चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)
Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary
मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा
क्षेत्रमें बकोरा कहते हैं। परबर—परवल। यह लता पर होता है और गरमी-बरसातमें फलता है। कुँदरूँ—(सं —कुन्दुक)—परवलके आकारकी सब्जी जो बरसातमें होता है। इसे संस्कृतमें बिम्ब या बिम्बक भी कहते हैं। पकने पर इसका फल लाल हो जाता है। इसी कारण कवियोंने ओठोंके उपमानके रूपमें इसका प्रयोग किया है। घी तुरई—घिया तोरोइ। यह भी बरसाती तरकारी है और बेल पर होती है। अरई—अरबी, घुइयाँ। यह जमीनके भीतर होता है। इसके पत्ते कमलके पत्तोंके समान होते हैं। (४) पालक—यह पत्तेदार तरकारी है। इसके पत्ते चौड़े और चिकने होते हैं। चालाई—यह बरसाती साग है। इसकी पत्ती चिकना तथा लाल अथवा हरे रंगका होता है। (५) कोहड़ा—कद्दू। यह लतामें उगनेवाली तरकारी है जो आकारमें लम्बी और मुलायम होती है। चिचिँडा—यह सौंपकी तरह लम्बा और धारीदार तरकारी है जो बरसातमें होती है। तोरई—घियातरोइ की जातिकी तरकारी। सेंब—(सं शिम्बा शिम्बिका) सेम; लतामें लगनेवाली पत्ती जातिकी तरकारी। (६) गलगल—गलगल, एक प्रकारका खट्टा नीबू। (७) संधान—अचार। १५७ (रीडेण्डस ११५) सिफत पकवान दर हर जिन्सी गोयद (पकवान वर्णन) बरा मुगौरा बड़सें फीन्हें। सैँहुई फाड़ि घिरत में दीन्हें ॥१ बने मियौरी छवकुल धरे। औ डुबकी जिहँ मिरिचैं परे ॥२ भुँजी फँध फरेष पकावा। पनि अढ़ाकर गुलियें लावा ॥३ रोटा गूँद किये मिरचपानी। आर उभार शाह कर पानी ॥४ तुरसी घालि फनी ओटाई। एसी सोंठ बहुत कें लाई ॥५ दूध फारि कें खिरसा, घौंधा दही मठाठ ।६ और खंडइ को कहि, जाफर नाँउ न आउ ॥७
१४ टिप्पणी—(१) बरा—(सं० वट-गोल टिकिया) मूँग या उड़दको भिगो कर पीसकर बनायी गयी गोल टिकिया। मूँगौरा—मूँगको पीस कर मसाला डाल कर बनाया जाता है। यह एक प्रकारका बड़ा ही है किन्तु इसे टिकियाका रूप नहीं देते वरन् गिट्टीके पिण्ड बनाकर घी या तेलमें छानते हैं। सेंहई—बेसनको पानीमें घोलकर कड़ाहमें हलवेकी तरह गाढ़ा करके नमकीन बनाते हैं। (वासुदेवशरण अग्रवाल पद्मावत ६४।१३)। (२) मियारी—पेठेके साथ उड़दकी दालको पीस कर मेथी आदि मसाला डाल कर बनायी गयी बरी। डुबकी—डुबकौरी एक प्रकारकी पकौड़ी जिसे घी या तेलमें नहीं तलते वरन् पानीमें खौलाते हैं। वह खौलते पानीमें ही पकती है। (७) तुरमी—कड़ा। जालि—झाझर। लपसी—हलवा से मिलता जुलता पकवान। इसे भी घीमें आटेको भूनकर बनाते हैं किन्तु यह सूखा न होकर गीला होता है। (६) चिरवा—दोना। खजाउ—बचा हुआ ऐसी दही जिस्म ऊपर मलाईकी तह जमी हो। (७) गँडई—यहाँ सम्भवतः कविरा तात्पर्य मिठाइसे है। १५८ ( दी०सं०प० ११६ ) निगत विरहदाह हर बिहसी गौपद ( चावकों का वर्णन ) गीरसार रितुसार बिकानी। करा धनियां मधुकर तूनी ॥१ सगुनों छाली औ धांधरा। ककर खाँडर काँडर भरा ॥२ अगरसार रतनों मवमरी। राजनेत मोड़ी साँउरी ॥३ फरँगी फलँगा साठी ठिय। सुरमा भन्मा यहसर ठिय ॥४ परूप थर कुन्टर आगरधना। रूपसिया ददि सोनदही ॥५ कदाप्रा अविदूपी, काड़े पय पमाइ ।६ जस बसन्त बन फूलइ, चहुँ दिसि बास गँधाइ ॥७
