ब्रह्मचर्य साधना
Brahmacharya Sadhana
स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा
स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)
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ब्रह्मचर्य साधना
प्रभाव पड़े। उनके लिये फिर विवाह संबंधी विचार (जिसके विषय में मैं पिछले सप्ताह में पूर्णतः प्रकाश डाल चुका हूँ) एक महत्वपूर्ण कार्य बन जायगा। इस युक्ति को उचित रीतिसे समझलेने पर पूर्णतः मानसिक परिवर्तन हो सकता है। इस को केवल कुछ इने गिने व्यक्ति विशेषों के लिये ही नहीं समझना चाहिये। यह नियम मनुष्य जाति के लिये प्रस्तुत किया गया है। इस नियम के भंग करने से सामाजिक स्थिति का पतन होकर, अनिच्छित संतान व नये रोगों की वृद्धि तथा धार्मिक जीवन का हास होगा। यह निश्चय है कि गर्भावरोध के कुत्रिम विधान से जन-संख्या-वृद्धि में तो कुछ सीमा तक कमी होती है, परंतु धार्मिक ग्रन्थ जो उससे व्यक्तिगत तथा समाज को होता है, वह अगणनीय है। हाँ, यह बात तो अवश्य है कि जो मनुष्य काम वासना को संतुष्ट करना ही जीवन का उद्देश्य समझते हैं, उन के लिये तो जीवन का सर्वथा पट परिवर्तन हो जाता है उन के लिये विवाह एक धर्म-संस्कार नहीं रहता। इस का अर्थ तो हमारे बहुमूल्य सामाजिक सिद्धान्तों का मूल्य घटाना है। यह निश्चय है कि इस तर्क वितर्क से उन लोगों पर कुछ भी प्रभाव नहीं पड़ेगा जो हमारे विवाह संबंधी पुराने सिद्धान्तों को मिथ्या समझते हैं। मेरा उक्त कथन केवल उन्हीं लोगों के लिये है जो कि स्त्री को भोग विलास की वस्तु न समझ कर उसको, पवित्र वंश-वर्धक मान रूप में गणना करते हैं।
अन्य उपाय निरर्थक
उपयुक्त सिद्धान्त जो मैंने आपको बताया है वह मेरा तथा मेरे कुछ एक मित्रों का अनुभव सिद्ध है। इसका
अन्य उपाय निरर्थक
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विवाह के पुराने विचारों के अविष्कार से भी समर्थन होता है। जहाँ तक मेरा विचार है, विवाहित जीवन में ब्रह्मचर्य धारण करने से ब्रह्मचर्य अपनी स्वभाविक स्थिति को ग्रहण करेगा तथा विवाह की यथार्त्ता को भी सरल बना देगा। जन्म निरोध के अन्य उपाय सब निरर्थक हैं। एक बार जब स्त्री-पुरुषों के यह बात अच्छी प्रकार से समझ में आ गई कि भोग-इंद्रिय का मुख्य कार्य संतानोत्पत्ति ही है तो फिर वे अन्यथा प्रसंग कर अपने वीर्य तथा बहुमूल्य शारीरिक व मानसिक शक्ति को नष्ट करना एक प्रकार का पाप समझने लेंगे। अब यह समझना सरल है कि हमारे प्राचीन वैज्ञानिकों ने वीर्य को इतना महत्व क्यों दिया है तथा क्यों उसको, समाज के हित के लिये श्रोत्र शक्ति में परिणत करने पर इतना जोर दिया है। उनकी यह घोषणा है कि जिसने अपनी जननेन्द्रिय पर पूर्णतः विजय प्राप्त की है, वही शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक शक्ति को प्राप्त कर अन्य सब अप्राप्य सिद्धियों को प्राप्त कर लेगा है।
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उत्कंठाओं के द्वारा अज्ञान पूर्वक काम के वशीभूत हो जाते हैं । मनुष्य को प्रभावित करने वाली सारी लालसाओं पर विजय प्राप्त करना ही सफलता प्राप्त करने का वास्तविक उद्योग है । जब कि साधारण पुरुष व स्त्री द्वारा ब्रह्मचर्य प्राप्त करना असंभव नहीं है तथापि इससे यह नहीं समझना चाहिये कि उसमें कुछ कम पुरुषार्थ की आवश्यकता है; नहीं नहीं, उस में तो उस से भी अधिक पुरुषार्थ की आवश्यकता है जो पुरुषार्थ कि एक साधारण विद्यार्थी किसी विज्ञान (विद्या) में पूर्णत्व प्राप्त करने के लिये निष्कपट हृदय से करता है । यहाँ, ब्रह्मचर्य की प्राप्ति से तात्पर्य है जीवन-विज्ञान पर प्रभुत्व प्राप्त करना ।
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ब्रह्मचर्य साधना
(द्वितीय भाग)
ब्रह्मचर्य
