भारतकोश
संग्रह पर लौटें

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

दशम खण्ड

नदीके दृष्टान्तद्वारा उपदेश

शृणु तत्र दृष्टान्तं यथा—इस विषयमें दृष्टान्त श्रवण कर।<br>जिस प्रकार—

इमाः सोम्य नद्यः पुरस्तात्प्राच्यः स्यन्दन्ते पश्चात्प्रतीच्यस्ताः समुद्रात्समुद्रमेवापियन्ति स समुद्र एव भवति ता यथा तत्र न विदुरियमहमस्मियमहमस्मीति ॥ १ ॥

हे सोम्य ! ये नदियाँ पूर्ववाहिनी होकर पूर्वकी ओर बहती हैं तथा पश्चिमवाहिनी होकर पश्चिमकी ओर । वे समुद्रसे निकलकर फिर समुद्रमें ही मिल जाती हैं और वह समुद्र ही हो जाता है । वे सब जिस प्रकार वहाँ ( समुद्रमें ) यह नहीं जानतीं कि ‘यह मैं हूँ, यह मैं हूँ’ ॥ १ ॥

| सोम्येमा नद्यो गङ्गाद्याः पुरस्तात्पूर्वां दिशं प्रति प्राच्यः प्रागञ्चनाः स्यन्दन्ते स्रवन्ति । पश्चात्प्रतीचीं दिशं प्रति सिन्ध्वाद्याः प्रतीचीमञ्चन्ति गच्छन्तीति प्रतीच्यस्ताः समुद्रादम्भोनिधेर्जलधरैराक्षिप्ताः पुनर्वृष्टिरूपेण पतिता गङ्गादिनदीरूपिण्यः पुनः समुद्रमम्भोनिधिमेवापियन्ति स समुद्र एव भवति । ता नद्यो यथा तत्र समुद्रे समुद्रात्मनैकतां | हे सोम्य ! ये गङ्गा आदि नदियाँ प्राच्य पूर्ववाहिनी होकर पुरस्तात् पूर्व दिशाकी ही ओर बहती हैं तथा सिन्धु आदि, जो पश्चिमको ओर जाती हैं अतः प्रतीच्य (पश्चिमवाहिनी) हैं, पश्चिम दिशाके प्रति बहती हैं । वे समुद्र—जलनिधिसे मेघोंद्वारा आकृष्ट होकर वृष्टिरूपसे बरसकर गङ्गादिरूपमें फिर समुद्रमें ही मिल जाती हैं और वह समुद्र ही हो जाता है । जिस प्रकार समुद्रमें समुद्ररूपसे एकताको प्राप्त हुई वे |

खण्ड १० ] शाङ्करभाष्यार्थ ६६९

| गता न विदुर्न जानन्तीयं गङ्गाहमस्मियं यमुनाहमस्मीति च ॥ १ ॥ | नदियाँ यह नहीं जानतीं कि 'यह मैं गङ्गा हूँ; यह मैं यमुना हूँ' इत्यादि ॥ १ ॥ |


एवमेव खलु सोम्येमाः सर्वाः प्रजाः सत आगम्य न विदुः सत आगच्छामह इति त इह व्याघ्रो वा सिꣳहो वा वराहो वा कीटो वा पतङ्गो वा दꣳशो वा मशको वा यद्यद्भवन्ति तदाभवन्ति ॥ २ ॥ स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिदꣳसर्वं तत्सत्यꣳस आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो इति भूय एव मा भगवान्‌विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच ॥ ३ ॥

ठीक इसी प्रकार हे सोम्य ! ये सम्पूर्ण प्रजाएँ सत्‌से आनेपर यह नहीं जानतीं कि हम सत्‌के पाससे आयी हैं। इस लोकमें वे व्याघ्र, सिंह, शूकर, कीट, पतङ्ग, डाँस अथवा मच्छर जो-जो भी होते हैं वे हो फिर हो जाते हैं ॥ २ ॥ वह जो यह अणिमा है, एतद्रूप ही यह सब है। वह सत्य है, वह आत्मा है और हे श्वेतकेतो ! वही तू है। [आरुणिके इस प्रकार कहनेपर श्वेतकेतु बोला—] 'भगवन् ! मुझे फिर समझाइये।' [तब आरुणिने] 'अच्छा, सोम्य !' ऐसा कहा ॥ ३ ॥

| एवमेव खलु सोम्येमाः सर्वाः प्रजा यस्मात्सति सम्पद्य न विदु- स्तस्मात्सत्त आगम्य न विदुः सत | ठीक इसी प्रकार हे सोम्य ! ये सम्पूर्ण प्रजाएँ क्योंकि सत्‌में लीन होकर [अपना पार्थक्यज्ञान नहीं रहता, इसलिये] उस सत्‌से |

३७० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६

३७०छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ६

| आगच्छामह आगता इति वा । त इह व्याघ्र इत्यादि समानमन्यत् । दृष्टं लोके जले वीचितरङ्गफेनबुद्बुदादय उत्थिताः पुनस्तद्भावं गता विनष्टा इति । जीवास्तु तत्कारणभावं प्रत्यहं गच्छन्तोऽपि सुषुप्ते मरणप्रलययोश्च न विनश्यन्तीत्येतद् । भूय एव मा भगवान्विज्ञापयतु दृष्टान्तेन । तथा सोम्येति होवाच पिता ॥ २-३ ॥ | लौटनेपर यह नहीं जानतीं कि हम सत्‌के पाससे आयी हैं । 'ते इह व्याघ्रः' इत्यादि शेष वाक्यका अर्थ पूर्ववत् है । [श्वेतकेतु बोला—] लोकमें यह देखा गया है कि जलमें उठे हुए भँवर, तरंग, फेन एवं बुद्‌बुद आदि पुनः जलरूप हो जानेपर नष्ट हो जाते हैं; किंतु जीव तो प्रतिदिन सुषुप्तावस्थामें तथा मरण और प्रलयके समय अपने कारणभावको प्राप्त होकर भी नष्ट नहीं होते—सो हे भगवन् ! इस बातको मुझे दृष्टान्तद्वारा फिर समझाइये । तब पिताने कहा—'सोम्य ! अच्छा' ॥ २-३ ॥ |


