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बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

९२ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् अथ परिधिफलम् विद्वान् सत्यरतः शान्तो धनवान्पुत्रवाञ्छुचिः। दाता च परिधौ मूर्त्तौ जायते गुरुवत्सलः ।।१।। यदि परिधि लग्न में हो तो जातक विद्वान्, सत्य बोलने वाला, शान्तचित्त, धनवान्, पुत्रवान्, पवित्र, दाता और गुरुभक्त होता है।।१।। ईश्वरो रूपवान् भोगी सुखी धर्मपरायणः। धनस्थे परिधौ प्राप्ते प्रभुर्भवति मानवः ।।२।। दूसरे भाव में हो तो समर्थ, रूपवान्, भोगी, सुखी, धर्मपरायण और समर्थ होता है।।२।। स्त्रीवल्लभः सुरूपाङ्गो देवस्वजनसङ्गतः। तृतीये परिधौ भृत्यो गुरुभक्तिसमन्वितः ।।३।। तीसरे भाव में हो तो स्त्रीप्रिय, सुन्दर रूप, धन से पूर्ण, देवता और आपस के लोगों के अनुकूल, नौकर और गुरुभक्त होता है।।३।। परिधौ सुखभावस्थे विस्मितं त्वरिमङ्गलम्। अक्रूरं त्वथ सम्पूर्ण कुरुते गीतकोविदः ।।४।। चौथे भाव में हो तो विस्मयालु, शत्रु का मंगल करने वाला, सरल और गीतज्ञ होता है।।४।। लक्ष्मीवान् शीलवान् कान्तः प्रियवान् धर्मवत्सलः ।।५।। पञ्चमे परिधौ जाते स्त्रीणां भवति वल्लभः ।।५।। पाँचवें भाव में हो तो लक्ष्मीवान्, शीलवान्, सुन्दर, धार्मिक और स्त्रियों का प्रिय होता है।।५।। व्यक्तोऽर्थपुत्रवान् भोगी सर्वसत्त्वहिते रतः। परिधौ रिपुभावस्थे शत्रुहा जायते नरः ।।६।। छठे भाव में हो तो प्रसिद्ध धनी, पुत्रवान्, भोगी, सभी का हित करने वाला, शत्रुयुक्त किन्तु शत्रु का नाश करने वाला होता है।।६।। स्वल्पापत्यसुखैर्हीनो मन्दप्रज्ञः सुनिष्ठुरः। परिधौ द्यूनभावस्थे स्त्रीणां व्याधिश्च जायते ।।७।। यदि परिधि सातवें भाव में हो तो थोड़े संतान सुख से हीन, मंदबुद्धि एवं निष्ठुर और उसकी स्त्री रोगी होती है।।७।।

अथ पातफलम् ९३ अध्यात्मचिन्तकः शान्तो दृढकार्यो दृढव्रतः। धर्मवांश्च ससत्यश्च परिधौ रन्ध्रसंस्थिते।।८।। आठवें भाव में हो तो अध्यात्म (वेदान्त) को जानने वाला, शांत, दृढ़ कार्य करने वाला, दृढ़निश्चयी, धार्मिक और बली होता है।।८।। पुत्रान्वितः सुखी कान्तो धनाढ्यो लोलवर्जितः। परिधौ धर्मगे मानी अल्पसन्तुष्टमानसः।।९।। नवम भाव में हो तो पुत्रयुक्त, सुखी, सुन्दर, धनी, स्थिर, अभिमानी और थोड़े में संतुष्ट होने वाला होता है।।९।। क्वचिदज्ञस्तथा भोगी दृढकायो ह्यमत्सरः। परिधौ दशमे प्राप्ते सर्वशास्त्रार्थपारगः।।१०।। दशम भाव में परिधि हो तो कोई मूर्ख होता है, भोगी, बली और सभी शास्त्र का विशारद होता है।।१०।। स्त्रीभोगी गुणवांश्चैव मतिमान् स्वजनप्रियः। लाभे च परिधौ जाते मन्दाग्निः संसुपद्यते।।११।। एकादश भाव में हो तो स्त्रीभोगी, गुणी, बुद्धिमान्, बंधुप्रिय और मंदाग्नि रोग से पीडित होता है।।११।। व्ययस्थे परिधौ जाते गुरुनिन्दापरायणः। दुःखी क्रोधाधिकश्चैव व्ययाधिक्यं च जायते।।१२।। बारहवें भाव में हो तो गुरु की निंदा करने वाला, दुःखी, अत्यंत क्रोधी और अधिक व्यय करने वाला होता है।।१२।। इति परिधिफलम्। अथ चापफलम् धनधान्यहिरण्याढ्यो कृतज्ञः सम्मतः सताम्। सर्वदोषपरित्यक्तश्चापे तनुगते नरः।।१।। यदि चापलग्न में हो तो जातक धन-धान्य से पूर्ण, सज्जनों के अनुकूल, कृतज्ञ, सभी दोषों से रहित होता है।।१।। प्रियंवदः प्रगल्भाढ्यो विनीतो विद्ययाधिकः। धनस्थे चापसम्प्राप्ते रूपवान् धर्मतत्परः।।२।।