“यदि लैंगिक ग्रन्थियों का स्नाय जारी है तो या तो उसको बाहर निकल जाना चाहिये अथवा शरीर में ही पन जाना चाहिये। वीर्य खाियों के पान्नन से तथा पुनः शरीर में मिल जानेसे रुधिर का पोषण होता है तथा मस्तिष्क शक्ति मजबूत होती है।” डा० टियो लिविस ने बतलाया कि इस तत्व का पान्नन मन की शक्ति तथा बुद्धि की तीव्रता के लिये आवश्यक है। दूसरा लेखक डा० ए० पी० मिलर लिखते हैं वीर्य ग्रन्थियों के स्नाय से चाहे वे
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ऐच्छिक हों अथवा अनैच्छिक प्राण शक्ति का व्यय होता है। यह सर्व मान्य है कि ऋषि के सारे बहुमूल्य तत्व वीर्य में पाये जाते हैं। यदि यह सत्य है तो यह सिद्ध हो जाता है कि पवित्र जीवन मनुष्य के लिये अत्यन्त आवश्यक है।”
कार्य सिद्धि करने के लिये ब्रह्मचर्य ही नींव है
पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिये। यह बहुत ही आवश्यक है। योग के अभ्यास से वीर्य श्रोजस् शक्ति में परिणत हो जाता है। श्रोजस् शक्ति की वृद्धि के द्वारा सारे जीव-कोष शक्ति तथा पोषण प्राप्त करते हैं। ब्रह्मचर्य, प्राणायाम, शीर्षासन तथा अन्य हठवैज्ञानिक क्रिया के द्वारा और ध्यान के द्वारा सारे शरीर का नव निर्माण होता है। हर जीव-कोष को नूतन बल, वीर्य तथा स्फूर्ति प्राप्त होते हैं। योगी को पूर्ण शरीर की प्राप्ति होती है। उसकी गति में आकर्षण तथा लावण्य रहता है। वह जब तक चाहे जी सकता है (इच्छा मृत्यु)। यही कारण है कि भगवान् श्री कृष्ण शत्रुघ्न से कहते हैं—“तस्मात् योगी भवाशुघ्न—इसलिये हे शत्रुघ्न तू योगी बनजा।”
ब्रह्मचर्य का महत्व
“ब्रह्मचर्येण तपसा देवा मृत्युमुपाच्यन्त”—वेदों की यह घोषणा है कि ब्रह्मचर्य तथा तपस्या के द्वारा देवताओं ने मृत्यु पर भी विजय पाली है। हनुमान जी महावीर कैसे हो गये। ब्रह्मचर्य के श्रद्ध के द्वारा ही उन्होंने अपूर्ण शक्ति तथा बल की प्राप्ति की थी। पाण्डव तथा कौरवों के पितामह महान् भीष्म ने भी ब्रह्मचर्य के द्वारा ही मृत्यु पर विजय प्राप्त की थी। लक्ष्मण जी भी ब्रह्मचारी ही थे जिन्होंने
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रावण के पुत्र तीनों लोकों के विजेता, अज्जय, मेघनाद का संहार किया था। यहां तक कि भगवान राम भी मेघनाद का संहार न कर सके। ब्रह्मचर्य के द्वारा ही लक्ष्मण ने मेघनाद को पराजित कर सके थे। पृथ्वीराज की महानता तथा वीरता का कारण भी ब्रह्मचर्य ही था। इन तीनों लोकों में कोई भी वस्तु इस तरह की नहीं है जो कि ब्रह्मचर्य के बल से प्राप्त न की जा सकती हो। प्राचीन काल के मुनिगण ब्रह्मचर्य के मूल्य को भली प्रकार से जानते थे और यही कारण है कि उन लोगों ने अश्वत्थ सुन्दर श्लोकों में ब्रह्मचर्य की स्तुति गाई है।
श्रुति घोषित करती है—“नायमात्मा बलहीनैव लभ्य- -यह आत्मा बल हीनों को प्राप्य नहीं है।” गीता में आप पायेंगे—यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यम् चरन्ति—जिसके लिये ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं” अध्याय ७-११। “त्रिविधम् नरकस्येदम् द्वारं नाशानमात्मनः काम क्रोधस्तथा लोभस्तस्मात्तेजयम् त्यजेत्—हे अर्जुन ! नरक के तीन द्वार हैं, जो आत्मा के नाशक हैं : वे हैं काम, क्रोध तथा लोभ मनुष्य को इन तीनों का परित्याग करना चाहिए।” “जहि शतुं महाबाहो कामरूपम् दुरासदम्” ब्रह्मचर्य के पालन के द्वारा इस महाशतु को मार डालिये।
योग दर्शन में भी ब्रह्मचर्य पर बहुत बल डाला गया है। देखिये संहिता क्या कहती है—“भरणम् विन्दु पातेन जीवनम् विन्दु धारणात्” शरीर से वीर्य पात होने पर मृत्यु निकट आती है तथा शरीर में इसके पच जाने से जीवन की रक्षा होती है तथा दीर्घायु प्राप्त होती है ! अन्न : यही सावधानी से इसकी रक्षा करनी चाहिये। “अद्यते मृत्युते लोके विन्दुना नात्र संशयः, एतत् श्राव्या सदा दत्ते-
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विन्दु धारणम् आचरेत्—इसमें सन्देह नहीं कि लोग वी को धारण करके जीते तथा दीर्घायु प्राप्त करते हैं तथा वीर्य क्षय से अकाल मृत्यु को पाते हैं। ऐसा जानकर योगी को सदा अपने वीर्य की रक्षा करनी चाहिये। उसको अखण्ड ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिये।”
योरप के विद्वान डाक्टर भी भारत के योगियों का समर्थन करते हैं। डा० लुई कहते हैं—“सारे शरीर विशेषज्ञ इस बात से सहमत हैं कि स्त्रिय के सर्वोत्तम अंश से वीर्य की उत्पत्ति होती है।” डा० निकोल का कहना है कि “यह शौपधीय तथा शारीरिक सत्य है कि स्त्रिय के सर्वोत्तम अंश से प्रजनन तत्वों का निर्माण होता है। शुद्ध जीवन में इन तत्वों का पुनर्प्राप्ति हो जाता है। यह स्त्रिय प्रयाली में पुनः पञ्चक सूक्ष्म प्रस्तित्क, स्नायु तथा मांस पेशियों का निर्माण करता है। वीर्य के पुनः पञ्च जाने से मनुष्य बली, वीर्यवान्, उत्साही तथा वीर बनता है। इसके क्षय से वह पुरुषत्व हीन, दुर्बल, कमजोर, कामोत्तेजन की प्रवृत्ति, दुर्बल स्नायु, मृगी, अन्यान्य व्याधियों तथा मृत्यु का भी शिकार हो जाता है। प्रजनन अंगों के निरोध से मानसिक तथा आध्यात्मिक बल की प्राप्ति होती है।” सेंट पाल तथा सर आइज़क न्यूटन के नैतिक चरित्र की ओर इंगित करते हुये डाक्टर लुई कहते हैं—“बुद्धि की कमजोरी विशेष कर स्मृति की दुर्बलता इस बात को परिलक्षित करती है कि मनुष्य ने विषय परायणता के कारण मनः शक्ति का ह्रास कर डाला है।” चौबीस वर्षों तक का ब्रह्मचर्य अधम, छत्तीस वर्षों तक का ब्रह्मचर्य मध्यम है तथा अष्टात्तीस वर्षों तक का ब्रह्मचर्य उत्तम है। “पुरुषभाव चतुर्विंशति वर्गाणि”—त्रेदों के अनुसार चौबीस वर्षों तक ब्रह्म-
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चर्य का पालन करना चाहिये। ५५ या साठ वर्षों तक ग्रहस्थ धर्म का पालन करना चाहिये। “पंचाशोषेते वनं व्रजेत” पंचास वर्ष की आयु के बाद आर्य को परमात्मा की खोज में तपोवन जाना चाहिये। ७५ वर्ष की आयु तक वाग्प्रस्थ का जीवन बिताना चाहिये। तथा उसके बाद मृत्यु पर्यन्त भिन्न ग्रन्थवा संन्यास धारण करना चाहिये।
आजकल बच्चों के भी बच्चे होते हैं। बालविवाह द्वारा भौतिक विगटन तथा वीर्यनाश हो चला है। बुद्धि के अभिमानी मनुष्य को पत्नियों तथा जानवरों से शिक्ता ग्रहण करनी चाहिये। सिंह, हाथी तथा अन्य शक्तिशाली जानवरों में मनुष्य से कहीं अधिक आत्म-मंजम है। सिंह गाल में एक धार ही मैथुन करते हैं। गर्भ धारण के पश्चात् स्त्री जाति के जानवर पुरुष जाति के जानवरों के तब तक पाम में नहीं आने देते जब तक कि उनके बच्चे पुष्ट नहीं हो जाते। वे स्वयं भी स्वस्थ नहीं हो जातीं। मनुष्य ही प्रकृति के नियमों का उल्लंघन करता है तथा फलतः अनेकानेक रोगों का शिकार बन जाना है। वह जानवरों से भी निचले स्तर में आ गिरा है। आहार, निद्रा, भय तथा मैथुन—ये तो जानवरों तथा मनुष्यों में समान हैं। मनुष्य अपनी विचार शक्ति के कारण ही जानवरों तथा प्राणों में जेद रखता है। यदि उसमें विचार शक्ति नहीं है तो वह भी जानवर ही है।
पश्चिम के प्रख्यात डा० शतलाते हैं कि वीर्य चय से विशेष कर सुवायस्था में, बहुत से रोग पैदा होते हैं— शरीर में भान, चेहरे पर कुखिया, आंखों के चारों ओर नीली धारियाँ, दाढ़ी का अभाव, गर्भ खाखें, पीला चेहरा,
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कपिरी की कमी, स्मृति की कमी, नेत्र दृष्टि की कमी, मूत्र के साथ वीर्य का पतन, अण्डकोषों की वृद्धि, अण्डकोष में दर्द, दुर्बलता, निद्रा, आलस्य, उदासी, हृदय-कंप, स्वांस में कठिनाई, यक्ष्मा, पीठ तथा कमर आदि में दर्द, चंचल मन, विचार शक्ति की कमी, घुरे स्वप्न, स्वप्नोदय तथा मानसिक अशांति । यदि यहस्य जीवन में भी ब्रह्मचर्य का पालन करे तथा वंश के लिए ही यैशुन करे तो उसकी मन्त्राल स्वस्थ, बुद्धिमान, मजबूत, सुन्दर तथा आत्मसाधी होगी । प्राचीन भारत के तपस्वी तथा संरक्षक जन विवाहित होने पर लोगों के समक्ष ब्रह्मचर्य का आदर्श रखते थे । किस तरह से यहस्याश्रम में ही ब्रह्मचर्य का पालन किया जा सकता है । हमारे पूर्वज उन ऋषियों का अनुगमन कर राष्ट्र-रक्षा के लिए ही सन्तानोत्पत्ति करते थे । जो लोग श्रीमद्भागवत् पढ़ते हैं उन्हें यह ज्ञान होगा कि किस तरह कर्दस ऋषि द्वारा देवहूति ने कपिला मुनि जैसे पुत्र को पाया था । पराशर ने मत्स्यगंधा से व्यास को जन्म दिया ।
भारतीयों की औषत आयु २२ वर्ष की है जब कि योरप वासियों की ५० की है । मातृभूमि भारत के सभी शुभेच्छुओं को चाहिए कि वे इस चिन्ताजनक स्थिति का विचार कर इसका उचित उपचार करने में प्रयत्नशील हों । प्रचार कार्य के द्वारा विद्यायियों तथा ग्रहस्थियों में ब्रह्मचर्य को पुनः स्थापित करना चाहिए । भारत का भविष्य पूर्णतः ब्रह्मचर्य पर ही है । सन्वासियों तथा योगियों का कर्तव्य है कि वे लोगों को ब्रह्मचर्य की शिक्षा दें । ग्रामन, प्राणायाम तथा आत्मज्ञान का प्रचार करें । इस परिस्थिति को सुधारने की ओर वे बहुत कुशल कर सकते हैं । क्योंकि उनके पास रगोंस समय है । उनको चाहिए
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कि वे गुहाओं तथा कुटीरों से निकल लोक संप्रभु के कार्यों में लग जायें। उन्हें मायावाद को थोड़ा कम कर देना चाहिये। अब उनके लिए 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म' हो जाना चाहिए।
माता पिता, संरक्षक, शिक्षक तथा शिक्षक सवों का यह कर्तव्य है कि वे राष्ट्र निर्माण के लिये स्वयं ब्रह्मचर्य का पालन करें तथा अपने कुमार बच्चों को भी ब्रह्मचर्य का ज्ञान करावें। हमारे प्राचीन ऋषि तथा मुनियों ने ब्रह्मचर्य के महत्व पर बल दिया था। भगवान् श्री कृष्ण ही कहते हैं "योग मार्ग पर चलने वाले को शान्त चित्त अभ्यस्य तथा ब्रह्मचर्य में दृढ़ रहना चाहिए।" गीता (६-१४) पुनः वे जोर देकर कहते हैं : उन सवों को जो कि अपना लक्ष्य प्राप्त करना चाहते हैं ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करना चाहिए। (गीता ८-११) जब तक आप काम को वशीभूत कर ब्रह्मचर्य में स्थिर नहीं होंगे तब तक आपके लिए आध्यात्मिक मार्ग में प्रवेश पाना तथा आत्म-ज्ञान-त्कार करना असंभव ही रहेगा। यदि हमारी मातृभूमि दूसरे राष्ट्रों की दृष्टि में ऊँचा स्थान पाना चाहती है तो उसके हर बच्चे, नर तथा नारी ब्रह्मचर्य का वाट पढ़ें। इसके साथ ही साथ वे पूर्ण ब्रह्मचर्य का भी पालन करें। उनको चाहिए कि वे इस व्रत के महत्व को ममम लें। शिक्षा की कोई भी प्रणाली, जिसमें कि संस्कृत माहिर्य का अध्ययन अनिवार्य नहीं है तथा जो ब्रह्मचर्य के सिद्धांतों पर आधारित नहीं हैं हिन्दुओं के लिए किसी काम की नहीं है तथा उमर्का विफलता निश्चित ही है। जो लोग शिक्षा विभाग के निर्माता हैं वे इस ग्रंथ ने पूरी तरह अनभिषेक ही हैं। यही कारण है कि आजकल शिक्षा में
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ब्रह्मचर्य साधना
बहुत मे गलत प्रयोग भी हो रहे हैं।
ब्रह्मचर्य की परमावश्यकता
मनुष्य वाचा कर्मणा युद्धता का व्रत ही ब्रह्मचर्य है जिससे मनुष्य आत्मसाक्षात्कार या ब्रह्म को प्राप्त करता है। यह केवल जननेन्द्रियों का ही नियह नहीं बल्कि सभी इन्द्रियों का मन, कर्म तथा वचन से नियह है। पूर्ण ब्रह्मचर्य ही निर्वाण का द्वार है। पूर्ण ब्रह्मचर्य की कुंजी के द्वारा ही नित्य सुख का द्वार खुलता है। परम शान्ति के प्राप्त का मार्ग ब्रह्मचर्य अथवा पूर्ण युद्धता से आरम्भ होता है।
काम का गुलाम होकर मनुष्य ने अपने को पतन के गर्त में डाल दिया है। कितने खेद की बात है कि वह यंत्रवत् बन बैठा है ! उमने विवेक बुद्धि को खो दिया है। वह गुलामी में जा गिरा है। कितनी दयनीय दशा है। यदि वह अपनी दिव्यावस्था को पुनर्प्राप्त करना चाहता है तो काम-वृत्ति का पूर्णतया रुपांतरण होना चाहिए। दिव्य विचारों तथा ध्यान के द्वारा काम की वृत्ति का रुपांतरण करना चाहिए। नित्य सुख की प्राप्ति के लिए काम-वृत्ति का रुपांतरण बहुत ही शक्तिशाली, प्रभावशाली तथा उपयुक्त तरीका है।
ब्रह्मचर्य तो योग की नींव है। जिस प्रकार क्रमजोर नींव पर खड़ी की गई इमारत एक न दिन अवश्य ही गिर जायगी उसी प्रकार आपने यदि पूर्ण ब्रह्मचर्य के ऊपर ध्यान की इमारत खड़ी नहीं की है तो निश्चय ही आपका पतन होगा। आप बाह्य वषों तक ध्यान का अभ्यास कर सकते हैं परन्तु फिर भी आपको समाधि में सफलता
ब्रह्मचर्य्य की परमावश्यकता
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नहीं मिल सकती—यदि आपने अपने हृदय की कामवासना को विनष्ट नहीं किया। आपको बड़ी सावधानी के साथ हृदय के हर कोने में इस दुष्ट काम शत्रु की खोज करनी होगी। जिस प्रकार से लोमड़ी भक्षियों के पीछे छिप जाती है उसी प्रकार काम भी हृदय के कोने में छिपा रहता है। यदि आप सावधान रहें तो आप इसको पहचान सकते हैं। उग्र आत्म निरीक्षण अत्यन्त आवश्यक है। बलशाली शत्रुओं को चारों ओर से आक्रमण के द्वारा ही आप जीत सकते हैं उसी प्रकार शक्तिशाली इन्द्रियों के पर विजय पाने के लिए आपको चारों ओर से—अन्धर से, बाहर से, ऊपर से, नीचे से आक्रमण करना होगा।
आप इस ध्रम में न पड़िये कि थोड़ा सात्विक भोजन, प्राणायाम का अभ्यास तथा थोड़ा जप के द्वारा आपने काम-वृत्ति का दमन कर लिया है और अधिक कुछ करने के लिए नहीं बचा है। किसी भी समय प्रलोभन अथवा मार आपको अपना शिकार बना सकते हैं। नित्य सावधानी तथा उग्र साधना की आवश्यकता है। सीमित प्रयास के द्वारा आप पूर्ण ब्रह्मचर्य्य को नहीं पा सकते। जिस प्रकार शक्तिशाली शत्रु को मारने के लिए मशीनगन की आवश्यकता है उसी प्रकार इस शक्तिशाली कामशत्रु को परास्त करने के लिए सतत तथा उग्र साधना की आवश्यकता है। ब्रह्मचर्य्य में प्रत्यय सफलता के द्वारा भिष्या वृष्टि न लाहये। योद्धी तो ही सफलता में अभिमान से न फूलिये। यदि आपको ज्ञान की गर्द तो आप बुरी तरह से विफल होंगे। सदा अपने दांपी में अवगत रहिए। उनको विनष्ट करने के लिए सदा प्रयत्न शील रहिये। सर्वोच्च प्रयास की आवश्यकता है। नभी आप इस दिशा में आशातीत सफलता
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नक्षत्रचर्य साधना
को प्राप्त कर सकते हैं।
जंगली बाघ, सिंह या हाथी को पालतू बना लेना आसान है। अजगर तथा सर्प के साथ खेलना आसान है। अग्नि को निगलना तथा सागर को सोख जाना आसान है। टिपालय को उखाड़ देना आसान है। संग्राम जेष्ठ में विजयी होना आसान है। परन्तु काम-वृत्ति का दमन करना कठिन है। ईश्वर, उसके नाम तथा उसकी कृपा में विश्वास रखिये। ईश्वरीय कृपा के बिना मन से काम-वृत्ति का पूरी तरह उन्मूलन नहीं हो सकता। यदि आपको ईश्वर में श्रद्धा है तो आपको सफलता अवश्य मिलेगी। तब आप पल मात्र में ही काम को विनष्ट कर सकते हैं। ईश्वर मूंगे को बाचाल बना देता है, पंगु को पर्यंत पर चढ़ने लायक बना देता है। मात्र मानवो प्रयास ही पर्याप्त नहीं है। ईश्वरीय कृपा की आवश्यकता है। ईश्वर भी उनकी ही सहायता करता है जो स्वयं अपनी सहायता करते हैं। यदि आप पूर्ण आत्मार्पण कर दें तो स्वयं आगजनी आप के लिये साधना करेंगी।
हृदित्रय बहुत ही उपद्रवी हैं। उपवास, आहार-संयम, प्राणायामः जप, कीर्तन, ध्यान, 'मैं कौन हूँ?' का विचार, प्रत्याहार, आसन, दम, वन्ध, मुद्रा, मनोान्त्रग्रह, वासनाक्षय आदि कई तरीकों से उसका नियंत्रण करना चाहिये।
पट्ट व्यक्ति कभी भी ब्रह्मचारी नहीं हो सकता। यदि आप ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करना चाहते हैं तो आपको चाहिए कि आप अपनी जिहा पर पूर्ण नियन्त्रण रखें। जिहा का जननेन्द्रिय में निकट मध्यस्थ है। जिहा शानेन्द्रिय है। यह जल जन्मात्रा के भौतिक ग्रंथ से उत्पन्न है। जननेन्द्रिय कमेन्द्रिय है। यह जल जन्मात्रा के राजसिक
ब्रह्मचर्य की परमावश्यकता
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अंश से पैदा होता है। उन दोनों का मूल एक ही है। यदि राजसिक अन्न के द्वारा जिह्वा उत्तेजित हुई तो साथ ही जननेन्द्रिय भी उत्तेजित हो जाती है। आहार में चुनौत तथा संयम रखना चाहिए। ब्रह्मचारी का भोजन सरस, पौष्टिक, मसाला रहित, अमृतजक तथा अनुहोपक होना चाहिए। भोजन में संयम अत्यन्त आवश्यक है। अति भोजन अत्यन्त हानिकारक है। फल खाना लाभदायक होता है। आपको तभी खाना चाहिए जब कि आप वास्तव में भूले हों। कभी कभी पेट आपको खोखा देगा। आपको भूड़ी भूल लगी होगी। जब आप खाने के लिए बैठेंगे तो आपको रुचि नहीं रहेगी। ब्रह्मचर्य के लिए आहार संयम तथा उपवास बहुत ही आवश्यक है। इनको कम न समझिये।
ब्रह्मचर्य का व्रत प्रलोभनों से आपका रक्षा करेगा। यह काम को नष्ट करने के लिए शक्तिशाली अस्त्र है। यदि आप पूर्ण ब्रह्मचर्य का व्रत न ले लें तो मार आपको कभी भी प्रलोभन का शिकार बना सकता है। आपके अन्दर प्रलोभन पर संवरण करने की शक्ति नहीं रह जायगी। जो दुर्बल है वह व्रत लेने से डरता है। वह कहता है “मैं व्रत के अधीन क्यों रहूँ? मेरा संकल्प शक्तिशाली है। मैं किसी भी प्रलोभन का संवरण कर सकता हूँ। मैं उपासना कर रहा हूँ। मैं संकल्प वल का अर्जन कर रहा हूँ।” उसको बाद में पछ्ताना पड़ता है। उसको इन्द्रियों के ऊपर वश नहीं रहता! वही मनुष्य भूट मूट का वहाना करता है जिसके हृदय में काम की सच्च वृत्ति बनी हुई है। आपको विवेक, वैराग्य तथा सम्मति होनी चाहिए। तभी आपका संन्यास स्याहै तथा शाश्वत रहेगा। यदि विवेक
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ब्रह्मचर्य साधना
तथा वैराग्य द्वारा आपका संन्यास उत्पन्न नहीं हुआ है तो आपका मन सदा उन वस्तुओं को प्राप्त करने की ताक में बैठता रहेगा जिनका कि उसने संन्यास नहीं किया है।
यदि आप कुछ दुर्बल हैं तो पहले एक महीने के लिए ब्रह्मचर्य का व्रत लीजिए। फिर उसको तीन महीने के लिए बढ़ा लीजिए। अब आपको कुछ ताकत मिल जायगी और आप उसको छः महीने तक के लिए बढ़ा लेंगे। धीरे धीरे आप व्रत को बढ़ाकर एक वर्ष, दो वर्ष तथा तीन वर्ष तक के लिए ले जायेंगे। अलग अलग सोइये। नित्य ही जप, कीर्तन तथा ध्यान का अभ्यास कीजिए। आप काम से घृणा करने लग जायेंगे। आप स्वतन्त्रता का अश्वत्थनीय सुख अनुभव करेंगे। आपकी ली को भी नित्य, कीर्तन, जप पूजा तथा ध्यान करना चाहिए।
वह ब्रह्मचारी धन्य है जिसने आजीवन ब्रह्मचर्य का व्रत ले लिया हो। वह ब्रह्मचारी और अधिक धन्य है जो काम-बुत्ति के उन्मूलन के लिए सच्चाई के साथ प्रयत्नशील है। वह ब्रह्मचारी तो सब से अधिक धन्य है जिसने काम का दमन कर आत्म-साक्षात्कार को प्राप्त कर लिया है। वे तो इस पृथ्वी पर देवता ही हैं। उनके आशीर्वाद आप सबों को प्राप्त हों।
ब्रह्मचारियों को उपदेश
एक साधक कहता है "जैसे ही मैं ध्यान के लिए बैठता हूँ, मेरे मन से मल की परतें एक एक कर आती हैं। कभी कभी तो यह इतना शक्तिशाली होता है कि मैं यह नहीं जान पा कि मैं क्या करूँ ? मैं सत्य तथा ब्रह्मचर्य में पूर्णतया स्थित नहीं हूँ। झूठ बोलने की पुरानी आदत अभी भी
ब्रह्मचारियों को उपदेश
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मेरे मन में बैठी हुई है। काम मुझको अधिक कष्ट दे रहा है। जी का विचार आते ही मेरा मन अधिक उद्विग्न हो जाता है। ज्यों विचार आता है त्यों ही काम के सारे संस्कार प्रगट हो जाते हैं। ज्यों ही ये विचार मेरे मन में आते हैं त्यों ही ध्यान तथा सारे दिन की शान्ति का अपहरण हो जाता है। मैं मन को समझता हूँ, उसे डराता हूँ, धमकाता हूँ परन्तु कोई फल नहीं। मेरा मन उपद्रव कर उठता है। मैं नहीं जानता कि काम को किस प्रकार से यशीभूत करूँ। चिड़चिड़ापन, अभिमान, क्रोध, लोभ, घृणा, राग इत्यादि अब भी मेरे में बैठे हुए हैं। मेरी समझ में काम ही मेरा मुख्य शत्रु है। यह बहुत सफल ही है। मैं प्रार्थना करता हूँ कि कृपया इस शत्रु को नष्ट करने के आप कुछ उपाय बतलावें।”
जब चित्त से मल बल पूर्वक निकलने लगे तो उसको बलपूर्वक दबाइये नहीं। इष्ट मन्त्र का जप कीजिए। अपने दोनों का अधिक चिंतन न कीजिये। अन्तर्निरीक्षण के द्वारा अपने दोनों को जान लेना ही पर्याप्त है। दोनों पर आत्मगुण न कीजिए। वे और भी प्रबल हो जायेंगे। “मुझमें बहुत दोष हैं” इस तरह का चिंतन न कीजिए। धनात्मक विचार का ऋणात्मक विचार के ऊपर सदा विजय होती है। सात्विक सदगुणों का अर्जन कीजिये। प्रतिपक्ष भावना के द्वारा सारे दुर्गुणों को नष्ट किया जा सकता है। यही उचित तरीका है।
संतत ध्यान तथा आत्म चिंतन के द्वारा काम दूर हो जायगा। महिलाओं से दूर भागने की कोशिश न कीजिये। तब माया भी आपके पीछे पड़ जायगी। सभी रूपों में अपनी ही आत्मा को देखने की कोशिश कीजिए।
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इस मन्त्र “ओ३म् सच्चिदानन्द आत्मा” का जप कीजिए। याद रखिये आत्मा-लिंग रहित है। इस मन्त्र के मानसिक जप के द्वारा आपको शक्ति मिलेगी।
अभ्यास के प्रारम्भ में आपको महिलाओं से तथा महिलाओं को पुरुषों से दूर रहना चाहिये। जब आप ब्रह्मचर्य में संस्थित होगये हैं तो सावधानी के साथ महिलाओं से मिलिये तथा अपने बल की जाँच कीजिये। यादें आपका मन अब भी बहुत शुद्ध है, यदि मन में आकर्षण तथा उत्तेजन नहीं है, यदि लैंगिक विचार नहीं हैं, यदि उपरति, शम तथा दम के द्वारा मन काम नहीं करता तो आपने वास्तव में ही आध्यात्मिक बल का अर्जन कर लिया है, आपकी साधना में काफी उन्नति हुई है। अब आपको कोई भी डर नहीं है। अपने को जितेन्द्रिय योगी समझकर अपनी साधना को बन्द मत कर दीजिये। यदि आप साधना को बन्द कर देते हैं तो आपका पतन होगा। आप माह्व योगी तथा जीवनमुक्त ही क्यों न हों, सांसारिक लोगों से मिलते समय बहुत सावधान रहिये।
आत्म साक्षात्कार के मार्ग पर चलने वाले साधकों को, जो गृहस्थाश्रम में हैं, तथा जिनकी आयु ५० वर्ष की है, उन्हें चाहिये कि वे ६ महीने के लिये एक बार अपने पति या पत्नी से सारा सम्पर्क दूर रखें। उनको पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिये। तभी वे इस जन्म में आत्म साक्षात्कार को प्राप्त कर सकते हैं। आध्यात्मिक मार्ग में अधूरी साधना को स्थान नहीं है।
ब्रह्मचारियों को पथ-प्रदर्शन आप महीनों तथा वर्षों तक लैंगिक न्यमन्यों को रोक
ब्रह्मचारियों को पय-प्रदर्शन
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मकते हैं, परंतु आपमें स्त्रियों के प्रति काम-वृत्ति तथा आकर्षण भी नहीं रहने चाहिये। स्त्रियों के साथ रहने पर भी आपके अन्दर खुरे विचार नहीं आने चाहिये। यदि इस दिशा में आपको सफलता मिल गई है तो आप पूर्ण ब्रह्मचर्य में संस्थित होंगये हैं। आप खतरों के कटिबन्ध को पार कर गये हैं। स्त्रियों की ओर देखने में कोई हानि नहीं है परंतु दृष्टि में शुद्धता होनी चाहिये। आपमें आत्मभाव होना चाहिये। युवती स्त्री की ओर देखते समय ऐसा अनुभव कीजिये कि “हे मां जगज्जननी आपको नमस्कार है। आप सयों की मां हैं। मुझे प्रलोभन में न डालिये। मैंने माया के सारे रहस्यों का समझ लिया है।” इन नाम रूपों के पर सर्वशक्तिशाली करुणामय भगवान है। यह सब नक्षत्र है। ईश्वर सौन्दर्यों का सौन्दर्य है। वह श्रुत्य सौन्दर्य का स्वरूप है। वह सौन्दर्य का स्रोत है। सतत ध्यान के द्वारा मैं उस सौन्दर्यों के सौन्दर्य का गान्धार करूँगा।” जब भी किसी मुन्दर रूप को आप देखें तो आपमें भक्ति तथा स्तुति की भावना जाग्रत होनी चाहिये। आपको उस रूप के लघा का स्मरण हो जाना चाहिये। तब आप किसी भी प्रलोभन में न पड़ सकेंगे। यदि आप वेदान्त के साधक हैं तो ऐसा विचार कीजिये कि सब कुछ आत्मा ही है। नाम रूप भ्रामक हैं। ये माया के द्वारा उत्पन्न होते हैं। आत्मा के अतिरिक्त उनका अपना अलग अस्तित्व नहीं हैं।
गाथकों को स्त्री सम्बन्धी बातें नहीं करनी चाहिये। उन्हें स्त्रियों के विययमें सोचना भी नहीं चाहिये। खुरे विचारों के आने पर आपने मन में आपने दृष्ट देवता की मूर्ति को लादिये। उस रूप से मंत्र का जप कीजिये। जानवरों के
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ब्रह्मचर्य साधना
मैथुन को देखकर यदि आपके मन में काम-वासना उत्पन्न हो तो आपमें अभी भी काम वासना बनी हुई है। कुछ लोग इतने कामुक तथा दुर्बल हैं कि स्त्री का विचार, दर्शन तथा स्पर्श के द्वारा ही उनका वीर्य-पतन हो जाता है। उनकी अवस्था दयनीय है।
उन्नत साधकों को भी सावधान रहना चाहिये। उन्हें भी स्त्रियों के साथ अधिक स्वतंत्रता नहीं रखनी चाहिये। उन्हें नहीं समझना चाहिये कि वे योग में निपुण हो गये हैं। एक प्रतिष्ठावान सन्त को भी पति होना पड़ा था। वे महिलाओं के साथ रहते थे, उनकी बहुत सी महिला शिष्यायें थीं। उनसे पैर दबवाते थे। उनका पतन हो गया।
दूसरा महात्मा जिनको कि उनके भक्त भगवान कृष्ण का अवतार मानते थे योग-प्रष्ट बन गया। वह भी महिलाओं के साथ स्वतंत्रता रखते थे तथा पाप-कृत्य कर बैठे। कितना दुर्भाग्य है। कितनी कठिनाई से साधक साधना की सीढ़ी पर चढ़ते हैं और असावधानी के कारण अपनी सारी कमाई को खो देते हैं। जिहा का दमन कीजिये। तभी काम को वश में करना आसान हो सकेगा। स्वादिष्ट राजसिक अन्न कामोत्तेजक होते हैं। आप इस भाव के अर्जन में कि सारी स्त्रियां आपकी मां तथा बहनें हैं, कई बार असफल हो सकते हैं। परंतु कोई बात नहीं। गंभीरता पूर्वक अभ्यास करते जाइये। आप अन्ततः सफल होंगे। एक विद्यार्थी मेरे पास लिखता है “मलिन मांस तथा चमड़ा मुझको बहुत ही शुद्ध तथा मुन्दर प्रतीत होता है। मैं बहुत ही कामुक हूँ। मैं मानुषात्र अर्जन करने की कोशिश करना हूँ। मैं स्त्री को देवी मानकर मानसिक
ब्रह्मचर्य माला
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नमस्कार करता हूँ। परंतु फिर भी मैं अत्यन्त कामुक हूँ। अब मैं क्या करूँ ?” स्पष्ट है कि उसके मन में वैराग्य तथा विवेक नाम मात्र को भी नहीं है। पुराने संस्कार तथा वासना अत्यन्त बलशाली हैं।
अस्त्रियंजर तथा मुर्दा शरीर की स्मृति से आपकी वैराग्य आवेगा। इस शरीर की उत्पत्ति मल से ही हुई है। यह मल से पूर्ण है तथा अन्त में यह भस्मीभूत हो जाता है। यदि आप यह याद रखें तो आपके मन में वैराग्य का प्रादुर्भाव होगा। संसार के दुखों का स्मरण कीजिये। विषयों की असत्यता तथा वन्धनों पर विचार कीजिये। किसी भी तरीके का अभ्यास कीजिये। पुराने संस्कार तथा वासना कितने ही बलशाली क्यों न हों नियमित ध्यान, तप, प्रार्थना, मासिक आहार, सत्संग, शीर्षासन, मर्यादामन, स्वाध्याय, “मैं कौन हूँ ?” का विचार तथा किसी पवित्र नदी के तट पर तीन महीनों तक एकान्तवास के अभ्यास के द्वारा वे विनष्ट हो जायेंगे। अनात्मक की विजय अणुआत्मक के ऊपर होती है। आपको कभी भी हिंमत न दारनी चाहिये। ध्यान में निमग्न हो जाइये, मार को नष्ट कीजिये। संग्राम में विजयी बनिये। तेजस्वी योगी बनिये। आप शुद्ध आत्माहैं।
हे विश्व राजन्। इसका अनुभव कीजिये।