चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)
Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary
मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा
१४६ ११८ ( रीडीण्ड्स ७१ ) आगे कथने भैंबरू का चाँद व गुफ्तः शुदने भैंबरू ( भैंबरू-चाँद युद्ध ) भैंवरू देखा कँवरू परा। रोहतास जैसे परबरा ॥१ हाथ साँग मारसि तस आई। फिरें लाग धड़ गयठ जुझाई ॥२ फुनि झाड़सि बिजुरी तरबारा। ढाफ दइ कें हनसि कपारा ॥३ टूटि खाँड तातर सभ धावा। पीठि कहा हौं इहँ पै पावा ॥४ फुनि लेँहति काड़सि सरबानी। तँहुत माँठा चला परानी ॥५ खेदत उड़झा भैंबरू, परा दाव सँहराइ ।६ पलटि भाँठ जो देखा, तो बहुरि मारसि आइ॥७ , टिप्पणी—(१) साँग—एक प्रकारका भाला जो बहेंस्ते डोय अर्थात् ७-८ फुट लम्बा होता है और उसका सिरा ढाई फुट लम्बा और पतला होता है। उसका दण्ड भी बांसेका होता है। (अर्विन आमीं आफ द इण्डियन मुगल्स) (२) खेदत—पीछा करते हुए। उड़झा—ठोकर खाकर गिरा। ११९ ( रीडीण्ड्स ८ ) धादिदाना रखन दर लश्करे राव रूपचन्द अज हिरसते फौम ( राव रूपचन्दकी सेनामें विजयोल्लास ) साखी तार दीठ बन मार। और हँवर महरें के द्वार ॥१ दीठ आनें बांधि खपाई। पाँयक मठ फरहिं नवाई ॥२ रकत लहू है सरपर भग। एकौ कुँवर न आगे सरा ॥३ जिन्द देखा तिन्द गयठ परानों। डर सहँ फोट न करें पधानों ॥४ वे महर जेठनाग जिवाये। सगरैं पीर न काऊँ आये ॥५ मार कहा महर सों, शापैं ना यह बीर ।६ बग हँकार पठावहु, लोरक बावनबीर ॥७
१४० १२० ( रोकीण्ड्स ८१ ) आमदन भाट बर लोरक अज फिरस्तादन महर (महरके भेजे भाटका लोरकके पास आना) भाट गुसाँई तुम्ह गइ धावसि । आगैं दइ लोरक लै आवसि ॥१ चढ़ तुरग भाट दौरावा । लोरक साझ जो आभर पावा ॥२ कहवाँ भाट घोड़ दौरायहू । काकर पठये कसा तुम्ह आयहु ॥३ लोर महर तुम्ह बेग हँकारी । कँधरू धँधरू चाँठे मारी ॥४ जारब गोवर लाग गोहारी । लइ अध चाँठ होइ अँधियारी ॥५ उठा लोर सुन माँग हमारी, महर भया अवसान ।६ आज चाँठ रन मारौं, देउउँ राइ परान ॥७ टिप्पणी—(५) जारब—जला दूँगा । (६) अवसान—हताश परेशान । १२१ ( रोकीण्ड्स ९० ; बम्बई १३ ) गुने राजा रफ्तने लोरक व मुस्तइद शुदन बर जंग ( लोरकका युद्धके लिए सुसज्जित होना ) घर गा लोरक ढाँकि सँभारी । ओडन खाँड लीन्ह तसवारी ॥१ बाँध रक्तावल खसि' सर पागा' । पहिरसि तारमार कर अँगा ॥२ घनमहरी कर खींच पछावा । पीत' काट मनाइ मढ़ावा ॥३ सावर जिह्वन लीन्ह टपाइ । लोरक मुँह दीन्हि औंधाइ ॥४ सारग एक जुगत कर घड़ा । जनु अर्जुन कहूँ रावन कड़ा ॥५ फिर मँजाइ कतार' लीन्ह, बाँध चला तरवारि ।६ रक्त पियास खाँड लोर कर, दाँग जीभ पसारि ॥७ पाठान्तर—बम्बई प्रति— शीर्षक—आमदने लोरक दर खाना व साख्ताशुदन बराय जंग व दर तन आमदा व बस्तने अस्लहा (घर आकर युद्धकी तैयारी करना और सशास्त सुसज्जित होना)
१४८ १-कसि । १-ख०-पौगा (पे के नीचे गुच्छे का अभाव है जिससे खेंया पढ़ा जाता है) । ३-पीहर । ४-कौरव कहें । ५-सँजोरि कराई । ६-बींग ।
१२२ ( रौदीन्हस ६८ ) आमदने मैना पेशि लोरक व गिरिया कर्दैन घ ( लोरकके सामने जाकर मैनाका विलाप ) आगे आइ ठाढ़ि धनि मैनाँ । नीर समुँद जस उलटै नैनाँ ॥१ चुइ-चुइ बूँद परहिं घनहारा । खनु टूटहिं गज मोतिहूँ हारा ॥२ जो तुम्ह है जूझे कै साधा । महिं सू मारि करहु दुइ आधा ॥३ तौ पीछे उठ सूझे आयहू । मोर असीस जीत घर जायहू ॥४ बाफर नारि सो झूझि न बाई । बाबन सिखण्डि रहा लुकाई ॥५ देहु असीस रोषन, मारि भाँठ घर आवहूँ । ६ सोने बेड़ि गड़ाइ, मोतिहूँ माँग भरावहूँ ॥७ टिप्पणी-(१) धनि-स्त्री पत्नी । मैना-लोरक्की पत्नी । (२) घनहारा-ठान । (५) सिखण्डि-शिखण्डी, महाभारत का एक पात्र जो नपुंसक था । (६) रोचन-टीका । (७) बेड़ि-पैर का एक आभूषण ।
१२३ ( अप्राप्य )
१२४ ( रौदीन्हस ८५ ; बम्बई ७ ) रफतन लोरक दर खानये अजबी व खदाना-ये मर्थ कर्दैन ङ ( लोरकका अजबीके घर जाना ) जैस अमीम दत गम पायहु । लारक राठ' जीति घर आयहु ॥१ लारक गा अजबी के धारा । भीतर हुवै सो आइ हँकारा ॥२
१४९
पहिलहिं अजयी दोख अनावाँ । मिस कै बरफा दाँत कँपावा ॥३ घात काट कहसि केर ओ फेरी । घिरै लै गोड़ी तर घेरी ॥४ अग मूँह अस करे पुकारा । कौन मीचु दीन्हें कन्तारा ॥५ लाज लाग महरैं मुँह, अमहीं राउ कह आठ ।६ खाँड मीचु बनायउँ, दइ भल पछतात ॥७
पाठान्तर—बम्बई प्रति— शीर्षक—राजी शुदने लेकिन व इजाजत दादने मैना, विरभ कर्दने लोरक बतानये राब रफतन (मोकिन का राजी होना मैना का अनुमति देना और लोरक का राव के यहाँ जाना) १—रइ । २—अजयी । ३—अपावा । ४—अमवइ । टिप्पणी—(२) अजयी—लोक-कथाओं के अनुसार अजयी लोरक का गुरु था । यहाँ उसके सम्बन्ध में स्पष्ट कुछ नहीं कहा गया है, परन्तु प्रसंग से लोक-कथाओं की बात ठीक जान पड़ती है ।
१२५ ( रीसण्ड्स ८९; बम्बई ८ ) नमून्दने लोरक रा अजयी तरीकए जंग (अजयी का युद्ध कौशल बताना)
अजयी कर बरकै असलाओँ । यहँ बहुत तुम्ह हुत' सिधि पाऔँ ॥१ में लोरक सहियों सिधि दीन्हेँ । हाथ भिरेँ तुम्ह नहियाँ लीन्हेँ ॥२ अब पुषि देतौं सुनहु दूँ मोरी । ओडन देह न देखें चोरी ॥३ फिरें रोग सुरैं पाठ उठावहु । भाँइ तुकाइ खड्ग चमकयहु ॥४ पात गहत जिन भूलै दीठी । पाउ न देसँ अखरहिं पीठी ॥५ खाल उघारैं खदहुँ, सीस भरे जिउ जाइ ।६ खड़ग भरहरे मारहु, अइसें पन्ह अरराइ ॥७
पाठान्तर—बम्बई प्रति । शीर्षक—विदआ करने लोरक बर अजयी रा ब हुनरहाय जंग आमोखने अजयी बर लोरक रा (लोरक का अजयी से विदा माँगना और अजयी का उसका युद्ध कौशल बताना)
९५
१—पकरहिं मलगकतैं । २—छेदैं । ३—पावठैं । ४—रते । ५—बैठे । ६—सुनहु तुम । ७—पाट परै । ८—डगायहु । —धस्कावहु । ९ —उभारत रोवहि । ११—बइ मयाहर । टिप्पणी—(२) तदिया—उस दिन । जदिया—जिस दिन । (३) ओडम—डाल । (६) संदेशु—संदेशो । (७) अराव—पेड़के गिरनेकी क्रिया । १२६ ( रफ्तींग्स ०१ ) रफ़्तने लौरक बर महर ब बग दहानीदने महर लोरक रा ( लोरकका महरके पास आना । महरका लोरकको पान देना ) पहिले जाइ महर (अरगायहु)¹ । तौ पाछै तुम्ह इसँ जाबहु ॥१ लोरक जाइ महर अरगावा । पेग बीस चल आगैं आवा ॥२ अवनिहि लोरहिं भये परजाई । सगरैं होइ मैं देखेतैं आई ॥३ लोरक सूर बिहसि तूँ मारा । मार पीठ मुख देखउँ तोरा ॥४ हौं तुम्ह यें धीर जो पाऊँ । आधे गोवर राज फराऊँ ॥५ तीन पान कर बीरा, महरैं लोरहि दीन्हि हँकार ।६ घोर देउँ सो आउर पाखर, जो आयहु रन मार ॥७ मूलपाठ—१—अरगावा । टिप्पणी—(१) तौ—उसके । (३) तइस—उसके अनुसार । १२७ ( रफ्तींग्स ०२ ) रवाँ कर्दने लोरक बा याराने खुद दर मिदानजंग ( लोरकका अपने साथियोके साथ युद्धके मैदानमे जाना ) चला खाग ले आपुन साथी । अइबाँ पखरे मँमंत हाथी ॥१ लोहू नदी जनु दह पुचकाइ । तारूँ तरणों सै जनबाइ ॥२
सिरफ लोह जनु अदनल भानूँ । डरहँ दूसर स्रसि न आनूँ ॥३ देखि पीठ राजा पहँ भाषा । चाँद कहा सूरज चलि आवा ॥४ उठै झार डर रहँ न जाइ । हाथि घोर सब चला पराइ ॥५ भूनहु पीठ सैं जीतब, आइ लोर छँदलाइ ।६ सर तीर सैं मारष, तिहँ मँह एक न जाइ ॥७ टिप्पणी-(१) एकर-शाहेक सूफ़स सुसज्जित । १२८ ( रीसन्दूम ७३ ) सिरते मुम्नीदिये फौज लोरक ( लोरककी सेनाकी तत्परता ) निसरत लोर सैन नीसरी । एक एक जन परफहिं अगरी ॥१ तउफहिं खड़ग दाँत सैं धरि । बाँधे पाट बिच गधिर घरे ॥२ झलकहिं ओहन तानें तरे । घाँघे पबर्र लोहें जरे ॥३ पटोर तारसार कें पहने । भये अतें पजर कें घने ॥४ सींह सिंदूर दरेरैं घरे । माजहिं देऊ घोर पाखरे ॥५ नियरैं नियरा पायक, चढ़ा सहस धर राठ ।६ अचल चलायें न चलैं, रहे रोप धर पाउ ॥७ टिप्पणी-(५) सींह-सिंदूर-इसका उल्लेख दो अन्य स्थानों पर भी हुआ है (१ १५३ २ ५/६) । रूपम तीन य, मून हे और तीन गून दाल बाच र बहुत स्पष्ट रूपम लिखे गये हैं। पहले शब्दक सींद पाठम कोई सन्देह नहीं हो सकता । दूसर शब्दका सन्दूर, संदूर, सिन्दूर सिंदूर कुछ भी पढ़ा जा सकता है । पदमावतमें भी यह शब्द युग्म दो बार आया है (१४४/६; १३६। ) । बहां माताप्रसाद गुप्तका पाठ है-सिंध संदूरा सिर सेंदूरहि । मधुमालतीमें उन्होंने सींह संदूर ( १ १०; १८१।२ ) पाठ दिया है। बासुदेवशरण अग्रवालने इनका तात्पर्य सिंह आर शार्दूल बतलाया है। और यही अथ माताप्रसादगुप्तने मधुमालतीमें स्वीकार किया है। सन्दूर अथवा संदूर हमारी दृष्टिमे मुक़्लोक अनामध्य अरघट है। बास्तविक पाठ सिन्दूर सिन्दूर अथवा सेंदूर है। और यह अनने रूपम्पमें
१५२ सिन्दुर है, जिसका अर्थ होता है हाथी। मध्यकालीन कलामें सिंह हस्ति एक अति प्रचलित 'मोटिफ' रहा है। (७) रोप—(धा०-रोपना) गाड़ना, दृढ करना। (४) सारमार—लोहेके तार का बना हुआ (सार—लोहा (सुने नागकी साँस चा सार भसम होइ जाय)। १२९ ( रौ०सूहस ८८ ) दैवत तुरने रूपवन्त व फिरिआदन भट ( रुक्मङ्गद भयभीत होअर दूत भेजना ) चहुँ दिसि दंस राठ डरि आधा। रहा अचल होइ चल न चलावा॥१ बीर चिलापहिं जाइ कहाँ। कौन उत्तर अस दीजै वहाँ ॥२ ओछे दर हम पावैं आय। अनैं पौर अब लाइ न जाय ॥३ देख मंदिर महँ ठागी लाजा। पौर राज ओ जिहैं सइँ माजा ॥४ काहू सा मन्त कर बिचारे। जे रहे मौन सो आगैं झारे ॥५ राइ भाट कह पठयं, महर गइ अब गाठ ।६ एक एक सइँ इसै, दूसर नर नहिं जाउ ॥७ १३० ( रौ०सूहस ८९ ) बाव गछन भट व मग रूंदने सींह व जुझना सुदन क ( दूतका लौटना युद्धमें सींहका मारा जाना ) बहुरे भाट दिवाई पानौं। महर बोल राजा कर मानौं ॥१ बाँठ असार फुरै लै आवा। पाछै सरे नहिं जिह कर पावा ॥२ सींह सिंगार धीर दुइ आये। राइ मथा कर पान दिखाये ॥३ जोउन सींह अकेले उतरा। हाथ खड़ग खसि धरती परा ॥४ अइ दूत अनै कुसगुन अस भयऊ। सींह सिंगार छोट रन गभऊ॥५
१५१ साँइ लाग रन रीसे, झाँप उठी नपार ।६ नहाँ भयउ जर फैंवरू, फाटसि खेद सिमार ॥७ टिप्पणी—(१) फुरै—तत्काल । १३१ ( रौलेन्दूस ९ ) जंग करने सिंगार का बाँगा व पुनः कूदने सिंगार ( सिंगार-बाँगा युद्ध : सिंगारकी मृत्यु ) देख सिंगार कोह चर चढ़ा । बाँध फरहरा आगे सरा ॥१ दाँव गहसि सर खाँड़इ घाऊ । तातर टूट काढ़ि गा पाऊ ॥२ दूसर खाँड लिहसि तरवारी । भिरे माट घर गीउ उपारी ॥३ दाब सिंगार चीर तम मारा । पिछला खाँड टूट गइ धारा ॥४ पुनि जमधर साँचे कर गहे । बजर चोट सर घेरेँ सहे ॥५ बिनु हथियार भया राउत, परिगा थाक सिंगार ।६ एक चोट दाइ फीतस, धर सों फाट कपार ॥७ टिप्पणी—फारसी शीर्षक असंगत जान पड़ता है। इस कड़बकमें बाँगाका कोई उल्लेख नहीं है। इसमें केवल सिंगार के युद्धकी बात जान पड़ती है। (१) फरहरा—फहराता झंडा । (३) गीउ—गरदन । (५) जमधर—छुरी नोकवाली कटार । १३२ ( रौलेन्दूस ११ ) भागने ब्रजराम व धरमूँ भज हरने राव रूपचन्द व पुनः कूदने ब्रजराम ( राव रूपचन्दकी ओरसे ब्रजराम और धरमूँका भागना और ब्रजरामका मारा जाना ) ब्रजदास धरमू दुइ आप । राइ भया कर पान दिवाय ॥१ आज मुदिन जाइहूँ पन्तार । गाँउ टाँउ कापर मैं सार ॥२
ओडन धँवर लाग घूँघरा। धरमदास सो आगें धरा ॥३ छाँड़ फिरे धानुष फर गहा। पानि धूलि धरि धीर रहा ॥४ धरमदास तुम नेर न आवहु। फौन ठाम फिइँ जीठ गँवावहु ॥५ धरमदास मन कोपा, काट मूँड लूँ आउँ ।६ भुझवा थान निफर गा, धरमदास परा ठाँउ ॥७
१३३ ( रीकेण्डस ९१ ) जंग करदन धरमूँ ब कुश्तह शुदन धरमूँ ( धरमूँका युद्ध करना और मारा जाना ) पुनि धरमूँ गुन मेलस सानी । पाँच टूट औ पंच गँवानी ॥१ धता बजाइ मेरि ओँ (तूरा) । साँरुहि धरमूँ चाँपइ पाछा ॥२ धरमूँ कोप पीठ तइ भिरे । चीरै गर धरमूँ कँ घरे ॥३ गये परान धरमूँ धर मारसि । काइ फनार दिये महँ सारसि ॥४ देइ पाठ तोरसि भूदण्डा । काटसि चीर सीस नौखण्डा ॥५ रनमल पैठ खड़ग लै मारसि, फैंबरू कइ पूछ ।६ रहे न तेगा नर पै, जूझ राह मजबूत ॥७ मूलपाठ-ठप । टिप्पणी-(२) इसका पूर्वपद और अगले कड़बककी पंक्ति २ का पूर्व पद एक ही है।
१३४ ( रीकेण्डस ९३ ) जंगिकर्दे जंग रनपति गोबद ( रनपतिक युद्ध ) रनपत दीन्हि महर अगसारी । बाहु बियाहि अनँ हँबारी ॥१ धता बजाइ मरि ओँ (तूरा) । खड़ग मूँठ भरलिहासिसिझोग॥२ दौर खाँड रनमल सर दीन्हाँ । रक्त धार सब सेंदुर कीन्हाँ ॥३
१९५ रनमल मरत सिरीचंद आवा । रनपत पाखर खाल खिंचावा ॥४ अजैराज सेंगर कर गहे । मारसि मेलक पाखर रहे ॥५ छाइ सिरीचंद पाखर भागा, झिठ लै गयउ पराइ ।६ राइ देखि चौंठा, तुम कस झूज न जाइ ॥७ टिप्पणी—(२) 'जम्भ बजाइ पेरि उतरा' पाठ भी सम्भव है । १३५ (रैकिड्स ९४) आल्हने चौंठा का फौज जुड़ कर मैदान भगा ( युद्धक्षेत्रमें ससैन्य चौंठाका आगमन ) धीरपाल करपत लै आवैं । मजवीर हमीर सनेफन पुलावैं ॥१ करमदास मतिराज देवानन्द । बिजैसेन औ महरास बिर्जचन्द ॥२ पिस्तनगर ष देखें ताको । इग्दीन खीस मरदेठ जाको ॥३ देपगढ हरराम सरूपा । अजयसिंह हरपार निरूपा ॥४ धीरू हरशु गनपत आनौ । सिउराज मदनूँ भल जानौ ॥५ तीस पखरिया आनौ, सब दर मारौ आज ।६ हाथिपाइ धन चौंदा लीजइ, गोवर कीजइ राज ॥७ १३६ (रैकिड्स ९५) बिरथानने महर लरक का मुकाबिले भोंगा ( महरका चौंठाका सामना करनेके लिए कौरवका भजना ) आनं पीर चौंठा लइ आवा । महर टेरि औ लार पुलावा ॥१ रास्क बीर पगरिया पारहु । पठै डाकनइ सीम हैंकारहु ॥२ पाँच दंम पाँच पाँझानौं । गतरी पाँच दम जिटिं जानौं ॥३ नाऊ एक तीन भाइनैं । पागर एक सगद फँ गिन ॥४ गहरवार औ शाद दम आनी । पागर कृष्ठ तुलानेउ जानी ॥५
आठ आइ दोइ आनें, जैस अधार कै मेह ॥६ लोइ पहिरे सब ठाढे, तिल एक सूझ न देह ॥७ टिप्पणी—(१) डाकबइ—हमलेनाइक । (४) सामनें—सैनिक; प्रधान । (६) अधार—आषाढ । १३७ (दीर्घोद्देश ५६) सिफते जग करदने बाँठा या गोरक ब हजीमते खुरदने ऊ (बाँठा-गोरक युद्ध । बाँठा की हार) उभरे खड़ग कुन्त तरबारी । घिर एक तह होइ रनमारी ॥१ टूटहिं मुण्ड रुण्ड धर परहीं । सियफर खोम न चिंत महँ धरहीं ॥२ खरख डँडाइर बाजहिं तारा । भये भाग भर रन रतनारा ॥३ अस फागुन फूलहिं बन टेसू । तस रन रक्त रात भये मेसू ॥४ बाजहिं भेरि सींग औ तूरा । दर भा घाचर रकत सिंदूरा ॥५ परे पखरिया चहुँ दिसि, कुन्त राज सर लाग ।६ महर वीर कुछ ठहरे, बाँठा जिठ खइ भाग ॥७ टिप्पणी—(३) डँडाइर—दण्डताल; ताल देनेका वाद्य । तारा—करताल । (४) टेसू—पलाशका फूल । यह फागुनके महीनेमें होलीके आसपास फूलता है। इसका रंग गहरा लाल होता है। जब फूलता है तो पूरे वृक्ष पर छा जाता है और दूरसे देखने पर भान पडता है कि जंगलमें आग लगी हुए है। (५) भेरि—मृदंगसे मिलता जुलता वाद्य। ब्रजमें लम्बी तुरहीके समान एक बाजेको भी भेरि कहते हैं। सींग—(सं शृंगिन् > सिम > सींग)—पशुके सींगसे बना फूंकनेका वाद्य । आइने-अकबरीमें नक्करखानेके बाजोंमें इसका उल्लेख है। वहाँ कहा गया है कि यह गायकी सींगकी शकलका तांबेका बनता है और एक साथ दो बजाये जाते हैं। तूरा—धातुका बना मुँहसे फूँकनेका बाजा । कदाचित इसे ही आजकल तुरही कहते हैं। (६) पखरिया—पाखर (कवच) धारी सैनिक । (७) उभरे—ताकतमें अधिक ।
१५७ १३८ (रीडिंग्स ९७) मुशावरत कर्दने राव रूपचन्द बा बाँठा (राव रूपचन्दका बाँठासे परामर्श) राइ कहा बाँठा कस कीजइ । सब दर खोप नगर किन लीजइ ॥१ ओ तिहँ राइ आपुन पँछवाइ । चाँद सनेह झूस पुनि पाई ॥२ पहिरै खाँड अनै तस जोरी । देखहिं देख बतीसो कोरी ॥३ पेखहिं पेखहिं मयठ अमेरा । चला भाजि राजा फर फेरा ॥४ चाँदा कारन जूस पुनि पायी । औ तिहँ रकतहँ मयठ बिगचा ॥५ लै वो पखरिया समता महँ, गाँठह कस कीज ।६ फै चाँदा लै जाइ राजा, फ गोबरौँ खिउ दीज ॥७ टिप्पणी—(२) दूसरी पंक्तिका उत्तर पद और पाँचवी पंक्तिका पूर्वपद लगभग एक-सा है । (५) प्रतीक अनुसार पाठ ठीक होते हुए भी पूरी पंक्तिके शुद्ध पाठ होनम सन्देह है । १३९ (रीडिंग्स ९८) जवाब दादन बांठा बर राव रूपचन्द रा (बांठाका उत्तर) राइ पखरिया माँ पहिं देहु । अदमी तीन चार तुम्ह लेहु ॥१ लै अभरौं हा राउत वहौं । पाछ मोर न छोड़हिं तहौँ ॥२ परा महर असि परी मढानी । बाँठ पिनवै तिहँ फे आनी ॥३ दुरि लै बाँठा तिहँ सुइँ गयउ । जहाँ अमेर महर सों अभयउ ॥४ [L25: दूध पियावत फिरैं हि न कोई । अब कँ मर्यै काल कित होई ॥५ परे पखरिया नौ दस, मल पानै होइ फाग ।६ महर सनाह टूटि गा, आछ गाँठ घर लाग ॥७
१५८ १४० ( रीकेन्स ९९ ) जम कंदने लोरक बा राव व हज़ीमत खुर्दने राव ( लोरक और रावका युद्ध : रावकी हार ) पठटा लोर संग जस गावा । फल खाँड राजा सर बाजा ॥१ खड्ग तार लोरक कै भाजी । पाखर काट राठ गा भाज़ी ॥२ पिवली जोनें भरसि महराजू । मारसि सिरिछन्द औ सुरैराजू ॥३ धीरगझ मारसि औ फिरे । बंबर आग खाँडे परवरे ॥४ मार सकति लै रफ़त बहाये । खड्ग झार लोहें भुझाये ॥५ आगें दइ लिहसि दर आपुन, हाथ चला धस टाँड ।६ लौटा बाँठ लोर [ ], सबन उझारस खाँड ॥८ टिप्पणी-(५) सकति (सं शक्ति)—तीन नोकोंवाला त्रिशूलके ढंगका छोटा बाण। १४१ ( रीकेन्स १ ) उफ्तादने बाँठ बर मैदान व हज़ीमत खुर्दने राव रूपचन्द बाँठका गिरना : राव रूपचन्दका पराजय उमर बाँठ लोरक धस मारा । परा धोर नर दबी उधारा ॥१ दूसर खाँड जा पैठ सनाहाँ । भुँजीं टूटि उपरि गइ पाहाँ ॥२ उठा छोर सकति कर गहे । मारसि बेरुझ पाखर रहे ॥३ उमर धीर दोउ बरबण्डा । अगिन भरै बर पावत खण्डा ॥४ गरद सेंजोइ बाँठ खसि परा । हियें पाठ दइ लोरक धरा ॥५ धरसि तार तरवारि कण्ठहुत, काट पसा लै मुण्ड ।६ माजि चला बर राठ रूपचंद, दंख पड़ा भइ रुण्ड ॥७ टिप्पणी-(४) बरबण्डा (वरिवण्ड)—बलवान प्रचण्ड दुर्धर्ष।
१५९ १४२ ( रौलेण्ड्स ११ ) दुमान बदन जरक अस कन्दरे सब रूपवन्द ( मारका स्वरूपमुखी सेनाका पीछा करना ) तोरुक कहा जान जनि पावहिं । सम मारों जम फिर न आवहिं ॥१ मार्गहि पायँक कीचहँ भर । ग्यँह रक्त पूइ भरे ॥२ मार महावत हाथी घर । धीर न टाढ़ घोड़ पागरे ॥३ बहुतै लोग जियत घर आवें । बहुतै जीउ लँ निसर पराने ॥४ मारत गरग मूँठ अस लागी । परी माँझ राजा गा भागी ॥५ मरिहें न गुर्झ धरता, रक्त भयउ पंराउ ।६ घला गँवाइ राउ दर आपुन, बहुरि न आवइ काउ ॥७ टिप्पणी—(१) असि—सज न । १४३ ( रौलेण्ड्स ४० ; पंजाब [क] ) सिर । चाउकन उचार नाव ( मुराँ नावका जीव ) गीर्बाह नाना फत्रन हँकारा । फीत समाइ अगिन¹ परजारा ॥१ आब पोर इत गँट तारा । नार समायें कुरुउँ जउतारा ॥२ नाना काठ दग कर आरा । बाँन्द क दर मोटा छारा ॥३ भरग उड़त गरुड़ह र्गानी । खान बगार माँझ दम कीनी ॥४ गुनों मिपार पिंगमुग आरा । ग्न पाय मय जान पुकारा ॥५ पहू माँझ धर गाएव, रक्त भयव ल पुष्ट ।६ भाव भीम परि जँरत, मात मोंम मरि मूष्ण" ।७
१६ १—पद अपाठ्य है । २—धान । ३—आग । ४—एव कयल है । ५—लोग अथवा लोक । ६—पद अपाठ्य है । ७—एव कयल है । ८—कार फकोर । ९—अपाठ्य है । १ —पंक्ति १-७ अपाठ्य हैं । टिप्पणी—(१) परखरा (सं प्रज्वल > प्रा पज्जल, पक्खल > फर्कन् परकना)— कजाया । (३) मांडो—मण्डप । (५) सुकी—धान कुटा । १४४ (रौंडंग्हल १२) बाज गुफ्तन म्हर बा पठह व नवाख्तने लोरक रा व बर पील सवार कर्दन् व बीसने सल्फाहा (महरका विजय कर लौटना और लोरकको हाथी पर बैठा कर खुरूप लियाजाना) रन जित महर गोवर सिधारा । लोरक खतरी बीर हँकारा ॥१ दइ के पान महर गिय लावा । औ गज मंपत आन चढ़ावा ॥२ चँवरधर दोइ चँवर डुलावहिं । औ राउत आगें कै आवहिं ॥३ ऊपर रात पिछौरा तानी । चढ़ि धौराहर देखें रानी ॥४ चलु गोवर सब देखै आवा । रन लोरक खाँडे जस पावा ॥५ मुनिबर दीन्ह असीसा, गोचरौं होइ बघात ।६ धन धन बीर भू ऊपर, पूजा लोग पड़ाठ ॥७ टिप्पणी—(२) गिय लावा—गले लगाया । (४) रात पिछौरा—लाल चंदोवा । अब्बास शर्वा कृत तवारीखे शेरशाहीके अनुसार लाल रंगका तम्बू या शामियाना केवल राजाके उपयोगमें आता था अथवा जिस पर राजकृपा होती थी उसे प्रदान किया जाता था । जायसीने पद्मावतके राजनागदमें लाल चंदोवेका उल्लेख किया है (२९।१४) । लाल रंग राज सम्मानका सूचक समझा जाता था । (५) जस—यश ।
१६१ १४५ ( रोकेन्दम् १ १) दर आमदने चाँदा बर बामारे कस व दीदन तमाशा लोरक व हुयने बिरस्पत रा वा खुद (बिरस्पतके साथ चाँदका महलकी छतपर जाकर लोरकका सुरूप देखना) चाँद धौराहर ऊपर गयी । घेरि बिरस्पत गोहन लगी ॥१ परी साँझ जग मा अँधियारा । चाँद मंदिर घइ गइ उजियारा ॥२ सो कस आहु जें गोबर उघारा । कवन बीर जिहूँ कटक संघारा ॥३ कौन मनुस जिहूँ कीन्ह हनाँ । धन सो जननि अस जे जनाँ ॥४ पूछिउँ धाइ बचन सुन मोरा । इहँ दर कौन सो कँकूँ लोरा ॥५ कवन रूप गुन सुन्दर, आँखौं बिरस्पत तोहि ।६ साध मरस हों बीरन, लोर दिखायहु मोहि ॥७ टिप्पणी—(१) गोहन—साथ । (२) मंदिर—आजकल मंदिरका प्रयोग देवस्थानके लिए किया जाता है; पर मध्यकालीन साहित्यम सुन्दर भवन और राजपुरुषोंके आवासको मंदिर कहा गया है। बाणने महासामन्त स्कन्दगुप्तके मंदिरका उल्लेख किया है। (३) उघारा—उद्धार किया । (७) साध—इच्छा । १४६ ( रोकेन्दम १ ४। फारसी) निशानी नमूने बिरस्पत चाँदा रा अज जवासे सूरते लोरक (बिरस्पनका चाँदका लोरकका रूप बतलाना) लागइ चाँद सुरुज कें जोती । कुण्डर सोन देंह गजमोती ॥१ बैंदर तिलार' धरा अनु लाइ । चमक घसीमी अतइ सुहाई ॥२ शृगिषा बेस रंक सह आइ । ऊँक छीन कोने पचमाइ' ॥३
१६२ नैन कषोरा दूधैं भरे। बनु छितिया तिहुँ भीतर पर ॥४ कनक बरन झरकत है देहा। मदन मूरत भन लाग न खेहा ॥५ तानी रात पिछौरी, हस्ति घड़ा दिखाठ ।६ कस सर पाग सलोने, विरिछ कटार सुहाठ ॥७ पाठान्तर—काणी प्रति— शीर्षक—नमूदने विरम्फ्त लोरक रा बर चाँदा (चाँदशे किरफ्ता लोरक की प्रशंसा करना)। १—उलट। २—लोपा कम ०ठह (?) अहराईं। रुक छीन हर (?) करी न जाईं ॥ ३—कपैं। ४—छबिया (?)। ५—बरे। ६—कर हर पाय। ८—भाऊत (?)। टिप्पणी—(६) रात पिछौरी—देखिये १४४।४। १४७ ( रीसिएंस १५ ) दीदने चाँदा कसाने रुआफ लोरक व बेहोश शुदने ऊ ( लोरकका सौन्दर्य देखकर चाँदाका मूर्च्छित हो जाना ) चाँदहि लोरक निरख [नि*] द्वारा। देखि विमोही गयी बेकरारा ॥१ नैन झरहिं मुख गा कुँपलाई। अन न रुच औ पानि न सुहाई ॥२ सुरुज सनेह चाँद कुँमलानी। दाइ बिरस्पत छिरकइ पानी ॥३ घर आँगन सुख सेज न भावइ । चाँदा माहे सुरुज बुलावइ ॥४ पूनितैं चँदर जैस मुख आहा। गइ सो जोत छीन होइ रहा ॥५ सहसकराँ सुरुज कै, रहे चाँद चित्त छाइ ।६ सोरहकराँ चाँद कै, भयी अमावस आइ ॥७ टिप्पणी—(६) सहसकराँ—हजार किरण अथवा हजार कलाएँ। (७) सोरहकराँ—सोलह कलाएँ। चन्द्रमागे सोलह कलाएँ मानी जाती हैं। पूर्णिमाके चन्द्रमें पन्द्रह कलाएँ होती हैं। अमावासमें पीछे हुए नक्षत्र किनारे अल्प चन्द्रमा सुशोभित रहता है उसकी सोरहवीं कला कही जाती है।
१५३ १४८ (रोडैंग्ड्स १ ६ : पंजाब [का]) फ़हम करने विरसत चाँद रा कि होशियार बाश (बिरस्पतका चाँदको समझाना) कहइ बिरस्पत चाँद सँभारू। सुरुज लागि कस करसि खमा[रू]१॥१ हाथ पाठ समरस नहिँ पारी। धाँधु फेस ओढ़ि लै सारी२॥२ जोस लागि सुरुज कै झारा। कै खंडवान पिआऊँ सारा३॥३ राजकुँअरि सँ कान न फरसी। हीँसो घाइ मोर लाज न घरसी॥४ आनौँ पानि बैसि मुख धोवहु। अन्दर५ सेज सुख निदरा सोवहु६॥५ वो चित्त है तुम्हा (यसा), भोर कहठ मोहि।६ रैन जाइ दिन अगवह, उतर देउ मैं तोहि७॥७ पाठान्तर—पंजाब प्रति— फोदोम शीर्षक अपाठ्य है। १—कमारू। २—मारी। ३—यह पंक्ति अपाठ्य है। ४—रान करी। ५—उल्र। ६—यह शब्द कट गया है। ७—फोदेस में दोहा अपाठ्य है। मूलपाठ—(६) निहा। टिप्पणी—(३) झारा (भ. ज्वाला>झार) तेज। खंडवान—गौंडका पानी थरकत। (५) अन्दर—अन्दर। यह अपपाठ जान पड़ता है। पंजाब प्रतिका पाठ उल्र अधिक संगत है (उल्र—आरामसे लेटना; निश्चेष्ट होकर पड़ रहना)। १४९ (रोडैंग्ड्स १ ७) पम्दादने विरसत चाँद रा अज आमदन लोरक दर स्यान (बिरस्पतका लोरककी दर मुकानका उपाय चाँदको बताना) गयी सो खेल रैन अँधियारी। उठा सुरुज खग किरन पसारी॥१ दिन गय घरी बिरस्पत आइ। चाँद फुर आन जाइ जगाइ॥२
१५४ कहु सो पात जिहँ सँअस मई । काइ लाग भर कँगर गई ॥३ चाँद बिरस्पत कै पाँ परी । कान्हि सुरुज देखउँ एक घरी ॥४ कै यह मोरें घरैं बुलाबहु । कै मैं ले बोकै (ढिंग) लावहु ॥५ चाँद गुनित मैं देखी, सुरुज मंदिर जिहँ आठ ।६ कर महर सँठ बिनती, गोवर नोत खिवाँठ ॥७ मूलपाठ—(५) इन्द । गाफका मस्कूफ़ छूट जानेसे यह पाठ है । टिप्पणी—(३) घरी—घड़ी । ४५ मिनटकी एक घड़ी होती है । (४) कान्हि—कब । (५) कै—या तो । बोकै—उसके । १५० (रीडैन्ट्स १८) रफ़्तने चाँदा बर महर व अर्ज शाश्त मेहनानिये कमर करदन (चाँदके महरसे बन-भोज करनेका अनुरोध करना) बिरस्पत बचन चाँद चित धरा । हींडर पूरि खाँड पिठ भरा ॥१ सुनतैं बचन महर पहँ गयी । आइ ठाढ़ि आगैं होइ भयी ॥२ एक ईछ इछी मैं पीता । दोतुम्ह राठ रूपचन्द बीता ॥३ दंवहिं पूजा फूल चढ़ाऊँ । पायँ लाग कर काइ मनाऊँ ॥४ पिता मोर भो रन बित आइह । दस लोग सम नोत खिवाइह ॥५ पर यह बाष जो कीन्हेउँ, अरज हाथ सा नारि ।६ राइ राइग रन जीत, आयहु कटक मँघारि ॥७ टिप्पणी—(१) हींडा—हृदय । (२) ठाढ़ि—खड़ी । (३) ईछ—इच्छा । ईछी—इच्छा किया संकल्प किया । (४) आइह—आवेगा । खिवांइह—भोजन करावेगा । (६) बाष—बचन ।
१६५ १५१ ( रीलेनहूल १ ९ ) कबूल कर्दने महर सुखुने चाँदा ब इस्तेदाब दादने इसे बस्क रा ( चाँदाके अनुरोधपर ज्योनारका आयोजन ) चाँद बचन हौं फहवाँ पावउँ । सब गोवर औ देस जिंवाषठँ ॥१ महरैं नाउहिं कहा बुलाई । घर घर गोवर नोवहु जाई ॥२ काल्हि महर घरँ बेंधनारा । थार झाइ सब झार हँकारा ॥३ सुनिकै नाउ दसा दिसि गये । तैंतीसों पार सब नोता लिये ॥४ खोंट खोंट सब नोता झारी । अथवाँ सुरुज परी अँधियारी ॥५ पारध पठये अहेरे, औ बारी पनवार ।६ पछिले रात आये बहुरि, नाउ सहदेव (दुआर) ॥७ मूलपाठ—(७) महर । टिप्पणी—(३) झार—एक एक करके । (४) दशा—(बारही) दस । पार—पांत; पंक्ति समूह यहाँ जातिसे तात्पर्य है । (६) पारध—शिकारी । पठये—भेजा । बारी—पत्तल बनानेवाली जाति । पनवार—पत्तल । १५२ ( रीकैण्ड्स ११ ) आवर्दने सैय्यादाने हैवानाते हर किस्मौ ( अहरियोंका अहेर लेकर आना ) दिन भा पारघ आइ तुलाने । अगनित मिरग जियत घर आने ॥१ बहुतैं राझ गेंड़ना न गिने । तीतर झाँउ औहि न गिने ॥२ गाँन पुछारि औ लोरउरा । ममा लैंप्रस्नों घर एक [सँकरा*] ॥३ मेढ़ा सहस मार के टाँगे । थार पाँच मै बकरा माँगे ॥४ औ माउव मह पनइल मार । सैंपर पार का फई न (पारे) ॥५