बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
३९६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् अथ कालचक्रदशायां सव्यमार्गचक्रम्
| दशानां नक्षत्राणि तत्पादानि च | नक्ष. | पा. | देहाधी. | १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | परमा. वर्षा. | जीवाधिपाः | राश. अंशाः |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ. १च. मू. १च. पुन. १च. पू. १च. ह. १च. | अश्विनी, पुनर्वसु, हस्त, मूल, पूर्वाभाद्रपद | १ | मं. | मं. = ७व. | शु. = १६व. | बु. = ९व. | चं. = २१व. | सू. = ५व. | बु. = ९व. | शु. = १६व. | मं. = ७व. | बृ. = १०व. | १०० वर्ष | बृ. | मे. |
| अ. २च. मू. २च. पुन. २च. पू. २च. ह. २च. | अश्विनी, पुनर्वसु, हस्त, मूल, पूर्वाभाद्रपद | २ | श. | श. = ४व. | श. = ४व. | बृ. = १०व. | मं. = ७व. | शु. = १६व. | बु. = ९व. | चं. = २१व. | सू. = ५व. | बु. = ९व. | ८५ वर्ष | बु. | वृ. |
| अ. ३च. मू. ३च. पुन. ३च. पू. ३च. ह. ३च. | अश्विनी, पुनर्वसु, हस्त, मूल, पूर्वाभाद्रपद | ३ | शु. | शु. = १६व. | मं. = ७व. | बृ. = १०व. | श. = ४व. | श. = ४व. | बृ. = १०व. | मं. = ७व. | शु. = १६व. | बु. = ९व. | ८३ वर्ष | बु. | मि. |
| अ. ४च. मू. ४च. पुन. ४च. पू. ४च. ह. ४च. | अश्विनी, पुनर्वसु, हस्त, मूल, पूर्वाभाद्रपद | ४ | चं. | चं. = २१व. | सू. = ५व. | बु. = ९व. | शु. = १६व. | मं. = ७व. | बृ. = १०व. | श. = ४व. | श. = ४व. | बृ. = १०व. | ८६ वर्ष | बृ. | कं. |
| भ. १च. चि. १च. पु. १च. पू.षा. १च. उ.भा. १च. | भरणी, पुष्य, चित्रा, पूर्वाषाढ़, उत्तराभाद्रपद | १ | मं. | मं. = ७व. | शु. = १६व. | बु. = ९व. | चं. = २१व. | सू. = ५व. | बु. = ९व. | शु. = १६व. | मं. = ७व. | बृ. = १०व. | १०० वर्ष | बृ. | सिं. |
| भ. २च. चि. २च. पु. २च. पू.षा. २च. उ.भा. २च. | भरणी, पुष्य, चित्रा, पूर्वाषाढ़, उत्तराभाद्रपद | २ | श. | श. = ४व. | श. = ४व. | बृ. = १०व. | मं. = ७व. | शु. = १६व. | बु. = ९व. | चं. = २१व. | सू. = ५व. | बु. = ९व. | ८५ वर्ष | बु. | क. |
| भ. ३च. चि. ३च. पु. ३च. पू.षा. ३च. उ.भा. ३च. | भरणी, पुष्य, चित्रा, पूर्वाषाढ़, उत्तराभाद्रपद | ३ | शु. | शु. = १६व. | मं. = ७व. | बृ. = १०व. | श. = ४व. | श. = ४व. | बृ. = १०व. | मं. = ७व. | शु. = १६व. | बु. = ९व. | ८३ वर्ष | बु. | तु. |
| भ. ४च. चि. ४च. पु. ४च. पू.षा. ४च. उ.भा. ४च. | भरणी, पुष्य, चित्रा, पूर्वाषाढ़, उत्तराभाद्रपद | ४ | चं. | चं. = २१व. | सू. = ५व. | बु. = ९व. | शु. = १६व. | मं. = ७व. | बृ. = १०व. | श. = ४व. | श. = ४व. | बृ. = १०व. | ८६ वर्ष | बृ. | वृ. |
अथ कालचक्रदशायां सव्यमार्गाच्चक्रम्
| दशानां नक्षत्राणि तत्पादानि च | नक्ष. | पा. | जीवाधिपाः | १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | परमावर्षा. | देहाधिपाः | राश. अंशाः |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| कृ. १च. | उ.षा. १च. | श्ले. १च. | रे. १च. | स्वा. १च. | कृत्तिका, आश्लेषा, स्वाती, उत्तराषाढ, रेवती | १ | मं. | मं. = ७ व. | शु. = १६ व. | बु. = ९ व. | चं. = २१ व. | सू. = ५ व. | बु. = ९ व. | शु. = १६ व. | मं. = ७ व. |
| कृ. २च. | उ.षा. २च. | श्ले. २च. | रे. २च. | स्वा. २च. | २ | श. | श. = ४ व. | श. = ४ व. | बृ. = १० व. | मं. = ७ व. | शु. = १६ व. | बु. = ९ व. | चं. = २१ व. | सू. = ५ व. | |
| कृ. ३च. | उ.षा. ३च. | श्ले. ३च. | रे. ३च. | स्वा. ३च. | ३ | शु. | शु. = १६ व. | मं. = ७ व. | बृ. = १० व. | श. = ४ व. | श. = ४ व. | बृ. = १० व. | मं. = ७ व. | शु. = १६ व. | |
| कृ. ४च. | उ.षा. ४च. | श्ले. ४च. | रे. ४च. | स्वा. ४च. | ४ | चं. | चं. = २१ व. | सू. = ५ व. | बु. = ९ व. | शु. = १६ व. | मं. = ७ व. | बृ. = १० व. | श. = ४ व. | श. = ४ व. |
अथ कालचक्रदशायामपसव्यमार्गाच्चक्रम्
| दशानां नक्षत्राणि तत्पादानि च | नक्ष. | पा. | जीवाधिपाः | १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | परमावर्षा. | देहाधिपाः | राश. अंशाः |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| रो. १च. | वि. १च. | म. १च. | श्र. १च. | रोहिणी, मघा, विशाखा, श्रवण | १ | बृ. | बृ. = १० व. | श. = ४ व. | श. = ४ व. | बृ. = १० व. | मं. = ७ व. | शु. = १६ व. | बु. = ९ व. | सू. = ५ व. | चं. = २१ व. |
| रो. २च. | वि. २च. | म. २च. | श्र. २च. | २ | बु. | बु. = ९ व. | शु. = १६ व. | मं. = ७ व. | बृ. = १० व. | श. = ४ व. | श. = ४ व. | बृ. = १० व. | मं. = ७ व. | शु. = १६ व. | |
