भारतकोश
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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

खण्ड १२ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १८९


| अभिमन्थति स हिंकारः प्राथम्यात् । अग्नेर्धूमो जायते स प्रस्ताव आनन्तर्यात् । ज्वलति स उद्गीथो हविःसंबन्धाच्छ्रैष्ठ्यं ज्वलनस्य । अङ्गारा भवन्ति स प्रतिहारोऽङ्गाराणां प्रतिहृतत्वात् । उपशमः सावशेषत्वाग्नेः संशमो निःशेषोपशमः समाप्तिसामान्यान्निधनम् । एतद्रथन्तरमग्नौ प्रोतम्; मन्थने ह्यग्नेर्गीयते ॥ १ ॥ | [ अग्निका ] अभिमन्थन करता है—यह सर्वप्रथम होनेके कारण हिंकार है । अग्निसे जो धुआँ उत्पन्न होता है वह इसका पश्चाद्वर्ती होनेके कारण प्रस्ताव है । अग्नि जलता है—यह उद्गीथ है; हविका सम्बन्ध होनेके कारण अग्निके प्रज्वलित होनेकी श्रेष्ठता है । अङ्गार होते हैं—यह प्रतिहार है, क्योंकि अङ्गारोंका प्रतिहरण किया जाता है। अग्निके बुझनेमें कसर रह जानेके कारण उपशम और उसका सर्वथा शान्त हो जाना संशम रूप निधन हैं, क्योंकि उसके साथ समाप्तिमें इनकी समानता है। यह रथन्तरसाम अग्निमें अनुस्यूत है तथा यह अग्नि-मन्थनकालमें गाया जाता है ॥ १ ॥ |

स य एवमेतद्रथन्तरमग्नौ प्रोतं वेद ब्रह्मवर्चस्यन्नादो भवति सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति महान्प्रजया पशुभिर्भवति महान्कीर्त्या न प्रत्यङ्ङग्निमाचामेन्न निष्ठीवेत्तद्व्रतम्॥२॥

वह, जो पुरुष इस प्रकार इस रथन्तरसामको अग्निमें अनुस्यूत जानता है वह ब्रह्मतेजःसम्पन्न और अन्नका भोक्ता होता है, पूर्ण जीवनका उपभोग करता है, उज्ज्वल जीवन व्यतीत करता है, प्रजा और पशुओंके कारण महान् होता है तथा कीर्तिके कारण महान् होता है । अग्निकी ओर मुख करके भक्षण न करे और न थूके ही—यह व्रत है ॥ २ ॥

| स य इत्यादि पूर्ववत् । ब्रह्मवर्चसी वृत्तस्वाध्यायनिमित्तं | 'स यः' इत्यादि मन्त्रका अर्थ पूर्ववत् समझना चाहिये । ब्रह्मवर्चसी—सदाचार और स्वाध्यायके |

१९० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय २

१९०छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय २

| तेजो ब्रह्मवर्चसम्, तेजस्तु केवलं त्विड्भावः । अन्नादो दीप्ताग्निः । न प्रत्यङ्ङग्नेरभिमुखो नाचामेन भक्षयेत्किञ्चिन्न निष्ठीवेच्च श्लेष्मनिरसनं च न कुर्यात्तद्व्रतम् ॥ २ ॥ | निमित्तसे प्राप्त हुआ तेज 'ब्रह्मवर्चस्' कहलाता है, केवल तेज तो त्विङ्-भाव ( कान्ति ) का नाम है। 'अन्नाद' का अर्थ दीप्ताग्नि है। अग्निकी ओर मुख करके आचमन यानो कुछ भी भक्षण न करे और न निष्ठीवन—श्लेष्मा ( कफ ) का ही त्याग करे—यह व्रत है ॥ २ ॥ |

—: ० :— इतिच्छान्दोग्योपनिषदि द्वितीयाध्याये द्वादशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १२ ॥ —: ० :—

त्रयोदश खण्ड

वामदेव्यसामकी उपासना

उपमन्त्रयते स हिंकारो ज्ञपयते स प्रस्तावः स्त्रिया सह शेते स उद्गीथः प्रति स्त्रीं सह शेते स प्रतिहारः कालं गच्छति तन्निधनं पारं गच्छति तन्निधनमे तद्वामदेव्यं मिथुने प्रोतम् १

पुरुष जो संकेत करता है, वह हिंकार है; जो तोष देता (प्रसन्न करनेके लिये मीठी बातें कहता) है, वह प्रस्ताव है; स्त्रीके साथ जो सोता है वह उद्गीथ है; अपनी अनेक पत्नियोंमेंसे प्रत्येकके साथ जो शयन (अनुकूल बर्ताव) करता है, वह प्रतिहार है; मिथुनद्वारा जो समय बिताता है, वह निधन है; मैथुन आदि क्रियाकी जो समाप्ति करता है, वह भी निधन ही है, यह वामदेव्य साम मिथुनमें ओत-प्रोत है ॥ १ ॥

| उपमन्त्रयते संकेतं करोति प्राथम्यात्स हिंकारः। ज्ञपयते तोषयति स प्रस्तावः। सहशयनमेकपर्‍यङ्कगमनं स उद्गीथः श्रैष्ठ्यात्। प्रतिस्त्रीं | पुरुष जो उपमन्त्रण—संकेत करता है, वह प्रथम होनेसे हिंकार है। जो ज्ञापन करता—मीठी बातें कह-कर तोष देता है, वह प्रस्ताव है। स्त्री-पुरुषका जो साथ सोना—एक शय्यापर जाना है, वह उद्गीथ है, क्योंकि उत्तम |

खण्ड १३ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १९१


| शयनं स्त्रियोऽभिमुखीभावः स प्रतिहारः। कालं गच्छति मैथुनेन पारं समाप्तिं गच्छति तन्निधनम् । एतद्वामदेव्यं मिथुने प्रोतम्, वाय्वम्बुमिथुनसम्बन्धात् ॥१॥ | सन्तानकी प्राप्तिका हेतु होनेके कारण) वह उत्कृष्ट है। अपनी अनेक पत्नियोंमेंसे प्रत्येकके साथ जो शयन करना—सम्मुख या अनुकूल होना है, वह प्रतिहार है। पुरुष मिथुनद्वारा जो समय बिताता है तथा मैथुनक्रियाकी जो समाप्ति करता है, वह निधन है। यह वामदेव्य साम मिथुनमें ओतप्रोत है; क्योंकि वायु और जलके मिथुन (जोड़े) से इसका सम्बन्ध है ॥ १ ॥ |


स य एवमेतद्वामदेव्यं मिथुने प्रोतं वेद मिथुनी भवति मिथुनान्मिथुनात्प्रजायते सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति महान्प्रजया पशुभिर्भवति महान्कीर्त्या न काञ्चन परिहरेत्तद्व्रतम् ॥ २ ॥

जो पुरुष इस प्रकार इस वामदेव्य सामको मिथुनमें ओतप्रोत जानता है, वह मिथुनवान् (दाम्पत्य-सुखसे सम्पन्न) होता है, प्रत्येक मैथुनसे संतानको जन्म देता है। सारी आयुका उपभोग करता है, उज्ज्वल जीवन बिताता है। प्रजा और पशुओंके कारण महान् होता है तथा कीर्तिके कारण भी महान् होता है। जिस उपासकके अनेक पत्नियाँ हों वह उनमेंसे किसीका भी परित्याग न करे, यह (वामदेव्योपासकका) व्रत है ॥ २ ॥

| स य इत्यादि पूर्ववत्। मिथुनी भवत्यविधुरो भवतीत्यर्थः। मिथुनान्मिथुनात्प्रजायत इत्यमोघरेतस्त्वमुच्यते। न काञ्चन काञ्चिदपि स्त्रियंस्वात्मन्नन्यप्राप्तां न परिहरेत्स- | 'स यः' इत्यादि मन्त्रभागका अर्थ पूर्ववत् है। मिथुनवान् होता है अर्थात् कभी विधुर (पत्नीके संयोग-सुखसे वञ्चित) नहीं होता है। मिथुन-मिथुनसे संतानको जन्म देता है, इस कथनके द्वारा उसकी अमोघवीर्यता बतायी जाती है। अपनी बहुत-सी स्त्रियोंमेंसे जो कोई जब कभी समागमकी इच्छा लेकर अपनी शय्यापर आ जाय, उसका परित्याग न |

१९२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय २

१९२छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय २

| मागमागमिनीम्, वामदेव्यसामोपासनाङ्गत्वेन विधानात्। एतस्मादन्यत्रप्रतिषेधस्मृतयः। वचनप्रामाण्याच्च धर्माविगतेर्न प्रतिषेधशास्त्रेणास्य विरोधः ॥ २ ॥ | करे; क्योंकि वामदेव्य सामोपासनाके अङ्गरूपसे इसका विधान किया गया है। स्मृतियोंके निषेध-वचन इस वामदेव्योपासनासे अन्यत्र ही लागू होते हैं। श्रुतिके वचनोंके प्रमाणसे ही धर्मका निश्चय होता है, अतः निषेधशास्त्रके साथ इस विधिका विरोध नहीं है ॥ २ ॥ |

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इतिच्छान्दोग्योपनिषदि द्वितीयाध्याये त्रयोदशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १३ ॥
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चतुर्दश खण्ड

बृहत्सामकी उपासना

उद्यन्हिङ्कार उदितः प्रस्तावो मध्यन्दिन उद्गीथोऽपराह्नः प्रतिहारोऽस्तंयन्निधनमेतद्बृहदादित्येप्रोतम् ॥ १ ॥

उदित होता हुआ सूर्य हिंकार है, उदित हुआ प्रस्ताव है, मध्याह्नकालिक सूर्य उद्गीथ है, मध्याह्नोत्तरकालिक प्रतिहार है और जो अस्तमित होनेवाला सूर्य है, वह निधन है । यह बृहत्साम सूर्यमें स्थित है ॥ १ ॥

उद्यन्सविता स हिंकारः। प्राथम्याद्दर्शनस्य । उदितः प्रस्तावः प्रस्तवनहेतुत्वात्कर्मणाम् । मध्यन्दिन उद्गीथः श्रेष्ठत्वात् । अपराह्नः प्रतिहारः पश्वादीनां गृहान् प्रति हरणात् । यदस्तं यंस्तन्निधनं रात्रौ गृहे निधानात् प्राणिनाम् । एतद्बृहदादित्ये प्रोतं बृहत आदित्यदैवत्यत्वात् ॥ १ ॥उदित होता हुआ जो सूर्य है वह हिंकार है, क्योंकि उसका दर्शन सबसे पहले होता है । उदित हुआ सूर्य कर्मोंके प्रस्तवनका हेतु होनेके कारण प्रस्ताव है । मध्याह्नकालीन सूर्य उत्कृष्ट होनेके कारण उद्गीथ है । पशु आदिको घरोंकी ओर ले जानेके कारण अपराह्न सूर्य प्रतिहार है । तथा जो अस्तको प्राप्त होनेवाला सूर्य है वह रातमें सम्पूर्ण प्राणियोंको अपने घरोंमें निहित करनेवाला होनेसे निधन है । यह बृहत्साम सूर्यमें स्थित है, क्योंकि बृहत्का सूर्य ही देवता है ॥ १ ॥

खण्ड १४ ] शाङ्करभाष्यं १९३


स य एवमेतद्बृहदादित्ये प्रोतं वेद तेजस्व्यन्नादो भवति सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति महान्प्रजया पशुभिर्भवति महान्कीर्त्या तपन्तं न निन्देत्तद्व्रतम् ॥ २ ॥

वह पुरुष, जो इस प्रकार इस बृहत्सामको सूर्यमें स्थित जानता है, तेजस्वी और अन्नका भोग करनेवाला होता है । वह पूर्ण आयुको प्राप्त होता है, उज्ज्वल जीवन व्यतीत करता है, प्रजा और पशुओंके कारण महान् होता है तथा कीर्तिके कारण भी महान् होता है । तपते हुए सूर्यकी निन्दा न करे—यह नियम है ॥ २ ॥

| स य इत्यादि पूर्ववत्। तपन्तं <br><br> न निन्देत्तद्व्रतम् ॥ २ ॥ | ‘स यः’ इत्यादि श्रुतिका अर्थ पूर्ववत् है । तपते हुए सूर्यकी निन्दा न करे—यह [ बृहत्सामोपासकके लिये ] नियम है ॥ २ ॥ |


इतिच्छान्दोग्योपनिषदि द्वितीयाध्याये
चतुर्दशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १४ ॥

पञ्चदश खण्ड


वैरूपसामकी उपासना

अभ्राणि संप्लवन्ते स हिंकारो मेघो जायते स प्रस्तावो वर्षति स उद्गीथो विद्योतते स्तनयति स प्रतिहार उद्गृह्णाति तन्निधनमेतद्वैरूपं पर्जन्ये प्रोतम् ॥ १ ॥

बादल एकत्रित होते हैं—यह हिंकार है। मेघ उत्पन्न होता है—यह प्रस्ताव है। जल बरसता है—यह उद्गीथ है। बिजली चमकती और कड़कती है—यह प्रतिहार है तथा वृष्टिका उपसंहार होता है—यह निधन है। यह वैरूप साम मेघमें ओतप्रोत है ॥ १ ॥

| अभ्राण्यब्भरणान्मेघ उदकसेक्तृत्वात् । उक्तार्थमन्यत् ।<br><br>एतद्वैरूपं साम पर्जन्ये प्रोतम् ।<br><br>अनेकरूपत्वादभ्रादिभिः पर्जन्यस्य वैरूप्यम् ॥ १ ॥ | जलधारण करनेके कारण बादलोंका नाम 'अभ्र' है तथा जलसेचन करनेवाले होनेसे वे 'मेघ' कहलाते हैं। शेष सबका अर्थ पहले [खण्ड ३ मन्त्र १ में] कहा जा चुका है। यह 'वैरूप' नामक साम मेघमें अनुस्यूत है। अभ्रादिरूपसे अनेकरूप होनेके कारण पर्जन्यकी विविधरूपता है ॥ १ ॥ |

खण्ड १५ ]शाङ्करभाष्यार्थ१९५

स य एवमेतद्वैरूपं पर्जन्ये प्रोतं वेद विरूपाँश्च सुरूपाँश्च पशूनवरुन्धे सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति महान् प्रजया पशुभिर्भवति महान्कीर्त्या वर्षन्तं न निन्देत्तद्व्रतम् ॥ २ ॥

वह पुरुष, जो इस प्रकार इस वैरूप सामको पर्जन्यमें अनुस्यूत जानता है वह विरूप और सुरूप पशुओंका अवरोध करता है, पूर्ण आयुको प्राप्त होता है, उज्ज्वल जीवन व्यतीत करता है, प्रजा और पशुओंके कारण महान् होता है तथा कीर्तिके कारण महान् होता है। बरसते हुए मेघकी निन्दा न करे—यह व्रत है ॥ २ ॥

| विरूपांश्च सुरूपांश्चाजाविप्रभृतीन् पशूनवरुन्धे प्राप्नोतीत्यर्थः। वर्षन्तं न निन्देत्तद्व्रतम् ॥ २ ॥ | वह बकरी और भेड़ आदि विरूप एवं सुरूप पशुओंका अवरोध करता है, अर्थात् उन्हें प्राप्त करता है। बरसते हुए मेघकी निन्दा न करे—यह [ वैरूपसामोपासकके लिये ] नियम है ॥ २ ॥ |

इतिच्छान्दोग्योपनिषदि द्वितीयाध्याये
पञ्चदशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १५ ॥

