भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
शुद्धिहीनमाक्षेपकम्पौ च किलासगुल्मौ । कुष्ठानि शूलं किल वातशोथं पाण्डुं प्रमेहञ्च भगन्दरञ्च ।।७२।।
Line 20: विषोपमं रक्तविकारवृन्दं क्षयञ्च कृच्छ्राणि कफज्वरञ्च । मेहाश्मरीविद्रधिमुष्करोगान् नागोऽपि कुर्यात्कथितान्विकारान् ।।७३।।
Line 21: अशुद्ध वङ्ग के दोष-बिना शोधा हुआ वङ्ग-आक्षेपक वात, कम्पवात, किलास (कुष्ठभेद), गुल्म, सभी प्रकार
Line 22: के कुष्ठ, शूल, वातसम्बन्धी शोथ, पाण्डु, प्रमेह, भगन्दर, विष के समान, रक्त सम्बन्धी अनेक प्रकार के विकार, क्षय,
Line 23: मूत्रकृच्छ्र आदि मूत्र रोग, कफज्वर, मेह, पथरी, विद्रधि और अण्डकोष सम्बन्धी रोगों को दूर करता है। इसी भाँति बिना Wait, "रोगों को दूर करता है"? Wait, look at line 23: "मूत्रकृच्छ्र आदि मूत्र रोग, कफज्वर, मेह, पथरी, विद्रधि और अण्डकोष सम्बन्धी रोगों को दूर करता है।" Wait, does it say "दूर करता है" or "पैदा करता है" or "
१८० भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे ततो द्वियाममात्रेण वङ्गं भस्म प्रजायते। अथ भस्मसमं तालं क्षिप्त्वाऽम्लेन विमर्दयेत् ॥७६॥ ततो गजपुटे पत्त्वा पुनरम्लेन मर्दयेत्। तालेन दशमांशेन याममेकं ततः पुटेत्। एवं दशपुटै पक्वं वङ्गं भवति मारितम् ॥७७॥ राँगा के मारण की विधि-मिट्टी के पात्र में गलाये हुये राँगे में इसका चतुर्थांश इमली तथा पीपल की छाल का चूर्ण डाल कर लोहे की कलछुल्ली से चलावे। उसके बाद उक्त रीति से दो प्रहर (६ घण्टे) तक चलाने से रांगा भस्म हो जाता है। फिर उस भस्म में उसके बराबर ही हरताल डाल कर अम्लपदार्थ (नींबू आदि) के रस के साथ खूब खरल कर उसे गजपुट की आग में पकावे। पक जाने के बाद पुनः दशवाँ भाग हरताल डाल कर अम्लपदार्थ के रस के साथ एक प्रहर तक खरल करे, तत्पश्चात् पुनः गजपुट की आग में पकाये। इस भाँति १० पुट देकर पकाने से वङ्ग (राँगा) अच्छी तरह मर जाता है ॥७५-७७॥ ❖ चिञ्चा=तिन्तिडी। रजः=चूर्णम्। अयोदर्वी=(लौहहाता) ॥७५-७७॥ ७५ वें श्लोक में 'चिञ्चा' पद से 'इमली' तथा 'रजः' पद से 'चूर्ण' और 'अयोदर्वी' पद से 'कलछुल्ली (लौहहाता)' अर्थ समझना चाहिये ॥७५-७७॥ अथ मारितवङ्गस्य गुणानाह- वङ्गं लघु सरं रूक्षं कुष्ठं मेहकफक्रिमीन्। निहन्ति पाण्डुं सश्वासं नेत्र्यमीषत् पित्तलम् ॥७८॥ सिंहो गजौघं तु यथा निहन्ति तथैव वङ्गोऽखिलमेहवर्गम्। देहस्य सौख्यं प्रबलेन्द्रियत्वं नरस्य पुष्टिं विदधाति नूनम् ॥७९॥ मारे हुए राँगा के गुण-मारा हुआ राँगा-लघु, सारक, रूक्ष एवं कुष्ठ, प्रमेह, कफ, कृमि, पाण्डु तथा श्वास रोग को दूर करने वाला, नेत्रों के लिये हितकर तथा किञ्चित् पित्तकारक होता है। जिस प्रकार सिंह हाथियों के समूह को नष्ट कर देता है उसी प्रकार मारा हुआ राँगा भी संपूर्ण मेह रोग के समूह को नष्ट करता है और मनुष्यों के देहसम्बन्धी सुख, पुष्टि तथा इन्द्रियों की प्रबलता को निश्चित रूप से करने वाला होता है ॥७८-७९॥ अथ यशदस्य स्वरूपं गुणांश्चाह- यशदं गिरिजं तस्य दोषाः शोधनमारणे। वङ्गस्येव हि बोद्धव्या गुणांस्तु गणयाभ्यथ ॥८०॥ यशदं च सरं तिक्तं शीतलं कफपित्तहृत्। चक्षुष्यं परमं मेहान् पाण्डुं श्वासञ्च नाशयेत् ॥८१॥ सीसे का स्वरूप-जस्ता (सीसा) भी पर्वत पर ही उत्पन्न होता है। अतः इसके दोष तथा शोधन और मारण की विधि पूर्वोक्त राँगे के समान ही समझना चाहिये। सीसे के गुण-सीसासारक, तिक्तरसयुक्त, शीतल नेत्रों के लिये अत्यन्त हितकार एवं कफ तथा पित्त को दूर करने वाला और सभी प्रकार के मेहरोग, पाण्डु-तथा श्वास को नष्ट करने वाला होता है ॥८०-८१॥ अथ सीसकस्य शोधनविधिमाह- तस्य साहजिका दोषा वङ्गस्येव निदर्शिताः। शोधनञ्चापि तस्येव भिषग्भिर्गदितं पुरा ॥८२॥ सीसा के शोधन विधि-सीसा के जो स्वाभाविक दोष हैं वे सब राँगा के समान ही होते हैं। अतः प्राचीन वैद्यों ने इसका शोधन भी राँगा के समान ही बतलाया है ॥८२॥ अथ सीसकस्य मारणबिधिमाह- ताम्बूलरससम्पिष्टं शिलालेपात् पुनः पुनः। द्वात्रिंशद्भिः पुटैर्नागो निरुत्थं भस्म जायते ॥८३॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA
अथ तृतीयं धात्वादिशोधनमारणविधिप्रकरणम् ९८१ सीसा के मारने की विधि- पान के रस के मैनसिल को बारीक चटनी सा पीस ले और सीसे पर उसी का चारो- तरफ लेकर गजपुट की अग्नि में पका ले। तत्पश्चात् पुनः निकाल कर उक्त मैनशिल का प्रलेप करके गजपुट में पकावे, इस प्रकार ३२ पुट देने से सीसे की निरुत्थ (पुनः नहीं जीवित होने वाली) भस्म तैयार हो जाती है ॥८३॥ ❖ शिला=मनःशिलाः ।।८३।। यहाँ शिला' से 'मैनशिल' का ग्रहणकरना चाहिये ॥८३॥ अथापरं सीसकमारणविधिमाह- अश्वत्थचिञ्चात्वक्चूर्णं चतुर्थांशेन निक्षिपेत्। मृत्पात्रे विद्रुतो नागो लोहदर्व्या प्रचालितः ।।८४।। यामैकेन भवेद्भस्म तत्तुल्या स्मान्मनःशिला । काञ्जिकेन द्वयं पिष्ट्वा पचेद्गजपुटेन च ।।८५।। स्वाङ्गशीतं पुनः पिष्ट्वा शिलया काञ्जिकेन च। पुनः पचेच्छरावाभ्यामेवं षष्ठिपुटैर्मृतिः ।।८६।। सीसा मारने की दूसरी विधि-मिट्टी के पात्र में सीसे को गला कर उसमें सीसे का चतुर्थांश पीपल तथा इमली के छाल का चूर्ण मिला कर एक पहर तक लोहे की कलछुली से चलाता रहे। ऐसा करने से सीसा भस्म हो जाता है। तत्पश्चात् उस भस्म में उसके बराबर ही मैनसिल मिला कर कांजी के साथ पीस कर गजपुट की आग में पकावे, पश्चात् स्वयं शीतल हो जाने पर निकाल कर पुनः पूर्वोक्त रीति से दो शराव (कोसा) के अन्दर रखकर मैनसिल मिला कर कांजी से पीसकर गजपुट की आग में पकावे। इसी भाँति ६० पुट की आँच देने से सीसा मर जाता है ॥८४-८६॥ अथ मारितसीसकस्य गुणानाह- सीसं रङ्गगुणं ज्ञेयं विशेषान्मेहनाशनम् ।।८७।। नागस्तु नागशततुल्यबलं ददाति व्याधिं च नाशयति जीवनमातनोति । वह्निं प्रदीपयति कामबलं करोति मृत्युञ्च नाशयति सन्ततसेवितः सः ।।८८।। मारे हुये सीसा के गुण-सीसा के गुण यद्यपि राँगा के समान ही होते हैं तथापि यह विशेष कर मेह्रोगनाशक होता है। सीसा निरन्तर सेवन करने से सौ हाथियों के समान बल देने वाला, रोगनाशक, जीवन को बढ़ाने वाला, अग्नि को प्रदीप्त करने वाला, कामशक्ति को बढ़ाने वाला तथा मृत्यु को दूर करने वाला होता है ॥८७-८८॥ अथाशुद्धलौहस्य दोषानाह- खञ्जत्वकुष्ठामयमृत्युकारी हृद्रोगशूलौ कुरुतेऽश्मरीञ्च । नानारुजानां च तथा प्रकोपं कुर्याच्च हल्लासमशुद्धलौहम् ।।८९।। अशुद्ध लोहा के दोष-अशुद्ध लोहा खञ्जता (लँगड़ापन), कुष्ठरोग, मृत्यु, हृद्रोग, शूल, पथरी, हल्लास (उबकाई) तथा अनेक प्रकार के रोगों की उत्पत्ति करता है ॥८९॥ अथ लौहस्य दोषशान्तये शोधनविधिमाह- पत्तलीकृतपत्राणि लौहस्याग्नौ प्रतापयेत् । निषिञ्चेत्तप्ततप्तानि तैले तक्रे च काञ्जिके ।।९०।। गोमूत्रे च कुलत्थानां कषाये च त्रिधा त्रिधा। एवं लौहस्य पत्राणां विशुद्धिः संप्रजायते ।।९१।। लोहा के दोष की शान्ति के लिये शोधनविधि-प्रथम लोहे के अत्यन्त पतले-पतले पत्तरों को लेकर अग्नि में पकावे, तत्पश्चात् तपे हुये उन सबों को क्रम से तिल का तेल, तक्र, कांजी, गोमूत्र तथा कुलथी के क्वाथ में प्रत्येक में तीन-तीन बार तपा-तपा कर बुझावे। ऐसा करने से लोहा के पत्तरों की शुद्धि होती है ॥९०-९१॥ अथ लौहस्य मारणविधिमाह- शुद्धं लौहभवं चूर्णं पातालगरुडीरसैः । मर्दयित्वा पुटेद्द्वौ दद्यादेवं पुटत्रयम् ।।९२।। पुटत्रयं कुमार्याश्च कुठारच्छिन्त्रिकारसैः । पुटषट्क ततो दद्यादेवं तीक्ष्णमृतिर्भवेत् ।।९३।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
