भारतकोश
संग्रह पर लौटें

भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)

Bhavaprakasha Nighantu with Hindi Commentary

भावमिश्र द्वारा

स्रोत: चौखम्बा भारती अकादमी · चौखम्बा भारती अकादमी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished143 पृष्ठ

१४ \ भावप्रकाशनिघण्टुः हरितक्यादिवर्गः १५ के कारण होने वाले उदरशूल, हृत्शूल में लाभ होता है। इसके सेवन से पाचन क्रिया ठीक होकर उदर में वायु का सञ्चय नहीं होता। जीर्णे सन्धिवात में विशेषतः वृद्धों में इसके फांट का नित्य रात में प्रयोग लाभकारी होता है। यह उष्ण एवं वातहर होने से किसी भी प्रकार की पीड़ा में लाभकारी है। गरम जल में सोंठ के चूर्ण का लेपः शिरःशूल, वातनाड़ीशूल, एवं दन्तशूल में उपयोगी है। पसीना अधिक होकर हाथ और पैरों में शीत आने पर इसके चूर्ण को रगड़ने से रक्ताभिसरण की क्रिया ठीक होकर शीत दूर होता है। यह कफघ्न होने के कारण इसका प्रयोग श्वास, कास, प्रतिश्याय, गले के रोग, स्वरभङ्ग इत्यादि में किया जाता है। इसके लिये इसका फांट बना कर लेना चाहिये। आमदोष दूर करने के लिये सोंठ के चूर्ण को घी के साथ रेंड़ के पत्तों में लपेट कर अग्नि में पुटपाक करना चाहिये और फिर इस चूर्ण को मिश्री के साथ सुबह लेना चाहिये। इससे आमातिसारजन्य शूल दूर होता है। गुड़ के साथ सोंठ का उपयोग अर्श, अजीर्ण, अतिसार, गुल्म, शोथ, प्रमेह, कामला आदि में किया जाता है। बल्य औषधियों के साथ सोंठ का उपयोग क्षतक्षीण एवं दुर्बल रोगियों के लिये उपयोगी है। विरेचक औषधियों के साथ सोंठ लेने से हल्लास, पेट में मरोड़ या ऐंठन नहीं होती। मात्रा—चूर्ण २ से ८ रत्ती।

अथार्द्रकस्य नामानि गुणाँश्चाह आर्द्रकं शृङ्गवेरं स्यात्कटुभद्रं तथाऽऽर्दिका । आर्दिका भेदनी गुर्वी तीक्ष्णोष्णा दीपनी मता ॥ कटुका मधुरा पाके रूक्षा वातकफापहा । ये गुणाः कथिताः शुण्ठ्यास्तेऽपि सन्त्यार्द्रकेऽखिलाः ॥ ५० ॥ भोजनाग्रे सदा पथ्यं लवणाद्रकभक्षणम् । अग्निसन्दीपनं रुच्यं जिह्वाकण्ठविशोधनम्॥५१॥ कुष्ठपाण्ड्वामये कृच्छ्रे रक्तपित्ते व्रणे ज्वरे । दाहे निदाघशरदोर्नैव पूजितमार्द्रकम् ॥ ५२ ॥ अदरख के नाम तथा गुण—आर्द्रक, शृङ्गवेर, कटुभद्र और आर्द्रिका ये संस्कृत नाम अदरख के हैं। अदरख—मल को भेदन करने वाली, पाक में गुरु, तीक्ष्ण, उष्णवीर्य, अग्निदीपक, कटु- रसयुक्त, विपाक में मधुर रसयुक्त, रूक्ष, वात तथा कफ को नष्ट करने वाली होती है और जितने गुण पूर्व में सोंठ के कह आये हैं, सभी गुण अदरख में भी रहते हैं और भोजन करने के प्रथम सर्वदा सेंधा नमक के साथ अदरख खाना हितकारी होता है। क्योंकि यह अग्नि को दीप्त करने वाला, रुचिकारक, जिह्वा तथा कण्ठ का शोधन करने वाला होता है। कुष्ठ, पाण्डुरोग, मूत्रकृच्छ्र, रक्तपित्त, व्रण, ज्वर, दाह इन रोगों में एवं ग्रीष्म तथा शरद ऋतुओं में अदरख खाना हितकर नहीं है ॥ ४९–५२ ॥

५ अदरख हि०-अदरख, आदी । ब०-आदा । प०-अदरक, अद, अद्रक, आंदा । म०-आले । ते०-अल्ल, अल्लम् । ब्राह्मी०-स्येन, सेङ्ग, गिनसिन । गु०-आदु । क०-अल्ल, असिशोंठि, हसीसुण्ठीं । मा०-आदो । ता०-शुक्क, इंडि । मल०-इञ्ची । सिंहली-अमुद्दहुरु । फा०-अञ्जीबीले तर । अ०-जंजबीले रतव । अं०-Ginger root (जिञ्जर रूट) । लै०-Zingiber officinale (जिंजिबेर ऑफिसिनेल्)। भारतवर्ष के प्रायः सब प्रान्तों में अदरख की खेती की जाती है। अदरख का पौधा प्रायः एक हाथ ऊँचा होता है। इसके पत्ते बांस के पत्तों के समान पर उनसे कुछ छोटे होते हैं। इसकी जड़ में जो कन्द होता है, उसीको अदरख कहते हैं। इसका फूल, फल-


बहुत कम देखने में आता है। किसी २ पुराने पौधे पर फूल आते हैं। फूलों का रङ्ग जामुनी रङ्ग का होता है। अदरख रेतीली भूमि में गोबर की खाद डाली हुई दुमट मिट्टी में अधिक उत्पन्न होती है। इसके लिये पर्याप्त वर्षा की आवश्यकता रहती है। गुण और प्रयोग—आर्द्रक के रस का उपयोग शहद के साथ विशेष कर श्वास, कास आदि कफ रोगों में अनुपान के लिये किया जाता है। भोजन के पूर्व सेंधानमक और आदी के सेवन से भूख बढ़ती है, जिह्वा एवं कण्ठ की शुद्धि होकर अन्न में रुचि भी बढ़ती है। आर्द्रक रस और प्याज का रस १, १ तोला लेने से उल्टी और जी मिचलाना दूर होता है। मलबार में जलोदर रोग में इसका रस, तीव्र मूत्रनिःसारक रूप में दिया जाता है। इसकी मात्रा धीरे २ बढ़ाई जाती है जिससे मूत्र की मात्रा भी बढ़ती जाती है। लेकिन पुराने हृदय रोग एवम् वृक्कविकार (ब्राइट्स् डिसीज) में यह हानिकर है। गुड़ के साथ इसका रस शीतपित्त में उपयोगी है। आदी का रस गुनगुना गरम करके कान में डालने से कर्णशूल दूर होता है। मात्रा—स्वरस १-२ चम्मच ।

अथ पिप्पल्या नामानि गुणाँश्चाह पिप्पली मागधी कृष्णा वैदेही चपला कणा । उपकुल्योष्णा शौण्डी कोला स्यात्तीक्ष्णतण्डुला। पिप्पली दीपनी वृष्या स्वादुपोका रसायनी । अनुष्णा कटुका स्निग्धा वातश्लेष्महरी लघुः ॥ पिप्पली रेचनी हन्ति श्वासकासोदरज्वरान् । कुष्ठप्रमेहगुल्मार्शः प्लीहशूलाममाहतान् ॥५५॥ आर्द्रा कफप्रदा स्निग्धा शीतला मधुरा गुरुः । पित्तप्रशमनी सा तु शुष्का पित्तप्रकोपिणी ॥५६॥ पिप्पली मधुसंयुक्ता मेदःकफविनाशिनी । श्वासकासज्वरहरी वृष्या मेध्याऽग्निवर्द्धिनी ॥५७॥ जीर्णज्वरेऽग्निमान्द्ये च शस्यते गुडपिप्पली । कासाजीर्णारुचिश्व्वासहृत्पाण्डुकृमिरोगनुत्॥५८॥ द्विगुणः पिप्पलीचूर्णाद् गुडोऽत्र भिषजां मतः ॥ ५८ ॥ पीपर के नाम तथा गुण—पिप्पली, मागधी, कृष्णा, वैदेही, चपला, कणा, उपकुल्या, ऊषणा, शौण्डी, कोला और तीक्ष्णतण्डुला ये सब संस्कृत नाम पीपर के हैं। पीपर-अग्निदीपक, वृष्य, पाक में मधुर रसयुक्त, रसायन, अनुष्ण (थोड़ी उष्ण), कटुरसयुक्त, स्निग्ध, वात तथा कफ नाशक, लघु- पाकी और रेचक (दस्तावर) है। यह—श्वास, कास, उदररोग, ज्वर, कुष्ठ, प्रमेह, गुल्म, बवासीर, प्लीहा, शूल और आमवातनाशक है। कच्ची पीपर-कफकारी, स्निग्ध, शीतल, मधुर, गुरु और पित्त को शान्त करने वाली है। किन्तु सूखी पीपर-पित्त को कुपित करने वाली है। मधु (शहद) से युक्त पीपर-मेद, कफ, श्वास, कास और ज्वर का नाश करने वाली होती है एवं वृष्य, मेधा (धारणाशक्ति) के लिये हितकारी और अग्निवर्द्धक भी है। गुड़ से युक्त पीपर-जीर्णज्वर और अग्निमान्य में हितकर होती है-एवं-कास, अजीर्ण, अरुचि, श्वास, हृद्रोग, पाण्डुरोग तथा कृमिरोग को दूर करने वाली भी होती है। यहां पर अर्थात् पीपर के साथ गुड़ मिलाने में पीपर के चूर्ण के तोल से दूना गुड़ मिलाना चाहिए ऐसा वैद्यों का मत है ॥ ५३–५८ ॥

६ पीपल हि०-पीपर, पीपल । ब०-पीपुल, पिपुल । म०-पिंपळी । गु०-पीपर, लींडी पीपर, लिंडी पीपल । क०-हिप्पली । ते०-पिप्पल्लु, पिप्पलि, पिप्पलु चेट्टु । ता०-तिप्पिली । तु०-श्चप्पली । मला०-तिप्पली । ब्राह्मी०-पौखीन । गोम०-हिपली । मा०-पीपल । फा०-पिलपिलं दराज,...

यहाँ दिए गए पृष्ठों का मूल पाठानुसार लिप्यंतरण प्रस्तुत है:

१६ | भावप्रकाश निघण्टुः फिल्फिल् दराज़, पीपल दराज़ । अ०-दारफिल्फिल्, डाल फिल्फिल् । अं०-Long pepper (लॉग पीपर ); Dried catkins (ड्राइड कॅटक़िन्स) । ले०-Piper longum Linn. (पाइपर लाँगस) । Chavica roxburghii (चविका रॉक्सवर्घाई) । Fam. Piperaceae (पाइपरेसी) । पीपल - इस देश से गरम प्रान्तों में पूर्व नेपाल से आसाम, खासिया के पहाड़ों पर, बंगाल में, पश्चिम की ओर बम्बई तक तथा दक्षिण की ओर त्रावनकोर तक पायी जाती है। सीलोन, मलाका तथा फिलीपाइन द्वीपों में भी यह पाई जाती है। पीपल लता जाति की वनौषधि का फल है। इसकी बेल-अन्य लताओं की भाँति अधिक विस्तार में नहीं बढ़ती किन्तु थोड़ी ही दूरी में फैलती है। जड़-कुछ मोटी और खड़ी सी होती है। उससे शाखायें निकल कर भूमि पर फैलती हैं। पत्ते-२॥-३॥ इञ्च के घेरे में, गोलाकार, पान के पत्तों के आकार वाले कोमल होते हैं। ऊपर के पत्ते विनाल होते हैं। फलगुच्छ-१-१॥ इञ्च लम्बे और कृष्णाभ होते हैं जिनमें अत्यन्त छोटे-छोटे फल लगे रहते हैं। एक दूसरी जाति की पीपल को पहाड़ी पीपल कहते हैं। इसका लेटिन नाम Piper sylvati- cum Roxb. (पीपर सिलवेटिकम्) है। यह आसाम और बंगाल में अधिक उत्पन्न होती है। इसकी लता कई फीट तक बढ़ जाती है और सूखने पर आपस में लिपटी हुई मालूम होती है। पत्ते-पान के आकार वाले, उक्त पीपल के पत्तों से किञ्चित् बड़े होते हैं। फलगुच्छ-पौन से १॥ इञ्च लम्बे गोल होते हैं। इसको बङ्गाल के कविराज अधिक व्यवहार में लाते हैं। पीपल छोटी और बड़ी-इन भेदों से दो प्रकार की होती है। इनमें छोटी अधिक गुणकारी समझी जाती है। रासायनिक संगठन-इसमें १% उड़न शील तैल रहता है जिसमें से करीब ५-६४% पाइप- रीन, पाइपरीडीन एवं एक कडु राल (चविसीन), स्टार्च और स्नेह आदि द्रव्य रहते हैं। गुण और प्रयोग-पीपल रसायन, सुगन्धि, दीपक, पाचक, उष्ण, वातहर और कफघ्न है। इसका उपयोग आनाह, अपचन, अग्निमान्द्य, उदरशूल, कास, श्वास, जीर्णज्वर, प्रसूतिज्वर, आमवात, गृध्रसी, कटिशूल, वातरक्त, अङ्गघात आदि रोगों में किया जाता है। (१) मधु के साथ इसका चूर्ण नये या पुराने कास, श्वास, स्वरभङ्ग तथा हिचकी में उपयोगी है। (२) प्रसूतिज्वर में गर्भाशय शुद्धि के लिए इसका मधु के साथ अच्छा उपयोग होता है। (३) वर्धमान पिप्पली का उपयोग रसायन के लिए एवं अधोशाखाघात, पुरानी खांसी, दमा, यक्ष्मा, प्लीहावृद्धि, उदर, अर्श आदि रोगों में बहुत लाभदायी है। इसके लिए प्रथम दिन ३ पीपल का फांट मधु अथवा शर्करा के साथ दिया जाता है फिर नित्य ३ पीपल बढ़ाई जाती है। इस प्रकार दसवें दिन ३० पीपल का फांट दिया जाता है। फिर इसी प्रकार ३ पीपल नित्य कम की जाती है। कुछ लोग आधा दूध और आधा जल में उबालकर दूध शेष रहने पर उसी पीपल को खिलाकर ऊपर से वही दूध पिलाते हैं। इसके अतिरिक्त इसके चूर्ण को घृत और मधु के साथ उपयोग किया जा सकता है। (४) पीपल चौसठ प्रहर घोट कर उपयोग करने से जीर्ण ज्वर में विशेष लाभदायी होती है। (५) सोंठ एवं पीपल से सिद्ध तैल की मालिश गृध्रसी, कटिशूल तथा अधोशाखाघात में उपयोगी है। (६) त्रिकटु और सहिजन के बीज को अगस्तिमूल के रस से घोटकर उसका नस्य देने से बेहोशी, मूर्च्छा आदि दूर होती है। मात्रा-चूर्ण २-४ र० । दर्पनाशक-जहेशक, बबूल का गोंद और इसबगोल ।


हरीतक्यादिवर्गः । १७ अथ मरीचस्य नामानि गुणाँश्चाह मरिचं वेल्लजं कृष्णमूषणं धर्मपत्तनम् ॥ ५९ ॥ मरिचं कटुकं तीक्ष्णं दीपनं कफवातजित् । उष्णं पित्तकरं रुच्यं श्वासशूलकृमीन्हरेत् ॥६०॥ तदार्द्रं मधुरं पाके नात्युष्णं कटुकं गुरु । किञ्चित्तीक्ष्णगुणं श्लेष्मप्रसेकि स्यादपित्तलम् ॥६१॥ मरिच के नाम तथा गुण-मरिच, वेल्लज, कृष्ण, ऊषण और धर्मपत्तन ये मरिच के संस्कृत नाम हैं। मरिच-कटुरस युक्त, तीक्ष्ण, अग्निदीपक, कफ तथा वायु को दूर करने वाला, उष्णवीर्य, पित्तकारक और रूक्ष है एवं श्वास, शूल तथा कृमिरोग को नष्ट करने वाला होता है। यदि यही गीला (कच्चा) हो तो-पाक में मधुर रस युक्त, थोड़ा उष्णवीर्य, कटुरस युक्त, पाक में गुरु, थोड़ा तीक्ष्ण गुण से युक्त, कफ को गिराने वाला और थोड़ा पित्तकारक होता है ॥ ५९-६१ ॥ ७ मरिच हि०-मरिच, मिरच, गोल मरिच, काली मरिच, दक्षिणी मरिच, गोल मिर्च, चोखा मिरच । बं०-मरिच, गोल मरिच, गोल मिरच, मुरिच, मोरिच । म०-मिरे, काली मिरीं । क०-ओळे- मेणसु । गु०-मरि, मरि तीखा, मरी, कालामरी। ते०-मरिचमु, शव्यमु, मरियल्लु । ता०-मोलहु शेव्वियम् । पं०-काली मरिच, गोल मिरिच । मा०-काली मरिच । मोटिया०-स्पोट । काश्मी०-मर्ज। सिन्धी०-गुलमिरियूँ । मला० - ल्हु, कुरु मुलक, कुरु मिलगु । अफ०-दारगर्म । फा०-पिलपिले असवद, फिल्फिल असवद, स्याह गिर्द, हलपिला गिर्द, फिल्फिल् स्याह् । अ०-फ़िल्फ़िले अवीद, फिल्फिल् गिर्द, फिल् फिल्स्तोदाय, पिल्पिले गिर्द । अं० - Black pepper (ब्लॅक पेपर) । ले०-Piper nigrum, Linn. (पाइपर नाइग्रम् लिन.) । Fam. Piperaceae (पाइपरेसी) । दक्षिण कोंकण, आसाम, मलाबार तथा मलाया और स्याम इसका उत्पत्ति स्थान है। दक्षिण भारत के उष्ण और आर्द्र भागों में त्रिवांकूर, मलाबार आदि खादर तथा गीली जमीन में यह अधिकता से उत्पन्न होती है। कच्छार, सिलहूट, दार्जिलिंग, सहारनपुर और देहरादून के पास भी इसकी खेती की जाती है। वर्षा ऋतु में इसकी लता को पान के बेल के समान छोटे छोटे टुकड़े कर बड़े बड़े वृक्षों की जड़ में गाड़ देते हैं। ये लता रूप से बढ़ कर वृक्षों का सहारा पाने से उनके ऊपर चढ़ जाती हैं। पत्ते ५-७ इञ्च लम्बे तथा २-५ इञ्च चौड़े, गोलाकार, नुकीले तथा पान के पत्तों के आकार के होते हैं। फल-गुच्छों में लगते हैं। कच्ची अवस्था में फल हरे रङ्ग के होते हैं। उस अवस्था में चरपराहट कम होती है। जब पकने पर आते हैं तब उनका रङ्ग नारंग लाल हो जाता है। उसी समय तोड़ कर सुखा लेते हैं। सूखने पर काले रङ्ग के हो जाते हैं। पूरे पक जाने पर तोड़ने से चरपराहट कम हो जाती है। पूर्वी मरीच की अपेक्षा दक्षिणी मरिच अधिक गुणदायक है। दक्षिणी मरिच ऊपर से भूरी तथा भीतर से हरियाली युक्त सफेद होती है। यह अधिक तीक्ष्ण होती है। पूर्वी मरिच ऊपर से अधिक काली और भीतर सफेद होती हैं। अधिक पके फलों को जब वे पीले हो जाते हैं तब तोड़कर पानी में फुला कर छिलके दूर करके सुखा लेते हैं। उसी को सफेद मरिच कहते हैं। मरिच के ऊपरी छिलके में कटु द्रव्य अधिक रहता है इसलिये सफेद मरिच कम कटु रहती है। इस सफेद मरिच को-बं० में 'सादा मरिच', म०-में 'पांढरेमिरे, गु०-में 'धोला मरी', क०-में 'विलेय मेणसु' और ता०-में 'मिलाओ' कहते हैं। २ रासायनिक संगठन-इसमें उड़नशील, जल में न घुलनेवाला, पाइपरीन नामक एक २ भा० नि०

[बायाँ पृष्ठ]

१८ | भावप्रकाशनिघण्टुः ।


रवेदार क्षाराम ५-९%, पाइपरीडीन ५%, चविसीन नामक कटुरस, एक अन्य हरे रंग की कडुराल ६%, उड़नशील तैल १-२.५%, स्टार्च ३०%, ईथर में घुलनशील न उड़ने वाला पदार्थ ६%, प्रोटीड ७% तथा लिगनिन, गोंद आदि कुछ अन्य द्रव्य पाये जाते हैं। **गुण और प्रयोग—**मरिच का प्रयोग अनेक योगों में किया जाता है। यह सुगन्धि, उत्तेजक, पाचक, अग्निदीपक, रुचिकर, स्वेदकर, कफघ्न एवं कृमिहर है। इसका उत्तेजक प्रभाव आंत्र एवं मूत्र संस्थान की श्लेष्मल कला पर पड़ता है। इसके सेवन से मूत्र की मात्रा बढ़ती है और इसका उपयोग पुराने सुजाक में किया जाता है। इसके सेवन से आमाशयिक रस की वृद्धि होती है और पाचन की क्रिया सुधरती है। घृत के पाचन में यह विशेष उपयोगी है। इसका उपयोग आध्मान, अपचन, प्रवाहिका, आमाशय शैथिल्य आदि में अच्छा होता है। (१) प्रवाहिका में इसके सूक्ष्म चूर्ण को हींग एवं अफीम के साथ दिया जाता है। (२) स्याहजीरा एवं काली मिर्च मधु के साथ नित्य सेवन से गुदा की श्लेष्मकला का संकोच होकर गुदभ्रंश एवं अर्श में बहुत लाभ होता है। (३) इसके पाइपरीन नामक क्षार के ज्वरघ्न गुण के कारण इसका उपयोग मलेरिया में कौनीन के साथ अधिक प्रभावकारी है। (४) विसूचिका के प्रारम्भ में मरिच, अफीम तथा हींग तीनों समान मात्रा में लेकर २ रत्ती की मात्रा में प्रत्येक २ या ४ घण्टे के बाद में देने से लाभ होता है। (५) खांसी में मधु एवं घृत के साथ देने से लाभ होता है। (६) पुराने जुकाम में इसको गुड़ एवं दही के साथ सेवन करना चाहिये। अधिक मात्रा में मरिच के सेवन से उदरशूल, वमन, बस्ति एवं मूत्र मार्ग प्रदाह, उदर्द आदि विकार उत्पन्न होते हैं। **बाह्य प्रयोग—**अनेक चर्म विकारों में एवं वायु के विकारों में किया जाता है। (१) इससे सिद्ध तैल की मालिश आमवात, गठिया, अक्षघात एवं कण्डू, पामा आदि में उपयोगी है। (२) घृत के साथ इसका लेप अर्श के मस्से पर करने से वाताशंशूल एवं शिथिलता दूर होती है। (३) फोड़े, फुन्सियों की आमावस्था में उनको बैठाने के लिए उन पर इसको पीस कर लगाया जाता है। (४) विषैले कीड़ों के काटने पर विनेगार (सिरका) के साथ इसको पीस कर लगाना चाहिये। (५) दही के साथ घिसकर इसके अञ्जन से अनेक नेत्र रोग जैसे रात्र्यंध, कण्डू आदि में लाभ होता है। (६) सर की दद्रु के कारण यदि सर के बाल झड़ गये हों तो इसे प्याज और नमक के साथ लगाने से लाभ होता है। इसी प्रकार इसका लेप शिरःशूल में भी उपयोगी है। (७) इसके क्वाथ से कुल्ला करने से दंतशूल दूर होता है एवं बढ़ी हुई उपजिह्वा में भी लाभ होता है। (८) इसका दंतमंजनों में भी व्यवहार होता है। **मात्रा—**चूर्ण २-४ रत्ती। **श्वेत मरिच—**काली मरिच के समान ही गुण वाली लेकिन उससे कुछ हीन गुण होती है। इसका एक विशेष प्रयोग श्लीपद में शोथ के साथ बार २ ज्वर के आक्रमण को रोकने के लिए किया जाता है। बचनाग एक भाग और सफेद मरीच १५ भाग दूध में भिगोया जाता है। रोज


[दायाँ पृष्ठ]

हरीतक्यादिवर्गः । | १६


दूध बदल दिया जाता है। इस प्रकार ३ दिन करने के बाद आदी के रस में घोंटकर १२० की गोली बनाई जाती है। इसकी १ गोली दिन में ३ बार दी जाती है।

अथ त्रिकटुकनामलक्षणगुणानाह

विश्वोपकुल्या मरिचं त्रयं त्रिकटु कथ्यते। कटुत्रिकं तु त्रिकटु व्यूषणं व्योष उच्यते ॥६२॥ व्यूषणं दीपनं हन्ति श्वासकासत्वगामयान् । गुल्ममेहकफस्थौल्यमेदःश्लीपदपीनसान् ॥ ६३॥ त्रिकटु के लक्षण, नाम तथा गुण—सोंठ, पीपर तथा मरिच इन तीनों के योग को 'त्रिकटु' कहते हैं। कटुत्रिक, त्रिकटु, व्यूषण और व्योष ये संस्कृत नाम 'त्रिकटु' के हैं। त्रिकटु-अग्निदीपक होता है तथा श्वास, कास, चर्मसम्बन्धी रोग, गुल्म, मेह, कफ, स्थूलता, मेद, श्लीपद और पीनस इन सब रोगों को दूर करता है ॥ ६२-६३ ॥

अथ पिप्पलीमूलस्य नामानि गुणाँश्चाह

ग्रन्थिकं पिप्पलीमूलमूषणं चटकांशिरः । दीपनं पिप्पलीमूलं कटूष्णं पाचनं लघु ॥ ६४ ॥ रूक्षं पित्तकरं भेदि कफवातोदरापहम् । आनाहप्लीहगुल्मघ्नं कृमिश्वासक्षयापहम् ॥ ६५ ॥ पिपरामूल के नाम तथा गुण—ग्रन्थिक, पिप्पलीमूल, ऊषण और चटकाशिर ये संस्कृत नाम 'पिपरामूल' के हैं। पिपरामूल-अग्निदीपक, कटुरस वाला, उष्णवीर्य, पाचक, लघु, रूक्ष, पित्तकारक, मल को भेदन करने वाला, कफ, वायु एवम् उदर सम्बन्धी रोगों को दूर करने वाला होता है। तथा आनाह, प्लीहा, गुल्म, कृमि, श्वास और क्षय इन सब रोगों को नष्ट करने वाला होता है ॥ ६४-६५ ॥

८ पिपलामूल

हि०- पीपलामूल, पीपरामूल । ब०- पिपुल मूल । म०- पिंपली मूल, पिंपलमूल, पिंपला मूल । गु०- पीपरी मूलना गंडोडा, पांपली मूल, पीपरी मूल । क०- पिप्पलीयवेरु, हिप्पलीयवेरु, हिप्पली मूल । ते०- मोंडी, पिप्पली वेरु, पिप्ली दुम्प । पं०- पिप्पला मूल । मा०- पीपला मूल । ता०- पिप्पली मूल । फा०- फिलुफिल्दवे, फिलिफिल् मूहह । अ०- फिलफिलादराज, फिलफिले मोया । अं०- Piper root (पाइपर रूट) । लै०- Root of the Piper longum Linn. (रूट ऑफ़ दी पाइपर लॉङ्गम) । पीपल लता की गांठदार जड़ को पीपलामूल कहते हैं। इसको जगह कितने पंसारी पीपल लता की मोटी शाखाओं को छोटे-छोटे टुकड़े कर बेचते हैं। इसलिये अच्छी तरह देख भाल कर खरीदना चाहिये । **गुण और प्रयोग—**पीपला मूल पीपल के ही समान लेकिन कम गुण वाला है। यह पीपल से अधिक उत्तेजक है। डाक्टर देसाई के मतानुसार प्रसव होने में अधिक समय लग रहा हो तो पीपरामूल, ईश्वर मूल और हींग, पान के साथ खिलाना चाहिये जिससे पीड़ा बढ़कर प्रसव हो जाता है। प्रसव के पश्चात तुरत इसका फांट देने से आवल (अपरा) गिरने में सहायता होती है।

अथ चतुरुषणस्य लक्षणगुणानाह

व्यूषणं सकणामूलं कथितं चतुरुषणम् । व्योषस्येव गुणाः प्रोक्ता अधिकाश्चतुरुषणे ॥ ६६ ॥ चतुरुषण के लक्षण, नाम तथा गुण—त्रिकटु (सोंठ, पीपर, मरिच) में यदि पिपरामूल मिला दिया जाय तो इसे चतुरुषण कहते हैं। पहले जितने गुण त्रिकटु के कह आये हैं, वही सब गुण चतुरुषण में अधिक रूप से रहते हैं ॥ ६६ ॥

२० भावप्रकाशनिघण्टुः प्रयोग करने से यह सिद्ध हुआ है कि चतुरूषण ५ से ३० र० की मात्रा में दिन में दो बार न केवल खांसी, प्रतिश्याय, स्वरभंग में उपयोगी है बल्कि उदरशूल, आध्मान आदि में भी बहुत उपयोगी है। अथ चव्यनामगुणानाह भवेच्चव्यं तु चविका कथिता सा तथोषणा । कणामूलगुणं चव्यं विशेषाद् गुदजापहम् ॥६७॥ चव्य के नाम तथा गुण-चव्य, चविका और ऊषण ये तीन संस्कृत नाम 'चव्य' के हैं। जो २ गुण 'पिपरामूल' के कह आये हैं वे ही सब 'चव्य' के भी होते हैं। केवल विशेषता यह है कि-यह अर्श (बवासीर) का नाशक होता है ॥ ६७ ॥ ९ चव्य हि०-चव्य, चाव, चाभ, चब। ब०-चेअर, चई, चोई। म०-चवक, कंकल, चावेचीनी। गु०-चवक, ते०-सेवासु, चैकाणी, चव्यमु। ता०-चव्यं। ले०-Piper chaba Hunter (पाइपर् चबा हण्टर); Piper officinarum Cas D. C. (पाइपर् ऑफिसिनेरम्)। Fam. Piperaceae (पाइपरेसी)। चव्य के विषय में विद्वानों में कुछ मतभेद हैं। भावप्रकाशकार आगे गजपिप्पली के वर्णन में लिखते हैं कि विद्वानों ने चव्य के फल को गजपिप्पली कहा है। अर्वाचीन विद्वानों ने गजपिप्पली एवं चव्य ये दो अलग वनस्पतियां मानी हैं। और यही कारण है कि ये दोनों द्रव्य संदिग्ध की श्रेणी में आ गये हैं। अधिकांश विद्वानों ने जिन दो द्रव्यों को माना है उन्हीं का यहां वर्णन किया जा रहा है। पाइपर चवा को चव्य कहा गया है। भारत के अनेक प्रान्तों में यह लगाई हुई मिलती है। यह वनस्पति जावा, सुमात्रा, मलाया आदि देशों में विशेषरूप से उत्पन्न होती है। इसके फल तथा कांड का उपयोग किया जाता है। संभवतः यह फल सिंगापुर के रास्ते कलकत्ते में आकर बड़ी पीपर के नाम से बिकता है। यह लताजाति की वनस्पति बहुत दृढ़ होती है। इस पर किसी प्रकार के रोम इत्यादि नहीं होते। इसकी शाखायें-वृक्षों की डालियों से खूब लिपटती हुई बढ़ती हैं और सूखने पर पीलापन युक्त सफेद रङ्ग की हो जाती हैं। पत्ते-५-७ इञ्च लम्बे तथा २-२॥ से ३॥ इञ्च तक चौड़े, आयताकार, अण्डाकार, और किञ्चित् नुकीले होते हैं, सूखने पर फीके या पीलापन युक्त सफेद रंग के हो जाते हैं। उनके ऊपर का भाग चमकदार होता है। इन पर रक्तवर्ण के फूल और फलों के गुच्छे लगते हैं। ये गुच्छे १-३ इञ्च लम्बे और ३/८ इञ्च मोटे, अग्र की तरफ कुछ पतले एवं डण्ठल की तरफ मोटे गोल और भूरे रंग के होते हैं। फल-बहुत छोटे छोटे इञ्च के दसवें हिस्से के घेरे में अण्डाकृति आते हैं। ये फल सुगन्धित एवं स्वाद में कटु होते हैं। गुण और प्रयोग-चाभ का उपयोग पीपर के समान ही किया जाता है। यह उत्तेजक एवं पाचक है तथा शूल, आध्मान, वृकरोग तथा विशेष कर खांसी, जुकाम आदि गले के रोगों में उपयोग में आता है। यूनानी मतानुसार उसके फल का नस्य अपस्मार में उपयोगी है। मात्रा-चाभ चूर्ण-१ से २ माशे, चाभ फल चूर्ण-२-४ र०। अथ गजपिप्पल्या नामानि गुणाँश्चाह चविकायाः फलं प्राज्ञैः कथिता गजपिप्पली । कपिवल्ली कोलवल्ली श्रेयसीवशिरश्च सा ॥६८॥ गजकृष्णा कटुर्वातश्लेष्महद्वह्निवर्धिनी । उष्णा निहन्त्यतीसारं श्वासकण्ठामयक्रिमीन् ॥६९॥ हरीतक्यादिवर्गः \२१ 'गजपीपल' के नाम तथा गुण-'चव्य' के फल का ही नाम 'गजपीपल' है ऐसा वैद्य लोग कहते हैं। कपिवल्ली, कोलवल्ली, श्रेयसी और वशिर ये सब संस्कृत नाम 'गजपीपल' के हैं। गज पीपल-कटुरसयुक्त, वात कफ नाशक, अग्निवर्धक और उष्ण वीर्य होती है तथा अतिसार, श्वास, कण्ठसम्बन्धी रोग और कृमि का भी नाश करती है ॥ ६८-६९ ॥ गजपिप्पली के सम्बन्ध में भी विद्वानों में मतभेद है। कुछ चव्य के फल को गजपिप्पली मानते हैं तो कुछ सिंडेप्सस् आफिसिनेलिस् के फल को मानते हैं। अधिकांश विद्वान सिं. आफिसिनेलिस् को गजपिप्पली मानते हैं जो ठीक भी मालूम होता है। कुछ बाजारों में ताड़वृक्ष के बाल (पुं-पुष्प व्यूह) को काटकर गजपिप्पली के नाम से बेचते हैं। १० गजपीपल हि०-गजपीपर, गजपीपल। ब०-गजपीपल। म०-गजपिंपली, थोर पिंपली। क०-अड्डुकेबीलुबळ्ळि। गु०-मोटो पीपर। ते०-एनुगा पिप्पल। ता०-अनं' तिप्पली। पं०-गजपीपल। सन्ताल०-दरे झपक । मल०-अतितिपली, अनैतिप्पली। ले०-Scindapsus officinalis, Schott (सिन्डे- प्सस् ऑफिसिनेलिस् स्काट); Syn: Pothos officinalis Schott Melet (पोथोस् ऑर्कि- सिनेलिस्)। Fam. Araceae (अॅरासी)। इसकी लता आर्द्रसपाट मैदानों में हिमालय के प्रान्तों में सिक्कम से पूर्व की ओर बंगाल, चटगांव, ब्रह्मा तथा सिवालिक के जंगलों में शाल वृक्षों पर चढ़ी हुई पाई जाती है। इसका डंठल-गूदेदार एक इञ्च या इससे भी अधिक मोटा एवं गोल होता है। पत्ते-बड़े बड़े, जैसे-५ से १० इञ्च तक लम्बे और २॥ से ६ इञ्च तक चौड़े, अंडाकार, गाढ़े हरे होते हैं और शाखाओं पर विपरीत रहते हैं। पत्र वृन्त ३ से ६ इञ्च तक लम्बा और अन्त का हिस्सा हाथ की कोहनी के समान होता है एवं तलवार की म्यान के समान दिखाई पड़ता है। इसके भीतर का हिस्सा पीले रङ्ग का होता है। फल-रसयुक्त, गूदेदार, लगभग ६ इञ्च लम्बा, १।-१॥ इञ्च व्यास में और नीचे की ओर लटका हुआ रहता है। इसका आगे का हिस्सा नोकदार होता है। इसके फल के आड़े कटे हुये सूखे टुकड़े बाजार में बिकते हैं। ये १ इञ्च व्यास के, ३/८ इञ्च मोटे और भूरे रङ्ग के होते हैं। इनमें गन्ध नहीं रहती तथा उन्हें जल में भिगोकर रखने से ये फूल कर नरम हो जाते हैं। इनके बीच में बीज होते हैं और उनके चारों ओर चूने के सूई के समान दाने होते हैं। बीज-वृक्का- कार, चिकने, गांजे के बीज से बड़े और भूरे रङ्ग के होते हैं। इसके पत्ते का शाक बनाकर खाते हैं। गुण और प्रयोग-सूखा हुआ फल-तीक्ष्ण, पसीना लाने वाला, सुगन्धिकारक, वातहर, कृमिनाशक, उत्तेजक, पाचक, एवं बल्य है। आमातिसार, श्वास और खांसी में जब कफ की अधिकता रहती है तब इसका उपयोग किया जाता है। इसके फांट को देने से कफ ढीला होकर निकलता है। संताल लोग इसको आमवात, संधिवात आदि रोगों में स्थानीय लेप के रूप में लगाते हैं। इसका उपयोग सुगंधित द्रव्य के रूप में अन्य औषधियों के साथ किया जाता है। इसमें १४३/८% राख, गोंद तथा एक क्षाराम रहता है। मात्रा-फांट (१ में १०) २-६ ड्राम । अथ चित्रकस्य नामानि गुणाँश्चाह चित्रकोऽनलनामा च पाठी व्यालस्तथोषगः । चित्रकः कटुकः पाके वह्निकृत्पाचनो लघुः ॥ रूक्षोष्णो ग्रहणीकुष्ठशोथार्शः कृमिकासनुत् । वातश्लेष्महरो ग्राही वातघ्नः१ श्लेष्मपित्तहृत् ॥ १. 'वातांशी' इति पाठान्० ।

२२] भावप्रकाशनिघण्टुः 'चीता' के नाम तथा गुण-चित्रक, अनलनामा (अग्नि के जितने नाम हैं वे सब 'चीता' के भी होते हैं), पाठी, व्याल तथा ऊषण ये सब संस्कृत नाम चीता के हैं। चीता-पाक में कटुरस युक्त, अग्निवर्धक, पाचक, लघु (शीघ्र पचने वाला), रूक्ष और उष्ण वीर्य वाला है और यह ग्रहणी, कुष्ठ, शोथ, अर्श, कृमि तथा कास का नाशक होता है। तथा वात और श्लेष्मा को दूर करने वाला, ग्राही, वात और श्लेष्म एवं पित्त का नाशक होता है ॥ ७०-७१ ॥ ११ चित्रक हि०-चीत, चीता, चित्रा, चित्रक, चित्ता, चितरक, चितउर । बं०-चिता, चितु । म०-चित्रक । क०-पैल्लीचित्रमूल, चित्रकमूल । पं०-चित्रा । ते०-अग्निमत, चित्रमूलं, तेलाचित्रा । ता०-पेंचीत्तर, कोदिवेल । उ०-ध्रुवचिता । गु०-चित्रो, चित्रा, पितरो । मला०-वेल्लाकोडुवेरि, कोडुवेलि । फा०-बेख बरंदा, बेख बरंदह, शीतरह, शीतरूह, शीतरक, बेखबुरिंदा । अ०-शितरज, शितरञ्ज, शीतरज हिन्दी, शैतराज । अं०-Ceylon Leadwort, White Leadwort (सीलोन लेडवोर्ट, हाइट लेडवोर्ट) । ले०-Plumbago zeylanica Linn. (प्लम्बैगो झेलैनिका) । Fam. Plumbaginaceae (प्लम्बैजिनासी) । सफेद, लाल और नीले फूलों के भेद से चित्रक तीन प्रकार का होता है। कोई कोई पीले फूल का भी चित्रक बतलाते हैं किन्तु इसका उल्लेख किसी पुस्तक में देखा नहीं जाता। सफेद फूल का चित्रक बहुत मिलता है और लाल फूल का कहीं कहीं नमूने की तरह देखने में आता है और मिलता भी बहुत कम है। नीले फूल का चित्रक भी कम मिलता है जिससे नमूने की तरह भी बहुत कम ही वैद्य लोग देख पाये होंगे । सफेद चित्रक इस देश के प्रायः सब प्रान्तों की जङ्गली झाड़ियों में देखा जाता है विशेष कर संयुक्त प्रान्त, बिहार, बङ्गाल, दक्षिण भारत, सीलोन और कुमाऊँ के पहाड़ों बहुत मिलता है। यह आप ही आप जङ्गली उत्पन्न होता है और कहीं कहीं वाटिकाओं में भी है। इसका क्षुप २ से ५ फूट तक ऊँचा होता है और बारहों मास मिलता है। गर्मी के दिनों में पत्ते प्रायः कम दिखाई पड़ते हैं किन्तु बरसात में हरे भरे हो जाते हैं। कांड पर लम्बाई में धारियां होती हैं। पत्ते-विपरीत, १।। से ३।। इञ्च तक लम्बे, १ से १।। इञ्च चौड़े, अण्डाकार, नोकदार, चिकने, कोमल और मोगरा के समान होते हैं। फूल-जाड़े के दिनों में चमेली के फूल के समान अत्यन्त सफेद फूल आते हैं । फल-यव के आकार वाले लम्बे, कच्ची अवस्था में हरे, पकने पर धूसर रङ्ग के, सूक्ष्म तथा चिपचिपे रोवों से भरे रहते हैं जो तोड़ने से आपस में सट जाते हैं और स्पर्श से लसीले जान पड़ते हैं। इसकी छाल-कालापन लिये भूरे रंग की, खड़े बल में कटी हुई और उस पर थोड़ी सी छोटी गांठें होती हैं। सूखी हुई जड़ तोड़ने से तुरत टूट जाती है। इसका स्वाद तीता, कड़ुआ और जिह्वा को सुई चुभोने के समान मालूम होता है। इसकी जड़ औषधि के काम आती है। यह हमेशा ताजी प्रयोग करनी चाहिये क्योंकि बहुत पुरानी होने पर यह गुणहीन हो जाती है। रासायनिक संगठन-इसके मूल में प्लम्बैजिन (Plumbagin) नामक एक रवेदार पदार्थ होता है। यह पीले रंग का, सुइयों के सदृश, दाहक एवं कटु पदार्थ है। यह मद्यसार एवं ईथर में अच्छी तरह घुल जाता है लेकिन उबलते हुये जल में बहुत थोड़ा घुलता है और गरम करने पर कुछ अंश में उड़नशील है। इसका द्रवणांक ७२° श० है। भारतवर्ष में प्राप्त होने वाली हरीतक्यादिवर्गः [२३ इसकी सभी जातियों में इसकी अधिक से अधिक मात्रा ०.९१% रहती है। सूखी जमीन में उत्पन्न होने वाले पुराने क्षुप में यह अधिक मात्रा में रहता है। गुण और प्रयोग-चित्रक में रहने वाला प्लम्बैजिन अल्प मात्रा में केन्द्रीय वातनाड़ा संस्थान को उत्तेजित करता है लेकिन अधिक मात्रा में वह दाहजनक एवं सम्मोहक विष है जिससे श्वसन- क्रिया बन्द होकर मृत्यु हो जाती है। चित्रकमूल-अग्निदीपक, गर्भाशय संकोचक, स्वेदजनक, कुष्ठहर, अर्शहर, रसायन, वात एवं कफहर है। इसका उपयोग मन्दाग्नि, अपचन, आध्मान, ज्वर, आमवात, आमातिसार, संग्रहणी, कुष्ठ, शोथ, पाण्डु एवं अर्श आदि रोगों में किया जाता है। अल्प मात्रा में यह पाचक संस्थान की श्लैष्मिक कला को उत्तेजित करके पाचक स्रावों की वृद्धि करता है जिससे भूख अच्छी लगती है। खाया हुआ जल्दी पचता है। अर्श में इसके प्रयोग से गुदवली की शिथिलता दूर होकर लाभ होता है। गर्भाशय के ऊपर इसकी बहुत तीव्र संकोचक क्रिया होती है जिससे गर्भिणी में इसको किसी भी समय प्रयोग करने से एक दो प्रहर में गर्भपात हो जाता है लेकिन गर्भ हमेशा मृत ही होता है। गर्भपात के लिये आंतरिक प्रयोग के साथ २ इसको गर्भाशयमुख में प्रविष्ट करते हैं या इसका लेप करते हैं। इसके प्रयोग में यदि विशेष सावधानी न रक्खी जाय तो इससे रक्तस्राव, धातुनाश एवं कोथ आदि गंभीर उपद्रव उत्पन्न हो सकते हैं। अतः इसका प्रयोग गर्भिणी में कभी भी न करना चाहिये। विषम ज्वर में यकृत् प्लीहा वृद्धि होकर पाण्डु हो गया हो तो इसका सेवन करना चाहिये। सूतिका ज्वर में निर्गुण्डी के साथ इसके उपयोग से ज्वर कम होता है तथा दूषित आर्तव निकलकर मकलशूल भी दूर होता है। (१) अग्निमांद्य, अरोचक, अजीर्ण, अतीसार आदि में चित्रक, वायविडङ्ग एवं मुस्ता का प्रयोग करना चाहिये । (२) अर्श में इसे दही के साथ सेवन करना चाहिये। (३) यकृत् एवं प्लीहा वृद्धि में इसका क्षार मट्ठे के साथ उपयोगी है। (४) इसका उपयोग कुष्ठ, फिरङ्ग की द्वितीयावस्था आदि में लाभकारी है। चित्रक मूल बाह्य प्रयोग में तीव्र कृमिघ्न, दाहजनक, एवं स्फोटोत्पादक है। आमवात, संधिशूल अङ्गवात आदि में इससे सिद्ध तैल की मालिश करने से लाभ होता है। प्लेग की गांठों पर गांठों को फोड़ने के लिये इसको काम में लाते हैं। श्वित्र एवं खालित्य में इसका लेप उपयोगी है। आमवातादि में स्फोटोत्पादन के लिये इसका लेप १५,२० मिनट से अधिक न रखना चाहिये। इससे उत्पन्न स्फोटों में पीड़ा बहुत होती है इसलिये जहां तक हो उसका प्रयोग न किया जाय। हानिकारक-फुफ्फुस, यकृत् और गर्भ । दर्पनाशक-फुफ्फुस के लिये मस्तगी एवं बबूल का गोंद तथा यकृत् के लिये गुलाब के फूल एवं चन्दन । मात्रा-३ से २ माशा । १२ लाल चीता हि०-लाल चीत, लाल चीता, लालचित्रक, लाल चितउर इत्यादि । बं०-लालचिता, रक्तो- चितो । म०-लालचित्रक । क०-केम्पू, चित्रमूल । ते०-येर्राचित्रमूलम् । ता०-शिवप्पु चित्रमूलम् ;

२४ भावप्रकाशनिघण्टुः चित्तुरमोल, कोडिमूली । उ०-रक्तचिता, रक्तचिता । मला०-चेक्कीक्कोडिवेरी । अं०-Rose coloured Leadwort ( रोज कलर्ड लेडवोर्ट) । ले०-Plumbago rosea Linn. (प्लम्बैगो रोझिया) । यह सिक्कम और खसिया की तराइयों में पाया जाता है। इसको वाटिकाओं में भी लगाते हैं परन्तु थोड़ी असावधानी से नष्ट हो जाता है। इसका क्षुप २-४ फुट ऊंचा, सदा हरा भरा रहता है। गर्मी के दिनों में कुछ पुराने पत्ते सूखकर गिर जाते हैं। पत्ते-उक्त चित्रक के समान होते हैं। फूल-लाल और फल सफेद चीते के समान लसीले होते हैं। लाल चित्रक गुणों में सफेद चित्रक की अपेक्षा अधिक प्रभाव शाली और तीव्र गुण सम्पन्न है, विशेष कर रुचिकारी, रसायन, शरीर को नवीन और स्थूल करने वाला, पारे को बांधने- वाला, लोहे को बेधने वाला तथा कुष्ठ को नष्ट करने वाला है। इसकी थोड़ी मात्रा उत्तेजक तथा अधिक मात्रा तीव्र मदकारी विष के समान हानिकारक होती है ॥ १२ ॥ १३ नीला चित्रक ले०-Plumbago capensis Thumb (प्लम्बैगो केपेनसिस थम्ब) काले चित्रक का क्षुप-उक्त चित्रक के समान किन्तु पत्र चक्रिक क्रम में आते हैं। पुष्प सफेदी युक्त नीले रंग के होते हैं। यद्यपि यह दक्षिण अफ्रीका का आदिवासी है तथापि बागों में लगाया हुआ मिलता है। लोग यह भी कहते हैं कि नीले चित्रक के सेवन करने से बाल काले हो जाते हैं और यदि गौ इसके क्षुप को केवल सूंघ ले अथवा इसकी जड़ दूध में डाली जावे तो दूध का रंग काला हो जाता है। परन्तु इसमें कहां तक सत्यता है परीक्षा करने से ही मालूम हो सकती है। अथ पञ्चकोलस्य लक्षणगुणानाह पिप्पली पिप्पलीमूलं चव्यचित्रकनागरैः । पञ्चभिः कोलमात्रं यत्तत्पञ्चकोलं तदुच्यते ॥७२॥ पञ्चकोलं रसे पाके कटुकं रुचिकृन्मतम् । तीक्ष्णोष्णं पाचनं श्रेष्ठं दीपनं कफवातनुत् ॥ गुल्मप्लीहोदरानाहशूलघ्नं पित्तकोपनम् ॥ ७३ ॥ 'पञ्चकोल' के लक्षण तथा गुण-पीपल, पिपरामूल, चव्य, चीता तथा सोंठ ये सब पांच द्रव्य यदि कोलमात्र अर्थात् आधा २ तोला की मात्रा में एकत्र किये जांय तो उसी को 'पञ्चकोल' कहते हैं। पञ्चकोल-स्वाद तथा पाक में कटुरस युक्त, रुचिकारक, तीक्ष्ण तथा उष्णवीर्य होता है। तथा पाचक अत्यन्त अग्निदीपक, कफ-वात नाशक, गुल्म, प्लीहा, उदरसम्बन्धी रोग, आनाह और शूल का नाश करने वाला तथा पित्त को कुपित करने वाला होता है ॥ ७२-७३ ॥ मात्रा-५-१५ र० दिन में दो बार । अथ षडूषणस्य लक्षणगुणानाह पञ्चकोलं समरिचं षडूषणमुदाहृतम् । पञ्चकोलगुणं तत्तू रूक्षमुष्णं विषापहम् ॥ ७४ ॥ 'षडूषण' के लक्षण तथा गुण-ऊपर कहे हुये 'पञ्चकोल' के पीपल आदि पांचों द्रव्यों के साथ यदि छठां द्रव्य 'मरिच' भी सम भाग में मिला दिया जाय तो उसे 'षडूषण' कहते हैं। पञ्चकोल के हरीतक्यादिवर्गः २५ जो गुण कह आये हैं वे ही सब 'षडूषण' के समझने चाहिये, अन्तर केवल इतना ही है कि यह रूक्ष, उष्ण तथा विषनाशक भी होता है ॥ ७४ ॥ अथ यवान्या नामानि गुणाँश्चाह यवानिकोपगन्धा च ब्रह्मदर्भाऽजमोदिका ॥ ७५ ॥ सैवोग्रा दीप्यका दीप्या तथा स्याद्यवसाह्वया । यवानी पाचनी रुच्या तीक्ष्णोष्णा कटुका लघुः ७६ ॥ दीपनी च तथा तिक्ता पित्तला शुक्रशूलहृत् । वातश्लेष्मोदरानाहगुल्मप्लीहकृमिप्रणुत् ॥७७॥ 'अजवायन' के नाम तथा गुण-यवानिका, उग्रगन्धा, ब्रह्मदर्भा, अजमोदिका, दीप्यका, दीप्या और यवसाह्वया ये सब नाम 'अजवाइन' के हैं। अजवाइन-पाचक, रुचिकारक, तीक्ष्ण तथा उष्णवीर्य, कटुरसयुक्त, परिपाक में लघु, अग्निदीपक, तिक्तरसयुक्त, पित्तवर्धक एवम् शुक्र तथा शूल की नाशक है। और यह वात, श्लेष्मा, उदरसम्बन्धी रोग, आनाह, गुल्म, प्लीहा तथा कृमि की भी नाशक है ॥ ७५-७७ ॥ १४ अजवायन ( यवानी ) हि०-अजवायन, अजवाइन, अजमायन, जवाइन, जबायन, अजवां, अजोवां । बं०-यमानी, यउयान, योयान्, जोवान् । सं०-ओंवा, उंबा । गु०-अजमा, यवान, जवाइन, अजमो । क०- बोम, ओमु । ते०-वामु, ओममी, ओममु, ओमा । ता०-अमन, ओमम्, ओमन । मा०-अजवान । कच्छ०-वोह्ररा । काश्मी०-जविन्द । फा०-नानुखा, शिनियानस नानूखाह, जीनानू । अ०-कमूने- 'मुलुकी, अमूला, तोलिबउल खुब्जा । अं०-The Bishop's weed (दी बिशॉप्स वीड); Ajova seeds (अजोवां सीड्स), Lovage (लोहाज) । ले०-Carum copticum Benth & Hook (करम् कोप्टिकम्); Syn: Trachyspermum ammi Linn. (ट्रॅकीस्परमॅम् अम्मी लिन ); Syn: Ptychotis ajowan DC (प्टिकोटिस् अजौवां)। Fam. Umbelliferae (अंबेलीफेरी) । भारतवर्ष के प्रायः सब प्रान्तों में हरसाल खेतों में यह बोई जाती है विशेषकर इन्दौर तथा हैदराबाद राज्य में यह अधिकता से होती है। यह अफगानिस्तान, बलूचिस्तान, पर्शिया, मिश्र और यूरोप आदि देशों में भी उत्पन्न होती है। इसका क्षुप १ से ३-फुट तक ऊँचा, पत्ते-धनिये के पत्ते के समान कटीले, अनेक भागों में विभक्त, डालियों पर दूर-दूर आते हैं। फूल-छत्ते से, सफेद रंग के बारीक आते हैं। फल- नन्हें-नन्हें रहते हैं। छत्ते पकने पर फल निकाल लिए जाते हैं। इन्हीं फलों को अजवायन कहते हैं। ये फल बहुत छोटे, दबे हुए, गोल अंडाकार, २ मि० मि० लम्बे, भूरे रंग के होते हैं। इनकी ऊपरी सतह पर छोटी गांठें एवं प्रत्येक अर्ध खण्ड पर पांच धारियां होती हैं। इसमें अज- वायन की विशिष्ट गंध होती है। रासायनिक संगठन-इसमें एक उड़नशील सुगन्धित तैल जिसे अजवाइन का तेल कहते हैं, २ से ३% पाया जाता है जिसमें से ४०-५०% थाइमॉल रहता है। इसमें पाये जाने वाला रवेदार पदार्थ स्टिअरोप्टिन, जिसे अजवाइन का फूल या अजवायन का सत्व कहते हैं डाक्टरी के थाइमॉल के समान होता है। इसके अतिरिक्त इसमें साइमोन, टरपेन आदि पदार्थ रहते हैं।

२६ भावप्रकाशनिघण्टुः गुण और प्रयोग-अजवायन अग्निदीपक, पाचक, उष्ण, उद्वेष्टन निरोधी, उत्तेजक, बल्य, कृमिघ्न, संक्रमण निरोधी, दुर्गन्धिनाशक एवं सड़न को दूर करने वाली है। इसका उपयोग अति- सार, कुपचन, अजीर्ण, उदरशूल, आध्मान, विसूचिका आदि रोगों में किया जाता है। इसमें सरसों और मिर्चों का तीतापन, चिरायते का कड़ुआपन, एवं हींग का उद्वेष्टन निरोधी गुण तीनों एक साथ हैं। इसका उपयोग अनेक औषधियों विशेषतया एरंड तेल की दुर्गन्ध को दूर करने के लिए किया जाता है। पुरानी खाँसी में जब कफ बहुत कम रहता है तब इसके प्रयोग से कफ ढीला होकर निकल जाता है। श्वास में गरम पानी के साथ इसका चूर्ण दिया जाता है या इसको चिलम में रखकर पीते हैं। अजवायन का चूर्ण और सेंधानमक अजीर्ण से उत्पन्न विकारों की घरेलू दवा है। (१) उदरशूल, आध्मान आदि विकारों में अजवायन, सेंधानमक, साँचरनमक, यवक्षार, हींग और आंवला इनके चूर्ण को $\frac{३}{४}$ से १ माशा की मात्रा में मधु के साथ दिया जाता है। (२) शराबियों को मद्य की आदत छुड़ाने के लिये शराब पीने की इच्छा होने पर इसे चबाने को दिया जाता है। (३) बच्चों के रोगों में तथा हैजे में इसका अर्क बहुत उपयोगी है। (४) अजवायन का सत्-बहुत अच्छा कृमिघ्न, सड़न को दूर करने वाला, प्रतिदूषक पदार्थ है। इसका उपयोग घोल के रूप में व्रण प्रक्षालन के लिये किया जाता है। अजवायन का सत्, पेपरमिंट का सत् और कपूर तीनों मिलाने से एक तरल पदार्थ बनता है जिसका विसूचिका के प्रारम्भ में ३, ४ बूँद बतासे के साथ व्यवहार किया जाता है। इससे कै, दस्त कम होकर लाभ होता है। अमृतधारा जैसे प्रचलित पेटेण्ट योगों में ये ही औषधियाँ मूलतः रहती हैं। यह आंत्रिक कृमियों पर विशेषकर अंकुश कृमि में बहुत उपयोगी है। संधिशूल आदि में इसको लगाने से लाभ होता है। अजवायन का सत् दंतशूल में उपयोगी है। (५) इसकी पुल्टिस बनाकर उदरशूल, आमवात, सन्धिशूल आदि में सेंका जाता है। विसू- चिका में हाथ, पैरों को तथा श्वास और खाँसी में छाती को इससे सेंकने से लाभ होता है। (६) इसके पत्तों का रस कृमियों को मारने के लिये काम में आता है एवं पत्तों को पीसकर कीड़ों के काटे हुए स्थानों पर लगाया जाता है। पत्तों के अन्य गुण शाकवर्ग में देखें। मात्रा-चूर्ण-३ से ६ माशा, अर्क-१ से २ औंस, सत्-$\frac{१}{२}$ से १ र० ।

अथ अजमोदाया नामानि गुणांश्च

अजमोदा खराश्वा च मयूरो दीप्यकस्तथा । तथा ब्रह्मकुशा प्रोक्ता कारवीलो$^१$ चमस्तका ! अजमोदा कटुस्तीक्ष्णा दीपनी कफवातनुत् । उष्णा विदाहिनी हृद्या वृष्या बलकरी लघुः । नेत्रामय$^३$ कृमिवमिहिक्कावस्तिरुजो हरेत् ॥ ७९ ॥ 'अजमोदा' (बड़ीअजवाइन) के नाम तथा गुण-अजमोदा, खराश्वा, मायूरो, दीप्यक, ब्रह्मकुशा, कारवी और लोचमस्तका ये सब नाम 'अजमोदा' के हैं। अजमोदा-कटरसयुक्त, तीक्ष्णवीर्य, अग्निदीपक, कफवातनाशक, उष्णवीर्य, विदाही, हृद्य (हृदय के लिये हितकर), वृष्य,

१. 'मयूर' इति पाठा० । २. 'च समस्तक'ति पाठा० । ३. 'कफे' पाठा० । हरीतक्यादिवर्गः २७ बलकारक और परिपाक में लघु होती है। और यह नेत्ररोग, कृमि, वमन, हिक्का (हिचकी) एवं बस्तिसम्बन्धी रोगों को नाश करने वाली होती है ॥ ७८-७९ ॥

१५ अजमोदा

हि०-अजमोद, अजमोदा, अजमूदा, अजमोत । ब०-वनयमानी, रान्धुनी, अजमूद, चनु । गु०-बोडी अजमोद, अजमोद, बोडी अजमो । ते०-आजामोदा, वोमा, अशमदागां, वोमां, अंजोदा- वोमरू । मध्य प्र०-रान्धुनी । पं०-भूतजटा । ता०-अशम, तागम, तागम, अशमता ओमान् । म०- अजमोदा वोवा, कोरंजा । क०-अजमोदा वोमा । फा०-करप्स । अ०-बजरूल करप्स । अं०- Celery fruit (सेलेरी फ्रूट); Apii fructus (अप्याई फ्रक्टस्) । ले०-Apium graveo- lens, Linn. (एपियम् ग्रेविओलेन्स् लिन) । Fam. Umbelliferae (अंबेलीफेरी) । यूरोप, अमेरिका तथा भारतवर्ष में इसकी खेती की जाती है। पंजाब तथा उत्तर प्रदेश में इसकी विशेष खेती होती है। यह उत्तर पश्चिमी हिमालय तथा पंजाब के पहाड़ी प्रान्तों में भी उत्पन्न होता है। इसका क्षुप २ से ३ फीट तक ऊँचा होता है। पत्ते-अनेक भागों में विभक्त, प्रत्येक भाग गहरे कटे किनारे वाले होते हैं। फूल-सफेद और छोटे छत्ते से होते हैं। फल-पीताभ, भूरा, गोलाभ अंडाकार, १ से १.५ मि. मि. लंबा, १.५ मि. मि. चौड़ा, ०.५ मि. मि. मोटा एवं प्रत्येक अर्धखण्ड पर ५ गहरी धारियों से युक्त होता है। रासायनिक संगठन-इसके फलों में एक हल्के पीले रङ्ग का उड़नशील तैल १.५-३% पाया जाता है जिसमें एक विशेष प्रकार की इसकी गन्ध होती है। इसके अतिरिक्त इसमें गन्धक, अपो- इल Apoil) नामक एक विषैला पदार्थ, एक ग्लूकोसाइड ओपीईन (Glucoside-Apiin), अल्ब्यू मिन्, गोंद और क्षार आदि पदार्थ रहते हैं। गुण और प्रयोग-यह सुगन्धि, पाचक, वातानुलोमक, उत्तेजक, वातशामक, बल्य, मूत्रल, गर्भाशय संकोचक एवं हृद्य है। घरेलू औषधि के रूप में इसका उपयोग आमवात, उदरशूल, आध्मान, वमन, हिक्का, कुपचन आदि रोगों में किया जाता है। इसको वातरक्त, कृमि, मूत्राशय के रोग और नपुंसत्व में काम में लाते हैं। इसके उद्वेष्टन निरोधी गुण के कारण श्वसनिका शोथ, श्वास एवं उदरशूल आदि विकारों में इसका व्यवहार किया जाता है। इसका पथरी के रोग में भी व्यवहार होता है। यकृत और प्लीहा के रोगों में भी यह कुछ लाभदायी है। मसाले के रूप में भी इसका व्यवहार किया जाता है। (१) इसका तैल उद्वेष्टन निरोधी, वातनाड़ियों के लिये बल्य एवं आमवाताभ संधिशोथ में लाभदायी है। (२) इसका मूल रसायन एवं मूत्रल माना गया है और इसका उपयोग सर्वांग शोफ और शूल में किया जाता है। (३) इसके मूल से बनी कॉफी मस्तिष्क एवं वातनाड़ियों के लिये बलदायक मानी गई है। (४) यह अपस्मार एवं गर्भिणी के लिये हानिकारक माना गया है। मात्रा-फल चूर्ण-१ से ४ माशा ।

१६ अजवायन जंगली (१)

यह दो प्रकार की होती है जिनका अलग-अलग वर्णन नीचे संक्षेप में दिया गया है।

२८ भावप्रकाशिनघण्टुः सं०-वन्ययमानी ? । म०-किरमिंजी अजवां । बं०-बनजोवान । ले०-Seseli indicum W. & A. (सिसिली इण्डिकम् ) । Fam. Umbelliferae (अम्बेलीफेरी) । यह हिमालय के निचले भागों में देहरादून से लेकर गोरखपुर, बुंदेलखण्ड, आसाम, मध्य बंगाल तथा कारोमण्डल तक होती है। इसके क्षुप-वर्षायु, ४ से १२ इञ्च तक ऊँचे, अनेक शाखा प्रशाखाओं से युक्त सघन देखने में आते हैं। पत्ते-विभक्त, कटे किनारे वाले और रोमश होते हैं। फूल-छत्ते से सफेदी युक्त गुलाबी रंग के, फल-बारीक छोटे-छोटे गोल, किञ्चित् लम्बे फीके पीले रंग के होते हैं। गुण और प्रयोग-इसके फल प्रायः पशुओं के लिये औषधि के काम में अधिक आते हैं। यह उत्तेजकदीपन, पाचन, शूलघ्न, आंतों के लिये हितकारी तथा विशेषरूप से गोल कृमि का नाशक है। इसके सेवन से पेट के आफरे में लाभ होता है और भूख बढ़ती है। मात्रा-१ से ३ माशा । १७ अजवायन जंगली (२) हि०-बन अजवायन । पं०-माशो, रांगस्तूर, मरिज़ह । फा०-हाशा । अं०-Wild Thyme (वाइल्ड थाइम्) । ले०-Thymus serpyllum Linn. (थाइमस् सर्पाइलम्) । Fam. Labiatae (लेबियटी) । यह हिमालय के गरम प्रांतों में काश्मीर से कुमाऊँ तक एवं ईरान में होती है। यह क्षुप जाति की वनौषधि अनेक शाखा प्रशाखाओं से युक्त, सघन, कुछ रोमयुक्त, ६ से १२ इञ्च तक ऊँची और सुगन्धित होती है। पत्ते-अवृन्त, इञ्च के अष्टमांश से चतुर्थांश के घेरे में किञ्चित् आयताकार अण्डाकार होते हैं और उन पर तैलीय धब्बे होते हैं। फूल-बारीक बैंगनी रंग के गुच्छों में आते हैं। फल-बारीक और चिकने होते हैं। इस औषधि का पञ्चांग व्यवहार में आता है। रासायनिक संगठन-इसमें एक उड़नशील सुगन्धित तैल ०.६%, टैनिन तथा गोंद पाया जाता है। इसमें थायमॉल (अजवायन का सत्व) बहुत ही थोड़ी मात्रा में होता है। गुण और प्रयोग-यह उष्ण, सड़न को दूर करने वाली, मूत्रजनन, उत्तेजक, आंखों के लिये हितकर, श्वास एवं कफहर, ग्राही, कृमिघ्न, व्रणशोधक और व्रणरोपक है। सड़न को दूर करने का इसका गुण बहुत स्पष्ट है। (१) इसका स्वरस, सिरका और मधु पुरानी खांसी, श्वास, कुक्कुर खांसी और घटसर्प तथा आंत्रिक व्रणों में दिया जाता है। (२) अजीर्ण और अग्निमांद्य में सैन्धव के साथ इसको दिया जाता है। यह ग्राही है तथा इससे उदरशूल दूर होता है। (३) बस्ति पीडा, बस्ति शोथ, तथा लसिकामेह ( Chyluria) एवं मूत्र स्वच्छ न होने पर इसका क्वाथ मधु और सिरके के साथ दिया जाता है। (४) चर्मरोग जैसे दाद, खुजली आदि में यह बहुत लाभदायी है। (५) अग्निदग्ध व्रण पर इसका स्वरस घी के साथ लगाते हैं। (६) सन्धिशोथ आदि में इसको रेंडी के तेल के साथ पीसकर लगाते हैं तथा इसका क्वाथ पीने को देते हैं।


हरीतक्यादिवर्गः २६ (७) इसकी चटनी दृष्टि के लिये उपयोगी है। (८) इसका धूपनार्थ प्रयोग करने से हवा शुद्ध होती है। मात्रा-चूर्ण-१/४ से ३/४ तोला । तेल-१ से ३ बूंद । अथ पारसीक्यवानीगुणानाह पारसीक्यवानी तु यवानीसदृशी गुणः । विशेषात्पाचनी रुच्या ग्राहिणी मादिनी गुरुः ॥८०॥ खुरासानी अजवाइन के गुण-पारसीक्यवानी अर्थात् खुरासानी अजवाइन का भी गुण अजवाइन के समान ही जानना चाहिये। किन्तु विशेषता यह है कि यह पाचक, रुचिकारक, ग्राही, मादक तथा परिपाक में गुरु होती है ॥ ८० ॥ १८ पारसीक यवानी हि०-खुरासानो अजवायन, खुरासानी अजवाइन, खुरसाना । ब०-खुरासानी अजोज़ान । म०-खुरासानी ओंवा, खुरासान ओंवा । गु०-खुरासाणी अजमो, छुहारी अजमोद । ते०-कुरासानीं वाम । ता०-कुरासानी योमाम । पं०-खुरासानी अजवाइन, बजरूल । मा०-खुरासानी अंजवाण । क०-खुरासानी वोभं । फा०-तुख्म वंजे, बङ्गदिवाना, बज्र, तुख्मबिंग, तुख्मेवंग । अ०-बज़रुल बज, अवीद शिकरान, बजुलवज्र, बज़रुल विनग । यू०-अजवायनी खुरसानी । अं०-Henbane (हेनबैन) । ले०-Hyoscyamus niger, Linn. (हायोसियामस नाइगर लिन) । Fam. Solanaceae (सोलेनेसी) । खुरासानी अजवायन केवल खुरासान देश में ही नहीं बल्कि इसके छोटे छोटे क्षुप योरप और मध्य एशिया के कई प्रान्तों के जङ्गलों तथा कूर्ड़ों के ढेर पर उगे हुए रहते हैं। हमारे देश में पश्चिम हिमालय के गरम प्रान्तों में काश्मीर से गढ़वाल तक पाये जाते हैं और सहारनपुर, पूना, आगरा और अजमेर के आस पास के कितने ही स्थानों में इसकी खेती की जाती है। इसकी अन्य जातियां H. reticulatus (हा. रेटिक्यूलैटस), तथा H. muticus (हा. म्यूटिकस-कोहीभंग) होती हैं। H. muticus (हा. म्यूटिकस) अधिक विषैली होती है तथा यह पश्चिमी पंजाब और सिन्ध के जङ्गलो प्रदेशों तथा नदियों के किनारों पर उत्पन्न होती है एवं हा. रेटिक्युलेटस् बलुचिस्तान में होती है। इसका पौधा-सीधा, रोमश, चिपचिपा, उग्रगंधयुक्त एवं १-३ फीट ऊँचा होता है। पत्ते-धतूरे के समान, कुछ कटे किनारेवाले, दन्तुर, नीचे के सवृन्त आयताकार, अंडाकार किन्तु ऊपर के अवृन्त अंडाकार होते हैं। पुष्प-पीले रंग के, पांच पंखडीवाले और आकार में तमाखू के फूलों के समान होते हैं तथा उन पर जामुनी रेखायें होती हैं। फल-अंडाकार, १/२ इंच व्यास के एवं दो खण्डों में विभक्त होते हैं। बीज-भूरे, धूसर, चिपटे, वृक्का- कार, या घोंघा की तरह, १.५-१.७५ x १-१.२ x ०.५-०.७ मि. मि. बड़े, धारीदार, गंधहीन एवं अव्यक्तिक्त होते हैं। हा. म्यूटिकस् के बीज-पीताभ, चिपटे, गोलाई लिये हुवे चौकोर, करोब उतने ही बड़े किन्तु सूक्ष्म गद्देदार, अल्प उग्रगंध युक्त किन्तु स्वादहीन होते हैं। बजार में दोनों मिले हुवे मिलते हैं जिसमें अन्य पदार्थ भी मिले हुवे पाये जाते हैं। आयुर्वेद में बीजों का तथा आधुनिक चिकित्सा विज्ञान में पत्र तथा पुष्पित अग्रभाग के विभिन्न कल्पों का उपयोग किया जाता है।

यूनानी चिकित्सकों के मत से खुरासानी अजवायन सफेद, काली और लाल तीन जाति की होती है। इनमें से काली विष के समान हानिकर और घातक मानी जाती है। रासायनिक संगठन—इसकी पत्तियों में हायोसायमिन (Hyoscyamine) नामक क्षाराभ तथा अल्प मात्रा में हायोसीन (Hyoscine) या स्कोपोलामाइन (Scopolamine), अंट्रोपिन (Atropine), हायोसिप्रिन (Hyosciprin), कोलिन (Cholin), तैल, गोंद, ॲल्ब्यूमिन तथा पोटैशियम नाइट्रेट २% आदि पदार्थ रहते हैं। इसकी विभिन्न जातियों में क्षाराभों की मात्रा भिन्न-भिन्न रहती है । सहारनपुर तथा काश्मीर में लगाये पौधों में इनकी मात्रा प्राकृत पौधों की अपेक्षा अधिक (०३%) होती है, तथा ब्रिटिशफारमाकोपिया के प्रतिमान (०५५%) के करीब होती है। इसके बीजों में हायोसायमिन (Hyoscyamine), २५% तैल, तथा राख ४-५% होती है । गुण और प्रयोग—यह अवसादक, वेदनाहर, स्वापजनक, उद्वेष्टन निरोधी, शामक, बल्य, कनीनिका विकासि, दीपन, पाचन तथा कृमिघ्न है। यह बहुत अच्छा वेदनाहर एवं निद्राकर है। इससे अफीम के समान कब्जियत नहीं होती। इसकी क्रिया बेलाडोना की तरह होती है, लेकिन इससे मस्तिष्क कम उत्तेजित होता है और सुषुम्ना एवं आन्त्र पर इसकी अवसादक क्रिया होती है। इससे अनैच्छिक मांस पेशियों के उद्वेष्टन के कारण होने वाले शूल—जैसे नाग (Lead) शूल तथा मूत्रमार्ग प्रक्षोभ से उत्पन्न शूल—दूर होते हैं। इसका उपयोग उन्माद, अपस्मार, अपतन्त्रक, निद्राभंग, आक्षेप, नाड़ीशूल तथा अनेक मस्तिष्क के विकार एवं मानसिक अस्वस्थता में किया जाता है। सूखी खांसी एवं दमा में श्वसनिकाओं का संकोच दूर होकर लाभ होता है। यह विरेचक औषधियों से उत्पन्न मरोड़ को दूर करती है। पथरी एवं बस्तिशोथ आदि से उत्पन्न प्रक्षोभ में यवक्षार, पाठा तथा गुरुच के साथ यह बहुत गुणकारी है। अल्प मात्रा में देने से यह हृदय के लिये शामक है, और बल्य होने से हृदय की धड़कन में इससे लाभ होता है। पीडितार्तव, अनियमितार्तव में भी इसका अच्छा उपयोग होता है। मध के साथ इसके बीजों को पीसकर स्तनशोथ, अंडशोथ, यकृत पीड़ा एवं संधिशोथ में लगाने से शोथ एवं वेदना कम होती है। दांत के गड्ढे में इसके बीजों को पीस कर रखने से दंतशूल दूर होता है। इसको अंगारों पर जलाकर उसके धुएं को मुख में जाने देने से भी दंतशूल में लाभ होता है। अधिक मात्रा में यह मादक विष है जिससे प्रलाप, संन्यास आदि होकर शीघ्र मृत्यु होती है। वृद्ध एवं दुर्बल इसकी अधिक मात्रा सहन नहीं कर सकते, लेकिन बच्चे अधिक मात्रा सहन कर सकते हैं। मात्रा—पत्र चूर्ण १॥-३ र., बीज चूर्ण १॥-३ र., तरल एक्स्ट्रैक्ट ३-६ बूंद, शुष्क एक्स्ट्रैक्ट १/२-१॥ र., टिंक्चर २०-६० बूंद। अथ शुक्लजीरककृष्णजीरककालिकानां नामानि गुणांश्च जीरको जरणोऽजाजी कणा स्याद्दीर्घजीरकः ॥ ८१ ॥ कृष्णजीरः सुगन्धश्च तथैवोद्गारशोधनः । कालाजाजी तु सुषवी कालिका चोपकालिका ॥८२॥ पृथ्वीका कारवी पृथ्वी पृथुक्रष्णोपकुञ्चिका । उपकुञ्ची च कुञ्ची च बृहज्जीरक इत्यपि ॥८३॥ जीरक्रतितयं रूक्षं कटूष्णं दीपनं लघु । संग्राहि पित्तलं मेध्यं गर्भाशयविशुद्धिकृत् ॥८४॥ ज्वरघ्नं पाचनं वृष्यं बल्यं रुच्यं कफापहम् । चक्षुष्यं पवनाध्मानगुल्मच्छर्द्यतिसारहृत् ॥८५॥ सफेद जीरा, स्याह जीरा तथा कलौंजी (मंगरेला) के नाम तथा गुण—उसमें से जीरक, जरण, अजाजी, कणा और दीर्घजीरक ये सब 'सफेद जीरा' के नाम हैं। कृष्णजीर, सुगन्ध और उद्गारशोधन ये नाम 'स्याहजीरा' के हैं और कालाजाजी (कोई २ काला तथा अजाजी ऐसा पृथक दो नाम मानते हैं), सुषवी, कालिका, उपकालिका, पृथ्वीका, कारवी, पृथ्वी, पृथु, कृष्णा, उपकुञ्चिका, उपकुञ्ची, कुञ्ची और बृहज्जीरक ये सब नाम कलौंजी (मंगरेला) के हैं। तीनों प्रकार के जीरे—रूक्ष, कटुरसयुक्त, उष्णवीर्य, अग्निदीपक, परिपाक में लघु, संग्राहो, पित्तकारक, मेधा के लिये हितकारी, गर्भाशय को शुद्ध करने वाले, ज्वरनाशक, पाचक, वृष्य (वीर्यवर्धक), बलकारक, रुचिकारक, कफनाशक, नेत्रों के लिये हितकारी और वायु, आध्मान, गुल्म, वमन और अतिसार को भी दूर करने वाले होते हैं ॥ ८१-८५ ॥ ९९ शुक्लजीरक (जीरा) हि०—जीरा, सादाजीरा, साधारण जीरा, सफेद जीरा। ब०—सादाजीरे, शाहाजीरे, जीरे। म०— जीरें, पांढरे जीरे। गु०—जीरूं, शाकनु जीरूं, सादु जीरूं, धोलु जीरूं। क०—जीरिगे, बिलिय जिरिगे बिलिय जीरगे। ते०—जिलकारा, जील करर, जील कर्र। ता०—शीरगम। यू०—रवामुने। फा०— जीरये सफेद । अ०—कमून अविअज़ । अं०—Cumin seed (क्युमिन सीड) । ले०—Cuminum cyminum Linn. (क्युमिनम् साइमिनम्, लिन.) । Fam. Umbelliferae (अंबेलिफेरी)। जीरा—एक सर्वप्रसिद्ध मसाले की वस्तु है। आसाम और बंगाल के सिवा प्रायः सब प्रान्तों में विशेषकर राजपूताना और उत्तर भारत के कई प्रान्तों में इसकी खेती की जाती है। यह खेतों में प्रति वर्ष बोया जाता है। इस क्षुप जाति की वनस्पति की शाखायें पतली होती हैं। पत्ते—सौंफ के पत्तों के समान पतले-पतले, लम्बे तथा २-३ एक साथ रहते हैं। बारीक सफेद फूलों के छत्ते लगते हैं। फल—सौंफ के समान होता है ॥ १८ ॥ रासायनिक संगठन—इसमें एक सुगन्धि, उड़नशील तथा हलके पीले रङ्ग का तैल २·५-४% पाया जाता है। इस तैल में क्यूमिक ॲल्डिहाइड् (Cumic aldehyde) की मात्रा ५२% तक होती है जिसके अन्दर कई रासायनिक पदार्थ होते हैं। इस तैल को कृत्रिम रूप से थाइमॉल् (Thymol = अजवाइन का सत्व) में परिवर्तित किया जा सकता है जो अच्छा प्रतिदूषक (Antiseptic) और कृमिघ्न पदार्थ है। इसके अतिरिक्त इसमें स्थिर तैल १०% एवं पेन्टोसान (Pentosan) ६·७% होता है। गुण और प्रयोग—यह पाचक, वातानुलोमक, मूत्रविरजनीय, वेदनाहर, उत्तेजक एवं संग्राहो है। इसका उपयोग वमन, अतिसार, कुपचन, आध्मान, ज्वर तथा मूत्रजननेन्द्रिय संस्थान के रोग जैसे सुजाक, पथरी एवं मूत्रावरोध में किया जाता है। बालकों के पाचन के विकारों में यह अधिक उपयोगी है। (१) ज्वर में पाचन सुधरकर भूख बढ़ती है, पेशाब साफ होती है और दाह शांति होती है इसमें गुड़ के साथ इसका प्रयोग करना चाहिये । (२) अतिसार में दही के साथ इसको दिया जाता है। जीरकाद्यमोदक का उपयोग जीर्ण अतिसार, अपचन एवं अग्निमान्द्यादि रोगों में किया जाता है। गर्भिणी में पित्तजन्य वांति में नींबू के रस के साथ देने से लाभ होता है। (३) सुजाक आदि में निम्न चूर्ण १० रत्ती की मात्रा में देने से लाभ होता है—जीरा ४, खुनखराबा २, कलमीशोरा ५, धनियां ५ तथा गुलाब २ भाग ।

३२ भावप्रकाशनिघण्टुः (४) प्रसूता को देने से दुग्ध वृद्धि होती है। (५) हिचकी में घृत के साथ इसका धूमपान बहुत उपयोगी है। (६) इसको स्वरभंग एवं सर्पविष में भी उपयोगी बतलाया गया है। (७) इसका बाह्यलेप पीडाहर है एवं यह अर्श, स्तन, अण्डकोष तथा उदर की पीड़ा पर लगाया जाता है और घृत, मधु एवं नमक के साथ बिच्छू के काटने पर लगाने से लाभ होता है। इसके क्वाथ से स्नान करने से खुजली दूर होती है तथा इससे सिद्ध तैल का चर्मरोगों में उपयोग होता है। मात्रा—३-२ माशा २० कृष्ण जीरक हि०-काला जीरा, स्या जीरा, स्याह जीरा, कृष्णजीरा। ब०-काल जीरें, कृष्णजीरा। म०- शहाजीरें, शाहाजीरें, कालेजीरे। गु०-स्याजीरुं। क०-करिजीरके, करिजिरीगे । ते०-शिमइसपू। ता०-शिमह शोम्बु । मा०-श्याजीरो। जना०-गूंयूं । फा०-सियाहजीरा, स्याहजीरा, ज़ीरस्याह, जीरयेस्याह । अ०-कमूले किरमानी, कमून अस्वद । आं०-Black Caraway seed (ब्लॅक कॅराबे सीड)। ले०-Carum carvi Linn. (कॅरम् कॅरवई) । Fam. Umbelliferae (अम्बेलीफेरी) । इसका क्षुप उत्तरी हिमालय के पहाड़ी भागों में उत्पन्न होता है। इसकी खेती भारत के मैदानी भागों में एवं काश्मीर, कुमाऊं, गढवाल, चम्बा आदि पहाड़ी स्थानों में की जाती है। यह अफ- गानिस्तान एवं ईरान में भी होता है। यह १-२ फूट ऊँचा, शाखा-कोमल, हरित, एकांतर; पत्र- बहुविभक्त; पुष्प-श्वेत, छत्राकार; फल-कुछ टेढ़ापन लिये लंबे, सुगंधि, भूरापन लिये हुये काले, करीब ७ मि० मि० तक लंबे एवं २ मि० मि० चौड़े एवं दोनों सिरों पर नोकीले होते हैं। रासायनिक संगठन—इसमें एक उड़नशील तैल ३*१-७% पाया जाता है। गुण और प्रयोग-यह दीपन, पाचन, वातानुलोमक और स्तन्यजनन है। आध्मान, उदर- शूल, अतिसार, अपचन, जीर्णज्वर आदि में इसका उपयोग किया जाता है। प्रसूतिकाल में दूध बढ़ाने के लिए इसको देते हैं। यूरोप में इसको शान्तिदायक, मस्तिष्क के लिए उत्तेजक और अप- तंत्रक में उपयोगी मानते हैं। (१) इसके तैल का उपयोग अन्य औषधियों को सुगन्धित करने के लिए एवं उनसे उत्पन्न हृल्लास और मरोड़ को दूर करने के लिए किया जाता है। (२) इसके अर्क का उपयोग बच्चों का पेट फूलना, शूल आदि में अनुपान के रूप में किया जाता है। (३) अर्श में सूजन हो तो इसके क्वाथ से सेकने से लाभ होता एवं गर्भाशय की पीड़ा में स्त्री को इसके क्वाथ में बैठाते हैं। मात्रा—३-२ माशा । नोट-एक अन्य प्रकार के जीरक का वर्णन जिसे संस्कृत में अरण्यजीरक और लैटिन में वर्नोनिया अंन्थेलमिन्टिका; कॉम्पोसिटी (Vernonia anthelmintica Willd; Fam. Compo- sitae ) कहते हैं, परिशिष्ट में देखें । २१ कालाजाजी (कलौंजी) हि०-कलौंजी, कलवंजी, कलौजी, मँगरेला, मंगरैल, मंगरैला। बं०-मोटा कालेजीरे, मोटकालजीर । म०-कलौंजी जीरें, कालेजीरे । गु०-कलौंजी जीरुं । क०-करि जीरिगे । ते०-नल्लुजील कारा। हरीतक्यादिवर्गः ३३ फा०-स्याहदाना । अ०-हब्बतूस्सोदा, शोनीज़ । आं०-Black cumin (ब्लॅक क्युमिन् ), Small fennel (स्मॉल फेनेल), Nigella seed (निगेल्ला सीड)। ले०-Nigella sativa Linn. (निगेला सॅटिवा, लिन.)। Fam. Ranunculaceae रेनन्क्युलेसी ) । कलौंजी हमारे देश का सर्व प्रसिद्ध एक गरम मसाला है। यह प्रायः पूर्व के प्रान्तों में एवं बिहार और पंजाब में अधिक बोई जाती है। दक्षिणी यूरोप तथा सीरिया में भी वह उत्पन्न होती है। इसका क्षुप छोटा, पत्ते लम्बे तथा कटे हुए, फूल-हल्के नीले रंग के और फलियां ३ इंच लम्बी होती हैं। बीज-त्रिकोणाकार, तिल के समान पर तिल से किञ्चित् मोटे और अत्यन्त काले रङ्ग के होते हैं। इसका गूदा सफेद होता है और इसमें तीव्र गन्ध होती है। रासायनिक संगठन—इसमें पीले रंग का उड़नशील तैल ०'५-१'४%, स्थिर तैल ३७'५%, राल, अेल्ब्युमिन, शर्करा, गोंद, टैनिन, ग्लूकोसाइड, मेलान्थिन, मेलान्येजेनिन (१%) आदि पदार्थ पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग—यह सुगन्धित, वातानुलोमक, दीपन, पाचन, गर्भाशय शुद्धिकर, स्तन्य- वर्धक, स्वेदल एवं कृमिघ्न है। इसका उत्सर्ग त्वचा, वृक्क एवं स्तन द्वारा होता है तथा इनके स्रावों की वृद्धि होती है। अधिक मात्रा में इसके सेवन से शरीर की उष्णता बढ़ती है, नाड़ी की गति बढ़ती है तथा साथ ही साथ गर्भाशय संकोच होकर गर्भपात की भी संभावना रहती है। सूतिका में इसका उपयोग चित्रकमूल के साथ करने से भूख बढ़ती है, पाचन ठीक होता है, गर्भाशय शुद्ध होता है तथा दूध भी बढ़ता है। पीडितार्तव वा नष्टार्तव में यह उपयोगी है। सूतिका ज्वर तथा विषमज्वर में इसका उपयोग किया जाता है। अग्निमांद्य, कुपचन तथा आध्मान आदि में अन्य औषधियों के साथ इसका प्रयोग लाभदायक है। हिचकी में मट्ठे के साथ देने से लाभ होता है। विरेचक औषधियों के साथ इसके उपयोग से मरोड़ नहीं होने पाती। यह मसाले के रूप में भी व्यवहार में आता है। इसका लेप हाथ और पैरों की सूजन पर करने से दर्द दूर होकर सूजन कम होती है। त्वक् रोगों में इससे सिद्ध तैल का व्यवहार करते हैं तथा इसका आंतरिक प्रयोग भी करते हैं। मात्रा ३-१ माशा। हानिकर-गर्भिणी के लिये। अथ धान्यकस्य नामानि गुणांश्चाह धान्यकं धानकं धान्यं धाना धानेयकं तथा । कुनटी धेनुका छत्रा कुस्तुम्बुरु वितुन्नकम् ॥८६॥ धान्यकं तुवरं स्निग्धमवृष्यं मूत्रलं लघु । तिक्तं कटूष्णवीर्यञ्च दीपनं पाचनं स्मृतम् ॥ ८७ ॥ ज्वरघ्नं रोचनं ग्राहि स्वादुपाकि त्रिदोषनुत् । तृष्णा दाहवमिश्र्वासकास कार्श्यक्रिमिप्रणुत् ॥८८॥ आर्द्रन्तु तद्गुणं स्वादु विशेषात्पित्तनाशनम् १ ॥ ८८ ॥ धनियाँ के नाम तथा गुण-धान्यक, धानक, धान्य, धाना, धानेयक, कुनटी, धेनुका, छत्रा, कुस्तुम्बरु और वितुन्नक ये सब 'धनियाँ' के नाम हैं। धनियाँ-कषायरसयुक्त, स्निग्ध, अवृष्य, मूत्रजनक, लघु, तिक्त तथा कटुरस युक्त, उष्णवीर्य, अग्निदीपक, पाचक, ज्वरनाशक, रोचक, ग्राही, परिपाक में मधुररसयुक्त, त्रिदोष को दूर करने वाली, तृष्णा (प्यास ), दाह, वमन, श्वास, कास, कृशता तथा कृमिरोग का नाश करने वाली है। कच्ची धनियाँ के भी गुण ३ १. 'पित्तनाशि तदिति पाठः । ३ भा० नि०

३४ भावप्रकाश निघण्टुः 'धनियाँ' ही के समान है किन्तु विशेषता यह है कि यह मधुर रस युक्त तथा पित्त की विशेष रूप से नाशक होती है ॥ ८६- ८८ ॥ २२ धनियाँ हि०-धनियाँ । बं०-धने । म०-धने, । कोथिंबीर, धणे । गु०-धाना, धाणा, कोथमीर । क०-कोथुंबुरी, कोथम्बरी, हविज । ते०-कोत्तिमिरि, धनियल्लु । ता०-कोत्मल्लि, कोतमल्ली । सिन्ध०-धातु । फा०-कश्नीज । अ०-कज़बुरा, कजबुरह । अं० -- Coriander fruit ( कोरि- ॲन्डर फ्रूट ) । ले०-Coriandrum sativum Linn. ( कोरिएण्ड्रम् सैटिवम् लिन ) । Fam. Umbelliferae (अंबेलीफेरी) । इस देश के प्रायः सब प्रान्तों में एवं विदेशों में भी इसकी उपज की जाती है । इसका पौधा १-२ फुट ऊँचा, शाखायें-चिकनी, पत्ते-विषमपत्ती, जड़ के निकटवाले पत्ते गोलाकार, ३-४ या ५ भागों में विभक्त, प्रत्येक भाग कटे किनारे वाले और कँगूरेदार तथा शाखाओं के पत्ते सोआ, चनसुल आदि के पत्तों के समान होते हैं । फूल-छत्ते से सोया के फूल के समान सफेद या किंचित् गुलाबी रंग के आते हैं। फल-नन्हें नन्हें, अण्डाकार, गुच्छों में छत्राकार लगते हैं । सूखने पर वे दो टुकड़े होकर धनिये के नाम से बिकते हैं । रासायनिक संगठन-इसके फलों में एक उड़नशील तैल ०'५-१% तक पाया जाता है जिसमें ४५-५५% कोरिएण्ड्रॉल ( Coriandrol, C₁₀H₁₈O ) तथा कुछ अन्य पदार्थ रहते हैं । इसके अतिरिक्त इसमें स्थिर तैल १३%, वसीय पदार्थ १३%, गोंद, टैनिन, मैलिक एसिड तथा राख ५% आदि पदार्थ पाये जाते हैं । गुण और प्रयोग-धनियां मूत्रल, दीपन, पाचन, वातानुलोमक, संग्राहक, दाहशामक एवं पिपासाघ्न है । इसका उपयोग नेत्र रोग, ज्वरजन्यदाह, वमन, अतिसार, आमाजीर्ण, आध्मान, शूल आदि में किया जाता है। मसाले के रूप में, अनेक औषधियों को सुगन्धित करने के लिए तथा विरेचक ओषधियां जैसे सनाय रेवाचीनी आदि से मरोड न हो इसलिए इसका व्यवहार किया जाता है। ( १ ) ज्वर में दाह एवं प्यास की शान्ति के लिए इसका शीत कषाय मिश्री तथा मधु मिला- कर पिलाते हैं । ( २ ) नेत्राभिष्यन्द में इसके क्वाथ को छानकर नेत्र बिन्दु के रूप में डालने से लाभ होता है। पहले एरण्ड तैल डालकर फिर इसका प्रयोग करना चाहिये । शीतला में आँख धोने के लिये इसके जल का व्यवहार किया जाता है जिससे उत्तरकालीन नेत्राभिष्यन्द एवं नेत्रव्रण आदि उपद्रवों का प्रतिषेध होता है। ( ३ ) इसके तैल का व्यवहार वातनाडी शूल एवं जोड़ों के दर्द में करते हैं तथा बच्चों के आध्मान जन्य शूल में १-४ बूँद मिश्री के साथ देते हैं । ( ४ ) कच्ची धनियां का लेप सिरदर्द तथा भिलावे से उत्पन्न दाह पर किया जाता है। ( ५ ) पुराने घाव, सूजन तथा विषैले फोड़ों पर यवके आटे के साथ इसकी पुल्टिस उपयोगी है । ( ६ ) इसके क्वाथ में मिश्री मिलाकर रक्तार्श में देने से लाभ होता है। ( ७ ) क्षोभशामक होने के कारण धनियां के शीत कषाय का उपयोग अनुपान या सहपान के रूप में स्वप्नमेह एवं श्वेतप्रदर में किया जाता है। हरीतक्यादिवर्गः । ३५ ( ८ ) जीर्ण प्रतिश्याय में धनियां का फाण्ट या बीजों का चूर्ण मिश्री के साथ प्रयुक्त होता है । मात्रा- ३ - ४ माशा । अधिक मात्रा में सेवन से कामशक्ति का ह्रास तथा स्त्रियों में मासिक धर्म रुक जाता है । दर्पनाशक - मधु, दालचीनो और अण्डा । अथ शतपुष्पामिश्रेयोर्नामानि गुणांश्चाह शतपुष्पा शताह्वा च मधुरा कारवी मिसिः । अतिलम्बी सितच्छत्रा संहितच्छत्रिकाऽपि १ च ॥ छत्रा शालेयशालीनी मिश्रेया मधुरा मिसिः । शतपुष्पा लघुस्तीक्ष्णा पित्तकृद्दीवनी कटुः ॥ उष्णा ज्वरानिलश्लेष्मव्रणशूलाक्षिरोगहत् । मिश्रेया तद्गुणा प्रोक्ता विशेषाद्यो निशूलनुत् ॥ अग्निमन्द्यहरी हृद्या वद्धविट्कृमिशुक्रहृत् । रूक्षोष्णा पाचनी कासवमिरुलेष्मानिलाहरेत् ॥ सोया और सौंफ के नाम तथा गुण- शतपुष्पा, शताह्वा, मधुरा, कारवी, मिसि, अतिलम्बी, सितच्छत्रा तथा संहितच्छत्रिका ये नाम सोये के हैं और छत्रा, शालेय, शालीन, मिश्रेया, मधुरा और मिसि ये सब नाम सौंफ के हैं। सोयां-परिपाक में लघु, तीक्ष्ण, पित्तकारक, अग्निदीपक, कड़वरसयुक्त, उष्णवीर्य तथा ज्वर, वातश्लेष्म, व्रण, शूल और नेत्रसम्बन्धी रोगों को दूर करने वाली है और सौंफ के भी सोये के समान ही गुण हैं किन्तु विशेष करके यह योनिसम्बन्धी शूल को दूर करने वाली, अग्नि की मन्दता को नाश करने वाली, हृदय के लिये हितकारक, मल की विबद्धता को दूर करने वाली, कृमि तथा शुक्र का नाश करने वाली, रूक्ष, उष्णवीर्य पाचक एवं कास, वमन, कफ तथा वायु को दूर करने वाली होती है ॥ ८९-९२ ॥ २३ सोआ हि०-सोआ, सोया, सोवा, बनसौंफ । बं०-शुलफा, शुल्का । पं०-सोया । म०-बालंत शोप, शेप । क०-सब्बसिगे । गु०-सुवा । सै०-पुरातकुषिविट् डुलू, सोम्पा । मा०-सोवा, सुवा । ता०-शतकुप्पी विरइ । अं०-Indian dill fruit ( इण्डियन डिल फ्रूट ) । ले०-Anethum sowa Kurz ( अनेथम् सोवा ) । Peucedanum graveolens Linn. (प्यूसिडैनम् ग्रॅवियोलेन्स लिन) Fam. Umbelliferae ( अंबेलीफेरी ) । युरोपीय जाति प्यूसिडैनम् ॲवियोलेन्स ( Peucedanum graveolens ) से भारतीय जाति में कुछ अन्तर होने के कारण भारतीय जाति को अनेथम सोवा ( Anethum sowa ) कहते हैं । इस देश के सब प्रान्तों में विशेषकर गरम और शीत गरम प्रान्तों में इसकी खेती शीत ऋतु में की जाती है। यह क्षुप जाति की वनस्पति १-३ फुट तक ऊँची होती है । पत्ते-कई भागों में विभक्त, बारीक और अत्यन्त कोमल होते हैं । फूल-छत्राकार किञ्चित् पीले रंग के होते हैं । फल-अंडाकार, चिपटे, उन्नतोदर, किनारे पर सपक्ष एवं प्रायः दोनों अर्धखण्ड मिले हुये तथा आधार पर पतला डण्ठल लगा रहता है। ये विदेशी बीजों से कम चौड़े तथा अधिक उन्नतोदर और इनके पृष्ठ भाग की धारियां हलके रंग की होती हैं । १. 'संहिते'ति पाठा० ।

३६ भावप्रकाश निघण्टुः रासायनिक संगठन—इसके फलों में ३-३.५% एक उड़न शील तैल पाया जाता है । इस तैल में डिल एपिओल (Dill-apiole, C₁₂H₁₄O₄) नामक एक तैलीय पदार्थ रहता है जो पारस्ले एपिओल (Parsley apiole, C₁₂H₁₄O₄) के सदृश होते हुये भी गुणों में उससे पृथक् (Isomeric = आइसॉमेरिक्) रहता है । इसके अतिरिक्त इसमें एक तरल हाइड्रोकार्बन ॲनीथेन् (Hydrocarbon-anethene, C₁₀H₁₆) और कारवोन (Carvone) सदृश पदार्थ रहता है । विदेशी और भारतीय तैल में थोड़ा अन्तर होता है । गुण और प्रयोग—सोआ दीपन, पाचन, वातानुलोमक, सुगन्धि, उत्तेजक, वातहर, गर्भाशय उत्तेजक एवं दुग्धवर्धक है। बालकों के पचन विकारों में, विशेषकर आध्मान एवं शूल में चूने के जल के साथ इसके अर्क का बहुत व्यवहार किया जाता है। प्रसूता में भी वमन, अजीर्ण, हिक्का, आध्मान, शूल तथा दुग्ध वृद्धि आदि के लिये इसके क्वाथ का प्रयोग किया जाता है । अनार्तव में भी इसका प्रयोग करते हैं । केल और म्हसकर के मतानुसार अंकुश कृमि (Hookworm) में यह उपयोगी है । (१) अतिसार में मेथी और सोआ घी में भूनकर देते हैं । (२) इसके पत्तों को तेल लगा कर गरम करके फोड़े फुन्सियों पर बांधने से वे जल्दी पक जाते हैं । (३) इसके पत्ते तथा मूल को पीसकर जोड़ों की सूजन पर बांधने से लाभ होता है । (४) विरेचक औषधियों के साथ इसके तैल या अर्क के व्यवहार से मरोड नहीं होती । (५) चरक की राजयक्ष्मा की चिकित्सा में पार्श्वशूलहर लेप में इसका उल्लेख है । मात्रा—फल चूर्ण - १-४ माशा, तैल-१-३ बूंद, अर्क-३-१ औंस । संकेन्द्रित जल (अंका कन्सैन्ट्रैट = Aqua Concentrata) - ५-१५ बूंद । २४ सौंफ हि०-सौंफ, बड़ी सौंफ, सवँफ । ब०-मौरी, पान मौरी । म०-बड़ी शेगले गु०-वरीआली, वलीय़ारी । क०-बड़ी सोपु, सब्बसिंगे । मा०-सौंफ । प०-सौंफ । ते -सोपु, पेद्दजिलकुरा । ता०-सौदिकिरे, शोम्बु । फा०-राजयानज्, राजयाना, बादियां, बादियान, राजियानह् । अ०- एजियानज़, असुलुल एजियानज़, राज़ियाज़ । अं०-Fennel Fruit (फेन्नेल फ्रूट)। ले०-Foe- niculum vulgare Mill. (फिनिक्यूलम् वलगेरि); Syr.-Anethum foeniculum (एनेथम् फिनिक्यूलम् ।। Fam. Umbelliferae (अंबेलिफेरी)। प्रायः सब प्रान्तों के खेतों में यह बोई जाती है । इसका क्षुप लम्बा, पत्ते-कई भागों में विभक्त सोये के पत्तों के समान, फूल-छत्राकार किञ्चित पीले रंग के और फल-६ से ७ मि. मि. लम्बे, ४ मि. मि. चौड़े, आयताकार, प्रायः अखण्डित एवं डंठल युक्त होते हैं । नये बीज हरे रंग के और पुराने होने पर पीलापन युक्त हो जाते हैं। जिन फलों का तेल निकाल लिया जाता है उनमें तैल की मात्रा कम हो जाती है और उनकी गन्ध भी कम होती है तथा वे अधिक गहरे रंग के हो जाते हैं। रासायनिक संगठन-इसमें एक उड़नशील तैल १-२.९% और स्थिर तैल ८.८-१५.८% रहता है । इस उड़नशील तैल में एनीथॉल् (Anethol) ६०% तथा फेनकोन् (Fenchone)


हरीतक्यादिवर्गः ३७ आदि कुछ अन्य पदार्थ रहते हैं । विदेशी सौंफ की अपेक्षा भारतीय सौंफ में इस तैल की मात्रा कम रहती है । गुण और प्रयोग-यह सुगन्धि, दीपन, पाचन, वातानुलोमक, दाहप्रशमन एवं मूत्रविर- जनीय है । इसका उपयोग विशेषरूप से मसाले के रूप में एवं मादक पेयों में सुगन्धि के लिये किया जाता है। इसका अर्क बच्चों के पाचन के विकार जैसे आध्मान, शूल आदि में दिया जाता है और अन्य औषधियों के अनुपान के रूप में भी व्यवहार करते हैं। इसका व्यवहार आमातिसार, अजीर्ण, आध्मान, ज्वर, खांसी, श्वास, वृक्कयोग, प्लीहा वृद्धि, अनार्तव तथा दृष्टिमांद्य आदि रोगों में किया जाता है । (१) इसको पीसकर पीने से पेशाब की जलन दूर होकर पेशाब साफ होती है । (२) सूखी खांसी और मुख के विकारों में इसे मुख में रखने से लाभ होता है । (३) इसके पत्र सुगन्धि, मूत्रल और स्वेदजनक होते हैं । (४) इसका मूल विरेचक होता है । (५) इसके फलों को पीसकर लेप करने से गरमी के दिनों में होने वाला चक्कर तथा शिरःशूल दूर होता है । (६) आध्मान में इसके क्वाथ से बस्ति देने से लाभ होता है । मात्रा-४ रत्ती से २ माशा तक । नोट-एक अन्य प्रकार की सौंफ जिसे 'बादियाण' (Pimpinella anisum Linn. पिंपिनेल्ला एनिसम्) कहते हैं उसका वर्णन परिशिष्ट में देखें । अथ मेथीवनमेथीनामगुणानाह 'मेथिका मेधिनी मेथी दीपनी बहुपत्रिका । बोधिनी बहुबीजा च ज्योतिर्गन्धफला^२ तथा । वल्लरी चन्द्रिका मन्था मिश्रपुष्पा च केरवी । कुञ्चिका बहुपर्णी च पीतबीजा^३ मुनिच्छदा ॥ मेथिका वातशमनी श्लेष्मघ्नी ज्वरनाशिनी । ततः स्वल्पगुणा वन्या^४ वाजिनां सा तु पूजिता ॥ मेथी तथा वनमेथी के नाम तथा गुण-मेथिका, मेथिनी, मेथी, दीपनी, बहुपत्रिका, बोधिनी, बहुबीजा, ज्योतिः, गन्धफला, वल्लरी, चन्द्रिका, मन्था, मिश्रपुष्पा, केरवी, कुञ्चिका, बहुपर्णी, पीतबीजा और मुनिच्छदा ये सब नाम मेथी के हैं। मेथी-वायु को शमन करने वाली, कफ को दूर करने वाली तथा ज्वर को नष्ट करने वाली है और वनमेथी-मेथी की अपेक्षा कम गुण वाली होती है, किन्तु वह घोड़ों के लिये अत्यन्त उत्तम (हितकर) होती है ॥ ९३-९५ ॥ २५ मेथी हि०-मेथी । पं०-बं०-म०-गु०-मेथी । ते०-मेंडुलु, मैंतुलु, मेंति । ता०-वेण्डयम्, वेंडयम, वेन्दयम । क०-मेंत्रे । मल-उल्लव । फा०-तुख्माशमलीत । अ०-बजरुल हुल्वा, वजरुलहुल्वह्, हुलबह् । १. 'मिथिनौ'ति पाठा० । २. 'जाती'ति पाठा० । ३. 'पित्तजिद्वायुनुद्विधे'ति पाठा० । ४. 'वल्वे'ति पाठा० ।

३८ भावप्रकाशनिघण्टुः अं०-Fenugreek (फेनुग्रीक) । ले०-Trigonella foenumgraecum Linn. (ट्राइगोनेल्ला फोएनम् ग्रेडकम्) । Papilionaceae (पैपिलिओनेसी) । प्रायः सब प्रान्तों में इसकी खेती की जाती है परन्तु पञ्जाब और काश्मीर में यह आपही आप जङ्गल में उत्पन्न होती है। इसका क्षुप ६ इञ्च से १६-१७ इञ्च तक ऊँचा होता है। पत्ते संयुक्त एवं प्रत्येक सींक पर तीन तीन पत्रक रहते हैं और वे आधे से एक इञ्च तक लम्बे, अण्डाकार और बारीक कंगूरेदार होते हैं। फूल-नन्हें नन्हें हलके पीत रङ्ग के आते हैं। फलियाँ-गोल २-३ इञ्च लम्बी कुछ टेढ़ी सी नोकदार रहती हैं। प्रत्येक से १०-२० पीले रङ्ग के दाने निकलते हैं। इन्हीं का चिकित्सा में अधिक उपयोग करते हैं। रासायनिक सङ्गठन-इसके सूखे पञ्चाङ्ग में प्रोटीन (Protein) की मात्रा १६% रहती है जिसमें से इसके ग्लोब्यूलिन (Globulin) में हिस्टिडीन् (Histadine) की काफी मात्रा रहती है। इसके अलब्यूमिन् (Albumin) भाग में फॉस्फोरस् (Phosphorus) तथा गन्धक रहता है। इसके बीजों में ट्रिगोनेल्लिन (Trigonelline, C_7 H_7 O_2 N), कोलीन (Choline) आदि क्षाराम, एक पीत रञ्जक पदार्थ, स्थिरतैल ६%, प्रोटीन २२% तथा गोंद २८% रहता है। बीजों को जलाने से इसमें ७% राख निकलती है जिसमें से ३ फॉस्फोरिक् एसिड (Phosphoric acid) रहता है। इसके बीजों में फॉस्फेट्स (Phosphates), लेसिथिन् (Lecithin) और न्यूक्लिओ अलब्यूमिन् (Nucleo-albumin) रहने के कारण ये कॉडलिवर ऑइल (Cod-liver oil) के समान पोषक तथा बलकारक होते हैं। गुण और प्रयोग-इसके बीज स्निग्ध, सुगन्धि, वातानुलोमक, अग्निदीपक, आध्मानहर, बल्य, वृष्य, वातहर, गर्भाशय सङ्कोचक, दुग्ध वृद्धिकर एवं शोथघ्न होते हैं। इसके पत्र शीतल, दाहशामक, शोथहर एवं मृदु विरेचक होते हैं। (१) इसके बीजों से बनाये लड्डू का व्यवहार प्रसूता में किया जाता है जिससे भूख बढ़ती है, मल शुद्धि और आर्तवशुद्धि होती है। अजीर्ण, अग्निमांद्य, आमवात, एवं कामशक्ति की कमजोरी में भी ये उपयोगी हैं। (२) रक्तातिसार एवं मसूरिका में इसके बीज भूनकर और फिर उसका फांट बनाकर देते हैं। (३) शरीर की पीड़ा में इसके बीजों को ३-१ तोला की मात्रा में खिलाने से लाभ होता है। (४) दुग्ध वृद्धि के लिये इसकी लप्सो बनाकर प्रसूता को दी जाती है। (५) घी में भुने हुये मेथी के बीज, बादियाण और नमक का व्यवहार अतिसार रोकने के लिये करते हैं। (६) इसके बीजों को कॉडलिवर आइल के स्थान पर दे सकते हैं और इसका व्यवहार गण्डमाला, फक्करोग, पाण्डु, वातरक्त, मधुमेह और औपसर्गिक रोगजन्य दौर्बल्य में किया जाता है। (७) मिश्र में ज्वर रोकने के लिये इसको अङ्कुरित करके खिलाते हैं। मधुमेह में भी इससे लाभ होता है। (८) चर्मको मुलायम और स्वच्छ रखने के लिये इसके बीजों का उपयोग किया जाता है। बालों के झड़ने पर तथा सूजन पर इसका लेप उपयोगी है। श्वेतप्रदर में इसकी पेसरी को धारण कराया जाता है।


हरीतक्यादिवर्गः ३६ (९) इसके पत्तों का भी लेप सूजन एवं दाह में किया जाता है। लू लगने में इसके पत्तों को पीसकर शरीर पर मलते हैं तथा आन्तरिक व्यवहार भी करते हैं जिससे दाह की शान्ति होती है। अल्पमूल्य में बल्य एवं पोषक होने के कारण पशुओं को भी खिलायी जाती है। मात्रा-चूर्ण ३-३ तोला । २६ बनमेथी हि०-बनमेथी, जङ्गली मेथी । पं०-सिंजी । सिन्ध-जिर । अ०-अकूलिल्-उल्-मल्लिका । अं०-Sweet-cloves (स्वीट् क्लोव्हस्) । ले०-Melilotus parviflora Desf. मेलिलोटस् पार्विफ्लोरा); Syn.-Trifolium indicum Linn. (ट्रिफोलिअम् इण्डिकम्) । Fam. Leguminosae (लेग्युमिनोसी) । पश्चिम प्रायद्वीप, बंगाल और उत्तरप्रदेश आदि स्थानों में यह आप ही आप उत्पन्न होती है। इसका क्षुप-३० से ४५ मि० मि० ऊँचा तथा वर्षायु होता है। पत्र-संयुक्त तथा त्रिपत्रक होते हैं। पत्रक-१२ से १६ × ८ से १० मि० मि०, दन्तुर, अर्धभालाकार या अर्ध अंडाकार होते हैं। पुष्प-सूक्ष्म, पीतवर्ण की मंजरियों में आते हैं। फली-दीर्घवृत्ताकार, दबी हुई, दोनों छोर पर पतली एवं २.५ मि० मि० लंबे एक बीज युक्त होती है। गुण और प्रयोग-इसके बीज ग्राही होते हैं तथा उदरशूल, अतिसार और आंत्र के विकारों में लाभदायक हैं। इसका व्यवहार कष्टार्तव, आमवात, गण्डमाला आदि में तथा रक्त शुद्धि के लिये किया जाता है। बच्चों के अतिसार में इसकी लप्सी का व्यवहार करते हैं। अथ चन्द्रशूरस्य नामानि गुणांश्चाह चन्द्रिका चर्महन्त्री च पशुमेहनकारिका । नन्दिनी कारवी भद्रा वासपुष्पा सुवासरा ॥५६॥ चन्द्रशूरं हितं हिक्कावातश्लेष्मातिसारिणाम् । असृग्वातगदद्वेषि बलपुष्टिविवर्द्धनम् ॥५७॥ चनसूर के नाम तथा गुण-चन्द्रिका, चर्महन्त्री, पशुमेहनकारिका, नन्दिनी, कारवी, भद्रा, वासपुष्पा और सुवासरा ये नाम चनसूर के हैं। चनसूर-हिक्को, वात-श्लेष्मा और अतिसार ग्रस्त रोगी तथा रक्तवातग्रस्त रोगियों के लिए हितकर है और बल तथा पुष्टिवर्धक भी है ॥५६-५७॥ २७ चन्द्रिका (हालों) हि०-हालों, हालिम, चनसुर, चन्दसुर, चन्द्रशूर । बं०-हालिम, हालिमा, हालो, चान्दसूर, अलेवेरी । म०-आलीव, हलिम, अहालीव । गु०-अशेलीओ, अशेरिया, आंशाल बीज । यू०- तरम राह के बीज । फा०-तुख्म तरह तेजक । अ०-बाजरुज्जरजीर । कुमा०-हालिम । ता०-अलिविरह । ते०-अदित यलु । प०-तेजक । सि०-अहेरो । क०-अह्लिबीज । अं०- Common Cress (कॉमनक्रेस) । ले०-Lepidium sativum Linn. (लेपिडियम् सेटि- वम्) Fam. Cruciferae (क्रूसीफेरी)। यह सब प्रान्तों में बोया जाता है। इसका क्षुप-१ से ३ फीट ऊँचा, मसृण या कुछ रोएंदार होता है। पत्ते-विभक्त होते हैं। पुष्प-सफेद तथा छोटे होते हैं। फल-०.२ इञ्च, चिपटे, १. 'चन्द्रिकाया' इति पाठा० । २. 'वामपुष्पे'ति पाठा० ।

४० | भावप्रकाश निघण्टुः अण्डाकार परन्तु अग्र पर भीतर की तरफ दबे हुये रहते हैं। बीज—छोटे, लाल तथा जल में डालने पर लुआबदार होते हैं। अधिकतर इसके बीजों का उपयोग करते हैं। रासायनिक संगठन—इसके बीजों में एक सुगन्धि उड़नशील तथा स्थिर तैल पाया जाता है। इसमें आयोडीन (Iodine), लोह, फॉस्फेटस् (Phosphates), पोटैश (Potash), कुछ लवण, एक तिक्त सत्व एवं जल आदि पदार्थ रहते हैं तथा गन्धक अधिक मात्रा में रहता है। इसके ग्लूको- साइड (Glucoside) को ग्लूकोट्रोपोइओलिन (Glucotro-poeolin) कहते हैं। गुण और प्रयोग—चनसुर रसायन, बल्य, वाजीकर, उत्तेजक, आनुलोमिक, दुग्धवर्धक एवं शूलहर है। इसका उपयोग प्रसूतावस्था, रक्तदोष, त्वचा के रोग, नेत्र रोग, यकृत और प्लीहा की जीर्ण वृद्धि, ग्रन्थिरोग, रक्तांश, श्वास, कास एवं अतिसार आदि में किया जाता है। (१) इसके फांट का व्यवहार आमाशय के प्रक्षोभ से उत्पन्न हिक्का में किया जाता है। इसको बार-बार थोड़ी-थोड़ी मात्रा में पिलाना चाहिये। इसी प्रकार प्रक्षोभजन्य अतिसार एवं ग्रहणी में भी इससे लाभ होता है। (२) गरी के साथ इसकी बर्फी या दूध में लप्सी बनाकर प्रसूता को दिया जाता है। यह रसायन, पौष्टिक तथा दुग्धवर्धक है। इससे कटिशूल एवं श्वेतप्रदर में भी लाभ होता है। दूध में उबाल कर गर्भपात कराने के लिए प्रयोग में लाते हैं। पुरुषों के लिए भी यह रसायन तथा वाजी- कर है एवं इसका व्यवहार शरीर की ऊँचाई बढ़ाने के लिए करते हैं। (३) मिश्री के साथ इसका चूर्ण कुपचन, अतिसार एवं ग्रहणी आदि में देते हैं। (४) नींबू के रस में पीसकर इसका लेप कटिशूल, आन्त्रिक शोथ, आमवात तथा सन्धिशूल आदि में करते हैं। (५) इसके पत्र मूत्रल तथा उत्तेजक होते हैं एवं इनका सलाद प्रशीताद (Scurvy = स्कर्वी) नामक रोग में व्यवहार में लाया जाता है। (६) इसकी जड़ का व्यवहार फिरङ्ग तथा निस्तानिका (Tenesmus = टेनेस्मस्) में किया जाता है। मात्रा—$\frac{१}{४}$-१ तो०।

अथ चतुर्बीजगुणानाह

मेथिका चन्द्रशूरश्च कालाऽजाजी यवानिका । एतच्चतुष्टयं युक्तं चतुर्बीजमिति स्मृतम् ॥९८॥ तच्चूर्णं भक्षितं नित्यं निहन्ति पवनामयम् । अजीर्ण शूलमाध्मानं पार्श्वशूलं कटिष्यथाम् ॥ 'चतुर्बीज' (चारदाना) के गुण—मेथी, चनसुर, मंगरैला और अजवाइन इन चारों के बीजों के योग को 'चतुर्बीज' (चारदाना) कहते हैं और इस चतुर्बीज का चूर्ण बनाकर नित्य खाने से वात सम्बन्धी रोग, अजीर्ण, शूल, आध्मान, पार्श्वशूल और कमर का दर्द दूर होता है॥९८-९९॥

अथ हिङ्गुनामगुणानाह

सहस्रवेधि जतुकं बाह्लीकं हिङ्गु रामठम् ॥ १०० ॥ हिङ्गूष्णं पाचनं रुच्यं तीक्ष्णं वातबलासत्नुत् १। शूलगुल्मोदरानाहकृमिघ्नं पित्तवर्धनम् ॥ १. 'हृदि'ति पा० ।


हरीतक्यादिवर्गः | ४१ हींग के नाम तथा गुण—सहस्रवेधि, जतुक, बाह्लीक, हिङ्गु और रामठ ये सब नाम हींग के हैं। हींग उष्णवीर्य, पाचक, रुचिकारक, तीक्ष्ण, वात-श्लेष्म को दूर करने वाला, शूल, गुल्म, उदर सम्बन्धी रोग, आनाह (अफरा) और कृमियों को नष्ट करनेवाला एवम् पित्त को बढ़ाने वाला होता है ॥ १००-१०१॥

२८ हींग

हि०—हींग। ब०—हिंगु। पं०—हिंगे, हीग। म०—हिंग। मा०—हींग। गु०—हिंगड़ो, बधारणी, हिंग बघारणी। ते०—इङ्गुव, इंगुव, इंगुरा। ता०—पेरुंगियम्, पेरुंग्यम्। क०—हिंगु। फा०—अंगूजह, अंगुजा, अंगुजहे-ईल्ती। अ०—हिल तीत, हिल्तीस। अ०—Asafoetida (असेफीटिडा)। लै०—Ferula narthex, Boiss. (फेरुला नार्थेक्स, बॉ़यस.); F. alliacea Boiss. (फे. एलिएसिआ); Ferula foetida Regel (फेरुला फीटिडा)। Fam. Umbelliferae (अंबेलिफेरी)। हींग सर्व प्रसिद्ध वस्तु एक विदेशीय वृक्ष का निर्यास है। इसकी उपर्युक्त कई जातियां विभिन्न स्थानोंपर होती हैं जिनसे कुछ कुछ भिन्न प्रकार का निर्यास प्राप्त किया जाता है। अधिकांश मिला- वटी हींग बिकती है। इनमें चोखी हींग, हीरा हींग, तलाव हींग इत्यादि अच्छी समझी जाती हैं। जो हींग रूमी मस्तगी के समान वर्ण वाली, गरम घी में डालने से लावा के समान खिल जाने वाली तथा लालिमा लिये भूरे या बादामी रंग की हो वह अच्छी मानी जाती है। उत्तम हींग की डली को तोड़ने से वह भाग बादामी रंग का दिखाई पड़ता है। इसका स्वाद कड़वा और लहसुन के समान खराशदार तथा इसकी गन्ध लहसुन के समान तीव्र होती है। पानी में घोलने से सफेद रंग की दिखाई पड़ती है। हींग के वृक्ष काबुल, हिरात, खुरासान, फारस एवं अफगानिस्तान आदि प्रदेशों में उत्पन्न होते हैं तथा इस देश के पंजाब और काश्मीर में कहीं कहीं देखने में आते हैं। विभिन्न जातियों में थोड़ा बहुत स्वरूप में अंतर होता है। इसका वृक्ष झाड़ के समान छोटा, ५ से ८-९ फीट तक ऊँचा होता है। पत्ते अनेक भागों में विभक्त, अजमोदे के पत्तों के समान कटे किनारे वाले एवं १-२ फुट लम्बे होते हैं तथा टहनियों के अन्त में फूलों के गुच्छे लगते हैं। फल-तिहाई से तीन चौथाई इञ्च के घेरे में अण्डाकार होते हैं। चार वर्ष का वृक्ष होने पर इसको काटते हैं और भूमि के पास वाली जड़ को तिरछे तराशने से जो रस निकल कर सूख जाता है उसको दो दिन के बाद खुरच कर संग्रह कर लेते हैं। फिर दो दिन के बाद जड़ को उसी प्रकार ऊपर से तराश कर छोड़ देते हैं और सूखने पर खुरच कर इकट्ठा कर लेते हैं। यही सूखा हुआ पदार्थ हींग है। प्रत्येक वृक्ष से २-३ छटांक से ५-६ छटांक तक हींग मिल सकती है। देशी हींग की अपेक्षा काबुली हींग अच्छी होती है। साधारण परीक्षा—(१) जल के साथ घोटने से इसका पीताभ दूधिया घोल बनता है जो क्षार मिलाने पर हरिताभ पीत हो जाता है। (२) थोड़ेसे हींग को गन्धक के तेजाब के साथ गरम करने पर लाल से भूरे रंग का घोल बनता है। इस घोल को अधिक जल से विरल बनाकर (Dilute), छानकर (filtering) उसको क्षारीय करने से एक गाढ़े नीले रंग की चमक उत्पन्न होती है (Purplish-blue fluorescence)।

४२ भावप्रकाश निघण्टुः

**मिलावटें—**हींग में कंकड़, बालू, मिट्टी, मूल के टुकड़े, गोदन्ती तथा गोंद आदि मिलाये रहते हैं ।

**रासायनिक संगठन—**यह गन्धक का सेन्द्रिय योग है । इसमें लहसुन में पाये जाने वाला एक उड़नशील तैल ३-१७% रहता है । इस तैल में टरपेन्स ( Terpenes ), डाइसल्फाइड्स ( Disulphides, $C_7H_{14}S_2$ and $C_{11}H_{20}S_2$ ) और एक नीले रंग का तरल पदार्थ $(C_{10}H_{16}O)n$ रहता है । इसमें राल ४०-६५% रहती है जिसमें असारेसिनोटेनॉल ( Asaresinotannol ), असा-रेसिनोल फेरूलिक एसिड इस्टर ( Asaresinol ferulic acid ester ) तथा फ्री फेरूलिक एसिड ( Free ferulic acid-1.3% ) रहता है । इसके अतिरिक्त इसमें गोंद की मात्रा २५% रहती है । शुद्ध हींग में ६५-७५% मद्यसार में घुलने वाले पदार्थ रहते हैं तथा राख ३-५% रहती है । इसकी राल का उर्ध्व पातन ( Dry distillation ) करने से अंबेलिफेरोन् ( Umbelliferone ) प्राप्त होता है लेकिन भारतीय जाति से यह प्राप्त नहीं होता ।

**गुण और प्रयोग—**हींग दीपन, पाचन, वातानुलोमक, उद्वेष्टन निरोधि, उत्तेजक, कफदुर्गन्धि हर, कफनिःसारक, वातनाड़ियों के लिये बल्य, गर्भाशयसंकोचक एवं कृमिघ्न है । इसका उत्सर्ग फुफ्फुस, त्वचा, मूत्र तथा पसीने के द्वारा होता है ।

इसका उपयोग आध्मान, शूल, अपस्मार, अपतन्त्रक, वातविकार, श्वास, कास, कुकास एवं हृच्छूल आदि में किया जाता है । हींग को घृत में भूनकर व्यवहार में लाया जाता है जिससे वमन नहीं होने पाता ।

(१) फुफ्फुस के रोगों में हींग का अच्छा उपयोग होता है। जीर्ण श्वास नलिका शोथ, दमा, कुकास, बच्चों के फुफ्फुसपाक एवं शुष्क कास आदि में इसका व्यवहार किया जाता है। इसके लिये जल के साथ हींग के घोल का व्यवहार करना चाहिये ।

(२) आध्मान, शूल, विबन्ध एवं आमाशय तथा आन्त्र की शिथिलता में अजवाइन अथवा एलुवा और साबुन के साथ गोली बनाकर दिया जाता है । ऐसे विकारों में हिंग्वाष्टक चूर्ण अथवा हिंगुकर्पूरवटी का बहुत व्यवहार किया जाता है ।

(३) विषमज्वर में प्रतिबन्धन की दृष्टि से अन्न के साथ हींग का व्यवहार किया जाता है ।

(४) अपस्मार, अपतन्त्रक एवं तज्जन्य अन्य विकारों में इसका बहुत अच्छा उपयोग होता है ।

(५) प्रसव के बाद इसके उपयोग से आर्तव शुद्धि होती है। बार बार होने वाले गर्भपात को रोकने के लिये भी इसका उपयोग करते हैं । गर्भ रहते ही ६ माशे हींग की ६० गोलियां बनाकर प्रारम्भ में १ गोली दिन में दो बार देते हैं । बाद में धीरे धीरे इसकी मात्रा बढ़ाते हुये १० गोली प्रतिदिन देते हैं और फिर प्रसवतक धीरे धीरे इसकी मात्रा कम करते हैं ।

(६) आध्मान, शूल एवं आक्षेप आदि में २-३ माशा हींग जल के साथ घोटकर उसकी बस्ति दी जाती है । इससे सूत्र कृमि में भी लाभ होता है ।

(७) सीलोन में नारियल के दूध में हींग को उबालकर सर्पदंश के स्थान पर लगाते हैं तथा पानी में इसको घोलकर नाक में भी टपकाते हैं। बिच्छू के काटने पर भी इसको लगाने से लाभ होता है।

(८) बच्चों के पेट फूलने पर इसका लेप पेट पर लगाते हैं तथा कुकास में छाती पर लेप करने से लाभ होता है। नारू तथा दाद पर इसको लगाने से लाभ होता है।


हरीतक्यादिवर्गः ४३

(९) हींग तथा अफीम की गोली दांत के दर्द में दांत के गड्ढे में रखने से लाभ होता है।

(१०) हींग, लहसुन तथा सैंधव आदि पदार्थों से सिद्ध तैल कर्णरोगों में बहुत उपयोगी है। इसको $\frac{३}{२}-१$ चम्मच दूध के साथ दिन में ३, ४ बार या सुबह ४ चम्मच एक साथ ही दूध और मिश्री के साथ पिलाते हैं एवं इसको गर्म करके कान में ३, ४ बूँद डालते हैं। यह तैल बहुत अच्छा प्रतिदूषक ( Antiseptic ) है एवं इसका अन्तर्वाह्य प्रयोग उपयोगी है।

**मात्रा—**२-८ रत्ती ।


अथ वचाया नामानि गुणाँश्चाह

वचोग्रगन्धा षड्ग्रन्था गोलोमी शतपर्विका । क्षुद्रपत्री च मङ्गल्या जटिलाोग्रा च लोमशा ॥ वचोग्रगन्धा कटुका तिक्तोष्णा वान्तिवह्निकृत् । विबन्धाध्मानशूलघ्नी शकृन्मूत्रविशोधिनी ॥ अपस्मारकोन्मादभूतजन्तवनिळान्हरेत् ॥ १०३ ॥

**वच के नाम तथा गुण—**वचा, उग्रगन्धा, षड्ग्रन्था, गोलोमी, शतपर्विका, क्षुद्रपत्री, मङ्गल्या, जटिला, उग्रा और लोमशा ये सब नाम वच के हैं । **वच—**उग्रगन्ध युक्त, तिक्त तथा कटुरस वाली, उष्णवीर्य, वमनकारक, अग्निजनक, विबन्ध, आध्मान और शूलको नष्ट करने वाली एवं मल तथा मूत्र का शोधन करने वाली होती है। एवम् मिर्गी, कफ, उन्माद, भूतबाधा, कृमि तथा वायु को भी दूर करने वाली होती है ॥ १०२-१०३ ॥


२९ वच

**हि०—**वच, घोरवच, घोड़वच। **ब०—**वच । **म०—**वेखण्ड । **ते०—**वासा, वस । **ग०—**वज, घोड़ावज । **क०—**बजे । **ता०—**वशाम्बु । **मला०—**व्ययम्पु । **गोमा०—**वेखण्ड । **पं०—**बरि बोज । **फा०—**सोज़न जर्व, अगारि तुर्की । **अ०—**उद्दल बुज, अकरून, बज, विज । **यू०—**अकुरुन् । **अं०—**Sweet Flag (स्वीट फ्लैग) । **ले०—**Acorus calamus, Linn. (एकोरस् कॅलॅमस्, लिन.) । Fam. Araceae (एरेंसी) ।

एशिया खण्ड का मध्य भाग तथा पूर्वी यूरोप वच का उत्पत्ति स्थान माना जाता है। मणीपुर, नागा पहाड़, काश्मीर, सिरमूर और युक्त प्रान्त के कितने ही देशों के दलदल और सजल स्थान, में यह उत्पन्न होती है ।

यह गुल्म जाति की बनौषधि ३-४ हाथ ऊँची होती है। इसकी जड़ अन्य पौधों की जड़ की तरह सीधी नहीं रहती बल्कि बहुत सी जटा के सदृश जड़ की शाखायें चारों ओर फैली हुई रहती हैं और इसकी मुटाई मध्यमा उँगली के समान होती है। प्रत्येक गांठ के चारो ओर सघन रोवें से होते हैं। इसके पत्ते लम्बे, पतले और तलवार के समान रहते हैं। मंजरियां सघन, विदाण्डक, २-४ इञ्च लम्बी, लम्ब गोल और ६-१८ इञ्च लम्बे पत्रकोशों से ढकी रहती हैं । वच के पौधों के सर्वाङ्ग में गन्ध आती है और इसकी जड़ में यह अत्यधिक होती है। मूलस्तम्भ तथा राइजोम ( Rhizome ) को टुकड़े टुकड़े कर बाजार में बेचते हैं । ये भूरे रङ्ग के और सुगन्धित होते हैं जिनके निचले हिस्से पर मूल के निशान रहते हैं तथा ऊपर के भाग में लम्बी गठेदार धारियां होती हैं ।

४४ भावप्रकाशनिघण्टुः बाजार में बच के नाम से प्रायः कुलिंजन ( Alpinia galanga ) की जड़ बेची जाती है । इसी लिये जहां बचा ( Acorus calamus ) की आवश्यकता हो वहां घोरबच नाम से ही औषधि खरीदनी चाहिये । बच के स्थान पर आंतरिक प्रयोग में बालवच का प्रयोग भी शास्त्रोक्त नहीं है न उचित ही है । रासायनिक संगठन—इसमें एक सुगन्धि उडनशील पीले रङ्ग का तैल १.५-३.५%, एकोरिन ( Acorin ) नामक मधु के समान पतला तिक्त सुगन्धि ग्लाइकोसाइड, एकोरेटिन (Acoretin ) नामक राल सदृश पदार्थ, कैलामेन (Calamene ) नामक रवेदार क्षाराम तथा स्टार्च, गोंद, टैनिन् एवं कैल्शियम ऑक्सेलेट (Calcium oxalate) आदि पदार्थ रहते हैं। इसके उड़नशील तैल में ॲसारिल् ॲल्डिहाइड (Asaryl-aldehyde ), ॲल्फापिनिन (a-pinene) एवं कैफीन् (Camphene) आदि पदार्थ रहते हैं। गुण और प्रयोग—वच वामक, कफनिःसारक, हृल्लासकर, उद्वेष्टन निरोधि, वातानुलोमक, दीपन, पाचन, मेध्य, वृष्य, कृमिघ्न एवं सुगन्धि है। अधिक मात्रा में देने से यह वामक है। इसका उपयोग उन्माद, अपस्मार, अपतन्त्रक, श्वास, कास, कण्ठरोग, जीर्ण अतिसार, संग्रहणी, आध्मान, शूल, मन्दज्वर, विषमज्वर, कर्णमूल ग्रन्थिशोथ एवं अश्मरी आदि रोगों में किया जाता है । ( १ ) अपस्मार, अपतन्त्रक एवं अंगघात आदि रोगों के लिये यह बहुत अच्छी औषधि है। इसके सेवन से धारणाशक्ति (मेधा) बढ़ती है। इसके लिये वच को मधु अथवा दूध के साथ अधिक दिन तक सेवन करना चाहिये । ब्राह्मी, शंखपुष्पी तथा वच तीनों समान मात्रा में लेकर इसके चूर्ण को ब्राह्मी के रस की ३ भावनाएं देनी चाहिये । इसको अथवा सारस्वत चूर्ण को ½ से १ माशा मधु एवं घृत के साथ कुछ दिन लेने से उन्माद, स्मरण शक्ति का ह्रास एवं वाणी की जड़ता आदि दूर होकर बुद्धि का विकास होता है। बेहोशी दूर करने के लिये अन्य औषधियों के साथ इसका अच्छा उपयोग होता है। (२) यह अधिक मात्रा (१ से २ माशा) में वामक है तथा खांसी और श्वास में वमन कराने के लिये इसको नमक और गरम जल से पिलाना चाहिये । इससे बिना किसी कष्ट के कफ निकल जाता है। यह इपिकाक की अपेक्षा अधिक अच्छी औषधि है । सरदी, गले की सूजन, खांसी तथा बच्चों के सूक्ष्म श्वसनिका शोथ में इसका क्वाथ बहुत उपयोगी होता है । सूखी खांसी में इसका टुकड़ा मुख में रखने से लाभ होता है। (३) इसमें रहने वाले टैनिन के कारण इसका उपयोग जीर्ण अतिसार एवं संग्रहणी आदि में किया जाता है। इसके सेवन से आध्मान एवं शूल दूर होता है तथा पाचन सुधर कर भूख बढ़ती है। बच्चों के लिए इसको भूनकर देना चाहिये। यह कृमि तथा पथरी में भी लाभदायक है । दन्तोद्भेद के समय इसको चबाने को बच्चों को देते हैं। (४) मलेरिया आदि विषमज्वरों में अन्य औषधियों के साथ इसके उपयोग से अधिक लाभ होता है । (५) जयपाल के विष को दूर करने के लिए इसको भूनकर जल के साथ पिलाना चाहिये । (६) अर्श में आंग और अजवाइन के साथ इसकी धूनी देने से दर्द दूर होता है । (७) इसका बाह्य प्रयोग अंगघात, आमवात, सन्धिपीडा, आध्मान, शूल तथा खांसी और श्वास में उपयोगी है। हरीतक्यादिवर्गः ४५ (८) मक्खी एवं दीमक आदि कीटों का नाश करने के लिए इसका उपयोग होता है । मात्रा—वामक-१ से २ माशा; अन्य गुणों के लिए-२-४ र०। अधिक मात्रा से शिरःशूल होता है। वर्णनाशक-सौंफ । अथ पारसीक ( खुरासानी ) वचाया नामानि गुणाँश्चाह पारसीकवचा शुक्ला प्रोक्ता हैमवतीति सा । हैमवत्युदिता तद्वद्वातं हन्ति विशेषतः ॥१०४॥ खुरासानी वच के नाम तथा गुण—पारसीकवचा, शुक्लबचा और हैमवती ये नाम खुरासानी वच के हैं। खुरासानी वच-शुक्लवर्ण की (सफेद) होती है तथा गुणों में पूर्वोक्त वच के समान ही होती है किन्तु विशेष करके यह वायु को दूर करनेवाली होती है ॥ १०४ ॥ ३० पारसीक वचा ( खुरासानी वच ) पारसीक वचा (हैमवती) के संबंध में विद्वानों में कुछ मतभेद हैं। कुछ लोग इसी को बालवच भी कहते हैं । कुछ परम्परा ऐसी है कि आंतरिक प्रयोग में जब 'वचा' लेनी हो तो बालवच नाम से मिलने वाला द्रव्य लिया जाय एवं बाह्य प्रयोग में 'वचा' के नाम से घोरबच लिया जाय। यद्यपि इसके लिए कोई शास्त्रीय आधार नहीं मिलता और प्रत्यक्षतः वचा के स्थान पर बाह्याभ्यन्तर प्रयोग में घोर बच का उपयोग अधिक उपयोगी सिद्ध हुआ है । बालवच के नाम से भी बाजार में भिन्न-भिन्न मूल की गांठें बिकती हैं जिनमें से एक का विनिश्चय श्री ठा० बलवन्तसिंह जी ने किया है । इसका वैज्ञानिक नाम Paris polyphylla (पैरिस पॉलिफाइला) है तथा इसे हिन्दी में दुधबच एवं नेपाली में इसे सतुआ कहते हैं। इसकी मोटी मोटी गांठें जैसी होती हैं। डा० देसाई के मत से मजार पोश (कश्मी०) ले०-Iris germanica Linn. (आइसिर जर्मेनिका) यह बाल वच है । यह कश्मीर में कम पर लगाई हुई मिलती है । बाजार में एक बहुत छोटे अन्य प्रकार के मूल भी बालवच के नाम से मिलते हैं। अथ महाभरीवचा यस्या लोके कुलिञ्जन इति नामान्तरं तस्या गुणानाह सुगन्धाऽप्युग्रगन्धा च विशेषात्कफकासनुत् । सुस्वरत्वकरी हृद्या हृत्कण्ठमुखशोधिनी ॥ महाभरी (कुलिञ्जन) के गुण—महाभरी वच (कुलिंजन) सुगन्ध तथा उग्रगन्ध युक्त होती है। विशेष करके यह कफ तथा खाँसी दूर करने वाली, स्वर को उत्तम करने वाली, रुचिकारक, हृदय, कण्ठ तथा मुख को शुद्ध करने वाली होती है ॥ १०५ ॥ ३१ कुलिंजन हिं०-कुलंजन, कुलिङ्कन, बड़ा कुलजन । ब०-कुरची वच, महाभरी वच, कुलजम । म०- कुलिंजन्, कोष्ट कोलञ्जन, मोठे कोलञ्जन । गु०-कुलिंजन जानु, कोलिंजन । सिन्ध०-कुंजर, कंजर, कांठी । ता०-पेररत्तै । ते०-पेद्डड्डुम्पराराष्ट्रकम् । मला०-पेरारट्टा । क०-धूम रास्मी। ब्रझी०-पदगोजी । फा०-खिरदारु, खरदारु, खुसरवे दारु एक़लान् । अ०-इर्क खोलिजान, खुलंजान, खुलंजाने कस्बी, खुलंजान्-ए-कबीर । अं०-Greater Galangal (ग्रेटर

४६ भावप्रकाशनिघण्टुः । गैलंगाल ); Java Galangal ( जावा गैलंगाल । ले०—Alpinia galanga Willd. (अल्पिनिया गैलंगा) । Fam. Zingiberaceae (झिंजिबेरेसी)। पहले यह जावा और सुमात्रा से आया करता था किन्तु अब बंगाल के पूर्व भाग, दक्षिण भारत, मालावार और गोमान्तक के जंगलों में यह अधिकता से उत्पन्न होता है। इसका क्षुप आमा हल्दी के आकार का ६-७ फीट ऊंचा होता है। पत्ते—९ से १८ इंच लम्बे, १।। से ४।। इंच चौड़े, चिकने, आयताकार-भालाकार होते हैं। फूल—हरे से सफेद छोटे छोटे आते हैं। फल—तिहाई इञ्च गोल नारङ्गी रङ्ग के होते हैं। बहुवर्षायु क्षुप होने के कारण काण्ड के सूख जाने पर भी इसकी जड़ जीवित रहती है। जड़—कन्दवत् और सुगन्ध युक्त होती है। इसको टुकड़े-टुकड़े कर सुखा करके बेंचते हैं। ये टुकड़े १ इञ्च से २।। इञ्च तक मोटे, बाहर से लाल या मोर्चा के समान बादामी रङ्ग के और अन्दर से हलके नारङ्गी बादामी रङ्ग के होते हैं। रासायनिक संघटन—इसमें एक सुगन्धित हलके पीले रंग का तेल १.५-४.८% पाया जाता है जिसमें यूजेनॉल (Eugenol २५%), सिनेओल-डी-पिनेन् (Cineole-d-pinene, कॅडे- नेन्स (Cadenens), बंसोरिन् (Bassorin) एवं गैलँगिन् (Galangin) रहते हैं। इसके अतिरिक्त इसमें ३ पीले रवेदार पदार्थ कॅफेराइड (Kaempferide, $C_{16}H_{12}O$, $H_{2}O$), गलँगॉल (Galangol), मॉनोमेथिल् ईथर ऑफ गॅलँगिन् (Mono-methyl ether of galan- gin) और स्टार्च २३%, राल, टैनिन, फ्लोबैफेन (Phlobaphane), वसा और मोम आदि पदार्थ रहते हैं। गुण और प्रयोग—प्राणियों में सिरा द्वारा इसके टिंक्चर या काथ के प्रयोग से निम्न प्रभाव दिखलाई देते हैं। रक्त का दबाव पहले कम होकर बाद में ठीक हो जाता है। यह शायद औदरिक रक्तवाहिनियों के विस्फार के कारण होता है। रक्तवहसंस्थान तथा हृदय के ऊपर इसकी अवसादक क्रिया होती है। इसकी अल्प मात्रा से श्वसन क्रिया उत्तेजित तथा अधिक मात्रा से श्वसन केन्द्र का घात होकर अवसादित होता है। इसकी अल्प मात्रा से भी श्वसनिकाओं (Bron- chioles) का विस्फार होता है। यह पाइलोकारपीन द्वारा कृत्रिम रूप से उत्पन्न श्वसनिकाओं के संकोच को भी दूर करता है। रक्त के दबाव के कम होने के कारण ही प्रारंभ में मूत्र की मात्रा कम होती है जो बाद में प्रकृत हो जाती है। पृथक्कृत (Isolated) गर्भाशय इसके प्रयोग से शिथिल होता है तथा उसके संकोच नियमित होने लगते हैं। पाचन-संस्थान के ऊपर इसकी क्रिया अन्य सुगन्धि उड़नशील तैलों की तरह होती है। कुलंजन उत्तेजक, कफनिःसारक, दीपक, पाचक, वातानुलोमक, बल्य तथा वृष्य है। इसका व्यवहार सरदी, जुकाम, आमवात, खांसी, श्वास, स्वर भंग एवं मधुमेह आदि में किया जाता है। (१) श्वास, खांसी, कुकास एवं सरदी के लिये यह बहुत अच्छी औषध है। बच्चों एवं वृद्धों के श्वसनसंस्थान के विकारों में इसको मधु के साथ चटाने से बहुत लाभ होता है। इससे श्वासकृच्छ्र दूर होकर ज्वर भी कम होता है। दमे में इसके उद्वेष्टननिरोधि गुण के कारण लाभ होता है। गले के प्रदाह में इसको चूसने से लाभ होता है। (२) इसके सुगन्धि, पाचक तथा दीपक गुणों के कारण पाचन के विकारों में यह उपयोगी है तथा अन्य औषधियों को सुगन्धित करने के लिये इसका व्यवहार किया जाता है।


हरीतक्यादिवर्गः। ४७ (३) मधुमेह तथा अपने आप होने वाले मूत्रत्याग (Incontinence) में इसका काथ लाभदायी है। (४) मुख की दुर्गन्धि दूर करने के लिये तथा वाजीकरण के लिये इसको चबाते हैं। (५) इससे सिद्ध तैल का उपयोग मुखदूषिका तथा कर्णपिटिका आदि चर्म रोगों में किया जाता है। (६) दन्तशूल में इसके चूर्ण को दांतों पर रगड़ते हैं। (७) अधिक पसीना आता हो तो इसके चूर्ण को शरीर पर रगड़ते हैं। (८) इसके बीज का भी उपयुक्त गुणों के लिये व्यवहार होता है। मात्रा—२ से ४ र., टिं. ई-१ द्रा.। नोट—इसी की एक अन्य जाति जिसे अल्पीनिया आफिसिनेरम (Alpinia officinarum Hance) और अं. में लेसर गॅलेंगल (Lesser galangal) कहते हैं, उसका भी व्यवहार कुलंजन के स्थान पर किया जाता है तथा हीनश्रेणी की सोंठ अथवा घोरबच की मिलावट भी इसमें रहती है।

अथ अपरा सुगन्धा स्थूलग्रन्थिः यस्या लोके महाभरी इति नाम तस्या गुणानाह स्थूलग्रन्थिः सुगन्धा स्यात्ततो हीनगुणा स्मृता ॥ १०६ ॥ महाभरी बच के गुण—जो मोटी गांठवाली तथा सुगन्धयुक्त (महाभरी) बच होती है वह पूर्वोक्त बच की अपेक्षा हीन गुण वाली होती है ॥ १०६ ॥

३२ महाभरीबच हि०—महाभरा बच, महाभरी बच, कुलञ्जन भेद। ब०—महाभरी बच, नरकचूर। पं०—कचूर, नरकचूर। मला०—कटुइंशीकुआ । ले०—Zingiber zerumbet Rosc. ex Smith (जिंजीबर् जिरम्बैट्) । Fam. Zingiberaceae (झिंजिबॅरेसी)। इस देश के कई प्रान्तों में यह उत्पन्न होती है। इसका क्षुप गन्ने के समान ३ से ५ फीट ऊँचा और आध इञ्च गोल होता है। पत्ते—८-१२ इञ्च लम्बे, २-३ इञ्च चौड़े, नरसल के पत्तों के समान किञ्चित् आयताकार-भालाकार एवं नोकदार होते हैं। १२ से १८ इञ्च तक लम्बी डण्डियों पर फूल आते हैं। फूल—फीके पीले रङ्ग के होते हैं। फल—एक इञ्च लम्बा दीर्घवृत्ताकार होता है। बीज—छोटे छोटे आयताकार काले रङ्ग के होते हैं। मूलस्तम्भ—कड़ा, द्विवर्षीय, भीतर से पीत, एवं स्वाद में कुछ आर्द्रक जैसा ही किन्तु कुछ कड़वाहट लिये हुए होता है। इसका व्यवहार खांसी, श्वास, कृमि, कुष्ठ तथा अन्य चर्मरोगों में किया जाता है एवं इसके अन्य गुण सोंठ की ही तरह हैं।

अथ चोपचीनीति लोके या प्रसिद्धा तस्या नाम गुणाँश्चाह द्वीपान्तरवचा किञ्चित्तिक्तोष्णा वह्निदीप्तिकृत् । विबन्धाध्मानशूलघ्नी शकृन्मूत्रविशोधिनी ॥ वातव्याधीनपस्मारमुन्मादं तनुवेदनाम् । व्यपोहति विशेषेण फिरङ्गामयनाशिनी ॥१०८॥

४८ भावप्रकाशनिघण्टुः चोबचीनी के नाम तथा गुण-'दीपान्तरवचा' यह संस्कृत नाम चोबचीनी का है। चोबचीनी- कुछ तिक्तरसयुक्त, उष्णवीर्य, अग्निदीपक, विबन्ध, आध्मान तथा शूल को नष्ट करने वाली, मल तथा मूत्र का शोधन करने वाली होती है एवं वातव्याधि, अपस्मार (मिर्गी), उन्माद (पागलपन) और शरीर के दर्द को दूर करती है और विशेष करके यह फिरङ्गरोग के दूर करने में उत्तम होती है ॥ १०७-१०८ ॥ ३३ चोपचीनी हि०-चोपचीनी, तोपचीनी, चोबचीनी। ब०-तोपचीनी, कुमारिका, शुकचिन । म०, गु०- चोपचीनी । ते०-पिरङ्गीचेका । ता०-परङ्गिचेकई । मला०-चाइना पैवू या पैरू। ने०-चोपचीनी । यू०-खसिलियर आशसिनी । फा०-चोबचीनी । अ०-कशवचीनी, खुशंबुस्सीनी । अं०- China root (चाइनारूट) । ले०-Smilax china Linn. (स्माइलैक्स चाइना)। Fam. Liliaceae (लिलिएसी) । वच की अनेक जातियों में चोपचीनी भी एक मानी गई है। यह चीन देश में अधिक उत्पन्न होती है और वहीं से इस देश में आती है। इस कारण इसका नाम दीपान्तरवचा रखा गया है। यह लता जाति की वनौषधि बहुत विस्तार में फैलनेवाली होती है। इस लता की जड़ को ही चोबचीनी कहते हैं। चोबचीनी ८-१० अङ्गुल लम्बी, आध से एक इञ्च तक मोटी, गांठदार, बेरेशा, खुरदरी तथा दृढ़ काष्ठवत् जड़ है। इसका स्वरूप सफेदी मायल पीत, गुलाबी एवं किंचित् कालापन युक्त होता है। अधिक पुरानी होने पर चोपचीनी में प्रायः घुन लग जाते हैं, जिससे वह छिद्र युक्त दिखाई देती है। घुनी हुई तथा गांठविहीन चोपचीनी को उपयोग में नहीं लाना चाहिये। रासायनिक सङ्घटन-इसमें वसा, शर्करा, ग्लूकोसाइड, रञ्जक पदार्थ, सॅपोनिन्, गोंद तथा स्टार्च आदि पदार्थ पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग-सम्राट् चार्ल्स पंचम के वातरक्त (Gout) में इस औषधि को बहुत सफलता सिद्ध होने से इसका यूरोप में बहुत प्रचार हुआ था। १७ वीं शताब्दी में सार्सोंपरिला के समान इसका व्यवहार किया जाता रहा। यह स्वेदल, स्नेहन, उत्तेजक, रसायन, रक्तशोधक, बल्य, वाजीकर, फिरंगहर तथा धातुओं को गलाने वाली (Resolvent = रीसॉल्भेन्ड) है। (१) इसको दूध में उबाल कर इसमें मस्तगी, इलायची तथा दालचीनी मिलाकर इसका व्यवहार आमवात, वातरक्त, अपस्मार, जीर्ण वातविकार, काश्यं, धातुक्षीणता, ग्रन्थिविकार तथा फिरंग की तृतीयावस्था में किया जाता है। (२) अनन्तमूल के साथ इसको पुराने सिरदर्द में देने से लाभ होता है तथा आमवात एवं फिरङ्ग में भी इसका व्यवहार करते हैं। (३) डा० देसाई के मतानुसार यह श्रेष्ठ रसायन है। इसकी क्रिया त्वचा, सन्धियों के बन्धन तथा रसग्रन्थियों पर होती है। सोजाक से उत्पन्न सन्थिशोथ आदि विकारों में तथा फिरङ्ग की द्वितीयावस्था तथा तृतीयावस्था में इससे बहुत लाभ होता है। पोटेशियम् आयोदाइड् की अपेक्षा यह शीघ्र लाभकर निर्दुष्ट औषध है। फिरङ्गादि से उत्पन्न ग्रन्थिवृद्धि में इसके उपयोग से प्रथम वेदना कम होकर बाद में सूजन कम होती है। चोबचीनी जितना चूर्ण रूप में काम करती है उतना फाण्ट या क्वाथरूप में नहीं करती। हरीतक्यादिवर्गः ४९ मात्रा-चूर्ण-३-६ तो०, सोंठ के साथ दूध में। इस जाति की जिन अन्य औषधियों का व्यवहार किया जाता है प्रसंगतः उनका संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित है। (क) जङ्गली उशवा हि०-जङ्गली उशुवा, चोबचीनी । ब०-कुमारिका । मल०-कुरिबिल्पिण्ड । म०-घोटवेल । गु०-गुटी । ता०-मलैतामर ले०-Smilax macrophylla Roxb. (स्माइलैक्स मॅक्रो- फाइला राक्स) । यह एक बड़ी लता होती है जो समस्त भारत में उत्पन्न होती है। पत्ते-लम्बे, बड़े, अखण्ड और नुकीले रहते हैं जिन पर ५, ७ मोटी सिराएं होती हैं। कांटे दूर-दूर या प्रायः अनुपस्थित होते हैं। पुष्प-गुच्छों में आते हैं। फल-चने के समान गोल, हरित एवं पकने पर रक्तवर्ण के हो जाते हैं। मूल-बहुत तथा सार्सोंपरिला के समान लाल रंग की होती है। इसकी जड़ों का व्यवहार किया जाता है। इसकी जड़ें ताजी काम में लानी चाहिये। गुण और प्रयोग-यह स्वेदल, मूत्रल, पौष्टिक, कामोदीपक और रसायन है। फिरङ्ग की द्वितीयावस्था, जीर्ण आमवात तथा सन्धिशोथ में इसका बहुत व्यवहार किया जाता है। फिरङ्ग से उत्पन्न होने वाले फोड़े-फुन्सियां, सन्धिवान, अस्थिशोध, अस्थिवात और शूल तथा ग्रन्थियों की वृद्धि में उपयोगी है। पुराने चर्मरोग तथा गण्डमाला में इससे लाभ होता है। नेपाल में ३ माशा चूर्ण सोजाक तथा अन्य श्लैष्मिककला के स्रावों के लिए दिया जाता है। मात्रा-१-२ तो० चूर्ण का क्वाथ दिन में एक बार । (ख) बड़ी चोबचीनी हि०-बड़ी चोबचीनी । ब०-हरिनाशुक्चिन । म०-गोटी शुकचिन । पहा०-हङ्गिन । ले०-Smilax glabra Roxb. (स्माइलैक्स ग्लैब्रा राक्स) । यह लता आसाम, सिलहट, खासिया की निम्न श्रेणियों एवं तेनासेरिम आदि स्थानों में उत्पन्न होती है। इसमें कांटे नहीं होते। पत्र-नुकीले, पतले, अधोभाग हलके रङ्ग का; पुष्प-सफेद विदाण्डक; मूल-चोबचीनी की तरह। गुण और प्रयोग-इसके ताजे मूल का क्वाथ त्वक् रोग तथा फिरंग आदि रतिजन्य उपसर्गों से उत्पन्न फोड़े फुन्सी आदि में दिया जाता है। (ग) हरिया शुकचिन पहा०-हरिन शुकचिन । ब०-गुचिया शुकचिन । ले०-Smilax lanceaefolia Roxb. (स्माइलैक्स लॅन्सिफोलिया) । यह भी लता सिक्किम, हिमालय, आसाम एवं बर्मा में होती है। पत्र-पतले तथा उन पर ३ बड़ी शिराएं रहती हैं। इसकी जड़ चोबचीनी के समान होती हैं जिसका व्यवहार किया जाता है। गुण और प्रयोग-इसकी जड़ का रस निकाल कर आमवात में पिलाते हैं तथा इसके कल्क को वेदनास्थान पर बांधते हैं। (घ) उशबा, सार्सापरिला हि०-उशबामग्रबी, सार्सोंपरिला । अं०-Sarsaparilla (सार्सोंपरिला) । ले०-Smilax ornata Hook. (स्माइलैक्स ओर्नेटा) । ४ भा० नि०

५० | भावप्रकाशनिघण्टुः यह स्माइलैक्स की उपर्युक्त विदेशी जाति तथा अन्य विदेशी जातियों के सुखाये हुए मूल हैं। कभी-कभी भौमिक काण्ड (राइजोम) के टुकड़े इसके साथ मिले रहते हैं। यह बहुत लंबे, धारीदार एवं कुछ लालिमा लिये हुए होते हैं। स्थान भेद से तथा वर्ण, धारी एवं भौमिक या वायवीय भाग की अधिकता इत्यादि के कारण इसके स्वरूप में भिन्नता रहती है। यह प्रायः गंधहीन एवं कुछ मीठापन लिये हुए कडु होती है। रासायनिक संगठन- इसमें मुख्यतया संपोनिन् (Sapouin) पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग- फिरंग, आमवात, जीर्ण चर्म विकार एवं रक्तदोष के लिए यह बहुत प्रसिद्ध औषध रही है। यह कैसे कार्य करती है यह स्पष्ट नहीं है। संभवतः शारीरिक क्षमता को बढ़ाकर या अन्य औषध के प्रचुषण में सहायता का कार्य करती है। विदेशों में इसका उपयोग अनेक बल्य पेयों में किया जाता है। भारतीय सार्सापरिला के नाम से अनन्तमूल का उपयोग किया जाता है। मात्रा- १ से ३ माशा ।

अथ हपुषाद्वयम्

तन्मध्ये प्रथमं फलं मत्स्यसदृशं विस्रगन्धं द्वितीयमश्वत्थफलसदृशं मत्स्यगन्धम् , तयोर्नामानि गुणांश्चाह हपुषा हबुषा विस्रा पराऽश्वत्थफला मता । मत्स्यगन्धाप्लीहहन्त्री विषघ्नी ध्वांचनाशिनी ॥ हपुषा दीपनी तिक्ता मृदूष्णा तुवरा गुरुः । पित्तोदरसमीरार्शो ग्रहणीगुल्मशूलहृत् ॥ पराऽप्येतद्गुणा प्रोक्ता रूपभेदो द्वयोरपि ॥ ११० ॥ दो प्रकार का 'हाऊबेर' होता है। उसमें पहला जो आकार में मछली के समान तथा आम गन्धवाला होता है और दूसरा जो आकार में पीपल के फल के समान तथा मछली के समान गन्ध- वाला होता है, उन दोनों के नाम तथा गुण— हपुषा, हबुषा और विस्रा ये तीन नाम प्रथम हाऊबेर के हैं और दूसरे के नाम-अश्वत्थफला, मत्स्यगन्धा, प्लीहहन्त्री, विषघ्नी और ध्वाङ्क्षनाशिनी (इसके खाने से कौवे मर जाते हैं) ये हैं। प्रथम हाऊबेर -अग्निदीपक, तिक्त तथा कषायरसयुक्त, मृदु, उष्णवीर्य, पाक में गुरु, पित्त, उदर और बात सम्बन्धी रोग, बवासीर, ग्रहणी, गुल्म तथा शूल को दूर करता है और दूसरा हाऊबेर भी इन्हीं पूर्वोक्त गुणों से युक्त होता है अन्तर केवल आकार तथा गन्ध मात्र में ही है।

३४ हपुषा ( हाऊबेर )

हिं०-हाऊबेर, हाऊबैर, आरार। ब०-हबुषा। म०-होश। मा०-हाऊबोर। पं०-हाऊबेर, पेल्यरी, अबडुल। कुमा०-चिचिया। काश्मी०-वेंथा, पेथरा। फा०-तुरुमदुलह, ओरस। अ०- अरअर, अबहाल, हब्बउलअरअर। अं०-Juniper berry (ज्युनिपेर बेरी)। ले०-Juniperus communis Linn. (ज्युनिपेरस कम्युनिस, लिन ) । Fam. Cupressaceae (क्यूप्रेसेंसी)। हाऊबेर दो प्रकार का होता है। एक का संस्कृत नाम 'हपुषा' और दूसरे का 'अश्वत्थफला' है। हपुषा और अश्वत्थफला वास्तव में दोनों फल और गन्धभेद से दो द्रव्य हैं, परन्तु दोनों के गुण समान हैं और दोनों ही के वृक्ष भी समान ही होते हैं। हपुषा-मछली के समान आकृति का एवं आम गन्ध युक्त और अश्वत्थफल-मछली के समान गन्ध और पीपर (अश्वत्थ) वृक्ष के फलों के समान फलवाला होता है।

हरीतक्यादिवर्गः | ५१ हपुषा के वृक्ष हिमालय के पश्चिमोत्तर भाग में कुमाऊँ से पश्चिम की ओर १२,५०० से १४,००० फीट की ऊंचाई तक देखने में आते हैं। इसका वृक्ष बड़ा नहीं होता बल्कि इसका झाड़ होता है जो सघन, फैला हुआ, तथा बारहो मास हरा भरा रहता है। पत्ते-रेखाकार, नोकीले, ५ से १३ मि. मी. लंबे, एक साथ तीन-तीन एवं काण्ड से समकोण बनाते हुए होते हैं। फूल-पीत वर्ण के गुच्छों में आते हैं। फल-३/८-३/२ इन्च के घेरे में गोलाकार, गूदेदार और पकने पर नीलापन युक्त काले या कुछ बैंगनी रङ्ग के दिखाई पड़ते हैं। इनके ऊपर रजावरण रहता है। अग्र भाग पर शल्कपत्र के त्रिविभक्त निशान रहते हैं और आधार पर भी शल्क पत्र के दो चक्र रहते हैं। प्रत्येक फल में तीन-तीन बीज रहते हैं जिनके पृष्ठ पर तैलग्रन्थियां पाई जाती हैं। फलों से तेल निकाला जाता है। कुछ लोग ले०-टॅमेरिक्स गॅलिका (Tamarix gallica Linn.), हि०-झाऊ तथा फ्लूजिया ल्यूकोपाइरस (Flueggea leucopyrus Willd) का ग्रहण करते हैं जो उचित नहीं है। रासायनिक संगठन- इसमें एक उड़नशील तैल ०.२५%, राल १०%, मधुशर्करा ३३%, एक तिक्त पदार्थ ज्यूनिपेरिन (Juniperin), ऑक्सैलिक एसिड तथा कुछ आर्गेनिक अम्ल (Organic acid) आदि पदार्थ रहते हैं। इसी की एक अन्य जाति ज्यू. मॅक्रोपोडा (J. macropoda Boiss) के फल कुछ लम्बे रहते हैं तथा उसमें तैल की मात्रा ३.२४% पाई गई है। गुण और प्रयोग- हाऊबेर सुगन्धित, मूत्रजननक, वातानुलोमक, आध्मानहर, पाचक, उत्तेजक, वृष्य, रक्तरुकन्दक, आर्तवजनक एवं उपसर्गनाशक है। इसका उपयोग उदर रोग, यकृत् प्लीहा के विकार, आमवात, संधिशोथ, श्वास, जीर्ण श्वस- निकाशोथ, मुखपाक, अर्धावभेदक, नया तथा पुराना सोज़ाक, श्वेतप्रदर, कष्टार्त्तव, अनार्तव, मधुमेह तथा चर्मरोग में किया जाता है। ( १ ) यह एक उत्तेजक मूत्रजनक है। इसकी क्रिया प्रत्यक्ष वृक्क के ऊपर होकर मूत्र की मात्रा बढ़ती है। इसका उपयोग हृदय, यकृत अथवा जीर्ण वृक्कशोथ के कारण उत्पन्न जलोदर में अन्य औषधियों के साथ किया जाता है। तीव्र वृक्क शोथ में इसका प्रयोग नहीं करना चाहिये। बच्चों के वृक्कजन्य जलोदर में इससे लाभ होता है। ( २ ) आध्मान, शूल तथा पाचन के विकारों में इसको मद्यसार के साथ देते हैं। ( ३ ) इसका तैल उत्तेजक, मूत्रल तथा वातानुलोमक है एवं इसका उपयोग कटिशूल, आध्मान तथा शूल में किया जाता है। उत्सर्ग के समय प्रत्याक्षेप क्रिया द्वारा यह गर्भाशय का संकोच करता है इसलिए आर्तवस्त्राव वृद्धि के लिए इसका उपयोग किया जाता है। इसके बाह्य प्रयोग से चर्म में प्रक्षोभ उत्पन्न होता है। वृक्क रोग में इसका प्रयोग नहीं करना चाहिये। ( ४ ) इसका काष्ठ स्वेदक है तथा ग्वायकम और सासाफ्रास के बदले में प्रयुक्त होता है। ( ५ ) हाऊबेर का रस एक अच्छा उपसर्ग नाशक है। स्थूलांत्र दण्डाणु (बी० कोलाइ) जैसे जीवाणुओं का भी यह नाश करता है। इसके धूम्र का व्यवहार किया जाता है तथा यह मांस तथा मद्यो के संरक्षण के लिये भी प्रयोग में आता है। जानपदिक संक्रामक रोगों के मरक (Pesti- lence) को रोकने की दृष्टि से यह उपयोगी समझा जाता है। मरक के समय इसके चूर्ण का दैनिक सेवन करने से व्याधि का प्रतिषेध होता है।

५२ | भावप्रकाशिनघण्टुः (६) बच्चों के राजयक्ष्मा में इसको पकाकर देने से भूख बढ़ती है, वजन बढ़ता है और लाभ होता है। (७) इसके चूर्ण को आमवातादि में संधियों तथा सूजन पर मलते हैं। (८) यह 'जिन' आदि आपानक मधों के निर्माण के लिये युरोप में व्यवहार में आता है। मात्रा—चूर्ण–२-६ माशा। तैल–१ से १ बूंद पाचक, ४-६ बूंद मूत्रल। स्पिरिट (२० में १) २०-६० बूंद। फांट–२-३ औंस।

अथ विडङ्गस्य नामानि गुणांश्चाह

पुंसि क्लीबे विडङ्गः स्यात्कृमिघ्नो जन्तुनाशनः । तण्डुलश्च तथा वेल्लममोघा चित्रतण्डुलः ॥ विडङ्गं कटु तीक्ष्णोष्णं रूक्षं वह्निकरं लघु । शूलाध्मानोदरश्लेष्मकृमिवातविबन्धनुत् ॥११२॥ वायविडङ्ग के नाम तथा गुण—'विडङ्ग' (यह शब्द पुंलिङ्ग तथा नपुंसकालिङ्ग दोनों ही में व्यव- हृत होता है), कृमिघ्न, जन्तुनाशन, तण्डुल, वेल्ल, अमोघा और चित्रतण्डुल ये सब बायविडङ्ग के पर्यायवाची शब्द हैं। बायविडङ्ग—कटुरसयुक्त, तीक्ष्ण और उष्ण वीर्य होता है तथा रूक्ष, अग्नि- वर्धक एवं पाक में लघु होता है और यह शूल, आध्मान, उदर, कफ, कृमि तथा वात रोग एवं विबद्धता को दूर करता है॥ १११-११२ ॥

३५ वायविडङ्ग

प्रायः सभी पंसारी धनिये के समान गोल-गोल किञ्चित लाली युक्त बीज को वायविडङ्ग के नाम से बेचते हैं और अधिकांश वैद्य इसी को लेकर व्यवहार में लाते हैं किन्तु आज कल के कति- पय विद्वान् वैद्यों की सम्मति है कि शास्त्रीय 'विडङ्ग' वास्तव में आज कल व्यवहार में आने वाले फल वायविडङ्ग नहीं हैं बल्कि 'नाड़ीहिङ्गु' (हि०-डिकामाली) शास्त्रीय विडङ्ग हैं। उनके मत से शास्त्रीय 'विडङ्ग' की जगह नाड़ीहिङ्गु को उपयोग में लेना चाहिये। कुछ विद्वान् काम्पिल्ल के फल को ही बायविडङ्ग मानते हैं। इस प्रकार बायविडङ्ग एक भ्रमात्मक औषधि मानी जाने लगी है। किन्तु मेरी समझ में विडङ्ग और नाड़ीहिङ्गु एक वस्तु नहीं हैं और न वायविडङ्ग काम्पिल्ल का फल ही है। प्रचलित विडङ्ग में शास्त्रोक्त कृमिघ्न अग्निदीपक आदि गुण पर्याप्त मात्रा में मिलते हैं, अतः सर्वमान्य निर्णय होने तक इसीका व्यवहार औषधि-कार्यों में करना चाहिए। हि०—बायविडङ्ग, बायभिडङ्ग, बायभिरङ्ग, भामिरंग, बाबिरंग। ब०—बिरंग। म०—बावड़िङ्ग, गु०—वावडीङ्ग। क०—वायुविडङ्ग, बायबिलंग। ते०—वायुविडंगमु । ता०—वायुविलंगम । पं०— बबरंग, बाबरंग। भा०—बायबिरंग। सिंहली—उम्बेलिया, अम्बेलिया। ने०—हिमलचेरी। अ०—बरंज काबली, विरंज काबुली। फा०—बरंग काबली, बिरंज कावली, विरङ्ग काबुली। अं०—Babreng; Fruits of Embelia ribes (बावरिंग, फ्रूट आफ एम्बेलिया राइब्स।) । ले०Embelia ribes Burm. (एम्बेलिया राइब्स)। Fam. Myrsinaceae (मिरसिनेसी)। यह मध्य हिमालय से भारतवर्ष के पहाड़ी भागों में तथा सिलोन से सिंगापुर तक बहुत पाया जाता है। इसकी झाड़ी बहुत विस्तार में बढ़ने वाली होती है। छाल-वातरन्ध्रों के कारण खुरदरी होती है। टहनियां-लंबी, पतली, लचीली, गोल एवं लंबे पर्व युक्त होती हैं। पत्ते-चर्मवत्,


हरीतक्यादिवर्गः | ५३ २ से ४ इञ्च लंबे दीर्घवृत्ताकार, या कुछ भालाकार, तीक्ष्णाग्र, ऊपर से चमकीले एवं अधोतल पर हल्के या कुछ रजताभ एवं सूक्ष्म रक्ताभ ग्रन्थियों से युक्त होते हैं। फूल-सफेद या किञ्चित् हरियाली लिये फीके पीले रंग के गुच्छों में आते हैं। फल-चौथाई इञ्च तक गोलाकार, पकने पर लाल रंगके किन्तु सूखने पर झुर्रीदार काले रंग के दीख पड़ते हैं। फलों में डण्ठल के साथ पांच पट्टों का पुष्प पात्र लगा रहता है और अग्र की तरफ नोकीला रहता है। फल तोड़ने पर चितकबरे लाल रंग के पतले आवरण से युक्त एक-एक बीज निकलता है, जो स्वाद में चरपरा और गरम मसाले के समान सुगन्धित होता है। चित्रतण्डुलः यह पर्याय इसी चितकबरे वर्ण का द्योतक है। रासायनिक संगठन—इसके फलों में एम्बेलिक् एसिड (Embelic acid) या एम्बेलिन (Embelin, C₁₈ H₂₈ O₄) नामक एक सुनहरे पीले रंग का रवेदार पदार्थ २.५% पाया जाता है। यह जल से अघुलनशील तथा मद्यसार, ईथर, क्लोरोफार्म और बेंझीन में घुलनशील होता है। क्षारीय घोल में यह घुलकर घोल लाल रंग का हो जाता है। इसके अतिरिक्त अल्प मात्रा में क्रिस्टेम्बिन (Christembine) नामक एक क्षाराम तथा तैल, उड़नशील तैल, रंजक द्रव्य, टैनिन एवं राल सदृश पदार्थ पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग—यह उत्तम कृमिघ्न, वातानुलोमक, वातहर, दीपन, पाचन, वातनाडी संस्थान के लिये बल्य, रक्त शोधक, आनुलोभिक तथा रसायन है। रसमन्थियों पर इसका विशेष प्रभाव पड़ता है। इसका उत्सर्ग मूत्रद्वारा होता है जिससे मूत्र लाल रंग का हो जाता है। (१) स्फीतकृमि (Tape-worm) के लिये यह अत्युत्तम औषधि है। मेलफर्न (Male- fern) के समान इससे मरोड़ नहीं होती और अधिक लाभ होता है। बच्चों को ४ माशा तथा बड़ों को ८ माशा चूर्ण मधु या दही के साथ सुबह खिलाकर ४ घंटे पश्चात् एरण्ड तैल अथवा कोई विरे- चन देना चाहिये । अथवा कोष्ठ शुद्धि के पश्चात रातमें इसका चूर्ण मठ्ठे के साथ देकर दूसरे दिन सुबह विरेचन देना चाहिये। इससे मरे हुए कृमि निकल जाते हैं। अन्य कृमियों पर इससे लाभ नहीं होता। इसका कृमिघ्न गुण एम्बेलिक् एसिड के कारण है। इसके लवण अमोनियम् एम्बेलेट (Ammonium embelate) (१॥-३ २०) का भी उपयोग मधु के साथ अच्छा होता है। इसके पूर्व तथा पश्चात् एरण्ड तैल से विरेचन कराना चाहिये। (२) यह एक अच्छा रसायन है। सुश्रुत में एक 'सर्वोपघातशमनीय' नामक प्रयोग बत- लाया है। नित्य एक महीने तक विडंग के मगज का चूर्ण तथा मुलेठी खाकर ऊपर से ठण्डा जल पीना चाहिये । पथ्य में बिना नमक, मूंग का आंवले के साथ सिद्ध किया यूष तथा घी और भात औषध पचने पर लें। इसके उपयोग से सब प्रकार के अर्श अच्छे होते हैं। ग्रहण शक्ति तथा धारणा शक्ति बढ़ती है। शरीर के सभी प्रकार के कृमि नष्ट होकर शरीर स्वस्थ होता है। इसके हर साल प्रयोग से मनुष्य निरोग तथा शतायु होता है। इससे सब प्रकार के पुराने रोग जैसे अर्श, संग्रहणी, प्रमेह, कुष्ठ, क्षय, श्वास, उपदंश एवं व्रण आदि अच्छे होते हैं तथा हैजा, प्लेग आदि उपसर्गों का भय नहीं रहता। (३) बालकों के सभी रोगों की यह अच्छी औषधि है। सुखण्डी, आध्मान, शूल, कुपचन एवं अग्निमांद्य आदि में दूध में इसको डालकर उबालते हैं और वही दूध पिलाते हैं। इससे बच्चे तन्दुरुस्त रहते हैं। यदि इसके साथ अनन्तमूल भी दिया जाय तो अधिक लाभ होता है। (४) गण्डमाला के लिये—वायविडङ्ग, गुग्गुल, मनःशिला तथा शृङ्गभस्म, मधु और घृत के साथ देने से धीरे २ लाभ होता है।