ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
ब्रह्मचर्य-विज्ञान
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अर्थ चीर्य-रक्षण के साथ ही प्रचलित था। ब्रह्मचर्य की अवस्था में वेदाध्ययन एक प्रधान कार्य समझा जाता था। अब भी विद्यो-पार्जन की प्रणाली किसीन किसी रूप में सर्वत्र प्रचलित है ही।
‘ब्रह्मचर्य’ का तीसरा अर्थ हमने ‘ईश्वर-चिन्तन’ किया है। यह भी प्राचीन काल में उद्देश्य-रूप से माना जाता था। वीर्य-रक्षण और वेदाध्ययन की परिपाटी के साथ ही ईश्वर-चिन्तन भी होता था। अब भी लोग देवाराधन करते हैं।
ब्रह्मचर्य में वीर्य-रक्षण, वेदाध्ययन और ईश्वर-चिन्तन—इन तीनों बातों की सिद्धि होती है।
अर्थात् एक साथ वीर्य-रक्षण करने, वेदाध्ययन करने तथा ईश्वर-चिन्तन करने का नाम ‘ब्रह्मचर्य’ है। इन्हीं तीन महत्वशाली प्रयोजनों के एकत्र किये हुये भाव से ‘ब्रह्मचर्य’ शब्द की संसार में उत्पत्ति हुई है।
अब हम ऊपर कहे गये तीन प्रयोजनों के समूह-रूप ‘ब्रह्मचर्य’ को आगे बतला देंगे। हमने जिन आधारों पर ऊपर के अर्थ किये हैं, वे भी नीचे लिखे जाते हैं:—
कठोपनिषत्—
“तदेव शुक् तद्ब्रह्म, तदेवामृतममृतत्वे।”
अर्थात् वही वीर्य है—वही परमात्मा है और वही अमृत कहलाता है।
यजुर्वेद—
“तदेव शुक् तद्ब्रह्म, ता आपः स प्रजापतिः।”
अर्थात् वही वीर्य है—वही ईश्वर है—वही जीवन है, और वही सृष्टि-कर्ता भी है।
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ब्रह्मचर्य की व्याख्या
पैतरेयोपनिषत्—
“प्रज्ञानं वै ब्रह्म ।”
अर्थात् वेद साक्षात् परमेश्वर है ।
मनुस्मृति—
“ब्रह्मभ्यासेन वाजस्वमनन्तसुखमश्नुते ।”
अर्थात् वेद के सर्वत्र अध्ययन करने से अपरिमित सुख मिलता है ।
कैवह्योपनिषत्—
“यत्परब्रह्म सर्वात्मा, विभ्रमस्यावतर्न महत् ।”
अर्थात् जो परब्रह्म है—सर्वात्मा है, और संसार का श्रेष्ठ धाम है ।
वेदान्तदर्शन—
“अशातो ब्रह्म-जिज्ञासा ।”
अर्थात् अब हम परमात्म-तत्व की विवेचना करते हैं ।
ऊपर के अवतरणों से पाठक समझ गये होंगे कि ‘ब्रह्म’ से वीर्य, वेद और ईश्वर का बोध होता है । ब्रह्मचर्य-व्याख्या—कहने का अभिप्राय यह है कि वीर्य, वेद और ईश्वर का—रत्न, अण्व-यंत तथा चिन्तन ही ‘ब्रह्मचर्य’ है । इन तीनों में से एक भी कम हुआ, तो ब्रह्मचर्य की सम्पूर्णता नहीं प्राप्त हो सकती ।
३-ब्रह्मचर्य के आविष्कारक
गयन्ति देवाः किल गीतकानि—
धन्यास्तु ये भारत-भूमि-भागे ।
स्वर्गापवर्गस्य च हेतु-भूते,
भवन्ति भूयः पुरुषाः सुखत्वात् ॥
(श्रीमद्भागवत)
ब्रह्मचर्य-विज्ञान .