१८४ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे लोहा के मारण विधि—शुद्ध किये हुये लोहे के चूर्ण को पातालगरुडी के रस में खूब खरल करके शराव के संपुट में रख गजपुट की आग में पकावे, पुनः शीतल होने पर निकाल कर उक्त रस से मर्दन कर पुनः गजपुट की आग में पकावे इस भाँति ३ बार गजपुट की आग में पकाने के बाद पुनः घीकुवार के रस में मर्दन कर ३ बार गजपुट में पकावे इसके बाद कुठारच्छिन्निका (कोरैया) के रस में मर्दन कर ६ बार गजपुट की आग में पकाने से लोहा का मारण होता है। अन्यच्च- क्षिपेच्च द्वादशांशेन दरदं तीक्ष्णचूर्णतः । सदयेत्कन्यकाद्रावैर्यामयुग्मं ततः पुटेत् । एवं सप्तपुटैर्मृत्युं लौहचूर्णमवाप्नुयात् ॥ ९४॥ लौह मारण का दूसरा प्रकार—लोहे के चूर्ण में बारहवाँ भाग सिंगरफ डाल कर घीकुवार के रस में २ प्रहर (६ घंटे) तक खूब खरल करे, उसके बाद गजपुट में रख फूँक दे इस प्रकार सातबार फूँकने से लोहा का मारण हो जाता है ॥९४॥ लोहमारणस्य तृतीयं विधिमाह- सत्योऽनुभूतो योगेन्द्रैः क्रमोऽन्यो लोहमारणे । कथ्यते रामराजेन कौतूहलधियाऽधुनाः ॥ ९५॥ सूतकाद् द्विगुणं गन्धं दत्त्वा कुर्याच्च कज्जलीम् । द्वयोः समं लौहचूर्ण मर्दयेत्कन्यकाद्रवैः ॥ ९६॥ यामयुग्मं ततः पिण्डं कृत्वा ताम्रस्य पात्रके । घर्मे धृत्वा रूवूकस्य पत्रैराच्छादयेद् बुधः ॥ ९७॥ यामत्रयाद्बवेदुष्णं धान्यराशौ न्यसेत्ततः । दत्त्वोपरि शरावं तु त्रिदिनान्ते समुद्धरेत् ॥ ९८॥ पिष्ट्वा च गालयेद्वस्त्रादेवं वारितरं भवेत् । दाडिमस्य दलं पिष्ट्वा तच्चतुर्गुणवारिणा ॥ ९९॥ तद्रसेनायसं चूर्ण शश्नीय प्लावयेदिति । आतपे शोषयेत्तञ्च पुटेदेवं पुनः पुनः ॥ १००॥ एकविंशतिवारैस्तन्म्रियते नात्र संशयः । एवं सर्वाणि लोहानि स्वर्णादीन्यपि मारयेत् ॥ १०१॥ लोहामारण की तीसरी विधि—लोहा के मारण करने में बड़े-बड़े योगियों के द्वारा सचमुच अनुभव किया हुआ एक विधि और है जिसे कि इस समय कौतुकबुद्धि से रामराज नामक वैद्य कह रहे हैं। पारा से दूना गन्धक लेकर उसकी कज्जली बना ले तत्पश्चात् उस कज्जली में उसके बराबर शुद्ध लोहे का चूर्ण मिलाकर घीकुवार के रस में २ प्रहर (६ घंटे) तक खरल करे उसके बाद उन सबों का एक पिण्ड बना कर तांबे के बर्तन में रख एरण्ड के पत्ते से उसे ढक कर घाम (धूप) में २ प्रहर (६ घंटे) तक रख दे फिर धूप से गर्म हुये उसके ऊपर पत्तों को हटा कर शराव रखकर मुख बन्द कर धान्य की राशि के अन्दर गाड़ दे, जब तीन दिन हो जाय तब निकाल कर उक्त पिण्ड को पीस कर कपड़े से छान ले। यह लोहे का चूर्ण ऐसा हल्का हो जाता है कि जल पर तैरने लगता है। इसके बाद चूर्ण को चौगुने जल में पिसे हुए अनार के पत्तों के रस से खूब भिगोकर धूप में सुखावै तत्पश्चात् गजपुट में फूँक दे। शीतल हो जाने पर निकाल कर पुनः उक्त रस में भिगो कर धूप में सुखाकर गजपुट में फूँके। इस तरह २१ बार पुट में रखकर फूँकने से सभी प्रकार के लोहा तथा सोना आदि भी मर जाते हैं। इसमें कोई संशय नहीं॥ अथ मारितलौहस्य गुणानाह- लौहं तिक्तं सरं शीतं कषायं मधुरं गुरु । रूक्षं वयस्यं चक्षुष्यं लेखनं वातलं जयेत् ॥ १०२॥ कफं पित्तं गरं शूलं शोफार्शःप्लीहपाण्डुताः भेदोमेहकृमीन् कुष्ठं तत्किटं तद्वदेव हि ॥ १०३॥ मारे हुए लोहे के गुण—मारा हुआ लोहा-तिक्त, कषाय तथा मधुररसयुक्त, सारक, शीतल, गुरु, रूक्ष, अवस्था को स्थिर रखने वाला, नेत्रों के लिये हितकर, लेखन, वातकारक एवं कफ, पित्त, गरसंज्ञक विष, शूल, शोथ, बवासीर, प्लीहा, पाण्डु, मेद, प्रमेह, क्रिमि तथा कुष्ठ को नष्ट करने वाला होता है। इसी प्रकार लोहे के कीट (मण्डूर) में भी ये सब गुण रहते हैं ॥१०२-१०३॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA
अथ तृतीयं धात्वादिशोधनमारणविधिप्रकरणम् १८३ अथ लौहभस्मभक्षणे मात्रामाह- गुञ्जामेकां समारभ्य यावत्स्युर्नवरक्तिकाः । तावल्लोहं समश्नीयाद्यथादोषानलं नरः ।।१०४।। लौहभस्म खाने की मात्रा-एक रत्ती से आरम्भ कर बढ़ाते-बढ़ाते नौ रत्ती तक मनुष्य दोष तथा अग्नि के अनुसार विचार कर यथायोग्य लौह भस्म का सेवन करे ।।१०४।। अथ लौहसेवनसमये वर्जनीयद्रव्याण्याह- कूष्माण्डं तिलतैलं च भाषान्नं राजिकां तथा । मद्यमम्लरसञ्चैव वर्जयेल्लोहसेवकः ।।१०५।। लौहभस्म खाने के समय त्याग करने योग्य द्रव्य-पेठा, तिल का तेल, उड़द, राई, मद्य, अम्लरस युक्त पदार्थ (इमली आदि) इन सबों का लौहभस्म खाने वाला व्यक्ति परित्याग कर देवे । अथ सर्वधातूनां मारणे साधारणविधिमाह- शिलागन्धार्कदुग्धाक्तः स्वर्णाद्याः सर्वधातवः । म्रियन्ते द्वादशपुटैः सत्यं गुरुवचो यथा ।। सब धातुओं के मारने की साधारण विधि-सोना आदि सभी धातु यदि मैनसिल तथा गन्धक को आक के दूध में महीन पीसकर और उसी कल्क से लपेट कर गजपुट में रख कर फूंक दिये जावें और शीतल होने पर पुनः उक्त कल्क से लपेट कर फूँके जावें तो इसी भाँति १२ बार फूँकने से भर जाते हैं । जैसे सद्गुरु का वचन सत्य होता है वैसे ही यह सत्य है ।।१०६।। अथोपधातूनां मारणप्रकारमाह- तत्राशुद्धस्वर्णमाक्षिकस्य दोषानाह- मन्दानलत्वं बलहानिमुग्रां विष्टम्भितां नेत्रगदान् सकुष्ठान् । भालां तथैव व्रणपूर्विकाञ्च कुर्यादशुद्धं खलु माक्षिकञ्च ।।१०७।। अशुद्ध 'स्वर्णमाक्षिक' (सोनामाखी) के दोष—अशुद्ध सोनामाखी-अग्नि की मन्दता, बल की हानि, अत्यन्त विष्टम्भ, नेत्रसम्बन्धी रोग, कुष्ठ, गण्डमाला तथा अनेक प्रकार के व्रणों को उत्पन्न करने वाली होती है ।।१०७।। अथ स्वर्णमाक्षिकस्य शोधनविधिमाह- माक्षिकस्य त्रयो भागा भागैकं सैन्धवस्य च । मातुलुङ्गद्रवैर्वाऽथ जम्बीरस्य द्रवैः पचेत् ।।१०८।। चालयेल्लौहजे पात्रे यावत्पात्रं सुलोहितम् । भवेत्ततस्तु संशुद्धिं स्वर्णमाक्षिकमृच्छति ।।१०९।। सोनामाखी शोधने की विधि-३ भाग सोनामाखी और एक भाग सेन्धानमक लेकर दोनों की बिजौरा अथवा जमीरी नींबू के रस के साथ लोहे के पात्र में रख कर पकावे और तब तक लोहे की करछुली से चलाता रहे जब तक लोहे का पात्र अच्छी तरह लाल न हो जाय । तदुपरान्त उतार कर सोनामाखी को अलग कर ले । ऐसा करने से सोनामाखी शुद्ध हो जाती है ।।१०८-१०९।। अथ स्वर्णमाक्षिकस्य मारणविधिमाह- कुलत्थस्य कषायेण घृष्ट्वा तैलेन वा पुटेत् । तक्रेण वाऽऽजमूत्रेण म्रियते स्वर्णभाक्षिकम् ।। सोनामाखी मारने की विधि-शुद्ध सोनामाखी को कुलथी के क्वाथ, तिल का तेल, तक्र (छाछ) या बकरे के मूत्र में घिस (खरल) कर अग्नि की पुट देवे तो वह (सोनामाखी) मर जाती है ।।११०।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
१८४ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे अथ तारमाक्षिकस्य शोधनविधिमाह- स्वर्णमाक्षिकवद्दोषा विज्ञेयास्तारमाक्षिके। अतस्तद्दोषशान्त्यर्थं शोधनं तस्य कथ्यते ।।१११।। कर्कोटीमेषशृङ्ग्युत्थैरार्द्रवैर्जम्बीरजैर्दिनम्। भावयेदातपे तीव्रे विमला शुद्ध्यति ध्रुवम् ।।११२।। रूपामाखी शोधने की विधि-सोनामाखी के जो दोष कहे हुए हैं वे ही रूपामाखी के भी समझने चाहिये। अतः उन सब दोषों को शान्त करने के लिये रूपामाखी के शोधने की विधि कहते हैं। रूपामाखी को एक दिन तक खेखसा, मेढ़ासि (शृ) ङ्गी तथा जमीरी नीबू के रस से भावना देकर तीव्र धूप में सुखाने से रूपामाखी शुद्ध हो जाती है ॥१११-११२॥ ❖ कर्कोंटी=खेखसा। मेषशृङ्गी। विमला=तारमाक्षिका ।।१११-११२।। यहाँ 'कर्कोंटी' पद से 'खेखसा' और 'मेढ़ाशृङ्गी' तथा 'विमला' पद से 'रूपामाखी का' ग्रहण करना चाहिये ।।१११- ११२॥ अथ तारमाक्षिकस्य मारणविधिमाह- कुलत्थस्य कषायेण घृष्ट्वा तैलेन वा पुटेत्। मरणं वाऽऽजमूत्रेण तारमाक्षिकमृच्छति ।।११३।। रूपामाखी के मारने की विधि-कुलथी का क्वाथ, तिल का तेल, तक्र या बकरे के मूत्र से रूपामाखी को घिस (खरल) करके अग्नि की आँच देने से रूपामाखी मर जाती है ।।११३।। अथ स्वर्णमाक्षिकरूप्यमाक्षिकयोर्विशेषगुणानाह- न केवलं स्वर्णरूप्यगुणास्तापीजयोर्मताः। द्रव्यान्तरस्य संसर्गात्सन्त्यन्येऽपि गुणास्तयोः ।।११४।। माक्षिकं मधुरं तिक्तं स्वर्यं वृष्यं रसायनम् ।।११५।। चक्षुष्यं बस्तिरुक्कुष्ठपाण्डुमेहविषोदरम्। अर्शः शोफं क्षयं कण्डूं त्रिदोषञ्च नियच्छति ।।११६।। सोनामाखी तथा रूपामाखी के विशेष गुण-केवल सोना तथा चाँदी के ही गुण क्रम से सोनामाखी तथा रूपामाखी में नहीं रहते हैं किन्तु दूसरे-दूसरे द्रव्यों का भी संयोग होने से उनके भी गुण रहते हैं। गुण-सोनामाखी तथा रूपामाखी-मधुर तथा तिक्तरसयुक्त, स्वर को उत्तम करने वाली, वीर्यवर्धक, रसायन, नेत्रों के लिये हितकर एवं बस्तिसम्बन्धी रोग, कुष्ठ, पाण्डु, मेहरोग, विष, उदररोग, बवासीर, शोथ, क्षय, खुजली तथा त्रिदोष को नष्ट करने वाली होती है ।। अथाशुद्धतुत्थस्य शोधनविधिमाह- विष्ठया मर्दयेत्तुत्थं मार्जारिककपोतयोः। दशांशं टङ्कणं दत्त्वा पचेल्लघुपुटे ततः। पुटं दध्ना पुटं क्षौद्रैर्देयं तुत्थविशुद्धये ।।११७।। अशुद्ध तूतिया के शोधन की विधि-बिल्ली और कबूतर की विष्ठा के साथ तूतिया को खरल कर उसी में दशवाँ भाग सुहागा भी डाल कर खरल कर हलकी आग की पुट देवे तदुपरान्त पहले दही के साथ और अन्त में शहद के साथ भी खरल करके पुट देने से तूतिया शुद्ध हो जाता है ।।११७।। अथ शुद्धतुत्थखर्परयोर्गुणानाह- तुत्थकं कटुकं क्षारं कषायं वामकं लघु ।।११८।। लेखनं भेदनं शीतं चक्षुष्यं कफपित्तहृत्। विषाश्मकुष्ठकण्डूघ्नं तद्गुणं खर्परं मतम् ।।११९।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA
अथ तृतीयं धात्वादिशोधनमारणविधिप्रकरणम् १८५ शुद्ध तूतिया के गुण-शुद्धतूतिया-कटु तथा कषायरसयुक्त, खारा, वमन कराने वाला, लघु, लेखन, मल का भेदन करने वाला, शीतल, नेत्रों के लिये हितकर एवं कफ, पित्त, विष, पथरी, कुष्ठ तथा खुजली को दूर करने वाला होता है इसी प्रकार शुद्ध खपरिया के भी ये ही सब गुण हैं ॥११८-११९॥ अथ कांस्यपित्तलयोः शोधनविधिमाह- पत्तलीकृतपत्राणि कांस्यस्याग्नौ प्रतापयेत् । निषिञ्चेत्तप्ततप्तानि तैले तक्रे च काञ्जिके ॥१२०॥ गोमूत्रे च कुलत्थानां कषायेऽत्र त्रिधा त्रिधा । एवं कांस्यस्य रीतेश्च विशुद्धिः सम्प्रजायते ।। काँसा तथा पीतल के शोधन की विधि-काँसा के पतले-पतले पत्तरों को प्रथम आग में तपाले, पश्चात् उन्हें तपा-तपा कर तिल का तेल, तक्र, कांजी, गोमूत्र तथा कुलथी के क्वाथ में क्रम से प्रत्येक में तीन-तीन बार बुझावे, ऐसा करने से काँसे की शुद्धि हो जाती है । इसी प्रकार पीतल के पत्तरों की भी शुद्धि की जाती है ॥१२०-१२१॥ अथ तयोर्मारणविधिमाह- अर्कक्षीरेण सम्पिष्टो गन्धकस्तेन लेपयेत् । समेन कांस्यपत्राणि शुद्धान्यम्लद्रवैर्मुहुः ॥१२२॥ ततो मूषापुटे धृत्वा पचेद्गजपुटेन च । एवं पुटद्वयात् कांस्यं रीतिश्च म्रियते ध्रुवम् ॥१२३॥ काँसा तथा पीतल के मारने की विधि-प्रथम आक के दूध में पिसे हुये गन्धक के तौल के बराबर काँसे के शुद्ध किये हुये पत्तरों को लेकर अम्ल पदार्थ नींबू आदि के रस से बारम्बार लगाकर खूब साफ कर ले पश्चात् उन सबों पर उक्त गन्धक का लेप कर के मूषा (घरिया) के संपुट के अन्दर रख कर सन्धियों को कपड़मिट्टी से बन्द कर और सुखा कर गजपुट की आँच में पकावे, इस तरह दो बार पुट देने से काँसा मर जाता है । इसी भाँति शुद्ध पीतल के पत्तरों का भी मारण होता है ॥१२२-१२३॥ अथ मारितकांस्यरीत्योर्गुणानाह- कांस्यं कषायं तीक्ष्णोष्णं लेखनं विशदं सरम् । गुरु नेत्रहितं रूक्षं कफपित्तहरं परम् ॥१२४॥ रीतिका तु भवेद् रूक्षा सतिक्ता लवणा रसे । शोधनी पाण्डुरोगघ्नी कृमिहृन्नातिलेखनी ॥१२५॥ मारे हुये काँसा तथा पीतल के गुण-काँसा-कषायरसयुक्त, तीक्ष्ण, उष्ण, लेखन तथा विशदगुणयुक्त, सारक, गुरु, नेत्रों के लिये हितकर, रूक्ष एवं कफ तथा पिन का अत्यन्त नाशक होता है । पीतल-तिक्त तथा लवणरसयुक्त, रूक्ष, देह का शोधन करने वाला, पाण्डुरोगनाशक, कृमि को दूर करने वाला एवं अत्यन्त लेखनगुणयुक्त नहीं होता अर्थात् किंचित् लेखन गुण युक्त होता है ॥१२४-१२५॥ अथ सिन्दूरस्य शोधनबिधिमाह- दुग्धाम्लयोगतस्तस्य विशुद्धिर्गदिता बुधैः ॥१२६॥ सिन्दूर के शोधने की विधि-सिन्दूर को दूध तथा अम्लपदार्थ नींबू आदि के रस में दो प्रहर तक अलग-अलग खरल करने से उसकी शुद्धि होती है ॥१२६॥ अथ सिन्दूरस्य गुणानाह- सिन्दूर उष्णो वीसर्पकुष्ठकण्डूविषापहः । भग्नसन्धानजननो व्रणशोधनरोपणः ॥१२७॥ सिन्दूर के गुण-शुद्ध सिन्दूर-उष्ण, वीसर्प, कुष्ठ, खुजली तथा विष को दूर करने वाला, टूटी हुई हड्डियों को जोड़ने वाला तथा व्रण का शोधन एवं रोपण करने वाला होता है ॥१२७॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
९८६ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे अथ शिलाजतुनो लक्षणं शोधनविधिश्चाह- गोमूत्रगन्धवत्कृष्णं स्निग्धं मृदु तथा गुरु। तिक्तं कषायं शीतञ्च सर्वश्रेष्ठं तदायसम् ।।१२८।। शिलाजीत के लक्षण-जिसमें गोमूत्र के समान गन्ध हो तथा जो देखने में काले रङ्ग का हो एवं स्निग्ध, कोमल, गुरु, तिक्त तथा कषाय रसयुक्त और शीतल हो ऐसे शिलाजीत को उत्तम समझना चाहिये। यह लोहे का उपधातु है ।।१२८।।
- आयसम् = अयउपधातुसम्बन्धि ।। १२८ ।। यहाँ 'आयसम्' पद का 'लोहे का उपधातु' यह अर्थ समझना चाहिये ।।१२८।। विन्ध्यादौ बहुलं तत्तु यत्र लौहं यतोऽधिकम् । तच्छोधनमृते व्यर्थमनेकमलमेलनात् ।।१२९।। शिलाजतु समानीय सूक्ष्मं खण्डं विधाय च । निक्षिप्यात्युष्णपानीये यामैकं स्थापयेत्सुधीः ।।१३०।। मर्दयित्वा ततो नीरं गृह्णीयाद्वस्त्रगालितम् । स्थापयित्वा च मृत्पात्रे धारयेदातपे बुधः ।।१३१।। उपरिस्थं घनं यत्स्यात्तत्क्षिपेदन्यपात्रके । एवं पुनः पुनर्नोतं द्विमासाभ्यां शिलाजतु ।।१३२।। भवेत्कार्यक्षमं वह्नौ क्षिप्तं लिङ्गोपमं भवेत् । निर्धूमञ्च ततः शुद्धं सर्वकर्मसु योजयेत् ।।१३३।। शोधनविधि-यह (शिलाजीत) विन्ध्य आदि पहाड़ों पर अधिकतर पाया जाता है, क्योंकि वहाँ लोहा अधिक रूप से होता है। शिलाजीत में अनेक प्रकार के मलों का मेल होने से बिना शोधन किये हुए कार्य में लेने योग्य नहीं होता है। अतः प्रथम शिलाजीत को लाकर उसके छोटे-छोटे टुकड़े कर अत्यन्त गरम जल में एक प्रहर तक रहने दे पश्चात् उसी जल में उसे खूब मल कर कपड़े से छान ले और छने हुए जल को मिट्टी के पात्र में रख कर धूप में रख दे। तत्पश्चात् जो उसके ऊपर उतराया हुआ घन भाग हो उसे धीरे से निकाल कर एक दूसरे पात्र में रख दे इस तरह से बारम्बार ऊपर तैरते हुये मलाई के समान घन भाग को निकाल कर एक दूसरे पात्र में रखता जाय, इस भाँति दो मास तक करने से जब ऊपर की मलाई पड़नी बन्द हो जाय तब नीचे के काले बैठे हुये भाग को निकाल लेना चाहिये। यही भाग शिलाजीत का कार्य में लेने योग्य होता है और वह आग में डालने से लिङ्ग के समान हो जाता है तथा उससे धूआँ नहीं निकलता। ऐसा जब शिलाजीत हो जाता है तब उसे शुद्ध समझना चाहिये और हर एक कार्य में उसका प्रयोग करना चाहिये ।।१२९-१३३।। अथान्यं प्रकारमाह- तत्र प्रथमतस्तस्य बहिर्मलमपाकर्त्तुं केवलजलेन प्रक्षालनं कर्त्तव्यं, ततस्तदन्तर्गतमृत्ति, कासिकतादि- दोषदूरीकरणाय वक्ष्यमाणक्वाथेन तत्र भावना देयेत्यत्र वाग्भटस्य मतमाह, तद्यथा- व्याधिव्याधितसात्म्यं समनुसरन् भावयेद्वयःपात्रे । प्राक् केवलजलधौतं शुष्कं क्वाथैस्ततो भाव्यम् ।।१३४।। तुल्यं गिरिजेन जले वसुगुणिते भावनौषधं क्काथ्यम् । तत्क्वाथे पादांशे पूतोष्णे प्रक्षिपेद् गिरिजम् ।।१३५।। तत्समरसतां यातं संशुष्कं प्रक्षिपेद्रसे भूयः । स्वैः स्वैरैवं क्वाथैर्भाव्यं वारान् भवेत्तु सप्त ।।१३६।। अथ स्निग्धस्य शुद्धस्य वृतं तिक्तकसाधितम् । त्र्यहं युञ्जीत गिरिsurface गिरिर्जैकैकन तथा त्र्यहम् ।।१३७।। फलत्रयस्य यूषेण पटोल्या मधुकस्य च शिलाजमेवं देहस्य भवत्यत्युपकारकम् ।।१३८।। शिलाजीत शोधने की दूसरी विधि-प्रथम शिलाजीत के बाहरी मल को दूर करने के लिये उसे केवल जल से धोवे, उसके बाद उसके अन्दर रहने वाली मिट्टी, बालू आदि दोष को दूर करने के लिये आगे कहे जाने वाले क्वाथ से उसमें भावना देनी चाहिये। इसी विषय में 'वाग्भट' का मत यह है कि-रोग तथा रोगी के लिये जो सात्म्य अर्थात् हितकर द्रव्य हो उसका विचार करते हुये उसी द्रव्य के क्वाथ से शिलाजीत को लोहे के पात्र में रख कर भावना देनी CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA
अथ तृतीयं धात्वादिशोधनमारणविधिप्रकरणम् ९८७ चाहिये। उसका प्रकार यह है कि—प्रथम केवल जल से शिलाजीत को धोकर सुखा ले पश्चात् क्वाथ से भावना देवे और उस क्वाथ के बनाने में जिस द्रव्य का क्वाथ बनाना हो उसे शिलाजीत के बराबर भाग में लेकर अठगुने जल में पकावे और जब चतुर्थांश जल शेष रह जाय तब छान कर गरम-गरम रहते ही उसमें शिलाजीत को छोड़ दे। जब वह पानी में खूब घुल जाय तब सुखा डाले, पश्चात् पुनः उक्त प्रकार से दूसरा क्वाथ बना कर उसमें फिर से सूखे पूर्वोक्त शिलाजीत को डाल कर घुल जाने पर सुखा डाले इस प्रकार कुल सात भावना क्वाथ से दे। उसके बाद रोगी को स्निग्ध पदार्थों के द्वारा स्नेहन तथा विरेचनादि से शोधन करके उसे तिक्तक (अड़ूसा, नीम, गिलोय, कटेरी तथा परवल) द्रव्यों के कल्क से सिद्ध किया हुआ घी तीन दिन तक खिलावे तत्पश्चात् एक दिन त्रिफला के क्वाथ के साथ शिलाजीत खिलावे, दूसरे दिन परवर के जूस के साथ, तीसरे दिन मुलेठीके क्वाथ के साथ शिलाजीत खिलावे। इस तरह यदि शिलाजीत का प्रयोग किया जाय तो वह शरीर के लिये अत्यन्त उपकारक होता है ।।१३४-१३८।। अथ क्वाथ्यद्रव्याणां भावनाफलञ्चाह हारीतः- लोहस्थितं निम्बगुडूचिसर्पिर्यवैर्यथावत्परिभावयेत्तत्। सन्तानिकाकीटपतङ्गदंशदुष्टौषधीदोषनिवारणाय ।।१३९।। जिन द्रव्यों का क्वाथ बनाया जाता है उनकी भावना देने के फल के विषय में 'हारीत' का मतशिलाजीत के बाहर भाग में लगी हुई मिट्टी आदि की बनी हुई मलाई, कीट, पतङ्ग (फतिङ्गा), डाँस, मच्छर आदि तथा दुष्ट ओषधियों के दोष को दूर करने के लिये लोह के पात्र में शिलाजीत को देख कर नीम, गिलोय और जौ का क्वाथ एवं घी की यथोक्त रूप से भावना देवे ।।१३९।। ❖ सन्तानिका=तद्बहिःसंलग्नमृत्तिकादिमयी ।।१३९।। यहाँ 'सन्तानिका' पद का 'शिलाजीत के बाहरी भाग में लगी हुई मिट्टी आदि की बनी हुई मलाई' यह अर्थ समझना चाहिये ।।१३९।। एवं भावनां दत्त्वा संशोष्य केवलेन जलेन शोधनं कर्त्तव्यं तत्प्रकारमाहाग्निवेशः- उष्णे च काले रवितापयुक्ते व्यभ्रे निवाते समभूमिभागे । चत्वारि पात्राण्यसितायसानि न्यस्यातपे तत्र कृतावधानः ।।१४०।। शिलाजतु श्रेष्ठमवाप्य पात्रे प्रक्षिप्य तस्माद् द्विगुणञ्च तोयम् । उष्णं तदूर्ध्वं क्वथितञ्च दत्त्वा विशोधयेत्तन्मृदितं यथावत् ।।१४१।। ततस्तु यत्कृष्णमुपैति चोर्ध्वं सन्तानिकावद्रविरश्मितप्तम् । पात्रे तदन्यत्र ततो निदध्यात्तत्रापरं कोष्णजलं क्षिपेच्च ।।१४२।। पुनश्च तस्मादपरत्र पात्रे पश्चाच्च पात्रादपरत्र भूयः । यदा विशुद्धं जलमेवमूर्ध्वं कृष्णं समस्तं मलमेत्यधस्तात् । तदा त्यजेत्तत्सलिलं भलञ्च शिलाजतु स्याज्जलशुद्धमेवम् ।।१४३।। इस प्रकार भावना देकर और सुखा कर पश्चात् केवल जल से साफ करना चाहिये, उसका प्रकार 'अग्निवेश' महर्षि कहते हैं कि—ग्रीष्मऋतु में जब सूर्य का ताप (धूप) अधिक हो, आकाश मेघ से रहित दीख पड़ता हो तथा हवा न चलती हो ऐसे समय में किसी समतल भूमि पर धूप में काले लोहे के पात्र रख कर एक में उत्तम शिलाजीत सावधानी से लाकर रख दे और उसी में जो जलते-जलते आधा शेष रह गया हो ऐसा दूना गरम जल छोड़ दे तथा इसमें शिलाजीत को खूब मल कर मिला दे इसके बाद जो सूर्य की किरणों से तप कर ऊपर काली सी मलाई पड़ जावे उसे धीरे से उठा कर दूसरे लोहे के पात्र में रख कर पुनः उसमें गरम जल थोड़ा छोड़ दे फिर उसमें भी जब मलाई पड़ जाय तो उसे निकाल कर तीसरे लोहे के पात्र में रख कर पुनः उसमें भी गरम जल थोड़ा छोड़ दे, जब इसमें भी भलाई पड़ जाय तो उसे निकाल कर चौथे लोहे के पात्र में रख कर ऊपर से गरम जल कुछ छोड़ दे ऐसा करते-करते ऊपर केवल उत्तम निर्मल जल रह जाता है और काला मल नीचे बैठ जाता है। ऐसा जब हो जाय तब जल को निकाल कर फेंक दे और नीचे बैठा हुआ जो काला सा पदार्थ होता है वही जल से शुद्ध शिलाजीत होता है ।।१४०-१४३।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA
९८८ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे अथ शोधितशिलाजतुनो गुणानाह- शिलाजतु स्मृतं तिक्तं कटूष्णं कटुपाकि च । रसायनं योगवाहि श्लेष्ममेहाश्मशर्कराः ।। १४४ ।। मूत्रकृच्छ्रं क्षयं श्वासं शोधमर्शसि पाण्डुताम् । वातरक्तं तथा कुष्ठपस्मारोदरं हरेत् ।। १४५ ।। शुद्ध किये हुये शिलाजीत के गुण-शोधित शिलाजीत तिक्त तथा कटु रसयुक्त, उष्ण, विपाक में कटुरसयुक्त, रसायन, योगवाही और कफ, मेहरोग, पथरी, शर्करा, मूत्रकृच्छ्र, क्षय, श्वास, शोथ, बवासीर, पाण्डुरोग, वातरक्त, कुष्ठ, मिर्गी तथा उदर रोग को दूर करने वाला होता है ॥१४४-१४५॥ अथ रसस्य शोधनविधिमाह । तत्रादौ स्वेदनमाह- नानाधान्यैर्यथाप्राप्तैस्तुषवजैर्जलान्वितैः । मृद्भाण्डं पूरितं रक्षेद्यावदम्लत्वमाप्नुयात् ।। १४६ ।। तन्मध्ये भृङ्गराङ् मुण्डी विष्णुकान्ता पुनर्नवा । मीनाक्षी चैव सर्पाक्षी सहदेवी शतावरी ।। त्रिफला गिरिकर्णी च हंसपादी च चित्रकम् । समूलं कुट्टयित्वा तु यथालाभं विनिक्षिपेत् ।। रस के शोधने की विधियों में प्रथम स्वेदन की विधि-एक मिट्टी के पात्र में जितने धान्य उस समय मिल सकें उन सबों की भूसी अलग कर केवल धान्यों को रखकर ऊपर से जल भी पूर्णरूप से भरकर तक रख दे जब तक खट्टापन न आजावे अर्थात् कांजी न बन जाय पश्चात् उस कांजी युक्त पात्र में भांगरा, गोरखमुण्डी, कोयल, पुनर्नवा, मछेछी, सरहटी, सहदेई, शतावर, त्रिफला (हरड़ बहेरा, आँवला), सफेद फूल की कोयल, हंसराज और चीता इन सबों को जहाँ तक मिल सके वहाँ तक जड़ के सहित ही कूट कर डाल दे ॥१४६-१४८॥ ❖ विष्णुकान्ता गिरिकर्णी चापराजितैव श्वेतनीलपुष्पभेदात् ।। १४६-१४८ ।। यहाँ 'विष्णुकान्ता तथा गिरिकर्णी' इन दोनों से श्वेत तथा नील फूलों के भेद से कोई दो प्रकार की अपराजिता (कोयल) होती है उसी का ग्रहण करना चाहिये ॥१४६-१४८॥ पूर्वाम्लभाण्डमध्ये तु धान्याम्लकमिदं स्मृतम् । स्वेदनादिषु सर्वत्र रसराजस्य योजयेत् । अत्यम्लमारनालं वा तदभावे प्रयोजयेत् ॥१४९॥ पूर्वोक्त कांजी युक्त पात्र में उक्त ओषधियों के छोड़ने से उस कांजी का नाम 'धान्याम्लक' होता है। उसका पारा के स्वेदन आदि कार्यों में सर्वत्र प्रयोग किया जाता है। धान्याम्ल के अभाव में अत्यन्त खट्टी कांजी का भी प्रयोग किया जाता है ॥१४९॥ ❖ तदभावे=धान्याम्लाभावे ।। १४९ ।। यहाँ 'तदभावे' पद का 'धान्याम्ल के अभाव में' यह अर्थ करना चाहिये ॥१४९॥ त्र्यूषणं लवणं राखी रजनी त्रिफलाऽऽर्द्रकम् । महाबला नागबला मेघनादः पुनर्नवा ।। १५० ।। मेषशृङ्गी चित्रकञ्च नवसारं समं समम् । एतत्समस्तं व्यस्तं वा पूर्वाम्लेनैव पेषयेत् ।। १५१ ।। प्रलिम्पेत् तेन कल्केन वस्त्रमङ्गुलमात्रकम् ।। १५२ ।। तन्मध्ये निक्षेपेत्सूतं बद्ध्वा तत्त्रिदिनं पचेत् । दोलायन्त्रेऽम्लसंयुक्ते जायते स्वेदितो रसः ।। इसके बाद सोंठ, पीपर, मिर्च, सेंधा नमक, राई, हरदी, त्रिफला (हरड़, बहेरा, आँवला), अदरक, महाबला (सहदेई, नागबला (गंगेरन), चौलाई (शाक), पुनर्नवा, मेढ़ाशृङ्गी, चीता, नवसादर इन सबों को समान भाग लेकर एकत्र अथवा अलग-अलग उक्त धान्याम्लक से पीस कर कल्क सा बना ले और उसी कल्क से एक वस्त्र के ऊपर एक अंगुल
अथ तृतीयं धात्वादिशोधनमारणविधिप्रकरणम्. १८९ मोटा लेप करके उसी के अन्दर पारे को बाँध कर कांजी भरे हुये दोलायन्त्र में लटका कर तीन दिन तक पकावे, ऐसा करने से पारे का स्वेदन होता है ॥१५०-१५३॥ ❖ मेघनादः= 'चौलाई' इति शाकविशेषः । मेषशृङ्गी (मेढ़ाशृङ्गी), तदभावे 'कर्कटशृङ्गी' ग्राह्या । नवसारं=नवसादरम् ।।१५०-१५३।। यहाँ 'मेघनाद' पद का 'चौलाई (शाकविशेष)' तथा 'मेषशृङ्गी' पद का 'मेढ़ाशृङ्गी' अर्थ समझना चाहिये। इसके अभाव में 'काकड़ाशिंगी' लेना चाहिये एवं 'नवसारम्' पद से 'नवसादर' समझना चाहिये ॥१५०-१५३॥ अन्यच्च- मूलकानलसिन्धूत्थत्र्यूषणार्द्रकराजिकाः । रसस्य षोडशांशेन द्रव्यं युञ्ज्यात् पृथक्पृथक् ।। द्रव्येष्वनुक्तमानेषु मतं मानमितं बुधैः । पट्टावृतेषु चैतेषु सूतं प्रक्षिप्य काञ्जिके ।।१५५।। स्वेदयेद्दिनमेकञ्च दोलायन्त्रेण बुद्धिमान् । स्वेदात्तीव्रो भवेत्सूतौ मर्दनाच्च सुनिर्मलः ।। १५६ ।। अन्य प्रकार - मूली, चीता, सेंधा नमक, सोंठ, पीपर, मिर्च, अदरख और राई इनमें से प्रत्येक पदार्थ पारे से सोलहवाँ भाग लेकर कल्क (चटनी) के समान बना डाले, 'जहाँ द्रव्यों का मान (तौल) न लिखा हो वहाँ जितने मान में द्रव्य लेने से कार्य ठीक हो उतना लेना चाहिये' यह परिभाषा सर्वत्र समझनी चाहिये, विशेषतः रसकर्म में तो अवश्य ही । पश्चात् उक्त कल्क का एक वस्त्र के ऊपर लेप करके उसके अन्दर पारा को रख कर और पोटली बना कर एक पात्र में कांजी रख कर उसी में दोला की भाँति उक्त पोटली को लटका कर दोलायन्त्र से एक दिन तक बुद्धिमान वैद्य स्वेदन करे । इस प्रकार स्वेदन कर्म करने से पारा तीव्र हो जाता है तथा आगे लिखी हुई रीति से मर्दन करने से अति निर्मल हो जाता है ।।