ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
प्रसन्नचर्य-विज्ञान
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सुसज्जीकरण पर सुगंध होकर बहुत सी स्त्रियाँ भी दुष्कर्म में प्रवृत्त हो जाती हैं ।
अब हम वेश्याओं से होने वाली कुछ हानियों को नीचे देते हैं-
( १ ) वेश्या-गमन से पुरुष महा पातकी हो जाता है ।
( २ ) वेश्यागामी का अन्तःकरण इतना मलिन हो जाता कि वह अपने कुटुम्ब की स्त्रियों पर भी कुट्टि डाल देता है ।
( ३ ) वेश्यागमन से निश्चय ही भयङ्कर रोग उत्पन्न हो जाते हैं ।
( ४ ) वेश्यागामी पुरुष कभी-कभी नर-हत्या या आत्म-हत्या भी कर बैठता है ।
( ५ ) वेश्यागामी का कुल कभी उन्नत नहीं हो सकता उसकी सम्पात्ति, कीर्ति और धर्म का नाश हो जाता है ।
(४) पर-स्त्री-गमन
नहीदधमनायुष्मं, लोके किञ्चन दृश्यते ।
यादृशं पुरुषस्थेह, परदाग्नोप सेवनम् ॥
( मनुस्मृति
इस संसार में पुरुष का आयुर्वैल चीख करने वाला पेर कोई भी कार्य नहीं है, जैसा कि पराई स्त्री के साथ रमण करना है हमारे समाज में कुछ ऐसे भी पुरुष हैं, जो प्रत्यक्ष रूप में वेश्याओं की तो निन्दा करते हैं, पर उनके विचार में पर-स्त्री-गमन बुरा नहीं है । कारण इसका यह बताते हैं कि वेश्याओं से रोग व उत्पत्ति होती है, पर गृहस्थ स्त्रियों से ऐसी सम्भावना नहीं ।
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वीर्य-नाश के प्रधान कारण
हमारे मत से वेरया-गमन पर-स्त्री-गमन में विशेष अन्तर नहीं। जो अपनी स्त्री से भिन्न है, वही पर-स्त्री कही जाती है। ऊपर की महामति मनु की सम्मति से विदित होता है कि पर-स्त्री-गमन बहुत ही दुष्ट है। वात्सव में ऐसा ही है। पर-स्त्री-गामी पुरुष निर्बल, निस्सन्तान, दुष्ट, गुप्त पापी, हठी, क्रूर, अल्पानु और महानिन्दित हो जाता है। पर स्त्री के प्रेम में रत रहने वाला अपनी पत्नी को कभी तुष्ट नहीं कर सकता। जो पति अपनी विवाहिता स्त्री पर ससृचित प्रेम नहीं रखता, उसकी स्त्री भी पर-पुरुष से मिल जाती है। इस प्रकार स्त्रियों का पातिव्रत धर्म नष्ट हो जाता है। और पुरुष भी अपने परमोत्तम एक पत्नी-वृष का नाश कर देता है। पर-स्त्री-गामी पुरुष अन्त में वेरयागामी भी हो जाता है। पुरुष हो या स्त्री, जिसका सदाचार दूष्ट जाता है, उसका मन फिर सधत्ता कठिन होता है। अब पाठक भली भाँति समझ गये होंगे कि ऊपर कहे गये दोनों दोषों से भी हमारी जाति का वीर्य, तेज, धर्म तथा धन नष्ट हो रहा है।
अब हम पर-स्त्री-गमन से होने वाली कुछ हानियों का वर्णन करते हैं:—
- (१) पर-स्त्री-गामी की स्त्री कर्कशा और दुष्टा हो जाती है।
- (२) पर-स्त्री-गामी के घर में कभी शान्ति नहीं रहती।
- (३) उसका रहस्य खुलने पर संसार में चोर निन्दा होती है।
- (४) उन्नत पुरुष भी पर-स्त्री के प्रेम से दिन पर दिन ध्वनित हो जाता है।
- (५) उसके चरित्र पर कभी अपनी या पर-स्त्री भी विश्वास नहीं करती।
प्रसन्चर्य-विज्ञान
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अतः समाज सुधारकों में हमारी यही विनय है कि यदि आप कुछ वास्तविक सुधार करना चाहते हैं, तो जाति के नव युवकों को वैश्यागमन तथा पर-ख्री-गमन जैसे वीर्य-नाशक कार्यों के रोकने का यथाशक्ति प्रयत्न करें।
(५) अति मैथुन
अति खीसम्प्रयोगाच्छ, रक्षोद्वात्मनमात्मवान् । क्रीड्यामपि मेधावी, हितार्थो परिचञ्चेयत् ।
( वैष्णव )
सावधान मनुष्य को उचित है कि अत्यन्त ख्री-प्रसङ्ग से अपने को बचाये रहे। अपना भला चाहने वाला बुद्धिमान् पुरुष क्रीड़ा ( ख्री-विहार ) में भी अति प्रसंग ( अत्यन्त वीर्य-पात ) को त्याग दे।
बहुत से लोग ऐसे हैं, जो नैश्य-गमन और पर-स्त्री-गमन को ठुरा समझते हैं, पर अपनी स्त्री के साथ अति मैथुन को ठुरा नहीं समझते। उनकी धारणा है कि अपनी स्त्री के साथ विशेष-रमण करना पाप नहीं। वह तो इसी लिये है ही। ऐसे विचार वालों से हमारा नश्र निवेदन है कि अति मैथुन सर्वथा निन्दित है। वह भी एक प्रकार का व्यभिचार है। असमय में वीर्य-पात से कुछ लाभ नहीं होता, प्रत्युत ब्रह्म-हत्या का पाप लगता है। वीर्य से ही बालक की उत्पत्ति होती है। हम पहले कह भी चुके हैं कि वीर्य में असंख्य कीट रहते हैं। अति मैथुन से उन सबों का दूषा नाश होता है। इसी कारण से वैष्णव-शास्त्र में अति मैथुनः
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वीर्य नाश के प्रधान कारण
का निषेध किया गया है। अब हम अति मैथुन से होने वाले कई रोगों का वर्णन करते हैं:—
शूल कास्त ज्वर श्वलित, क शर्य पादुषामयद्वयः।
श्रुति व्यवथायाञ्जायन्ते, रोगाश्चाक्षेपकादयः ॥
अति मैथुन ( श्त्री-प्रसङ्ग ) से शूल, खाँसी, ज्वर, खास, दुर्बलता, पीलिया रोग, क्षय तथा आक्षेप आदि ( वातन्याधि ) रोग उत्पन्न हो जाते हैं।
(६) अनैसर्गिक मैथुन
श्त्री-प्रसङ्ग सृष्टि-विधान के अनुकूल माना गया है। प्राकृतिक नियमों के विरुद्ध अन्य उपायों द्वारा वीर्य-पात करने का नाम “अनैसर्गिक मैथुन” है। अज्ञान के कारण आजकल हमारे देश में कई प्रकार के कुमैथुनों का प्रचार हो गया है। इनमें पड़ कर जन-समूह का बड़ा भारी अहित हो रहा है।
कई अनैसर्गिक मैथुनों में से हम दी के नाम यहाँ देते हैं। एक का नाम गुदा-मैथुन और दूसरे का नाम हस्त-मैथुन है। हमारी आर्य-जाति में ये दोनों पहले नहीं थे। यदि प्राचीन काल में ये रहे होते, तो कुछ न कुछ चरलेख तो अवश्य मिलता। पर ऐसा कहीं भी नहीं देखने में आया।
एक ऐतिहासिक का कहना है कि इन दोनों मैथुनों के जन्म-दाता पाश्चात्य देश हैं। पहले पहल विदेशों में ही इनका प्रचार हुआ। फिर क्रमशः जो जो जातियों सक्षम-समय पर भारत में घुसी-उन्होंने के साथ इनका यहाँ भी प्रचार हो गया।
गृहस्थ-विज्ञान
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“गुदा-मैथुन” बालकों के साथ दुर्जयवहार करने को कहते हैं। यह दूषण विधार्थियों और अविवाहित पुरुषों में बहुत फैल रहा है। इसके कारण पुरुष बल-रहित हो जाता है। सन्तान उत्पन्न करने की शक्ति मारी जाती है। इन्द्रिय में उत्तेजना नहीं रहती। गुदा-मैथुनी पुरुष को स्वप्न-दोष, प्रमेह, शूल, संयमहर्षी, कौष्ठबन्धता, मन्दाग्नि, उरःक्षत और उपवर्द्ध जैसे रोग उत्पन्न हो जाते हैं। वह पुरुष थोड़े ही दिन में नाना प्रकार के रोगों का कोष बन कर अपनी जीवनलीला समाप्त कर देता है।
डाक्टर हिल साहब कहते हैं:—“हस्त-मैथुन वह जबरदस्त कुल्हाड़ा है जिसे आशानी युवक अपने ही हाथों अपने पैरों में मारता है और चेत तब होता है, जब कि हृदय, मस्तिष्क, आमाशय और मूत्राशय निर्बल होकर, स्वरमदोष, शीघ्रपतन, प्रमेह आदि कुछ रोग आ घेरते हैं और जननेन्द्रिय छोटी देही और निर्बल होकर ग्रहस्थ धर्म के सर्वथा अयोग्य हो जाती है।”
“हस्त-मैथुन” उस कुकर्म का नाम है, जो हाथ के द्वारा वीर्य-स्खलन का कारण होता है। इस दुर्जयसन का प्रचार नवयुवक विधार्थी तथा अविवाहित पुरुषों में विरोधतर हो रहा है। इस कुकृत्य के कारण बहुत से लोगों का सर्वनाश तक हो जाता है। जो इसमें पड़ जाता है, वह मर कर ही इससे छूटता है। हमने कई सद्वैधों के सूचीपत्रों में इस बुढ़ी क्रिया के करनेवालों के पत्र पढ़े हैं। प्रत्येक पत्र के पढ़ने से धृष्टा, दुःख तथा परम शोक हुआ। ऐसे पुरुष वैधों की शरण में जाते रहते हैं, पर-कुछ भी लाभ नहीं होता। इससे निम्नलिखित रोग उत्पन्न होते हैं:—
मूत्राशय निर्बल हो जाता है—धातु में चीखता आ जाती
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वीर्य नाश के प्रधान कारण
है—टष्टि की कमी, श्रुधा, रुपा, मन्दाग्नि, स्वप्नोप, सूनी, वन्माद, बुद्धि-भ्रंश, च्यव, वरक्षत, कोष्ठ-बद्धता, शिरः पीड़ा तथा मधु मेह जैसे रोग उत्पन्न होते हैं।
अज्ञानता तथा कुसङ्ग के कारण बालक इस दुष्कर्म में प्रवृत्त हो जाते हैं। प्रारम्भ में तो इससे उन्हें सुख प्रतीत होता है, पर कुछ दिनों में इसके कारण होने वाली हानियाँ भी सूचित हो जाती हैं। यदि उसी समय यह अवगुण छूटा, तब तो कुछ सुधार भी हो जाता है। इससे जो रोग उत्पन्न होते हैं, वे स्थायी होते हैं।
अब पाठक भली भाँति समझ गये होंगे कि ऊपर कही गयी दो अनैसर्गिक क्रियायें, वीर्य-नाश के लिये पूरी राक्षसी सिद्ध हो चुकी हैं। अतएव हम शिष्टकों, विद्यार्थियों तथा बालकों के संरक्षकों से नम्रनिवेदन करते हैं कि वे पूर्ण रूप से इन दुर्न्यवहारों से होने वाली हानियों का वर्णन कर बालकों को जीवन-दान दें !
(७)—तामस तथा राजस भोजन
“कुभोजनं दुःखकरं न योग्यम्।”
( सृक् )
खुरे भोजन से दुःख प्राप्त होता है, इसलिये अयोग्य है।
सात्विक भोजन के विपरीत आहार का नाम तामस भोजन है। तामसी भोजन से मनुष्य में तमोगुण की वृद्धि होती है। इसीलिये शास्त्रों में इसका निषेध किया गया है।
यह बात सभी लोग जानते हैं कि जैसा आहार किया जाता
महाचर्य विज्ञान
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है, वैसी ब्राह्म भी उत्पन्न होती है। जिसकी बुद्धि अच्छी नहीं रहती, उसका मन बलात्कार दुरे कर्मों में लग जाता है। तामसी आहार करने वाले पुरुषों से वीर्य-रक्षा नहीं हो सकती। इसलिये ऐसे आहार से दूर रहना ही अच्छा है।
यातयामं गतरसं, पूतिं पर्युषितश्चयत् । उच्छिष्टमपिचामेधं, भोजनं तामसमियम् ॥
देर का बना हुआ, रस विहीन पदार्थ, दुर्गन्ध युक्त, लक्षण, प्याज, मछली तथा मांस आदि वासी और जूठा (अपवित्र) आहार तामस कहलाता है।
हमारे विचार से तामस के अतिरिक्त राजस आहार भी हमारे वीर्य-नाश का कारण बन रहा है। इस आहार के प्रेमियों के लिये वीर्य-संरक्षण बड़ा ही कठिन होता है।
अब हम राजस आहार का भी नीचे वर्णन कर देते हैं:—
कटुमल्लवश्यात्युष्ण, तीक्ष्ण रूचि विद्वादिनः ।
आद्यारा राजसस्येष्टा, दुःख शोकामयप्रदाः ॥
(गोलेपानिषत्)
अति कटु ( बहुत मिर्च वाला पदार्थ ) अति खट्टा, अत्यन्त नमकीन, अति तीक्ष्ण, बहुत गरमागरम, पदार्थ राई आदि मिश्रित बहुत रूखा और अत्यन्त दाह करने वाला आहार—राजस कहलाता है। इससे दुःख, शोक तथा रोग बढ़ता है।
जिह्वा की लोलुपता के कारण लोग तामस और राजस आहार से प्रेम करते हैं, पर यह नहीं जानते कि इससे आन्तरिक हानि होती है। अतएव वीर्य-रक्षकों से हमारा नम्र निवेदन है कि वे इन दोनों प्रकार के आहार पर संयम प्राप्त करें।
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मादक द्रव्य-सेवन
(८)—मादक द्रव्य-सेवन
“बुद्धिं लुप्तति यद्द्रव्यं, मदकारी तदुच्यते ।”
(वैशक)
जिस वस्तु से मनुष्य की बुद्धि नष्ट हो, उसे मदकारी या मादक कहते हैं ।
“मद्य मांसञ्च वर्जयेत् ।”
(मनुस्मृति)
मदिरा और मांस का सेवन करना वर्जित है ।
भारतवर्ष में मादक द्रव्यों का प्रचार दिन दूना रात चौगुना बढ़ रहा है । इससे हिन्दू-समाज की जो हानि हो रही है, वह कहे में नहीं आ सकती ।
धर्म-शास्त्र के अनुसार मदिरा और मांस तामसीय पुरुषों और राक्षसों का आहार है । पौराणिक काल में भी अशुरों के अतिरिक्त कोई भी मादक द्रव्यों का सेवन नहीं करता था । पर काल के प्रभावसे अब बहुत ही कम लोग ऐसे हैं, जो एक न एक प्रकार के मादक द्रव्य का सेवन न करते हों ।
मादक द्रव्य भी हमारे वीर्य के नाश करने में अग्रेसर हो रहे हैं । बहुत से लोग मानसिक दुर्बलता के कारण मादक द्रव्य का एक बार सेवन कर, फिर जन्म भर उससे नहीं छूट सकते । देश के कुछ सत्पुरुषों ने मादक द्रव्य के बहिष्कार करने के लिये बहुत ग्रन्थ किया, पर दुर्भाग्य-वशा पूरी सफलता नहीं मिली । देखें, इन मादक द्रव्यों से कब समाज का पिछड़ छूटता है !
ग्रन्थचर्य-विज्ञान
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अब हम भादक द्रव्यों से होने वाली कतिपय हालियों का वर्णन करते हैं:—
भादक द्रव्य के खेलन से बुद्धि नष्ट हो जाती है, हृदय दुर्बल और निस्तेज हो जाता है, शरीर जर्जरित होने लगता है और कुकर्म में मन लगता है। आलस्य, अयुत्साह और क्रोध को बुद्धि होती है। वीर्य-नाश के लिये उत्तेजना मिलती है। भादक द्रव्य का भेमी पुरुष अग्नी, वरिद्र, दोषी, और तथा जुझारी हो जाता है। भादक द्रव्य से सब गुण नष्ट हो जाते हैं। आयु-वैल घट जाता है। इसके खेलन से समाज सदैव दास बना रहता है।
( ९ ) कुशिक्षा और कुसंग
“सङ्कात्संजायते कामः।”
( गीता )
विकारों के उत्पन्न होने वाले विषयों के सहवास से काम की उत्पत्ति होती है।
“कामिनां कामिनीनाञ्च, सङ्गारहामी भ “मुमान्।”
( बुद्धि )
कामी पुरुष या भोगवत्ती स्त्री के साथ रहने वाला भी कामी बन जाता है।
ग्रन्थचर्य के नाश करने वाले कारणों में कुशिक्षा और कुसङ्ग भी है।
आजकल की शिक्षा ऐसी अच्छी नहीं है जो कि बालकों को सच्चे से दूर रख सके। सौ में पचासी बालक निर्बल, दृष्टिहीन, धर्म-भ्रष्ट, अविचारी, गुप्त पापी और प्रमादी हो जाते हैं।
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भोग की तृष्णा
देश में अच्छे पुरुषों का भोग अभाव है। उतरे लोगों के सङ्ग में पड़ कर बालक अपने को नष्ट-ध्वष्ट कर डालते हैं। उनके माता-पिता और गुरु भी उनकी कुसङ्ग से रक्षा नहीं कर सकते। इस लिये सुबोध लोगों का कर्तव्य है कि वे बालक बालिकाओं की दुश्चिन्ता और कुसङ्ग से पूर्ण रूप से रक्षा करें।
५—भोग की तृष्णा
“भोगे रोग-भयम्।”
भोग में रोग होने का भय रहता है।
“भोगा न भुक्ता वयमेव भुक्ताः।”
( भर्तृहरि-शतक )
हम भोगों को नहीं भोग सके, प्रत्युत भोगों ने हमें ही नष्ट कर डाला।
इस संसार में मनुष्य वृद्धा विचित्र जीव है। वह ज्ञानवान् होने पर भी अपनी अज्ञानतावश भोगों में अतुरक्त रहता है। वह समझता है कि इसमें सुख है। अपनी तृष्णा को पूरी करने के लिये सर्वत्र लालायित रहता है। वह चाहता है कि इस भोग्य वस्तु को अधिकता से भोगने से मनोवृत्ति की शान्ति होगी, पर इसका विपरीत ही परिणाम होता है। अज्ञान के शिथिल हो जाने पर भी तृष्णा की शान्ति कदापि नहीं होती।
अहं नालितं पलितं सुषुम्नम् । दन्तविहीनं जातं तुषुम्नम् ॥