९४ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् दूसरे भाव में हो तो प्रिय बोलने वाला, प्रगल्भ, धनी, विनीत विद्वान्, सुन्दर और धार्मिक होता है।।२।। कृपणोऽतिकलाभिज्ञश्चौर्यकर्मरतः सदा। सहजे धनुषि प्राप्ते हीनाङ्गो मत्तसौहदः।।३।। सुखी गोधनधान्यादिराजसन्मानपूजितः। धनुषि सुखसंस्थे तु नीरोगो न तु जायते।।४।। तीसरे भाव में हो तो कृपण, कला को जानने वाला, हमेशा चोरी करने में आसक्त, अंग से हीन और मतवाले साथियों से युक्त होता है।।३।। चौथे भाव में हो तो सुखी, गौ, धन-धान्य से पूर्ण, राजसम्मानयुक्त और नीरोग होता है।।४।। रुचिमान् दीर्घदर्शी च देवभक्तः प्रियंवदः। चापे पञ्चमभे जातो विवृद्धः सर्वकर्मसु ।।५।। पाँचवें भाव में हो तो कांतिमान्, दीर्घदर्शी, देवभक्त, प्रिय बोलने वाला और सभी कामों में वृद्धि करने वाजा होता है।।५।। शत्रुहन्ताऽतिधूर्त्तश्च सुखी प्रतिरुचिः शुचिः। अरिस्थलंगते चापे सर्वकर्मसमृद्धिभाक् ।।६।। छठे भाव में हो तो शत्रु का नाश करने वाला, अत्यंत मूर्ख, प्रेम करने वाला, सुखी, पवित्र और सभी कामों में समृद्धि को प्राप्त करने वाला होता है।।६।। ईश्वरो गुणसम्पूर्णः शास्त्रविद्धार्मिकः प्रियः। चापे सप्तमभावस्थे भवतीति न संशयः।।७।। यदि चाप सातवें भाव में हो तो जातक ईश्वर-सदृश गुणों से पूर्ण, शास्त्र को जानने वाला, धार्मिक और प्रियभाषी होता है।।७।। परकर्मरतः क्रूरः परदारपरायणः। अष्टमस्थानगे चापे करोति विफलान्तिकः।।८।। आठवें भाव में हो तो परकर्म में आसक्त, क्रूर, परस्त्रीगामी और अंतिम समय में अधिक कष्ट भोगने वाला होता है।।८।। तपस्वी व्रतचर्यासु निरतो विद्यायाधिकः। धर्मस्थे यदि चापे च मानज्ञो लोकविश्रुतः।।९।।

अथ शिखिफलम् ९५ नवें भाव में हो तो मानी, लोक में प्रसिद्ध, तपस्वी, व्रतादि करने में आसक्त, विद्वान् होता है।।९।। बहुपुत्रधनैश्वर्यो गोमहिष्यादिभाक् भवेत्। कर्मस्थे चायसंयुक्ते जायते लोकविश्रुतः॥१०॥ दशम भाव में हो तो बहुपुत्र, धन, ऐश्वर्य, गौ, भैंस से युक्त और लोक- प्रसिद्ध होता है।।१०।। लाभगे चापसम्प्राप्ते लाभयुक्तो भवेन्नरः। नीरोगो दृढकर्माग्निर्मन्त्रस्त्रीपरमार्थवित् ।।११।। ग्यारहवें भाव में हो तो लाभ से युक्त, नीरोग, क्रोधी, मंत्र, स्त्री और परमास्त्र को जानने वाला होता है।।११।। खलोऽतिमानी दुर्बुद्धिर्निर्ल्लज्जो व्ययसंस्थितः। चापे परस्त्रीसंयुक्तो जायते निर्धनः सदा।।१२।। बारहवें भाव में हो तो दुष्ट, अभिमानी, दुर्बुद्धि, निर्लज्ज, परस्त्री युक्त और निर्धन होता है।।१२।। इति चापफलम्। अथ शिखिफलम् कुशलः सर्वविद्यासु सुखी वाङ्निपुणः पुमान्। मूर्त्तिस्थे शिखिसम्प्राप्ते सर्वकामान्वितो भवेत् ।।१।। यदि लग्न में शिखि (केतु) हो तो सभी विद्याओं में निपुण, सुखी, वाक्चातुर्य, प्रवीण और सभी कार्यों में चतुर होता है।।१।। वक्ता प्रियंवदः कान्तो धनस्थानगते शिखी। काव्यकृत्पण्डितो मानी विनीतो वाहनान्वितः ।।२।। दूसरे भाव में हो तो वक्ता, प्रिय बोलने वाला, सुन्दर, कविता करने वाला, मानी, नम्र और वाहन युक्त होता है।।२।। कदर्यः क्रूरकर्मा च कुशाङ्गो धनवर्जितः। शिखिनि सहजस्थे तु तीव्ररोगी प्रजायते।।३।। तीसरे भाव में हो तो कृपण, क्रूर कर्म करने वाला, कृश शरीर वाला, धनहीन और कठिन रोगवाला होता है।।३।।

९६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् रूपवान् गुणसम्पन्नः सात्त्विको विश्रुतिप्रियः। सुखस्थे तु शिखीजाते सदा भवति सौख्यभाक् ॥४॥ चौथे भाव में हो तो रूपवान्, गुण से युक्त, सात्त्विक, वेद को जानने वाला और सदा सुखी होता है॥४॥ सुखी भोगी कलाविच्च पञ्चमस्थानगः शिखी। युक्तिज्ञो मतिमान् वाग्मी गुरुभक्तिसमन्वितः॥५॥ पाँचवें भाव में हो तो युक्ति को जानने वाला, वक्ता, चतुर, गुरुभक्ति युक्त, सुखी, भोगी और कला को जानने वाला होता है॥५॥ मातृपक्षक्षयकरः रिपुहा बहुबान्धवः। रिपुस्थाने शिखिप्राप्ते शूरः कान्तो विचक्षणः॥६॥ छठे भाव में हो तो मातृपक्ष (माया आदि) को नाश करने वाला, शत्रु को नाश करने वाला, बहु बांधवों वाला, शूरवीर, सुन्दर और विचक्षण होता है॥६॥ रक्तपीडाभिरतः कामी भोगसमन्वितः। शिखी तु सप्तमस्थाने वेश्यास्तु कृतसौहृदः॥७॥ यदि शिखी सातवें भाव में हो तो रक्तपीडा से युक्त, कामी, भोगयुक्त, वेश्या से मित्रता करने वाला होता है॥७॥ नीचकर्मरतः पापो निर्लज्जो निन्दकः सदा। मृत्युस्थाने शिखिप्राप्ते गतस्त्र्यपरपक्षकः॥८॥ आठवें भाव में हो तो नीचकर्म में आसक्त, पापी, निर्लज्ज, निंदा करने वाला, स्त्रीहीन, शत्रुपक्ष से युक्त होता है॥८॥ लिङ्गधारी प्रसन्नात्मा सर्वभूतहिते रतः। धर्मभे शिखिनि प्राप्ते धर्मकार्येषु कोविदः॥९॥ नवम भाव में हो तो चिह्नधारी (तिलक-विशेष), प्रसन्न आत्मा, सभी प्राणियों के हित करने में आसक्त, धार्मिक कार्यों में पटु होता है॥९॥ सुखसौभाग्यसम्पन्नः कामिनीनां च वल्लभः। दाता द्विजसमायुक्तः कर्मस्थे शिखिनी भवेत्॥१०॥ दशम स्थान में हो तो सुख-सौभाग्य से संपन्न, स्त्रियों का प्यारा, दाता, ब्राह्मणों से आवृत होता है॥१०॥

