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बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

अथ प्रत्यन्तर्दशाऽध्यायः । ५५९ से पीड़ा, नीच से भय और शत्रु भय की शंक' होती है।।६९।। कामिनीभ्यो भयं भूयात्तथा वैरिसमुद्भवः । शूद्रादपि भवेद्भीतिः केतोः केत्वन्तरे तमः ।।७०।। (के.र.) केतु के अंतर में राहु के प्रत्यंतर में स्त्रियों से भय, राजा से तथा शत्रुओं से भय शूद्र से भी भय होता है।।७०।। धनहानिर्महोत्पातो वस्त्रमित्रविनाशनम् । सर्वत्र लभते क्लेशं केतोः केत्वन्तरे गुरुः ।।७१।। (के.बृ.) केतु के अंतर में गुरु के प्रत्यंतर में धन की हानि, महाउत्पात, वस्त्र, मित्र की हानि और सर्वत्र क्लेश होता है।।७१।। गोमहिष्यादिमरणं देहपीडा सुहृद्वधः । स्वल्पालपलाभकरणं केतोः केत्वंतरे शनिः ।।७२।। (के.श.) केतु के अंतर में शनि के प्रत्यंतर में गौ भैंस आदि का मरण, शरीर में पीड़ा, मित्रों का वध और थोड़ा-थोड़ा लाभ होता है।।७२।। बुद्धिनाशो महोद्वेगो विद्याहानिर्महाभयम् । कार्यसिद्धिर्न जायेत केतोः केत्वन्तरे बुधः ।।७३।। (के.बु.) केतु के अन्तर में बुध के प्रत्यंतर में बुद्धि का नाश, बड़ा उद्वेग, विद्या की हानि महाभय और कार्य की सिद्धि में बाधा होती है।।७३।। इति केतु प्रत्यंतर फलम्। अथ शुक्रान्तरेशुक्रादीनां प्रत्यतरफलम्- श्वेताश्ववस्त्रमुक्ताद्याः स्वर्णमाणिक्य संभवः । लभते सुन्दरी नारी शुक्रे शुक्रांतरे भृगुः ।।७४।। (शु.शु.) शुक्र के अन्तर में शुक्र के प्रत्यंतर में सफेद घोड़ा, सफेद वस्त्र, मोती का लाभ सुवर्ण माणिवय के लाभ की संभावना और सुन्दरी स्त्री का लाभ होता है।।७४।। वातज्वरः शिरःपीडा राज्ञः पीडा रिपोरपि । जायते स्वल्पलाभोऽपि शुक्रे शुक्रान्तरे रविः ।।७५।। (शु.सू.) शुक्र के अंतर में सूर्य के प्रत्यंतर में वातज्वर, शिर में पीड़ा, राजा और शत्रु से पीड़ा और अल्प लाभ होता है।।७५।।

५६० वृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । कन्याजन्म नृपाल्लाभो वस्त्राभरणसंयुतः । राज्याधिकारसंप्राप्ति शुक्रे शुक्रान्तरे शशी ॥७६॥ (शु.चं.) शुक्र के अंतर में चन्द्रमा के प्रत्यंतर में कन्या का जन्म, राजा से वस्त्र-आभूषण का लाभ और राज्याधिकार की प्राप्ति होती है।।७६।। रक्तपित्तादिरोगश्च कलहंताडनं भवेत् । महान्क्लेशोभवेद्र शुक्रे शुक्रान्तरे कुजः ।।७७।। (शु.मं.) शुक्र के अंतर में भौम के प्रत्यंतर में रक्त-पित्त के रोग, कलह-ताडना, और बड़ा कष्ट होता है।।७७।। कलहो जायते स्त्रीभिरकस्माद्भयसंभवः । राजतः शत्रुत: पीडा शुक्रे शुक्रान्तरेतमः ।।७८।। (शु.रा.) शुक्र के अंतर में राहु के प्रत्यंतर में काक सतत् स्त्री से झगड़ा और भय और राजा तथा शत्रु से पीड़ा होती है।।७८।। महद्द्रव्यं महद्राज्यं वस्त्रमुक्तादिभूषणम् । गजाश्वादिपदप्राप्तिः शुक्रे शुक्रान्तरे गुरुः ।।७९।। (शु.वृ.) शुक्र के अंतर में गुरु के प्रत्यंतर में बड़े द्रव्य, बड़े राज्य, वस्त्र, मुक्ता आदि के. आभूषण, हाथी-घोड़ा पद की प्राप्ति होती है।।७९।। खरोष्ट्रछागसम्प्राप्तिर्लोहमाषतिलादिकम् ।

अथ सूक्ष्मान्तरदशाध्यायः । ५६१ अथ सूक्ष्मान्तरदशाध्यायः । तत्रादौ सूक्ष्मांतरानयनप्रकारः- ग्रहवर्षेण संगुण्यं प्रत्यन्तरघटिकादिकम् । विंशोत्तरशतेनाप्तं सूक्ष्मान्तरदशामितिः ॥१॥ जिस ग्रह के प्रत्यंतर में जिस ग्रह का सूक्ष्मान्तर लाना हो उस ग्रह की दशा वर्ष से प्रत्यन्तर के (घटिकादिपिंडबनाकर) घटिकादि को गुणाकर गुणनफल में १२० का भाग देने से लब्धि घटिका और शेष को ६० से गुणाकर पुनः १२० का भाग देने से फल जो प्राप्त होता है इस प्रकार घटी-पल वा दिन (यदि घटी ६० से अधिक हो तो उसमें साठ से भाग देने से लब्धि दिन होता है) सूक्ष्म अन्तर होता है॥१॥ उदाहरण-जैसे सूर्य के प्रत्यंतर में सूर्यादि ग्रहों का सूक्ष्मान्तर लाना है तो सूर्य का प्रत्यन्तर ५ दिन २४ घटी है। इसका पिड ५×६०+२४ = ३२४ घटी हुआ इसे सूर्य के दशावर्ष ६ से गुणने ३२४×६ = १९४४ हुआ इसमें १२० का भाग देने से लब्धि १६ घटी और शेष २४ को ६० गुणने से २४×६० = १४४० हुआ इसमें १२० का भाग देने से १२ पल हुआ अर्थात् सूर्य के प्रत्यंतर घटी पिंड को चन्द्रमा के दशा वर्ष १० से गुणनकर १२० का भाग देने से २७ घटी सूर्य के प्रत्यंतर में चंद्रमा का सूक्ष्मान्तर हुआ। इसी प्रकार सभी ग्रहों का सूक्ष्मांतर लाना चाहिये। अथसूर्यप्रत्यंतरे सूर्यादीनांसूक्ष्मन्तरदशाफलम्- नृणां भूमिपरित्यागो नियतं प्राणनाशनम् । स्थाननाशो महाहानिः सूर्यसूक्ष्मदशाफलम् ॥२॥ (सू.सू.) सूर्य के प्रत्यंतर में सूर्य के सूक्ष्मांतर में मनुष्य को भूमि का त्याग करना पड़ता है, प्राण नाश की आशंका और स्थान का नाश होता है॥२॥ देवब्राह्मणभक्तिश्च नित्यकर्मरतस्तथा । सुप्रीतिः सर्वमित्रैश्च रवेः सूक्ष्मगते विधौ ॥३॥ (सू.चं.) सूर्य के प्रत्यंतर में चन्द्रमा के सूक्ष्मांतर में देवता ब्राह्मण में भक्ति, नित्यकर्म में आसक्ति और सभी मित्रों से सुन्दर प्रेम होता है॥३॥ क्रूरकर्मरतिस्तिग्मशत्रुभिः परिपीडनम् । रक्तस्त्रावादिरोगश्च रवेः सूक्ष्मगते कुजे ॥४॥ (सू. मं.)

