भारतकोश
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संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished893 पृष्ठ

कपिल आश्रम में अश्वानयन ] [ ४१

तुरगानयनार्थाय यत्नेन महतान्वितः ॥२७
तं प्रार्थयित्वा विधिवत्प्रसाद्य च विशेषतः ।
आदाय तुरगं वत्स शीघ्रमागंतुमर्हसि ॥२८

आप इस मन की उदासी को शिथिल करके यह सोच लीजिये कि यह सभी कुछ भाग्य के कारण से ही हुआ है और इसमें अन्य किसी का भी कुछ वश नहीं चलता है। ऐसा ही मानकर बिना किसी संशय के जो भी कुछ पीछे करने का कृत्य है उसको ही करना अब उचित है ।२२। वसिष्ठ जी के द्वारा इस रीति से कहा जाने पर कार्यों के अर्थ के तत्त्वों के ज्ञाता राजा सगर ने धैर्य का सहारा लिया था और मुनि से वही सब कुछ करने के लिये प्रार्थना की थी ।२३। फिर नृप सगर ने अपने विनय शाली पौत्र अंशुमान् को अपने पास बुलाकर विप्रों और क्षत्रियों की सभा के मध्य में धीरे से उससे कहा था ।२४। हे बेटा ! तुम्हारे सभी पितृगण ब्रह्मदण्ड से निहत हो गये हैं और वे पाप कर्मों के करने वाले सैकड़ों वर्षों के लिए नरक में पतित हो गये हैं ।२५। इस समय में तो मेरे अन्य सभी पुत्रों का विनाश हो गया है मेरी केवल एक तुम ही सन्तति शेष रहे हो जो कि इस मेरे विशाल राज्य के रक्षा करने वाले हो । अब तो इस लोक में और परलोक में मेरे पूर्ण श्रेय को करना तुम्हारे ही अधीन है ।२६। वह आप ही अब मेरी आज्ञा से पाताल लोक में कपिल मुनि के समीप में गमन करो । और महान् यत्न से उस यज्ञ के अश्व को यहाँ पर ले आओ ।२७। आप वहाँ पर पहुँच कर उन मुनिवर से विधि के साथ प्रार्थना करना और विशेष रूप से उनको प्रसन्न कर लेना । फिर उस अश्व को अपने साथ लेकर हे वत्स ! तुम बहुत ही शीघ्रता से यहाँ पर वापिस आ जाओ ।२८।

जैमिनिरुवाच-
एवमुक्तोऽशुमांस्तेन प्रणम्य पितरं पितुः ।
तथेत्युक्त्वा महाबुद्धिः प्रययौ कपिलांतिकम् ॥२६
तमुपागम्य विधिवन्नमस्कृत्य यथामति ।
प्रश्रयावनतो भूत्वा शनैरिदमुवाच ह ॥३०
प्रसीद विप्रशार्दूल त्वामहं शरणं गतः ।
कोपं च संहर क्षिप्रं लोकप्रक्षयकारकम् ॥३१

४२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

त्वयि क्रुद्धे जगत्सर्वं प्रकाशमुपयास्यति ।
प्रशांतिमुपयाह्याशु लोकाः संतु गतव्यथाः ॥३२
प्रसन्नोऽस्मान्महाभाग पश्य सौम्येन चक्षुषा ।
ये त्वत्क्रोधाग्निनिर्दग्धास्तत्संततिमवेहि माम् ॥३३
नाम्नांशुमंतं नप्तारं सगरस्य महीपतेः ।
सोऽहं तस्य नियोगेन त्वत्प्रसादाभिकांक्षया ॥३४
प्राप्तो दास्यसि चेद्ब्रह्मंस्तुरगानयनाय च ।
जैमिनिरुवाच—
इति तद्वचनं श्रुत्वा योगींद्रप्रवरो मुनिः ॥३५

जैमिनि मुनि ने कहा—जब राजा के द्वारा अपने पौत्र अंशुमान् से इस प्रकार से कहा गया था तो महान् बुद्धिमान उसने पिता के पिता को प्रणाम किया था ओर मैं ऐसा ही करूँगा—यह कहकर वह कपिल मुनि के समीप में चला गया था ।२६। उसके समीप में प्राप्त होकर उसने विधि के साथ उनके प्रणाम किया था और फिर बुद्धि के अनुसार विनम्रता से अवनत होकर धीरे से उनसे कहा था ।३०। हे विप्रशार्दूल ! मुझ पर कृपया प्रसन्न होइए—मैं तो आपके चरणों की शरण में समागत हुआ हूँ । आपके हृदय में जो कोप समुत्पन्न हो गया है उसका संहरण शीघ्र ही कर लीजिए क्योंकि आपका यह कोप समस्त लोकों के विनाश कर देने वाला है ।३१। आपके क्रुद्ध हो जाने पर तो यह समग्र जगत विनाश को ही प्राप्त हो जायगा । अब आप प्रशान्ति को शीघ्र प्राप्त हो जाइए । जिससे इन सब लोकों की व्यथा दूर हो जावे ।३२। हे महाभाग ! आप हमारे ऊपर प्रसन्न हो जाइए । सौम्य नेत्रों से हमको देखिए । जो आपके क्रोध की अग्नि से संदग्ध हो गये हैं उन्हीं की सन्तति मुझे आप समझिए ।३३। मेरा नाम अंशुमान है और मैं राजा सगर का नाती हूँ । वह मैं राजा के ही नियोग से आपकी प्रसन्नता की अभिकांक्षा से ही मैं यहाँ पर समागत हुआ हूँ ।३४। मैं तो उस यज्ञ के अश्व के ले जाने के ही लिए आया हूँ यदि कृपा कर मुझे देंगे । जैमिनि मुनि ने कहा—उस अंशुमान के इस वचन को सुनकर योगीन्द्र प्रवर मुनि ने अंशुमान का अवलोकन किया और परम प्रसन्न होकर यह वचन उससे कहा था ।३५।

[ कपिल आश्रम में अश्वानयन ] [ ४३

अंशुमंतं समालोक्य प्रसन्न इदमब्रवीत् । स्वागतं भवतो वत्स दिष्ट्या च त्वमिहागतः ॥३६ गच्छ शीघ्रं हयश्चायं नीयतां सगरांतिकम् । अधिक्षिप्तोऽस्य यज्ञोऽपि प्रागतः संप्रवर्त्तताम् ॥३७ व्रियतां च वरो मत्तस्त्वया यस्ते मनोगतः । दास्ये सुदुर्लभमपि त्वद्भक्तिपरितोषितः ॥३८ एषां तु संप्रणाशं हि गत्वा वद पितामहम् । पापानां मरणं त्वेषां न च शोचितुमर्हसि ॥३९ ततः प्रणम्य योगींद्रमंशुमानिदमब्रवीत् । वरं ददासि चेन्मह्यं वरये त्वां महामुने ॥४० वरमर्हामि चेत्त्वत्तः प्रसन्नो दातुमर्हसि । त्वद्रोषपावकप्लुष्टाः पितरो ये ममाखिलाः ॥४१ संप्रयास्यंति ते ब्रह्मन्निरयं शाश्वतीः समाः । ब्रह्मदंडहतानां तु न हि पिंडोदकक्रियाः ॥४२

