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भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

८७२ भावप्रकाशनिघण्टुः अथ कूपजादिमत्स्याः । तेषां मांसगुणानाह कौपमत्स्याः शुक्रमूत्रकृच्छ्रश्लेष्मविवर्द्धनाः । सरोजा मधुराः स्निग्धा बल्या वातविनाशनाः ।। नादेया बृंहणा मत्स्या गुरोऽनिलनाशनाः । रक्तपित्तकरा वृष्याः स्निग्धाष्णाः स्वल्पवर्चसः ।। चौब्याः पित्तकराः स्निग्धा मधुरा लघवो हिमाः । तडागा गुरवो वृष्याः शीतला मलमूत्रदाः ।। ताडागवन्निर्झरजा बलायुर्मतिदृक्कराः ।।१२८।। कुएँ में रहने वाली मछलियों का मांस-शुक्र, मूत्र, कुष्ठ तथा कफ को बढ़ानेवाला होता है । सरोवर में रहने वाली मछलियों का मांस-मधुर रसयुक्त, स्निग्ध, बलकारक तथा वायु को नष्ट करने वाला होता है । नदियों में रहने वाली मछलियों का मांस-बृंहण (रस-रक्तादिवर्धक), गुरु, वातनाशक, रक्तपित्तकारक, वीर्यवर्धक, स्निग्ध, उष्ण एवं स्वल्प मात्रा में मल को निकालने वाला होता है । चोंढा या हौज में रहने वाली मछलियों का मांस-पित्तकारक, स्निग्ध, मधुर रसयुक्त, लघु तथा शीतल होता है । तालाब की मछलियों का मांस-गुरु, वीर्यवर्धक, शीतल, मल तथा मूत्र को निकालने वाला होता है । झरनों में रहनेवाली मछलियों का मांस-गुणों में तालाबों में रहनेवाली मछलियों के समान ही होता है किन्तु विशेष करके बल, आयु, बुद्धि तथा दृष्टि शक्ति को बढ़ानेवाला होता है ।।१२४] अथर्तुविशेषे मत्स्यविशेषाणां मांसगुणानाह हेमन्ते कूपजा मत्स्याः शिशिरे सारसा हिताः । वसन्ते ते तु नादेया ग्रीष्मे चौब्यसमुद्भवाः ।। तडागजाता वर्षासु तास्वपथ्या नदीभवाः । नैर्झरा शरदि श्रेष्ठा विशेषोऽयमुदाहृतः ।।१२९।। विशेष-विशेष ऋतुओं में विशेष-विशेष मछलियों के मांस का गुण-हेमन्त ऋतु (अगहन-पूसमास) में- कूप में रहने वाली मछलियों का मांस; शिशिर ऋतु (माघ-फागुनमास) में-सरोवर में रहनेवाली मछलियों का मांस; वसन्त ऋतु (चैत-वैशाख मास) में-नदी में रहने वाली मछलियों का मांस और ग्रीष्म ऋतु (जेठ-आषाढ़ मास) में- चोंड़ा या हौज की मछलियों का मांस हितकर होता है । वर्षा ऋतु (सावन-भादो मास) में-तालाब की मछलियों का मांस हितकर और नदी की मछलियों का मांस अपथ्य (अहितकर) होता है । शरद ऋतु (क्वार-कार्तिक मास) में-झरनों की मछलियों का मांस-उत्तम होता है । इस प्रकार से मछलियों के मांस के सम्बन्ध में जो विशेषतायें थीं उनका वर्णन कर दिया गया है । [१२६] इति श्रीमिश्रलटकनतनय श्रीमिश्रभावविरचिते भावप्रकाशे वर्गप्रकरणे मांसवर्गः समाप्तः ।

अथ कृतान्नवर्गः

तत्रान्नानां साधनप्रकारान् सिद्धानां गुणांश्चाह । तत्र परिभाषामाह समवायिनि हेतौ ये मुनिभिर्गणिता गुणाः । कार्योऽपि तेऽखिलाज्ञेयाः परिभाषेति भाषिताः ॥१॥ क्वचित्संस्कारभेदेन गुणभेदो भवेद्यतः । भक्तं लघु पुराणस्य शालेस्तच्चिपिटो गुरुः ॥२॥ क्वचिद्योगप्रभावेण गुणान्तरमपेक्षते । कदन्नं गुरु सर्पिश्च तद्युक्तं सुपचं भवेत् ॥३॥ अब इस कृतान्न वर्ग में अन्नों को सिद्ध करने का प्रकार तथा सिद्ध हुये अन्नों का गुण कहते हैं। उसमें प्रथम परिभाषायें कहते हैं— परिभाषा—समवायिकरण (अन्नादि द्रव्यों) में जो गुण मुनियों ने गिनाये हैं वे सभी गुण, कार्य अन्नादि द्रव्यों से बने हुये पदार्थ भात आदि में भी होते हैं ऐसा समझना चाहिये। यह परिभाषा सामान्य रूप से मुनियों ने कही है। किन्तु कहीं-कहीं संस्कार भेद से गुण में भी भेद हो जाता है अर्थात् समवायिकारण का गुण कार्य में पूर्ण रूप से नहीं आता है। जैसे कि—पुराने शालि (जड़हन) चावल का भात हलका होता है किन्तु उसी (जड़हन) का चिउड़ा गुरु होता है। यहाँ पर संस्कार भेद से गुण में भेद हुआ है। और कहीं-कहीं संयोग के प्रभाव से भी गुणों में अन्तर पड़ जाता है। जैसे- पृथक्-पृथक् स्वयं कदन्न (खराब अन्न) तथा घी दोनों ही गुरु होते हैं किन्तु यदि इन दोनों का संयोग हो जाय तो जल्दी हजम होने वाले हो जाते हैं। यहाँ पर परस्पर संयोग के प्रभाव से गुण में अन्तर हुआ है। [१-३]

अथ भक्तम् (भात)। तस्य नामानि साधनं गुणांश्चाह

भक्तमन्नं तथाऽन्धश्च क्वचित्कूरं च कीर्तितम् । ओदनोऽस्त्री स्त्रियां भित्सा दीदिविः पुंसि भाषितः ॥४॥ सूधौतांस्तण्डुलान् स्फीतांस्तोये पञ्चगुणे पचेत् । तद्भक्तं प्रस्रुतं चोष्णं विशदं गुणवन्मतम् ॥५॥ भक्तं वह्निकरं पथ्यं तर्पणं रोचनं लघु । अधौतमस्रुतं शीतं गुर्वरुच्यं कफप्रदम् ॥६॥ भात के संस्कृत नाम—भक्त, अन्न, अन्ध (अन्धस्), कूर (कहीं-कहीं यह भात का नाम कहा है), ओदन (यह स्त्रीलिङ्ग को छोड़ कर शेष लिंगों में होता है), भित्सा (यह केवल स्त्रीलिङ्ग में होता है) और दीदिवि (यह केवल पुंलिङ्ग में होता है) ये सब हैं। निर्माणविधि—प्रथम चावलों को उत्तम रीति से धो डाले, पश्चात् कुछ क्षण के बाद जब वह कुछ फूल जाय तब उसे पाँच गुने जल में पकावे। सिद्ध होने पर उतार कर उसमें से माँड़ निकाल लेवे, यह माड़ निकाला हुआ गरम भात विशद गुणयुक्त अत्यन्त गुणकारी होता है। भात—अग्निकारक, पथ्य, संतर्पण करने वाला, रोचक तथा लघु होता है। यदि यही भात बिना धोये तथा मांड निकाले ही सिद्ध किया हुआ हो एवं शीतल हो तो गुरु, अरुचि उत्पन्न करने वाला तथा कफकारक होता है। [४-६]

अथ दाली (दाल)। तस्या नामानि साधनगुणांश्चाह

दलितन्तु शमीधान्यं दालिर्दाली स्त्रियामुभे । दाली तु सलिले सिद्धा लवणार्द्रकहिङ्गुभिः ॥७॥ संयुक्ता सूपनाम्नी स्यात्कथ्यन्ते तद्गुणा अथ । सूपो विष्टम्भको रूक्षः शीतस्तु स विशेषतः । निस्तुषो भृष्टसंसिद्धो लाघवं सुतरां व्रजेत् ॥८॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

'शु' then 'क्ल' + आ = 'शुक्ला'! Wait, let's look at the letter: Top: शु Next: क + ल = क्ल + ा = शुक्ला. Yes, it clearly has the 'ल' hook at the bottom of 'क'! So it's printed "शुक्ला".

Line 11: खिचड़ी बनाने की विधि—चावलों में बराबर की दाल मिलाकर यदि जल में पकाई जाय और उसमें Yes.

Line 12: आवश्यकतानुसार सेंधा नमक, अदरख तथा हींग डाल दिया जाय तो सिद्ध होने पर उसे पण्डित लोग संस्कृत में ‘कृशरा’ Yes, quotes: ‘कृशरा’.

Line 13: कहते हैं। Yes.

Line 14: खिचड़ी—शुक्रजनक, बलकारक, गुरु, पित्त तथा कफकारक, देर में हजम होने वाली एवम् बुद्धि बढ़ाने वाली, Yes.

Line 15: विष्टम्भ करने वाली तथा मल एवं मूत्र को कराने वाली होती है। [९-१०] Yes.

Line 16: अथ तापहरी। तस्याः साधनं गुणाँश्चाह Yes.