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यह वही महत्त्वशाली महादेश है, जहाँ की सम्पत्ता अपने अलौ-किक गुणों के कारण, एक बार उन्नति की चरम-सीमा को पहुँच गई थी। यह वही पुराय-प्रधान भूमि है, जहाँ का अन्तिम आलोक ग्रहण कर आधुनिक सभ्य तथा उन्नत कहलाने वाले देशों के निवासी, विश्व में अपनी विजय-वैजयन्ती उड़ा रहे हैं। वास्तव में हमारे उस गौरव-नरिमामय वैभव-विकास के आश्रय-भूत, इस देश में रहनेवाले, परम स्वार्थत्यागी और त्रिकालदर्शी ऋषि, मुनि तथा महात्मा लोग थे, जो उच्च पर्वतों की कन्दराओं और हरे-भरे वनों की कुटियों में बस कर, समस्त मनुष्य-जाति के लिये हितकर, एवं सुख-शान्तिमय उपाय सोचा करते थे। उनके सत्सिद्धान्त कोरी कल्पना (Theory) की अरसित भित्ति पर ही नहीं ठहरते थे, वरन् वे आदर्श विज्ञान (Science) की खरी कसौटी पर सुदृढ़ अभ्यास (Practice) द्वारा कसे जाकर ही जनता में प्रच-लित किये जाते थे। यही एक मुख्य कारण था कि उनके अनुगमन से प्रजा सदा फूलती-फलती रही। उन्होंने सामाजिक जीवन को नियम-बद्ध किया। ईश्वर की सत्ता को स्थिर रखने के लिये तथा मानवी-स्थिति को कुमार्ग-गामिनी होने से बचाने के उद्देश्य से, अनेक शास्त्रों की रचना की, और उनमें अनेक अमूल्य, उच्च तथा स्वभाविक विधान किये। उन्होंने स्वभाव-सिद्ध ब्राह्मणादि चार वर्णों और ब्रह्मचर्यादि चार आश्रमों की योजना की। जैसे वर्णों में ब्राह्मण, वैसे आश्रमों में ब्रह्मचर्य को प्रथमता और श्रेष्ठता का स्थान मिला। इस रहस्य-पूर्ण प्रणाली को हम उनके सर्वतोभद्र-मस्तिष्क और दिव्य-दृष्टि का सबसे बड़ा उत्पादन मानते हैं। संसार की प्राथमिक अवस्था में, वास्तव में, यह उनकी अपूर्व योग्यता:
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ब्रह्मचर्य की प्राचीनता
थी। अतएव ब्रह्मचर्य के मूल आविष्कारक, इसी देश के प्राचीन महात्मा तथा दूरदर्शी देव-पुत्र्य पुरुष थे। इन्होंने के कारण कई शताब्दियों तक ब्रह्मचर्य-प्रथा का प्रचार धार्मिक रूप से भारत में ही किया, समस्त भूमण्डल में उत्तरोत्तर-वृहत दिनों तक बढ़ता गया।
काल के प्रभाव से उस सुवर्ण-युग का अन्त हो गया। भारत में आज वे महर्षि तथा सिद्ध लोग नहीं रहे, पर जिस कल्याणप्रद मार्ग को दिखला गये, वह इस पवित्र समय में भी उनका स्मरण दिलाता है। यदि हम अपनी अज्ञानता और अभिमान को छोड़ कर, उनकी बातों पर विश्वास और प्रेम कर, ब्रह्मचर्य-प्रणाली को पुनः उसी रूप में प्रचलित करें, तो वास्तव में हम फिर भी उनकी आत्मा को दर्शन नवीन शरीर में कर सकते हैं। इसमें तनिक भी सन्देह नहीं कि ब्रह्मचर्य के प्रभाव से भविष्य में हम भी वैसे ही आविष्कारक तथा सत्पुरुष हो सकेंगे।
४—ब्रह्मचर्य की प्राचीनता
ब्रह्मचर्य-प्रथा के आविष्कार-काल के सम्बन्ध में कुछ कहने के लिये, विश्व का इतिहास सूक्ष्म है। इसलिये यह बात निश्चय रूप से नहीं कही जा सकती कि यह प्रथा अमुक समय में ही प्रचलित हुई थी। पर ही, इतना तो कई उदाहरणों से जान पड़ता है कि इसका स्वेभाव वैदिक काल से पहले हो चुका था। जैसा कि मित्र-लिखित सन्ध से भी सूचित होता है:—
ब्रह्मचर्येण तपसा, देवा मृत्युमुपागत ।
इन्द्रोह ब्रह्मचर्येण, देवेभ्यः स्वरामरत् ॥
(अथर्ववेद)
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ब्रह्मचर्य के तपोयल से देवों ने मृत्यु पर विजय प्राप्त की, और इन्द्र को इसी ब्रह्मचर्य के पुराय-प्रताप से सुरों में उद्यासन मिला ।
वास्तव में हमारे वेद-कालीन आर्यों ने इसका पूर्ण-रूप से विकास तथा सर्वश्रेष्ठ प्रचार किया था—वस समय की आश्रम-प्रथाओं से भी यह बात स्पष्ट-स्पष्ट भलकती है। यह प्रथा पौराणिक काल तक अधिक मर्यादित रही, और यहाँ फिर इसकी धीरे-धीरे अवनति होने लगी और इस दशाको पहुँची ।
सृष्टि-सम्बन्ध पर बहुत मत-भेद है। यदि लोकमान्य तिलक के मत से वैदिक सभ्यता का समय ८००० वर्षों से पूर्व मानें, तो भी हमारी ब्रह्मचर्य-प्रथा इससे विशेष प्राचीन ठहरेगी। वेदों में कई स्थानों पर ब्रह्मचर्य विषयक मन्त्र आये हैं। उनमें कहीं सद्गुण और कहीं प्रकट रूप से ब्रह्मचर्य के वर्णन हैं। प्रथम तीन वेदों में सूक्ष्म रीति से ब्रह्मचर्य का वर्णन है, पर चौथे वेद (अथर्वण) में इसका उल्लेख बहुत सार-गर्भित रूप में किया गया है, जो आगे यथास्थान दिया जायगा ।
वेदों के पश्चात् उपनिषदों की गणना है। हमारे कई उपनिषदों में ब्रह्मचर्य-विषय की आख्यायिकायें आई हैं, और उनमें के अन्तर्गत इस सम्बन्ध के मनोहर उपदेश भी दिये गये हैं, जिन्हें हम प्रसङ्ग-प्रसङ्ग पर पाठकों के लिये उपस्थित करेंगे ।
वेद तथा उपनिषदों के पश्चात् पुराण, रामायण, महाभारत और विविध ग्रन्थशास्त्र, प्रमाण-कोटि के ग्रन्थ हैं—इन ग्रन्थों में भी ब्रह्मचर्य की कथायें, पालन की शिक्षायाँ, विविध प्रशंसायें तथा निश्चित की हुई विधियाँ मिलती हैं । इसलिये ऐसी अवस्था में
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ब्रह्मचर्य की प्राचीनता
इसकी प्राचीनता में कोई सन्देह ही नहीं रह जाता। प्राचीन ग्रन्थों में ऐसा कोई विरला ही ग्रन्थ होगा, जो ब्रह्मचर्य के सम्बन्ध में अपना भिन्न मत रखता हो, और कुछ न कुछ उपदेश न देता हो।
आज से ५००० वर्ष पहले हमारी रामायण और महाभारत के समय में भी अनेक पुरुष ब्रह्मचर्य के पालन में आदर्श स्वरूप हो गये हैं। पुरुष ही नहीं, बहुत सी स्त्रियाँ भी इस अलौकिक धर्म की दृढ़ अनुयायिनी थीं। हिन्दू-राजाओं के अधःपतन-काल में भी उस ब्रह्मचर्य का दीपक कहीं-कहीं टिमटिमा रहा था। वास्तव में ब्रह्मचर्य का इतिहास भारतीय सभ्यता के इतिहास से कम प्राचीन नहीं है। इसका उत्थान और पतन सभ्यता के साथ ही साथ होता आया।
५-ब्रह्मचर्य की महिमा
ब्रह्मचर्य-प्रतिष्ठायां, वीर्य-लामो भवत्यपि।
सुरत्यं मानवोयाति, चान्तेयाति परांगतिम् ॥
(चण्डि)
ब्रह्मचर्य का पालन करने से वीर्य का लाभ होता है। ब्रह्मचर्य की रक्षा करने वाले मनुष्य को दिव्यता प्राप्त होती है, और साधना पूरी होने पर, परम गति भी उसे मिलती है।
ब्रह्मचर्य की महिमा अपार है। वाणी से उसका वर्णन करना सूर्य को दीपक से दिखाने के समान है। 'ब्रह्मचर्य' वह उग्र व्रत है, जिसकी साधना से लोग नर से नारायण हो सकते हैं। इसके पालन से अब तक अनेक लोग देव-कोटि में गिने गये। तभी तो
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भगवान् शङ्कर ने अपने मुखारविन्द से इस प्रकार कह कर, आदेश किया है:—
न तपस्तपस्तत्प्राहृष्टम्वच्यं तपोचमम् । उध्वरेतामचेद्यस्तु, सदेवो नतुमातुपः ॥
तप कुछ भी नहीं है । ब्रह्मचर्य ही उत्तम तप है । जिसने अपने वीर्य को वश में कर लिया है, वह देव-स्वरूप है—भतुष्य नहीं !
“एकतक्षतुरो वेदा, ब्रह्मचर्यं तथैकतः ।”
( छान्दोग्योपनिषत् )
एक ओर वा चारों वेदों के उपदेश, और दूसरी ओर ब्रह्मचर्य—दोनों एक गुला पर रखकर तौले जायें, तो दोनों पलड़े बराबर होंगे । अर्थात् ब्रह्मचर्य का महत्व वेदों से भी विशेष है ।
“तेषामेवैव स्वर्गलोकौ, येषां तपो ब्रह्मचर्यं, येतु सत्यं प्रतिष्ठितम् ।”
( प्रश्नोपनिषत् )
उन्हीं जनों को स्वर्ग-सुख मिलता है, जिन्होंने ब्रह्मचर्य जैसे तप का अनुष्ठान किया है, और जिनके हृदय में ब्रह्मचर्य स्वी सत्य विराजमान है ।
ब्रह्मचर्यं पालनीयं, देशानामपि दुर्लभम् । वीर्यं सुरक्षितेयान्ति, सर्वलोकार्थ-सिद्धम् ॥
( सूक्ति )
ब्रह्मचर्य का पालन करना योग्य है । देवों के लिये भी ब्रह्म-
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ब्रह्मचर्य की महिमा
चर्य दुर्लभ है। वीर्य की रक्षा भली भाँति होने पर, सब लोकों के मुखों की सिद्धियाँ स्वयं मिल जाती हैं।
अखण्ड ब्रह्मचारी पितामह भीष्म ने धर्मराज युधिष्ठिर को ब्रह्मचर्य-विषय का उपदेश किया है, उसमें भी इस महाव्रत की महिमा भले प्रकार प्रकट होती है। वह इस प्रकार है:—
ब्रह्मचर्यरय सुगुणं, शृणुत्वच्च सुधाधिया।
प्राजन्म भरगाद्यस्तु, ब्रह्मचारी भवेद्दिह ॥
मैं ब्रह्मचर्य का गुण बतलाता हूँ। तुम स्थिर बुद्धि से सुनो ! जो आजीवन ब्रह्मचारी रहता है, उसे इस संसार में कुछ भी दुःख नहीं होता।
न तस्य किञ्चिदप्याप्यमिति विद्धि नराधिप !
