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भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

८२४ भावप्रकाशनिघण्टुः १६. चूका हिं०-चूका (शाक) । बं०-चुका, पालंग । म०-चुका, आंबट चुका । गु०-चुको, खारी भाजी । क०- हुलीचकोत । फा०-तुरश्क बड़ा, तुर्रे, खुरासानी, तरह हिरा साई । अ०-हुम्माज बुकलेहा मेजा, बुल्फ येह मिजई । अं०-Bladder Dock (ब्लैडर डॉक्) । ले०-Rumex vesicarius Linn. (रूमेक्स वेसिकेरियस्) । Fam. Polygonaceae (पॉलिगोनेसी) । यह पश्चिम पंजाब और सिन्ध के आस-पास पहाड़ी जमीन में अधिक होता है और दूसरे प्रान्त में भी कहीं-कहीं पाया जाता है । इसका क्षुप-६ से १२ इञ्च तक ऊँचा, पाण्डुर हरित, कुछ मांसल एवं मूल के पास से ही दो भागों में बँटा रहता है । पत्ते-अंडाकार-लट्त्वाकार या आयताकार, १ से ३ इञ्च लम्बे, आधार स्फानवत् या हृद्वत् या दो कोने निकले हुवे तथा लम्बे वृन्त से युक्त होते हैं । पुष्प-श्वेत या गुलाबी होते हैं । इसके बीज यूनानी वैद्यक में तुख्म हुम्माज नाम से व्यवहार में आते हैं । इसका साग बनाया जाता है । गुण और प्रयोग-यह दीपन, रुचिकर, सारक, शोथघ्न एवं वेदना स्थापन है । पचन नलिका के विकार में इसका साग देते हैं । आमाशय में दाह, आँव, वमन एवं क्षुधा नाश आदि में इसे देते हैं । इसके बीज शीतल, ग्राही, लेसदार तथा दाह शामक होते हैं । इनका उपयोग पित्त विकार, पित्तातिसार, मूत्र मार्ग में दाह एवं आमाशय शोथ में करते हैं । पत्तों का लेप सूजन पर तथा कीटदंश पर करते हैं । दंतशूल में भी रस लगाते हैं । अथ चञ्चुकी (भाफली) तस्या नामगुणानाह चिञ्चा चञ्चुश्चञ्चुकी च दीर्घपत्रा सतिक्तका । चञ्चुः शीता सरा रुच्या स्वाद्वी दोषत्रयापहा ।। धातुपुष्टिकरी बल्या मेध्या पिच्छिलका स्मृताः ।।२६।। चञ्चुकी के संस्कृत नाम-चिञ्चा, चञ्चु, चञ्चुकी दीर्घपत्रा तथा सतिक्तका ये सब हैं । चंचु-स्वादिष्ट, शीतल, सारक, रुचिकारक, त्रिदोषनाशक, धातु को पुष्ट करनेवाला, बलदायक, मेधा के लिये हितकर तथा पिच्छिल है । [२६] १७. चंचु हिं०-चंचु शाक, चोंच, (बा) माफली । बं०-बिलनलिता । म०-हरणखुरी, मगरमिठी । गु०-उमी बहुफली, छुंछडी । ले०-Corchorus fascicularis Lam. (कोकोर्रस् फॅसीक्यूलेरिस) । Fam. Tiliaceae (टिलिएसी) । यह गरम प्रान्तों में अधिक उत्पन्न होता है । इसका क्षुप-एक ऊंचा, प्रसरणशील एवं वर्षायु होता है । पत्ते- १-२ इञ्च लम्बे, पाव से आध इञ्च तक चौड़े, एकान्तर, आयताकार-भालाकार तथा दन्तुर होते हैं । फूल-पीले रंग के, २ से ५ एक वृन्त पर पत्तों के सामने आते हैं । फलियाँ-मृदुरोमश, करीब ½ इञ्च लम्बी, ३-४ एक साथ एवं प्रत्येक ३-४ कोष्ठ युक्त होती हैं । बीज-अनेक, काले एवं कोनयुक्त होते हैं । इसके पंचांग का उपयोग किया जाता है । गुण और प्रयोग-यह उत्तम स्नेहन एवं बल्य है । इसका क्वाथ सोजाक में देते हैं जिससे पेशाब की मात्रा बढ़कर जलन इत्यादि कम होती है । मात्रा-½ से १ तोला । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA

शाकवर्गः ८२५ अथ हिलमोचिका (हरकुच) । तस्य नामगुणानाह ब्राह्मी शङ्खधराऽऽचारी मत्स्याक्षी हिलमोचिका । शोथं कुष्ठं कफं पित्तं हरते हिलमोचिका ॥२७॥ हरकुच के संस्कृत नाम-ब्राह्मी, शङ्खधरा, आचारी, मत्स्याक्षी तथा हिलमोचिका ये सब हैं। हरकुच-शोथ, कुष्ठ, कफ तथा पित्त का नाशक है। [२७] १८. हरकुच शाक हिं०-हरकुच । बं०-हिलेंचा शाक, हिंलंचशाक, हिंगचा । ले०-Enhydra fluctuans Lour. (एन्हाइड्रा फ्लक्चुएन्स) । Fam. Compositae (कम्पोज़िटी) । यह आसाम, बिहार और बंगाल में पाया जाता है। यह जल के निकटवर्ती स्थान और दलदल में उत्पन्न होने वाली प्रसरणशील वनस्पति है। इसकी शाखा १-२ फीट लम्बी, मांसल, रोमश, भूमि पर पसरी हुई रहती है और गाँठों से मूल निकल कर भूमि में घुस जाते हैं। पत्ते- विपरीत, अवृन्त, रेखाकार-आयताकार १ से ३ इञ्च लम्बे और दन्तुर होते हैं। फूल (मुण्डक)-पीले, दण्डरहित, व्यास में ३ से ७ इञ्च एवं विषमलिंग होते हैं। इनमें प्रान्तीय पुष्प स्त्रीलिंग, जिह्वाकार एवं कई चक्रों में तथा केन्द्रीय पुष्प उभयलिंग होते हैं। अधःपत्रावलि के पत्र केवल चार होते हैं। इसके पत्ते कुछ कड़वे होते हैं तथा बंगाल में इसका साग बनाते हैं। रासायनिक संगठन-इसके शुष्क पौधे में उड़नशील तेल, स्टिग्मॅस्टेराल् (Stigmasterol) एवं अत्यल्प कड़वा पदार्थ होता है। गुण और प्रयोग-यह मृदुसारक, पित्तशामक, स्नेहन तथा त्वचा एवं वातिक विकारों में लाभदायक है। (१) त्वचा के रोग तथा वातिक विकारों में इसका स्वरस १ तोले की मात्रा में पिलाते हैं। (२) यकृत् का कार्य ठीक न होता हो तो चावल की माँड़ में इसको उबालकर सेंधव तथा सरसों का तेल डालकर देते हैं। नोट-टीकाकारों ने हिलमोचिका को कहीं-कहीं हुरहुर लिखा है जो वास्तव में इससे भिन्न है। अथ शितिवारः (चौपतिया) । तस्य नामलक्षणगुणानाह शितिवार शितिवारः स्वस्तिकः सुनिषण्णकः । श्रीवारकः सूचिपत्रः पर्णकः कुक्कुटः शिखी ॥२८॥ चाङ्गेरीसदृशः पत्रैश्चतुर्दल इतीरितः । शाको जलान्विते देशे चतुष्पत्रीति चोच्यते ॥२९॥ सुनिषण्णो हिमो ग्राही मेदोदोषत्रयापहः ॥३०॥ अविदाही लघुः स्वादुः कषायो रूक्षदीपनः । वृष्यो रुच्योज्वरश्वासमेहकुष्ठभ्रम प्रणुत् ॥३१॥ चौपतियो के संस्कृत नाम-शितिवार, शितिवर, स्वस्तिक, सुनिषण्णक, श्रीवारक, सूचिपत्र, पर्णक, कुक्कुट और शिखी ये सब हैं। लक्षण-चौपतिया के पत्ते चांगेरी (तिनपतिया) के पत्तों के समान होते हैं और इसके पत्रदण्ड में ४ पत्रक रहते हैं इसी से इसको चतुष्पत्री अर्थात् चौपतिया कहते हैं। यह शाक जलयुक्त देश में उत्पन्न होता है। चौपतिया-मधुर तथा कषाय रसयुक्त, शीतल, ग्राही, किंचित् विदाही, लघु, रूक्ष, अग्निदीपक, वीर्यवर्धक, रुचिकारक एवं-मेद, त्रिदोष, ज्वर, श्वास, प्रमेह, कुष्ठ तथा भ्रम रोग नाशक है। [२९-३२] CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

८२६ भावप्रकाशनिघण्टुः नोट-शितिवार तथा सुनिषण्णक वास्तव में दो भिन्न द्रव्य हैं जबकि यहाँ इन्हें पर्यायों में लिखा गया है। यहाँ जिसका स्वरूप वर्णन श्लोक में आया है वह चौपतिया साग है। शितिवार इससे भिन्न है जिसका वर्णन पहले कर्पूरादिवर्ग (पृष्ठ २६४) में केवर्त्तमुस्तक के अन्तर्गत किया जा चुका है। १९. चौपतिया हिं०-चौपतिया, सुनसुनिया साग। बं०-सुवुणी शाक, शुनिशाक, शुशुनी शाक। ले०-Marsilea minuta Linn. (मार्सिलिया माइन्यूटा)। Fam. Rhizocarpeae (राइजो कार्पी)। यह शाकवर्गीय वनस्पति भारतवर्ष के प्रायः सब प्रान्तों के सजल स्थान में कहीं-न-कहीं पायी जाती है। वर्षा ऋतु में यह अधिक उत्पन्न होती है। इसमें नीचे विसर्पी, पतला एवं सशाख काण्ड होता है। इसके छत्ते-पानी के ऊपर तैरते हुए दिखाई पड़ते हैं। प्रत्येक पत्रदण्ड पर चार-चार पत्ते स्वस्तिक क्रम में निकले रहते हैं, इस कारण इसे चतुष्पत्री या चौपतिया भी कहते हैं। पत्ते और दण्ड आकार में छोटे-बड़े हुआ करते हैं। पत्ते-चांगेरी के पत्तों के समान किन्तु उनसे बड़े होते हैं। बीजाणुकोष एक विशेष प्रकार की अंडाकार परन्तु कुछ-कुछ चिपटी रचना के अन्दर रहते हैं जो फल की तरह मालूम होती है। गुण और प्रयोग-इसका साग निद्राजनक तथा दीपन होता है। निद्रा लाने के लिये तथा अग्निमांद्य में इसका उपयोग करते हैं। अथ मूलकपत्रम् (मुरई का पत्ता) । तस्य गुणानाह पाचनं लघु रुच्योष्णं पत्रं मूलकजं नवम्। स्नेहसिद्धं त्रिदोषघ्नमसिद्धं कफपित्तकृत् ।। ३२ ।। नवीन मुरई के पत्ते का शाक-पाचक, लघु (हल्का), रुचिकारक तथा उष्ण होता है। तेल में भुना हुआ शाक- त्रिदोष-नाशक होता है। बिना भुना हुआ-कफ तथा पित्तकारक होता है। [३२] २०. मूली के पत्ते इसका परिचय कंदशाक वर्ग में दिया जायगा। अथ द्रोणपुष्पी पत्रम् (गूमा का पत्ता) । तस्य गुणानाह द्रोणपुष्पीदलं स्वादु रूक्षं गुरु च पित्तकृत्। भेदनं कामलाशोथमेहज्वरहरं कटु ।। ३३ ।। गूमा के पत्ते का शाक-स्वादिष्ट, कटुरसयुक्त, रूक्ष, गुरु, पित्तकारक, मलभेदक एवं कामला, शोथ, प्रमेह तथा ज्वर को दूर करनेवाला होता है। [३३] २१. गूमा इसका पूर्ण विवरण गुडूच्यादि वर्ग (पृष्ठ ६२५) में दिया गया है। अथ यवानीशाकम् (अजवाइन का शाक) । तस्य गुणानाह यवानीशाकमाग्नेयं रुच्यं वातकफप्रणुत् । उष्णं कटु च तिक्तं च पित्तलं लघु शूलहृत् ।। ३५ ।। अजवाइन के पत्ते का शाक-आग्नेय (अग्नि के गुणों से युक्त), रुचिकारक, उष्ण, कटु तथा तिक्त रसयुक्त, पित्तजनक, लघु एवम्-वात, कफ तथा शूल को दूर करनेवाला होता है ।। [३४]

शाकवर्गः ८२७ २२. अजवाइन इसका पूर्ण परिचय हरीतक्यादि वर्ग (पृष्ठ २२७) में दिया जा चुका है। अथ दद्रुघ्नपत्रम् (पमार, चकवड़ शाक)। तस्य गुणानाह दद्रुघ्नपत्रं दोषघ्नमम्लं वातकफापहम्। कण्डूकासक्रिमिश्वासदद्रुकुष्ठप्रणुल्लघु ।।३६।। चकवड़ के पत्ते—दोषनाशक, लघु, अम्लरस युक्त, वात, कफ, खुजली, खाँसी, क्रिमि, श्वास, दाद और कुष्ठ को दूर करनेवाले होते हैं। [३५] २३. चकवड़ इसका पूर्ण विवरण हरीतक्यादि वर्ग (पृष्ठ ३१८) में दिया गया है। अथ सेहुण्डः (थूहर)। तत्पत्रस्य गुणानाह सेहुण्डस्य दलं तीक्ष्णं दीपनं रेचनं हरेत्। आध्मानाष्ठीलिकागुल्मशूलशोथोदराणि च ।।३६।। थूहर के पत्ते—तीक्ष्ण, अग्निदीपक, रेचक (दस्तावर) एवम्—आध्मान (अफरा), अष्ठीलिका, गुल्म, शूल, शोथ तथा उदररोग को दूर करने वाले होते हैं। [३६] २४. थूहर इसका पूर्ण परिचय गुडूच्यादि वर्ग (पृष्ठ ४८२) में दिया गया है। अथ पर्पटः (पित्तपापड़ा)। तत्पत्रस्य गुणानाह पर्पटो हन्ति पित्तास्रज्वरतृष्णाकफभ्रमान्। संग्राही शीतलस्तिक्तो दाहनुद्वातलो लघुः ।।३७।। पित्तपापड़ा—तिक्त रस युक्त, ग्राही, शीतल, वातजनक, लघु एवम्—पित्त, रक्तविकार, ज्वर, प्यास, कफ, भ्रमरोग तथा दाह को दूर करने वाला होता है। [३७] २५. पित्तपापड़ा इसका पूर्ण विवरण गुडूच्यादि वर्ग (पृष्ठ ४९७) में किया गया है। अथ गोजिह्वा। तस्या गुणानाह गोजिह्वा कुष्ठमेहास्रकृच्छ्रज्वरहरी लघुः ।।३८।। गोजिह्वा के पत्ते—लघु एवम् कुष्ठ, प्रमेह, रक्तविकार, मूत्रकृच्छ्र तथा ज्वर को दूर करने वाले होते हैं। [३८] २६. गोजिह्वा इसका पूर्ण वर्णन गुडूच्यादि वर्ग (पृष्ठ ६३२) में दिया गया है। अथ पटोलपत्रम्। तस्य गुणानाह पटोलपत्रं पित्तघ्नं दीपनं पाचनं लघु। स्निग्धं वृष्यं तथोष्णं च ज्वरकासक्रिमिप्रणुत् ।।३९।। परवर के पत्ते—पित्तनाशक, अग्निदीपक, पाचक, लघु, स्निग्ध, वीर्यवर्धक, उष्ण, एवम्—ज्वर, खाँसी तथा क्रिमि को नष्ट करने वाले होते हैं। [३९] CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

८२८ भावप्रकाशनिघण्टुः २७. पटोल-पत्र इसका परिचय आगे शाक वर्ग (पृष्ठ ८३७) में लिखा गया है। अथ गुडूचीपत्रम् (गिलोयशाक) । तस्य गुणानाह गुडूचीपत्रमाग्नेयं सर्वज्वरहरं लघु । कषायं कटु तिक्तं च स्वादुपाकं रसायनम् ।।४०।। बल्यमुष्णं च संग्राहि हन्याद्दोषत्रयं तृषाम् । दाहप्रमेहवातासृक्कामलाकुष्ठपाण्डुताः ।।४१।। गिलोय के पत्ते-आग्नेय (अग्नि के गुणों से युक्त), सर्व प्रकार के ज्वर को दूर करने वाले, लघु, कषाय, कटु तथा तिक्त रसयुक्त, विपाक में मधुर रस युक्त, रसायन, बलकारक, उष्ण, ग्राही, एवम्-त्रिदोष, तृषा, दाह, प्रमेह, वात, रक्तविकार या वातरक्त, कामला, कुष्ठ तथा पाण्डु रोग को दूर करने वाले होते हैं । [४०-४०] २८. गिलोय शाक इसका विस्तृत वर्णन गुडूच्यादि वर्ग (पृष्ठ ४४८) में किया गया है। अथ कासमर्दः (कसौंदी शाक) । तस्य नामानि तत्पत्रस्य गुणांश्चाह कासमर्दोऽरिमर्दश्च कासारिः कर्कशस्तथा । कासमर्ददलं रुच्यं वृष्यं कासविषास्रनुत् ।।४२।। मधुरं कफवातघ्नं पाचनं कण्ठशोधनम् । विशेषतः कासहरं पित्तघ्नं ग्राहकं लघु ।।४३।। कसौंदी के संस्कृत नाम-कासमर्द, अरिमर्द, कासारि तथा कर्कश ये सब हैं । कासमर्द के पत्ते-मधुर रसयुक्त, रुचिकारक, वीर्यवर्धक, पाचक, कण्ठ को शुद्ध करने वाले लघु, ग्राही, एवम्-खाँसी, विष, रक्तविकार, कफ तथा वात को नाश करने वाले होते हैं और विशेषतः ये कासनाशक तथा पित्त को दूर करने वाले होते हैं । [४२-४३] २९. कसोंदी हिं०-कसौंदी, कसौंदी । बं०-कालकासुन्दा । म०-कासविंदा । गु०-कासोंदरो । क०-दोग्दुतगचे । ते०- कर्सि । मला०-पीन्ना बीर । ता०-पैदाविरै । अं०-The Negro Coffee (दी निग्रो कॉफी) । ले०-Cassia occidentalls Linn. (कंसोआ ऑक्सीडेण्टॅलिस्) । Fam. Leguminosae (लेग्युमिनोसी) । कसौंदी-क्षुप जाति की वनस्पति वर्षा ऋतु में अधिक होती है। इसका क्षुप-३-४ फीट तक ऊँचा तथा कुछ दुर्गन्ध युक्त होता है । कांड-कुछ नालीदार होता है । पत्ते-संयुक्त एवं ६ से १२ इञ्च लम्बे तथा वृन्त के आधार पर एक ग्रन्थि युक्त होते हैं । पत्रक-लट्वाकार, लट्वाकार-आयताकार या लट्वाकार-प्रासवत, १ १/४ से ४ इञ्च लम्बे, मुलायम एवं प्रायः लम्बाग्र होते हैं । पुष्प-पीले रंग के होते हैं । फली-४-५ इञ्च लम्बी तथा चिपटी होती है । इसके पत्र, मूल तथा बीजों का उपयोग किया जाता है। बीजों को भूनकर कॉफी की तरह व्यवहार में लाते हैं। भेद-इसका एक अन्य भेद कँ. सोफेरा (C. sophera) होता है। इसके क्षुप-४ से ७ फीट ऊँचे; पत्रक ६ से १२ जोड़े, प्रायः १ से ३ इञ्च लम्बे, लम्बे प्रासवत्, तीक्ष्णाग्र या लम्बाग्र एवं वृन्त आधारीय ग्रंथि एक किन्तु भिन्न आकार की होती है । रासायनिक संगठन-इसके बीजों में टॅनिन् ॲसिड, म्यूसिलेज, तेल, एमोडिन (Emodin), टॉक्सअल्ब्यूमिन (Toxalbumin) एवं क्राइसोरोबिन (Chrysorobin) पाया जाता है । विरेचन द्रव्य इनको भूनने से नष्ट हो जाते हैं । यह विरेचन द्रव्य सनाय जैसे इसके पत्तों में भी होते हैं ।