५६२ वृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । सूर्य के प्रत्यंतर में भौम के सूक्ष्मान्तर में क्रूरकर्म में आसक्ति, शत्रुओं से पीड़ा और रक्तस्राव के रोग होते हैं ।।४।। चौराग्विविषभीतिश्च रणे भंगः पराजयः । दानधर्मादिहीनश्च रवेः सूक्ष्मगते ह्यगौ ।।५।। (सू.रा.) सूर्य के प्रत्यंतर में राहु के सूक्ष्मांतर में चोर, अग्नि, विष से भय, संग्राम में विफलता वा पराजय और दान-धर्म से हीन होता है।।५।। नृपसत्कारराजार्हः सेवकैः परिपूजितः । राजचक्षुर्गतः शान्तः सूर्यसूक्ष्मगतेगुरौ ।।६।। (सू.वृ.) सूर्य के प्रत्यंतर में गुरु के सूक्ष्मांतर में राजा के समान सत्कार, नौकरो से पूजित और राजा का कृपापात्र और शांत होता है।।६।। धैर्यसाहसकर्मार्थ देवब्राह्मणपीड़नम् । स्थानच्युतिं मनोदुःखं रवेः सूक्ष्मगतेशनौ ।।७।। (सू.शं.) सूर्य के प्रत्यंतर में शनि के सूक्ष्मांतर में धैर्य और साहस के कार्य के लिये देवता और ब्राह्मण का पीड़न, स्थान की हानि और मन में दुःख होता है।।७।। दिव्याम्बरादिलब्धिश्च दिव्यस्त्रीपरिभोगता । अचिंतितार्थसिद्धिश्च रवेः सूक्ष्ममते बुधे ।।८।। (सू.बु.) सूर्य के प्रत्यंतर में बुध के सूक्ष्मांतर में दिव्य वस्त्र आदि की प्राप्ति, दिव्य स्त्री का योग और अचिंतित कार्य की सिद्धि होती है।।८।। गुरुतार्त्तिविनाशश्च भृत्यदारभवस्तथा । क्वचित्सेवकसम्बन्धो रवेः सूक्ष्मतेध्वजे ।।९।। (सू.के.) सूर्य के प्रत्यंतर में केतु के सूक्ष्मांतर में गौरव नौकर और स्त्री जनित दुःख का नाश और कभी किसी सेवक से संबंध भी होता है।।९।। पुत्रमित्रकलत्रादिसौख्यसम्पन्न एव च । नानाविद्या च सम्पत्ती रवेः सूक्ष्मगते भृगौ ।।१०।। (सू.शु.) सूर्य के प्रत्यंतर में शुक्र के सूक्ष्मांतर में पुत्र, मित्र, स्त्री आदि का सुख सम्पन्न होता है और अनेक प्रकार की सम्पत्ति का लाभ होता है।।१०।। इति रवौ सूक्ष्मांतरफलम्।

अथ सूक्ष्मन्तरदशाध्यायः । ५६३ अथचंद्राप्रत्यंतरेचंद्रादीनांसूक्ष्मांतरफलम्- भूषणं भूमिलाभश्च सन्मानं नृपपूजनम् । तामसत्वं गुरुत्वं च चन्दसूक्ष्मदशाफलम् ॥१९१॥ (चं.चं.) चन्द्रमा के प्रत्यन्तर में चन्द्रमा के सूक्ष्मान्तर में आभूषण तथा भूमि का लाभ, सन्मान और राजा से पूजन, तामस और गुरुता होता है॥१९१॥ दुःखं शत्रुविरोधश्च कुक्षिरोगः पितुर्मृतिः । वातपित्तकफोद्रेकः शशिसूक्ष्मगते कुजः ॥१९२॥ (चं.मं.) चन्द्रमा के प्रत्यंतर में भौम के सूक्ष्मान्तर में दुःख, शत्रु से विरोध, कुक्षीस्थान में रोग, पिता की मृत्यु और वात-पित्त-कफ का रोग होता है॥१९२॥ क्रोधनं मित्रबंधूनां देशत्यागो धनक्षयः । विंदेशात्रिगडप्राप्तिरिन्दुसूक्ष्मगतेत्यहौ ॥१९३॥ (चं.स.) चन्द्रमा के प्रत्यंतर में राहु के सूक्ष्मान्तर में मित्र तथा बन्धुओं से द्वेष, देश का त्याग, धन का नाश, विदेश में बंधन होता है॥१९३॥ छत्रचामर संयुक्तं वैभवं पुत्रसम्पदः । सर्वत्र सुखमाप्नोति चन्द्रसूक्ष्मगतेगुरौ ॥१९४॥ (चं.रा.) चन्द्रमा के प्रत्यंतर में गुरु के सूक्ष्मान्तर में छत्र-चामर युक्त राज वैभव की प्राप्ति पुत्र का लाभ और सुख होता है॥१९४॥ राजोपद्रवनाशः स्याद्व्यवहारे धनक्षयः । चौरत्वं विप्रभीतिश्च चन्द्रसूक्ष्मगते शनौ ॥१९५॥ (चं.श.) चन्द्रमा के प्रत्यन्तर में शनि के सूक्ष्मान्तर में राजा के उपद्रव से हानि, रोजगार में धन की हानि, चोरी और ब्राह्मण से भय होता है॥१९५॥ राजमानं वस्तुलाभं विदेद्वाहनादिकम् । पुत्रपौत्रसमृद्धिश्च चन्द्र सूक्ष्मगते बुधे ॥१९६॥ (चं.बु.) चन्द्रमा के प्रत्यन्तर में बुध के सूक्ष्मान्तर में राजा से प्रतिष्ठा, वस्तु का लाभ, विदेश से वाहनादि का लाभ और पुत्र-पौत्र आदि समृद्धि का लाभ होता है॥१९६॥ आत्मनो वृत्तिहननं सस्यशृंगवृषादिभिः । अग्निसूर्यादिभीतिः स्याच्चन्द्रसूक्ष्मगतेध्वजे ॥१९७॥ (चं.के.) चन्द्रमा के प्रत्यन्तर में केतु के सूक्ष्मान्तर में धान्य मृग और बैल आदि से