वहु-कोटि ऋषीणाश्च, ब्रह्मलोके वसन्त्युत ॥
हे राजन् ! उस पुरुष को कोई वस्तु दुर्लभ नहीं। इस बात को तुम निश्चय समझो ! ब्रह्मचर्य के प्रभाव से करोड़ों ऋषि ब्रह्मलोक में वास करते हैं।
सत्येतरानां सततं, दन्तानामूर्ध्व-रेतसाम् ।
ब्रह्मचर्यद्वैद्देदानन् ! सर्व-पापान्युपासितम् ॥
सत्य से सदैव प्रेम करने वाले निमल ब्रह्मचारी का ब्रह्मचर्य व्रत, हे राजन् ! समस्त पापों को नष्ट कर देता है।
चिरायुषः सुसंस्थाना, दृढसंहननानराः ।
तेजस्विनी महावीर्या, भवेयुर्ब्रह्मचर्यतः ॥
( हेमचन्द्र सूत्र )
जो लोग विशिष्ट ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं, वे चिरायु, सुन्दर शरीर, दृढ़ कर्तव्य, तेजस्वितापूर्ण और वड़े पराक्रमी होते हैं।
ब्रह्मचर्य-चिन्हाण
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प्राणभूतं चरित्रस्य, परब्रह्मैककारणम् । समाचरन् ब्रह्मचर्यं, पूजितैरपिपूज्यते ॥
( देवचन्द्र श्रि )
ब्रह्मचर्य सन्वरित्रता का प्राण-स्वरूप है, इसका पालन करता हुआ मनुष्य, सुपूजित लोगों से भी पूजा जाता है ।
ऊपर के श्लोकों में जिस ब्रह्मचर्य के इतने गुण बतलाये गये हैं, उसके विषय में अधिक कहने की आवश्यकता नहीं ।
पाठक इतने से ही ब्रह्मचर्य की महिमा का अनुमान कर सकते हैं । हमारे विचार से तो ब्रह्मचर्य की यथार्थ महिमा कहने और सुनने से नहीं विहित हो सकती ! इसको तो भली भाँति वे ही जान सकते हैं, जो कुछ समय तक इस व्रत की साधना करें । क्योंकि ब्रह्मचर्य जैसे आध्यात्मिक तत्व का रस, उसके अन्तर्गत भरा रहता है । जो लोग इसके प्रेमी होते हैं, वे ही उसे पीकर उसके अपूर्व स्वाद का उचित अनुभव कर सकते हैं ।
६-धन्वन्तरि का ब्रह्मचर्योपदेश
भगवान् धन्वन्तरि का नाम संसार में बहुत प्रख्यात है । वे आयुर्वेद के प्रचार करने वाले—भीष्म-भारिण वैद्य कहें जाते थे । ऐसा कहा जाता है कि वे युवक को भी एक बार अपने तप तथा विन्योपधि के प्रभाव से जीवित कर सकते थे ।
वें ही धन्वन्तरि महाराज एक दिन शिष्यों के साथ अपने आश्रम में बैठे हुये, आयुर्वेद का उपदेश कर रहे थे । पाठ समाप्त होने पर शिष्यों ने उनसे प्रश्न किया कि भगवन् ! कोई ऐसा एक ही उपचार बतलाइये, जिसके सेवन से सब प्रकार के रोगों का
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धन्वन्तरि का ब्रह्मचर्योपदेश
नाश हो सके । आप मनुष्य-मात्र के कल्याण के लिये अपना सब से अनुभूत उपाय बताने की दया कीजिये ।
शिष्यों के प्रश्न को सुनकर भगवान् धन्वन्तरि अत्यन्त प्रसन्न हुये, और उन्होंने कहा कि प्रिय वत्स ! तुम लोगों को हृदय से ऐसा ही एक उपचार बतलाता हूँ—इसकी सत्यता में मुझे तनिक सन्देह नहीं है । तुम लोग ध्यान देकर सुनो !
मृत्युज्याधिजरात्नाशौ-पीयुषं परमौपधम् । ब्रह्मचर्यं महद्यत्नं, सत्यमेव वदाम्यहम् ॥
मैं इस बात को तुम लोगों से सत्य-सत्य कहता हूँ कि मरण, रोग तथा दुष्टता का नाश करने वाला—अमृत रूप और बहुत बड़ा उपचार, मेरे विचार से ब्रह्मचर्य है ।
शान्तिर्काम्निस्मृतिज्ञानं भारोग्यञ्चापिसन्ततिम् । य इच्छति महद्दमं, ब्रह्मचर्यं चरेदिह ॥
जो शान्ति, सुन्दरता, स्मृति, ज्ञान, स्वास्थ्य और उत्तम सन्तति चाहता है, वह इस संसार में सर्वोत्तम धर्म ब्रह्मचर्य का पालन करे ।
ब्रह्मचर्यं परंज्ञानं, ब्रह्मचर्यं परं बलम् । ब्रह्मचर्यमेवो ह्यात्मा, ब्रह्मचर्यैव तिष्ठति ॥
ब्रह्मचर्य सब से उत्तम ज्ञान है । ब्रह्मचर्य अपरिमित बल है । यह आत्मा निश्चय रूप से ब्रह्मचर्यमय है, और यह मनुष्य-शरीर में ब्रह्मचर्य से ही ठहरता है ।
ब्रह्मचर्यं नमस्कृत्य, वासाध्यं साधयाम्यहम् । सर्व-लक्षणं हीनत्वं, हन्यते ब्रह्मचर्यया ॥ ब्रह्मचर्यमय भगवान् को प्रणाम कर, मैं असाध्य रोगियों
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को भी साध्य बनाता हूँ। उस ब्रह्मचर्य की रक्षा से सब प्रकार का अशुभ नष्ट हो जाता है।
उनकी इस शिक्षाओं को सुन कर शिष्य-मण्डली में आनन्द का स्रोत उमड़ पड़ा। बहुत से विद्यार्थियों ने अपने हृदय में आजीवन ब्रह्मचर्य-पालन की प्रतिज्ञा की।
अब पाठक भली भाँति समझ गये होंगे कि भगवान् धन्वन्तरि जैसे वैद्य ने भी मुक्त-कण्ठ से ब्रह्मचर्य का समर्थन किया है। यदि उनके कहे पर विश्वास करके विधिवत् ब्रह्मचर्य का पालन किया जाय, तो मनुष्य को किसी प्रकार का रोग नहीं हो सकता। फिर औषधियों की आवश्यकता ही क्यों कर हो सकेगी ?