शाकवर्गः ८२९ गुण और प्रयोग—यह उष्ण, कण्ठशोधन, कफघ्न, स्रंसन, ज्वरहर एवं कुष्ठघ्न है। इसकी जड़ मूत्रजनन है। इसका पंचांग विरेचन है। पत्र एवं बीज ज्वरहर हैं। (१) कफज्वर, कुकास, श्वास आदि में पत्रस्वरस मधु के साथ देते हैं। इससे वमन तथा विरेचन भी होता है। (२) पंचांग के क्वाथ से वायु का अनुलोमन होता है तथा शौच साफ होता है। (३) पत्तों का लेप व्रणशोथ, विसर्प आदि दाहयुक्त चर्म रोगों में किया जाता है। त्वचा के रोगों में मूल तथा पत्तों का क्वाथ एवं लेप उपयोगी है। (४) उदर तथा जलशोथ में मूल का उपयोग करते हैं। मात्रा—स्वरस १/२ से १ तोला; पंचांग ३ से ६ माशा; फल ३ से ६ माशा। कासमर्द भेद—इसमें इमोडिन तथा क्राइसोफेनिक ॲसिड पाया जाता है। इसके भी गुण कासमर्द के समान हैं। इसके पत्तों का बाह्य प्रयोग दाद में करते हैं। पंचांग का क्वाथ खाँसी में दिया जाता है। अथ चणकशाकम् (चने का शाक) । तस्य गुणानाह रुच्यं चणकशाकं स्याद् दुर्जरं कफवातकृत्। अम्लं विष्टम्भजनकं पित्तनुद्दन्तशोथहृत् ।।४४।। चने का शाक—रुचिकारक, देर में हजम होने वाला, कफ तथा वातकारक, अम्लरस युक्त, विष्टम्भ पैदा करने वाला एवम्–पित्त तथा दाँतों के शोथ को दूर करने वाला होता है। [४४] ३०. चना चने का वर्णन शिम्बीधान्य वर्ग (पृष्ठ ८०२) में किया गया है। अथ कलायशाकम् (मटर का शाक) । तस्य गुणानाह कलायशाकं भेदि स्याल्लघु तिक्तं त्रिदोषजित् ।।४७।। मटर का शाक—मल का भेदन करने वाला, लघु, तिक्तरस युक्त, एवम् त्रिदोष-नाशक होता है। [४५] ३१. मटर इसका परिचय शिम्बीधान्य वर्ग (पृष्ठ ८०२) में दिया गया है। अथ सार्षपं शाकम् (सरसों का शाक) । तस्य गुणानाह कटुकं सार्षपं शाकं बहुमूत्रमलं गुरु। अम्लपाकं विदाहि स्यादुष्णं रूक्षं त्रिदोषकृत्। सक्षारलवणं तीक्ष्णं स्वादु शाकेषु निन्दितम् ।।४६।। सरसों का शाक—कटुरस युक्त, बहुत मूत्र तथा मल को करने वाला, गुरु, विपाक में अम्लरस युक्त, विदाही, उष्ण, रूक्ष, त्रिदोष कारक, क्षार युक्त लवण रस वाला, तीक्ष्ण और स्वादिष्ट होता है। एवम् यह शाकों में निन्दनीय होता है। [४६] ३२. सरसों इसका वर्णन शिम्बीधान्य वर्ग (पृष्ठ ८०७) में किया गया है। ।। इति पत्रशाकानि ।।

८३० भावप्रकाशनिघण्टुः अथ पुष्पशाकानि। तत्रागस्तिपुष्पस्य गुणानाह अगस्तिकुसुमं शीतं चातुर्थिकनिवारणम्। नक्तान्ध्यनाशनं तिक्तं कषायं कटुपाकि च। पीनसश्लेष्मपित्तघ्नं वातघ्नं मुनिभिर्मतम् ।।४७।। अगस्त का पुष्प—तिक्त तथा कषायरस युक्त, विपाक में कटुरस युक्त, शीतल एवम् चौथिया ज्वर, नक्तान्ध्य (रतौंधी), पीनस, कफ, पित्त तथा वात को नष्ट करने वाला होता है ऐसा मुनि लोग मानते हैं। [४७] ३३. अगस्त इसका विवरण पुष्पवर्ग (पृष्ठ ६६७) में दिया गया है। अथ कदलीपुष्पम् (केले का फूल)। तस्य गुणानाह कदल्यः कुसुमं स्निग्धं मधुरं तुवरं गुरु। वातपित्तहरं शीतं रक्तपित्तक्षयप्रणुत् ।।४८।। केले का फूल—मधुर तथा कषायरस युक्त, स्निग्ध, गुरु, शीतल एवम्—वात-पित्त, रक्तपित्त तथा क्षय को दूर करने वाला होता है। [४८] ३४. केला इसका परिचय फलवर्ग (पृष्ठ ७१४) में दिया गया है। अथ शिग्रोः मधुशिग्रोः च पुष्पं (सहजना एवं उसके भेद एवं फूल)। तयोर्गुणानाह शिग्रोः पुष्पं तु कटुकं तीक्ष्णोष्णं स्नायुशोथनुत्। कृमिहृत्कफवातघ्नं विद्रधिप्लीहगुल्मजित्। मधु शिग्रोस्त्वक्षिहितं रक्तपित्तप्रसादनम् ।।४९।। सहजन का फूल—कटुरस युक्त, तीक्ष्ण, उष्ण, स्नायुगत शोथ को दूर करने वाला एवम् कृमि, कफ, वात, विद्रधि, प्लीहा तथा गुल्म को नष्ट करने वाला होता है। मधुशिग्रु (सहजन भेद) का फूल—नेत्रों के लिये हितकर तथा रक्तपित्त को दूर करने वाला होता है। [५०] ३५. सहजना इसका विवरण गुडूच्यादि वर्ग (पृष्ठ ५१२) में किया गया है। अथ शाल्मलीपुष्पम् (सेमल के फूल)। तस्य गुणानाह शाल्मलीपुष्पशाकं तु घृतसैन्धवसाधितम्। प्रदरं नाशयेत्येव दुःसाध्यं च न संशयः ।।५०।। रसे पाके च मधुरं कषायं शीतलं गुरु। कफपित्तास्रजिद् ग्राहि वातलं च प्रकीर्त्तितम् ।।५१।। सेमल के फूल का शाक—यदि यह घी तथा सेन्धा निमक डाल कर बनाया जाय तो सेवन करने से दुःसाध्य प्रदर को दूर करता है इसमें कोई संशय नहीं है। और यह कषाय तथा मधुररस युक्त, विपाक में मधुररस युक्त, शीतल, गुरु, ग्राही, वातजनक एवम् कफ, पित्त तथा रक्तविकार को दूर करने वाला होता है। [५०-५१] ३६. सेमर इसका विवरण वटादिवर्ग (पृष्ठ ६९५) में दिया गया है। ।। इति पुष्पशाकानि ।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA

शाकवर्गः ८३१ अथ फलशाकानि । तत्रकूष्माण्डम् (पेठा) । तस्य नामानि तद्बाल-मध्यम-वृद्धफलानां च गुणानाह कूष्माण्डं स्यात्पुष्पफलं पीतपुष्पं बृहत्फलम् ।।५२।। कूष्माण्डं बृंहणं वृष्यं गुरु पित्तास्रवातनुत् । बालं पित्तापहं शीतं मध्यमं कफकारकम् ।।५३।। वृद्धंनातिहिमं स्वादु सक्षारं दीपनं लघु । बस्तिशुद्धिकरं चेतोरोगहृत्सर्वदोषजित् ।।५४।। पेठा के नाम—कूष्माण्ड, पुष्पफल, पीतपुष्प तथा बृहत्फल ये सब हैं। पेठा—बृंहण (बलवर्धक), वृष्य (वीर्यवर्धक), गुरु एवम् पित्त, रक्तविकार तथा वात को नष्ट करने वाला होता है। कच्चा पेठा—शीतल तथा पित्तनाशक होता है। मध्यम अवस्था का पेठा—कफकारक होता है। पका पेठा—स्वादिष्ट, क्षारयुक्त, किंचित् शीतल, अग्निदीपक, लघु, बस्ति (मूत्राशय) का शोधन करने वाला, मानसिक रोग (उन्माद आदि) तथा सम्पूर्ण दोषों को दूर करने वाला होता है। [५२-५४] ३७. पेठा हिं०—पेठा, भूरा कुम्हड़ा, भतुआ, रकसा कोंहड़ा । बं०—कुमड़ा । म०—कोहला । गु०—भुरुं कोह्लुं । क०— दार कोहोला । ता०—पुशानीकै । ते०—गुम्मडि । फा०—पजदाब, पदुव । अ०—महदवः । अं०—The Ash Gourd (दी अॅश गोर्ड) । ले०—Benincasa cerifera Savi (बेनिनर्कैसा सेरीफेरा) । Fam. Cucurbitaceae (कुकुरबिटेसी) । पेठा—प्रायः सब प्रान्तों में रोपण किया जाता है। इसकी लता—मचान आदि के सहारे खूब फैलती है। पत्ते— कद्दू के समान ४-६ इञ्च के घेरे में गोलाकार, कटे किनारे वाले या ५ भाग वाले होते हैं। फूल—पीले रंग के आते हैं। फल—गोलाई युक्त, किञ्चित् लम्बे तथा लम्बाई में १ से १.५ फीट होते हैं। इसकी गूदी सफेद रहती है। बीज— अनेक, चिपटे एवं किनारेदार होते हैं। रासायनिक संगठन—इसके फल में आर्द्रता ९६, प्रोटीन ०.४, स्नेह ०.१, कार्बोहाइड्रेट ३.२, खनिज ०.३ भाग तथा विटामिन बी₁ २१ अ. एकक प्रति १०० ग्राम में रहता है। गुण और प्रयोग—इसका फल मूत्रजनन, सौम्य विरेचक, बल्य, पौष्टिक, पित्तशामक, रक्तपित्त प्रशमन एवं रक्त संग्राहक है। इसका उपयोग रक्तपित्त, रक्तष्ठीवन, आन्तरिक रक्तस्राव, पागलपन, अपस्मार, मूत्रकृच्छ्र, तृष्णा एवं प्रमेह में किया जाता है। इससे रक्ताभिसरण की तेजी कम होती है। अधिक मात्रा में शौच साफ होकर नींद आती है। (१) उन्माद में इसका रस पिलाते हैं जिससे शौच साफ होकर नींद आती है। (२) राजयक्ष्मा में रक्तष्ठीवन होने पर इसका रस देते हैं। (३) अर्श में कूष्माण्डपाक देते हैं। (४) इसके बीज तथा बीजों का तेल चिपटे कृमियों के उपसर्ग में लाभदायक है। मात्रा—स्वरस २ से ४ औंस; बीजचूर्ण ३ से ६ माशा। अथ कूष्माण्डी (कुम्हडी) । तस्यानामगुणानाह कूष्माण्डी तु भृशं लघ्वी कर्कारुरपि कीर्त्तिता । कर्कारुर्ग्राहिणी शीता रक्तपित्तहरा गुरुः । पक्वा तिक्ताऽग्निजननी सक्षारा कफवातनुत् ।।५६।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

८३२ भावप्रकाशनिघण्टुः कुम्हड़ी का संस्कृत नाम-अत्यन्त लघु पेठे को "कुष्माण्डी" कहते हैं, इसकी का नाम "कर्कारु" भी है। कुम्हड़ी-ग्राही, शीतल, रक्तपित्त नाशक तथा गुरु होती है। पकी कुम्हड़ी-तिक्तरस युक्त, अग्निवर्धक, क्षार युक्त एवम्-कफ तथा वात को दूर करने वाली होती है। [५५] ३८. कुष्माण्डी (कोहला) हिं०-कुम्हड़ा, सफेद कद्दू। बं०-सादा कुम्हड़ा। म०-कौला। ता०-सुरईकई। अं०-Vegetable Marrow (वेजिटेबुल मॅरो); Field Pumpkin (फील्ड पम्पकिन)। ले०-Cucurbita pepo Linn. (कुकुरविटा पेपो)। Fam. Cucurbitaceae (कुकुरबिटेसी)। यह सभी प्रान्तों में कृषित अवस्था में होता है। इसकी लता-वर्षायु, दृढ़ एवं खुरदरी से रोमश होती है। पत्ते- गोलाकार, अल्प खण्डित एवं वृन्त तीक्ष्ण रोमश होते हैं। पुष्प-पीले रंग के आते हैं। फल-कई प्रकार के किन्तु सामान्यतः नाशपाती के आकार वाले या कुछ आयताकार होते हैं। इसका डण्ठल कड़ा, अनेक गहरी धारियों से युक्त एवं फल के आधारीय भाग में फूला हुआ नहीं रहता। इसके अनेक प्रकार होते हैं। गुद्दी हलके रंग की एवं गंधहीन होती है। बीजों को तथा उसके तेल को खाने के काम में लाते हैं। रासायनिक संगठन-इसमें आर्द्रता ९५, प्रोटीन ०.५, स्नेह ०.१, कार्बोहाइड्रेट ४ एवं खनिजों में लोह तथा अत्यल्प खटिक, आर्सेनिक और विटामिन 'सी' १०० ग्राम में १८ मि० ग्रा० रहता है। बीजमज्जा में प्रोटीन, तैल (३८%), रालीय द्रव्य एवं सॅलिसिलिक् ॲसिड आदि द्रव्य होते हैं। गुण और प्रयोग-इसके ताजे बीज, चिपटे कृमियों में लाभदायक हैं। ३० से ग्राम बीजों को कूटकर दूध एवं मधु मिलाकर खालीपेट पिलाते हैं। बाद में विरेचन देते हैं। इसके पत्तों का लेप जलने पर करते हैं। नोट-कुम्हड़े के निम्नलिखित अन्य भेद भी पाये जाते हैं- (क) हिं०-लाल कुम्हड़ा, सीताफल। अं०-Red Gourd (रेड गोर्ड); Squash (स्कैश)। ले०-C. maxima Duchesne (कु. मॅक्सिमा)। इसमें भी फल विभिन्न नाप के होते हैं एवं डंठल न तो धारीदार रहता है न फल से लगा भाग बढ़ा हुआ रहता है। इसका गूदा पकने पर पीताभ या रक्ताभ रहता है। इसके बीज श्वेत या भूरे तथा उनके किनारे भी उसी तरह होते हैं। इसके पत्र, पुष्प, फल एवं बीज का उपयोग खाद्य रूप में किया जाता है। बीज कृमिघ्न, मूत्रल तथा बल्य होते हैं। (ख) ले०-C. moschata Duchesne ex Poir. (कु. मास्केटा)। इसमें के फल का डंठल धारीदार एवं फल से लगा भाग बढ़ा हुआ रहता है। इसमें बीज धूसराभ श्वेत या पीताभ किन्तु किनारे गहरे रंग के होते हैं। इसके अन्य भाषा नाम एवं इसका व्यवहार (क) की तरह ही होता है। अथ अलाबूर्दीर्घा-वर्तुला च तस्या नामानि भेदांस्तत्फलगुणाँश्चाह अलाबूः कथिता तुम्बी द्विधा दीर्घा च वर्तुला ।।५६।। मिष्टतुम्बीफलं हृद्यं पित्तश्लेष्मापहं गुरु । वृष्यं रुचिकरं प्रोक्तं धातु पुष्टिविवर्धनम् ।।५७।। लौकी के संस्कृत नाम-अलाबु तथा तुम्बी है। भेद-लम्बी तथा गोल भेद से लौकी दो प्रकार की होती है अर्थात्-१ दीर्घा अलाबु, २ वर्तुला अलाबु। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

शाकवर्गः ८३३ मीठी लौकी का फल—गुरु, रुचिकारक, वीर्यवर्धक, हृदय के लिये हितकर, पित्त तथा कफ नाशक एवम् धातु की पुष्टि को विशेष रूप से करने वाला होता है। [५६-५७] ३९. अलाबू (लौकी) हिं०—तुम्बी, लौआ, लौकी, कद्दू, कदुआ, मीठी तोम्बी, लम्बा कद्दू । बं०—लाउ। म०—दुध्या भोंपला। गु०—दुधियुं, तुंबड़ी। क०—उवलकाई। ते०—अलबुवु, आनपकाया। फा०—शीरिन् । अ०—युक्तिनेहुलुकुर । अं०— White Gourd (ह्वाइट गोर्ड) । ले०—Lagenaria vulgaris Ser (लॅगेनेरिया वर्ल्गेरिस्) । Fam. Cucurbitaceae (कुकुरबिटेसी) । यह प्रायः सब प्रान्तों में रोपण की जाती है। खेत, बाग, मचान, छप्पर आदि पर फैली हुई इसकी बेल देखने में आती है। इसके पत्ते—मृदुरोमश, ६-७ इञ्च के घेरे में गोलाकार, पञ्च कोणाकार या पाँच खण्डवाले होते हैं। फूल— सफेद रंग के आते हैं। फल—१-२ हाथ लम्बा गोल या गोल अथवा चिपटा गोल विभिन्न आकार का होता है। कृषिजन्य इसके अनेक प्रकार होते हैं। कृषिजन्य की गुद्दी मीठी होती है तथा वन्य की कड़वी होती है। गुण और प्रयोग—इसके कृषित प्रकार की लोग सब्जी इत्यादि के काम में लाते हैं। वन्यभेद जो स्वाद में कड़वा होता है उसका चिकित्सा में उपयोग होता है जिसका आगे वर्णन दिया गया है। अथ कटुतुम्बी (कड़वी लौकी)। तस्या नामगुणानाह इक्ष्वाकुः कटुतुम्बी स्यात्सा तुम्बी च महाफला । कटुतुम्बी हिमा हृद्या पित्तकासविषापहा । तिक्ता कटुर्विपाके च वातपित्तज्वरान्तकृत् ।।५९।। कड़वी तुम्बी के संस्कृत नाम—इक्ष्वाकु, कटुतुम्बी, तुम्बी और महाफला ये सब हैं। कड़वी तुम्बी—तिक्तरसयुक्त, विपाक में कटु रसयुक्त, शीतल, हृदय के लिए हितकर एवम्-पित्त, खाँसी, विष, वात तथा पित्तज्वर को नष्ट करने वाली होती है। [५९] ४०. कटुतुम्बी (कड़वी तुम्बी) हिं०—कटुलौकी, कड़वी तोंबी, तित लौकी, तितुआ लौका, तुमरी, तुम्बी । बं०—तितलाउ, तित लाओ । म०— कडु मोपला । गु०—कड़वी तुम्बरी । क०—कहि सोरे । फा०—कदूय तल्ख । अ०—कर अउल् मुर, करउब् मुर । अं०—Bitter Gourd (बिटर गोर्ड) । ले०—Lagenaria vulgaris Ser. (लॅगेनेरिया वर्ल्गेरिस्) । Fam. Cucurbitaceae (कुकुरबिटेसी) । कड़वी तुम्बी—इसके लता-पत्र-पुष्पादि सब उक्त अलाबू के समान होते हैं। फल—यह बहुत कड़वा होता है। यह इसका वन्य भेद है। रासायनिक संगठन—बीजों में सॅपोनिन् होता है। गुण और प्रयोग—इसकी गुद्दी अत्यन्त कड़वी, वामक एवं भेदन होती है। इन्द्रायण की तरह इसका प्रभाव है। इससे हैजे जैसी अवस्था होती है। प्राचीन ग्रन्थों में वमन कराने के लिये इसका उपयोग लिखा है। अल्प मात्रा में इससे मिचली आकर कफ निकलता है तथा शौच साफ होता है। कामला तथा कास श्वास में इसे देते हैं। कामला में पत्तों का क्वाथ देते हैं। यह भी विरेचक होता है। दाह एवं शोथ पर गुद्दी को लगाते हैं। पत्तों से सिद्ध तैल गंडमाला, गाँठ या बद आदि पर मलते हैं। ५६ भाव.I CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

८३४ भावप्रकाशनिघण्टुः अथ कर्कटी (ककडी)। तस्या नामानि तत्पक्वापक्वफलगुणाँश्चाह एर्वारुः कर्कटी प्रोक्ता कथ्यन्ते तद्गुणा अथ ।।५९।। कर्कटी शीतला रूक्षा ग्राहिणी मधुरा गुरुः । रुच्या पित्तहरा सामा पक्वा तृष्णाऽग्निपित्तकृत् ।।६०।। ककड़ी का संस्कृत नाम—एर्वारु तथा कर्कटी है। कच्ची ककड़ी—मधुररस युक्त, शीतल, रूक्ष, ग्राही, गुरु, रुचिकारक तथा पित्तनाशक होती है। पकी ककड़ी— तृषा, जठराग्नि तथा पित्त को बढ़ाने वाली होती है। [५९-६०] ४१. ककड़ी हिं०—ककड़ी (री)। बं०—कांकुर। म०—काँकडी। क०—सौते। ते०—दोसकाया। ता०—वेल्लरिक्कै। फा०— ख्यार जाब, ख्यार दराल। अ०—किस्सा कदस। अं०—Snake Cucumber (स्नेक् कुकुम्बर)। ले०—Cucumis utilissimus Roxb. (कुकुमिस युटिलिस्सिमस्)। Fam. Cucurbitaceae (कुकुरबिटेसी)। यह युक्तप्रान्त, पञ्जाब आदि प्रान्तों में अधिक उत्पन्न होती है। इसकी लता खूब फैलती है। पत्ते—पञ्च कोणाकार और दन्तुर होते हैं। फूल—पीले रंग के आते हैं। फल—कुछ इञ्चों से लेकर ३ फीट तक लम्बे होते हैं। यह हलके या गहरे हरे रंग के एवं कोमल अवस्था में मृदु रोमश होते हैं। बीज—छोटे-छोटे होते हैं। इसके अनेक प्रकार पाये जाते हैं जिनमें कड़वा भेद भी होता है। गरमी के दिनों में इसे लोग कच्चा या सब्जी के रूप में खाते हैं। गुण और प्रयोग—ककड़ी शीत, पाचन एवं मूत्रजनन है। बीज शीत, मूत्रजनन एवं बल्य है। पत्तों की राख कफ निस्सारक है। (१) बीजों का उपयोग मूत्रकृच्छ्र तथा मूत्राघात में करते हैं। इसमें बीज ४ भाग, दारु हल्दी १ भाग, मुलेठी १ भाग इनको पीसकर चावल की मांड के साथ पिलाते हैं। (२) गेहूँ, मकई, अरहर, मूँग आदि प्रोटीन युक्त आहार से उत्पन्न कुपचन में ककड़ी का उपयोग किया जाता है। इसे भोजन के साथ या भोजनोत्तर देते हैं। अजीर्ण से वमन हो तो बींजों को मट्ठे में पीसकर पिलाते हैं। (३) श्वास नलिकाओं में कफ जमा हो तो पत्तों की राख देते हैं। अथ चिचिण्डः (चिचिण्डा)। तस्य नामानि गुणाँश्चाह चिचिण्डः श्वेतराजिः स्यात्सुदीर्घो गृहकूलकः। चिचिण्डो वातपित्तघ्नो बल्यः पथ्यो रुचिप्रदः। शोषणोऽतिहितः किञ्चिद् गुणैर्न्यूनः पटोलतः।।६१।। ४२. चचेण्डा हिं०—चचेंडा, चिचिंडा चिचेंडा। बं०—चिचिंगा। म०—पड़वल। गु०—पंडोलुं। ते०—पोटल काया। अं०— Snake Gourd (स्नेक गोर्ड)। ले०—Trichosanthes anguina Linn. (ट्रॉइकोसेंथीस् ऐंग्विना)। Fam. Cucurbitaceae (कुकुरबिटेसी) चिचेंडा—खेतों में बोया जाता है। इसकी लता—विस्तार से फैलती है। पत्ते—कटे किनारे वाले पंचकोणाकार होते हैं। फूल—पीले रंग के आते हैं। फल—ककड़ी के समान लम्बा होता है परन्तु इसके दोनों छोर पतले होते हैं और इस पर लम्बी सफेद धारियाँ होती हैं। इसकी सब्जी लोग खाते हैं। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

शाकवर्गः ८३५

गुण और प्रयोग—इसके बीज शीतल होते हैं। अथ कारवेल्लं कारवेल्ली च (करेला, करेंली) तयोर्नामानि गुणाँश्चाह कारवेल्लं कठिल्लं स्यात्कारवेल्ली ततो लघुः । कारवेल्लं हिमं भेदि लघु तिक्तमवातलम् ।।६२।। ज्वरपित्तकफास्रघ्नं पाण्डुमेहकृमीन् हरेत् । तद्गुणा कारवेल्ली स्याद्विशेषाद्दीप्नी लघुः ।।६३।। करेला के संस्कृत नाम—कारवेल्ल तथा कठिल्ल हैं। करेली का संस्कृत नाम—कारवेल्ली है। यह करेला की अपेक्षा छोटी होती है। करेला—तिक्त रसयुक्त, शीतल, मलभेदक, लघु, किंचिद् वातजनक होता है और ज्वर, पित्त, कफ, रक्तविकार, पाण्डु, प्रमेह तथा कृमि का नाशक होता है। करेली—इसके गुण उक्त करेला की भाँति होते हैं किन्तु विशेष कर यह अग्निदीपक तथा लघु होती है। [६२-६३] ४३. करेला हिं०—करेला, करैला, करइला, करेली। बं०—करोला, बड़ा मसिया, उच्छे। म०—कारलें, कारली। गु०— कारेला, करेलुं। क०—हागल। ते०—काकर। ता०—पागल। फा०—कारेलाह। अ०—किस्सा उल्हिमार, कसायुल हिमार। अं०—Carilla Fruit (कॅरिल्ला फ्रूट); (विटर गोर्ड)। ले०—Momordica charantia Linn. (मोमोर्डिका चेरण्टिआ)। Fam. Cucurbitaceae (कुकुरबिटेसी)। प्रायः सब प्रान्तों में इसे रोपण करते हैं। इसकी लता—मृदुरोमश होती है। पत्ते—१ से ५ इञ्च के घेरे में गोलाकार, गहरे कटे किनारे वाले एवं ५-७ भागों में विभक्त रहते हैं। फूल—चमकीले पीले रंग के आते हैं। फल—१ से ५ इञ्च लम्बे, बीच में मोटे तथा दोनों तरफ नोकीले, त्रिकोणाकृति उभारों के कारण ऊबड़ खाबड़, हरे किन्तु पकने पर पीले रंग के हो जाते हैं। बीज—चिपटे होते हैं। इसके कृषिजन्य अनेक प्रकार, आकार तथा नाप के अनुसार पाये जाते हैं जिनमें से छोटे फल को करेली कहते हैं। इसके कड़वे स्वाद को कम करने के लिये सब्जी बनाने के पूर्व नमक के जल में इसे भिगोकर रखते हैं। रासायनिक संगठन—इसमें गंधयुक्त उड़नशील तैल, कॅरोटीन, ग्लूकोसाइड, सॅपोनिन् एवं मोमोरिडिसाइन (Momoridicine) नामक क्षाराभ पाया जाता है। बीजों में ३२% विरेचक तेल होता है। गुण और प्रयोग—इसके फल पित्तशामक, आनुलोमिक, कृमिघ्न एवं मूत्रजनन हैं। वृन्तयुक्त कोमल पत्ते कड़वे, मूत्रजनन, वामक एवं विरेचक हैं। कभी-कभी इससे वमन विरेचन अधिक होता है उस समय उसके निवारण के लिये घी भात खिलाना चाहिये। प्रयोग से देखा गया है कि खरगोश में इससे रक्तगत शर्करा की मात्रा कम हो जाती है। इस आधार पर इसके मधुमेह में लाभदायक सिद्ध होने की संभावना है। (१) यकृत् प्लीहावृद्धि के साथ जलोदर हो तथा विषम ज्वर हो तब इसके पत्तों का रस देते हैं। (२) पित्तप्रकोप, श्वसनिका शोथ आदि में वमन कराने के लिये पत्र रस दिया जाता है। (३) आमवात, वातरक्त, यकृत् प्लीहा वृद्धि एवं जीर्ण त्वचा के रोगों में बिना कड़वापन दूर किये फल की सब्जी लाभदायक होती है। (४) पुराने त्वचा के रोगों में पत्तों का लेप किया जाता है। (५) इसकी जड़ के क्वाथ से गर्भपात हो सकता है। मात्रा—स्वरस १ से २ ड्राम; बच्चों को ¼-१ ड्राम।

८३६ भावप्रकाशनिघण्टुः अथ महाकोशातकी (नेनुआ) । तस्या नामानि गुणाँश्चाह महाकोशातकी प्रोक्ता हस्तिघोषा महाफला ।। ६५ ।। धामार्गवो घोषकश्च हस्तिपर्णश्च स स्मृतः । महाकोशातकी स्निग्धा रक्तपित्तानिलापहा ।। ६६ ।। नेनुआ के संस्कृत नाम-महाकोशातकी, हस्तिघोषा, महाफला, धामार्गव, घोषक तथा हस्तिपर्ण ये सब हैं। नेनुआ-स्निग्ध एवम् रक्तपित्त तथा वायु को नष्ट करनेवाली होती है। [६४-६५] ४४. नेनुआ हिं०-नेनुआ, बड़ी तोरई, घिया तोरई । बं०-धुंधुल, धुन्दुल । म०-घोसाले गु०-गुलका । क०-अरहिरे तुप्पिरी । ता०-पिचुक्कु । ते०-नेति बीर, वीर काया । फा०-खियार । अं०-Sponge Gourd (स्पंज गोर्ड) । ले०-Luffa aegyptiaca Mill ex Hook f. (लूफा एजिप्टिएका) । Fam. Cucurbitaceae (कुकुर्बिटेसी) । नेनुआ-एक बहुत प्रसिद्ध तरकारी प्रायः सब प्रान्तों में उत्पन्न होती है। इसकी लता विस्तार में फैलने वाली होती है। पत्ते-४-६ इञ्च के घेरे में, गोलाकार, ५ या क्वचित् ७ भाग वाले होते हैं। फूल-पीले रंग के एवं हरी शिराओं से युक्त होते हैं। फल-५ से १२ इञ्च लम्बे एवं लम्बाई में धारीदार होते हैं। बीज-धूसर या काले, ३/८-१/४ इञ्च, चिपटे एवं अल्प पंखयुक्त होते हैं। इसके कृषित एवं वन्य भेद होते हैं। कृषित की सब्जी बनाई जाती है। इसके पके फल का जाला स्पंज की तरह काम में आता है। रासायनिक संगठन-इसके वन्य भेद में एक रक्तसंस्रावी सॅपोनिन तथा कड़वा विषैला पदार्थ रहता है। गुण और प्रयोग-वन्य भेद के पत्तों का रस तथा बीज विरेचक एवं वामक होते हैं। सभी प्रकार के व्रण पर इसके पत्र स्वरस से बनाया मलहम लाभदायक होता है। गाँठ आदि पर पत्तों के रस में गुड़, चूना या सिंदूर मिलाकर लेप करते हैं। अथ राजकोशातकी (तोरई) । तस्या नामानि गुणाँश्चाह धामार्गवः पीतपुष्पो जालिनी कृतवेधना । राजकोशातकी चेति तथोक्ता राजिमत्फला ।। ६६ ।। राजकोशातकी शीता मधुरा कफवातकृत् । पित्तघ्नी दीपनी श्वासज्वरकासकृमिप्रणुत् ।। ६७ ।। तोरई के संस्कृत नाम-धामार्गव, पीतपुष्प, जालिनी, कृतवेधा, राजकोशातकी तथा राजिमत्फला ये सब हैं। तोरई-मधुर रसयुक्त, शीतल, अग्निदीपक, कफ तथा वातकारक एवम्-पित्त, श्वास, ज्वर, खांसी तथा कृमि को दूर करने वाली होती है । [६७-६८] ४५. तोरई हिं०-तोरई, तरोई, तुरई । बं०-घोषा लता, झिंगा । म०-डोडका, शिराले । गु०-तुरिया, घिसोडां, तुरया । क०-हीरे । ते०-बीर । ता०-मीर्कु । ले०-Luffa acutangula Roxb. (लूफा एक्यूटँग्युला) । Fam. Cucurbitaceae (कुकुर्बिटेसी) । तोरई-सभी प्रान्तों में रोपण की जाती है तथा वन्य भी पाई जाती है। इसकी लता और पत्ते नेनुआ के समान होते हैं। फूल-पीले किन्तु पुंकेशर ३ रहते हैं जबकि नेनुआ में ५ रहते हैं। फल-६ से १२ इञ्च लम्बे, आधार की तरफ संकुचित एवं १० धारीदार होते हैं। इसमें कभी-कभी कड़वे फल होते हैं। वह वास्तव में जंगली प्रकार नहीं है। जंगली प्रकार का स्वतंत्र आगे वर्णन किया गया है।

शाकवर्गः ८३७

रासायनिक संगठन-फल में कड़वा द्रव्य एवं बीजों में तैल रहता है। कुत्तों में इस तैल से वमन, विरेचन एवं लालास्राव की वृद्धि होती है। गुण और प्रयोग-इसके बीज वामक तथा विरेचक हैं। इसका साग बनाते हैं। रोहा में इसके ताजे पत्तों का रस आंख में डालते हैं। पत्तों का लेप प्लीहा वृद्धि, अर्श एवं कुष्ठ में किया जाता है। ४६. जंगली तोरई हिं०-कड़वी तोरोई। ले०-लू. एक्यूटँग्युला प्रकार अमारा (L. acutangula (Linn.) Roxb. var. amara Clarke) । यह पश्चिम की तरफ अधिक होती है। इसके पत्ते तथा पुष्प तोरई के जैसे होते हैं। इसके पत्ते उसकी अपेक्षा छोटे, भूरे रंग के, नये कोमल अवस्था के उनकी तरह मुलायम किन्तु बाद में खुरदरे हो जाते हैं। फल-२ से ४ इञ्च लम्बा, १ से १ १/२ इञ्च मोटा, तोरई जैसा १० धारीदार किन्तु कड़वा होता है। इसके सभी अंग कड़वे होते हैं। रासायनिक संगठन-बीजों में तेल होता है। गुण और प्रयोग-यह उष्ण, वामक, विरेचक, मूत्रजनन, व्रणशोधन एवं विषघ्न है। अल्पमात्रा में इससे भूख बढ़ती है, शौच साफ होता है तथा उदर के सभी इन्द्रियों का कार्य ठीक होता हैं। अधिक मात्रा से वमन विरेचन होता है। (१) यकृत्, प्लीहा वृद्धि से उत्पन्न जलोदर में इसके पंचांग का टिंचर (१ : २०) लाभदायक है। (२) सड़ने लगे व्रण को धोने के लिये इसका हिम (दो फल + शीतजल १ पाइंट) उपयोग में लाते हैं। मात्रा-टिंचर १० से २० बूँद। अथ पटोलः (परबल) । तस्य नामानि गुणाँश्चाह पटोलः कुलकस्तिक्तः पाण्डुकः कर्कशच्छदः । राजीफलः पाण्डुफलो राजेयश्चामृतफलः ।।६८।। बीजगर्भः प्रतीकश्च कुष्ठहा कासभञ्जनः । पटोलं पाचनं हृद्यं वृष्यं लघ्वग्निदीपनम् ।।६९।। स्निग्धोष्णं हन्ति कासास्रज्वरदोषत्रयक्रिमीन् ।।७०।। परवर के संस्कृत नाम-पटोल, कुलक, तिक्त, पाण्डुक, कर्कशच्छद, राजीफल, पाण्डुफल, राजेय, अमृतफल, बीजगर्भ, प्रतीक, कुष्ठहा तथा कासभञ्जन ये सब हैं। परवर-पाचक, हृदय के लिये हितकर, वीर्यवर्धक, लघु, अग्निदीपक, स्निग्ध, उष्ण एवम्-खाँसी, रक्तविकार, ज्वर, त्रिदोष तथा क्रिमि को नष्ट करने वाला होता है। [६८-७०] अथ पटोलस्य मूल-नाल-पत्र-फलानां गुणानाह पटोलस्य भवेन्मूलं विरेचनकरं सुखात् ।।७१।। नालं श्लेष्महरं पत्रं पित्तहारी फलं पुनः । दोषत्रयहरं प्रोक्तं तद्वत्तिक्ता पटोलिका ।।७२।। परवर की जड़-सुखपूर्वक विरेचन करने वाली होती है। परवर की डंडी (नाल)-कफनाशक है। परवर के पत्ते-पित्तनाशक होते हैं। परवल का फल-त्रिदोषनाशक होता है। कड़वे परवर के भी गुण पूर्वोक्त परवर की भाँति ही होते हैं। संस्कृत में इसे "पटोलिका" कहते हैं। यह तिक्तरसयुक्त होती है। [७१-७२]

८३८ भावप्रकाशनिघण्टुः ४७. परवल हिं०-परवर, परवल, परोर, परोरा । बं०-पटोल, पलता । म०-परवल । क०-पडवल । ता०-पुड़लै । ते०-पोटल, आडर । गु०-पटोल । ले०-Trichosanthes dioica Roxb. (ट्राइकोसेनथिस डायोइका) । Fam. Cucurbitaceae (कुकुरबिटेसी) । यह उत्तर भारत के मैदानी प्रदेश में तथा आसाम एवं पूर्वबंगाल तक होता है । इसकी खेती भी की जाती है । इसकी लता होती है । काण्ड रोमश होते हैं । पत्ते-२ × ३ इञ्च बड़े, अंडाकार, आयताकार, हृदयाकार, तीक्ष्णाग्र, लहरदार दन्तुर एवं रूखे होते हैं । फूल-सफेद रंग के आते हैं । फल-२-३ इञ्च लम्बे, आयताकार या गोलाभ और पकने पर नारंग रक्त हो जाते हैं । इसका एक वन्य प्रकार होता है वह कड़वा होता है । कृषित के फल साग के लिये काम में लाये जाते हैं । चिकित्सा में वन्य के पंचांग का उपयोग करते हैं । उपर्युक्त वन्य प्रकार के अतिरिक्त एक जाति ट्रा. कुकुमेरिना (T. cucumerina) के फल भी कड़वे होते हैं । यह १ से ३ इञ्च लम्बे, दीर्घवृत्ताभ-तर्क्वाकार एवं दोनों तरफ चोंच की तरह नोकदार होते हैं । यह कच्ची अवस्था में हरे, सफेद धारियों से युक्त एवं पकने पर गहरे लाल हो जाते हैं । इनका भी तिक्त पटोल के स्थान पर उपयोग किया जाता है । रासायनिक संगठन-मूल में सॅपोनिन्, इन्द्रायण की तरह कड़वा पदार्थ, कुछ उड़नशील तेल तथा स्थिर तेल पाये जाते हैं । गुण और प्रयोग-कड़वा परवर उष्ण, पित्त को न बढ़ाने वाला, वृष्य, कफघ्न, ज्वरनाशक एवं रेचन है । यह कामला, उदर, रक्तविकार, कण्डू, कुष्ठ, जीर्णज्वर एवं दाह में लीभादायक है । पित्तप्रधान रोग में रेचन के लिये पटोल का उपयोग करते हैं । इसकी जड़ तीव्र रेचक होती है । हरे फल की गूदी भी रेचक होती है । पत्ते दीपन, पाचन, बल्य, तिक्त पौष्टिक एवं अधिक मात्रा में वामक एवं रेचक है । इसके पत्ते तथा धनियाँ का क्वाथ पित्तज्वर में देते हैं । त्वचा के रोगों में इसे गुडूची के साथ देते हैं तथा पत्तों का रस लगाते हैं । मात्रा-गूद्दी १ से २ रत्ती । अथ बिम्बी (कुन्दुरी, कन्दूरी) । तस्य नामानि तत्फलगुणांश्चाह बिम्बी रक्तफला तुण्डीतुण्डीकेरी च बिम्बिका । ओष्ठोपमफला प्रोक्ता पीलुपर्णी च कथ्यते ॥७३॥ बिम्बीफलं स्वादु शीतं गुरु पित्तास्रवातजित् । स्तंभनं लेखनं रुच्यं विबन्धाध्मानकारकम् ॥७४॥ कन्दूरी के संस्कृत नाम-बिम्बी, रक्तफला, तुण्डी, तुण्डीकेरी, बिम्बिका, ओष्ठोपमफला और पीलुपर्णी ये सब हैं । कन्दूरी का फल-स्वादिष्ट, शीतल, गुरु, स्तम्भन, लेखन, रुचिकारक तथा विबन्ध और आध्मान (अफरा) को करनेवाला एवम्-पित्त, रक्तविकार तथा वात को दूर करने वाला होता है । [७३-७४] ४८. कन्दूरी (कुन्दरू) हिं०-कन्दूरी, कुनली, कुनरी, कुन्दरी, कुन्दुरू । बं०-तेला कुचा । म०-तोंडली । गु०-घोलां, घोली, टिंडोराँ । क०-तोंडे । ता०-को वै । ते०-दोंडा तिगे । अं०-Ivy-gourd (आइवी-गोर्ड) । ले०-Coccinia indica W. & A. (कोक्सीनिया इण्डिका) । Fam. Cucurbitaceae (कुकुर्बिटेसी) ।

शाकवर्गः ८३९ यह सभी प्रान्तों में होती है। इसकी लता-आरोही, बहुवर्षायु, निःशाख तन्तुओं से युक्त एवं मूल लम्बे कन्दवत् होते हैं। काण्ड-पाँच कोण युक्त होता है। पत्ते-प्रायः १ १/२-३ १/२ इञ्च बड़े, लट्वाकार या वृत्ताकार, ३ से ५ खण्ड या कोणयुक्त, चिकने एवं दूर-दूर पर किञ्चित् दन्तुर होते हैं। पुष्प-श्वेत होते हैं। फल-मांसल, दीर्घवृत्ताभ या बेलनाकार, १-२ इञ्च लम्बे, १/२-१ इञ्च व्यास के, कच्ची अवस्था में १० श्वेत धारियों से युक्त, चिकने, चमकीले हरे तथा पकने पर गहरे लाल रंग के रहते हैं। इसके कई प्रकार होते हैं जिनमें जंगली कड़वी होती है। चिकित्सा में पंचांग का एवं शाकार्थ फल का उपयोग होता है। रासायनिक संगठन-इसके कोमल फलों में आर्द्रता ९३.१, प्रोटीन १.२, स्नेह ०.१, रेशा १.६, कार्बोहाइड्रेट ३.५, खनिज ०.५, खटिक .०४, फास्फोरस् ०.०३%, लोह १.४ मि० ग्रा० प्रति १०० ग्राम, विटामिन 'ए' २६० अ० एकक प्र० १०० ग्रा० एवं विटामिन 'सी' २८ मि० ग्रा० प्र० १०० ग्रा० रहता है। इसके रस में अमाइलेस् पाया जाता है। इनके अतिरिक्त एक किण्व, हारमोन एवं क्षाराभ भी पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग-यह स्नेहन, मूत्रसंग्रहणीय, कफनाशक एवं व्रणरोपक है। इसका उपयोग मधुमेह, सोजाक, प्रदर, कास तथा व्रण में किया जाता है। (१) मधुमेह में लता का स्वरस वसंत कुसुमाकर आदि रस योगों के अनुपान के लिये देते हैं। इसमें मूल का स्वरस १ तो० या चूर्ण १/४-१/२ तोला, वंगेश्वर या सोमनाथ रस के साथ दिया जाता है। साथ में शाकार्य फल भी देते हैं। कर्नल चोपरा के प्रयोगों में इसे मधुमेह के लिये निरुपयोगी बतलाया गया है। (२) व्रण एवं त्वचा के रोगों में पत्तों का स्वरस लगाते हैं। जीभ में छाले होने पर फल को चबाते हैं। अथ शिम्बीः-पुस्तशिम्बी च (सेम-सेमभेद) । तयोर्नामानि गुणाँश्चाह शिम्बिः शिम्बी पुस्तशिम्बी तथा पुस्तकशिम्बिका। शिम्बीद्वयं च मधुरं रसे पाके हिमं गुरु ।। बल्यं दाहकरं प्रोक्तं श्लेष्मलं वातपित्तजित् ।।७५।। सेम का संस्कृत नाम-शिम्बी तथा शिम्बी है। सेम भेद का संस्कृत नाम-पुस्तशिम्बि तथा पुस्तकशिम्बिका है। उक्त दोनों प्रकार की सेम-रस तथा विपाक में मधुर (मीठी), शीतल, गुरु, बलकारक तथा दाह और कफ को उत्पन्न करने वाली एवम् वात और पित्त को दूर करने वाली होती है। [७५] ४९. सेम सेम के अनेक प्रकार होते हैं। धान्यवर्ग में निष्पाव के अन्तर्गत एक सेम का उल्लेख किया गया है जिसके अनेक प्रकार पाये जाते हैं। उन्हीं भेदोपभेदों में से उपर्युक्त शिम्बी के भेद हो सकते हैं। अथ कोलशिम्बिः तस्या नामानि गुणाँश्चाह कोलशिम्बिः कृष्णफला तथा पर्यङ्कपट्टिका ।।७६।। कोलशिम्बिः समीरघ्नी गुर्व्युष्णाकफपित्तकृत्। शुक्राग्निसद्कृत् वृष्या रुचिकृद् बद्धविङ् गुरुः ।।७७।। कोलशिम्बि के संस्कृत नाम-कोलशिम्बि, कृष्णफला तथा पर्यङ्कपट्टिका ये सब हैं। कोलशिम्बि-वातनाशक, अधिक उष्ण, कफ तथा पित्त कारक, वीर्यवर्धक, रुचिकारक, मल को बाँधने वाली, गुरु एवम् शुक्र जठराग्नि को क्षीण करने वाली होती है। [७६-७७] CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

८४० भावप्रकाशनिघण्टुः ५०. कोलशिम्बि यह भी प्रथमोक्त सेम के भेदों में से हो सकती है या अन्य लता हिं०-बड़ासेम । बं०-माखन सेम; ले०- कॅनॅवेलिया ग्लेडिएटा (Canavalia gladiata (Jacq.) DC.) हो सकती है। इसके भी कई प्रकार सेम की लम्बाई तथा बीजों की संख्या के अनुसार होते हैं। इसकी लता-बड़ी होती है। फूल-श्वेत तथा गुलाबी होते हैं। फली- ८-१२ इञ्च लम्बी, १-१ १/२ इञ्च चौड़ी, तलवार के आकार की होती है। बीज-गुलाबी, धूसर या श्वेत होते हैं। इसकी कोमल फलियों का शाकार्थ उपयोग किया जाता है। केंवाच की एक अन्य जाति होती है जिसकी फली का भी सेम के नाम से व्यवहार किया जाता है। अथ शोभाञ्जनफलम् (सहेजन की फली) । तस्य गुणानाह शोभाञ्जनफलं स्वादु कषायं कफपित्तनुत् । शूलकुष्ठक्षयश्वासगुल्महृद् दीपनं परम् ।।७८।। सहेजन की फली-स्वादिष्ट, कषाय रस युक्त, अत्यन्त अग्निदीपक, एवम्-कफ, पित्त, शूल, कुष्ठ, क्षय, श्वास तथा गुल्म को दूर करने वाली होती है । [७८] ५१. सहेजन की फली सहिजन का परिचय गुडूच्यादि वर्ग (पृष्ठ ३४०) में दिया गया है ॥५१॥ अथ वृन्ताकम् (बैंगन, भण्टा) । तस्य नामानि गुणाँश्चाह वृन्ताकं स्त्री तु वार्त्ताकुर्भण्टाकी भाण्टिकाऽपि च । वृन्ताकं स्वादु तीक्ष्णोष्णं कटुपाकमपित्तलम् ।। ज्वरवातबलासघ्नं दीपनं शुक्रलं लघु ।।७५।। बैंगन के संस्कृत नाम-वृन्ताक, वार्त्ताकु (स्त्रीलिङ्गी), भण्टाकी तथा भाण्टिका ये सब हैं। बैंगन-स्वादिष्ट, विपाक में कटुरस युक्त, तीक्ष्ण, उष्ण तथा किञ्चित् पित्तजनक, ज्वर, वायु तथा कफ को नष्ट करने वाला, अग्निदीपक, शुक्रजनक और लघु होता है । [७९] अथ तद्बालवृद्धफलयोर्गुणानाह तद्बालं कफपित्तघ्नं वृद्धं पित्तकरं गुरु ।।८०।। बैंगन का छोटा फल-कफ तथा पित्तनाशक होता है। बड़ा फल-गुरु तथा पित्तकारक होता है । [८०] अथाङ्गारपरिपाचितवृन्ताकफलगुणानाह वृन्ताकं पित्तलं किञ्चिदङ्गारपरिपाचितम् । कफमेदोऽनिलामघ्नमत्यर्थं लघु दीपनम् ।।८१।। अङ्गारे पर भुना हुआ बैंगन-किञ्चित् पित्तजनक, अत्यन्त लघु, अग्निदीपक एवम्-कफ-मेद-वायु तथा आम को दूर करने वाला होता है । [८१] अथ तैललवणान्वितवृन्ताकफलस्य श्वेतवृन्ताकस्य च गुणानाह तदेव हि गुरु स्निग्धं सतैलं लवणान्वितम् । अपरं श्वेतवृन्ताकं कुक्कुटाण्डसमं भवेत् । तदर्शःसु विशेषेण हितं हीनं च पूर्वतः ।।८२।। अङ्गारे पर भुने हुए उसी बैंगन में यदि तेल तथा नमक डाल दिया जाय तो वह-गुरु तथा स्निग्ध होता है। भेद- एक दूसरे प्रकार का और बैंगन होता है जिसे संस्कृत में "श्वेतवृन्ताक" तथा हिन्दी में "सफेद बैंगन" कहते हैं। वह CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA

शाकवर्गः ८४१ आकार में मुर्गे के अण्डे के समान होता है। सफेद बैंगन-अर्श में विशेष करके हितकर होता है और पूर्वोक्त बैंगन की अपेक्षा यह हीन गुण वाला होता है। [८२] ५२. भंटा हिं०-भंटा, बैंगन, बैगुन। बं०-बेगुन। म०-वांगे, वांगी। गु०-रिङ्गणा, वेंगण, वंताक। क०-बदने। ते०-वंकाया। ता०-कत्तरिक्काइ। फा०-बांदगान। अ०-वार्द जान, वादंजान, बाजं जान। अं०-Brinjal (ब्रिझल); Egg-Plant (एग प्लॅण्ट)। ले०-Solanum melongena Linn. (सोलेनम् मेलोंगेना)। Fam. Solanaceae (सोलेनेसी)। यह गुडूच्यादि वर्गोक्त बृहती के अन्तर्गत वर्णित एक जाति का कृषित प्रकार है। यह प्रसिद्ध फल शाक प्रायः सब प्रान्तों में उत्पन्न होता है। इसका क्षुप-३ फुट तक ऊँचा होता है। पत्ते-वन भाँटे के समान परन्तु इनसे लम्बे चौड़े होते हैं। फूल-कंटकारी के समान बैंगनी रंग के और फल-गोल लम्बे होते हैं। किसी के फल गोल, हरे और बैंगनी रंग के, किसी के गोलाई लिये लम्बे सफेद होते हैं। गुण और प्रयोग-इसके वन्य प्रकार का बृहती की तरह उपयोग होता है। कृषित का शाकार्थ उपयोग करते हैं। अथ डिण्डिशः (टिंडा) तस्य नामगुणानाह डिण्डिशो रोमशफलो मुनिनिर्मित इत्यपि ।।८३।। डिण्डिशो रुचिकृद्भेदी पित्तश्लेष्मापहः स्मृतः । सुशीतो वातलो रूक्षो मूत्रलश्चाश्मरीहरः ।।८४।। टिंडा के संस्कृत नाम-डिण्डिश, रोमशफल तथा मुनिनिर्मित ये सब हैं। टिंडा-रुचिकारक, मलभेदक, अत्यन्त शीतल, वातजनक, रूक्ष, मूत्र लाने वाला एवम् पित्त, कफ तथा पथरी को दूर करने वाला होता है। [८३-८४] ५३. टिंडा हिं०-ढेंड़स, टिंडा। म०-ढेंडेसे, दिंडशी। ले०-Citrullus vulgaris var. fistulosus (सिट्रुलस् वल्गेरिस् प्रकार फिस्चुलोसस्)। Fam. Cucurbitaceae (कुकुर्बिटेसी)। उत्तर प्रदेश, पंजाब तथा बम्बई में इसकी उपज की जाती है। इसका क्षुप-आरोही या प्रसरणशील होता है तथा काण्ड दृढ़ होता हैं। इसके फल-छोटे, बड़े, २-३ इञ्च व्यास के गोल, हलके या गहरे हरे रंग के होते हैं। बीज-कुछ कृष्णाभ होते हैं। इनमें से हलके रंग के फल अधिक अच्छे होते हैं। रासायनिक संगठन-इसमें आर्द्रता ९२.३, प्रोटीन १.७, स्नेह ०.१, खनिज ०.६, कार्बोहाइड्रेट ५.३, खटिक ०.०२, फास्फोरस ०.०३%, लोह ०.९ मि० ग्राम प्र० १०० ग्रा०, विटामिन 'ए' २८ अ० एकक् प्रति १०० ग्रा० आदि पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग-इसका फल शाकार्थ व्यवहार में लाते हैं। बीजों को सुखाकर भूनकर उपयोग में लाते हैं। अथ पिण्डारम् (पिण्डार)। तस्य गुणानाह पिण्डारं शीतलं बल्यं पित्तघ्नं रुचिकारकम् । पाके लघु विशेषेण विषशान्तिकरं स्मृतम् ।।८५।। पिण्डालू-शीतल, बलकारक, पित्तनाशक, रुचिकारक, विपाक में लघु होता है। एवम्-यह विशेष करके विष का शमन करने वाला होता है। [८५]

८४२ भावप्रकाशनिघण्टुः ५४. पिंडार हिं०-पिंडार, पिंडारी, पिंडारू, पिंडालु। बं०-पिरालो। गु०-गंगेडा। म०-पेंढर, पेंढारी, पेंढ्र, पेंदूर। क०- पेरालु। ते०, ता०-नलैक। ले०-Randia uliginosa DC. (रॅण्डिया युलिजिनोसा)। Fam. Rubiaceae (रूबिएसी)। यह पूर्व, मध्य, पश्चिम तथा दक्षिण भारत में होता है। उत्तर में कम होता है। इसके वृक्ष-छोटे; टहनियाँ मोटी और कृष्णाभ; काँटे कम; पत्ते-अंडाकार, आयताकार या कभी-कभी अभिलट्वाकार, २-८ x १-४ इञ्च बड़े, टहनियों पर गुच्छाकार क्रम में निकले हुये; पुष्प-१-२ इञ्च व्यास के बड़े, श्वेत, सुगंधित फल-मांसल, दीर्घवृत्ताभ, २-२.५ इञ्च व्यास के, पकने पर पीले, चिकने तथा अमरूद की तरह दिखलाई देते हैं। कच्चे फल का शाकार्थ उपयोग करते हैं। नोट-पिंडार नाम एक अन्य वृक्ष ट्रेविआ न्यूडिफ्लोरा (Trewia nudiflora Linn.) को भी लिखा मिलता है जिसका गंभारी के स्थान पर कहीं-कहीं प्रयोग किया जाता है। उसका वर्णन पृष्ठ २७८ पर किया जा चुका है। यहाँ शाकवर्ग में जिसका वर्णन आया है वह उपर्युक्त रँ. युलिजिनोसा है। इसके गुणों में विषघ्न गुण भी लिखा हुआ है। इस वृक्ष का स्थानिक नाम 'गद पिडार' भी मिलता है जो इसके अगद के रूप में व्यवहार का द्योतक है। शाकार्थ इसके फल का उपयोग भी करते हैं। डॉ. देसाई ने इसे 'गांगेरुक' लिखा है। गुण और प्रयोग-इसका पका फल मधुर, शीतल एवं मूत्रजनन है। कच्चा फल स्तंभन है। कच्चे फल को आग में भूनकर ऊपर का भाग अतिसार एवं आँव में देते हैं। अन्दर का बीज का भाग नहीं देते। अथ कर्कोटी (ककोडा, खेखसा) । तस्या नामानि गुणाँश्चाह कर्कोटकी पीतपुष्पा महाजालीति चोच्यते। कर्कोटी मलहत्कुष्ठहृल्लासारुचिनाशिनी। श्वासकासज्वरान्हन्ति कटुपाका च दीपनी ॥८६॥ ककोड़ा के संस्कृत नाम-कर्कोटकी, पीतपुष्पा और महाजाली ये सब हैं। ककोडा-विपाक में कटुरस युक्त, अग्निदीपक, मलनाशक एवम्-कुष्ठ, हल्लास (जी मचलाना), अरुचि, श्वास, खाँसी तथा ज्वर का नाशक है। [८६] ५५. ककोड़ा (खेखसा) हिं०-खेखसा, खेखसा, ककोड़ा, ककोरा। बं०-वनकरेला। म०-कटोली, कांटोलें। गु०-कंटोला, कोडा। ते०-आगाकर। क०-माडहा। ता०-एगारवल्लि। ले०-Momor-dica dioica, Roxb. (मोमोर्डिका डायोइका)। Fam. Cucurbitaceae (कुकुर्बिटेसी)। सभी प्रान्तों में यह होता है। इसकी लता-आरोहणशील, चिकनी एवं प्रायः दुर्गन्धयुक्त होती है। काण्ड-कोनदार होते हैं। तन्तु बिना शाखा के होते हैं। पत्ते-हृदयाकार, लट्वाकार, अखण्ड या ३ खण्ड वाले, प्रायः लहरदार दन्तुर किनारेवाले एवं २-४१/२ इञ्च व्यास के होते हैं। पुष्प-पीले होते हैं। इसमें नर एवं नारी पुष्पों की लताएँ अलग-अलग होती हैं। नर पुष्प की लता में फल न लगने के कारण उसे बाँझ खेखसा या वन्ध्याकर्कोटकी कहा जाता है। फल देने वाली, नारीपुष्प की लता होती है जिसे कर्कोटकी कहते हैं। नरपुष्प पतले एवं २ से ६ इञ्च लम्बे दण्ड से युक्त तथा नारीपुष्प के दण्ड छोटे या उतने ही बड़े होते हैं। फल-१ से ३ इञ्च लम्बा, दीर्घ वृत्ताभ एवं तीक्ष्णाग्र या अंडाकार होता है तथा इस पर मुलायम काँटे सदृश उभार होते हैं। इसमें नीचे कन्दवत् बहुवर्षायु मूल होता है जो शलगम की तरह किन्तु लम्बा, पीताभ श्वेत, गोल कंकणाकृति चिह्नों से युक्त एवं स्वाद में कसैला होता है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA

शाकवर्गः ८४३ इसकी स्त्री जाति की लता के कंद का उपयोग चिकित्सा में करते हैं। गुण और प्रयोग—इसका कंद कुछ रक्तसंग्राहक होता है। इसे रक्तार्श में देते हैं। मधुमेह में कंदचूर्ण वंगभस्म के साथ देते हैं। इसकी अधिक मात्रा से वमन होता है। इसको पीसकर इसका लेप ज्वर एवं प्रलाप में शरीर पर किया जाता है। इसके फल का चूर्ण या फांट का नस्य के लिये उपयोग करते हैं। मात्रा—१ से ५ ड्राम शर्करा के साथ। अथ डोडिका। तस्या नामानि गुणाँश्चाह डोडिका विषमुष्टिश्च डोडित्यपि सुमुष्टिका ॥८७॥ डोडिका पुष्टिदा वृष्या रुच्या वह्निप्रदा लघुः। हन्ति पित्तकफार्शांसि कृमिगुल्मविषामयान् ॥८८॥ डोडिका के संस्कृत नाम—डोडिका, विषमुष्टि, डोडी और सुमुष्टिका ये सब हैं। डोडिका—पुष्टिदायक, वीर्यवर्धक, रुचिकारक, जठराग्नि को दीप्त करने वाला, लघु एवम्—पित्त, कफ, अर्श, कृमि, गुल्म तथा विषरोग को दूर करने वाला है। [८७-८८] ५६. डोडिका नोट—इसके सम्बन्ध में मतभेद है। कोई इसे करेरुआ मानते हैं। कोई जीवन्ती शाक मानते हैं। अधिक संभावना जीवन्ती शाक की है जिसका वर्णन पहले गुडूच्यादि वर्ग (पृष्ठ ४७२) में किया जा चुका है। अथ कण्टकारीफलं (कटेरी का फल)। तस्य गुणानाह कण्टकारीफलं तिक्तं कटुकं दीपनं लघु। रूक्षोष्णं श्वासकासघ्नं ज्वरानिलकफापहम् ॥८९॥ कटेरी का फल—तिक्त तथा कटुरसयुक्त, अग्निदीपक, लघु, रूक्ष, उष्ण एवम्—श्वास, खाँसी, ज्वर, वायु तथा कफ को दूर करने वाला होता है। [८९] ५७. कंटकारी फल कंटकारी का पूर्ण परिचय गुडूच्यादि वर्ग (पृष्ठ ४६६) में दिया गया है। इति फलशाकानि। अथ नालशाकानि। तत्र सार्षपनालगुणानाह तीक्ष्णोष्णं सार्षपं नालं वातश्लेष्मव्रणापहम्। कण्डूकृमिहरं दद्रुकुष्ठघ्नं रुचिकारकम् ॥९०॥ सरसों का नाल—तीक्ष्ण, उष्ण, रुचिकारक एवम्—वात, कफ, व्रण, खुजली, कृमि, दाद तथा कुष्ठ को दूर करने वाला होता है। ५८. सरसों का नाल सरसों का विवरण शिम्बीधान्य वर्ग (पृष्ठ ८०७) में किया गया है।