हे वत्स ! आपका स्वागत है । बड़े ही हर्ष की बात है कि आप यहाँ पर आ गये हो ।३६। अब बहुत शीघ्र जाओ यह अश्व राजा सगर के समीप में ले जाओ । पूर्व से ही संप्रवृत्त हुआ इस राजा का यज्ञ रुक गया है उसको पूर्ण करो ।३७। और आपके मन में जो भी कुछ हो वह वरदान अब मुझसे प्राप्त कर लो । मैं तुम्हारी भक्ति से बहुत ही परितुष्ट हो गया हूँ यदि तुम्हारा वर परम दुर्लभ भी होगा तो भी मैं तुमको दे ही दूँगा ।३८। अब तुम इन साठ सहस्र नृप के पुत्रों का विनाश हो गया है—यह राजा से कह देना । ये महान पापी थे अतः इनके मरण के विषय में राजा से कह देना कि कोई शोक न करें ।३९। फिर उन योगीन्द्र मुनि को प्रणाम करके अंशुमान ने उनसे यह कहा था । हे मुने ! आप यदि मुझको वरदान देने की इच्छा करते हैं तो मैं आपसे वर का वरण करूँ ।४०। यदि मैं वर पाने के योग्य हूँ तो आपसे वरदान प्राप्त करूँ किन्तु वह वरदान आप सुप्रसन्न होकर ही मुझे दीजिए । आपके रोष की अग्नि से मेरे सभी पितृगण संप्लुष्ट हो गये हैं ।४१। हे ब्रह्मन् ! क्योंकि उन्होंने आपका महान अपराध किया

४४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

था इससे वे सभी बहुत वर्षों तक नरक में जायेंगे । क्योंकि वे सब ब्रह्मदण्ड से हत हैं अतएव उनकी पिण्डोदक क्रिया भी कुछ नहीं हो सकती है ।४२।

पिंडोदकविहीनानामिह लोके महामुने । विद्यते पितृसालोक्यं न खलु श्रुतिचोदितम् ॥४३ अक्षयः स्वर्गवासोऽस्तु तेषां तु त्वत्प्रसादतः । वरेणानेन भगवन्कृतकृत्यो भवाम्यहम् ॥४४ तत्प्रसीद त्वमेवैषां स्वर्गतेर्वद कारणम् । येनोद्धारणमेतेषां वह्नेः कोपस्य वै भवेत् ॥४५ ततस्तमाह योगीन्द्रः सुप्रसन्नेन चेतसा । निरयोद्धारं तेषां त्वया वत्स न शक्यते ॥४६ तैंश्चापि नरके तावद्वस्तव्यं पापकर्मभिः । कालः प्रतीक्ष्यतां तावद्यावत्त्वत्पौत्रसंभवः ॥४७ कालांते भविता वत्स पौत्रस्तव महामतिः । राजा भगीरथो नाम सर्वधर्मार्थतत्त्ववित् ॥४८ स तु यत्नेन महता पितृगौरवयंत्रितः । आनेष्यति दिवो गंगां तपस्तप्त्वा महद्ध्रुवम् ॥४९

हे महामुने ! इस लोक में जिनकी पिण्डोदक क्रिया नहीं होती है वे पितृगण के लोक में उनका सालोक्य प्राप्त नहीं कर सकते हैं—ऐसा श्रुति सम्मत प्रमाण है ।४३। अब मेरा यही वर मुझे प्रदान कीजिए कि आपके प्रसाद से उनको अक्षय स्वर्ग का निवास प्राप्त होवे । हे भगवान् ! इस वरदान से मैं कृत-कृत्य हो जाऊँगा ।४४। सो आप प्रसन्न हो जाइए और उनके स्वर्ग में गमन करने का कारण बता दीजिए । जिसके करने से उनका कोप की अग्नि से उद्धार हो जावे ।४५। इसके अनन्तर योगीन्द्र प्रसन्न चित्त से उससे बोले—हे वत्स ! उनका नरक से उद्धार तुम्हारे द्वारा नहीं किया जा सकता है ।४६। पाप कर्मों के करने वालों को तब तक नरक में वास करना ही होगा । उस समय की प्रतीक्षा करो जब तक तुम्हारे यहाँ पौत्र जन्म ग्रहण करे ।४७। कुछ काल के पश्चात् हे वत्स ! तुम्हारा एक महामति पौत्र होगा । उसका शुभ नाम राजा भगीरथ होगा जो समस्त धर्मों के

कपिल आश्रम में अश्वानयन ] [ ४५

अर्थों के तत्त्वों का ज्ञाता होगा ।४८। वह अपने पितरों के गौरव से सुसमन्वित होगा और महान् यत्न से परम घोर तप करके निश्चय ही स्वर्ग से यहाँ पर गङ्गा को लावेगा ।४६।

तदंभसा पावितेषु तेषां गात्रास्थिभस्मसु ।
प्राप्नुवंति गतिं स्वर्गे भवतः पितरोऽखिला ॥५०
तथेति तस्या माहात्म्यं गंगाया नृपनन्दन ।
भागीरथीति लोकेऽस्मिन्सा विख्यातिमुपैष्यति ॥५१
यत्तोयप्लावितेष्वस्थिभस्मलोमनखेष्वपि ।
निरयादपि संयाति देही स्वर्लोकमक्षयम् ॥५२
तस्मात्त्वं गच्छ भद्रं ते न शोकं कर्तुं मर्हसि ।
पितामहाय चैवैनमश्वं संप्रतिपादय ॥५३
जैमिनिरुवाच—
ततः प्रणम्य तं भक्त्या तथेत्युक्त वा महामतिः ।
ययौ तेनाभ्यनुज्ञातः साकेतनगरं प्रति ॥५४
सगरं स समासाद्य तं प्रणम्य यथाक्रमम् ।
न्यवेदयच्च वृत्तांतं मुनेस्तेषां तथात्मनः ॥५५
प्रददौ तुरगं चापि समानीतं प्रयत्नतः ।
अतः परमनुष्ठेयमब्रवीत्कि मयेति च ॥५६

उस पतित पावनी गङ्गा के पुनीत जल से उन सबके गात्र-अस्थि और भस्म के पवित्र हो जाने पर वे समस्त आपके पितृगण स्वर्ग में गति को प्राप्त करेंगे ।५०। हे नृपनन्दन उस गङ्गा का माहात्म्य ही ऐसा अद्भुत है । राजा भगीरथ के द्वारा यहाँ लाने से इस लोक में उसका नाम भागीरथी प्रसिद्ध होगा ।५१। गङ्गा का बड़ा अद्भुत माहात्म्य होता है कि उसके जल में किसी भी प्राणी की अस्थि-भस्म-नख आदि कोई भी भाग जब प्लावित हो जाता है तो वह प्राणी नरक की यातनाओं से भी मुक्त होकर अक्षय स्वर्गलोक में चला जाया करता है ।५२। इस कारण से अब आप यहाँ से चले जाइए—आपका कल्याण होगा—आपको कुछ भी शोक नहीं करना चाहिए । अपने पितामह को यह अश्व ले जाकर दे दो ।५३। जैमिनि मुनि