Line 17: घृते हरिद्रासंयुक्ते माषजा भर्जयेद्वटीम् ॥११॥ Wait, let's check: "माषजा" or "माषजां"? Look at "माषजा": is there an anusvara? No anusvara

orभृशम् ।? It has a virama on म्: भृशम् ।. Then पाकेऽपि मधुरो ग्राही लघुर्दोषत्रयापहः ।।२५।।`

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कृतान्नवर्गः ८७५ अथ नारिकेरक्षीरी (नारियल की खीर) । तस्याः साधनं गुणाँश्चाह नारिकेरं तनूकृत्य छिन्नं पयसि गोः क्षिपेत् । सितागव्याज्यसंयुक्ते तत्पचेन्मृदुनाऽग्निना ।।१७।। नारिकेरोद्भवा क्षीरी स्निग्धा शीताऽतिपुष्टिदा । गुर्वी सुमधुरा वृष्या रक्तपित्तानिलापहा ।।१८।। नारिकेरक्षीरी (नारियल की खीर) बनाने की विधि-नारियल को छीलकर उसकी गरी के छोटे-छोटे टुकड़ों को साफ चीनी (शक्कर) तथा गाय के घी के साथ उचित मात्रा में दूध में डाल कर मन्द अग्नि से धीरे-धीरे पकावे । जब सिद्ध हो जाय तब उतार ले । इसी को नारियल की खीर कहते हैं । नारियल की खीर-स्निग्ध, शीतल, अत्यन्त पुष्टिकारक, गुरु, मधुर, वीर्यवर्

८७६ भावप्रकाशनिघण्टुः मण्डा—बृंहण (रस रक्तादि वर्धक), वीर्यवर्धक, बलकारक, अत्यन्त रोचक, विपाक, में मधुर रस युक्त, ग्राही, लघु एवम् त्रिदोषनाशक होता है। [२४-२५] अथ पोलिका (मैदे की रोटी) । तस्याः साधनं गुणाँश्चाह कुर्यात्समितयाऽतीव तन्वी पर्पटिका ततः ।।२६।। स्वेदयेत्तप्तके तां तु पोलिकां जगदुर्बुधाः । तां खादेल्लप्सिकायुक्तां तस्या मण्डकवद् गुणाः ।।२७।। पोलिका (रोटी) के बनाने की विधि—मैदा को गूँथ कर उसकी अत्यन्त पतली पापड़ के समान रोटी बना ले, पश्चात् उसे तवे पर रख कर सेंक डाले, सिद्ध हो जाने पर इसे पण्डित लोग पोलिका कहते हैं। अनुपान—इसे लप्सी के साथ खाना चाहिये। पोलिका—इसके गुण पूर्वोक्त मण्डा के समान होते हैं। [२६-२७] अथ लप्सिका (लप्सी) । तस्याः साधनं गुणाँश्चाह समितां सर्पिषा भृष्टां शर्करां पयसि क्षिपेत् । तस्मिन्धनीकृते न्यस्येल्लवङ्गं मरिचादिकम् । सिद्धैषा लप्सिका ख्याता गुणानस्या वदाम्यहम् ।।२८।। लप्सिका बृंहणी वृष्या बल्या पित्तानिलापहा । स्निग्धा श्लेष्मकरी गुर्वी रोचनी तर्पणी परम् ।।२९।। लप्सी बनाने की विधि—प्रथम मैदा को लेकर घी में भून डाले पश्चात् मात्रानुसार शक्कर के साथ पानी में डालकर पकायें, जब गाढ़ा हो जाय तब उसमें लौंग, मरिच आदि डाल कर अत्यन्त तृप्तिकारक एवम् पित्त तथा वायुनाशक होती है। [२८-२९] अथ रोटिका (रोटी) । तस्याः साधनं गुणाँश्चाह शुष्कगोधूमचूर्णेन किञ्चित्पुष्टाञ्च पोलिकाम् ।।३०।। तप्तके स्वेदयेत्कृत्वा भूर्यङ्गारेऽपि तां पचेत् । सिद्धैषारोटिका प्रोक्ता गुणानस्याः प्रचक्ष्महे ।।३१।। रोटिका बलकृद्रुच्या बृंहणी धातुवर्द्धनी । वातघ्नी कफकृद् गुर्वी दीप्ताग्नीनां प्रपूजिता ।।३२।। रोटी बनाने की विधि—सूखे गेहूँ के आटे को जल से खूब गूँथकर उस सूखे आटा का पलोयन लगा-लगा कर पूर्वोक्त पूरी से कुछ मोटी रोटी बेलकर बनाले पश्चात् उसे तवा पर रख कर मामूली तरह से सेंक कर पुनः बहुत से अँगारों पर रखकर पका ले, जब वह सिद्ध हो जाय तब उसे रोटी कहते हैं। रोटी—बलकारक, रुचिजनक, बृंहण, धातुवर्धक, वातनाशक, कफकारक तथा गुरु होती है। यह प्रदीप्त अग्निवालों के लिये उत्तम होती है। [३०-३२] ❖ तप्तकं = "तावा" इति लोके ।।३०-३२।। यहाँ पर मूल में "तप्तक" से "तावा" का बोध करना चाहिये। [३०-३२] अथाङ्गारकर्कटी (बाटी) । तस्याः साधनं गुणांश्चाह शुष्कगोधूमचूर्णन्तु साम्बु गाढं विमर्दयेत् । विधाय वटकाकारं निर्धूमेऽग्नौ शनैः पचेत् ।।३३।। अङ्गारकर्कटी ह्येषा बृंहणी शुक्रला लघुः । दीपनी कफकृद्वल्या पीनसश्वासकासजित् ।।३४।। बाटी बनाने की विधि—सूखे गेहूँ के आटे में जल डाल कर खूब कड़ा माँड़ कर उसकी गोलाकार कुछ चिपटी लोई बना ले पश्चात् उसे निर्धूम आग पर धीरे-धीरे खूब सेंक लें, यही तैयार हो जाने पर बाटी कहलाती है। बाटी— बृंहण (रस—रक्तादिवर्धक), शुक्रजनन, लघु, अग्निदीपक, कफकारक, बलदायक एवम्-पीनस, श्वास तथा खाँसी को दूर करने वाली होती है। [३३-३४] CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

कृतान्नवर्गः ८७७ अथ यवरोटिका । तस्या गुणानाह यवजा रोटिका रुच्या मधुरा विशदा लघुः । मलशुकानिलकरी बल्या हन्ति कफामयान् ।। ३५ ।। जौ की रोटी—रुचिकारक, मधुररसयुक्त, विशद गुण वाली, लघु, मल, शुक्र, वायु तथा बल को करने वाली एवम् कफ सम्बन्धी रोगों को दूर करने वाली होती है । [३५] अथ बलभद्रिका (चमसीरोटिका) (छिल्केदार उरद की रोटी) । तस्याः साधनं गुणाँश्चाह चूर्णं यच्छुष्कमाषाणां चमसी साऽभिधीयते । चमसीरचिता रोटी कथ्यते बलभद्रिका । रूक्षोष्णा वातला बल्या दीप्ताग्नीनां सुपूजिता ।। ३६ ।। चमसी बनाने की विधि—सूखे उरद को पीस कर जो पूर्ण (आटा) तैयार होता है उसे चमसी कहते हैं । चमसी की बनी हुई रोटी का संस्कृत नाम—बलभद्रिका है । चमसी की रोटी—रूक्ष, उष्ण, वायु को उत्पन्न करने वाली, बलकारक, एवम् प्रदीप्त अग्नि वालों के लिये अत्यन्त उत्तम होती है । [३६] अथ धूमसी (धुआँस) । तस्याः साधनविधिमाह माषाणां दालयस्तोये स्थापितास्त्यक्तकञ्चुकः । आतपे शोषिता यन्त्रे पिष्टास्ता धूमसी स्मृता ।। ३७ ।। धुआँस बनाने की विधि—उरद की दाल को प्रथम जल में भिंगो दे, पश्चात् उसके छिलके को निकाल कर उसे धूप में डाल दे, जब सूख जाय तब चक्की में पीस कर आँटा तैयार कर ले, इसी को धुआँस कहते हैं । [३७] अथ झर्झरी । तस्याः साधनं गुणाँश्चाह धूमसीरचिता चैव प्रोक्ता झर्झरिका बुधैः । झर्झरी कफपित्तघ्नी किञ्चिद्वातकरी स्मृता ।। ३८ ।। झर्झरी (धुआँस की रोटी) बनाने की विधि—धुआँस को गूँथ कर जो रोटी बनायी जाती है उसे संस्कृत में “झर्झरी” कहते हैं । झर्झरी—कफ तथा पित्त नाशक एवम् किंचित् वातकारक होती है । [३८] अथ चणकरोटिका (चने की रोटी) । तस्या गुणानाह चणक्या रोटिका रूक्षा श्लेष्मपित्तास्रनुद्गुरुः । विष्टम्भिनी न चक्षुष्या तद्गुणा चापि शष्कुली ।। ३९ ।। चने की रोटी—चने के आटे की जो रोटी बनाई जाती है, वह—रूक्ष, गुरु, विष्टम्भ करने वाली, नेत्रों के लिये हित न करने वाली, एवम्—कफ पित्त तथा रक्तविकार को दूर करने वाली होती है । चने की पूड़ी—यह भी गुणों में चने की रोटी के समान ही होती है । [३९] अथ पिष्टिका (पीठी) । तस्या निर्माणप्रकारमाह दालिः संस्थापिता तोये ततोऽपहतकञ्चुका । शिलायं साधु सम्पिष्टा पिष्टिका कथिता बुधैः ।।४०।। पीठी बनाने की विधि—हर एक प्रकार के दाल को जल में भिगोने के बाद उसके छिलके को अलग कर के सिल पर अच्छी तरह से पीस देने से पीठी तैयार होती है । इसी को संस्कृत में पण्डित लोग “पिष्टिका” कहते हैं । [४०] अथ बेढमिका (बेढई) । तस्याः साधनं गुणाँश्चाह माषपिष्टिकया पूर्णगर्भा गोधूमचूर्णतः । रचिता रोटिका सैव प्रोक्ता बेढमिका बुधैः ।।४१।। भवेद्वेढमिका बल्या वृष्या रुच्याऽनिलापहा । उष्णा सन्तर्पणी गुर्वी बृंहणी शुक्रला परम् ।।४२।।

८७८ भावप्रकाशनिघण्टुः भिन्नमूत्रमला स्तन्यमेदःपित्तकफप्रदा। गुदकीलार्दितश्वासपक्तिशूलानि नाशयेत् ॥४३॥ बेढ़ई बनाने की विधि-गेहूँ के आटे को गूँथकर उसके लोई के अन्दर उरद की पीठी भर कर जो रोटी बनाई जाती है उसी को पण्डित लोग संस्कृत में 'बेढमिका' कहते हैं। बेढ़ई-बलदायक, वीर्यवर्धक, रुचिकारक, वातनाशक, उष्ण, सन्तर्पण कारक, गुरु, बृंहण (रस-रक्तादिवर्धक), अत्यन्त शुक्रजनक, मूत्र तथा मल का भेदन करने वाली, दुग्धवर्धक, मेद, पित्त तथा कफ कारक एवम् गुदकील, अर्दित वात (मुंह का लकवा), श्वास तथा परिणामशूल को नष्ट करने वाली है। [४१-४३] अथ पर्पटः (पापड)। तत्र माषोद्भवस्य तस्य साधनं गुणाँश्चाह धूमसीरचिता हिङ्गुहरिद्रालवणैर्युताः। जीरकस्वर्जिकाभ्याञ्च तनूकृत्य च वेल्लिताः ॥४४॥ पर्पटास्ते सदाऽङ्गारभृष्टाः परमरोचकाः। दीपनाः पाचनाः रूक्षा गुरवः किञ्चिदीरिताः ॥४५॥ पापड़ बनाने की विधि-धुआँस को जल के साथ भली-भाँति गूथकर उसमें मात्राऽनुसार हींग, हरदी, सेंधा नमक, जीरा और सज्जीखार डाल कर लोई बनावे और उसे बेलन से पतला बेल कर रोटी के समान बना ले, इसी को पर्पट (पापड़) कहते हैं। उक्त पापड़-सदा आग पर भूँज कर खाने से अत्यन्त रोचक, अग्निदीपक, पाचक, रूक्ष तथा किंचित् गुरु होते हैं। [४४-४५] अथ मुद्ग-चणकोद्भव-स्नेहभृष्टानां पर्पटानां गुणानाह मौद्गाश्च तद्गुणाः प्रोक्ता विशेषाल्लघवो हिताः ॥४६॥ चणकस्य गुणैर्युक्ताः पर्पटाश्चणकोद्भवाः। स्नेहभृष्टास्तु ते सर्वे भवेयुर्मध्यमा गुणैः ॥४७॥ मूँग के पापड़-यद्यपि गुणों से उड़द के पापड़ के समान होते हैं तथापि विशेष कर यह लघु तथा हितकर होते हैं। चने के बने हुए पापड़-गुणों में चने के समान ही होते हैं। स्नेह (तैल आदि) में भुने हुए सभी पापड़-पूर्वोक्त अपने-अपने गुणों की अपेक्षा मध्यम गुण वाले होते हैं। अर्थात् जो उरद-मूँग आदि के पापड़ों के गुण कहे हुये हैं उनकी अपेक्षा इसमें न्यून गुण होते हैं। [४६-४७] अथ पूरिका तैलपक्का घृतपक्वा च (तेल व घी में पकी हुई कचौरी)। तयोः साधनं गुणाँश्चाह माषाणां पिष्टिकां पूर्व्वाल्लवणार्द्रकहिङ्गुभिः। तया पिष्टिकया पूर्णा समिता कृतपोलिका ॥४८॥ ततस्तैलेन पक्वा सा पूरिका कथिता बुधैः। रुच्या स्वादी गुरुः स्निग्धा बल्या पित्तास्रदूषिका ॥४९॥ चक्षुस्तेजोहरी चोष्णा पाके वातविनाशिनी। तथैव घृतपक्वाऽपि चक्षुष्या रक्तपित्तहृत् ॥५०॥ तेल की पूरी बनाने की विधि-उरद की पीठी में मात्रानुसार सेंधा नमक, अदरक तथा हींग डालकर उसे मैदा की लोई के अन्दर रख कर उस को बेलकर बारीक रोटी बना ले, उसके बाद उसे तेल में पका डाले, सिद्ध होने पर उसी को पण्डित लोग संस्कृत में पूरिका कहते हैं। तेल की कचौरी-रुचिकारक, स्वादिष्ट, गुरु, स्निग्ध, बलकारक, पित्त तथा रक्त को दूषित करने वाली, नेत्रों के तेज को हरण करने वाली, पाक में उष्ण एवम् वातनाशक होती है। घी की कचौरी-यह भी गुणों में उक्त कचौरी के समान ही होती है किन्तु विशेषकर नेत्रों के लिये हितकर तथा रक्तपित्तनाशक होती है। [४८-५०]

कृतान्नवर्गः ८७९ अथ वटकः शुष्कः सरसश्च (सूखा व रसदार बरा) । तयोः साधनं गुणांश्चाह माषाणां पिष्टिकां युक्तां लवणाईकहिङ्गुभिः । कृत्वा विदध्याद्वटकांस्तांस्तैलेषु पचेच्छनैः ।।५१।। विशुष्का वटका बल्या बृंहणा वीर्य्यवर्द्धनाः । वातामयहरा रुच्या विशेषादर्दिलापहाः ।।५२।। विबन्धभेदिनः श्लेष्मकारिणोऽत्यग्निपूजिताः । संचूर्य्यनिक्षिपेत्तक्रे भृष्टं जीरकहिङ्गु च ।।५३।। लवणं तत्र वटकान्सकलानपि मज्जयेत् । शुक्लस्तत्र वटको बलकृद्रोचनो गुरुः ।।५४।। विबन्धहृद्विदाही च श्लेष्मलः पवनापहः । राज्यक्तयाऽतिरोचन्या पाचनया तांस्तु भक्षयेत् ।।५५।। उरद का सूखा बरा बनाने की विधि-उरद की पीठी में मात्रानुसार सेंधा नमक, अदरुक तथा हींग डालकर खूब फेंटकर उसकी बड़ी-बड़ी गोली बनाले, पश्चात् तेल में डालकर धीरे-धीरे मन्द आँच से पकावे, जब सिद्ध हो जाय तब उतार ले, यही सूखा बरा कहलाता है । उरद का सूखा बरा-बलकारक, बृंहण, वीर्यवर्धक, वात सम्बन्धी रोगों को दूर करने वाला, रुचिकारक, विशेष करके अर्दितवात (मुँह के लकवे) को दूर करने वाला, विबन्धनाशक, कफकारक एवम् अत्यन्त दीप्त अग्नि वालों के लिये उत्तम होता है । रसदार बरा-शुक्रजनक, बलकारक, रोचक, गुरु, विबन्ध को दूर करने वाला, विदाही, कफकारक तथा वातनाशक होता है । यदि इसे रायता में डालकर भक्षण करे तो अत्यन्त रोचक और पाचक होता है । [५१-५५] ❖ राज्यक्ता (राइता) इति लोके ।।५१-५५।। यहाँ पर मूल में "राज्यक्ता" से राइता का ग्रहण करना चाहिये । [५१-५५] अथ काञ्जिकावटकः (काञ्जी बरा) । तस्य साधनं गुणांश्चाह मन्थनी नूतना धार्या कटुतैलेन लेपिता । निर्मलेनाम्बुनाऽऽपूर्वं तस्यां चूर्णं विनिक्षिपेत् ।। राजिकाजीरकलवणाहिङ्गुशुण्ठीनिशाकृतम् ।।५६।। निक्षिपेद्वटकांस्तत्र भाण्डस्यास्याञ्च मुद्रयेत् । ततो दिनत्रयादूर्ध्वमम्लाः स्युर्वटका ध्रुवम् ।।५७।। काञ्जिकावटको रुच्यो वातघ्नः श्लेष्मकारकः । शूलघ्नोऽजीर्णदाहनुद् नेत्ररोगे तु नो हितः ।।५८।। काञ्जी बरा बनाने की विधि-एक नवीन मिट्टी का मजबूत पात्र (हाँड़ी) लेकर उसके अन्दर कडुवा तैल चुपड़ कर उसमें स्वच्छ जल भर दे, तत् पश्चात् मात्रानुसार राई, जीरा, सेंधा नमक, हींग, सोंठ और हलदी का चूर्ण जब तीन दिन बीत जाय तब चौथे दिन बरे सब खट्टे हो जायेंगे तब पात्र का मुख खोल दे । यही बरे काञ्जी के बरे कहलाते हैं। काञ्जी के बरे-रुचिकारक, वातनाशक, कफकारक, शूलनाशक, एवम्-अजीर्ण तथा दाह को दूर करनेवाले और नेत्ररोग में अहितकर होते हैं । [५६-५८] अथाम्लिकावटकाः (इमली के बरे) । तेषां साधनं गुणांश्चाह अम्लिकां स्वेदयित्वा तु जलेन सह मर्दयेत् । तन्नीरे कृतसंस्कारे वटकान्मज्जयेज्जनः ।।५९।। अम्लिकावटकास्ते तु रुच्या वह्निप्रदीपनाः । वटकस्य गुणैः पूर्वैरेतैऽपि च समन्विताः ।।६०।। इमली के बरे बनाने की विधि-इमली को उबालकर जल के साथ मलकर के उसका रस तैयार करले, पुनः उसका संस्कार करके अर्थात् सरसों, हींग, जीरा, सेंधा नमक, सोंठ, हरदी आदि मसाला डाल करके पीछे से उरद के

८८० भावप्रकाशनिघण्टुः सूखे बरों को उसी में भिगो दे, जब भींग जायँ तब उन्हें कार्य में ले, ये ही इमली के बरे कहलाते हैं। इमली के बरे- रुचिकारक, अग्नि को प्रदीप्त करने वाले एवम् पूर्वोक्त उड़द के सूखे बरों के गुणों से युक्त होते हैं। [५९-६०] अथ मुद्गवटकाः (मूँग के बरे)। तक्रमज्जितानां च तेषां गुणानाह मुद्गानां वटकास्तक्रे मज्जिता लघवो हिमाः। संस्कारजप्रभावेण त्रिदोषशमना हिताः ।।६१।। मूँग के बरे बनाने की विधि-उरद के बरों की भाँति मूँग के भी बरे बनाकर तक्र (मट्ठे) में भिगो दे और पूर्वोक्त भुना जीरा तथा हींग और सेंधा नमक का चूर्ण उसमें डाल दे, भीगने पर ये ही मूँग के बरे कहलाते हैं। मूँग के बरे- लघु, शीतल एवम् संस्कार के प्रभाव से अर्थात् मसाला आदि डालने से त्रिदोष को शमन करने वाले तथा हितकर होते हैं। [६१] अथ माषवटिकाः (उरद की बरी)। तेषां साधनं गुणाँश्चाह माषाणां पिष्ठिका हिङ्गुलवणाद्रकसंस्कृता। तया विरचिता वस्त्रे वटिकाः साधु शोषिताः ।।६२।। भर्जितास्तप्ततैलेस्ता अथवाऽम्बुप्रयोगतः। वटकस्य गुणैर्युक्ता ज्ञातव्या रोचना भृशम् ।।६३।। उरद की बरी बनाने की विधि-उरद की पीठी को पीस कर उसमें मात्राऽनुसार हींग, सेंधा नमक तथा अदरक आदि डालकर खूब फेंटे पश्चात् उसकी छोटी-छोटी बरी बना कर कपड़े पर रखकर धूप में खूब सुखा डाले और सूख जाने पर उसे तेल में भून कर अथवा पानी में उबालकर सिद्ध करके, इसी को उरद की बरी कहते हैं। उरद की बरी- गुणों में पूर्वोक्त उरद के बरों के समान होती है और अत्यन्त रुचिकर होती है। [६२-६३] अथ कूष्माण्डकवटी (पेठे की बरी)। तस्या गुणानाह कूष्माण्डकवटी ज्ञेया पूर्वोक्तवटिकागुणा। विशेषात्पित्तरक्तघ्नी लघ्वी च कथिता बुधैः ।।६४।। पेठे की बरी (कोहड़ौरी) बनाने की विधि-पूर्वोक्त उरद की बरी बनाने के समय पीठी में पेठे के छोटे-छोटे बारीक टुकड़े कद्दूकश से तैयार करके डाले और पूर्वोक्त मसाला डालकर कपड़े पर सुखाले। यही पेठे की बरी कहलाती हैं। पेठे की बरी-गुणों में उरद की बरी के समान होती है किन्तु विशेष करके यह पित्त तथा रक्तविकार को दूर करने वाली एवम् लघु होती ऐसा विद्वानों का मत है। [६४] . अथ मुद्गवटी (मूँग की बरी)। तस्या गुणानाह मुद्गानां वटिका तद्वद्रचिता साधिता तथा। पथ्या रुच्या तथा लघ्वी मुद्गसूपगुणा स्मृता ।।६५।। मूँग की बरी बनाने की विधि-मूँग की बरी, उरद की बरी के समान ही बनाई तथा पकाई जाती है। मूँग की बरी-पथ्य, रुचिकारक तथा लघु होती है एवम् मूँग के दाल के जो गुण पूर्व में कह आये हैं वे सभी इसमें रहते हैं। [६५] आथालीकमत्स्यः। तस्य साधनप्रकारमाह माषपिष्टिकया लिप्तं नागवल्लीदलं महत् ।।६६।। तत्तु संस्वेदयेद्युक्त्या स्थालीयामास्तारकोपरि। ततो निष्कास्य तं खण्ड्यं ततस्तैलेन भर्जयेत् ।।६७।। अलीकमत्स्य (यह खाने में मछली के समान होता है) बनाने की विधि-बड़े-बड़े २ पान के पत्तों को लेकर उनके ऊपर उरद की पीठी लपेट दे और एक बटुलोई में जल भरकर उनके मुख पर वस्त्र बाँधकर उसी के ऊपर उन सबों को रख कर आँच पर रख दे और युक्ति से इस तरह भाप से उबाले कि वे सब सिद्ध हो जायँ, पुनः उतारकर उनके टुकड़े-टुकड़े कर डाले, तत्पश्चात् तेल में पका डाले। [६६-६७] ❖ खण्ड्यं = खण्डन योग्यमिति यावत् ।।६६-६७।।

कृतान्नवर्गः ८८९ यहाँ पर “खण्ड्य” पद का—“टुकड़े-टुकड़े कर डाले” यह अर्थ समझना चाहिये । [६६-६७] अलीकमत्स्य उक्तोऽयं प्रकारः पाकपण्डितैः । तं वृन्ताकभटित्रेण वांस्तूकेन च भक्षयेत् ।।६८।। अलीक मत्स्य बनाने का यही पूर्वोक्त प्रकार पाकविद्या के विद्वानों ने बतलाया है । इसे बैंगन के कबाब (लोहे के सींक में खोंस कर आग पर भूने हुये बैंगन) के साथ या बैंगन के भर्ते के साथ अथवा बथुवा के साथ खावे । [६८] अथ क्वथिता (कढी) । तस्याः साधनं गुणाँश्चाह स्थाल्यां घृते वा तैले वा हरिद्रां हिङ्गु भर्जयेत् । अवलेहनसंयुक्तं तक्रं तत्रैव निक्षिपेत् । एषा सिद्धा समरिचा क्वथिता कथिता बुधैः ।।६९।। कढ़ी बनाने की विधि—कढ़ाई या बटुलोई में घी अथवा तेल डालकर उसमें हींग तथा हरदी डाल कर प्रथम भून डाले तत्पश्चात् उसमें अरिहन अर्थात् जल में घोला हुआ बेसन और उसी के साथ तक्र (मट्ठा) भी मिलाकर डालकर पकावे और काली मिर्च तथा मात्रानुसार सेंधा नमक भी डाल दे, जब यह सिद्ध हो जाय तो उतार ले, इसी को विद्वान् लोग कढ़ी कहते हैं । [६९] ❖ अवलेहनम् “अरिहन” इति लोके ।।६९।। यहाँ पर 'अवलेहनम्' पद से लोक प्रसिद्ध “अरिहन” लेना चाहिये । [६९] क्वथिता पाचनी रुच्या लघ्वी वह्निप्रदीपनी । कफानिलाविबन्धघ्नी किञ्चित्पित्तप्रकोषणी ।।७०।। कढ़ी—पाचक, रुचिकारक, लघु, अग्निदीपक, किञ्चित् पित्त को प्रकुपित करने वाली एवम्-कफ, वायु तथा विबन्ध को दूर करने वाली होती है । [७०] अलीकमत्स्यस्य गुणानाह अलीकमत्स्याः शुष्का वा किं वा क्वथितया पुनः । बृंहणा रोचना वृष्या बल्या वातगदापहः ।।७१।। कोष्ठशुद्धिकराः शुष्काः किञ्चित्पित्तप्रकोपणाः । अर्दिते सहनुस्तम्भे विशेषेण हिताः स्मृताः ।।७२।। अलीक मत्स्य—अलीक मत्स्य चाहे सूखे हों या कढ़ी में भिगोये हुये हों दोनों ही बृंहण (रसा-रक्तादिवर्धक), रोचक, वीर्यवर्धक, बलकारक, वातरोग-नाशक तथा कोष्ठ की शुद्धि करने वाले होते हैं । सूखे अलीक मत्स्य—विशेष करके किञ्चित् पित्त को प्रकुपित करने वाले और अर्दितवात (मुँह का लकवा) तथा हनुस्तम्भ रोग में विशेष हितकर होते हैं। [७१-७२] अथ मुद्गार्द्रवटकाः (अदरक बड़ा) । तेषां साधनं गुणाँश्चाह मुद्गपिष्टीविरचितान् वटकांस्तैलपाचितान् । हस्तेन चूर्णयेत्सम्यक् तस्मिंश्चूर्णं विनिक्षिपेत् ।।७३।। भृष्टं हिङ्ग्वार्द्रकं सूक्ष्मं मरिचं जीरकं तथा । निम्बूरसं यवानी च युक्त्वा सर्वं विमिश्रयेत् ।।७४।। मुद्गपिष्टि पचेत्सम्यक् स्थाल्यामास्तारकोपरि । तस्यास्तु गोलकं कुर्यात्तन्मध्ये पूरणं क्षिपेत् ।।७५।। तैले तानगोलकान्पक्त्वा क्वथितायां निमज्जयेत् । गोलकाः पाचकैः प्रोक्तास्ते त्वार्द्रकवटा अपि ।।७६।। मुद्गार्द्रकवटा रुच्या लघ्वो बलकारकाः । दीपखास्तर्पणाः पथ्यास्त्रिषु दोषेषु पूजिताः ।।७७।। अदरक का बड़ा बनाने की विधि—प्रथम मूँग की पीठी के बरे बनाकर तेल में पका डाले, पश्चात् उसे हाथ से मसल कर चूर्ण कर डाले । पुनः उसमें—भुना हुआ हींग, अदरख के पतले-पतले छोटे-छोटे टुकड़े, मरिच, जीरा, नींबू के रस, अजवाइन इन सबों को युक्तिपूर्वक यथायोग्य चूर्ण करके मिला दे । और मूँग की पीठी को बटुलोई में जल ५९ भाव.I CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

८८२ भावप्रकाशनिघण्टुः भर कर उसके ऊपर कपड़ा रख कर उसी के ऊपर रख कर माप से सिद्ध कर ले। जब तैयार हो जाय तब उसके बड़े- बड़े गोले कर, बरे बनाकर उसी के अन्दर पूर्वोक्त चूर्ण किये हुये पदार्थों को भर तैल में पका डाले, जब तैयार हो जाय तब कढ़ी में भिगो दे। भींग जाने पर इसी को पाकविद्या में कुशल लोग अदरक बड़ा कहते हैं। अदरक बड़ा-रुचिकारक, लघु, बलकारक, अग्निदीपक, तृप्तिकारक, पथ्या तथा तीनों दोषों में ही उत्तम होता है अर्थात् हानिकारक नहीं होता है। [७३-७७] अथ वेसनम् (वेसन)। तस्य साधनमाह दाल्यश्चणकानां तु निस्तुषा यन्त्रपेषिताः। तच्चूर्णं वेसनं प्रोक्तं पाकशास्त्रविशारदैः ॥७८॥ बेसन बनाने की विधि-बिना छिलके की चने की दाल को चक्की में पीसकर आटा तैयार करले। इसी को पाकशास्त्र (रसोई बनाने की विद्या) में निपुण लोग बेसन कहते हैं। [७८] अथ वेसनवटिका (फुलौरी)। तस्या साधनं गुणाँश्चाह वटिकावेसनस्यापि क्वयितायां निमज्जिता। रुच्या विष्टम्भजननी बल्या पुष्टिकरी स्मृता ॥७९॥ फुलौरी बनाने की विधि-बेसन की बरी बनाकर यदि कढ़ी में भिगो दी जाय तो उसे फुलौरी कहते हैं। फुलौरी-रुचिकारक, विष्टम्भजनक, बल तथा पुष्टि करने वाली होती है। [७९] ❖ एवमन्येऽपि वेसनभवाः प्रकाराः खण्डनखण्डप्रभृतयो बोद्धव्याः ॥७९॥ इस प्रकार से अन्य भी बेसन से बनाये जाने वाले खण्डन आदि पदार्थों के बनाने की विधियाँ होती हैं। उन्हें स्वयं समझ लेना चाहिये। ग्रन्थ बढ़ जाने के भय से नहीं लिखी जा रही हैं। [७९] अथ मांसस्य प्रकाराः। तत्र शुद्धमांसम्। तस्य प्रकारमाह पाकपात्रे घृतं दद्यात्तैलञ्च मदभावतः। तत्र हिङ्गुहरिद्रां च भर्जयेत्तदनन्तरम् ॥८०॥ छागादेरस्थिरहितं मांसं तत्खण्डितं ध्रुवम्। धौतं निर्गालितं तस्मिन्नृते तद्भर्जयेच्छनैः ॥८१॥ सिद्धयोग्यं जलं दत्वा लवणन्तु पचेत्ततः। सिद्धे जलेन सम्पिष्य वेशवारं परिक्षिपेत् ॥८२॥ मांस बनाने के प्रकारों में प्रथम शुद्ध मांस बनाने की विधि-मांस बनाने के पात्र में प्रथम घी अथवा अभाव में तेल ही डाल कर उसमें हींग और हरदी डाल कर भूने, तत्पश्चात् बकरे आदि का मांस लेकर उसके टुकड़े कर डाले, यदि हड्डियाँ हों तो उन्हें फेंक दे, पुनः उन टुकड़ों को धोकर तथा जल खूब निथारकर उपर्युक्त घी अथवा तेल में धीरे-धीरे भूने और सिद्ध होने योग्य जल छोड़ कर तथा सेंधा नमक मात्राऽनुसार डालकर पकावे, जब पक जाय तब जल के साथ वेशवार पीस कर उसी में छोड़ दें। [८०-८२] अथ वेशवरः (पिसा हुआ मसाला)। तद्द्रव्याण्याह द्रव्याणि वेशवारस्य नागवल्लीदलानि च। तण्डुलाश्च लवङ्गानि मरिचानि समासतः ॥८३॥ वेशवार के द्रव्य-पान के पत्ते, चावल, लौंग, मरिच ये सब संक्षेप में वेशवार में पड़ने वाले द्रव्य हैं। [८३] वेशवार "वेगर" इति लोके ॥८३॥ यहाँ पर "वेशवार" से लोक प्रसिद्ध "वेगर" समझना चाहिये। [८३]

कृतान्नवर्गः ८८३ अथ शुद्धमांसस्य गुणानाह अनेन विधिना सिद्धं शुद्धमांसमिति स्मृतम् ।।८४।। शुद्धमांसं परं वृष्यं बल्यं रुच्यञ्च बृंहणम् । त्रिदोषशमनं श्रेष्ठं दीपनं धातुवर्द्धनम् ।।८५।। शुद्ध मांस-इस पूर्वोक्त विधि से सिद्ध किया हुआ मांस "शुद्ध-मांस" कहलाता है। यह अत्यन्त वीर्यवर्धक, बलकारक, रोचक, बृंहण (रस-रक्तादि वर्धक), त्रिदोष को शमन करने वाला, अत्यन्त अग्निदीपक तथा धातुवर्धक होता है। [८४-८५] अथ सहद्रकम् ("सेहण्डुक, सहर्वांसु" इति लोके) । तस्य साधनं गुणाँश्चाह छागादेर्मांसमूर्वादिः कुट्टितं खण्डितं पुनः । शुद्धमांसविधानेन पचेदेतत्सहद्रकम् । सहद्रकं गुणैर्ग्रन्थे शुद्धमांसगुणं स्मृतम् ।।८६।। सहद्रक (इसे लोक में-सेहुण्डक या सहर्वासु-कहते हैं) बनाने की विधि-बकरे आदि के ऊरु आदि स्थानों के मांस को कूट-कूट कर खूब टुकड़े करके पूर्वोक्त शुद्ध मांस बनाने की विधि के अनुसार पका डाले, इसको सहद्रक कहते हैं । सहद्रक-द्रव्य-गुण-ग्रन्थों में इसके गुण शुद्ध मांस के समान ही कहे हुए हैं। [८६] अथ तक्रमांसम् (अखनी) । तस्य साधनं गुणाँश्चाह पाकपात्रे घृतं दत्त्वा हरिद्रां हिङ्गु भर्जयेत् । छागादेः सकलस्यापि खण्डान्यपि च भर्जयेत् ।।८७।। सिद्धयोग्यं जलं दत्त्वा पचेन्मृदुतरं तथा । जीरकादियुते तक्रे मांसखण्डानि भावयेत् ।।८८।। तक्रमांसन्तु वातघ्नं लघु रुच्यं बलप्रदम् । कफघ्नं पित्तलं किञ्चित्सर्वाहारस्य पाचनम् ।।८९।। अखनी बनाने की विधि-पाक बनाने के बर्तन में घी डाल कर उसमें हल्दी तथा हींग को प्रथम भून डाले, तत्पश्चात् उसी में बकरे आदि के सम्पूर्ण अंगों के मांस के टुकड़ों को भून डाले, तत्पश्चात् उसमें सिद्ध होने योग्य जल डाल कर पुनः मन्द-मन्द अग्नि से पकावे । पश्चात् जीरा आदि पड़े हुये तक्र (मट्ठा) में उन मांस के टुकड़े को डाले । यही 'अखनी' कहलाती है। अखनी-वातनाशक, लघु, रुचिकारक, बलकारक, कफनाशक, किञ्चित् पित्तजनक तथा सम्पूर्ण खाये हुए पदार्थों को पचाने वाली होती हैं। [८७-८९] अथ हरीसा (आसा) । तस्य साधनं गुणाँश्चाह पाकपात्रे तु बृहति मांसखण्डानि निक्षिपेत् । पानीयं प्रचुरं सर्पिः प्रभूतं हिङ्गु जीरकम् ।।९०।। हरिद्रामार्द्रकं शुण्ठीं लवणं मरिचानि च । तण्डुलांश्चापि गोधूमाञ्जम्बीराणां रसान् बहून् ।।९१।। यथा सर्वाणि वस्तूनि सुपक्वानि भवन्ति हि । तथा पचेत्तु निपुणो बहुमण्डस्थितिर्यथा ।।९२।। एषा हरीसा बलकृद्वातपित्तापहा गुरुः । शीतोष्णा शुक्रदा स्निग्धा सरा सन्धानकारिणी ।।९३।। हरीसा (आस) बनाने की विधि-एक बहुत बड़े पात्र में मांस के टुकड़ों को डाल कर उसी में अधिक मात्रा में जल तथा घी और हींग, जीरा, हल्दी, अदरख, सोंठ, सेंधा नमक, मरिच, चावल, गेहूँ और जमीरी नींबू का रस इन सबों को डाले तथा इस भाँति चतुरता से पकावे कि उपर्युक्त सब वस्तुयें भली भाँति पक भी जायें और अधिक मात्रा में मांड (रस) भी रह जाय । इसी को-हरीसा कहते हैं। हरीसा-बलकारक, वात तथा पित्तनाशक गुरु, शीतोष्ण, शुक्रजनक, स्निग्ध, सारक (मल को निकालने वाला) तथा सन्धान-कारक (टूटी हुई हड्डियों को जोड़ने वाला) होता है। [९०-९३]

८८४ भावप्रकाशनिघण्टुः अथ तलितमांसम् (तला हुआ मांस) । तस्य साधनं गुणाँश्चाह शुद्धमांसविधानेन मांसं सम्यक्प्रसाधितम् । पुनस्तदाज्ये सम्मृष्टं तलितं प्रोच्यते बुधैः ॥९४॥ तलितं बलमेधाऽग्निमांसौजःशुक्रवृद्धिकृत् । तर्पणं लघु सुस्निग्धं रोचनं दृढताकरम् ॥९५॥ तलित मांस (तला हुआ मांस) बनाने की विधि—पूर्वोक्त शुद्ध मांस बनाने की विधि के अनुसार भली भाँति सिद्ध किये हुए मांस को पुनः घी में डाल कर जो अच्छी तरह से भूना जाता है, उसे पण्डित लोग तलित मांस अर्थात् तला हुआ मांस कहते हैं। तलित मांस (तला हुआ मांस)—बल, मेधाशक्ति, अग्नि, मांस, ओज तथा शुक्र की वृद्धि करने वाला, तृप्तिकारक, लघु, अत्यन्त स्निग्ध, रोचक तथा शरीर को दृढ़ करने वाला होता है। [९४-९५] अथ शूल्यपलम् (कबाब) । तस्य साधनं गुणाँश्चाह कालखण्डादिमांसानि ग्रथितानि शलाकया । घृतं सलवणं दत्त्वा निर्धूमे दहने पचेत् ॥९६॥ तत्त शूल्यमिति प्रोक्तं पाककर्मविचक्षणैः ॥९७॥ शूल्यं पलं सुधातुुल्यं रुच्यं वह्निकरं लघु । कफवातहरं बल्यं किञ्चित्पित्तकरं हि तत् ॥९८॥ शूल्य पल (कबाब) बनाने की विधि—कलेजे आदि अंगों के मांस को कूट कर उसमें घी तथा नमक मिला कर लोहे की सलाई पर लपेट कर या उसी में गूँथ कर निर्धूम (बिना धूयें की) अग्नि पर कुछ ऊँचाई से रख कर धीरे- धीरे पकावे, इसी को पाक करने में निपुण लोग शूल्य पल (कबाब) कहते हैं। कबाब—अमृत के तुल्य स्वादिष्ट, रुचिकारक, अग्नि को प्रदीप्त करने वाला, लघु, कफ तथा वातनाशक, बलकारक, एवम्—किञ्चित् पित्तकारक होता है [९६-९८] अथ मांसशृङ्गाटकम् (मांस का सिंघाड़ा) । तस्य साधनं गुणाँश्चाह शुद्धमांसं तनूकृत्य कर्त्तितं स्वेदितं जले। लवङ्गहिङ्गलवणमरिचार्द्रकसंयुतम् ॥९९॥ एलाजीरकधान्याकनिम्बूरससमन्वितम् । घृते सुगन्ध्ये तद् भृष्टं पूरणं प्रोच्यते बुधैः ॥१००॥ शृङ्गाटकं समितया कृतं पूरणपूरितम्। पुनः सर्पिषि सभृष्टं मांसशृङ्गाटकं वदेत् ॥१०१॥ मांसशृङ्गाटकं रुच्यं बृंहणं बलकृद् गुरु। वातपित्तहरं वृष्यं कफघ्नं वीर्यवर्धनम् ॥१०२॥ मांस का सिंघाड़ा बनाने की विधि—शुद्ध मांस के पतले-पतले तथा छोटे-छोटे टुकड़े करके उसे जल में उबाले। पश्चात् उसमें—लौंग, हींग, सेन्धा नमक, मरिच, अदरख, छोटी इलायची, जीरा, धनिया इन सबों का यथायोग्य चूर्ण और नींबू का रस डाल करके सुगन्धित घी में भून डाले, इसी को पण्डित लोग पूरण (मैदा के सिंघाड़ा के अन्दर भरे जाने वाला द्रव्य) कहते हैं। इसके उपरान्त मैदा को जल में सान कर उसकी लोई के अन्दर उक्त पूरण संज्ञक द्रव्यों को भर कर सिंघाड़ा के आकार का बना ले और उसे घी में भून ले, इसी को मांस का सिंघाड़ा कहते हैं। मांस का सिंघाड़ा—रुचिकारक, बृंहण (रस-रक्तादिवर्धक), बलकारक, गुरु, वात तथा पित्तनाशक, वृष्य, कफनाशक तथा अत्यन्त वीर्यवर्धक होता है। [९९-१०२] अथ सिद्धमांसरसः (सुरुवा) । तस्य गुणानाह सिद्धमांसरसो रुच्यः श्रमश्वासक्षयापहः । प्रीणनो वातपित्तघ्नः क्षीणानामल्परेतसाम् ॥ विश्लिष्टभग्नसन्धीनां शुद्धानां शुद्धिकाङ्क्षिणाम् ॥१०३॥ स्मृत्योजोबलहीनानां ज्वरक्षीणक्षतोरसाम् । शस्यते स्वरहीनानां दृष्ट्यायःश्रवणार्थिनाम् ॥१०४॥ प्रकाराः कथिताः सन्ति बहवो मांससम्भवाः । ग्रन्थविस्तरभीतेश्ते मया नात्र प्रकीर्त्तिताः ॥१०५॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA

कृतान्नवर्गः ८८५ सिद्धमांसरस (सुरुवा)—रुचिकारक, श्रम, श्वास तथा क्षय को दूर करने वाला, तृप्तिदायक, वात तथा पित्तनाशक होता है; एवम् क्षीण, अल्पवीर्य या जिनकी सन्धियाँ उखड़ गई हैं या टूट गई हैं, या जो वमन विरेचनादि से शुद्ध हुये हैं अथवा वमन विरेचनादि से शोधन करना चाहते हैं, किंवा स्मरणशक्ति ओज तथा बल से हीन हैं, या ज्वर से क्षीण अथवा उरःक्षत रोग से पीड़ित हैं या जिनका स्वर हीन हो गया है अथवा दृष्टिशक्ति आयु तथा श्रवणशक्ति की वृद्धि चाहने वाले जो लोग हैं उनके लिये उत्तम होता है। इस प्रकार से बहुत से मांस बनाने के प्रकार अन्यत्र कहे हुये हैं किन्तु ग्रन्थ के बढ़ जाने के भय से यहाँ पर उन सबका वर्णन नहीं किया जा रहा है। [१०३-१०५] अथ शाकपाकविधिः । तामाह हिङ्ग्जीरयुते तैले क्षिपेच्छाकं सुखण्डितम् ।।१०६।। लवणं चात्र चूर्णादि सिद्धे हिङ्गूद्कं क्षिपेत् । इत्येवं सर्वशाकानां साधनेऽभिहितो विधिः ।।१०७।। शाक बनाने की विधि—शाक को पहले टुकड़े-टुकड़े करके और धो करके पीछे तेल में हींग तथा जीरा का तड़का दे करके उसी में डाल दे, जब गल जाय तब उसमें सेंधा नमक, खटाई का चूर्ण तथा हींग घोला हुआ जल छोड़ कर पक जाने पर उतार ले। हर एक शांकों को बनाने के लिये प्रायः करके यही विधि काम में ली जाती है। [१०६- १०७] अथ पच्यान्नसाधनविधिमाह । तत्र मण्ठकः (“मठरी” इति लोके) । तस्य साधनविधिमाह समितां मर्दयेदाज्यैर्जलैनापि च सन्नयेत् । तस्यास्तु वटिकां कृत्वा पचेत्सर्पिषि नीरसम् ।। एलालवङ्गकर्पूरमरिचाद्यैरलङ्कृते ।।१०८।। मज्जयित्वा सितापाके ततस्तञ्च समुद्धरेत् । अयं प्रकारः संसिद्धौ मण्ठ इत्यभिधीयते ।।१०९।। पकवान बनाने की विधियों में प्रथम मण्ठक (लोकप्रसिद्ध मठरी) बनाने की विधि कहते हैं—प्रथम मैदा को घी तथा जल से खूब मर्दन करे, पश्चात् उसको टिकिया बनाकर घी में खूब तल ले, फिर चीनी की चाशनी बना कर उसमें छोटी इलायची, लौंग, कपूर, मरिच आदि डालकर उसी में उक्त टिकियों को डुबो दे, जब खूब भींग जाय तब निकाल कर काम में ले, इस प्रकार से तैयार हुये पकवान को मण्ठ अर्थात् मठरी कहते हैं। [१०८-१०९] ❖ सन्नयेद् = मर्दयेत् ।।१०८-१०९।। यहाँ पर मूल में “सन्नयेत्” पद का “खूब मर्दन करे” यह अर्थ समझना चाहिए। अथ मण्ठस्य गुणानाह मण्ठस्तु बृंहणो वृष्यो बल्यः सुमधुरो गुरुः । पित्तानिलहरो रुच्यो दीप्ताग्निनां सुपूजितः ।।११०।। समिताशर्करासर्पिर्निर्मिता अपरेऽपि ये । प्रकारा अमुना तुल्यास्तेऽपि चेत्तद्गुणाः स्मृताः ।।१११।। मठरी—बृंहण (रस-रक्तादिवर्धक), वृष्य, बलकारक, अत्यन्त मधुर, गुरु, पित्त तथा वायु को दूर करने वाली, रुचिकारक तथा प्रदीप्त अग्नि वालों के लिये अत्युत्तम होती है। इसी के समान मैदा, शक्कर तथा घी के योग से बने हुये अन्य प्रकार के भी जो पकवान बालू-साही आदि हैं, उसके भी ये ही सब गुण होते हैं। [११०-१११] अथ सम्पावः (गुजियां) । तस्य साधनं गुणाँश्चाह पर्पट्यः साज्यसमितानिर्र्मिता घृतभर्जिताः । कुट्टिताश्चालिताः शुद्धशर्कराभिर्विमर्दिताः ।।११२।। तत्र चूर्ण क्षिपेदेलालवङ्गमरिचानि च । नारिकेरं सकर्पूरं चारबीजान्यनेकधा ।।११३।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

८८६ भावप्रकाशनिघण्टुः घृताक्तसमिता पुष्टरोटिका रचिता ततः । तस्यान्तःपूरणं तस्य कुर्यान्मुद्रां दृढां सुधीः ।। १९४ ।। सर्पिषि प्रचुरे तान्तु सुपचेन्निपुणो जनः । प्रकारज्ञैः प्रकारोऽयं सम्पाव इति कीर्त्तितः ।। १९५ ।। मण्ठकेन समो ज्ञेयः सम्पावोऽपि गुणैर्जनैः ।। १९६ ।। गुजिया बनाने की विधि-घी का मोयन देकर मैदा की पतली-पतली रोटी बेल कर उसे घी में खर्खरी तल करके पश्चात् कूट कर चलनी से चाल ले और उसमें अन्दाज से बूरा मिला कर खूब मर्दन करे । पुनः इलाएची, लौंग, मरिच, नारियल की मींगी का बुरादा (बारीक-बारीक टुकड़े), कपूर, चिरौंजी आदि द्रव्यों चूर्ण मिलाकर घी का मोयन देकर माँडे हुये मैदे की मोटी रोटी बेल कर उसके अन्दर (पूर्वोक्त चूर्ण किये हुये द्रव्यों को) भरकर उसका मुख दृढ़ता से युक्तिपूर्वक बन्द कर दे, तत्पश्चात्, अधिक घी कढ़ाई में डाल कर उसमें अच्छी तरह से पकावे । पकवान बनाने की विधियों के जानने वाले लोगों ने इस प्रकार से बने हुये पदार्थ को "सम्पाव" अर्थात् गुजिया कहा है । गुजिया-गुणों में मठरी के समान ही होती है ऐसा पाकशास्त्रज्ञों का मत है । अथ कर्पूरनालिका । तस्याः साधनं गुणाँश्चाह घृताढ्यया समिततया लम्बं कृत्वा पुटं ततः । लवङ्गोषणकर्पूरयुतया सितयाऽन्वितम् ।। १९७ ।। पचेदाज्येन सिद्धैषा ज्ञेया कर्पूरनालिका । सम्पावसदृशा ज्ञेया गुणैः कर्पूरनालिका ।। १९८ ।। कर्पूरनालिका बनाने की विधि-घी का मोयन देकर मड़े हुये मैदा की लोई बेलकर लम्बा सम्पुट बनाकर उसके अन्दर लौंग, मरिच तथा कपूर का चूर्ण और बूरा (दानेदार चीनी) भरकर उसका मुख दृढ़ता से बन्द करके घी में पकावे, सिद्ध होने पर इसी को "कर्पूरनालिका" कहते हैं । कर्पूरनालिका-गुणों में गुजिया के समान ही होती है । [१९७-१९८] अथ फेनिका (फेनी) । तस्याः साधनं गुणाँश्चाह समिताया घृताढ्याया वर्त्तीर्दीर्घाः समाचरेत् । तास्तु सन्निहिता दीर्घाः पीठस्योपरि धारयेत् ।। १९९ ।। वेल्लयेद्वेल्लनेनैता यथैका पर्पटी भवेत् । ततश्छुरिकया तान्तु संलग्नामेव कर्त्तयेत् ।। १२० ।। ततस्तु वेल्लयेद्भूयः सट्टकेन च लेपयेत् । शालिचूर्णं घृतं तोयं मिश्रितं सट्टकं बदेत् ।। १२१ ।। ततः संवृत्य तल्लोप्त्रीं विदधीत पृथक्पृथक् । पुनस्तां वेल्लयेल्लोप्त्रीं यथा स्यान्मण्डलाकृतिः ।। १२२ ।। ततस्तां सुपचेदाज्ये भवेयुश्च स्फुटाः स्फुटाः । सुगन्धया शर्करया तद्धूलनमाचरेत् ।। १२३ ।। सिद्धैषा फेनिकानाम्नी मण्ठकेन समा गुणैः । ततः किञ्चिल्लघुरियं विशेषोऽयमुदाहृतः ।। १२४ ।। फेनी बनाने की विधि-घी का मोयन देकर मड़े हुये मैदा की लम्बी-लम्बी बत्ती बना कर उसे चकला पर पास- पास सटाकर रखकर लम्बाई की तरफ से बेलन से ऐसा बेले कि जिसमें एक रोटी की तरह हो जाय, उसके बाद छूरी से एक दूसरे से लगी हुई को काट-काट कर, उसको पुनः अलग-अलग बेले और उन पर चावल का चूर्ण, घी और जल को खूब मिलाने से जो सट्टक तैयार होता है, उसका लेप करे । फिर उन सबों को अलग-अलग समेट कर लोई बनाकर ऐसा बेले कि जिसमें चक्राकार रोटी बन जाय । तत्पश्चात् घी में उन सबको अच्छी तरह से पकावे, तैयार होने पर उसमें फुटका-फुटका सा पड़ जायगा । पुनः सुगन्धित शक्कर में उन सबों को सान दे अथवा चाशनी से डुबोकर निकाल ले । इस प्रकार से तैयार हुई पकवान को फेनी कहते हैं । फेनी-गुणों में मठरी के समान होती है, किन्तु विशेषकर उसकी अपेक्षा किञ्चित् लघु होती है । [११९-१२४] ❖ वेल्लयेत् = प्रसारयेत् । वेल्लनः = 'बेलन' इति लोके । पर्पटी = रोटी । लोप्त्री 'लोई' इति लोके ।। ११९-१२४ ।।

कृतान्नवर्गः ८८७ यहाँ पर मूल में “बेल्लयेत्” का “बेले”, “बेल्लन” पद का लोक प्रसिद्ध “बेलन”, “पर्पटी” का “रोटी” और “लोजी” का “लोई” अर्थ समझना चाहिये । [११९-१२४] अथ शष्कुली (खस्तापूरी) । तस्याः साधनं गुणाँश्चाह समिताया घृताक्ताया लोप्त्रीं कृत्वा च वेल्लयेत् । आज्ये तां भर्जयेत्सिद्धा शष्कुली फेनिकागुणा ।। १२५ ।। खस्ता पूरी बनाने की विधि—घी का मोयन देकर मैदा माड़ कर उसकी लोई बना डाले, पश्चात् उन सबों को बेल कर घी में पका डाले, सिद्ध होने पर इसी को संस्कृत में—“शष्कुली” कहते हैं। खस्ता पूरी—गुणों में फेनी के समान होती है। [१२५] अथ सेविकामोदकाः (सेव के लड्डू) । तेषां साधनं गुणाँश्चाह घृताढ्यया समितया कृत्वा सूत्राणि तानि तु । निपूणो भर्जये दाज्ये खण्डपाकेन योजयेत् ।। युक्तेन मोदकान् कुर्यात्ते गुर्णैर्मण्ठका यथा ।। १२६ ।। सेव के लड्डू बनाने की विधि—घी का मोयन देकर मैदा माड़ कर उसके सूत्र अर्थात् सेव बना ले और उसे घी में भून ले, जब सिक जाय तब उत्तान कर शक्कर की चाशनी में डुबो कर उसका लड्डू बाँध ले, उसी को सेव का लड्डू कहते हैं। यह—गुण में मठरी के समान ही होता है। [१२६] अथ मुक्तामोदका मुद्गमोदका वा (बूँदी के लड्डू) । तेषां साधनं गुणाँश्चाह मुद्गानां धूमसीं सम्यग्घोलयेन्निर्मलाऽम्बुना ।। १२७ ।। कटाहस्य घृतस्योर्ध्वं झर्झरं स्थापयेत्ततः । घूमसीन्तु द्रवीभूतां प्रक्षिपेज्झर्झरोपरि ।। १२८ ।। पतन्ति विन्दवस्तस्मात्तान्सुपक्वान्समुद्धरेत् । सितापाकेन संयोज्य कुर्याद्बिस्तेन मोदकान् ।। १२९ ।। लघुर्ग्राही त्रिदोषघ्नः स्वादुः शीतो रुचिप्रदः । चक्षुष्यो ज्वरहृद्बल्यस्तर्पणो मुद्गमोदकः ।। १३० ।। बूँदी के लड्डू बनाने की विधि—मूँग की धुंवास को साफ जल में गाढ़ा-गाढ़ा घोल कर खूब फेंट डाले, फिर कढ़ाई में ज्यादा घी रखकर उसे आग पर चढ़ा दे और कढ़ाई के ऊपर झरनी रखकर उस पर पूर्वोक्त घोले हुये धुआंस को धीरे-धीरे डाले तो जो बूँद के समान कढ़ाई में गिरे उन सबों को सिक जाने पर निकाल-निकाल कर चीनी की चासनी में भिगोता जाय, बाद को सबों को चासनी में से निकाल कर हाथ से लड्डू बना ले। इसी को बूँदी के लड्डू कहते हैं। बूँदी के लड्डू—लघु, ग्राही, त्रिदोषनाशक, स्वादिष्ट, शीतल, रुचिकारक, नेत्रों के लिये हितकर, ज्वरनाशक, बलकारक तथा तृप्तिदायक होते हैं। [१२७-१३०] ❖ “झर्झरं झर्झरा” वेति लोके ।। १२७-१२० ।। यहाँ पर मूल में झझर या झर्झरा से लोकप्रसिद्ध झरनी का बोध करना चाहिये । [१२७-१३०] अथ्र वेसनमोदकाः (मोतीचूर के लड्डू) । तेषां साधनं गुणाँश्चाह एवमेव प्रकारेण कार्या वेसनमोदकाः ।। १३१ ।। ते बल्या लघवः शीताः किञ्चिद्वातकरास्तथा । विष्टम्भिनो ज्वरघ्नाश्च पित्तरक्तकफापहाः ।।

८८८ भावप्रकाशनिघण्टुः मोतीचूर के लड्डू बनाने की विधि—इसी प्रकार से अर्थात् उपर्युक्त बूँदी के समान बेसन के भी लड्डू बनाने चाहिये। बेसन के लड्डू—बलकारक, लघु, शीतल, किञ्चिद् वायु उत्पन्न करने वाले, विष्टम्भकारक, ज्वरनाशक तथा पित्त, रक्तविकार और कफ को दूर करने वाले होते हैं। [१३१] अथ दुग्धकूपिका। तस्याः साधनं गुणाँश्चाह तण्डुलचूर्णविमिश्रितनटक्षीरेण सान्द्रपिष्टेन। दृढकूपिकां विदध्यात्ताञ्च पचेत्सर्पिषासम्यक् ।।१३२।। अथ तां कोरितमध्यां घनपयसा पूर्णगर्भाञ्च। सट्टकमुद्रितवदनां तप्तघृते सुपक्ववदनाञ्च ।।१३३।। अथ पाण्डुखण्डपाके स्नपयेत्कर्पूरवासिते कुशलः। अथ दुग्धकूपिका सा बल्या पित्तानिलापहाचैव ।।१३४।। वृष्या शीता गुर्वी शुक्रकरी च तर्पणी रुच्या। विदधाति कायपुष्टिं दृष्टिं दूरप्रसारिणीं सुचिरम् ।।१३५।। दुग्धकूपिका बनाने की विधि—चावलों के चूर्ण में छेना (दूध को खटाई आदि डाल कर फाड़ देने से जो घन भाग अलग हो जाता है उसे छेना कहते हैं) मिलाकर खूब मर्दन करे, तत्पश्चात् उसकी मजबूत कुप्पी बना ले और उसे घी में पका ले, उसके बाद कूपी के मध्य भाग में छेद करके गाढे दूध से उसे भर दे, पश्चात् पूर्वोक्त सट्टक से उसका मुख दृढ़ता से बन्द कर दे, पश्चात् पुनः घी में पका दे, जब उसका मुख सिक जाय तब कर्पूर से सुवासित सफेद चीनी की चाशनी में उसे भिंगो दे। इसी को पाकशास्त्र में कुशल लोग—दुग्धकूपिका कहते हैं। दुग्धकूपिका—बलकारक, पित्त तथा वायु को नष्ट करनेवाली, वृष्य, शीतल, गुरु, शुक्रजनक, तृप्तिकारक, रुचिजनक एवम्—शरीर की पुष्टि तथा चिरकाल तक दूर तक देखने की शक्ति को करने वाली होती है। [१३३-१३६] अथ कुण्डलिनी ("जलेबी" इति लोके)। तस्याः साधनं गुणाँश्चाह नूतनं घटमानीय तस्यान्तः कुशलो जनः। प्रस्थार्द्धपरिमाणेन दध्नाऽम्लेन प्रलेपयेत् ।। १३७।। द्विअस्थां समितां तत्र दध्यम्ल प्रस्थसम्मितम्। घृतमर्द्धशरावञ्च घोलयित्वा घटे क्षिपेत् ।। १३८ ।। आतपे स्थापयेत्तावद् यावद्याति तदम्लताम्। ततस्तत्प्रक्षिपेत्पात्रे सच्छिद्रे भाजने तु तत् ।। १३९।। परिभ्राम्य परिभ्राम्य सुसन्तप्ते घृते क्षिपेत्। पुनःपुनःस्तदावृत्त्या विदध्यान्मण्डलाकृतिम् ।। १४० ।। तां सुपक्वां घृतान्नीत्वा सितापाके तनुद्रवे। कर्पूरादिसुगन्ध्ये च स्नापयित्वोद्धरेत्ततः ।। १४१ ।। एषा कुण्डलिनी नाम्ना पुष्टिकान्तिबलप्रदा। धातुवृद्धिकरी वृष्या रुच्या चेन्द्रियतर्पणी ।। १४२ ।। जलेबी बनाने की विधि—पाकविद्या में जो निपुण हो, वह एक नवीन घड़ा लेकर उसके अन्दर आधा प्रस्थ (३२ रुपये भर) खट्टा दही लेकर उससे चारों तरफ लेप कर दे, उसके बाद २ प्रस्थ (१२८ रुपये भर अर्थात् १ सेर ९ छटाक ३ भर) मैदा, १ प्रस्थ (६ छटाक २) भर खट्टा दही, आधा शराव (३ छटाक १ भर) घी, इन सबों को खूब घोल कर उक्त घड़े में रख कर धूप में जब तक उक्त पदार्थ खट्टे न हो जायँ तब तक रहने दे। खट्टे हो जाने के बाद घड़े में से निकाल कर उक्त पदार्थों को जिसमें एक छिद्र कनिष्ठिका अंगुली जाने लायक से कुछ छोटा हो, उस पात्र में रखकर खौलते हुए घी की कढ़ाई में पात्र को घुमा-घुमा कर मण्डलाकार एक मण्डल के भीतर दूसरा मण्डल इस भांति से जैसा छोटा या बड़ा बनाना हो, वैसा मण्डल बना ले और जब वह पक जाय तब निकाल कर पतली चीनी की चाशनी में डुबो दे और ऊपर से कपूर आदि सुगन्धित पदार्थों का चूर्ण बुरका दे, तत्पश्चात् धीरे से निकाल कर अलग पात्र में रख दे, इसी को जलेबी कहते हैं ।। जलेबी—पुष्टि, कान्ति तथा बल को देने वाली, धातुवर्धक, वीर्यवर्धक, रुचिकारक तथा इन्द्रिय अर्थात् रसनेन्द्रिय को तृप्त करने वाली होती है। [१३७-१४२] CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

कृतान्नवर्गः ८८९ अथ पश्चात् परिवेष्याणि । तत्र रसाला (श्रीखण्ड) । तस्याः साधनं सेवनार्हजनान् गुणांश्चाह आदौ माहिषमम्लमम्बुरहितं दध्याढकं शर्करां शुभ्रां प्रस्थयुगोन्मितां शुचिपटे किञ्चिच्च किञ्चित्क्षिपेत् । दुग्धेनार्द्धघटेन मृण्मयनवस्थाल्यां दृढं स्त्रावयेदेलाबीजलवङ्गचन्द्रमरिचैर्योर्ग्यैश्च तद्योजयेत् ।। १४३ ।। भीमेन प्रियभोजनेन रचिता नाम्ना रसाला स्वयं श्रीकृष्णेन पुरा पुनः पुनरियं प्रीत्या समास्वादिता । एषा येन वसन्तवर्जितदिने संसेव्यते नित्यशस्तस्य स्यादतिवीर्यवृद्धिरनिशं सर्वेन्द्रियाणां बलम् ।। १४४ ।। ग्रीष्मे तथाशरदि ये रविशोषिताङ्गा ये च प्रमत्तवनितासुरतातिखिन्नाः । ये चापि मार्गपरिसर्पणशीर्णगात्रास्तेषामियं वपुषि पोषणमाशु कुर्यात् ।। १४५ ।। रसाला शुक्ला बल्या रोचनी वातपित्तजित् ।। १४६ ।। दीपनी बृंहणी स्निग्धा मधुरा शिशिरा सरा । रक्तपित्तं तृषां दाहं प्रतिश्यायं विनाशयेत् ।। १४७ ।। भोजन के पश्चात् परोसने योग्य पदार्थों में प्रथम श्रीखण्ड बनाने की विधि कहते हैं- प्रथम भैंस का जल रहित खट्टा दही १ आढक (३ सेर ३ छटाक १ भर), सफेद शक्कर का बूरा २ प्रस्थ (१ सेर ९ छटाक ३ भर) और आधा घट (२ आढक अर्थात् ५ सेर २ भर) दूध लेकर इन सबको एक साफ कपड़े पर धीरे-धीरे डाल कर खूब मसल कर के नीचे एक मिट्टी के पात्र में छान ले, पश्चात् उसमें छोटी इलायची के बीज, लौंग, कपूर, मरिच इत्यादि द्रव्यों का चूर्ण आवश्यकतानुसार डाल दे । इसी को श्रीखण्ड कहते हैं । इसे सर्वप्रथम उत्तम भोजन करने तथा बनाने वाले कुन्ती पुत्र भीम ने बनाया था और इसे स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण ने अत्यन्त स्वादिष्ट होने से बारम्बार लेकर प्रीतिपूर्वक खाया था तथा इसे जो कोई वसन्त ऋतु के अतिरिक्त अन्य ऋतुओं में प्रतिदिन खाता है, उसके वीर्य की अत्यन्त वृद्धि और सम्पूर्ण इन्द्रियों में बल की वृद्धि होती है । एवम् ग्रीष्म तथा शरद् ऋतु में सूर्य की किरणों से जिनके शरीर सूख गये हैं, जो काम मद से मतवाली स्त्रियों के साथ रमण करने से अत्यन्त खिन्न हो गये हैं तथा अत्यन्त मार्ग चलने से जिनके शरीर शिथिल हो गये हैं, उन लोगों के लिये यह श्रीखण्ड तत्काल शरीर की पुष्टि करने वाला होता है। श्रीखण्ड-शुक्रजनन, बलकारक, रोचक, वात तथा पित्तनाशक, अग्निदीपक, बृंहण, स्निग्ध, मधुर, शीतल, सारक एवम् रक्तपित्त, तृषा, दाह और जुकाम को दूर करने वाला होता है । [१४३-१४७] अथ शर्करोदकम् (सरबत) । तस्य साधनं गुणांश्चाह जलेन शीतलेनैव घोलिता शुभ्रशर्करा । एलालवङ्गकर्पूरमरिचैश्च समन्विता ।। १४८ ।। शर्करोदकनाम्ना तत्प्रसिद्धं विदुषां मुखैः । शर्करोदकमाख्यातं शुक्लं शिशिरं सरम् ।। १४९ ।। बल्यं रुच्यं लघु स्वादु वातपित्तप्रणाशनम् । मूर्च्छाच्छर्दितृषादाहज्वरशान्तिकरं परम् ।। १५० ।। शर्बत बनाने की विधि-सफेद चीनी को शीतल जल में घोलकर उसमें इलायची, लौंग, कपूर तथा मरिच पीस कर डाल दे, पश्चात् छान कर पीवे, इसी को पण्डित लोग शर्बत कहते हैं । शर्बत-शुक्रजनक, शीतल, सारक, बलकारक, रोचक, लघु, स्वादिष्ट, वात तथा पित्तनाशक एवम्-मूर्च्छा, वमन, प्यास, दाह तथा ज्वर को अत्यन्त शान्त करने वाला होता है । [१४८-१५०] अथ प्रपाणकानि (सरबत) । तत्रास्रफलप्रपाणकम् । तस्य साधनं गुणांश्चाह आम्राममं जले स्विन्नं मर्दितं दृढपाणिना । सिताशीताम्बुसंयुक्तं कर्पूरमरिचान्वितम् ।। १५१ ।। प्रपाणकमिदं श्रेष्ठं भीमसेनेन निर्मितम् । सद्यो रुचिकरं बल्यं शीघ्रमिन्द्रियतर्पणम् ।। १५२ ।।

८९० भावप्रकाशनिघण्टुः प्रपाणक अर्थात् सरबत अथवा पना में प्रथम आम का पना बनाने की विधि-कच्चा आम जल में उबाल कर हाथ से मसलकर उसका रस निकाल ले और उसमें सफेद चीनी, शीतल जल मात्रानुसार डाल कर पुनः कपूर तथा मरिच का चूर्ण मिला दे। इसी को आम का पना कहते हैं, यह उत्तम होता है। इसे भीमसेन ने सर्वप्रथम बनाया था। यह पीने से तत्काल ही रुचि को बढ़ाने वाला, बलकारक तथा शीघ्र इन्द्रियों को तृप्त करने वाला होता है। [१५१-१५२] अथाम्लिकाफलपानकम्। तस्य साधनं गुणाँश्चाह अम्लिकायाः फलं पक्वं मर्दितं वारिणा दृढम्। शर्करामरिचैर्मिश्रं लवङ्गेन्दुसुवासितम् ।।१५३।। · अम्लिकाफलसम्भूतं पानकं वातनाशनम्। पित्तश्लेष्मकरं किञ्चित्सुरुच्यं वह्निबोधनम् ।।१५४।। इमली का पना बनाने की विधि-इमली के पके फलों को प्रथम जल में भिगो दे, तत्पश्चात् हाथ से खूब मसल कर छानकर उसमें साफ शक्कर, मरिच, लवङ्ग तथा कपूर का चूर्ण मिला दे। इमली का पना-वातनाशक एवम् किञ्चित् पित्त तथा कफकारक, अत्यन्त रोचक और जठराग्नि को उद्दीप्त करने वाला होता है। [१५३-१५४] अथ निम्बुकफलपानकम्। तस्य साधनं गुणाँश्चाह भागैकं निम्बुजं तोयं षड्भागं शर्करोदकम्। लवङ्गमरिचैर्मिश्रं पानं पानकमुत्तमम् ।।१५५।। निम्बूकफलभवं पानमत्यम्लं वातनाशनम्। वह्निदीप्तिकरं रुच्यं समस्ताहार पाचकम् ।।१५६।। नीम्बू का पानक बनाने की विधि-निम्बू का रस १ भाग, चीनी का शर्बत ६ भाग, इन दोनों को एकत्र कर उसमें लवङ्ग तथा मरिच मात्रानुसार मिला देने से पीने योग्य उत्तम पानक तैयार होता है। निम्बू का पानक-अत्यन्त अम्ल रसयुक्त, वातनाशक, अग्नि को प्रदीप्त करने पाला, रोचक तथा सभी प्रकार के आहार को पचाने वाला होता है। [१५५- १५६] अथ धान्याकपानकम्। तस्य साधनं गुणाँश्चाह शिलायां साधु सम्पिष्टं धान्याकं वस्त्रगालितम्। शर्करोदकसंयुक्तं कर्पूरादिसुसंस्कृतम्। नूतने मृण्मये पात्रे स्थितं पित्तहरं परम् ।।१५७।। धनियें का पानक बनाने की विधि तथा गुण-धनिये को प्रथम सिल पर भली भाँति पीस कर वस्त्र से छान ले, पश्चात् उसमें मात्रानुसार चीनी का शर्बत मिलाकर तथा कपूर आदि सुगन्धित द्रव्यों से सुगन्धित करके नवीन मिट्टी के पात्र में रख दे, पश्चात् इच्छानुसार पीने से यह पित्त को अत्यन्त नष्ट करता है। [१५७] अथ काञ्जी तस्यागुणानाह काञ्जिकं रोचनं रुच्यं पाचनं वह्निदीपनम् ।।१५८।। शूलाजीर्णविबन्धघ्नं कोष्ठशुद्धिकरं परम्। न भवेत्काञ्जिकं यत्र तत्र जालिः प्रदीयते ।।१५९।। काञ्जी-रोचक तथा स्वयं रुचने वाली, पाचक, अग्निदीपक एवम् शूल, अजीर्ण तथा विबन्ध (मलबन्ध) को नष्ट करने वाली एवम् कोष्ठ को अत्यन्त शुद्ध रखने वाली होती है। यदि काञ्जी न मिले तो उसके अभाव में निम्नलिखित जाली का प्रयोग करना चाहिये। ❖ काञ्जीविधिर्वटकावसरे लिखितः ।।१५८-१५९।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA

कृतान्नवर्गः ८९१ यहाँ पर यह और भी समझ लेना चाहिये कि—काञ्जी बनाने की विधि पूर्व में वटक बनाने की विधि में कह आये हैं अतः पुनः उल्लेख नहीं किया गया। [१५८-१५९] अथ जालिः । तस्य साधनं गुणाँश्चाह आममाम्र फलं पिष्टं राजिकालवणान्वितम्। भृष्टहिङ्गुयुतं पूतं घोलितं जालिरुच्यते ।।१६०।। जालिर्हरति जिह्वायाः कुण्ठत्वं कण्ठशोधिनी। मन्दं मन्दन्तु पीता सा रोचनी वह्निबोधिनी ।।१६१।। जाली बनाने की विधि—आम के कच्चे फल को पीसकर उसमें मात्रानुसार राई तथा सेंधा नमक मिलाकर घोल ले, पश्चात् छान कर उसमें भुने हुए हींग का चूर्ण मिला दे। इसी को जाली कहते हैं। सहजाली—जीभ की जड़ता को दूर करने वाली तथा कण्ठ को शुद्ध करने वाली होती है। एवम् यदि इसे धीरे- धीरे पिया जाय तो यह रोचक तथा अग्नि को बढ़ाने वाली होती है। [१६०-१६१] अथ तक्रम् (छाछ)। तस्य साधनं गुणाँश्चाह तुर्यांशेन जलेन संयुतमतिस्थूलं सदम्लं दधि प्रायोमाहिषमम्बरेण विमले मृद्भाजने गालयेत्। भृष्टं हिङ्गुच जीरकञ्चलवणं राजीञ्च किञ्चिन्मितां पिष्टां तत्र विमिश्रयेद्भवति तत्तक्रं न कस्य प्रियम् ।।१६२।। तक्रं रुचिकरं वह्निदीपनं पाचनं परम्। उदरे ये गदास्तेषां नाशनं तृप्तिकारकम् ।।१६३।। छाछ बनाने की विधि—प्रायः करके अत्यन्त गाढ़ा तथा खट्टा भैंस का दही लेकर उसमें चतुर्थांश जल मिला कर मथ डाले, तत्पश्चात् वस्त्र से स्वच्छ मिट्टी के पात्र में छान ले और उसमें मात्रानुसार भुनी हुई हींग, भुना हुआ जीरा, सेंधा नमक, इन सबका चूर्ण तथा थोड़ी मात्रा में राई पीसकर मिला देने से छाछ तैयार हो जाता है, जो किसको प्रिय नहीं लगता है अर्थात् सभी लोग इसे रुचि से पीते हैं। छाछ—रुचिकारक, अग्निदीपक, अत्यन्त पाचक एवम् उदरसम्बन्धी जितने रोग हैं सभी को नष्ट करने वाला तथा तृप्ति देने वाला होता है। [१६३] अथ दुग्धम् (दूध) । तस्य भोजनान्ते पानगुणानाह विदाहीन्यन्नपानानि यानि भुङ्क्ते हि मानवः। तद्विदाहप्रशान्त्यर्थं भोजनान्ते पयः पिबेत् ।।१६४।। भोजन के अन्त में दूध पीने के गुण—यदि मनुष्य भोजन में विदाही (दाहकारक) अन्न पानादि का प्रयोग करे तो उसे उचित है कि उससे उत्पन्न होने वाले दाह की शान्ति के लिये भोजन के अन्त में दुग्धपान अवश्य करे। [१६४] दुग्धस्यापरे गुणा उक्ता एव दुग्धवर्गे ।।१६४।। यहाँ पर यह भी समझना चाहिये कि इसके अतिरिक्त दुग्ध के अन्य जो गुण हैं, वे आगे दुग्धवर्ग में कहे जायेंगे। अतः यहाँ उनका उल्लेख नहीं किया गया। [१६४] अथ सक्तवः (सत्तू) । तस्य साधनविधिमाह धान्यानि भ्राष्ट्रभृष्टानि यन्त्रपिष्टानि सक्तवः ।।१६५।। सत्तू बनाने की विधि—भाड़ में भूजे हुये चावल जौ आदि धान्यों को यदि चक्की में पीस दिया जाय तो वे सत्तू कहलाते हैं। [१६५] CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA