बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४६६ अभिजित्क्षणयोगोऽयमभीष्टफलसिद्धिदः । पञ्चांगशुद्धिरहिते दिवसेऽपि फलप्रदः ॥६५१॥ यात्राद्योगा विचित्रास्तान् योगान्वक्ष्ये यतस्ततः । फलसिद्धिर्यागलग्नाद्राज्ञां विप्रस्य धिष्ण्यतः ॥६५२॥ मुहूर्तशक्तितोऽन्येषां शकुनैस्तस्करस्य च। केंद्रत्रिकोणे ह्येकेन योगः शुक्रज्ञसूरिणाम् ॥६५३॥ अधियोगो भवेद्द्वाभ्यां त्रिभिर्योगाधियोगकः । योगेऽपि यायिनां क्षेममधियोगे जयो भवेत् ॥६५४॥ योगाधियोगे क्षेमं च विजयोर्थविभूतयः । व्यापारशत्रुमूर्त्तिस्थैश्चन्द्रमन्ददिवाकरैः ॥६५५॥ रणे गतस्य भूपस्य जयलक्ष्मीः प्रमाणिका । शुक्रार्कज्ञाकिभौमेषु लग्नाश्वस्तविशत्रुषु ॥६५६॥ गतस्याग्रे वैरिचमूवह्नौ लाक्षेव लीयते । लग्नस्थे त्रिदशाचार्ये धनायस्थैः परग्रहैः ॥६५७॥ गतस्य राज्ञोऽरिसेना नीयते यममंदिरम् । लग्ने शुक्रे रवौ लाभे चन्द्रे बन्धुस्थिते यदा ॥६५८॥ गतो नृपो रिपूहंति केसरीवेभसंहतिम् । स्वोच्चसंस्थे सिते लग्ने स्वोच्चे चन्द्रे च लाभगे ॥६५९॥ हंति यातोऽरिघटतनां केशवः पूतनामिव । त्रिकोणे केंद्रगाः सौम्याः क्रूरास्त्वायारिगा यदि ॥६६०॥ यस्य यातेरलक्ष्मीस्तमुपैतीवाभिसारिका । जीवार्कचन्द्रा लग्नादिरंध्रगा यदि गच्छतः ॥६६१॥ शुभ फल देता है। इस (अभिजित् मुहूर्त) में पञ्चाङ्ग (तिथि-वारादि) शुभ न हो तो भी यात्रा में वह उत्तम फल देने वाला होता है ॥६५०-६५१॥ यात्रा योग--लग्न और ग्रहों की स्थिति से नाना प्रकार के यात्रा-योग होते हैं। अब उन योगों का वर्णन करता हूँ, क्योंकि राजाओं (क्षत्रियों) को योगबल से ही अभीष्ट सिद्धि प्राप्त होती है। ब्राह्मणों को नक्षत्र- बल से तथा अन्य मनुष्यों को मुहूर्त-बल से इष्टसिद्धि होती है। तस्करों को शकुनबल से अपने अभीष्ट की प्राप्ति होती है। ६५२॥ शुक्र, बुध और बृहस्पति-इन तीन में से कोई भी यदि केन्द्र या त्रिकोण में हो तो योग कहलाता है। यदि उनमें से दो ग्रह केन्द्र या त्रिकोण में हों तो (अधियोग) कहलाता है तथा तथा यदि तीनों लग्न से केन्द्र (१,४,७,१०) या त्रिकोण (५,९) में हों तो योगाधियोग कहलाता है ॥६५३॥ योग में यात्रा करने वालों का कल्याण होता है । अधियोग में यात्रा करने से विजय प्राप्त होती है और योगाधियोग में यात्रा करने वाले को कल्याण, विजय तथा सम्पत्ति का लाभ होता है ॥६५४॥ लग्न से दसवें स्थान में चन्द्रमा, षष्ठ स्थान में शनि और लग्न में सूर्य हों तो इस समय यात्रा करने वाले राजा को विजय तथा शत्रु की सम्पत्ति भी प्राप्त होती है ॥६५५॥ शुक्र, रवि, बुध, शनि और मंगल-ये पाँचों ग्रह क्रम से लग्न चतुर्थ, सप्तम, तृतीय और षष्ठ भाव में हों तो यात्रा करने वाले राजा के सम्मुख आये हुए शत्रुगण आग में पड़ी हुई लाह की तरह नष्ट हो जाते हैं ॥६५६॥ बृहस्पति लग्न में और अन्य ग्रह यदि दूसरे और ग्यारहवें भाव में हों तो इस योग में यात्रा करने वाले राजा के शत्रुओं की सेना यमराज के घर पहुँच जाती है ॥६५७॥ यदि लग्न में शुक्र, ग्यारहवें में रवि और चतुर्थ भाव में चन्द्रमा हो तो इस योग में यात्रा करने वाला राजा अपने शत्रुओं को उसी प्रकार नष्ट कर देता है, जैसे हाथियों के झुंड को सिंह ॥६५८॥ अपने उच्च (मीन) में स्थित शुक्र लग्न में हो अथवा अपने उच्च (वृष) चन्द्रमा लाभ (११) भाव में स्थित हो तो यात्रा करने वाला नरेश अपने शत्रु की सेना को उसी प्रकार नष्ट कर देता है, जैसे भगवान् श्रीकृष्ण ने पूतना को नष्ट किया था ॥६५९॥ यदि यात्रा के समय शुभ ग्रह केन्द्र में या त्रिकोण में हों तो तथा पापग्रह तीसरे, छठे और ग्यारहवें स्थान में हों तो यात्रा करने वाले राजा के शत्रु की लक्ष्मी अभिसारिका के समान उसके समीप आ जाती है ॥६६०॥ गुरु, रवि और चन्द्रमा-ये क्रमशः लग्न, ६ और ८ में हों तो यात्रा करने वाले राजा के सामने दुर्जनों की मैत्री के समान शत्रुओं की सेना नहीं ठहरती है ॥६६१॥ यदि लग्न से ३, ६ ११ में पापग्रह
५०० नारदीयपुराणम् तस्याग्रे खलमैत्रीव न स्थिरा रिपुवाहिनी । त्रिखंडायेषु मन्दारौ बलवंतः शुभा यदि ॥६६२॥ यात्रायां नृपतस्तस्य हस्तस्था शत्रुमेदिनी । स्वोच्चस्थे लग्ने जीवे चंद्रे लाभगते यदि ॥६६३॥ गतो राजा रिपूहंति पिनाकी त्रिपुरं यथा । मस्तकोदयगे शुक्रे लग्नस्थे लाभगे गुरौ ॥६६४॥ गतो राजा रिपूहंति कुमारस्तारकं यथा । जीवे लग्नगते शुक्रे केंद्रे वापि त्रिकोणगे ॥६६५॥ गतो दहत्यरीन्द्राजा कृष्णवर्मा यथा वनम् । लग्नगे ज्ञे शुभे केंद्रे धिष्ण्ये चोबकुले गतः ॥६६६॥ नृपाः शुष्यंत्यरीन् ग्रीष्मे ह्रदिनीं वार्करश्मयः । शुभे त्रिकोणे केंद्रस्थे लाभे चंद्रेऽथवा रवौ ॥६६७॥ शत्रून्हन्ति गतो राजा ह्यंधकारं यथा रविः । स्वक्षेत्रगे शुभे केंद्रे त्रिकोणावगते गतः ॥६६८॥ विनाशयत्यरीन्द्राजा तूलराशिमिवानलः । इंदौ स्वस्थे गुरौ केंद्रे मंत्रः सप्रणवो गतः ॥६६६॥ नृपो हंति रिपून्सर्वान्पापान्पंचाक्षरो यथा । वर्गोत्तमगते शुक्रेऽप्येकस्मिन्नेव लग्नेगे ॥६७०॥ हरिस्मृतिर्यथाघौघान्हंति शत्रून् गतो नृपः । शुभे केंद्रे त्रिकोणस्थे चंद्रे वर्गोत्तमे गतः ॥६७१॥ सगोत्रारोन्नृपान् हंति यथा गोत्रांश्च गोत्रभित् । मित्रभेऽथ गुरौ केंद्रे त्रिकोणस्थेऽथ वा सिते ॥६७२॥ हों और शुभ ग्रह बलवान् होकर अपने उच्चादि स्थान में (स्थित) हों तो शत्रु की भूमि यात्रा करने वाले राजा के हाथ में आ जाती है ॥६६२३॥ अपने उच्च (कर्क) में स्थित बृहस्पति यदि लग्न में हों और चन्द्रमा ११ भाव में स्थित हों तो यात्रा करने वाला नरेश अपने शत्रु को उसी प्रकार नष्ट कर देता है, जैसे त्रिपुरासुर को शंकर ने नष्ट किया था ॥६६३३॥ शीर्षोदय (मिथुन, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक, कुम्भ) राशि में स्थित शुक्र यदि लग्न में हों और गुरु ग्यारहवें स्थान में हों तो यात्रा करने वाला पुरुष तारकासुर को कार्तिकेय के समान अपने शत्रु को नष्ट कर देता है ॥६६४३॥ गुरु लग्न में और शुक्र किसी केन्द्र या त्रिकोण में हों तो यात्री नरेश अपने शत्रुओं को वैसे ही भस्म कर देता है जैसे वन को दावानल ॥६६५३॥ यदि बुध लग्न में और अन्य शुभग्रह किसी केन्द्र में हों तथा नक्षत्र भी अनुकूल हो तो उसमें यात्रा करने वाला राजा अपने शत्रुओं को वैसे ही सोख लेता है, जैसे सूर्य की किरणें ग्रीष्मऋतु में क्षुद्र नदियों को सोख लेती हैं ॥६६६३॥ सम्पूर्ण शुभ ग्रह केन्द्र या त्रिकोण में हों तथा सूर्य या चन्द्रमा ग्यारहवें भाव में स्थित हों तो यात्रा करने वाला नरेश अन्धकार को सूर्य की भांति अपने शत्रु को नष्ट कर देता है ॥६६७३॥ शुभग्रह यदि अपनी राशि में स्थित होकर केन्द्र (१,४,७,१०) त्रिकोण (५,९) तथा आय (११) भाव में हो तो यात्रा करने वाला राजा रूई को अग्नि के समान अपने शत्रुओं को जलाकर भस्म कर देता है ॥६६८३॥ चन्द्रमा दसवें भाव में और वृहस्पति केन्द्र में हों तो उसमें यात्रा करने वाला राजा अपने सम्पूर्ण शत्रुओं को उसी प्रकार नष्ट कर देता है जैसे प्रणव सहित पञ्चाक्षरमंत्र (ओं नमः शिवाय) पाप-समूह का नाश कर देता है ॥६६६३॥ अकेला शुक्र भी यदि वर्गोत्तम नवमांशगत लग्न में स्थित हो तो उसमें भी यात्रा करने से राजा अपने शत्रुओं को उसी प्रकार नष्ट कर देता है, जैसे पापों को श्रीभगवान् का स्मरण ॥६७०३॥ शुभग्रह केन्द्र या त्रिकोण में हों तथा चन्द्रमा यदि वर्गोत्तम नवमांश में हो तो ऐसे समय में यात्रा करने से राजा अपने शत्रुओं को उसी प्रकार सपरिवार नष्ट करता है, जैसे इन्द्र पर्वतों को ॥६७१३॥ बृहस्पति अथवा शुक्र अपने मित्र की राशि में होकर केन्द्र या त्रिकोण में हों तो ऐसे समय में यात्रा करने वाला भूपाल सर्पों को गरुड़ के समान अपने शत्रुओं को अवश्य नष्ट करता है ॥६७२॥ यदि एक भी ग्रह वर्गोत्तम नवमांश में स्थित होकर केन्द्र में हो तो
षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ५०१ शत्रून्हंति गतो राजा भुजंगान् गरुडो यथा । शुभकेन्द्रत्रिकोणस्थे वर्गोत्तमगते गतः ॥६७३॥ विनाशयत्यरीन्द्राजा पापान्भागीरथी यथा । ये नृपा यान्त्यरीञ्जेतुं तेषां योगैर्नृपाह्वयैः ॥६७४॥ उपैति शांतिं कोपाग्निः शत्रुयोषाश्रुबिंदुभिः । बलक्षपक्षदशमीमासीषे विजयाभिधा ॥६७५॥ विजयस्तत्र यांतॄणां संधिर्वा न पराजयः । निमित्तशकुनादिभ्यः प्रधानं हि मनोजयः ॥६७६॥ तस्मान्मनस्विनां यत्नात्फलहेतुर्मनोदयः । उत्सवोपनयोद्वाहप्रतिष्ठाशौचसूतके ॥६७७॥ असमाप्त न कुर्वीत यात्रां मर्त्यो जिजीविषुः । महिषौंदुरयोर्युद्धे कलत्रकलहातवे ॥६७८॥ वस्त्रादेः स्खलिते क्रोधे दुरुक्ते न व्रजेन्नृपः । घृतान्नं तिलपिष्टान्नं मत्स्यान्नं घृतपायसम् ॥६७९॥ प्रागादिक्रमशो भुक्त्वा याति राजा जयत्यरीन् । सज्जिका परमान्नं च कांजिकं च पयो दधि ॥६८०॥ क्षीरं तिलोदनं भुक्त्वा भानुवारादिषु क्रमात् । कुल्माषांश्च तिलान्नं च दधि क्षौद्रं घृतं पयः ॥६८१॥ मृगमांसं च तत्सारं पायसं च खगं मृगम् । शशमांसं च षाष्टिक्यं प्रियंगुकमपूपकम् ॥६८२॥ चित्रांडजफलं कूर्मशवाविद्गोधांश्र्च शास्तकम् । हविष्यं कृशरान्नं च मुद्गान्नं यवपिष्टकम् ॥६८३॥ यात्रा करने वाला नरेश पाप समूह को गंगाजी के समान अपने शत्रुओं को क्षणभर में नष्ट कर देता है ॥६७३१/२॥ जो राजा शत्रुओं को जीतने के लिए उपर्युक्त राजयोगों में यात्रा करता है, उसका कोपानल शत्रुओं की स्त्रियों के अश्रुजल से शान्त होता है ॥६७४१/२॥ आश्विन मास के शुक्लपक्ष की दशमी तिथि विजया कहलाती है। उसमें जो यात्रा करता है, उसे अपने शत्रुओं पर विजय होती है। अथवा शत्रुओं से सन्धि हो जाती है। किसी भी दशा में उसकी पराजय नहीं होती है ॥६७५१/२॥ मनोजय प्रशंसा—यात्रा आदि सभी कार्यों में निमित्त और शकुन आदि (लग्न एवं योग) की अपेक्षा भी मनोजय प्रबल है। इसलिए मनस्वी पुरुषों के लिए यत्नपूर्वक फलसिद्धि में मनोजय ही प्रधान कारण होता है ॥६७६ १/२॥ यात्रा में प्रतिबन्ध—यदि घर में उत्सव, उपनयन, विवाह, प्रतिष्ठा या सूतक उपस्थित हो तो जीवन की इच्छा रखने वालों को बिना उत्सव को समाप्त किये यात्रा नहीं करनी चाहिए ॥६७७१/२॥ यात्रा में अपशकुन—यात्रा के समय यदि परस्पर दो भैंसों या चूहों में लड़ाई हो, स्त्री से कलह हो या स्त्री को मासिक धर्म हुआ हो, वस्त्र आदि शरीर से खिसककर गिर पड़े, किसी पर क्रोध हो जाय या मुख से दुर्वचन कहा गया हो तो उस दशा में राजा को यात्रा नहीं करनी चाहिए ॥६७८१/२॥ दिशा, वार तथा नक्षत्र-दोहद—यदि राजा घृतमिश्रित अन्न खाकर पूर्व दिशा की यात्रा करे, तिलचूर्ण मिलाया हुआ अन्न खाकर दक्षिण दिशा को जाय और घृतमिश्रित खीर खाकर उत्तर दिशा की यात्रा करे तो निश्चय ही शत्रुओं पर विजय प्राप्त करता है। रविवार को सज्जिका (मिसरी और मसाला मिला हुआ दही), सोमवार को खीर मंगलवार को कांजी, बुधवार को दूध, गुरुवार को दही, शुक्रवार को दूध तथा शनिवार को तिल और भात खाकर यात्रा करे तो शत्रुओं को जीत लेता है। अश्विनी में कुल्माष (कुलथी) भरणी में तिल, कृत्तिका में उड़द, रोहिणी में गाय का दही, मृगशिरा में गाय का घी, आर्द्रा में गाय का दूध, अश्लेषा में खीर, मघा में नीलकण्ठ का दर्शन, हस्त में षाष्टिक्य (साठी धान्य) के चावल का भात, चित्रा में प्रियंगु (कंगनी), स्वाती में अपूप (मालपूआ), अनुराधा में फल, उत्तराषाढ में चावल, अभिजित् में हविष्य, श्रवण में कृशरान्न (खिचड़ी), धनिष्ठा में मूंग,
५०२ नारदीयपुराणम् मत्स्यान्नं च विवित्तान्नं दध्यन्नं दत्तभाक्रमात् । भुक्त्वा राजेभाश्वरथनरैर्य्याति जयत्यरीन् ॥६८४॥ हुताशनं तिलैर्हुत्वा पूजयेत दिगीश्वरम् । प्रणम्य देवभूदेवानाशीर्वादैर्नृपो व्रजेत् ॥६८५॥ यद्वर्णवस्त्रगंधाद्यैस्तन्मंत्रेण विधानतः । इंद्रमैरावतारूढं शच्या सह विराजितम् ॥६८६॥ वज्रपाणिं स्वर्णवर्णं दिव्याभरणभूषितम् । सप्तहस्तं सप्तजिह्वं षण्मुखं मेषवाहनम् ॥६८७॥ स्वाहाप्रियं रक्तवर्णं स्रुक्स्रुवायुधधारिणम् । दंडाधुधं लोहिताक्षं यमं महिषवाहनम् ॥६८८॥ श्यामलं सहितं रक्तवर्णैरूध्र्वमुखं शुभम् । खङ्गचर्मधरं नीलं निर्र्ऋति नरवाहनम् ॥६८६॥ ऊर्ध्वकेशं विरूपाक्षं दीर्घग्रीवायुतं विभुम् । नागपाशधरं पीतवर्णं मकरवाहनम् ॥६९०॥ वरुणं कालिकानाथं रत्नाभरणभूषितम् । प्राणिनां प्राणरूपं तं द्विबाहुं दंडपाणिकम् ॥६९१॥ वायुं कृष्णमृगारूढं पूजयेदंजनीपतिम् । अश्वारूढं कुंभपाणिं द्विबाहुं स्वर्णसन्निभम् ॥६९२॥ कुबेरं चित्रलेखेशं यक्षगंधर्वनायकम् । पिनाकिनं वृषारूढं गौरीपतिमनुत्तमम् ॥६९३॥
शतभिषा में जौ का आटा, उत्तरभाद्रपद में खिचड़ी तथा रेवती में दही-भात खाकर राजा यदि हाथी, घोड़े, रथ या पालकी पर बैठकर यात्रा करे तो शत्रुओं पर विजय पाता है और उसका अभीष्ट सिद्ध होता है ॥६७९-६८४॥ यात्रा विधि—प्रज्वलित अग्नि में तिलों से हवन करके जिस दिशा में जाना हो, उस दिशा के स्वामी को उन्हीं के समान रंग वाले वस्त्र, गन्ध तथा पुष्प आदि उपचार अर्पण करके उन दिक्पालों के मन्त्रों द्वारा विधिपूर्वक उनका पूजन करे । फिर अपने इष्टदेव और ब्राह्मणों को प्रणाम करके ब्राह्मणों से आशीर्वाद लेकर राजा को यात्रा करनी चाहिए ॥६८५॥ दिक्पालों के स्वरूप का ध्यान—(१ पूर्व दिशा के स्वामी) देवराज इन्द्र शची देवी के साथ ऐरावत पर आरूढ हो सुशोभित हो रहे हैं। उनके हाथ में वज्र है। उनकी कान्ति सुवर्ण सदृश है तथा वे दिव्य आभूषणों से विभूषित हैं। (२ अग्निकोण के अधीश्वर) अग्निदेव के सात हाथ, सात जिह्वायें और छह मुख हैं। वे भेड़ पर सवार हैं, उनकी कान्ति लाल है, वे स्वाहा देवी के प्रियतम हैं तथा स्रुक्-स्रुवा और नाना प्रकार के आयुध धारण करते हैं। (३ दक्षिण दिशा के स्वामी) यमराज का दण्ड ही अस्त्र है। उनकी आंखें लाल हैं और वे भैंसे पर आरूढ़ हैं। उनके शरीर का रंग कुछ लाली लिये हुए सांवला है। वे ऊपर की ओर मुंह किये हुए हैं तथा शुभस्वरूप हैं। (४ नैर्ऋत्यकोण के अधिपति) निर्ऋति का वर्ण नील है। वे अपने हाथों में ढाल और तलवार धारण किये हुए हैं; मनुष्य ही उनका वाहन है। उनकी आंखें भयंकर तथा केश ऊपर की ओर उठे हुए हैं। वे सामर्थ्य- शाली हैं और उनकी गर्दन बहुत बड़ी है। (५ पश्चिम दिशा के स्वामी) कालिका देवी के प्राणनाथ वरुण की अंगकांति पीली है। वे नाग पाश धारण करते हैं। ग्राह उनका वाहन है और रत्नमय आभूषणों से विभूषित हैं। (६ वायव्य कोण के अधिपति) अञ्जनीपति वायुदेव काले रंग के मृग पर आरूढ़ हैं। वे समस्त प्राणियों के प्राण- स्वरूप हैं। उनकी दो भुजाएं हैं। वे हाथ में कलश धारण करते हैं। उनकी अंग कान्ति सुवर्ण के सदृश है। ७ उत्तर दिशा के स्वामी कुबेर चित्रलेखा देवी के प्राणवल्लभ तथा यक्षों और गन्धर्वों के राजा हैं। (८ ईशानकोण के स्वामी) गौरीपति भगवान् शंकर हाथ में पिनाक लिये वृषभ पर आरूढ़ हैं। वे सबसे श्रेष्ठ देवता हैं। उनकी अंग कान्ति श्वेत है। माथे पर चन्द्रमा का मुकुट सुशोभित है और सर्पमय यज्ञोपवीत धारण करते हैं। (इस प्रकार इन सब दिक्पालों का ध्यान और पूजन करना चाहिए) ॥६८६-६९३॥
षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ५०३ श्वेतवर्णं चन्द्रमौलिं नागयज्ञोपवीतिनम् । अप्रयाणे स्वयं कार्या प्रेष्या भूभुजस्तथा ॥६६४॥ कार्यं निर्गमनं छत्रं ध्वजशस्त्रास्त्रवाहनैः । स्वस्थानान्निर्गमस्थानं दंडानां च शतद्वयम् ॥६६५॥ चत्वारिंशद्द्वादशैव प्रस्थितः स स्वयं गतः । दिनान्येकत्र न वसेत्सप्तषड् वा परो जनः ॥६६६॥ पंचरात्रं च पुरतः पुनर्लग्नांतरे व्रजेत् । अकालजेषु नृपतिविद्युद्गर्जितवृष्टिषु ॥६६७॥ उत्पातेषु त्रिविधेषु सप्तरात्रं तु न व्रजेत् । रत्नाकुडचशिवाकाककपोतानां गिरस्तथा ॥६६८॥ झल्लेभूकूहेमवक्षोरस्वराणां वामतो गतिः । पीतकारभरद्वाजपक्षिणां दक्षिणा गतिः ॥६६९॥ चापं त्यक्त्वा चतुष्पात्तु शुभदा वामतो मताः । कृष्णं त्यक्त्वा प्रयाणे तु कृकलासेन वीक्षितः ॥७००॥ वाराहशशगोधास्तु सर्पाणां कीर्तनं शुभम् । हृतेक्षणं नेष्टमेवव्यत्ययं कपिऋक्षयोः ॥७०१॥ मयूरच्छागनकुलचाषपारावताः शुभाः । दृष्टमात्रेण यात्रायां व्यस्तं सर्वं प्रवेशने ॥७०२॥ यात्रासिद्धिर्भवेद्दृष्टे शवेरोदनवर्जिते । प्रवेशे रोदनयुतः शवः शवप्रदस्तथा ॥७०३॥
