भारतकोश
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ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

प्रकृतिखण्ड

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हैं। कर्मका जो बीजरूप है, वही सदा फल प्रदान करनेवाला है। कर्म कोई दूसरी वस्तु नहीं, भगवान् श्रीकृष्णका ही रूप है। वे भगवान् प्रकृतिसे परे हैं। कर्म भी इन्हींसे होता है; क्योंकि वे उसके हेतुरूप हैं। जीव कर्मका फल भोगता है; आत्मा तो सदा निर्लिप्त ही है। देही आत्माका प्रतिबिम्ब है, वही जीव है। देह तो सदासे नश्वर है। पृथ्वी, तेज, जल, वायु और आकाश—ये पाँच भूत उसके उपादान हैं। परमात्माके सृष्टि-कार्यमें ये सूत्ररूप हैं। कर्म करनेवाला जीव देही है। वही भोक्ता और अन्तर्यामीरूपसे भोजयिता भी है। सुख एवं दुःखके साक्षात् स्वरूप वैभवका ही दूसरा नाम भोग है। निष्कृति मुक्तिको ही कहते हैं। सदसत्सम्बन्धी विवेकके आदिकारणका नाम ज्ञान है। इस ज्ञानके अनेक भेद हैं। घट-पटादि विषय तथा उनका भेद ज्ञानके भेदमें कारण कहा जाता है। विवेचनमयी शक्तिको 'बुद्धि' कहते हैं। श्रुतिमें ज्ञानबीज नामसे इसकी प्रसिद्धि है। वायुके ही विभिन्न रूप प्राण हैं। इन्हींके प्रभावसे प्राणियोंके शरीरमें शक्तिका संचार होता है। जो इन्द्रियोंमें प्रमुख, परमात्माका अंश, संशयात्मक, कर्मोंका प्रेरक, प्राणियोंके लिये दुर्निवार्य, अनिरूप्य, अदृश्य तथा बुद्धिका एक भेद है, उसे 'मन' कहा गया है। यह शरीरधारियोंका अङ्ग तथा सम्पूर्ण कर्मोंका प्रेरक है। यही इन्द्रियोंको विषयोंमें लगाकर दुःखी बनानेके कारण शत्रुरूप हो जाता है और सत्कार्यमें लगाकर सुखी बनानेके कारण मित्ररूप है। आँख, कान, नाक, त्वचा और जिह्वा आदि इन्द्रियाँ हैं। सूर्य, वायु, पृथ्वी और वाणी आदि इन्द्रियोंके देवता कहे गये हैं। जो प्राण एवं देहादिको धारण करता है, उसीकी 'जीव' संज्ञा है। प्रकृतिसे परे जो सर्वव्यापी निर्गुण ब्रह्म हैं, उन्हींको 'परमात्मा' कहते हैं। ये कारणोंके भी कारण हैं। ये स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण हैं।

वत्से! तुमने जो कुछ पूछा था, वह सब मैंने शास्त्रानुसार बतला दिया। यह विषय ज्ञानियोंके लिये परम ज्ञानमय है। अब तुम सुखपूर्वक लौट जाओ।

सावित्रीने कहा— प्रभो! आप ज्ञानके अथाह समुद्र हैं। अब मैं इन अपने प्राणनाथ और आपको छोड़कर कैसे कहाँ जाऊँ? मैं जो-जो बातें पूछती हूँ, उसे आप मुझे बतानेकी कृपा करें। जीव किस कर्मके प्रभावसे किन-किन योनियोंमें जाता है? पिताजी! कौन कर्म स्वर्गप्रद है और कौन नरकप्रद? किस कर्मके प्रभावसे प्राणी मुक्त हो जाता है तथा श्रीहरिमें भक्ति उत्पन्न करनेके लिये कौन-सा कर्म कारण होता है? किस कर्मके फलस्वरूप प्राणी रोगी होता है और किस कर्मफलसे नीरोग? दीर्घजीवी और अल्पजीवी होनेमें कौन-कौनसे कर्म प्रेरक हैं? किस कर्मके प्रभावसे प्राणी सुखी होता है और किस कर्मके प्रभावसे दुःखी? किस कर्मसे मनुष्य अङ्गहीन, एकाक्ष, बधिर, अन्धा, पङ्गु, उन्मादी, पागल तथा अत्यन्त लोभी और नरघाती होता है एवं सिद्धि और सालोक्यादि मुक्ति प्राप्त होनेमें कौन कर्म सहायक है? किस कर्मके प्रभावसे प्राणी ब्राह्मण होता है और किस कर्मके प्रभावसे तपस्वी? स्वर्गादि भोग प्राप्त होनेमें कौन कर्म साधन है? किस कर्मसे प्राणी वैकुण्ठमें जाता है? ब्रह्मन्! गोलोक निरामय और सम्पूर्ण स्थानोंसे उत्तम धाम है। किस कर्मके प्रभावसे उसकी प्राप्ति हो सकती है? कितने प्रकारके नरक हैं और उनकी कितनी संख्या और उनके क्या-क्या नाम हैं? कौन किस नरकमें जाता है और कितने समयतक वहाँ यातना भोगता है? किस कर्मके फलसे पापियोंके शरीरमें कौन-सी व्याधि उत्पन्न होती है? भगवन्! मैंने ये जो-जो प्रश्न किये हैं, इन सबके उत्तर देनेकी आप कृपा करें। (अध्याय २४-२५)

२५- नरक-कुण्डों और उनमें जानेवाले पापियों तथा पापोंका वर्णन

१९८संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

सावित्री-धर्मराजके प्रश्नोत्तर, सावित्रीको वरदान

भगवान् नारायण कहते हैं—नारद! सावित्रीके वचन सुनकर यमराजके मनमें बड़ा आश्चर्य हुआ। वे हँसकर प्राणियोंके कर्म-विपाक कहनेके लिये उद्यत हो गये।

धर्मराजने कहा—प्यारी बेटी! अभी तुम हो तो अल्प वयकी बालिका, किंतु तुम्हें पूर्ण विद्वानों, ज्ञानियों और योगियोंसे भी बढ़कर ज्ञान प्राप्त है। पुत्री! भगवती सावित्रीके वरदानसे तुम्हारा जन्म हुआ है। तुम उन देवीकी कला हो। राजाने तपस्याके प्रभावसे सावित्री-जैसी कन्यारत्नको प्राप्त किया है। जिस प्रकार लक्ष्मी भगवान् विष्णुके, भवानी शंकरके, राधा श्रीकृष्णके, सावित्री ब्रह्माके, मूर्ति धर्मके, शतरूपा मनुके, देवहूति कर्दमके, अरुन्धती वसिष्ठके, अदिति कश्यपके, अहल्या गौतमके, शची इन्द्रके, रोहिणी चन्द्रमाके, रति कामदेवके, स्वाहा अग्निके, स्वधा पितरोंके, संज्ञा सूर्यके, वरुणानी वरुणके, दक्षिणा यज्ञके, पृथ्वी वराहके और देवसेना कार्तिकेयके पास सौभाग्यवती प्रिया बनकर शोभा पाती हैं, तुम भी वैसी ही सत्यवान्‌की प्रिया बनो। मैंने यह तुम्हें वर दे दिया। महाभागे! इसके अतिरिक्त भी जो तुम्हें अभीष्ट हो, वह वर माँगो। मैं तुम्हें सभी अभिलषित वर देनेको तैयार हूँ।

सावित्री बोली—महाभाग! सत्यवान्‌के औरस अंशसे मुझे सौ पुत्र प्राप्त हों—यही मेरा अभिलषित वर है। साथ ही, मेरे पिता भी सौ पुत्रोंके जनक हों। मेरे श्वशुरको नेत्र-लाभ हों और उन्हें पुनः राज्यश्री प्राप्त हो जाय, यह भी मैं चाहती हूँ। जगत्प्रभो! सत्यवान्‌के साथ मैं बहुत लंबे समयतक रहकर अन्तमें भगवान् श्रीहरिके धाममें चली जाऊँ, यह वर भी देनेकी आप कृपा करें।

प्रभो! मुझे जीवके कर्मका विपाक तथा विश्वसे तर जानेका उपाय भी सुननेके लिये मनमें महान् कौतूहल हो रहा है; अतः आप यह भी बतावें।

धर्मराजने कहा—महासाध्वि! तुम्हारे सम्पूर्ण मनोरथ पूर्ण होंगे। अब मैं प्राणियोंका कर्म-विपाक कहता हूँ, सुनो। भारतवर्षमें ही शुभ-अशुभ कर्मोंका जन्म होता है—यहाँके कर्मोंको 'शुभ' या 'अशुभ' की संज्ञा दी गयी है। यहाँ सर्वत्र पुण्यक्षेत्र है, अन्यत्र नहीं; अन्यत्र प्राणी केवल कर्मोंका फल भोगते हैं। पतिव्रते! देवता, दैत्य, दानव, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस तथा मनुष्य—ये सभी कर्मके फल भोगते हैं। परंतु सबका जीवन समान नहीं है। उनमेंसे मानव ही कर्मका जनक होता है अर्थात् मनुष्ययोनिमें ही शुभाशुभ कर्म किये जाते हैं; जिनका फल सर्वत्र सभी योनियोंमें भोगना पड़ता है। विशिष्ट जीवधारी—विशेषतः मानव ही सब योनियोंमें कर्मोंका फल भोगते हैं और सभी योनियोंमें भटकते हैं। वे पूर्व-जन्मका किया हुआ शुभाशुभ कर्म भोगते हैं। शुभ कर्मके प्रभावसे वे स्वर्गलोकमें जाते हैं और अशुभ कर्मसे उन्हें नरकमें भटकना पड़ता है। कर्मका निर्मूलन हो जानेपर मुक्ति होती है। साध्वि! मुक्ति दो प्रकारकी बतलायी गयी है—एक निर्वाणस्वरूपा और दूसरी परमात्मा श्रीकृष्णकी सेवारूपा। बुरे कर्मसे प्राणी रोगी होता है और शुभ कर्मसे आरोग्यवान्। वह अपने शुभाशुभ कर्मके अनुसार दीर्घजीवी, अल्पायु, सुखी एवं दुःखी होता है। कुत्सित कर्मसे ही प्राणी अङ्गहीन, अंधे-बहरे आदि होते हैं। उत्तम कर्मके फलस्वरूप सिद्धि आदिकी प्राप्ति होती है।

देवि! सामान्य बातें बतायी गयीं; अब विशेष बातें सुनो। सुन्दरि! यह अतिशय दुर्लभ विषय शास्त्रों और पुराणोंमें वर्णित है। इसे सबके सामने नहीं कहना चाहिये। सभी जातियोंके लिये भारतवर्षमें मनुष्यका जन्म पाना परम दुर्लभ है। साध्वि! उन सब जातियोंमें ब्राह्मण श्रेष्ठ माना

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जाता है। वह समस्त कर्मोंमें प्रशस्त होता है। भारतवर्षमें विष्णुभक्त ब्राह्मण सबसे श्रेष्ठ है। पतिव्रते! वैष्णवके भी दो भेद हैं—सकाम और निष्काम। सकाम वैष्णव कर्मप्रधान होता है और निष्काम वैष्णव केवल भक्त। सकाम वैष्णव कर्मोंका फल भोगता है और निष्काम वैष्णव शुभाशुभ भोगके उपद्रवसे दूर रहता है।

साध्वि! ऐसा निष्काम वैष्णव शरीर त्यागकर भगवान् विष्णुके निरामय पदको प्राप्त कर लेता है। ऐसे निष्काम वैष्णवोंका संसारमें पुनरागमन नहीं होता। द्विभुज भगवान् श्रीकृष्ण पूर्णब्रह्म परमेश्वर हैं। उनकी उपासना करनेवाले भक्तपुरुष अन्तमें दिव्य शरीर धारण करके गोलोकमें जाते हैं। सकाम वैष्णव पुरुष उच्च वैष्णव लोकोंमें जाकर समयानुसार पुनः भारतवर्षमें लौट आते हैं। द्विजातियोंके कुलमें उनका जन्म होता है। वे भी कालक्रमसे निष्काम भक्त बन जाते और भगवान् उन्हें निर्मल भक्ति भी अवश्य देते हैं। वैष्णव ब्राह्मणसे भिन्न जो सकाम मनुष्य हैं, वे विष्णुभक्तिसे रहित होनेके कारण किसी भी जन्ममें विशुद्ध बुद्धि नहीं पा सकते। साध्वि! जो तीर्थस्थानमें रहकर सदा तपस्या करते हैं, वे द्विज ब्रह्माके लोकमें जाते हैं और पुण्यभोगके पश्चात् पुनः भारतवर्षमें आ जाते हैं। भारतमें रहकर अपने कर्तव्य-कर्मोंमें संलग्न रहनेवाले ब्राह्मण तथा सूर्यभक्त शरीर त्यागनेपर सूर्यलोकमें जाते हैं और पुण्यभोगके पश्चात् पुनः भारतवर्षमें जन्म पाते हैं। अपने धर्ममें निरत रहकर शिव, शक्ति तथा गणपतिकी उपासना करनेवाले ब्राह्मण शिवलोकमें जाते हैं; फिर उन्हें लौटकर भारतवर्षमें आना पड़ता है। जो धर्मरहित होनेपर भी निष्कामभावसे श्रीहरिका भजन करते हैं, वे भी भक्तिके बलसे श्रीहरिके धाममें चले जाते हैं।

साध्वि! जो अपने धर्मका पालन नहीं करते, वे आचारहीन, कामलोलुप लोग अवश्य ही नरकमें जाते हैं। चारों ही वर्ण अपने धर्ममें कटिबद्ध रहनेपर ही शुभकर्मका फल भोगनेके अधिकारी होते हैं। जो अपना कर्तव्य-कर्म नहीं करते, वे अवश्य ही नरकमें जाते हैं। कर्मका फल भोगनेके लिये वे भारतवर्षमें नहीं आ सकते। अतएव चारों वर्णोंके लिये अपने धर्मका पालन करना अत्यन्त आवश्यक है।

अपने धर्ममें संलग्न रहनेवाले ब्राह्मण, स्वधर्मनिरत विप्रको अपनी कन्या देनेके फलस्वरूप चन्द्रलोकको जाते हैं और वहाँ चौदह मन्वन्तर कालतक रहते हैं। साध्वि! यदि कन्याको अलंकृत करके दानमें दिया जाय तो उससे दुगुना फल प्राप्त होता है। उन साधु पुरुषोंमें यदि कामना हो तब तो वे चन्द्रमाके लोकमें जाते हैं। निष्कामभावसे दान करें तो वे भगवान् विष्णुके परम धाममें पहुँच जाते हैं। गव्य (दूध), चाँदी, सुवर्ण, वस्त्र, घृत, फल और जल ब्राह्मणोंको देनेवाले पुण्यात्मा पुरुष चन्द्रलोकमें जाते हैं। साध्वि! एक मन्वन्तरतक वे वहाँ सुविधापूर्वक निवास करते हैं। उस दानके प्रभावसे उन्हें वहाँ सुदीर्घ कालतक निवास प्राप्त होता है। पतिव्रते! पवित्र ब्राह्मणको सुवर्ण, गौ और ताम्र आदि द्रव्यका दान करनेवाले सत्पुरुष सूर्यलोकमें जाते हैं। वे भय-बाधासे शून्य हो, उस विस्तृत लोकमें सुदीर्घ कालतक वास करते हैं। जो ब्राह्मणोंको पृथ्वी अथवा प्रचुर धान्य दान करता है, वह भगवान् विष्णुके परम सुन्दर श्वेतद्वीपमें जाता है और दीर्घकालतक वहाँ वास करता है। भक्तिपूर्वक ब्राह्मणको गृह-दान करनेवाले पुरुष स्वर्गलोकमें जाते और वहाँ दीर्घकालतक निवास करते हैं; वे उस लोकमें उतने वर्षोंतक रहते हैं, जितनी संख्यामें उस दान-गृहके रजःकण हैं। मनुष्य जिस-जिस देवताके उद्देश्यसे गृह-दान करता है, अन्तमें उसी देवताके लोकमें जाता है और घरमें जितने धूलिकण हैं, उतने वर्षोंतक वहाँ रहता

२००संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

है। अपने घरपर दान करनेकी अपेक्षा देवमन्दिरमें दान करनेसे चौगुना, पूर्तकर्म (वापी, कूप, तड़ाग आदिके निर्माण)-के अवसरपर करनेसे सौगुना तथा किसी श्रेष्ठ तीर्थस्थानमें करनेसे आठगुना फल होता है—यह ब्रह्माजीका वचन है।

समस्त प्राणियोंके उपकारके लिये तड़ागका दान करनेवाला दस हजार वर्षोंकी अवधि लेकर जनलोकमें जाता है। बावलीका दान करनेसे मनुष्यको सदा सौगुना फल मिलता है। वह सेतु (पुल)-का दान करनेपर तड़ागके दानका भी पुण्यफल प्राप्त कर लेता है। तड़ागका प्रमाण चार हजार धनुष* चौड़ा और उतना ही लंबा निश्चित किया गया है। इससे जो लघु प्रमाणमें है, वह वापी कही जाती है। सत्पात्रको दी हुई कन्या दस वापीके समान पुण्यप्रदा होती है। यदि उस कन्याको अलंकृत करके दान किया जाय तो दुगुना फल मिलता है। तड़ागके दानसे जो पुण्यफल प्राप्त होता है, वही उसके भीतरसे कीचड़ और मिट्टी निकालनेसे सुलभ हो जाता है। वापीके कीचड़को दूर करानेसे उसके निर्माण कराने-जितना फल होता है। पतिव्रते ! जो पुरुष पीपलका वृक्ष लगाकर उसकी प्रतिष्ठा करता है, वह हजारों वर्षोंके लिये भगवान् विष्णुके तपोलोकमें जाता है। सावित्री ! जो सबकी भलाईके लिये पुष्पोद्यान लगाता है, वह दस हजार वर्षोंतक ध्रुवलोकमें स्थान पाता है। पतिव्रते ! विष्णुके उद्देश्यसे विमानका दान करनेवाला मानव एक मन्वन्तरतक विष्णुलोकमें वास करता है। यदि वह विमान विशाल और चित्रोंसे सुसज्जित किया गया हो तो उसके दानसे चौगुना फल प्राप्त होता है। शिविका-दानमें उससे आधा फल होना निश्चित है। जो पुरुष भक्तिपूर्वक भगवान् श्रीहरिके उद्देश्यसे मन्दिराकार झूला दान करता है, वह अति दीर्घकालतक भगवान् विष्णुके लोकमें वास करता है। पतिव्रते ! जो सड़क बनवाता और उसके किनारे लोगोंके ठहरनेके लिये महल (धर्मशाला) बनवा देता है, वह सत्पुरुष हजारों वर्षोंतक इन्द्रके लोकमें प्रतिष्ठित होता है। ब्राह्मणों अथवा देवताओंको दिया हुआ दान समान फल प्रदान करता है। जो पूर्वजन्ममें दिया गया है, वही जन्मान्तरमें प्राप्त होता है। जो नहीं दिया गया है, वह कैसे प्राप्त हो सकता है? पुण्यवान् पुरुष स्वर्गीय सुख भोगकर भारतवर्षमें जन्म पाता है। उसे क्रमशः उत्तम-से-उत्तम ब्राह्मण-कुलमें जन्म लेनेका सौभाग्य प्राप्त होता है। पुण्यवान् ब्राह्मण स्वर्गसुख भोगनेके अनन्तर पुनः ब्राह्मण ही होता है। यही नियम क्षत्रिय आदिके लिये भी है। क्षत्रिय अथवा वैश्य तपस्याके प्रभावसे ब्राह्मणत्व प्राप्त कर लेता है—ऐसी बात श्रुतिमें सुनी जाती है। धर्मरहित ब्राह्मण नाना योनियोंमें भटकते हैं और कर्मभोगके पश्चात् फिर ब्राह्मणकुलमें ही जन्म पाते हैं। कितना ही काल क्यों न बीत जाय, बिना भोग किये कर्म क्षीण नहीं हो सकते। अपने किये हुए शुभ और अशुभ कर्मोंका फल प्राणियोंको अवश्य भोगना पड़ता है। देवता और तीर्थकी सहायता तथा कायव्यूहसे प्राणी शुद्ध हो जाता है।

साध्वि ! ये कुछ बातें तो तुम्हें बतला दीं, अब आगे और क्या सुनना चाहती हो?

(अध्याय २६)


* चार हाथकी लंबाईको धनुषका प्रमाण कहते हैं।

प्रकृतिखण्ड २०१


सावित्री-धर्मराजके प्रश्नोत्तर तथा सावित्रीके द्वारा धर्मराजको प्रणाम-निवेदन

**सावित्रीने कहा—**धर्मराज ! जिस कर्मके प्रभावसे पुण्यात्मा मनुष्य स्वर्ग अथवा अन्य लोकमें जाते हैं, वह मुझे बतानेकी कृपा करें।

**धर्मराज बोले—**पतिव्रते ! ब्राह्मणको अन्न दान करनेवाला पुरुष इन्द्रलोकमें जाता है और दान किये हुए अन्नमें जितने दाने होते हैं उतने वर्षोंतक वह वहाँ निवास पाता है। अन्नदानसे बढ़कर दूसरा कोई दान न हुआ है और न होगा। इसमें न कभी पात्रकी परीक्षाकी आवश्यकता होती है और न समयकी*। साध्वि ! यदि ब्राह्मणों अथवा देवताओंको आसन दान किया जाय तो हजारों वर्षोंतक अग्निदेवके लोकमें रहनेकी सुविधा प्राप्त हो जाती है। जो पुरुष ब्राह्मणको दूध देनेवाली गौ दान करता है, वह गौके शरीरमें जितने रोएँ होते हैं, उतने वर्षोंतक वैकुण्ठलोकमें प्रतिष्ठित रहता है। यह गोदान साधारण दिनोंकी अपेक्षा पर्वके समय चौगुना, तीर्थमें सौगुना और नारायणक्षेत्रमें कोटिगुना फल देनेवाला होता है। जो मानव भारतवर्षमें रहकर भक्तिपूर्वक ब्राह्मणको गौ प्रदान करता है, वह हजारों वर्षोंतक चन्द्रलोकमें रहनेका अधिकारी बन जाता है। दुग्धवती गौ ब्राह्मणको देनेवाला पुरुष उसके रोमपर्यन्त वर्षोंतक विष्णुलोकमें प्रतिष्ठित होता है। जो ब्राह्मणको वस्त्रसहित शालग्राम-शिलाका दान करता है, वह चन्द्रमा और सूर्यके स्थितिकालतक वैकुण्ठमें सम्मानपूर्वक रहता है। ब्राह्मणको सुन्दर स्वच्छ छत्र दान करनेवाला व्यक्ति हजारों वर्षोंतक वरुणके लोकमें आनन्द करता है। साध्वि ! जो ब्राह्मणको दो पादुकाएँ प्रदान करता है, उसे दस हजार वर्षतक वायुलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त होती है। मनोहर दिव्य शय्या ब्राह्मणको देनेसे दीर्घकालतक चन्द्रलोकमें प्रतिष्ठा होती है। जो देवताओं अथवा ब्राह्मणोंको दीप-दान करता है, वह ब्रह्मलोकमें वास करता है। उस पुण्यसे उसके नेत्रोंमें ज्योति बनी रहती है तथा वह यमलोकमें नहीं जाता। भारतवर्षमें जो मनुष्य ब्राह्मणको हाथी दान करता है, वह इन्द्रकी आयुपर्यन्त उनके आधे आसनपर विराजमान होता है। ब्राह्मणको घोड़ा देनेवाला भारतवासी मनुष्य वरुणलोकमें आनन्द करता है। ब्राह्मणको उत्तम शिविका—पालकी प्रदान करनेवाला विष्णुलोकमें जाता है। जो ब्राह्मणको पंखा तथा सफेद चँवर अर्पण करता है, वह वायुलोकमें सम्मान पाता है। जो भारतवर्षमें ब्राह्मणको धानका पर्वत देता है, वह धानके दानोंके बराबर वर्षोंतक विष्णुलोकमें प्रतिष्ठित होता है। दाता और प्रतिगृहीता दोनों ही वैकुण्ठलोकमें चले जाते हैं।

जो भारतवर्षमें निरन्तर भगवान् श्रीहरिके नामका कीर्तन करता है, उस चिरञ्जीवी मनुष्यको देखते ही मृत्यु भाग जाती है। भारतवर्षमें जो विद्वान् मनुष्य पूर्णिमाको रातभर दोलोत्सव मनानेका प्रबन्ध करता है, वह जीवन्मुक्त है। इस लोकमें सुख भोगकर अन्तमें वह भगवान् विष्णुके धामको प्राप्त होता है। उत्तराफाल्गुनीमें उत्सव मनानेसे इससे दुगुना फल मिलता है। जो भारतवर्षमें ब्राह्मणको तिलदान करता है, वह तिलके बराबर वर्षोंतक विष्णुधाममें सम्मान पाता है। उसके बाद उत्तम योनिमें जन्म पाकर चिरजीवी हो सुख भोगता है। ताँबेके पात्रमें तिल रखकर दान करनेसे दूना फल मिलता है। जो मनुष्य ब्राह्मणको फलयुक्त वृक्ष प्रदान करता है, वह फलके बराबर वर्षोंतक इन्द्रलोकमें सम्मान पाता है। फिर उत्तम योनिमें जन्म पाकर वह सुयोग्य पुत्र प्राप्त करता है। फलवाले वृक्षोंके दानकी महिमा इससे हजारगुना अधिक बतायी


* अन्नदानात् परं दानं न भूतं न भविष्यति। नात्र पात्रपरीक्षा स्यान्न कालनियमः क्वचित्॥
(प्रकृतिखण्ड २७।३)

२०२ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

गयी है अथवा ब्राह्मणको केवल फलका भी दान करनेवाला पुरुष दीर्घकालतक स्वर्गमें वास करके पुनः भारतवर्षमें जन्म पाता है।

भारतवर्षमें रहनेवाला जो पुरुष अनेक द्रव्योंसे सम्पन्न तथा भाँति-भाँतिके धान्योंसे भरे-पूरे विशाल भवन ब्राह्मणको दान करता है, वह उसके फलस्वरूप दीर्घकालतक कुबेरके लोकमें वास पाता है। तत्पश्चात् उत्तम योनिमें जन्म पाकर वह महान् धनवान् होता है। साध्वि! हरी-भरी खेतीसे युक्त सुन्दर भूमि भक्तिपूर्वक ब्राह्मणको अर्पण करनेवाला पुरुष निश्चयपूर्वक वैकुण्ठधाममें प्रतिष्ठित होता है। जो मानव उत्तम गोशाला तथा गाँव ब्राह्मणको दान करता है, उसकी वैकुण्ठलोकमें प्रतिष्ठा होती है। फिर, जहाँकी उत्तम प्रजाएँ हों, जहाँकी भूमि पकी हुई खेतियोंसे लहलहा रही हो, अनेक प्रकारकी पुष्करिणियोंसे संयुक्त हो तथा फलवाले वृक्ष और लताएँ जिसकी शोभा बढ़ा रही हों, ऐसा श्रेष्ठ नगर जो पुरुष भारतवर्षमें ब्राह्मणको दान करता है, वह बहुत लंबे समयपर्यन्त वैकुण्ठधाममें सुप्रतिष्ठित होता है। फिर भारतवर्षमें उत्तम जन्म पाकर राजेश्वर होता है। उसे लाखों नगरोंका प्रभुत्व प्राप्त होता है। इसमें संशय नहीं है। निश्चितरूपसे सम्पूर्ण ऐश्वर्य भूमण्डलपर उसके पास विराजमान रहते हैं।

अत्यन्त उत्तम अथवा मध्यम श्रेणीका भी नगर प्रजाओंसे सम्पन्न हो, वापी, तड़ाग तथा भाँति-भाँतिके वृक्ष जिसकी शोभा बढ़ाते हों, ऐसे सौ नगर ब्राह्मणको दान करनेवाला पुण्यात्मा वैकुण्ठलोकमें सुप्रतिष्ठित होता है। जैसे इन्द्र सम्पूर्ण ऐश्वर्योंसे सम्पन्न होकर स्वर्गलोकमें शोभा पाते हैं, वैसे ही भूमण्डलपर उस पुरुषकी शोभा होती है। दीर्घ कालतक पृथ्वी उसका साथ नहीं छोड़ती। वह महान् सम्राट् होता है। अपना सम्पूर्ण अधिकार ब्राह्मणको देनेवाला पुरुष चौगुने फलका भागी होता है; इसमें संशय नहीं है।

पतिव्रते! जो पुरुष ब्राह्मणको जम्बूद्वीपका दान करता है, उसे निश्चितरूपसे सौगुने फल प्राप्त होते हैं। जो सातों द्वीपोंकी पृथ्वीका दान करनेवाले, सम्पूर्ण तीर्थोंमें निवास करनेवाले, समस्त तपस्याओंमें संलग्न, सम्पूर्ण उपवास-व्रतके पालक, सर्वस्व दान करनेवाले तथा सम्पूर्ण सिद्धियोंके पारङ्गत तथा श्रीहरिके भक्त हैं, उन्हें पुनः जगत्में जन्म धारण करना नहीं पड़ता। उनके सामने असंख्य ब्रह्माओंका पतन हो जाता है, परंतु वे श्रीहरिके गोलोक या वैकुण्ठधाममें निवास करते रहते हैं। विष्णु-मन्त्रकी उपासना करनेवाले पुरुष अपने मानवशरीरका त्याग करनेके पश्चात् जन्म, मृत्यु एवं जरासे रहित दिव्य रूप धारण करके श्रीहरिका सारूप्य पाकर उनकी सेवामें संलग्न हो जाते हैं। देवता, सिद्ध तथा अखिल विश्व—ये सब-के-सब समयानुसार नष्ट हो जाते हैं, किंतु श्रीकृष्णभक्तोंका कभी नाश नहीं होता। जन्म, मृत्यु और वृद्धावस्था उनके निकट नहीं आ सकती।

जो पुरुष कार्तिकमासमें श्रीहरिको तुलसी अर्पण करता है, वह पत्र-संख्याके बराबर युगोंतक भगवान्के धाममें विराजमान होता है। फिर उत्तम कुलमें उसका जन्म होता और निश्चितरूपसे भगवान्के प्रति उसके मनमें भक्ति उत्पन्न होती है, वह भारतमें सुखी एवं चिरञ्जीवी होता है। जो कार्तिकमें श्रीहरिको घीका दीप देता है, वह जितने पल दीपक जलता है, उतने वर्षोंतक हरिधाममें आनन्द भोगता है। फिर अपनी योनिमें आकर विष्णुभक्ति पाता है; महाधनवान् नेत्रकी ज्योतिसे युक्त तथा दीप्तिमान् होता है। जो पुरुष माघमें अरुणोदयके समय प्रयागकी गङ्गामें स्नान करता है, उसे दीर्घकालतक भगवान् श्रीहरिके मन्दिरमें आनन्द लाभ करनेका सुअवसर मिलता है। फिर वह उत्तम योनिमें आकर भगवान् श्रीहरिकी भक्ति एवं मन्त्र पाता है; भारतमें

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जितेन्द्रियशिरोमणि होता है। पुनः यथासमय मानव-शरीरको त्यागकर 'भगवद्धाम' में जाता है। वहाँसे पुनः पृथ्वीतलपर आनेकी स्थिति उसके सामने नहीं आती। भगवान्‌का सारूप्य प्राप्तकर वह उन्हींकी सेवामें सदा लगा रहता है। गङ्गामें सर्वदा स्नान करनेवाला पुरुष सूर्यकी भाँति भूमण्डलपर पवित्र माना जाता है। उसे पद-पदपर अश्वमेध-यज्ञका फल प्राप्त होता है, यह निश्चित है। उसकी चरण-रजसे पृथ्वी तत्काल पवित्र हो जाती है। वह वैकुण्ठलोकमें सुखपूर्वक निवास करता है। उस तेजस्वी पुरुषको जीवन्मुक्त कहना चाहिये। सम्पूर्ण तपस्वी उसका आदर करते हैं। जो पुरुष मीन और कर्कके मध्यवर्तीकालमें भारतवर्षमें सुवासित जलका दान करता है, वह वैकुण्ठमें आनन्द भोगता रहता है। फिर उत्तम योनिमें जन्म पाकर रूपवान्, सुखी, शिवभक्त, तेजस्वी तथा वेद और वेदाङ्गका पारगामी विद्वान् होता है। वैशाखमासमें ब्राह्मणको सत्तू दान करनेवाला पुरुष सत्तूकणके बराबर वर्षोंतक विष्णुमन्दिरमें प्रतिष्ठित होता है। भारतवर्षमें रहनेवाला जो प्राणी श्रीकृष्णजन्माष्टमीका व्रत करता है, वह सौ जन्मोंके पापोंसे मुक्त हो जाता है। इसमें संशय नहीं है। वह दीर्घकालतक वैकुण्ठलोकमें आनन्द भोगता है। फिर उत्तम योनिमें जन्म लेनेपर उसे भगवान् श्रीकृष्णके प्रति भक्ति उत्पन्न हो जाती है—यह निश्चित है। इस भारतवर्षमें ही शिवरात्रिका व्रत करनेवाला पुरुष दीर्घकालतक शिवलोकमें प्रतिष्ठित होता है। जो शिवरात्रिके दिन भगवान् शंकरको बिल्वपत्र चढ़ाता है, वह पत्र-संख्याके बराबर युगोंतक कैलासमें सुखपूर्वक वास करता है। पुनः श्रेष्ठ योनिमें जन्म लेकर भगवान् शिवका परम भक्त होता है। विद्या, पुत्र, सम्पत्ति, प्रजा और भूमि—ये सभी उसके लिये सुलभ रहते हैं।

जो व्रती पुरुष चैत्र अथवा माघमासमें शंकरकी पूजा करता है तथा बेंत लेकर उनके सम्मुख रात-दिन भक्तिपूर्वक नृत्य करनेमें तत्पर रहता है, वह चाहे एक मास, आधा मास, दस दिन, सात दिन अथवा दो ही दिन या एक ही दिन ऐसा क्यों न करे, उसे दिनकी संख्याके बराबर युगोंतक भगवान् शिवके लोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त हो जाती है।

साध्वि! जो मनुष्य भारतवर्षमें रामनवमीका व्रत करता है, वह सात मन्वन्तरोंतक विष्णुधाममें आनन्दका अनुभव करता है, फिर अपनी योनिमें आकर रामभक्ति पाता और जितेन्द्रियशिरोमणि होता है। जो पुरुष भगवतीकी शरत्कालीन महापूजा करता है; साथ ही नृत्य, गीत तथा वाद्य आदिके द्वारा नाना प्रकारके उत्सव मनाता है, वह पुरुष भगवान् शिवके लोकमें प्रतिष्ठित होता है। फिर श्रेष्ठ योनिमें जन्म पाकर वह निर्मल बुद्धि पाता है। अतुल सम्पत्ति, पुत्र-पौत्रोंकी अभिवृद्धि, महान् प्रभाव तथा हाथी-घोड़े आदि वाहन—ये सभी उसे प्राप्त हो जाते हैं। वह राजराजेश्वर भी होता है। इसमें कोई संशय नहीं है। जो पुरुष पुण्यक्षेत्र भारतवर्षमें रहकर भाद्रपदमासकी शुक्लाष्टमीके अवसरपर एक पक्षतक नित्य भक्ति-भावसे महालक्ष्मीकी उपासना करता है, सोलह प्रकारके उत्तम उपचारोंसे भलीभाँति पूजा करनेमें संलग्न रहता है, वह वैकुण्ठधाममें रहनेका अधिकारी होता है।

भारतवर्षमें कार्तिककी पूर्णिमाके अवसरपर सैकड़ों गोप एवं गोपियोंको साथ लेकर रासमण्डल-सम्बन्धी उत्सव मनानेकी बड़ी महिमा है। उस दिन पाषाणमयी प्रतिमामें सोलह प्रकारके उपचारोंद्वारा श्रीराधा-कृष्णकी पूजा करे। इस पुण्यमय कार्यको सम्पन्न करनेवाला पुरुष गोलोकमें वास करता है और भगवान् श्रीकृष्णका परम भक्त बनता है। उसकी भक्ति क्रमशः वृद्धिको प्राप्त होती है। वह सदा भगवान् श्रीहरिका मन्त्र जपता है। वहाँ

२०४ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

भगवान् श्रीकृष्णके समान रूप प्राप्त करके उनका प्रमुख पार्षद होता है। जरा और मृत्युको जीतनेवाले उस पुरुषका पुनः वहाँसे पतन नहीं होता।

जो पुरुष शुक्ल अथवा कृष्ण-पक्षकी एकादशीका व्रत करता है, उसे वैकुण्ठमें रहनेकी सुविधा प्राप्त होती है। फिर भारतवर्षमें आकर वह भगवान् श्रीकृष्णका अनन्य उपासक होता है। क्रमशः भगवान् श्रीहरिके प्रति उसकी भक्ति सुदृढ़ होती जाती है। शरीर त्यागनेके बाद पुनः गोलोकमें जाकर वह भगवान् श्रीकृष्णका सारूप्य प्राप्त करके उनका पार्षद बन जाता है। पुनः उसका संसारमें आना नहीं होता। जो पुरुष भाद्रपदमासकी शुक्ल द्वादशी तिथिके दिन इन्द्रकी पूजा करता है, वह सम्मानित होता है। जो प्राणी भारतवर्षमें रहकर रविवार, संक्रान्ति अथवा शुक्लपक्षकी सप्तमी तिथिको भगवान् सूर्यकी पूजा करके हविष्यान्न भोजन करता है, वह सूर्यलोकमें विराजमान होता है। फिर भारतवर्षमें जन्म पाकर आरोग्यवान् और धनाढ्य पुरुष होता है। ज्येष्ठ महीनेकी कृष्ण-चतुर्दशीके दिन जो व्यक्ति भगवती सावित्रीकी पूजा करता है, वह ब्रह्माके लोकमें प्रतिष्ठित होता है। फिर वह पृथ्वीपर आकर श्रीमान् एवं अतुल पराक्रमी पुरुष होता है। साथ ही वह चिरंजीवी, ज्ञानी और वैभव-सम्पन्न होता है। जो मानव माघमासके शुक्लपक्षकी पञ्चमी तिथिके दिन संयमपूर्वक उत्तम भक्तिके साथ षोडशोपचारसे भगवती सरस्वतीकी अर्चना करता है, वह वैकुण्ठधाममें स्थान पाता है। जो भारतवासी व्यक्ति जीवनभर भक्तिके साथ नित्यप्रति ब्राह्मणको गौ और सुवर्ण आदि प्रदान करता है, वह वैकुण्ठमें सुख भोगता है। भारतवर्षमें जो प्राणी ब्राह्मणोंको मिष्टान्न भोजन कराता है, वह ब्राह्मणकी रोमसंख्याके बराबर वर्षोंतक विष्णुलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त करता है। जो भारतवासी व्यक्ति भगवान् श्रीहरिके नामका स्वयं कीर्तन करता है अथवा दूसरेको कीर्तन करनेके लिये उत्साहित करता है, वह नाम-संख्याके बराबर युगोंतक वैकुण्ठमें विराजमान होता है। यदि नारायणक्षेत्रमें नामोच्चारण किया जाय तो करोड़ोंगुना अधिक फल मिलता है। जो पुरुष नारायणक्षेत्रमें भगवान् श्रीहरिके नामका एक करोड़ जप करता है, वह सम्पूर्ण पापोंसे छूटकर जीवन्मुक्त हो जाता है—यह ध्रुव सत्य है। वह पुनः जन्म न पाकर विष्णुलोकमें विराजमान होता है*। उसे भगवान्‌का सारूप्य प्राप्त हो जाता है। वहाँसे वह फिर गिर नहीं सकता।

जो पुरुष प्रतिदिन पार्थिव मूर्ति बनाकर शिवलिङ्गकी अर्चा करता है और जीवनभर इस नियमका पालन करता रहता है, वह भगवान् शिवके धाममें जाता है और लंबे समयतक शिवलोकमें प्रतिष्ठित रहता है; तत्पश्चात् भारतवर्षमें आकर राजेन्द्रपदको सुशोभित करता है। निरन्तर शालग्रामकी पूजा करके उनका चरणोदक पान करनेवाला पुण्यात्मा पुरुष अतिदीर्घकालपर्यन्त वैकुण्ठमें विराजमान होता है। उसे दुर्लभ भक्ति सुलभ हो जाती है। संसारमें उसका पुनः आना नहीं होता। जिसके द्वारा सम्पूर्ण तप और व्रतका पालन होता है, वह पुरुष इन सत्कर्मोंके फलस्वरूप वैकुण्ठमें रहनेका अधिकार पाता है। पुनः उसे जन्म नहीं लेना पड़ता। जो सम्पूर्ण तीर्थोंमें स्नान करके पृथ्वीकी प्रदक्षिणा करता है, उसे निर्वाणपद मिल जाता है। पुनः संसारमें उसकी उत्पत्ति नहीं होती। भारत-जैसे पुण्यक्षेत्रमें जो अश्वमेधयज्ञ करता है, वह दीर्घकालतक


* नाम्नां कोटिं हरेर्यो हि क्षेत्रे नारायणे जपेत्। सर्वपापविनिर्मुक्तो जीवन्मुक्तो भवेद्ध्रुवम्॥
लभते न पुनर्जन्म वैकुण्ठे स महीयते।
(प्रकृतिखण्ड २७। ११०-१११)

प्रकृतिखण्ड २०५

इन्द्रके आधे आसनपर विराजमान रहता है। राजसूययज्ञ करनेसे मनुष्यको इससे चौगुना फल मिलता है।

सुन्दरि! सम्पूर्ण यज्ञोंसे भगवान् विष्णुका यज्ञ श्रेष्ठ कहा गया है। ब्रह्माने पूर्वकालमें बड़े समारोहके साथ इस यज्ञका अनुष्ठान किया था। पतिव्रते! उसी यज्ञमें दक्ष प्रजापति और शंकरमें कलह मच गया था। ब्राह्मणोंने क्रोधमें आकर नन्दीको शाप दिया था और नन्दीने ब्राह्मणोंको। यही कारण है कि भगवान् शंकरने दक्षके यज्ञको नष्ट कर डाला। पूर्वकालमें दक्ष, धर्म, कश्यप, शेषनाग, कर्दममुनि, स्वायम्भुवमनु, उनके पुत्र प्रियव्रत, शिव, सनत्कुमार, कपिल तथा ध्रुवने विष्णुयज्ञ किया था। उसके अनुष्ठानसे हजारों राजसूययज्ञोंका फल निश्चितरूपसे मिल जाता है। वह पुरुष अवश्य ही अनेक कल्पोंतक जीवन धारण करनेवाला तथा जीवन्मुक्त होता है।

भामिनि! जिस प्रकार देवताओंमें विष्णु, वैष्णवपुरुषोंमें शिव, शास्त्रोंमें वेद, वर्णोंमें ब्राह्मण, तीर्थोंमें गङ्गा, पुण्यात्मा पुरुषोंमें वैष्णव, व्रतोंमें एकादशी, पुष्पोंमें तुलसी, नक्षत्रोंमें चन्द्रमा, पक्षियोंमें गरुड़, स्त्रियोंमें भगवती मूलप्रकृति राधा, आधारोंमें वसुन्धरा, चञ्चल स्वभाववाली इन्द्रियोंमें मन, प्रजापतियोंमें ब्रह्मा, प्रजेश्वरोंमें प्रजापति, वनोंमें वृन्दावन, वर्षोंमें भारतवर्ष, श्रीमानोंमें लक्ष्मी, विद्वानोंमें सरस्वती, पतिव्रताओंमें भगवती दुर्गा और सौभाग्यवती श्रीकृष्णपत्नियोंमें श्रीराधा सर्वोपरि मानी जाती हैं; उसी प्रकार सम्पूर्ण यज्ञोंमें विष्णुयज्ञ श्रेष्ठ माना जाता है। सम्पूर्ण तीर्थोंका स्नान, अखिल यज्ञोंकी दीक्षा तथा व्रतों एवं तपस्याओं और चारों वेदोंके पाठका तथा पृथिवीकी प्रदक्षिणाका फल अन्तमें यही है कि भगवान् श्रीकृष्णकी मुक्तिदायिनी सेवा सुलभ हो। पुराणों, वेदों और इतिहासमें सर्वत्र श्रीकृष्णके चरण-कमलोंकी अर्चनाको ही सारभूत माना गया है। भगवान्‌के स्वरूपका वर्णन, उनका ध्यान, उनके नाम और गुणोंका कीर्तन, स्तोत्रोंका पाठ, नमस्कार, जप, उनका चरणोदक और नैवेद्य ग्रहण करना—यह नित्यका परम कर्तव्य है। साध्वि! इसे सभी चाहते हैं और सर्वसम्मतिसे यही सिद्ध भी है।

वत्से! अब तुम प्रकृतिसे पर तथा प्राकृत गुणोंसे रहित परब्रह्म श्रीकृष्णकी निरन्तर उपासना करो। मैं तुम्हारे पतिदेवको लौटा देता हूँ। इन्हें लो और सुखपूर्वक अपने घरको जाओ। मनुष्योंका यह मङ्गलमय कर्म-विपाक मैंने तुमको सुना दिया। यह प्रसङ्ग सर्वेप्सित, सर्वसम्मत तथा तत्त्वज्ञान प्रदान करनेवाला है।

भगवान् नारायण कहते हैं—नारद! धर्मराजके मुखसे उपर्युक्त वर्णन सुनकर सावित्रीकी आँखोंमें आनन्दके आँसू छलक पड़े। उसका शरीर पुलकायमान हो गया। उसने पुनः धर्मराजसे कहा।

सावित्री बोली—धर्मराज! वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ प्रभो! मैं किस विधिसे प्रकृतिसे भी पर भगवान् श्रीकृष्णकी आराधना करूँ, यह बताइये। भगवन्! मैं आपके द्वारा मनुष्योंके मनोहर शुभकर्मका विपाक सुन चुकी। अब आप मुझे अशुभकर्म-विपाककी व्याख्या सुनानेकी कृपा करें।

ब्रह्मन्! सती सावित्री इस प्रकार कहकर फिर भक्तिसे अत्यन्त नम्र हो वेदोक्त स्तुतिका पाठ करके धर्मराजकी स्तुति करने लगी।

सावित्रीने कहा—प्राचीनकालकी बात है, महाभाग सूर्यने पुष्करमें तपस्याके द्वारा धर्मकी आराधना की। तब धर्मके अंशभूत जिन्हें पुत्ररूपमें प्राप्त किया, उन भगवान् धर्मराजको मैं प्रणाम करती हूँ। जो सबके साक्षी हैं, जिनकी सम्पूर्ण भूतोंमें समता है, अतएव जिनका नाम शमन है, उन भगवान् शमनको मैं प्रणाम करती हूँ। जो कर्मानुरूप कालके सहयोगसे विश्वके सम्पूर्ण

२०६ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

प्राणियोंका अन्त करते हैं, उन भगवान् कृतान्तको मैं प्रणाम करती हूँ। जो पापीजनोंको शुद्ध करनेके निमित्त दण्डनीयके लिये ही हाथमें दण्ड धारण करते हैं तथा जो समस्त कर्मोंके उपदेशक हैं, उन भगवान् दण्डधरको मेरा प्रणाम है। जो विश्वके सम्पूर्ण प्राणियोंका तथा उनकी समूची आयुका निरन्तर परिगणन करते रहते हैं, जिनकी गतिको रोक देना अत्यन्त कठिन है, उन भगवान् कालको मैं प्रणाम करती हूँ। जो तपस्वी, वैष्णव, धर्मात्मा, संयमी, जितेन्द्रिय और जीवोंके लिये कर्मफल देनेको उद्यत हैं, उन भगवान् यमको मैं प्रणाम करती हूँ। जो अपनी आत्मामें रमण करनेवाले, सर्वज्ञ, पुण्यात्मा पुरुषोंके मित्र तथा पापियोंके लिये कष्टप्रद हैं, उन 'पुण्यमित्र' नामसे प्रसिद्ध भगवान् धर्मराजको मैं प्रणाम करती हूँ। जिनका जन्म ब्रह्माजीके वंशमें हुआ है तथा जो ब्रह्मतेजसे सदा प्रज्वलित रहते हैं एवं जिनके द्वारा परब्रह्मका सतत ध्यान होता रहता है, उन ब्रह्मवंशी भगवान् धर्मराजको मेरा प्रणाम है।*

मुने! इस प्रकार प्रार्थना करके सावित्रीने धर्मराजको प्रणाम किया। तब धर्मराजने सावित्रीको विष्णु-भजन तथा कर्मके विपाकका प्रसङ्ग सुनाया। जो मनुष्य प्रातः उठकर निरन्तर इस 'यमाष्टक' का पाठ करता है, उसे यमराजसे भय नहीं होता और उसके सारे पाप नष्ट हो जाते हैं। यदि महान् पापी व्यक्ति भी भक्तिसे सम्पन्न होकर निरन्तर इसका पाठ करता है तो यमराज अपने कायव्यूहसे निश्चित ही उसकी शुद्धि कर देते हैं। (अध्याय २७-२८)


नरक-कुण्डों और उनमें जानेवाले पापियों तथा पापोंका वर्णन

भगवान् नारायण कहते हैं—नारद! रविनन्दन धर्मराजने सावित्रीको विधिपूर्वक विष्णुका महामन्त्र देकर 'अशुभकर्मका विपाक' कहना आरम्भ किया।

धर्मराजने कहा—पतिव्रते! मानव शुभकर्मके विपाकसे नरकमें नहीं जा सकता। नरकमें जानेमें कारण है—अशुभकर्मका विपाक। अतएव अब मैं अशुभकर्मका विपाक बतलाता हूँ, सुनो। नाना प्रकारके स्वर्ग हैं। प्राणी अपने-अपने कर्मोंके प्रभावसे उन स्वर्गोंमें जाते हैं। नरकोंमें जाना कोई मनुष्य नहीं चाहते, परंतु अशुभकर्म-विपाक उन्हें नरकमें जानेके लिये विवश कर देते हैं। नरकोंके नाना प्रकारके कुण्ड हैं। विभिन्न पुराणोंके भेदसे इनके नामोंके भी भेद हो गये हैं। ये सभी कुण्ड बड़े ही विस्तृत हैं। पापियोंको दुःखका भोग कराना ही इन कुण्डोंका प्रयोजन है। वत्से! ये भयंकर कुण्ड अत्यन्त भयावह तथा कुत्सित हैं। इनमें छियासी कुण्ड तो प्रसिद्ध हैं,


* तपसा धर्ममाराध्य पुष्करे भास्करः पुरा। धर्मांशं यं सुतं प्राप धर्मराजं नमाम्यहम्॥
समता सर्वभूतेषु यस्य सर्वस्य साक्षिणः। अतो यन्नाम शमन इति तं प्रणमाम्यहम्॥
येनान्तश्च कृतो विश्वे सर्वेषां जीविनां परम्। कर्मानुरूपकालेन तं कृतान्तं नमाम्यहम्॥
बिभर्ति दण्डं दण्डाय पापिनां शुद्धिहेतवे। नमामि तं दण्डधरं यः शास्ता सर्वकर्मणाम्॥
विश्वं यः कलयत्येव सर्वायुश्चापि सन्ततम्। अतीव दुर्निवार्यं च तं कालं प्रणमाम्यहम्॥
तपस्वी वैष्णवो धर्मी संयमी संजितेन्द्रियः। जीविनां कर्मफलदं तं यमं प्रणमाम्यहम्॥
स्वात्मारामश्च सर्वज्ञो मित्रं पुण्यकृतां भवेत्। पापिनां क्लेशदो यश्च पुण्यमित्रं नमाम्यहम्॥
यज्जन्म ब्रह्मणो वंशे ज्वलन्तं ब्रह्मतेजसा। यो ध्यायति परं ब्रह्म ब्रह्मवंशं नमाम्यहम्॥
(प्रकृतिखण्ड २८। ८—१५)

२६- पञ्चदेवोपासकोंके नरकमें न जानेका कथन तथा छियासी प्रकारके नरक-कुण्डोंका विशद परिचय

प्रकृतिखण्ड २०७

जो संयमनीपुरीमें स्थित हैं। इनके अतिरिक्त कुछ अप्रसिद्ध भी हैं। साध्वि! उन प्रसिद्ध कुण्डोंके नाम बतलाता हूँ, सुनो। वह्निकुण्ड, तप्तकुण्ड, भयानक क्षारकुण्ड, विट्कुण्ड, मूत्रकुण्ड, दुःसह श्लेष्मकुण्ड, गरकुण्ड, दूषिकाकुण्ड, वसाकुण्ड, शुक्रकुण्ड, असृक्कुण्ड, कुत्सित अश्रुकुण्ड, गात्रमलकुण्ड, कर्णविट्कुण्ड, मज्जाकुण्ड, मांसकुण्ड, दुस्तर नखकुण्ड, लोमकुण्ड, केशकुण्ड, दुःखद अस्थिकुण्ड, ताम्रकुण्ड, महान् क्लेशदायक प्रतप्तलौहकुण्ड, तीक्ष्ण कण्टककुण्ड, विघ्नप्रद विषकुण्ड, घर्मकुण्ड, तप्तसुराकुण्ड, प्रतप्ततैलकुण्ड, दुर्वहदन्तकुण्ड, कृमिकुण्ड, पूयकुण्ड, दुरन्त सर्पकुण्ड, मशकुण्ड, दंशकुण्ड, भयंकर गरलकुण्ड, वज्रदंष्ट्रकुण्ड, वृश्चिककुण्ड, शरकुण्ड, शूलकुण्ड, भयंकर खड्गकुण्ड, गोलकुण्ड, नक्रकुण्ड, शोकास्पद काककुण्ड, सञ्चालकुण्ड, बाजकुण्ड, दुस्तर वन्धकुण्ड, तप्तपाषाणकुण्ड, तीक्ष्ण पाषाणकुण्ड, लालाकुण्ड, मसीकुण्ड, सुदारुण चूर्णकुण्ड, चक्रकुण्ड, वज्रकुण्ड, अत्यन्त दुःसह कूर्मकुण्ड, ज्वालाकुण्ड, भस्मकुण्ड, पूतिकुण्ड, तप्तसूर्मिकुण्ड, असिपत्रकुण्ड, क्षुरधारकुण्ड, सूचीमुखकुण्ड, गोधामुखकुण्ड, नक्रमुखकुण्ड, गजदंशकुण्ड, गोमुखकुण्ड तथा कुम्भीपाक, कालसूत्र, अवटोद, अरुन्तुद, पांशुभोज, पाशवेष्ट, शूलप्रोत, प्रकम्पन, उल्कामुख, अन्धकूप, वेधन, दण्डताडन, जालबन्ध, देहचूर्ण, दलन, शोषणकरं, सर्पमुख, ज्वालामुख, जिम्भ, धूमान्ध तथा नागवेष्टनकुण्ड हैं। सावित्री! ये सभी कुण्ड पापियोंको क्लेश देनेके लिये निर्मित हैं। दस लाख किंकरगण सदा इनकी देख-रेखमें नियुक्त रहते हैं। उन किंकरोंके हाथोंमें दण्ड, शूल और पाश रहते हैं। वे भयंकर एवं मदाभिमानी किंकर हाथोंमें भयावह गदा और शक्ति लिये रहते हैं। उनमें दयाका नामतक नहीं रहता। उन्हें कोई किसी प्रकार भी रोक नहीं सकता। उन तेजस्वी एवं निर्भीक अनुचरोंकी ताँबेके सदृश रक्तवर्णकी आँखें कुछ-कुछ पीले रंगकी हैं। योगसिद्धिसे सम्पन्न होनेके कारण वे नाना प्रकारके रूप धारण कर लिया करते हैं। मृत्युकाल उपस्थित होनेपर समस्त पापी जीवोंको वे स्वयं दिखायी पड़ते हैं। शिव, देवी, सूर्य और गणपतिके उपासक तथा अपने कर्मोंमें निरत रहनेवाले सिद्ध एवं योगी पुरुषोंको अपने पुण्य-प्रभावसे उनके सम्मुख नहीं जाना पड़ता। जो अपने धर्ममें सदा निरत रहते हैं, जिनका हृदय विशाल है तथा जो पूर्ण स्वतन्त्र हैं, जिन्हें स्वप्नमें भी कहीं भी इष्टदेवका दर्शन प्राप्त हो सका है, ऐसे वैष्णव पुरुषोंको वे बलवान् एवं निश्शङ्क यम-किंकर कभी दिखायी नहीं देते।

साध्वि! इन कुण्डोंकी संख्याका निरूपण तो कर चुका, अब किन पापियोंको किन कुण्डोंमें जाना पड़ता है, उन्हें बताता हूँ, सुनो।

साध्वि! भगवान् श्रीहरिकी सेवामें संलग्न रहनेवाले पुण्यात्मा, योगी, सिद्ध, व्रती, तपस्वी और ब्रह्मचारी पुरुष नरकमें नहीं जाते, यह ध्रुव सत्य है। जो शक्तिशाली मनुष्य बलके अभिमानमें आकर खलताके कारण अपने कटुवचनोंके द्वारा बान्धवोंको दग्ध करता है, वह अग्निकुण्ड नामक नरकमें जाता है। उसके शरीरमें जितने रोम होते हैं, उतने वर्षोंतक उसे उस नरकमें वास करना पड़ता है। फिर वह तीन बार पशु-योनिमें जन्म पाता है। जो मूर्ख मानव घरपर आये हुए भूखे और प्यासे दुःखी ब्राह्मणको भोजन नहीं देता, वह तप्तकुण्ड नामक नरकमें जाता है। अपने रोमके बराबर वर्षोंतक उस दुःखप्रद नरकमें वास करनेके पश्चात् सात जन्मोंतक वह पक्षी होता है। जो मनुष्य रविवार, सूर्यसंक्रान्ति, अमावास्या और श्राद्धके दिन वस्त्रोंको क्षार पदार्थसे धोता है, उसे सूतके बराबर वर्षोंतक क्षारकुण्डमें रहना पड़ता है। फिर सात जन्मोंतक वह धोबी होता है। जो अपने अथवा दूसरेके द्वारा दी हुई ब्राह्मण और देवताओंकी वृत्तिको छीन लेता है, वह साठ

२०८संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

हजार वर्षोंके लिये विट्कुण्ड नामक नरकमें जाता है। पुनः पृथ्वीपर आकर उतने ही वर्षोंतक वह विष्ठाके कीड़ेकी योनिमें रहता है। जो दूसरोंके तड़ागमें बिना उसकी आज्ञा लिये तड़ाग निर्माण कराता है (तड़ाग बनवानेका झूठा यश लेता है) तथा भाग्यदोषसे उसका विधिवत् उत्सर्ग करता है, ऐसा व्यक्ति उस दोषके कारण मूत्रकुण्ड नामक नरकमें जाता है। उसे वहाँ वे ही मूत्रादि अपवित्र वस्तुएँ भोजनके लिये मिलती हैं। फिर सात जन्मोंतक भारतवर्षमें वह गोधा होकर रहता है। मधुर पदार्थको अकेले ही खा जानेवाला व्यक्ति श्लेष्मकुण्ड नामक नरकमें जाता है। तत्पश्चात् वह प्रेत बनता है। जो पिता-माता, गुरु, स्त्री, पुत्र-पुत्री अथवा अनाथका भरण-पोषण नहीं करता, वह गरल (विष)-कुण्ड नामक नरकमें जाता है और पूरे एक हजार वर्षोंतक उसे खानेके लिये विष ही मिलता है। तत्पश्चात् वह भूतयोनिमें जाता है। जो मनुष्य अतिथिको क्रोधभरे नेत्रोंसे देखता है, उस पापीके दिये हुए जलको पितर और देवता ग्रहण नहीं करते। उसको यहीं ब्रह्महत्या-जैसे घोर पापोंका फल मिल जाता है। अन्तमें इनके फलस्वरूप प्राणी दूषिकाकुण्ड नामक नरकमें जाता है। वहाँ पूरे सौ वर्षोंतक दूषित पदार्थ भोजन करके रहना पड़ता है। फिर भूतकी योनिमें रहनेके पश्चात् वह पवित्र होता है। यदि ब्राह्मणको दी हुई वस्तु फिर दूसरेको दे दी जाय तो उस दूषित कर्मके प्रभावसे दाताको सौ वर्षोंके लिये वसाकुण्ड नामक नरकमें जाना पड़ता है। तदनन्तर सात जन्मोंतक उसे भारतमें गिरगिट होना पड़ता है। जो स्त्री पर-पुरुषसे अथवा पुरुष परायी स्त्रीसे अवैध सम्बन्ध करता है या उसे शुक्रपान कराता है, वह शुक्रकुण्ड नामक नरकमें जाता है और सौ वर्षोंतक वही खाता है। तत्पश्चात् सौ वर्षोंतक कीटयोनिमें रहकर वह शुद्ध होता है।

जो गुरु अथवा ब्राह्मणको मारकर उनके शरीरसे रक्त बहा देता है, उसे असृक्कुण्ड नामक नरककी प्राप्ति होती है। उसमें रहकर वह रक्तपान करता है। तदनन्तर सात जन्मोंतक वह व्याघ्र होता है। फिर क्रमशः मानवयोनिमें जन्म पाता है। जो श्रीकृष्ण-गुणगानके अवसरपर भक्तको आँसू बहाते तथा गद्गदवाणीसे हरिगुण गाते देखकर अनुचित रूपसे उसका उपहास करता है, वह मानव सौ वर्षोंतक अश्रुकुण्ड नामक नरकमें वास करता है। भोजनके लिये उसे अश्रु ही मिलते हैं। तत्पश्चात् तीन जन्मोंतक चाण्डालकी योनिमें उसका जन्म होता है, तब वह शुद्ध होता है। जो मनुष्य सुहृद्के साथ निरन्तर शठताका व्यवहार करता है, वह गात्रमलकुण्ड नामक नरकमें जाता है। इसके बाद उसे तीन जन्मोंतक गदहेकी तथा तीन जन्मोंतक शृगालकी योनि प्राप्त होती है। तत्पश्चात् वह शुद्ध होता है। जो बहरेको देखकर हँसता और अभिमानवश उसकी निन्दा करता है, उसका कर्णविट् नामक नरककुण्डमें वास होता है और वहाँ उसे कानोंकी मैल भोजनके लिये मिलती है। फिर परम दरिद्र होकर जन्म लेता है और उसके कानोंमें सुननेकी शक्ति नहीं रहती। जो मनुष्य लोभवश अपने भरण-पोषणके लिये प्राणियोंकी हिंसा करता है, वह बहुत दीर्घकालतक मज्जाकुण्ड नामक नरकमें स्थान पाता है। वहाँ मज्जा ही उसे भोजनके लिये मिलती है। इसके बाद वह खरगोशकी योनिमें जन्म पाता है; फिर सात जन्मोंतक मछलीका शरीर पाता है। फिर कर्मोंके प्रभावसे उसे मृग आदि योनियाँ प्राप्त होती हैं। तदनन्तर वह शुद्ध होता है। जो अपनी कन्याको पाल-पोषकर उसे बेचता है, वह अर्थलोभी महान् मूर्ख मानव मांसकुण्ड नामक नरकमें जाता है। कन्याका मांस ही उसे भोजनके लिये मिलता है। मेरे अनुचर उसे डंडोंसे पीटते हैं। मांसका भार मस्तकपर उठाकर वह ढोता है और भूख लगनेपर

प्रकृतिखण्ड २०९

उससे छूते हुए रक्तकी धारा चाटता है। तदनन्तर वह पापी भारतमें जन्म पाकर कन्याकी विष्ठाका कीड़ा होता है। फिर सात जन्मोंतक वधिक होता है। उसके बाद उसे तीन जन्म तक सूअर और सात जन्मोंतक कुत्तेकी योनि मिलती है। फिर सात-सात जन्मोंतक मेंढक, जोंक और कौएकी योनि प्राप्त होती है। तत्पश्चात् वह शुद्ध हो जाता है।

जो मनुष्य व्रतों, श्राद्धों और उपवासके लिये संयमके दिन क्षौरकर्म कराता है, वह सम्पूर्ण कर्मोंके लिये अपवित्र माना जाता है। साध्वि! ऐसा करनेवाला व्यक्ति नखकुण्डमें स्थान पाता है। जो भारतमें केशयुक्त पार्थिव लिङ्गकी पूजा करता है, वह दीर्घकालतक केशकुण्डमें वास करता है। उसके बाद महादेवजीके कोपसे वह यवन होता है। फिर सौ वर्षके बाद उसकी शुद्धि होती है। जो मानव विष्णुपद नामक तीर्थमें पितरोंको पिण्ड नहीं देता है, वह अस्थिकुण्ड नामक नरकमें वास पाता है। फिर सात जन्मोंतक मानव-शरीर पाकर वह लँगड़ा और अत्यन्त दरिद्र होता है। इस तरह दण्ड भोगनेके बाद उसकी शुद्धि होती है। जो महामूर्ख मानव अपनी गर्भवती स्त्रीका सेवन (उसके साथ समागम) करता है, वह तप्त ताम्रकुण्ड नामक नरकमें वास पाता है। अवीरा तथा सद्यःऋतुस्नाताका अन्न खानेवाला मनुष्य सौ वर्षोंतक तप्त लौहकुण्ड नामक नरकमें रहता है। इसके बाद उसे रजककी योनि और चर्मकारकी योनि प्राप्त होती है। जो चाम छूकर बिना हाथ धोये देवद्रव्यका स्पर्श करता है, वह घर्मकुण्ड नामक नरकमें वास करता है। जो बिना निमन्त्रण मिले शूद्रके घर जाकर उसका अन्न खाता है, वह ब्राह्मण तप्तसुराकुण्डमें स्थान पाता है। जो कठोर वचन कहकर सदा स्वामीको कष्ट पहुँचाता है, वह तीक्ष्णकण्टक नामक नरककुण्डमें कण्टकभोजी बनकर वास करता है। मेरे दूत उसे डंडेसे कष्ट पहुँचाते हैं। जो निर्दयी व्यक्ति प्राणीको विष देकर मार डालता है, वह हजार वर्षोंतक विषभोजी होकर विषकुण्डमें रहता है। फिर सात जन्मोंतक नरघाती अर्थात् जल्लाद होता है। सात जन्मोंतक कोढ़ी होता है। उसके प्रत्येक अङ्गमें फोड़े-फुंसियाँ कष्ट देती हैं। तत्पश्चात् उसकी शुद्धि होती है। जो पुण्यक्षेत्र भारतवर्षमें जन्म पाकर बैल जोतनेवाला व्यक्ति डंडेसे बैलको स्वयं मारता है अथवा भृत्यद्वारा मरवाता है, वह प्रतप्त तप्ततैल नामक नरककुण्डमें रहता है। उस बैलके जितने रोएँ होते हैं, उतने वर्षोंतक उसे बैल होकर कष्ट भोगना पड़ता है। साध्वि! जो निर्दयी व्यक्ति डंडेसे, लोहेसे अथवा बंसीसे प्राणीकी हिंसा करता है, वह युगोंतक दन्तकुण्ड नामक नरकमें स्थान पाता है। इसके बाद मानव-योनिमें जन्म पाकर उदररोगसे दुःखी होता है। जो ब्राह्मण मांस-मछली खाता तथा श्रीहरिके नैवेद्यकी वस्तु (उन्हें अर्पण किये बिना ही) चट कर जाता है, वह कृमिकुण्ड नामक नरकमें जाता है। उसे आहारके रूपमें मांस उपलब्ध होता है। तत्पश्चात् तीन जन्मोंतक उसे म्लेच्छकी योनि मिलती है। जो छोटे-बड़े अथवा क्रूर सर्पको मारता है, वह मानव सर्पकुण्ड नामक नरकका अधिकारी होता है, उसे वहाँ सर्प काटते हैं। सर्पका विट् उसे खाना पड़ता है। तत्पश्चात् वह सर्पकी योनि पाता है। इसके बाद थोड़ी आयुवाला मानव होता है। उसके शरीरमें दाद आदि चर्मरोग होते हैं। फिर वह साँपके काटनेपर बड़े क्लेशसे मृत्युको प्राप्त होता है।

ब्रह्माके विधानमें रक्तपान जिनकी जीविका ही निश्चित है, उन मच्छर आदि क्षुद्र जन्तुओंको जो मारते हैं, वे मृत जीवोंके मशकुण्ड और दंशकुण्ड नामक नरकोंमें निवास करते हैं। दिन-रात वे जन्तु उन्हें काटते रहते हैं। उन्हें खानेको कुछ मिलता नहीं। तदुपरान्त उस क्षुद्र जन्तुकी योनिमें उनका जन्म होता है। फिर वे

२१०संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

अङ्गहीन मानव होते हैं। जो दण्ड न देने योग्य व्यक्तिको अथवा ब्राह्मणको दण्ड देता है, वह वज्रदंष्ट्रकुण्ड नामक नरकमें जाता है। उसमें कीड़े-ही-कीड़े रहते हैं। उसे कीड़े खाते हैं और वह हाहाकार मचाया करता है। जो मूढ़ भूपाल धनके लोभसे प्रजाको सताता है, वह वृश्चिककुण्ड नामक नरकमें स्थान पाता है। पुनः सात जन्मोंतक बिच्छू होता है। तत्पश्चात् मनुष्यकी योनिमें उसकी उत्पत्ति होती है। वह अङ्गहीन और रोगी होकर जीवन व्यतीत करता है। जो ब्राह्मण होकर जीवोंके वधके लिये हथियार उठाता है, वह दूसरोंका धावन बनकर इधर-उधर जाता है। जो कभी संध्या नहीं करता तथा भगवान् श्रीहरिकी भक्तिसे विमुख रहता है, वह शर आदिके कुण्डमें जाता है। बाण आदिसे उसके अङ्ग निरन्तर छिदते रहते हैं। मदके अभिमानमें चूर रहनेवाला जो राजा थोड़े-से अपराधके कारण अन्धकारपूर्ण कारागारमें प्रजाओंको मारता है, उसे अपने दोषके फलस्वरूप गोलकुण्ड नामक नरकमें जाना पड़ता है। वह नरक बड़ा ही भयंकर है। उसमें खौलता हुआ जल भरा रहता है। अन्धकार छाया रहता है। तीखे दाँतवाले कीड़े सर्वत्र फैले रहते हैं। ऐसे दारुण नरकमें वह पड़ा रहता है। तत्पश्चात् मनुष्य होकर उन प्रजाओंका भृत्य बनता है। सरोवरसे निकले हुए नक्र आदि जलचर जीवोंको जो मारता है, वह नक्रकुण्ड नामक नरकमें जाता है। जो मनुष्य पुण्यक्षेत्र भारतवर्षमें आकर कामभावसे परस्त्रीके वक्षःस्थल, श्रोणी, स्तन एवं मुख देखता है, वह काकतुण्ड नामक नरकमें वास करता है। जो मूढ़ मानव भारतवर्षमें जन्म पाकर ताँबा और लोहा चुराता है, वह बाजकुण्ड नामक नरकमें स्थान पाता है। मेरे दूत बाणोंसे उसकी आँख फोड़ देते और उसे डंडोंसे पीटते हैं। इसके बाद वह तीन जन्मोंमें नेत्रहीन तथा सात जन्मोंमें दरिद्री होता है।

भारतवर्षमें जन्म पाकर देवताओंकी प्रतिमा तथा देवसम्बन्धी द्रव्यकी चोरी करनेवाला मानव दुस्तर वन्थकुण्ड नामक नरकमें निश्चितरूपसे वास करता है। तीखे वज्रोंसे उसका शरीर दग्ध-सा होता रहता है। देवता और ब्राह्मणके रजत, गव्य (दूध-दही आदि) पदार्थ तथा वस्त्रकी चोरी करनेवाला व्यक्ति तप्तपाषाणकुण्डनामक नरकमें स्थान पाता है—यह निश्चित है। फिर तीन जन्मोंतक बगुला, तीन जन्मोंतक श्वेत हंस, एक जन्ममें सफेद चील, फिर अन्यान्य श्वेत पक्षी, इसके बाद अल्पायु मानव होता है। रक्त-विकार और शूलरोगसे उसे असह्य पीड़ा सहनी पड़ती है। जो ब्राह्मण और देवताके पीतल तथा काँसेके पात्रका अपहरण करता है, वह तीक्ष्ण पाषाणकुण्डमें अपनी रोमकी संख्याके बराबर वर्षोंतक निश्चय ही निवास करता है। जो पुंश्चलीका अन्न खाता तथा उसकी कमाईसे जीविका चलाता है, वह लालाकुण्ड नामक नरकमें वास करता है। जिसमें लार-ही-लार भरी रहती है, वहाँका दुःख भोगनेके पश्चात् मानव बनकर नेत्ररोग और शूलरोगसे कष्ट पाता है।

साध्वि! जो ब्राह्मण तथा देवताओंके धान्य आदिसे सम्पन्न खेती, ताम्बूल, आसन एवं शय्याका अपहरण करता है, वह पापी मानव चूर्णकुण्ड नामक नरकमें जाता है। जो मनुष्य ब्राह्मणका धन चुराकर उससे चक्र (पहिया अथवा तेल पेरनेका कोल्हू) बनवाता है, वह चक्रकुण्ड नामक नरकमें वास करता है। उसे वहाँ सैकड़ों वर्षोंतक डंडोंकी मार सहनी पड़ती है। फिर तीन जन्मोंतक वह तेली, रोगी और निःसंतान होता है। भाई-बन्धुओं और ब्राह्मणोंके प्रति क्रूर दृष्टि रखनेवाला मानव दीर्घकालतक वक्रकुण्ड नामक नरकमें रहता है। तत्पश्चात् सात जन्मोंतक टेढ़े शरीरवाला तथा अङ्गहीन बनता है। दरिद्रता उसे घेरे रहती है। देवता और ब्राह्मणोंके घृत तथा तेलका अपहरण करनेवाला पातकी ज्वालाकुण्ड

प्रकृतिखण्ड २१९

तथा भस्मकुण्ड नामक नरकका अधिकारी होता है। जो मानव देवता-ब्राह्मणके सुगन्धित तैल, आँवला तथा अन्य भी किसी उत्तम गन्धवाले द्रव्यका अपहरण करता है, वह पूतिकुण्डसंज्ञक नरकमें रहकर रात-दिन दुर्गन्धका अनुभव करता है। साध्वि! जो बलवान् व्यक्ति किसी दूसरेकी पैतृक भूमिको छल-बलसे अथवा उसे मारकर छीन लेता है, उसे तप्तसूर्मि नामक नरकमें स्थान मिलता है। जैसे खौलते हुए तेलमें कोई जीव जलता है, उसी तरह वह दग्ध होता हुआ निरन्तर उसके भीतर चक्कर लगाता रहता है, तथापि जलकर भस्म नहीं हो जाता; क्योंकि प्राणीका भोगदेह (यातना-शरीर) नष्ट नहीं होता। इसके बाद वह विष्ठाका कीड़ा होता है। फिर भूमिहीन एवं दरिद्र मानव होता है।

साध्वि! जो अत्यन्त दारुण एवं निर्दयी व्यक्ति तलवारसे जीवोंको काटता तथा धनके लोभसे नरघाती बनकर मानवकी हत्या करता है, वह असिपत्र नामक नरकमें स्थान पाता है। मेरे दूत तलवारसे निरन्तर उसके अङ्ग काटते हैं। जब वह भोजनके अभावमें चिल्लाता है, तब दूत उसे मारते हैं। फिर सौ-सौ जन्मोंतक भारतमें चाण्डाल, शूकर और कूकर होता है। इसके बाद सात-सात जन्मोंतक शृगाल और व्याघ्र होता है, तीन जन्मोंतक भेड़िया, सात जन्मोंतक गेंडा और तीन जन्मोंतक भैंसा होता है। पतिव्रते ! ग्रामों और नगरोंमें आग लगानेवाला पापी मानव क्षुरधारकुण्ड नामक नरकमें निवास करता है। तीन युगोंतक उसमें रहता है और यमदूत उसके अङ्गको काटते रहते हैं। फिर उसे प्रेतकी योनि मिल जाती है और मुँहसे आग उगलता हुआ वह जगत्में भ्रमण करता है। फिर सात-सात जन्मोंतक अमेध्य-भोजी, खद्योत, महान् शूलरोगी एवं गलितकुष्ठी मानव होता है। जो दूसरेके कानमें मुँह लगाकर परायी निन्दा करता है, दूसरेके दोष जाननेमें जिसकी विशेष स्पृहा रहती है तथा जो देवता एवं ब्राह्मणकी निन्दा किया करता है, वह तीन युगोंतक सूचीमुख नामक नरकमें स्थान पाता है। सूचीमें उसके सभी अङ्ग छिद जाते हैं। फिर बिच्छू, सर्प, वज्रकीट तथा आग फैलानेवाले कीड़ोंकी योनियोंमें सात-सात जन्मोंतक भटकता है। जो गृहस्थोंके घरमें सेंध लगाकर घुस जाता और भीतर पड़ी हुई वस्तुएँ चुरा लेता है तथा गाय, बकरे और भेड़ोंकी भी चोरी करता है, वह गोधामुख नामक नरकमें जाता है। मेरे दूतोंकी मार खाते हुए तीन युगोंतक उसे वहाँ रहना पड़ता है। साधारण वस्तु चुरानेवाला व्यक्ति नक्रमुख-संज्ञक नरकमें जाता है। मेरे दूतोंकी मार सहते हुए वह वहाँ रहता है। फिर उसकी शुद्धि हो जाती है। जो हाथियों, घोड़ों एवं गौओंको मारता है तथा वृक्षोंको काटता है, वह महान् पातकी व्यक्ति गजदंश नामक नरकमें दीर्घकालतक रहता है। मेरे दूत हाथीके दाँत लेकर उन्हींसे उसको निरन्तर पीटते हैं। फिर तीन-तीन जन्मोंतक वह हाथी, घोड़े, गौ एवं म्लेच्छ जातिकी योनिमें उत्पन्न होता है। प्यासी गौके जल पीते समय जो उसे दूर हटा देता है, वह पुरुष गोमुखकुण्ड नामक नरकमें पड़ता है। वहाँ सब ओर कीड़े और खौलता हुआ जल भरा रहता है। वह उसीमें जलता हुआ वास करता है। इसके बाद दीर्घरोगी एवं दरिद्र मानव होता है।

जो गौ, ब्राह्मण, स्त्री, भिक्षुक तथा गर्भकी प्रत्यक्ष अथवा आतिदेशिकी हत्या करता है एवं अगम्या स्त्रीके साथ गमन करता है, वह महान् नीच व्यक्ति कुम्भीपाककुण्ड नरकमें निवास करता है। मेरे दूत निरन्तर मारते हुए उसे चूर्ण-चूर्ण कर देते हैं। प्रज्वलित अग्नि, कण्टक और खौलते हुए तेलमें एवं गरम लोहे तथा आगसे संतप्त ताँबेपर वह क्षण-क्षणमें गिरता रहता है। फिर गीध, सूअर तथा कौवा और सर्प होता है।

२१२संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

तदनन्तर वह विष्ठाका कीड़ा होता है। फिर बैल होनेके पश्चात् कोढ़ी मनुष्य होता है। दरिद्रता उसका साथ कभी नहीं छोड़ती।

साध्वि! जो भगवान् श्रीकृष्ण और उनकी प्रतिमामें, अन्य देवताओं तथा उनके विग्रहोंमें, शिव तथा शिवलिङ्गमें, सूर्य तथा सूर्यकान्तमणिमें, गणेश और उनकी प्रतिमामें—सर्वत्र भेदबुद्धि करता है, उसे आतिदेशिकी ब्रह्महत्या लगती है। अर्थात् शास्त्रकी आज्ञाके अनुसार उसे ब्रह्महत्या लगती है। जो अपने गुरु, इष्टदेव और जन्मदात्री मातामें भेदबुद्धि करता है, उसे ब्रह्महत्या लगती है। जो विष्णुभक्तों तथा अन्य देवभक्तोंमें, ब्राह्मणों एवं ब्राह्मणेतरोंमें तुलना करता है, उसे ब्रह्महत्या लगती है। परिपूर्णतम भगवान् श्रीकृष्ण सर्वेश्वरेश्वर हैं। ये सम्पूर्ण कारणोंके कारण हैं। इन सर्वान्तर्यामी आदिपुरुषकी सभी देवता उपासना करते हैं। ये मायासे अनेक रूप धारण करते हैं। वस्तुतः ये एक निर्गुण ब्रह्म हैं। जो इनकी दूसरे किसीसे समता करता है, वह आतिदेशिकी ब्रह्महत्याका अधिकारी माना जाता है। वेदमें कहे हुए देवताओं और पितरोंके परम्परागत पूजनका जो निषेध करता है, वह ब्रह्महत्याको प्राप्त करता है। जो भगवान् हृषीकेश तथा उनके मन्त्रोपासकोंकी निन्दा करता है; जो पवित्रोंमें भी परम पवित्र हैं, जिनका विग्रह आनन्दमय ज्ञानस्वरूप है तथा जो वैष्णवजनोंके परम आराध्य एवं देवताओंके सेव्य हैं, उन सनातन भगवान् श्रीहरिकी जो पूजा नहीं करते, बल्कि उलटे निन्दा करते हैं, उनको ब्रह्महत्या लगती है। जो सर्वदेवीस्वरूपा, सर्वाद्या, सर्ववन्दिता, सर्वकारणरूपा, विष्णुभक्तिप्रदायिनी, सती, विष्णुमाया, सर्वशक्तिस्वरूपा तथा सर्वमाता प्रकृति (दुर्गा) हैं, उनकी जो निन्दा करते हैं, उन्हें ब्रह्महत्या प्राप्त होती है। श्रीकृष्णजन्माष्टमी, रामनवमी, एकादशी, शिवरात्रि और रविवारव्रत—ये अत्यन्त पुण्य प्रदान करनेवाले हैं। जो ये परम पवित्र पाँच व्रत नहीं करते, वे चाण्डालसे भी अधिक नीच मानव ब्रह्महत्याके भागी होते हैं। जो भारतवासी मानव अम्बुवाची योगमें अर्थात् आर्द्रा नक्षत्रके प्रथम चरणमें पृथ्वी खोदते तथा जलमें मल-मूत्रादि करते हैं, उन्हें ब्रह्महत्या लगती है। जो समर्थ होकर भी गुरु, माता, भाई, साध्वी स्त्री, पुत्र-पुत्री तथा अनाथोंका भरण-पोषण नहीं करता है, वह ब्रह्महत्याका अधिकारी होता है। जो भगवान् श्रीहरिकी भक्तिसे वञ्चित है, उसे ब्रह्महत्या लगती है। निरन्तर भगवान् श्रीहरिको भोग लगाकर भोजन नहीं करनेवाला और भगवान् विष्णु तथा पुण्यमय पार्थिवेश्वरकी उपासनासे विमुख रहनेवाला ब्रह्महत्यारा कहा जाता है।

(अब आतिदेशिकी गोहत्या बतलाते हैं—) कोई व्यक्ति गौको मार रहा हो, उसे देखकर जो निवारण नहीं करता तथा जो गौ और ब्राह्मणके बीचसे होकर निकलता है, वह गोहत्याका अधिकारी होता है। जो मूर्ख डंडोंसे गौको पीटता है, बैलपर आरूढ़ होता है, उसे प्रतिदिन गोवधका पाप लगता है। जो पैरसे अग्निका स्पर्श और गौपर चरण-प्रहार करता है तथा स्नान करके बिना पैर धोये घरके भीतर प्रवेश करता है, उसे गोवधका पाप लगता है। जो पति अपनी स्त्रीका सतीत्व बेचकर जीविका चलाता है और संध्या नहीं करता, उसे गोहत्या लगती है। जो स्त्री अपने स्वामी तथा श्रीकृष्णमें भेदबुद्धि करती तथा कठोर वचनोंसे पतिके हृदयपर आघात पहुँचाती है, उसे निश्चय ही गोहत्या लगती है। जो गौओंके जानेके मार्गको खोदकर तथा तड़ाग एवं उसके ऊपरकी भूमिको जोतकर उसमें अनाज बोता है, वह गोहत्याके पापका भागी होता है। राजकीय उपद्रव और दैवी प्रकोपके अवसरपर जो स्वामी यत्नपूर्वक गौकी रक्षा नहीं करता, बल्कि उसे उलटे दुःख देता है, उस मूढ़ मानवको गोहत्या अवश्य लगती है। जो किसी प्राणीको, देवप्रतिमाके स्नान

२७- भगवान् श्रीकृष्णके स्वरूप, महत्त्व और गुणोंकी अनिर्वचनीयता

प्रकृतिखण्ड २१३

करानेके बाद वहाँसे बहते हुए जलको, देवताके नैवेद्यको तथा निर्माल्य पुष्पको लाँघता है, वह गोहत्याका भागी होता है। जो अतिथियोंके लिये सदा 'नहीं' ही किया करता, झूठ बोलता और दूसरोंको ठगता तथा देवता और गुरुसे द्वेष करता है, उसे गोहत्याका पाप लगता है। जो देवप्रतिमा, गुरु और ब्राह्मणको देखकर वेगपूर्वक उन्हें प्रणाम नहीं करता, उसे गोहत्या अवश्य लगती है। जो ब्राह्मण प्रणाम करनेवाले व्यक्तिको क्रोधमें आकर आशीर्वाद नहीं देता तथा विद्यार्थीको विद्या नहीं पढ़ाता, उसे गोहत्या लगती है।

गुरुपत्नी, राजपत्नी, सौतेली माँ, सगी माँ, पुत्री, पुत्र-वधू, सास, गर्भवती स्त्री, बहिन, सहोदर भाईकी पत्नी, मामी, दादी, नानी, बूआ, मौसी, भतीजी, शिष्या, शिष्य-पत्नी, भानजेकी स्त्री, भाईके पुत्रकी पत्नी—इन सबको ब्रह्माजीने अत्यन्त अगम्या बतलाया है। जो पुरुष कामभावसे इनपर दृष्टिपात करता है, उसे अधम मानव कहा गया है। वेदोंमें उसे मातृगामी कहा गया है। उसे ब्रह्महत्याका पाप-फल प्राप्त होता है। किसी भी सत्कर्ममें उसे नहीं लिया जा सकता। वह महापापी अत्यन्त दुष्कर कुम्भीपाक नामक नरकमें जाता है। भद्रे! मैंने नरकोंमें जानेवाले लोगोंके कुछ लक्षण बतला दिये। इन नरककुण्डोंसे अतिरिक्त नरकोंमें जो जाते हैं, उनका प्रसङ्ग कहता हूँ, सुनो!

साध्वि! जो द्विज पुंश्चली और वेश्याका अन्न खाता तथा उसके साथ गमन करता है, वह मरनेके पश्चात् कालसूत्र नामक नरकमें जाता है। इसके बाद रोगी होता है। एक पतिकी सेवा करनेवाली स्त्री 'पतिव्रता' कहलाती है। दूसरेसे सम्बन्ध स्थापित करनेपर उसे 'कुलटा' कहते हैं। तीसरेके सम्पर्कमें आनेपर उसे 'धर्षिणी' जानना चाहिये। चौथेके पास जानेवाली 'पुंश्चली' मानी जाती है। पाँचवें-छठेंके साथ गमन करनेवाली स्त्रीकी 'वेश्या' संज्ञा होती है। सातवें-आठवेंके सम्पर्कमें आनेवाली 'युग्मी' कहलाती है। इससे अधिक पुरुषोंके पास जानेवाली स्त्रीको 'महावेश्या' कहते हैं। वह सबके लिये अस्पृश्य है। जो द्विज कुलटा, धर्षिणी, पुंश्चली, वेश्या, युग्मी तथा महावेश्याके साथ गमन करता है, वह अवटोद नामक नरकमें जाता है—यह निश्चित है। कुलटागामी सौ वर्षोंतक, धर्षिणीगामी चार सौ वर्षोंतक, पुंश्चलीगामी छः सौ वर्षोंतक, वेश्यागामी आठ सौ वर्षोंतक, युग्मीगामी एक हजार वर्षोंतक तथा महावेश्यागामी कामुक मानव इससे सौ गुने वर्षोंतक इस अवटोद नरकमें वास करता है। यमदूत उसपर प्रहार करते हैं। फिर कुलटागामी तित्तिर, धर्षिणीगामी कौआ, पुंश्चलीगामी कोयल, वेश्यागामी शृगाल, युग्मीगामी सूअर तथा महावेश्यागामी मरघटमें सेमलका वृक्ष होकर सात जन्मोंतक पापका फल भोगते हैं।

जो ज्ञानहीन मानव सूर्यग्रहण अथवा चन्द्रग्रहणके समय भोजन करता है, वह अरुन्तुद नामक नरकमें जाता है। वह जितने अन्नके दाने खाता है, उतने वर्षोंतक उसे उस नरकमें वास करना पड़ता है। इसके बाद वह उदररोगसे पीड़ित मानव होता है। फिर गुल्म-रोगी, काना और दन्तहीन होता है। जो अपनी कन्याका वाग्दान करके किसी दूसरे वरके साथ उसका विवाह करता है, वह पांशुभोज नामक नरकमें स्थान पाता है। पांशु ही उसे भोजनके लिये मिलता है। साध्वि! जो दानमें दी हुई वस्तुको फिर ले लेता है, वह पाशवेष्ट नामक नरकमें निवास करता है। वहाँ शयन करनेके लिये उसे बाणोंकी शय्या मिलती है। मेरे दूतोंकी मार भी खानी पड़ती है। जो ब्राह्मणको दण्ड देता है तथा जिसके भयसे ब्राह्मण काँपता है, वह व्यक्ति प्रकम्पन नामक नरकमें वास करता है। जो स्त्री क्रोधभरे मुखसे रोषपूर्वक अपने पतिको देखती तथा कटुवचन कहती है, वह

२१४संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

उल्कामुख नामक नरकमें जाती है। मेरे दूत उसके मुखमें उल्का (लूक) देते हैं और डंडोंसे उसके मस्तकपर प्रहार करते हैं। इसके बाद मनुष्ययोनिमें आकर वह विधवा तथा रोगिणी होती है। वेश्याको वेधन-कुण्डमें, युग्मीको दण्डताडनकुण्डमें, महावेश्याको जालबन्धकुण्डमें, कुलटाको देहचूर्णकुण्डमें, स्वैरिणीको दलनकुण्डमें तथा धृष्टाको शोषणकुण्डमें यातना भोगनेके लिये निवास करना पड़ता है। मेरे दूत उनपर प्रहार करते हैं। साध्वि ! ये पापिनी स्त्रियाँ विष्ठा-मूत्र आदि अपवित्र वस्तुएँ खाकर निरन्तर कष्ट भोगती हैं।

जो पुरुष हाथमें तुलसी लेकर की हुई प्रतिज्ञाका पालन नहीं करता अथवा झूठी शपथ खाता है, वह ज्वालामुख नामक नरकमें जाता है। हाथमें गङ्गाजल तथा शालग्रामकी प्रतिमा ले प्रतिज्ञा करके उसका पालन नहीं करनेवाला भी ज्वालामुख नरकका ही भागी होता है। जो दाहिना हाथ उठाकर प्रतिज्ञा करता, देवमन्दिरमें जाकर या गौ और ब्राह्मणको छूकर वचनबद्ध होता और फिर उसका पालन नहीं करता है, उसे भी ज्वालामुख नामक नरककी प्राप्ति होती है। मित्रद्रोही, कृतघ्न, विश्वासघाती तथा झूठी गवाही देनेवाला—ये सभी ज्वालामुख नरकमें स्थान पाते हैं। वहाँ उन्हें प्रतप्त अङ्गार खानेके लिये मिलते हैं और मेरे दूत उन्हें पीड़ा पहुँचाते रहते हैं। तुलसी छूकर झूठी शपथ खानेवाला सात जन्मोंतक चाण्डाल होता है। गङ्गाजल लेकर प्रतिज्ञा करके उसे न पालनेवाला पाँच जन्मोंतक म्लेच्छ होता है। देवि! शालग्रामका स्पर्श करके की हुई प्रतिज्ञाका पालन न करनेवाला सात जन्मोंतक विष्ठाका कीड़ा होता है। देवप्रतिमाको छूकर झूठी शपथ खानेवाला फोड़ेका कीड़ा होता है। खुले हाथों देनेकी झूठी प्रतिज्ञा करनेवाला सात जन्मोंतक सर्प होता है। इसके बाद बिना हाथका मानव होकर फिर शुद्ध होता है। देवमन्दिरमें असत्य बोलनेवाला सात जन्मोंतक देवल होता है। ब्राह्मण आदिके सम्मुख प्रतिज्ञा करके उसका पालन न करनेवाला अग्रदानी होता है। तदनन्तर तीन जन्मोंतक वह गूँगा और बहरा मानव होता है। मित्रसे द्रोह करनेवाला नेवला होता है। कृतघ्न गेंडा और विश्वासघाती व्याघ्र होता है। वक्तव्यमें जो झूठी गवाही देता है, वह भालू होता है। ये उपर्युक्त पापी मानव अपने आगे और पीछेकी सात-सात पीढ़ियोंको नरकमें गिराते हैं। मूर्खताके कारण अपनी नित्यक्रियासे विहीन, वेदके वचनोंमें अनास्था रखकर निरन्तर कपटपूर्वक उनका उपहास करनेवाला तथा व्रत और उपवाससे रहित एवं उत्तम सद्वाक्यका निन्दक कुटिल ब्राह्मण जिम्भ एवं हिमोदक नरकमें वास करता है। जो देवता और ब्राह्मणके धनका अपहरण करता है, उसे आगे-पीछेकी दस-दस पीढ़ियोंको नरकमें गिराकर स्वयं भी वहाँ रहना पड़ता है। धूमके अन्धकारसे पूर्ण धूमान्ध नामक नरकमें जाता है। उसे धूएँके कारण कष्ट भोगना पड़ता है। भोजनके लिये उसे धूम्र ही मिलता है। इस प्रकारकी यातना भोगते हुए वह वहाँ रहता है। तत्पश्चात् सात जन्मोंतक वह चूहेकी योनिमें जन्म पाता है। तदनन्तर नाना प्रकारके पक्षियों, कीड़ों, वृक्षों और पशुओंकी योनिमें जन्म पानेके पश्चात् शुद्ध होता है।

पतिव्रते! ये सुविख्यात नरककुण्ड बताये गये हैं। इनके अतिरिक्त अन्य छोटे-छोटे अप्रसिद्ध नरक भी गिनाये गये हैं। अपने दुष्कर्मोंके फल भोगनेवाले पापियोंसे उन नरकोंका कोना-कोना भरा रहता है। कर्म-फल भोगनेके लिये प्राणी नाना प्रकारकी योनियोंमें भटकते हैं। कहाँतक बताया जाय ?

(अध्याय २९-३१)

प्रकृतिखण्ड २१५

पञ्चदेवोपासकोंके नरकमें न जानेका कथन तथा छियासी प्रकारके नरक-कुण्डोंका विशद परिचय

सावित्रीने कहा— महाभाग धर्मराज ! आप वेद एवं वेदाङ्गके पारगामी विद्वान् हैं। जो सबका सारभूत, अभीष्ट, सर्वसम्मत, कर्मका उच्छेद करनेमें कारणभूत, परम श्रेष्ठ, मनुष्योंके लिये सुखदायी, यशोवर्द्धक, धर्मप्रद तथा सबको सब प्रकारका मङ्गल प्रदान करनेवाला है, जिसके प्रभावसे सम्पूर्ण मानव जगत्‌को दुःख देनेवाली यमयातनाको नहीं प्राप्त होते, नरककुण्डोंको नहीं देखते और न उनमें पड़ते ही हैं; तथा जिससे जन्म आदि विकार नहीं प्राप्त होते, वह उत्तम कर्म क्या है? सुव्रत ! यह बतानेकी कृपा करें। साथ ही उन कुण्डोंके आकार कैसे हैं, वे किस प्रकार बने हैं तथा कौन-से पापी किस रूपसे उनमें वास करते हैं—यह मैं सुनना चाहती हूँ। देहके अग्निमें भस्म हो जानेके पश्चात् मानव किस देहसे लोकान्तरोंमें जाता और अपने किये हुए शुभाशुभ कर्मोंके फल भोगता है ? अत्यन्त क्लेश पानेपर भी वह शरीर नष्ट क्यों नहीं हो जाता तथा वह शरीर भी कैसा है ? ये सभी बातें मुझे बतानेकी कृपा करें।

भगवान् नारायण कहते हैं— नारद ! सावित्रीके वचन सुनकर धर्मराजने भगवान् श्रीहरिको स्मरण करते हुए गुरुको नमस्कारकर पवित्र कथा आरम्भ की।

धर्मराज बोले— वत्से ! पतिव्रते ! सुव्रते ! चारों वेद, धर्मशास्त्र, संहिता, पुराण, इतिहास, पाञ्चरात्र प्रभृति धर्मग्रन्थ तथा अन्य धर्मशास्त्र एवं वेदाङ्ग—इन सबमें एक श्रीकृष्णकी मङ्गलमयी सेवाको ही सबके लिये अभीष्ट एवं सारभूत बतलाया गया है। इससे जन्म, मृत्यु, जरा, व्याधि तथा शोक-संताप नष्ट हो जाते हैं। यह साधन सर्वमङ्गलस्वरूप तथा परम आनन्दका कारण है। इससे सम्पूर्ण सिद्धियाँ प्राप्त हो जाती हैं। यह नरकसे प्राणीका उद्धार करनेवाला है। भक्तिरूपी वृक्षमें अङ्कुर उत्पन्न करनेवाला तथा कर्मरूपी वृक्षको काटनेवाला है। गोलोकके मार्गपर अग्रसर होनेके लिये यह सोपान है। भगवान्‌के सालोक्य, सार्टि, सारूप्य और सामीप्य आदि मोक्षको तथा अविनाशी एवं शुभ पदको प्रदान करनेवाला है। शुभे ! श्रीकृष्णके किङ्कर नरककुण्ड, यमदूत तथा यमराजको स्वप्नमें भी नहीं देखते हैं।

जो एकादशीका व्रत तथा वैष्णवतीर्थमें स्नान करते हैं, एकादशीको अन्न नहीं खाते और भगवान् श्रीहरिको नित्य प्रणाम करते एवं उनकी प्रतिमाकी पूजा करते हैं, उन्हें भी मेरी भयंकर संयमनीपुरीमें नहीं जाना पड़ता। भगवान् श्रीकृष्णके भक्तोंसे मेरे दूत इस प्रकार डरते हैं, जैसे गरुड़से सर्प। मेरा दूत जब हाथमें पाश लेकर मर्त्यलोककी ओर जाता है, तब मैं चेतावनी देते हुए उससे कहता हूँ—‘दूत ! तुम भगवान् विष्णुके भक्तका आश्रम छोड़कर और सब जगह जा सकोगे।’ श्रीकृष्ण-मन्त्रके उपासकोंके नाम भी यमलोक-वासियोंको काट खाते हैं। चित्रगुप्त भयभीत-से हो दोनों हाथ जोड़कर उनका स्वागत करते हैं। ब्रह्माजी उनके लिये मधुपर्क आदि निवेदन करते हैं; क्योंकि वे ब्रह्मलोकको लाँघकर गोलोकमें जानेवाले होते हैं। उनके स्पर्शमात्रसे प्राणियोंके सारे पाप नष्ट हो जाते हैं। ठीक उसी तरह, जैसे प्रज्वलित अग्निमें पड़कर तृण और काष्ठ भस्म हो जाते हैं। उन्हें देखकर मोह भी अत्यन्त भयभीत-सा होकर सम्मोहको प्राप्त होता है। काम, क्रोध, लोभ, मृत्यु, जरा, शोक, भय, काल, शुभाशुभ कर्म, हर्ष तथा भोग—ये सभी हरिभक्तोंको देखकर प्रभावशून्य हो जाते हैं।

२१६संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

पतिव्रते! जो यमयातनामें नहीं पड़ते, उनका परिचय दिया गया। अब आगमके अनुसार देहका विवरण बता रहा हूँ, सुनो। पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश—ये पाँच तत्त्व स्रष्टाके सृष्टि-विधानमें देहधारियोंकी देहके बीज (उपादान कारण) हैं। पृथ्वी आदि पाँच भूतोंसे जो देह निर्मित होता है, वह कृत्रिम है। अतएव नश्वर है। इसीलिये वह यहीं भस्म हो जाता है। बँधी हुई मुट्ठीमें अँगूठेकी जितनी लम्बाई होती है, उतना ही बड़ा जो पुरुषाकार जीव है, वही कर्मोंके भोगके लिये सूक्ष्म 'यातनादेह' को धारण करता है। वह देह मेरे लोकमें नरककी प्रज्वलित आगमें डाली जानेपर भी जलकर भस्म नहीं होती। जलमें भी गलती नहीं है। दीर्घकालतक घातक प्रहार करनेपर भी उसका नाश नहीं होता है। अस्त्र, शस्त्र, तीखे कण्टक, खौलते हुए तेल या जल, तपाये हुए लौह, गरम पत्थर तथा तपाकर लाल की हुई लोहेकी प्रतिमासे स्पर्श होनेपर और ऊँचेसे नीचे गिरनेपर भी वह यातना-शरीर न तो दग्ध होता है, न टेढ़ा-मेढ़ा ही होता है। केवल संताप भोगता है (पर नष्ट नहीं होता)। देवि! आगमोंके कथनानुसार (जलने, कटने आदिका भीषण दुःख सहते हुए भी न मरनेवाले) यातना-देहका सारा वृत्तान्त तथा कारण बताया गया। अब मैं तुमसे नरक-कुण्डोंके लक्षण बता रहा हूँ; सुनो।

सतीशिरोमणे! सभी नरककुण्ड पूर्ण चन्द्रमण्डलकी भाँति गोलाकार हैं। वे गहरे भी बहुत हैं। उनमें अनेक प्रकारके पत्थर जड़े गये हैं। प्रलयकालतक उनका नाश नहीं होता। भगवान् श्रीहरिकी इच्छासे पापियोंको क्लेश देनेके लिये नानारूपोंमें उनका निर्माण हुआ है। जो प्रज्वलित अंगारस्वरूप है, जिसका विस्तार सब ओरसे एक-एक कोस है तथा जिसमें सौ हाथ ऊपरतक आगकी लपटें उठा करती हैं, उसे ‘अग्निकुण्ड’ कहा गया है। भयानक चीत्कार करनेवाले पापियोंसे वह सदा भरा रहता है। मेरे दूत उनपर प्रहार करते रहते हैं। वे निरन्तर उस नरककी रक्षा भी करते हैं। जो हिंसक जन्तुओंसे भरा-पूरा अत्यन्त घोर अन्धकारसे पूर्ण तथा आधे कोसतक विस्तृत है और जिसमें बहुत गरम जल भरा रहता है उसे ‘प्रतप्तोदककुण्ड’ कहते हैं। मेरे सेवकोंद्वारा कठिन प्रहार पड़नेपर नारकी जीव चिल्लाते रहते हैं। इसके बाद ‘तप्तक्षारोदकुण्ड’ है। वह खौलते हुए खारे जलसे भरा रहता है। एक कोस विस्तारवाला वह भयानक नरक पापियों तथा नाकोंसे भरपूर है। एक कोसके विस्तारमें ‘विण्मूत्रकुण्ड’ नामक नरक है। निराहार रहनेके कारण सूखे हुए कण्ठ, ओठ और तालुवाले पापी उसमें इधर-उधर भागते हैं। वह दारुण नरक विष्ठासे ही बना हुआ है। उसमें अत्यन्त दुर्गन्ध फैली रहती है। वहाँ कीड़ोंसे उनका सारा अङ्ग छिद जाता है। ‘मूत्रकुण्ड’ नामक नरक खौलते हुए मूत्र तथा मूत्रके कीड़ोंसे भलीभाँति भरा हुआ है। अत्यन्त पातकी जीवोंसे भरा हुआ वह नरक दो कोसके परिमाणमें है। वहाँके कीड़े जीवोंको खाते रहते हैं। उसमें पड़े पापियोंके कण्ठ, ओठ और तालु सूखे रहते हैं। श्लेष्म आदि अपवित्र वस्तुओं और उसके कीड़ों तथा श्लेष्मभोजी पापीजनोंसे भरा नरक ‘श्लेष्मकुण्ड’ कहा गया है। आधे कोसके परिमाणमें विषभक्षी पापियों तथा कीड़ोंसे भरा हुआ नरक ‘गरकुण्ड’ के नामसे कहा जाता है। सर्पके समान आकारवाले वज्रमय दाँतोंसे युक्त तथा क्षुधातुर सूखे कण्ठवाले अत्यन्त भयंकर जन्तुओंद्वारा वह नरक भरा रहता है। आँखोंके मलोंसे युक्त आधे कोसके विस्तारवाला ‘नेत्रमलकुण्ड’ है। कीड़ोंसे क्षत-विक्षत हुए पापी प्राणी निरन्तर उसमें चक्कर लगाते रहते हैं। वसासे पूर्ण चार कोसका लम्बा-चौड़ा ‘वसाकुण्ड’ है। वसाभोजी पातकी जीव