५६४ वृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । अपने वृत्ति का उच्छेद, और अग्नि तथा सूर्य से भय होता है।।१७।। विवाहो, भूमिलाभश्च वस्त्राभरणवैभवम् । राज्यलाभश्च कीर्त्तिश्च चन्द्रसूक्ष्मगते भृगौ ।।१८।। (चं.शु.) चन्द्रमा के प्रत्यन्तर में शुक्र के सूक्ष्मान्तर में विवाह, भूमि का लाभ, वस्त्र, आभूषण आदि वैभव, राज्यलाभ और यश होता है।।१८।। क्लेशात्क्लेशः कार्यनाशः पशुधान्यधनक्षयः । गात्रवैषम्यभूमिश्च चन्द्रसूक्ष्मगते रवौ ।।१९।। (चं.सू.) चन्द्रमा के प्रत्यन्तर में सूर्य के सूक्ष्मान्तर में क्लेश से क्लेश, कार्य की हानि, पशु, धान्य और पशु का नाश, शरीर तथा भूमि में विषमता होती है।।१९।। इति चन्द्रसूक्ष्मान्तर फलम्। अथ भौम प्रत्यन्तरे भौमादीनां सूक्ष्मान्तर फलम् - भूमिहानिर्मनः खेदोह्यपस्मारी च बंधुयुक् । पुरक्षोभमनस्तापो भौमसूक्ष्मदशाफलम् ।।२०।। (मं.मं.) भौम के प्रत्यन्तर में भौम के सूक्ष्म अंतर में भूमि की हानि, चित्त में खेद, मृगी रोग, बंधु से युक्त, ग्राम से क्षोभ और मन में संताप होता है।।२०।। अङ्गदोषो जनाद्भीतिः प्रमदावंशनाशनम् । वह्निसर्पभयं घोरं भौमसूक्ष्मगतेप्यहौ ।।२१।। (मं.रा.) भौम के प्रत्यन्तर में राहु के सूक्ष्मान्तर में किसी अंग में विकार लोगों से भय, कन्या की हानि, और अग्नि तथा सर्प से बड़ा भय होता है।।२१।। देहपूजारतिश्चात्र मंत्राभ्युत्थानतत्परः । लोकपूज्यं प्रमादं च भौमसूक्ष्मगते गुरौ ।।२२।। (मं.वृ.) भौम के प्रत्यन्तर गुरु के सूक्ष्मान्तर में देह की पूजा, मंत्र साधन में रति, लोक से पूजा और प्रमाद होता है।।२२।। बंधनान्मुच्यते बद्धो धनधान्यपरिच्छदः । भृत्यार्थबहुलः श्रीमान्भौमसूक्ष्मगते शनौ ।।२३।। (मं.श.) भौम के प्रत्यन्तर में शनि के सूक्ष्मान्तर में बंधन से मुक्ति, धन, धान्य, नौकर आदि विशेष होते हैं।।२३।।

अथ सूक्ष्मान्तरदशाध्यायः । ५६५ वाहनं छत्रसंयुक्तं राज्यभोगपरं सुखम् । कासश्वासादिका पीडा भौमसूक्ष्मगते बुधे ।।२४।। (मं.बु.) भौम के प्रत्यन्तर में बुध के सूक्ष्मान्तर में वाहन, छत्र आदि राज्य के सुख का लाभ और सुख तथा कासश्वास से पीड़ा होती है।।२४।। परप्रेरितबुद्धिश्च सर्वत्रापि च गर्हितः । अशुचिः सर्वकार्येषु भौमसूक्ष्मगते ध्वजे ।।२५।। (मं.के.) भौम के प्रत्यन्तर में केतु के सूक्ष्मान्तर में दूसरे की प्रेरणा वाली बुद्धि, सर्वत्र निंदा और सभी कार्यों में असफलता होती है।।२५।। इष्ट स्त्रीभोगसम्पत्तिरिष्टभोजनसंग्रहः । इष्टार्थश्चैव लाभश्च भौमसूक्ष्मगते भृगौ ।।२६।। (मं.शु.) भौम के प्रत्यंतर में शुक्र के सूक्ष्मांतर में अभीष्ट स्त्री का सुख, सम्पत्ति अभीष्ट भोजन का लाभ और अभीष्ट की सिद्धि होती है।।२६।। राजद्वेषोद्विजात्क्लेशः कार्याभिप्रायवंचकः । लोकेऽपि निंद्यतामेति भौमसूक्ष्मगते रवौ ।।२७।। (मं.सू.) भौम के प्रत्यंतर में सूर्य के सूक्ष्मांतर में राजा से शत्रुता, ब्राह्मण से कष्ट, कार्य के अभिप्राय से रहित और लोक में निंदा होती है।।२७।। शुद्धत्वं धनसंप्राप्तिर्देवब्राह्मणवत्सलः । व्याधिना परिभूयेत भौमसूक्ष्मगतेविधौ ।।२८।। (मं.चं.) भौम के प्रत्यंतर में चंद्रमा के सूक्ष्मांतर में चित्त में शुद्धता, धन का लाभ, देवता ब्राह्मण में प्रेम और व्याधि से पीड़ित होता है।।२८।। इति भौम सूक्ष्मांतरफलम्। अथ राहु प्रत्यन्तरे राह्वादीनांसूक्ष्मांतरफलम्- लोकोपद्रवबुद्धिश्च स्वकार्ये मतिविभ्रमः । शून्यता चित्तदोषः स्याद्राहोः सूक्ष्मदशाफलम् ।।२९।। (रा.रा.) राहु के प्रत्यंतर में राहु के सूक्ष्मांतर में उपद्रव करने की बुद्धि, बुद्धि में भ्रम, शून्यता होती है।।२९।। दीर्घरोगी दरिद्रश्च सर्वेषां प्रियदर्शनः । दानधर्मरतः शस्तो राहोः सूक्ष्मगते गुरौ ।।३०।। (रा.बृ.)

५६६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । राहु के प्रत्यंतर में गुरु के सूक्ष्मांतर में दीर्घ रोग, दरिद्रता, सबका दर्शन प्रिय, और दानादि में आसक्त होता है।।३०।। कुमार्गात्कुत्सितोग्रश्च दुष्टश्च परसेवकः । असत्संगमतिमूढो राहोः सूक्ष्मगते शनौ ।।३१।। (रा.श.) राहु के प्रत्यंतर में शनि के सूक्ष्मांतर में कुमार्ग से निंदित, उग्रस्वभाव दुष्ट और दूसरे का सेवक और दुष्टों का संग साथ होता है।।३१।। स्त्रीसंभोगमतिर्वाग्मी लोकसम्भावनावृतः । अन्नमिच्छंस्तनुम्लानी राहोः सूक्ष्मगते बुधे ।।३२।। (रा.बु.) राहु के प्रत्यंतर में बुध के सूक्ष्मांतर में स्त्री प्रसंग की बुद्धि, संसार में विख्यात हमेशा अन्न की चिंता से युक्त होता है।।३२।। माधुर्यं मानहानिश्च बंधनं चाप्रमादकम् । पारुष्यं जीवहानिश्च राहोः सूक्ष्मगते ध्वजे ।।३३।। (रा.के.) राहु के प्रत्यंतर में केतु के सूक्ष्मांतर में मधुरस्वभाव, मानहानि, बंधन, कठोरता और किसी जीव की हानि होती है।।३३।। बंधनान्मुच्यते बद्धः स्थानमानार्थसंचयः । कारणद्रव्यलाभश्च राहोः सूक्ष्मगते भृगौ ।।३४।। (रा.शु.) राहु के प्रत्यंतर में शुक्र के सूक्ष्मांतर में बंधन से मुक्ति, स्थान, यश, धन का लाभ और भाग्योदय होता है।।३४।। व्यक्ताशों गुल्मरोगश्च क्रोधहानिस्तथैव च । वाहनादिसुखं सर्वं राहोः सूक्ष्मगते रवौ ।।३५।। (रा.सू.) राहु के प्रत्यंतर में सूर्य के सूक्ष्मांतर में अर्श (बवासीर) गुल्म रोग, क्रोध और वाहनादि के सुख की हानि होती है।।३५।। मणिरत्नधनावाप्तिर्विद्योपासनशीलवान् । देवार्चनपरोभक्त्या राहोः सूक्ष्मगते विधौ ।।३६।। (रा.चं.) राहु के प्रत्यन्तर में चन्द्रमा के सूक्ष्मान्तर में मणि, रत्न, धन की प्राप्ति, विद्या की उपासना और भक्ति से देवता की पूजा होती है।।३६।। निर्जितं जनविद्रावो जने क्रोधश्च बंधनात् । चौर्यशीलरतिः नित्यं राहोः सूक्ष्मगते कुजे ।।३७।। (रा.म.)