| रो. ३च. | वि. ३च. | म. ३च. | श्र. ३च. | ३ | बु. | बु. = ९ व. | सू. = ५ व. | चं. = २१ व. | बु. = ९ व. | शु. = १६ व. | मं. = ७ व. | बृ. = १० व. | श. = ४ व. | श. = ४ व. | |
| रो. ४च. | वि. ४च. | म. ४च. | श्र. ४च. | ४ | बृ. | बृ. = १० व. | मं. = ७ व. | शु. = १६ व. | बु. = ९ व. | सू. = ५ व. | चं. = २१ व. | बु. = ९ व. | शु. = १६ व. | मं. = ७ व. |
(पृष्ठ-शीर्षकः) अथ दशाध्यायः ३९७
३९८ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् अथ कालचक्रगतिभेदमाह- प्रथमा गति मण्डूकी द्वितीया मर्कटी तथा। बाणाच्च नवपर्यन्तं गतिः सिंहावलोकनम् ।।८८।। कालचक्र की गति ३ प्रकार की होती है। पहली गति का नाम मण्डूकी है, दूसरी का नाम मर्कटी और तीसरी का नाम सिंहावलोकन है।।८८।। कन्यायां कर्कटे वापि सिंहभे मिथुनेऽपि च। माण्डूकी गति विज्ञेया भवेद्रोगस्य कारणम् ।।८९।। कन्या से कर्क में और सिंह से मिथुन में जाने को मण्डूकी गति कहते हैं। इसमें रोग होता है।।८९।। मीनवृश्चिकयोर्विप्र चापमेषस्तथैव च। सिंहावलोकनं चैव तादृशं च फलं भवेत्। सिंहावगतिमार्गे च मर्कटीगतिसम्भवः ।।९०।। मीन से वृश्चिक में और धन से मेष में जाने को सिंहावलोकन गति कहते हैं। नाम सदृश ही इसका फल होता है। सिंह से कर्क में जाने को मर्कटी गति कहते हैं।।९०।। गतिफलञ्चाह- मीनात्तु वृश्चिके याते ज्वरो भवति निश्चितम्। कन्यातः कर्कटे याते भ्रातृबन्धुविनाशनम् ।।९१।। मीन से वृश्चिक प्राप्त हो तो उस दशा में निश्चय ही ज्वर होता है। कन्या से कर्क प्राप्त हो तो उस दशा में माता और बन्धु का नाश होता है।।९१।। सिंहात्तु मिथुने याते स्त्रिया व्याधिर्भवेद् ध्रुवम्। कर्कटाच्च हरौ याते वधो भवति देहिनाम्। पितृबन्धुमृतिं विद्याच्चापान्मेषगते पुनः ।।९२।। सिंह से मिथुन प्राप्त हो तो इस दशा में स्त्री को रोग होता है। कर्क से सिंह प्राप्त हो तो उस दशा में मनुष्य का वध होता है। धन से मेष प्राप्त हो तो पिता के भाई (चाचा) की मृत्यु होती है।।९२।। पुनः गतिफलमाह- कन्यातः कर्कटे याते पूर्वभागे महत्फलम्। उत्तरे देशमाश्रित्य शुभा यात्रा भविष्यति ।।९३।।
अथ दशाध्यायः . ३९९ कन्या से कर्क में जाने के समय पूर्वभाग से लाभ और उत्तर देश की शुभकर यात्रा होती है।।९३।। सिंहात्तु मिथुने याते पूर्वभागं विसृज्यते। कार्यान्तेऽपि च नैर्ऋत्यां सुखं यात्रा भविष्यति ।।९४।। सिंह से मिथुन में जाने के समय पूर्व दिशा को त्याग देना चाहिए। कार्य हो जाने पर भी नैर्ऋत्य कोण की यात्रा से सुख होता है।।९४।। कर्कटात्तु गते सिंहे कार्यहानिश्च जायते। दक्षिणां दिशमाश्रित्य प्रत्यगामनं भवेत् ।।९५।। कर्क से सिंह में जाने के समय दक्षिण दिशा में यात्रा करने से कार्य की हानि होती है और दक्षिण से पश्चिम की यात्रा होती है।।९५।। मीनात्तु वृश्चिके याते उदग्गच्छति सङ्कटम्। चापाच्च मकरे विप्र दुःखं सङ्कटमुच्यते ।।९६।। मीन से वृश्चिक में जाने के समय उत्तर की यात्रा से संकट होता है। धन से मकर में जाने से दुःख और संकट होता है।।९६।। चापान्मेषे तु यात्रायां वधबन्धो मृतिर्भवेत्। तुला सम्पद्विवाहश्च स्त्रीप्राप्तिर्वृश्चिके गतिः ।।९७।। धन से मेष में जाने के समय वध, बंधन और मृत्यु होती है। तुला से वृश्चिक में जाने के समय सम्पत्ति, स्त्री की प्राप्ति होती है।।९७।। अथ कालचक्रांशफलम्- मेषांशे चोरको विन्द्याच्छ्रीमाञ्छुक्रांशके भवेत्। बुधांशे ज्ञानसम्पन्नश्चन्द्रे च नृपतिर्भवेत् ।।९८।। यदि कालचक्र की दशा में मेषांश में जन्म हो तो चोर होता है। वृषांश में लक्ष्मीवान्, मिथुनांश में ज्ञानी, कर्कांश में राजा।।९८।। सिंहांशे भूपतिः प्रोक्तः सौम्यांशे पण्डितो भवेत्। तुलांशे राजमन्त्री च भौमांशे निर्धनो भवेत् ।।९९।। सिंहाश में राजा, कन्यांश में पंडित, तुलांश में राजमन्त्री, [वृश्चिकां]श में दरिद्र।।९९।। चापांशे ज्ञानसंयुक्तो मकरांशे च पापकृत्। कुम्भांशे च वणिक्कर्मा मीनांशे किल धान्यवान् ।।१००।।