अथ गुलिकफलम् ९७ नित्यलाभः सुधर्मी च लाभे शिखिनि पूज्यते। धनाढ्यः सुभगः शूरः सुयज्ञश्चातिकोविदः॥११॥ एकादश भाव में हो तो नित्य लाभ से युक्त, धर्मात्मा, धनी, सुन्दर, शूरवीर, यशस्वी और पंडित होता है॥११॥ पापकर्मरतः शूरः श्रद्धाहीनोऽघृणो नरः। परदाररतो रौद्रः शिखिनि व्ययगे सति॥१२॥ बारहवें भाव में हो तो पापकर्म में आसक्त, शूर, श्रद्धाहीन, निर्लज्ज, परस्त्रीगामी और भयंकर होता है॥१२॥ इति शिखिफलम्। अथ गुलिकफलम् रोगार्त्तः सततं कामी पापात्माधिगतः शठः। मूर्त्तिस्थे गुलिके मन्दः खलभावोऽतिदुःखितः॥१॥ यदि गुलिक लग्न में हो तो जातक निरंतर रोग से पीड़ित, कामी, पापात्मा, मूर्ख, दुष्ट स्वभाव और अत्यंत दुःखी होता है॥१॥ विकृतो दुःखितः क्षुद्रो व्यसनी च गतत्रपः। धनस्थे गुलिके जातो निःस्वो भवति मानवः॥२॥ दूसरे भाव में हो तो विकृत, दुःखी, क्षुद्र, दुर्व्यसनी, निर्लज्ज और निर्धन होता है॥२॥ चार्वङ्गो ग्रामपः पुण्यसंयुक्तः सज्जनप्रियः। गुलिके तृतीयगे जातो जायते राजपूजितः॥३॥ तीसरे भाव में हो तो सुन्दर शरीर, ग्रामपति, पुण्यवान्, सज्जनों का प्रिय और राजपूजित होता है॥३॥ रोगी सुखपरित्यक्तः सदा भवति पापकृत्। यमात्मजे सुखस्थे तु वातपित्ताधिको भवेत्॥४॥ चौथे भाव में हो तो रोगी, सुख से हीन, सदा पाप करने वाला और अधिक वायु-पित्त वाला होता है॥४॥ विस्तुतिर्विधनोऽल्पायुर्द्वेषी क्षुद्रो नपुंसकः। सुते सगुलिको जातो स्त्रीजितो नास्तिको भवेत्॥५॥ पाँचवें भाव में हो तो निन्दा करने वाला, निर्धन, अल्पायु, द्वेषी, क्षुद्र, नपुंसक, स्त्री से जीता हुआ और नपुंसक होता है॥५॥

९८ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् वीतशत्रुः सुपुष्टाङ्गो रिपुस्थाने यमात्मजे। सुदीप्तः सम्मतः स्त्रीणां सोत्साहः सुदृढो हितः।।६।। छठे भाव में हो तो शत्रु से रहित, पुष्ट शरीर, तेजस्वी, स्त्रीप्रिय, उत्साही और दृढ़ विचार का हितकारी होता है।।६।। स्त्रीजितः पापकृज्जारः कृशाङ्गो गतसौहृदः। जीवितः स्त्रीधनेनैव सप्तमस्थे रवेः सुते ।।६।। यदि गुलिक सातवें भाव में हो तो जातक स्त्री से पराजित, पाप करने वाला, दुर्बल शरीर वाला, मित्रहीन, स्त्रीधन से जीविका वाला होता है।।७।। क्षुधालुर्दुःखितः क्रूरस्तीक्ष्णशेषोऽतिनिर्घृणः। रन्ध्रे प्राणहरो निःस्वो जायते गुणवर्जितः ।।८।। आठवें भाव में हो तो भूख से पीड़ित, दुःखी, क्रूर, अधिक क्रोधी, अत्यंत निर्लज्ज, दरिद्र और गुण से हीन होता है।।८।। बहुक्लेशी कृशतनुर्दुष्टकर्मातिनिर्घृणः। मन्दे धर्मस्थिते मन्दः पिशुनो बहिष्कृतिः ।।९।। नवम भाव में हो तो अत्यंत दुःखी, दुर्बल शरीर, दुष्टकर्म को करने वाला, अत्यंत निर्लज्ज, मंदप्रकृति, कृपण और चुगलखोर होता है।।९।। पुत्रान्वितः सुखी भोक्ता देवाग्न्यर्चनवत्सलः। दशमे गुलिके जातो योगधर्माश्रितः सुखी ।।१०।। दशम भाव में हो तो पुत्र से युक्त, सुखी, सुख भोगने वाला, देवता एवं अग्नि का उपासक, योगसाधन में संलग्न होता है।।१०।। सुखी भोगी प्रजाध्यक्षो बन्धूनां च हिते रतः। लाभे यमानुजो जातो नीचांशः सार्वभौमकः ।।११।। एकादश भाव में हो तो सुखी, भोगी, प्रजा का अध्यक्ष, बंधुओं के हित में आसक्त, नीचे अंगों वाला और सार्वभौम के समान रहने वाला होता है।।११।। नीचकर्माश्रितः पापो हीनाङ्गो दुर्भगोऽलसः। व्ययभे गुलिके जातो नीचेषु कुरुते रतिम् ।।१२।। बारहवें भाव में हो तो नीच कर्म में आसक्त, पापी, अंग से हीन, दरिद्र, आलसी और नीचों से प्रेम करने वाला होता है।।१२।। इति गुलिकफलम् ।