प्रज्ञाचर्य-विज्ञान
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कर धृत कम्पित शोभित दण्डम् । तदपि न मुञ्चत्याशा भगवद्भम् ॥
( साहसार्थ )
अङ्ग शिथिल पड़ जाते हैं, सिर हिलने लगता है, मुख में दौत नहीं रह जाते और हाथ में लाठी लेकर कौपते हुये चलते हैं । फिर भी पुरुष की एक न एक प्रकार की आशा बनी ही रह जाती है ।
इससे यह बात विदित होती है कि बुद्धता में भी तृष्णा का नाश नहीं होता । अतएव जो पुरुष भोग के भोगने की चेष्टा करता है, वह वास्तव में मृदुता करता है । भोगों के भोगने से आज तक किसी की न इच्छा पूरी हुई, और न हो सकती है । मनुष्य की इच्छायें इतनी चलबती हैं कि वे कभी तुष्ट नहीं होती हैं, वरन् दिन पर दिन बढ़ती जाती हैं ।
प्राचीन समय में यथाति नाम के एक राजा थे । वे किसी शापवशा जुवावस्था में ही बुद्धता को प्राप्त हो गये थे । पर चनकी भोगेच्छा नहीं गई । तब उन्होंने अपने सब लड़कों को बुलाकर पूछा कि हमें कौन अपनी जवानी देगा ?
इस पर सब से छोटे लड़के के अतिरिक्त सभी ने अपने पिता की याचना को अस्वीकार कर दिया । इसलिये यथाति ने बस्ती की अपनी बुद्धता देख कर तरुण ताली और बहुत दिनों तक भोग में लगे रहे । अन्त में उन्होंने इस प्रकार अपने मन के उद्धार प्रकट किये :—
न जातु कामः कामानाजुपभोगेन शाम्यति । द्विषाण् कृष्ण वस्त्रम्, भूय पद्मभिर्वर्धते ॥
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भोग की तुल्या
काम-वासनाओं की शान्ति उनके भोगने से कदापि नहीं होती, बल्कि उनकी वृद्धि होती जाती है। अग्नि में हृष्य पदार्थ के डालते रहने से उसकी ज्वाला बढ़ती ही जाती है। वह कभी घट नहीं सकता।
यत्पृथिव्यां ब्रह्मि यथं, हिरण्यं पशवः स्त्रिवः ।
एकस्यापि न पर्याप्तं, तस्मात्सृष्णां परित्यजेत् ॥
संसार में जितने अन्न, सुवर्ण, पशु और स्त्रियाँ हैं, एक पुरुष के भोगने के लिये भी पर्याप्त नहीं हैं। इसलिये तृष्णा को छोड़ देना चाहिये।
या दुःस्थया दुर्मतिभिर्नजीर्यति सुजीर्यतः ।
योऽसौ प्राणात्तिकारोगास्तां तृष्णां त्यजेतः सुखी ॥
जो मूर्ख पुरुषों से छोड़ी नहीं जा सकती, जो जीर्ण हो जाने पर भी जीर्ण नहीं होती और जो प्राणों का नाश करने वाली व्याधि है—उस तृष्णा को छोड़ने से ही मनुष्य सुखी हो सकता है।
यह कह कर उन्होंने अपने पुत्र से पुनः दृष्टता ले ली और बहुत प्रकाश से आशीर्वाद दे कर उसे विदा किया।
अब पाठकों को यह इस आख्यायिका से शिक्षा लेनी चाहिये कि विषय-भोग में सुख नहीं। इसमें पड़ना मूर्खता है। इससे जो लोग पशुपत्र की भाँति जल से न्यारे रहते हैं, वे ही सत्पुरुष हैं। वास्तवमें ब्रह्मचर्य ही सुख-शान्ति का देने वाला है, जिसके मनमें इसके प्रति आदर है, वह भोग रूपी दोगोंमें पड़कर अपना जीवन नाष्ट नहीं कर सकता।
मनुष्य-विज्ञान
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६—दुराचार की निन्दा
वज्रोद्विषो यो विषयातुरागी । कावा विमुक्तिं विषये विरक्तिः ॥
(प्रसन्नोदरी)
कौन बंधा हुआ है ? वह, जो विषयों में लीन है। और कौन छूटा हुआ है ? वह जो विषयों से अतिस है।
मनुष्य ज्ञान-प्रधान प्राणी है। उसे कर्मों की नीचता और उच्चता का स्वयं ज्ञान होता है। पर वह अपनी तामसी बुद्धि के कारण ऊपर चढ़ने की अपेक्षा, नीचे जाने में विशेष रुचि रखता है। इसी से वह पतन के गत में गिरता ही जाता है। यदि वह इस दुर्गुण को दवादे, तो वह पापों से मुक्त हो सकता है। वह यह जानता है कि पाप का फल विप के समान होता है, जो दुष्कर्मों को अवश्य मिलता है, पर अध्यानता और प्रमाद-वश उसी ओर बढ़ता है। सत्य कहा गया है:—
