चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)
Chanakya Niti Darpan Hindi
आचार्य चाणक्य / कौटिल्य द्वारा
स्रोत: Chanakya Niti Darpan with Shlokas and Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
७२ चाणक्यनीतिदर्पणः
छन्द--विप्र वृक्ष हैं मूल सन्ध्या वेद शाखा जानिये । धर्म कर्म हैं पत्र दोऊ मूल को नहिं नाशिये ॥ जो नष्ट मूल है जाय तो कुछ शाख पात न फूटिये । यही नीति सुनीति है की मूल रक्षा कीजिये ॥१३॥
ब्राह्मण वृक्ष के समान है, उसकी जड़ है सन्ध्या, वेद हैं शाखा और कर्म पत्ते हैं। इसलिए मूल ( सन्ध्या ) की यत्न पूर्वक रक्षा करो। क्योंकि जब जड़ ही कट जायगी तो न शाखा रहेगी और न पत्र ही रहेगा ॥१३॥
माता च कमला देवी पिता देवो जनार्दनः । बान्धवा विष्णु भक्ताश्च स्वदेशो भुवनत्रयम् ॥१४॥
दोहा--लक्ष्मी देवी मातु हैं, पिता विष्णु सर्वेश । कृष्णभक्त बन्धू सभी, तीन भुवन निज देश ॥१४॥
भक्त मनुष्यकी माता हैं लक्ष्मीजी, विष्णु भगवान् पिता हैं, विष्णुके भक्त भाई बन्धु हैं और तीनों भुवन उसका देश है ॥१४॥
एकवृक्षे समारूढ़ा नानावर्णा विहंगमाः । प्रभाते दिक्षु दशसु का तत्र परिवेदना ? ॥१५॥
दोहा--बहु विधि पक्षी एक तरु, जो बैठें निशि आय । भोर दशो दिशि उड़ि चलें, कह कोही पछिताय ॥१५॥
विविध वर्ण ( रंग ) के पक्षी एक ही वृक्ष पर रात भर बसेरा करते हैं और सबेरे दशों दिशाओं में उड़ जाते हैं। यही दशा मनुष्यों की भी है, फिर इसके लिये सन्ताप करने की क्या जरूरत ? ॥१५॥
बुद्धिर्यस्य बलं तस्य निर्बुद्धेस्तु कुतो बलम् ।
चाणक्यनीतिदर्पणः ७३
वने हस्ती मदोन्मत्तः शशकेन निपातितः ॥१६॥
दोहा—बुद्धि जासु है सो बली, निबुद्धिहि बल नाहिं । अति बल हाथिहिं स्यार लघु, चतुर हतेसि बन माहिं ॥१६॥
जिसके पास बुद्धि है उसी के पास बल है, जिसके बुद्धि ही नहीं उसके बल कहाँ से होगा । एक जंगल में एक बुद्धिमान् खरगोश ने एक मतवाले हाथी को मार डाला था ॥१६॥
का चिन्ता मम जीवने यदि हरिविश्वम्भरो गीयते । नो चेदर्भकजीवनाय जननीस्तन्यं कथं निःसरेत् ॥ इत्यालोच्य मुहुर्मुहुर्यदुपते लक्ष्मीपते केवलम् । त्वत्पादाम्बुजसेवनेन सततं कालो मया नीयते ॥१७॥
छन्द—है नाम हरिको पालक मन जीवन शंका क्यों करनी । नहिं तो बालकजीवन को थन से पय निसरत क्यों जननी ॥ यही जानकर बार है यदुपति लक्ष्मीपति तेरे । चरण कमल के सेवन से दिन बीते जायँ सदा मेरे ॥१७॥
यदि भगवान् विश्वंभर कहलाते हैं तो हमें अपने जीवन सम्बन्धी झंझटों (अन्न-वस्त्र आदि) की क्या चिन्ता ? यदि वे विश्वम्भर न होते तो जन्म के पहले ही बच्चे को पीने के लिए माता के स्तन में दूध कैसे उतर आता । बार-बार इसी बात को सोचकर हे यदुपते ! हे लक्ष्मीपते ! मैं केवल आप के चरण-कमलों की सेवा करके अपना समय बिताता हूं ॥१७॥
गीर्वाणवाणीषु विशिष्टबुद्धि— स्तथापि भाषान्तरलोलुपोऽहम् ।
७४ चाणक्यनीतिदर्पणः
यथा सुधायाममरेषु सत्यां स्वर्गाङ्गनानामधरासवे रुचिः ॥१८॥
सो०—देववानि बस बुद्धि, तऊ और भाषा चहौं। यदपि सुधा सुर देश, तहँ अवस सुर अधर रस ॥१८॥