७-ब्रह्मचर्य-विज्ञान का समर्थन
‘स यो विज्ञानं प्रल्लेप्युपास्ते विज्ञानवतो वे स लोकार्मुद्धानवतोऽभिसिध्यति ।’
( छन्दोग्योपनिषत् )
जो पुरुष विज्ञान को बड़ा समझ कर, उसकी उपासना करता है, वह निश्चय कर के ज्ञानवान् होकर, ज्ञान वाले लोगों को प्राप्त होता है।
हमने अपने इस ग्रन्थ में ‘ब्रह्मचर्य’ को विज्ञान माना है। कुछ लोग इस पर आपत्ति भी कर सकते हैं। इसलिये हम इस बात की वरसा देना चाहते हैं कि हमने जो ब्रह्मचर्य को विज्ञान माना है, वह कोई नई बात नहीं है, बल्कि प्रचीन समय में भी लोग ब्रह्मचर्य को विज्ञान मानते और कहते थे। बहुत से ऋषियों ने
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ब्रह्मचर्य-विज्ञान का समर्थन
सो ब्रह्मचर्य को विज्ञान कह के ही पुकारा है। वास्तव में यह ज्ञात है भी ऐसी ही।
छान्दोग्योपनिषद् में लिखा है कि सब से पहले इस ब्रह्म (चर्य) विज्ञान का बोध ब्रह्माजी को हुआ। तत्पश्चात् उन्होंने इसका उपदेश कश्यप (प्रजापति) को दिया। फिर कश्यप जी ने मनु महाराज को इसका रहस्य बताया, और फिर मनुजी ने समस्त प्रजा को इसकी शिक्षा दी। इस के उपरान्त महामति अरुण ने उद्यालक ऋषि को इसका महत्त्व बताया।
फिर तो इस ब्रह्मचर्य-विज्ञान का सारे संसार में धीरे-धीरे प्रचार बढ़ता गया। पिता और आचार्य लोग अपने पुत्रों तथा प्राणप्रिय शिष्यों को वंश-परम्परा से इसका उपदेश करते गये। और इस के मानने वाले तथा इसके अनुकूल चलने वाले लोग दुःखों से छूट कर परम गति को प्राप्त हुये।
इस सम्बन्ध में एक बहुत ही उत्तम आख्यायिका है। वह इस प्रकार है:—
पुरुषश्चोक ऐतरेय ऋषि के तेजस्वी पुत्र महीदास इस 'ब्रह्मचर्य-विज्ञान' के अच्छे ज्ञाता थे। वे अपने शत्रुओं तथा दुष्ट प्रकृति वाले पलित पुरुषों से कहा करते थे कि तुम लोग मेरे ब्रह्मचर्य (विज्ञान) को न जानते हुये, मुझे क्यों कष्ट दे रहे हो। तुम्हारे दुःख देने से मेरी कुछ भी हानि न होगी, वरन् इससे तुम्हारा ही अन्तिष्ट होगा। क्योंकि मैंने पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन किया है। इस प्रकार इस विज्ञान के इन्द्रजाली महीदास ११६ वर्ष तक जीवित रहे, उन्हें किसी बात का भय न था। और उनका तर्क
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भी अग्निष्ट न हो सका। उन्हें कष्ट देने वाले पहले ही नष्ट हो गये; जो पुरुष इन महोदास का अनुकरण करेगा, वह भी दीर्घजीवी होगा।
हमारे कहने का तात्पर्य यह है कि आधुनिक समय में भी जा पिता या आचार्य, अपने पुत्र या शिष्य को इस सर्व-श्रेष्ठ (ब्रह्मचर्य) विज्ञान का रहस्य समझा देगा, वह अवश्य ही देश और जाति के सुधार का पुरुष प्राप्त करेगा।
२-ब्रह्मवचस और ब्रह्मलोक
“ब्रह्मभ्यावत्ते, तन्मेषच्छतुमुद्विषां, तन्मे ब्राह्मण-वचसम् ।”
(अथर्ववेद)
मैं ब्रह्म (वीर्य) की उपासना करता हूँ। वह मुझे बल दे और वह मुझे ब्रह्मवचस प्रदान करे।
जितने महाव्रत हैं, उनके पालन से उसके कर्त्ता को कुछ न कुछ फल अवश्य मिलता है। मनुष्य का स्वभाव ही ऐसा है कि वह निष्काम-कर्म की अपेक्षा सकाम-कर्म को अधिक पसन्द करता है। यदि फल की अशा न हो, तो अनुष्ठान के पूर्ण होने में भी सन्देह ही रहता है। यही बात ब्रह्मचर्य के साथ में भी घटती है। ब्रह्मचर्य का पालन जिन बड़े उद्देश्यों की सिद्धि के लिये किया जाता है, उन्हें हम प्रकट कर देना चाहते हैं। वे इस प्रकार हैं:—
अनेक ग्रन्थों में यह बात लिखी है—बहुत से वैदिक मन्त्रों में भी हम देखते हैं कि भाव-भरे मनोहर शब्दों में ‘ब्रह्मवचस’ के
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ब्रह्मवर्चस् और ब्रह्मलोक
