भारतकोश
संग्रह पर लौटें

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

१०८४ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे सिर की ८ अस्थियाँ संमुखकपालास्थि (Frontal bone) १ | शंखास्थि (Temporal) २ पार्श्वकपालास्थि (Parietal) २ | झर्झरास्थि (Ethmoid) १ पश्चात्कपालास्थि (Occipital) १ | जतुकास्थि (Sphenoid) १ सब मिलाकर आठ अस्थियाँ सिर में होती हैं। मुख की १४ अस्थियाँ २ नासास्थि (Nasal) २ ताल्वस्थि (Palatal) २ ऊर्ध्वहन्विकास्थि (Maxilla) २ नासाफलकास्थि (Inferior Nasalconcha) २ गण्डास्थि (Malar or cheeck bones) १ हलाकार-अस्थि (Vomer) २ अश्रुविका (Lachrymal) १ अधोहन्विका (Mandible or Inferior Maxillary योग १४ ऊर्ध्वशाखा Uppar limbs की ६४ अस्थियाँ जिह्वामूलकास्थि (Hyoid) १ | प्रगण्डिका (Humerus) २ अक्षक (Clavicle) २ | अन्तःप्रकोष्ठास्थि (Ulna) २ अंसफलक (Scapula) २ | बहिःप्रकोष्ठास्थि (Radius) २ मणिबन्ध की अस्थियाँ (Wrist or Carpal bones) 31 करभास्थियां (हस्ततल में) (Meta Carpal bons) 10 अंगुलियों में (Phalaanges) में २८ (३×४=१२ अंगुलियों में तथा २ अंगूठे में=१४ एक हाथ में १४×२=२८ दोनों हाथों में मिलाकर) योग-६४ अधः शाखा की ६२ अस्थियाँ श्रोणिफलक या नितम्बास्थि (Hip bone or ossa innaminata) २ उर्विका (Femur) २ | गुल्फ देश में (Tarsal bones) १४ जानुकपालास्थि या जानुचक्रास्थि (Fatella) २ | प्रपद या पादतल की अस्थियाँ अन्तर्जङ्घिका (Tibia) २ | (Meta tarsal bones) १० बहिर्जङ्घिका (Fibula) २ | अङ्गुलियों में (Phalanges) २८ अधः शाखा की अस्थियाँ कुल ६२ हुईं पृष्ठवंश में २६ अस्थियाँ हैं इनके बीच में एक गोला छिद्र होता है जिसमें सुषुम्णा (spinal chord) रहती है उन अस्थियों के ५ समूह होते हैं। पृष्ठवंश की अस्थियाँ कशेरुकायें (Vertebra) कही जाती हैं। पृष्ठवंश की २६ अस्थियाँ ग्रीवा की (Cervica) कशेरुका ७ | त्रिकप्रदेश में त्रिकास्थियाँ (Sacrum) १

परिशिष्ट १ १०८५ पीठ की (Thoracic) कशेरुका १२ | गुदा प्रदेश में पुच्छास्थि (Coccyx) १ कटि की (Lumber) कशेरुका ५ | योग २६ | त्रिकास्थियाँ (Sacrum) अस्थि की परीक्षा करने पर वह ५ कशेरुकों के मिलने से बनी मालूम होती है इसी प्रकार पुच्छास्थि (Coccyx) भी ४ अस्थियों से मिलकर बनी है। वक्ष की २५ अस्थियाँ उरोऽस्थि (Sternum) १ | पर्शुकाएँ (Rids) २४ योग २५ कान के भीतर मध्यकर्ण में ६ छोटी-छोटी अस्थियाँ रहती हैं। प्रत्येक कर्ण के भीतर मध्य कर्ण में ३-३ अस्थियाँ होती हैं। जिनके नाम ये हैं— कान की ६ अस्थियाँ शूर्मिकास्थि (इङ्कस) २ मुद्गरास्थि (मैलियस) २ रकावास्थि (स्टैपीज) २ योग=६ इस प्रकार सामान्य २०६ अस्थियाँ मानी जाती हैं। अस्थियों के प्रकार जैसा कि सुश्रुत लिखते हैं:— 'एतानि पञ्चविधानि भवन्ति तद्यथा-कपालरुचकतरुणवलयनलकसंज्ञकानि' अर्थात् १ कपाल, २ रुचक, ३ तरुण, ४ वलय, ५ नलक इस भाँति से पाँच प्रकार की अस्थियाँ होती हैं। १ कपाल। २ रुचक—(दाँत) ये आज से प्रायः ५० वर्ष पूर्व अस्थि में ही पाश्चात्य सिद्धान्त के अनुसार भी गिने जाते थे किन्तु आजकल अस्थियों की रचना से इनकी रचना भिन्न होने के कारण अस्थि से पृथक् गिने जाते हैं। ३ तरुण—आजकल पाश्चात्य विज्ञान के अनुसार इनको सृक्ति कहा जाता है। ये भी अस्थियों से पृथक् माने जाते हैं। ४ वलय—पर्शुका आदि मुड़ी हुई अस्थियाँ इसके अन्दर आती हैं। ५ नलक-Long bones दीर्घ अस्थियाँ। अस्थियों की स्थिति 'तेषां जानुनितम्बांसगण्डतालुशङ्खशिरःसु कपालानि, दशनास्तु रुचकानि, घ्राणकर्णग्रीवाक्षिकोषेषु तरुणानि, पार्श्वपृष्ठोरःसु वलयानि, शेषाणि नलकसंज्ञकानि' (सु.शा.अ. ५) जानु, नितम्ब, स्कन्ध, कपोल, तालु, शंख तथा सिर में कपालास्थियाँ (Flats bones) हैं। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

१०८६ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे दाँत रुचकास्थियों से निर्मित हैं। नासिका, कर्ण, ग्रीवा तथा अक्षिकोष में तरुणास्थियाँ हैं। पार्श्व, पृष्ठ तथा वक्ष में वलयास्थियाँ हैं। इनके अतिरिक्त अन्य (हाथ-पैर आदि) भागों में नलक (Long bones) हैं। भोज ने भी लिखा है 'हस्तपादाङ्गुलितले कूर्चेषु मणिबन्धयोः । बाहुजङ्घाद्वये चापि जानीयान्नलकानि तु' ।। हाथ-पैर की अंगुलियों और पादतल तथा पाणितल, कूर्च, मणिबन्ध तथा जंघाओं में नलक अस्थियाँ होती हैं। अस्थियों के कार्य अस्थियाँ शरीर के सुदृढ़ होने में कारणभूत हैं। इनके कारण ही शरीर अपनी एक आकृति विशेष में स्थित रहता है। अन्यथा दबाव आदि के कारण इनका भी आकार परिवर्तित होना संभव था। तथा शरीर के बोझ को सँभालने के लिये भी किसी दृढ़ वस्तु की आवश्यकता थी। इसके अतिरिक्त हाथ, पैर आदि अंगों में जो गति होती है उसका कारण मांसपेशियाँ हैं तथा ये मांसपेशियाँ अस्थियों पर ही लगी हुई हैं। कोमल अङ्गों की रक्षा करना भी अस्थियों का एक महत्त्वपूर्ण कार्य है। वक्ष के भीतर के हृदय तथा फुफ्फुस और उदरगुहा के यकृत् तथा प्लीहा प्रभृति कोमल अंग पसलियों द्वारा पूर्णतः सुरक्षित हैं। मस्तिष्क जैसे सुकोमल अंग के लिये प्रकृति के सिर की अस्थियों की जो सुन्दर मञ्जूषा (सन्दूक) बनाई है वैसा कौन कारीगर बना सकता है ? ये ही सब अस्थियों के साधारणतः कार्य हैं। कार्य के विषय में सुश्रुत लिखते हैं— 'अभ्यन्तरगतैः सारैर्यथा तिष्ठन्ति भूरुहाः । अस्थिसारैस्तथा देहा ध्रियन्ते देहिनां ध्रुवम् ।। तस्माच्चिरविनष्टे, त्वङ्मांसेपुशरीरिणाम् । अस्थीनि न विनश्यन्ति साराण्येतानि देहिनाम् ।। मांसान्यत्र निबद्धानि सिराभिः स्नायुभिस्तथा । अस्थीन्यालम्बनं कृत्वा न शीर्यन्ते पतन्ति वा ।। जिस प्रकार अन्तःस्थित सार के द्वारा वृक्ष स्थिर रहते हैं, उसी भाँति यह मानव शरीर अस्थियों द्वारा धारण किया जाता है। ये अस्थियाँ शरीर की सारभूत हैं। ये कठिन होने के कारण त्वचा तथा मांसादि के नष्ट होने पर भी नष्ट नहीं होतीं। इन्हीं अस्थियों के साथ मांसपेशियाँ सिरा तथा स्नायुओं के द्वारा बँधी हुई हैं। अस्थि पर आश्रित होने ही के कारण वे कभी नष्ट तथा स्थान से भ्रष्ट नहीं होती हैं। अस्थियों को भी सजीव अङ्ग होने के कारण पोषण की आवश्यकता होती है। उनके भीतर सूक्ष्म धमनियों द्वारा रक्तप्रवाह होता रहता है। अस्थियाँ वास्तव में घन तथा सुषिर पर्तों द्वारा बनी हुई हैं। बाहर की तरफ घन भाग तथा भीतर की तरफ अस्थि का कुछ सुषिर भाग होता है। अस्थि के बीच में अस्थिमज्जा पाई जाती है। बड़ी अस्थियों की लाल मज्जा में रक्त के लाल कणों की उत्पत्ति होती है। मांस धातु शरीर में ७ धातुयें ऋषियों ने मानी हैं यथा— रसासृङ्मांसमेदोऽस्थिमज्जशुक्राणि धातवः । रक्त, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा तथा शुक्र ये सात धातुयें हैं। जो आहार प्रतिदिन किया जाता है उसका प्रथम