यद्यपि मैं देववाणी में विशेष योग्यता रखता हूँ, फिर भी भाषान्तर का लोभ है ही। जैसे स्वर्ग में अमृत जैसी उत्तम वस्तु विद्यमान है फिर भी देवताओं को देवांगनाओं के अधरामृत पान करने की रुचि रहती ही है ॥१८॥
अन्नाद्दशगुणं पिष्टं पिष्टाद्दशगुणं पयः। पयसोऽष्टगुणं मांसं मांसाद्दशगुणं घृतम् ॥१९॥
दोहा—चूर्ण दश गुणो अन्न ते, ता दश गुण पय जान। पय से अठगुण मांस ते, तेहि दशगुण घृत मान ॥१९॥
खड़े अन्न की अपेक्षा दसगुना बल रहता है पिसान में। पिसान से दसगुना बल रहता है दूध में। दूध से अठगुना बल रहता है मांस में और मांस से भी दसगुना बल है घी में ॥१९॥
शाकेन रोगा वर्द्धन्ते पयसो वर्द्धते तनुः। घृतेन वर्द्धते वीर्यं मांसान्मासं प्रवर्द्धते ॥२०॥
दोहा—रोग बढ़त है शाकते, पय से बढ़त शरीर। घृत खाये वीरज बढ़े, मांस मांस गम्भीर ॥२०॥
शाक से रोग, दूध से शरीर, घी से वीर्य और मांस से मांस की वृद्धि होती है ॥२०॥
इति चाणक्ये दशमोऽध्यायः ॥१०॥
चाणक्यनीतिदर्पणः ७५
अथ एकादशोऽध्यायः ॥११॥
दातृत्वं प्रियवक्तृत्वं धीरत्वमुचितज्ञता ।
अभ्यासेन न लभ्यन्ते चत्वारः सहजा गुणाः ॥१॥
दोहा–दानशक्ति प्रिय बोलिबो, धीरज उचित विचार ।
ये गुण सीखे ना मिलैं, स्वाभाविक हैं चार ॥१॥
दानशक्ति, मीठी बात करना, धैर्य धारण करना, समय पर उचित अनुचित का निर्णय करना, ये चार गुण स्वाभाविक सिद्ध हैं । सीखने से नहीं आते ॥१॥
आत्मवर्गं परित्यज्य परवर्गं समाश्रयेत् ।
स्वयमेव लयं याति यथा राज्यमधर्मतः ॥२॥
दोहा–वर्ग आपनो छोड़ि के, गहे वर्ग जो आन ।
सो आपुइ नशि जात है, राज अधर्म समान ॥२॥
जो मनुष्य अपना वग छोड़कर पराये वर्ग में जाकर मिल जाता है तो वह अपने आप नष्ट हो जाता है । जैसे अधर्म से राजा लोग चौपट हो जाते हैं ॥२॥
हस्ती स्थूलतनुः स चांकुशवशःकिं हस्तिमात्रांकुशः।
दीपे प्रज्वलिते प्रणश्यति तमः कि दीपमात्रं तमः ॥
वज्रेणापि हताः पतन्ति गिरयः किं वज्रमात्रन्नगाः ।
तेजो यस्य विराजते स बलवान्स्थूलेषु कः प्रत्ययः ।३।
सवैया–आरि करी रह अंकुश के वश का वह अंकुश भारी करीसों ।
त्यौं तम पुंजहिं नाशत दीपसो दीपकहू अँधियार सरीसों ॥
७६ चाणक्यनीतिदर्पणः
वज्र के मारे गिरे गिरिहूँ कहूँ होय भला वह वज्र गिरीसों।
तेज है जासु सोई बलवान कहा विसवास शरीर बड़ोसों ॥३॥
हाथी मोटा-ताजा होता है, किन्तु अंकुश के वश में रहता है तो क्या अंकुश हाथी के बराबर है ? दीपक के जल जानेपर अन्धकार दूर हो जाता है तो क्या अन्धकार के बराबर दीपक है ? इन्द्र के वज्रप्रहार से पहाड़ गिर जाते हैं तो क्या वज्र उन पर्वतों के बराबर है ? इसका मतलब यह निकला कि जिसमें तेज है, वही बलवान् है यों मोटा-ताजा होने से कुछ नहीं होता ॥३॥
कलौ दश सहस्राणि हरिस्त्यजति मेदिनीम् ।
तदर्द्धं जाह्नवीतोयं तदर्द्धं ग्रामदेवताः ॥४॥
दोहा—दस हजार बीते बरस, कलि में तजि हरि देहि ।
तासु अर्द्ध सुर नदी जल, ग्रामदेव अधि तेहिं ॥४॥
कलि के दस हजार वर्ष बीतने पर विष्णु भगवान् पृथ्वी छोड़ देते हैं। पाँच हजार वर्ष बाद गंगा का जल पृथ्वी को छोड़ देता है और उसके आधे यानी ढाई हजार वर्ष में ग्राम-देवता ग्राम छोड़कर चलते हैं ॥४॥
गृहासक्तस्य नो विद्या न दया मांस भोजिनः ।
द्रव्यलुब्धस्य नो सत्यं स्त्रैणस्य न पवित्रता ॥५॥
दोहा—विद्या गृह आसक्त को, दया मांस जे खाहिं ।
लोभहिं होत न सत्यता, जारहिं शुचिता नाहिं ॥५॥
गृहस्थी के जंजाल में फँसे व्यक्ति को विद्या नहीं आती, मांसभोजी के हृदय में दया नहीं आती, लोभी के पास सच्चाई नहीं आती और कामी पुरुष के पास पवित्रता नहीं आती ॥५॥
चाणक्यनीतिदर्पणः ७७
न दुर्जनःसाधुदशामुपैति बहुप्रकारैरपि शिद्यमाणः । आमूलसिक्तःपयसाघृतेन न निम्बवृक्षोमंधुरत्वमेति ।६।
दोहा—साधु दशा को नहिं गहै, दुर्जन बहु सिखलाय । दूध घीव से सींचिये, नाम न तदपि मिठाय ॥६॥
दुर्जन व्यक्ति को चाहे कितना भी उपदेश क्यों न दिया जाय वह अच्छी दशा को नहीं पहुँच सकता । नीम के वृक्ष को चाहे जड़ से लेकर सिर तक घी और दूध से ही क्यों न सींचा जाय फिर भी उसमें मीठापन नहीं आ सकता ॥६॥
अन्तर्गतमलो दुष्टः तीर्थस्नानशतैरपि । न शुद्ध्यति तथा भाण्डं सुरदा दाहितं च यत् ॥७॥
दोहा—मन मलीन खल तीर्थ ये, यदि सौ बार नहाहि । होयँ शुद्ध नहिं जिमि सुरा, बासन दीनेहु दाहि ॥७॥
जिसके हृदय में पाप घर कर चुका है, वह सैकड़ों बार तीर्थ-स्नान करके भी शुद्ध नहीं हो सकता । जैसे कि मदिरा का पात्र अग्नि में झुलसने पर भी पवित्र नहीं होता ॥७॥
न वेत्ति यो यस्य गुण प्रकर्षं स तं सदा निन्दन्ति नाऽत्र चित्रम् । यथा किराती करिकुम्भलब्धां मुक्तां परित्यज्य बिभर्ति गुञ्जाम् ॥८॥
चा० छं०—जो न जानु उत्तमत्व जाहिके गुण गान की । निन्दतो सो ताहि तो अचर्ज कौन खान की ॥ ज्यों किराति हाथि माथ मोतियाँ विहाय कै । घूँघची पहीनतीं विभूषणै बनाय कै ॥८॥
७८ | चाणक्यनीतिदर्पणः
जो जिसके गुणों को नहीं जानता, वह उसकी निन्दा करता रहता है तो इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं है। देखो न, जंगल की रहनेवाली भिलनी हाथी के मस्तक की मुक्ता को छोड़कर घुँघची ही पहनती है ॥८॥
ये तु संवत्सरं पूर्णं नित्यं मौनेन भुंजते ।
युगकोटि सहस्रन्तु स्वर्गलोके महीयते ॥६॥
दोहा—जो पूरे इक बरस अर, मौन धरे नित खात ।
युग कोटिन कै सहस तरु, स्वर्ग माहिं पूजि जात ॥९॥
जो लोग केवल एक वर्ष तक, मौन रहकर भोजन करते हैं वे दश हजार वर्ष तक स्वर्गवासियों से सम्मानित होकर स्वर्ग में निवास करते हैं ॥९॥
कामं क्रोधं तथा लोभं स्वादुशृंगारकौतुकम् ।
अतिनिद्राऽतिसेवा च विद्यार्थी ह्यष्ट वर्जयेत् ॥१०॥
सोरठा—काम क्रोध अरु स्वाद, लोभ शृङ्गारहिं कौतुकहिं ।
अति सेवन निद्राहि, विद्यार्थी आठौ तजे ॥१०॥
काम, क्रोध, लोभ, स्वाद, शृङ्गार, खेल-तमाशे, अधिक नींद और किसी की अधिक सेवा, विद्यार्थी इन आठ कर्मों को त्याग दे। क्योंकि ये आठ विद्याध्ययन में बाधक हैं ॥१०॥
अकृष्टफलमूलानि वनवासरतः सदा ।
कुरुतेऽहरहः श्राद्धमृषिर्विप्रः स उच्यते ॥११॥
दोहा—बिनु जोते महि मूल फल, खाय रहे बन माहिं ।
श्राद्ध करै जो प्रति दिवस, कहिय विप्र ऋषि ताहि ॥११॥
चाणक्यनीतिदर्पणः ७९
जो ब्राह्मण बिना जोते फल पर जीवन बिताता, हमेशा वन में रहना पसन्द करता और प्रति दिन श्राद्ध करता है, उस विप्र को ऋषि कहना चाहिए ॥११॥