४६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

ने कहा—इसके अनन्तर उस महामति ने—ऐसा ही करूंगा—यह कहकर उनको भक्ति से प्रणाम किया था और उनकी आज्ञा प्राप्त कर साकेत नगरी की ओर वहाँ से गमन किया था ।५४। राजा सगर के समीप में पहुँच कर उसने क्रमानुसार उनको प्रणाम किया था और फिर उन सबका—मुनि का और अपना सम्पूर्ण वृत्तान्त राजा से निवेदन कर दिया था ।५५। और वह अश्व भी राजा को दे दिया था । जिसको वह बड़े प्रयत्न से लाया था । फिर राजा की सेवा में प्रार्थना की थी कि अब आगे मुझे क्या सेवा करनी चाहिए—यह अपनी आज्ञा प्रदान कीजिए ।५६।

—x—

।। अंशुमान को राज्य प्राप्ति ।।

जैमिनिरुवाच— ततः पौत्रं परिष्वज्य सगरः प्रेमविह्वलः । अभिनंद्याशिषात्यर्थं लालयन्प्रशंस ह ॥१॥ अथ ऋत्विक्सदस्यैश्च सहितो राजसत्तमः । उपाक्रमत तं यज्ञं विधिवद्वेदपारगः ॥२॥ ततः प्रवृत्ते यज्ञः सर्वसंपद्गुणान्वितः । सम्यगौर्ववसिष्ठाद्यैर्मुनिभिः संप्रवर्त्तितः ॥३॥ हिरण्मयमयी वेदिः पात्राण्युच्चावचानि च । सुसमृद्धं यथाशास्त्रं यज्ञे सर्वं बभूव ह ॥४॥ एवं प्रवर्त्तितं यज्ञमृत्विजः सर्व एव ते । क्रमात्समापयामासुर्यजमानपुरस्सराः ॥५॥ समापयित्वा तं यज्ञं राजा विधिविदां वरः । यथावद्दक्षिणां चैव ऋत्विजां प्रददौ तदा ॥६॥ अथ ऋत्विक्सदस्यानां ब्राह्मणानां तथार्थिनाम् । तत्कांक्षितादभ्यधिकं प्रददौ वसु सर्वशः ॥७॥

अंशुमान को राज्य प्राप्ति ] [ ४७

जैमिनी मुनि ने कहा—इसके अनन्तर राजा सगर ने प्रेम से विह्वल होकर अपने पौत्र का परिष्वजन किया था और अत्यधिक आशीर्वचनों से उसका अभिनन्दन करके बहुत ही अधिक लाड़ करते हुए उसकी प्रशंसा की थी ।१। इसके उपरान्त सब ऋत्विजों और सदस्यों के सहित उस नृप श्रेष्ठ ने वेदों के पारगामी विप्रों के द्वारा उस यज्ञ का विधि सहित उपक्रम किया था ।२। इसके अनन्तर सब प्रकार की सम्पत्ति और गुणों से संयुत वह यज्ञ आरम्भ हुआ था जिसका समारम्भ और्व और वसिष्ठ आदि मुनियों के द्वारा भली भांति सम्प्रवर्तित किया गया था ।३। उस यज्ञ की वेदी सुवर्ण से निर्मित की गयी थी तथा उसके उपयुक्त सभी छोटे-बड़े पात्र अत्युत्तम जुटाये गये थे । उस यज्ञ में शास्त्र के अनुसार सभी वस्तुएं सुसमृद्ध थीं ।४ इस प्रकार से आरम्भ किया हुआ वह यज्ञ था जिसको सभी ऋत्विजों ने किया था और यजमान के साथ उन्होंने उसको समाप्त किया था।५। विधि के ज्ञाताओं में श्रेष्ठ राजा ने उस यज्ञ को समाप्त कराकर उसी समय में ऋत्विजों के लिए उचित दक्षिणा दी थी ।६। इसके उपरान्त ऋत्विज-सदस्य-ब्राह्मण तथा याचकों के लिए सबको जो भी उनका आकांक्षित था उस से अधिक धन दिया था ।७।

एवं संतर्प्य विप्रादीन्दक्षिणाभिर्यथाक्रमम् ।
क्षमापयामास गुरून्सदस्यान्प्रणिपत्य च ॥८
ब्राह्मणैस्ततो वर्णैऋत्विग्भिश्च समन्वितः ।
वारकीयाकदंबैश्च सूतमागधवंदिभिः ॥९
अन्वीयमानः सस्त्रीकः श्वेतच्छत्रविराजितः ।
दोधूयमानचमरो बालव्यजनराजितः ॥१०
नानावादित्रनिर्घोषैर्बधिरीकृतदिङ्मुखः ।
स गत्वा सरयूतीरं यथाशास्त्रं यथाविधि ॥११
चकारावभृथस्नानं मुदितः सह बन्धुभिः ।
एवं स्नात्वा सपत्नीकः सुहृद्भिर्ब्राह्मणैः सह ॥१२
वीणावेणुमृदंगादिनानावादित्रनिःस्वनैः ।
मंगल्यैर्वेदघोषैश्च सह विप्रजनेरितैः ॥१३

४८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

संस्तूयमानः परितः सूतमागधबंदिभिः । प्रविवेश पुरीं रम्यां हृष्टपुष्टजनायुताम् ॥१४

इस प्रकार से विप्रगण आदि की दक्षिणाओं से भली-भाँति तृप्ति करके क्रम के अनुसार गुरुवर्गों को और सदस्यों को प्रणिपात करके उनसे क्षमा की याचना की थी ।८। फिर वह राजा शोभा यात्रा के स्वरूप में सरयू के तट पर गया था । उसके साथ ब्राह्मण आदि सभी वर्णों वाले लोग तथा ऋत्विज गण थे और जो मार्ग में रोकथाम करने वाले लोग थे उनके भी समूह और सूत—मागध और बन्दी जन भो थे ।६। इन सब को साथ में लेकर अपनी पत्नियों के सहित राजा वहाँ से चला था जिसके ऊपर श्वेत छत्र शोभित था । उसके दोनों ओर चमर ढुलाये जा रहे थे तथा बाल व्यजन भी किये जा रहे थे ।१०। अनेक वाद्य उस समय बजाये जा रहे थे जिनकी तुमुल ध्वनि से सभी दिशाओं कुछ भी सुनाई नहीं दे रहा था । इस रीति से वह शास्त्र के कथनानुसार विधिपूर्वक सरयू पर प्राप्त हो गया था ।११। समस्त बन्धु-बान्धवों के साथ परम प्रसन्न होकर अवभृथ अर्थात् यज्ञान्त स्नान राजा ने किया था । इस रीति के पत्नियों के सहित सुहृद्गण और विप्रों के साथ स्नान करके वहाँ से राजा वापिस चला था ।१२। उस समय में वीणा-वेणु-मृदङ्ग आदि अनेक बाजे रहे थे और माङ्गलिक वेद-मन्त्रों की भी ध्वनि हो रही थी जिन मन्त्रों को ब्राह्मण बोल रहे थे ।१३। सूत-मागध और बन्दीजन सभी ओर से संस्तवन कर रहे थे । इस रीति से हृष्ट-पुष्टजनों से समन्वित अपनी सुरम्यपुरी में राजा ने प्रवेश किया था ।१४।

श्वेतव्यजनसच्छत्रपताकाध्वजमालिनीम् । सिक्तसंमृष्टभूभागापणशोभासमन्विताम् ॥१५ कैलासाद्रिप्रकाशाभिरुज्ज्वलां सौधपक्तिभिः । स तत्रागरुधूपोत्थगंधामोदितदिङ्मुखम् ॥१६ विकीर्यमाणः परितः पौरनारीजनैर्मुहुः । लाजवर्षेण सानंदं वीक्षमाणश्च नागरैः ॥१७ उपदाभिरनेकाभिस्तत्र तत्र वणिग्जनैः । संभाव्यमानः शनकैर्जगाम स्वपुरं प्रति ॥१८

अंशुमान को राज्य प्राप्ति ] [ ४६

स प्रविश्य गृहं रम्यं सर्वमंडलमंडितम् । सम्यक्संभावयामास सुहृदो ब्राह्मणानपि ॥१९ संसेव्यमानश्च तदा नानादेशेश्वरैर्नृपैः । सभायां राजशार्दूलो रेमे शक्र इवापरः ॥२० एवं सुहृद्भिः सहितः पूरयित्वा मनोरथम् । सगरः सह भार्याभ्यां रेमे नृपवरोत्तमः ॥२१

उस पुरी की शोभा का वर्णन किया जाता है कि उसमें सर्वत्र छत्र पताका-ध्वजाओं की मालायें दिखाई दे रही थीं सर्वत्र पुरी का भूभाग संमार्जित तथा संसिक्त था और उसमें दुकान और बाजारों की भी अतीव अद्भुत शोभा हो रही थी ।१५। उस पुरी में बड़े-बड़े भवनों की की पंक्तियां थी जो बहुत ही ऊँचे थे और जिनमें प्रकाश हो रहा था । वे ऐसे ही प्रतीत हो रहे थे मानों उज्ज्वल कैलाश गिरि के शिखर हों । वहाँ पर अगुरु की धूप की गन्ध चारों ओर फैल रही थी जिससे सभी दिशाओं के मुख आमोदित हो रहे थे ।१६। नगर निवासिनी नारियों का समुदाय सभी ओर बारम्बार खीलों की वर्षा राजा के ऊपर कर रहा था और नगर निवासी पुरुष बड़े आनन्द के साथ राजा का मुखावलोकन कर रहे थे ।१७। साकेत पुरी के वणिग्जन अपनी भेंटें लेकर जो अनेक प्रकार की थी जहाँ-तहाँ पर राजा का सम्मान कर रहे थे । इस रीति से राजा धीरे-धीरे अपने पुर की ओर गये थे ।१८। उस नृप ने सभा मण्डलों से मण्डित अपने सुरम्य गृह में प्रवेश किया था ओर वहाँ पर अपने सुहृदों का तथा ब्राह्मणों का भली भाँति सत्कार-समादर किया था ।१९। वहाँ पर अनेक देशों के नृप उस समय में विद्यमान थे और उनके द्वारा राजा का पूर्ण सेवा-सम्मान किया गया था । वह राजाशार्दूल अपनी सभी में दूसरे इन्द्र के ही समान रमण किया करता था ।२०। इस प्रकार से सुहृदों के सहित नृप नरोत्तम सगर ने मनोरथ को पूर्ण किया था और वह अपनी दोनों भार्याओं के साथ रमण किया करता था ।२१।

अंशुमन्तं ततः पौत्रं मुदा विनयशालिनम् । वसिष्ठानुमते राजा यौवराज्येऽभ्यषेचयत् ॥२२ पौरजानपदानां तु बंधूनां सुहृदामपि ।

५० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

स प्रियोऽभवदत्यर्थमुदारैश्च गुणैर्नृपः ॥२३ प्रजास्तमन्वरज्यंत बालमप्यमितौजसम् । नवं च शुक्लपक्षादौ शीतांशुमचिरोदितम् ॥२४ स तेन सहितः श्रीमान्सुहृद्भिश्च नृपोत्तमः । भार्याभ्यामनुरूपाभ्यां रममाणोऽवसच्चिरम् ॥२५ युवैव राजशार्दूलः साक्षाद्धर्म इवापरः । पालयामास वसुधां सशैलवनकाननाम् ॥२६ एवं महानहिमदीधितिवंशमौलिरत्नायामानवपुरुत्तर- कोसलेशः । पूर्णेन्दुवत्सकललोकमनोऽभिरामः सार्द्धं प्रजाभिरखिलाभिरलं जहर्ष ॥२७

इसके अनन्तर राजा सगर ने अपने विनयशील अंशुमान् पौत्र को बसिष्ठ मुनि की अनुमति प्राप्त करने पर यौवराज्य पद पर बड़ी प्रसन्नता से अभिषिक्त कर दिया था ।२२। वह नृप अपने अत्यन्त उदार गुण गणों से पुरवासी जनपद निवासी-बन्धुगण और सुहृदों का भी सबका परम प्रिय हो गया था ।२३। जिस तरह से शुक्ल पक्ष के आदि में अचिरोदित अर्थात् तुरन्त ही उगे हुए चन्द्रमा को जो कि नवीन होता है सभी उसका दर्शन करके परम प्रसन्न हुआ करते हैं ठीक उसी भाँति से वह राजा बालक था और अपरिमित ओज से समन्वित था अतः उसको बहुत प्यार किया करती थी ।२४। वह उत्तम नृप सगर भी श्री से सुसम्पन्न उस नवीन राजा के साथ मित्रों के सहित अपनी अनुरूप दोनों भार्याओं के साथ रमण करता हुआ वहाँ पर निवास किया करता था ।२५। यद्यपि वह राजाशार्दूल युवा ही था किन्तु साक्षात् दूसरे धर्म के ही समान था । उसने पर्वतों और काननों के सहित पृथ्वी का पालन किया था ।२६। इस प्रकार से सूर्यवंश के शिरोमणि रत्न के सदृश वपु वाला महान् उत्तर कोसल का स्वामी राजा अंशुमान पूर्ण चन्द्र के समान सभी लोकों में परम सुन्दर अपनी सब प्रजाओं के साथ परमाधिक प्रसन्न हुआ था ।२७।