परिशिष्ट १ १०८७ रस बनता है, रस से रक्त, रक्त से मांस, मांस से मेद, मेद से अस्थि, अस्थि से मज्जा तथा मज्जा से शुक्र का निर्माण होता है। इस प्रकार मांसपेशियाँ रस से ही बनती हैं। किन्तु मांस के आहार से रस-रक्तादि की अपेक्षा मांस अधिक बनता है। शरीर के भिन्न-भिन्न स्थानों पर भिन्न-भिन्न आकार के मांस का समूह रहता है। उन्हें हम पेशियाँ कहते हैं। मांसपेशियों का कार्य सिरास्नावस्थ्यपर्वाणि सन्थयश्च शरीरिणाम्। पेशीभिः संवृतान्यत्र बलवन्ति भवन्त्यतः।। (सु.शारीर.अ. ५) शरीर की सिरायें, स्नायु, अस्थियों के पर्व तथा सन्धियाँ, पेशियों से भलीभाँति आवृत हैं। अतः वे (सिरा आदि) बलवती होती हैं। शरीर में चलने-फिरने, उठने-बैठने आदि में गति होती है। इसके अतिरिक्त हाथ को हिलाना, पलकों को चलाना, बोलना, श्वास, मैथुन आदि जितनी भी गतियाँ शरीर में होती हैं मांस ही सब का कारण है। बिना मांस के किसी भी स्थान में गति नहीं होती। इस प्रकार किसी प्रकार की गति के लिये मांस आवश्यक है। इनमें सङ्कुचित तथा विस्तृत होने का खास गुण होता है। सारे शरीर के मांसों को पाश्चात्त्य विज्ञान के अनुसार दो भागों में विभाजित किया जाता है— १. ऐच्छिक मांसपेशियाँ। २. अनैच्छिक मांसपेशियाँ। १. ऐच्छिक पेशियाँ वे हैं जिन पर अपना अधिकार है जिनका इच्छानुसार संकोच तथा विस्तार कर सकते हैं, प्रायः अस्थियों पर लगी हुई पेशियाँ इसी समूह की होती हैं। २. अनैच्छिक मांसपेशियाँ वे हैं जिनमें अपनी इच्छा के अनुसार संकोच या विस्तार आदि कुछ भी परिवर्तन नहीं कर सकते, आन्त्र आदि शरीर के भीतरी अङ्ग इन्हीं पेशियों से निर्मित हैं। पेशियों की संख्या 'पञ्च पेशीशतानि भवन्ति, तासां चत्वारि शतानि शाखासु, कोष्ठे षट्षष्टिः, ग्रीवां प्रत्यूर्ध्वं चतुस्त्रिंशत्' ।। सुश्रुत शारीर. अ. ५ ।। पेशियां ५०० होती हैं, उनमें शाखा में ४००, कोष्ठों में ६६ तथा ग्रीवा में ३४ ये मिलकर ५०० होती हैं। 'एकैकस्यां पादाङ्गुल्यां तिस्रस्तिस्रस्ताः पञ्चदश, दश प्रपदे, पादोपरि कूर्चसन्निविष्टास्तावत्य एव, दश गुल्फतलयोः, गुल्फजान्वन्तरे विंशतिः, पञ्च जानुनि, विंशतिरूरौ, दश वङ्क्षणे, शतमेवमेकस्मिन्सक्थिन भवन्ति। एतेनेतरसक्थि बाहू च व्याख्यातौ' । पैर की १०० मांसपेशियाँ प्रत्येक पैर की अङ्गुलियों में ३-३ (३×५)=१५ पेशियाँ पैर के अगले प्रान्त (प्रपद) में १० गुल्फ तथा जानु (घुटने) के भीतर २० (प्रपदं पादाग्रमिति डल्हणः) जानु में ५ पैर के ऊपर कूर्च स्थान में लगी हुई पेशियाँ १० ऊरु (जाँघ) में २० गुल्फ (टखना) पादतल में मिलकर १० वङ्क्षण सन्धि में १० योग १०० इस प्रकार कुल शाखाओं में (१००×४) ४०० मांसपेशियां हुईं।

१०८८ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे कोष्ठ की ६६ मांसपेशियाँ तिस्रः पायौ, एका मेढ्रे, सेवन्यां चापरा, द्वे वृषणयोः, स्फिचोः, पञ्च पञ्च, द्वे वस्तिशिरसि, पञ्चोदरे, नाभ्यामेका, पृष्ठोर्ध्वसन्निविष्टाः पञ्च पञ्च दीर्घाः, षट् पार्श्वयोः, दश वक्षसि, अक्ष-कांसौ प्रति समन्तात् सप्त, द्वे हृदयामाशययोः, षड् यकृत्प्लीहोण्डुकेषु । गुदा में ३ पेशियाँ, लिङ्ग में १, सीवनी में १, अण्डों में २, चूतड़ के दोनों ओर की ५-५ मिलाकर १०, वस्ति के ऊपरी भाग में २, उदर में ५, नाभि में १, पृष्ठ के ऊर्ध्व भाग में लगी हुई दीर्घ पेशियाँ (प्रत्येक ओर ५-५) १०, पार्श्व में ६, वक्ष में १०, अक्षक तथा स्कन्ध के चारों ओर मिलाकर ७, हृदय तथा आमाशय में २, यकृत्, प्लीहा तथा उण्डुक [मलाशय] में ६ । कोष्ठ की कुल पेशियों का योग ६६ ग्रीवा की ३४ पेशियाँ ग्रीवायां चतस्रः, अष्टौ हन्वोः, एकैका काकलकगलयोः, द्वे तालुनि, एका जिह्वायाम्, ओष्ठयोर्द्वे, नासायां द्वे, द्वे नेत्रयोः, गण्डयोश्चतस्रः कर्णयोद्वे, चतस्रो ललाटे, एका शिरसीति पञ्च पेशीशतानि । ग्रीवा में ४, दोनों हनु में ८, काकलक (घाँटी) में १, गले के भीतर १, तालु में २, जिह्वा में १, ओठों में २, नासिका में २, नेत्रों में २, कपोल में ४, कान में २, ललाट में ४, सिर में १ । ग्रीवा की कुल पेशियों का योग=३४ शाखाओं की पेशियाँ ४०० मध्य कोष्ठ की कुल पेशियाँ ६६ ग्रीवा से ऊपर ३४ इस भाँति कुल पेशियों का योग ५०० होता है । आधुनिक शरीर-शास्त्रज्ञ पेशियों की संख्या ५१९ मानते हैं । इन ५१९ पेशियों में से प्रायः ४५० अस्थियों पर लगती हैं तथा उनके गति की प्रवर्तक होती हैं शेष ६९ स्वरयंत्र, जिह्वा, तालुं, कण्ठ, नेत्र तथा कर्ण आदि में लगी रहती हैं । प्रायः शरीर की मध्य रेखा के दोनों तरफ दायें तथा बायें समूह में पेशियाँ होती हैं । आधुनिक मत से मांसपेशियों की संख्या ऊर्ध्व शाखा की मांसपेशियाँ (५९-५९)=११८ अधः शाखा की मांसपेशियाँ (५९-५९)=११८ मध्य शरीर (धड़) मांसपेशियाँ (६७-६७)=१३४ सिर तथा ग्रीवा मांसपेशियाँ (४०-४०)=८० योग=४५०