इतिच्छान्दोग्योपनिषदि षष्ठाध्याये दशमखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १० ॥

एकादश खण्ड

—: o :—

वृक्षके दृष्टान्तद्वारा उपदेश

शृणु दृष्टान्तमस्य—[ इस विषयमें ] एक दृष्टान्त सुनो—

अस्य सोम्य महतो वृक्षस्य यो मूलेऽभ्याहन्या-
जीवन्स्रवेद्यो मध्येऽभ्याहन्याजीवन्स्रवेद्याऽग्रेऽभ्याह-
न्याजीवन्स्रवेत्स एष जीवेनात्मनानुप्रभूतः पेपीयमानो
मोदमानस्तिष्ठति ॥ १ ॥

हे सोम्य ! यदि कोई इस महान् वृक्षके मूलमें आघात करे तो यह जीवित रहते हुए ही केवल रसस्राव करेगा, यदि मध्यमें आघात करे तो भी यह जीवित रहते हुए केवल रसस्राव करेगा और यदि इसके अग्रभागमें आघात करे तो भी यह जीवित रहते हुए ही रसस्राव करेगा । यह वृक्ष जीव—आत्मासे ओतप्रोत है और जलपान करता हुआ आनन्दपूर्वक स्थित है ॥ १ ॥

संस्कृत व्याख्याहिन्दी अनुवाद
हे सोम्य महतोऽनेकशाखा-दियुक्तस्य वृक्षस्यास्येत्यग्रतः स्थितं वृक्षं दर्शयन्नाह—यदि यः कश्चिदस्य मूलेऽभ्याहन्यात्परश्वादिना सकृद्घातमात्रेण न शुष्यतीति जीवन्नेव भवति तदा तस्य रसः स्रवेत् । तथा योहे सोम्य ! [इस प्रकार सम्बोधित करके] सामने स्थित वृक्षको दिखलाते हुए कहते हैं—इस महान्—अनेक शाखादिसे युक्त वृक्षके मूलमें यदि कोई कुल्हाड़ी आदिसे आघात करे तो एक ही आघातसे यह सूख नहीं जाता, बल्कि जीवित ही रहता है; उस समय केवल इसका कुछ रस निकल जाता है । तथा यदि कोई मध्यमें आघात करे तो भी यह

६७२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६

६७२छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ६

| मध्येऽभ्याहन्याज्जीवन्स्रवेत्तथा योऽग्रेऽभ्याहन्याज्जीवन्स्रवेतस एष वृक्ष इदानीं जीवेनात्मनानुप्रभूतोऽनुव्याप्तः पेपीयमानोऽत्यर्थं पिबन्नुदकं भौमांश्च रसान्मूलैर्गृह्णन्मोदमानो हर्षं प्राप्नुवंस्तिष्ठति ॥ १ ॥ | जीवित रहते हुए ही रसस्राव कर देता है और यदि अग्रभागमें आघात करे तो भी यह जीवित रहते हुए ही रसस्राव करता है। इस समय यह वृक्ष जीव-आत्मासे अनुप्रभूत—पूर्णतः व्याप्त है और अत्यन्त जलपान करता हुआ तथा अपनी जड़द्वारा पृथिवीके रसोंको ग्रहण करता हुआ—मोदमान होता—हर्ष पाता हुआ स्थित है ॥ १ ॥ |


अस्य यदेकाँ शाखां जीवो जहात्यथ सा शुष्यति द्वितीयां जहात्यथ सा शुष्यति तृतीयां जहात्यथ सा शुष्यति सर्वं जहाति सर्वः शुष्यति ॥ २ ॥

यदि इस वृक्षकी एक शाखाको जीव छोड़ देता है तो वह सूख जाती है; यदि दूसरीको छोड़ देता है तो वह सूख जाती है और तीसरीको छोड़ देता है तो वह भी सूख जाती है, इसी प्रकार यदि सारे वृक्षको छोड़ देता है तो सारा वृक्ष सूख जाता है ॥ २ ॥

| तस्यास्य यदेकां शाखां रोगग्रस्तामाहतां वा जीवो जहात्युपसंहरति शाखायां विप्रसृतमात्मांशम्, अथ सा शुष्यति। वाङ्मनःप्राणकरणग्रामानुप्रविष्टो | उस इस वृक्षकी यदि एक रोगग्रस्त अथवा आहत शाखाको जीव छोड़ देता है—उस शाखामें व्याप्त जीवांश उपसंहृत हो जाता है तो वह सूख जाती है; क्योंकि वाणी, मन, प्राण तथा इन्द्रियग्राममें जीव अनुप्रविष्ट है इसलिये |