गंगा का पृथ्वी पर आगमन ] [ ५१

गंगा का पृथ्वी पर आगमन

जैमिनिरुवाच-
एतत्ते चरितं सर्वं सगरस्य महात्मनः ।
संक्षेपविस्तराभ्यां तु कथितं पापनाशनम् ॥१
खंडोऽयं भारतो नाम दक्षिणोत्तरमायतः ।
नवयोजनसाहस्रं विस्तारपरिमंडलम् ॥२
पुत्रैस्तस्य नरेंद्रस्य मृगयद्भिस्तुरंगमम् ।
योजनानां सहस्रं तु खात्वाष्टौ विनिपातिताः ॥३
सगरस्य सुतैैर्यस्माद्वर्द्धितो मकरालयः ।
ततः प्रभृति लोकेषु सागराख्यामवाप्तवान् ॥४
ब्रह्म पादावधि महीं सतीर्थक्षेत्रकाननाम् ।
अब्धिः संक्रमयोमास परिक्षिप्य निजांभसा ॥५
ततस्तन्निलयाः सर्वे सदेवासुरमानवाः ।
इतस्ततश्च संजाता दुःखेन महतान्विताः ॥६
गोकर्ण नाम विख्यातं क्षेत्रं सर्वसुरार्चितम् ।
सार्द्धयोजनविस्तारं तीरे पश्चिमवारिधेः ॥७

जैमिनि मुनि ने कहा—हमने यह महात्मा सगर का सम्पूर्ण चरित संक्षेप तथा विस्तार से आपके सामने कहकर सुना दिया है जो कि पापों का विनाश कर देने वाला है ।१। यह दक्षिण से उत्तर पर्यन्त भारत खण्ड है । इसके विस्तार का परिमण्डल नौ सहस्र योजन होता है ।२। उस नरेन्द्र के पुत्रों ने उस यज्ञ के अश्व की खोज करते हुए एक सहस्र योजन खोदकर आठ ही विनिपातित किये हैं ।३। क्योंकि सगर के पुत्रों के द्वारा वह समुद्र बढ़ा दिया गया है । तभी से लेकर इसका सागर यह नाम प्राप्त हो गया है ।४। तीर्थों और काननों तथा क्षेत्रों के सहित ब्रह्म पाद की अवधि तक इस मही को समुद्र ने अपने जल से परिक्षिप्त करके संक्रामित कर दिया था ।५। फिर सब निलय-देव-असुर और मानव महान् दुःख से संयुत होते हुए इधर-उधर हो गये थे ।६। पश्चिम समुद्र के तट पर हुए योजन विस्तार वाला गोकर्ण नामक क्षेत्र विख्यात था जो सभी सुरों के द्वारा अर्चित था ।७।

५२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

तत्रासंख्यानि तीर्थानि मुनिदेवालयाश्च वै । वसंति सिद्धसंघाश्च क्षेत्रे तस्मिन्पुरा नृप ॥८ क्षेत्रं तल्लोकविख्यातं सर्वपापहरं शुभम् । तत्तीर्थमब्धेरपतद्भागे दक्षिणपश्चिमे ॥६ यत्र सर्वे तपस्तप्त्वा मुनयः शंसितव्रताः । निर्वाणं परमं प्राप्ताः पुनरावृत्तिवर्जितम् ॥१० तत्क्षेत्रस्य प्रभावेण प्रीत्या भूतगणैः सह । देव्या च सकलैर्देवैर्नित्यं वसति शंकरः ॥११ एनांसि यत्समुद्दिश्य तीर्थयात्रां प्रकुर्वताम् । नृणामाशु प्रणश्यंति प्रवाते शुष्कपर्णवत् ॥१२ तत्क्षेत्रसेवनरतिर्नैव जात्वभिजायते । समीपे वसमानानामपि पुंसां दुरात्मनाम् ॥१३ महता सुकृतेनैव तत्क्षेत्रगमने रतिः । नृणां संजायते राजन्नान्यथा तु कथंचन ॥१४

हे नृप ! पहिले वहां पर उस क्षेत्र में अगणित तीर्थ मुनियों और देवों के आलय और सिद्धों के संघ निवास किया करते थे ।८। वह क्षेत्र लोक में विख्यात था और परम शुभ समस्त पापों के हरण करने वाला था । वह तीर्थ समुद्र के दक्षिण भाग में गिर गया था ।६। जहाँ पर सब मुनिगण तपश्चर्या करके संशित व्रत वाले हुए थे और वे सब निर्वाण पद को प्राप्त हो गये थे जिस पद पर पहुँच कर इस लोक में पुनः आवृत्ति नहीं होती है ।१०। उस क्षेत्र का ऐसा प्रभाव था कि उसी के कारण से भगवान् शङ्कर बड़ी ही प्रीति से अपनी प्रिया देवी-सकल देवगण और भूत गणों के साथ निवास किया करते हैं ।११। इसी का उद्देश्य करके तीर्थ यात्रा करने वाले मनुष्यों के समस्त अघ तेज वायु में शुष्क पुत्रों के ही समान शीघ्र ही विनष्ट हो जाया करते हैं ।१२। जो उसके समीप में ही निवास करने वाले दुरात्मा मनुष्य होते हैं और वहीं पर निवासी हैं उनको कभी भी उस क्षेत्र के सेवन करने की रति नहीं हुआ करती है ।१३। हे राजन् यह एक महान् सुकृत हो तभी उस क्षेत्र के गमन में रति हुआ करती है । यदि कोई महान् पुण्यों का

गंगा का पृथ्वी पर आगमन ] [ ५३

उदय नहीं तो फिर मानवों के हृदय में किसी भी प्रकार से उस क्षेत्र के सेवन करने की रति समुत्पन्न नहीं हुआ करती है ।१४।

निबंधेन तु ये तस्मिन्प्राणिनः स्थिरजंगमाः ।
म्रियंते नृप सद्यस्ते स्वर्गं प्राप्स्यंति शाश्वतम् ॥१५
स्मृत्याऽपि सकलैः पापैर्यस्य मुच्येत मानवः ।
क्षेत्राणामुत्तमं क्षेत्रं सर्वतीर्थनिकेतनम् ॥१६
स्नात्वा चैतेषु तीर्थेषु यजंतश्च सदाशिवम् ।
सिद्धिकामा वसंति स्म मुनयस्तत्र केचन ॥१७
कामक्रोधविनिर्मुक्ता ये तस्मिन्वीतमत्सराः ।
निवसंत्यचिरेणैव तत्सिद्धिं प्राप्नुवंति हि ॥१८
जपहोमरताः शांता नियता ब्रह्मचारिणः ।
वसंति तस्मिन्ये ते हि सिद्धिं प्राप्स्यंत्यभीप्सिताम् ॥१९
दानहोमजपाद्यं वै पितृदेवद्विजार्चनम् ।
अन्यस्मात्कोटिगुणितं भवेत्तस्मिन्फलं नृप ॥२०
अंभोधिसलिले मग्ने तस्मिन् क्षेत्रेऽतिपावने ।
महता तपसा युक्ता मुनयस्तन्निवासिनः ॥२१