लिये प्रार्थना की गई है। मन्वादि स्मृतियों में भी यह बात स्पष्ट रूप से प्रतिपादित की गई है कि ब्रह्मवर्च्य के पालन का श्रेय ब्रह्मवर्चस की प्राप्ति है। इसी ब्रह्मवर्चस के लिये कोटि-कोटि महर्षि और मुनीश्वर लोग अखण्ड ब्रह्मवर्च्य की साधना करते रहे। कहने का वात्सय यह है कि ब्रह्मवर्चस को प्राप्त करने का ब्रह्मवर्च्य ही एकमात्र साधन था।
अथर्ववेद में 'ब्रह्मवर्चस' के सम्बन्ध के कई प्रमानोत्पादक मन्त्र हैं। उनमें से एक हम यहाँ उद्धृत करते हैं। उससे हमारी यह बात स्पष्ट हो जायगी:—
सूर्यस्यावृत मन्वावर्ते, दक्षिणा मन्वावर्ते। सामे द्विविर् यच्छतु, सामे ब्राह्मणवर्चसम् ॥
हम प्रकाश-स्वरूप परमात्मा का अनुगमन करते हैं। हम उसकी अनुकूलता की उपासना करते हैं। वह हमें बलप्रदान करे, वह हमें ब्रह्मतेज दे !
इस मन्त्र का अभिप्राय यह है कि हम सूर्य की भाँति शरीर को प्रकाशित करने वाले ब्रह्मवर्च्य का अनुष्ठान करते हैं। उसकी सत्ता का अनुमान करते हैं। वह हमें मनोबल दे—वह हमें ब्रह्मतेज प्रदान करे।
वात्सय में वीर्य ही मनुष्य-शरीर में सूर्य है। इसी के प्रताप से यह प्रकाशित होता है। जिस दिन इस परम प्रकाश का लोप हो जाय, उसी क्षण यह पौर तम से घिर जाता है। अर्थात् वीर्य के बिना शरीर का नाश होना निश्चित है।
ब्रह्मवर्च्य के पालन से ही मनुष्य को ब्रह्मवर्चस की उपलब्धि होती है। ब्रह्मवर्चस नाम है—आत्म-ज्ञान का। जब तक ब्रह्मवर्चस
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ब्रह्मचर्य-विज्ञान
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नहीं, सिद्ध होता, 'सब-तक 'ब्रह्मलोक' में आत्मा स्वतन्त्र होकर नहीं पहुँच सकता। अर्थात् एक 'साधन' की सिद्धि हो जाने से दूसरे सबूतय की भी सिद्धि होती है।
अब पाठक ब्रह्मचर्य कर रहा है, इसे तो समझ गये होंगे। इसके प्रश्नोत्तर 'ब्रह्मलोक' का भी थोड़ा परिचय कर देना चाहते हैं।
“तद्य एवैतं ब्रह्मलोकं ब्रह्मचर्येणानुविन्दते। तेषामेवैष ब्रह्मलोकस्तेषां स्वर्गेषुलोकेषु फामचारो भवति।” ( छान्दोग्योपनिषत् )
ब्रह्मचर्य से ही 'ब्रह्मलोक' की स्थिति है। ब्रह्मचर्य के ही द्वारा 'ब्रह्मलोक' मिलता है। ब्रह्मचारियों का ही 'ब्रह्मलोक' पर अधिकार है, अन्य का नहीं। जो ब्रह्मचर्य चुक पुलप हैं, वे सभी लोकों में विचरण कर सकते हैं।
इसका अभिप्राय यह है कि इस शरीर के ही अन्तर्गत 'ब्रह्मलोक' है। ब्रह्मचर्य की निष्ठा से आत्मा को वह अवस्था प्राप्त होती है। जिस ब्रह्मचारी को आत्मज्ञान प्राप्त हो जाता है, वह शरीर के भीतर के दूसरे लोकों में भी पहुँच सकता है। अर्थात् उसका अनुभव सब प्रकार के सद्भावों में परिणत हो सकता है।
'ब्रह्मलोक' आत्मा की वह अवस्था है, जिसमें वह परम सुख का अनुभव करता है। इस लोक में पहुँचने पर, उसे किसी प्रकार का दुःख नहीं मिलता। 'ब्रह्मलोक' सब लोकों से श्रेष्ठ है। यह सब से ऊपर मस्तिष्क में है। प्राणों के यह पहुँचने से जीव का मोच होता है। उसे फिर यहिक हृदयों से मुक्ति मिल जाती है। इसीसे 'ब्रह्मलोक' का आशय है—परमानन्द।
अब पाठक समझ गये होंगे कि चौर्य-सत्ता (ब्रह्मचर्य से) की
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प्राचीन आर्य और ब्रह्मचर्य
मनुष्य को आत्मज्ञान प्राप्त होता है, और आत्मज्ञान प्राप्त होने पर ही परमात्मन्द (ब्रह्मलोक) की प्राप्ति हो सकती है। इस अवस्था के प्राप्त होने पर, फिर कुछ भी प्राप्त करने के लिये शेष नहीं रह जाता।
हमारे विचार से यही 'ब्रह्मवचन' और 'ब्रह्मलोक' का मूल रहस्य है। इन दोनों के लिये प्रयत्न करना मनुष्य-जाति का प्रधान ध्येय होता चाहिये। जो लोग अपने जन्म को सार्थक करना चाहें, वे ब्रह्मचर्य रूढ़ी सुधुपाय को साथ कर 'ब्रह्मवचन' और 'ब्रह्मलोक'—'आत्मज्ञान' और 'परमात्मन्द' को अवश्य प्राप्त करें !