एकाहारेण सन्तुष्टः षट्कर्मनिरतः सदा ।
ऋतुकालेऽभिगामी च स विप्रो द्विज उच्यते ॥१२॥
सोरठा—एकै बार अहार, तुष्ट सदा षटकर्मरत ।
ऋतु में प्रिया विहार, करै बनै सो द्विज कहै ॥१२॥
जो ब्राह्मण केवल एक बार के भोजन से सन्तुष्ट रहता और यज्ञ, अध्ययन दानादि षट्कर्मों में सदा लीन रहता और केवल ऋतु-काल में स्त्रीगमन करता है, उसे द्विज कहना चाहिए ॥१२॥
लौकिके कर्मणि रतः पशूनां परिपालकः ।
वाणिज्यकृषिकर्ता यः स विप्रो वैश्य उच्यते ॥१३॥
सोरठा—निरत लोक के कर्म, पशु पालै बानिज करै ।
खेती में मन कर्म, करै विप्र सो वैश्य है ॥१३॥
जो ब्राह्मण सांसारिक धन्धों में लगा रहता है पशु पालन करता, वाणिज्य व्यवसाय करता या खेती ही करता है, वह विप्र वैश्य कहलाता है ॥१३॥
लाक्षादितैलनीलानां कौसुम्भमधुसर्पिषाम् ।
विक्रेता मद्यमांसानां स विप्रः शूद्र उच्यते ॥१४॥
सोरठा—लाख आदि मदमांसु, घीव कुसुम अरु नील मधु ।
तेल बेचियत तासु, शूद्र जानिये विप्र यदि ॥१४॥
जो लाख, तेल, नील कुसुम, शहद, घी, मदिरा और मांस बेचता है, उस ब्राह्मण को शूद्र-ब्राह्मण कहते हैं ॥१४॥
८० चाणक्यनीतिदर्पणः
परकार्यविहन्ता च दाम्भिकः स्वार्थधकः ।
छली द्वेषी मृदुक्रूरो विप्रो मार्जार उच्यते ॥१५॥
सोरठा—दंभी स्वार्थ सूर, पर कारज घालै छली ।
द्वेषी कोमल क्रूर, विप्र बिल्लार कहाव ॥१५॥
जो औरों का काम बिगाड़ता, पाखण्डपरायण रहता, अपना मतलब साधने में तत्पर रहता, छल, आदि कर्म करता ऊपर से मीठा, किन्तु हृदय से क्रूर रहता ऐसे ब्राह्मण को मार्जार विप्र कहते हैं ॥१५॥
वापीकूपतड़ागानामारामसुरवेश्मनाम् ।
उच्छेदने निराशंकः स विप्रो म्लेच्छ उच्यते ॥१६॥
सोरठा—कूप बावली बाग, औ तड़ाग सुरमन्दिरहिं ।
नाशै जो भय त्यागि, म्लेच्छ विप्र कहाव सो ॥१६॥
जो बावली, कुआँ, तालाब, बगीचा और देवमन्दिरों के नष्ट करने में नहीं हिचकता, ऐसे ब्राह्मण को ब्राह्मण न कहकर म्लेच्छ कहा जाता है ॥१६॥
देवद्रव्यं गुरुद्रव्यं परदाराभिमर्षणम् ।
निर्वाहः सर्वभूतेषु विप्रश्चाण्डाल उच्यते ॥१७॥
सोरठा—परनारी रत जोय, जो गुरु सुर धन को हरै ।
द्विज चाण्डाल सो होय, सबमें करु निर्वाह जो ॥१७॥
जो देवद्रव्य और गुरुद्रव्य अपहरण करता, परायी स्त्री के साथ दुराचार करता और लोगों की वृत्ति पर ही जो अपना निर्वाह करता है, ऐसे ब्राह्मण को चाण्डाल कहा जाता है ॥१७॥
६ चाणक्यनीतिदर्पणः ८१
देयं भोज्यधनं सुकृतिभिर्नो संचयस्तस्य वै श्रीकर्णस्य बलेश्च विक्रमपतेरद्यापि कीर्त्तिः स्थिता । अस्माकं मधुदानभोगरहितं नष्टं चिरात्सञ्चितं निर्वाणादिति नष्टपादयुगलं घर्षन्त्यहो मक्षिकाः ॥१८॥
सवैया—मतिमानको चाहिये वे धन भोज्य सुसंचहिं नाहिं दियोई करें ते बलि विक्रम कर्णहू कीरति, आजुलों लोग कहोई करें ॥ चिरसंचि मधु हम लोगन को बिनु भोग दिये नसिबोई करें । यह जानि गये मधुनास दोऊ मधुमखियाँ पाँव घिसोई करें ।
आत्म-कल्याण की भावनावालों को चाहिये कि अपनी साधारण आवश्यकता से अधिक बचा हुआ अन्न वस्त्र या धन दान कर दिया करें, जोड़ें नहीं। दान ही की बदौलत कर्ण बलि और महाराज विक्रमादित्य की कीर्ति आज भी विद्यमान है। मधुमक्खियों को देखिये वे यही सोचती हुई अपने पैर रगड़तीं हैं कि "हाय ! मैंने दान और भोग से रहित मधु को बहुत दिनों में इकट्ठा किया और वह क्षण में दूसरा ले गया"॥१८॥
इति चाणक्ये एकादशोऽध्यायः ॥११॥
अथ द्वादशोऽध्यायः ।
सानन्दं सदनं सुतास्तु सुधियः कान्ता प्रियालापिनी इच्छापूर्तिधनं स्वयोषितिरतिः स्वाज्ञापराः सेवकाः
८२ चाणक्यनीतिदर्पणः
आतिथ्यं शिवपूजनं प्रतिदिनं मिष्ठान्नपानं गृहे साधोः सङ्गमुपासते च सततं धन्यो गृहस्थाश्रमः॥१॥
स० सानन्दमंदिर पंडित पुत्र सुबोल रहै तिरिया पुनि प्राणपियारी। इच्छित सम्पति और स्वतीय रति रहै सेवक भौंह निहारी॥ आतिथ औ शिवपूजन रोज रहे घर संच सुअन्न औ वारी। साधुन संग उपासात है नित धन्य अहै गृह आश्रम धारी॥१॥
आनन्द से रहने लायक घर हो, पुत्र बुद्धिमान् हो, स्त्री मधुरभाषिणी हो, मानमाना धन हो, अपनी स्त्री पर प्रेम हो, सेवक आज्ञाकारी हो, घर आये हुए अतिथियों का सत्कार हो, प्रति दिन शिवजी का पूजन होता रहे और सज्जनों का साथ हो तो फिर वह गृहस्थाश्रम धन्य है॥१॥
आर्तेषु विप्रेषु दयान्वितश्चे- च्छ्रद्धेण या स्वल्पमुपैति दानम्। अनन्तपारं समुपैति दानम्। यद्दीयते तन्न लभेद् द्विजेभ्यः॥२॥
दोहा—दिया दयायुत साधुसो, आरत विप्रहिं जौन। थोड़ी मिलै अनन्त ह्वै, द्विज से मिलै न तौन॥२॥
जो मनुष्य श्रद्धापूर्वक और दयाभाव से दीन-दुखियों तथा ब्राह्मणों को थोड़ा भी दान दे देता है तो वह उसे अनन्तगुणा होकर उन दीन ब्राह्मणों से नहीं बल्कि ईश्वर के दरबार से मिलता है॥२॥
चाणक्यनीतिदर्पण। ८३
दाक्षिण्यं स्वजने दया परजने शाठ्यं सदा दुर्जने प्रीतिःसाधुजने स्मयः खलजने विद्वज्जने चार्जवम् । शौर्यं शत्रुजने क्षमा गुरुजने नारीजने धूर्तता इत्थं ये पुरुषा कलासु कुशलास्तेष्वेव लोकस्थितिः ॥३॥
कविता–दक्षता स्वजनबीच दया परजन बीच शठता सदा ही रहे बीच दुरजन के । प्रीति साधुजन में खलन माहिं अभिमान सरल स्वभाव रहे बीच पण्डितन के। शत्रुन में शूरता सयानन में क्षमा पूर धुरताई राखे फेरि बीच नारिजन के। ऐसे सब कला में कुशल रहैं जेते लोग लोक थिति रहि रहे बीच तिनहिन के ॥३॥
जो मनुष्य अपने परिवार में उदारता, दुर्जनों के साथ शठता, सज्जनों से प्रेम, दुष्टों में अभिमान, विद्वानों में कोमलता, शत्रुओं में वीरता, गुरुजनों में क्षमा, और स्त्रियों में धूर्तता का व्यवहार करते हैं । ऐसे ही कलाकुशल मनुष्य संसार में आनंद के साथ रह सकते हैं ॥३॥
हस्तौ दानविवर्जितौ श्रुतिपुटौ सारस्वतद्रोहिणौ नेत्रे साधुवलोकनेन रहिते पादौ न तीर्थं गतौ ॥ अन्यायार्जितवित्तपूर्णमुदरं गर्वेण तुङ्गं शिरो । रे रे जम्बुक मुञ्चमुञ्च सहसा नीचं सुनिन्द्यं वपुः ॥४॥
छ०–यह पाणि दान विहीन कान पुराण वेद सुने नहीं । अरु आँखि साधुन दर्शहीन न पाँव तीरथ में कहीं ॥
७४ चाणक्यनीतिदर्पणः
अन्याय वित्त भरो सुपेट उठयो शिरो अभिमानहीं । वपु नीच निंदित छोड़ु छोड़ अरे सियार सो वेगहीं ॥ १ ॥
जिसके दोनों हाथ दान विहीन हैं, दोनों कान विद्याश्रवण से परांगमुख हैं, नेत्र सज्जनों का दर्शन नहीं करते और पैर तीर्थों का पर्यटन नहीं करते । जो अन्याय से अर्जित धन से पेट पालते हैं और गर्व से सिर ऊँचा करके चलते हैं, ऐसे मनुष्यों का रूप धारण किये हुए ऐ सियार ! तू झटपट अपने इस नीच और निन्दनीय शरीर को छोड़ दे ॥ ४ ॥
येषां श्रीमद्यशोदा सुतपदकमले नास्ति भक्तिर्नराणां येषामाभीरकन्याप्रियगुणकथने नानुरक्ता रसज्ञा । येषां श्रीकृष्णलीलाललितरसकथा सादरोनैव कर्णौ धिक्तांधिक्तांधिगेतां कथयतिसततं कीर्तनस्थोमृदङ्गः
छं०-जो नर यसुमतिसुत चरणन में भक्ति हृदय से कीन नहीं । जो राधाप्रिय कृष्ण चन्द्र के गुण जिह्वा नाहिं कहीं ॥ जिनके दोउ कानन माहिं कथारस कृष्ण को पीय नहीं । कीर्तन माहिं मृदंग इन्हें धिक् २एहि म् ति कहेहि कहीं ।५।
कीर्तन के समय बजता हुआ मृदंग कहता है कि जिन मनुष्यों को श्रीकृष्णचन्द्रजी के चरण कमलों में भक्ति नहीं है श्रीराधारानी के प्रिय गुणों के कहने में जिसकी रसना अनुरक्त नहीं और श्रीकृष्ण भगवान् की लीलाओं को सुनने के लिए जिसके कान उत्सुक नहीं हैं । ऐसे लोगों को धिक्कार है, धिक्कार है ॥ ५ ॥
चाणक्यनीतिदर्पणः ८५
पत्रं नैव यदा करीरविटपे दोषो वसन्तस्य किं नोलूकोऽप्यवलोकते यदि दिवा सूर्यस्य किं दूषणम्। वर्षा नैव पतन्ति चातकमुखे मेघस्य किं दूषणम् । यत्पूर्वं विधिना ललाटलिखितं तन्मार्जितुं कः क्षमः
छं०-पात न होय करीरन में यदि दोष बसन्तहि कौन तहाँ है। त्यौं जब देखि सकै न उलूक दिये तहँ सूरज दोष कहाँ है। चातक आनन बूँदपरै नहिं मेघन दूषण कौन यहाँ है॥ जो कछु पूरब माथ लिखा विधि मेटनको समरथ कहाँ है॥
यदि करीर के पेड़ में पत्ते नहीं लगते तो बसन्त ऋतु का क्या दोष ? उल्लू दिन को नहीं देखता तो इसमें सूर्य का क्या दोष ? बरसात की बूँदें चातक के मुख में नहीं गिरतीं तो इसमें मेघ का क्या दोष ? विधाता ने पहले ही ललाट में जो लिख दिया है, उसे कौन मिटा सकता है ॥ ६ ॥
सत्सङ्गाद् भवति हि साधुता खलानाम् । साधूनां न हि खलसंगतेः खलत्वम् ॥ आमोदं कुसुमभवं मृदेव धत्ते मृद्गन्धं नहि कुसुमानि धारयन्ति ॥७॥
व० ति०-सतसंगसों खलन साधु स्वभाव लेव । साधू न दुष्टपन संग परेहु लेव ॥
८६ चाणक्यनीतिदर्पणः
माटिहि बास कछु फूलन धार पावै ।
माटी सुवास कहुँ फूल नहिं बसावै ॥ ७ ॥
सत्संग से दुष्ट सज्जन हो जाते हैं । पर सज्जन उनके संग से दुष्ट नहीं होते । जैसे फूल की सुगंधि को मिट्टी अपनाती है, पर फूल मिट्टी की सुगन्धि को नहीं अपनाते ॥ ७ ॥
साधूनां दर्शनं पुण्यं तीर्थीभूता हि साधवः ।
कालेन फलते तीर्थं सद्यः साधुसमागमः ॥८॥
दोहा—साधू दर्शन पुण्य है, साधु तीर्थ के रूप ।
काल पाय तीरथ फलै, तुरतहिं साधु अनूप ॥ ८ ॥
सज्जनों का दर्शन बड़ा पुनीत होता है । क्योंकि साधुजन तीर्थ के समान रहते हैं । बल्कि तीर्थ तो कुछ समय बाद फल देते हैं पर सज्जनों का संत्संग तत्काल फलदायक है ॥ ८ ॥
विप्राऽस्मिन्नगरे महान् कथय कस्तालद्रुमाणां गणः
को दाता रजको ददाति वसनं प्रातर्गृहीत्वा निशि ।
को दक्षः परवित्तदारहरणे सर्वोऽपि दक्षो जनः
कस्माज्जीवसि हे सखे विष कृमि न्यायेन जीवाम्यहम् ।
कवित्त—कहौ या नगर में महान् है कौन ? विप्र ! तारन के वृक्षन के कतार के कतार हैं । दाता कहो कौन है ? रजक देत साँझ आनि धोय शुभ वस्त्र को जो देत सकार है । दक्ष कहौ कौन है ? प्रत्यक्ष सबही हैं दक्ष हरने को कुशल परायो धनदार हैं
चाणक्यनीतिदर्पणः ८७
हैं ? कैसे तुम जीवत कहो मोसों मीत ! विष कृमिन्याय कर लीज निरधार है ॥ ९ ॥
कोई पथिक किसी नगर में जाकर किसी सज्जन से पूछता है हे भाई ! नगर में कौन बड़ा है ? उसने उत्तर दिया—बड़े तो ताड़ के पेड़ हैं। ( प्रश्न ) दाता कौन है ? (उत्तर) धोबी, जो सबेरे कपड़े ले जाता और शाम को वापस दे जाता है । ( प्रश्न ) यहाँ चतुर कौन है ? (उत्तर) पराई दौलत ऐंठने में यहाँ सभा चतुर हैं । (प्रश्न) तो फिर हे सखे ! तुम यहाँ जीते कैसे हो ? ( उत्तर ) उसी तरह जीता हूँ जैसे कि विष का कीड़ा विष में रहता हुआ भी जिन्दा रहता है ॥ ९ ॥
न विप्रपादोदकपंकजानि
न वेदशास्त्रध्वनिगर्जितानि ।
स्वाहास्वधाकारविवर्जितानि
श्मशानतुल्यानिगृहाणि तानि ॥१०॥
दोहा—
विप्रचरण के उदक से, होत जहाँ नहिं कीच ।
वेद ध्वनि स्वाहा नहीं, वे गृह मर्घट नीच ॥
जिस घर में ब्राह्मणों के पैर धुलने से कीचड़ नहीं होता, जिसके यहाँ वेद और शास्त्रों की ध्वनि का गर्जन नहीं और जिस घर में स्वाहा स्वधा का कभी उच्चारण नहीं होता, ऐसे घरों को श्मशान के तुल्य समझना चाहिए ॥ १० ॥
४४ चाणक्यनीतिदर्पणः
सत्यं माता पिता ज्ञानं धर्मो भ्राता दया सखा शांतिः पत्नी क्षमा पुत्रः षडेते मम बान्धवाः ॥११॥
सोरठा—सत्य मातु पितु ज्ञान, सखा दया भ्राता धरम ।
तिया शांति सुत जान, क्षमा यही षट् बन्धु मम ॥११॥
कोई ज्ञानी किसी के प्रश्न का उत्तर देता हुआ कहता है कि सत्य मेरी माता है, ज्ञान पिता है धर्म भाई है, दया मित्र है, शांति स्त्री है और क्षमा पुत्र है, ये ही मेरे छः बान्धव हैं ॥११॥
अनित्यानि शरीराणि विभवो नैव शाश्वतः ।
नित्यं सन्निहितो मृत्युः कर्त्तव्यो धर्मसंग्रहः ॥१२॥
सोरठा—है अनित्य यह देह, विभव सदा नाहिं थिर है ।
निकट मृत्यु नित हेय, चहिए कीन संग्रह धरम ॥१२॥
शरीर क्षणभंगुर है, धन भी सदा रहनेवाला नहीं है, मृत्यु बिल्कुल समीप विद्यमान है। इसलिए धर्म का संग्रह करो ।
निमन्त्रणोत्सवा विप्रा गावो नवतृणोत्सवाः ।
पत्युत्साहयुता भार्या अहं कृष्ण ! रणोत्सवः ॥१३॥
दोहा—पति उत्सव युवतीन को, गौवन को नवघास ।
नेवत द्विजन को हे हरि, मोहिं उत्सव रणवास ॥१३॥
ब्राह्मण का उत्सव है निमन्त्रण, गौओं का उत्सव है नई घास । स्त्री का उत्सव है पति का आगमन, किन्तु हे कृष्ण ! मेरा उत्सव है युद्ध ॥१३॥
. चाणक्यनीतिदर्पणः ४९
मातृवत्परदारेषु परद्रव्याणि लोष्ठवत् । आत्मवत्सर्वभूतानि यः पश्यति स पंडितः ॥१४॥ दोहा—पर धन माटी के सरिस, परतिय माता मेष । आपु सरीखे जगत सब, जो देखे सो देख ॥१४॥
जो मनुष्य परायी स्त्री को माता के समान समझता, पराया धन, मिट्टी के ढेले के समान और और अपने ही तरह सब प्राणियों के सुख-दुःख समझता वही पण्डित है ॥१४॥
धर्मे तत्परता मुखे मधुरता दाने समुत्साहता मित्रेऽवंचकता गुरौ विनयता चित्तेऽतिगम्भीरता । आचारे शुचिता गुणे रसिकता शास्त्रेषु विज्ञातृता रूपे सुन्दरता शिवे भजनता त्वय्यस्ति भो राघवः ॥
कविता-धर्म माहिं रुचि मुख मीठी बानी दान वचन शक्ति मित्र संग नहिं ठगने बान है । वृद्धमाहिं नम्रता अरु मन में गम्भीरता शुद्ध है आचरण गुण विचार विमल हैं । शास्त्र का विशेष ज्ञान रूप भी सुहावन है शिवजी के भजन का सब काल ध्यान है । कहे पुष्पवन्त ज्ञानी राघव बीच मानों सब ओर इक ठौर कहिन को न मान है ॥१५॥
वशिष्ठजी श्रीरामचन्द्रजी से कहते हैं—हे राघव ! धर्म में तत्परता, मुख में मधुरता, दान में उत्साह, मित्रों में निश्छल व्यवहार, गुरुजनों के समक्ष नम्रता, चित्त में गम्भीरता, आचार
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चाणक्यनीतिदर्पणः
में पवित्रता, शास्त्रों में विज्ञता, रूप में सुन्दरता और शिवजी में भक्ति, ये गुण केवल आप ही में हैं ॥१५॥
काष्ठं कल्पतरुः सुमेरुरचलश्चिन्तामणिः प्रस्तरः सूर्यस्तीव्रकरः शशीक्षयकरः क्षारो हि वारां निधिः । कामो नष्टतनुर्बलिर्दितिसुतो नित्यं पशुः कामगौः नैस्तांस्ते तुलयामि भो रघुपते कस्योपमादीयते ॥१६॥
कवित्त—कल्पवृक्ष काठ अंचल सुमेरु चिन्तामणिन भी जाति पत्थर की जानिये। सूरुज में उष्णता अरु कलाहीन चन्द्रमा है सागरहू का जल खारो यह जानिये। कामदेव नष्टदेव अरु राजा बली दैत्यदेव कामधेनु गौ को भी पशु मानिये। उपमा श्रीराम की इन से कुछ तुलैना और कौन वस्तु जिसे उपमा बखानिये ॥१६॥
कल्पवृक्ष काष्ठ है, सुमेरु अचल है, चिन्तामणि पत्थर है, सूर्य की किरणें तीखी हैं, चन्द्रमा घटता-बढ़ता है, समुद्र खारा है, कामदेव शरीर रहित है, बलि दैत्य है और कामधेनु पशु है। इसलिए इनके साथ तो मैं आपकी तुलना नहीं कर सकता। तब हे रघुपते ! किसके साथ आपकी उपमा दी जाय ? ॥१६॥
विद्या मित्रं प्रवासे च भार्या मित्रं गृहेषु च । व्याधितस्यौषधं मित्रं धर्म मित्रं मृतस्य च ॥
दोहा—विद्या मित्र विदेश में, घरमें नारी मित्र । रोगिहिं औषधि मित्र है, मरे धर्म ही मित्र ॥१७॥
प्रवास में विद्या हित करती है, घर में स्त्री है, रोगग्रस्त
चाणक्यनीतिदर्पणः ९१
पुरुष का हित औषधि से होता है और धर्म मरे का उपकार करता है ॥१७॥
विनयं राजपुत्रेभ्यः पण्डितेभ्यः सुभाषितम् । अनृतं द्यूतकारेभ्यःस्त्रीभ्यः शिक्षेत् कैतवम् ॥१८॥
दोहा–राजसुत से विनय अरु, बुध से सुन्दर बात । झूठ जुआरिन से कपट, स्त्री से सीखी जात ॥१८॥
मनुष्य को चाहिए कि विनय (तहजीब) राजकुमारों से, अच्छी-अच्छी बातें पण्डितों से, झुठाई जुआरियों से और छल-कपट स्त्रियों से सीखे ॥ १८ ॥
अनालोक्यं व्ययं कर्ता अनाथः कलहप्रियः । आर्तः स्त्रीसर्वक्षेत्रेषु नरः शीघ्रं विनश्यति ॥१६॥
दोहा–बिन विचार खर्चा करे, झगरे बिनहिं सहाय । आतुर सब तिय में रहै, सोई बेगि नसाय ॥१९॥
बिना समझे-बूझे खर्च करनेवाला अनाथ झगड़ालू, और सब तरह की स्त्रियों के लिए बेचैन रहनेवाला मनुष्य देखते-देखते चौपट हो जाता है ॥१९॥
नाऽऽहारं चिन्तयेत्प्राज्ञो धर्ममेकं हि चिन्तयेत् । आहारो हि मनुष्याणां जन्मना सह जायते ॥२०॥
दोहा–नहिं आहार चिन्तहिं सुमति, चिन्तहिं धर्म हिं एक । होहिं साथ ही जनम के, नरहिं अहार अनेक ॥२०॥
विद्वान् को चाहिए कि वह भोजनकी चिन्ता न किया