हे नृप ! जो स्थावर या जंगम प्राणी निर्बन्ध होने के कारण से वहां पर अपना प्राण परित्याग किया करते हैं वे तुरन्त ही शाश्वत स्वर्ग की प्राप्ति कर लिया करते हैं। यद्यपि स्वर्ग का निवास सावधिक होता है और पुण्य क्षीण हो जाने पर वहां से हटना होता है परन्तु इस क्षेत्र के प्रभाव से सदा ही स्वर्ग निवास होता है ।१५। इसकी ऐसी अद्भुत महिमा है कि यदि इसकी स्मृति भी कोई कर लेवे तो स्मरण मात्र से ही मनुष्य सब पापों से मुक्त हो जाया करता है । यह सभी क्षेत्रों में उत्तम क्षेत्र है और सब तीर्थों का निकेतन है ।१६। कुछ मुनिगण तो इन तीर्थों में स्नान करके सदा ही शिव का यजन करते हुए सिद्धि की कामना वाले यहां पर निवास किया करते थे ।१७। जो मनुष्य काम और क्रोध से रहित होकर मत्सरता को त्याग कर उसमें निवास किया करते हैं वे थोड़े ही समय में सिद्धि को प्राप्त

५४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

कर लिया करते हैं।१८। मन्त्रों के जाप करने तथा हवन करने में जो निरत रहते हुए परम शान्त-नियत तथा ब्रह्मचर्य पालन करने वाले इसमें निवास करते हैं वे भी अभीष्ट सिद्धि को प्राप्त कर लिया करते हैं।१९। हे नृप ! दान-होम-जप और पितृगण तथा देवगण एवं द्विजों का अर्चन आदि सभी धार्मिक कृत्यों का फल इसमें करने से अन्य स्थल से करोड़ों गुना अधिक हुआ करता है ।२०। अति पावन उस क्षेत्र के समुद्र के जल में निमग्न हो जाने पर जो मुनिगण अपने महान् तप से युक्त थे और वहाँ पर निवास किया करते थे वे पर्वत पर चले गये थे ।२१।

सह्यं शिखरिणं श्रेष्ठं निलयार्थं समारुहन् ।
वसन्तस्तत्र ते सर्वे संप्रधार्य परस्परम् ॥२२
महेंद्राद्रौ तपस्यंतं रामं गन्तुं प्रचक्रमुः ।
राजोवाच-
अगस्त्यपीततोयेऽब्धौ परितो राजनंदनैः ॥२३
खात्वाधः पातिते क्षेत्रे सतीर्थश्रमकानने ।
भूभागेषु तथान्येषु पुरग्रामाकरादिषु ॥२४
विनाशितेषु देशेषु समुद्रोपांतवर्त्तिषु ।
किमकार्षुर्मु निश्रेष्ठ जनास्तन्निलयास्ततः ॥२५
तत्रैव चावसन्कृच्छात्प्रस्थितान्यत्र वा ततः ।
कियता चैव कालेन संपूर्णोऽभूदपां निधिः ।
केन वापि प्रकारेण ब्रह्मन्नेतद्वदस्व मे ॥२६
जैमिनिरुवाच-
अनूपेषु प्रदेशेषु नाशितेषु दुरात्मभिः ॥२७
जनास्तन्निलयाः सर्वे संप्रयाता इतस्ततः ।
तत्रैव चावसन्कृच्छात्केचित्क्षेत्रनिवासिनः ॥२८

उन्होंने परम श्रेष्ठ सह्य पर्वत पर निवास के लिए समारोहण किया था। वहाँ पर ही सब निवास करने लगे थे और उन्होंने परस्पर में निश्चय किया था ।२२। महेन्द्र पर्वत पर जो राम तपस्या कर रहे थे वहाँ पर गमन

गंगा का पृथ्वी पर आगमन ] [ ५५

करने का उन्होंने उपक्रम किया था। राजा ने कहा-जब अगस्त्य मुनि ने समुद्र के जल का पान कर लिया था और सभी ओर सगर पुत्रों ने उसका खनन किया था तथा सभी तीर्थ-क्षेत्र और कानन नीचे की ओर गिरा दिये गये थे और अन्य पुरग्राम तथा आकर आदि भू भाग एवं देश विनाborder: नाशित हो गये थे जो भी समुद्र के समीप में विद्यमान थे हे मुनिश्रेष्ठ ! वहाँ पर पतरों वाले मनुष्यों ने फिर क्या किया था ? ।२३-२५। वे सब वहीं पर बस गये थे अथवा बड़ी कठिनाई से कहीं अन्य स्थलों में प्रस्थान कर गये थे ? फिर कितने समय में यह समुद्र परिपूर्ण हो गया था ? हे ब्रह्मन् ! यह किस प्रकार से सब हुआ था-यह आप अब कृपया मुझे बतलाइये ।२६। जैमिनि मुनि ने कहा--जब दुरात्माओं के द्वारा सभी अनूप प्रदेश नष्ट कर दिये गये थे तब वहाँ पर रहने वाले सभी जन इधर-उधर प्रयाण कर गये थे। कुछ क्षेत्र के निवासी बड़ी कठिनाई से वहीं पर निवास करने लगे थे ।२७-२८।

एतस्मिन्नेव काले तु राजन्नंशुमतः सुतः ।
बभूव भुवि धर्मात्मा दिलीप इति विश्रुतः ॥२९
राज्येऽभिषिच्य तं सम्यग्भुक्तभोगोऽशुमान्नृपः ।
वनं जगाम मेधावी तपसे धृतमानसः ॥३०
दिलीपस्तु ततः श्रीमानशेषां पृथिवीमिमाम् ।
पालयामास धर्मेण विजित्य सकलानरीन् ॥३१
भगीरथो नाम सुतस्तस्यासील्लोकविश्रुतः ।
सर्वधर्मार्थकुशलः श्रीमानमितविक्रमः ॥३२
राज्येऽभिषिच्य तं राजा दिलीपोऽपि वनं ययौ ।
स चापि पालयन्नुर्वी सम्यग्विहतकंटकाम् ॥३३
मुमुदे विविधैर्भोगैर्दिवि देवपतिर्यथा ।
स शुश्रावात्मनः पूर्वं पूर्वजानां महीपतिः ॥३४
निरये पतनं घोरं विप्रकोपसमुद्भवम् ।
ब्रह्मदंडहतान्सर्वान्पितॄञ्छ्रुत्वाऽतिदुःखितः ॥३५

इसी समय में हे राजन् ! अंशुमान का सुत परम धर्मात्मा दिलीप —इस नाम से प्रसिद्ध हुआ था। अर्थात् दिलीप ने भूमि में जन्म ग्रहण

