चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पा० ४ ] चिकित्सितस्थानम् २६५ इसके आगे 'पुमान्-जात-बलादिक' नामक चतुर्थ वाजीकरण पाद की व्याख्या करते हैं । भगवान् आत्रेय ने ऐसा उपदेश किया है ॥१-२॥ पुमान् यथा जातबलो यावदिच्छं स्त्रियो व्रजेत् । यथा चापत्यवान् सद्यो भवेत्तदुपदेक्ष्यते ॥ ३ ॥ न हि जातबलाः सर्वे नराश्चापत्यभागिनः । बृहच्छरीरा बलिनः सन्ति नारीषु दुर्बलाः ॥ ४ ॥ सन्ति चाल्पबलाः स्त्रीषु बलवन्तो बहुप्रजाः । प्रकृत्या चाबलाः सन्ति सन्ति चामयदुर्बलाः ॥ ५ ॥ नराश्चटकवत्केचिद् व्रजन्ति बहुशः स्त्रियम् । गजवच्च प्रसिञ्चन्ति केचिच्च बहुगामिन ॥ ६ ॥ कालयोगबलाः केचित्केचिदभ्यसनध्रुवाः । केचित्प्रयत्नैर्वाह्यन्ते वृषाः केचित्स्वभावतः ॥ ७ ॥ तस्मात्प्रयोगान्वक्ष्यामो दुर्बलानां बलप्रदान् । सुखोपभोगान् बलिना भूयश्च बलवर्धनान् ॥ ८ ॥ पुरुष जिस प्रकार से यथेष्ट स्त्रियों मे रमण कर सकता है और जिस प्रकार से सन्तानवान् हो सकता है, उसका विस्तार से वर्णन करते हैं—संसार में यह आवश्यक नहीं कि जितने भी बलवान् व्यक्ति हैं, वे सब सन्तान वाले हों । ऐसे भी बहुत से पुरुष हैं जो बलवान् और पूरे डीलडौल के हैं, परन्तु स्त्रियों के विषय में कमजोर होते हैं। दूसरे पुरुष शरीर रचना में निर्बल हैं, परन्तु स्त्रियों में बलवान् हैं। इनमें कुछ तो प्रकृति से ही निर्बल होते हैं और कुछ रोग आदि से कमजोर हो जाते हैं। कई व्यक्ति तो चिड़ों के समान बहुत बार (लगातार जल्दी जल्दी) स्त्रियों से मैथुन करते हैं और कई व्यक्ति गज के तुल्य कभी कभी मैथुन करते हैं, वे बहुत बार मैथुन नही करते । जब कभी सहवास करते हैं तो हाथी के समान वे बड़ी मात्रा मे, अधिक शुक्र बहाते हैं। कई व्यक्ति विशेष समय में ही बलवान् होते हैं, और कई बार बार अभ्यास (मैथुन करने) से समर्थ हो जाते है। कई व्यक्ति चुम्बन, आलिंगन आदि प्रयत्नों से बल प्राप्त करते हैं और कई स्वभाव से ही बलशाली, वीर्यसेचन में समर्थ होते हैं१ । इसलिये दुर्बलों के लिये बलप्रद और बली पुरुषों के बल को बढानेवाले ओर उपभोग मे सुखकर वृष्य प्रयोगोका वर्णन करते हैं । १ शुक्र के प्रवाह को नियमित करनेवाले दो केन्द्र हैं। एक मस्तिष्क मे और दूसरा मेरुदण्ड में । प्रथम केन्द्र का सम्बन्ध प्रायः विचारों के साथ और
२६६ चरकसंहिता [ अ० २ पूर्वं शुद्धशरीराणां¹ निरूहान् सानुवासनान्। बलापेक्षां प्रयुञ्जीत शुक्रापत्यविवर्धनान् ॥ ९ ॥ घृततैलरसक्षीरशर्करामधुसंयुताः । बस्तयः संविधातव्याः क्षीरमांसरसाशिनाम् ॥ १० ॥ इति वृष्या बस्तयः । इसके लिये सब से प्रथम शुद्ध और स्वस्थ पुरुष को बल के अनुसार शुक्र और सन्तानवर्धक निरूह तथा अनुवासनबस्ति देनी चाहिये । दूध और मास रस का आहार करनेवाले व्यक्ति के लिये घी, तैल, मास रस, दूध, शर्करा और शहद इनसे युक्त बस्तिया दोषानुसार देनी चाहियें । [ अष्टाग-संग्रह मे विस्तार से बस्तिया दी हैं। चरक में सिद्धिकल्प में बस्तियों का वर्णन है] ॥९-१०॥ पिष्ट्वा वराहमांसानि दत्त्वा मरिचसैन्धवे । कोलवद् गुडिकाः कृत्वा तप्ते सर्पिषि भर्जयेत्² ॥ ११ ॥ ³भर्जेन स्तम्भितातस्ताश्च प्रक्षेप्याः कौक्कुटे रसे । घृताढ्ये गन्धपिशुने दधिदाडिमसाधिते ॥ १२ ॥ यथा न भिन्द्याद् गुडिकास्तथा तं साधयेद्रसम् । तं पिबन् भक्षयंस्ताश्च लभते शुक्रमक्षयम् ॥ १३ ॥ मासानामेवमन्येषां मेध्यानां कारयेद्भिषक् । गुडिकाः सरसास्तासा प्रयोगः शुक्रवर्धनः ॥ १४ ॥ इति वृष्या मांसगुडिकाः । मांसगुडिका—सुअर के मास को पीस कर इसमें मरिच और सैन्धा नमक मिला कर बेर के समान गोलिया बना लेवे । इनको गरम घी में भून ले । भूनने पर जब कठोर हो जायें तब इनको मुर्गे के मास रस मे डुबो दे । इसमे दूसरे का क्रिया के साथ ह । परन्तु एक केन्द्र के उत्तेजित होने पर दूसरा केन्द्र स्वय उत्तेजित हो जाता है। इसलिये शुक्र क्षरण में वीर्य की मात्रा एक ही व्यक्ति में समय भेद से भिन्न २ होती है। वैसे तो सब मनुष्यों में मात्रा भेद रहता है। कोई २४ रत्ती, कोई ६० बूंद, कोई १० से १५ ग्राम मानता है। देखने में बलवान् पुरुष नपुसक न हो, यह कोई नियम नहीं है। कुश्ती, बैठक, दण्ड खास कर बचपन से करने वाले व्यक्ति प्रायः नपुसक होते हैं। स्त्रीसहवास में विशेष रूप से वे जल्दी क्षरित हो जाते हैं । १ 'पूर्व सुस्थशरीराणा' इति च पाठः । २ 'वर्त्तयेत्' इति च पाठ । ३ 'वर्त्तन' इति च पाठः ।
पा० ४ ] चिकित्सास्थानम् २६७
पा० ४ ] चिकित्सास्थानम् २६७ प्रचुर घी, इलायची, केशर, कर्पूर आदि का गन्ध, दही और अनार रस मिला कर इस प्रकार से पकावे जिसमे कि गुटिकायें टूटे नही । इन गुटिकाओं को खाने से तथा मास रस को पीने से शुक्र की वृद्धि होती है। इसी प्रकार से अन्य मेध्य (मेदुर या भक्ष्य) मासों को, गुटिकाओं को मास रस में विद्ध करके प्रयोग करने से वीर्य की वृद्धि होती है ॥११-१४॥ माषानङ्कुरिताञ्छुद्धांन्निस्तुषान् साञ्जडाफलान् । घृताढ्ये माहिषरसे दधिदाडिमसारिके ॥ १५ ॥ प्रक्षिपेन्मात्रया युक्तान् धान्यजीरकनागरैः । भुक्त पीतश्च स रसः कुरुते शुक्रमक्षयम् ॥ १६ ॥ इति वृष्यो माहिषरसः । माहिष रस-उड़दों को जड़ाकर अंकुरित कर ले। इनको धोकर छिलके उतार दे। इसी प्रकार से कौंच के फलों का भी छिलका उतार दे। इनको प्रचुर घी, भैंसे का मांस रस, दही और अनार के रस के साथ पकावे । पकते समय इसमें परिमाण से धनिया, जीरा और सोंठ मिला दे। इनको खाने तथा पीने से शुक्र अत्यन्त बढ़ता है ॥ १६ ॥ आर्द्राणि मत्स्यमांसानि भृष्टांश्च शफरींश्च वा । तप्ते सर्पिषि यः खादेत्स गच्छेत्स्त्रीषु न क्षयम् ॥ १७ ॥ इति वृष्यघृतभृष्टमत्स्यमांसानि । मछलियों (खासकर रोहित) का ताज़ा मास और शफरी मछली को घी में भून कर खाने से संभोग के समय शुक्र क्षरित नहीं होता ॥१७॥ घृतभृष्टान् रसे छागे रोहितान् फलसारिके । अनुपीतरसान् सिद्धानपत्यार्थी प्रयोजयेत् ॥ १८ ॥ इति गर्भाधानकरा योगः । सन्तान को चाहने वाले व्यक्ति रोहित (रोहू) मछली को घी में भूनकर बकरे के मास रस में डालकर अनार के रस के साथ पकाकर इनको खाये तथा मास रस पीये ॥ १८ ॥ कुट्टकं मत्स्यमांसानां हिङ्गुसैन्धवधान्यकैः । युक्तं गोधूमचूर्णेन घृते पूपलिकाः पचेत् ॥ १६ ॥ पूपलिका योग-मछलियों के मास को कूटकर इसमें हींग, सैन्धानमक, धनिया मिलाकर गेहूँ के आटे में सान घी मे पूपलिकायें (कचौरिया) पकावे । अथवा गेहूँ के आटे में मछलियों के मास का कीमा भरकर कचौरी की तरह पकावे ॥ १६ ॥
माषपूपलिकानां तद् गर्भार्थमुपकल्पयेत् ॥ २१ ॥
२६८ चरकसंहिता [ अ० २ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~
माहिषे च रसे मत्स्यान् स्निग्धाम्ललवणान् पचेत् । रसे चानुगते मांसं पोथयेत्तत्र चावपेत् ॥ २० ॥ मरिचं जीरकं धान्यमल्पं हिङ्गु नवं घृतम् । माषपूपलिकानां तद् गर्भार्थमुपकल्पयेत् ॥ २१ ॥ एतौ पूपलिकायोगौ बृंहणौ बलवर्धनौ । हर्षसौभाग्यजननौ परं शुक्राभिवर्धनौ ॥ २२ ॥ इति वृष्यौ पूपलिकायोगौ । मछलियों के मास को घी, अनार का रस और सैन्धानमक के साथ भैंस के मास रस में पकाना चाहिये। जब मास रस शुष्क हो जाये तब मास को कूट कर इसमें मरिच, जीरा, धनिया, थोड़ा सा हींग और ताज़ा घी मिलाना चाहिये । अब उड़द के आटे में इसको पिठ्ठी के रूप में भरकर घी में तल लेवे। ये दोनो प्रकार की पूपलिकायें बृंहण (पुष्टिदायक) बलवर्द्धक, प्रहर्ष और सौभाग्य को उत्पन्न करनेवाली तथा शुक्रवर्द्धक हैं ॥ २०-२२ ॥ माषात्मगुप्तागोधूमशालिषष्टिकपौष्टिकम् । शर्कराया विदार्याश्च चूर्णमिक्षुरकस्य च ॥ २३ ॥ संयोज्य मसृणे क्षीरे घृते पूपलिकाः पचेत् । पयोऽनुपानास्ताः शीघ्रं कुर्वन्ति वृषतां परम् ॥ २४ ॥ इति वृष्या माषादिपूपलिकाः । माषादि पूपलिका-उड़द, कौंच, गेहूँ, शाली चावल, साठी चावल, इन सब का आटा, शर्करा, विदारीकन्द का चूर्ण, तालमखाने का चूर्ण, इनको दूध के साथ गूधकर घी में तल लेवे। इनको खाकर ऊपर से दूध पीले। ये अत्यन्त शुक्रवर्धक हैं ॥ २३-२४ ॥ शर्करायास्तुलाका स्यादेका गव्यस्य सर्पिषः । प्रस्थो विदार्याश्चूर्णस्य पिप्पल्याः प्रस्थ एव च ॥ २५ ॥ अर्घाढकं तुगाक्षीर्याः क्षौद्रस्याभिनवस्य च । तत्सर्वं मूच्छितं तिष्ठेन्मृत्तिके घृतभाजने ॥ २६ ॥ मात्रामग्निसमां तस्य प्रातः प्रातः प्रयोजयेत् । एष वृष्य. परं योगो बल्यो बृंहण एव च ॥ २७ ॥ इति वृष्ययोगः । वृष्य योग-खाण्ड १ तुला (१०० पल), गाय का घी १ तुला, विदारी- कन्द का चूर्ण १ प्रस्थ, पिप्पली एक प्रस्थ, वंशलोचन आधा आढक, ताजा
