसी भी भावसे लोगोंकी उसमें प्रीति हो और उनका कल्याण हो। सहज भाव रागानुगा प्रीति है। रागतः प्राप्तमें विधि नहीं होती, वह तो अत्यन्त अप्राप्तमें होती है। कान्ताको अपने कान्तमें स्वाभाविक राग होता है, देवतामें विधिप्राप्त राग है, सर्वेश्वर सर्वशक्तिमान् प्रभु इसी आशयसे सहज भावसे उपास्य बननेके लिये प्राकृत होते हैं। कामिहि नारि पिआरि जिमि लोभिहि प्रिय जिमि दाम। तिमि रघुनाथ निरंतर प्रिय लागहु मोहि राम॥ (रा०च०मा० ७।१३० (ख)) कामीको जो कामिनीमें राग होता है, लोभीको जो धनमें राग होता है, वही राग प्रभुके प्रति सहज होना चाहिये। माताका जो अनुराग अपने बालकके प्रति होता है, चाहे वह काला-कलूटा दिव्य-भव्य कैसा भी हो—वैसा ही सहज भाव प्रभुके प्रति होना चाहिये। श्रीव्रजेन्द्रगेहिनीका यही स्वाभाविक वात्सल्यभाव मनमोहन श्यामसुन्दरके प्रति था। तभी तो उनका मृद्भक्षण-लीलापर छड़ी लेकर मारनेका माधुर्यभाव है। इस माधुर्य-भाव-प्रसंगमें बालविहारी प्रभुके असत्य भाषणको प्रकारान्तरसे सत्य बताना, माधुर्यपोषकोंकी दृष्टिमें लीपापोती करना है। हाँ तो प्रकृतमें यह झूठ और इसी तरह चौर्य भी श्रीकृष्णके आश्रय-माहात्म्यसे माहात्म्यवान् हैं। जैसे क्षीरसमुद्र या मधुर समुद्रकी लहरीतरंग मधुर, वैसे ही आनन्दसुधासिन्धु प्रभुकी समस्त लीलाएँ मधुर हैं— 'मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ॥' व्रजांगनाओंका 'काम' विषयके माहात्म्यसे पवित्र है। यहाँ देखना यह है कि उनका काम किसमें था ? वह था उसी पूर्ण ब्रह्म पुरुषोत्तम श्रीश्यामसुन्दरमें। शुद्ध विवेचनसे तो 'रसो वै सः' के अनुसार वही— परब्रह्म श्रीकृष्ण ही रसस्वरूप है। उन्हींके विकृत रूप नवरस हैं। जैसे सत्ता एक ही है 'सदेव सोम्येदमग्र आसीत्' किंतु शुभ, अशुभ सब कुछ उसीका परिणाम है। वही 'सत्' पुण्यरूपसे विवर्तित होकर उपादेय और पापरूपसे विवर्त होकर अनुपादेय हो जाता है। वही सत् अशेष विशेषातीत होकर शुद्ध सत् है। 'श्रृंगार' भी उसी रसका विवर्त है। आलम्बन या आश्रयकी पवित्रता अथवा अपवित्रतासे उसमें पवित्रता या अपवित्रताका आरोप होता है, स्वतः रस निर्विशेष है। जहाँ प्राकृत कामिनी-कामुक उस रसके आश्रय होंगे, वहाँ वह दोष होगा, अतएव उनका श्रृंगार दोष वह है। सहस्त्रों दिवसके ब्रह्मविषयक मनन-चिन्तनसे भी इतनी भावना नहीं बनती, जितनी अनेक जन्मोंके मलिन संस्कारोंके कारण क्षणिक कान्तादर्शन, स्मरण, चिन्तनसे बनती है। अनेक स्थापित किये गये प्रतिकूल