“पोत्वा मोहमयी प्रमादमदिरा, सुन्मत्त भूतं जगत्।”
संसार मोहमयी सदिरा को पीकर उन्मत्त हो रहा है।
उन्मत्तता की दशा में मनुष्य की बुद्धि अष्ट हो जाती है। उसे दुरे-भले का ज्ञान नहीं रह जाता। इसी से वह असावधानी करता है, और उससे होने वाले कष्ट फल को चखता है। पर जब उसे स्वयं ज्ञान होता है, तब उसे अपनी करनी पर पश्चा-ताप होता है। वह अपने मन में इस बात की प्रतिष्ठा करता है कि अब मैं मूल कर के भी ऐसे दुष्कर्मों में न फसूंगा। यदि इसी भाँति छूटा रही, तो वह सुधर भी जाता है, पर बहुत कम लोग ऐसे हैं, जो अपने को इस दुराचार के हाथसे बाहरकर सकते हैं।
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दुराचार-की निन्दा।
दुराचार से बढ़ कर मनुष्य का संसार में दूसरा अहित नहीं ! जो इसका अनुयायी हुआ, उसको अपने जीवन से हाथ धोना पड़ता है । यह उस राक्षस के समान है, जो जीते जी शरीर के सब रक्त को पी जाता है । यह मनुष्य के भीतर है, पर इसको न दृष्टाते रहने से यह मनुष्य का सर्वनाश कर के ही रहता है । दुराचार आदि में प्रिय और अन्त में अग्रिय होता है । इसीलिये मनुष्य भ्रमवश उसके लोभ में पड़ जाता है ।
देखिये, इस विषय में धर्माचार्य मनु क्या कहते हैं :—
दुराचारोहि पुरुषो, लोके भवति निन्दितः । दुःख-भागौ च सततं, व्यापितोऽहपायुरेव च ॥
दुराचारी मनुष्य संसार में निन्दा का पात्र, सदा दुखी, रोग-भस्त और अत्यायु होता है ।
वास्तव में पाप धीरे-धीरे बढ़ कर दुराचारी को मूल से नष्ट कर देता है । द्वार पर में यहु-वंशियों की सत्ता बहुत बढ़ गई थी । श्री कृष्ण के कारण वे दिन पर दिन उन्नत होते गये, पर जब उनकी शिलाओं का लोप होने लगा, वे लोग दुराचारी हो गये । कहा जाता है कि उनकी संख्या ५६ कोटि थी । उनमें मदिरा, भांस और मेश्रुत के दुर्जन्यसेन घुस गये । फिर ऐसा विमष्ट हुआ कि वे आपस में लड़ कर मर गिटे ।
दुराचारी पुरुष स्वयं अपने क्रूरता का फल भोगता है । भ्रायः सभी सदुग्रन्थों में दुराचार की निन्दा की गई है, और इससे पृथक् रहने का आदेश किया गया है । अतएव जो लोग आत्म-कल्याण चाहते हैं, वे प्रयत्न-पूर्वक दुराचार से पृथक् रहें ।
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मध्यचर्य-विधान
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यदि हृदय में अह्मचर्य के प्रति श्रद्धा है, तो दुःखानार से बँचना कोई कठिन काम नहीं।
७—काम-शमन के उपदेश
शरान्महाशयस्तमोस्ति कोऽषा । मनोजवाणैर्व्यथितो न यस्तु ॥
(शंकराचार्य)
शूरों में भी महाशूर कौन है ? वह पुरुष जो कामदेव के वार्यों से न्यथित न हुआ हो।
वास्तव में कामदेव का दीक्षण बाण सहना कठिन काम है। जो उसके वार्यों को खा कर स्थिर चित्त रह जाय, उसे ही महाशूर कहना चाहिये। महाराज भरतहरि कहते हैं:—
मत्तैभक्तुम्भदलने भुवि सन्ति शूराः।
केचित् प्रमत्त मृगराज-वधेऽपिदद्वाः॥
किन्तु प्रवीणि बलिनां पुरतः प्रसन्नाः।
कन्दर्प-दर्प-दलने विरला भद्रुष्याः॥
मतवाले हाथी के मस्तक को बिदीर्य करने वाले शूर तो संसार में बहुत से हैं—कोई-कोई ऐसे भी हैं, जो क्रोधित सिंह को भी मारने में निपुण हैं, किन्तु मैं बड़े-बड़े चली लोगों के सामने ललकार कर कहता हूँ कि कामदेव के दर्प को चूर्ण करने वाले-थिरले ही पुरुष होते हैं !