अथ प्राणपदफलम् ९९ अथ प्राणपदफलम् मूकोन्मत्तो जडाङ्गस्तु हीनाङ्गो दुःखितः कृशः। लग्ने प्राणपदे क्षीणो रोगी भवति मानवः॥१॥ यदि प्राणपद लग्न में हो तो गूँगा, उन्मत्त, स्तब्ध, अंगहीन, दुःखी, कृश, रोगी और दुर्बल शरीर का होता है॥१॥ बहुधान्यो बहुधनो बहुभृत्यो बहुप्रजः। धनस्थानस्थिते प्राणे सुभगो जायते नरः॥२॥ दूसरे भाव में हो तो धन-धान्य से पूर्ण, अनेक भृत्य एवं अनेक संतति वाला और भाग्यशाली पुरुष होता है॥२॥ हिंस्रो गर्वसमायुक्तो निष्ठुरोऽतिमलिम्लुचे। तृतीयगे प्राणपदे गुरुभक्तिविवर्जितः॥३॥ तीसरे भाव में हो तो हिंसा करने वाला, गर्व से युक्त, निष्ठुर, अत्यंत मलिन और गुरुभक्तिहीन होता है॥३॥ सुखस्थे तु सुखी कान्तः सुहृद्रामासु वल्लभः। गुरौ परायणः शीलः प्राणे वै सत्यतत्परः॥४॥ चौथे भाव में हो तो सुखी, सुन्दर, मित्र एवं स्त्री का प्रिय, गुरुभक्त, सुशील और सत्यवक्ता होता है॥४॥ सुखभाक् च क्रियोपेतस्त्वषचारदयान्वितः। पञ्चमस्थे प्राणपदे सर्वकर्मसमन्वितः॥५॥ पाँचवें भाव में हो तो सुख भोगने वाला, क्रिया से युक्त, दयायुक्त और सभी कामों में अनुरक्त होता है॥५॥ बन्धुशत्रुवशस्तीक्ष्णो मन्दाग्निर्निर्दयः खलः। षष्ठे प्राणोऽल्परोगश्च वित्तपोऽल्पायुरेव च॥६॥ छठे भाव में हो तो बन्धु एवं शत्रु के वशं में रहने वाला, तीक्ष्ण स्वभाव, मंदाग्नि से युक्त, निर्दयी, दुष्ट, धनी और अल्पायु होता है॥६॥ ईर्ष्यालुः सततं कामी तीव्ररौद्रवपुर्नरः। सप्तमस्थे प्राणपदे दुराराध्यः कुबुद्धिमान्॥७॥ यदि सातवें भाव में प्राणपद हो तो ईर्ष्यालु, कामी, भयानक शरीर, दुष्ट स्वभाव और मूर्ख होता है॥७॥

बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् रोगसन्तापिताङ्गश्च प्राणपदेऽष्टमे सति। पीडितः पार्थिवैर्दुःखैर्भृत्यबन्धुसुतोद्भवैः ॥८८॥ अष्टम भाव में हो तो रोग से पीडित, राजा, रोग, बन्धु, पुत्र और शत्रु से पीडित होता है॥८८॥ पुत्रवान् धनसम्पन्नः सुभगः प्रियदर्शनः। प्राणे धर्मस्थिते भृत्यः सदाऽदुष्टो विचक्षणः ॥८९॥ नवम भाव में हो तो पुत्रवान्, धनी, भाग्यवान्, दर्शनीय, नौकर से युक्त, पंडित होता है॥८९॥ वीर्यवान् मतिमान् दक्षो नृपकार्येषु कोविदः। दशमे वै प्राणपदे देवार्चनपरायणः ॥९०॥ दशम भाव में हो तो बलवान्, बुद्धिमान्, राजकार्य में चतुर, पंडित; देवपूजन में संलग्न होता है॥९०॥ विख्यातो गुणवान् प्राज्ञो भोगी धनसमन्वितः। लाभस्थानस्थिते प्राणे गौराङ्गो मानवत्सलः ॥९१॥ एकादश भाव में हो तो प्रसिद्ध, गुणी, बुद्धिमान्, भोगी, धनी, गौरवर्णी, मानी होता है॥९१॥ क्षुद्रो दुष्टस्तु हीनाङ्गो विद्वेषी द्विजबन्धुषु। व्यये प्राणे नेत्ररोगी काणो वा जायते नरः ॥९२॥ बारहवें भाव में हो तो क्षुद्र, दुष्ट, हीनांग, ब्राह्मण-बंधुओं का द्वेषी, नेत्ररोगी अथवा काना होता है॥९२॥ इति प्राणपदफलम्। इति पाराशरहोरायां पूर्वखण्डेऽप्रकाशग्रहफलाध्यायः षष्ठः ॥६॥ अथाऽर्गलाध्यायः अथातः सम्प्रवक्ष्यामि अर्गलार्गलमुत्तमम्। यस्य विज्ञानमात्रेण ग्रहाणां च फलं वदेत्॥१॥ अब मैं अर्गला योग के लक्षण और फल को कह रहा हूँ, जिसके ज्ञान से ग्रहों के फलों का ज्ञान होता है॥१॥ चतुर्थे च धने लाभे विद्यमानग्रहार्गला। तस्य दृष्ट्यादिकं ज्ञेयं निर्विशङ्कं द्विजोत्तम ॥२॥

अथार्गलाध्यायः १०१ चौथे, दूसरे और एकादश भाव में ग्रहों के होने से अर्गला योग होता है और उसकी दृष्टि आदि पूर्वोक्त प्रकार से ही होती है।।२।। एकग्रहार्गलाल्पं च द्विग्रहा मध्यमा भवेत्। त्रयेण ग्रहयोगेन अर्गला पूर्णमुच्यते ।।३।। वह भी एक ग्रह के होने से अल्प, दो ग्रह के होने से मध्यम और तीन ग्रह के होने से पूर्ण अर्गला होती है।।३।। राश्यर्गलापि सा ज्ञेया ग्रहयुक्ता विशेषतः। तुर्यवित्तैकादशेषु यस्य कस्यार्गला भवेत् ।।४।। इसी प्रकार किसी राशि से उक्त स्थानों में राशि की अर्गला होती है। चौथे, दूसरे और एकादश भाव की अर्गला जिस किसी की होती है।।४।। द्विविधा सार्गला विप्र ब्रह्मणा चोदितं पुरा। शुभकृत् पापकृच्चैव तन्वादीनां विचिन्तयेत् ।।५।। वह दो प्रकार की होती है। शुभग्रह और पापग्रह कृत होती है।।५।। भिन्नार्गलां पुनर्वक्ष्ये चतुर्थार्गलपापयुक्। तृतीये तु यदा विप्र बहुपापयुते सति ।।६।। एक भिन्न अर्गला होती है जो कि चौथी होती है। वह तीसरे भाव में अधिक पापग्रहों के होने से होती है।।६।। बहुपापा तृतीयस्था पापषड्वर्गयोगतः। पापार्जितः पापदृष्ट्या संयुक्तार्गलकारकः ।।७।। तृतीये शुभसम्बन्धे शुभक्षेत्रे शुभान्विते। शुभवर्गे च षड्वर्गे विज्ञेयं तुर्यमर्गला ।।८।। तीसरे भाव में शुभग्रह का संबन्ध हो, शुभग्रह की राशि हो, शुभग्रह देखता हो, शुभग्रह का षड्वर्ग हो तो चौथा अर्गला योग होता है।।७-८।। तुर्यवित्तैकादशे च पापयुग्वा शुभोऽपि वा। उभयक्षेत्रसम्बन्धे अर्गलां कारयेद्द्विज।।९।। चौथे, दूसरे, एकादश भाव में पापग्रह युत हो वा शुभग्रह हो, दोनों के संबंध से अर्गला योग होता है।।९।। तृतीये बहुपापस्थे बहुयुक्तार्गला भवेत्। निर्बाधिका तु सा ज्ञेया निर्विशङ्कं द्विजोत्तम ।।१०।।

१०२ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् तीसरे भाव में बहुत से पापग्रह हों तो बहुयुक्त अर्गला होती है और इसे निर्बाध अर्गला कहते हैं।।१०।। एकेन द्वितयेनापि अर्गला या भवेद्द्विज। सार्गला नैव विज्ञेया बहुपापयुतिं विना।।११।। एक ग्रह या दो ग्रह से जो अर्गला होती है वह फलदं नहीं होती है।।११।। चतुर्थे धनलाभस्था शुभपापकृतार्गला। तस्यापि बाधकाः खेटा व्योमारिष्फतृतीयाः।।१२।। चौथे, दूसरे, एकादश में शुभग्रह एवं पापग्रह से अर्गला योग होता है, किन्तु दशम, द्वादश और तीसरा स्थान उसका बाधक होता है।।१२।। क्रमेण ज्ञायते विप्र चतुर्थं व्योमबाधकम्। धने च व्ययभावं च भवेज्ज्ञेयं तृतीयकम्।।१३।। चौथे का दशमं, दूसरे का द्वादश और एकादश का तीसरा स्थान बाधक होता है।।१३।। निर्बाधका च फलदा न दातव्या सबाधका। चिन्तनीयं प्रयत्नेन तत्फलं द्विजपुङ्गव।।१४।। अर्थात् बाधक स्थानों में ग्रहों के होने से अर्गला योग नहीं होता है। निर्बाध अर्गला फलदायक और सबाधक अर्गला निष्फल होती है।।१४।। अर्गलाया बाधकानां बाधकान् कथयेऽधुना। नूनं सा निर्बला खेटा ज्ञायते गणकैस्तदा।।१५।। अर्गला योग से बाधक ग्रहों के बाधकों को मैं कह रहा हूँ, निश्चय ही वह निर्बल ग्रह होता है।।१५।। वित्तलाभचतुर्थानां यः पश्यति शुभार्गलाम्। व्ययभ्रातृनभस्थाश्चेद्विपरीतार्गला द्विज।।१६।। दूसरे, ग्यारहवें ओर चौथे भाव को देखता हो तो शुभ अर्गला होती है। किन्तु १२वें, ३रे और १०वें स्थान में स्थित ग्रह देखते हों तो विपरीत अर्गला होती है।।१६।। पुनर्योगार्गलं ज्ञेयं त्रिकोणे पूर्ववद्द्विज। पञ्चमे चार्गलास्थानं नवमस्तद्विरोधकः।।१७।।

अथाऽर्गलाध्यायः १७३ इसी प्रकार त्रिकोण (५।९) अर्गला योग होता है। ५वें भाव में ग्रह हो तो अर्गला होता है, किन्तु नवम भाव में कोई ग्रह हो तो अर्गला नहीं होता है।।१७।। विपरीतेन केतुश्च नवमेऽर्गलकारकः। पञ्चमस्थस्तद्विरोधो ज्ञायते गणकैर्द्विज।।१८।। केतुग्रह विपरीत यानि ९वें भाव में अर्गला योगकारक और पाँचवें भाव में वाचक होता है।।१८।। क्रमेण केतुः प्रकरोत्यर्गलां द्विज। नवमस्थस्तद्विरोधो लग्नार्गलमिदं विदुः।।१९।। हे द्विज ! केतु ग्रह भी क्रम से अर्गला योग करता है। किन्तु नवमस्थ ग्रह उसका विरोधी होता है, इसे लग्नार्गल कहते हैं।।१९।। राश्यर्गलं च खेटानां चिन्तयेद्विविधार्गलम्। यस्या यस्या दशा प्राप्ता तस्यां तस्यां फलं भवेत्।।२०।। इसी प्रकार राशियों का भी अर्गला योग विचार करना चाहिए।।२०।। यत्र राशिस्थितः खेटंस्तस्य पाकान्तरे भवेत्। तत्काले च फलं वाच्यं निर्विशङ्कं द्विजोत्तम।।२१।। जो-जो अर्गलायोगकारक ग्रह हों उनके दशा अन्तर में अर्गला योग का फल होता है।।२१।। सारांश यह है कि जिस किसी भाव या ग्रह का विचार किया जाय तो यह देखना चाहिए कि उस भाव या ग्रह से चौथे, दूसरे और ग्यारहवें भाव में कोई ग्रह हो तो उस भाव या ग्रह का अर्गला योग होता है। किन्तु उक्त अर्गला योग का भंग भी होता है अर्थात् राशि का ग्रह से चौथे भाव में ग्रह के होने से अर्गला होता है, यदि राशि का ग्रह से दशमस्थ कोई ग्रह न हो। इसी दूसरे भाव में योग होता है, किन्तु १२वें कोई ग्रह न हो तथा ग्यारहवें भाव में योग होता है, यदि तीसरे भाव में कोई ग्रह न हो। यदि योगकारक ग्रह से बाधक ग्रह निर्बल या संख्या में कम हों तो अर्गला का प्रतिबंध नहीं होता है। इसी प्रकार राशि या ग्रह से तीसरे भाव में तीन से अधिक खल ग्रह हों तो निर्विरोधी अर्गला योग होता है। इसी प्रकार ५वें भाव में भी अर्गला योग होता है, यदि नवम में कोई ग्रह न हों तो। केतुग्रह का विपरीत अर्गला योग होता है अर्थात् बाधक स्थान में अर्गला और योगस्थान में प्रतिबंधक होता है।

s are:

  • over
  • over There is NO other mātrā! And the consonants are: प्र + = ला + = यो + = ल्प + = ते It is 100% प्रबलायोपकल्प्यते!

Let's double check line 24: यत्र जन्मनि सोऽपि स्याच्छुभदृष्टे शुभागर्ला। Wait, look at शुभागर्ला: श + ु = शु भ + ा = भा ग र् + ल + ा = र्ला Yes, शुभागर्ला।

Line 25: तेन दृष्टेक्षिते लग्ने प्रबलायोपकल्प्यते।।२७।।

Line 26: यदि जन्मकाल में शुभग्रह से दृष्ट शुभ अर्गला हो और उसी शुभग्रह

Line 27: से लग्न युत वा दृष्ट हो तो लग्न प्रबल होती है।।२७।।

Line 28: यदि पश्येद्ग्रहस्तत्र विपरीतार्गलसंस्थितः।

Line 29: `प्रथमां तु विजानीयाद्विपरीतार्गलां द्व

अथ कारकाध्यायः १०५ लग्नसप्तमयोगेन भाग्ययोगं विचिन्तयेत्। भाग्यप्रबलता ज्ञेया लग्नसप्तशुभार्गला।।२९।। लग्न और सप्तम के योग से भाग्ययोग की चिंता करनी चाहिए। लग्न सप्तम में शुभ कृत अर्गला हो तो भाग्य की प्रबलता जाननी चाहिए।।२९।। शुभार्गले स्ववृद्धिः स्यात्पापे स्वल्पधनं वदेत्। उभयार्गले तु तत्रैव क्वचिद्वृद्धिः क्वचित् क्षयम्।।३०।। शुभग्रह की अर्गला में धन की वृद्धि और पापग्रह की अर्गला में अल्पधन की हानि होती है।।३०।। तत्तद्राशिदशायां तु अर्गलाफलसिद्धये। शुभो वाऽप्यशुभो वापि ह्यर्गला फलदायकः।।३१।। उन-उन राशियों के अर्गला फल को देने वाले शुभग्रह शुभफल और पापग्रह अशुभ फल को देने वाले होते हैं।।३१।। इति बृहत्पाराशरहोरायां पूर्वखण्डे सुबोधिन्यां अर्गलाफलकथनं नाम सप्तमोऽध्यायः। अथ कारकाध्यायः अथाग्रे सम्प्रवक्ष्यामि ग्रहाणां कारकान् द्विज। आत्मादिकारकान् सप्त यथावत् कथयामि ते।।१।। हे द्विज ! अब मैं ग्रहों के आत्मा आदि सात कारकों को कहूँगा।।१।। रव्यादिशनिपर्यन्ता भवन्ति सप्तकारकाः। अंशैः समौ ग्रहौ द्वौ च राह्वन्तान् गणयेद्विज।।२।। रवि आदि ग्रह सात किसी-किसी के मत से राहु पर्यन्त आठ कारक होते हैं। यदि दो ग्रहों में अंश साम्य हो तो राहु पर्यन्त ८ ग्रहों में कारक का विचार करना चाहिए।।२।। रव्यादिपङ्गुपर्यन्तमंशाधिकग्रहो द्विज। कारकेन्द्रोऽथ स ज्ञेयो आत्माकारक उच्यते।।३।। रवि से राहु पर्यन्त ग्रहों में भी जो ग्रह अंश से अधिक हो वह आत्मकारक ग्रहों का राजा होता है।।३।।

१०६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् अंशसाम्यग्रहो यत्र कलाधिक्यं च पश्यति। कलासाम्ये पलाधिक्यमात्माकारक ईर्यते ।।४।। जहाँ ग्रहों के अंश तुल्य हो वहाँ कला से अधिकता लेना चाहिए और कला समान हो तो विकला से जो अधिक हो वही आत्मकारक होता है।।४।। तत्र राशिकलाधिक्ये नैव ग्राह्यः प्रधानकः। अंशाधिक्ये कारकः स्यादल्पभागोऽन्तकारकः ।।५।। राशि और कला से अधिक हो तो वह आत्मकारक नहीं होता है। जिसका अंश अधिक हो वही आत्मकारक होता है, अल्प अंश वाला अंतिमकारक होता है।।५।। मध्यांशो मध्यखेटः स्यादुपखेटः स एव हि। अधोऽधः कारका ज्ञेयाश्चराणि सप्तकारकाः ।।६।। दोनों के मध्य अंश वाले अन्य कारक होते हैं। क्रम से कारक होते हैं उसी को उपकारक कहते हैं।।६।। तेषां मध्ये प्रधानं तु आत्मकारक उच्यते। जातकराट् स विज्ञेयः सर्वेषां मुख्यकारकः ।।७।। इन सभी में आत्मकारक प्रधान जातक का स्वामी होता है, इसी को मुख्यकारक कहते हैं।।७।। यथा भूमौ प्रसिद्धोऽस्ति नराणां क्षितिपालकः। सर्ववार्ताधिकारी च बन्धकृन्मोक्षकृत्तथा ।।८।। जिस प्रकार पृथ्वी पर मनुष्यों में राजा बंधन, मोक्ष आदि सभी बातों का अधिकारी होता है।।८।। पुत्रामात्यप्रजानां तु तत्तद्दोषगुणैस्तथा। बन्धकृन्मोक्षकृद्विप्र तथा सम्मानकारकः ।।९।। वही पुत्र, मंत्री और प्रजा का उनके गुण-दोष के अनुसार बंधन, मोक्ष तथा सम्मान आदि करने वाला होता है। उसी प्रकार कारकराज के वश से अन्य कारक फल देने वाले होते हैं।।९।। तथैव कारको राजा ग्रहाणामात्मकारकः। आत्मेत्यादि फलं दत्ते चान्यथा स्थापयेद्द्विज ।।१०।।

अथ कारकाध्यायः १०७ जिस प्रकार राजा के क्रोधित होने से सभी मंत्री आदि अपने मन का कार्य करने में असमर्थ होते हैं।।१०।। यथा राजाज्ञया विप्र पुत्रामात्यादयोऽपि च। समर्था लोककार्येषु तथैवान्योन्यकारकः।।११।। कारकराजवश्येन फलदातान्यकारकः। यथा राजनि क्रुद्धे च सर्वेऽमात्यादयो द्विज।।१२।। स्वजनानां कार्यकर्त्तुमसमर्था भवन्ति हि। स्निग्धे भूपे ह्यमात्यादिः स्वशत्रूणां द्विजोत्तम।।१३।। अकार्यं कर्तु नो शक्तस्तथैवान्योपकारकः। आत्मकारकवश्येन ह्यमात्यादि फलं ददुः।।१४।। यदि राजा प्रसन्न होते हैं तो मंत्री आदि अपने शत्रु का भी अहित नहीं करते हैं, उसी प्रकार अन्य कारक भी आत्मकारक के वश में होते हैं।।१४।। आत्मकारकखेटेन न्यूनभागो हि यद्ग्रहः। अमात्यसंज्ञा तस्यैव ज्ञायते द्विजसत्तम।।१५।। आत्मकारक ग्रह से न्यून अंशवाला ग्रह अमात्यकारक होता है।।१५।। अमात्यन्यूनो भ्राता च भ्रातृन्यूनं च मातृकम्। मातृकारकखेटेन न्यूनभागो हि यो ग्रहः।।१६।। इससे न्यून अंश वाला ग्रह भ्राताकारक, इससे न्यून अंश वाला मातृकारक, इससे न्यून पुत्रकारक।।१६।। सपुत्रकारको ज्ञेयस्तद्धीनो ज्ञातिकारकः। ज्ञातिकारकखेंटेन हीनभागो हि यो ग्रहः।।१७।। इससे न्यून अंश वाला ग्रह शांति (जाति) कारक, इससे न्यून अंश वाला ग्रह।।१७।। दारकारकविज्ञेयो निर्विशङ्कं द्विजोत्तम। चराश्च कारकाः सप्त ब्रह्मणा चोदितः पुरा।।१८।। स्त्रीकारक होता है। यही सात चरकारक होते हैं।।१८।। अंशसाम्यौ ग्रहौ द्वौ च जायेतां यस्य जन्मनि। स्वकारकं विना विप्र लुप्यति चात्मकारकः।।१९।।

१०८ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् यदि ग्रहों के अंश तुल्य हों तो दोनों ही एक कारक होते हैं ।।१९।। तत्कारको लुप्यति चेदन्यन्नैवास्ति कारकम् । कारकाणां स्थिराणां च मध्ये सञ्चितयेद्विज ।।२०।। वहाँ दोनों का नाश हो जाता है, फिर स्थिरकारक से ही फल को देखना चाहिए ।।२०।। अथ योगकारकमाह- अधुना सम्प्रवक्ष्यामि खेटान् कारकसंज्ञकान् । यस्य जन्मनि भावानां यथास्थाने च वै द्विज ।।२१।। अब मैं योग करने वाले कारक ग्रहों को कह रहा हूँ ।।२१।। स्वक्षे तुङ्गे च मित्रर्क्षे कण्टके संस्थिता ग्रहाः । अन्योन्यकारका विप्र कर्मगास्तु विशेषतः ।।२२।। जन्म समय ग्रह अपनी उच्चराशि, अपनी राशि वा अपने मित्र की राशि में होकर परस्पर केन्द्र में हों तो परस्पर कारक (भाग्योदय) करने वाले होते हैं। इसमें भी दशम स्थान में विशेष योगकारक होते हैं ।।२२।। लग्ने सुखे तथा कामे ग्रहभाववशेन च । भवन्ति कारका विप्र विशेषेण च खेगताः ।।२३।। लग्न चतुर्थ, सप्तम, दशम में कारक होते हैं, विशेषतः दशम में कारक होता है ।।२३।। स्वमित्रर्क्षोच्चगो हेतुरन्योन्यं यदि केन्द्रगः । ससुहृद्गणसम्पन्नः सोऽपि कारक एव वै ।।२४।। यदि ग्रह अपने मित्र, राशि, उच्च में होकर परस्पर केन्द्र में हों तो वे भी परस्पर कारक होते हैं ।।२४।। नीचान्वये यस्य जन्म बभूव द्विजसत्तम । पतन्ति कारका लग्ने प्रधानत्वं च स आप्नुयात् ।।२५।। नीच वंश में उत्पन्न हो और योगकारक ग्रहों से योग होता हो तो वह अपने कुल में प्रधान होता है ।।२५।। राज्ञां कुले समुत्पन्नो राजा भवति निश्चितम् । एवं कुलानुसारेण कारकाणां फलं भवेत् ।।२६।।

अथ कारकाध्यायः ६९ और राजकुल में उत्पन्न हो और योग होता हो तो अवश्य राजा होता है। इस प्रकार कुल के अनुसार कारकों का फल होता है॥२६॥ अथ स्थिरकारकमाह— अधुना सम्प्रवक्ष्यामि कारकाणि स्थिराणि च। सूर्यादीनां ग्रहाणां च वीर्यवान् कारको भवेत्॥२७॥ अब मैं स्थिर कारकों को कह रहा हूँ। सूर्य आदि ग्रहों के बलाबल के अनुसार ये कारक होते हैं॥२७॥ बलवान् जायते विप्र जन्मनि रविशुक्रयोः। स पितृकारको ज्ञेयो निर्विशङ्कं द्विजोत्तम॥२८॥ जन्मकाल में रवि और शुक्र में जो बलवान् हो वह पितृकारक होता है॥२८॥ चन्द्रारयोश्च बलवान् मातृकारक उच्यते। भौमतस्तु विशेषेण भगिनीदारभ्रातृकौ॥२९॥ चंद्रमा और भौम में जो बलवान् हो वह भावकारक होता है॥ विशेषतः भौम से बहिन और साला (स्त्री के भाई) का विचार होता है॥२९॥ बुधान्मातुलमाख्यातो मातृतुल्यानपि द्विज। गुरुणा चात्र विज्ञेया पुत्रस्वामिपितामहाः॥३०॥ बुध से मामा और मातृसदृश (मौसी) आदि का विचार होता है॥ गुरु से पुत्र और पितामह आदि का विचार होता है॥३०॥ स्वभार्यामातृपितरौ तथा मातामही द्विज। भृगुद्वारा विजानीयादेतेषां शुक्रकारकाः॥३१॥ सास-ससुर और नानी का विचार शुक्र से होता है॥ यही उनका कारक होता है॥३१॥ सूर्याच्च पुण्यभे तात इन्दोर्माता चतुर्थतः। कुजात्तृतीयतो भ्राता मातुलो रिपुभाद्बुधात्॥३२॥ सूर्य से ९वें स्थान में पिता का, चन्द्रमा से चतुर्थ स्थान पर माता का, भौम से तीसरे भाई का, बुध से छठे मामा का॥३२॥ देवेज्यात्पञ्चमे पुत्रो दैत्येज्याद्यूनभे स्त्रियः। मन्दादष्टमतो मृत्युस्तातादीनां विचिन्तयेत्॥३३॥

११० बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् गुरु से पाँचवें पुत्र का, शुक्र से सातवें स्त्री का और शनि से आठवें भाव में आयु का विचार करना चाहिए।। ३३ ।। अथ भावकारकमाह- अधुना सम्प्रवक्ष्यामि विशेषं भावकारकम् । जनुर्लग्नं च विद्याद्धै आत्मकारकमेव च ।। ३४ ।। अब विशेषकर भावकारक को कह रहा हूँ। जन्मलग्न आत्मकारक ।। ३४ ।। धनभावं विजानीयाद्दारकारकमेव च । एकादशे ज्येष्ठभ्रातुस्तृतीये च कनिष्ठकाः ।। ३५ ।। धनभाव स्त्रीकारक, ग्यारहवाँ ज्येष्ठ भाई का और तीसरा कनिष्ठ ।। ३५ ।। सुते सुतं विजानीयाद्दारं सप्तमभावतः । सुतस्थाने ग्रहस्तिष्ठेत्सोऽपि कारक उच्यते ।। ३६ ।। पंचम भाव पुत्र का और सातवाँ स्त्री का कारक होता है। पाँचवें भाव में यदि कोई ग्रह हो तो वह भी उस भाव का कारक होता है ।। ३६ ।। सूर्यो गुरुः कुजः सोमो गुरुर्भौमः सितः शनिः ।। ३७ ।। गुरुश्चन्द्रसुतो जीवो मन्दश्च भावकारकः ।। ३७ ।। क्रम से सूर्य, गुरु, भौम, बुध, गुरु, भौम, शुक्र, शनि, गुरु, बुध, गुरु और शनि ये लग्नादि भावों के कारक होते हैं ।। ३७ ।। पुनस्तन्वादयो भावाः स्थाप्यास्तेषां शुभाऽशुभम् । लाभं तृतीयं रन्ध्रं च शत्रुभावव्ययं तथा । एषां योगेन यो भावस्तन्नाशं प्राप्नुयाद्‌ध्रुवम् ।। ३८ ।। फिर भी लग्न आदि भावों के शुभ-अशुभ को लिखकर उनके शुभाशुभ का निर्णय करना चाहिए। एकादश, तृतीय, आठवाँ, छठवाँ और बारहवाँ भाव- इनके साथ जिस भाव का सम्बन्ध होता है उस भाव के फल का नाश हो जाता है अर्थात् इन भावों के स्पष्ट दृश्यादि का योग करने से जो भाव बने वह नष्ट हो जाता है ।। ३८ ।। चत्वारो राशयो भद्राः केन्द्रकोणशुभावहाः । तेषां संयोगमात्रेण अशुभोऽपि शुभो भवेत् ।। ३९ ।। केन्द्र और कोण ये चार भाव शुभद हैं। इनके संयोग से जो भाव हो वह भी शुभद होता है।। ३९ ।।

सूर्यादिग्रहाणां कारकत्वमाह १११ अथ सूर्यादिग्रहाणां कारकत्वमाह राज्यविद्दुमरक्तवस्त्रमाणिक्यराजवन- पर्वतक्षेत्रपितृकारको रविः॥१॥ राज्य, मूँगा, रक्तवस्त्र, मानिक, राज, वन, पर्वत, क्षेत्र और पिता का कारक सूर्य होता है॥१॥ मातृमनःपुष्टिगन्धरसेक्षुगोधूमक्षारक- द्विजशक्तिकार्यसस्यरजतादिकारकश्चन्द्रः॥२॥ माता, मन, शरीरपुष्टि, गंधद्रव्य, रस, ऊख, गेहूँ, क्षारपदार्थ, ब्राह्मण, शक्तिकार्य, धान्य और चाँदी आदि का कारक चन्द्रमा है॥२॥ सत्त्वसद्मभूमिपुत्रशीलचौर्यरोगब्रह्मभ्रातृ- पराक्रमाग्निसाहसराजशत्रुकारकः कुजः॥३॥ ओज, भूमि, पुत्र, शील, चोर, रोग, ब्रह्म, भाई, पराक्रम, अग्नि, साहस और राजशत्रु के कारक भौम हैं॥३॥ ज्योतिर्विद्यामातुलगणितकार्यनर्तनवैद्य- हास्यभीश्रीशिल्पविद्यादिकारको बुधः॥४॥ ज्योतिष विद्या, मामा, गणित विद्या, नृत्य, वैद्यक, हास्य, भय, लक्ष्मी, शिल्पविद्या का कारक बुध है॥४॥ स्वकर्मयजनदेवब्राह्मणधनगृहकाञ्चन- वस्त्रपुत्रमित्रान्दोलनादिकारको गुरुः॥५॥ अपने कार्य, यज्ञ, देवता, ब्राह्मण, धन, गृह, सुवर्ण, वस्त्र, पुत्र, मित्र, आंदोलन आदि के कारक गुरु हैं॥५॥ कलत्रकार्मुकसुखगीतशास्त्र- काव्यपुष्पसुकुमारयौवनाभरणरजत- यानस्वर्गलोकमौक्तिक- विभवकवितारसादिकारको भृगुः॥६॥ स्त्री, धनुष, सुख, गीतशास्त्र, काव्यशास्त्र, पुष्प, यौवन, आभूषण, चाँदी, सवारी, स्वर्गलोक, मोती, वैभव, कविता, रस आदि के कारक शुक्र हैं॥६॥