खण्ड ११ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६७३

शाङ्करभाष्यभाुष्यार्थ
हि जीव इति तदुपसंहार उपसंह्रियते । जीवेन च प्राणयुक्तेनाशितं पीतं च रसतां गतं जीववच्छरीरं वृक्षं च वर्धयद्रसरूपेण जीवस्य सद्भावे लिङ्गं भवति । अशितपीताभ्यां हि देहे जीवस्तिष्ठति ते चाशितपीते जीवकर्मानुसारिणी इति । तस्यैकाङ्गवैकल्यनिमित्तं कर्म यदोपस्थितं भवति तदा जीव एकां शाखां जहाति शाखाया आत्मानमुपसंहरति । अथ तदा सा शाखा शुष्यति ।उनका उपसंहार होनेपर वह भी उपसंहृत हो जाता है । प्राणयुक्त जीवके द्वारा भी भक्षण तथा पान किया हुआ अन्न-जल रसभावको प्राप्त होता है; वह रसरूपसे जीवयुक्त शरीर तथा सजीव वृक्षकी वृद्धि करता हुआ जीवके सद्भावमें लिङ्ग है । खाये-पीये हुए अन्न-जलसे ही जीव देहमें रहता है । वे खानपान जीवके कर्मानुसार होते हैं । जिस समय उसके एक अङ्गकी विकलताका निमित्तभूत कर्म उपस्थित होता है उस समय जीव एक शाखाको छोड़ देता है—उस एक शाखासे अपना उपसंहार कर लेता है । इसके पश्चात् तब वह शाखा सूख जाती है ।
जीवस्थितिनिमित्तो रसो जीवकर्माक्षिप्तो जीवोपसंहारे न तिष्ठति । रसापगमे च शाखा शोषमुपैति तथा सर्वं वृक्षमेव यदायं जहाति तदा सर्वोऽपि वृक्षः शुष्यति । वृक्षस्य रसस्रवणशोषणादिलिङ्गाज्जीववत्त्वं दृष्ट्वा-जीवके कर्मानुसार प्राप्त हुआ तथा जीवकी स्थितिके कारण रहनेवाला रस जीवका उपसंहार होनेपर नहीं रहता; और रसके निकल जानेपर शाखा सूख जाती है । इसी प्रकार जब यह सारे वृक्षको छोड़ देता है तो सारा ही वृक्ष सूख जाता है । वृक्षके रसस्राव एवं शोषण आदि लिङ्गसे उसकी सजीवता सिद्ध होती है तथा [ 'स एष वृक्षः जीवेन आत्मना अनु-

६७४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६

६७४छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ६

| न्तश्रुतेश्च चेतनावन्तः स्थावरा इति बौद्धकाणादमतमचेतनाः स्थावरा इत्येतदसारमिति दर्शितं भवति ॥ २ ॥ | प्रभूतः'] इस दृष्टान्तश्रुतिसे यह निश्चित होता है कि स्थावर चेतनायुक्त होते हैं और इससे यह भी प्रदर्शित हो जाता है कि 'स्थावर चेतनाशून्य होते हैं' ऐसा बौद्ध और काणादमत सारहीन है ॥ २ ॥ |

—: ० :—

| यथास्मिन्वृक्षदृष्टान्ते दर्शितं जीवेन युक्तो वृक्षोऽशुष्को रसपानादियुक्तो जीवतीत्युच्यते तदपेतश्च म्रियत इत्युच्यते — | जिस प्रकार कि इस वृक्षके दृष्टान्तमें यह दिखलाया गया है कि जीवसे युक्त वृक्ष अशुष्क और रसपानादिसे युक्त रहता है; इसलिये 'वह जीवित है'—ऐसा कहा जाता है तथा उस (जीव) से रहित हो जानेपर 'मर जाता है' ऐसा कहा जाता है— |

एवमेव खलु सोम्य विद्धीति होवाच जीवापेतं वाव किलेदं म्रियते न जीवो म्रियत इति स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिदꣳसर्वं तत्सत्यꣳस आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो इति भूय एव मा भगवान्विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच ॥ ३ ॥

'हे सोम्य ! ठीक इसी प्रकार तू जान कि जीवसे रहित होनेपर यह शरीर मर जाता है, जीव नहीं मरता'—ऐसा [ आरुणिने ] कहा, 'वह जो यह अणिमा है एतद्रूप ही यह सब है । वह सत्य है, वह आत्मा है और हे श्वेतकेतो ! वही तू है ।' [ आरुणिके इस प्रकार कहनेपर श्वेतकेतु बोला— ] 'भगवन् ! मुझे फिर समझाइये ।' [ तब आरुणिने ] 'अच्छा, सोम्य !' ऐसा कहा ॥ ३ ॥

खण्ड ११] शाङ्करभाष्यार्थ ६७५


| एवमेव खलु सोम्य विद्धीति होवाच। जीवापेतं जीववियुक्तं वाव किलेदं शरीरं म्रियते न जीवो म्रियत इति। कार्यशेषे च सुप्तोत्थितस्य ममेदं कार्यशेषमपरिसमाप्तमिति स्मृत्वा समापनदर्शनात्। जातमात्राणां च जन्तूनां स्तन्याभिलाषभयादिदर्शनाच्चातीतजन्मान्तरानुभूतस्तनपानदुःखानुभवस्मृतिर्गम्यते अग्निहोत्रादीनां च वैदिकानां कर्मणामर्थवत्त्वान्न जीवो म्रियत इति। स य एषोऽणिमेत्यादि समानम्। <br><br> कथं पुनरिदमत्यन्तस्थूलं पृथिव्यादि नामरूपवज्जगदत्यन्तसूक्ष्मात्सद्रूपान्नामरूपरहितात् सतो जायत इत्येतद्दृष्टान्तेन भूय एव मा भगवान्विज्ञापयत्विति। तथा सोम्येति होवाच पिता ॥ ३ ॥ | 'हे सोम्य ! ठीक इसी प्रकार तू जान कि जीवापेत—जीवसे वियुक्त हुआ यह शरीर ही मरता है जीव नहीं मरता' ऐसा [आरुणिने] कहा, क्योंकि कार्य शेष रहनेपर ही सोकर उठे हुए पुरुषको 'मेरा यह काम शेष रह गया था' ऐसा स्मरण करके उसे समाप्त करते देखा जाता है। तथा तत्काल उत्पन्न हुए जीवोंको स्तनपानकी अभिलाषा और भय आदि होते देखे जानेसे पूर्वजन्मोंमें अनुभव किये हुए स्तनपान तथा दुःखानुभवकी स्मृतिका ज्ञान होता है। इसके सिवा अग्निहोत्र आदि वैदिक कर्मोंकी सार्थकता होनेके कारण भी जीव नहीं मरता।' 'स य एषोऽणिमा' इत्यादि वाक्यका अर्थ पूर्ववत् है। <br><br> 'किंतु यह अत्यन्त स्थूल 'पृथिवी' आदि नाम और रूपोंवाला संसार अत्यन्त सूक्ष्म, सद्रूप, नामरूपरहित सत्‌से किस प्रकार उत्पन्न होता है ? इस बातको हे भगवन् ! मुझे दृष्टान्तद्वारा फिर समझाइये'—ऐसा श्वेतकेतुने कहा । तब पिताने कहा—'सोम्य ! अच्छा' ॥ ३ ॥ |


इतिच्छान्दोग्योपनिषदि षष्ठाध्याये एकादशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ११ ॥


छा० उ० २२—

द्वादश खण्ड

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न्यग्रोधफलके दृष्टान्तद्वारा उपदेश

यद्येतत्प्रत्यक्षीकर्तुमिच्छसि—यदि तू इस बातको प्रत्यक्ष करना चाहता है तो—

न्यग्रोधफलमत आहरेतीदं भगव इति भिन्द्धीति भिन्नं भगव इति किमत्र पश्यसीत्यण्व्य इवेमा धाना भगव इत्यासामङ्गैकां भिन्द्धीति भिन्ना भगव इति किमत्र पश्यसीति न किञ्चन भगव इति ॥ १ ॥

इस (सामनेवाले वटवृक्ष) से एक बड़का फल ले आ। [श्वेतकेतु—] 'भगवन् ! यह ले आया।' [ आरुणि— ] 'इसे फोड़' [ श्वेत०— ] 'भगवन् ! फोड़ दिया।' [ आरुणि— ] 'इसमें क्या देखता है ?' [श्वेत०—] 'भगवन् ! इसमें ये अणुके समान दाने हैं।' [आरुणि—] 'अच्छा वत्स ! इनमेंसे एकको फोड़।' [श्वेत०—] 'फोड़ दिया भगवन् !' [ आरुणि— ] 'इसमें क्या देखता है ?' [ श्वेत०— ] 'कुछ नहीं भगवन् !' ॥ १ ॥

अतोऽस्मान्महतो न्यग्रोधात् फलमेकमाहरेत्युक्तस्तथा चकार स इदं भगव उपहृतं फलमिति दर्शितवन्तं प्रत्याह फलं भिन्द्धीति भिन्नमित्याहेतरः । तमाह पिता किमत्र पश्यसीत्युक्त आ-इस महान् वटवृक्षसे एक फल ले आ। ऐसा कहे जानेपर उसने वैसा ही किया [ और बोला— ] 'भगवन् ! मैं यह फल ले आया' इस प्रकार फल दिखलानेवाले उससे [ आरुणिने ] कहा—'इस फलको फोड़ !' इसपर श्वेतकेतु बोला—'फोड़ दिया।' उससे पिताने कहा—'इसमें तू क्या देखता है ?' इस प्रकार कहे जानेपर श्वेतकेतु बोला—

खण्ड १२ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६७७


| हाण्व्याऽणुतरा इवेमा धाना बीजानि पश्यामि भगव इति । आसां धानानामेकां धानामङ्ग हे वत्स भिन्द्धीत्युक्त आह भिन्ना भगव इति । यदि भिन्ना धाना तस्यां भिन्नायां किं पश्यसीत्युक्त आह न किञ्चन पश्यामि भगव इति ॥ १ ॥ | ‘भगवन् ! मैं इसमें ये अणु-अणुतर अत्यन्त छोटे दाने—बीज देखता हूँ।’ [ आरुणि— ] ‘हे वत्स ! इन धानोंमेंसे तू एक धानेको फोड़।’ इस प्रकार कहे जानेपर वह बोला—‘भगवन् ! फोड़ दिया।’ [ आरुणि— ] ‘अच्छा, यदि तूने धाना फोड़ दिया तो उस फूटे हुए धानेमें तू क्या देखता है ?’ ऐसा कहे जानेपर वह बोला—‘भगवन् ! मैं कुछ नहीं देखता’ ॥१॥ |

—: ० :—

तं होवाच यं वै सोम्यैतमणिमानं न निभालयस एतस्य वै सोम्यैषोऽणिम्न एवं महान्न्यग्रोधस्तिष्ठति श्रद्धत्स्व सोम्येति ॥ २ ॥

तब उससे ( आरुणिने ) कहा—‘हे सोम्य ! इस वटबीजकी जिस अणिमाको तू नहीं देखता हे सोम्य ! उस अणिमाका ही यह इतना बड़ा वटवृक्ष खड़ा हुआ है । हे सोम्य ! तू [इस कथनमें] श्रद्धा कर’ ॥२॥

| तं पुत्रं होवाच वटधानायां भिन्नायां यं वटबीजाणिमानं हे सोम्यैतं न निभालयसे न पश्यसि । तथाप्येतस्य वै किल सोम्यैष महान्न्यग्रोधो बीजस्या- | उस पुत्रसे ( आरुणिने ) कहा— ‘हे सोम्य ! वटके दानेके टूटनेपर जिस वटबीजकी अणिमाको तू नहीं देखता, तथापि हे सोम्य ! देख, निश्चय उसी बीजकी दिखायी न देनेवाली सूक्ष्म अणिमाका कार्यभूत |

६७८ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ६

६७८ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ६


| णिम्नः सूक्ष्मस्यादृश्यमानस्य कार्यभूतः स्थूलशाखास्कन्धफलपलाशवांस्तिष्ठत्युत्पन्नः सन्नुत्तिष्ठतीति वोच्छब्दोऽध्याहार्यः । अतः श्रद्धत्स्व सोम्य सत् एवाणिम्नः स्थूलं नामरूपादिमत्कार्यं जगदुत्पन्नमिति । <br><br> यद्यपि न्यायागमाभ्यां निर्धारितोऽर्थस्तथैवेत्यवगम्यते तथाप्यत्यन्तसूक्ष्मेष्वर्थेषु बाह्यविषयासक्तमनसः स्वभावप्रवृत्तस्यासत्यां गुरुतरायां श्रद्धायां दुरवगमत्वं स्यादित्याह—श्रद्धत्स्वेति । श्रद्धायां तु सत्यां मनसः समाधानं बुभुत्सतेऽर्थे भवेत्ततश्च तदर्थावगतिः “अन्यत्रमना अभूवम्” (बृ० उ० १।५।३) इत्यादिश्रुतेः॥२॥ | यह मोटी-मोटी शाखा, स्कन्ध, फल और पत्तोंवाला महान् वटवृक्ष स्थित है—उत्पन्न होकर खड़ा हुआ है इस प्रकार यहाँ 'तिष्ठति' क्रियाके पूर्व 'उत्' शब्दका अध्याहार करना चाहिये। इसलिये हे सोम्य! विश्वास कर कि नाम-रूपादिमान् स्थूल जगत् अत्यन्त सूक्ष्म सत्‌से ही उत्पन्न हुआ है।' <br><br> यद्यपि युक्ति और शास्त्र—इन दोनोंसे निश्चित हुआ अर्थ ऐसा ही है; तथापि गुरुतर श्रद्धाके न होने-पर बाह्य विषयोंमें आसक्तचित्त स्वभावसे ही प्रवृत्तिशील पुरुषका [ ऐसे ] अत्यन्त सूक्ष्म विषयोंमें प्रवेश होना बड़ा ही कठिन है—ऐसा समझकर आरुणिने कहा—'श्रद्धा कर।' क्योंकि श्रद्धाके होने-पर ही जिज्ञासित विषयमें मनका समाधान हो सकता है और तभी उस विषयका ज्ञान होना सम्भव है; जैसा कि 'मेरा मन दूसरी ओर था [ इसलिये मैं नहीं देख सका ]' इत्यादि श्रुतिसे प्रमाणित होता है॥२॥ |


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खण्ड १२ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३७९


स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिदꣳसर्वं तत्सत्यꣳस आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो इति भूय एव मा भगवान् विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच ॥ ३ ॥

वह जो यह अणिमा है एतद्रूप ही यह सब है। वह सत्य है वह आत्मा है और हे श्वेतकेतो ! वही तू है। [ आरुणिके इस प्रकार कहनेपर श्वेतकेतु बोला— ] 'भगवन् ! मुझे फिर समझाइये ।' [ तब आरुणिने ] 'अच्छा, सोम्य !' ऐसा कहा ॥ ३ ॥

| स य इत्याद्युक्तार्थम् । यदि तत्सज्जगतो मूलं कस्मान्नोपलभ्यत इत्येतद्दृष्टान्तेन मा भगवान्भूय एव विज्ञापयत्विति । तथा सोम्येति होवाच पिता ॥ ३ ॥ | 'स यः' इत्यादि श्रुतिका अर्थ पहले कहा जा चुका है। 'यदि वह सत् जगत्का कारण है तो उपलब्ध क्यों नहीं होता ? हे भगवन् ! इस बातको आप दृष्टान्तद्वारा मुझे फिर समझाइये' ऐसा [श्वेतकेतुने कहा] । तब पिताने 'सोम्य ! अच्छा' ऐसा उत्तर दिया ॥ ३ ॥ |

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इतिच्छान्दोग्योपनिषदि षष्ठाध्याये द्वादशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १२ ॥

त्रयोदश खण्ड

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लवणके दृष्टान्तद्वारा उपदेश

विद्यमानमपि वस्तु नोपलभ्यते प्रकारान्तरेण तूपलभ्यत इति शृण्वत्र दृष्टान्तम् । यदि चेममर्थं प्रत्यक्षीकर्तुमिच्छसि—विद्यमान होनेपर भी [ कोई-कोई ] वस्तु उपलब्ध नहीं होती । हाँ, प्रकारान्तरसे उसकी उपलब्धि हो सकती है । इस विषयमें दृष्टान्त श्रवण कर, यदि तू इस बातको प्रत्यक्ष करना चाहता हो तो—

लवणमेतदुदकेऽवधायाथ मा प्रातरुपसीदथा इति सह तथा चकार तँहोवाच यद्दोषा लवणमुदकेऽवाधा अङ्ग तदाहरेति तद्धावमृश्य न विवेद ॥ १ ॥

इस नमकको जलमें डालकर कल प्रातःकाल मेरे पास आना । आरुणिके इस प्रकार कहनेपर श्वेतकेतुने वैसा ही किया । तब आरुणिने उससे कहा—'वत्स ! रात तुमने जो नमक जलमें डाला था उसे ले आओ।' किंतु उसने ढूँढ़नेपर उसे उसमें न पाया ॥ १ ॥

पिण्डरूपं लवणमेतद्घटादावुदकेऽवधाय प्रक्षिप्याथ मा मां श्वः प्रातरुपसीदथा उपगच्छेथा इति । स ह पित्रोक्तमर्थं प्रत्यक्षीकर्तुमिच्छंस्तथा चकार । तं होवाच परेद्युः प्रातर्यल्लवणं दोषा रात्रावुदकेऽवाधा निक्षिप्तवानस्यङ्ग हे वत्स तदाहरेत्युक्तस्त-इस पिण्डरूप नमकको घड़े आदिमें जलमें डालकर कल प्रातःकाल मेरे पास आना । श्वेतकेतुने पिताकी कही हुई बातको प्रत्यक्ष करनेकी इच्छासे वैसा ही किया । दूसरे दिन सबेरे ही आरुणिने उससे कहा—'हे वत्स ! रात तुमने जो नमक पानीमें डाला था उसे ले आओ।' इस प्रकार कहे जानेपर
खण्ड १३ ]शाङ्करभाष्यार्थं६८१

| ल्लवणमाजिहीर्षुर्ह किलावमृश्यो-<br>दके न विवेद न विज्ञातवान्; यथा<br>तल्लवणं विद्यमानमेव सदप्सु<br>लीनं संश्लिष्टमभूत् ॥ १ ॥ | उसने उस नमकको ले आनेकी इच्छा-<br>से जलमें टटोला, किंतु उसे न पाया,<br>क्योंकि वह नमक वहाँ मौजूद होने-<br>पर भी जलमें लीन हो गया था<br>अर्थात् जलमें ही मिल गया था ॥ १ ॥ |

<div align="center">—:००:—</div>

यथा विलीनमेवाङ्गास्यान्तादाचामेति कथमिति लवणमिति मध्यादाचामेति कथमिति लवणमित्यन्तादाचामेति कथमिति लवणमित्यभिप्रायैतदथ मोपसीदथा इति तद्ध तथा चकार तच्छश्वत्संवर्तते तꣳहोवाचात्र वाव किल सत्सोम्य न निभालयसेऽत्रैव किलेति ॥ २ ॥

[ आरुणि—] ‘जिस प्रकार वह नमक इसीमें विलीन हो गया है [ इसलिये तू उसे नेत्रसे नहीं देख सकता, उसे यदि जानना चाहता है तो ] इस जलको ऊपरसे आचमन कर।’ [ उसके आचमन करनेपर आरुणिने पूछा— ] ‘कैसा है ?’ [ श्वेत०— ] ‘नमकीन है।’ [ आरुणि— ] ‘बीचमेंसे आचमन कर’ ‘अब कैसा है ?’ [ श्वेत०— ] ‘नमकीन है।’ [ आरुणि— ] ‘नीचेसे आचमन कर’ ‘अब कैसा है ?’ [ श्वेत०— ] ‘नमकीन है।’ [ आरुणि— ] ‘अच्छा, अब इस जलको फेंककर मेरे पास आ।’ उसने वैसा ही किया, [ और बोला— ] ‘उस जलमें नमक सदा ही विद्यमान था।’ तब उससे पिताने कहा—‘हे सोम्य ! [ इसी प्रकार ] वह सत् भी निश्चय यहीं विद्यमान है, तू उसे देखता नहीं है; परंतु वह निश्चय यहीं विद्यमान है’ ॥ २ ॥

| यथा विलीनं लवणं न वेत्थ तथापि तच्चक्षुषा स्पर्शनेन च पिण्डरूपं लवणमगृह्यमाणं विद्यत | जिस प्रकार वह नमक विलीन हो गया है इसलिये तू उसे नहीं जान सकता । तथापि वह पिण्डरूप लवण दिखायी न देनेपर भी है जलमें ही, |

३८२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६

३८२छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ६
संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
एवाप्सु, उपलभ्यते चोपायान्तरेण—इत्येतत्पुत्रं प्रत्याययितुमिच्छन्नाहाङ्गास्योदकस्यान्तादुपरि गृहीत्वाचामेत्युक्त्वा पुत्रं तथा कृतवन्तमुवाच—कथमिति; इतर आह लवणं स्वादत इति । तथा मध्यादुदकस्य गृहीत्वाचामेति, कथमिति, लवणमिति । तथान्तादधोदेशाद्गृहीत्वाचामेति, कथमिति, लवणमिति । <br><br> यद्येवम्, अभिप्रास्य परित्यज्यैतदुदकमाचम्याथ मोपसीदथा इति । तद्ध तथा चकार । लवणं परित्यज्य पितृसमीपमाजगामेत्यर्थः, इदं वचनं ब्रुवन्—तल्लवणं तस्मिन्नेवोदकेयन्मया रात्रौ क्षिप्तं शश्वन्नित्यं संवर्तते विद्यमानमेव सत्सम्यग्वर्तते । <br><br> इत्येवमुक्तवन्तं तं होवाचऔर एक दूसरे उपायसे उसकी उपलब्धि भी हो सकती है—इस बातकी पुत्रको प्रतीति करानेकी इच्छासे आरुणिने कहा—'हे वत्स ! इस जलके अन्त—ऊपरी भागसे लेकर आचमन कर।' ऐसा कहकर पुत्रके उसी प्रकार करनेपर वह बोला—'कैसा है ?' [ पुत्र— ] 'स्वादमें नमकीन है।' [ पिता-- 'और जलके मध्यभागसे भी लेकर आचमन कर' 'कैसा है ?' [पुत्र-] 'नमकीन है।' [पिता--] 'अच्छा, अन्त—नीचेके भागसे भी लेकर आचमन कर कैसा है ?' [ पुत्र-- ] 'नमकीन है।' <br><br> [ पिता--] 'यदि ऐसा है तो इस जलको फेंककर आचमन करनेके अनन्तर मेरे पास आ।' उसने वैसा ही किया, अर्थात् उस नमकीन जलको फेंककर वह इस प्रकार कहता हुआ पिताके पास आया कि रात मैंने जो नमक उस जलमें डाला था वह उसमें शश्वत्—नित्य वर्तमान है अर्थात् उसमें विद्यमान हुआ ही सम्यक्प्रकारसे वर्तमान है। <br><br> इस प्रकार कहते हुए उस पुत्रसे

खण्ड १३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६८३


शाङ्करभाष्यभाष्यार्थ
पिता--यथेदं लवणं दर्शनस्पर्शनाभ्यां पूर्वं गृहीतं पुनरुदके विलीनं ताभ्यामगृह्यमाणमपि विद्यत एवोपायान्तरेण जिह्वयोपलभ्यमानत्वात् । एवमेवात्रैवास्मिन्नेव तेजोऽबन्नादिकार्ये शुङ्गे देहे, वाव किलेत्याचार्योपदेशस्मरणप्रदर्शनार्थौ, सत्तेजोऽबन्नादिशुङ्गकारणं वटबीजाणिमवद्विद्यमानमेवेन्द्रियैर्नोपलभसे न निभालयसे यथात्रैवोदके दर्शनस्पर्शनाभ्यामनुपलभ्यमानं लवणं विद्यमानमेव जिह्वयोपलब्धवानसि, एवमेवात्रैव किल विद्यमानं सज्जगन्मूलमुपायान्तरेण लवणाणिमवदुपलप्स्यस इति वाक्यशेषः ॥ २ ॥पिताने कहा--'जिस प्रकार यह नमक पहले दर्शन और स्पर्शनसे गृहीत होता हुआ भी फिर जलमें विलीन होनेपर उनसे गृहीत न होनेपर भी उसमें विद्यमान है ही, क्योंकि उपायान्तरसे अर्थात् जिह्वाद्वारा उसकी उपलब्धि होती है; इसी प्रकार यहाँ—तेज, अप् और अन्नके कार्यभूत इस शरीररूप शुङ्गमें—यहाँ 'वाव' और 'किल' ये दो निपात आचार्योपदेशका स्मरण प्रदर्शित करनेके लिये हैं— तेज, जल और अन्नादि शुङ्गके कारणभूत सत्‌को तू वटबीजकी अणिमाके समान विद्यमान रहते हुए भी इन्द्रियोंसे उपलब्ध नहीं करता—तुझे वह दिखायी नहीं देता। जिस प्रकार कि यहाँ जलमें दर्शन और स्पर्शनसे उपलब्ध न होनेवाले विद्यमान नमकको तूने जिह्वासे उपलब्ध किया है उसी प्रकार निश्चय यहीं विद्यमान जगत्‌के मूलभूत सत्‌को तू लवणकी अणिमाके समान अन्य उपायसे उपलब्ध कर सकता है—यह वाक्यशेष है ॥ २ ॥

३८४ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ६

३८४ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ६


स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिदँ सर्वं तत्सत्यँस आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो इति भूय एव मा भगवान्‌विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच ॥ ३ ॥

वह जो यह अणिमा है एतद्रूप ही यह सब है। वह सत्य है, वह आत्मा है और हे श्वेतकेतो ! वही तू है। [ आरुणिके इस प्रकार कहनेपर श्वेतकेतु बोला— ] 'भगवन् ! मुझे फिर समझाइये।' [ तब आरुणिने ] 'अच्छा, सोम्य !' ऐसा कहा ॥ ३ ॥

| स य इत्यादि समानम्। यद्येवं लवणाणिमवदिन्द्रियैरनुपलभ्यमानमपि जगन्मूलं सदुपायान्तरेणोपलब्धुं शक्यते यदुपलम्भात्कृतार्थः स्यामनुपलम्भाच्चाकृतार्थः स्यामहम्, तस्यैवोपलब्धौ क उपाय इत्येतद्भूय एव मा भगवान्विज्ञापयतु दृष्टान्तेन तथा सोम्येति होवाच ॥ ३ ॥ | 'स यः' इत्यादि श्रुतिका अर्थ पूर्ववत् है। 'यदि इस प्रकार लवणकी अणिमाके समान इन्द्रियोंसे उपलब्ध होनेवाला न होनेपर भी वह जगत्का मूलभूत सत् किसी दूसरे उपायसे उपलब्ध हो सकता है, जिसकी उपलब्धिसे कि मैं कृतार्थ हो सकता हूँ और जिसे उपलब्ध न करनेसे अकृतार्थ ही रहूँगा, तो उसकी उपलब्धिके लिये क्या उपाय है—इस बातको हे भगवन् ! आप दृष्टान्तद्वारा मुझे फिर भी समझाइये।' [ तब आरुणिने ] 'सोम्य ! अच्छा' ऐसा कहा ॥३॥ |


इतिच्छान्दोग्योपनिषदि षष्ठाध्याये त्रयोदशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १३ ॥

चतुर्दश खण्ड

—: ० :—

अन्यत्रसे लाये हुए पुरुषके दृष्टान्तद्वारा उपदेश

यथा सोम्य पुरुषं गन्धारेभ्योऽभिनद्धाक्षानीय तं ततोऽतिजने विसृजेत्स यथा तत्र प्राङ् वोदङ् वाधराङ् वा प्रत्यङ् वा प्रध्मायीताभिनद्धाक्ष आनीतोऽभिनद्धाक्षो विसृष्टः ॥ १ ॥

हे सोम्य ! जिस प्रकार [ कोई चोर ] जिसकी आँखें बँधी हुई हों ऐसे किसी पुरुषको गान्धार देशसे लाकर जनशून्य स्थानमें छोड़ दे । उस जगह जिस प्रकार वह पूर्व, उत्तर, दक्षिण अथवा पश्चिमकी ओर मुख करके चिल्लावे कि 'मुझे आँखें बाँधकर यहाँ लाया गया है और आँखें बँधे हुए ही छोड़ दिया गया है' ॥ १ ॥

| यथा लोके हे सोम्य पुरुषं यं कश्चिद्गन्धारेभ्यो जनपदेभ्योऽभिनद्धाक्षं बद्धचक्षुषमानीय द्रव्यहर्ता तस्करस्तमभिनद्धाक्षमेव बद्धहस्तमरण्ये ततोऽप्यतिजनेऽतिगतजनेऽत्यन्तविगतजने देशे विसृजेत्स तत्र दिग्भ्रमोपेतो यथा प्राङ्वा प्राग्गमनः प्राङ्मुखो वेत्यर्थः । तथोदङ्वाधराङ्वा प्रत्यङ्वा प्रध्मायीत शब्दं कुर्या- | हे सोम्य ! लोकमें जिस प्रकार कोई द्रव्य हरण करनेवाला चोर किसी पुरुषको जो अभिनद्धाक्ष हो अर्थात् जिसकी आँखें बाँध दी गयी हों, गान्धार देशसे लाकर वनमें और उसमें भी जो अतिजन—अतिगतजन अर्थात् अत्यन्त जन-शून्य हो ऐसे देशमें आँखें और हाथ बँधे हुए ही छोड़ दे तो उस जगह वह दिग्भ्रमसे युक्त हुआ 'प्राङ् वा'—पूर्वकी ओर जाता हुआ अर्थात् पूर्वाभिमुख हुआ तथा उत्तर, दक्षिण अथवा पश्चिमकी ओर मुख |

६८६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६

६८६छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ६

| द्विक्रोशेत्, अभिनद्धाक्षोऽहं गन्धारेभ्यस्तस्करेणानीतोऽभिनद्धाक्ष एव विसृष्ट इति ॥ १ ॥ | करके इस प्रकार शब्द कहे अर्थात् चिल्लावे कि मुझे गान्धार देशसे आँखें बाँधकर यहाँ चोर ले आया है और आँखें बँधे हुए ही छोड़ दिया है' ॥ १ ॥ |

-: ० :-

एवं विक्रोशतः—इस प्रकार चिल्लानेवाले—

तस्य यथाभिनहनं प्रमुच्य प्रब्रूयादेतां दिशं गन्धारा एतां दिशं व्रजेति स ग्रामाद्ग्रामं पृच्छन्पण्डितो मेधावी गन्धारानेवोपसम्पद्येतैवमेवेहाचार्यवान्पुरुषो वेद तस्य तावदेव चिरं यावन्न विमोक्ष्येऽथ सम्पत्स्य इति ॥ २ ॥

उस पुरुषके बन्धनको खोलकर जैसे कोई कहे कि 'गान्धार देश इस दिशामें है, अतः इसी दिशाको जा,' तो वह बुद्धिमान् और समझदार पुरुष एक ग्रामसे दूसरा ग्राम पूछता हुआ गान्धारमें ही पहुँच जाता है, इसी प्रकार इस लोकमें आचार्यवान् पुरुष ही [सत्‌को] जानता है; उसके लिये [ मोक्ष होनेमें ] उतना ही विलम्ब है जबतक कि वह [ देहबन्धनसे ] मुक्त नहीं होता । उसके पश्चात् तो वह सत्सम्पन्न (ब्रह्मको प्राप्त ) हो जाता है ॥ २ ॥

| तस्य यथाभिनहनं यथा बन्धनं प्रमुच्य मुक्त्वा कारुणिकः कश्चिदेतां दिशमुत्तरतो गन्धारा | उस पुरुषके अभिनहन—बन्धनको खोलकर जिस प्रकार कोई कृपालु पुरुष कहे कि इस दिशामें उत्तरकी ओर गान्धार | | एतां दिशं व्रजेति प्रब्रूयात्स एवं कारुणिकेन बन्धनान्मोक्षितो | देश है; अतः इस दिशाकी ओर जा तो इस प्रकार उस कृपालु | | ग्रामाद्ग्रामान्तरं पृच्छन्पण्डित | पुरुषद्वारा बन्धनसे छुड़ाया हुआ |

खण्ड १४ ]शाङ्करभाष्यार्थ६८७

| उपदेशवान्मेधावी परोपदिष्टग्रामप्रवेश मार्गाविधारणसमर्थः सन्गन्धारानेवोपसम्पद्येत, नेतरो मूढमतिर्देशान्तरदर्शनतृड्वा । | वह पण्डित—उपदेशवान् और मेधावी—दूसरोंके बतलाये हुए ग्राममें प्रवेश करनेके मार्गको ठीक-ठीक समझनेमें समर्थ पुरुष एक गाँवसे दूसरे गाँवको पूछता हुआ गान्धार देशमें ही पहुँच जाता है—दूसरा मूढमति अथवा देशान्तर देखनेको तृष्णावाला नहीं पहुँच पाता । | | यथायं दृष्टान्तो वर्णितः, स्वविषयेभ्यो गन्धारेभ्यः पुरुषस्तस्करैरभिनद्धाक्षोऽविवेको दिङ्मूढोऽशनायापिपासादिमान्व्याघ्रतस्कराद्यनेकभयानर्थव्रातयुतमरण्यं प्रवेशितो दुःखार्तो विक्रोशन्बन्धनेभ्यो मुमुक्षुस्तिष्ठति स कथञ्चिदेव कारुणिकेन केनचिन्मोक्षितः स्वदेशान्गन्धारानेवापन्नो निर्वृतः सुखीभूत्— | जिस प्रकार यह दृष्टान्त वर्णन किया गया है अर्थात् अपने देश गान्धारसे चोरोंद्वारा आँखें बाँधकर लाया जानेके कारण विवेकशून्य दिङ्मूढ तथा भूख-प्याससे युक्त होकर व्याघ्र-तस्कर आदि अनेकों भय और अनर्थसमूहसे सम्पन्न वनमें प्रवेशित किया हुआ पुरुष दुःखार्त होकर चिल्लाता हुआ बन्धनोंसे मुक्त होनेके लिये उत्सुक था और वह किसी कृपालुद्वारा उन बन्धनोंसे छुड़ा दिये जानेपर किसी प्रकार अपने देश गान्धारमें पहुँचकर ही कृतार्थ यानी सुखी हुआ । | | एवमेव सतो जगदात्मस्वरूपात्तेजोऽबन्नादिमयं देहारण्यं वातपित्तकफरुधिरमेदोमांसास्थि- | ठीक इसी प्रकार संसारके आत्मस्वरूप सत्से तेज, जल और अन्नादिमय देहरूप वनमें जो कि वात, पित्त, कफ, रुधिर, मेद, मांस, अस्थि, मज्जा, शुक्र, कृमि |