५६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

किया था।२९। समस्त सांसारिक भोगों के उपभोग करने वाले अंशुमान नृप ने राज्यासन पर उस अपने पुत्र को अभिषिक्त करा दिया था और मेधा सम्पन्न वह तपश्चर्या करने का संकल्प मन में करके वन में चला गया था।३०। फिर श्री सम्पन्न राजा दिलीप ने समस्त शत्रुओं को परास्त करके इस सम्पूर्ण भूमि का परिपालन धर्म पूर्वक किया था।३१। इस दिलीप का पुत्र भगीरथ हुआ था। जो लोक में परम प्रख्यात था सभी धर्म-अर्थ में महाकुशल और श्रीमान् अपरिमित बल-विक्रम से समन्वित था।३२। वह दिलीप भी अवसर आने पर राज्यासन पर भगीरथ का अभिषेक कराकर वन में गमन कर गया था। उस भागीरथ ने भी भूमि का परिपालन अच्छी तरह से किया था और उसने भूमि के सभी कण्टकों को हत कर दिया था।३३। स्वर्गलोक में देवाधीश्वर की ही भाँति नाना प्रकार भोगों का उपभोग करके परम प्रसन्न हुआ था। उस राजा ने पहिले अपने पूर्वजों की जो दशा हुई थी उसका पूरा वृत्तान्त सुन लिया था।३४। विप्र के कोप से महान घोर नरक में पूर्वजों का पतन हुआ है और उसके सभी पितृगण ब्रह्मदण्ड से मारे गये हैं—यह सब सुनकर उसको बहुत अधिक दुःख हुआ था।३५।

राज्ये बंधुषु भोगे वा निर्वेदं परमं ययौ ।
स मंत्रि वरे राज्यं विन्यस्य तपसे वनम् ॥३६

प्रययौ स्वपितॄन्नाकं निनीषुर्नृपसत्तमः ।
तपसा महता पूर्वमायुषे कमलोद्भवम् ॥३७

आराध्य तस्माल्लेभे च यावदायूर्निजेप्सितम् ।
ततो गंगां महाराज समाराध्य प्रसाद्य च ॥३८

वरमागमनं वव्रे दिवस्तस्वा महीं प्रति ।
ततस्तां शिरसा धत्तुं तपसाऽऽराध्यच्छिवम् ॥३९

स चापि तद्वरं तस्मै प्रददौ भक्तवत्सलः ।
मेरोर्मूर्ध्नस्ततो गंगां पतंती शिरसात्मनः ॥४०

सग्राहनक्रमकरां जग्राह जगतां पतिः ।
सा तच्छिरः समासाद्य महावेगप्रवाहिनी ॥४१

गंगा का पृथ्वी पर आगमन ] [ ५७

तज्जटामंडले शुभ्रे विलिल्ये साऽतिगह्वरे ।
चुलकोदकवच्छंभोर्विलीनां शिरसि प्रभोः ॥४२

फिर तो राजा भगीरथ को उस विशाल अपने राज्य में—बन्धु-बान्धवों में तथा सुखोपभोगों में परम वैराग्य उत्पन्न हो गया था अर्थात् उसे कुछ भी नहीं सुहाता था और सबको उसने निस्सार ही समझ लिया था। उसने फिर अपने एक परमश्रेष्ठ मन्त्री को राज्य शासन का भार सौंप दिया था और तप करने के लिए वन में चला गया था। ३६। उसकी उत्कट इच्छा यही थी कि वह श्रेष्ठ नृप अपने पितरों को नरक की घोर यातना से मुक्त कर स्वर्ग वासी बना देवे। सर्वप्रथम उसने महान तप के द्वारा आयु के द्वारा आयु के लिए ब्रह्माजी की समाराधना की थी। ३७। उनकी आराधना से भगीरथ ने अपनी अभीष्ट आयु प्राप्त करली थी। फिर हे महाराज ! गङ्गा की आराधना की थी और गङ्गा को अपने ऊपर प्रसन्न कर लिया था। ३८। भगीरथने स्वर्ग से गङ्गा का भूमि पर समागमन करने का वरदान प्राप्त किया था। फिर उस स्वर्ग से समापतन करने वाली गंगा की विशाल धारा को अपने शिर पर धारण करने की कृपा करें—इसलिए शिव की आराधना तप द्वारा की थी। क्योंकि अन्य किसी की भी ऐसी शक्ति नहीं थी जो गंगा के वेग को सह सके। ३९। शिव भी भक्तों पर कृपा करने वाले हैं। उन्होंने भी यह वरदान दे दिया था। मेरु पर्वत की शिखर से समापतन करती हुई गंगा देवी को अपने शिर पर जगतों के स्वामी ने ग्रहण किया था जिसमें बड़े-बड़े ग्रह-नक्र और मकर आदि सभी जल के जीव विद्यमान थे। वह गंगा उनके शिर पर सम्प्राप्त हुई थी जिसमें महान् प्रवाह का वेग विद्यमान था। ४०-४१। किन्तु वह गंगा अति गहन परम शुभ शिव के जटा-जूटों का मण्डल था उसमें ही विलीन हो गयी थी। प्रभु शम्भु के शिर में वह ऐसे ही विलीन हो गयी थी जैसे एक चुल्लू जल विहीन हो जाया करता है। ४२।

विलोक्य तत्प्रमोक्षाय पुनराराधयद्धरम् ।
स तां शर्वप्रसादेन लब्ध्वा तु भुवमागताम् ॥४३
आनिन्ये सागरा दग्धा यत्र तां वै दिशं प्रति ।
सऽनुव्रजंती राजानं राजर्षेर्यजतः पथि ॥
तद्यज्ञवाटमखिलं प्लावयामास सर्वतः ।

५८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

स तु राजऋषिः संक्रुद्धो यज्ञवाटेऽखिले तथा ।।४५
मग्ने गंडूषजलवत्स पपौ तामशेषतः ।
मग्ने गंडूषजलवत्स षपौ तामशेषतः ।
अतंद्रितो वर्षशतं शुश्रूषित्वा स तं पुनः ।।४६
तस्मात्प्रसन्नान्नृपतिर्लेभे गंगां महात्मनः ।
उषित्वा सुचिरं तस्य निसृता जठराच्चतः ।।४७
प्रथितं जाह्नवीत्यस्यास्ततो नामाभवद्भुवि ।
भगीरथानुगा भूत्वा तत्पितॄणामशेषतः ।।४८
निजांभसाऽस्थिभस्मानि सिषेच सुरनिम्नगा ।
ततस्तदंभसा सिक्तेष्वस्थिभस्मसु तत्क्षणात् ।।४६

राजा भगीरथ ने जब ऐसा देखा तो उस गङ्गा देवी के प्रमोक्षण के लिये पुनः भगवान् शङ्कर की आराधना की थी। फिर भगवान् शिव के प्रसाद से राजा भगीरथ ने गङ्गा को भूमि पर लाने का कार्य सम्पन्न किया था।४३। राजा भगीरथ उस गङ्गा को उसी दिशा की ओर लाये थे जहाँ पर सगर सुत दग्ध हुए थे । वह गंगा राजा भगीरथ के पीछे ही अनुगमन कर रही थी कि उसके मार्ग में एक राजर्षि यज्ञ का यजन कर रहे थे।४४। गंगा देवी ने उसके यज्ञ स्थल को सभी ओर से पूर्णतया प्लावित कर दिया वह राजर्षि बहुत ही अधिक क्रुद्ध हो गया था जबकि गंगा के द्वारा उसका सब यज्ञ वाट निमग्न हो गया था। उस राजर्षि ने एक कुल्ली के ही समान उस सम्पूर्ण गंगा का पान कर लिया था। फिर बहुत ही सावधान होकर भगीरथ ने सौ वर्षों तक उस राजर्षि की शुश्रूषा की थी ।४५-४६। फिर जब वह राजर्षि प्रसन्न हुए तो भगीरथ ने उन महान् आत्मा वाले से गङ्गा की प्राप्ति की थी। बहुत समय पर्यन्त निवास करके फिर उनके जटा से गंगा निकली थी। इसीलिए सभी से जह्नु के उदर से निकलने से ही उनका भूमण्डल में जाह्नवी—यह नाम प्रख्यात हो गया था। फिर भागीरथ के पीछे अनुगमन करने वाली होकर उसके समस्त पितरों का उसने उद्धार कर दिया था ।४७-४८। फिर सुर नदी ने अपने परम पुनीत जल से सगर सुतों की अस्थियों और भस्म का सेवन किया था। गंगा जल के सेचन होने पर जो उनकी अस्थियाँ और भस्म पर हुआ था उसी क्षण में उन सबका उद्धार हो गया था ।४६।

गंगा का पृथ्वी पर आगमन ] [ ५६

निर्यातात्सागराः सर्वे नष्टपापा दिवं ययुः ।
एवं सा सागरान्सर्वान्दिवं नीत्वा महानदी ॥५०
तेनैव मार्गेण जवात्प्रयाता पूर्वसागरम् ।
मेरोर्मूध्नँश्चतुर्भेदा भूत्वा याता चतुर्दिशम् ॥५१
चतुर्भेदतया चाभूत्तस्या नाम्नां चतुष्टयम् ।
सीता चालकनंदा च सुचक्षुर्भद्रवत्यपि ॥५२
अगस्त्यपीतसलिलाच्चिरं शुष्कोदका अपि ।
गंगांभसा पुनः पूर्णाश्चत्वारोऽम्बुधयोऽभवन् ॥५३
पूर्यमाणे समुद्रे तु सागरैः परिवर्द्धिते ।
अंतर्हिताऽभवन्देशा बहवस्तत्समीपगाः ॥५४
समुद्रोपांतवर्त्तीनि क्षेत्राणि च समंततः ।
इतस्ततः प्रयाताश्च जनास्तन्निलया नृप ॥५५
गोकर्णमिति च क्षेत्रं पूर्वं प्रोक्तं तु यत्तव ।
अर्णवोपात्तवर्त्तित्वात्समुद्रैंस्तद्विभागमत् ॥५६
ततस्तन्निलयाः सर्वे तदुद्धाराभिकांक्षिणः ।
सह्याद्रेर्भृगुशार्दूलं द्रष्टुकामा ययुर्नृप ॥५७

नरकों में जो घोर यातना पा रहे थे वे सभी सगर के पुत्र समस्त पापों के नष्ट होने से नरक से उसी क्षण में स्वर्ग लोक में चले गये थे। इस रीति से उस महा नदी ने सब सगर सुतों को स्वर्ग में पहुँचा कर फिर वहन करने लगी थी ।५०। उसी मार्ग से बड़े वेग से उसने पूर्व सागर की ओर प्रयाण किया था। मेरु पर्वत के मस्तक से चार भेद होकर वह चारों दिशाओं में गमन कर गयी थी ।५१। उसके चार भेद होने से उसके नाम भी चार हो गये थे। वे नाम में हैं—सीता—अलक नन्दा— सुचक्षु और भद्रवती ये चार नाम हुए हैं ।५२। अगस्त्य मुनि के द्वारा जल पीये जाने पर बहुत समय तक जल के शुष्क ही जाने वाले चारों समुद्र भी गंगा के जल से पुनः परिपूर्ण जल वाले हो गये थे ।५३। समुद्र के पूरित होने पर और सगर सुतों के द्वारा परिवर्द्धित हो जाने पर उसके समीप में स्थित बहुत से

६० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

देश थे वे सब लुप्त हो गये थे अर्थात् समुद्र में लीन हो गये थे ।५४। समुद्र के समीप में रहने वाले समस्त क्षेत्र सभी ओर से निमग्न हो गये थे और हे नृप ! वहाँ पर जो भी जन निवास करते थे वे सभी इधर-उधर चले गये थे ।५५। गोकर्ण नाम वाला क्षेत्र है जिसके विषय में पूर्व में ही आपसे कहा गया था। वह समुद्र के ही समीप में विद्यमान होने से समुद्र के ही अन्दर में छिप गया था ।५६। इसके अनन्तर उसके विनाश करने वाले सब उसके उद्धार की आकाङ्क्षा वाले थे और सह्य अद्रि पर भृगुशार्दूल की देखने की इच्छा वाले हे नृप ! वे सब वहाँ गये थे ।५७।


गान्धर्व मूर्छना लक्षण

सूत उवाच-
विसर्गं मनुपुत्राणां विस्तरेण निबोधत ।
पृषध्रो हिंसयित्वा तु गुरोर्गां निशि तत्क्षये ॥१
शापाच्छूद्रत्वमापन्नश्च्यवनस्य महात्मनः ।
करूषस्य तु कारूषाः क्षत्रिया युद्धदुर्मदाः ॥२
सहस्रं क्षत्रियगणो विक्रान्तः संबभूव ह ।
नाभागो दिष्टपुत्रस्तु विद्वानासीद्द्वालंदनः ॥३
भलंदनस्य पुत्रोऽभूत्प्रांशुर्नाममहाबलः ।
प्रांशोरेकोऽभवत्पुत्रः प्रजापतिसमो नृपः ॥४
संवर्तेन दिवं नीतः समुहृत्सहबांधवः ।
विवादोऽत्र महानासीत्संवर्त्तस्य वृहस्पतेः ॥५
ऋद्धिं दृष्ट्वा तु यज्ञस्य क्रुद्धस्तस्य वृहस्पतिः ।
संवर्त्तेन तते यज्ञे चुकोप स भृशं तदा ॥६
लोकानां स हि नाशाय दैवतैर्हि प्रसादितः ।
मरुत्तश्चक्रवर्त्ती स नरिष्यंतमवासवान् ॥७

श्री सूतजी ने कहा—अब आप मनु के पुत्रों का विसर्ग विस्तार के साथ समझ लीजिए। पृषध्र रात्रि में गुरुदेव की गौ की हिंसा करके उसके क्षय होने पर महात्मा च्यवन के शाप से शूद्रता को प्राप्त हो गया था। करूष