भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
आम्रादिफलवर्गः ७२९ बेर के भेद तथा उनके लक्षण और गुण-सौवीर के लक्षण-जो बेर, पका हुआ अत्यन्त मीठा और बड़ा हो उसे सौवीर कहते हैं। सौवीर (बेर)-शीतल, मल का भेदन करने वाला, गुरु, शुक्रजनक, बृंहण (रस-रक्तादि वर्धक) एवम् पित्त, दाह, रक्तविकार, क्षय तथा प्यास को दूर करने वाला होता है। कोल के लक्षण-जो सौवीर नामक बेर छोटा, मधुर तथा पका हुआ हो उसे कोल समझना चाहिये। कोल (बेर)-ग्राही, रोचक, उष्ण, कफ तथा पित्तजनक, गुरु, सारक एवम् वातनाशक होता है। कर्कन्धू के लक्षण-छोटे बेर को कर्कन्धू कहते हैं। कर्कन्धू-अम्ल, तिक्त, कषाय तथा किञ्चित् मधुर रसयुक्त, स्निग्ध, गुरू एवम्-वात तथा पित्त नाशक है। सभी प्रकार के बेर यदि सूखे हों तो वे-मलभेदक, जठराग्निवर्धक, लघु एवम् प्यास, क्लान्ति तथा रक्तविकार के नाशक होते हैं। [७३-७७] नोट-भावप्रकाशकार बेर के तीन भेद सौवीर, कोल तथा कर्कन्धू लिखते हैं जो क्रमशः एक-दूसरे से छोटा होता है। सौवीर सबसे बड़ा है जिसे उन्नाव या राजबदर कहा जाता है। इसका उपयोग करना चाहिये। दूसरा कोल है जो साधारण बेर होता है। तीसरा सबसे छोटा कर्कन्धू है जिसे झड़बेरी, झड़बेर कहते हैं। राजनिघंटु ने चौथा भेद घोण्टा (Zizyphus xylopyra, Willd-झिझीफस् क्साइलोपाइरा) लिखा है जिसे काठ बेर कहते हैं। भावप्रकाशकार ने इसे सौवीर का पर्याय बतलाया है। एक अन्य वल्ली बदर (Z. oenoplia-झि. इनोप्लिया) एवं अन्य भेद भी होते हैं। यहाँ संक्षेप में मुख्य भेदों का वर्णन किया गया है। २२. उन्नाव (सौवीर, राजबदर) सं०-सौवीर, राजबदर। हिं०-उन्नाव। अं०-Jujube (जुजुबे)। ले०-Zizyphus sativa Gaertn. (झिझीफस् सटाइवा); Z. vulgaris Lam. (झि० वल्गेरिस्)। Fam. Rhamnaceae (हॅम्नेसी)। यह पंजाब, हिमालय में ६५०० फीट तक, पूर्व में बंगाल तक, उत्तरपश्चिम सीमांत प्रदेश तथा बलूचिस्तान में होता हैं। अधिकतर चीन, ईरान आदि देशों से यह आते हैं। इसका क्षुप-छोटा तथा काँटेदार होता है। पत्ते-अंडाकार या गोल होते हैं। पुष्प-सितम्बर के अन्त में छोटे हरिताभ श्वेत आते हैं। फल-लाल, बहुत झुर्रीदार, १ से १॥ इञ्च लम्बा, १ इञ्च चौड़ा, बेर की तरह गोल रहता है जिसका गूदा गुठली से चिपका हुआ, मीठा, पीला तथा हलका होता है। गुठली लम्बी, कड़ी तथा झुर्रीदार होती है। इसके पत्तों को चबाने से सभी प्रकार के स्वाद का ज्ञान ५ से २० मिनट के लिये समाप्त हो जाता है। रासायनिक संगठन-इसमें शर्करा तथा लबाब रहता है। गुण और प्रयोग-यह मधुर, स्नेहन तथा कफशामक है। छाल ग्राही, व्रणरोपण तथा व्रणशोधन है। (१) इसका शरबत खाँसी में दिया जाता है। सूखी खाँसी में उन्नाव, गोंद, चीनी तथा गुलाब पत्ती को पकाकर तैयार की गई गोली मुँह में रखकर चूसते हैं। (२) पत्तों को पीसकर बिच्छू काटने पर बाँधते हैं। (३) छाल का क्वाथ शीतज्वर में अतिसार तथा शिथिलता आने पर देते हैं। इससे व्रण प्रक्षालन भी किया जाता है। मात्रा-५ से ७ बेर।
७३० भावप्रकाशनिघण्टुः २३. बेर (कोल, बदर) हिं०-बेर, बैर, बहर। बं०-कुल बेर। म०-बोर, बोरीचे झाड़। गु०-बीर। ता०-इलंदै। ते०-रेगु चेट्टु। अ०-सिदर नवङ्क। अं०-Plum (पल्म)। ले०-Zizyphus jujuba Lam. (झिझिफस् जुजुबा)। Fam. Rhamnaceae (हॅम्नेसी)। बेर प्रायः सब प्रान्तों में होता है। यह जंगलों में आप ही आप उत्पन्न होता है और बागों में रोपण किया जाता है। इसका वृक्ष-मध्यमाकार का होता है और शाखायें बहुत होती हैं। वृक्ष और शाखायें छोटे-छोटे तीक्ष्ण काँटों से भरी रहती हैं। पत्ते-१-१॥ इञ्च के घेरे में गोलाई लिये लम्बे होते हैं। फूल-हरापन युक्त सफेद आते हैं। फल-संख्या में बहुत, अण्डाकार, पकने पर फीके पीले या नारंगी रंग के होते हैं। गुठली-कठोर होती है। गुण और प्रयोग-इसके फल स्नेहन, रक्तस्तम्भक, पाचन, रक्तशोधन, हृद्य, उदर्द प्रशमन, अमहर एवं वातसंशमन हैं। इसके बीज हिक्का निग्रहण एवं नेत्त्र्य हैं। इसका पत्रलेप ज्वर एवं दाहनाशक है। इसकी छाल, विस्फोट शामक तथा अतिसार में लाभदायक है। २४. झड़बेर (कर्कन्धू, क्षुद्रबदर) हि०-झड़बेर, झरबेर, झड़बेरी। पं०-कोकनबेर। म०-जंगलीबोर। गु०-चणीआंबोर, चणीबोर। ले०- Zizyphus nummularia W. & A. (झिझीफस् न्यूम्यूलेरिया)। Fam. Rhamnaceae (हॅम्नेसी)। यह शुष्क भागों में प्रायः सभी जगह पाया जाता है। इसका वृक्ष-झाड़ के समान एक गज तक ऊँचा और शाखायें-सूक्ष्म काँटों से भरी हुई पतली-पतली भूमि की ओर नत रहती हैं। पत्ते-उक्त बेर के पत्तों के आकार के परन्तु उनसे छोटे होते हैं। फल-छोटे-छोटे उन्नाव के समान होते हैं। गुण और प्रयोग-इसके फल शीतल ग्राही एवं पित्तशामक होते हैं। इसकी पत्तियाँ पामा तथा फोड़े पर लगाई जाती हैं। अथ प्राचीनामलकम् (पानी आँवला)। तस्य नामानि गुणांश्चाह प्राचीनामलकं लोके पानीयामलकं स्मृतम्। प्राचीनामलकं दोषत्रयजिज्ज्वरघाति च ।।७८।। पानी आँवला के संस्कृत नाम-प्राचीनामलक तथा पानीयामलक हैं। पानी आँवला-त्रिदोष तथा ज्वर को दूर करने वाला होता है। [७८] २५. पानी आमला हिं०-पानी आमला, पानी आँवड़ा (रा), पनियाला। बं०-पानिआमला। म०-पान आँवला, तांबर। गु०- तालिसपत्र। अं०-Puneala plum (पनियाला प्लम्)। ले०-Flacourtia cataphracta Roxb. (फ्लाकोर्शिया कॅटाफ्रॅक्टा)। Fam. Flacourtiacae (फ्लाकोर्शियेसी)। यह बंगाल, आसाम, चट्टगाँव, कोंकण आदि प्रान्तों में पाया जाता है। इसका वृक्ष-छोटे कद का होता है और शाखाओं पर लम्बे एवं बहुविभक्त काँटे होते हैं। पत्ते-३ से ५ इञ्च लम्बे, आयताकार या आयताकार-भालाकार, लम्बाग्र, चिकने एवं गोल या आरावत् दन्तुर होते हैं। फूल-बहुत छोटे-
आम्रादिफलवर्ग: ७३१ छोटे बेर के समान होते हैं। फल-झरबेर के समान गोलाकार, व्यास में .८-१ इंच, खानेलायक और पकने पर लाल हो जाते हैं। इसके फल में विशेष गंध रहती है। गुद्दी भूरापन लिये हरी तथा रसदार रहती है। रासायनिक संगठन-बीजों में तेल होता है। गुण और प्रयोग-यह पित्तशामक है। पित्तप्रकोप में इसको देते हैं। इससे वमन तथा विरेचक रुक जाता है। दंतशूल तथा मसूढ़े से खून आता हो तो इसके पत्ते तथा छाल के क्वाथ से कुल्ला कराते हैं। अथ लवली (हरफारेवडी)। तस्या नामानि तत्फलगुणांश्चाह सुगन्धमूला लवली पाण्डुः कोमलवल्कला ॥७९॥ लवलीफलमश्मार्शःकफपित्तहरं गुरु । विशदं रोचनं रूक्षं स्वाद्वम्लं तुवरं रसे ॥८०॥ हरफारेवड़ी के संस्कृत नाम-सुगन्धमूला, लवली, पाण्डु तथा कोमलवल्कला ये सब हैं। हरफारेवड़ी का फल-विशद गुणयुक्त, रोचक, रूक्ष, गुरु, स्वादिष्ट, अम्ल तथा कषाय रसयुक्त एवम्-पथरी, अर्श, कफ तथा पित्त को नष्ट करनेवाली होती है। [७९-८०] २६. हरफारेवड़ी हिं०-हरफारेवड़ी (री), लवली, हरफरौरी । बं०-नोयाल, हरफल । म०-रायआँवल । गु०-खाटी आँवल । ता०-अरिनेल्लिल । ते०-राच्युयसरिके । क०-करिनेल्लिल । अं०-Star gooseberry (स्टार गूजबेरी), (कण्ट्री गूजबेरी) । ले०-Cicca acida (Linn.) Merrill (सिक्का ॲसिड़ा); Syn. Phyllanthus distichus Muell. Skells (फाइलेन्थस् डिस्टिकस्) । Fam. Euphorbiaceae (युफोर्बिएसी) । प्रायः यह सब प्रान्त की वाटिकाओं में लगाई हुई देखने में आती है। इसका वृक्ष-मध्यमाकार का, २० फीट ऊँचा तथा सुहावना दिखाई पड़ता है। पत्ते-कसौंदी के पत्तों के आकार वाले, सींकों के दोनों ओर एकान्तर लगते हैं। देखने में ये यद्यपि पक्षवत् सपत्रक मालूम होते हैं तथापि ये अपत्रक होते हैं । वसन्त ऋतु में इस पर फूल लगते हैं। फूल-बारीक गुलाबी रंग के गुच्छों में मोटी-मोटी डालियों पर आते हैं। फल-खट्टे, नतशीर्ष, गोल, सतह पर ८ से १० नालियों से युक्त एवं खाने लायक होते हैं। इसको कच्चा या पकाकर, खाते हैं तथा आचार, मुरब्बा आदि भी बनाते हैं। पत्तों का साग बनाते हैं। रासायनिक संगठन-फलों में ॲसेटिक ॲसिड होता है। मूल की छाल में टैनिन्, सॅपोनिन्, गॅलिक ॲसिड तथा एक रवेदार पदार्थ होता है। गुण और प्रयोग-फल अम्ल तथा ग्राही है। मूल तथा बीज विरेचक होते हैं। पत्ते तथा मूल का सर्पविष में प्रयोग किया जाता है। इसके मूल की छाल का रस विषैला रहता है तथा इससे सर में दर्द, सुस्ती, तीव्र उदर शूल तथा मृत्यु होती है। अथ करमर्दः, करमर्दिका च (करौंदा-करौंदी) । तयोर्नामानि पक्वापक्वतत्फलगुणांश्चाह करमर्दः सुषेणः स्यात्कृष्णापाकफलस्तथा । तस्माल्लघुफला या तु सा ज्ञेया करमर्दिका ॥८१॥ करमर्दद्वयं त्वाममम्लं गुरु तृषाहरम् । उष्णं रुचिकरं प्रोक्तं रक्तपित्तकफप्रदम् ॥ तत्पक्वं मधुरं रुच्यं लघु पित्तसमीरजित् ॥८२॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
७३२ भावप्रकाशनिघण्टुः करौंदा के संस्कृत नाम—करमर्द, सुषेण तथा कृष्णापाकफल ये सब हैं। इसकी अपेक्षा छोटे फल जिसके हों उसे संस्कृत में 'करमर्दिका' कहते हैं। दोनों प्रकार के करौंदे के कच्चे फल—अम्ल (खट्टे), पाक में गुरु, तृष्णानाशक, उष्ण, रुचिजनक तथा रक्तपित्त और कफ के वर्धक होते हैं। पके फल—मीठे, रुचिजनक, लघु, एवम्—पित्त तथा वायु के नाशक होते हैं। [८१-८२] २७. करोंदा हिं०—करोंदा, करौंदा। बं०—करमचा। म०—करवंद। गु०—करमदां। क०—करिजिगे। ते०—वाका, करवन्दे। ता०—कलक्के। ले०—Carissa carandas Linn. (केरिसा कॅरण्डस्)। Fam. Apocyuaceae (एपोसाइनेसी)। यह प्रायः बाग-बगीचों में रोपण किया जाता है तथा सभी भागों में होता है। इसका वृक्ष—छोटा, झाड़दार और सदा हरा-भरा रहता है। इस पर तीक्ष्ण युग्म काँटे होते हैं। पत्ते—१।।-२ इञ्च लम्बे, १-१।। इञ्च चौड़े नींबू के पत्तों के समान होते हैं। फूल—सफेद रंग के आते हैं और उनसे सुगन्ध आती है। फल— झरबेर के आकारवाले, ½-१ इञ्च लम्बे, काले या सफेदी युक्त लाल रंग के होते हैं। इनका स्वाद अत्यन्त खट्टा होता है। इसकी अन्य दो तीन जातियाँ होती हैं जिनमें से एक दक्षिण की तरफ होती है जिसमें फल बड़े होते हैं तथा अन्य छोटे फल वाली सभी स्थानों पर होती है जिसे मूल में करमर्दिका कहा गया है। गुण और प्रयोग—इसके फल, मूल तथा पत्तों का उपयोग किया जाता है। यह शीतल, रक्तपित्तशामक एवं हृद्य है। यह प्रशीताद नामक मसूढ़े के रोग में जिसमें मसूढ़े से खून आता है, लाभदायक हैं। इसकी जड़ कटु, तिक्त, वामक एवं मूत्रजनन है। इसका उपयोग सर्प ने काटा है या नहीं इसकी परीक्षा के लिये करते हैं। इसको शीत जल में घिसकर पिलाते हैं। यदि साँप ने काटा है तो वमन नहीं होता। नींबू के रस में कपूर के साथ इसे घिसकर बच्चों को होने वाले सफेद पानीदार फोड़ों पर लेप करते हैं। विषमज्वर में पत्तों का क्वाथ पिलाते हैं। अथ प्रियालः (चिरौंजी)। तस्य नामानि तत्फलस्य च गुणाँश्चाह प्रियालस्तु खरस्कन्धश्चारो बहुलवल्कलः। राजादनस्तापसेष्टः सन्नकद्रुर्धनुष्पटः ।।८३।। चारः पित्तकफास्रघ्नस्तत्फलं मधुरं गुरु। स्निग्धं सरं मरुत्पित्तदाहज्वरतृषाऽपहम् ।।८४।। चिरौंजी के संस्कृत नाम—प्रियाल, खरस्कन्ध, चार, बहुलवल्कल, राजादन, तापसेष्ट, सन्नकद्रु और धनुष्पट ये सब हैं। चिरौंजी—पित्त, कफ तथा रक्तविकार को दूर करने वाली होती है। चिरौंजी के फल—मधुर, गुरु, स्निग्ध, मलसारक एवं—वात, पित्त, दाह, ज्वर तथा तृषा को दूर करने वाले होते हैं। [८३-८४] अथ तन्मज्जगुणानाह प्रियालमज्जा मधुरो वृष्यः पित्तानिलापहः। हृद्योऽतिदुर्जरः स्निग्धो विष्टम्भी चामवर्द्धनः ।।८५।। चिरौंजी की मींगी—मधुर रसयुक्त, वृष्य (वीर्यवर्धक), हृदय को हितकर, अत्यन्त देर में पचने वाली, स्निग्ध, मल का विष्टम्भ करने वाली, आम को बढ़ानेवाली तथा पित्त और वायु को नष्ट करने वाली होती है। [८५] २८. चिरौंजी हिं०—चिरोंजी, चिरौंजी। बं०—चिरौंजी, पियाल। म०, गु०—चारोली। क०—चारनीज, नरकल। ते०— सारुपपु। ता०—मुड़इमा। फा०—नुकले खाजा, नुकुलख्वाजह। अ०—हब्बुस्समाना, हब्बुल समनह। ले०—Buchanania latifolia Roxb. (बुचनैनिया लेटिफोलिया)। Fam. Anacardiaceae (ॲनेकार्डिएसी)। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
आम्रादिफलवर्गः ७३३ यह इस देश के गरम और सूखे प्रान्तों में अधिक पाई जाती है। चिरौंजी का वृक्ष-मध्यमाकार का होता है। कहीं-कहीं ५० फीट तक ऊँचा वृक्ष देखा जाता है। छाल-मोटी, गहरे धूसर वर्ण की एवं चौकोर आकार में फटी हुई होने से मगर के चमड़े की तरह दिखलाई देती है। पत्ते-कड़े, अखण्ड, आयताकार या लट्वाकार-आयताकार एवं ६-१० इञ्च लम्बे होते हैं। फूल-श्वेत एवं मञ्जरियों में चौथाई इञ्च के घेरे में गोलाकार होते हैं। फल-लम्बाई युक्त गोलाकार दबे हुए, १/२ इञ्च व्यास के, एक बीजयुक्त तथा काले रंग के होते हैं। फल तथा उसके भीतर की मज्जा जिसे चिरौंजी कहते हैं खाई जाती है। इसके वृक्ष से गोंद भी निकलता है। रासायनिक संगठन-मज्जा में ५१.८% तेल, २१.६% प्रोटीन तथा ५% शर्करा होती है। तेल हलके पीले रंग का, सुगंधित तथा बादाम या जैतून के तेल सदृश होता है। छाल में टैनिन होता है। गुण और प्रयोग-चिरौंजी बहुत अच्छी पौष्टिक एवं बृंहण है। इसको बादाम के स्थान पर उपयोग में ला सकते हैं। इसकी पेया खाँसी में दी जाती है। बालों को काला बनाने के लिये तेल का उपयोग करते हैं। त्वचा के रोगों में इसका उबटन बनाकर लगाते हैं। गोंद का उपयोग अतिसार में करते हैं। अथ राजादनः (खिरनी)। तस्य नामानि तत्फलगुणाँश्चाह राजादनः फलाध्यक्षो राजन्यो क्षीरिकाऽपि च ।।८६।। क्षीरिकायाः फलं वृष्यं बल्यं स्निग्धं हिमं गुरु। तृष्णामूर्च्छामदभ्रान्तिक्षयदोषत्रयास्रजित् ।।८७।। खिरनी के संस्कृत नाम-राजादन, फलाध्यक्ष, राजन्या तथा क्षीरिका ये सब हैं। खिरनी के फल-वृष्य, बलकारक, स्निग्ध, शीतल, गुरु एवम्-तृषा, मूर्च्छा, मद, भ्रान्ति, क्षय, त्रिदोष तथा रक्तविकार को दूर करने वाले होते हैं। [८६-८७] २९. खिरनी हिं०-खिरनी, खिर्नी, खित्री। बं०-खीर खजूर। म०-खिरणी, रांजण। गु०-रायण काकडिआ। क०- खिरणी मारा। ता०-पल्ल, पलै। ते०-पालमानु। ले०-Mimusops hexandra Roxb. (माइमुसोप्स हेक्सैंड्रा)। Fam. Sapotaceae (सॅपोटेसी)। यह प्रायः सब प्रान्तों में पायी जाती है। विशेषकर दक्खन से गुजरात तक और बान्दा में अधिक मिलती है। इसके वृक्ष कहीं बड़े और कहीं छोटे दिखाई पड़ते हैं। पत्ते-२-३ इञ्च लम्बे, १-१।। इञ्च चौड़े अंडाकार होते हैं और वे टहनियों के अन्त में सघन रहते हैं। फूल-चक्राकार, छोटे-छोटे सफेद या फीके पीले रंग के आते हैं। फल- आध इञ्च तक लम्बे, चिपटे और पकने पर पीले हो जाते हैं। इसकी लकड़ी कड़ी होती है। इसके फल खाये जाते हैं। छाल तथा बीज तैल का उपयोग किया जाता है। रासायनिक संगठन-इसके फल में फल शर्करा ७०% होती है। बीजों में तेल पाया जाता है। गुण और प्रयोग-छाल संग्राही है एवं तेल बल्य तथा स्नेहन होता है। छाल का प्रयोग वकुल की छाल की तरह किया जाता है। अथ विकङ्कतः (कण्टाई)। तस्य नामानि तत्पक्वफलगुणाँश्चाह विकङ्कतः स्रुवावृक्षो ग्रन्थिलः स्वादुकण्टकः। स एव यज्ञवृक्षश्च कण्टकी व्याघ्रपादपि ।। विकङ्कतफलं पक्वं मधुरं सर्वदोषजित् ।।८८।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA
७३४ भावप्रकाशनिघण्टुः कण्टाई के संस्कृत नाम-विकङ्कत, स्रुवावृक्ष, ग्रन्थिल, स्वादुकण्टक, यज्ञवृक्ष, कण्टकी तथा व्याघ्रपाद् ये सब हैं। कण्टाई के फल-यदि पके हों तो वे मधुर रसयुक्त सभी दोषों को दूर करने वाले होते हैं। [८८] ३०. विकंकत (कंटाई) हिं०-कंटाई, बिलंगरा, कंजू। बं०-बइञ्चि गाछ, बैंची। म०-बेहकल काकेर। गु०-कांकोड। क०- हलुमाणिका। ते०-कानवेगु चेट्टु। ता०-सोट्टैटैकला। अं०-Governor's Plum (गवर्नर्स प्लम)। ले०- Flacourtia ramontchi L' Herit (फ्लेकोर्शिया रामोंशी)। Fam. Flacourtiaceae (फ्लेकोर्शियेसी)। यह हिमालय, बिहार, मध्यभारत, दक्खन, कोंकण आदि प्रदेशों में उत्पन्न होता है। इसका वृक्ष-छोटा होता है। शाखाओं पर काँटे रहते हैं। पत्ते-विभिन्न आकार के, चमकीले, प्रायः ४ इञ्च से कम लम्बे, वृत्ताकार या आयताकार-अभिलट्वाकार, कुंठिताग्र एवं गोल या आरावत् दन्तुर होते हैं। फूल-पीताभ हरित और बारीक होते हैं। फल-आध इञ्च के घेरे में गोलाकार, गूदेदार, चिकने और पकने पर गहरे बैंगनी या लाल हो जाते हैं। बीज-अनेक तथा छोटे-छोटे होते हैं। इसके कई भेद पाये जाते हैं। फलों का स्वाद तीक्ष्ण किंतु मधुर होता है तथा गंध भी अच्छी होती है। गुण और प्रयोग-फल दीपन एवं पाचन होते हैं। कामला एवं प्लीहा वृद्धि में फल देते हैं। छाल कषाय एवं मूत्रल होती है। अथ पद्माक्षम् (कमलगट्टा) । तस्य नामानि गुणाँश्चाह पद्मबीजं तु पद्माक्षं गालोड्यं पद्मकर्कटी। पद्मबीजं हिमं स्वादु कषायं तिक्तकं गुरु ॥८९॥ विष्टम्भि वृष्यं रूक्षञ्च गर्भसंस्थापकं परम् । कफवातकरं बल्यं ग्राहि पित्तास्रदाहनुत् ॥९०॥ कमलगट्टा के संस्कृत नाम-पद्मबीज, पद्माक्ष, गालोड्य तथा पद्मकर्कटी ये सब हैं। कमलगट्टा-स्वादिष्ट, कषाय तथा तिक्तरसयुक्त, शीतल, गुरु, विष्टम्भक, वृष्य (वीर्यवर्धक), रूक्ष, गर्भ को विशेषतः स्थापित करनेवाला, कफ तथा वातजनक, बलदायक, ग्राही एवम् पित्त, रक्तविकार या रक्तपित्त और दाह को दूर करने वाला होता है। [८९-९०] ३१. कमलगट्टा हिं०-कमलगट्टा, कमल के बीज। बं०-पद्म बीचि। म०-कमलाक्ष, कमलाचे बीज। गु०-कमल काकड़ी, पबड़ी। क०-ताबड़े बीज, पद्माक्ष। ते०-तामरकारा, तामरकाई। यू०-गुलहार। अ०-बालके कुवति। कमल के बीजों को कमलगट्टा कहते हैं। यह रीठे की गुठली के समान परन्तु लम्बाई युक्त गोल तथा चिकना होता हैं और कमलकोष के भीतर से निकलता है। छिलका-कठोर होता है और गिरी सफेद होती है। गिरी के बीच में हरे रंग की पत्ती रहती हैं। उसको निकाल कर व्यवहार में लाना चाहिये। नोट-अन्य वर्णन कमल के साथ (पृष्ठ ४८०) किया गया है। अथ मखान्नम् (मखाना) । तस्य नामानि गुणाँश्चाह मखान्नं पद्मबीजाभं पानीयफलमित्यपि। मखान्नं पद्मबीजस्य गुणैस्तुल्यं विनिर्दिशेत् ॥९१॥ मखाना के संस्कृत नाम-मखान्न, पद्मबीजाभ तथा पानीयफल ये सब हैं। मखाना-गुणों में कमलगट्टा के समान ही समझना चाहिये। [९१] CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA
आम्रादिफलवर्गः ७३५ ३२. मखाना हिं०-मखाना, मखान्ना। बं०-माखाना। गु०-मखाणा। म०-मखाणे, मकाणे। ते०-मेल्लुनिपदममु। प०-जवेर। अं०-Fox nut (फॉक्स नट), Gorgon fruit (जार्गन फ्रूट)। ले०-Euryale ferox Salisb. (युरीएल फेराक्स)। Fam. Nymphaeaceae (निम्फिएसी)। यह उत्तर, मध्य तथा पश्चिम भारत के स्वच्छ पानी के तालाबों तथा झीलों में होता है। इसका क्षुप-कांडहीन, काँटेदार तथा कमल के समान जल में होता है। पत्ते-कमल के समान, तैरते हुये, गोलाकार, १ से ४ फीट व्यास में, ऊपर से हरे किन्तु नीचे से लाल या बैंगनी, मृदुरोमश एवं शिराओं पर काँटों से युक्त होते हैं। फूल-१-२ इञ्च लम्बे, भीतर की ओर लाल चमकीले और बाहर से हरे रंग के होते हैं। फल-दो से चार इञ्च के घेरे में गोलाकार एवं काँटेदार होते हैं। बीज-मटर या मटर से कुछ बड़े होते हैं। यह संख्या में ८ से २० एवं काले रहते हैं। इन्हें कच्चे या भूनकर खाते हैं। बालू में भूनने से ये फूल जाते हैं जिन्हें मखाना कहा जाता है। इसका आटा अरारूट के समान होता है। रासायनिक संगठन-सौ भाग मखाने में प्रोटीन ९.७, आर्द्रता १२.८, कार्बोहाइड्रेट ७६.९, स्नेह ०.१; लोह १.४ मि० ग्रा० १०० ग्राम में एवं अल्प खटिक, फॉस्फोरस तथा कैरोटीन आदि द्रव्य पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग-मखाना बल्य, वाजीकर एवं ग्राही है। इसको प्रसवान्त दौर्बल्य, शुक्रस्राव एवं वीर्याल्पता में दूध में पकाकर खिलाते हैं। यह सुपाच्य होता है तथा आहार के रूप में इसका उपयोग किया जा सकता है। अथ शृङ्गाटकम् (सिंघाड़ा) । तस्य नामानि गुणांश्चाह । शृङ्गाटकं जलफलं त्रिकोणफलमित्यपि ।।९२।। शृङ्गाटकं हिमं स्वादु गुरु वृष्यं कषायकम्। ग्राही शुक्रानिलश्लेष्मप्रदं पित्तास्रदाहनुत् ।।९३।। सिंघाड़ा के संस्कृत नाम-शृङ्गाटक, जलफल तथा त्रिकोणफल ये सब हैं। सिंघाड़ा-स्वादिष्ट तथा कषायरसयुक्त, शीतल, गुरु, वृष्य (वीर्यवर्धक), ग्राही, शुक्र, वात तथा कफजनक एवम्- पित्त, रक्तविकार और दाह को दूर करने वाला होता है। [९२-९३] ३३. सिंघाड़ा हि०-सिंघाड़ा(रा) सिंहाड़ा(रा)। बं०-पानिफल, सिंगाड़े। म०-शिंगाड़े, शेंगाड़ा। गु०-शींघोड़ा। क०- सिंगाड़े। ते०-परिकिगडु। अं०-Water caltrops (वाटर कॅलट्राँप्स); Water Chestnut (वाटर चेस्टनट)। ले०-Trapa bispinosa Roxb. (ट्रॅपा वाइस्पाईनोसा)। Fam. Onagraceae (ओनेग्रेसी)। सिंघाड़ा-प्रसिद्ध पानीय फल अनेक प्रान्तों के बड़े छोटे ताल तलैयों में उत्पन्न होता है। इसका जलीय क्षुप- जलकुम्भी के समान पानी के ऊपर फैला रहता है। पत्ते-जलकुम्भी के समान होते हैं परन्तु वे त्रिकोणाकार होते हैं। फूल-सफेद आते हैं जो शाम को फूलते हैं। फल-त्रिधारे होते हैं और उनके ऊपर २ काँटे होते हैं जो देखने में बैल के सिर की तरह दिखलाई देते हैं। छिलका-मोटा होता है और गुदी सफेद होती है। फल को उबाल कर या कच्चा ही छिलका निकाल कर आहार के रूप में खाया जाता है। काश्मीर में एक बिना काँटे की जाति पाई जाती है। रासायनिक संगठन-इसमें मँगॅनीज तथा स्टार्च होता है। गुण और प्रयोग-यह शीत, पौष्टिक, वृष्य, शोणितास्थापन ग्राही, दीपन, दाहहर एवं श्रमहर है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
७३६ भावप्रकाशनिघण्टुः इसकी पेया अतिसार, आँव एवं प्रदर में दी जाती है। पित्त प्रकृति वालों को तथा गर्भिणी को इससे लाभ होता है। अथ कैरविणीफलम् (भेंट) तस्य नामानि गुणाँश्चाह उक्तं कुमुदबीजन्तु बुधैः कैरविणीफलम् । भवेत्कुमुद्वतीबीजं स्वादु रूक्षं हिमं गुरु ।।९४।।। कुमुदनी बीज के संस्कृत नाम-कुमुद्वतीबीज, कैरविणीफल तथा कुमुदबीज ये सब विद्वानों ने बताये हैं। कुमुदनी के बीज-स्वादिष्ट, रूक्ष, शीतल तथा पाक में गुरु होते हैं। [९४] ३४. कैरविणीफल (बेरा) हिं०-बेरी, कुमुद के बीज, कुमुदबीज, बेरा, घंघोल के दाने, भटबेरा, भेटबेरा। बं०-हेलाबीज, सुन्दी बीज। गु०-पोयणानाबीज। फा०-तुख्म नीलोफर। अ०-करनबुल् माय। कुमुद फूल के बीज को कैरविणीफल कहते हैं। इसके सम्बन्ध में अन्य वर्णन पुष्पवर्ग में कुमुद के अन्तर्गत (पृष्ठ ६४४) किया जा चुका है। अथ मधूकः (महुआ, बनमहुआ)। तस्य नामानि तत्पुष्पफलगुणाँश्चाह मधूको गुडपुष्पः स्यान्मधुपुष्पो मधुस्रवः । वानप्रस्थो मधुष्ठीलो जलजेऽत्र मधूलकः ।।९५।। मधूकपुष्पं मधुरं शीतलं गुरु बृंहणम् । बलशुक्रकरं प्रोक्तं वातपित्तविनाशनम् ।।९६।। फलं शीतं गुरु स्वादु शुक्रलं वातपित्तनुत् । अहृद्यं हन्ति तृष्णाऽस्रदाहश्वासक्षतक्षयान् ।।९७।। महुआ के संस्कृत नाम-मधूक, गुडपुष्प, मधुपुष्प, मधुस्रव, वानप्रस्थ तथा मधुष्ठील ये सब हैं। जो महुआ जल में होता है उसे "मधूलक" कहते हैं। महुवे के फूल-मधुर, शीतल, गुरु, बृंहण (रसरक्तादि-वर्धक), बल तथा शुक्रजनक एवम्-वात और पित्त को दूर करने वाले होते हैं। महुवे के फल-स्वादिष्ट, शीतल, गुरु, शुक्रजनक, हृदय के लिए अहितकर, वात तथा पित्त को दूर करने वाले एवम्-तृषा, रक्तविकार, दाह, श्वास, क्षत तथा क्षय नाशक हैं। [९५-९७] ३५. महुआ हिं०-महुआ, महुया, महुवा। बं०-मौल, मउल म०-मोहड। गु०-महुडो। क०-इष्पेमरा। ते०-इपा, पिन्ना, इप्प। ता०-कटइल्लुपि। फा०-गुलचर्का ले०-Bassia latifolia Roxb. (बेसिय लैटिफोलिया)। Fam. Sapotaceae (सॅपोटेसी)। यह बंगाल, बिहार, युक्तप्रान्त, मध्यभारत, दक्षिण आदि प्रान्तों में लगाया हुआ पाया जाता है और कुमाऊँ की तराइयों में आप ही आप जंगली उत्पन्न होता है। इसका वृक्ष-बड़ा हुआ करता है और सदा हराभरा रहता है। पत्ते-५ से ९ इञ्च तक लम्बे, चर्मवत्, दीर्घवृत्ताभ या आयताकार-दीर्घवृत्ताभ, किंचित् लम्बाग्र, आकार गोल या संकुचित, १० से १४ शिराओं से युक्त टहनियों के अन्त में एक साथ गुच्छों में रहते हैं। फूल-सफेद रंग के गूदेदार छोटी-छोटी शाखाओं के अन्त में गुच्छों में आते हैं और वे सूखने पर दाख के समान हो जाते हैं। फल-१ से २ इंच लम्बे, अंडाकार, नुकीले, गूदेदार तथा हरिताभ पीत रंग के होते हैं। बीज-किञ्चित् लाली युक्त बीज होते हैं। उनके भीतर सफेद गूदी होती है। गूदी से तेल निकाला जाता CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammu. Digitized by S3 Foundation USA
आम्रादिफलवर्गः ७३७ है। रसदार फूलों (Corollas–अन्तर्दल) को आटे में मिलाकर रोटी बनाकर गरीब लोग खाते हैं। इसके तेल का उपयोग किया जाता है। इसके फूलों से मद्य बनाया जाता है। थोड़ा सा तैयार मद्य फूलों में रहता है जिससे इनको खाने से कुछ नशा हो जाता है। इसका मद्य स्वाद में तेलिया, कषाय एवं धूएँ जैसा दुर्गन्धी रहता है जो रखने से कुछ सुधरता है। रासायनिक संगठन–इसमें सॅपोनिन तथा अन्य क्षाराभ होता है। गुण और प्रयोग–इसका नया मद्य अहितकारक होता है तथा इससे आमाशय में दाह, अनिद्रा, शिरःशूल, बेचैनी एवं मानसिक विकार होते हैं। पुराना मद्य काम में लाया जा सकता है। इसके फूल शीत, पौष्टिक एवं स्नेहन होने के कारण इनका क्वाथ ज्वर एवं कास में देते हैं। अंडशोथ में फूलों से सेकते हैं। इनको घी में भूनकर अर्शवालों को देते हैं। इसकी छाल का खुजली और सन्धिव्रात में उपयोग किया जाता है। तैल वातनाशक होता है। ३६. जलमहुआ हिं०–जलमहुआ। बं०–जल मउल। म०–जलमोहा। क०–तोरे इप्पे। ते०–पित्रा। गु०–जलमहुडो। क०–जल मह्वे। ता०–इल्लपि। ले०–Bassia longifolia Linn. (बेसियॉ लाँगीफोलिया)। Fam. Sapotaceae (सॅपोटेसी)। जलमहुआ–नदी नालों के किनारे या आर्द्र जंगलों में उत्पन्न होता है। यह दक्षिण में अधिक होता है। इसके वृक्ष पत्ते आदि महुवे के समान होते हैं पर उनसे छोटे होते हैं। नोट–उपर्युक्त वृक्ष के गुण कर्म महुवे के सदृश ही होते हैं। इसे भावप्रकाश में जल में होने वाला लिखा है किन्तु यह जल के अन्दर नहीं होता। अथ परूषकम् (फालसा)। तस्य नामानि तत्पक्वापक्वफलगुणाँश्चाह परूषकं तु परुषमल्पास्थि च परापरम्। परूषकं कषायाम्लमामं पित्तकरं लघु ॥९८॥ तत्पक्वं मधुरं पाके शीतं विष्टम्भि बृंहणम्। हृद्यन्तु पित्तदाहास्त्रज्वरक्षयसमीरहत् ॥९९॥ फालसा के संस्कृत नाम–परूषक, परुष, अल्पास्थि तथा परापर ये सब हैं। फालसा के कच्चे फल–कषाय तथा अम्ल रसयुक्त, पित्तकारक तथा लघु होते हैं। पके फलविपाक में मधुर रसयुक्त, शीतल, विष्टम्भक, बृंहण (रस-रक्तादिवर्धक), हृदय के लिए हितकर एवम् पित्त, दाह, ˙क्तविकार, ज्वर, क्षय तथा वात को दूर करने वाले होते हैं। [९८-९९] ३७. फालसा हिं०–फालसा। बं०–फलूसा। म०–फालसा। क०–वेड्ढा, दागल। ते०–चिट्टित। गु०–फालसा। फा०– फालसा, पालसह। अ०–फालसह। ले०–Grewia asiatica Linn. (ग्रिविया शियाटिका)। Fam. Tiliaceae (टिलिएसी)। इसको अनेक प्रान्तों के लोग बागों में रोपण करते हैं। इसकी अन्य जातियों को भी फालसा कहा जाता है। इसका वृक्ष–छोटा होता है। पत्ते–४-५ इञ्च लम्बे, २-२॥ इञ्च चौड़े गोलाकार एवं दंतुर होते हैं। दन्त अनियमित होते हैं तथा आधार की तरफ कुछ तिरछे होते हैं। फूल–झुमको में पीले रंग के आते हैं। फल–मटर के समान गोल, कच्ची अवस्था में हरे रंग के और पकने पर जामुनी रंग के हो जाते हैं। इसका स्वाद खट्टा तथा कुछ मधुर होता है। इसका शरबत बनाकर लोग गरमी के दिनों में पीते हैं। रासायनिक संगठन–फल में साइट्रिक अम्ल, शर्करा तथा अल्प विटामिन ‘सी’ होता है। गुण और प्रयोग–इसके पके फल शीत, विष्टम्भि, पित्तशामक, हृद्य एवं तृष्णाशामक हैं। ५० भाव.I CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA
७३८ भावप्रकाशनिघण्टुः (१) इनका उपयोग हृद्रोग, पित्तप्रकोप, ज्वर एवं दाह आदि में शरबत बनाकर करते हैं। (२) इसके मूल की छाल आमवात में लाभप्रद मानी जाती है। (३) पत्तों को पूय युक्त फुन्सियों पर लगाते हैं। इसके पत्तों के ईथरीय सत्व में पूयजनक जीवाणु (Staphylococus aureus and Escherichia coli–स्टैफिलोकोकस ऑरिअस् एवं एस्चेरिचिया कोलाई) नाशक शक्ति पाई गई है। (४) इसकी अन्तर्छाल को जल में भिगोकर, मसलकर, छानकर पीने से मधुमेह में लाभ होता है। अथ तूतः (सहतूत)। तस्य नामानि तत्पक्वापक्वफलगुणाँश्चाह तूतस्तूलश्च पूगश्च क्रमुको ब्रह्मदारु च। तूतं पक्वं गुरु स्वादु हिमं पित्तानिलापहम्॥ तदेवामं गुरु सरमम्लोष्णं रक्तपित्तकृत्॥१००॥ सहतूत के संस्कृत नाम-तूत, तूल, पूग, क्रमुक तथा ब्रह्मदारु ये सब हैं। सहतूत के पके फल-स्वादिष्ट, गुरु, शीतल एवम्-पित्त तथा वात के नाशक होते हैं। यदि कच्चे फल हों तो वे-अम्ल रसयुक्त, उष्ण, पाक में गुरु एवम्-रक्तपित्त को उत्पन्न करने वाले होते हैं।[१००] ३८. तूत हिं०-सहतूत, तूत, शाहतूत। बं०-तूँत। म०-तूते। गु०-शेतूर। ते०-पुतिका। ता०-कम्बली। फा०- शाहतूत, तूततुर्श। अ०-तूत, तूद हामीज। अं०-Mulberry (मलबेरी)। ले०-Morus indica Griff. (मोरस् इण्डिका)। Fam. Moraceae (मोरेसी)। तूत-आसाम, बंगाल, बिहार, उत्तर प्रदेश आदि प्रान्तों में उत्पन्न होता है तथा बागों में लगाया भी जाता है। इसका वृक्ष-मध्यमाकार का होता है। पत्ते-२ से ५ इञ्च लम्बे, २-३ इञ्च चौड़े, अंडाकार, अञ्जीर के पत्तों के समान कटे हुए होते हैं। फूल-मंजरियों में आते हैं। तूत की दो-तीन जातियाँ होती हैं जिनके पत्ते आदि एक समान होते हैं। इसके पत्ते को रेशम के कीड़े बड़े चाव से खाते हैं। इसलिए रेशम के कीड़े पालने वाले प्रायः इसका वृक्ष रोपण कर रखते हैं। इनमें से एक के फल पीताभ श्वेत एवं मीठे तथा दूसरे के मधुराम्ल एवं रक्ताभ कृष्ण होते हैं। वन्य तथा ग्राम्य भेद से भी इसके भेद होते हैं। इसकी एक जाति मो० लिविगेटा (M. laevigata Wall.) सिक्किम की तराई में प्रायः वन्य अवस्था में मिलती है जिसका नेपाली नाम किमू या किम्बू होता है। तूत के पर्याय में क्रमुक आया है और क्रमुक से लोग पूग (सुपारी) का ग्रहण करते हैं किन्तु चरकोक्त चार त्वगासवयोनि वृक्षों में क्रमुक के स्थान पर पूग का ग्रहण उचित नहीं जान पड़ता। वहाँ तो क्रमुक से कोई ऐसी छाल अभिप्रेत है जिसमें अन्य द्रव्यों के समान रेचन गुण हो। इन आधारों पर श्री डा० बलवन्तसिंहजी ने चरकोक्त त्वगासवयोनि वृक्षों में के क्रमुक को पूग न मानकर इस तूद के भेद को माना है। (बिहार की वनस्पतियाँ, पृष्ठ १२३)। गुण और प्रयोग-इसका रस दाहशामक, पिपासाहर एवं कुछ कफघ्न है। इसका ज्वर में प्रयोग करते हैं। इसकी छाल कृमिघ्न तथा विरेचक होती है। इसके पत्तों के क्वाथ से स्वर भंग में गण्डूष कराते हैं। इसकी जड़ कृमिघ्न तथा ग्राही होती है। मात्रा-त्वक्क्वाथ ५ से १० तोला; फलस्वरस २ से ५ तोला। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
आम्रादिफलवर्गः ७३९ अथ दाडिमः (अनार) । तस्य नामानि तत्फलभेदाँश्चाह दाडिमः करको दन्तबीजो लोहितपुष्पकः । तत्फलं त्रिविधं स्वादु स्वादम्लं केवलाम्लकम् ॥१०१॥ अनार के संस्कृत नाम-दाडिम, करक, दन्तबीज तथा लोहितपुष्पक ये सब हैं। फल के भेद-अनार के फल स्वाद में तीन प्रकार के होते हैं। (१) कोई मधुर रसयुक्त, (२) कोई मधुर तथा अम्ल रसयुक्त (३) और कोई केवल अम्ल ही होते हैं। [१०१] अथ तत्फलभेदानां गुणानाह तत्तु स्वादु त्रिदोषघ्नं तृड्दाहज्वरनाशनम् । हृत्कण्ठमुखगन्धघ्नं तर्पणं शुक्रलं लघु ॥१०२॥ कषायानुरसं ग्राहि स्निग्धं मेधाबलावहम् ॥१०३॥ स्वादम्लं दीपनं रुच्यं किञ्चित्पित्तकरं लघु । अम्लन्तु पित्तजनकमार्म वातकफापहम् ॥१०४॥ मीठे अनार-आरम्भ में मीठे अन्त में कसैले, सन्तर्पण करने वाले, शुक्रजनक, लघु, ग्राही, स्निग्ध, मेधा तथा बलवर्धक एवम्-त्रिदोष, तृषा, दाह ज्वर, हृदय तथा कण्ठ-सम्बन्धी रोग, और मुख के दुर्गन्ध को दूर करने वाले होते हैं। कुछ मीठे कुछ खट्टे अनार-अग्निदीपक, रुचिजनक, लघु तथा किंचित् पित्तकारक होते हैं। खट्टे अनार- अम्ल रसयुक्त, पित्तजनक एवम्-आम, वात तथा कफ के नाशक होते हैं। [१०२-१०४] ३९. अनार हिं०-अनार, दाड़िम। बं०-दाड़िम, दालिम गाछ। म०-डालिम्ब। गु०-दाड़म। क०-दालिम्ब। ते०- दालिम्बकाया। ता०-मादलै, मडलै, मडलम। अं०-Pomegranate (पोमेग्रेनेट्)। ले०-Punica granatum Linn. (प्युनिका ग्रॅनेटम्) । Fam. Punicaceae (प्युनिकेसी) । प्रायः सब प्रान्त की वाटिकाओं में अनार के वृक्ष लगाये जाते हैं। यह हिमालय में ३ से ६ हजार फीट तक तथा अफगानिस्तान एवं फारस में वन्य रूप में पाया जाता है। इसका वृक्ष-छोटा अनेक शाखा-प्रशाखा करके झाड़दार होता है। पत्ते-विपरीत या न्यूनाधिक विपरीत या समूहबद्ध, अत्यन्त सूक्ष्म पारभासक छींटों से युक्त, १-२॥ इञ्च लम्बे, आयताकार या अभिलट्वाकार, चिकने एवं आधार की तरफ छोटे वृन्त से युक्त रहते हैं। फूल-अत्यन्त लाल रंग के होते हैं। फल-गोल और छिलका मोटा होता है। फलों में सफेदीयुक्त लाल अथवा गुलाबी रंग के अगणित नोकदार दाने होते हैं। सूखने पर वह अनारदाना कहलाता है। इसके संपूर्ण फल, जड़ या कांड की छाल, फल की छाल एवं स्वरस आदि का उपयोग किया जाता है। रासायनिक संगठन-फल के छिलके में पीतरंजक पदार्थ एवं गॅलोटॅनिक अम्ल (Gallotannic acid 28%) रहता है। मूल की छाल में ०.५-०.९% तथा काण्डत्वक् में ०.५% क्षाराभ पाये जाते हैं जिनमें पेलेटीराइन (Pelletierine) मुख्य हैं। इनमें गॅलोटॅनिक अम्ल २२% होता है। गुण और प्रयोग-अनार हृद्य, ग्राही, रोचक, रक्तशोधक एवं शीतल है। (१) इसकी छाल अत्यन्त ग्राही एवं कृमिघ्न होती है। यह विशेष रूप से स्फीत कृमि (Tape worm) में लाभदायक होती है। कृमि के लिए १ छटाक ताजी छाल को २० छटाक जल में उबाल कर, आधा शेष रहने पर, छानकर १, १ छटाक प्रत्येक आधे घंटे पर, ४ बार खाली पेट पिलावें तथा बाद में एरंडतैल दें। अतिसार तथा संग्रहणी में भी छाल का उपयोग किया जाता है। (२) फल का छिलका अत्यन्त ग्राही होने से, अतिसार प्रवाहिका में इसका क्वाथ पिलाते हैं। संपूर्ण फल को जरा भूनकर, कूटकर, रस निकाल उसका भी उपयोग इनमें करते हैं। मात्रा-फल का छिलका, मूलत्वक् १ से २ माशा। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
७४० भावप्रकाशनिघण्टुः अथ बहुवारः (लिसोड़ा) । तस्य नामानि तत्पक्वापक्वफलस्य च गुणाँश्चाह बहुवारस्तु शीतः सstate/स्यादुद्दालो बहुवारकः । शेलुः श्लेष्मातकश्चापि पिच्छिलो भूतवृक्षकः ।। १०५ ।। बहुवारो विषस्फोटव्रणवीसर्पकुष्ठनुत् । मधुरस्तुवरस्तिक्तः केश्यश्च कफपित्तहृत् ।। १०६ ।। फलमामन्तु विष्टम्भि रूक्षं पित्तकफास्रजित् । तत्पक्वं मधुरं स्निग्धं श्लेष्मलं शीतलं गुरु ।। १०७ ।। लिसोड़ा के संस्कृत नाम-बहुवार, शीत, उद्दाल, बहुवारक, शेलु, श्लेष्मातक, पिच्छिल तथा भूतवृक्षक ये सब हैं। लिसोड़ा-विष, विस्फोट, व्रण, वीसर्प, कुष्ठ, कफ तथा पित्त का नाश करने वाला, केशों के लिये हितकर एवम्-मधुर, कषाय तथा तिक्त रसयुक्त होता है। लिसोड़ा के कच्चे फल-विष्टम्भक, रूक्ष तथा पित्त, कफ और रक्तविकार को दूर करनेवाले हैं। पके फल- मधुर, स्निग्ध, कफजनक, शीतल तथा गुरु होते हैं। [१०५-१०७] ४०. लिसोड़ा हिं०-लिसोड़ा, लिसोरा, छोटा लसोरा। बं०-बहुवार। म०-भोंकर। गु०-गूंदा, गुंदा वड। क०-चल्ले कायि। ते०-चिन्न नक्केरू। ता०-नरिविली। फा०-सपिस्तां, सिपसिस्तां। अ०-सपिस्तां दबक। अं०-(फलनाम) Sebestan (सेबेस्टान्)। ले०-Cordia myxa Roxb. (कॉर्डिया मिक्सा); C. dichotoma Forst. f. (कॉ. डाइ-कोटोमा)। Fam. Boraginaceae (बोरेजिनेसी)। यह प्रायः सब प्रान्तों के वन उपवनों में तथा लगाया हुआ पाया जाता है। इसका वृक्ष-४०-५० फीट तक ऊँचा होता है। डालियाँ-टेढ़ी-मेढ़ी कुबड़ी सी होती हैं। पत्ते-१ से ४-५ इञ्च के घेरे में गोलाकार और शाखाओं पर विषमवर्त्ती लगते हैं। फल-०.५ से १ इञ्च बड़े, पीताभ भूरे एवं पकने पर गुलाबी या कुछ काले होते हैं जिनके भीतर बीच की गुठली के बाहर एक गाढ़ा, मधुर एवं पारदर्शक गूदा होता है। इसे लोग खाते हैं। इसका एक भेद बड़ा लसोड़ा नाम का गुजरात, उत्तरी कनारा एवं दक्खिन में होता है जिसका लेटिन नाम कॉ. वालिशिआई (C. wallichii G. Don.) है। इसके फल कफनिःसारक, ग्राही तथा स्नेहन होते हैं। एक अन्य भेद गोंदी नाम का होता है। इसका लेटिन नाम कॉ. रोथाई (C. rothii Roem & Schult) है। इसका वृक्ष-छोटा; फल-अंडाकार १ से १.३ से० मी० बड़े, लम्बाई में धारीदार, पकने पर पीत या रक्ताभ भूरे एवं खाने लायक होते हैं। यह पंजाब, सिंधु, गुजरात, दक्खिन तथा लंका में होता है। लिसोड़ा के फल, छाल, पत्र एवं बीजमज्जा का उपयोग किया जाता है। रासायनिक संगठन-छाल में टैनिन होता है। गुण और प्रयोग-इसके फल शीत, ग्राही, कृमिघ्न, विषघ्न, मूत्रल, स्नेहन एवं कफनिःसारक है। इनके क्वाथ का उपयोग कफ ढीला करने के लिये, मूत्र की जलन कम करने के लिये तथा अतिसार में करते हैं। छाल का उपयोग जीर्णज्वर एवं कुपचन में करते हैं। इसके बीज की मज्जा का लेप दद्रु में लाभदायक माना जाता है। अथ कतकः (निर्मली) । तस्य नामानि तत्फलगुणाँश्चाह पयःप्रसादी कतकः कतकं तत्फलं च तत्। कतकस्य फलं नेत्र्यं जलनिर्मलताकरम् ।। वातश्लेष्पहरं शीतं मधुरं तुवरं गुरु ।।१०८।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
आम्रादिफलवर्गः ७४१ निर्मली के संस्कृत नाम-पयःप्रसादी और कतक ये हैं। इसके फल को भी 'कतक' ही कहते हैं किन्तु यह नपुंसकलिंग में होता है। निर्मली के फल-मधुर तथा कषाय रस युक्त, नेत्रों के लिये हितकर, जल को निर्मल करने वाले, गुरु एवम्- वात तथा कफ को दूर करने वाले होते हैं। [१०८] ४१. निर्मली हिं० - निर्मली। बं० - निर्मली। म० - निर्मली। गु० - निर्मली, कतकडो। क० - चिल्लिकायि। ता० - तेतन कोट्टई। ते० - कतकमु। ले० - Strychnos potatorum Linn. स्ट्रिक्नोस पोटेटोरम्) । Fam. Loganiaceae (लोगेनिएसी) । इसका वृक्ष-सोन नदी के किनारे, मध्यभारत तथा दक्षिण की ओर पाया जाता है। यह ४० फीट तक ऊँचा होता है। पत्ते-प्रायः २।। इञ्च लम्बे, एक इञ्च चौड़े अंडाकार होते हैं। फूल-सफेद रंग के आते हैं और उनसे सुगन्ध आती है। फल-गोल, पकने पर काले रंग के होते हैं। इसमें गोल कुछ चिपटे बीज होते हैं जो चिमड़े होते हैं। गुण और प्रयोग-निर्मली के बीजों में विष नहीं रहता। इसका उपयोग जल साफ करने के लिये करते हैं। इसके बीजों को काटकर मिट्टी के घड़े के अन्दर रगड़ते हैं, फिर पानी भरते हैं। इससे पानी की गन्दगी नीचे बैठ जाती है। नेत्राभिष्यन्द में बीजों को जल में घिस कर अञ्जन करते हैं। सोजाक, मधुमेह तथा जीर्ण अतिसार में बीजों का उपयोग किया जाता है। जीर्ण अतिसार में आधा बीज मट्ठे में घिसकर पिलाते हैं। अथ द्राक्षा (दाख) । तस्या नामानि तत्पक्वापक्वफलस्य तद्भेदानां च गुणाँश्चाह द्राक्षा स्वादुफला प्रोक्ता तथा मधुरसाऽपि च। मृद्वीका हारहूरा च गोस्तनी चापि कीर्त्तिता ।। १०९ ।। द्राक्षा पक्वा सरा शीता चक्षुष्या बृंहणी गुरुः। स्वादुपाकरसा स्वर्या तुवरा सृष्टमूत्रविट् ।। ११० ।। कोष्ठमारुतकृद् वृष्या कफपुष्टिरुचिप्रदा ।। १११ ।। हन्ति तृष्णाज्वरश्वासवातवातास्रकामलाः। कृच्छ्रास्रपित्तसंमोहदाहशोषमदात्ययान् ।। ११२ ।। आमा स्वल्पगुणा गुर्वी सैवाम्ला रक्तपित्तकृत्। वृष्या स्याद् गोस्तनी द्राक्षा गुर्वी च कफपित्तनुत् ।। ११३ ।। दाख के संस्कृत नाम-द्राक्षा, स्वादुफला, मधुरसा, मृद्वीका, हारहूरा और गोस्तनी ये सब हैं। दाख के पके फल-मधुर तथा कषाय रसयुक्त, विपाक में मधुर रसयुक्त, सारक, शीतल, नेत्रों के लिये हितकर, बृंहण, गुरु, स्वर को उत्तम करने वाले, मूत्र तथा मल की प्रवृत्ति कराने वाले, कोष्ठ में वातकारक, वृष्य, कफ-पुष्टि तथा रुचि के उत्पन्न करने वाले एवम्-तृषा, ज्वर, श्वास, वात, वातरक्त, कामला, मूत्रकृच्छ्र, रक्तपित्त, मोह, दाह, शोष तथा मदात्यय रोग को दूर करने वाले होते हैं। कच्चे दाख के फल-पके की अपेक्षा अल्प गुण वाले एवम् गुरु होते हैं। वे ही यदि खट्टे हों तो रक्तपित्त कारक होते हैं। गोस्तनी-दाख (मुनक्का) - वीर्यवर्धक, गुरु तथा कफ और पित्त का नाशक होती है। गोस्तनी 'मुनक्का' इति लोके ।। १०९-११३ ।।
७४२ भावप्रकाशनिघण्टुः यहाँ पर “मूल में गोस्तनी पद से मुनक्का का बोध लोक में होता है” ऐसा समझना चाहिये । [१०९-११३] ❖ अबीजाऽन्या स्वल्पतरा गोस्तनीसदृशी गुणैः । द्राक्षा पर्वतजा लघ्वी साऽम्ला श्लेष्माम्लपित्तकृत् ।। द्राक्षा पर्वतजा यादृक् तादृशी करमर्दिका ।।११४।। दूसरी जाति की जो थोड़े बीजवाली दाख होती है वह—यद्यपि गुणों में मुनक्का के ही समान होती है तथापि उसमें अपेक्षाकृत स्वल्प गुण होते हैं। पर्वत पर उत्पन्न होने वाली जो दाख है उसे “पर्वतजा” द्राक्षा कहते हैं। वह—पाक में लघु होती है। किन्तु यदि खट्टी हो तो वह—कफ तथा अम्लपित्त को उत्पन्न करने वाली होती है। करमर्दिका के गुण—जिस भाँति “पर्वतजा” दाख के होते हैं वैसे ही इसके भी होते हैं । [११४] ❖ अबीजा = ईषद्बीजा 'किसमिस' इति लोके । पर्वतजा = 'पहाड़ी' इति लोके । करमर्दिका = 'करौंदी' इति लोके ।।११४।। यहाँ पर मूल में “अबीजा” पद से “थोड़े बीज वाली” यह अर्थ समझना चाहिये इसी को लोक में “किसमिस” कहते हैं। “पर्वतजा” को “पहाड़ीदाख” तथा “करमर्दिका” को लोक में “करौंदी” दाख कहते हैं। [११४] ४२. दाख हिं०-दाख, मुनक्का, अंगूर । बं०-मनेका । म०-अंगूर, द्राक्ष । गु०-धराख, दराख । क०-द्राक्षे । ते०- द्राक्षा । ता०-कोट्टन । फा०-अंगूर, मवेझ (सूखा) । अ०-हबुस् सजीव । अं०-Grapes (ग्रेप्स) । ले०-Vitis vinifera Linn. (विटिस् विनिफेरा) । Fam. Vitaceae (विटेसी) । अंगूर, किसमिस, दाख, बड़ी दाख सब एक ही जाति की लताओं के फल हैं। कच्चे, पके, बीजहीन तथा छोटे, बड़े, सूखे आदि फलों के भेद से यह भिन्न-भिन्न नामों से पुकारे जाते हैं। यह लता जाति की वनस्पति फारस, अफगानिस्तान आदि विदेशों के सिवा इस देश में भी कई जगह किन्तु विशेष रूप से उत्तर पश्चिमी भागों में अधिक उत्पन्न होती है। पत्ते—गोलाकार, पाँच दल तथा कटे किनारे वाले और कंगूरेदार होते हैं। फूल—हरे रंग के सुगन्धित होते हैं। फूल तथा फल गुच्छों में आते हैं। अफगानिस्तान और फारस आदि देशों के अंगूर अच्छे होते हैं। काश्मीर में किसमिस, मुनक्का, होंसानी और मस्का नामक कई जातियों के अंगूर उत्पन्न होते हैं। औरङ्गाबाद का अंगूर लाल और स्वादिष्ट होता है। दौलताबाद के अंगूर देश देशान्तरों में भेजे जाते हैं। सब जगह की जलवायु भिन्न होती है इस कारण प्रत्येक स्थान के फलों में कुछ-न-कुछ भेद होता है। रासायनिक संगठन—पक्व फल में शर्करा, कुछ सेन्द्रीय अम्ल द्रव्य जैसे मॅलिक् टार्टरिक्, रेसेमिक् अम्ल तथा आर्सेनिक (१०० सी० सी० रस में ०.०५ मि० ग्रा०) कच्चे फल में आक्ज़ेलिक् अम्ल एवं बीज में स्थिर तैल होता है। इससे आसव, अरिष्ट, सिरका, ब्रॉण्डी आदि बनाई जाती है। इसके फलों का अधिक उपयोग किया जाता है। गुण और प्रयोग—पक्व फल शीतल, संतर्पण, पाचन, स्रंसन, बल्य, कण्ठ्य, रक्तपित्त शामक है। सूखे फल शीतल, स्नेहन, कफ शामक, स्रंसन हैं। अपक्व फल का रस बहुत ग्राही होता है। गर्मी के दिनों में इसको काटने से एक रस बहता है जो त्वग्दोषहर है। रक्तपित्त, पांडु दौर्बल्य आदि में अंगूर से लाभ होता है। ज्वर में इससे दाह एवं तृषा शांत होती है तथा मूत्र भी साफ होता है। मुनक्का का उपयोग खाँसी, पेशाब की जलन तथा शौच साफ होने के लिये करते हैं।
आम्रादिफलवर्गः ७४३ अथ क्षुद्रखर्जूरी-पिण्डखर्जूरी-छोहारा च। तासां नामानि गुणाँश्चाह भूमिखर्जूरिका स्वाद्वी दुरारोहा मृदुच्छदा। तथा स्कन्धफला काककर्कटी स्वादुमस्तका ॥११५॥ पिण्डखर्जूरिका त्वन्या सा देशे पश्चिमे भवेत्। खर्जूरी गोस्तनाकारा परद्वीपादिहागता ॥११६॥ जायते पश्चिमे देशे सा छोहारेति कीर्त्त्यते। खर्जूरीत्रितयं शीतं मधुरं रसपाकयोः ॥११७॥ स्निग्धं रुचिकरं हृद्यं क्षतक्षयहरं गुरु। तर्पणं रक्तपित्तघ्नं पुष्टिविष्टम्भशुक्रदम् ॥११८॥ कोष्ठमारुतहृद् बल्यं वान्तिवातकफापहम्। ज्वरातिसारक्षुत्तृष्णाकासश्वासनिवारकम् ॥११९॥ मदमूर्च्छामरुत्पित्तमद्योद्भूतगदान्तकृत्। महतीभ्यां गुणैरल्पा स्वल्पखर्जूरिका स्मृता ॥१२०॥ खजूर के संस्कृत नाम—भूमिखर्जूरिका, स्वाद्वी, दुरारोहा, मृदुच्छदा, स्कन्धफला, काककर्कटी तथा स्वादुमस्तका ये सब हैं और दूसरी जाति का जो खजूर है वह पश्चिम (काबुल आदि) देशों में उत्पन्न होता है उसका संस्कृत नाम— पिण्डखर्जूरिका (हिन्दी नाम—पिण्डखजूर है)। एवम्—तीसरी जाति का जो खजूर है जो कि आकार में गौ के स्तन की भाँति होता है तथा दूसरे द्वीप से इस भारतवर्ष में आया है उसको लोग “छुहारा” कहते हैं। और वह भी पश्चिम के देशों में उत्पन्न होता है। उक्त तीनों प्रकार के खजूर—रस में तथा विपाक में मधुर रसयुक्त, शीतल, स्निग्ध, रुचिकर, हृदय को हितकर, गुरु, सन्तर्पणकारक, बलवर्धक एवम्—क्षत, क्षय, रक्तपित्त, कोष्ठस्थित-वायु, वमन, वात, कफ, ज्वर, अतिसार, भूख, प्यास, कास, श्वास, मद, मूर्च्छा, वातपित्त, मद्य से उत्पन्न रोग को दूर करने वाले होते हैं। दोनों बड़े खजूर (पिण्ड- खजूर, छुहारा) से गुण में कम होने से खर्जूर को स्वल्पखर्जूरिका कहते हैं। [११५-१२०] अथ खर्जूरीतरोस्तोयगुणानाह खर्जूरीतरुतोयं तु मदपित्तकरं भवेत्। वातश्लेष्महरं रुच्यं दीपनं बलशुक्रकृत् ॥१२१॥ खजूर के वृक्षों के जल—रुचिकारक, अग्निदीपक, मद, पित्त, बल तथा शुक्र को उत्पन्न करने वाले एवम्— वात तथा कफ के नाशक होते हैं। [१२१] अथ पिण्डखर्जूरीभेदः (सुलेमानी खजूर)। तस्य नामगुणानाह सुलेमानी तु मृदुला दलहीनफला च सा। सुलेमानी श्रमभ्रान्तिदाहमूर्च्छाऽस्र पित्तहृत् ॥१२२॥ सुलेमानी खजूर (यह “पिण्ड खजूर” का भेद है) के संस्कृत नाम—सुलेमानी, खर्जूरी, मृदुला तथा दलहीनफला ये सब हैं। सुलेमानी खजूर—श्रम, भ्रान्ति, दाह, मूर्च्छा तथा रक्तपित्त को दूर करने वाला होता है। [१२२] ४३. खर्जूरी-पिण्ड खर्जूरी (खजूर) हिं०-खजूर, देशी खजूर, खिजूर। बं०-खेजूर गाछ। म०-शिन्दी। क०-इचुली। ते०-इण्टाचेट्टु पेड्डयिटा। गु०-खजूर। फा०-तमर रुतब, खुरमाय हिन्दी। अ०-खुरमातर, रतव हिन्दी। अं०-Date (डेट)। ले०- Phoenix sylvestris Roxb. (फोनिक्स सिल्वेस्ट्रिस)। Fam. Palmae (पामी)। देशी खजूर इस देश के प्रायः सब प्रान्तों में उत्पन्न होता है। इसका वृक्ष—ताड़वृक्ष के समान होता है किन्तु इसकी ऊँचाई कम होती है। पत्ते—६ से ७ फीट लम्बे तथा पक्षाकार होते हैं। पत्रक—६ से १२ इञ्च चौड़े, तीक्ष्णाग्र, विपरीत एवं अग्र में एक पत्रक रहता है। पुष्प—एकलिंगी भिन्न-भिन्न वृक्षों पर आते हैं। कृत्रिम परागण की इसमें आवश्यकता होती है। फल—१ से १ १/२ इञ्च लम्बा, गोलाकार, पीत एवं पकने पर रक्ताभ रहता है। फल के अन्दर बीज रहता है। प्रायः पुष्प एवं फल काल के समय घोर वर्षा हुआ करती है जिसमें फल बनने में बहुत कठिनाई होती है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
७४४ भावप्रकाशनिघण्टुः इसके वृक्ष से जो रस निकलता है उसे खजूरी कहते हैं। इससे मद्य बनता है तथा गुड़ भी बनाया जाता है। गुण और प्रयोग-इसके फल बल्य एवं पौष्टिक होते हैं। इसके वृक्ष का रस शीतल मूत्रजनन तथा पौष्टिक पेय माना जाता है। इसकी जड़ दंतशूल में उपयोगी है। इसका मद्य दीपन, पाचन तथा उत्तेजक होता है। यह अन्य विदेशी मद्यों की अपेक्षा अधिक अच्छा होता है। इसकी शर्करा अधिक पौष्टिक तथा सारक है। ४४. छुहारा, ४५. पिण्ड खजूर हिं०-पिंडखजूर, छुहारा, छोहारा। बं०-सोहारा। म०-खारीक। गु०-खारेक। क०-इचुलु, करिइंचुली, करिइंचुलु। ते०-खजूरुपपण्डु। फा०-खुर्मा, खुर्मा खुष्क। अ०-तमर। अं०-Date Palm (डेट पाम)। ले०- Phoenix dactylifera Linn. (फोनिक्स डॅक्टिलिफेरा)। Fam. Palmae (पामी)। छुहारा-ईरान, फारस, काबुल आदि देशों में उत्पन्न होता है और इस देश के पंजाब सिन्ध प्रान्तों में रोपण किया जाता है। इसके क्षुप-ताड़ और नारियल के वृक्षों के समान होते हैं और पत्ते-खजूर के पत्तों के समान पर उनसे कुछ बड़े होते हैं। फल-भी खजूर से बड़ा होता है। जिस प्रकार अंगूर, किसमिस, मुनक्के आदि एक ही जाति के लताओं के फल हैं और कच्चे, पके, बीजहीन, छोटे, बड़े, सूखे आदि फलों के भेद से वे भिन्न-भिन्न नामों से पुकारे जाते हैं उसी प्रकार खजूर छोहारा, पिण्डखजूर आदि एक ही जाति के वृक्षों के फल हैं। इस देश में होने से उसको देशी खजूर कहते हैं और वह गुण में हीन होता है। जिस प्रकार काबुल, फारस आदि देशों के अंगूर, अनार, नासपाती आदि फल इस देश में उत्पन्न हुये फलों की अपेक्षा सुस्वादु और वीर्यबह होते हैं उसी प्रकार काबुल फारस प्रभृति देशों के खजूर सुस्वादु और अधिक गुणवान् होते हैं। अधपके सूखे फल को छुहारा और पके हुये फलों को पिण्ड खजूर या खजूर कहते हैं। इसके सिवा सुलेमानी खजूर, पिण्डखजूर का ही भेद है। रासायनिक संगठन-फलों में विटामिन ए, बी, डी तथा प्रशीताद (Scurvy-स्कर्वी) नाशक विटामिन होते हैं। गुण और प्रयोग-खजूर शीतल, स्नेहन, वृष्य, तर्पण, गुरु, वातपित्तहर एवं कफनिःसारक है। इसका उपयोग क्षय, क्षतक्षय, कास, श्वास, दाह एवं रक्तपित्त में किया जाता है। इसका गोंद अतिसार तथा मूत्रविकारों में लाभदायक है। इसके वृक्ष का रस शीतल तथा सारक होता है। अथ वातादः (बादाम)। तस्य नामानि तन्मज्जगुणाँश्चाह वातादौ वातवैरी स्यान्नेत्रोपमफलस्तथा। वातादः उष्णः सुस्निग्धो वातघ्नः शुक्रकृद् गुरुः ॥१२३॥ वातादमज्जा मधुरो वृष्यः पित्तानिलापहः। स्निग्धोष्णः कफकृन्नेत्र्यो रक्तपित्तविकारिणाम् ॥१२४॥ बादाम के संस्कृत नाम-वाताद, वातवैरी तथा नेत्रोपमफल ये सब हैं। बादाम-उष्ण, स्निग्ध, शुक्रकारक, गुरु एवम्-वातनाशक होता है। बादाम की मींगी-मधुर, वीर्यवर्धक, स्निग्ध, उष्ण, कफकारक एवम्-पित्त तथा वात को दूर करने वाली होती है तथा रक्तपित्त के रोगियों को हितकर नहीं होती है। [१२३-१२४] ४६. बादाम हिं०-बादाम, बदाम। बं०-बादाम। म०-बदाम। गु०-बदाम। ते०-बदाम। ता०-बडुमै। फा०- बदाम। अ०-लोजल। अं०-Almond (ऑल्मण्ड) ले०-Prunus amygdalus Batsch. (प्रूनस् एमिग्डेलस)। Fam. Rosaceae (रोसेसी)। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
भारत के पंजाब एवं कश्मीर के शीतल प्रान्तों में इसकी उपज की जाती है। यह अफगानिस्तान, ईरान तथा यूरोप में भी होता है। इसका वृक्ष-मध्यमाकार का होता है। टहनियों के अन्त में पत्ते गुच्छों में रहते हैं। पत्ते-भालाकार और बारीक कंगूरेदार होते हैं। फूल-सफेद रंग के आते हैं जिन पर लाल रंग के धब्बे रहते हैं। फल-लम्बाई युक्त गोल होते हैं। बीज-अंडाकार और चिपटे होते हैं। कच्चे फलों का कश्मीर में साग बनाकर खाते हैं। कच्चे फल खट्टे और पके फल खटमीठे होते हैं। बादाम के दो प्रकार पाये जाते हैं। एक की मींगी मधुर तथा दूसरे की कड़वी होती है। बदाम की स्थान भेद से अनेक जातियाँ पाई जाती हैं। मीठा बादाम खाने के योग्य होता है। कड़वा अत्यन्त विषैला होता है। रासायनिक संगठन-कड़वे बादाम में अत्यन्त विषैला तत्व हाइड्रासायेनिक एसिड होता है। करीब ६० कड़वे बदाम में वयस्क मनुष्य के लिये घातक प्रमाण में विष होता है। यह विष उसके उड़नशील तैल में होता है। मीठे बदाम में स्थिर तैल ३५-६२% होता है। यह विष इसमें यदि हो तो बहुत ही कम होता है। गुण और प्रयोग-बदाम मधुर, गुरु, स्निग्ध, उष्ण, बृंहण, बल्य, वातहर, वातनाड़ी बल्य, उत्तेजक एवं कफपित्तकर है। बदाम को रातभर गरम पानी में भिंगोकर दूसरे दिन थोड़ी देर पकाकर उसकी पेया बनाते हैं। यह श्वसन एवं मूत्रजननेन्द्रिय संस्थान के रोगों, मधुमेह तथा स्त्रियों के कटिशूल एवं श्वेत प्रदर में देते हैं। मात्रा-पेया २ से ४ तोला। नोट-देशी बादाम (जंगली बादाम), ले०-टर्मिनेलिया कॅटेप्पा, कॉम्ब्रेटॅसी (Terminalia catappa Linn. Fam. Combretaceae) नामक एक अन्य वृक्ष भी पाया जाता है। इसमें बादाम सदृश बीज पाया जाता है तथा बीज तैल का प्रयोग बादाम के तेल के स्थान पर भी करते हैं। इसकी छाल संग्राही होती है एवं पत्तों का मलहम चर्मरोगों में काम में लाया जाता है। अथ सेवम् । तस्य नामगुणानाह मुष्टिप्रमाणं बदरं सेवं सिवितिकाफलम् १ ॥१२५॥ सेवं समीरपित्तघ्नं बृंहणं कफकृद् गुरु। रसे पाके च मधुरं शिशिरं रुचिशुक्रकृत् ॥ १२६॥ सेव के संस्कृत नाम-मुष्टिप्रमाण, बदर अथवा मुष्टिप्रमाणबदर, सेव तथा सिवितिकाफल ये सब हैं। सेव-रस तथा विपाक में मधुरस युक्त, बृंहण (रस-रक्तादिवर्धक), कफकारक, गुरु, शीतल, रुचि तथा शुक्र को उत्पन्न करने वाला होता है। [१२५-१२६] ४७. सेव हिं०-सेव, सेव। बं०-सेव। म०, गु०-सफरचंद। क०-सेबु। अ०-तूफाह। फा०-सेव, सिव। अं०-Apple Tree (ॲपल् ट्री) । ले०-Pyrus malus Linn. (पाइरस मँलस्) । Fam. Rosaceae (रोज़ेसी) । हिमालय, पंजाब, सिंध, उत्तर पश्चिम सीमांत प्रदेश, मध्यभारत एवं डेक्कन में इसकी उपज की जाती है। उत्तर पश्चिम हिमालय में वन्य भी पाया जाता है। १. सिम्बि(श्वि)तिका इति पा०।
७४६ भावप्रकाशनिघण्टुः इसका वृक्ष-३० फीट से अधिक ऊँचा नहीं होता। नयी शाखा, पत्र का अधर पृष्ठ एवं पुष्प व्यूह, श्वेताभ रजावरण से ढँके रहते हैं। पत्ते-२ से ३ इञ्च, अण्डाकार, गोल दन्तुर एवं कुछ लम्बाग्र होते हैं। पुष्प-१ १/२-२ इञ्च व्यास के एवं गुलाबी होते हैं। फल-गोल, छोटे डंठल एवं स्थाई बाह्यदल से युक्त एवं दोनों तरफ से अन्दर धंसा हुआ होता है। खट्टा तथा मीठा ऐसे दो भेद पाये जाते हैं। पके फल को लोग खाते हैं तथा उसका मुरब्बा भी बनाते हैं। इसकी छाल एवं मूल का भी उपयोग किया जाता है। रासायनिक संगठन-पत्ते एवं छाल में एक ग्लूकोसाइड फ्लोरिजिन् (Phlorizin) होता है। बीजों में ॲमिग्डॅलिन पाया जाता है। फ्लोरिजिन् के प्रयोग से वृक्क द्वारा शर्करा का अधिक उत्सर्ग होने लगता है। फल में मॅलिक अम्ल, खटिक, फॉस्फेट आदि होते हैं। गुण और प्रयोग-इसके फल मधुर, शीत, ग्राही, शुक्रल, बृंहण, कफकर एवं वातपित्तहर होते हैं। यह हृदय, मस्तिष्क, यकृत् एवं आमाशय को शक्ति देनेवाला है। रक्तातिसार तथा आमातिसार में सेव का मुरब्बा देते हैं। विबंध में भी इसका उपयोग होता है। इसकी छाल का क्वाथ पार्यायिक ज्वर में दिया जाता है। इसकी जड़ कृमिघ्न, दाहशामक एवं निद्राजनक है। अथामृतफलम् (यद् बदक्सान-काबिल-प्रभृतिषु देशेषु "नाशपाती" तिनाम्ना प्रसिद्धम्) तस्य गुणानाह अमृतफलं लघु वृष्यं सुस्वादु त्रीन्हरेद्द्रोषान् । देशेषु मुग़लानां-बहुलं तल्लभ्यते लोकैः ॥१२७॥ अमृत फल—यह बदक्सान तथा काबिल आदि देशों में "नाशपाती" नाम से प्रसिद्ध है। नाशपाती-लघु, वृष्य (वीर्यवर्धक), अत्यन्त स्वादिष्ट एवम् तीनों दोषों को दूर करने वाली होती है और मुगलों के देश में इसे बहुलता से लोग पाते हैं। [१२७] ४८. नाशपाती सं०-टङ्क। हिं०-नाशपाती। म०-नास्पती। ता०-पेरिक्के। ते०-बेरिकाय। अं०-Pear (पीअर)। ले०- Pyrus communis Linn. (पाइरस कम्युनिस)। Fam. Rosaceae (रोज़ेसी)। उत्तर पश्चिम हिमालय में इसकी बहुत उपज की जाती है। यह कश्मीर, ईरान एवं अफगानिस्तान आदि में भी होती है। इसका वृक्ष-मध्यमाकार का होता है तथा नये वृक्षों की टहनियों पर कुछ काँटे होते हैं। पत्ते-चौड़ाई लिये हुए अण्डाकार, अखण्ड या कुण्ठित दन्तुर एवं पतले और पत्र बराबर लम्बे वृन्त से युक्त होते हैं। पुष्प-श्वेत आते हैं। फल-यह स्थान भेद से अनेक आकार प्रकार का होता है। कश्मीर आदि की नासपाती अधिक मुलायम रहती है। स्वाद में यह मधुर होती है। इसकी कलम करके सुधारी हुई जाति को नाक कहा जाता है जो अधिक मधुर तथा मुलायम होता है। गुण और प्रयोग-यह कषाय, मधुर, गुरु, शीतवीर्य, वातकर एवं ज्वरहर है। कुछ पक्व फल को काटकर, सुखाकर उसका चूर्ण बना, आटे में मिला रोगी को पथ्य रूप में दिया जाता है। इसके बीज, जिन्हें अंचू या अंचूक कहते हैं, उनकी मज्जा पौष्टिक मानी जाती है।
आम्रादिफलवर्गः ७४७ अथ पीलुः । तस्य नामानि तत्फलगुणाँश्चाह पीलुर्गुडफलः स्रंसी तथा शीतफलोऽपि च । पीलु श्लेष्मसमीरघ्नं पित्तलं भेदि गुल्मनुत् ।। स्वादु तिक्तञ्च यत्पीलु तन्नात्युष्णं त्रिदोषहत् ।। १२८ ।। पीलु के संस्कृत नाम-पीलु, गुडफल, स्रंसी तथा शीतफल ये संब हैं। पीलु-मल का भेदन करने वाला, पित्तजनक एवम् कफ, वायु तथा गुल्म को दूर करने वाला है। जो पीलु-स्वादिष्ट तथा तिक्तरस युक्त होता है। यह अत्यन्त उष्ण नहीं होता तथा त्रिदोषनाशक होता है। [१२८] ४९. पीलु हिं०-पीलु, छोटा पीलु, खरजाल । बं०-पीलुगाछ । म०-पिलु । गु०-पीलु, खारी जाल । क०-गेनुमर । ते०-गोगु । ता०-पेरुन्गोलि । फा०-दरख्ते मिस्वाक् । अ०-अराक । पं०-पीलु, जाल, वष । राजपु०-झाल । ले०-Salvadora persica Linn. (साल्वेडोरा पर्सिका) । Fam. Salvadoraceae (साल्वेडोरेसी) । यह राजपुताना, बिहार, कोंकण, सरकार, डेक्कन, कर्णाटक, बलूचिस्तान, सिंध आदि स्थानों में शुष्क प्रदेशों में होता है। इसका वृक्ष-छोटा एवं सदा-हरा-भरा रहता है। स्तम्भ-टेढ़ा-मेढ़ा होता है और शाखायें नीचे झुकी हुई और दुर्बल होती हैं। पत्ते-विपरीत, चर्मसदृश या मांसल, अंडाकार, आयताकार, १।-२ इञ्च लम्बे तथा दोनों सिरों पर गोल होते हैं। इस पर छोटे-छोटे फूल बारहो मास आते रहते हैं और वे हरापन युक्त सफेद होते हैं। फल-आध इञ्च गोल, चिकने और पकने पर लाल हो जाते हैं। सूँघने पर इनमें राई आदि के समान तीक्ष्ण गंध आती है तथा इसमें एक बीज होता है। एक दूसरा बड़ा पीलु होता है जिसको लैटिन में-Salvadora oleoides Done. (साल्वेडोरा ओलीओडीस्) कहते हैं। इसके फल पकने पर पीले, सूखने पर लाली लिये भूरे रंग के होते हैं। रासायनिक संगठन-पीलु में एक क्षाराम् ट्राइमेथिलामाइन (Trimethylamine) पाया जाता है। बड़े पीलु में भी यह क्षाराम् होता है तथा बीज में दोनों प्रकार के तेल होते हैं। गुण और प्रयोग-लघु पीलु के पत्ते विरेचक होते हैं तथा कास में दिये जाते हैं। इसके बीजों का तेल राई के तेल की तरह होता है तथा आमवातादि में लगाया जाता है। इसके जड़ की छाल उत्तेजक, स्वेदजनन एवं कुछ मूत्रजनन है। इसका क्वाथ ज्वर में दौर्बल्य तथा प्रलाप दूर करने के लिये देते हैं। इसको गर्भिणी को न दें। वृद्धपीलु के पत्ते वातनाशक होने के कारण उनको गरम करके पीड़ायुक्त स्थानों को सेंकते हैं। छाल उत्तेजक एवं उष्ण होने के कारण ज्वर में दौर्बल्य होने पर तथा आर्तव रुक जाने पर देते हैं। फल-उष्ण, दीपन, वातहर एवं मूत्रजनक हैं। इनमें शर्करा बहुत रहती है। संधियात एवं प्लीहा वृद्धि में फल देते हैं। बीज आनुलोमिक एवं विषघ्न है। सर्पविष में इनका उपयोग करते हैं। बीजों का तेल स्वेदजनन एवं उत्तेजक होने के कारण पुराने सन्धिरोगों में इसकी मालिश की जाती है। इस तेल को किंकणेल या खिकणेल कहते हैं। अथाक्षोटः (अखरोट) तस्य नामगुणानाह पीलुः शैलभवोऽक्षोटः कर्पराल्लश्च कीर्तितः । अक्षोटकोपि वातादसदृशः कफपित्तकृत् ।।१२९।। अखरोट के संस्कृत नाम-शैलभव पीलु अक्षोट तथा कर्पराल ये सब हैं। (जो पीलू पर्वत पर उत्पन्न होता है उसको "अखरोट" कहते हैं)। अखरोट-गुणों में बादाम के सदृश होता है एवम् कफ तथा पित्त का वर्धक होता है। [१२९] CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA
७४८ भावप्रकाशनिघण्टुः ५०. अखरोट हिं०-अखरोट, अक्षोट, पहाड़ी पीलु। बं०-आखरोट। पं०-अखरोट। म०-अक्रोड। गु०-अखरोड। ते०-अक्षोलमु। ता०-अक्रोटु। क०-आखोट। आसा०-कवसिंग। फा०-चार मग्ज, जिर्दगां। अ०-ज़ोज़ हिन्दी, ज़ोज़ेजुल हिन्द, ज़ोज़। अफगा०-उप्पस्। अं०-Walnut (वालनट)। ले०-Juglans regia Linn. (जग्लान्स रेजीया)। Fam. Juglandaceae (जग्लैंडेसी)। यह हिमालय के उष्ण भागों में ३ से १० हजार फीट तक एवं खासिया पर्वत तथा बलुचिस्तान में होता है। कश्मीर में इसकी बहुत उपज की जाती है। इसका वृक्ष ऊँचा होता है तथा छाल धूसर एवं लम्बाई में फटी होती है। शाखाओं पर मृदु रजावरण होता है। पत्ते-असम पक्षवत्, एकान्तर तथा ६ से १५ इञ्च लम्बे होते हैं। पत्रक-संख्या में ५-१३, दीर्घवृत्ताभ से लेकर आयताकार मालाकार, ३-८ × १.५-४ इञ्च बड़े, न्यूनाधिक विनाल एवं प्रायः अखण्ड होते हैं। पुष्प-छोटे, पीताभ हरे एवं एक लिंगी होते हैं। फल-कुछ लंबाई लिये हुये गोल एवं २ इञ्च व्यास में एवं बाह्यस्तर (Exocarp) हरा तथा चर्मवत् रहता है। इसके अन्दर अन्तस्तर कठोर काष्ठीय, सिकुड़नदार एवं दो कोष्ठ युक्त होता है जिसमें ४ खण्डवाला तैल से भरा हुआ, टेढ़ा-मेढ़ा धूसर श्वेत रंग का बीज होता है। इन्हीं बीजों को लोग खाते हैं। स्थान भेद से अन्तस्तर (Endocarp) के स्वरूप के अनुसार इसके कई प्रकार होते हैं। इसमें सबसे अच्छा कागजी अखरोट होता है जो बड़ा, अन्तस्तर पतला तथा उसकी मींगी श्वेत तथा अधिक स्वादिष्ट रहती है। इसकी छाल डण्डासा के नाम से बिकती है जिसको दाँत साफ करने के लिये तथा चबाकर होंठ लाल करने के लिये उपयोग में लाते हैं। बाल रंगने के लिये हरे फल के छिलकों का उपयोग किया जाता है। रासायनिक संगठन-इसमें तैल, अनेक पोषक तत्त्व, विटामिन 'बी', 'ए', 'सी', लेसिथिन तथा अनेक खनिज होते हैं। खनिज में लोह, ताम्र, खटिक, फास्फोरस, यशद, कोबाल्ट, मैगनेशियम, आर्सेनिक, गंधक, आयोडीन, मैंगेनीज, पोटेशियम् तथा सोडियम् होते हैं। इनके अतिरिक्त कच्चे फलों में विटामिन 'सी' बहुत होता है। पत्तों में विटामिन 'सी' एवं उड़नशील तैल रहता है। इनका जलीय सत्व अनेक जीवाणु के लिये घातक होता है। गुण और प्रयोग-इसकी मींगी, पौष्टिक, बल्य, बृंहण, क्षतक्षयनाशक एवं आमवातहर होती है। आमवात, वातरक्त आदि में इसका उपयोग करते हैं। इसके पत्ते पौष्टिक एवं कृमिघ्न होते हैं। इनका क्वाथ गंडमाला में लाभदायक होता है। इसकी छाल को पीसकर शोथ पर लगाते हैं। इसका तेल स्फीतकृमि में लाभदायक माना जाता है। नोट-एक जङ्गली अखरोट होता है जो आसाम तथा विशेष रूप से दक्षिण में होता है। यह एल्यूराइटिस् मोलुक्केना (Aleurites moluccara, Willd.), युफोर्बिएसी (Fam. Euphorbiaceae) है। इसके फल अंडाकार, दो इञ्च व्यास के होते हैं जिसके अन्दर दो बीज अखरोट जैसे निकलते हैं। इसमें तेल होता है। यह १ से २ औंस की मात्रा में विरेचक होता है। बीजों को भूनकर खाया जाता है जिसमें कुछ विरेचक गुण रहता है। इन्हें बिना भूने नहीं खाना चाहिये क्योंकि इसमें एक विषैला तत्त्व होता है जो भूनने से नष्ट हो जाता है। बीजों की बत्ती बनाकर जलाते हैं जिससे इसे 'दी कैंडल नट ट्री' (The candle nut tree) भी कहते हैं। भावप्रकाशकार अखरोट को पर्वत पर होने वाला पीलु कहते हैं किन्तु इसके स्वरूपादि से इनमें कोई साम्य नहीं मालूम पड़ता। अथ बीजपूरः (बिजौरा) । तस्य नामानि तत्फलगुणाँश्चाह बीजपूरो मातुलुङ्गो रोचकः फलपूरकः । बीजपूरफलं स्वादु रसेऽम्लं दीपनं लघु ।।१३०।। रक्तपित्तहरं कण्ठजिह्वाहृदयशोधनम् । श्वासकासारुचिहरं हृद्यं तृष्णाहरं स्मृतम् ।।१३१।।