१५४-१५६।। ❖ मूलकम् 'मुरई, मूली' वा इति लोके । अनलं=चित्रकम् । त्र्यूषणं=त्रिकुट । राजिका (राई) ।।१५४- १५६।। यहाँ 'मूलकम्' पद से 'मुरई या मूली' इस नाम से लोकप्रसिद्ध वस्तु तथा 'अनल' से चित्रक (चीता)' । 'त्र्यूषणम्' से 'त्रिकटु (सोंठ, पीपर, मिर्च)' और 'राजिका' से 'राई' का ग्रहण करना चाहिये ॥१५४-१५६॥ अथ मर्दनविधिमाह- इष्टिकाचूर्णचूर्णाभ्यामादौ मर्द्यो रसस्ततः । दध्ना गुडेन सिन्धूत्थराजिकागृहधूमकैः ।।१५७।। मर्दन की विधि स्वेदन के पश्चात् ईंट का चूर्ण तथा चूना से प्रथम पारे का खूब मर्दन करे उसके बाद जल से धोकर दही, गुड़, सेंधा नमक, राई और घर का धूआँ इन सबों से अलग-अलग क्रम से मर्दन करे ।।१५७।। अन्यच्च- कुमारिकाचित्रकरक्तसर्षपैः कृतैः कषायैर्बृहतीविमिश्रितैः । फलत्रिकेणापि विमर्दितो रसो दिनत्रयं सर्वमलैर्विमुच्यते ।। १५८ ।। अथवा—घीकुवार, चीता, लाल सरसों, कटेरी इनके क्वाथ से तथा त्रिफला के क्वाथ से तीन दिन तक पारे का खूब मर्दन करने से वह सम्पूर्ण मलों से छूटकर स्वच्छ हो जाता है ॥१५८॥ अथ मूर्च्छनविधिमाह- त्र्यूषणत्रिफलाबन्ध्याकन्दैः क्षुद्राद्वयान्वितैः । चित्रकोर्णानिशाक्षारकन्याऽर्ककनकद्रवैः ।।१५९।। सूतं कृतेन यूषेण वारान्सप्त विमर्दयेत् । इत्थं संमूर्च्छितः सूतस्त्यजेत्सप्तापि कञ्चुकान् ।।१६०।।
९९० भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे मूर्च्छन विधि-सोंठ, पीपल, मिर्च, हरड़, बहेड़ा, आँवला, बाँझककोड़े का कन्द, छोटी कटेरी, बड़ी कटेरी, चीता, भेड़ की ऊन, हरदी, जवाखार, घीकुवार, आक के पत्तों का रस, धतूरे के पत्तों का रस इन सबों के क्वाथ से सात बार मर्दन करने से पारा मूर्च्छित हो जाता है तथा सात प्रकार के कञ्चुक दोषों से रहित हो जाता है ॥१५९-१६०॥ ❖ बन्ध्याकन्दः=बान्दु खेखसाकन्दः (बाँझ काँकूड)। (छोटीकटाई, बड़ी कटाई)। ऊर्णा (मेषकी ऊन)। निशा=हरिद्रा। क्षारः=यवक्षारः। कन्या=कुमारिका। अर्कः=अर्कपत्ररसः। कनकद्रवः=धत्तूर- पत्ररसः ॥१५९-१६०॥ यहाँ 'बन्ध्याकन्द' से 'बाँझककोड़े का कन्द' । 'क्षुद्राद्वयम्' से 'छोटी तथा बड़ी कटेरी' । 'ऊर्णा' से 'मेष (भेड़) की ऊन' । 'निशा' से 'हरदी' । 'क्षार' से 'जवाखार' । 'कन्या' से 'घीकुवार' । 'अर्क' 'आक' से 'आक के पत्तों का रस' । 'कनकद्रव' से 'धतूरे के पत्तों का रस' समझना चाहिये ॥ अथोर्ध्वपातनविधिमाह- मयूरग्रीवताप्याभ्यां नष्टपिष्टीकृतस्य च। यन्त्रे विद्याधरे कुर्याद्रसेन्द्रस्योर्ध्वपातनम् ॥१६१॥ ऊर्ध्वपातन विधि-नीलाथोथा तथा सोनामाखी इन दोनों के साथ पारे को मिलाकर घीकुवार के रस के साथ तब खरल करे जब तक पारा अलग न देख पड़े। पश्चात् उसे डमरूयन्त्र में रख कर भाफ द्वारा पारे को उड़ा ले। इसी को पारे का ऊर्ध्वपातन (ऊपर उड़ाना) कहते हैं ॥१६१॥ ❖ ताप्यम्=सुवर्णमाक्षिकम्। नष्टपिष्टीकृतस्य=कुमारिकाद्रवयोगेन तावन्मर्दनं कर्तव्यं यावत् पारदः पृथङ् न दृश्यत इत्यर्थः । विद्याधरयन्त्रे=डमरूयन्त्रे ॥१६१॥ यहाँ 'ताप्य' पद का 'सोनामाखी' तथा 'नष्टपिष्टीकृतस्य' पद का 'घीकुमार के रस के साथ तब तक खरल करे जब तक पारा अलग न देख पड़े' एवं 'विद्याधरयन्त्र' पद का 'डमरूयन्त्र' अर्थ समझना चाहिये ॥१६१॥ अथाधःपातनविधिमाह- त्रिफलाशिग्रुशिखिभिर्लवणासुरिसंयुतैः । नष्टपिष्टं रसं कृत्वा लेपयेदूर्ध्वभाजनम् ॥१६२॥ ततो दीप्तैरधः पातमुपलैस्तस्य कारयेत्। यन्त्रे भूधरसंज्ञे तु ततः सूतो विशुद्ध्यति ॥१६३॥ स्वेदनादिक्रियाभिस्तु शोधितोऽसौ यदा भवेत्। तदा कार्याणि कुरुते प्रयोज्यः सर्वकर्मसु ॥१६४॥ अधःपातन विधि-त्रिफला (हरड़, बहेरा, आँवला), सहिजना, चीता, सेंधा नमक और राई इन सबों को पारे के साथ घीकुवार के रस में तब तक खरल करे जब तक पारा अलग न दिखाई पड़े। पश्चात् उन सबों को ऊपर की हाँड़ी में लेप कर भूधरयन्त्र में रख ऊपर से दहकते हुए उपलों को रख कर पारे को नीचे की हाँड़ी में गिरावे। इसी को पारे का अधः पातन कहते हैं। इससे पारा शुद्ध हो जाता है और स्वेदन आदि (स्वेदन, मूर्च्छन, ऊर्ध्वपातन, अधःपातन) क्रियाओं से जब पारा का शोधन हो जाय तब पारे को सब कामों में लेवे। अन्यथा वह अनिष्टकर होता है ॥१६२-१६४॥ अथ मुख्यदोषहरणार्थं शोधनविधिणमाह- गृहकन्या हरति मलं त्रिफलाऽग्निं चित्रको विषं हन्ति। तस्मादेभिर्मिश्रैर्वारान् संमूर्च्छयेत्सप्त ।। पारा के मुख्य दोषों को दूर करने की विधि-घीकुवार-पारा के मलदोष को दूर करता है, त्रिफला- अग्निदोष को तथा चीता-विषदोष को दूर करता है। अतः इन सबों को एकत्र कर इनमें ७ बार पारे को खरल कर मूर्च्छित करे अर्थात् एक बार का डाला रस जब खरल करते-करते सूख जाय तब पुनः रस डालकर खरल करे। इस भाँति ७ बार करे ॥१६५॥
अथ तृतीयं धात्वादिशोधनमारणविधिप्रकरणम् ९९१ अथ सर्वदोषहरसंक्षिप्तशोधनविधिमाह- कुमारिकाचित्रकरक्तसर्षपैः कृतैः कषायैर्बृहतीविमिश्रितैः । फलत्रिकेणापि विमर्दितो रसो दिनत्रयं सर्वमलैर्विमुच्यते ।। १६६ ।। कुमार्या च निशाचूर्णेर्दिनं सूतं विमर्दयेत् । एवं कदर्थितः सूतः षण्ढो भवति निश्चितम् ।। १६७ ।। बह्वौषधिकषायेण स्वेदितः स बली भवेत् । सर्पाक्षीचिञ्चिकाबन्ध्याभृङ्गाब्दैः स्वेदितो बली । ततः स पावकद्रावैः स्विन्नः स्यादतिदीप्तिमान् ।। १६८ ।। पारा के सम्पूर्ण दोषों को दूर करने के लिये संक्षिप्त शोधन विधि-घीकुवार, चीता, लाल सरसों और कटेरी के क्वाथ के साथ तीन दिन तक खरल करने से तथा त्रिफला के क्वाथ में भी तीन दिन तक खरल करने से पारा सब मलों से रहित हो जाता है । तत्पश्चात् घीकुवार का रस और हरदी के चूर्ण के साथ एक दिन खरल करने से पारा निश्चय नपुंसक हो जाता है । उसके बाद बहुत सी ओषधियों के क्वाथ से पारे का स्वेदन करने से वह बली हो जाता है जैसे- नागफनी, इमली, बाँझककोड़ा, भाँगरा और नागरमोथा इन सबों के क्वाथ से दोलायन्त्र में रख कर स्वेदन करने से पारा बली हो जाता है । चीता के क्वाथ से पुनः स्वेदन करने से पारा अत्यन्त दीप्तिमान् हो जाता है ।। १६६-१६८ ।। ❖ सर्पाक्षी (नागफनी), चिञ्चिका (इमली), बन्ध्या (बाँझ ककोड़ा), भृङ्गः=भृङ्गराज, अब्दः=मुस्ता, पावकः=चित्रकम् ।। १६६-१६८ ।। यहाँ 'सर्पाक्षी' से 'नागफनी' । 'चिञ्चिका' से 'इमली' । 'बन्ध्या' से 'बाँझ ककोड़ा' । 'भृङ्ग' से 'भृङ्गराज (भाँगरा)' । 'अब्द' से 'मुस्ता (नागरमोथा) और 'पावक' से 'चीता' का बोध करना चाहिये ।। १६६-१६८ ।। अथ पारदस्य मारणविधिमाह- धूमसारं रसं तोरीं गन्धकं नवसादरम् । यामैकं मर्दयेदम्लैर्भागं कृत्वा समं समम् ।। १६९ ।। काचकूप्यां विनिक्षिप्य ताञ्च मृद्वस्त्रमुद्रया । विलिप्य परितो वक्त्रे मुद्रां दत्त्वा विशोषयेत् ।। १७० ।। अधः सच्छिद्रपिठरीमध्ये कूपीं निवेशयेत् । पिठरीं बालुकापूरैर्भृत्वा चाकूपिकागलम् ।। १७१ ।। निवेश्य चुल्ल्यां तदधो वह्निं कुर्याच्छनैः शनैः । तस्मादत्यधिकं किञ्चित्पावकं ज्वालयेत्क्रमात् ।। १७२ ।। एवं द्वादशभिर्यामैर्म्रियते रस उत्तमः । स्फोटयेत्स्वाङ्गशीतं तमूर्ध्वगं गन्धकं त्यजेत् ।। १७३ ।। अधःस्थञ्च मृतं सूतं गृह्णीयातं तु मात्रया । यथोचितानुपानेन सर्वकर्मसु योजयेत् ।। १७४ ।। पारा के मारने की विधि-घर का धुआँ, पारा, फिटकिरी, गन्धक, नवसादर इन सबों को समान भाग लेकर अम्ल पदार्थ नींबू आदि के रस में एक प्रहर (३ घण्टे) तक खरल करे । तत्पश्चात् काँच की कूपी के चारो तरफ कपरोटी (मिट्टी लिपटे वस्त्र द्वारा लपेट) कर और उसे धूप में रख कर सुखा डाले । फिर उसी काँच की कूपी में उपर्युक्त खरल किये द्रव्यों को रख कर कूपी का मुख बन्द करके सुखा लेने के बाद एक मिट्टी के पात्र के तल भाग में छिद्र करके उसी छिद्र के ऊपर उक्त कूपी को रख उसके गले तक उक्त पात्र में बालू भर कर उसे चूल्हे पर रख दे और उसके नीचे धीरे-धीरे आँच अधिक करता जाय अर्थात् प्रथम मृदु पुनः मध्यम तदनन्तर तीव्र आँच करे । इस तरह १२ प्रहर (३६ घण्टे) तक आँच देने से उत्तम रीति से पारा भर जाता है । पुनः स्वयं शीतल हो जाने पर सावधानी से कूपी को फोड़ कर ऊपर लगे हुये गन्धक को छोड़ कर शेष नीचे स्थित मरे हुये पारे को निकाल ले और उसे मात्रानुसार यथोचित अनुपान से जहाँ-जहाँ आवश्यकता हो वहाँ-वहाँ प्रयोग में लेवे ।।१६९-१७४।। अथ पारदमारणेऽपरं विधिमाह- अपामार्गस्य बीजानां मूषायुग्मं प्रकल्पयेत् । तत्सम्पुटे क्षिपेत्सूतं मलयूदुग्धमिश्रितम् ।। १७५ ।। द्रोणपुष्पीप्रसूनानि विडङ्गमरिमेदकः । एतच्चूर्णमध्यश्चोर्ध्वं दत्त्वा मुद्रा प्रदीयते ।। १७६ ।। तद्गोलं स्थापयेत्सम्यङ् मृन्मूषासम्पुटे पचेत् ।। १७७ ।। एवमेकपुटेनैव सूतकं भस्म जायते । तत्प्रयोज्यं यथास्थाने यथामात्रं यथाविधि ।। १७८ ।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA
१९२ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे पारा मारने की दूसरी विधि—प्रथम चिचिड़ा के बीजों को पीस कर उसके दो मूषे (घरिया) बना ले, फिर पारा को कठूमर (कठगूलर) के दूध में खूब खरल करके उसे उक्त मूषा के सम्पुट के अन्दर नीचे गूमा के फूल, बायविडङ्ग अरिमेद (दुर्गन्ध खैर) इन सबों का चूर्ण रख कर उसके ऊपर रख कर पुनः उसी चूर्ण को ऊपर से भी रखकर मूषा का मुख बन्द कर दे। पुनः एक दूसरे मिट्टी के मूषा के अन्दर उक्त मूषा के सम्पुट को रख कर मुख बन्द कर तथा सुखा कर अग्नि की पुट देवे। इस तरह एक ही पुट में पारा भस्म हो जाता है। फिर जब जहाँ आवश्यकता हो वहाँ विधि के अनुसार यथोचित मात्रा में उस भस्म का प्रयोग करे ॥१७५-१७८॥ ❖ मलयूः=काकोडुम्बरिका ।।१७५-१७८।। यहाँ 'मलयू' पद से 'कठूमर' का बोध करना चाहिये ॥१७५-१७८॥ अथ पारदमारणे तृतीयं विधिमाह- काकोडुम्बरिकादुग्धै रसं किञ्चिद्विमर्दयेत् । तद्दुग्धघृष्टहिङ्गोश्च मूषायुग्मं प्रकल्पयेत् ।।१७९।। क्षिप्त्वा तत्संुपुटे सूतं तत्र मुद्रां प्रदापयेत् । धृत्वा तद् गोलकं प्राज्ञो मृन्मूषासम्पुटेऽधिके ।। पचेद् गजपुटेनैव सूतकं याति भस्मताम् ।।१८०।। पारा मारने की तीसरी विधि—प्रथम कठूमर के दूध के साथ पारे को किञ्चित् खरल कर ले पश्चात् उसी के दूध के साथ हींग को पीस कर उसकी दो मूषा बना कर उसी के सम्पुट के अन्दर उक्त पारे को रख कर सन्धि भली-भाँति से बन्द कर दे फिर एक दूसरे मिट्टी के बने मूषे (घरिया) के सम्पुट के अन्दर उक्त मूषा-सम्पुट को रखकर कपड़मिट्टी द्वारा मुख दृढ़ता से बन्द कर तथा सुखाकर गजपुट की आग में रख कर पकावे। इस भाँति एक ही पुट देने से पारा भस्म हो जाता है ॥१७९-१८०॥ अथ पारदमारणे चतुर्थ विधिमाह- नागवल्लीरसैर्घृष्टः कर्कोटीकन्दगर्भितः । मृन्मूषासम्पुटे पक्वं सूतो यात्येव भस्मताम् ।।१८१।। पारा मारने की चौथी विधि—प्रथम पारे को पान के रस में खरल कर ले पश्चात् उसे बाँझककोड़ा के कन्द के अन्दर रख दे पुनः उक्त कन्द को मिट्टी के मूषा (घरिया) के सम्पुट के अन्दर रखकर कपड़मिट्टी से मुख बन्द कर सुखा दे पश्चात् गजपुट की आँच में पका डाले। इस भाँति एक ही पुट में पारा भस्म हो जाता है ॥१८१॥ अथ रसकर्पूरनिर्माणविधिमाह- तत्र पारदस्य संक्षिप्तं शोधनं कर्त्तव्यम्। शुद्धसूतसमं कुर्यात्प्रत्येकं गैरिकं सुधीः । इष्टिकां खटिकां तद्वत्स्फटिकां सिन्धुजन्म च ।।१८२।। वल्मीकं क्षारलवणं भाण्डरञ्जकमृत्तिकाम् । सर्वाण्येतानि संचूर्ण्य वाससा चापि शोधयेत् ।।१८३।। एभिश्चूर्णैर्युतं सूतं यावद्यामं विमर्दयेत् । तच्चूर्णसहितं सूतं स्थालमध्ये परिक्षिपेत् ।।१८४।। तस्याः स्थाल्या मुखे स्थालीमपरां धारयेत्समाम् । सवस्त्रकुट्टितमृदा मुद्रयेदनयोर्मुखम् ।।१८५।। संशोष्य मुद्रयेद्भूयो भूयः संशोष्य मुद्रयेत् । सम्यग्विशोष्य मुद्रां तां स्थालीं चुल्ल्यां विधारयेत् ।।१८६।। अग्निं निरन्तरं दद्याद्यावद्दिनचतुष्टयम् । अङ्गारोपरि तद्यन्त्रं रक्षेद्यत्रादहर्निशम् ।।१८७।। शनैरुद्घाटयेद्यन्त्रमूर्ध्वस्थालीगतं रसम् । कर्पूरवत्सुविमलं गृह्णीयाद् गुणवत्तरम् ।।१८८।। तद्देवकुसुमचन्दनकस्तूरीकुङ्कुमैर्युक्तम् । खादन् हरति फिरङ्गं व्याधिं सोपद्रवं सपदि ।।१८९।। बिन्दति वह्नेर्दीप्ति पुष्टिं वीर्य बलं विपुलम् । रमयति रमणीशतकं रसकर्पूरस्य सेवकः सततम् ।।१८०।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
अथ तृतीयं धात्वादिशोधनमारणविधिप्रकरणम् ९९३ 'रसकर्पूर' बनाने की विधि-रसकर्पूर बनाने के समय प्रथम पारे का संक्षिप्त शोधन विधि के अनुसार शोधन करे तत्पश्चात् शुद्ध पारा के समान भाग में गेरू, ईंटा, खड़ी, फिटकिरी, सेंधा नमक, वमई की मिट्टी, खारीनोन, बर्तन रँगने की मिट्टी (काबिस) इन सबों को पृथक्-पृथक् लेकर सबों का चूर्ण कर कपड़े से छान कर उसके साथ उक्त पारे को एक प्रहार तक खरल करे, पश्चात् उसे एक मिट्टी की हँड़िया के अन्दर रख कर ऊपर से दूसरी हाँड़ी औंधा कर दोनों का मुख कपड़ा या रूई डाल कर कुटी हुई मिट्टी से बन्द कर धूप में सुखा दे पश्चात् पुनः उक्त मिट्टी का लेप कर सुखा डाले इसके बाद फिर मिट्टी का लेप कर और सुखा कर उसे चूल्हे पर चढ़ा दे और चार दिन तक बराबर आँच देता रहे। जब तक आग पर रखा रहे तब तक दिन-रात बलपूर्वक उसकी रक्षा करता रहे। स्वयं शीतल हो जाने पर धीरे से हाँड़ी का मुख खोल कर ऊपर की हाँड़ी में लगे हुये अत्यन्त गुणकारी कपूर के समान परम उज्ज्वल पारे को निकाल ले और उसे लौंग, सफेद चन्दन, कस्तूरी तथा केशर के साथ मिला कर यदि खाया जाय तो उपद्रव से युक्त बढ़ा हुआ फिरङ्ग नामक रोग शीघ्र नष्ट हो जाता है और अग्नि प्रदीप्त होता है तथा शरीर की पुष्टि, वीर्य एवं बल की वृद्धि होती है। इस रसकर्पूर का निरन्तर सेवन करने वाला पुरुष १०० स्त्रियों के साथ रमण कर सकता है ॥१८४-१९०॥ ❖ खटिका [खड़ी]। स्फटिका [फिट्किरी]। सिन्धुजन्म=सैन्धवम्। वल्मीकम्='बमई' इति लोके। क्षारलवणम् [खारीनोन]। भाण्डरञ्जकमृत्तिका [काविस] ॥१८४-१९०॥ यहाँ 'खटिका' का 'खड़ी', 'स्फटिका' का 'फिट्किरी', 'सिन्धुजन्म' का 'सेंधानमक' 'वस्मीक' का लोक- प्रसिद्ध 'बमई की मिट्टी', 'क्षारलवण' का 'खारी नोन' और 'भाण्डरञ्जक मृत्तिका' का 'काविस' यह अर्थ समझना चाहिये ॥१८४-१९०॥ अथ सिन्दूररसविधिमाह- शुद्धसूतस्य गृह्णीयाद्द्विषड्भागचतुष्टयम्। शुद्धगन्धस्य भागैकं तावत्कृत्रिमगन्धकम् ।।१९१।। अथवा पारदस्यार्द्धं शुद्धगन्धकमेव हि। तयोः कज्जलिकं कुर्याद्दिनमेकं विमर्दयेत् ।।१९२।। मृत्तिकां वाससा सार्द्धं कुट्टयेदतियत्नतः। तथा वारत्रयं सम्यक्काचकूपीं प्रलेपयेत् ।।१९३।। मृत्तिकां शोषयित्वा तु कूप्यांकज्जलिकं क्षिपेत्। तां कूपीं बालुकायन्त्रे स्थापयित्वा रसं पचेत् ।।१९४।। अग्निं निरन्तरं दद्याद्यावद्दिनचतुष्टयम्। गृह्णीयादूर्ध्वसंलग्नं सिन्दूरसदृशं रसम् ।।१९५।। सिन्दूररस बनाने की विधि-सिन्दूररस बनाने के समय वैद्य को चाहिये कि वह शुद्ध पारा ४ भाग, शुद्ध गन्धक १ भाग तथा बनाया हुआ गन्धक १ भाग अथवा शुद्ध पारा आधा भाग तथा शुद्ध गन्धक आधा भाग ले और इनकी कज्जली एकदिन तक खरल करके बना ले। पश्चात् कपड़ा या रूई डाल कर मिट्टी को खूब कूट-कूट कर सान ले और उसको एक बार काँच की शीशी के चारों तरफ सर्वत्र लेप कर सुखा डाले, इस भाँति तीन लेप चढ़ा कर सुखावे। फिर उक्त कज्जली को उक्त शीशी के अन्दर रख दे और शीशी को बालुकायन्त्र के अन्दर रख कर रस (पारा) को पकावे। चार दिन तक बराबर आँच देता रहे। पश्चात् स्वयं शीतल हो जाने पर ऊपर लगे हुये सिन्दूर के सदृश दिखाई पड़ते हुये रस को धीरे से युक्तिपूर्वक निकाल ले। यही सिन्दूररस कहलाता है ॥१९१-१९५॥ इति सिन्दूररसः। अथ मारितमूर्च्छितपारदयोर्गुणानाह- पारदः कृमिकुष्ठघ्नो जयदो दृष्टिकृत्सरः। मृत्युहृच्च महावीर्यो योगवाही ज्वरापहः ।।१९६।। स्मृतौजोरूपदो वृष्यो वृद्धिकृद्धातुवर्द्धनः। षण्ढत्वनाशनः शूरः खेचरः सिद्धिदः परः ।।१९७।। पारदः सकलरोगहा स्मृतः षड्रसो निखिलयोगवाहकः। पञ्चभूतमय एष कीर्त्तितस्तेन तद्गुणगणैर्विराजते ।।१९८।। ६६ भाव.I CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