अथ सूक्ष्मान्तरदशाध्यायः । ५६७ राहु के प्रत्यन्तर में भौम के सूक्ष्मान्तर में मनुष्यों से विद्रोह, पराजय, जन समुदाय का क्रोध भाजन, बंधन और चौर भय होता है।।३७।। इति राहु सूक्ष्मन्तरफलम्। अथ गुरु प्रत्यन्तरे गुर्वादीनांसूक्ष्मान्तरफलम् - शोकनाशो धनाधिक्यमग्निहोत्रं शिवार्चनम् । वाहनक्षत्रसंयुक्तं जीवसूक्ष्मदशाफलम् ।।३८।। (वृ.वृ.) गुरु के प्रत्यन्तर में गुरु के सूक्ष्मान्तर में शोक का नाश, धन का लाभ, शिव का पूजन, वाहन और क्षेत्र का लाभ होता है।।३८।। व्रतहा सूर्यवर्त्ती च विदेशे वसुनाशनम् । विरोधो धननाशश्च गुरोः सूक्ष्मगते शनौ ।।३९।। (वृ.श.) गुरु के प्रत्यन्तर में शनि के सूक्ष्मान्तर में व्रत का छूट जाना, विदेश में धन का नाश, शत्रुता और धन की हानि होती है।।३९।। विद्यामानयशप्राप्तिः धनागमनमेव च । नित्योत्सवस्तुसंजातः गुरोः सूक्ष्मगते बुधे ।।४०।। (वृ.बु.) गुरु के प्रत्यंतर में बुध के सूक्ष्मान्तर में विद्या, मान और यश का लाभ, धन का आगमन और नित्य उत्सव होता रहता है।।४०।। ज्ञानं विभवपाण्डित्यं शास्त्रश्रोता शिवार्चनम् । अग्निहोत्रं गुरोर्भक्तिर्गुरोः सूक्ष्मगते ध्वजे ।।४१।। (वृ.के.) गुरु के प्रत्यंतर में केतु के सूक्ष्मान्तर में ज्ञान में वृद्धि, विभव, पांडित्य, शास्त्र का अध्ययन, शिव की पूजा और अग्निहोत्र और गुरु भक्ति होती है।।४१।। रोगान्मुक्तिः सुखं भोगं धनधान्यसमागमम् । पुत्रदारादिकं सौख्यं गुरोः सूक्ष्मगते भृगौ ।।४२।। (वृ.शु.) गुरु के प्रत्यंतर में शुक्र के सूक्ष्मान्तर में रोग से मुक्ति, सुख, भोग, धन, धान्य का लाभ और पुत्र स्त्री आदि का सुख होता है।।४२।। वातपित्तप्रकोपश्च श्लेष्मोद्रेकस्तु दारूणः । रसव्याधिकृतं शूलं गुरोः सूक्ष्मगते रवौ ।।४३।। (वृ.सू.) गुरु के प्रत्यंतर में सूर्य के सूक्ष्मान्तर में वायु और पित्त का प्रकोप कफ की अधिकता से कष्ट और रसदोष से शूलरोग होता है।।४३।।

५६८ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् ! छत्रचामरसंयुक्तं वैभवं पुत्रसम्पदः । नेत्रकुक्षिगता पीडा गुरोः सूक्ष्मगते विधौ ।।४४।। (वृ.चं.) गुरु के प्रत्यंतर में चन्द्रमा के सूक्ष्मान्तर में छत्र, चामर से युक्त, वैभव का लाभ, पुत्र सुख, नेत्र और कोख (कुक्षि) में पीड़ा होती है।।४४।। स्त्रीजनाच्चविषोत्पत्तिर्वधनं चातिनिग्रहम् । देशांतरगमो भ्रांतिर्गुरोः सूक्ष्मगते कुजे ।।४५।। (वृ.मं.) गुरु के प्रत्यंतर में भौम के सूक्ष्मान्तर में स्त्रियों के द्वारा कलह, बंधन और अत्यंत विग्रह, देशांतर की यात्रा और भ्रान्ति होती है।।४५।। व्याधिभिः परिभूतः स्याच्चौरोपहतं धनम् । सर्पवृश्चिकदंष्ट्रत्वं गुरोः सूक्ष्मगतेऽप्यहौ ।।४६।। (वृ.रा.) गुरु के प्रत्यन्तर में राहु के सूक्ष्मान्तर में व्याधियों से दुःखी, चोरों द्वारा धन का अपहरण और सर्प-बिच्छू के काटने का भय होता है।।४६।। इति गुरु सूक्ष्मांतर फलम् । अथ शनि प्रत्यंतरे शन्यादीनां सूक्ष्मान्तर फलम् - धनहानिर्महाव्याधिः वायुपीडा कुलक्षयः । भिक्षाहारी महादुःखी मंदसूक्ष्मदशाफलम् ।।४७।। (श.श.) शनि प्रत्यंतर में शनिसूक्ष्मान्तर में धन की हानि, महाव्याधि, वायु की पीड़ा, कुल का नाश और भिक्षा का भोजन तथा बड़ा दुःखी होता है।।४७।। वाणिज्यवृत्तेर्लाभश्च विद्याविभवमेव च । स्त्रीलाभश्च महीप्राप्तिः शनेः सूक्ष्मगतेबुधे ।।४८।। (श.बु.) शनि के प्रत्यंतर में बुध के सूक्ष्मान्तर में व्यापार में लाभ, विद्या और वैभव, स्त्री का लाभ और पृथ्वी का लाभ होता है।।४८।। चौरोपद्रवकुष्ठादि वृत्तिक्षयविगुंफनम् । सर्वाङ्गपीडनं व्याधिः शनिसूक्ष्मगते ध्वजे ।।४९।। (श.के.) शनि के प्रत्यंतर में केतु के सूक्ष्मान्तर में चोरी का भय, कुष्ठरोग, वृत्ति की हानि, कुंठता, सर्वांग में पीड़ा और व्याधि होती है।।४९।।