१७४ टिप्पणी—इस कड़वक में ३ प्रकारके चावलके नाम इस प्रकार गिनाये हैं— (१) गीरस्रार (२) रितुसार (३) विकौनी (४) वगं (५) धनिमा (६) मधुकर (७) तूनी (८) सगुनों (९) छभी (१०) चौधरा (११) ककर (१२) मँडर (१३) काँडर (१४) अगरसार (१५) रत्ना (१६) मत्सरी (१७) राजनेत (१८) भौदी (१९) घोरतरी (२०) करेंगेी (२१) करेगा (२२) साठी (२३) सुरमा (२४) मंशा (२५) महत्तर (२६) आगरधनी (२७) रूपसिया (२८) दहिंसोंधी अथवा छोनबड़ी (२९) वैदोशा (३०) शशिभूपी। इनमें से केवल ४-५ नाम जायसीकी सूची (पदमावत, ५४४) में मिलते हैं। इन सब चावलोंकी पहचान हमारे किए सम्भव नहीं हो सकी। (१) रितुसार—(सं रक्तशालि > रक्तसारि > रितुसार)। रक्तशालिका संस्कृत साहित्यमें प्रायः उल्लेख मिलता है। सम्भवतः यह लाल रंगका धान होगा। विकौनी—सम्भवतः यह जायसी उल्लिखित बिकौरी होगा। मधुकर—हलके काले रंगका पतला छोटा महीन धान; इसका चावल सफेद और इसमें हल्की सुगन्धि होती है। यह अगहनी धान है जो रोपा जाता है। (२) सगुनों—(सं शकुनी) इसे शगुनी या सठनी भी कहते हैं। इसका दाना महीन और चावल अत्यन्त सुगन्धित होता है। मेंडर—यद्यपि निश्चित नहीं पर हो सकता है यह जायसीका मेंडचिला हो। काँडर— यह धान दो प्रकारका होता है—(१) घीकाँडर जो पिठिकाँवों भी कहा जाता है और (२) दुधकाँडर। इसकी भूसी लाल और चावल सफेद और मोटा होता है। यह बिना घी दूधके ही स्वादिष्ट होता है। (३) राजनेत—सम्भव है वही चावल हो जिसे आज कल राजभोग या राय भोग कहते हैं यह धान आकारमें बहुत छोटा और छिटककर बोया जाता है। इसमें सुगन्धि होती है। (४) करूँगी—लाल अथवा काली भूसीरा धान। इसका चावल छोटा और हल्का लाल होता है और खानेमें मीठा होता है। करेंगा—करूँगीकी जातिका धान जो आकार में कुछ बड़ा होता है। साठी—करूँगीकी ही जातिका धान या नाटा मोटा होता है और कुछ रक्ताइ लिए रहता है। इसे मदह कहते हैं। इसके सम्बन्धमें उक्ति है—साठी पाके साठ दिनों। जब महउ बरिसै रात दिनों॥ मंशा—इसका हंसा पाठ भी सम्भव है। जायसी की सूचीमें रायहंस और हंसामोरी नामक दो चावलोंका उल्लेख है। रायहंस तो कदाचित हंसराज नामक प्रसिद्ध चावल है। इसकी भूसी सफेद होती है और वह पुआलके बाहर आकर पकता है। हंसा
१७२ भौरीका छिलका उज्वल और पाकेका भी सफेद होता है । इसका फल मुलायम होता है । यह अगहनी धान है । इसे सुबऊमरी या सुपात्र भी कहते हैं । (७) इसके दूसरे पद का पाठ—रूपसिंघा बहिसैंची भी हो सकता है । पर दोनों ही अवस्था मात्राओंकी न्यूनता है । इस कारण कहना कठिन है कि चावल का नाम सोनदही है या बहिसैंची । (६) पप—माँड । पसाय—निचोड़ कर । १५९ (राँकेण्ड्स ११० ; बम्बई १४ ; पंजाब [प] ) सिफत गन्दुम व नाने मैइये खालिस (गेहूँ और शुद्ध मदेकी रोटीका वर्णन) हाँसा गोहूँ धोइ पिसाइ । कपर छान कै छार' बनवाई ॥१ अतिमँदपहुती' धरु भर तोला । सेत सुहाठ' फूँज' अनु दोसा ॥२ टूटै न सानौँ दुँहु कर बोरा । नैमूँ मास हाथ जनु बोरा ॥३ अठरै साथ मरे गार्स सलानी''। मुख मेलत खिन बाहिँ 'बिसानी''॥४ सकर देसँ जेवँहिँ चित लाई । मरे न पेट न भूख भुखाई'' ॥५ कपुरबास'' पर सुख", माँगत चाहि उड़ाइ ।६ मार सहस दोइ' तिलकुट, महरै घरे बनबाइ ॥७ पाठान्तर—बम्बई और पंजाब प्रति— शीर्षक—(ब) सिफते गन्दुम व नाने दोम (गेहूँ और मोटी रोटीका वर्णन)। (प) शीर्षक उपलभ्य पोथी में अप्राप्य है । १—(प) हंसा । २—(ब) साफ । ३—(प) पोचा । ४—(ब) कडमपती (प) बडबड सुभर । ५—(ब) सुहाइ । ६—(ब) सूँज । ७—(ब) तानिँ (प) तनै न टूटे । ८—(प) कठरै । ९—(ब प) एक । १०—(ब) काउ । ११—(पं ; ब) तलाई । १२—(ब) बहु जाई । १३—(ब प) बिलाई । १४—(ब, प) सब दिन । १५—(बं०-जैठ को (प) जो जीह । १६—(प) भूख न खा । १७—(ब) कर मास, (प) केवरबास अथवा कफूरबास । १८—(प) मुख तर । १९—(प) दए ।
टिप्पणी-(१) हाँसा—हंसके समान सफेद । गोहूँ—गेहूँ । छार—आग । (४) बडरै-जाठर (खीर) के । १६० (रीडेन्ट्स ११८ : बम्बई १० : पंजाब [क] ) सिफत आवर्दने बर्गाहाये दरख्तान (पत्तियोंका वर्णन) पत्तरिहैं लोग 'तुरैं धन पाता' । छोर न अधरा कीन्हैं निखाता ॥१ महुआ अँब लीन्ह घर पारी' । घर पीपर्र कै बाँधैं' खारीं ॥२ कटहर पकुहर औ लोकर लिये । आमुनँ गुरहर्र' नाँग सब" भये ॥३ कठऊँबर पाकर बहु "तोरी । महुले फदमें दाख फकोरी" ॥४ तँदू गुगुची रीठा घनों । पुरइन पात कररै फो गिनों ॥५ पनवड आइ मनासियत, पानैं लाग कर जोर ।६ नाँग कीन्ह हौँ बारिहैं, पात लीन्ह सबै तोरैं ॥७ पाठान्तर—बम्बई और पंजाब प्रति— (क) आवर्दने बगहाय दरख्तान रा बराये दौंद (?) रा (दाद (?) क निमित्त बनपत्तीका लाना) । (पं) शीर्षक टफ्स्य पोताम अपाठ्य है । १-(प ब) केंह । २-(प) फ्ता । ३-(ब) छोड न : (प) लीकेँह । ४-(ब) भौत; (प) शब्द नष्ट हो गया है । ५-(ब) भारी । ६-(ब) पीपर, (पं) पेड । ७-(ब) बाँधहि । ८-(ब) जारी : (प) शब्द नष्ट हो गया है । ९-(ब) ओ नींबू; (पं) पंक्ति अपाठ्य है । १ -(ब) जाम्य; (प) पूरी पंक्ति अपाठ्य है । ११-(ब) कपियार । १२-(बं) ठभ । १३-(ब) बहु पाखर । १४-(ब) महु बदोदे । १५-(ब) फेंकोरी । १६-(ब) बगुची : (प) बगुचन । १७-(पं) पुरइं । १८-(ब) करन । १' -(ब) इम । २ -(ब) सम । २१-(प) पंक्ति ६-७ अपाटय है ।
२७४ १६१ (रौकेन्ड्स ११६। बम्बई ११) आमदने लश्करे गोबर बर रवानये महर व नशिस्तने ईशाँ (मगरिकोंका महरके घर आकर बैठना) महर' मंदिर सब नेत बिछाई । कै खँडवान कुण्ड मराई ॥१ गोबर नोता हुत' सोइ भुलावा । विहवीसो' पार समै लै'आवा ॥२ घटहि न सूसँ सरह जनु चढ़ी । ठपना देस मंदिर गा मढ़ी ॥३ बैस कुँवर गे पांतिहिं पाँती । परखा पीन सो भाँवहिं भाँती ॥४ खोरक महरें पाट बैसारा । गहन भार जैं चाँद उबारा ॥५ घरन घर भरि बैठे, अगनित कही न जाइ ॥६ खेत साथ लहि आँगन, तोहु लोग न समाइ ॥७ पाठान्तर—बम्बई प्रति— शीर्षक—वरास्त करने कतूरी बर खानये राय महर (महरके घर भोजकी तैयारी) । १—महरें । २—राम । ३—हुँच । ४—बैहीचो । ५—पक्ति । ६—सूसहि । ७—कोरम । १६२ (बम्बई १२। रौकेन्ड्स १२) आमदने तमाम दर मज्लिसे हरकिन्त (नाना प्रकारके व्यंजनोंका परसा जाना) बैठी पार पसारि पँवारा । मात परोसहिं झार सुवारा' ॥१ पतरी भरहिं मूँस बछवानों' । भाँतहिँ भाँति लोर पहँ आनों ॥२ मास ममोरों खरवों फुनि भरी । ढानों सौ सो गुन पत धरी ॥३ लै मसमार तुलाने नाऊ । धिरत खाँड कीन्ह पैराऊ ॥४ घर पकवान जेवहुँत कजे । फल सन्धान साख एक अहे ॥५
१७७
गिन चौरासी सै हाँड़ी, धामनँ परसि सँमार ।६ परे बहुत खमहर्वा, होइ लाख जेउनार ॥७
पाठान्तर—रीट्स प्रति— शीर्षक—त आम खुरानीदने महर मर खल्क रा बज अक्सामे नेहमत हा (महरका लोगोंको नाना प्रकारके उत्तम भोजन खिलाना) १—बैठे पारी पसरि सबारा । २—होइ जेउनार । ३—कइ भाना । ४—कटीसो (!) । ५—भाव मसोया कटवाँ भरे । ६—हुत । ७—गिन चौयसी हाँड़ी नाँऊ । ८—परे गजबजा बहुतर । ९—लाग । टिप्पणी—(७) खमहवा—(सं गान्धाद्य>प्रा गंधअज>गमहव्वा>गमहवा) खाने योग्य उत्तम फल मेवा ।
१६३ ( रीट्स १२१ ) आमदने चाँदा बर कसर व दीदने लोरक व बेहोश शुदन लोरक ( चाँदाको छतपर चढ़ी देखकर लोरकका मूर्छित हो जाना )
पहिरि चाँद खिरोदक सारी । सोरह करों सिंगार सिंगारी ॥१ चढ़ धौराहर किहसि पिकासू । देखि लोर कहँ विसरि गरासू ॥२ लोर जानि अछरहि दिखरावा । इँह कबिलास अउर को आवा ॥३ अमरित जेवँत माहुर भयो । डीठ सो हर चाँदें लियो ॥४ मुखँ न जोवि कन्या अति रूखी । चाँद मनहु सुरज गा सोखी ॥५ खइम माँझ अमरित कै, झार उठी जेउनार ।६ लोर लीन्ह कें डाँडी, बिसँभर कछु न सँभार ॥७
टिप्पणी—(१) खिरोदक (सं क्षीरोदक)—सातवीं शताब्दीसे इस वस्त्रका उल्लेख भारतीय साहित्यमें मिलता है। इसका उल्लेख बाणने हर्षचरितमें किया है। परिशिष्ट पर्वण और मञ्चकथा में इसका जो उल्लेख है उससे यह प्रकट होता है कि यह अत्यन्त हल्का सफेद रंगका वस्त्र था जिसमें समुद्रकी लहरोंकी सी आभा झलकती थी (क्षीरतरङ्गरी भूत क्षीरोदोमिस्यानिव) । (२) गरासू—ग्रास कौर । (३) अछरहि—अप्सरा । (४) माहुर—विष ।
१७६ १६४ (रौशनस १९२) दर जाने अजदने इश्क दर गिरिया कर्दने लोरिक (लोरिकका घर आना और लोरिकका दुःखी होना) सैं लोरक घर सेज ओलारा। बहई नैन फाँचइ असरारा ॥१ खोलिन रोवइ फाइ यह मया। मोर मार फँ पचहँडा दिया ॥२ लोग कुटुंब बंधु जन आये। पंडित बैद सयान पुलाये ॥३ धर नौरिफा बैद अस कहही। चाँद सुरुज दुइ निरमल अ[हहीँ*] ॥४ बात न पित्त रकत न सीऊ। ताप न जूरी चित्त सँमीऊ ॥५ देउ न दानौँ झरकौँ, यह सीर बरियारि। ६ मन काम कर बिया, ता बहु रे सुगारि ॥७ टिप्पणी-(१) ओलारा-निर्जीव होकर पड़ रहना। फाँचइ-कराहे। (२) बार-बार पुनः। पचहँडा-मरणके दशवें दिन घरसे निकाल कर बाहर दूर रखे जानेवाले मिट्टीके पाँच पात्र; किसी व्यक्तिके रोगको दूसरे व्यक्तिके ऊपर डालनेकी क्रिया; उतारा फ्लाय। (३) सयान-ओझा झाड़ फूँक करनेवाले। (४) धर-पकड़ कर। नारिफ-नाड़ी। (५) सीऊ-शीत। ताप-ज्वर। जूरी-ठण्ड लगकर आनेवाला ज्वर, मलेरिया। (६) देउ-देव। दानौँ-दानव। सीर-रोग। बरियारि-बहुत बड़ा। १६५ (रौशनस १९३) ऐजन (वहु); दर गिरिये लोरिक गोयद (लोरिकका विलाप) सुरझ रैन महँ गयउ सुझाई। चँदर छोत निसि आगे आइ ॥१ खोलिन नीर ढार सरपिया। महु मूयों महँ छोरक जीया ॥२ हौं जस जीठ बीठ इह देऊं। लोरक फेर माँग कें लेऊं ॥३
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१७८ १६७ ( रौकन्ट्स १२५ ) खुरने लोकिन बिरस्पत रा बर महक व दीदने बिरस्पत लोरक रा ( बिरस्पतका घरके भीतर जाकर लोरकका देखना ) पल खोलिन तोर कहाँ रोगी । मकु औखद जानउँ यहि जिउकी ॥१ सेजइ खोलिन लोरक ठाऊँ । देखसि क्या सीस धड़ पाऊँ ॥२ सुरुज भरहिं बिरस्पत आइ । नैन उघार चँदर बिहसाइ ॥३ गुनि गुनि देखि अग कै पीरा । कठन गरह करिरहै तुम्ह पीरा ॥४ यह गुन गुनी तिरी परछाना । यह बियाधि न आखद जाना ॥५ महर भंडार भंडारी औ चाँदा कँ भाइ ।६ नैन उघार मात कहु, आयउँ आइ भुलाइ ॥७ टिप्पणी—(१) मकु = कदाचित । (५) बियाधि—(स व्याध) रोग । औखद—औषधि । १६८ ( रौकन्ट्स १२२ ) दूर सुरने लोकिन व गुप्तने लोरक हिदायते दीदने चाँदा बा बिरस्पत ( लोकिनका हट जाना और लोरकका बिरस्पतसे चाँद-दर्शनकी बात कहना ) बननि जो चाँद कइ बोल आहा । सहसकरों सुरुज परकासा ॥१ कहसि अननि यह मदन कहाँ । तार लाव सर्जास अहीं ॥२ खोलिन बाइ और तह ठाढी । लारक पीर हियँ कँ काढी ॥३ जिहिं दिन हूँ बउनार भुलाना । महर मंदिर काहू दिखरावा ॥४ सो जिउ लगइ कही न आइ । दिन जिउ भयउँ परेउँ पहराइ ॥५ मोगहरू मपूरन, चाँद जात परगाम ।६ पीतु चमरु पइ चमरी बैठि घाघहर पास ॥७ टिप्पणी—(३) पीर—हृदय व्यथा । ( ) पहराई—बहकर गिरना ।
१०९ १६९ (रीट्सबर्ग १२७) मना कर्दने बिरस्पत लोरक रा कि इन हिकायत न गोयद (बिरस्पतका इस बातको छिपा रखनेको लोरकसे कहना) सुनु लोरक अस पात न कहिये। जो कहै इँह देस न रहिये ॥१ यह तो आइ महर के जिया। चाँद नाउँ चौराहर दिया ॥२ सो तैं दीख बीजु बरियारी। लखैं तोर चितै गई न मारी ॥३ तरइँह चाफर सेज बिछावहिं। सपनैं नखत निसि पहरे आवहिं ॥४ मन कै सांक हिंयेहुत धोवहु। अँखैं मूँज सुख निदरा सोवहु ॥५ इव राजा के दुआर, औ निसि सरग असेर ।६ जिहँ का राज पिरिय में, तिहँ तू गरब न हेर ॥७ टिप्पणी-(४) तरइँह-तारागण । सपनै-सभी। (५) अँखैं मूँज-या पीकर। १७० (बम्बई १६; रीट्सबर्ग १२८) मिन्नत कदन लोरक पेश बिरस्पत (लोरक्का बिरस्पतसे अनुनय) चाँद क उतर बिरस्पत कहा। सुरुज दुहूँ पायन पर रहा ॥१ आजु बिरस्पत सुदिन हमारा। मुस्ताकॅवल जिहँ देखि तुम्हारा ॥२ कहु सो बात जिहूँ होइ पिरावा। भल ओ करैं भलाई पावा ॥३ कै मिस लै मोहिं आन जियावहु। कै सो मॅत्र-बिधि आज जियावहु ॥ किरपाव दम नव मूँह मेरा। पाँय परतें बिरस्पत ठेला ॥५ पाँय न टतु बिरस्पत, हा वो पर तुम्हार ।६ बचन तार मँहि आसद, खसि न सीसँ हमार ॥७
१८ पाठान्तर—सम्बर प्रति— शीर्षक—ब पाये उस्तादने लोरक ब इलहाहे बिसियार नमूदने ऊ (लोरुक का बिरसपतक पाँव पड़ना और अनुरोध करना)। १—भहारा। २—ओ। ३—अरे नो। ४—कँहि म। ५—दैरे। ६—दरे। ७—उभे। ८—पाइ। टिप्पणी—(१) मिराबा—मिलाप। (५) देखा—दराया। १७१ (रीड्सूम १२९) शीर्षक- मामोफ्तने बिरस्पत मर लोरक रा (बिरस्पतका लोरकको उपाय बताना) बिरसपत देखि लोर कर कया। मरन सनेह उठी मन मया ॥१ पाय छाडु लोरक ल मानी। आँखद् करां पीर तोर जानी ॥२ लोरक तोर कहा मैं मानौं। कै हौं कै तूँ अउर न जानौं ॥३ जो लोरक इहँ घात उबारा। मइँ करपना घरु झाँगी मारा ॥४ सुनु बिधि मोरी ताइ मइँ सेवहु। मैं लै वाष पुजायहु [दिबहु*] ॥५ गुर्ताँ रूप होइ बैठउँ, कया भभूत चढ़ाइ ॥६ दरस निकट जो भगत, देखि नैन अघाइ ॥७ टिप्पणी—(१) कया—काया शरीर। मया—ममता। (३) कै हौं कै तूँ—या तो मैं या फिर तुम। (४) झोंघी—जोगी। मारा—दाना घञ। ( ) वाघ—चाहूँगी। (५) गुर्त्ता—(फारसी) देवता यहाँ तात्पर्य जोगी रूपसे है। भभूत—भस्म। १७२ (रीड्सूम १३) शीर्षक आमदन बिरस्पत बज महले लोरक व पाये उस्तादने लोरिकिन (बिरस्पतके बाहर आनेपर लोरिकका पाँव पड़ना) फइ बिरस्पत बाहर भइ। खोलिन सेइ पाय कै सइ ॥१ सीस चढ़ायसु पागं धूरी। आस मोर जनु छीजै धूरी ॥२
१८१ खोलिन चँदर मेघ घिरि आवा । सूरुज गहमहुत सोइ छुड़ावा ॥३ भा सुख भरम चित जनि धरहू । न्हाइ धोइ कुछ अरघ फरहू ॥४ थोरहिं घरी चैन कै पाई । बागा सुरुज चँदर मिहसाई ॥५ भरम न करहु खोलिन चित मँह, लोरक लै अन्हवावहु । ६ अरु कुछ अरघ दरब बार, तिहि पाहर दे पठावहु ॥७ टिप्पणी—(१) खेह—धूल । (२) धूरी—धूलि । जनु—मत । धूरी—चूरचूर करना । (३) गहुन—ग्रहण । हुत—था । (४) अरघ—अर्घ पूजन उपचार । (५) अन्हवावहु—स्नान कराओ । (७) बार—निछावर करके । १७३ ( रीकीन्स १३१ ) बंदक कदने गाकिन बिरस्पत रा बज लेहवे गारक ( न्होलिन का बिरस्पतसे बाहा करना ) जिहैं दिन लोरक उठी नहाई । लोग कुटुंब में करब मधाई ॥१ तिह पहिराँवों चीर अमोला । जो सूचा आये लोरखँ छूता ॥२ गइ बिरस्पत मिहिं सब तारा । औ निसि चाँद करै उजियारा॥३ किये सेउ सब सुरुज फे[रा*] । चाँद तरायीं सोवन कँ फेरा ॥४ पान मँग निसि चाँदा रानी । नखत तराइ कहहिं कहा[नी*]॥५ चाँद नउत लै तारा, बैठि धौराहर जाइ । ६ लोर लाग तिहँ चिंतइ, कहि जो बिरस्पत आइ ॥७ टिप्पणी—(१) करब—करूँगी । (२) चीर—साड़ी । अमोला—अमूल्य । सूचा—शुभ ग्रह । (४) सोवन कँ फेरा—सोने के लिए भेजा ।
१८२ १७४ ( संक्षिप्त १९२ ) जोगी शुदने गोरख व नशिस्तन दर बुतख़ानये खुद ( मन्दिरमें गोरखका जोगी बन कर बैठना ) सुवन फटिक मुँदरा सरसेली । कण्ठ जाप रुद्राफैं मली ॥१ चकर जगाँग गूँथी कंथा । पायें पावरी गोरउपन्था ॥२ मुंड मभूत कर गही अधारी । छाला पंस क आसन भारी ॥३ दण्ड अधर बैन कैं पूरी । नेइ आरचा गावइ झारी ॥४ कर किंगरि तिहूँ बार बजावइ । जिहूँ घाँदा सुरस चितरा पावइ ॥५ सिध पुरुउ मढ़ि बैठउ, घर घर घर दुआर ।६ मगत मोर मनखंड गये, फाँद नाम ना निसार ॥७ टिप्पणी—(१) सुवन—श्रवण कान। फटिक—स्फटिक। मुँदरा—मुद्रा कानमें पहननेका कुण्डल। सरसेली—छेदकर पहना। जाप—माला। दरा—रुद्राक्ष। (२) चकर—चक्र सम्भवतः छोटी गोल अँगूठी जिसे पबित्री कहते हैं (वामुरेशाकरण अप्रकास) । जगौटा—(सं योगपट्ट) वह वस्त्र जिसे जोगी ध्यान करते समय घिरने पैरों तक डाल लेते हैं। अन्य अवस्था- में यह कन्धे पर रहता है। कंथा—कथरी, गुदड़ी कटे-पुराने कपड़ोंसे बनाया गया वस्त्र। पायें—पैर। पावरी (स पादरक्षा>पा पायक्खइ
पावड>पावडा पौवरि)—खड़ाऊँ। (३) अधूत—भस्म। अधारी—लकड़ीका बना सहारा जिसको देखकर योगी बैठते और सोते हैं। छाला—चर्म। सम्भवतः यहाँ व्याघ्रचर्मसे तात्पर्य है। जायसीने जोगी वेषक प्रसंगम वघछालाका उल्लेख किया है (पदमावत १९६।६)। ( ) किंगरि—छोटा शिकारा या सारंगी जिसे बजाकर जोगी भीख माँगते हैं।
१८४ १७५ ( रीकेन्स १३३ ) एक साल परसीदने लोरक बुत रा, व आमदने चाँदा व सहेलियान दर्रॉ ( लोरकका एक साल तक मन्दिरमें तप करना : चाँदा सहेलियोंके साथ आना ) एक बरसि लोरक मढ़ि सेवा । चाँद सनेह मनायसि देवा ॥१ कातिक परब देवारी आई । दार परी रितु खेले गाई ॥२ चाँद बिरस्पत लीन्ह हँकारी । आवहु देखै जाँहि देबारी ॥३ सखी सात एक गोहन लागीं । रूप सरूप सुभागिन मार्गी ॥४ अबरत चाँद चली लै तहाँ । गाएँ देवारी खेलैं जहाँ ॥५ सुरन फूल चाँदा लै, एक हुत मेला आइ ।६ पहिरत हार टूटि गा, मोतिह गये छरियाइ ॥७ टिप्पणी-(४) सात-साठ पाठ भी सम्भव है । (५) अबरत-एक हुत पाठ भी सम्भव है । (६) एकहुत-अबरत पाठ भी सम्भव है । (७) छरियाइ-बिखर गये । १७६ ( रीकेन्स १३४ ) शिकस्तने हारे मुरवारीदे चाँदा दर बुतखानये व बर्गफदन सहेलियाँन (चाँदका मोती-माल टूटना और सखियोंका मोती बटोरना ) समर मोतिइ लैँ घोइ पानी । चाँद कलफ चितहि लजानी ॥१ सननि जो पूछि तो कस कहहूँ । कवन उतर उन ऊपर देउँ ॥२ पोता सखिह छाँइँ मढ़ि लीजै । हार पिरोइ चाँद कहँ दीजै ॥३ आइ बिरस्पत हेरि हँकारी । चाँद बचन सुन भइ मँघियारी ॥४ मढ़ि सुहाउ आँ छाएँ सुहाइ । चाँद सरी लै पैठी जाइ ॥५ मानिक मोति पिरोयहिं, गचि गचि पार हार ।६ पैठ चाँद बिरस्पत, सूरूज मढ़ि दुआर ॥७
१८४ १७७ (रोहिङ्ग्स ३१५) गन्बरे जोगी कर्दने सहेलियों बर चाँदा रा (सहेलियोंका चाँदाको जोगीकी सूचना देना) झाँउ सहेलिहँ चाँदहि कहा। इंद मदि मँह एक आयसु अहा ॥१ अति रूपवन्त राजपुत आहे। सुरूज मदि निकर आये चाहे ॥२ करक ऊँच आहु भिखारू। मदिर घेरे बीर अपारू ॥३ कौन जननि अरमेउँ अस बारा। सहसकराँ भयउ उजियारा ॥४ नागर छल सुभागैं भरा। करम जोत मनु माथें परा ॥५ चाँद कहा तराई, सुरूज देखउ आइ ।६ अस भगवन्त जो देखइ, दिसत पाप झर जाइ ॥७ मूलपाठ—पंक्ति ४ और ५ के उत्तर पद मूल प्रति में परस्पर स्थानान्तरित हैं। टिप्पणी—(१) झाँउ—झाँक कर। (७) दिसत—देखते ही। झर जाइ—गिर जाये नष्ट हो जाये। १७८ (रोहिङ्ग्स ३१६) सलाम कर्दने चाँदा व बिहोश शुदने जोगी (चाँदाका प्रणाम करना और जोगीका मूर्च्छित होना) चाँद सीस भगवन्तहिं नावा। भा अचेत मन चेत गँवावा ॥१ सँभर मन देखन गुन गभउ। नेव चरन मुख फेंफर भयउ ॥२ नैन झरहिं अति कया सुखानी। धनि धानुक चख इना पिनानी ॥३ नैन दिस्टि चाँदा लायसु। दहा खाइ न सो देखें पायसु ॥४ भाँइँ फिराइ चाँद गुन सानी। नैन बान मिस हनों सयानी ॥५ काट दीन्ह अस पफर देबारैं, रकत कीन्ह परबारि ।६ दउ गपी घर धरती, सँबर देउ हुभारि ॥७ टिप्पणी—(२) फेंफर—कान्तिहीन; धुंधला हुआ।
१८७ १७९ ( रिसंग्रहम १२७ ) बाज गश्तन चाँद अज़ बुतखाना व आमदने ब खानये खुद ( चाँदका मन्दिरसे घर लौटना ) बाहर मदिर चाँद जो आई । सूरुज दिसत मुख गा कुँमलाई ॥१ पूछी चाँद बिरस्पत धाई । काह कहाँ कछु कही न जाइ ॥२ जोहि सीस मँझि कहुँ नाया । परा मुरुस मुख बकत न आवा ॥३ डार्य पाउ सर हर न सँभारी । धुन धुन सीस मंदिर सौं मारी ॥४ हार पिराइ सहेलिहिं दीन्हा । हँस कें चाँद पहिर गिय लीन्हा ॥५ कहा बिरस्पत चाँदा, चलहु बेग घर जाहिं ।६ चाँद सुरुज हैं अँधवत, महरी घरे डराहिं ॥७ टिप्पणी—(१) जोहि—जैसे ही; जिस समय; कर । बकत—बोली आवाज । (४) पाउ—पैर । (७) अँधवत—डूब रहे । घरे—घर पर । १८०-१८१ ( अप्राप्त ) १८२ ( रिसंग्रहम १२८ । बम्बई ९ ) बकियत दर तनहाइये लोरक शुबद ( लोरककी एकान्तताका वर्णन ) माता पिता पन्धु¹ न भाई² । मग न साथी मीत न धाइ³ ॥१ इहँ पनगंट कइ पाव न आवइ । पा३ग परन मुख नीर चुआवइँ ॥२ दह दिपन जीउ भर भंगाग । पॉपनि भीमतारि गदि पाग ॥३ सपन यनक में फलु दगा । भिन नवैमारउँ मग्न पिगरा ॥४ काह उगाह पैसार गँभार । इहँ कथा फल दइँ⁵ ईंकार ॥५
१८५ देखि पूछि तूं जो आहा, हौं कस गा बिसँभार ।६ रूपा एक मुख फेफर, मोर" लिय कछु न सँभार ॥७ पाठान्तर—बम्बई प्रति— शीर्षक—राफ्तने सोरठ सुरखते खुद व पुरसीदने खुद रा (सोरठका जल- हाय अवस्थामे देखतासे प्रश्न) इस प्रतिमें पंक्ति ३ ४ ५ का क्रम ५ ३ ४ है। १—बहून (नागरी छोटे अक्षरोंमें 'बन्धु' भी) । २—बाद। ३— भाई। ४—आबा। ५—फोर्त। ६—भुआवा। ७—के। ८—सँभार। ९—भान। १०—को गहे। ११—मोरैं। १८३ (रीडंग्स १३९) जबाब बादने बुत बर सोरफ रा (देखताका उत्तर) एक अचम्भा सुनु तूं लोरा । सुतक सेतें भयउ जिहूँ तोरा ॥१ जहरिन्ह फेर मुण्ड इक आवा । सो तैं अहरिन्ह देख न पावा ॥२ हूँ तिहूँ देखि परा मुरझाइ । हौं रे पौन भर गएउँ बिलाइ ॥३ भा झंकार जो सिहूँ फोनों । डम्बर उठा बहुत गिय सोनों ॥४ खिन एकइस मबन तिहूँ कीन्हौं । फिर पयान उत्तर मुख दीन्हौं ॥५ सीस उघाइ जो देखउँ, मंदिर चहूँ दिसि सून ।६ सहन मोर जियैं उठरी, लोर तुम्हारे पून ॥७ टिप्पणी—(१) सुतक सेते—छोये हुए के समान । १८४ (रीडंग्स १४ ) तल्बीदने चाँदा बिरहपत रा व पुरसीदने हिकायत सोरफ (बिरहपतको बुलाकर चाँदका सोरठके सम्बन्धमें जिज्ञासा) चाँद पिरम्पत पास बुलाई। पिरम कह्रानी कहु मोहि आई ॥१ जिहूँ रग सफर पिरम बिमारें। रग डघरा हिरदै मरि भारूँ ॥२
१८७
रस अहार सँह देह अघाई । बिरह झारें रस न बुझाई ॥३ पहुल रसायन देखेउँ चाखी । रस कहहानी कहु महँ माखी ॥४ रस कै रात सपूरन [मानइ*] । औ रस मन सुख निंदरा आवइ ॥५ कहहु रस पचन बिरस्पत, जिहिं चित करउँ मिठाइ ।६ रस के घड़े भरावहु, दुख संताप सब जाइ ॥७
१८५ ( सोरिनुद्दम् १४१ ) जबान दादन बिरस्पतका चाँदा रा ( बिरस्पतका चान्दको उत्तर ) तूँ रस बिरस चाँद का जानसि । हाँ रस कहौं घिरत ओ सानसि ॥१ घिरत खाँड सोँ करउँ मेरावा । चाँद लइस अपनहि तुम पावा ॥२ रस पर जिहि कै परै अहारू । रसहि पूर आछहिँ ससारू ॥३ रस कें दाध अन-पानि न भावा । रसजो आन भाँखद पड़ लावा ॥४ रस कें मात चितहि जो घरसी । रस कै घड़े बिरस जनु करसी ॥५ रस कै कुण्ड परा मदि, सँवर गुन खीर ।६ रस कह घूंट घरु माँह, चाँदा लावहु तीर ॥७
१८६ ( सोरिनुद्दम् १४२ ) ज्याबदादन चाँदा बर बिरस्पत रा बागुस्सा ( चाँइका बिरस्पत पर क्रोध ) निलज बिरस्पत लाजन धरसी। महि बिगरािर सा मग्भर करसी ॥१ बिरस्पत ताँइँ मन अस आवा । जो हैं मदि मैयर दिगगया ॥२ बिहुँ रन चाँद गुरुज दिगगया । तिहँ दिन हून पड़ि अउर न भावा ॥३ नैन पँगि चित्त छीनसि थानूँ । पाप कीन्हि हां अन्न न खानूँ ॥४ हँ जा देगाइ बिरस्पत कहा । मा हीउ मं लागि पिस रहा ॥५
१८८
लोर सुरुज यह निरमल, तहँ सुवन उजियार ॥६ चाँद आहि घनि ठाकर, सुरुज नाँह हमार ॥७ टिप्पणी—(१) सरभर—समानता बराबरी। (४) पैसि—पैठ कर। कोलिसि—लिया। काहूँ—स्थान। अन्त—अन्य, किसी दूसरेको। (७) घनि—पत्नी। नाँह—पति। १८७ (रीकैण्ड्स १४३) बाज़ नमूने बिरहस्त हिराफ्ते लोरक पेश चांदा (बिरहपतका चाँदासे लोरकके प्रेमकी बात कहना) वह सो महर धिय तोर भिखारी। भीख लेइ जो देसु हँकारी ॥१ दरसन राता भयउ तिह जोगी। भीख न माँग पुरुख है मोगी ॥२ तिहि कारन मुख मसम चढ़ावा। बचन देहि तोहि सिघ पावा ॥३ तोरें रस कर आस पियासा। नित नहि आवै लै मरि सासा ॥४ चाँद बचन एक सुनु तुम्ह मोरा। तूँ औखद वह रोगिया तोरा ॥५ हस्त चढ़ा दिखरावतें, पुनि आनेहँ जेठनार।६ सोइ मड़ि महँ, देखत गा बिसँभार ॥७ टिप्पणी—(१) जो—यदि। देसु—दो। हँकारी—बुलाकर। (६) आनिहँ—ले आई। (७) गा—गया। १८८ (रीकैण्ड्स १४४) बपसरेह कर्दन चांदा अज बेहोशी लोरक दर कुलराना (मन्दिरमें लोरकके मूर्छित होने पर चाँदाका खेद) मड़ि मदिर सो लोरक अहा। हँ न बिरहपत मोसेतैं कहा ॥१ 'जुगुति जुगुति तिह जोग देतों। धिरत मिर बचन सुन सेंतों ॥२