९९४ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे उक्त प्रकार से मारे हुए तथा मूर्च्छित किये हुए पारा के गुण-उक्त प्रकार का पारा-कृमि तथा कुष्ठ नाशक, जय देने वाला (कार्य सिद्ध करने वाला), दृष्टिशक्ति को बढ़ाने वाला, सारक, अकाल मृत्यु को दूर करने वाला, महावीर्यशाली, योगवाही (जिसके साथ दिया जाय उसके गुण को बढ़ाने वाला), ज्वरनाशक, स्मृति, ओज तथा रूप को देने वाला, कामी पुरुषों के लिये हितकर, वृद्धिकारक, धातुवर्धक, नपुंसकता को दूर करने वाला, शूरता, आकाश में उड़ने की शक्ति तथा अनेक प्रकार की सिद्धियों को देने वाला होता है। शुद्ध पारा सम्पूर्ण रोगों को नष्ट करने वाला, मधुरादि ६ रसों से युक्त, तथा निखिल योगवाहक (सभी रोगों के सभी ओषधियों के साथ योग कर देने से उसकी शक्ति को बढ़ाने वाला) है एवं पञ्च महाभूत (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) मय होने से उन सबों के प्रत्येक गुणों से युक्त होता है ।।१९६-१९८।। उक्तञ्च रसामृते- यस्य रोगस्य यो योगस्तेनैव सह योजितः । रसेन्द्रो हन्ति तं रोगं नरकुञ्जरवाजिनाम् ।।१९९।। 'रसामृत' में भी कहा हुआ है कि जिस रोग का जो भी योग (औषध) हो, उसके साथ योग कर देने से पारा मनुष्य, हाथी तथा घोड़ा इन सभी के रोगों को दूर करने वाला होता है। अथोपरसानां शोधनविधिमाह- तत्र हिङ्गुलस्य गुणानाह- मेषीक्षीरेण दरदमम्लवर्गैश्च भावितम् । सप्तवारान्नयत्नेन शुद्धिमायाति निश्चितम् ।।२००।। हिङ्गुल (सिंगरफ) की शोधन विधि-भेड़ का दूर और १अम्लवर्गोक्त अमलवेंत, जम्बीरी नींबू आदि पदार्थों के रस की यत्नपूर्वक ७ बार भावना देने से सिंगरफ निश्चय शुद्ध हो जाता है ।। अथ शोधितहिङ्गुलस्य गुणानाह- तिक्तं कषायं कटु हिङ्गुलं स्यान्नेत्रामयघ्नं कफपित्तहारि । हल्लासकण्डूज्वरकामलाश्च प्लीहामवातौ च गरं निहन्ति ।।२०१।। शुद्ध किये हुये सिंगरफ के गुण-शुद्ध सिंगरफ-तिक्त, कषाय तथा कटुरसयुक्त, नेत्ररोगनाशक, कफ तथा पित्त को दूर करने वाला एवं हल्लास (उबकाई), खुजली, ज्वर, कामला, प्लीहा, आमवात तथा गरसंज्ञक विष (कृत्रिम विष) को नष्ट करने वाला होता है ।।२०१।। अथ हिङ्गुलात्पारदनिष्कर्षणविधिमाह- निम्बूरसैर्निम्बपत्ररसैर्वा याममात्रकम् । घृष्ट्वा दरदमूर्ध्वन्तु पातयेत्सूतयुक्तिवत् ।।२०२।। तत्रोर्ध्वपिठरीलग्नं गृह्णीयाद्रसमुत्तमम् । शुद्धमेव हि तं सूतं सर्वकर्मसु योजयेत् ।।२०३।। सिंगरफ से पारा निकालने की विधि-नीबू के रस के अथवा नीम के पत्तों के रस के साथ सिंगरफ को एक प्रहर (३ घण्टे) तक खरल करके ऊर्ध्वपातन यन्त्र में पारे की भांति रख कर उड़ाने से ऊपर की हाँड़ी में लगे हुये उत्तम पारे को निकाल लेना चाहिये । यह पारा स्वयं शुद्ध होता है अतः इसे हर एक कार्यों में लेना चाहिये ।।२०२-२०३।। १. अम्लवेतसजम्बीरलुङ्गाम्लचणकाम्लकाः । नागरङ्गं तिन्तिडी च चिञ्चापत्रं च निम्बुकम् ।। चाङ्गेरी दाडिमं चैव करमर्दं तथैव च । एष चाम्लगणः प्रोक्तो वेतसाम्लसमायुतः ।। अर्थ-अम्लवेत, जम्बीरी नींबू, बिजौरा नींबू, चनाखार, नारङ्गी (खट्टी), इमली के फल और पत्ते, नींबू, चांगेरी, अनार (खट्टा), करौंदा ये सब अम्लगण (अम्लवर्ण) कहलाते हैं । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA
अथ तृतीयं धातवादिशोधनमारणविधिप्रकरणम् ९९५ अथाशुद्धगन्धकस्य दोषानाह- अशुद्धो गन्धकः कुर्यात्कुष्ठं पित्तरुजां भ्रमम्। हन्ति वीर्यं बलं रूपं तस्माच्छुद्धः प्रयुज्यते ॥२०४॥ अशुद्ध गन्धक के दोष-अशुद्ध गन्धक कुष्ठ, पित्तसम्बन्धी रोग तथा भ्रमरोग को उत्पन्न-करने वाला एवं वीर्य, बल, तथा रूप को नष्ट करने वाला होता है। अतः शुद्ध गन्धक का ही प्रयोग करना चाहिये ॥२०४॥ अथ गन्धकस्य शोधनविधिमाह- लौहपात्रे विनिक्षिप्य घृतमग्नौ प्रतापयेत्। तप्ते घृते तत्समानं क्षिपेद् गन्धकजं रजः ॥२०५॥ विद्रुतं गन्धक दृष्ट्वा तनुवस्त्रे विनिक्षिपेत्। यथा वस्त्राद्विनिःस्रुत्य दुग्धमध्येऽखिलं पतेत् । एवं स गन्धकः शुद्धः सर्वकर्मोचितो भवेत् ॥२०६॥ गन्धक के शोधने की विधि-लोहे की कढ़ाई में घी डाल कर आग पर रख कर तपावे, जब घी खूब तप जाय तब उसी के बराबर गन्धक का चूर्ण उसमें डाल दे और गन्धक को पिघला हुआ देख कर पतले वस्त्र के ऊपर उसे उड़ेल दे और दूध भरे पात्र में उस पिघले गन्धक को चुवावे, जब वस्त्र से सारा गन्धक छन कर दूध में गिर जाय तब उसे निकाल ले। इस प्रकार गन्धक को शुद्ध करके सम्पूर्ण कार्यों में प्रयोग करे ॥२०५-२०६॥ अथ शुद्धगन्धकस्य गुणानाह- गन्धकः कटुकस्तिक्तो वीर्य्योष्णस्तुवरः सरः ।।२०७।। पित्तलः कटुकः पाके कण्डूवीसर्पजन्तुजित्। हन्ति कुष्ठक्षयप्लीहकफवातान् रसायनः ।।२०८।। शुद्ध गन्धक के गुण-शुद्ध गन्धक-कटु, तिक्त तथा कषायरसयुक्त, उष्णवीर्य, सारक, पित्तजनक, विपाक में कटुरसयुक्त, रसायन एवं खुजली, वीसर्प, कृमि, कुष्ठ, क्षय, प्लीहा, कफ तथा वात को नष्ट करने वाला होता है ॥२०७-२०८॥ अथाशुद्धाभ्रकस्य दोषानाह- पीडां विधत्ते विविधां नराणां कुष्ठं क्षयं पाण्डुगदञ्च कुर्य्यात् । हृत्पार्श्वपीडां च करोत्यसह्यामशुद्धमभ्रं गुरु वह्निहन्त्यात् ।।२०९।। अशुद्ध अभ्रक के दोष-अशुद्ध अभ्रक-मनुष्यों को अनेक प्रकार की पीड़ा देने वाला, कुष्ठ, क्षय, पाण्डुरोग, हृदय तथा पसलियों में असह्य पीड़ा उत्पन्न करने वाला, गुरु तथा जठराग्नि को नष्ट करने वाला होता है ॥२०९॥ अथाभ्रकस्य शोधनविधिमाह- कृष्णाभ्रकं धमेद्वह्नौ ततः क्षीरे विनिक्षिपेत् । भिन्नपत्रं तु तत्कृत्वा तण्डुलीयाम्लयोर्द्रवैः । भावयेदष्टयामं तदेवमभ्रं विशुद्ध्यति ।।२१०।। अभ्रक के शोधने की विधि-काले अभ्रक को प्रथम आग में डाल कर खूब तपावे जब लाल हो जाय तब उसे दूध में डाल कर बुझावे, तत्पश्चात् उसके प्रत्येक पत्र (पत्तर) अलग-अलग करके उन सबों को चौलाई तथा अम्ल पदार्थ नींबू आदि के रस से आठ पहर तक भावना दे। ऐसा करने से अभ्रक शुद्ध हो जाता है ॥२१०॥ अथाभ्रकस्य मारणविधिमाह- कृत्वा धान्याभ्रकं तथा शोषयित्वाऽथ मर्दयेत् । अर्कक्षीरैर्दिनं खल्वे चक्राकारं च कारयेत् ।।२११।। वेष्टयेदर्कपत्रैश्च सम्यग्गजपुटे पचेत् । पुनर्मर्द्यं पुनः पाच्यं सप्तवारान् पुनः पुनः ।।२१२।। ततो वटजटाक्वाथैस्तद्वद्देयं पुटत्रयम् । म्रियते नात्र सन्देहः प्रयोज्यं सर्वकर्मसु ।।२१३।। तुल्यं घृतं मृताभ्रेण लोहपात्रे विपाचयेत् । घृते जीर्णे तदभ्रन्तु सर्वयोगेषु योजयेत् ।।२१४।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
१९६ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे अभ्रक के मारने की विधि-प्रथम शुद्ध अभ्रक को लेकर उससे आगे लिखी विधि के अनुसार धान्याभ्रक तैयार कर उसे सुखा कर एक दिन तक आक के दूध के साथ खल में रख खरल करे पश्चात् उसकी चक्के के आकार की गोल टिकिया बना कर उन सबों के ऊपर आक के पत्ते अच्छी तरह से लपेट कर गजपुट की आग में रख कर पकावे। पुनः निकाल कर पूर्वोक्त रीति से आक के दूध के साथ खरल करके टिकिया बना कर आक के पत्ते लपेट कर गजपुट की आग में रख कर पकावे। इसी प्रकार जब सात पुट हो जाय तब बरगद की जटा (बरोह) के क्वाथ के साथ खरल करके और टिकिया बना कर पूर्वोक्त रीति की भाँति गजपुट की आग में रख कर पकावे इसी भाँति तीन पुट हो जाने पर अभ्रक निःसन्देह मर जाता है और सभी कार्यों में प्रयोग करने योग्य हो जाता है। उक्त रीति से मारे हुये अभ्रक को समान भाग घी में डाल कर लोहे की कढ़ाई में रख कर पकावे, जब घी जल जाय तब उतार कर उस अभ्रक को हर एक योगों में मिलावे ॥२१४॥ अथ धान्याभ्रकस्य विधिमाह- पादांशशालिसंयुक्तमभ्रं बद्ध्वाऽथ कम्बले। त्रिरात्रं स्थापयेन्नीरे तत्क्लिन्नं मर्दयेत्करैः ।। २१५ ।। कम्बलाद्गलितं सूक्ष्मं बालुकारहितञ्च यत्। तद् धान्याभ्रमिति प्रोक्तमभ्रमार्मारणसिद्धये ।। २१६ ।। धान्याभ्रक बनाने की विधि-अभ्रक का चतुर्थांश शालि (जड़हन) धान्य मिला कर अभ्रक को कम्बल में बाँध कर जल में तीन दिन तक भींगा रहने दे, पश्चात् उसे निकाल कर हाथों में खूब रगड़े और कम्बल से छन २ कर सूक्ष्म जो बालू से रहित अभ्रक के कण गिरे हों उन्हें एकत्र करले वे ही 'धान्याभ्र' कहलाते हैं तथा अभ्रक के मारण के समय कार्य में आते हैं ॥२१५-२१६॥ अथ मारिताभ्रकस्य गुणानाह- अभ्रं कषायं मधुरं सुशीतमायुष्करं धातुविवर्द्धनञ्च । हन्यात् त्रिदोषं व्रणमेहकुष्ठं प्लीहोदरं ग्रन्थिविषक्रिमींश्च ।। २१७ ।। रोगान् हन्ति द्रढयति वपुर्वीर्यवृद्धिं विधत्ते, तारुण्याढयं रमयति शतं योषितां नित्यमेव । दीर्घायुष्काञ्जनयति सुतान् सिंहतुल्यप्रभावान्, मृत्योर्भीतिं हरति सुतरां सेव्यमानं मृताभ्रम् ।। १८ ।। मारे हुये अभ्रक के गुण-मारा हुआ अभ्रक-कषाय तथा मधुर रसयुक्त, शीतल, आयु को बढ़ाने वाला, धातुवर्धक एवं त्रिदोष, व्रण मेह, कुष्ठ, प्लीहा, उदररोग, ग्रन्थि (गाँठ), विष तथा क्रिमि को नष्ट करने वाला होता है। यह सेवन करने से रोगों को दूर करता है, शरीर को दृढ़ रखता है, वीर्य की वृद्धि करता है और सौ १०० युवती स्त्रियों के साथ रमण करने की शक्ति देता है तथा सिंह के समान पराक्रमी और दीर्घ आयु वाले पुत्रों को उत्पन्न करता है एवं अपमृत्यु के भय को दूर करता है ॥२१७-२१८॥ अथाशुद्धहरितालस्य दोषानाह- अशुद्धं तालमायुर्हत्कफमारुतमेहकृत् । तापस्फोटाङ्गसङ्कोचं कुरुते तेन शोधयेत् ।। २१९ ।। अशुद्ध हरताल के दोष-अशुद्ध हरताल-आयु नाशक, कफ, वायु तथा मेहयोग कारक एवं शरीर में ताप, स्फोट तथा अङ्ग को संकुचित करने वाला होता है। अतः इस का शोधन करना आवश्यक है ॥२१९॥ अथ हरितालस्य शोधनविधिमाह- तालकं कणशः कृत्वा तच्चूर्णं काञ्जिके पचेत् । दोलायन्त्रेण यामैकं ततः कूष्माण्डजद्रवैः ।। २२० ।। तिलतैले पचेद्यामं यामञ्च त्रिफलाजले । एवं यन्त्रे चतुर्यामं पक्वं शुद्ध्यति तालकम् ।। २२१ ।। हरताल शोधने की विधि-तबकिया हरताल का मोटा चूर्ण कर उसे कांजी से भरे दोलायन्त्र में रख १ प्रहर (३ घण्टा) तक पकावे, उसके बाद क्रम से पेठा का रस, तिल का तेल तथा त्रिफला का जल भरे दोलायन्त्र में उक्त CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA
अथ तृतीयं धात्वादिशोधनमारणविधिप्रकरणम् १९७ हरताल को रख अलग एक-एक प्रहर तक पकावे, इस भाँति चार प्रहर तक दोलायन्त्र में रख कर पकाने से हरताल शुद्ध हो जाता है ॥२२०-२२१॥ अथ हरितालस्य मारणविधिमाह- सदलं तालकं शुद्धं पौनर्नवरसेन तु। खल्वे विमर्दयेदेकं दिनं पश्चाद्विशोधयेत् ।।२२२।। ततः पुनर्नवाक्षारैः स्थाल्यामर्द्धं प्रपूरयेत्। तत्र तद्गोलकं कृत्वा पुनस्तेनैव पूरयेत् ।।२२३।। आकण्ठं पिठरं तस्य पिधानं धारयेन्मुखे। स्थालीं चुल्ल्यां समारोप्य क्रमाद्वह्निं विवर्धयेत् ।।२२४।। दिनान्यन्तरशून्यानि पञ्च वह्निं प्रदापयेत् ।।२२५।। एवं तन्म्रियते तालं मात्रा तस्यैकरक्तिका। अनुपानान्यनेकानि यथायोग्यं प्रयोजयेत् ।।२२६।। हरताल मारने की विधि-शुद्ध किये हुये दलयुक्त तबकिया हरताल को लेकर पुनर्नवा (सफेद) के रस के साथ खल में रख कर एक दिन तक खरल करे पश्चात् गोला बना कर तथा सुखा कर एक हाँड़ी में आधे दूर तक सफेद पुनर्नवा का खार भर कर उसके ऊपर उक्त हरताल के गोले को रख कर ऊपर से पुनः सफेद पुनर्नवा का खार हाँड़ी के गले तक भर रख दे और ऊपर से हाँड़ी का मुख बन्द कर चूल्हे पर रख कर नीचे आग जला दे और आँच धीरे-धीरे तेज करता जाय, इस तरह पाँच दिन तथा पाँच रात तक अखण्ड आँच देने से हरताल मर जाता है। इसकी मात्रा १ रत्ती की होती है तथा अनेक प्रकार के अनुपानों में जहाँ जिसकी योग्यता हो रोगादि के अनुसार उस अनुपान के साथ इसका प्रयोग करना चाहिये ॥२२२-२२६॥ अथ शोधितमारितहरितालयोर्गुणानाह- हरितालं कटु स्निग्धं कषायोष्णं हरेद्विषम्। कण्डूकुष्ठास्यरोगास्रकफपित्तकचव्रणान् ।।२२७।। शुद्ध किये हुये और मारे हुये हरताल के गुण-उक्त प्रकार का हरताल-कटु तथा कषायरस युक्त, स्निग्ध, उष्ण एवं विष, खुजली, कुष्ठ, मुख सम्बन्धी रोग, रक्तविकार, कफ, पित्त, बाल तथा व्रण को नष्ट करने वाला होता है ॥२२७॥ अन्यच्च- तालकं हरते रोगान्कुष्ठमृत्युज्वरापहम्। शोधितं कुरुते कान्तिं वीर्यवृद्धिं तथाऽऽयुषम् ।।२२८।। और भी कहा है कि-शोधित हरताल-रोगनाशक, शरीर की कान्ति तथा वीर्य की वृद्धि करने वाला, आयु को बढ़ाने वाला एवं कुष्ठ, अकाल मृत्यु तथा ज्वर को दूर करने वाला होता है ॥२२८॥ अथाशुद्धमनःशिलाया दोषानाह- तालकस्यैव भेदोऽस्ति मनोगुप्तैतदन्तरम्। तालकं त्वतिपीतं स्याद्भवेद्रक्ता मनःशिला ।।२२९।। मनःशिला मन्दबलं करोति जन्तुं ध्रुवं शोधनमन्तरेण। मलस्य बन्धं किल मूत्ररोधं सशर्करं कृच्छ्रगदञ्च कुर्यात् ।।२३०।। अशुद्ध मैनसिल का स्वरूप-हरताल के एक भेद को ही मैनसिल कहते हैं। क्योंकि इन दोनों में केवल यही अन्तर है कि हरताल का रङ्ग अत्यन्त पीला होता है और मैनसिल का रङ्ग लाल होता है। अशुद्ध मैनसिल के दोष- बिना शोधा हुआ मैनसिल सेवन करने से मनुष्य को मन्द बलवाला कर देती है और दुर्बलता, क्रिमि, मल का विबन्ध, मूत्र का अवरोध तथा शर्करा युक्त मूत्रकृच्छ्र करने वाली होती है ॥२२९-२३०॥ अथ मनःशिलायाः शोधनविधिमाह- पचेत्त्र्यहमजामूत्रे दोलायन्त्रे मनःशिलाम्। भावयेत्सप्तधा पित्तैरजायाः सा विशुद्ध्यति ।।२३१।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
१९८ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे मैनसिल शोधने की विधि-मैनसिल को ३ दिन तक बकरी के मूत्र से भरे दोलायन्त्र में रख कर पकावे, पश्चात् बकरी के पित्त से सात बार भावना देनेसे मैनसिल शुद्ध हो जाती है ॥२३१॥ अथ शोधितमनःशिलाया गुणानाह- गुर्वी मनःशिला वर्ण्या सरोष्णा लेखनी कटुः । तिक्ता स्निग्धा विषश्वासकासभूतकफास्रनुत् ।। शुद्ध की हुई मैनसिल के गुण-शुद्ध मैनसिल-गुरु, वर्ण को उत्तम करने वाली, सारक, उष्ण, लेखन गुण युक्त, कटु तथा तिक्त रसयुक्त, स्निग्ध एवं विष, श्वास, कास, भूतबाधा, कफ तथा रक्तविकार को दूर करने वाली होती है ॥२३२॥ अथ खर्परस्तुत्थभेदस्तस्य शोधनविधिमाह- नरमूत्रे च गोमूत्रे सप्ताहं रसकं पचेत् । दोलायन्त्रेण शुद्धः स्यात्ततः कार्येषु योजयेत् ।।२३३।। तूतिया का भेद जो खपरिया है उसके शोधन की विधि-खपरिया को मनुष्य के मूत्र से भरे दोलायन्त्र में रख कर सात दिन तक पकावे फिर गोमूत्र से भरे दोलायन्त्र में रख कर सात दिन तक पकावे । ऐसा करने से वह शुद्ध हो जाती है और इसके बाद कार्य में लेने योग्य होती है ॥२३३॥ अथ शुद्धखर्परस्य गुणानाह- खर्परं कटुकं क्षारं कषायं वामकं लघु । लेखनं भेदनं शीतं चक्षुष्यं कफपित्तहृत् ।। विषाश्मकुष्ठकण्डूनां नाशन परम मतम् ।।२३४।। शुद्ध खपरिया के गुण-शुद्ध खपरिया-कटु तथा कषायरसयुक्त, खारी, वमन कराने वाली, लघु, लेखनगुणयुक्त, मलभेदक, शीतल, नेत्रों के लिये हितकर, कफ तथा पित्त को दूर करनेवाली एवं विष, पथरी, कुष्ठ तथा खुजली को अत्यन्त नष्ट करने वाली होती है ॥२३४॥ अथ सर्वोपरसानां साधारणशोधनविधिमाह- सूर्यावर्त्तो वज्रकन्दः कदली देवदालिका । शिग्रुः कोषातकी बन्ध्या काकमाची च बालकम् ।।२३५।। एषामेकरसेनैव त्रिक्षारैर्लवणैः सह । भावयेदम्लवर्गैश्च दिनमेकं प्रयत्नतः ।।२३६।। ततः पचेच्च तद्द्वावैर्दोलायन्त्रे दिनं सुधीः । एवं शुद्ध्यन्ति ते सर्वे प्रोक्ता उपरसा हि ये ।।२३७।। सम्पूर्ण उपरसों के शोधने की साधारण विधि-हुरहुर, वज्रकन्द (जंगली सूरन), केला, देवदाली (सनैया), सहंजना, तोरई, बाँझककोड़ा, मकोय, सुगन्धबाला इन सबों में से किसी एक का रस, क्षारत्रय१ (जवाखार, सुहागा, सज्जीखार), पाँचो२ नोन तथा अम्लवर्गोक्त (अमलवेत, जम्बीरी नींबू आदि) पदार्थों का रस इन सबों से एक दिन तक भावना दे उसके बाद उपर्युक्त इन्हीं रसों से भरे दोलायन्त्र में उपरसों को रख कर एक दिन तक पकावे । ऐसा करने से जितने उपरस कहे हुए हैं वे सभी शुद्ध हो जाते हैं ॥२३५-२३७॥ अथ विशेषशुद्धिमाह- कङ्कुष्ठं गैरिकं शङ्खः कासीसं टङ्कणं तथा । नीलाञ्जनं शुक्तिभेदाः क्षुल्लकाः सवराटकाः ।।२३८।। जम्बीरवारिणा स्विन्नाः क्षालिताः कोष्णवारिणा । शुद्धिमायान्त्यमी योज्या भिषग्भिर्योगसिद्धये ।।२३९।। १. स्वर्जिका च यवक्षारष्टङ्कणक्षार एव च । क्षारत्रयं समाख्यातं त्रिक्षारः स च कथ्यते ।। अर्थ-सज्जीखार, जवाखार, सुहागा ये तीनों मिलकर क्षारत्रय या त्रिक्षार कहलाते हैं। २. सैन्धवं रुचकं चैव विडमौद्भिदमेव च । सामुद्रेण समायुक्तं ज्ञेयं लवणपञ्चकम् ।। अर्थ-सेंधा नमक, कालानोन, विरिया सञ्चर नोन, औद्भिद (रेहगवा नोन), समुद्रीनोन इन सबों के योग को लवणपञ्चक कहते हैं। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA