चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)
Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary
मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा
ओडन धँवर लाग घूँघरा। धरमदास सो आगें धरा ॥३ छाँड़ फिरे धानुष फर गहा। पानि धूलि धरि धीर रहा ॥४ धरमदास तुम नेर न आवहु। फौन ठाम फिइँ जीठ गँवावहु ॥५ धरमदास मन कोपा, काट मूँड लूँ आउँ ।६ भुझवा थान निफर गा, धरमदास परा ठाँउ ॥७
१३३ ( रीकेण्डस ९१ ) जंग करदन धरमूँ ब कुश्तह शुदन धरमूँ ( धरमूँका युद्ध करना और मारा जाना ) पुनि धरमूँ गुन मेलस सानी । पाँच टूट औ पंच गँवानी ॥१ धता बजाइ मेरि ओँ (तूरा) । साँरुहि धरमूँ चाँपइ पाछा ॥२ धरमूँ कोप पीठ तइ भिरे । चीरै गर धरमूँ कँ घरे ॥३ गये परान धरमूँ धर मारसि । काइ फनार दिये महँ सारसि ॥४ देइ पाठ तोरसि भूदण्डा । काटसि चीर सीस नौखण्डा ॥५ रनमल पैठ खड़ग लै मारसि, फैंबरू कइ पूछ ।६ रहे न तेगा नर पै, जूझ राह मजबूत ॥७ मूलपाठ-ठप । टिप्पणी-(२) इसका पूर्वपद और अगले कड़बककी पंक्ति २ का पूर्व पद एक ही है।
१३४ ( रीकेण्डस ९३ ) जंगिकर्दे जंग रनपति गोबद ( रनपतिक युद्ध ) रनपत दीन्हि महर अगसारी । बाहु बियाहि अनँ हँबारी ॥१ धता बजाइ मरि ओँ (तूरा) । खड़ग मूँठ भरलिहासिसिझोग॥२ दौर खाँड रनमल सर दीन्हाँ । रक्त धार सब सेंदुर कीन्हाँ ॥३
१९५ रनमल मरत सिरीचंद आवा । रनपत पाखर खाल खिंचावा ॥४ अजैराज सेंगर कर गहे । मारसि मेलक पाखर रहे ॥५ छाइ सिरीचंद पाखर भागा, झिठ लै गयउ पराइ ।६ राइ देखि चौंठा, तुम कस झूज न जाइ ॥७ टिप्पणी—(२) 'जम्भ बजाइ पेरि उतरा' पाठ भी सम्भव है । १३५ (रैकिड्स ९४) आल्हने चौंठा का फौज जुड़ कर मैदान भगा ( युद्धक्षेत्रमें ससैन्य चौंठाका आगमन ) धीरपाल करपत लै आवैं । मजवीर हमीर सनेफन पुलावैं ॥१ करमदास मतिराज देवानन्द । बिजैसेन औ महरास बिर्जचन्द ॥२ पिस्तनगर ष देखें ताको । इग्दीन खीस मरदेठ जाको ॥३ देपगढ हरराम सरूपा । अजयसिंह हरपार निरूपा ॥४ धीरू हरशु गनपत आनौ । सिउराज मदनूँ भल जानौ ॥५ तीस पखरिया आनौ, सब दर मारौ आज ।६ हाथिपाइ धन चौंदा लीजइ, गोवर कीजइ राज ॥७ १३६ (रैकिड्स ९५) बिरथानने महर लरक का मुकाबिले भोंगा ( महरका चौंठाका सामना करनेके लिए कौरवका भजना ) आनं पीर चौंठा लइ आवा । महर टेरि औ लार पुलावा ॥१ रास्क बीर पगरिया पारहु । पठै डाकनइ सीम हैंकारहु ॥२ पाँच दंम पाँच पाँझानौं । गतरी पाँच दम जिटिं जानौं ॥३ नाऊ एक तीन भाइनैं । पागर एक सगद फँ गिन ॥४ गहरवार औ शाद दम आनी । पागर कृष्ठ तुलानेउ जानी ॥५
आठ आइ दोइ आनें, जैस अधार कै मेह ॥६ लोइ पहिरे सब ठाढे, तिल एक सूझ न देह ॥७ टिप्पणी—(१) डाकबइ—हमलेनाइक । (४) सामनें—सैनिक; प्रधान । (६) अधार—आषाढ । १३७ (दीर्घोद्देश ५६) सिफते जग करदने बाँठा या गोरक ब हजीमते खुरदने ऊ (बाँठा-गोरक युद्ध । बाँठा की हार) उभरे खड़ग कुन्त तरबारी । घिर एक तह होइ रनमारी ॥१ टूटहिं मुण्ड रुण्ड धर परहीं । सियफर खोम न चिंत महँ धरहीं ॥२ खरख डँडाइर बाजहिं तारा । भये भाग भर रन रतनारा ॥३ अस फागुन फूलहिं बन टेसू । तस रन रक्त रात भये मेसू ॥४ बाजहिं भेरि सींग औ तूरा । दर भा घाचर रकत सिंदूरा ॥५ परे पखरिया चहुँ दिसि, कुन्त राज सर लाग ।६ महर वीर कुछ ठहरे, बाँठा जिठ खइ भाग ॥७ टिप्पणी—(३) डँडाइर—दण्डताल; ताल देनेका वाद्य । तारा—करताल । (४) टेसू—पलाशका फूल । यह फागुनके महीनेमें होलीके आसपास फूलता है। इसका रंग गहरा लाल होता है। जब फूलता है तो पूरे वृक्ष पर छा जाता है और दूरसे देखने पर भान पडता है कि जंगलमें आग लगी हुए है। (५) भेरि—मृदंगसे मिलता जुलता वाद्य। ब्रजमें लम्बी तुरहीके समान एक बाजेको भी भेरि कहते हैं। सींग—(सं शृंगिन् > सिम > सींग)—पशुके सींगसे बना फूंकनेका वाद्य । आइने-अकबरीमें नक्करखानेके बाजोंमें इसका उल्लेख है। वहाँ कहा गया है कि यह गायकी सींगकी शकलका तांबेका बनता है और एक साथ दो बजाये जाते हैं। तूरा—धातुका बना मुँहसे फूँकनेका बाजा । कदाचित इसे ही आजकल तुरही कहते हैं। (६) पखरिया—पाखर (कवच) धारी सैनिक । (७) उभरे—ताकतमें अधिक ।
१५७ १३८ (रीडिंग्स ९७) मुशावरत कर्दने राव रूपचन्द बा बाँठा (राव रूपचन्दका बाँठासे परामर्श) राइ कहा बाँठा कस कीजइ । सब दर खोप नगर किन लीजइ ॥१ ओ तिहँ राइ आपुन पँछवाइ । चाँद सनेह झूस पुनि पाई ॥२ पहिरै खाँड अनै तस जोरी । देखहिं देख बतीसो कोरी ॥३ पेखहिं पेखहिं मयठ अमेरा । चला भाजि राजा फर फेरा ॥४ चाँदा कारन जूस पुनि पायी । औ तिहँ रकतहँ मयठ बिगचा ॥५ लै वो पखरिया समता महँ, गाँठह कस कीज ।६ फै चाँदा लै जाइ राजा, फ गोबरौँ खिउ दीज ॥७ टिप्पणी—(२) दूसरी पंक्तिका उत्तर पद और पाँचवी पंक्तिका पूर्वपद लगभग एक-सा है । (५) प्रतीक अनुसार पाठ ठीक होते हुए भी पूरी पंक्तिके शुद्ध पाठ होनम सन्देह है । १३९ (रीडिंग्स ९८) जवाब दादन बांठा बर राव रूपचन्द रा (बांठाका उत्तर) राइ पखरिया माँ पहिं देहु । अदमी तीन चार तुम्ह लेहु ॥१ लै अभरौं हा राउत वहौं । पाछ मोर न छोड़हिं तहौँ ॥२ परा महर असि परी मढानी । बाँठ पिनवै तिहँ फे आनी ॥३ दुरि लै बाँठा तिहँ सुइँ गयउ । जहाँ अमेर महर सों अभयउ ॥४ [L25: दूध पियावत फिरैं हि न कोई । अब कँ मर्यै काल कित होई ॥५ परे पखरिया नौ दस, मल पानै होइ फाग ।६ महर सनाह टूटि गा, आछ गाँठ घर लाग ॥७
१५८ १४० ( रीकेन्स ९९ ) जम कंदने लोरक बा राव व हज़ीमत खुर्दने राव ( लोरक और रावका युद्ध : रावकी हार ) पठटा लोर संग जस गावा । फल खाँड राजा सर बाजा ॥१ खड्ग तार लोरक कै भाजी । पाखर काट राठ गा भाज़ी ॥२ पिवली जोनें भरसि महराजू । मारसि सिरिछन्द औ सुरैराजू ॥३ धीरगझ मारसि औ फिरे । बंबर आग खाँडे परवरे ॥४ मार सकति लै रफ़त बहाये । खड्ग झार लोहें भुझाये ॥५ आगें दइ लिहसि दर आपुन, हाथ चला धस टाँड ।६ लौटा बाँठ लोर [ ], सबन उझारस खाँड ॥८ टिप्पणी-(५) सकति (सं शक्ति)—तीन नोकोंवाला त्रिशूलके ढंगका छोटा बाण। १४१ ( रीकेन्स १ ) उफ्तादने बाँठ बर मैदान व हज़ीमत खुर्दने राव रूपचन्द बाँठका गिरना : राव रूपचन्दका पराजय उमर बाँठ लोरक धस मारा । परा धोर नर दबी उधारा ॥१ दूसर खाँड जा पैठ सनाहाँ । भुँजीं टूटि उपरि गइ पाहाँ ॥२ उठा छोर सकति कर गहे । मारसि बेरुझ पाखर रहे ॥३ उमर धीर दोउ बरबण्डा । अगिन भरै बर पावत खण्डा ॥४ गरद सेंजोइ बाँठ खसि परा । हियें पाठ दइ लोरक धरा ॥५ धरसि तार तरवारि कण्ठहुत, काट पसा लै मुण्ड ।६ माजि चला बर राठ रूपचंद, दंख पड़ा भइ रुण्ड ॥७ टिप्पणी-(४) बरबण्डा (वरिवण्ड)—बलवान प्रचण्ड दुर्धर्ष।