यद्यःवात बहुत ही सत्य है। विकारों के नाश करने वाले पुरुषों की संख्या संसार में बहुत कम होती है। पर ऐसी नात
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काम-शमन के उपदेश
नहीं कि है ही नहीं। हमारे विचार से काम-वासनाओं का नाश करना कोई असम्भव बात नहीं। आज तक अनेक ऐसे प्रातःस्मरणीय पुरुष हो गये हैं, जिन्होंने काम-विकारों को अपनी इच्छा के अनुकूल करके उससे लाभ उठाया है।
यह संसार बड़ा विचित्र है। यहाँ कोई वस्तु निर्गुण या निर्दोष नहीं है। विद्वान् पुरुष विष से भी अमृत का काम ले सकता है तथा मूर्ख अमृत को भी दूषित विष कर सकता है। कोई पातक ऐसा नहीं, जिसका प्रायश्चित्त न हो, कोई दोष ऐसा नहीं, जिसकी शान्ति न हो—कोई रोग ऐसा नहीं, जिसकी चिकित्सा न हो, और कोई विकार ऐसा नहीं, जिसको दूर करने का सपाथ न हो !
काम-विकारों के उत्पन्न होने का स्थान हृदय और मस्तिष्क है। यहीं से ये मनत-चिन्तन द्वारा उद्भूत होकर सर्वोच्च में उचो-जना प्रकट करते हैं। जब सारे शरीर में गुप्त रूप से इनका प्रभाव हो जाता है, तब भला लिङ्गन्दिग्य कैसे बँच सकता है ? और इसमें विकार होते ही मैथुन के लिये लोग वाञ्छ्य होते हैं। अन्त में इनका प्रभुत्व बढ़ता ही जाता है, जो किसी न किसी रूप में वीर्य-नाश का प्रधान कारण होता है। हमारा विचार है कि जैसे ही मनी-वृत्तियों में विकार उत्पन्न होने लगे, वैसे ही इसका रोकना श्रेयस्कर है, अतएव हृदय तथा मस्तिष्क को संयमित करने के उपायों से ही इनको अपने हुक्मनों से रोकना जा सकता है।
अब हम काम-विकारों को रोकने के कुछ अत्यन्त उपयोगी और अनुपम नियमों का वर्णन करते हैं। जिस समय मन में विकार चढने लगे, निम्नलिखित क्रियायें अत्यन्त उपयोगी हैं:—
शास्त्रार्थ-विज्ञान
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१—शीतल जल से शिर को तब तक धोते रहना, जब तक चित्त स्थिर न हो जाय ।
२—बूछ्छा से अधिक ठंडा जल पी लेना चाहिये ।
३—किसी खट्टे फल को अनिच्छा होते हुये भी खा लेना हितकर है ।
४—नदी समीप हो, तो उसमें शरीर मल-मल कर खूब स्नान कर लेना ।
५—आधा या पाव कोस तक दौड़ जाना या दानों कानों को खूब मलाना ।
६—१५, २० मिनट तक शीघ्रता से श्वास-प्रश्वास लेना ।
७—रमशान-भूमि को देखना या वहाँ की गति का स्मरण करना ।
८—आश्रयजनक या कीर्तुहल-वर्धक ग्रन्थ पढ़ने लगना ।
९—संसार की असारता और अपने त्वर शरीर से घृणा करना ।
१०—परमेश्वर के ध्यान और स्मरण में लग जाना ।
ऊपर लिखे किसी भी उपाय का यथा विधि अवलम्बन करने से क्राम-विकारों का निश्चयपूर्वक नाश हो सकता है—ये कई सज्जनों के अनुभूत उपाय हैं ।
८—स्वास्थ्य की शिल्पार्थ
प्रसिद्ध डा० डिफोरनेट ने स्वस्थ रहने के सर्वोच्च १० उपाय बतलाये हैं । अमेरिका की कई सभाओं में एक डाक्टर
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स्वास्थ्य को शिखार्ये
सहोदय को पुरस्कार भा इसके कारण मिल चुके हैं। हम उन्हें नहीं देते हैं:—
(१) वायु-सेवन—बहुत सवैरे ठठकर, टहलने को जाना और सब दिन परिश्रम करना।
(२) श्वास-प्रश्वास—पानी और रोटी से जीवनो शक्ति बढ़ती है। नीरोगता के लिये शुद्ध वायु और सूर्य-किरणों की बड़ी आवश्यकता है।
(३) आचार-उदार—धीर्घ जीवन के लिये परिमित आचार और थोड़ा आहार ही सबसे उत्तम है।
(४) शारीरिक स्वच्छता—जैसे स्वच्छ किया हुआ यन्त्र अधिक दिनों तक चलता है, वैसे ही शरीर भी स्वच्छता से नीरोग रहता है।
(५) उचित निद्रा—निद्रा शरीर को फिर से शक्ति प्रदान कर देती है। बहुत पड़े रहने से दुर्बलता आती है।
(६) वस्त्र-व्यवहार—शीत और गर्मी से शरीर की रक्षा के लिये ऐसे कपड़े हों, जिनसे चलने-फिरने में रुकावट न हो।
(७) रहने का घर—बहुत स्वच्छ और खुला हुआ हो; वायु और प्रकाश के पहुँचने योग्य हो।
(८) नैतिक स्वास्थ्य—आमोद-प्रमोद से मन अवश्य प्रसन्न होता है, पर इसकी अधिकता से शरीर-शुद्ध ईर्ष्या से उत्तेजित होकर, मनुष्य को पाप की ओर ले जाते हैं।
(९) मानसिक श्रवस्था—मन की प्रसन्नता स्वस्थता को बढ़ाती है किन्तु दुःख और विपाद से असमय में दुष्टता प्राप्त होती है।
प्रहारचर्य-विज्ञान
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(१०) परिश्रम—केवल मस्तिष्क-परिश्रम से ही काम नहीं चलता। शारीरिक श्रम करने से ही आहार मिलता और परिपाक होता है।
वयोवृद्ध नेता दादाभाई नौरोजी ८६ वर्ष के होने पर भी हृष्ट-पुष्ट, प्रसन्न-सुख तथा स्वस्थ रहते थे। एक समाचार-पत्र के ख़ामो के पृष्ठाने पर उन्होंने इसके जो कारण और स्वास्थ्य सम्बन्धी नौ नियम बतलाये, वे भी नीचे दिये जाते हैं:—
मैंने आज तक एक दिन भी सदिया पान नहीं किया। मैंने मांस का स्पर्श तक नहीं किया है। मैंने कभी तम्बाखु नहीं पिया, नहीं खाया और नहीं सूँघा। मैंने कभी भी अधिक मिर्चों का चटपटा भोजन नहीं किया है। मैं वासी भोजन से बँचता आया हूँ। मैं अब तक समीरुण्य के पास नहीं गया अर्थात् क्रोध में भर कर गाली-गलौज या मार-पीट नहीं की। मैंने सदा परिश्रम के साथ अपने और दूसरों के बहुत से काम किये हैं। मैंने प्रत्येक काम नियम से किये हैं।
१—केवल स्थूल शरीर का नीरोग रहना ही सच्चा आरोग्य नहीं है। स्थूल और सूक्ष्म, दोनों शरीर विकास-रहित होने चाहियें।
२—शरीर, मन और आत्मा—इन तीनों की, जिसमें आगे की वरावर चन्तति होती चली जाय, ऐसा काम करना आरोग्य का सच्चा नियम है।
३—आरोग्य रहने के लिये केवल सुख से खा-पी लेना ही पर्याप्त नहीं है, किन्तु सदगुणों में प्रवृत्ति रखनी चाहिये, जिससे क्ती आयु बढ़े।
४—स्थूल और सूक्ष्म, इन दोनों शरीरों का परस्पर संम्बन्ध है। इन दोनों में एक के बिना दूसरा नहीं ठहर सकता। स्थूल
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स्वास्थ्य की शिर्शायें
को स्थूल और सूक्ष्म का सूक्ष्म भोजन देना चाहिये। नियमित खाना-पीना स्थूल शरीर का, और सदाचार आदि सूक्ष्म का भोजन है।
५—ज्वर, खाँसी, लूथ आदि रोग स्थूल शरीर के, और काम, क्रोध, ईर्ष्या, अ्यात्म्य आदि सूक्ष्म शरीर के रोग हैं।
६—सात्विक भोजन स्थूल शरीर को नीरोग रखता है, और मन को सत्व गुणी बनाता है।
७—तामसी भोजन मन को तमोगुणी बनाता है।
८—परीपकार, दया, चमा, प्रेम, स्वार्थ-त्याग, स्वदेश और जाति-सेवा आदि उत्तम गुण मनुष्य को उन्नत बनाते, और शरीर को नीरोग रख कर आगु बढ़ाते हैं।
९—शारीरिक और मानसिक, दोनों प्रकार का आरोग्य होने पर ही, आनन्द मिलता है; आगु बढ़ती है और प्रसिद्धा प्राप्त होती है।
अमेरिका के सुप्रसिद्ध डाक्टर एडवर्ड ड्यूई ने सदैव स्वस्थ रहने के लिये निम्नलिखित तीन नियम बतलाये हैं। इनका पालन करने वाला मनुष्य थोड़े ही दिनों में सत्यता की परीक्षा कर सकता है:—
( १ ) स्वच्छ वायु में दहलना और प्राणायाम साधना।
( २ ) स्वाभाविक श्रृंख लगने पर ही चचित मात्रा में भोजन करना।
( ३ ) प्रत्येक कचल को भली भाँति चबा-चबा कर खाना।