६२ भक्तिसुधा

भाव लुप्त हो जाते हैं, पर यह बात उसी अवस्थामें है, जहाँ अवलम्बन या आश्रय दोषयुक्त है। व्रजांगनाओंको 'स्मर' है सही, पर किसमें? ‘नृणां निःश्रेयसार्थाय व्यक्तिर्भगवतो नृप' (श्रीमद्भा० १०।२९।१४) में, मनुष्योंका कल्याण करनेके लिये साकाररूपमें प्रकट हुए ब्रह्ममें। उसमें किसी भी तरह जीवोंकी प्रवृत्ति होनेसे उनका कल्याण-ही-कल्याण है। चाहे प्रेमसे, भक्तिसे और चाहे काम, क्रोध, भय, स्नेह आदिसे भी भगवच्चिन्तन होनेसे कल्याण होता है— कामं क्रोधं भयं स्नेहमैक्यं सौहृदमेव च। नित्यं हरौ विदधतो यान्ति तन्मयतां हि ते ॥ (श्रीमद्भा० १०।२९।१५) कंसको भयसे, शिशुपालको द्वेषसे, गोपियोंको स्नेहसे पूर्णतम पुरुषोत्तम परब्रह्म कल्याण-गुण-गण- निलय, कल्याणदायकके प्रति एकान्त दृढ़निष्ठा हुई। कहा जा सकता है कि वेन भी तो द्वेषी था, उसको भगवद्विषयक एकान्त दृढ़ निष्ठा क्यों नहीं हुई—और शिशुपालको क्यों हुई, जिसने गिनकर भगवान् श्रीकृष्णको सौ गालियाँ दीं ? सबके देखते-देखते उसमेंसे एक ज्योति निकलकर श्रीकृष्णके मुखमें लीन हो गयी। कारण स्पष्ट है कि शिशुपालको भगवान्के अस्तित्वमें दृढ़ निश्चय था और वेन ईश्वरको मानता ही न था, वह तो अपनेको ही सर्वेश्वर प्रख्यात करता था। कहा है कि प्राणी भय या कामसे जितनी अधिक तन्मयताको प्राप्त होता है, उतना अन्य किसी प्रकारसे नहीं होता है—'यथा कामाद् भयाद्वाऽपि मर्त्यस्तन्मयता- मियात्।' शिशुपाल और कंसका भी यही हाल था—बैठते, सोते, चलते, खाते, घूमते हुए उन्हें कृष्ण-ही-कृष्ण दिखलायी पड़ते थे, सारा जगत् उनके लिये कृष्णमय था— आसीनः संविशंस्तिष्ठन् भुञ्जानः पर्यटन् महीम्। चिन्तयानो हृषीकेशमपश्यत् तन्मयं जगत्॥ (श्रीमद्भा० १०।२।२४) भृंगीकीटन्यायसे जीवमें तल्लीनता होनी चाहिये। दृढ़ अभिनिवेशवश जहाँ नहीं, वहाँ भी उसकी प्रतीति हो। सिद्धान्त भी तो यही है 'अस्तीत्येवोपलब्धव्यम्', परंतु वेनको यह निश्चय नहीं था। प्रसंगमें गोपांगनाओंका काम शिशुपालके द्वेषसे कहीं बढ़कर था। इनकी निष्ठा बहुत ऊँची थी। इस प्रकार इनका काम विषय या आलम्बनकी महिमासे महामहिम हुआ। अतः किसी वस्तुका माहात्म्य विषयकी महत्तासे महत्त्ववान् होता है। इस प्रसंगमें एक बड़ी सुन्दर सूक्ति है— प्रथयति नवनीतचोरतां ते व्रजयुवतीजनजारतां जनो यो। वितरसि निजभावमीश तस्मै स्वकृतधियो परिगोपनाय नूनम् ॥ अर्थात् हे प्रभो ! जो आपकी माखनचोरी और गोपियोंके साथ जारभावका प्रख्यापन करता है, आपको 'चोरजारशिखामणि' नामसे बदनाम करता है, उसे आप निजभाव—अपना रूप दे देते हैं, अपनेमें मिला लेते हैं, मुक्त कर देते हैं। यह इसलिये नहीं कि आप उसपर दया करते हैं, अपितु इसलिये कि यह अलग रहकर हमारी निन्दा करता फिरेगा और जब अपनेमें मिला लिया तो वह भी अपने ही जैसा हो गया, फिर निन्दा किसकी करेगा ? यह भक्त कविकी अपने प्रसाधनपर मीठी व्यंग्य छार है। भाव यह है कि उस विशुद्ध पूर्णतम तत्त्वके चोर एवं जाररूपमें किये गये चिन्तनसे भी पूर्ण पद प्राप्त होता है। भगवान्को व्रजयुवतीजनका जार बताया, परंतु वह जार यह लौकिक जार नहीं जो 'जरयति आत्मविज्ञानं निःश्रेयसम्' से ख्यात होता है। गोपियोंका जार तो अलौकिक है। वह तो 'जरयति अविद्या तत्कार्यात्मकं प्रपञ्चं यः स जारः' है। 'जरयत्याशु या कोशं निगीर्णमनलो यथा ॥' (श्रीमद्भा० ३।२५।३३)— की तरह अथवा 'ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात् कुरुतेऽर्जुन !' की तरह यह तो प्राणमय, अन्नमय, मनोमय, विज्ञानमय, आनन्दमयादि पंच कोषोंको जलानेवाला जार है। उत्तप्त वियोगाग्निसे समस्त

किरातिनियोंका स्मररोग ६३ पाप-तापोंको दग्ध कर देनेवाला जार है। यहाँ 'नातप्ततनुर्न तदामोऽश्नुते दिवम्' की बात ही नहीं रह जाती, जो फिर परिपक्व हो। पर यह तभी है, जब निर्निमित्त भावसे भक्ति हो। कहा है—'अनिमित्ता भागवती भक्तिः सिद्धेर्गरीयसी।' (श्रीमद्भा० ३। २५। ३३) चिन्तामणिमें दीपक-बुद्धिसे प्रवृत्त होनेपर भी जैसे मिलेगी चिन्तामणि ही, वैसे ही नित्य, शुद्ध, बुद्ध, मुक्तस्वभाव, पूर्णतम पुरुषोत्तममें जार-बुद्धिसे प्रवृत्त होनेपर भी मिलेगा वही तत्त्व, जो अखण्ड, अनन्त, अचिन्त्य, अव्यक्त, कूटस्थ, साक्षि-भास्य है। गोपियोंको उनकी एकान्त दृढ़ निष्ठासे वही मिला। इस तरह गोपियोंका काम विषयकी महत्तासे महत्त्ववान् हुआ है। श्रीकृष्ण-वियोग-ताप-शान्त्यर्थ कुंकुम-लिप्त श्रीव्रजदेवियोंके वक्षोजोंसे श्रीकृष्णके पादपद्मोंमें संलग्न जो कुंकुम था, वही उनके गोचारणार्थ वनमें आनेसे तृणोंमें लगा। उसके दर्शन करनेसे पुलिन्दियोंको— शबर रमणियोंको कामरूप रोग उत्पन्न हुआ अथवा 'स्मरो वा व आशायो भूयान्' से स्मरका अर्थ जब उत्कट उत्कण्ठा लिया गया, तब यह अर्थ हुआ कि उस कुंकुमके दर्शनसे उन किरातिनियोंको साक्षात् श्रीकृष्णकी दिव्य सौन्दर्य-माधुर्य-सौगन्ध्योपेत लावण्यामृतमूर्तिके दर्शनकी तीव्र अभिलाषा हुई। उसके पूर्ण न होनेसे हृदयमें श्रीकृष्ण-वियोग-तापका वेगवान् उदय हुआ। उसे मिटानेके लिये तृणोंमें संलग्न उसी कुंकुमको उन सबोंने अपने मुख और वक्षःस्थलमें लगाया—'लिम्पन्त्य आननकुचेषु....।' (श्रीमद्भा० १०।