प्रस्थानविधि—यदि किसी आवश्यक कार्यवश निश्चित यात्रालग्न में राजा स्वयं न जा सके तो छत्र, ध्वजा, शस्त्र, अस्त्र या वाहन में से किसी एक वस्तु को यात्रा के निर्धारित समय में घर से निकालकर जिस दिशा में जाना हो उसी दिशा की ओर दूर रखा दे । अपने स्थान से निर्गमस्थान (प्रस्थान रखने की जगह) २०० दण्ड (चार हाथ की लग्गी) से दूर होना उचित है । अथवा चालीस या कम से कम बारह दण्ड की दूरी होनी आवश्यक है । राजा स्वयं प्रस्तुत होकर जाय तो किसी एक स्थान में सात दिन न ठहरे । अन्य (राजमन्त्री तथा साधारण) जन भी प्रस्थान करके एक स्थान में छह या पाँच दिन न ठहरे । यदि इससे अधिक ठहरना पड़े तो उसके बाद दूसरा शुभ मुहूर्त और उत्तम लग्न विचार कर यात्रा करनी चाहिए । ॥६६४-६९६॥ असमय में (पौष से चैत्र पर्यन्त) बिजली चमके मेघ की गर्जना हो या वर्षा होने लगे तथा त्रिविध (दिव्य, आन्तरिक्ष और भौम) उत्पात होने लग जाय तो राजा को सात रात तक अन्य स्थानों की यात्रा नहीं करनी चाहिए ॥६६७॥ शकुन—यात्राकाल में रत्ना नामक पक्षी, चूहा, सियारिन, कौवा तथा कबूतर—इनके शब्द वामभाग में सुनायी दें तो शुभ होता है। छछूँदर, पिंगला (उल्लू), पल्ली और गदहा—ये यात्रा के समय वाम भाग में हों तो श्रेष्ठ हैं। कोयल, तोता और भरदूल आदि पक्षी यदि दाहिने भाग में आ जायं तो श्रेष्ठ हैं। काले रंग को छोड़कर अन्य सब रंगों के चौपाये यदि वाम भाग में दीख पड़ें तो श्रेष्ठ हैं तथा यात्रासमय में कृकलास (गिरगिट) का दर्शन शुभ नहीं है ॥६६८-७००॥ यात्राकाल में सूअर, खरगोश, गोधा (गोह) और सर्पों की चर्चा शुभ होती है, किसी भूली हुई वस्तु को खोजने के लिए जाना हो तो इनकी चर्चा अशुभ होती है। वानर और भालुओं की चर्चा का विपरीत फल होता है ॥७०१॥ यात्रा में मोर, बकरा, नेवला, नीलकंठ और कबूतर दीख जायं तो, इनके दर्शनमात्र से शुभ होता है; परन्तु लौटकर अपने नगर में आने या घर में प्रवेश करने के समय ये दर्शन दें तो सब अशुभ होता है। यात्राकाल में रोदन-शब्दरहित कोई शव सामने दीख पड़े तो यात्रा के उद्देश्य की सिद्धि होती है। परन्तु लौटकर घर आने तथा नवीन गृह में प्रवेश करने के समय यदि रोदन-शब्द के साथ शव दिखाई पड़े तो वह घातक होता है ॥७०२-७०३॥
५०४ नारदीयपुराणम् पतितक्लीबजटिलमत्तवांतौषधादिभिः । अभ्यक्तवसास्थिचर्माङ्गारदारुणरोगिभिः ॥७०४॥ गुडकार्पासलवणरिपुप्रश्नतृणोरगैः । वंध्याकुब्जककाषायमुक्तकेशबुभुक्षितैः ॥७०५॥ प्रयाणसमये नग्नैर्दृष्टैः सिद्धिर्न जायते । प्रज्वलाग्निसुतुरगनृपासनपुरांगनाः ॥७०६॥ गंधपुष्पाक्षतच्छत्रचामरांदोलिकं नृपः । भक्ष्येक्षुफलमृत्स्नान्नमध्वाज्यदधिगोमयाः ॥७०७॥ मद्यमांससुधाधौतवस्त्रशंखवृषध्वजाः । पुण्यस्त्रीपुण्यकलशरत्नशृङ्गारगोद्विजाः ॥७०८॥ भेरीमृदंगपटहघंटावीणादिनिःस्वनाः । वेदमंगलघोषाः स्युः यायिनां कार्यसिद्धिदाः ॥७०६॥ आदौ विह्वद्द्शकुनं दृष्ट्वा यायीष्टदेवताम् । स्मृत्वा द्वितीये विप्राणां कृत्वा पूजां निवर्तयेत् ॥७१०॥ सर्वदिक्क्षुतं नेष्टं गोक्षुतं निधनप्रदम् । अफलं यद्बालवृद्धरोगिपैत्तसिकैः कृतम् ॥७११॥ परस्त्री द्विजदेवस्वं तत्स्पृशेद्दिग्गजाश्वकान् । हन्यात्परपुरप्राप्तौ न स्त्रीन्नित्यं निरायुधान् ॥७१२॥ आदौ सौम्यायने कार्य नववास्तुप्रवेशनम् । विधाय पूर्वदिवसे वास्तुपूजाबलिक्रियाम् ॥७१३॥ माघफाल्गुनवैशाखज्येष्ठमासेषु शोभनम् । प्रवेशो मध्यमो ज्ञेयः सौम्यकार्तिकमासयोः ॥७१४॥
अपशकुन—यात्रा के समय पतित, नपुंसक, जटाधारी, पागल, औषध आदि खाकर वमन करने वाला, शरीर में तेल लगाने वाला, वसा, अस्थि, चर्म, अंगार, दीर्घरोगी, गुड़, कपास, नमक, प्रश्न (पूछने या रोकने का शब्द), तृण, गिरगिट, वन्ध्या स्त्री, कुबड़ा, गेरुआ वस्त्रधारी, खुले केश वाला, भूखा तथा नंगा—ये सब सामने उपस्थित हो जायें तो अभीष्ट-सिद्धि नहीं होती है ॥७०४-७०५॥
शुभ शकुन—प्रज्वलित अग्नि, सुन्दर घोड़ा, राजसिंहासन, सुन्दरी स्त्री, चन्दन आदि की सुगंध, फल, अक्षत, छत्र, चामर, डोली या पालकी, राजा, खाद्य पदार्थ, ईख, फल, चिकनी मिट्टी, अन्न, मधु, घृत, दही, गोबर, मद्य, मांस, चूना, धुला हुआ वस्त्र, शंख, श्वेत बैल, ध्वजा, सौभाग्यवती स्त्री, भरा हुआ कलश, रत्न, शृंगार, स्वर्णपात्र या अभिषेकपात्रों गो, ब्राह्मण, नगाड़ा, मृदंग, दुंदुभि, घंटा तथा वीणा आदि वाद्यों के शब्द, वेदमंत्र एवं मंगल गीत आदि के शब्द—ये यात्रा के समय यदि देखने या सुनने में आयें तो यात्रा करने वाले लोगों के सब कार्य सिद्ध करते हैं ॥७०६-७०९॥
अपशकुन-परिहार—यात्रा के समय प्रथम बार अपशकुन हो तो खड़ा होकर इष्टदेव का स्मरण करके फिर चले । दूसरा अपशकुन हो तो ब्राह्मणों की पूजा करके चले । यदि तीसरी बार अपशकुन हो जाय तो यात्रा स्थगित कर देनी चाहिए ॥७१०॥
छींक के फल—यात्रा के समय सभी दिशाओं की छींक निन्दित है। गौ की छींक घातक होती हैं; किन्तु बालक, वृद्ध, रोगी या कफ वाले मनुष्य की छींक निष्फल होती है ॥७११॥
परस्त्रियों का स्पर्श करने वाला तथा ब्राह्मण और देवता के धन का अपहरण करने वाला तथा अपने छोड़े हुए हाथी और घोड़े को बाँध लेने वाला, शत्रु यदि सामने आ जाय तो राजा उसे अवश्य मार डाले; परन्तु स्त्रियों तथा शस्त्रहीन मनुष्यों पर कदापि हाथ न उठाये ॥७१२॥
गृह प्रवेश—नये घर में प्रथम बार प्रवेश करना हो तो उत्तरायण के शुभ मुहूर्त में करे । पहले दिन विधिपूर्वक वास्तु-पूजा और बलि अर्पण करके गृह में प्रवेश करना चाहिए ॥७१३॥ गृह-प्रवेश में विहित मास—माघ,फाल्गुन, वैशाख और ज्येष्ठ—इन चार मासों में गृह प्रवेश श्रेष्ठ होता है । कार्तिक और मार्गशीर्ष मास में मध्यम है ।
षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ५०५
शशौज्यौतेषु वरुणत्वाष्ट्रमित्रस्थिरोडुषु । शुभः प्रवेशो देवेज्यशुक्रयोर्दृश्यमानयोः ॥७१५॥ व्यर्करारवारे तिथिषु रिक्तामावर्जितेषु च । दिवा वा यदि वा रात्रौ प्रवेशो मंगलप्रदः ॥७१६॥ चन्द्रताराबलोपेते पूर्वाह्ने शोभने दिने । स्थिरलग्ने स्थिरांशे च नैधने शुद्धिसंयुते ॥७१७॥ त्रिकोणकेन्द्रसंस्थैश्च सौम्यैस्तृपायारिगैः परैः । लग्नांत्याष्टमषष्ठस्थवर्जितेन हिमांशुना ॥७१८॥ कर्तुर्वा जन्मभे लग्ने ताभ्यामुपचयेऽपि वा । प्रवेशलग्ने स्याद्वृद्धिरन्यथे शोकनिःस्वता ॥७१९॥ दर्शनीयं गृहं रम्यं विविधैर्मंगलस्वनैः । कृत्वाकं वामतो विद्वान्भृंगारं चाग्रतो विशेत् ॥७२०॥ वर्षप्रवेशे शशिनि जलराशिगतेऽपि वा । केंद्रगे वा शुक्लपक्षे चातिवृष्टिः शुभेक्षिते ॥७२१॥ अल्पवृष्टिः पापखण्डे प्रावृट्कालेऽचिराद्भवेत् । चंद्रश्चेद्भार्गवे सर्वमेवं विधुगुणान्विते ॥७२२॥ प्रावृषींदुः सितात्सप्तराशिगः शुभवीक्षितः । मंदात्त्रिकोणसप्तस्थो यदि वा वृद्धिकृद्भवेत् ॥७२३॥ सद्यो वृष्टिकरः शुक्नो यदा बुद्धसमीपगः । तयोर्मध्यगते भानौ भवेद्वृष्टिविनाशनम् ॥७२४॥
विहित नक्षत्र- मृगशिरा, पुष्य, रेवती, शतभिषा, चित्रा, अनुराधा और स्थिर-संज्ञक (तीनों उत्तरा) और रोहिणी नक्षत्रों में बृहस्पति और शुक्र दोनों उदित हों तब रवि और मंगल को छोड़कर अन्य वारों में रिक्ता (४, ९, १४) तथा अमावास्या को छोड़कर अन्य तिथियों में दिन या रात्रिके समय गृहप्रवेश शुभप्रद होता है। चन्द्रबल और ताराबल सहित उपद्रवरहित दिन के पूर्वाह्न भाग में स्थिर राशि के नवमांशयुक्त स्थिर लग्न में जब लग्न से अष्टम स्थान शुद्ध (ग्रहरहित) हों, शुभग्रह त्रिकोण या केन्द्र में हों, पापग्रह ३, ६, ११ भावों में हों और चन्द्रमा लग्न, १२, ८, ६ से भिन्न स्थानों में हो, तब गृहप्रवेश करने वाले यजमान की जन्मराशि, जन्मलग्न या इन दोनों से उपचय (३, ६, १०, ११वीं) राशि के गृहप्रवेश लग्न में विद्यमान होने पर सब प्रकार के सुख और सम्पत्ति की वृद्धि होती है। अन्यथा इससे विपरीत समय में गृहप्रवेश किया जाय तो शोक और निर्धनता प्राप्त होती है ॥७१४-७१९॥
प्रवेश-विधि- जिस नूतन गृह में प्रवेश करना हो उसको चित्र आदि से सजाकर तथा पुष्प, तोरण आदि से अलंकृत करके वेदध्वनि, शान्तिपाठ, सौभाग्यवती स्त्रियों के मांगलिक गीत तथा वाद्य आदि के शब्दों के साथ सूर्य को वाम भाग में रखकर जल से भरे हुए कलश को आगे करके उसमें प्रवेश करना चाहिए ॥७२०॥
वृष्टि-विचार- वर्षा-प्रवेश (आर्द्रा नक्षत्र में सूर्य के प्रवेश) के समय यदि शुक्लपक्ष हो, चन्द्रमा जलचर राशि में या लग्न से केन्द्र (१, ४, ७, १०) में स्थित होकर शुभग्रह से देखे जाते हों तो अधिक वृष्टि होती है। यदि उस समय चन्द्रमा पर पापग्रह की दृष्टि हो तो दीर्घकाल में अल्पवृष्टि समझनी चाहिए। (यदि चन्द्रमा पर पाप और शुभ दोनों ग्रहों की दृष्टि हो तो मध्यम वृष्टि होती है, जिस प्रकार चन्द्रमा से फल कहा गया है, उसी प्रकार उस समय शुक्र से भी समझना चाहिए। (अर्थात् सूर्य के आर्द्रा-प्रवेश के समय चन्द्रमा और शुक्र दोनों की स्थिति देखकर तारतम्य से फल समझना चाहिए ॥७२१-७२२॥
वर्षाकाल में आर्द्रा से स्वाती तक सूर्य के रहने पर चन्द्रमा यदि शुक्र से सप्तम स्थान में अथवा शनि से पञ्चम, नवम तथा सप्तम स्थान में हो, उस पर शुभ ग्रह की दृष्टि पड़े तो उस समय अवश्य वर्षा होती है ॥७२३॥
यदि बुध और शुक्र समीपवर्ती (एक राशि में स्थित) हों तो तत्काल वर्षा होती है। किन्तु उन दोनों (बुध और शुक्र) के बीच में सूर्य हो तो वृष्टि का अभाव होता है ॥७२४॥ ६४ ना० पृ०
५०६ नारदीयपुराणम् मघादिपंचधिष्ण्यस्थःपूर्वे स्वातित्रये परे । प्रवर्षणं भृगुः कुर्याद्विपरीते न वर्षणम् ॥७२५॥ पुरतः पृष्ठतो भानोर्ग्रहा यदि समीपगाः । तदावृष्टिं प्रकुर्वन्ति न ते चेत्प्रतिलोमगाः ॥७२६॥ वामभागस्थितः शुक्नो वृष्टिकृच्चेत्तु याम्यगः । उदयास्तेषु वृष्टिः स्याद्भानोरार्द्राप्रवेशने ॥७२७॥ संध्ययोः सस्यवृद्धिः स्यात्सर्वसंपन्नृणान्निशि । स्तोकवृष्टिरनर्घः स्याद्वृष्टिः सस्यसंपदः ॥७२८॥ आर्द्रोदयेग्रभिन्ना चेद्मवेदिति न संशयः । चन्द्रेज्ये ज्ञेय वा शुक्रे केन्द्रेन्वीतिर्विनश्यति ॥७२६॥ पूर्वाषाढां गतो भानुर्जीमूतैः परिवेष्टितः । वर्षत्यार्द्रोदिमूलांतं प्रत्यक्षं प्रत्यहं तथा ॥७३०॥ वृष्टिश्चेत्पौष्णभे तस्माद्दशर्वेषु न वर्षति । सिंहे भिन्ने कुजो वृष्टिरभिन्ने कर्कटे तथा ॥७३१॥ कन्योदये प्रभिन्ने चेत्सर्वदा वृष्टिरुत्तमा । अहिर्बुध्न्यं पूर्वशस्यं परशस्या च रेवती ॥७३२॥ भरणी सर्वसस्या च सर्वनाशाय चाश्विनी । गुरोः सप्तमराशिस्थः प्रत्यग्गो भृगुजो यदा ॥७३३॥ तदातिवर्षणं भूरि प्रावृट्काले बलोज्झिते । आसप्तमक्षं शशिनः परिवेषगतोत्तरा ॥७३४॥ विद्युत्प्रपूर्णमंडूकास्वनावृष्टिर्भवेत्तदा । यदा प्रत्यङ्नता मेघाः खसप्तोपरि संस्थिताः ॥७३५॥ पतंति दक्षिणस्था ये भवेद्वृष्टिस्तदाचिरात् । नखैल्लिखन्तोमार्जाराइचावनिं लोहसंयुते ॥७३६॥ यदि मघा आदि पाँच नक्षत्रों में शुक्र पूर्व दिशा में उदित हों और स्वाती तीन नक्षत्रों (स्वाती, विशाखा, अनुराधा) में शुक्र पश्चिम दिशा में उदित हो तो निश्चय ही वर्षा होती है, इससे विपरीत हो तो वर्षा नहीं समझनी चाहिए ॥७२५॥ यदि सूर्य के समीप (एक राशि के भीतर होकर) कोई ग्रह आगे या पीछे पड़ते हों तो वे वर्षा अवश्य करते हैं। यदि उनकी गति वक्र न हुई हो ॥७२६॥ सूर्य के वाम भाग में शुक्र हो तो वृष्टिकारक होता है। आर्द्रा में प्रवेश के समय शुक्र दक्षिण में हो तो उदय और अस्त के समय वर्षा होती है। यदि सूर्य का आर्द्रा-प्रवेश सन्ध्या के समय हो तो सस्य (धान्य) की वृद्धि होती है। यदि रात्रि में हो तो मनुष्यों को सब प्रकार की सम्पत्ति प्राप्त होती है। यदि प्रवेश काल में चन्द्रमा, गुरु, बुध एवं शुक्र से आर्द्रा भेदित हो तो क्रमशः अल्पवृष्टि, धान्यहानि, अनावृष्टि और धान्यवृष्टि होती है; इसमें संशय नहीं है। यदि ये चारों चन्द्र, बुध, गुरु और शुक्र प्रवेश-लग्न से केन्द्र में पड़ते हों तो ईति (खेती के टिड्डी आदि सब उपद्रव) का नाश होता है ॥७२७-७२९॥ यदि सूर्य पूर्वाषाढ़ नक्षत्र में प्रवेश के समय मेघों से आच्छन्न हो तो आर्द्रा से मूल तक प्रतिदिन वर्षा होती हैं। सिंह-प्रवेश में लग्न यदि मंगल से भिन्न (भेदित) हो, कर्क-प्रवेश में अभिन्न हो एव कन्या प्रवेश में भिन्न हो तो उत्तम वृष्टि होती है ॥७३०-७३१३॥ उत्तर भाद्रपद पूर्वधान्य, रेवती परधान्य तथा भरणी सर्वधान्य नक्षत्र है । अश्विनी को सर्वधान्यों का नाशक नक्षत्र कहा गया है। वर्षा काल (चातुर्मास्य) में पश्चिम उदित हुए शुक्र यदि गुरु से सप्तम राशि में निर्बल हो तो आर्द्रा से सात नक्षत्र तक प्रतिदिन अतिवृष्टि होती है। चन्द्रमण्डल में परिवेष (घेरा) हो और उत्तर दिशा में बिजली दीख पड़े या मेढ़कों के शब्द सुनाई पड़े तो निश्चय ही वर्षा होती है। पश्चिम भाग में लटका हुआ मेघ यदि आकाश के बीच में होकर दक्षिण दिशा में जाय तो शीघ्र वर्षा होती है। बिलाव अपने नाखूनों से धरती को खोदे, लोहे (तथा तांबे और काँसे आदि) में मल जमने लगे अथवा बहुत से बालक मिलकर सड़कों पर पुल बाँधे तो ये वर्षा के सूचक चिह्न हैं ॥७३२-७३६३॥
षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ५०७
रथ्यायां सेतुबंधाः स्युर्बालानां वृष्टिहेतवः । पिपीलिकाश्रेणयश्छिन्नाः खद्योता बहवस्तदा ॥७३७॥ द्रुमादिरोहःसर्पाणां प्रीतिर्दुर्विष्टिसूचकाः । उदयास्तमये काले विवर्णोऽर्कोथ वा शशी ॥७३८॥ मधुवर्णोऽतिवायुश्चेदतिवृष्टिर्भवेत्तदा । प्राङ्मुखस्य तु कूर्मस्य नवांगेषु धरामिमाम् ॥७३८½॥ विमज्य नवधा खण्डे मंडलानि प्रदक्षिणम् । अन्तर्वेदाश्च पांचालस्तस्येदं नाभिमण्डलम् ॥७४०॥ प्राच्यामागधलाटोत्था देशास्तन्मुखमंडलम् । स्त्रीकौलिंगकिराताख्या देशास्तद्द्बाहुमंडलम् ॥७४१॥ अवंती द्रविडा भिल्ला देशास्तत्पार्श्वमण्डलम् । गौडकौंकणशाल्वांध्रपौंड्रस्तत्पादमण्डलम् ॥७४२॥ सिंधुकाशिमहाराह्रूसौराष्ट्राः पुच्छमण्डलम् । पुलिंदचीनयवनगुर्जराः पादमंडलम् ॥७४३॥ कुरुकाश्मीरमाद्रेयमत्स्यास्तत्पार्श्वमण्डलम् । खसांगवंगवाहीकं कांबोजाः पाणिमंडलम् ॥७४४॥ कृत्तिकादीनि धिष्ण्यानि त्रीणि त्रीणि क्रमान्न्यसेत् । नाभ्यादिषु नवांगेषु पापैर्दुष्टं शुभैः शुभम् ॥७४५॥ देवता यत्र नृत्यंति पतंति प्रज्वलंति च । मुहु रुदंति गायंति प्रस्विद्यंति हसंति च ॥७४६॥ वमंत्यग्नि तथा धूमं स्नेहं रक्तं पयो जलम् । अधोमुखाधितिष्ठंति स्थानात्स्थानं व्रजंति च ॥७४७॥ एवमाद्या हि दृश्यंते विकाराः प्रतिमासु च । गंधर्वनगरं चैव दिवा नक्षत्रदर्शनम् ॥७४८॥
चींटी की पंक्ति छिन्न-भिन्न हो जाय, आकाश में बहुतेरे जुगुनू दीख पड़ें तथा सर्पों का वृक्ष पर चढ़ना और प्रसन्न होना देखा जाय तो ये सब दुवृष्टिसूचक हैं । उदय या अस्त समय में यदि सूर्य या चन्द्रमा का रंग बदला हुआ जान पड़े या उनकी कान्ति मधु के समान दीख पड़े तथा बड़े जोर की हवा चलने लगे तो अतिवृष्टि होती है ॥ ७३७-७३८½ ॥ पृथ्वी के आधार कूर्म के अंग-विभाग--कूर्म देवता पूर्व की ओर मुख करके स्थित हैं, उनके नव अंगों में इस भारत भूमि के नौ विभाग करके प्रत्येक खंड में प्रदक्षिण-क्रम से विभिन्न मंडलों (देशों) को समझे। अन्त- र्वेदी (मध्य विभाग) में पाञ्चालदेश स्थित है, वहाँ कूर्म भगवान् का नाभिमण्डल है। मगध और लाटदेश पूर्व दिशा में विद्यमान हैं, वे ही उनका मुखमण्डल हैं। स्त्री, कलिंग और किरात देश भुजा हैं। अवन्ती, द्राविड़ और भिल्ल देश उनका दाहिना पार्श्व हैं। गौड, कोंकण, शाल्व, आन्ध्र और पौण्ड्र ये सब देश दोनों अगले पैर हैं। सिन्ध, काशी, महाराष्ट्र तथा सौराष्ट्रदेश पुच्छभाग हैं। पुलिन्द, चीन, यवन और गुर्जर ये सब देश दोनों पिछले पैर हैं। कुरु, काश्मीर, मद्र तथा मत्स्यदेश वाम पार्श्व हैं। खस (नेपाल), अंग, वंग, बाह्लीक और काम्बोज-ये दोनों हाथ हैं ॥७३९-७४४॥ इन नवों अंगों में क्रमशः कृत्तिका आदि तीन-तीन नक्षत्रों का न्यास करे । जिस अंग के नक्षत्र में पापग्रह रहते हैं, उस अंग के देशों में तब तक अशुभ फल होता है और जिस अंग के नक्षत्रों में शुभग्रह रहते हैं; उस अंग के देशों में शुभ फल होते हैं ॥७४५॥ मूर्ति-प्रतिमा-विकार--देवताओं की प्रतिमा यदि नीचे गिर पड़े, जले, बार-बार रोये, गाये, पसीने से तर हो जाय, हँसे, अग्नि, धुआँ, तेल, शोणित, दूध या जल का वमन करे, अधोमुख हो जाय, एक स्थान से दूसरे स्थान में चली जाय तथा इसी तरह की अनेक अद्भुत बातें दीख पड़ें तो ये प्रतिमा-विकार कहलाते हैं। ये विकार अशुभ फल के सूचक होते हैं ॥७४६-७४७½॥ विविध विकार--यदि आकाश में गन्धर्व-नगर (ग्राम के समान आकार), दिन में ताराओं का दर्शन, उल्कापतन, काष्ठ, तृण और शोणित की वर्षा, गन्धर्वो का दर्शन, दिग्दाह, दिशाओं में धूम्न छा जाना, दिन या
५०८ नारदीयपुराणम् महोल्कापतनं काष्ठतृणरक्तप्रवर्षणम् । गांधर्वं देहदिग्धूमं भूमिकंपं दिवा निशि ॥७४८॥ अनग्नौ च स्फुलिङ्गाश्चज्वलनं च विनेंधनम् । निशीन्द्रचापमंडकं शिखरे श्वेतवायसः ॥७५०॥ दृश्यंते विस्फुलिङ्गाश्च गोगजाश्वोष्ट्रगात्रतः । जंतवो द्वित्रिशिरसो जायते वापि योनिषु ॥७५१॥ प्रातः सूर्याश्चतसृषु ह्यादितायुगपद्रवेः । जम्बूकग्रामसंवासः केतूनां च प्रदर्शनम् ॥७५२॥ काकानामाकुलं रात्रौ कपोतानां दिवा यदि । अकाले पुष्पिता वृक्षा दृश्यंते फलिता यदि ॥७५३॥ कार्यं तच्छेदनं तत्र ततः शांतिर्मनीषिभिः । एवमाद्या महोत्पाता बहवः स्थाननाशदाः ॥७५४॥ केचिन्मृत्युप्रदाः केचिच्छत्रुभ्यश्च भयप्रदाः । मभ्याद्भयं यशो मृत्युः क्षयः कीर्तिः सुखासुखम् ॥७५५॥ ऐश्वर्यं धनहानि च मधुच्छन्नं च वाल्मिकम् । इत्यादिषु च सर्वेषूत्पातेषु द्विजसत्तम ॥७५६॥ शांतिं कुर्यात्प्रयत्नेन कल्पोक्तविधिना शुभम् । इत्येतत्कथितं विप्र ज्यौतिषं ते समासतः ॥७५७॥ अतः परं प्रवक्ष्यामि च्छंदःशास्त्रमनुत्तमम् ॥७५८॥ इति श्रीबृहन्ना० पूर्व० बृहदुपाख्याने द्वितीयपादे षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥५६॥
रात्रि में भूकम्प होना, बिना आग के स्फुलिंग (अंगार) दीखना, बिना लकड़ी के आग का जलना, रात्रि में इन्द्र- धनुष या परिवेष (घेरा) दीखना, पर्वत या वृक्षादि के ऊपर उजला कौआ दिखाई देना तथा आग को चिनगारियों का प्रकट होना आदि बातें दिखाई देने लगें, गो, हाथी और घोड़ों के दो या तीन मस्तक वाला बच्चा पैदा हो । प्रातःकाल एक साथ ही चारों दिशाओं में अरुणोदय-सा प्रतीत हो, गांवों में गीदड़ों का दिन में वास हो, धूम- केतुओं का दर्शन होने लगे ।।७४८-७५२।। तथा रात्रि में कौओं का और दिन में कबूतरों का क्रन्दन हो तो ये भयंकर उत्पात हैं। वृक्षों में बिना समय के फूल या फल दीख पड़े तो उस वृक्ष को काट देना चाहिए । इस प्रकार और भी वृक्ष से बड़े-बड़े उत्पात दृष्टिगोचर होते हैं, वे स्थान (देश या ग्राम) का नाश करने वाले होते हैं। बहुत से उत्पात घातक होते हैं; बहुत से शत्रुओं से भय उपस्थित करते हैं। बहुत उत्पातों से भय, यश, मृत्यु, हानि, कीर्ति, सुख-दुःख और ऐश्वर्य की भी प्राप्ति होती है। यदि वल्मीक (दीमक की मिट्टी के ढेर) पर शहद दीख पड़े तो धन की हानि होती है। द्विजश्रेष्ठ ! इस तरह के सभी उत्पातों में यत्नपूर्वक कल्पोक्त विधि से शान्ति अवश्य करा लेनी चाहिए। नारद ! इस प्रकार संक्षेप से मैंने ज्योतिष शास्त्र का वर्णन किया है। अब वेद के छहों अंगों में श्रेष्ठ छन्दःशास्त्र का परिचय देता हूँ ।।७५३-७५८।। श्री नारदीयपुराण के पूर्व भाग के द्वितीय पाद में छप्पनवां अध्याय समाप्त ॥५६॥
अथ सप्तपञ्चाशत्तमोऽध्यायः सनंदन उवाच वैदिकं लौकिकं चापि छन्दो द्विविधमुच्यते । मात्रावर्णविभेदेन तच्चापि द्विविधं पुनः ॥१॥ मयौ रसौ तजौ भनौ गुरुलघुरपि द्विज । कारणं छंदसि प्रोक्ताश्छन्दःशास्त्रविशारदैः ॥२॥ सर्वगो मगणः प्रोक्तोमुखलो यगणः स्मृतः । मध्यलो रगणश्चैव प्रांत्यगः सगणो मतः ॥३॥ तगणोऽतलघुः ख्यातो मध्यगो जो भआदिगः । त्रिलघुनंगरणः प्रोक्तस्त्रिका वर्णगणा मुने ॥४॥ चतुर्लास्तु गणाः पञ्च प्रोक्त आर्यादिसंमताः । संयोगश्च विसर्गश्चानुस्वारो लघृतः परः ॥५॥ लघोर्दीर्घत्वमाख्याति दीर्घो गो लो लघुर्मतः । पादश्चतुर्थभागः स्याद्विच्छेद्यतिरुरुच्यते ॥६॥ सममर्द्धसमं वृत्तं विषमं चापि नारद । तुल्यलक्षणतः पादचतुष्के सममुच्यते ॥७॥ आदित्रिके द्विचतुर्थे सममर्द्धसमं ततम् । लक्ष्म भिन्नं यस्य पादचतुष्के विषमं हि तत् ॥८॥ एकाक्षरात्समारभ्य वर्णैकैकस्य वृद्धितः । षड्विंशत्यक्षरं यावत्पादस्तावत्पृथक् पृथक् ॥६॥
अध्याय ५७ छन्दः शास्त्र का संक्षिप्त परिचय सनन्दन बोले-नारद ! छन्द दो प्रकार के बताये जाते हैं-वैदिक और लौकिक । मात्रा और वर्ण के भेद से वे लौकिक या वैदिक छन्द भी दो-दो प्रकार के हो जाते हैं (मात्रिक छन्द और वर्णिक छन्द) ॥१॥ छन्द शास्त्र के विद्वानों ने मगण, यगण, रगण, तगण, जगण, भगण और नगण तथा गुरु एवं लघु-इन्हीं को छन्दों की सिद्धि में कारण बताया है ॥२॥ जिसमें सभी अर्थात् तीनों अक्षर गुरु हों उसे मगण (ऽऽऽ) कहा गया है, जिसका आदि अक्षर लघु (और शेष दो अक्षर गुरु) हो, वह यगण (।ऽऽ) माना गया है। जिसका मध्यवर्ती अक्षर लघु हो, वह रगण (ऽ।ऽ) और जिसका अन्तिम अक्षर गुरु हो, वह सगण (।।ऽ) है ॥३॥ जिसमें अन्तिम अक्षर लघु हो, वह तगण (ऽऽ।) कहा गया है। जहाँ मध्य गुरु हो, वह जगण (।ऽ।) और जिसमें आदि गुरु हो, वह भगण (ऽ।।) है । मुने ! जिसमें तीनों अक्षर लघु हों, वह नगण (।।।) कहा गया है। तीन अक्षरों के समुदाय का नाम गण है ॥४॥ आर्या आदि छन्दों में चार मात्रा वाले पाँच गण कहे गये हैं, जो चार लघु वाले गण से युक्त हैं। यदि लघु अक्षर से परे संयोग, विसर्ग और अनुस्वार हो तो वह लघु की दीर्घता का बोधक होता है। इस छन्दः शास्त्र में 'ग' का अर्थ गुरु या दीर्घ माना गया है और 'ल' का अर्थ लघु समझा जाता है। पद्य या श्लोक के एक चौथाई भाग को पाद कहते हैं । विच्छेद या विराम का नाम 'यति' है ॥५-६॥ नारद ! वृत्त (छन्द) के तीन भेद माने गये हैं-समवृत्त, अर्ध समवृत्त तथा विषमवृत्त । जिसके चारों चरणों में समान लक्षण लक्षित होता हो, वह समवृत्त कहलाता है ॥७॥ जिसके प्रथम और तीसरे चरणों में एवं दूसरे तथा चौथे चरणों में समान लक्षण हों, वह अर्धसम वृत्त हैं । जिसके चारों चरणों में एक दूसरे से भिन्न लक्षण लक्षित होते हों, वह विषमवृत्त है ॥८॥ एक अक्षर के पाद से आरम्भ करके एक-एक अक्षर बढ़ाते हुए जब तक छब्बीस अक्षर का पाद पूरा हो तब तक पृथक्-पृथक् छन्द
५१० नारदीयपुराणम् तत्परं चंडवृष्ट्यादिदंडकाः परिकल्पिताः । त्रिभिः षड्भिः पदैर्गाथाः शृणु संज्ञा यथोत्तरम् ॥१०॥ उक्तात्युक्ता तथा मध्या प्रतिष्ठाऽन्या सुपूर्विका । गायत्र्युष्णिगनुष्टुप् च बृहती पंक्तिरेव च ॥११॥ त्रिष्टुप् च जगती चैव तथातिजगती मता । शक्वरो सातिपूर्वा च अष्ट्यत्यष्टी ततः स्मृते ॥१२॥ धृतिश्च विधृतिश्चैव कृतिः प्रकृतिराकृतिः । विकृतिः संकृतिश्चैव तथातिकृतिरुत्कृतिः ॥१३॥ इत्येताश्छन्दसां संज्ञा प्रस्ताराद्भेदभागिकाः । पादे सर्वगुरौ पूर्वल्लघुं स्थाप्य गुरोरधः ॥१४॥ यथोपरि तथा शेषमग्रे प्राग्वन्न्यसेदपि । एष प्रस्तार उदितो यावत्सर्वलघुर्भवेत् ॥१५॥ नष्टांकाद्धे समेलः स्याद्विषमे सैव सोर्द्धगः । उद्दिष्टे द्विगुणानाद्यादंगान्संमील्य लस्थितान् ॥१६॥ कृत्वा सैकान्वदेत्संख्यामिति प्राहुः पुराविदः । वर्णान्सैकान्वृत्तमवानुत्तराधरतः स्थितान् ॥१७॥ एकादिक्रमतश्चैकानुपर्युपरि विन्यसेत् । उपांत्यतो निवर्तेत त्यजन्नेकैकसूर्ध्वतः ॥१८॥ बनते हैं। छब्बीस अक्षर से अधिक का चरण होने पर चण्डवृष्टिप्रपात दण्डक बनते हैं । तीन या छह पादों से गाथा होती है । अब क्रमशः एक से छब्बीस अक्षर तक के पाद वाले छन्दों की संज्ञा सुनो ॥९-१०॥ उक्ता, अत्युक्ता, मध्या, प्रतिष्ठा, सुप्रतिष्ठा, गायत्री, उष्णिक्, अनुष्टुप्, बृहती, पंक्ति, त्रिष्टुप्, जगती, अतिजगती, शक्वरी, अतिशक्करी, अष्टि, अत्यष्टि, धृति, विधृति, (या अतिधृति) कृति, प्रकृति, आकृति, विकृति, संकृति, अतिकृति या अभिकृति तथा उत्कृति ॥११-१३॥ ये छन्दों की संज्ञाये हैं, प्रस्तार से इनके अनेक भेद होते हैं। सम्पूर्ण गुरु अक्षर वाले पाद में प्रथम गुरु के नीचे लघु लिखना, चाहिए, फिर दाहिनी ओर की पंक्ति को ऊपर की पंक्ति के समान भर दे । तात्पर्य यह है कि शेष स्थानों में ऊपर के अनुसार गुरु-लघु आदि भरे। इस क्रिया को बराबर करता जाय । इसे करते हुए ऊन स्थान अर्थात् बायीं ओर शेष स्थान में गुरु ही लिखे। यह क्रिया तब तक करता रहे, जब तक कि सभी लघु अक्षरों की प्राप्ति न हो जाय। इसे प्रस्तार कहा गया है ॥१४-१५॥ (प्रस्तार नष्ट हो जाने पर यदि उसके किसी भेद का स्वरूप जानना हो तो उस जानने की विधि को 'नष्ट प्रत्यय' कहते हैं ।) यदि नष्ट अंक सम है तो उसके लिए एक लघु लिखे ओर उसका आधा भी यदि सम हो तो उसके लिए पुनः एक लघु लिखे। यदि नष्ट अंक विषम हो तो उसके लिए एक गुरु लिखे और उसमें एक जोड़ कर आधा करे। वह आधा भी यदि विषम हो तो उसके लिए भी गुरु ही लिखे। यह क्रिया तब तक करता रहे जब तक अभीष्ट अक्षरों का पाद प्राप्त न हो जाय (प्रस्तार के किसी भेद का स्वरूप तो ज्ञात हो; किन्तु संख्या ज्ञात न हो तो उसके जानने की विधि को 'उद्दिष्ट' कहते हैं ।) उद्दिष्ट में गुरु-लघु-बोधक जो चिह्न हों, उनमें पहले अक्षर पर एक लिखे और क्रमशः दूसरे अक्षरों पर दूने अंक लिखता जाय; फिर लघु के ऊपर जो अंक हों, उन्हें जोड़कर उसमें एक और मिला दे तथा वही उद्दिष्ट स्वरूप की संख्या बताये, ऐसा पौराणिक विद्वानों का कथन है ॥१६३॥ (अमुक छन्द के प्रस्तार में एक गुरु वाले या एक लघु वाले या तीन गुरु वाले भेद कितने हो सकते हैं; यह पृथक्-पृथक् जानने की जो प्रक्रिया है, उसे 'एकद्वयादिलगक्रिया' कहते हैं ।) छन्द के अक्षरों की जो संख्या है, उसमें एक अधिक जोड़कर उतने ही एकांक ऊपर-नीचे के क्रम से लिखे । उन एकांकों को ऊपर की अन्य पंक्ति में जोड़ दे; किन्तु अन्त्य के समीपवर्ती अंक को न जोड़े और ऊपर के एक-एक अंक को त्याग दे । ऊपर के सर्वगुरु वाले पहले भेद से नीचे तक गिने । इस रीति से प्रथम भेद सर्वगुरु, दूसरा भेद एक गुरु और तीसरा भेद द्विगुरु होता है । इसी तरह नीचे से ऊपर की ओर ध्यान देने से सबसे नीचे का सर्वलघु, उसके ऊपर
उपर्याद्याद्गुरोरेवमेकद्वयादिलगक्रिया । लगक्रियांकसंदोहे भवेत्संख्याविमिश्रिते ॥१७॥ उद्दिष्टांकसमाहारः सैको वा जनयेदिमाम् । संख्यैव द्विगुणैकोना सद्भिरध्वा प्रकीर्तितः ॥२०॥ इत्येतत्किंचिदाख्यातं लक्षणं छंदसां मुने । प्रस्तारोक्तप्रभेदानां नामानंत्यं प्रगाहते ॥२१॥ इतिश्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने द्वितीयपादे सङ्क्षिप्तच्छन्दोवर्णनं नाम सप्त- पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥५७॥
अथाष्टपञ्चाशत्तमोऽध्यायः नारद उवाच अनूचानप्रसंगेन वेदांगान्यखिलानि च । श्रुतानि त्वन्मुखाम्भोजात्समासव्यासयोगतः ॥१॥ शुकोत्पत्तिं समाचक्ष्व विस्तरेण महामते । सनंदन उवाच मेरुशृङ्गे किल पुरा कर्णिकारवनायते ॥२॥ विजहार महादेवो भौमैर्भूतगणैर्वृतः । शैलराजसुता चैव देवी तत्राभवत्पुरा ॥३॥ तत्र दिव्यं तपस्तेपे कृष्णद्वैपायनः प्रभुः । योगेनात्मानमाविश्य योगधर्मपरायणः ॥४॥
का एक लघु, तीसरा भेद द्विलघु इत्यादि होता है । इस प्रकार एकद्वयादि-लगक्रिया जाननी चाहिए । लगक्रिया के अंकों को जोड़ देने से उस छन्द के प्रस्तार की पूरी संख्या ज्ञात हो जाती है । यही संख्यान प्रत्यय कहलाता है । अथवा उद्दिष्ट पर दिये हुए अंकों को जोड़कर उसमें एक का योग कर दिया जाय तो वह भी प्रस्तार की पूरी संख्या को प्रकट कर देता है । छन्द के प्रस्तार को अंकित करने के लिए जो स्थान का नियमन किया जाता है, उसे अध्वयोग प्रत्यय कहते हैं । प्रस्तार की जो संख्या है, उसे दूना करके एक घटा देने से जो अंक आता है, उतने ही अंगुल का उसके प्रस्तार के लिए अध्वा या स्थान कहा गया है ॥१७-२०॥ मुने ! यह छन्दों का किंचित् लक्षण बताया गया है । प्रस्तार द्वारा प्रतिपादित होने वाले उनके भेद-प्रभेदों की संख्या अनन्त है, ॥२१॥ श्री नारदीय पुराण के पूर्व भाग के द्वितीय पाद में संक्षिप्त छन्दोवर्णन नामक सत्तावनवाँ अध्याय समाप्त ॥५७॥
अध्याय ५८ शुक का इतिहास निरूपण नारद बोले—आपके श्रीमुख से मैंने षडंग वेदों के अध्ययन प्रसङ्ग में सम्पूर्ण वेदांगों को संक्षेप और विस्तार रूप से सुन लिया । अब हे महामते ! कृपा कर शुक-जन्म कथा को विस्तारपूर्वक कहिए ॥१३॥ सनन्दन ने कहा—प्राचीन काल में कर्णिकार (कनेर) वन से आच्छादित विस्तृत मेरु शृंग पर महादेव शंकर अपने भूमि-वासी भूत गणों के साथ वन विहार कर रहे थे । उसी स्थान पर उससे पूर्व समय में देवी हिम- गिरि कन्या भी हुई थीं ॥२-३॥ मुनिसत्तम ! प्रभु कृष्ण द्वैपायन ने योग धर्म की साधना में निरत होकर योग द्वारा आत्मा में मनोनिरोध कर उसी वन में पुत्र की कामना से तपस्या प्रारम्भ की । उनके मन में यही संकल्प था
यहाँ पृष्ठ का पंक्ति-दर-पंक्ति लिप्यंतरण प्रस्तुत है:
५१२ नारदीयपुराणम् धारयन्स तपस्तेपे पुत्रार्थं मुनिसत्तमः । अग्नेर्भूमेस्तथा वायोरंतरिक्षस्य चाभितः ॥५॥ वीर्येण संमतः पुत्रो मम भूयादिति स्म ह । संकल्पेनाथ सोऽनेन दुष्प्रापमकृतात्मभिः ॥६॥ वरयामास देवेशमास्थितस्तप उत्तमम् । अतिष्ठन्मारुताहारः शतं किल समाः प्रभुः ॥७॥ आराधयन्महादेवं बहुरूपमुमापतिम् । तत्र ब्रह्मर्षयश्चैव सर्वे देवर्षयस्तथा ॥८॥ लोकपालाश्च साध्याश्च वसुभिश्चाष्टभिः सह । आदित्याश्चैव रुद्राश्च दिवाकरनिशाकरौ ॥६॥ विश्वावसुश्च गंधर्वः सिद्धाश्चाप्सरसां गणः । तत्र रुद्रो महादेवः कर्णिकारमयीं शुभाम् ॥१०॥ धारयानः स्रजं भाति शरदीव निशाकरः । तस्मिन् दिव्ये वने रम्ये देवदेवर्षिसंकुले ॥११॥ आस्थितः परमं योगं व्यासः पुत्रार्थमुद्यतः । न चास्य हीयते वर्णो न ग्लानिरुपजायते ॥१२॥ त्रयाणामपि लोकानां तदद्भुतमिवाभवत् । जटाश्च तेजसा तस्य वैश्वानरशिखोपमाः ॥१३॥ प्रज्वलंत्यः स्म दृश्यंते युक्तस्यामिततेजसः । एवं विधेन तपसा तस्य भक्त्या च नारद ॥१४॥ महेश्वरः प्रसन्नात्मा चकार मनसा मतिम् । उवाच चैनं भगवांस्त्र्यंबकः प्रहसन्निव ॥१५॥ यथा ह्यग्निर्यथा वायुर्यथा भूमियंथा जलम् । यथा खं च तथा शुद्धो भविष्यति सुतस्तव ॥१६॥ तद्भावभागी तद्बुद्धिस्तदात्मा तदुपाश्रयः । तेजसा तस्य लोकांस्त्रीन्यशः प्राप्स्यति केवलम् ॥१७॥ एवं लब्ध्वा वरं देवो व्यासः सत्यवतीसुतः । अरणिं त्वथ संगृह्य ममंथाग्निचिकीर्षया ॥१८॥ अथ रूपं परं विप्र बिभ्रतीं स्वेन तेजसा । घृताचीं नामाप्सरसं ददर्श भगवानृषिः ॥१९॥ कि उनको अग्नि, वायु, आकाश और वायु के तेज से युक्त एक पुत्र हो ॥४-५½॥ इस दृढ़ संकल्प से उन्होंने देवेश की आराधना प्रारम्भ की और ऐसी उत्तम तपस्या को प्रारम्भ किया जो अजितेन्द्रिय साधकों के लिये सर्वथा दुष्प्राप्य था । पहले उस प्रभु व्यास ने उमापति बहुरूप धारी महादेव की आराधना करते हुए सौ वर्षों तक केवल वायु पान करके जीवन रक्षा की ॥६-७½॥ उस मेरु श्रृंग पर सब ब्रह्मर्षि, देवर्षि, लोकपाल, अष्ट वसुओं के सहित साध्य गण, आदित्य, रुद्र, दिवाकर, चन्द्रमा, विश्वावसु, गन्धर्व, सिद्ध और अप्सरःसमूह रहते थे ॥८-९½॥ वहीं कर्णिकार की बनी शुभ माला को धारण किये हुए शंकर जी शरद् पूर्णिमा के चन्द्रमा की भांति सुशोभित हो रहे थे ॥१०½॥ उस देव और देवर्षियों से संकुल रम्य दिव्य वन में पुत्र प्राप्ति की कामना से व्यास जी दृढ़तापूर्वक परम योग की साधना करने लगे । परन्तु तपस्या करते समय न तो उनकी शरीर कान्ति ही क्षीण हुई और न तो मुख पर कोई ग्लानि की या श्रान्ति की रेखा ही देख पड़ी ॥११-१२॥ यह त्रिलोक के लिए एक आश्चर्यजनक घटना सी हुई; क्योंकि तपस्याकाल में क्लान्ति की अपेक्षा उनकी जटाओं में अग्नि की लपटों के समान एक विशेष प्रकार की आभा आ गई और अमित तेजस्वी उस योगी की वे जटायें अग्नि-ज्वाला के समान जलती हुई सी दिखाई देती थीं । नारद ! उनको इस प्रकार की तपस्या और भक्ति से महेश्वर प्रसन्न हो गये और उनको वरदान देने की इच्छा की । तब हँसते हुए भगवान् त्रिनेत्र ने व्यास से कहा ॥१३-१५॥ जिस प्रकार अग्नि, वायु, भूमि, जल और आकाश शुद्ध हैं उसी प्रकार तुमको शुद्ध और तेजस्वी पुत्र होगा ॥१६॥ उन्हीं के भावों से युक्त, उन्हीं की बुद्धि वाला, उन्हो का स्वरूप और उन्हीं का उपाश्रय होगा । उसके तेज से तीनों लोकों में उसका यश फैलेगा ॥१७॥ इस प्रकार का वर प्राप्त कर सत्यवती-सुत व्यास ने अरणि को इकट्ठा किया और अग्नि उत्पन्न करने की इच्छा से उसका मन्थन किया ॥१८॥ अरणि मन्थन के अनन्तर ही भगवान् ऋषि ने अपने तेज और रूप से अलौकिक सुन्दरी घृताची नामक अप्सरा को देखा ॥१९॥ मुनीश्वर ! उस वन में
अष्टपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ५१३ स तामप्सरसं दृष्ट्वा सहसा काममोहितः । अभवद्भगवान्व्यासो वने तस्मिन्मुनीश्वर ॥२०॥ सा तु कृत्वा तदा व्यासं कामसंविग्नमानसम् । शुकीभूया महारम्या घृताची समुपागमत् ॥२१॥ स तामप्सरसं दृष्ट्वा रूपेणान्येन संवृताम् । स्मरराजेनानुगतः सर्वगात्रातिगेन ह ॥२२॥ स तु धैर्येण महता निगृह्णन् हृच्छयं मुनिः । न शशाक नियंतुं तं व्यासः प्रविसृतं मनः ॥२३॥ भावित्वाच्चैव भाव्यस्य घृताच्या वपुषाहृतम् । यत्नान्नियच्छतश्चापि मुने एतच्चिकीर्षया ॥२४॥ अरण्यामेव सहसा तस्य शुक्रमवापतत् । शुक्रं निर्मथ्यमानेऽस्यां शुक्नो जज्ञे महातपाः ॥२५॥ परमर्षिर्महायोमी अरणीगर्भसंभवः । यथैव हि समिद्धोऽग्निर्भाति हव्यमुपात्तवान् ॥२६॥ तथा रूपः शुको जज्ञे प्रज्वलन्निव तेजसा । बिभ्रच्चित्रं च विप्रेंद्र रूपवर्णमनुत्तमम् ॥२७॥ तं गंगां सरितां श्रेष्ठां मेरुपृष्ठे स्वरूषिणीम् । अभ्येत्य स्नापयामास वारिणा स्वेन नारद ॥२८॥ कृष्णाजिनं चांतरिक्षाच्छुकार्थं भुव्यवापतत् । जेगीयंते च गंधर्वा ननृतुश्चाप्सरोगणाः ॥२८॥ देवदुन्दुभयश्चैव प्रावाद्यंत महास्वनाः । विश्वावसुश्च गंधर्वस्तथा तुंबुरुनारदौ ॥३०॥ हाहाहूहूश्च गंधर्वो तुष्टुवुः शुकसंभवम् । तत्र शक्रपुरोगाश्च लोकपालाः समागताः ॥३१॥ देवा देवर्षयश्चैव तथा ब्रह्मर्षयोऽपि च । दिव्यानि सर्वपुष्पाणि प्रववर्ष च मारुतः ॥३२॥ जंगमं स्थावरं चैव प्रहृष्टमभवज्जगत् । तं महात्मा स्वयं प्रीत्या देव्या सह महाद्युतिः ॥३३॥ उस अप्सरा को देखकर भगवान् व्यास काममोहित हो गए ॥२०॥ वह अप्सरा मुनि व्यास को कामातुर बना कर स्वयं अति सुन्दरी शुकी बनकर उनके पास आई ॥२१॥ वे ऋषि शुकी रूप में आई हुई उस अप्सरा को देखकर सब अंगों को व्यथित कर देने वाले कामदेव के वश में हो जाने से मह्यन्त धैर्यपूर्वक काम को वश में करने का प्रयत्न करने पर भी अपने कामातुर मन को वश में न कर सके ॥२२-२३॥ भावी की प्रबलता से घृताची के रूप सौन्दर्य से आकृष्ट उस मुनि ने यत्न पूर्वक मन को वश में करने का प्रयत्न किया परन्तु तो भी काम प्रेरणा से आतुर होने के कारण उस अरणि पर ही उनका वीर्य गिर पड़ा । उस अरणि मन्थन से मुनि का शुक्र भी मथ उठा जिससे उस अरणि में ही अरणि गर्भ से एक महायोगी शुक नामक परम ऋषि उत्पन्न हुआ । जिस प्रकार हविष्य को पाकर अग्नि प्रज्वलित हो उठती है उसी प्रकार अपने तेज से जलता हुआ वह शुक उस अरणि से उत्पन्न हुआ । विप्रन्द्र ! उस समय उस तेजस्वी बालक का रूप अलौकिक और आश्चर्यचकित करने वाला था ॥२४-२७॥ नारद ! उस बालक को मेरुपृष्ठ पर बहने वाली सरित्श्रेष्ठ गंगा नदी के पास जो कि घृताची का ही रूप है—ले गईं और अपने जल से उस तेजस्वी बालक को नहलाया ॥२८॥ उस समय आकाश से शुक के लिए कृष्ण मृगचर्म अनायास पृथ्वी पर गिर पड़ा, गन्धर्व प्रसन्न होकर मंगल गान करने लगे, अप्सरायें नाचने लगीं ॥२९॥ और देव,-दुन्दुभियों के गम्भीर घोष से आकाश गूंज उठा, । गन्धर्व, विश्वावसु तुंबुरु, नारद और गन्धर्व हाहा हूहू ने शुक देव जी की स्तुति की ॥३०-१/२॥ उस समय इन्द्र आदि लोकपाल, देव, देवर्षि और ब्रह्मर्षिगण भी वहां उपस्थित हो गए । वायु देव ने प्रसन्नता व्यक्त करने के लिए सब प्रकार के देव पुष्पों की वर्षा की ॥३१- ३२॥ सारा स्थावर जंगमात्मक संसार शुक जन्म से आनन्द-मग्न हो गया । महातेजस्वी महात्मा शंकर ने देवी पार्वती के साथ स्वयं उस सद्योजात मुनिकुमार का विधिवत् उपनयन किया ॥३३-१/२॥ देवेश्वर इन्द्र ने उस कुमार को दिव्य और अद्भुत कमण्डलु दिया, देवताओं ने प्रेमपूर्वक वस्त्र दिये । नारद ! हंस, शतपत्र, सारस, ६५ ना० पु०
५१४ नारदीयपुराणम् जातमात्रं मुनेः पुत्रं विधिनोपानयत्तदा । तस्य देवेश्वरः शक्रो दिव्यमद्भुतदर्शनम् ॥३४॥ ददौ कमंडलुं प्रीत्या देवा वासांसि चाभितः । हंसाश्च शतपत्राश्च सारसाश्च सहस्रशः ॥३५॥ प्रदक्षिणमवर्तंत शुकाश्र्चाषाश्च नारद । आरणेयस्तदा दिव्यं प्राप्य जन्म महामतिः ॥३६॥ तत्रैवोवास मेधावी व्रतचारी समाहितः । उत्पन्नमात्रं तं वेदाः सरहस्याः ससंग्रहाः ॥३७॥ उपतस्थुर्मु निश्रेष्ठं यथास्य पितरं तथा । बृहस्पति स वव्रे च वेदवेदांगभाष्यवित् ॥३८॥ उपाध्यायं द्विजश्रेष्ठ धर्ममेवानुचिंतयन् । सोऽधीत्य वेदानखिलान्सरहस्यान्ससंग्रहान् ॥३६॥ इतिहासंच कात्स्न्येन वेदशास्त्राणि चाभितः । गुरवे दक्षिणां दत्वा समावृत्तो महामुनिः ॥४०॥ उग्रं तपः समारेभे ब्रह्मचारी समाहितः । देवतानामृषीणां च बाल्येऽपि सुमहातपाः ॥४१॥ संमंत्रणीयो जन्यश्च ज्ञानेन तपसा तथा । न त्वस्य रमते बुद्धिरश्रामेषु मुनीश्वर ॥४२॥ त्रिषु गार्हस्थ्यमूलेषु मोक्षधर्मानुदर्शिनः । स मोक्षममुचिन्तयैव शुकः पितरमभ्यगात् ॥४३॥ प्राहाभिवाद्य च तदा श्रेयोऽर्थी विनयान्वितः । मोक्षधर्मेषु कुशलो भगवान् प्रब्रवीतु मे ॥४४॥ यथैव मनसः शांतिः परमा संभवेन्मुने । श्रुत्वा पुत्रस्य वचनं परमर्षिरुवाच तम् ॥४५॥ अधीष्व मोक्षशास्त्रं वै धर्मांश्च विविधानपि । पितुर्निर्देशाज्जग्राह शुको ब्रह्मविदां वरः ॥४६॥ योगशास्त्रं च निखिलं कापिलं चैव नारद । शतब्राह्मयाम् श्रिया युक्तं ब्रह्मतुल्यपराक्रमम् ॥४७॥ मेने पुत्रं यथा व्यासो मोक्षशास्त्रविशारदम् । उवाच गच्छेति तदा जनकं मिथिलेश्वरम् ॥४८॥
सुग्गे और नीलकण्ठ आदि पक्षियों ने हजारों प्रदक्षिणायें कीं । उस समय अरण से उत्पन्न वह मेधावी महा मुनि इस प्रकार लोकोत्तर जन्म प्राप्त कर उस स्थान पर एकाग्रमन होकर ब्रह्मचर्यपूर्वक रहने लगा ।।३४-३६।। उत्पन्न होते ही उस मुनिकुमार के पास रहस्य और संग्रह के सहित सम्पूर्ण वेद उपस्थित हो गए जैसे कि उसके पिता व्यास मुनि के पास आए थे ।।३७।। द्विजश्रेष्ठ ! वेद, वेदांग और भाष्यों के ज्ञाता उस मुनि-पुत्र ने केवल धर्म पालन के ही विचार से बृहस्पति को अपने उपाध्याय के रूप में वरण किया ।।३८।। थोड़े ही समय में उस महामुनि ने सम्पूर्ण रहस्य और संग्रह ग्रन्थों के सहित वेदों, सम्पूर्ण इतिहास और सांगोपांग वेद शास्त्रों का अध्ययन कर लिया । पश्चात् गुरु को दक्षिणा देकर वह गुरु आश्रम से लौट आया ।।४०।। तदनन्तर उस महातपस्वी ब्रह्मचारी ने बाल्यकाल में ही उग्र तपस्या को प्रारम्भ किया । वह अपनी तपस्या तथा ज्ञान के प्रभाव से देवता और ऋषियों का भी मन्त्रदाता और उपदेशक बन गया ।।४१।। मुनीश्वर ! मोक्ष धर्म के जिज्ञासु उस महातपस्वी शुक का मन आश्रमों के क्रमिक पालन में नहीं लगता था । ।४२।। इसलिए मोक्ष प्राप्ति का विचार कर उन्होंने अपने पिता व्यास से पूछा । पहले श्रेयस्काम उस मुनिपुत्र ने विनम्र भाव से पिता का अभिवादन किया और फिर कहा ।।४३।। आप मोक्ष धर्म के कुशल विद्वान् हैं, अतः कृपा कर आप ऐसे ज्ञान का उपदेश करें जिससे मेरे मन को परम शान्ति प्राप्त हो । पुत्र की बातों को सुनकर परम ऋषि व्यास जी ने कहा--'तुम मोक्ष शास्त्र और विविध धर्मों का अध्ययन करो' ।।४४-४५।। नारद ! पिता की आज्ञा पाकर ब्रह्मज्ञानियों में श्रेष्ठ शुक ने सम्पूर्ण, योगशास्त्र और सांख्य का अध्ययन किया । जब व्यास ने जान लिया कि अब मेरा पुत्र ब्रह्म के समान पराक्रमी, शत ब्राह्मी श्री से युक्त और मोक्ष शास्त्र का पारंगत विद्वान् हो गया है तब कहा कि पुत्र ! तुम मिथिलापति जनक के पास जाओ, वह मिथिलेश्वर तुमको भलीभांति मोक्ष धर्म का उपदेश देगा । ।।४३-४८।। पिता के आदेशानुसार धर्म की निष्ठा और मोक्ष के
अष्टपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ५१५ स ते वक्ष्यति मोक्षार्थं निखिलेन नराधिपः । पितुर्नियोगाद्गमज्जनकं मैथिलं नृपम् ॥४६॥ प्रष्टुं धर्मस्य निष्ठां वै मोक्षस्य च परायणम् । उक्तश्च मानुषेण त्वं तथा गच्छेत्यविस्मितः ॥५०॥ न प्रभावेण गन्तव्यमंतरिक्षचरेण वै । आर्जवेनैव गंतव्यं न सुखाय क्षणात्त्वया ॥५१॥ न द्रष्टव्या विशेषा हि विशेषा हि प्रसंगिनः । अहंकारो न कर्तव्यो याज्ये तस्मिन्नराधिपे ॥५२॥ स्थातव्यं वसथे तस्य स ते छेत्स्यति संशयम् । स धर्मकुशलो राजा मोक्षशास्त्रविशारदः ॥५३॥ यथा यथा च ते संयात्तत्कार्यमविशंकया । एवमुक्तः स धर्मात्मा जगाम मिथिलां मुनिः ॥५४॥ पद्भ्यां शक्तोऽंतरिक्षेण क्रांतुं भूमिं ससागराम् । सगिरींश्चाप्यतिक्रम्य भारतं वर्षमासदत् ॥५५॥ स देशान्विविधान्स्फीतानतिक्रम्य महामुनिः । विदेहान्वै समासाद्य जनकेन समागमत् ॥५६॥ राजद्वारं समासाद्य द्वारपालैर्निवारितः । तस्थौ तत्र महायोगी क्षुत्पिपासादिवर्जितः ॥५७॥ आतपे ग्लानिरहितो ध्यानयुक्तश्च नारद । तेषां तु द्वारपालानामेकस्तत्र व्यवस्थितः ॥५८॥ मध्यंगतमिवादित्यं दृष्ट्वा शुकमवस्थितम् । पूजयित्वा यथान्यायमभिवाद्य कृताञ्जलिः ॥५६॥ प्रावेशयत्ततः कक्षं द्वितीयां राजवेश्मनः । तत्रांतः पुरसंबद्धं महच्चैत्ररथोेपमम् ॥६०॥ सुविभक्तजलाक्रीडं रम्यं पुष्पितपादपम् । दर्शयित्वासने स्थाप्य राजानं च व्यजिज्ञपत् ॥६१॥ श्रुत्वा राजा शुकं प्राप्तं वारस्त्रीः स न्ययुंक्त च । सेवार्थं तस्य भावस्य ज्ञानाय मुनिसत्तम ॥६२॥ तं चारुकेश्यः शुभ्रोण्यस्तरुण्यः प्रियदर्शनाः । सूक्ष्मरक्तांबरधरास्तप्तकांचनभूषणाः ॥६३॥
परम तत्त्व को पूछने के लिए वह मैथिल नृप की राजधानी की ओर चल पड़ा । जाते समय व्यास जी ने कहा कि तुम वहाँ साधारण मनुष्य की भाँति इस प्रकार जाना कि तुमको किसी प्रकार का विस्मय न हो, अपने अलौकिक प्रभाव के द्वारा या आकाशचारी बन कर न जाना । अत्यन्त विनीत होकर अपने क्षणिक सुख की भावना का सर्वथा त्याग कर वहाँ जाना ॥४९-५१॥ किन्हीं विशेष बातों की ओर ध्यान न देना क्योंकि प्रसंग या प्रमादवश कुछ विशेष (अरुचिकर) घटनायें हो जाती हैं । उस यज्ञ कराने योग्य नृपति के प्रति किसी प्रकार का अहंकार भाव मत दिखलाना ॥५२॥ उसी राजा के भवन में ठहरना । वह मोक्ष शास्त्र का ज्ञाता, धर्मकुशल राजा तुम्हारे सन्देहों को अवश्य दूर कर देगा ॥५३॥ जो जो आज्ञायें तुमको दे उनका बिना किसी हिचकिचाहट के पालन करना । व्यास जी के उपयुक्त उपदेशों को सुन कर उस मुनि ने मिथिलापुरी की ओर प्रस्थान किया ॥५४॥ यद्यपि इस ससागरा पृथ्वी को वे मुनि आकाश मार्ग से तय कर सकते थे परन्तु वे पैदल ही पर्वतों, नदियों को पार करते हुए भारतवर्ष में आये ॥५५॥ और भारतवर्ष के विविध पवित्र देशों को पार कर विदेहों के देश में आकर जनक से मिले ॥५६॥ पहले तो राज द्वार पर द्वारपालों ने उनको रोका जिससे कि भूख प्यास की कुछ भी चिन्ता न कर वह महायोगी वहीं पर धूप में किसी प्रकार की ग्लानि न कर ध्यानस्थ होकर बैठ गया । उन द्वारपालों में से एक ने दोपहर के सूर्य की भाँति तेजस्वी शुक को वहाँ बैठा देखकर विधिवत् उनकी पूजा की फिर वह हाथ जोड़कर अभिवादन करके उनको राज भवन के द्वितीय कक्ष में ले गया ॥५७-५९½॥ वहाँ अन्तःपुर से सटे हुए चैत्ररथ वन के समान मनोहर, अनेकों खिले हुए फूलों से लदे हुए पोधों से युक्त, गृह वाटिका को, जिसमें अनेक अलग-अलग जल क्रीड़ा करने के लिए जलाशय बने हुए थे, दिखाया और वहीं एक आसन पर बैठा कर राजा से उनके आगमन के विषय में निवेदन किया ॥६०-६१॥ मुनिश्रेष्ठ राजा ने शुक का आगमन सुनकर उनकी आन्तरिक भावनाओं की परीक्षा के लिए वार स्त्रियों को उनकी सेवा के लिये नियुक्त किया ॥६२॥ अनेकों चारु केश और मनोहर नितम्ब वाली सुन्दरौ पचास तरुणियों ने, जो सूक्ष्म रक्ताम्बर और चमकीले सुवर्ण के
यहाँ प्रस्तुत पृष्ठ का पंक्ति-दर-पंक्ति लिप्यंतरण (Transcription) है:
५१६ नारदीयपुराणम् संलापालापकुशला भावज्ञाः सर्वकोविदाः । परं पंचाशतस्तस्य पाद्यादीनि व्यकल्पयन् ॥६४॥ देशकालोपपन्नेन साध्वन्नेनाप्यतर्पयन् । तस्य भुक्तवतस्तात तास्ततः पुरकाननम् ॥६५॥ सुरम्यं दर्शयामासुरेकैकत्वेन नारद । क्रीडंत्यश्च हसंत्यश्च गायंत्यश्चैव ताः शुकम् ॥६६॥ उदारसत्त्वं सत्त्वज्ञास्सर्वाः पर्य्यचरंस्तदा । आरणेयस्तु शुद्धात्मा जितक्रोधो जितेंद्रियः ॥६७॥ ध्यानस्थ एव सततं न हृष्यति न कुप्यति । पादशौचं तु कृत्वा वै शुकः संध्यामुपास्य च ॥६८॥ निषसादासने पुण्ये तमेवार्थं व्यचिंतयत् । पूर्वरात्रे तु तत्रासौ भूत्वा ध्यानपरायणः ॥६६॥ मध्यरात्रे यथान्याय्यं निद्रामाहारयत्प्रभुः । ततः प्रातः समुत्थाय कृत्वा शौचमनंतरम् ॥७०॥ स्त्रीभिः परिवृतो धीमान्ध्यानमेवान्वपद्यत । अनेन विधिना तत्र तदहः शेषमप्युत ॥७१॥ तां च रात्रिं नृपकुले वर्तयामास नारद ॥७२॥ इति श्रीबृहन्नारदी०पूर्वभागे बृहदुपाख्याने द्वितीयभागे शुकप्रलोभनं नामाष्टपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥५८॥
आभूषणों से सजी-धजी थीं, जो सब नारी-भावों को कुशल पंडिता, प्रत्येक प्रकार के आलाप में चतुर एवं सब प्रकार की श्रृङ्गार कला में पारंगत थीं, उस मुनि का पाद्य आदि के द्वारा सत्कार किया ॥६३-६४॥ फिर देशकाला- नुकूल मधुर अन्न को भोजन के लिए सामने रखा । जब मुनि कुमार शुक भोजन से तृप्त हो गये तब उन तरुणियों ने क्रमशः नगर के एक-एक रम्य उपवन को दिखाया ॥६५ १/२॥ उन सब सुन्दरियों ने अपनी मधुर हंसी, मनोहर कामक्रीड़ा और मादक गीतों से उस उदारचेता की परिचर्या की परन्तु उस जितेन्द्रिय, क्षमाशील, शुद्धात्मा अरणि- कुमार का ध्यान भंग नहीं हुआ और उसके हृदय में किसी प्रकार का हर्ष या क्रोध नहीं उत्पन्न हुआ ॥६६-६७ १/२॥ सायंकाल शुकदेव ने पादप्रक्षालन आदि नित्य कृत्यों से निवृत्त होकर संध्योपासन किया और पवित्र आसन पर आसीन होकर अपने मोक्षतत्त्व का चिन्तन किया । इस प्रकार रात के पहले पहर में वे ध्यान लगाये बैठे रहे । दूसरे और तीसरे पहर भगवान् शुक ने न्यायपूर्वक निद्रा को स्वीकार किया ॥६८-६९ १/२॥ फिर प्रातःकाल उठकर शौचादि से निवृत्त होकर स्त्रियों से घिरे रहने पर भी वह महात्मा ध्यान-साधना में ही लीन रहा ॥७० १/२॥ उस राजभवन में इस विधि से योगी शुक ने दिन को बिता दिया और रात भी राज परिवार में रहकर ही बिताई ॥७१-७२॥ श्री नारदीय महापुराण के द्वितीय भाग में शुक-प्रलोभन नामक अट्ठावनवां अध्याय समाप्त ॥५८॥
अथैकोनषष्टितमोऽध्यायः सनंदन उवाच ततः स राजा सहितो मन्त्रिभिर्द्विजसत्तम । पुरः पुरोहितं कृत्वा सर्वाण्यंतःपुराणि च ॥१॥ शिरसा चार्घ्यमादाय गुरुपुत्रं समभ्यगात् । महदासनमादाय सर्वरत्नविभूषितम् ॥२॥ प्रददौ गुरुपुत्राय शुकाय परमोचितम् । तत्रोपविष्टं तं कार्ष्णं शास्त्रदृष्टेन कर्मणा ॥३॥ पाद्यं निवेद्य प्रथमं सार्घ्यं तां च न्यवेदयत् । स च तां मंत्रतः पूजां प्रतिगृह्य द्विजोत्तमः ॥४॥ पर्यपृच्छन्महातेजाराज्ञः कुशलमव्ययम् । उदारसत्त्वाभिजानो राजापि गुरुसूनवे ॥५॥ आवेद्य कुशलं भूमौ निषसाद तदाज्ञया । सोऽपि वैयासकिं भूयः पृष्ट्वा कुशलमव्ययम् किमागमनमित्येव पर्यपृच्छद्विधानवित् ॥६॥ शुक उवाच पिताहमुक्तो भद्रं ते मोक्षधर्मार्थकोविदः । विदेहराजोह्याद्यो मे जनको नाम विश्रुतः ॥७॥ तत्र त्वं गच्छ तूर्णं वै स ते हृदयसंशयम् । प्रवृत्तौ च निवृत्तौ सर्वं छेत्स्यत्यसंशयम् ॥८॥ सोऽहं पितुर्नियोगात्वामुपप्रष्टुमिहागतः । तन्मे धर्मभृतां श्रेष्ठ यथावद्वक्तुमर्हसि ॥६॥ किं कार्यं ब्राह्मणेनेह मोक्षार्थश्च किमात्मकः । कथं च मोक्षः कर्तव्यो ज्ञानेन तपसापि वा ॥१०॥ अध्याय ५६ अध्यात्मतत्त्व का निरूपण सनन्दन बोले-द्विजवर्य ! इतनी परीक्षा के बाद राजा मन्त्रियों के सहित पुरोहित और अपनी रानी एवं दासियों को आगे कर विनीत भाव से अर्घ्यपात्र लेकर गुरुपुत्र शुक के समीप आये और उन्होंने सब रत्नों से जड़े हुए उपयुक्त बहुमूल्य आसन गुरु-पुत्र शुक को अर्पित किया ॥१-२१/२॥ जब व्यासपुत्र आसनस्थ हो गए तब मिथिलाधीश ने शास्त्र विधि से उनको पाद्य और अर्घ्य आदि प्रदान कर गो-दान दिया ॥३१/२॥ उस महातेजस्वी द्विजवर ने भी मन्त्रपाठपूर्वक उस सत्कार को स्वीकार किया और राजा से कुशल-मंगल पूछा । उदार हृदय राजा भी गुरु-पुत्र से अपना सारा कुशल समाचार कहकर उनकी आज्ञा से पृथ्वी पर बैठ गया । उस विधिज्ञ राजा ने भी व्यास-पुत्र शुक से कुशल वार्ता पूछने के बाद पूछा कि आपने किस लिए यहाँ तक आने का कष्ट किया है ॥४-६॥ शुक ने कहा-पिताजी ने मुझसे कहा कि तुम्हारा कल्याण इसी में है कि तुम शीघ्र धर्म, अर्थ और मोक्ष के ज्ञाता जनक के समीप जाओ, जो मेरे प्रथम शिष्य हैं । वे ही तुम्हारे सब सन्देहों को दूर कर देगें । निश्चय ही वे तुम्हारे प्रवृत्ति और निवृत्ति विषयक सन्देहों को दूर कर देगें ॥७-८॥ इसी लिए मैं पिता की आज्ञा से आपके समीप अपनी शंकाओं को मिटाने के लिए आया हूँ। इसलिए हे धार्मिकों में श्रेष्ठ ! आप भली भाँति मुझे बतायें कि ब्राह्मणों को क्या करना चाहिए, मोक्ष का अभिप्राय क्या है, मोक्ष की प्राप्ति ज्ञान या तपस्या किससे होगी ? ॥६-१०॥
५१८ नारदीयपुराणम् जनक उवाच यत्कार्यं ब्राह्मणेनेह जन्मप्रभृति तच्छृणु । कृतोपनयनस्तात भवेद्वेदपरायणः ॥११॥ तपसा गुरुवृत्त्या च ब्रह्मचर्येण चान्वितः । देवतानां पितॄणां च ह्यतृष्णश्चानसूयकः ॥१२॥ वेदानधीत्य नियतो दक्षिणामपवर्त्य च । अभ्यनुज्ञामनुप्राप्य समावर्तेत वै द्विजः ॥१३॥ समावृत्तस्तु गार्हस्थ्ये सदारो नियतो वसेत् । अनसूयुर्यथान्यायमाहिताग्निरनादृते ॥१४॥ उत्पाद्य पुत्रपौत्रांश्च वन्याश्रमपदे वसेत् । तानेवाग्नीन्यथान्यायं पूजयन्नतिथिप्रियः ॥१५॥ सर्वानग्नीन्यथान्यायमात्मन्यारोप्य धर्मवित् । निर्द्वन्द्वो वीतरागात्मा ब्रह्मा श्रमपदे वसेत् ॥१६॥ शुक उवाच उत्पन्ने ज्ञानविज्ञाने प्रत्यक्षे हृदि शाश्वते । न विना गुरुसंवासाज्ज्ञानस्याधिगमः स्मृतः ॥१७॥ किमवश्यं तु वस्तव्यमाश्रमेषु न वा नृप । एतद्भवंतं पृच्छामि तद्भवान्वक्तुमर्हति ॥१८॥ जनक उवाच न विना ज्ञानविज्ञाने मोक्षस्याधिगमो भवेत् विना गुरुसंबांधाज्ज्ञानस्याधिगमस्तथा ॥१९॥ आचार्यः प्लाविता तस्य ज्ञानं प्लव इहोच्यते । विज्ञाय कृतकृत्यस्तु तोर्णस्तत्रोभयं त्यजेत् ॥२०॥ अनुच्छेदाय लोकानामनुच्छेदाय कर्मणाम् । कृत्वा शुभाशुभं कर्म मोक्षो नामेह लभ्यते ॥२१॥ जनक बोले- जन्म से ब्राह्मणों को जो कुछ करना चाहिए उसको सुनो । तात ! जब ब्राह्मणपुत्र का उपनयन- संस्कार हो जाय उसी दिन से वेदाध्ययन प्रारम्भ कर दे ॥११॥ अध्ययन के समय वह ब्रह्मचर्य का पालन करे और तपस्या तथा गुरु सेवा में लगा रहे । तृष्णा से विमुख हो, देवता और पितरों की कभी निन्दा न करे ॥१२॥ जब नियमित रूप से वेदों का अध्ययन कर ले तब गुरु को गुरुदक्षिणा देकर उनसे आज्ञा लेकर समावर्तन संस्कार करे ॥१३॥ समावर्तन संस्कार के बाद नियम पूर्वक विवाह करके स्त्री सहित गृहस्थाश्रम का पालन करे । इस आश्रम में रहकर वह किसी की निन्दा न करे और विधिपूर्वक अग्नि की स्थापना करके प्रतिदिन आदरपूर्वक अग्नि होम करे । पुत्र और पौत्रों को उत्पन्न करने के अनन्तर अरण्य-आश्रम (वानप्रस्थ) को अपनाये । उस आश्रम में वह भी प्रेमपूर्वक अतिथियों की पूजा करे ॥१४-१५॥ और यथाशास्त्र अग्न्याधान करे अथवा धर्मज्ञ वह वानप्रस्थाश्रमी आत्मा में ही शास्त्रानुसार अग्नि लीन करके द्वन्द्वातीतः और वीतराग होकर ब्रह्मा श्रम में प्रवेश करे ॥१६॥ शुक बोले--राजन् ! बिना गुरु के ज्ञान का होना नहीं कहा गया है । तो यदि किसी को बिना गुरु के ही हृदय में नित्य ज्ञानविज्ञान की प्रत्यक्षानुभूति हो जाय तो भी उसके लिए क्या शेष तीन आश्रमों में रहना आवश्यक है ? इस शंका को पूछ रहा हूँ, इसका समाधान आप कर दें ॥१७-१८॥ जनक ने कहा--बिना ज्ञान-विज्ञान के मोक्ष की प्राप्ति नहीं होती और गुरु के बिना ज्ञान-प्राप्ति भी दुर्लभ ही है ॥१९॥ आचार्य ही इस संसार-सागर से पार लगाने वाला है और ज्ञान ही नौका है । ज्ञान की प्राप्ति हो जाने पर मनुष्य कृतकृत्य एवं पवित्र हो जाता है तब वह शुभ-अशुभ दोनों प्रकार के कर्मों का त्याग कर दे ॥२०॥ लोक और कर्म का उच्छेद न हो जाय, इसलिए पहले शुभाशुभ कर्म करके तब मोक्ष को प्राप्त करना चाहिए ।