९—प्राचीन आर्य और ब्रह्मचर्य
मन्ये विधात्रा जगदेक कानम् । विनिर्मितं वर्षं भिदं सुशोभनम् ॥ धर्माख्यं पुष्पाणि कियन्ति यत्र वै । कैवलय रूपञ्च फलं प्रचीयते ॥
यह वात सब पर विदित है कि इस देश के निवासी आर्य नाम से विश्व-भरपल में विख्यात थे। उनकी इस महत्ता का कारण क्या था? उनका सदाचारमय-धर्मनिष्ठ-लोकोपकारी जीवन। वे निरन्तर साधुता-पूर्ण तथा सब चरित्र का अभ्यास करते थे। इस बात से वे बहुत उन्नत तथा सद्गुण-सम्पन्न थे। उनके जीवन को सुधारने वाला प्रधान साधन यही 'ब्रह्मचर्य' था। इसी ब्रह्मचर्य के ऊपर उनका सामाजिक तथा नैतिक जीवन प्रधानतया
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अधिष्ठित था, और सारे देश में सुख-शान्ति का अनुपम साम्राज्य हो गया था। पर हाय ! महाभारत के साथ ही आर्यों के सस्ति-ख़ातों का हास होने लग गया। दिन पर दिन आर्यों की सब प्रकार की अवनति होती गई। अन्त में यह दशा हुई कि हम उन्हीं की एक मात्र सन्तान, उनके आदर्शों के शिखर से अनाचार के कूप में गिर गये। आर्यों के उन्नत चरित्र के सम्बन्ध में बहुत से विद्वानों ने अपने ग्रन्थों में सुसम्पत्तियों प्रकट की हैं। उनके देखने से हमें पूर्ण रूप से अनुमान हो जाता है कि कुछ ही दिन पहले, खदेड़ी शासन में हम, कितने गौरवान्वित तथा उच्च थे। हमारी ब्रह्मचर्य की प्रणाली ज्यों ज्यों अवनत होती गई, त्यों त्यों जाति की शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक अवनति भी बढ़ती ही गई।
आर्यों के विषय में कहा गया है कि वे बड़े ऊँचे, हृद-पुष्ट और पराक्रमी थे। उनका वर्ण गौर, शरीर तेजस्वी, उन्नत वक्ष-स्थल और दिव्य सुख-मण्डल था। बड़े नेत्र और लम्बी भुजायें थीं। मुख में शूल्ता दिखलाते थे। धर्म-पालन में दृढ़ और ईश्वर के परम भक्त थे। उनको स्त्रियों सदाचारिणी, पति-भक्ता तथा देवी-स्वरूपा थीं।
ऊपर की बातों के अवलोकन से हमारे मनमें यह स्वाभाविक जिज्ञासा होती है कि वे ऐसे क्यों थे, और आज हम उन्हीं के वंशज होकर, इस दुर्गति को क्यों प्राप्त हैं ? इसका उत्तर यह सूझता है कि इन सब अवनतियों का प्रधान कारण ब्रह्मचर्य-हीनता है। ब्रह्मचर्य की साधना से आर्यों का प्राचीन समय में चत्थान हुआ था। और उसके विपरीत चलने से ही हमारा
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प्राचीन आर्य और ब्रह्मचर्य
अघःपात हुआ। यदि उसी ब्रह्मचर्य-प्रथा को पुनर्जीवित कर दिया जाय, तो हमारे अनुमान से आर्यों की दशवीं पीढ़ी में पुनः आर्यों के वंशधर अपनी प्राचीन अवस्था को प्राप्त कर सकेंगे।
अब हम इस देश के प्राचीन आर्यों के चरित्र के सम्बन्ध में कुछ विदेशी विद्वानों के मतों का संग्रह करते हैं। इन विद्वानों में प्रायः सभी भारतवर्ष में आकर यहाँ की अवस्था अपनी आँखों देख गये हैं, और अपने देश में जोकर अपने ग्रन्थों में यहाँ का विस्तृत वर्णन किया है, तथा जो कुछ कहा है, उससे उनकी निष्पक्षता प्रकट होती है:—
जोर्जस—
“धर्म तथा सभ्यता के प्राचीनत्व के विचार से पृथ्वी की कोई भी जाति आर्य-जाति के समकक्ष नहीं।”
हयनसिंग—
“सबरिजता वा सत्यता के लिये आर्य-जाति चिरकाल से विषय में प्रसिद्ध है।”