अथ सूक्ष्मान्तरदशाध्यायः । ५६९ ऐश्वर्यमायुधाभ्यासं पुत्रलाभोभिषेचनम् । आरोग्यं धनकामौ च शनिसूक्ष्मगते भृगौ ॥५०॥ (श.शु.) शनि के प्रत्यंतर में केतु के सूक्ष्मन्तर में ऐश्वर्य का लाभ, आयुध का अभ्यास, पुत्र का लाभ, अभिषेक, आरोग्यता आदि होता है॥५०॥ राजतेजोविकारत्वं स्वगृहे जायते कलिः । किंचित्पीडा स्वदेहोत्था शनिसूक्ष्मगते रवौ ॥५१॥ (श.सू.) शनि के प्रत्यंतर में सूर्य के सूक्ष्मान्तर में राज कार्य में विकार, अपने घर में कलि, अपने शरीर में कुछ पीड़ा होती है॥५१॥ स्फीतबुद्धिर्महारम्भो मदं तेजो बहुव्ययः । स्त्रीपुत्रैश्च समं सौख्यं शनिसूक्ष्मगते विधौ ॥५२॥ (श.चं.) शनि के प्रत्यंतर में चन्द्रमा के सूक्ष्मान्तर में संगीत का प्रेम, किसी बड़े कार्य का आरम्भ, यज्ञ में कमी, द्रव्य का भय और स्त्री पुत्र का सुख होता है॥५२॥ नेत्रोहानिर्महोद्वेगो वह्निक्षयभ्रमो कलिः । वातपित्तकृतापीडा शनेः सूक्ष्मगते कुजो ॥५३॥ (श.मं.) शनि के प्रत्यंतर में भौम के सूक्ष्मान्तर में नेत्र की हानि, उद्वेग, मंदाग्नि, क्षय, भ्रम, झगड़ा और वात पित्त से कष्ट होता है॥५३॥ पितृमातृविनाशश्च मनोदुःखं गुरुव्ययम् । सर्वत्र विफलं स्यात्तु शनिसूक्ष्मगतेप्यहौ ॥५४॥ (श.रा.) शनि के प्रत्यंतर में राहु के सूक्ष्मान्तर में पिता-माता की हानि, मन में दुःख, अधिक व्यय, और सब जगह विफलता होती है॥५४॥ सन्मुद्राभोगसन्मानं धनधान्यविवर्धनम् । छत्रचामरसम्प्राप्तिः शनेः सूक्ष्मगते गुरौ ॥५५॥ (श.बृ.) शनि के प्रत्यन्तर में गुरु के सूक्ष्मान्तर में द्रव्य का लाभ, धन धान्य की वृद्धि और छत्र चामर का लाभ होता है॥५५॥ इति शनि सूक्ष्मान्तर फलम्। अथ बुध प्रत्यंतरे बुधादीनां सूक्ष्मान्तर फलम् - सौभाग्यंराजसम्मानं धनधान्यादिसम्पदः । सर्वेषां प्रियदर्शी च बुधसूक्ष्मदशाफलम् ॥५६॥ (बु.बु.)

५७० बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । बुध के प्रत्यन्तर में बुध के सूक्ष्मांतर में भाग्योदय, राजा से सम्मान की प्राप्ति, धन धान्य का लाभ और सबका प्रिय होता है।।५६।। बालग्रहाग्निभीस्तापः स्त्रीमदोद्भवदोषभाक् । कुमार्गी कुत्सिताशी च बुधसूक्ष्मगतेध्वजे ।।५७।। (बु.के.) बुध के प्रत्यंतर में केतु के सूक्ष्मांतर में बालग्रह तथा अग्नि से भय, ज्वर, स्त्री के रजोविकार से कष्ट, कुमार्ग में प्रवृत्ति और निंदित आन्नों का भोजन होता है।।५७।। वाहनंधन सम्पत्तिर्जलजान्नार्थसम्भवः । शुभकीर्तिर्महाभोगो बुधसूक्ष्मगते भृगौ ।।५८।। (बु.शु.) बुध के प्रत्यंतर में शुक्र के सूक्ष्मान्तर में वाहन, धन, सम्पत्ति और जल से उत्पन्न होने वाले अन्न और द्रव्य का लाभ, यशोवृद्धि और महाभोग प्राप्त होता है।।५८।। ताडनं नृपवैषम्यं बुद्धिस्खलनरोगभाक् । हानिर्जनापवादं च बुधसूक्ष्मगते रवौ ।।५९।। (बु.सू.) बुध के प्रत्यंतर में सूक्ष्मांतर में ताडना, राजा से शत्रुता, मंदबुद्धि होने का रोग, हानि और जनापवाद (कलंक) होता है।।५९।। सुभगः स्थिरबुद्धिश्च राजसन्मानसम्पदः । सुहृदां गुरुसंस्कारो बुधसूक्ष्मगते विधौ ।।६०।। (बु.चं.) बुध के प्रत्यंतर में चन्द्रमा के सूक्ष्मान्तर में सौभाग्य, स्थिर बुद्धि, राजा से सन्मान और संपत्ति का लाभ और मित्रों का समागम होता है।।६०।। अग्निदाहं विषोत्पत्तिर्जडत्वं च दरिद्रता । विभ्रमश्च महोद्वेगो बुधसूक्ष्मगते कुजे ।।६१।। (बु.मं.) बुध के प्रत्यंतर में भौम के सूक्ष्मांतर में अग्नि से जलने का तथा विष का भय, जड़ता, दरिद्रता, भ्रम और बड़ा उद्वेग होता है।।६१।। अग्निसर्पनृपाद्भीतिः कृच्छ्वादरिपराभवः । भूतावेशभ्रमाद्भ्रांतिर्बुधसूक्ष्मगतेप्यहौ ।।६२।। (बु.रा.) बुध के प्रत्यंतर में राहु के सूक्ष्मांतर में अग्नि, सर्प और राजा से भय। कष्ट से शत्रु का पराभव, भूत का आवेश और भ्रम से भ्रान्ति होता है।।६२।।

·अथ सूक्ष्मान्तरदशाध्यायः । ५७१ ग्रहोपकरणं भव्यं त्यांगं भोगादिवैभवम् । राजप्रसादसम्पत्तिर्बुधसूक्ष्मगते भगौ ॥६३॥ (बु.बृ.) बुध के प्रत्यंतर में गुरु के सूक्ष्मांतर में गृह के सुन्दर उपकरणों का लाभ। त्याग भाव वैभव, राजा की प्रसन्नता से सम्पत्ति का लाभ होता है।।६३।। वाणिज्यवृत्तिलाभश्च विद्याविभवमेव च । स्त्रीलाभश्च महाव्याधिबुधसूक्ष्मगते शनौ ॥६४॥ (बु.श.) बुध के प्रत्यंतर में शनि के सूक्ष्मान्तर में व्यापार से लाभ, विद्या और वैभव का लाभ, स्त्री का लाभ और महाव्याधि की संभावना होती है।।६४।। इति बुधसूक्ष्मांतर फलम्। अथ केतोः प्रत्यन्तरे केत्वादीनां सूक्ष्मान्तरफलम् - पुत्रदारादिजं दुःखं गात्रवैषम्यमेव च । दारिद्र्याद्भिक्षुवृत्तिश्च केतोःसूक्ष्मदशाफलम् ॥६५॥ (के.के.) केतु के प्रत्यंतर में केतु के ही सूक्ष्मांतर में पुत्र, स्त्री जन्मादि दुःख, शरीर में विकलता और दरिद्रता से भिक्षुक वृत्ति होती है।।६५।। रोगनाशोऽर्थलाभश्च गुरुविप्रानुवत्सलः । संगमः स्वजनैः सार्धे केतोः सूक्ष्मगते भृगौ ॥६६॥ (के.शु.) केतु के प्रत्यंतर में शुक्र के सूक्ष्मांतर में रोग का नाश, धन का लाभ, गुरु और ब्राह्मण से प्रेम और स्वजनों का समागम होता है।।६६।। पुत्रभूमिविनाशश्च विप्रवासः स्वदेशतः । सुहृद्विपत्तिरार्त्तिश्च केतोः सूक्ष्मगते रवौ ॥६७॥ (के.सू.) केतु के प्रत्यंतर में सूर्य के सूक्ष्मान्तर में पुत्र-भूमि की हानि, स्वदेश से प्रवास मित्र की विपत्ति और पीड़ा होती है।।६७।। दासीदाससमृद्धिश्च युद्धे लब्धिर्जयस्तथा । ललिता कीर्त्तिरुत्पन्ना केतोः सूक्ष्मगते विधौ ॥६८॥ (के.चं.) केतु के प्रत्यंतर में चन्द्रमा के सूक्ष्मांतर में दासी, नौकर और समृद्धि का लाभ, युद्ध में द्रव्यलाभ और विजय और सुन्दर कीर्ति होती है।।६८।।

५७२ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । आसने भयमश्वादेश्चौरदुष्टादिपीडनम् । गुल्मपीडा शिरोरोगः केतोः सूक्ष्मगते कुजो ।।६९।। (के.मं.) केतु के प्रत्यंतर में भौम के सूक्ष्मांतर में आसन और घोड़े से भय चोर और दुष्टो से पीड़ा, गुल्मरोग और शिर में पीड़ा होती है।।६९।। विनाशः स्त्रीगुरूणां च दुष्टस्त्रीसंगमाल्लघुः । वमनं रुधिरं पित्तं केतोः सूक्ष्मगतेऽप्यगौ ।।७०।। (के.रा.) केतु के प्रत्यंतर में राहु के सूक्ष्मांतर में स्त्री तथा गुरु का नाश, दुष्ट स्त्री के संग से अपयश और रुधिर तथा पित्त का वमन होता है।।७०।। वैरं विरोध सम्पत्तिः सहसा राजवैभवम् । पशुक्षेत्रविनाशस्यात्केतोः सूक्ष्मगते गुरौ ।।७१।। (के.बृ.) केतु के प्रत्यंतर में गुरु के सूक्ष्मांतर में वैर, विरोध होता है, सहसा राज वैभव का लाभ और पशु, क्षेत्र की हानि होती है।।७१।। मृषापीडां भवेत्क्षुद्रसुतोत्पत्तिश्चलंघनम् । स्त्रीविरोधः सत्यहानिः केतोः सूक्ष्मगते शनौ ।।७२।। (के.श.) केतु के प्रत्यंतर में शनि के सूक्ष्मान्तर में व्यर्थ ही पीड़ा, दुष्ट पुत्र की उत्पत्ति लंघन, स्त्री से विरोध और सत्य की हानि होती है।।७२।। नानाविधजनाप्तिश्च विप्रयोगोऽरपीड़नम् । अर्थसम्पत्समृद्धिश्च केतोः सूक्ष्मगते बुधे ।।७३।। (के.बु.) केतु के प्रत्यन्तर में बुध के सूक्ष्मांतर में अनेक लोगों से संयोग और वियोग, शत्रु से पीड़ा और धन-सम्पत्ति की वृद्धि होती है।।७३।। इति केतु सूक्ष्मांतर फलम्। अथशुक्रप्रत्यन्तरेशुकादीनांसूक्ष्मान्तरफलम् - शत्रुहानिर्महत्सौख्यं शंकरालयसम्भवम् । तडागकूपनिर्माणं शुक्रसूक्ष्मदशाफलम् ।।७४।। (शु.शु.) शुक्र के प्रत्यन्तर में शुक्र के सूक्ष्मान्तर में शत्रु की हानि, अपार सुख, शंकर के मंदिर का निर्माण वा तालाब कूआँ के निर्माण की संभावना होती है।।७४।। उरस्तापो भ्रमश्चैव गतागतविचेष्टितम् । कचिल्लाभः कृचिद्धानिर्भृगोः सूक्ष्मगतेरवौ ।।७५।। (शु.सू.)

अथ सूक्ष्मान्तरदशाध्यायः । ५७३ शुक्र के प्रत्यन्तर में सूर्य के सूक्ष्मांतर में उरु प्रदेश में रोग भ्रम, गमनागमन की चेष्टा, कभी लाभ और कभी हानि होती है।।७५।। आरोग्यं धनसम्पत्तिः कार्यलाभोगतागतैः । वैरिकापारबुद्धिः स्याद्भृगोः सूक्ष्मगते विधौ ।।७६।। (शु.चं.) शुक्र के प्रत्यन्तर में चन्द्रमा के सूक्ष्मान्तर में आरोग्यता, धन सम्पत्ति का लाभ गमनागमन से कार्य की सिद्धि, अपार बुद्धि होती है।।७६।। जडत्वं रिपुवैषम्यं देशभ्रंशो महद्भयम् । व्याधिदुःखसमुत्पत्तिर्भृगोः सूक्ष्मगते कुजे ।।७७।। (शु.मं.) शुक्र के प्रत्यन्तर में भौम के सूक्ष्मान्तर में जड़ता, शत्रु से शत्रुता, देशत्याग, महाभय, व्याधि और दुःख की प्राप्ति होती है।।७७।। राज्याग्निसर्पजाभीतिर्बन्धुनाशो गुरुव्यथा । स्थानच्युतिर्महाभीतिभृगोः सूक्ष्मगतेप्यहौ ।।७८।। (शु.रा.) शुक्र के प्रत्यन्तर में राहु के सूक्ष्मान्तर में राजा, अग्नि और सर्प से भय, बन्धु का नाश, व्यथा, स्थानच्युति (अवनति) और महाभय होता है।।७८।। सर्वत्रकार्यलाभश्च क्षेत्रार्थविमनोन्नतिः । वणिग्वृत्तेर्महालब्धिर्भृगोः सूक्ष्मगतेगुरौ ।।७९।। (शु.वृ.) शुक्र के प्रत्यन्तर में गुरु के सूक्ष्मांतर में सभी कार्यों में लाभ, क्षेत्र धन और वैभव की उन्नति और व्यापार से लाभ होता है।।७९।। शत्रुपीड़ा महद्दुःखं चतुष्पादविनाशनम् । स्वगोत्रगुरुहानिः स्याद्भृगोः सूक्ष्मगते शनौ ।।८०।। (शु.शं.) शुक्र के प्रत्तन्तर में शनि के सूक्ष्मान्तर में शत्रु पीड़ा, महादुःख, चौपायों की हानि, अपने गोत्रजों की हानि होती है।।८०।। बांधवादिशु सम्पत्तिर्व्यवहारो धनोन्नतिः । पुत्रदारादितः सौख्यं भृगोः सूक्ष्मगते बुधे ।।८१।। (शु.बु.) शुक्र के प्रत्यन्तर में बुध के सूक्ष्मान्तर में बांधवों से सम्पत्ति का लाभ व्यवहार, धन की उन्नति और पुत्र स्त्री आदि से सुख होता है।।८१।।

५७४ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्। अग्निरोगो महत्पीडा मुखनेत्रशिरोव्यथा। संचितार्थात्मनः पीडा भृगोः सूक्ष्मगतेध्वजे ॥८२॥ (शु.के.) शुक्र के प्रत्यन्तर में केतु के सूक्ष्मान्तर में जठराग्नि का रोग, महापीड़ा, मुख, नेत्र और शिर में पीड़ा और संचित-धन से आत्मा को कष्ट होता है॥८२॥ इति भृगोः सूक्ष्मान्तरदशा फलम्। इति बृहत्पाराशर होरायाः पूर्वार्धे सूर्यादि सूक्ष्मान्तर्दशा फलं समाप्तम्। अथ प्राणदशा फलाध्यायः। तत्रादौ प्राणदशानयन प्रकारः- स्वसूक्ष्मदशायाश्चपिंडे विघटिकात्मके । स्वाब्दैर्हते पुनर्भाक्ते विंशोत्तरशतेन च । लब्धं विघटिकाज्ञेया विपलानिततः परम् ॥१॥ ग्रह के सूक्ष्मदशामान की पला बनाकर उसे ग्रह के दश वर्ष (जिस ग्रह की प्राणदशा लानी हो उस ग्रह के दशा वर्ष से) गुणाकर गुणन फल में १२० का भाग देने विघटिकात्मक उस ग्रह की प्राणदशा होती है॥१॥ उदाहरण- जैसे सूर्य की दशा में सूर्य के अंतर में सूर्य ही के प्रत्यन्तर में सूर्य का सूक्ष्मांतर १६ घटी १२ पल है इसका पला बनाया तो १६×६०+१२ = ९७२ पल हुआ इसे सूर्य की दशा वर्ष ६ से गुणाकिया ५८३२ हुआ इसमें १२० का भाग देने से लब्धि ३६ विपल प्राप्त हुआ। अर्थात् सूर्य की दशा और उन्हीं के अंतर-प्रत्यंतर और सूक्ष्मांतर में सूर्य की प्राण दशा ० घटी = ४८ पल और ३६ विपल होगी। इसी प्रकार सूक्ष्म के पलात्मक पिंड को चन्द्रमा के दशावर्ष १० से गुणाकर ९७२० में १२० का भाग देने से लब्धि ८१ पल याने १ घटी २१ पल ० विपल यह सूर्य के सूक्ष्मांतर में चन्द्रमा की प्राणदशा हुई। इसी प्रकार अन्य ग्रहों के दशा वर्ष से गुणकर भाग देने से उन लोगों की प्राणदशा हो जाती है।

अथ प्राणदशा फलाध्यायः। ५७५ सूर्य सूक्ष्मदशामध्येप्राणदशा चक्रम्।

ग्रहाःसू.चं.मं.रा.वृ.श.बु.के.शु.यो.
घट्य१६
पला.४८२१५६२५३३१७५६४२१२
विपला३६४२४८३६५४५२४२
अथ सूर्य प्राणदशाफलम्-
पौंश्चल्यं विषजावाधा शोषणं विषमेक्षणम् ।
सूर्यप्राणदशायां तु मरणं कृच्छ्रमादिशेत् ।।२।। (सू.सू.)
सूर्य के सूक्ष्मांतर में सूर्य के प्राण में दुराचार, विष की बाधा, शरीर में शुष्कता,
नेत्र में विकार और मरण होता है।।२।।
सुखं भोजनसम्पत्तिः संस्कारो नृपवैभवम् ।
उदारादिकृपाभिश्च रवेः प्राणगते विधौ ।।३।। (सू.चं.)
सूर्य के सूक्ष्मांतर में चन्द्रमा की प्राणदशा में सुख, भोजन की सामग्री, संस्कार
और उदार पुरुष की कृपा से राजवैभव की प्राप्ति होती है।।३।।
भूपोपद्रवमन्यार्थे द्रव्यनाशो महद्भयम् ।
महत्यपचयप्राप्ति रवेः प्राणगते कुजे ।।४।। (सू.मं.)
सूर्य के सूक्ष्मांतर में भौम की प्राण दशा में राजा के उपद्रव की वृद्धि, धन
की क्षति, भय और धनादिका अपचय (हानि) होता है।।४।।
अन्नोद्भवा महापीड़ा विषोत्पत्तिर्विशेषतः ।
अर्थाग्निराजभिः क्लेशं रवेः प्राणगतेप्यहो ।।५।। (सू.रा.)
सूर्य के सूक्ष्मान्तर राहु की प्राणदशा में अन्न से उत्पन्न महापीड़ा (हैजा आदि)
विशेषतः विष की संभावना, धन, अग्नि और राजा से कष्ट होता है।।५।।
नानाविद्यार्थसम्पत्तिः कार्यलाभो गतागतैः ।
नीचजनाश्रय नाशो रवेः प्राणगते गुरौ ।।६।। (सू.वृ.)
सूर्य के सूक्ष्मान्तर में गुरु की प्राणदशा में अनेक विद्या, धन सम्पत्ति का लाभ,
गमना-गमन से कार्य की सिद्धि और नीचजनों की संगति का नाश होता है।।६।।
बंधनं प्राणनाशश्च चित्तोद्वेगस्तथैव च ।
बहुबाधा महाहानी रवेः प्राणगते शनौ ।।७।। (सू.श.)

५७६ वृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । सूर्य के सूक्ष्मान्तर में शनि की प्राणदशा में बंधन, प्राण का भय, चित्त में उद्वेग, अनेक बाधा और हानि होती हैं।।७।। राजान्नभोगः सततं राजलांछनतत्पदम् । आत्मासन्तर्पयेदेवं रवेः प्राणगतेबुधे ।।८।। (सू.बु.) सूर्य के सूक्ष्मान्तर में बुध की प्राणदशा में निरन्तर राजभोग राजकीय चिन्हों से युक्त और आत्मा को शान्ति मिलती है।।८।। अन्योन्यं कलहश्चैव वसुहानिः पराजयः । गुरुस्त्रीबंधुहानिश्च सूर्यप्राणगते ध्वजे ।।९।। (सू.के.) सूर्य के सूक्ष्मान्तर में केतु की प्राणदशा में परस्पर कलह धन की हानि और पराजय गुरु, स्त्री, बंधु की हानि होती है।।९।। राजपूजा धनाधिक्यं स्त्रीपुत्रादिभवं सुखम् । अन्नपानादिभोगश्च रवेः प्राणगते भृगौ ।।१०।। (सू.शु.) सूर्य के सूक्ष्मान्तर में शुक्र की प्राण दशा में राजा से पूजा, धनका विशेष लाभ, स्त्री पुत्रादि का सुख और अन्न पानादि का सुख होता है।।१०।। इति सूर्य प्राणदशाफलम्। अथ चन्द्रप्राणदशाफलम्। योगाभ्यासं समाधिं च स्त्रीपुत्रादिसुखं तथा । इति सर्व समासेन चन्द्रप्राणे भवन्ति च ।।११।। (चं.चं.) चन्द्रमा के सूक्ष्मांतर में चन्द्रमा की प्राणदशा में योगाभ्यास, समाधि, स्त्री पुत्रादि का सुख यह सब एक साथ ही होता है।।११।। क्षयं कुष्ठं बंधुनाशं रक्तस्त्रावान्महद्भयम् । भूतावेशादि जायेत चन्द्रप्राणगते कुजे ।।१२।। (चं.मं.) चन्द्रमा के सूक्ष्मांतर में भौम की प्राणदशा में क्षय रोग, कुष्ठ रोग की संभावना, बंधु का नाश, रक्तस्राव से कष्ट और भूत आदि का आवेश होता है।।१२।। सर्पभीतिविशेषेण भूतोपद्रववान्सदा । दृष्टिक्षोभोमतिभ्रंशश्चन्द्रप्राणगतेप्यहौ ।।१३।। (चं.रा.) चन्द्रमा के सूक्ष्मांतर में राहु की प्राणदशा में विशेषकर सर्प का भय, भूत का उपद्रव, दृष्टि में विकार और बुद्धि नाश होता है।।१३।।

अथ प्राणदशा फलाध्यायः। ५७७ धर्मबुद्धिः क्षमाप्राप्तिर्देवब्राह्मणपूजनम् । सौभाग्यं प्रियदृष्टिश्च चन्द्रप्राणगते गुरौ ॥१९४॥ (चं.बृ.) चन्द्रमा के सूक्ष्मांतर में गुरु की प्राणदशा में धर्मबुद्धि, क्षमा की प्राप्ति, देवता और ब्राह्मण का पूजन और भाग्योदय होता है॥१९४॥ सहसा देहपतनं शत्रुपद्रववेदना । अंधत्वं च धनप्राप्तिश्चन्द्रप्राणगते शनौ ॥१९५॥ (चं.श.) चन्द्रमा के सूक्ष्मांतर में शनि की प्राणदशा में अकस्मात् शरीर का पतन, शत्रुओं का उपद्रव, नेत्रान्धता और धन का लाभ होता है॥१९५॥ चामरछत्रसंप्राप्ती राज्यलाभो नृपात्ततः । समत्वं सर्वभूतेषु चन्द्रप्राणगते बुधे ॥१९६॥ (चं.बु.) चन्द्रमा के सूक्ष्मांतर में बुध की प्राणदशा में राजा से चामर छत्र और राज्य का लाभ और सभी प्राणियों में समदृष्टि होती है॥१९६॥ शस्त्राग्नि रिपुजापीडा विषाग्नि कुक्षिरोगता । पुत्रदारवियोगश्च चन्द्रप्राणगते शिखी ॥१९७॥ (चं.के.) चन्द्रमा के सूक्ष्मांतर में केतु की प्राणदशा में शस्त्र, अग्नि और शत्रु से पीड़ा, विष भय, कुक्षिगत रोग और पुत्र स्त्री से वियोग होता है॥१९७॥ पुत्रमित्रकलत्राप्तिर्विदेशाच्च धनांगयः । सुखसम्पत्तिरर्थश्च चन्द्रप्राणगते भृगौ ॥१९८॥ (चं.शु.) चन्द्रमा के सूक्ष्मांतर में शुक्र की प्राणदशा में पुत्र मित्र स्त्री आदि का लाभ विदेश से धन का लाभ और सुख सम्पत्ति का लाभ होता है॥१९८॥ तीव्रदोषी प्रदोषी च प्राणहानिर्मनोरुजम् । देशत्यागो महाभीतिश्चन्द्रप्राणगते रवौ ॥१९९॥ (क.सू.) चन्द्रमा के सूक्ष्मांतर में सूर्य की प्राणदशा में तीव्र दोष से प्राणहानि की संभावना देश त्याग और महाभय होता है॥१९९॥ इति चन्द्रप्राणदशाफलम्। अथ भौमप्राणदशाफलम्- युद्धे परजनाद्वद्धः शास्त्रेण परकेन वा । मृत्युना मरणं याति भौमे प्राणदशा फलम् ॥२००॥ (मं.मं.)

५७८ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । भौम के सूक्ष्मांतर में भौम के प्राणदशा में युद्ध में शत्रु से बँधने वा शत्रु के शस्त्र से बँधन और मृत्यु बात तुल्य कष्ट होता है।।२०।। विच्युतः सुतदारादिवंधूपद्रवपीडितः । प्राणत्यागो विषेणैव भौमप्राणगतेप्यहौ ।।२१।। (मं.श.) भौम के सूक्ष्मांतर में राहु की प्राणदशा में पुत्र स्त्री से रहित, बंधुओं के उपद्रव से पीड़ा और विष से प्राणनाश होता है।।२१।। देवार्चनपरः श्रीमान्मन्त्रानुष्ठानतत्परः । पुत्रपौत्र सुखावाप्तिर्भौमप्राणगते गुरौ ।।२२।। (मं.वृ.) भौम के सूक्ष्मांतर में गुरु की प्राणदशा में देवता का पूजन में तत्पर, लक्ष्मी की प्राप्ति, मन्त्र के अनुष्ठान में तत्पर और पुत्र-पौत्र के सुख की प्राप्ति होती है।।२२।। अग्निबाधा भवेन्मृत्युरर्थनाशः पदच्युतिः । बंधुभिर्वधुतावाप्तिर्भौमप्राणगते शनौ ।।२३।। (मं.श.) भौम के सूक्ष्मांतर में शनि की प्राणदशा में अग्नि से बाधा, मृत्यु, धन का नाश, पद की अवनति और भाइयों से भ्रातृत्व का लाभ होता है।।२३।। दिव्याम्बरसमुत्पत्तिर्दिव्याभरण भूषितः । दिव्याङ्गनायाः सम्प्राप्तिर्भौमप्राणगते बुधे ।।२४।। (मं.बु.) भौम के सूक्ष्मान्तर में बुध की प्राणदशा में दिव्यवस्त्र का लाभ, दिव्य आभूषण का लाभ और दिव्य स्त्री का लाभ होता है।।२४।। पतनोत्पातपीडा च नेत्रक्षोभो महद्भयम् । भुजङ्गाच्च महाहानिर्भौम प्राणगते ध्वजे ।।२५।। (मं.के.) भौम के सूक्ष्मान्तर में केतु की प्राणदशा में पतन, उत्पात् - पीड़ा, नेत्र में पीड़ा महाभय और सर्प से हानि होती है।।२५।। धनधान्यादि सम्पत्तिर्लोकपूजा सुखावहा । नाना भोगैर्भवेद्रोगी भौम प्राणगते भृगौ ।।२६।। (मं.शु.) भौम के सूक्ष्मान्तर में शुक्र की प्राणदशा में धन, धान्य आदि सम्पत्ति का लाभ, लोक में प्रतिष्ठा और अनेक भोगों से रोग की संभावना होती है।।२६।।