२१।१७) परंतु इससे भी उनकी व्याकुलता, व्यग्रता मिटी नहीं, प्रत्युत जब और भी बढ़ती गयी, तब उन्हें संशय हुआ कि कहीं यह कुंकुम ही तो हमारी आधि-मानसी व्यथाका कारण नहीं है? तुरंत उन्हें यही निश्चय भी हो गया और उसे उन्होंने 'आधिं मत्वा जहुः' अर्थात् मानसी व्यथाका कारण समझकर त्याग दिया। इसपर श्रीकृष्ण- प्रणय-प्रमत्त गोपियाँ कहती हैं—हमारे अंगमें लिप्त कुंकुम श्रीव्रजेन्द्रनन्दन श्यामसुन्दरके सुकोमल श्रीचरणोंमें लगा था। उसे देखनेमात्रसे ही इन पुलिन्दियोंको रोग उत्पन्न हुआ, असह्य मानसी व्यथा हुई, अतः इन्होंने उसे त्याग दिया। हाँ सखि! हम इतनी बड़ी हतभागा हैं कि जिनके अंग-संलग्न वस्तुके देखनेसे भी लोगोंमें रोग उत्पन्न होता है। अथवा 'तद्दर्शनस्मररुजः' का यह अर्थ है कि उन भिल्लपुरन्ध्रियोंने श्रीकृष्ण-चरणसंसक्त उस कुंकुमका दर्शन किया, अवघ्राण किया और स्पर्श किया। इससे उन सबोंने अपनी सब मनोव्यथाओंका त्याग किया— अर्थात् वे भगवद्भावापन्न हो गयीं। बात यह हुई कि उस विलक्षण आकर्षक कुंकुमके दर्शन आदिसे ही उन किरात-कामिनियोंको श्रीकृष्णदर्शनविषयक उत्कट उत्कण्ठा हुई और श्रीकृष्ण-दर्शन न होनेसे उन्हें तीव्रातितीव्र ताप हुआ। उत्कट उत्कण्ठासे जब तीव्र ताप होगा, तभी श्रीकृष्ण परब्रह्मका दर्शन हो सकेगा, नहीं तो कल्प-कल्पान्तरोंसे, युग-युगान्तरोंसे जीव भगवद्विमुख है, पर उसे कहाँ तीव्र वियोग ताप होता है? अतः उत्कट उत्कण्ठाकी ही प्रथम अपेक्षा है। उसका भी मूल वही कुंकुम है। वह कुंकुम साधारण कुंकुम नहीं, अपितु प्रथम वह श्रीवृषभानुनन्दिनीके उरोजमें संलग्न था, फिर वहींसे श्रीव्रजेन्द्रनन्दन श्यामसुन्दरके श्रीचरणोंमें संपृक्त हुआ। उसीके दर्शनसे पुलिन्दियोंको श्रीकृष्ण-दर्शनकी उत्कट उत्कण्ठा हुई और उसके पूर्ण न होनेके कारण उत्पन्न हुए तीव्रातितीव्र तापसे उनके हृदयमें इतना अधिक दुःखका आविर्भाव हुआ कि अनेक कल्पोंके दुःख उसमें समा गये और दग्ध हो गये। इनके साथ ही कुंकुम- परम्परासे पूर्णतम पुरुषोत्तमके श्रीचरणसम्पर्कसे इतना अधिक अनन्तानन्तगुणित आनन्द प्राप्त हुआ कि उससे वे पूर्ण हो गयीं, कृतकृत्य हो गयीं। श्रीमद्वल्लभाचार्य कहते हैं—उस कुंकुमके दर्शनसे, उसके विलिम्पनसे इन भिल्लिनियोंमें श्रीराधा-स्वरूपका अथवा श्रीलक्ष्मी-स्वरूपका प्रवेश हुआ। यह एक विलक्षण तत्त्व है; व्यापक वस्तु है। श्यामसमुद्रमें

श्रीराधा माधुर्याधिष्ठात्री महाशक्ति है। तब तत्त्वज्ञानी भी आत्माराम होते हैं, तब पूर्णतम पुरुषोत्तमका रमण बाह्य वस्तुमें कैसे हो सकता है? उनका तो अपनेमें ही रमण बनता है। श्रीजानकीरमण, श्रीराधारमण, गिरा और अर्थकी तरह, जल और वीचिकी तरह अभिन्न हैं। गोस्वामी तुलसीदासजीने कहा है— 'गिरा अरथ जल बीचि सम कहिअत भिन्न न भिन्न। बंदउँ सीता राम पद....।।' (रा०च०मा० १।१८)। महाकवि कालिदासने भी श्रीपार्वतीरमणको वाणी और अर्थकी तरह अभिन्न बतलाया है— 'वागर्थाविव सम्पृक्तौ वागर्थप्रतिपत्तये। जगतः पितरौ वन्दे पार्वतीपरमेश्वरौ।।' (रघुवंश १।१) श्रीजानकी, श्रीराधा, श्रीपार्वती आदि उस अखण्ड, अनन्त, अचिन्त्य, अव्यक्त, आनन्दसागर परब्रह्मकी तरंग आदिकी तरह निजी अभिन्न वस्तु हैं। इससे भी अन्तरंग भाव जल और उसके माधुर्यके अभेदका है। यों उस परम तत्त्वका अपनेमें ही रमण सम्भव है। इन किरातिनियोंमें कुंकुम-सम्बन्धसे श्रीराधा- रूपका उदय हुआ। उससे उनमें वही अन्तरंगता आयी और उस दिव्य तत्त्वके रमणका अनुभव उन्हें हुआ। अतः उन्होंने 'आधिं जहुः' मानसी व्यथाको त्यागा और पूर्ण हो गयीं। जैसे प्रभु श्रीराधाको मिले, वैसे ही किरातिनियोंको भी मिले, क्योंकि 'ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं हृदि सर्वस्य विष्ठितम्' (गीता १३।१७)- के अनुसार वह पूर्णतम तत्त्व सर्वत्र ही अव्याहत- रूपसे वर्तमान है। अतः दीन-हीन दशामें भी हताश होनेकी आवश्यकता नहीं है। आवश्यकता है उत्कट उत्कण्ठासे प्रभु-स्मरण और प्रभुके साथ सम्बन्ध स्थापित करनेकी। फिर तो किरातिनियोंकी ही तरह सभी पूर्ण हो सकते हैं।

वेणुगीत

श्रीवेणुगीतमें श्रीगोपांगनाओंकी आसक्तिका वर्णन है, पीछेके प्रकरणमें श्रीवृन्दावनधामकी वर्षा और शरद्-ऋतुओंका वर्णन हो चुका है। वहाँ कहा गया है कि वनसे आनेवाली परम सौगन्ध्य-सौरस्यसम्पन्न अनेकविध पुष्पोंके समशीतोष्ण वायुका आलिंगन करके श्रीवृन्दावन एवं व्रजके समस्त जनोंने तो तिग्मरश्मिजन्य ताप भुला दिया, किंतु गोपांगनाओंका अपने निरतिशय निरुपाधिक परमप्रेमास्पद प्रियतम श्रीकृष्णवियोगसे जन्य ताप शान्त नहीं हुआ— आश्लिष्य समशीतोष्णं प्रसूनवनमारुतम्। जनास्तापं जहुर्गोप्यो न कृष्णहृतचेतसः॥ (श्रीमद्भा० १०।२०।४५) राजा परीक्षित्से श्रीशुकदेवजीने कहा कि वर्षाकालके व्यतीत होनेपर जब शरद्-ऋतुका आगमन हुआ, तब श्रीवृन्दावनधामके सरित-सरोवर आदि जलाशयोंके जल स्वच्छ तथा निर्मल हो गये। नाना प्रकारके कमल-कमलिनी, कुमुद-कुमुदिनीके समुदायोंकी मनोहर सुरम्य सुगन्धिसे सुगन्धित मन्द शीतल समीरसे श्रीवृन्दारण्यधाम परम-रमणीय हो गया। उसी समय परमानन्दरसामृतमूर्ति भगवान् श्रीकृष्णने गौओं तथा गोपवृन्दोंके साथ श्रीवृन्दावनधाममें प्रवेश किया। इत्थं शरत्स्वच्छजलं पद्माकरसुगन्धिना। न्यविशद् वायुना वातं सगोपालोऽच्युतः॥ (श्रीमद्भा० १०।२१।१) कुछ आचार्योंके मतानुसार इस अध्यायमें श्रीगोपांगनाओंका आसक्तिनिरोध वर्णित है। निरोध तीन प्रकारका होता है—(१) प्रेमनिरोध, (२) आसक्तिनिरोध और (३) व्यसननिरोध। पहले राग होनेसे कुछ काल-पर्यन्त प्रियतमसे अन्यका विस्मरण होता है, यही 'प्रेमनिरोध' या 'रागनिरोध' है। ऐश्वर्य-माधुर्यव्यंजक विभिन्न लीलाओंसे प्रेमनिरोधका वर्णन है। प्रियतमका अधिकाधिक स्मरण होनेसे उसमें आसक्ति होकर अन्यका विस्मरण होता है, वही 'आसक्तिनिरोध' कहा गया है। यहाँ गोपांगनाओंके

वेणुगीत ६५ आसक्तिनिरोधका वर्णन है। आगे चलकर उस आसक्तिके अधिकाधिक गाढ़ होनेसे उसका छूटना असम्भव हो जाता है। अतः वह व्यसनरूप हो जाता है। इसीलिये वह ‘व्यसननिरोध’ कहा जाता है। इसका वर्णन रासपंचाध्यायी, युगलगीतमें है। सर्वविस्मरणपूर्वक निरतिशय निरूपाधिक परमप्रेमास्पद प्रियतम श्रीकृष्ण स्वरूपमें श्रीव्रजांगनाओंकी तन्मयता ही ‘आसक्तिनिरोध’ है। जितनी अधिक तन्मयता, उतना ही अधिक विश्वविस्मरण होता है। अत्र सर्गो विसर्गश्च स्थानं पोषणमूतयः। मन्वन्तरेशानुकथा निरोधो मुक्तिराश्रयः॥ (श्रीमद्भा० २।१०।२) इस दशविध पुराणलक्षणान्तर्गत निरोधका लक्षण, अपनी समस्त शक्तियोंके सहित अखण्ड, अनन्त आत्मस्वरूप भगवान्‌का शयन कहा गया है— ‘निरोधोऽस्यानुशयनमात्मनः सह शक्तिभिः।’ (श्रीमद्भा० २।१०।६) इस मतमें महाप्रलय ही निरोध है। सृष्टिकालमें शक्तियाँ कार्यरूपमें परिणत होती हैं और प्रलयकालमें समस्त कार्य स्वकारणभूत शक्तियोंमें लीन हो जाता है और भगवान् स्वस्वरूपभूत उन शक्तियोंको साथमें लेकर उसे अपने स्वरूपमें लीन करके शयन करते हैं। जैसे अंकुर, नाल, स्कन्ध, शाखा, उपशाखा, पत्र, पुष्प, फल, सौगन्ध्य, सौरस्यादिके उत्पादनानुकूल समस्त शक्तियाँ बीजमें निहित होती हैं, वैसे ही परब्रह्म अखिल ब्रह्माण्डोत्पादिनी शक्तियोंको साथ लेकर प्रलयावस्थामें शयन करते हैं। यहाँ ब्रह्मका शयन वास्तविक न होकर सुप्तशक्तियोंके कारण औपचारिक है; क्योंकि ‘भागवत’ में ही अन्यत्र ब्रह्मको ‘सुप्तशक्तिरसुप्तदृक्’ (श्रीमद्भा० ३।