४०० बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् धन्वंश में बुद्धिमान्, मकरांश में पापी, कुम्भांश में व्यापारी और मीनांश में धान्य से युक्त होता है।।१००।। अथ देहजीवफलम्- देहजीवसमायोगे भौमार्करविजादिभिः। एकैकयोगे मरणं बहुयोगे तु का कथा।।१।। यदि देह या जीव में कोई भी भौम, सूर्य, शनि में से किसी से युत हो तो मरण होता है। यदि सभी से युक्त हो तो क्या कहना है।।१।। देहयोगे महाबाधा जीवयोगे तु मृत्युदः। द्वाभ्यां संयोगमात्रेण हन्यते नात्र संशयः।।२।। देह में पापग्रह का योग हो तो महाबाधा होती है और जीव में पापयोग हो तो मृत्यु होती है। यदि दोनों में पापयोग हो तो अवश्य मृत्यु होती है।।२।। देहे जीवे यदा राहुः सौरिर्वक्रो रविः स्थितः। मृत्युकालगतिं ज्ञात्वा शान्तिं कुर्याद्यथाविधि ।।३।। देह-जीव में जब राहु, शनि, भौम, सूर्य स्थित हों उस समय मृत्यु का भय होता है। इसे जानकर शान्ति करनी चाहिए।।३।। देहे जीवे यदि सोमे सौम्यजीवसितः स्थितः। तदा सौख्यं प्रकुर्वन्ति रोगमृत्युविनाशनम् ।।४।। देह-जीव में जब चन्द्रमा, बुध, गुरु, शुक्र होते हैं उस समय रोग तथा मृत्यु का नाश कर सुख देते हैं।।४।। पापक्षेत्रे दशायोगे देहजीवौ तु दुःखदौ। शुभक्षेत्रे दशायोगे शुभयोगे शुभं भवेत् ।।५।। देह-जीव पापक्षेत्र में हों और पापयुक्त हों तो उसकी दशा में दुःख होता है। देह-जीव शुभक्षेत्र में हों और शुभयुक्त हों तो उसकी दशा में शुभ फल होता है।।५।। देहे शुभग्रहैर्युक्ते भूषणादि ध्रुवं भवेत्। जीवे शुभग्रहैर्युक्ते पुत्रदारादिकाँल्लभेत ।।६।। देह में शुभग्रह युक्त हों तो भूषण आदि का लाभ होता है। जीव शुभग्रह से युक्त हो तो पुत्र-स्त्री आदि का लाभ होता है।।६।। इति कालचक्रदशाज्ञानम्।
अथ दशाध्यायः ४०१ अथ चरदशानयनम्- लग्नादि व्ययपर्यन्तं राशयो द्वादशो द्विज। आयुर्वर्षप्रदातार एभिश्चरदशा मता।।७।। लग्न से १२वें भाव पर्यन्त १२ राशियाँ होती हैं। ये आयु के वर्ष को देने वाली होती हैं और इन्हीं से चरदशा भी होती है।।७।। ओजर्क्षाणां क्रमाद्विप्र समानां व्युत्क्रमात्पुनः। नाथान्तेन समाज्ञेया निर्विशङ्कं द्विजोत्तम।।८।। ओज (विषम) राशियों का क्रम से और सम राशियों का व्युत्क्रम से उस राशि के स्वामी पर्यन्त गिनने से दशा के वर्ष का मान होता है।।८।। मेषो वृषोऽथ मिथुनो तुलालिश्च धनुर्धरः। एतेषामोजसंज्ञा स्यादब्दानां गणनाक्रमात्।।९।। मेष, वृष, मिथुन, तुला, वृश्चिक, धन राशियों की ओज संज्ञा है और इसमें वर्ष के गणना क्रम से गिनना चाहिए।।९।। कर्कः सिंहश्च कन्या च नक्रकुम्भझषा द्विज। एतेषां समसंज्ञा स्यादृक्षाणां व्युत्क्रमाद्द्विज।।१०।। कर्क, सिंह, कन्या, मकर, कुंभ और मीन इन राशियों की सम संज्ञा है। इनमें व्युत्क्रम गणना से वर्ष की संख्या को जानना चाहिए।।१०।। स्वर्क्षसंस्थितखेटस्य वर्षाणि द्वादशैव हि। धनस्थे चैकवर्षं हि तृतीये हायनद्वयम्।।११।। ग्रह (राशीश) अपनी राशि में हो तो १२ वर्ष की दशा होती है। अपनी राशि से धन भाव में हो तो १ वर्ष, तीसरे भाव में हो तो २ वर्ष।।११।। तुर्ये वर्षत्रयं विप्र पञ्चमे तुर्यहायनम्। रिपुस्थे पञ्चवर्षाणि षड्वर्षाणि च सप्तमे।।१२।। चौथे में हो तो ३ वर्ष, पाँचवें में हो तो ४ वर्ष, छठे में हो तो ५ वर्ष, सातवें में हो तो ६ वर्ष, आठवें में हो तो ७ वर्ष।।१२।। रन्ध्रस्थे नगवर्षाणि चाष्टवर्षाणि पुण्यभे। नभस्थे चाङ्कवर्षाणि दिग्वर्षाणि तु लाभगे। व्ययस्थे रुद्रवर्षाणि राश्यङ्काश्च तथानघ।।१३।।
४०२ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् नवम में हो तो ८ वर्ष, दशम में हो तो ९ वर्ष, एकादश में हो तो १० वर्ष और बारहवें भाव में हो तो ११ वर्ष की दशा होती है। यह पूर्व में कहे हुए प्रकार से जानना।।१३।। द्विराश्यधिपतौ विशेषः- वृश्चिकाधिपती द्वौ च कुजकेतू द्विजोत्तम। स्वर्भानुपङ्गू कुम्भस्य पती द्वौ चिन्तयेद्द्विज ।।१४।। वृश्चिक राशि के भौम और केतु ये दो स्वामी हैं और कुम्भ राशि के राहु तथा शनि ये दो स्वामी हैं।।१४।। स्वर्क्षे यदि स्थितौ द्वौ च भानुवर्षप्रदायकौ। परर्क्षे सङ्गतौ द्वौ च नाथान्ते न विचिन्तयेत् ।।१५।। यदि दोनों स्वामी अपनी राशि में हों तो १२ वर्ष की दशा होती है। यदि दोनों भिन्न राशि में हो तो स्वामी पर्यन्त दशा की गणना नहीं करना चाहिए।।१५।। परर्क्षे भिन्नभिन्नस्थौ द्वयोर्मध्ये तु यो बली। तस्य नाथान्तरीत्या च वर्षाणि संलिखेद्द्विज ।।१६।। भिन्न राशि में दोनों अलग-अलग हों तो दोनों में जो बली हो उसी के साथ पर्यन्त रीति से दशावर्ष लेना चाहिए।।१६।। अग्रहात्सग्रहः प्राणी सग्रहादधिकग्रहः। साम्ये चरस्थिरद्वन्द्वाः क्रमात्स्युर्बलिनो द्विज ।।१७।। बल विचार में ग्रहहीन से ग्रह युक्त बली होता है। यदि दोनों ग्रह युक्त हों तो जिसके साथ अधिक ग्रह हों वह बली होता है। यदि ग्रह में समानता हो तो चर, स्थिर, द्विस्वभाव क्रम से बल का विचार करना चाहिए।।१७।। राशिसाम्ये सदा विप्र बहुवर्षप्रदो बली। तद्बाधादुच्चगः खेटो बलवान्भवति द्विज ।।१८।। यदि राशि में भी समानता हो तो जिसका अधिक वर्ष हो वह बली होता है। इसमें भी उच्चस्थ ग्रह बली होता है।।१८।। यद्यप्यल्पवर्षदो विप्र तदापि तुङ्गगो बली। नाथान्तेन समाज्ञेया पूर्वोक्तेन क्रमेण हि।।१९।।
अथ दशाध्यायः ४०३ यद्यपि उच्चस्थ ग्रह अल्पवर्ष देने वाला हो तथापि वही बली होता है। वहाँ स्वामी पर्यन्त दशावर्ष लेना चाहिए।।१९।। उच्चखेटस्य सद्भावे वर्षमेकं तु निःक्षिपेत्। तथैव नीचखेटस्य वर्षमेकं त्यजेद्द्विज।।२०।। उच्चस्थ ग्रह के वर्ष में १ जोड़ देना चाहिए और नीचस्थ ग्रह में १ वर्ष कम करना चाहिए।।२०।। एकः स्वक्षेत्रगो अन्यस्तु परत्र यदि संस्थितः। तदान्यत्र स्थितं नाथं परिगृह्य दशां नयेत्।।२१।। यदि एक ग्रह अपनी राशि में हो और दूसरा अन्य राशि में हो तो वहाँ अन्यत्र स्थित ग्रह के स्वामी से दशावर्ष लेना चाहिए।।२१।। एकः स्वोच्चगतस्त्वन्यः परत्र यदि संस्थितः। ग्राहयेदुच्चखेटस्थं राशिमन्यं विहाय वै।।२२।। एक ग्रह अपने उच्च में हो और दूसरा अन्यत्र हो तो वहाँ उच्चस्थ ग्रह की राशि को अन्य ग्रह की राशि को छोड़कर लेना चाहिए।।२२।। चरदशाफलमाह— एवं सर्वं समालोच्य दशायां निधनं वदेत्। पापयोगे पापदृष्ट्या यस्य पापत्रिकोणगाः ।।२३।। इस प्रकार सभी पदार्थों का विचार कर निधन को कहना। जिस दशा की राशि में पापग्रह का योग हो अथवा दृष्टि हो वा पापग्रह से त्रिकोण में हो तो।।२३।। निधनं तद्दशायां वै भाषितं ब्रह्मणा यथा। चरमुख्यदशायास्ते कथयिष्याम्यहं फलम्।।२४।। उस दशा में अवश्य मृत्यु होती है, ऐसा ब्रह्मा ने कहा है। इस प्रकार चर दशा का फल मैंने कहा।।२४।। उदाहरण— जन्मांग के अनुसार जन्मलग्न मकर सम राशि है, अतः ६ उत्क्रम गणनां से मकर से दशा का आरम्भ हुआ और उसका दशांवर्ष ३ हुआ। कुम्भ का शनिपर्यन्त ३ वर्ष, मीन का ७ वर्ष, मेष ओज राशि है, अतः क्रम गणना से मेष का १० वर्ष, वृष का १ वर्ष, मिथुन का २ वर्ष। इसी प्रकार अन्य राशियों के दशावर्ष भी लाना चाहिए, शेष चक्र से स्पष्ट है।
४०४ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् | १२ | मं. ११ | ९ | | १ | १० | श. ८ रा. | | २ के. | ४ सू. | ७ | | चं. ३ शु. | ५ बृ. बु. | ६ | चरदशाचक्रम्
| म. | ध. | वृ. | तु. | क. | सिं. | कं. | मि. | वृ. | मे. | मी. | कुं. | राशि |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| २ | ८ | ९ | ४ | ११ | ११ | १० | २ | १ | १० | ७ | ३ | वर्ष |
| २०१५ | २०२३ | २०३२ | २०३६ | २०४७ | २०५८ | २०६८ | २०७० | २०७१ | २०८१ | २०८८ | २०९१ | संवत् |
| ३ | ३ | ३ | ३ | ३ | ३ | ३ | ३ | ३ | ३ | ३ | ३ | सूर्य |
| १८ | १८ | १८ | १८ | १८ | १८ | १८ | १८ | १८ | १८ | १८ | १८ | |
| अथ नवांशस्थिरदशा- | ||||||||||||
| अधुना सम्प्रवक्ष्यामि दशास्थिरविशेषतः। | ||||||||||||
| नवांशकदशामानं तवाग्रे द्विजनन्दन ।।२५।। | ||||||||||||
| पाराशरजी ने कहा- हे द्विजोत्तम ! अब मैं तुमसे स्थिर दशा के मध्य | ||||||||||||
| में नवांशक दशा को कहता हूँ।।२५।। | ||||||||||||
| प्रतिराशिप्रदिष्टैवमङ्काङ्का च दशा स्थिरा। | ||||||||||||
| तन्वादिव्ययभावानां स्पष्टीकृत्वा द्विजोत्तम ।।२६।। | ||||||||||||
| लग्नादि द्वादश भावों को स्पष्ट करना चाहिए। प्रत्येक राशि में नव | ||||||||||||
| नवमांश होते हैं, इन्हीं की दशा को स्थिर दशा कहते हैं।।२६।। | ||||||||||||
| ग्रहनवांशायुरीत्या दशातुल्या नवांशका। | ||||||||||||
| अस्थिरा इति विज्ञेया परपक्षमिदं क्रमात् ।।२७।। | ||||||||||||
| इसे दो प्रकार की कोई-२ कहते हैं। एक राशि से और दूसरी ग्रह नवांश | ||||||||||||
| से दशा होती है।।२७।। | ||||||||||||
| पक्षद्वयं प्रवक्ष्यामि चरस्थिरं द्विजोत्तम। | ||||||||||||
| पूर्वं चरदशां वक्ष्ये तवाग्रे द्विजनन्दन ।।२८।। |
अथ दशाध्यायः ४०५ इसमें भी दो प्रकार है, पहला चर और दूसरा स्थिर दशा। उसमें प्रथम प्रकार को कहता हूँ।।२८।। ओजलग्ने जनुर्यस्य नवांशकदशा द्विज। लग्नादिकं समारभ्य तस्य चांशदशा मता।।२९।। जिसका जन्म विषम राशिलग्न में हो उसकी नवांश दशा लग्न से क्रम गणना के अनुसार होती है।।२९।। समराशौ जनुर्यस्य नवांशकदशा द्विज। व्युत्क्रमाच्च समारभ्य पुरा शम्भुप्रचोदितम्।।३०।। और जिसका जन्म लग्न समराशि हो उसकी दशा उत्क्रम गणना के अनुसार होती है।।३०।। दशाप्रवर्त्तको राशिः विषमर्क्ष समोऽपि वा। राशिप्रतिनवाङ्कानां सर्वेषां गणयेत्क्रमात्।।३१।। अष्टोत्तरशताङ्कानां संख्यापूर्वं तदंशकाः। ख्याता स्थिरदशा विप्र निर्विशङ्कं द्विजोत्तम।।३२।। दशाप्रवर्त्तक राशियों का दशावर्ग ९ वर्ष ही होता है, चाहे वे विषम हों वा सम हों। इस प्रकार सभी वर्षों का योग १०८ वर्ष होता है।।३२।। उदाहरण— पूर्वोक्त जन्मकुंडली में जन्मलग्न मकर समराशि है, अतः उत्क्रम गणना द्वारा दशा होगी। चक्र देखिए। नवांशकस्थिरदशाचक्रम्
| म. | ध. | वृ. | तु. | क. | सिं. | कं. | मि. | वृ. | मे. | मी. | कुं. | रा. |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ९ | ९ | ९ | ९ | ९ | ९ | ९ | ९ | ९ | ९ | ९ | ९ | व. |
| २०१३ | २२ | ३१ | ४० | ४९ | ५८ | ६७ | ७६ | ८५ | ९४ | २१०३ | १२ | २१ |
| ३ | ३ | ३ | ३ | ३ | ३ | ३ | ३ | ३ | ३ | ३ | ३ | |
| १८ | १८ | १८ | १८ | १८ | १८ | १८ | १८ | १८ | १८ | १८ | १८ | १८ |
अथ स्थिरदशामाह— अधुना सम्प्रवक्ष्यामि स्थिरदशां द्विजोत्तम। चरस्थिरद्विस्वभावा राशयो त्रिविधाः क्रमात्।।३३।।
४०६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् हे द्विजोत्तम ! अब मैं स्थिर दशा को कह रहा हूँ। चर, स्थिर, द्विस्वभाव ये तीन प्रकार की राशियाँ हैं।।३३।। सप्ताष्टनवाङ्काभ्याम् आनयीत दशां स्थिराम् ।।३४।। इसमें क्रम से ७, ८, ९ वर्ष के प्रमाण से दशा लानी चाहिए।।३४।। मेषे सप्ताङ्कं विज्ञेया वृषे वसुसमा द्विज। मिथुने नव वर्षाणि कर्केत्यादि यथाक्रमम् ।।३५।। जैसे मेष का ७ वर्ष, वृष का ८ वर्ष और मिथुन का ९ वर्ष प्रमाण होता है। इसी प्रकार आगे भी कर्क आदि का जानना।।३५।। द्वादशराशिपर्यन्तं ज्ञायतेऽङ्का द्विजोत्तम। षण्णवति समासंख्या जायते द्विजसत्तम।।३६।। बारह राशियों के वर्षों का योग ९६ वर्ष होता है।।३६।। एषा स्थिरदशा प्रोक्ता तस्या चापि प्रवर्त्तकम्। ब्रह्मग्रहाश्रितारम्भस्तदग्रे पूर्ववत्क्रमः ।।३७।। यह स्थिर दशा है और ब्रह्मग्रह से आरम्भ होती है।।३७।। अथ ब्रह्मग्रहलक्षणमाह- षष्ठाष्टमव्ययेशानां मध्ये यश्च बली ग्रहः। स चेद्विषमर्क्षे स्तः सैव ब्रह्मा भविष्यति ।।३८।। छठे, आठवें और बारहवें भावों के स्वामियों में जो बलवान् हो वह यदि विषमराशि में हो तो वही ब्रह्मग्रह होता है।।३८।। लग्नसप्तमयोर्मध्ये यो राशिः बलवान्भवेत् । तस्यानुचरराशीशो ओजे ब्रह्मग्रहो भवेत् ।।३९।। लग्न और सातवें भाव में जो बली हो उसका अनुचर (अर्थात् उस भाव से पीछे ६ राशि के अन्दर जो ग्रह हो, वह) यदि विषमराशि में हो तो वही ब्रह्मा होता है।।३९।। मध्ये शनिपातानां च यदि ब्रह्मस्य सम्भवः । तदा तस्माच्च षष्ठेशो ब्रह्मग्रहःसुनिश्चितम् ।।४०।। शनि, राहु और केतु में से कोई भी ब्रह्मा होता हो तो उससे षष्ठेश ब्रह्मा होता है।।४०।। बहूनां ब्रह्मसद्भावेऽधिकांशो भवेद्विधिः । तत्र राहुसमायोगेऽल्पांशो ब्रह्मणो भवेत् ।।४१।।
अथ दशाध्यायः ४०७ यदि बहुत से ब्रह्मा होते हों तो सबमें जिसका अधिक अंश हो वही ब्रह्मा होता है। यदि उसके साथ राहु हो तो अल्प अंश वाला ही ब्रह्मा होता है॥४१॥ कारकादष्टमस्थस्तथा चाष्टमेश्वरो ग्रहः। तयोर्मध्ये च बलवान्ब्रह्मग्रहः सुनिश्चितम्॥४२॥ कारक से आठवें भाव में वा अष्टमेश दोनों में जो बली हो वही ब्रह्मा होता है॥४२॥ उदाहरण— पीछे दिये हुए जन्मांग में षष्ठेश, अष्टमेश और व्ययेश, बुध, सूर्य और गुरु में बली गुरु ही है, अतः वही ब्रह्मग्रह हुआ। ब्रह्मग्रह विषमराशि सिंह में है, अतः सिंह से क्रम गणना के अनुसार दशा का आरम्भ हुआ। यदि कारक से अष्टमेश ले तो आत्मकारक भौम (पृ. ९७ देखो) से अष्टमेश बुध भी सिंह ही राशि विषम में है, अतः सिंह से ही क्रम गणना से दशा का आरम्भ हुआ। यहाँ आत्मकारक से दशा का आरम्भ लेना चाहिए। अथ स्थिरदशाचक्रम्—
| बृ. बु. | श. | ल. | मं. | शु.<br>चं. | सू. | ग्रहाः | ||||||
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १ | २ | ३ | ४ | राशयः |
| ८ | ९ | ७ | ८ | ९ | ७ | ८ | ९ | ७ | ८ | ९ | ७ | वर्षाणि |
| २०१३ | २१ | २७ | ३४ | ४२ | ५१ | ६१ | ७२ | ८४ | ८५ | ८७ | ९० | २-९४ |
| ३<br>१८ | ३<br>१८ | ३<br>१८ | ३<br>१८ | ३<br>१८ | ३<br>१८ | ३<br>१८ | ३<br>१८ | ३<br>१८ | ३<br>१८ | ३<br>१८ | ३<br>१८ | सूर्यः |
इति स्थिरदशा। अथ ब्रह्मदशामाह— ओजलग्ने यदा जन्म विधेराश्रितराशितः। स्वराशेः षष्ठेशपर्यन्तमङ्कास्तु सदा द्विज॥४३॥ यदि विषमलग्न में जन्म हो तो ब्रह्मग्रहाश्रित राशि से दशा का आरम्भ क्रम से होता है और राशियों के दशा का वर्ष उस राशि से छठी राशि के स्वामी पर्यन्त संख्या होती है॥४३॥
४०८ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् समलग्ने यदा जन्म विधेः सप्तमराशितः । व्युत्क्रमाच्च दशानेया एषा ब्रह्मदशा मता ॥४४॥ यदि समलग्न में जन्म हो तो ब्रह्मग्रहाश्रित राशि से जो सातवीं राशि है उससे विलोम राशियों की दशा होती है। यहाँ भी वर्षसंख्या पूर्ववत् ही लेना चाहिए। इसे ब्रह्मग्रहदशा कहते हैं॥४४॥ उदाहरण— पूर्वोक्त कुंडली में जन्मलग्न सम है, अतः ब्रह्मग्रह गुरु से सातवीं राशि कुम्भ है, उसी से विलोम राशियों की कुंभ, मकर, धन आदि की दशा होगी। दशा वर्ष के विचार से कुम्भ से छठी राशि कर्क है, इसके स्वामी चन्द्रमा हैं जो कि छठे भाव में है, अतः कुंभ से गणना करने से ५ वर्ष कुंभ के हुए। इसी प्रकार मकर से छठी राशि मिथुन है, इसके स्वामी बुध आठवें भाव में हैं, यहाँ तक गिनने से ७ वर्ष मकर के हुए। इसी प्रकार शेष राशियों के वर्ष को भी जानना। शेष चक्र से स्पष्ट है। ब्रह्मदशाचक्रम्—
| मं. | ल. | श. | बु.<br>बृ. | सू. | चं.<br>शु. | ग्रहाः | ||||||
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| कुं. | म. | ध. | वृ. | तु. | क. | सिं. | कं. | मि. | वृ. | मे. | मी. | राशयः |
| ५ | ७ | ६ | ३ | १० | ३ | ३ | १ | ८ | १ | ४ | ५ | वर्षाणि |
| २०१३ | १८ | २५ | ३१ | ३४ | ४४ | ४७ | ५० | ५१ | ५९ | ६० | ६४ | २०६९ |
| ३/१८ | ३/१८ | ३/१८ | ३/१८ | ३/१८ | ३/१८ | ३/१८ | ३/१८ | ३/१८ | ३/१८ | ३/१८ | ३/१८ | ३/१८ |
| अथ केन्द्रदशामाह— | ||||||||||||
| लग्नास्तभावयोर्मध्ये यो राशिर्बलवान् द्विज । | ||||||||||||
| ततः केन्द्रादिस्थितानां राशीनां च बलक्रमात् ॥४५॥ | ||||||||||||
| लग्न और सप्तम में जो बली राशि हो उससे आरम्भ कर पहले केन्द्रस्थ | ||||||||||||
| राशियों की उनके बल के अनुसार, इसके बाद पणफरस्थ राशियों की, | ||||||||||||
| इसके बाद आपोक्लिमस्थ राशियों की दशा होती है॥४५॥ | ||||||||||||
| केन्द्रादिस्थितराशीनां दशा ज्ञेया द्विजोत्तम । | ||||||||||||
| दशाब्दांश्चात्र भो विप्र चरवच्च समादिशेत् ॥४६॥ | ||||||||||||
| यहाँ राशियों का दशावर्ष चरदशा के समान ही लेना चाहिए॥४६॥ |
अथ दशाध्यायः ४०९ गहेन्द्राणामप्येवं स्वकारकाच्च दशां नयेत्। ओजसमविभेदाच्च गणनात्रापि कारयेत्॥४७॥ यह लग्न की केन्द्रादि दशा हुई। इसी प्रकार आत्मकारक ग्रह से भी केन्द्रादि राशियों की दशा होती है, किन्तु विषम-सम राशि के अनुसार क्रम-उत्क्रम से गणना होती है। अर्थात् कारक ग्रह यदि विषम राशि में हो तो केन्द्र, पणफर, आपोक्लिम की और समराशि में हो तो केन्द्र, आपोक्लिम, पणफर की दशा क्रम से होती है। इसी प्रकार भावों में बैठे हुए ग्रहों की भी दशा होती हैं॥४७॥ विशेष— केन्द्र दशा के दो भेद हैं। प्रथम लग्न से केन्द्रस्थित राशियों का और दूसरा कारक से केन्द्रस्थित राशियों का। इसमें भी प्रथम प्रकार में लग्न से केन्द्र स्थित राशियों में जो सबसे बलवान् हो उसकी सर्वप्रथम, उसके बाद उत्तरोत्तर न्यूनबली की दशा होती है। इसके बाद पणफरस्थ राशि की इसके बाद आपोक्लिमस्थ राशि की दशा होती है। यहाँ भी विषम-समराशि के अनुसार ही क्रम-उत्क्रम गणना केन्द्रादि में करनी चाहिए। राशियों के वर्ष क्रम दशा के समान ही लेना चाहिए। दूसरे प्रकार में यदि कारक विषम राशि में हो तो कारक से केन्द्र, पणफर और आपोक्लिम की और समराशि में हो तो केन्द्र, आपोक्लिम और पणफर की स्थित राशियों की दशा होती है। उदाहरण— पीछे दिये हुए उदाहरण के जन्मांग में आत्मकारक भौम कुम्भ राशि में और उससे सप्तम सिंह राशि, दोनों में बली कुम्भ राशि है, अतः कुम्भराशि से ही दशा आरम्भ होगी। इसके बाद कारक से केन्द्रस्थित राशि कुम्भ, वृष, सिंह, वृश्चिक में बलक्रम से दशा होगी, इसके बाद पणफरस्थ मकर, मेष, कर्क, तुला राशि की, इसके बाद धन, मीन, मिथुन और कन्या राशि की बलक्रम से दशा होगी। कारककेन्द्रदशाचक्रम्—
| कुं. | वृ. | सिं. | वृ. | म. | मे. | तु. | क. | ध. | मी. | मि. | कं. |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ३ | १ | ११ | ९ | २ | १० | ४ | १० | ८ | ७ | २ | ११ |
| २०१५ | १८ | १९ | ३० | ३९ | ४१ | ५१ | ५५ | ६५ | ७३ | ८० | ८२ | ९३ |
| ३ | ३ | ||||||||||
| १८ | १८ |
४१० बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् कारकेन्द्रग्रहदशामाह- लग्नाद्वा सप्तमाद्विप्र गणनीयः क्रमोत्क्रमात् ।।४८ ।। कारकावधिराशिश्च संख्या तत्रात्मिकाः समाः ।।४८ ।। लग्न या सप्तम से क्रम वा उत्क्रम रीति से गणना करना चाहिए। कारक पर्यन्त राशियों का दशावर्ष होता है।।४८।। कारकग्रहदशा विप्र अन्येषां तु व्यतिक्रमः। ग्रहात्कारकपर्यन्तं विषमसमविरोधतः ।।४९ ।। कारक ग्रह की दशा इस प्रकार होती है। ग्रह से कारक पर्यन्त विषम- सम के विरोध से क्रम-उत्क्रम के भेद से दशावर्ष को जानना चाहिए।।४९।। क्रमव्युत्क्रमभेदेन गणनीयं प्रयत्नतः। संख्या समा इहाब्दाश्च पुरा शम्भुप्रणोदिताः ।।५० ।। कारक से युक्त ग्रह की दशा की संख्या कारक के तुल्य ही होती है। अन्य कारकों के दशावर्ष लग्न से कारक पर्यन्त संख्या को लेना चाहिए।।५०।। कारक्युक्तग्रहाणां तु कारकतुल्याङ्कसंख्यया। संग्राह्याश्च समा विप्र पूर्वोक्तेन दशाक्रमः ।।५१ ।। उनके साथ जो ग्रह हों उनका दशावर्ष भी उन्हीं के तुल्य लेना चाहिए।।५१।। लग्नात्कारकपर्यन्तं संख्यां न्यस्य दशा भवेत्। गणनीयं प्रयत्नेन समालब्धदशां नयेत् ।।५२ ।। दोनों में जो अधिक संख्या हो वही कारक के दशावर्ष की संख्या होती है।।५२।। तद्युक्तानां तुल्याङ्काः प्रत्येकं स्युर्दशाक्रमात्। उभयोरधिकं संख्या कारकस्य दशासमाः ।।५३ ।। कारकस्य युतश्चादौ तत्केन्द्रादिस्थितस्ततः। दशाक्रमेण विज्ञेयाः शुभाशुभफलप्रदाः ।।५४ ।। पहले कारक की, उसके बाद उससे युत ग्रह की, उसके बाद उससे पणफरस्थ की, उसके बाद उससे आपोक्लिमस्थ की दशा होती है।।५४।।
अथ दशाध्यायः ४११ विशेष- उपर्युक्त श्लोकों में दो प्रकार की दशा का संकेत है। एक कारक से केन्द्रादि में स्थित ग्रहों की और दूसरा आत्मादि सात कारकों की दशा का है। किन्तु दशा के वर्ष की गणना ग्रह की राशि पर्यन्त ही क्रम- उत्क्रम से लेना चाहिए। जिस ग्रह की दो राशियां हैं उनमें जिस राशि से अधिक दशा वर्ष आवे उसी को लेना चाहिए। सात कारकों के दशावर्ष लग्न से उन-२ कारकों के दशावर्ष लग्न से उन-उन कारकों तक गिनने से जो संख्या हो उतने ही वर्ष दशा का लेना चाहिए। अथ कारककेन्द्रदशाचक्रम्-
| मं. | के. | बृ. | शु. | श. | रा. | चं. | शु. | सू. |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ९ | .६ | ७ | १३ | ३ | ९ | १ | ११ | १ |
| २०१५ | २४ | ३० | ३७ | ४० | ४३ | ५२ | ५३ | ६४ <br> २०६५ |
| ३ <br> १८ | ३ <br> १८ |
अथ मण्डूकदशा- मण्डूक इति विख्याता त्रिकूटाख्या दशा द्विज। लग्नसप्तमयोर्मध्ये बलवद्राशितो भवेत् ॥५५॥ त्रिकूट दशा को ही मंडूक दशा कहते हैं। लग्न सप्तम में जो बलवान् राशि हो॥५५॥ क्रमव्युत्क्रमभेदेन दशाश्चिन्त्या द्विजोत्तम । चरस्थिरद्विस्वभावे सप्ताष्टनवसंख्यया ॥५६॥ वहाँ (ओज-सम के अनुसार) क्रम-उत्क्रम भेद से चर आदि राशियों की दशा होती है। चर राशियों की ७ वर्ष, स्थिर राशियों की ८ वर्ष और द्विस्वभाव राशियों की ९ वर्ष की दशा होती है॥५६॥ क्रमेण प्रोक्तरीत्या च प्रवृत्तः स्यात् त्रिकूटका । मण्डूकेति समाख्याता पुरा शम्भुप्रणोदितम् ॥५७॥ इस प्रकार चर-स्थिर-द्विस्वभाव राशियों की त्रिकूट दशा के मध्य में २ राशियों का अन्तर होने से इसे मंडूक गति के समान होने से मंडूक दशा कहते हैं॥५७॥
४१२ वृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् उदाहरण— पूर्वोक्त जन्मकुंडली में लग्न और सप्तम में बली लग्न सम राशि की है; अतः उत्क्रम से ९,१२,३,६,१०,१,४,७,११,२,८,५ इन राशियों की दशा होगी। शेष चक्र में स्पष्ट है। मण्डूकदशाचक्रम्—
| ३ध. | मी. | मि. | क. | म. | मे. | कं. | तु. | कुं. | वृ. | सिं. | वृ. |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ९ | ९ | ९ | ९ | ७ | ७ | ७ | ७ | ८ | ८ | ८ | ८ |
| २०१३ | २२ | ३१ | ४० | ४९ | ५६ | ६३ | ७० | ७७ | ८५ | ९३ | २००१<br>२००९ |
| ३<br>१८ | ३<br>१८ |
इति मण्डूकदशा। अथ शूलदशामाह— दशाशूलं प्रवक्तव्यं फलनिर्याणराशितः। प्रवक्ति सप्तमाद्विप्र निर्देशे शूलमात्रतः।।५८।। निर्याण की राशि से शूलदशा का फल कहना चाहिए। वह सप्तम से शूल का विचार करना चाहिए।।५८।। माहेश्वरर्क्षादि दशा निर्याणस्थानशूलभम्। बलेन शूलसंग्राह्या मृत्युरस्य द्विजोत्तम।।५९।। माहेश्वर ग्रह की राशि से निर्याण राशि को शूल राशि कहते हैं।।५९।। दशानेकविधा विप्र सप्ताष्टनवभिः समाः। अत्र ग्राह्या महाप्राज्ञ शूले निर्याणनिश्चितम्।।६०।। लग्न और सप्तम से आठवीं राशि को निर्याण राशि कहते हैं। इसमें दशा वर्ष (स्थिर दशा के समान ही) ७, ८, ९ वर्ष की होती है।।६०।। लग्नसप्तमयोर्विप्र क्रमोत्क्रमगणनया। तयोस्तु रन्ध्रभं विप्र शूलराशिश्च निश्चितम्।।६१।। लग्न और सप्तम से क्रम और उत्क्रम (विषम-सम) के अनुसार आठवीं राशियों में जो बली हो वही शूल वा निर्याण राशि होती है।।६१।। रन्ध्रेशयोर्बली विप्र रुद्रसंज्ञो भवेत्किल। रुद्रशूलान्तमायुः स्यादिति पूर्वैश्च भाषितम्।।६२।।
अथ दशाध्यायः ४१३ दोनों के स्वामियों में जो बली होता है वही रुद्रग्रह होता है। रुद्रशूलान्त ही आयु होती है।।६२।। उदाहरण- जन्मांग में लग्न से अष्टम सिंह राशि में बुध-गुरु हैं और सप्तम से अष्टम में कुम्भ राशि है उसमें मंगल है, अतः दोनों में बली सिंह राशि से क्रम गणना के अनुसार ही शूलदशा होगी। शूलदशाचक्रम्-
| सिं. | कं. | तु. | वृ. | ध. | म. | कुं. | मी. | मे. | वृ. | मि. | क. |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ८ | ९ | ७ | ८ | ९ | ७ | ८ | ९ | ७ | ८ | ९ | ७ |
| २०१३ | २१ | ३० | ३७ | ४५ | ५४ | ६१ | ६९ | ७८ | ८५ | ९३ | २१०२<br>२१०९ |
| ३<br>१८ | ३<br>१८ |
इति शूलदशा। अथ योगार्धदशामाह- चरस्थिरदशायाश्च योगं विप्र समाचरेत्। तस्यार्धञ्च समा विप्र योगार्धाख्या तु सा दशा ।।६३।। चरदशा और स्थिरदशा की राशियों के दशावर्ष के योग के आधे तुल्य योगार्ध दशा में राशियों का दशावर्ष होता है।।६३।। लग्नसप्तमयोर्मध्ये चिन्तयेत्तु बलाधिकम्। लग्ने बलयुते लग्नाद्दशारम्भं प्रकाशयेत् ।।६४।। लग्न और सप्तम में जो राशि बलवान् हो उसी से दशा का प्रारम्भ होता है।।६४।। तस्मात्सप्तमवीर्याढ्ये दशारम्भं प्रकल्पयेत्। बली लग्नास्तयोर्विप्र ओजसमक्रमेण वै। क्रमव्युत्क्रममार्गेण दशा लेख्या द्विजोत्तम ।।६५।। लग्न सप्तम में बली राशि विषम हो तो क्रम से, समराशि हो तो उत्क्रम से गणना होती है।।६५।। उदाहरण- जैसे कुंडली में लग्न राशि बली है और सम राशि है, अतः जन्मलग्न से उत्क्रम गणना से दशा का आरम्भ होगा। जन्मलग्न
४१४ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् मकर है, चर दशा में इसका दशावर्ष २ है और स्थिर दशा में ७. वर्ष, दोनों का योगार्ध ४ वर्ष ६ मास हुआ; यह मकर का दशावर्ष हुआ। इसी प्रकार शेष राशियों के दशावर्ष को निकालना चाहिए। अथ योगार्धदशाचक्रम्-
| म. | ध. | वृ. | तु. | कं. | सिं. | कं. | मि. | वृ. | मे. | मी. | कुं. | |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ४ | ८ | ८ | ५ | १० | ९ | ८ | ५ | ४ | ८ | ८ | ५ | |
| ६ | ६ | ६ | ६ | ० | ६ | ६ | ६ | ६ | ६ | ० | ६ | |
| २०१३ | १७ | २६ | ३४ | ४० | ५० | ५९ | ६८ | ७३ | ७८ | ८६ | ९४ | २१०० |
| ३ | ९ | ३ | ९ | ३ | ९ | ३ | ९ | ३ | ९ | ३ | ९ | ३ |
| १८ | १८ | १८ | १८ | १८ | १८ | १८ | १८ | १८ | १८ | १८ | १८ | १८ |
इति योगार्धदशा। अथ दृग्दशामाह- कुजादिति स विज्ञेया विलग्ननवमादितः। क्रमत्रये कूटपदं नाम्ना वै दृग्दशा द्विज।।६६।। लग्न से आरम्भ कर नवम राशि से ९, १०, ११ राशियों से दशा का आरम्भ होता है। इन तीन राशियों को त्रिकूट कहते हैं।।६६।। दृष्टिचक्रे सम्मुखश्च राश्यादौ नवमस्य च। कुत्रचित्क्रमरीत्या च कुत्रचित्व्युत्क्रमेण च।।६७।। इन्हीं तीन राशियों को देखने वाली तीन-तीन राशियों की दशा होती है, अतः इसे दृग्दशा कहते हैं। नवम की और नवम की दृष्ट राशियों की दशा होगी; इसी प्रकार दशम और उसके दृष्ट राशियों की, पुनः एकादश राशि और उसके दृष्ट राशियों की दशा होगी। कहीं क्रम गणना और कहीं उत्क्रम गणना होगी।।६७।। ततोऽपि पञ्चमस्यैवं क्रमेण कुत्रचिद्द्विज। कुत्रचिद् व्युत्क्रमेणैव राश्यैकादशसम्मुखम् ।।६८।। उसमें भी पाँचवीं (सिंह राशि) और उसके सम्मुख ग्यारहवीं ।।६८।। तस्याभावप्रमाणो हि न ग्राह्यं द्विजसत्तम। संग्राह्यं पञ्चमस्यैव दृष्टिचक्रे विशेषतः।।६९।। (कुंभ) राशि की क्रम गणना करनी चाहिए।।६९।।
अथ दशाध्यायः ४१५ अभिपश्यन्ति ऋक्षाणि पार्श्वभे द्विजसत्तम। पूर्वोक्तरीत्या तदेव त्रिकूटपदमुच्यते ।।७०।। त्रिराश्यात्मकूटपदं ततोऽपि दशमस्य च। दृग्दशैकादशे ज्ञेया नवमस्यापि दृग्दशा ।।७१।। इसी प्रकार दशम राशि से दृष्टिचक्र के अनुसार गणना करनी चाहिए ।।७१।। फलार्थे दृग्दशा विप्र संगृह्यैकादशेऽपि च। तस्याः प्रकारं वक्ष्येऽहं पुनरुक्तं विशेषतः ।।७२।। अब मैं पुनः ओज (विषम) समराशि के अनुसार गणना को कह रहा हूँ ।।७२।। अथोजयुग्मभेदेन गणनाक्रममिहोच्यते। यथासामान्यसंज्ञेयं युग्मेषु मातृघर्मयोः ।।७२।। सिंह और कुम्भ राशियों में विषम होते हुए भी सामान्य अर्थात् क्रम. गणना ।।७२।। गणनायां च सामान्यं पञ्चमैकादशे द्विज। क्वचिद्विद्यात्मकं ज्ञेयं सामान्यत्रयकूटके ।।७४।। अथोजपदयोर्विप्र संज्ञेयं विपरीततः। युग्मे युग्मपदयोश्च यथासामान्ययोजकम् ।।७५।। क्रमाद्वृषे वृश्चिके च इत्युक्तेन द्विजोत्तम। अत्रापि ओजकूटस्थे पञ्चमैकादशे क्रमात् ।।७६।। समपदीय राशि होते हुए भी और ओजपदीय मेष, वृष और तुला वृश्चिक में मेष तुला की विषम होते हुए भी उत्क्रम और वृष- वृश्चिक की सम होते हुए भी क्रम गणना करनी चाहिए ।।७४-७६।। दृग्योग्यं च भवेद्विप्र दृग्दशा बलदायिका। युग्मकूटस्थसामान्यं व्युत्क्रमात्सिंहकुम्भयोः ।।७७।। बलवान् दृग्दशा दृगयोग्य होती है। युग्म (सम) कूट में सामान्य गणना होते हुए भी सिंह और कुम्भ राशियों में उत्क्रम गणना करनी चाहिए ।।७७।। पञ्चमैकादशौ विप्र दृगयोग्यौ भवतस्तथा। पुंराशिर्द्विस्वभावस्य ज्ञेया तस्य क्रमेण च ।।७८।।