परिशिष्ट ९ १०८९ वक्षोदर मध्यस्था पेशी १. स्वरयन्त्र-की विशेष पेशियाँ ५ गले की मांसपेशियाँ ५. ‘बाह्य कर्ण विशेष पेशियाँ ६ जिह्वा की विशेष पेशियाँ ४. मध्य कर्ण विशेष पेशियाँ २ तालु विशेष पेशियाँ ४. अक्षिगोलक तथा ऊपरी पलक ७ योग ३४ यह एक ओर का हुआ दोनों भीतर तथा बाहर के ओर की पेशियों की संख्या=३४×२)=६८ इस प्रकार ४५० ६८ ग्रीवा तथा नेत्र गोलक आदि की पेशियाँ १ वक्षोदर मध्यस्था कुल पेशियां ५१९ पेशियों की स्थिति तथा कार्य के अनुसार विविध नाम उनके दिये गये हैं । जो कि प्रसंग बढ़ जाने के भय से यहाँ नहीं लिखे जा सकते । नारी-जननेन्द्रियों का संक्षिप्त विवरण सुश्रुत ने योनि की जो परिभाषा लिखी है उसके अनुसार आजकल के भग (Vulba), योनि (Vagina) तथा गर्भाशय (Uterus) ये सभी अङ्ग आ जाते हैं । सुश्रुत लिखते हैं— शङ्खनाभ्याकृतिर्योनिस्त्र्यावर्त्ता सा प्रकीर्त्तिता । तस्यास्तृतीये त्वावर्त्ते गर्भशय्या प्रतिष्ठिता ।। यथा रोहितमत्स्यस्य मुखं भवति रूपतः । तत्संस्थानां तथारूपां गर्भशय्यां विदुर्बुधाः ।। (सुश्रुतसंहिता) इससे स्पष्ट विदित होता है कि योनि के भीतरी भाग को ही वे गर्भाशय मानते हैं । इस विषय में आधुनिक वैज्ञानिकों का जो वर्णन मिलता है संक्षेप में उसकी चर्चा अनावश्यक न होगी । वे उत्पादक अङ्गों (Genaratine Organs) को दो भागों में विभाजित करते हैं— १. बाह्य जननेन्द्रियाँ तथा २. आभ्यन्तरिक जननेन्द्रियाँ । १. बाह्य जननेन्द्रियाँ—वे हैं जो बाहर से देखी जाती हैं । इनके समूह को (Vulba) कहते हैं । २. आभ्यन्तरिक जननेन्द्रियाँ—वे हैं जो कि वस्तिगुहा (Pelvic cavity) के अन्दर रहती हैं । बाह्यजननेन्द्रियाँ—इनमें निम्नलिखित भाग आते हैं । १. कामाद्रि (Mous veneres) २. बृहद् भगोष्ठ (Labia majora) ३. क्षुद्रभगोष्ठ (Lmiaibnora) ४ भगाङ्कुर (Clitoris) ५. योनिद्वार (Vaginal orifice) ६. मूत्रद्वार (Urethral orifiee) ७. योनिच्छद (Hyman) इनमें से प्रत्येक का संक्षिप्त विवरण नीचे दिया जा रहा है:— १. कामाद्रि (Mous veneres)—भग के ऊर्ध्वप्रदेश में होता है । तथा विटपसन्धि की सीध में होता है । इस स्थान में नीचे की ओर वसा (fat) रहती है । युवावस्था (Puberty) के आने पर इस स्थान पर लोम उगते हैं । ७२ भाव.I

१०९० भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे २. बृहद् भगोष्ठ (Labia majora)—ये दो होते हैं। १. वाम बृहद् भगोष्ठ तथा दक्षिण बृहद् भगोष्ठ। ये योनिद्वार (Vaginal orifice) के दोनों ओर होते हैं। इनके नीचे वसा (fat) होती है। युवावस्था में इन पर लोम उगते हैं। बाल्यावस्था में ये दोनों बृहद्भगोष्ठ परस्पर मिले रहते हैं। मैथुन वा प्रसव होने के बाद ये दोनों पृथक् हो जाते हैं। ३. क्षुद्रभगोष्ठ—ये भी संख्या में दो होते हैं और बृहद्भगोष्ठो (Labia majora) के भीतर तथा योनिद्वारों के आस पास होते हैं। इनमें बसा कम होती है अतः ये पतले होते हैं। ये जिस समय भगांकुर के पास पहुँचते हैं उस समय दो भागों में विभाजित हो जाते हैं। ४. भगांकुर (Clitoris)—ऊपर की तरफ, जहाँ पर दोनों बृहद्भगोष्ठ मिलते हैं, उसके प्रायः आधा इंच के नीचे होता है। यह लचकीला होता है। मैथुन के समय यह उत्तेजित हो जाता है और शिश्न की भाँति स्पर्श में कठिन प्रतीत होता है। ५. योनिद्वार (Vaginal orifice)—यह बृहद् तथा क्षुद्र भगोष्ठों के मध्य में छिपा हुआ होता है। यदि अंगुलियों द्वारा भगोष्ठों को पृथक् करें तो भग के निचले भाग में योनिद्वार दिखाई देगा। ६. मूत्रद्वार (Vaginal orifice) यह योनिद्वार (Vrethral orifice) के आधे इञ्च ऊपर होता है। ७. योनिच्छद (Hyman)—यह एक झिल्ली (Menbrane) है जो कि योनिद्वार (Vaginal orifice) को बन्द किये रहती है। इसके बीच में छोटा-सा छिद्र होता है जिससे कि युवावस्था में आर्तव निकला करता है। प्रथम- सम्भोग में यह झिल्ली फट जाती है। कभी-कभी आघात के कारण भी योनिच्छद फट जाता है। योनिच्छद की उपस्थिति स्त्री-सतीत्व की अक्षुण्णता को प्रमाणिक करती है। कभी-कभी मैथुन के समय योनिच्छद नहीं फटता इस अवस्था में पशुवत् अधिक बल प्रयोग न करके शस्त्रकर्म (Peration) द्वारा उसे कटवा देना चाहिये। आभ्यन्तरिक जननेन्द्रियाँ—इसमें निम्नलिखित अङ्ग आते हैं— १. योनि (Vagina) ३. डिम्बप्रणाली (Fallopian tube) २. गर्भाशय (Uterus) ४. डिम्बप्रस्थि (Ovary) इनके संक्षिप्त विवरण नीचे दिये जा रहे हैं— १. योनि यह एक नलिका है जो भग से गर्भाशय के बीच में रहती है। इसकी अग्रिम भित्ति (anterior wall) २ से ३ इंच्छ लम्बी तथा पश्चिम भित्ति ३ से ४ इञ्च लम्बी होती है। इसके सामने की ओर मूत्रप्रणाली (Urethra) और मूत्राशय (Bladder) तथा पीछे की ओर मलाशय (Rectum) रहता है। इसकी पूर्व तथा पश्चिम भित्तियाँ परस्पर मिली रहती हैं। यह नलिका आवश्यकता पड़ने पर (जैसे प्रसव के समय) बढ़ तथा फैल सकती है। गर्भाशय-ग्रीवा (Cervix) का कुछ भाग योनि में आता है। इस प्रकार योनि में चार कोण (Fornix) बन जाते हैं। जो ग्रीवा के सामने होता है वह अग्रकोण (auterio fornix), जो पीछे होता है वह पश्चात् कोण (Posterior fornix) तथा जो पार्श्व में २ कोण बनते हैं उन्हें (Lateralforices) कहते हैं। पश्चात् कोण (Posterior fornix) सबसे अधिक गहरा है। योनि से एक विशिष्ट स्राव निकला करता है इसकी प्रतिक्रिया आम्लिक होती है। योनि में उपस्थित एक विशेष प्रकार के कीटाणु (डोर्डरलीन के जीवाणु) तक्राम्ल (Lactic acid) पैदा करते हैं जो कि प्रायः अन्य जीवाणुओं के लिये घातक होता है। इस प्रकार बाहर से किसी प्रकार विकार उत्पन्न करने वाले जीवाणु वहाँ पहुँच जायें तो भी वे इस तक्राम्ल (Lactic acid) के कारण नष्ट कर दिये जाते हैं।

परिशिष्ट १ १०११ २. गर्भाशय योनि के ऊपरी भाग से इसका प्रारम्भ होता है। इसके सामने की ओर मूत्राशय (Bladder) तथा पीछे की ओर मलाशय होता है। यह बड़े अमरूद के आकार का किन्तु सामने तथा पीछे की ओर चपटा होता है। सुश्रुत ने रीहित- मत्स्य के मुख से गर्भाशय की उपमा दी है। यथा रोहितमत्स्यस्य मुखं भवति रूपतः। तत्सस्थाना तथारूपां गर्भशय्यां विदुर्बुधाः। गर्भाशय में ही गर्भ का पोषण होता है, यहीं गर्भ अपनी पूर्ण वृद्धि तक पहुँचता है तथा प्रसव के समय बाहर निकलता है। गर्भाशय के तीन भाग हैं— ऊपर का भाग मुण्ड १. (Lundus), मध्य का भाग गात्र (Body) तथा इससे नीचे का भाग ग्रीवा (Cervix) है। गर्भाशय की श्लैष्मिक कला (Endometrium) में नलिकाकार ग्रन्थियाँ (Tubular glands) होती हैं जिनसे क्षारीय स्राव निकलता रहता है। गर्भाशय के दोनों ओर दो विस्तृत स्नायु (Broad ligaments) होते हैं तथा पीछे की तरफ दो बन्धन होते हैं उन्हें गर्भत्रिक स्नायु (Uterosa cialligaments) कहते हैं, वे पीछे की तरफ त्रिकास्थि के उभरे हुये भाग (Promontry) पर लगे हुये हैं। गोलबन्धन (Roundligaments) ये भी संख्या में दो होते हैं। ये इतने ढीले होते हैं कि यह कहना कि गर्भाशय को उसके स्थान से भ्रंश होने से बचाते हैं अधिक उचित नहीं प्रतीत होता। हाँ गर्भाशय-भ्रंश को ठीक करने में अवश्य सहायक होते हैं। साधारण स्थिति में गर्भाशय कुछ मूत्राशय की तरफ को झुका रहता है तथा जिस स्थान पर गात्र ग्रीवा से मिलता है वहाँ पर गर्भाशय अपने ही ऊपर कुछ मुड़ा होता है इस प्रकार गर्भाशय (Slightly anteverted and antifixed) रहता है। उदर की परिविस्तृत कला (Feritoneum) मूत्राशय के ऊपर से होकर गर्भाशय की पूर्व भित्ति पर पहुँचती है। इस प्रकार मूत्राशय की पश्चिम भित्ति (Posterior wall) तथा गर्भाशय की पूर्व भित्ति (anterior wall) के बीच एक खात बनता है इसका नाम (Uterovasical ponch) है। इसके बाद परिविस्तृत कला गर्भाशय के पश्चात् भित्ति से होकर फिर मलाशय पर चली जाती है और मलाशय से आगे आन्त्रनिबन्धन—कला (mesentry) से मिल जाती है। इस प्रकार मंलाशय तथा मूत्राशय के बीच एक खात उत्पन्न होता है उसे (Rectal uterin ponch or Ponch of Douglas) कहते हैं। गर्भाशय की आकृति तथा तौल तथा इसके बन्धन, उदर का दाब (intra abdominal pressure) तथा वस्ति गुहा की नीचे की भित्ति ये वे सब मिलकर गर्भाशय को अपनी स्थिति में रखते हैं। इनके विकार से गर्भाशय की स्थान से विच्युति (displacement) होती है। ३. डिम्ब प्रणाली (Fallopian tube) ये गर्भाशय के पार्श्विक कोणों से प्रारम्भ होती हैं। दोनों तरफ दो डिम्बप्रणालियाँ होती हैं तथा विस्तृत स्नायु (Broad ligaments) के ऊपरी भाग से आच्छादित रहती हैं। इनकी लम्बाई ४ इञ्च है। इस नलिका के चार भाग किये जाते हैं। १. प्रथम—गर्भाशय के अन्दर रहने वाला भाग २. दूसरा—इसके आगे का संकीर्ण भाग