१५९ १४२ ( रौलेण्ड्स ११ ) दुमान बदन जरक अस कन्दरे सब रूपवन्द ( मारका स्वरूपमुखी सेनाका पीछा करना ) तोरुक कहा जान जनि पावहिं । सम मारों जम फिर न आवहिं ॥१ मार्गहि पायँक कीचहँ भर । ग्यँह रक्त पूइ भरे ॥२ मार महावत हाथी घर । धीर न टाढ़ घोड़ पागरे ॥३ बहुतै लोग जियत घर आवें । बहुतै जीउ लँ निसर पराने ॥४ मारत गरग मूँठ अस लागी । परी माँझ राजा गा भागी ॥५ मरिहें न गुर्झ धरता, रक्त भयउ पंराउ ।६ घला गँवाइ राउ दर आपुन, बहुरि न आवइ काउ ॥७ टिप्पणी—(१) असि—सज न । १४३ ( रौलेण्ड्स ४० ; पंजाब [क] ) सिर । चाउकन उचार नाव ( मुराँ नावका जीव ) गीर्बाह नाना फत्रन हँकारा । फीत समाइ अगिन¹ परजारा ॥१ आब पोर इत गँट तारा । नार समायें कुरुउँ जउतारा ॥२ नाना काठ दग कर आरा । बाँन्द क दर मोटा छारा ॥३ भरग उड़त गरुड़ह र्गानी । खान बगार माँझ दम कीनी ॥४ गुनों मिपार पिंगमुग आरा । ग्न पाय मय जान पुकारा ॥५ पहू माँझ धर गाएव, रक्त भयव ल पुष्ट ।६ भाव भीम परि जँरत, मात मोंम मरि मूष्ण" ।७
१६ १—पद अपाठ्य है । २—धान । ३—आग । ४—एव कयल है । ५—लोग अथवा लोक । ६—पद अपाठ्य है । ७—एव कयल है । ८—कार फकोर । ९—अपाठ्य है । १ —पंक्ति १-७ अपाठ्य हैं । टिप्पणी—(१) परखरा (सं प्रज्वल > प्रा पज्जल, पक्खल > फर्कन् परकना)— कजाया । (३) मांडो—मण्डप । (५) सुकी—धान कुटा । १४४ (रौंडंग्हल १२) बाज गुफ्तन म्हर बा पठह व नवाख्तने लोरक रा व बर पील सवार कर्दन् व बीसने सल्फाहा (महरका विजय कर लौटना और लोरकको हाथी पर बैठा कर खुरूप लियाजाना) रन जित महर गोवर सिधारा । लोरक खतरी बीर हँकारा ॥१ दइ के पान महर गिय लावा । औ गज मंपत आन चढ़ावा ॥२ चँवरधर दोइ चँवर डुलावहिं । औ राउत आगें कै आवहिं ॥३ ऊपर रात पिछौरा तानी । चढ़ि धौराहर देखें रानी ॥४ चलु गोवर सब देखै आवा । रन लोरक खाँडे जस पावा ॥५ मुनिबर दीन्ह असीसा, गोचरौं होइ बघात ।६ धन धन बीर भू ऊपर, पूजा लोग पड़ाठ ॥७ टिप्पणी—(२) गिय लावा—गले लगाया । (४) रात पिछौरा—लाल चंदोवा । अब्बास शर्वा कृत तवारीखे शेरशाहीके अनुसार लाल रंगका तम्बू या शामियाना केवल राजाके उपयोगमें आता था अथवा जिस पर राजकृपा होती थी उसे प्रदान किया जाता था । जायसीने पद्मावतके राजनागदमें लाल चंदोवेका उल्लेख किया है (२९।१४) । लाल रंग राज सम्मानका सूचक समझा जाता था । (५) जस—यश ।
१६१ १४५ ( रोकेन्दम् १ १) दर आमदने चाँदा बर बामारे कस व दीदन तमाशा लोरक व हुयने बिरस्पत रा वा खुद (बिरस्पतके साथ चाँदका महलकी छतपर जाकर लोरकका सुरूप देखना) चाँद धौराहर ऊपर गयी । घेरि बिरस्पत गोहन लगी ॥१ परी साँझ जग मा अँधियारा । चाँद मंदिर घइ गइ उजियारा ॥२ सो कस आहु जें गोबर उघारा । कवन बीर जिहूँ कटक संघारा ॥३ कौन मनुस जिहूँ कीन्ह हनाँ । धन सो जननि अस जे जनाँ ॥४ पूछिउँ धाइ बचन सुन मोरा । इहँ दर कौन सो कँकूँ लोरा ॥५ कवन रूप गुन सुन्दर, आँखौं बिरस्पत तोहि ।६ साध मरस हों बीरन, लोर दिखायहु मोहि ॥७ टिप्पणी—(१) गोहन—साथ । (२) मंदिर—आजकल मंदिरका प्रयोग देवस्थानके लिए किया जाता है; पर मध्यकालीन साहित्यम सुन्दर भवन और राजपुरुषोंके आवासको मंदिर कहा गया है। बाणने महासामन्त स्कन्दगुप्तके मंदिरका उल्लेख किया है। (३) उघारा—उद्धार किया । (७) साध—इच्छा । १४६ ( रोकेन्दम १ ४। फारसी) निशानी नमूने बिरस्पत चाँदा रा अज जवासे सूरते लोरक (बिरस्पनका चाँदका लोरकका रूप बतलाना) लागइ चाँद सुरुज कें जोती । कुण्डर सोन देंह गजमोती ॥१ बैंदर तिलार' धरा अनु लाइ । चमक घसीमी अतइ सुहाई ॥२ शृगिषा बेस रंक सह आइ । ऊँक छीन कोने पचमाइ' ॥३
१६२ नैन कषोरा दूधैं भरे। बनु छितिया तिहुँ भीतर पर ॥४ कनक बरन झरकत है देहा। मदन मूरत भन लाग न खेहा ॥५ तानी रात पिछौरी, हस्ति घड़ा दिखाठ ।६ कस सर पाग सलोने, विरिछ कटार सुहाठ ॥७ पाठान्तर—काणी प्रति— शीर्षक—नमूदने विरम्फ्त लोरक रा बर चाँदा (चाँदशे किरफ्ता लोरक की प्रशंसा करना)। १—उलट। २—लोपा कम ०ठह (?) अहराईं। रुक छीन हर (?) करी न जाईं ॥ ३—कपैं। ४—छबिया (?)। ५—बरे। ६—कर हर पाय। ८—भाऊत (?)। टिप्पणी—(६) रात पिछौरी—देखिये १४४।४। १४७ ( रीसिएंस १५ ) दीदने चाँदा कसाने रुआफ लोरक व बेहोश शुदने ऊ ( लोरकका सौन्दर्य देखकर चाँदाका मूर्च्छित हो जाना ) चाँदहि लोरक निरख [नि*] द्वारा। देखि विमोही गयी बेकरारा ॥१ नैन झरहिं मुख गा कुँपलाई। अन न रुच औ पानि न सुहाई ॥२ सुरुज सनेह चाँद कुँमलानी। दाइ बिरस्पत छिरकइ पानी ॥३ घर आँगन सुख सेज न भावइ । चाँदा माहे सुरुज बुलावइ ॥४ पूनितैं चँदर जैस मुख आहा। गइ सो जोत छीन होइ रहा ॥५ सहसकराँ सुरुज कै, रहे चाँद चित्त छाइ ।६ सोरहकराँ चाँद कै, भयी अमावस आइ ॥७ टिप्पणी—(६) सहसकराँ—हजार किरण अथवा हजार कलाएँ। (७) सोरहकराँ—सोलह कलाएँ। चन्द्रमागे सोलह कलाएँ मानी जाती हैं। पूर्णिमाके चन्द्रमें पन्द्रह कलाएँ होती हैं। अमावासमें पीछे हुए नक्षत्र किनारे अल्प चन्द्रमा सुशोभित रहता है उसकी सोरहवीं कला कही जाती है।
१५३ १४८ (रोडैंग्ड्स १ ६ : पंजाब [का]) फ़हम करने विरसत चाँद रा कि होशियार बाश (बिरस्पतका चाँदको समझाना) कहइ बिरस्पत चाँद सँभारू। सुरुज लागि कस करसि खमा[रू]१॥१ हाथ पाठ समरस नहिँ पारी। धाँधु फेस ओढ़ि लै सारी२॥२ जोस लागि सुरुज कै झारा। कै खंडवान पिआऊँ सारा३॥३ राजकुँअरि सँ कान न फरसी। हीँसो घाइ मोर लाज न घरसी॥४ आनौँ पानि बैसि मुख धोवहु। अन्दर५ सेज सुख निदरा सोवहु६॥५ वो चित्त है तुम्हा (यसा), भोर कहठ मोहि।६ रैन जाइ दिन अगवह, उतर देउ मैं तोहि७॥७ पाठान्तर—पंजाब प्रति— फोदोम शीर्षक अपाठ्य है। १—कमारू। २—मारी। ३—यह पंक्ति अपाठ्य है। ४—रान करी। ५—उल्र। ६—यह शब्द कट गया है। ७—फोदेस में दोहा अपाठ्य है। मूलपाठ—(६) निहा। टिप्पणी—(३) झारा (भ. ज्वाला>झार) तेज। खंडवान—गौंडका पानी थरकत। (५) अन्दर—अन्दर। यह अपपाठ जान पड़ता है। पंजाब प्रतिका पाठ उल्र अधिक संगत है (उल्र—आरामसे लेटना; निश्चेष्ट होकर पड़ रहना)। १४९ (रोडैंग्ड्स १ ७) पम्दादने विरसत चाँद रा अज आमदन लोरक दर स्यान (बिरस्पतका लोरककी दर मुकानका उपाय चाँदको बताना) गयी सो खेल रैन अँधियारी। उठा सुरुज खग किरन पसारी॥१ दिन गय घरी बिरस्पत आइ। चाँद फुर आन जाइ जगाइ॥२
१५४ कहु सो पात जिहँ सँअस मई । काइ लाग भर कँगर गई ॥३ चाँद बिरस्पत कै पाँ परी । कान्हि सुरुज देखउँ एक घरी ॥४ कै यह मोरें घरैं बुलाबहु । कै मैं ले बोकै (ढिंग) लावहु ॥५ चाँद गुनित मैं देखी, सुरुज मंदिर जिहँ आठ ।६ कर महर सँठ बिनती, गोवर नोत खिवाँठ ॥७ मूलपाठ—(५) इन्द । गाफका मस्कूफ़ छूट जानेसे यह पाठ है । टिप्पणी—(३) घरी—घड़ी । ४५ मिनटकी एक घड़ी होती है । (४) कान्हि—कब । (५) कै—या तो । बोकै—उसके । १५० (रीडैन्ट्स १८) रफ़्तने चाँदा बर महर व अर्ज शाश्त मेहनानिये कमर करदन (चाँदके महरसे बन-भोज करनेका अनुरोध करना) बिरस्पत बचन चाँद चित धरा । हींडर पूरि खाँड पिठ भरा ॥१ सुनतैं बचन महर पहँ गयी । आइ ठाढ़ि आगैं होइ भयी ॥२ एक ईछ इछी मैं पीता । दोतुम्ह राठ रूपचन्द बीता ॥३ दंवहिं पूजा फूल चढ़ाऊँ । पायँ लाग कर काइ मनाऊँ ॥४ पिता मोर भो रन बित आइह । दस लोग सम नोत खिवाइह ॥५ पर यह बाष जो कीन्हेउँ, अरज हाथ सा नारि ।६ राइ राइग रन जीत, आयहु कटक मँघारि ॥७ टिप्पणी—(१) हींडा—हृदय । (२) ठाढ़ि—खड़ी । (३) ईछ—इच्छा । ईछी—इच्छा किया संकल्प किया । (४) आइह—आवेगा । खिवांइह—भोजन करावेगा । (६) बाष—बचन ।
१६५ १५१ ( रीलेनहूल १ ९ ) कबूल कर्दने महर सुखुने चाँदा ब इस्तेदाब दादने इसे बस्क रा ( चाँदाके अनुरोधपर ज्योनारका आयोजन ) चाँद बचन हौं फहवाँ पावउँ । सब गोवर औ देस जिंवाषठँ ॥१ महरैं नाउहिं कहा बुलाई । घर घर गोवर नोवहु जाई ॥२ काल्हि महर घरँ बेंधनारा । थार झाइ सब झार हँकारा ॥३ सुनिकै नाउ दसा दिसि गये । तैंतीसों पार सब नोता लिये ॥४ खोंट खोंट सब नोता झारी । अथवाँ सुरुज परी अँधियारी ॥५ पारध पठये अहेरे, औ बारी पनवार ।६ पछिले रात आये बहुरि, नाउ सहदेव (दुआर) ॥७ मूलपाठ—(७) महर । टिप्पणी—(३) झार—एक एक करके । (४) दशा—(बारही) दस । पार—पांत; पंक्ति समूह यहाँ जातिसे तात्पर्य है । (६) पारध—शिकारी । पठये—भेजा । बारी—पत्तल बनानेवाली जाति । पनवार—पत्तल । १५२ ( रीकैण्ड्स ११ ) आवर्दने सैय्यादाने हैवानाते हर किस्मौ ( अहरियोंका अहेर लेकर आना ) दिन भा पारघ आइ तुलाने । अगनित मिरग जियत घर आने ॥१ बहुतैं राझ गेंड़ना न गिने । तीतर झाँउ औहि न गिने ॥२ गाँन पुछारि औ लोरउरा । ममा लैंप्रस्नों घर एक [सँकरा*] ॥३ मेढ़ा सहस मार के टाँगे । थार पाँच मै बकरा माँगे ॥४ औ माउव मह पनइल मार । सैंपर पार का फई न (पारे) ॥५
१५५ साठज दीस न अबरा, अनैं सै घर जाइ ॥६ जवैंत पंखि सैंकोले, कही (बिरंत) सब गाइ ॥७ मूलपाठ--(५) बरारे । (७) भरत (मुकठोंके अभावमें यह पाठ है) । टिप्पणी-(१) रोझ (सं रुष्य>प्रा रोक्ख)—नीलगाय । चीतर—चीत्तल एक प्रकारका मृग । झाँख—साँभर । (३) गौज—एक प्रकारका बारहसिंहा जिसे गौंद भी कहते हैं। पुकारी— मोर । ओखरा (लोखहा)—लोमड़ी (लोमड़ी खाद्य है यह संदिग्ध है) । ससा—शशक खरगोश । डॅवकन्ना (लम्बकर्ण)—लम्बे कान वाला खरगोश । खर—लोम्बा शूकर पूरा सूरा । (५) साउज—(स स्वापद्>साउअअ>साउज)—जंगली जानवर। बनझुक (बनैक)—जंगली । यहाँ सूअरसे अभिप्राय है । (६) दीस—दिखाई पड़ा । अबरा—सुकर । अनै—अनेक । १५३ (अप्राप्य) १५४ (रौकैनुस्स ३१२) विपते ब्यनबराअ दर प्वाखते महर (पक्षियोंका वर्णन) भटर तीतर लावा घरे । गुडरू फैंबों खचियन भरे ॥१ बहुरु बिगुरिया औ बिरयारा । उसर सकोवा औ मनबारा ॥२ : परबा सेतकार बलोरा । रैन टिटहरी घरे टटोरा ॥३ बनकुकुरा केरमोरो घने । कुँज महोख साँय न गिने ॥४ घरे कोयरें अँगहसी घनों । पंखि बहुरु नाँउँ को गिनौं ॥५ जे कय माप समान, सरभस बरन के तेहि ।६ अउर पंखि जे मारे, ताकर नाँउँ को लेहि ॥७ टिप्पणी-(१) लावा—(ल्वा) बटेरसे छोटा इसी जातिका पक्षी (बटन क्वेल) । गुडरू—बटेर जातिका इसी नामसे ख्यात पक्षी (कामन बस्टर्ड
१६७ श्वेत) । फैंचा—कञ्च लखमोंदरी नामक पक्षी जो बत्तख और मुर्ग़ीके बीचकी जातिकी होती है । कंचिपच—टोकरियों भर, असंख्य । (२) उसरहकोया—इसे उसरहगेदा भी कहते हैं । यह भूरे रंगकी होती है और अक्सर दो-तीन सौके झुण्डमें एक साथ पायी जाती है । (३) परवा—कबूतर । रटोटा—रटोळकर । (४) बनकुकुरा—बनकुक्कुट, बनमुर्गी । फेरमोरो—चरख चरत सोहन यह मोरके समान किन्तु उससे छोटा होता है । कैंज—कुञ्ज, क्रौंच कुरंग । १५५ ( रौदैन्ट्स ११३ ) सिफ़ते पुजानीदने ताआम दर मतबख़ ( भोजन बनानेका वर्णन ) तीन भाग सैं बैठ सुपारा । घीठर आन रसोई परजारा ॥१ मास मसोरा कटवाँ कीन्हाँ । लै घँगार पतियों कर दीन्हौँ ॥२ बेगर बेगर पखि पकाई । घिरत बघार मिरष भराई ॥३ मिरचन अँबिरचन बनबा वय । रस रसनाकर सेंधो गेरा ॥४ कूँकूँ मेलि कियो धमथारू । दराँद कराँद अँबिली घारू ॥५ फनक तराफत खसोर, लोन तेल बिसवार । ६ खटरस होइ महारस, तिलकुर कियउ अहार ॥७ टिप्पणी—(१) सुपारा—सूपकार, रसोइया । आन—आकर । परजारा—(सं प्रज्वलन > प्रा पज्जलय पज्जेल > पज्जर > परजरना) प्रज्वलित किया जलाया । (२) मसोरा—कचार, पीसकर बनाया हुआ । कटवाँ—काटकर बनाये हुए । घँगार—शाकन बघार । (३) बेगर बेगर—तरह तरहके; भिन्न-भिन्न प्रकार के । बघार—छारा । (४) सेंधा—सैन्धव सेंधा नमक । (५) कूँकूँ—केसर । मेलि—मिलाकर । धमथारू—छौंकक मसालेस छौंका ।
१९८ १५६ (रौरेण्ड्स ११४) नियत राजिआछे हर जिन्सो गोपद (तरकारीका वर्णन) घाघर पापर मूँज उघाये । भाँगा टेंडस सोंधि तराये ॥१ फरुयें तल करेला तरे । कुम्हड़ा मूँज साथ एक घरे ॥२ खखसा परवर कुँदरं अही । घी तुरई अरुई कही ॥३ घाटी नोट धोइ पफाइ । चूका पालक आँ चौलाई ॥४ लोंआ चिचिंढा पहु छोरइ । सेंसा सेंध मार दस भइ ॥५ गंगल चुबैं सौफ आँ, माड मेथि पक़ान ।६ रांधे कुसुम कैंडुरियाँ, काड़े फल सन्धान ॥७ टिप्पणी—(१) पापर—बाबर पाठ भी सम्भव है। बाबर चावलके आटेकी मालपुएके सदृशी मिठाई है। अलीगढ़ क्षेत्रमे यह बाबरा या बाबरीके नामसे प्रसिद्ध है। भूननेके प्रसङ्गसे पापर (सं पर्पट > प्रा पप्पड > पापड
पापर) पाठ ही सङ्गत है। सुनीतिकुमार चाटुर्ज्याके अनुसार पापड शब्दके मूलम तमिल शब्द पर्पु (दाल) है। यह आजकल उर्द या मूँगकी दाल चावल साबूदाना आदिको पीसकर मसाला मिलाकर बनाया जाता है और भून अथवा तलकर खाया जाता है। भाँगा—भटा बैगन। यह प्रायः साल भर होने वाली तरकारी है। भारतकी प्राचीन तरकारियोंमे इसकी गणनाकी जा सकती है। बाणने हर्षचरितमें 'श्वेत 'वंगार' नामसे उल्लेख किया है। टेंडस—टेंड़स, टिण्डा। (२) करेला—यह काफी प्रसिद्ध तरकारी है। कड़वी होनेके कारण प्राय इसकी तरकारी सरसोंके तेलमें तलकर बनायी जाती है। कडूँवे तेल— कटु तैल सरसोंका तैल। कुम्हड़ा—संस्कृत गणपक्व वार्ताराक, तौताफल कहुवा कुष्माण्ड। इसकी बेल होती है और यह गर्मी और बरसातमें होती है। आकारमें यह तरबूजकी तरह और रंगमें पीला होता है। पका हुआ कुम्हड़ा बहुत दिनों तक खराब नहीं होता। (३) खखसा—करेलेकी जातिकी छोटे आकारकी तरकारी। इसे हाँडीपे
क्षेत्रमें बकोरा कहते हैं। परबर—परवल। यह लता पर होता है और गरमी-बरसातमें फलता है। कुँदरूँ—(सं —कुन्दुक)—परवलके आकारकी सब्जी जो बरसातमें होता है। इसे संस्कृतमें बिम्ब या बिम्बक भी कहते हैं। पकने पर इसका फल लाल हो जाता है। इसी कारण कवियोंने ओठोंके उपमानके रूपमें इसका प्रयोग किया है। घी तुरई—घिया तोरोइ। यह भी बरसाती तरकारी है और बेल पर होती है। अरई—अरबी, घुइयाँ। यह जमीनके भीतर होता है। इसके पत्ते कमलके पत्तोंके समान होते हैं। (४) पालक—यह पत्तेदार तरकारी है। इसके पत्ते चौड़े और चिकने होते हैं। चालाई—यह बरसाती साग है। इसकी पत्ती चिकना तथा लाल अथवा हरे रंगका होता है। (५) कोहड़ा—कद्दू। यह लतामें उगनेवाली तरकारी है जो आकारमें लम्बी और मुलायम होती है। चिचिँडा—यह सौंपकी तरह लम्बा और धारीदार तरकारी है जो बरसातमें होती है। तोरई—घियातरोइ की जातिकी तरकारी। सेंब—(सं शिम्बा शिम्बिका) सेम; लतामें लगनेवाली पत्ती जातिकी तरकारी। (६) गलगल—गलगल, एक प्रकारका खट्टा नीबू। (७) संधान—अचार। १५७ (रीडेण्डस ११५) सिफत पकवान दर हर जिन्सी गोयद (पकवान वर्णन) बरा मुगौरा बड़सें फीन्हें। सैँहुई फाड़ि घिरत में दीन्हें ॥१ बने मियौरी छवकुल धरे। औ डुबकी जिहँ मिरिचैं परे ॥२ भुँजी फँध फरेष पकावा। पनि अढ़ाकर गुलियें लावा ॥३ रोटा गूँद किये मिरचपानी। आर उभार शाह कर पानी ॥४ तुरसी घालि फनी ओटाई। एसी सोंठ बहुत कें लाई ॥५ दूध फारि कें खिरसा, घौंधा दही मठाठ ।६ और खंडइ को कहि, जाफर नाँउ न आउ ॥७
१४ टिप्पणी—(१) बरा—(सं० वट-गोल टिकिया) मूँग या उड़दको भिगो कर पीसकर बनायी गयी गोल टिकिया। मूँगौरा—मूँगको पीस कर मसाला डाल कर बनाया जाता है। यह एक प्रकारका बड़ा ही है किन्तु इसे टिकियाका रूप नहीं देते वरन् गिट्टीके पिण्ड बनाकर घी या तेलमें छानते हैं। सेंहई—बेसनको पानीमें घोलकर कड़ाहमें हलवेकी तरह गाढ़ा करके नमकीन बनाते हैं। (वासुदेवशरण अग्रवाल पद्मावत ६४।१३)। (२) मियारी—पेठेके साथ उड़दकी दालको पीस कर मेथी आदि मसाला डाल कर बनायी गयी बरी। डुबकी—डुबकौरी एक प्रकारकी पकौड़ी जिसे घी या तेलमें नहीं तलते वरन् पानीमें खौलाते हैं। वह खौलते पानीमें ही पकती है। (७) तुरमी—कड़ा। जालि—झाझर। लपसी—हलवा से मिलता जुलता पकवान। इसे भी घीमें आटेको भूनकर बनाते हैं किन्तु यह सूखा न होकर गीला होता है। (६) चिरवा—दोना। खजाउ—बचा हुआ ऐसी दही जिस्म ऊपर मलाईकी तह जमी हो। (७) गँडई—यहाँ सम्भवतः कविरा तात्पर्य मिठाइसे है। १५८ ( दी०सं०प० ११६ ) निगत विरहदाह हर बिहसी गौपद ( चावकों का वर्णन ) गीरसार रितुसार बिकानी। करा धनियां मधुकर तूनी ॥१ सगुनों छाली औ धांधरा। ककर खाँडर काँडर भरा ॥२ अगरसार रतनों मवमरी। राजनेत मोड़ी साँउरी ॥३ फरँगी फलँगा साठी ठिय। सुरमा भन्मा यहसर ठिय ॥४ परूप थर कुन्टर आगरधना। रूपसिया ददि सोनदही ॥५ कदाप्रा अविदूपी, काड़े पय पमाइ ।६ जस बसन्त बन फूलइ, चहुँ दिसि बास गँधाइ ॥७
१७४ टिप्पणी—इस कड़वक में ३ प्रकारके चावलके नाम इस प्रकार गिनाये हैं— (१) गीरस्रार (२) रितुसार (३) विकौनी (४) वगं (५) धनिमा (६) मधुकर (७) तूनी (८) सगुनों (९) छभी (१०) चौधरा (११) ककर (१२) मँडर (१३) काँडर (१४) अगरसार (१५) रत्ना (१६) मत्सरी (१७) राजनेत (१८) भौदी (१९) घोरतरी (२०) करेंगेी (२१) करेगा (२२) साठी (२३) सुरमा (२४) मंशा (२५) महत्तर (२६) आगरधनी (२७) रूपसिया (२८) दहिंसोंधी अथवा छोनबड़ी (२९) वैदोशा (३०) शशिभूपी। इनमें से केवल ४-५ नाम जायसीकी सूची (पदमावत, ५४४) में मिलते हैं। इन सब चावलोंकी पहचान हमारे किए सम्भव नहीं हो सकी। (१) रितुसार—(सं रक्तशालि > रक्तसारि > रितुसार)। रक्तशालिका संस्कृत साहित्यमें प्रायः उल्लेख मिलता है। सम्भवतः यह लाल रंगका धान होगा। विकौनी—सम्भवतः यह जायसी उल्लिखित बिकौरी होगा। मधुकर—हलके काले रंगका पतला छोटा महीन धान; इसका चावल सफेद और इसमें हल्की सुगन्धि होती है। यह अगहनी धान है जो रोपा जाता है। (२) सगुनों—(सं शकुनी) इसे शगुनी या सठनी भी कहते हैं। इसका दाना महीन और चावल अत्यन्त सुगन्धित होता है। मेंडर—यद्यपि निश्चित नहीं पर हो सकता है यह जायसीका मेंडचिला हो। काँडर— यह धान दो प्रकारका होता है—(१) घीकाँडर जो पिठिकाँवों भी कहा जाता है और (२) दुधकाँडर। इसकी भूसी लाल और चावल सफेद और मोटा होता है। यह बिना घी दूधके ही स्वादिष्ट होता है। (३) राजनेत—सम्भव है वही चावल हो जिसे आज कल राजभोग या राय भोग कहते हैं यह धान आकारमें बहुत छोटा और छिटककर बोया जाता है। इसमें सुगन्धि होती है। (४) करूँगी—लाल अथवा काली भूसीरा धान। इसका चावल छोटा और हल्का लाल होता है और खानेमें मीठा होता है। करेंगा—करूँगीकी जातिका धान जो आकार में कुछ बड़ा होता है। साठी—करूँगीकी ही जातिका धान या नाटा मोटा होता है और कुछ रक्ताइ लिए रहता है। इसे मदह कहते हैं। इसके सम्बन्धमें उक्ति है—साठी पाके साठ दिनों। जब महउ बरिसै रात दिनों॥ मंशा—इसका हंसा पाठ भी सम्भव है। जायसी की सूचीमें रायहंस और हंसामोरी नामक दो चावलोंका उल्लेख है। रायहंस तो कदाचित हंसराज नामक प्रसिद्ध चावल है। इसकी भूसी सफेद होती है और वह पुआलके बाहर आकर पकता है। हंसा
१७२ भौरीका छिलका उज्वल और पाकेका भी सफेद होता है । इसका फल मुलायम होता है । यह अगहनी धान है । इसे सुबऊमरी या सुपात्र भी कहते हैं । (७) इसके दूसरे पद का पाठ—रूपसिंघा बहिसैंची भी हो सकता है । पर दोनों ही अवस्था मात्राओंकी न्यूनता है । इस कारण कहना कठिन है कि चावल का नाम सोनदही है या बहिसैंची । (६) पप—माँड । पसाय—निचोड़ कर । १५९ (राँकेण्ड्स ११० ; बम्बई १४ ; पंजाब [प] ) सिफत गन्दुम व नाने मैइये खालिस (गेहूँ और शुद्ध मदेकी रोटीका वर्णन) हाँसा गोहूँ धोइ पिसाइ । कपर छान कै छार' बनवाई ॥१ अतिमँदपहुती' धरु भर तोला । सेत सुहाठ' फूँज' अनु दोसा ॥२ टूटै न सानौँ दुँहु कर बोरा । नैमूँ मास हाथ जनु बोरा ॥३ अठरै साथ मरे गार्स सलानी''। मुख मेलत खिन बाहिँ 'बिसानी''॥४ सकर देसँ जेवँहिँ चित लाई । मरे न पेट न भूख भुखाई'' ॥५ कपुरबास'' पर सुख", माँगत चाहि उड़ाइ ।६ मार सहस दोइ' तिलकुट, महरै घरे बनबाइ ॥७ पाठान्तर—बम्बई और पंजाब प्रति— शीर्षक—(ब) सिफते गन्दुम व नाने दोम (गेहूँ और मोटी रोटीका वर्णन)। (प) शीर्षक उपलभ्य पोथी में अप्राप्य है । १—(प) हंसा । २—(ब) साफ । ३—(प) पोचा । ४—(ब) कडमपती (प) बडबड सुभर । ५—(ब) सुहाइ । ६—(ब) सूँज । ७—(ब) तानिँ (प) तनै न टूटे । ८—(प) कठरै । ९—(ब प) एक । १०—(ब) काउ । ११—(पं ; ब) तलाई । १२—(ब) बहु जाई । १३—(ब प) बिलाई । १४—(ब, प) सब दिन । १५—(बं०-जैठ को (प) जो जीह । १६—(प) भूख न खा । १७—(ब) कर मास, (प) केवरबास अथवा कफूरबास । १८—(प) मुख तर । १९—(प) दए ।
टिप्पणी-(१) हाँसा—हंसके समान सफेद । गोहूँ—गेहूँ । छार—आग । (४) बडरै-जाठर (खीर) के । १६० (रीडेन्ट्स ११८ : बम्बई १० : पंजाब [क] ) सिफत आवर्दने बर्गाहाये दरख्तान (पत्तियोंका वर्णन) पत्तरिहैं लोग 'तुरैं धन पाता' । छोर न अधरा कीन्हैं निखाता ॥१ महुआ अँब लीन्ह घर पारी' । घर पीपर्र कै बाँधैं' खारीं ॥२ कटहर पकुहर औ लोकर लिये । आमुनँ गुरहर्र' नाँग सब" भये ॥३ कठऊँबर पाकर बहु "तोरी । महुले फदमें दाख फकोरी" ॥४ तँदू गुगुची रीठा घनों । पुरइन पात कररै फो गिनों ॥५ पनवड आइ मनासियत, पानैं लाग कर जोर ।६ नाँग कीन्ह हौँ बारिहैं, पात लीन्ह सबै तोरैं ॥७ पाठान्तर—बम्बई और पंजाब प्रति— (क) आवर्दने बगहाय दरख्तान रा बराये दौंद (?) रा (दाद (?) क निमित्त बनपत्तीका लाना) । (पं) शीर्षक टफ्स्य पोताम अपाठ्य है । १-(प ब) केंह । २-(प) फ्ता । ३-(ब) छोड न : (प) लीकेँह । ४-(ब) भौत; (प) शब्द नष्ट हो गया है । ५-(ब) भारी । ६-(ब) पीपर, (पं) पेड । ७-(ब) बाँधहि । ८-(ब) जारी : (प) शब्द नष्ट हो गया है । ९-(ब) ओ नींबू; (पं) पंक्ति अपाठ्य है । १ -(ब) जाम्य; (प) पूरी पंक्ति अपाठ्य है । ११-(ब) कपियार । १२-(बं) ठभ । १३-(ब) बहु पाखर । १४-(ब) महु बदोदे । १५-(ब) फेंकोरी । १६-(ब) बगुची : (प) बगुचन । १७-(पं) पुरइं । १८-(ब) करन । १' -(ब) इम । २ -(ब) सम । २१-(प) पंक्ति ६-७ अपाटय है ।