मेगास्थनीज—
“आर्यों में दासत्व-भाव बिलकुल नहीं। उनकी स्त्रियों में पातित्रत्व और पुरुषों में वीरत्व असीम है। साहसिकता में आर्य-जाति पृथ्वी भर की अन्य जातियों में श्रेष्ठ है—परिग्रभी, शिल्पी तथा नग्न प्रकृति है।”
मैक्समूलर—
“जैसे पृथ्वी पर स्वर्ग कहने में भी मुझे आनन्द होता है। यदि कोई मुझसे कहे कि किस देश के आकाश के नीचे मनुष्य के अन्तःकरण की पूर्णता प्राप्त हुई, तो मैं कहूँगा कि वह देश भारतवर्ष है।”
ब्रह्मचर्य-विद्यान
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मिसेज पर्नीवेसॅट—
“हिन्दु-धर्म के सामने पारवाल सम्भ्या अत्यन्त हीन ज्ञात होता है । ज्ञान की कृष्णी सदा से हिन्दुओं के हाथ में रही है ।”
अपर की सम्पातियों के अतिरिक्त इस देश के विद्वानों के भी अनेक सदूभाव हैं, जो यहाँ पर अनावश्यक समय कर नहीं दिये गये । क्योंकि स्वदेशी लोग अपने देश का पक्षपात भी थोड़ा-बहुत कर सकते हैं, पर विदेशी लोगों को इससे क्या काम ! अतः इस सम्बन्ध में उन्हें के विचार मूल्यवान हो सकते हैं ।
१७—धर्म और ब्रह्मचर्य
“धर्मोर्ध्व जगत्सुप्रहितमिदम् ।”
“धर्मो विभ्रत्य जगत्ः प्रतिष्ठा,
प्रजा उपसर्पन्ति धर्मेष ।”
( नारयणगीतम् )
धर्म से ही वह संसार सुरक्षित है । धर्म से ही इस दृष्टि की मर्यादा है । धर्म से ही प्रजा अपने उद्देश्य को प्राप्त कर सकती है ।
विचार-दृष्टि से देखने पर विदित होता है कि वास्तव में धर्म मनुष्य-जीवन के लिये अत्यन्त आवश्यक साधन है । धर्म से ही सब प्रकार की उन्नतियाँ हो सकती हैं । धर्म मनुष्य की उस योग्यता का नाम है, जिसके आश्रय से, वह अपने पद को सार्थक बनाता है । जैसे धरि का धर्म धन्वज—जल का वरलाल है,
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धर्म शौर्य ब्रह्मचर्य
वैसे ही इस शरीका धर्म संयम-नियम और आत्मा, का ब्रह्मचर्य है। जो पदार्थ अपने धर्म को छोड़ देता है, वह उसी समय अपने अस्तित्व को भी खो बैठता है।
उक्तंति निखिला ज्ञावा, धर्मैरेव कृमादिह।
विदधानाः सावधानाः, लभन्तेऽन्ते परं पदम्॥
(महर्षिः व्याख्या)
इस लोक में समस्त जीव धर्म से ही विकास को प्राप्त करते हैं। धर्म के नियमों को पालने वाले, और उसके साधन में सामान्य रहने वाले नर ही अन्त में उत्तम पद के अधिकारी होते हैं, अन्य नहीं !
महर्षि कृष्णद ने अपने ग्रन्थ में धर्म की बहुत ही विख्यापक तथा अकाट्य परिभाषा की है, जो सदा और सर्वत्र एक सी घटती है, उसे हम यहाँ देते हैं :—
“यतोऽभ्युदय निः श्रेयस सिद्धिः सधर्मः।”
(बैशोपिकदर्शन)
जिस उपाय के अवलम्बन से इस लोक तथा परलोक दोनों का सुख प्राप्त हो, उसे धर्म कहते हैं। इसके विपरीत अधर्म है। ‘अभ्युदय’ नाम है—ऐहिक उन्नतियों का। सुन्दर स्वास्थ्य, दीर्घ-जीवन, प्रचुर-सम्पत्ति, सुख्य तथा अच्छी सन्तान को ही लोग इसलोक की उन्नतियों में गिनते हैं। ये सभी उन्नतियाँ ‘ब्रह्मचर्य’ के अधीन हैं। एक ब्रह्मचारी पुरुष—इन सबों को सहज में प्राप्त कर लेता है।
‘निःश्रेयस’ नाम है—पारलौकिक विकास का। आत्मानन्द, जीव-बुधा, परमोत्साह, उच्च कर्तव्य-शीलता, सद्भावना और