१०९२ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे ३. तीसरा—इसके आगे का अपेक्षा कृत विस्तृत भाग ४. चौथा—इस नलिका के झालरदार सिरे का भाग कहा जाता है। दोनों नलिकाओं (Infundibul pelvic fragments) के द्वारा वस्तिगुहा के पार्श्विक भाग से सम्बन्धित हैं। ४. डिम्बग्रन्थि (Ovary) ये बदाम के आकार की दो ग्रन्थि हैं जो कि विस्तृत स्नायु के पश्चिम भित्ति पर लगी हुई हैं। ये १ १/२ डेढ़ इञ्च लम्बी तथा ३/४ पौन इञ्च चौड़ी तथा १/२ आधी इञ्च मोटी होती हैं। प्रत्येक डिम्बग्रन्थि में अनेक डिम्बकोष (Craffian follicle) होते हैं तथा इन डिम्बकोषों में एक-एक डिम्ब (Ovum) होता है। जिस समय डिम्ब परिपक्व (Ripe) होता है उस समय डिम्बकोष (Graffian follicle) फट जाता है और (Ovum) डिम्बप्रणाली (Fallopian tube) में प्रविष्ट होता है। इस प्रकार डिम्बप्रणाली ही में शुक्र से उसका सम्पर्क होता है तथा वहाँ भ्रूण की वृद्धि ६ दिन तक होती है। इसके उपरान्त भ्रूण गर्भाशय में प्रवेश करता है तथा नवम मास पर्यन्त वहीं बढ़ता रहता है। डिम्बकोष के फटने पर रिक्त डिम्बकोष में रक्त एकत्र होता है जो कुछ समय में एक पीतवर्ण के पिण्ड में परिवर्तित हो जाता है। इसे (Corpus Iuteum) कहते हैं। गर्भाधान हो जाने पर इसमें कुछ और परिवर्तन होते हैं तथा यह बढ़ता है। किन्तु गर्भाधान न हुआ तो यह मुरझा कर श्वेत वर्ण का हो जाता है। डिम्ब—(Ovum) यह एक गोल तन्तु (Cell) है इसका व्यास १/१२० इञ्च है। नारियों के स्तन का विवरण स्तन—इनका जननेन्द्रियों में परिगणन नहीं है किन्तु जननेन्द्रियों से इनका सम्बन्ध अवश्य है। स्तन के स्पर्श से वहाँ की नाड़ी में किसी प्रकार उत्तेजना से गर्भाशय में संकोच प्रारम्भ हो जाता है तथा स्त्री एक विशेष आनन्द का अनुभव करती है। उत्तेजना की अवस्था में स्तन दृढ़ तथा चूचुक कड़े हो जाते हैं। ये स्तन वक्ष में ऊपर की ओर द्वितीय पर्शुका से लेकर नीचे छठीं पर्शुका तक होते हैं। तथा सामने से पीछे की ओर वक्षिका (Slesunm) के किनारे से लेकर मध्यकक्षीयरेखा (Midaxillary line) तक होते हैं। ये अर्द्धवृत्ताकार होते हैं, इनके ऊपरी भाग में एक वर्तुल उभार होता है जिसे चूचुक (Nipple) कहते हैं। इसमें १२ से २० छिद्र होते हैं जिनसे कि दुग्ध-स्रोतों द्वारा दुग्ध निकलता है। चूचुक के चारों ओर एक गहरे रङ्ग का मण्डल होता है इसे स्तनमण्डल (Areola) कहते हैं। स्तन के भीतर अनेक दुग्धग्रन्थियाँ (Lactals) होती हैं तथा वसा भी उपस्थित रहती है। ये दुग्धवाहिनियाँ रथ के चक्र की भाँति स्तन में स्थित हैं। पुरुष-जननेन्द्रियों का संक्षिप्त विवरण इसमें १. अण्ड (sorotum) । २. उपाण्ड । ३. अण्डरज्जु (Spermatic cord) । ४. शुक्राशय । ५. शिश्न ये अङ्ग होते हैं। १. अण्ड ये संख्या में दो होते हैं। यहाँ का चर्म एक प्रकार के थैले की भांति रचना बनाता है। इस प्रकार—दो थैलों में दो अण्ड रहते हैं, इनकी उत्पत्ति उदरगुहा में होती है। भ्रूण के आठवें मास के अन्त में ये उदरगुहा से निकल कर अपने निवासस्थानभूत थैले में पहुँच जाते हैं। उदरगुहा से ये अण्डकोश अण्डरज्जु (Spermatio cord) द्वारा लटकते रहते हैं। इनके ऊपर एक आवरण होता है उसे अण्डवेष्ट (Tunica vaginalis) कहते हैं। इसके स्तरों के बीच में कुछ

परिशिष्ट १ १०९३ द्रव रहता है जब इस द्रव की मात्रा अधिक बढ़ जाती है तो उसे अण्डतरलातिवृद्धि (Hydrocyl) कहते हैं। इन अण्डों के तन्तुओं (सेलों) द्वारा शुक्र (Semen) का निर्माण होता है। २. उपाण्ड ये अण्डों के ऊपर चिपके हुये रहते हैं इनके निचले भाग से अण्डरज्जु प्रारम्भ होते हैं। ३. अण्डरज्जु ये रस्सी की भाँति होते हैं। उनमें एक अत्यन्त सूक्ष्म आलपीन के नोक के समान एक सूक्ष्म छिद्र होता है इसी के द्वारा शुक्र शुक्राशय को जाता है। ये उपाण्ड से प्रारम्भ होकर उदर में (Through the external abdominal ring, ingoinal canal and internal abdominal ring.) प्रवेश करते हैं, वहाँ से जाकर वे नीचे की तरफ घूम कर मलाशय तथा मूत्राशय के बीच में स्थित शुक्राशय में खुलते हैं। ४. शुक्राशय ये अत्यन्त घूमे हुये होते हैं। मलाशय तथा मूत्राशय के बीच में इनकी स्थिति होने के कारण मलाशय तथा मूत्राशय के भरे रहने पर इन पर दाब पड़ता है। इस प्रकार मूत्र तथा मल से तथोक्त आशयों के भरे होने पर स्वप्न में शुक्रमेह की सम्भावना अधिक होती है। जैसा कि नाम से ही प्रकट है। अण्डों द्वारा बना हुआ शुक्र इन्हीं में आता है। ये आगे चलकर पतली नलिका (इजीकुलेटरी डक्ट) में समाप्त होते हैं जो कि (नलिका) मूत्रमार्ग में जाकर खुलती है। ५. अष्ठीलाग्रन्थि (प्रोस्टेट) यह युवावस्था में मूत्रनलिका के प्रारम्भिक १ से १। इन्च भाग को चारों तरफ से आवृत किये रहती है। मैथुन के समय इसका स्राव भी शुक्र में मिल जाता है। ६. शिश्न यह मांसपेशियों के ३ दण्डिकाओं से निर्मित है, दो दण्डिकायें पार्श्व तथा कुछ ऊपर की ओर तथा एक दण्डिका नीचे की तरफ होती है, ऊपर के दण्डिकाओं में केशिकाओं की अत्यन्त अधिकता है तथा इनमें कोई छिद्र नहीं होता है। नीचे का दण्ड पोला होता है। इसमें एक नलिका होती है जिसके द्वारा शुक्र तथा मूत्र निकलते हैं। ऊपर की दोनों दण्डिकायें शिश्नमुण्ड के पास पहुँचने के पूर्व ही समाप्त हो जाती हैं, केवल नीचे की दण्डिका आगे चल कर छत्र की भांति विस्तृत हो जाती है इसे ही शिश्नमुण्ड कहते हैं। इसमें एक छिद्र होता है। जिसके द्वारा शुक्र तथा मूत्र बाहर निकलते हैं। ये तीनों शिश्न दण्डिकायें संयुक्त रहती हैं। इनके ऊपर त्वचाओं का आवरण रहता है। शिश्न अचैतन्यावस्था में ३ से ४ इञ्च लम्बा होता है और मृदु होता है किन्तु चैतन्यावस्था में उपरोक्त शिश्न-दण्डिका ही फूल कर मोटी हो जाती है और शिश्न अपेक्षाकृत अधिक लम्बा (६ से ९ इञ्च तक) तक कठिन हो जाता है। इसका कारण यह है कि पूर्व कही हुई दोनों शिश्न-दण्डिकाओं की रचना ऐसी है कि उसमें बहुत से कोष्ठक हैं और इन कोष्ठकों में सूक्ष्म केशिकाओं का जाल-सा बिछा हुआ है। जब किसी प्रकार उत्तेजना होती है तो ये केशिकायें रक्त से परिपूर्ण हो जाती हैं। अतः यही रक्त-परिपूर्णता शिश्न के काठिन्य में कारण है; कार्य-निवृत्ति के अनन्तर तथोक्त केशिकाओं से रक्त लौटकर पुनः स्वस्थ्हान में (समीपस्थ रक्तवाहिनी धमनियों तथा सिराओं में) पहुँच जाता है अतः शिश्न पुनः शिथिल हो जाता है। जननेन्द्रिय का विषय अत्यन्त विस्तृत है। उसका संक्षेपातिसंक्षेप में यहाँ वर्णन किया गया है। पाठक अधिक विवरण के लिये जननेन्द्रिय-सम्बन्धी पाश्चात्य विद्वानों द्वारा रचित ग्रन्थों का अध्ययन करें।