५।२४) कहा गया है। ‘सुप्ताः शक्तयो यत्र असौ सुप्तशक्तिः’ इस तरह प्रलयावस्थामें शक्तियाँ विद्यमान होती हुई भी कार्यकरणक्षम नहीं रहतीं। ब्रह्म तो अखण्ड, अनन्त, स्वप्रकाशबोधस्वरूप होनेसे ‘असुप्तदृक्’ है। उपनिषदोंने भी कहा है कि ‘द्रष्टा- सर्वभासककी दृष्टिका स्वरूपभूत अखण्डभानका लोप कभी नहीं होता। हाँ, भगवान् भी महाप्रलयकालमें प्रपंचोत्पादनादि व्यापारसे विवर्जित होनेसे शयन-से सोते हुए-से प्रतीत होते हैं। उस अखण्ड अनन्तबोधका— ज्ञानका भी अस्त-उदय नहीं होता, वह सदा ही एकरस बना रहता है’—‘नास्तमेति न चोदेति।’ घटादिकी उत्पत्तिके पूर्व कुलालको उनका ज्ञान रहता है, फिर तदनुसार वह घटादिको उत्पन्न करता है। ‘आसीज्ज्ञानमथो ह्यर्थ एकमेवाविकल्पितम्।’ (श्रीमद्भा० ११।२४।२) अर्थात् प्रलयावस्थामें शुद्ध ज्ञान और प्रकृति-प्रपंचरूप अर्थ दोनों मिले हुए ही थे। यहाँ ज्ञान पदसे घटादि ज्ञान नहीं, अपितु ‘सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म’ यह ज्ञान लिया गया है। इस तरह समस्त दार्शनिक सिद्धान्तानुसार अपनी समस्त शक्तियोंके साथ आत्माका सो जाना ही निरोध है, परंतु कुछके मतानुसार अखिल विश्वका विस्मरणपूर्वक भगवान्‌में मनकी तन्मयता ही निरोध है। भगवान्‌के श्रीचरणोंमें अनुराग होना लोकोत्तर सौभाग्य है पहले प्रेमास्पदके अद्भुत गुण, उसकी अद्भुत अचिन्त्य महिमा एवं ऐश्वर्यके ज्ञान तथा सौरस्य, सौगन्ध्य आदिके अनुभवसे उसमें राग होता है। विष्णुसहस्रनाम, गीता आदिमें अनुराग होनेके लिये पहले उनके माहात्म्य-पाठका विधान है। अतः यहाँ भी पहले अध्यायोंमें पूतना-वध, गोवर्द्धनोद्धारण आदिसे भगवान् श्रीकृष्णमें राग-प्रेम उत्पन्न होनेके लिये उनका महत्त्व बतलाया गया है। यहाँ आसक्तिनिरोधका वर्णन है और व्यसननिरोध रासलीलाके बाद युगलगीतमें वर्णन किया गया है। राग, आसक्ति एवं व्यसन वैसे तो निन्द्य एवं त्याज्य ही हैं, किंतु कहीं-कहीं आलम्बनकी महत्तासे इनका महत्त्व बढ़ जाता है। लौकिक स्त्री, पुत्र, धनादिमें राग एवं आसक्ति पतनका मूल है, किंतु यही राग और आसक्ति यदि भगवान्‌के श्रीचरणोंमें हो जाय तो क्या कहना है, ऐसा तो किसी महानुभावको ही लोकोत्तर सौभाग्य हो सकता है।