छा० उ० ७—

षोडश खण्ड

वैराजसामकी उपासना

वसन्तो हिंकारो ग्रीष्मः प्रस्तावो वर्षा उद्गीथः शरत्प्रतिहारो हेमन्तो निधनमेतद्वैराजमृतुषु प्रोतम् ॥ १ ॥

वसन्त हिंकार है, ग्रीष्म प्रस्ताव है, वर्षा उद्गीथ है, शरद् ऋतु प्रतिहार है, हेमन्त निधन है—यह वैराज साम ऋतुओंमें अनुस्यूत है ॥ १ ॥

| वसन्तो हिंकारः प्राथम्यात् । ग्रीष्मः प्रस्ताव इत्यादि पूर्ववत् ॥ १ ॥ | सर्वप्रथम होनेके कारण वसन्त हिंकार है, ग्रीष्म प्रस्ताव है इत्यादि अर्थ पूर्ववत् समझना चाहिये ॥ १ ॥ |


स य एवमेतद्वैराजमृतुषु प्रोतं वेद विराजति प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेन सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति महान्प्रजया पशुभिर्भवति महान्कीर्त्यार्तून्न निन्देत्तद्व्रतम् ॥ २ ॥

वह पुरुष, जो इस प्रकार इस वैराज सामको ऋतुओंमें अनुस्यूत जानता है, प्रजा पशु और ब्रह्मतेजके कारण शोभित होता है, वह

खण्ड १६ ] शाङ्करभाष्यार्थ १९७


पूर्ण आयुको प्राप्त होता है, उज्ज्वल जीवन व्यतीत करता है, प्रजा और पशुओंके कारण महान् होता है तथा कीर्तिके कारण भी महान् होता है। ऋतुओंकी निन्दा न करे—यह व्रत है॥ २ ॥

| एतद्वैराजमृतुषु प्रोतं वेद ।<br><br>विराजति ऋतुवद्यथर्तव आर्त-<br><br>वैर्धर्मैर्विराजन्त एवं प्रजादिभि-<br><br>र्विद्वानित्युक्तमन्यत् । ऋतून<br><br>निन्देत्तद्व्रतम् ॥ २ ॥ | इस वैराज सामको जो ऋतुओंमें अनुस्यूत जानता है वह ऋतुओंके समान विराजता है। जिस प्रकार ऋतुएँ ऋतुसम्बन्धी धर्मोंके कारण शोभाको प्राप्त होती हैं उसी प्रकार विद्वान् प्रजा आदिके कारण सुशोभित होता है । और सब अर्थ कहा जा चुका है। ऋतुओंकी निन्दा न करे—यह [ वैराजसामोपासकके लिये ] नियम है ॥ २ ॥ |

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इतिच्छान्दोग्योपनिषदि द्वितीयाध्याये षोडशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १६ ॥

सप्तदश खण्ड

शकरीसामकी उपासना

पृथिवी हिंकारोऽन्तरिक्षं प्रस्तावो द्यौरुद्गीथो दिशः प्रतिहारः समुद्रो निधनमेताः शक्वर्यो लोकेषु प्रोताः॥ १॥

पृथिवी हिंकार है, अन्तरिक्ष प्रस्ताव है, द्युलोक उद्गीथ है, दिशाएँ प्रतिहार हैं और समुद्र निधन है—यह शकरीसाम लोकोंमें अनुस्यूत है॥ १॥

| पृथिवी हिंकार इत्यादि पूर्ववत्। शक्वर्य इति नित्यं बहुवचनम्, रेवत्य इव। लोकेषु प्रोताः ॥ १ ॥ | 'पृथिवी हिंकारः' इत्यादि श्रुतिका अर्थ पूर्ववत् है। 'रेवत्यः' इस पदके समान 'शक्वर्यः' यह पद सर्वदा बहुवचनान्त है। [ यह शकरीसाम ] लोकोंमें अनुस्यूत है ॥१॥ |

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स य एवमेताः शक्वर्यो लोकेषु प्रोता वेद लोकी भवति सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति महान्प्रजया पशुभिर्भवति महान्कीर्त्या लोकान्न निन्देत्तद्व्रतम् ॥ २ ॥

वह पुरुष, जो इस प्रकार इस शकरीसामको लोकोंमें अनुस्यूत जानता है, लोकवान् होता है, वह सम्पूर्ण आयुको प्राप्त होता है। उज्ज्वल जीवन व्यतीत करता है। प्रजा और पशुओंके कारण महान् होता है तथा कीर्तिके कारण भी महान् होता है। लोकोंकी निन्दा न करे—यह व्रत है ॥ २ ॥

| लोकी भवति लोकफलेन युज्यत इत्यर्थः। लोकान्न निन्देत्तद्व्रतम् ॥ २ ॥ | लोकी होता है अर्थात् लोकसम्बन्धी फलसे सम्पन्न होता है। लोकोंकी निन्दा न करे—यह [शकरीसामोपासकके लिये] नियम है ॥२॥ |

इतिच्छान्दोग्योपनिषद्-द्वितीयाध्याये सप्तदशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १७ ॥

अष्टादश खण्ड

रेवतीसामकी उपासना

अजा हिंकारोऽवयः प्रस्तावो गाव उद्गीथोऽश्वाः प्रतिहारः पुरुषो निधनमेता रेवत्यः पशुषु प्रोताः॥१॥

बकरी हिंकार है, भेड़ें प्रस्ताव हैं, गौएँ उद्गीथ हैं, घोड़े प्रतिहार हैं और पुरुष निधन है—यह रेवतीसाम पशुओंमें अनुस्यूत है ॥ १ ॥

| अजा हिंकार इत्यादि पूर्ववत् । पशुषु प्रोताः ॥ १ ॥ | 'अजा हिंकारः' इत्यादि मन्त्रका अर्थ पूर्ववत है । यह [ रेवतीसाम ] पशुओंमें अनुस्यूत है ॥ १ ॥ |

स य एवमेता रेवत्यः पशुषु प्रोता वेद पशुमान् भवति सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति महान्प्रजया पशुभिर्भवति महान्कीर्त्या पशून्न निन्देत्तद्व्रतम्॥ २ ॥

वह पुरुष, जो इस प्रकार इस रेवतीसामको पशुओंमें अनुस्यूत जानता है, पशुमान् होता है, वह पूर्ण आयुको प्राप्त होता है । उज्ज्वल जीवन व्यतीत करता है । प्रजा और पशुओंके कारण महान् होता है तथा कीर्तिके कारण भी महान् होता है । पशुओंकी निन्दा न करे, यह नियम है ॥ २ ॥

| पशून्न निन्देत्तद्व्रतम् ॥२॥ | पशुओंकी निन्दा न करे—यह [ रेवतीसामोपासकके लिये ] नियम है ॥ २ ॥ |

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इतिच्छान्दोग्योपनिषदि द्वितीयाध्याये अष्टादशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १८ ॥

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एकोनविंश खण्ड


यज्ञायज्ञीयसामकी उपासना

लोम हिंकारस्त्वक्प्रस्तावो मांसमुद्गीथोऽस्थि प्रतिहारो मज्जा निधनमेतद्यज्ञायज्ञीयमङ्गेषु प्रोतम् ॥ १ ॥

लोम हिंकार है, त्वचा प्रस्ताव है, मांस उद्गीथ है, अस्थि प्रतिहार है और मज्जा निधन है। यह यज्ञायज्ञीय साम अङ्गोंमें अनुस्यूत है ॥ १ ॥

| लोम हिंकारो देहावयवानां प्राथम्यात् । त्वक्प्रस्ताव आनन्तर्यात् । मांसमुद्गीथः श्रैष्ठ्यात् । अस्थि प्रतिहारः प्रतिहतत्वात् । मज्जा निधनमानन्त्यात् । एतद्यज्ञायज्ञीयं नाम साम देहावयवेषु प्रोतम् ॥ १ ॥ | देहके अवयवोंमें सर्वप्रथम होनेके कारण लोम हिंकार है। लोमोंके अनन्तर होनेके कारण त्वचा प्रस्ताव है। उत्कृष्ट होनेके कारण मांस उद्गीथ है प्रतिहत होनेके कारण अस्थि प्रतिहार है तथा सबके अन्तमें स्थित होनेके कारण मज्जा निधन है। यह यज्ञायज्ञीयनामक साम देहके अवयवोंमें अनुस्यूत है ॥ १ ॥ |


स य एवमेतद्यज्ञायज्ञीयमङ्गेषु प्रोतं वेदाङ्गी भवति नाङ्गेन विहूर्च्छति सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति महान्प्रजया पशुभिर्भवति महान्कीर्त्या संवत्सरं मज्ज्ञो नाश्नीयात्तद्व्रतं मज्ज्ञो नाश्नीयादिति वा ॥ २ ॥

खण्ड १९] शाङ्करभाष्यार्थ २०१


वह पुरुष, जो इस प्रकार इस यज्ञायज्ञीय सामको अङ्गोंमें अनुस्यूत जानता है; अङ्गवान् होता है । वह अङ्गके कारण कुटिल नहीं होता, पूर्ण आयुको प्राप्त होता है, उज्ज्वल जीवन व्यतीत करता है, प्रजा और पशुओंके कारण महान् होता है तथा कीर्तिके कारण भी महान् होता है । एक वर्षतक मांसभक्षण न करे—यह व्रत है, अथवा [ सर्वदा ही ] मांसभक्षण न करे—ऐसा नियम है ॥ २ ॥

| अङ्गी भवति समग्राङ्गो भवतीत्यर्थो नाङ्गेन हस्तपादादिना विहूर्च्छति न कुटिली भवति पङ्गुः कुणी वेत्यर्थः । संवत्सरं संवत्सरमात्रं मज्ज्ञो मांसानि नाश्नीयान्न भक्षयेत् । बहुवचनं मत्स्योपलक्षणार्थम् । मज्ज्ञो नाश्नीयात्सर्वदैव नाश्नीयादिति वा तद्व्रतम् ॥ २ ॥ | अङ्गी होता है अर्थात् पूर्णाङ्ग होता है। अङ्ग अर्थात् हाथ-पाँव आदिके द्वारा कुटिल यानी लँगड़ा या इमश्रुरहित नहीं होता। संवत्सरपर्यन्त अर्थात् केवल एक साल मांसभक्षण न करे। 'मज्ज्ञः' इस पदमें बहुवचन मछलियोंको उपलक्षित करानेके लिये है [ अर्थात् मांस एवं मत्स्यादि न खाय ] । अथवा 'मज्ज्ञो नाश्नीयात्—सर्वदा ही मांस-मछली न खाय—ऐसा नियम है ॥ २ ॥ |

— : ० : —

इतिच्छान्दोग्योपनिषदि द्वितीयाध्याये एकोनविंशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १९ ॥

विंश खण्ड

—: ० :—

राजनसामकी उपासना

अग्निहिंकारो वायुः प्रस्ताव आदित्य उद्गीथो नक्षत्राणि प्रतिहारश्चन्द्रमा निधनमेतद्राजनं देवतासु प्रोतम् ॥ १ ॥

अग्नि हिंकार है, वायु प्रस्ताव है, आदित्य उद्गीथ है, नक्षत्र प्रतिहार हैं, चन्द्रमा निधन है—यह राजनसाम देवताओंमें अनुस्यूत है ॥ १॥

अग्निर्हिंकारः प्रथमस्थानत्वात् । वायुः प्रस्ताव आनन्तर्यसामान्यात् । आदित्य उद्गीथः श्रैष्ठ्यात् । नक्षत्राणि प्रतिहारः प्रतिहृतत्वात् । चन्द्रमा निधनं कर्मिणां तन्निधनात् । एतद्राजनं देवतासु प्रोतं देवतानां दीप्तिमत्त्वात् ॥ १ ॥अग्नि हिंकार है, क्योंकि उसका स्थान सर्वप्रथम है । आनन्तर्यमें तुल्यता होनेके कारण वायु प्रस्ताव है । उत्कृष्ट होनेके कारण आदित्य उद्गीथ है । प्रतिहृत होनेके कारण नक्षत्र प्रतिहार हैं तथा चन्द्रमा निधन है, क्योंकि उसीमें कर्मकाण्डियोंका निधन होता है । यह राजनसाम देवताओंमें अनुस्यूत है, क्योंकि देवगण दीप्तिमान् होते हैं ॥ १ ॥
विद्वत्फलम्—इस उपासनाके विद्वान्‌को प्राप्त होनेवाला फल—

स य एवमेतद्राजनं देवतासु प्रोतं वेदैतासामेव देवतानाँसलोकताँसार्ष्टिताँसायुज्यं गच्छति सर्व-

खण्ड २० ] शाङ्करभाष्यार्थ २०३


मायुरेति ज्योग्जीवति महान् प्रजया पशुभिर्भवति महान् कीर्त्या ब्राह्मणान्न निन्देत्तद्व्रतम् ॥ २ ॥

वह पुरुष, जो इस प्रकार इस राजनसामको देवताओंमें अनुस्यूत जानता है, उन्हीं देवताओंके सालोक्य, सार्ष्टित्व (तुल्य ऐश्वर्य) और सायुज्यको प्राप्त हो जाता है। वह पूर्ण आयुको प्राप्त होता है, उज्ज्वल जीवन व्यतीत करता है, प्रजा और पशुओंके द्वारा महान् होता है तथा कीर्तिके द्वारा भी महान् होता है। ब्राह्मणोंकी निन्दा न करे—यह व्रत है ॥ २ ॥

संस्कृत-भाष्यभाषानुवाद
एतासामेवाग्न्यादीनां देवतानां सलोकतां समानलोकतां सार्ष्टितां समानर्द्धित्वं सायुज्यं सयुग्भावमेकदेहदेहित्वमित्येतत्। वाशब्दोऽत्र लुप्तो द्रष्टव्यः। सलोकतां वेत्यादि। भावनाविशेषतः फलविशेषोपपत्तेः। गच्छति प्राप्नोति। समुच्चयानुपपत्तेश्च। ब्राह्मणान्न निन्देत्तद्व्रतम्।<br><br>“एते वै देवाः प्रत्यक्षं यद्ब्राह्मणाः”<br><br>इति श्रुतेर्ब्राह्मणनिन्दा देवनिन्दैवेति ॥ २ ॥इन अग्नि आदि देवताओंकी ही सलोकता—समानलोकता, सार्ष्टिता—समान ऐश्वर्य, . सायुज्य—परस्पर मिल जानेके भावको अर्थात् एक ही देहके देहित्वको प्राप्त हो जाता है। यहाँ ‘वा’ शब्द लुप्त समझना चाहिये। अतः ‘सलोकतां वा’ इत्यादि पाठ जानना चाहिये। क्योंकि भावनाविशेषसे फलविशेषकी उत्पत्ति होती हैं और इन सब फलोंका समुच्चय होना [अर्थात् एक ही उपासकको इन सब फलोंका प्राप्त होना] भी सम्भव नहीं है।<br><br>ब्राह्मणोंकी निन्दा न करे—यह इस प्रकारके उपासकके लिये नियम है। “ये जो ब्राह्मण हैं प्रत्यक्ष देवता ही हैं” ऐसी श्रुति होनेसे ब्राह्मण-निन्दा देवनिन्दा ही है ॥ २ ॥

इति च्छान्दोग्योपनिषदि द्वितीयाध्याये विंशखण्ड-भाष्यं सम्पूर्णम् ॥ २० ॥

एकविंश खण्ड

सर्वविषयक सामकी उपासना

त्रयी विद्या हिंकारस्त्रय इमे लोकाः प्रस्तावोऽग्नि-
र्वायुरादित्यः स उद्गीथो नक्षत्राणि वयाꣳसि मरीचयः
स प्रतिहारः सर्पा गन्धर्वाः पितरस्तन्निधनमेतत्साम
सर्वस्मिन्प्रोतम् ॥ १ ॥

त्रयीविद्या हिंकार है। ये तीन लोक प्रस्ताव हैं। अग्नि, वायु और आदित्य—ये उद्गीथ हैं। नक्षत्र, पक्षी और किरणें—ये प्रतिहार हैं। सर्प, गन्धर्व और पितृगण—ये निधन हैं। यह सामोपासना सबमें अनुस्यूत है ॥ १ ॥

संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
त्रयी विद्या हिंकारः। अग्न्यादिसाम्न आनन्तर्यं त्रयीविद्याया अग्न्यादिकार्यत्वश्रुतेः। हिंकारः प्राथम्यात्सर्वकर्त्तव्यानाम्। त्रय इमे लोकास्तत्कार्यत्वादनन्तरा इति प्रस्तावः। अग्न्यादीनामुद्गीथत्वं श्रैष्ठ्यात्। नक्षत्रादीनां प्रतिहृत-त्रयीविद्या हिंकार है। त्रयीविद्या अग्नि आदिका कार्य है—ऐसी श्रुति होनेके कारण त्रयीविद्या अग्नि आदि सामोपासनाके पश्चात् कही गयी है। सम्पूर्ण कर्मोंके आरम्भमें होनेके कारण त्रयीविद्या हिंकार है। उसके कार्य होनेके कारण ये तीन लोक उसके पश्चाद्वर्ती हैं, अतः ये प्रस्ताव हैं। उत्कृष्टताके कारण अग्नि आदिका उद्गीथत्व बतलाया गया है। तथा प्रतिहृत होनेके कारण नक्षत्रादिकी प्रतिहारता है।

खण्ड २१ ] शाङ्करभाष्यार्थ २०५


| त्वात्प्रतिहारत्वम् । सर्पादीनां धकारसामान्यान्निधनत्वम् ।<br><br>एतत्साम नामविशेषाभावात्सामसमुदायः सामशब्दः सर्वस्मिन्प्रोतम् । त्रयीविद्यादि हि सर्वम् । त्रयीविद्यादिदृष्ट्या हिंकारादिसामभक्तय उपास्याः। अतीतेष्वपि सामोपासनेषु येषु प्रोतं यद्यत्साम तद्दृष्ट्या तदुपास्यमिति । कर्माङ्गानां दृष्टिविशेषेणाज्यस्येव संस्कार्यत्वात् ॥ १ ॥ | और धकारमें समानता होनेके कारण सर्पादिका निधनत्व बतलाया गया है ।*<br><br>यह साम—किसी नामविशेषका अभाव होनेके कारण यह सामसमुदाय अर्थात् 'साम' शब्द सबमें अनुस्यूत है । त्रयीविद्या आदि ही सब कुछ हैं; तथा त्रयीविद्या आदि दृष्टिसे ही हिंकार आदि सामभक्तियोंकी उपासना करनी चाहिये । पीछे बतलायी हुई सामोपासनाओंमें भी जिन-जिनमें जो-जो साम अनुस्यूत है इन त्रयीविद्या आदिकी दृष्टिसे ही उनकी उपासना करनी चाहिये । [ 'पत्न्यवेक्षितमाज्यं भवति' इस वाक्यके अनुसार पत्नीकी दृष्टि पड़नेसे ] जैसे आज्य संस्कारयुक्त होता है, उसी प्रकार सभी कर्माङ्ग दृष्टिविशेषसे ही संस्कार किये जाने योग्य हैं ॥ १ ॥ |

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सर्वविषयसामविदः फलम्—सर्वविषयक सामके विद्वान्‌को मिलनेवाला फल—

स य एवमेतत्साम सर्वस्मिन्प्रोतं वेद सर्वꣳह भवति ॥ २ ॥


* यहाँ 'सर्प' शब्दका पर्याय 'विषधर', 'फणधर' आदि कोई धकारविशिष्ट शब्द लेना चाहिये; जैसा कि २।२।१ के भाष्यमें भाष्यकारने अन्तरिक्षको उद्गीथ बतलाते हुए अन्तरिक्षके पर्यायभूत गकारविशिष्ट 'गगन' शब्दका ग्रहण किया है ।

२०६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय २

२०६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय २


वह, जो इस प्रकार सबमें अनुस्यूत इस सामको जानता है सर्वरूप हो जाता है ॥ २ ॥

| सर्वं ह भवति सर्वेश्वरो भवतीत्यर्थः। निरुपचरितसर्वभावे हि दिक्स्थेभ्यो बलिप्राप्त्यनुपपत्तिः ॥ २ ॥ | सर्व हो जाता है अर्थात् सर्वेश्वर हो जाता है; क्योंकि सर्वभावका उपचार हुए बिना सम्पूर्ण दिशाओंमें स्थित पुरुषोंसे बलि प्राप्त होना सम्भव नहीं है ॥ २ ॥ |

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सर्वविषयक सामकी उपासनाका उत्कर्ष

तदेष श्लोको यानि पञ्चधा त्रीणि त्रीणि तेभ्यो न ज्यायः परमन्यदस्ति ॥ ३ ॥

इसी विषयमें यह मन्त्र भी है—जो पाँच प्रकारके तीन-तीन बतलाये गये हैं, उनसे श्रेष्ठ तथा उनके अतिरिक्त और कोई नहीं है ॥३॥

| तदेतस्मिन्नर्थ एष श्लोको मन्त्रोऽप्यस्ति । यानि पञ्चधा पञ्चप्रकारेण हिंकारादिविभागैः प्रोक्तानि त्रीणि त्रीणि त्रयीविद्यादीनि तेभ्यः पञ्चत्रिकेभ्यो ज्यायो महत्तरं परं च व्यतिरिक्तमन्यद्वस्त्वनन्तरं नास्ति न विद्यत इत्यर्थः । तत्रैव हि सर्वस्यान्तर्भावः ॥ ३ ॥ | इसी अर्थमें यह श्लोक यानी मन्त्र भी है । हिंकारादि-विभागोंद्वारा जो पाँच प्रकारसे बतलाये हुए तीन-तीन हैं यानी त्रयीविद्या आदि हैं, उन पाँच त्रिकोंकी अपेक्षा उत्कृष्ट-महान् और उनसे भिन्न कोई दूसरी वस्तु नहीं है—यह इसका तात्पर्य है। अर्थात् उन्हींमें सम्पूर्ण वस्तुओंका अन्तर्भाव हो जाता है ॥ ३ ॥ |

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यस्तद्वेद स वेद सर्वꣳसर्वा दिशो बलिमस्मै हरन्ति सर्वमस्मीत्युपासीत तद्व्रतं तद्व्रतम् ॥ ४ ॥

खण्ड २१ ] शाङ्करभाष्यार्थ २०७


जो उसे जानता है वह सब कुछ जानता है । उसे सभी दिशाएँ बलि समर्पित करती हैं । 'मैं सब कुछ हूँ' इस प्रकार उपासना करे—यह नियम है, यह नियम है ॥ ४ ॥

| यस्तद्यथोक्तं सर्वात्मकं साम वेद स वेद सर्वं स सर्वज्ञो भवतीत्यर्थः । सर्वा दिशः सर्वदिक्स्था अस्मा एवंविदे बलिं भोगं हरन्ति प्रापयन्तीत्यर्थः । सर्वमस्मि भवामीत्येवमेतत्सामोपासीत तस्यैतदेव व्रतम् । द्विरुक्तिः सामोपासनसमाप्त्यर्था ॥ ४ ॥ | जो पुरुष इस पूर्वोक्त सर्वात्मक सामको जानता है, वह सबको जानता है; अर्थात् वह सर्वज्ञ हो जाता है । सम्पूर्ण दिशाएँ—सम्पूर्ण दिशाओंमें स्थित पुरुष इस प्रकार जाननेवाले इस उपासकके प्रति बलि यानी भोग उपस्थित करते हैं, अर्थात् उसे भोगोंकी प्राप्ति कराते हैं । 'मैं सब कुछ हूँ' इसी प्रकार इस सामकी उपासना करे—उस उपासकके लिये यही नियम है । यहाँ जो द्विरुक्ति है वह सामोपासनाकी समाप्तिके लिये है ॥ ४ ॥ |

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इतिच्छान्दोग्योपनिषदि द्वितीयाध्याये
एकविंशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ २१ ॥

द्वाविंश खण्ड

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विनर्दिगुणविशिष्ट सामकी उपासना

सामोपासनप्रसङ्गेन गानविशेषादिसंपदुद्गातुरुपदिश्यते; फलविशेषसंबन्धात् ।सामोपासनाके प्रसङ्गसे उद्गाताको गानविशेषादि¹ सम्पत्तिका उपदेश किया जाता है, क्योंकि इससे फलविशेषका सम्बन्ध होता है ।

विनर्दि साम्नो वृणे पशव्यमित्यग्नेरुद्गीथोऽनिरुक्तः प्रजापतेर्निरुक्तः सोमस्य मृदु श्लक्ष्णं वायोः श्लक्ष्णं बलवदिन्द्रस्य क्रौञ्चं बृहस्पतेरपध्वान्तं वरुणस्य तान्सर्वानेवोपसेवेत वारुणं त्वेव वर्जयेत् ॥ १ ॥

सामके ‘विनर्दि’ नामक गानका वरण करता हूँ; वह पशुओंके लिये हितकर है और अग्निदेवतासम्बन्धी उद्गीथ है । प्रजापतिका उद्गीथ अनिरुक्त है, सोमका निरुक्त है, वायुका मृदुल और श्लक्ष्ण ( सरलतासे उच्चारण किये जानेयोग्य ) है, इन्द्रका श्लक्ष्ण और बलवान् है, बृहस्पति का क्रौञ्च ( क्रौञ्चपक्षीके शब्दके समान ) है और वरुणका अपध्वान्त (भ्रष्ट) है । इन सभी उद्गीथोंका सेवन करे; केवल वरुणसम्बन्धी उद्गीथका ही परित्याग कर दे ॥ १ ॥

विनर्दि विशिष्टो नर्दः स्वरविशेष ऋषभकूजितसमोऽस्यास्तीति विनर्दि गानमिति वाक्य-विनर्दि—जिसका नर्द यानी स्वरविशेष ऋषभ ( बैल ) के शब्दके समान विशिष्ट है वह विनर्दिगान है, यहाँ ‘गान’ शब्द वाक्यशेष है । वह विनर्दि गान पशुओंके

१. ‘आदि’ शब्दसे स्वर एवं वर्णादि समझने चाहिये ।