१०९४ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे आर्त्तव-गर्भाधान तथा बन्ध्यात्व का संक्षिप्त विवरण Menstruation is the periodicflow of blood and mucusgrom the Uterus commences at puberty (Ten Teachers.) योनि से प्रतिमास रक्तयुक्त श्लेष्मा का स्राव होता है, इसी का नाम आर्त्तव है। यह भारत में प्रायः १२ से १४ वर्ष की आयु में प्रारम्भ होता है तथा ४०-५० वर्ष की आयु में समाप्त होता है। इस अवस्था को रजोनिवृत्ति वा (Menopause) कहते हैं। यह रक्तस्राव गर्भाशय से आता है। जिस समय सर्वप्रथम आर्त्तव होता है उसे रजोदर्शन कहते हैं। आर्त्तव प्रारम्भ होने के दिन से १६ दिन पर्यन्त ऋतुकाल कहा जाता है। आर्त्तव का होना यह सूचित करता है कि कन्या अब युवती हो गई तथा गर्भाधान के सर्वथा योग्य हो गई है। इसके प्रारम्भ होने का समय १२ से १९ वर्ष तक हो सकता है। आर्त्तव पर निम्नलिखित बातों का प्रभाव पड़ता है जलवायु—शीत प्रधान देशों की अपेक्षा उष्ण प्रधान देशों में रजोदर्शन शीघ्र होता है। जाति—भिन्न-भिन्न जातियों के रजोदर्शन के समय में कुछ भिन्नता होती है। सामाजिक आहार-विहार—पौष्टिक तथा उत्तेजना उत्पन्न करने वाले आहार, परिश्रम न करना, उपन्यास आदि अधिक पढ़ना तथा विलासितापूर्ण जीवन ये सब कारण आर्त्तव को शीघ्र पैदा करते हैं। आर्त्तव प्रारम्भ होने के समय स्त्री में शारीरिक तथा मानसिक परिवर्तन होते हैं। स्तनों की वृद्धि होती है। स्त्री इस समय अपूर्व लावण्य से सुशोभित हो जाती है, उसका वर्ण पहले की अपेक्षा अधिक निखर आता है तथा उसे जननेन्द्रिय-सम्बन्धी उत्तेजनाओं का अनुभव होने लगता है। आर्त्तव के लिये दो शब्दों का प्रयोग होता है। आर्त्तवकालान्तर (Menstrula type)—दो आर्त्तवों के अन्तर का समय आर्त्तव काल कहा जाता है। साधारणतः यह २८ दिन का होता है। किसी-किसी स्त्रियों में यह २१ से ३० दिन के अन्तर पर भी होता है किन्तु यदि नियत समय पर आर्त्तवस्राव होता रहे तो उसे साधारण समझना चाहिये किन्तु यदि आर्त्तव होने के समय में अनियमितता (Irregularity) हो तो यह किसी विकृति का निदर्शक है। आर्त्तवस्रवकाल —यह प्रायः ४ से ५ दिन तक होता रहता है। कभी-कभी यह कुछ घण्टे से ८-१० दिन तक भी जारी रहता है। आर्त्तव के विषय में सुश्रुत ने लिखा है— तद्वर्षाद् द्वादशादूर्ध्वं वर्त्तमानमसृक् पुनः। जरापक्वशरीराणां याति पञ्चाशतः क्षयम् ।। पूर्व में कहा जा चुका है कि आर्त्तव के प्रथम दिन से १६ दिन पर्यन्त ऋतुकाल होता है यही ऋतुकाल गर्भाधान के योग्य कहा जाता है। जैसा कि सुश्रुत लिखते हैं 'आर्त्तवस्रावदिवसाद्ऋतुः षोडश रात्रयः। गर्भग्रहणयोग्यस्तु स एव समयः स्मृतः।। किन्तु कभी-कभी आर्त्तवस्राव के बिना भी ऋतुकाल होता है जैसे कि दुग्धकाल में, किन्तु गर्भाधान उस समय भी हो सकता है। बिना आर्त्तव के ऋतुकाल का ज्ञान करने के लिये लक्षण दिये जा रहे हैं— CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA

परिशिष्ट १ १०९५ 'पीनप्रसन्नवदनां प्रक्लिन्नात्ममुखद्विजाम् । नरकामां प्रियकथां त्रस्तकुक्ष्यक्षिमूर्द्धजाम् ।। स्फुरद्भुजकुचश्रोणिनाभ्यूरुजघनस्फिचम् । हर्षोत्सुक्यपराञ्चापि पिद्यादृत्तुमतीमपि ।। इस प्रकार आर्त्तवचक्र प्रवर्त्तित होता रहता है । इस चक्र की चार अवस्थायें होती हैं— प्रथम अवस्था (Premenstrual congestion) यह आर्त्तव निकलने के चार या पाँच दिन पूर्व प्रारम्भ होती है, गर्भाशय की कला में रक्ताधिक्य होता है अतः वह पहले से मोटी और मुलायम हो जाती है । द्वितीय अवस्था—यह चार-पाँच दिन तक रहती है । इस अवस्था में केशिकाओं में और भी अधिक रक्त आता है तथा केशिकाओं से निकल कर गर्भाशय की श्लैष्मिक कला के नीचे इकट्ठा होता है । इसके उपरान्त श्लैष्मिक कला फटती है तथा उसके नीचे जो रक्त इकट्ठा हो रहा था वह अब गर्भाशय में जाता है तथा योनि से बाहर निकलने लगता है । इस रक्त में साधारण रक्त से कुछ भिन्नता होती है । इसमें श्लेष्मा मिला रहता है तथा खटिक लवणों की साधारण रक्त की अपेक्षा अधिकता होती है किन्तु रक्त को जमाने वाले विशेष द्रव्य फाइब्रिन (Fibrin) के अभाव के कारण रक्त जमता नहीं । साधारण रक्त ज्योंही बाह्य धातु के सम्पर्क में आता है त्योंही जम जाता है । उसके जमाने में फाइब्रिन का मुख्य भाग रहता है । आर्त्तव के रक्त में एक विशेष प्रकार का गन्ध होता है तथा इसकी प्रतिक्रिया क्षारीय होती है । तृतीय अवस्था (Postmenstrual evolution)—यह भी सात दिन तक रहती है । इसमें गर्भाशय की केशिकायें, श्लैष्मिककला आदि अपनी पूर्व अवस्था को प्राप्त होती हैं । चतुर्थ अवस्था (Interval)—यह आर्त्तव की तृतीया अवस्था है इसको गर्भाशय के विश्राम की अवस्था कह सकते हैं । जिन चार अवस्थाओं का वर्णन ऊपर किया गया है, वे परिवर्त्तन गर्भाशय (Uterus) के गात्र (Body) में होते हैं । इसके अतिरिक्त गर्भाशय, ग्रीवा (Cervix) तथा डिम्ब-प्रणाली (Fallopian tube) में रक्ताधिक्य होता है । गर्भाशय, ग्रीवा, योनि (Vagina) तथा भग (Vulba) से एक प्रकार का रस निकलता है, इसे (Meustrual molimina) कहते हैं । आर्त्तव जब प्रारम्भ होने को होता है उस समय स्त्री आलस्य, अरुचि एवं कटि तथा उदर के निचले भाग (पेड़ू) में पीड़ा, भारीपन तथा स्वभाव में कुछ चिड़चिड़ापन इनका अनुभव करती है । आर्त्तव और डिम्ब परिपक्व होना— आर्त्तव होने के ५-१४ दिन के अनन्तर डिम्ब (Ovum) डिम्बग्रन्थि (Ovary) से निकलता है, वहाँ से डिम्बप्रणाली से होता हुआ गर्भाशय की ओर चल पड़ता है । शुक्रकीट इस डिम्ब का डिम्बप्रणाली में ही पहुँच कर गर्भित (Fertilize) करता है । अतः गर्भाधान के ख्याल से आर्त्तव के बाद के १०-१५ दिन उपयुक्त हैं । इतने समय में यदि डिम्ब से शुक्रकीट का संसर्ग नहीं होता तो डिम्ब मृत हो जाता है । डिम्बग्रन्थि Overy तथा डिम्ब का परिपक्व होना (Ovulation)— गर्भाशय के दोनों ओर दो ग्रन्थियाँ बादाम के आकार की होती है । इसके भीतर अनेक डिम्ब होते हैं । इस ग्रन्थि का नाम Overy है । युवावस्था प्रारम्भ होने पर ये डिम्ब बढ़ते हैं, इनके पूर्ण वृद्धि प्राप्त करने पर डिम्बप्रणाली का इनके निकटं का प्रदेश फट जाता है और वहाँ से डिम्ब बाहर निकलता है । डिम्ब के पक कर बाहर निकलने की इस क्रिया

१०९६ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे को Ovulation कहते हैं। आर्तव के समय गर्भाशय की कला (Endometrium) में रक्ताधिक्य होता है तथा वह मुलायम हो जाती है जिससे कि भ्रूण वहाँ पर चिपक सके। आर्तव के रक्त में खटिक की अधिकता होती है यह पहले कहा जा चुका है। स्त्री के रक्त में इस खटिक (Caloium) की भ्रूण की वृद्धि के लिये आवश्यकता होती है। गर्भाधान न होने पर रक्त का बढ़ा हुआ खटिक द्रव्य आर्तव द्वारा निकल जाता है। इसके साथ ही साथ गर्भाशय कला भी फट जाती है तथा उसके टुकड़े रक्त के साथ निकलते हैं। 'Graen Armytaga' ने लिखा है— 'Menstruation is unfertile Abortion of the unpregnant descidua it is the Uterus weeping for the death of the an unfertilized ovum', जब गर्भाधान हो जाता है तब खटिक का उपयोग भ्रूण के शरीर बनने में होता है अतः गर्भावस्था में आर्तव बन्द होता है। पूर्व में कहा जा चुका है कि-आर्तव साधारणतः १३ वर्ष से प्रारम्भ होता है और ४० से ५० वर्ष की आयु में बन्द हो जाता है। आर्तव जिस समय बन्द होने को होता है (रजोनिवृत्ति के समय) कभी-कभी पाचनसंस्थान, रक्तवाहक संस्थान तथा नाड़ीसंस्थान के कुछ विकार प्रकट होते हैं। पाचनशक्ति में विकृति हो जाती है तथा स्वभाव कुछ चिड़चिड़ा हो जाता है। और कभी-कभी शरीर पर उष्णता की लहरों का प्रवाह सा मालूम होता है। आर्तव कभी-कभी थोड़ा-थोड़ा होता रहता है और शनैः-शनैः बन्द हो जाता। कभी-कभी आर्तव एकाएक बन्द होता है। स्त्री इस अवस्था में कुछ स्थूल हो जाती है। उदर में मेद बढ़ जाता है। किसी-किसी स्त्री के चेहरे पर झुर्रियाँ, पुरुषों की तरह रोम उग आते हैं। यह देखा गया है कि यह अवस्था (Menopause) बाल्यावस्था में विवाह हो गया हो तो और भी शीघ्र प्रकट होती है। यदि गर्भाशय या डिम्बग्रन्थि (Ovary) को शस्त्र-कर्म द्वारा निकाल दिया जाय तो आर्तव के समय में ही (४० वर्ष के पूर्व ही जिस समय Ovary या Uterus को निकाला गया है) रजोनिवृत्ति (Menopause) हो जायगी इसे कृत्रिम रजोनिवृत्ति या (Artificial menopause) कहते हैं। वास्तव में आर्तव प्रारम्भ होने के समय से आर्तव बन्द होने के बीच का ही समय सन्तानोत्पत्ति के लिए अच्छा है। प्रायः रजोदर्शन के पूर्व तथा रजोनिवृत्ति (Menopause) के पश्चात् गर्भाधान नहीं होता। आर्तव काल में स्राव की मात्रा २ से ८ औंस तक हो सकती है इससे कम या अधिक स्राव का निकलना किसी विकृति की ओर ध्यान आकर्षित कराता है। आर्तव का रक्त गर्भाशय में जमा हुआ थक्के के रूप में होता है। वह थक्का शनैः शनैः घुल कर द्रवरूप में परिणत होता है इसी को आर्तव कहते हैं। यह द्रव होने की क्रिया गर्भाशय में स्थित ग्रन्थियों (uterinegland) के उद्रेचन (Secretion) द्वारा निकले हुए फाइब्रिनोलाइसिन (Fibrinolysin) के कारण होती है। इस फाइब्रिनोलाइसिन का कार्य है कि गर्भाशय के अन्दर जमे हुये रक्त को द्रवरूप में परिणत करे। यथा टेनटीचर (Tente acher) स्वरचित मिडवाइफरी (Midwifery) में लिखते हैं— White house attributes the clotting to throwbokinase derived from the endome- trial tissues thrown of during menstruation. White house Contends that menstruating uterus Normally always contains a clot and this clot gradually eid producing the Fluid which is known as menstrual blood. 'While the solution of the clot, he believes is brought a bout by fibrinolysin CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

परिशिष्ट १ १०९७ Containd in the secretion of the uterine glands' —Midwifery by Tenteachers. आर्तव के विकार आर्तव की अधिक प्रवृत्ति वा आर्तवकालान्तर में भी प्रवृत्ति को रक्तप्रदर या असृग्दर (Excessive and irregular menstruation) कहते हैं। जैसा कि सुश्रुत ने लिखा है— ‘तदेवातिप्रसङ्गेन प्रवृत्तमनृतावपि । असृग्दरं विजानीयादतोऽन्यद्रक्तलक्षणात्’ ।। आधुनिक शास्त्रज्ञ इस रक्तस्राव के लिये दो पृथक्-पृथक् संज्ञाओं का व्यवहार करते हैं। यदि आर्तवकाल में ही अधिक आर्तवस्राव हो तो उसे मेनोरेजिया (Menerrhagia) कहते हैं। तथा यदि आर्तवकालान्तर में भी आर्तव दिखाई पड़े तो उसे मेट्रोरोज़िया (Metrorrhagia) कहते हैं। सुश्रुत ने आर्तव के विकार का वर्णन करते हुए शरीर के दूसरे अध्याय में आर्तवनाश का भी वर्णन किया है। आधुनिक परिभाषा के अनुसार उसे एमनोरिया (Amenorhoea) कहेंगे। सुश्रुत ने आर्तवविकार तथा शुक्र के विकार को बन्ध्यात्व का कारण माना है। ऋतुकाल में तथा जिस समय गर्भाशय शुद्ध हो उस अवस्था में यदि स्त्री-पुरुष मैथुन में प्रवृत्त हों तो निश्चित गर्भाधान होता है। सुश्रुत शारीर में लिखते हैं— ‘ध्रुवं चतुर्णां सान्निध्याद् गर्भः स्याद्विधिपूर्वकः । ऋतुक्षेत्राम्बुबीजानां सामग्र्यादङ्कुरो यथा’ ।। जिस प्रकार उचित ऋतु (अंकुर निकलने के लिये उपयुक्त समय), क्षेत्र (भूमि), जल तथा बीज इन चारों के संसर्ग से अंकुर उत्पन्न होता है उसी प्रकार ऋतु (ऋतुकाल), क्षेत्र (गर्भाशय), अम्बु (आहार रस) तथा बीज (शुक्र) इनके संयोग होने पर निश्चित गर्भाधान होता है। यदि आर्तव शब्द से—आजकल के डिम्ब (Ovum) का ग्रहण कर लिया जाय जैसा कि उचित भी प्रतीत होता है तो आधुनिक शास्त्रज्ञों के मत में भी भिन्नता नहीं पड़ती। उनके मत में भी आर्तव के बाद के १० दिनों में ही गर्भाधान की अधिक सम्भावना होती है। नारी-जननेन्द्रियों के वर्णन के समय, डिम्बग्रन्थि तथा ट्यूब का वर्णन किया जा चुका है। डिम्बग्रन्थि से पका हुआ डिम्ब (Mature Ovum) बाहर निकल कर डिम्बप्रणाली में प्रवेश करता है उसी दशा में शुक्रकीट (Sperm) वहाँ पहुँच कर डिम्ब से संयुक्त होता है, इस प्रकार गर्भाधान फेलोपियन ट्यूब में होता है, वहाँ से वह शनैः शनैः गर्भाशय की तरफ प्रस्थान करता है तथा प्रायः छठे दिन के पश्चात् वह गर्भाशय में प्रविष्ट होता है। तथा तब तक गर्भाशय भी अपने आने वाले मेहमान की अभ्यर्थना के लिये सुसज्जित रहता है। गर्भाशय की कला (Endometrium) पहले की अपेक्षा अधिक मोटी हो जाती है और उसका रक्तसंचार भी बहुत बढ़ जाता है। जिस समय डिम्ब गर्भित (Fertilized) हो जाता है उसकी वृद्धि प्रारम्भ हो जाती है तथा वह शनैः-शनैः गर्भाशय की तरफ प्रस्थान भी करता रहता है यह ऊपर कहा जा चुका है। गर्भाशय में प्रविष्ट होने पर यह सुकोमल गर्भाशय कला के सम्पर्क में आता है, उससे चिपक जाता है। भ्रूण (Chrionicviliu) के शरीर से बाहर की तरफ कुछ अंकुर निकले रहते है (Chorionic viliu) वे जिस धातु के सम्पर्क में आते हैं उसे खाते जाते हैं। इस प्रकार वे गर्भकला को खाकर उसमें एक खात की तरह रचना उपस्थित कर देते हैं। गर्भाशय की श्लैष्मिक कला इस समय तक डिम्ब को पूर्णतया आच्छादित कर लेती है। अब भ्रूण गर्भकला के अन्दर ही अन्दर बढ़ता है। भ्रूण के अंकुरों (Chorionic viliu) में दो तरह के अंकुर होते हैं—एक तो वे जिनके सहारे वह (भ्रूण) गर्भाशय में लटकता रहता है, दूसरे वे जो कि समीपवर्ती धातु से रक्त को ग्रहण करते हैं। बाद में इन्हीं अंकुरों में रक्तवाहिनियाँ बनती हैं। यह आधुनिक शास्त्रज्ञों का मत है। अब हम यदि सुश्रुत के पूर्वोक्त श्लोक पर विचार करें तो दोनों की एकवाक्यता सुस्पष्ट हो जाती है। यदि डिम्ब पक कर जब शक्ति-सम्पन्न (जो गर्भाधान योग्य हो) शुक्र से संयुक्त होता है तभी गर्भ धारण हो सकता है। तथा यदि शुक्र

१०९८ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे तथा डिम्ब का उचित सम्पर्क भी हुआ तो भी यदि क्षेत्र अर्थात् गर्भाशय में कोई विकृति (यथा Metritis वा Endometritis प्रभृति गर्भाशय की शोथयुक्त अवस्था) है तो गर्भाधान नहीं होगा। तथा यदि क्षेत्र निर्मल है किन्तु वहाँ पर रस अर्थात् पर्याप्त पोषक रक्त की अनुपस्थिति हो तो भी गर्भधारण होना कभी सम्भव नहीं। अतः (१) शक्ति-सम्पन्न शुक्र, (२) पूर्णता पर पहुँचे हुये डिम्ब, (३) स्वस्थ गर्भाशय तथा (४) वहाँ पर उचित रक्तसञ्चार इन चारों वस्तुओं के सम्यग्योग से गर्भाधान होता है। इसी को ध्यान में रखते हुये परम वैज्ञानिक सुश्रुत ने ध्रुवं चतुर्णां सान्निध्याद्. इत्यादि लिखा है— प्राचीन ऋषियों के मत में उपर्युक्त चारों वस्तुओं के संयोग होने पर भी आत्मा का संयोग होना अपेक्षित है बिना आत्मा के गर्भोत्पत्ति नहीं होती। पूर्वजन्म के कर्मफल के अनुसार मन के सहित आत्मा दूसरे शरीर को ग्रहण करता है। महर्षि चरक ने भी लिखा है— ‘शुक्रासृगात्माशयकालसम्पद्यस्योपचाराश्च हितैस्तथाऽर्थैः । गर्भश्च काले च सुखी सुखं च सञ्जायते संपरिपूर्णदेहः’ ।। (चरक शारीर) शुक्र, आर्तव, आत्मा, काल (ऋतु) तथा हितकर आहार-विहार इनके सम्यग् योग से गर्भ समय में (नवम वा दशम वा एकादश मास में) सुखपूर्वक तथा सम्पूर्ण अवयवों से युक्त उत्पन्न होता है। कुछ स्वस्थ स्त्रियों को भी गर्भ देर से होता है। उसका कारण है—माता का अहितकर (विरुद्ध) आहार-विहार। चरक में लिखा है— योनिप्रदोषानमनसोऽभितापाच्छुक्रासृगाहारविहारदोषात् । अकालयोगाद् बलसंक्षयाच्च गर्भं चिराद्विन्दति सप्रजाऽपि ।। अर्थात्—यदि योनि में किसी प्रकार का दोष उपस्थित हो तथा सहवास के समय मन एकाग्र न हो एवं शुक्र, आर्त्तव अथवा माता के आहार-विहार के दोष से, अकाल में (ऋतुकाल से भिन्न समय में) तथा दौर्बल्य की स्थिति में मैथुन करने से प्रकृतिस्थ (बन्ध्यात्वरहित) स्त्रियों में भी सन्तानोत्पत्ति देर से होती है। ऋतुकाल वह समय होता है जिस समय डिम्बग्रन्थि से डिम्ब पक कर निकलता है। यदि उचित समय पर उससे शुक्रकीट का सम्पर्क न हो तो वह मर जाता है। अतः आर्त्तव के बाद के १० दिन मैथुन के लिये अधिक उपयुक्त हैं। सुश्रुत लिखते हैं— ‘नियतं दिवसेऽतीते सङ्कुचत्यम्बुजं यथा। ऋतौ व्यतीते नार्यास्तु योनिः संव्रियते तथा’ ।। यमल गर्भ (Twin pregnancy) गर्भाशय के बीज का वायु के द्वारा जब दो भागों में विभाजन हो जाता है तब उस समय दो गर्भ उत्पन्न होते हैं, ऐसी प्राचीन आचार्यों की सम्मति है। जैसा कि सुश्रुत अपने शारीर-स्थान में लिखते हैं— ‘बीजेऽन्तर्वायुना भिन्ने द्वौ जीवौ कुक्षिमागतौ। यमावित्यभिधीयेते धर्मेतरपुरःसरौ’ ।। —(सुश्रुत शारीर) यमल गर्भ के कारण के विषय में महर्षि चरक भी बीज (आर्तव तथा शुक्र) की दो भागों में विभक्ति होने से यमल गर्भ की उत्पत्ति मानते हैं। तथा वायु जिस समय शुक्रार्त्तव को कई भागों में विभाजित कर देती है उस समय, कई सन्तति (Multiple pregnacy) उत्पन्न होती है। आधुनिक शास्त्रज्ञ वायु के द्वारा शुक्रार्त्तव के विभाजन को यमल वा अनेक गर्भ का कारण नहीं मानते। उनका यह कथन है कि एकबार गर्भाधान के कुछ काल बाद ही यदि दूसरा मैथुन किया जाय तो कभी-कभी गर्भ धारण हो जाता है। ऐसा देखा गया है कि एक आंग्लदेशीया महिला को दो सन्तति एक साथ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

परिशिष्ट १ १०९९ उत्पन्न हुई जिसमें एक का वर्ण गौर तथा दूसरी का वर्ण श्याम था। अन्वेषण से पता चला कि जिस समय तथोक्त महिला के पति ने सहवास किया था उसके कुछ समय बाद उसके एक हबसी भृत्य ने भी मैथुन किया था, इस प्रकार एक सन्तान गौर वर्ण की तथा दूसरी श्याम वर्ण की उत्पन्न हुई। अब विचारणा यह है कि क्या एक ही डिम्ब को दो शुक्रकीट पहुँच कर यमल गर्भ उत्पन्न करते हैं या कोई अन्य कारण यमल गर्भ की उत्पत्ति में सहायक होता है। वास्तव में साधारण नियम के अनुसार जिस समय आर्तव प्रारम्भ होता है उसके १४वें दिन डिम्बग्रन्थि से परिपक्व डिम्ब निकलता है। प्रायः एक मास में एक ही डिम्ब निकलता है। जैसे-यदि एक मास में बाईं ओर की डिम्ब ग्रन्थि Ovary से डिम्ब आया तो दूसरे मास में दाहिनी ओर की डिम्बग्रन्थि से डिम्ब आयेगा। पर कभी-कभी इस नियम के अपवाद स्वरूप दोनों ओर की डिम्ब ग्रन्थियों से एक ही मास में दो डिम्ब पकते हैं तथा वे ही भिन्न-भिन्न शुक्रकीटों (Sperms) द्वारा संयुक्त होकर यमल गर्भ उत्पन्न करते हैं तथा कभी-कभी ऐसा देखा गया है कि एक बार गर्भाधान होने के बाद भी दूसरे महीने में दूसरी ओर की डिम्बग्रन्थि से एक डिम्ब आ जाता है उस समय भी यदि प्रसङ्ग किया गया तो पुनः गर्भाधान होकर यमल गर्भ उत्पन्न होता है। एक ही आर्तवकाल में यदि दो डिम्ब पृथक्-पृथक् शुक्र कीट से मिलकर यमल गर्भ उत्पन्न करें तो उसे Superfoecundation कहते हैं और यदि दो आर्तव कालों (Menstrual type) में अलग-अलग सम्भोग से यमल गर्भ उत्पन्न हो तो उसे Superfoetation कहते हैं। यमलगर्भ में लैङ्गिक विभेद आयुर्वेदज्ञ यह मानते हैं कि-गर्भाधान के समय यदि आर्तव की अधिकता हो तो कन्या तथा शुक्र की अधिकता हो तो पुत्र की उत्पत्ति होती है। शुक्रार्तव के वायु द्वारा विभाजित होने पर जिस ओर के विभाग में शुक्र की अधिकता हो उस ओर से पुत्र और जिस ओर आर्तव की अधिकता हो उस ओर से कन्या उत्पन्न होगी, यदि दोनों ही ओर शुक्र की अधिकता होगी तो दोनों ही पुत्र होंगे और यदि दोनों ओर के ही विभाग में आर्तव-बाहुल्य रहा हो तो दो कन्यायें उत्पन्न होंगी। जैसा कि चरक में भगवान् पतञ्जलि ने लिखा है— 'रक्तेन कन्यामधिकेन पुत्रं शुक्रेण तेन द्विविधीकृतेन। बीजेन कन्याञ्च सुतं च सूते यथास्वबीजान्यतराधिकेन' ।। शिशु की विकृति के कारण माता के आहार-विहार के व्यतिक्रम से दोष प्रकुपित होते हैं और ये प्रकुपित दोष भ्रूण की विकृति के कारण होते हैं। तथा कुछ लोग पूर्वजन्म के कर्मफल को भी विकृति का कारण मानते हैं। आजकल के वैज्ञानिक विभजन से ही सन्तान की वृद्धि मानते हैं। इसी विभजन द्वारा जब एक भाग अधिक बढ़ जाता है वा अविकसित रह जाता है उस समय तत्तत्स्थलों में विकृति उत्पन्न होती है। बन्ध्यत्व यदि पुरुषों के शुक्र में उत्पादन की शक्ति न हो तो उस पुरुष को 'बन्ध्य' कहते हैं तथा यदि स्त्री का आर्तव उत्पादन शक्ति से विहीन हो तो उस स्त्री को 'बन्ध्या' कहते हैं। बन्ध्य पुरुष वा बन्ध्या स्त्री के संयोग से चाहे वह ऋतुकाल में ही किया गया हो संतान उत्पन्न होना असम्भव है। जब तक कि चिकित्सा द्वारा बन्ध्यत्व दूर न किया जाय। यदि स्त्री तथा पुरुष दोनों स्वस्थ तथा युवा हों और उनके दाम्पत्य जीवन के चार साल में भी यदि सन्तान उत्पन्न न हो तो अवश्य दम्पति की परीक्षा करके चिकित्सा में प्रवृत्त होना चाहिये। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

११० ० भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे आधुनिक शास्त्रज्ञ स्त्रियों के बन्ध्यात्व कारण को दो भागों में विभाजित करते हैं। प्रथम विभाग वह है जिसमें स्त्रियों के जननेन्द्रिय में कुछ विकृति उपस्थित होती है। इस समूह के अन्दर निम्न विकार आते हैं— १. डिम्ब ग्रन्थियों (Ovary) के रोग—इससे स्वस्थ तथा पके हुये डिम्ब ही नहीं तैयार होंगे। अतः गर्भ होना कैसे सम्भव हो सकता है। किन्तु यदि विकृति एक तरफ की डिम्बग्रन्थि तक ही सीमित हो तो दूसरी अविकृत ग्रन्थि से परिपक्व डिम्ब निकलता है और सन्तानोत्पत्ति होती है। २. डिम्बप्रणाली या फैलोपियन ट्यूब के विकार, यथा सल्पिंजाइटिस (Sulpingitis)—यह प्रायः दोनों तरफ की नलिकाओं में (Bilateral) होती है। इस अवस्था में स्त्री के गर्भाधान का अवसर अत्यन्त कम होता है। यह निश्चित है कि संक्रमण के द्वारा डिम्बप्रणाली का झालरदार किनारा (Abdominal osteum) बन्द हो जाता है अतः डिम्ब को डिम्बप्रणाली में आने का कोई मार्ग नहीं मिलता। अतः सन्तानोत्पादन इस अवस्था में असम्भव है। पूयमेह (Gonorrhea) और गर्भपात व प्रसव के अनन्तर जो बन्ध्यात्व हो जाता है उसका सब से मुख्य कारण डिम्बप्रणाली शोथ (Sutpingitis) है। ३. गर्भाशय में अर्बुद (Fibroid speoially and interstetial variy and submucus)—उपस्थित हो तो भी बन्ध्यात्व हो जाता है। स्मरण रखना चाहिये कि ये अर्बुद (fibroid) ३० वर्ष की अवस्था के पूर्व गर्भाशय की श्लेष्मिक कला के चिरकालीन शोथ के कारण भी बन्ध्या स्व हो जाता है। भग (Valba) तथा योनि (Vaginal) के रोग तथा श्वेतप्रदर (Laueorrhalal disoharges) ये सब भी बन्ध्यात्व उत्पन्न करते हैं। बन्ध्यात्व के कारण के दूसरे विभाग में स्त्रियों की जननेन्द्रियाँ यद्यपि स्वस्थ प्रतीत होती हैं किन्तु डिम्ब में ही यह सामर्थ्य नहीं होता कि वह शुक्रकीट (Sperm) से मिल कर एक हो जाय या वृद्धि प्रारम्भ कर दे। कभी-२ पशुओं पर प्रयोग करके देखा गया है कि एक मादा में एक नर से गर्भाधान नहीं होता किन्तु दूसरे नर से हो जाता है। ऐसा अनुमान किया जाता है कि मनुष्य जाति भी इस नियम के लिये अपवाद नहीं है। बन्ध्यात्व का सन्देह होने पर पूर्ण परीक्षा कर अबिलम्ब चिकित्सा प्रारम्भ करनी चाहिये। आर्तव तथा उसके रोग और गर्भाधान तथा बन्ध्यात्व के विषय में प्राच्य, पाश्चात्त्य विद्वानों का संक्षिप्त समन्वय इस प्रकार समाप्त होता है। इति भावप्रकाशे पूर्वखण्डे प्रथमं परिशिष्टं समाप्तम्।

परिशिष्ट २ अकारादि-क्रमानुसार निघण्टुभाग-स्थित द्रव्यों के व्यवहारोपयोगी अङ्ग तथा उनकी मात्राएँ द्रव्य अङ्ग मात्रा अंकोट छाल १/२ माशे अधःपुष्पी पत्ते, बीज २-३ अकरकरा जड़ ३ माशे अखरोट फल की गूदी १-२ तोले अगर लकड़ी ६ रत्ती से ३ माशे अगस्त छाल, फूल ३ से ६ माशे छाल अजमोदा बीज २ से ८ माशे अडूसा जड़ की छाल, पत्ते १ से ४ माशे अतीस जड़ ६ रत्ती से १ ॥ माशे अदरक कन्द-स्वरस २ माशे से १ तोले अनन्तमूल जड़ ३ माशे से १ तोले अनार दाना, छिलका ६ माशे से १ ॥ तोले अपराजिता जड़-बीज ३ ॥ से ५ रत्ती अफीम फल-रस १/४ से १ रत्ती अभरक भस्म १ से ३ रत्ती अमरबेल लता ६ माशे से १ तोले अमरूद फल-पत्ते-छाल ६ माशे से २ तोले अमलतास फल की गूदी १-२ तोले अमलबेत गूदी १ से ३ माशे अरनी छाल ६ माशे से २ तोले अर्जुन छाल ६ माशे से १ ॥ तोले अशोक छाल १ तोले से ३ तोले अष्टवर्ग कन्द ६ माशे से १ तोले असगन्ध जड़ ३ माशे से १ तोले आक जड़ की छाल, फूल १-३ माशे आम फल, छाल ६ माशे से १ तोले CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

११०२ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे आमला फल का छिलका ५ माशे से १ तोले आमाहल्दी जड़ की गाँठ १ से ४ माशे आम्रातक फल, पत्ते ४ से ९ माशे इनारुन फल, जड़ १ से ३ माशे इन्द्रयव बीज ५ रत्ती से ३ माशे इमली फल १ से ३ तोले इलायची छोटी बीज २-४ माशे इलायची बड़ी बीज ३-५ माशे एकांगी जड़ ३-६ माशे जड़ ६ माशे से २ तोले एरंड बीज २ से ७ दाने तेल ६ माशे १।। तोले ओंगा पंचांग १-२ तोले बीज ३-६ माशे औषर लवण नमक ३-९ माशे कंटकारी जड़ पंचांग २-६ माशे ककड़ी बीज ३-९ माशे ककही जड़, जड़ का छाल, बीज ५-१० माशे कचनार छाल ६ माशे से २ तोले कचूर जड़ २-३ माशे कटसरैया पञ्चाङ्ग-पत्ते ३-८ माशे कठूमर फल-छाल ३- माशे से १ तोले कद्दू बीज ६-९ माशे कनेर जड़, विषैला ६ रत्ती से २ माशे कपास जड़ १-२ तोले बीज २-६ माशे कपूर गोंद, सत्त्व १/८-१/४ रत्ती कबीला लालरज १-२ माशे कमल बीज, फूल, जल ३-४ माशे करञ्ज छाल, बीज १-६ माशे कलम्बी पत्ते-स्वरस ३-९ माशे कलिहारी जड़ (विष) १-४ रत्ती कुसुम फूल, बीज ३-१० माशे CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

परिशिष्ट २ ११०३ कसेरू जड़ ६ माशे से १ तोले कसोंदी जड़, बीज ३-६ माशे कस्तूरी मृगमद १/२ से २ रत्ती काकजंघा पञ्चाङ्ग-पत्ते ८-९ माशे काकड़ाशिङ्गी फल १-३ माशे कायफर छाल ३-७ माशे काला जीरा बीज ६-७ माशे कालादाना बीज २-६ माशे कालीजीरी बीज २-३ माशे कास जड़ १-२ तोले किवाछ जड़, बीज ६-९ माशे कुकरवदा पत्ते जड़ ६-९ माशे कुचला बीज (विष) शुद्ध १-२ रत्ती कुटकी जड़ १ ॥-३ माशे कुन्दरु गोंद २-४ माशे कुमुद फूल ६ से १० माशे बीज ५ से ६ माशे कुलञ्जन जड़ ३-९ माशे कुशा जड़ १-२ तोला कूठ जड़ ३-९ मा. कूड़ा छाल ६ माशे से १ तोला केला स्तम्भरस १-२ तोला केसर फूल २-६ रत्ती कोलकन्द कन्द (सविष) १/२ से १ ॥ रत्ती खजूर फल १-२ तोला खपरिया शुद्ध भस्म १-४ रत्ती खरबूजा बीज ६-९ माशे खस जड़ ३-६ माशे खीरा बीज ६-९ माशे खुरासानी अजवायन शुरासाना बीज १-२ माशा अजमोद