पा० ४] चिकित्त्सितस्थानम् २६६
पा० ४] चिकित्त्सितस्थानम् २६६ मधु १ आढक, इन सबको घी से भावित मिट्टी के पात्र में डालकर रखे । इसकी अग्नि-बल के अनुसार मात्रा प्रतिदिन प्रातःकाल खावे । यह योग अत्यन्त वृष्य बल्य एव बृहण है ॥ २७ ॥ शतावर्या विदार्याश्च तथा माषात्मगुप्तयोः । श्वदंष्ट्रायाश्च निष्क्वाथान् जलेषु च पृथक् पृथक् ॥ २८ ॥ साधयित्वा घृतप्रस्थं पयस्यष्टगुणे पुनः। शर्करामधुसंयुक्तमपत्यार्थी प्रयोजयेत् ॥ २९ ॥ इत्यपत्यकरं घृतम्। अपत्यकर घृत—शतावरी, विदारीकन्द, कौंच, उड़द, गोखरू इनका पृथक् पृथक् क्वाथ बनावे । इन सब क्वाथों से एव आठ प्रस्थ ( परिभाषा के अनुसार द्विगुण १६ प्रस्थ) दूध के साथ एक प्रस्थ घी पकावे । इस घी को शर्करा और मधु के साथ मिला कर संतानाथीं पुरुष खावे ॥ २८-२९ ॥ घृतपात्रं शतगुणे विदारीस्वरसे पचेत् । सिद्धं पुनः शतगुणे गव्ये पयसि साधयेत् ॥ ३० ॥ शर्करायास्तुगाक्षीर्याः क्षौद्रस्येक्षुरसस्य च । पिप्पल्याः साजडायाश्च भागैः पादाशिकैर्युतम् ॥ ३१ ॥ गुडिकाः कारयेद्वैद्यो यथा स्थूलमुदुम्बरम् । तासा प्रयोगात्पुरुषः कुलिङ्ग इव हृष्यति ॥ ३२ ॥ इति वृष्यगुटिकाः। वृष्य गुटिका—गाय के ८ प्रस्थ घी को ८०० प्रस्थ विदारीकन्द के रस में सिद्ध करे । इस सिद्ध घी को ८०० प्रस्थ गाय के दूध में पकावे । इस प्रकार से सिद्ध घी में खाड, वंसलोचन, शहद, गन्ने का रस, पिप्पली, कौंच ये घी से चतु- र्थाश मिलावे । इसकी मोटे गूलर के समान गोलिया बना कर प्रयोग करे । इसके प्रयोग से पुरुष कुलिंग की भाति हर्षयुक्त होता है । [ यहा पर यदि प्रक्षेप द्रव्य प्रत्येक चतुर्थांश लिया जाये तो गोलिया आराम से बन जायेंगी । ] ॥३०-३२॥ सितोपलापलशतं तदर्धं नवसर्पिषः । क्षौद्रपादेन संयुक्त साध्येज्जलपादिकम् ॥ ३३ ॥ सान्द्र गोधूमचूर्णाना पाद् स्तीर्णे शिलातले । शुचौ श्लक्ष्णे समुत्कीर्य मर्दनेनापपादयेत् ॥ ३४ ॥ शुद्धा उत्कारिका कार्याश्चन्द्रमण्डलसन्निभाः । तासां प्रयोगाद् गजबन्नारीः संतर्पयेन्नरः ॥ ३५ ॥ इति वृष्योत्कारिका।
२७० चरकसंहिता । अ० २ ॰ वृष्योत्कारिका—मिसरी १०० पल, ताज़ा घी ५० पल, मधु २० पल, जल २५ पल इनको यथाविधि मिलावे। पहिले पानी और मिश्री से चास पका कर घी डाले, ठण्डा होने पर मधु मिलावे। इसमें गेहूँ का आटा २५ पल मिला कर मथे। अब इसको साफ़ चिकनी शिला पर फैला कर उत्कारिकायें बनावे। ये उत्कारिकायें चन्द्रमा के मण्डल के समान गोल हों। इनके प्रयोग से पुरुष हाथी के समान स्त्रियों को तृप्त करता है ॥ ३३-३५ ॥ यत्किञ्चिन्मधुरं स्निग्धं जीवनं बृंहणं गुरु। हर्षणं मनसश्चैव सर्वं तद्वृष्यमुच्यते ॥ ३६ ॥ द्रव्यैरेवंविधैस्तस्माद्भावितः प्रमदा व्रजेत्। आत्मवेगेन चोदीर्णः स्त्रीगुणैश्च प्रहर्षितः ॥ ३७ ॥ गत्वा स्नात्वा पयः पीत्वा रस चानुशयीत ना। यथाऽऽप्याय्यते भूयः शुक्रं च बलमेव च ॥ ३८ ॥ यथा मुकुलपुष्पस्य सुगन्धो नोपलभ्यते। लभ्यते तद्विकाशात्तु तथा शुक्रं हि देहिनाम् ॥ ३६ ॥ नर्ते वै षोडशाद्वर्षात्सप्तत्या परता न च। आयुष्कामो नरः स्त्रीभिः संयोगं कर्तुमर्हति ॥ ४० ॥ अतिबालो ह्यसम्पूर्णसर्वधातु स्त्रियो व्रजन्। उपनश्येत सहसा तडागमिव काजलम् ॥ ४१ ॥ शुष्कं रूक्षं यथा काष्ठ जन्तुजग्ध विजर्जरम्। स्पृष्टमाशु विशीर्येत तथा वृद्धः स्त्रियो व्रजन् ॥ ४२ ॥ वृष्य का लक्षण—जो कोई भी वृष्य मधुर, स्निग्ध, जीवनदायक, पौष्टिक, गुरु, मन में हर्ष उत्पन्न करता है, वह सब वृष्यगुण वाले हैं। अतः वृष्य द्रव्यों के सेवन से, अपने बल तथा कामवेग से प्रेरित, स्त्री के रूप, हाव, भाव आदि गुणों से आकर्षित होकर मैथुन करे। मैथुन के पीछे स्नान करके, दूध या मांसरस को पीकर सो जाने से ह्रास हुआ शुक्र और बल पुनः प्राप्त हो जाता है। जिस प्रकार कि फूल के डोडे में गन्ध का पता नहीं चलता, परन्तु फूल के खिलने पर गन्ध स्पष्ट हो जाती है, इसी प्रकार बाल्यावस्था में शुक्र प्रकट नहीं होता। परन्तु यौवनावस्था में शुक्र प्रकट हो जाता है१। जो पुरुष दीर्घ आयु
१ बारह वर्ष तक अष्ठीला ग्रन्थि तथा शिश्न के अन्दर की ग्रन्थियों का रस आता है जो कि देखने में प्रायः वीर्य से मिलता है। इसमें न तो शुक्राणु होते ह आर न वह सन्तानोत्पत्ति ही कर सकता है।
पा० ४] चिकित्सितस्थानम् २७१
पा० ४] चिकित्सितस्थानम् २७१ ~ ~ ~ चाहता हो वह सोलह वर्ष से पूर्व और सत्तर साल के पीछे स्त्री के साथ सहवास न करे। क्योंकि सोलह वर्ष से पूर्व छोटी अवस्था में धातुओं के असम्पूर्ण, कच्ची अवस्था में होने से सम्भोग करने पर थोडे पानी वाले तालाब की भाँति सूख जाता है, क्षीण हो जाता है। जिस प्रकार से थोड़े पानी वाला तालाब ज़रा सी गरमी से खुश्क हो जाता है, इसी प्रकार थोड़े से ही शुक्र क्षय से पुरुष भी क्षीण हो जाता है और यदि सत्तर वर्ष की आयु का वृद्ध पुरुष स्त्री-सहवास करता है, तो वह सूखा, रूखा (स्नेह रहित), जिस प्रकार कि सूखी, जर्जरित घूण से खाई लकड़ी छूने से गिर जाती है, इसी प्रकार वह वृद्ध पुरुष भी सहवास के झटके को सह नहीं सकता, गिर पडता है ॥ ४०-४२ ॥ जरया चिन्तया शुक्र व्याधिभिः कर्मकर्षणात् । क्षयं गच्छत्यनशनात्स्त्रीणा चातिनिषेवणात् ॥ ४३ ॥ निम्न कारणों से शुक्र का क्षय होता है—बुढापे से, चिन्ता से, रोगों से, अति शारीरिक या मानसिक श्रम से, भोजन न करने से और स्त्रियों के अति सेवन से शुक्र क्षय होता है ॥ ४३ ॥ क्षयाद्भयादविश्रम्भाच्छाकात्स्त्रीदोषदर्शनात् । नारीणामरसज्ञत्वादभिचागादसेवनात् ॥ ४४ ॥ तृप्तस्यापि स्त्रियो गन्तु न शक्तुरुपजायते । देहसत्त्वबलापेक्षी हर्षः शक्तिश्च हर्षजा ॥ ४५ ॥ रस इक्षौ यथा दध्नि सर्पिस्तैलं तिले यथा । सर्वत्रानुगतं देहे शुक्रं संस्पर्शने तथा ॥ ४६ ॥ तत्स्त्रीपुरुषसंयोगे चेष्टासंकल्पपीडनात् । शुक्र प्रच्यवते स्थानाज्जलमार्द्रात्पटादिव ॥ ४७ ॥ निम्न अवस्थाओं में शुक्र प्रवृत्त नहीं होता—धातुओं के (विशेष रूप से शुक्र के) क्षय से, भय से, विश्वास (निश्चिन्तता) न होने से, शोक से, स्त्री में दोष देखने से, स्त्रियों के फूहड़ (अरसज्ञ) होने से, सकल्प अर्थात् मनोयोग न होने से, सहवास न करने से, मैथुन से तृप्त होने से, शुक्र उत्पन्न नहीं होता। हर्ष (उत्तेजना) शरीर और मन तथा बल की अपेक्षा रखती है। शक्ति (मैथुन, सामर्थ्य) हर्ष से उत्पन्न होती है। जिस प्रकार कि रस सम्पूर्ण गन्ने में रहता है, घी सम्पूर्ण दही के कण कण में व्याप्त है, तैल तिल के अणु अणु में भरा होता है, इसी प्रकार से शुक्र भी शरीर की त्वक्-इन्द्रिय में, स्पर्शज्ञान-युक्त स्थानों में रहता है, वह सर्वत्र व्याप्त है।
२७२ चरकसंहिता [ अ० २ शुक्र नहीं है। परन्तु जब इनकी वृद्धि और ह्रास होता है तो शुक्र का होना भी निश्चित है। शरीर का कोई भी अङ्ग ऐसा नहीं जहा वीर्य न हो ] । यह शुक्र स्त्री और पुरुष के सयोग होने पर, चेष्टा, सकल्प तथा परस्पर पीड़न ( सम्मूर्छन, दबाने ) के कारण अपने वास्तविक स्थान से पृथक् होकर झरने लगता है, जिस प्रकार कि गीले कपड़े से पानी टपकने लगता है ॥४४-४७॥ हर्षात्तर्षात्सरत्वाच्च पैच्छिल्याद् गौरवादपि । अणुप्रवणभावाच्च द्रुतत्वान्मारुतस्य च ॥ ४८ ॥ अष्टाभ्य एभ्यो हेतुभ्यः शुक्रं देहात्प्रसिच्यते । निम्न आठ कारणों से शुक्र सम्पूर्ण शरीर से मथा जाकर प्रवृत्त होता है । हर्ष से, तर्ष ( उपभोग की इच्छा ) से, सर गुण होने से ( बहने का स्वभाव होने से ), पिच्छिल ( चिकना ) होने से, गौरव ( गुरु ) होने से, अणु (सूक्ष्म) होने से, प्रवण ( बाहर निकलने का स्वभाव होने से ),१ वायु के शीघ्रगामी होने से वीर्य बाहर आता है२ ॥ ४८- ॥ १. कावराज गगाधर सन ने 'हृषात्सरत्वासोक्ष्म्याच्च' यह पाठ दिया है। इसी प्रकार 'अणु-प्रवण-भावाच्च' के स्थान पर 'अनुप्लवनभावाच्च' यह पाठ पढ़ा है। 'अनुप्लवन' का अर्थ शिश्न को मास पेशियों का रह रह कर संकोच होना बताया है। इन सकोचों के कारण वीर्य झटकों के साथ बाहर आता है। वीर्य का क्षरण वात पर निर्भर है। यह केन्द्र मस्तिष्क और मेरुदण्ड में है। “सुप्रसन्न मनस्तत्र हर्षणे हेतुरुच्यते ।” सुश्रुत २. साधारणत. जब कामेच्छा उत्पन्न होती है उस समय शरीर के अवयवों में परिवर्त्तन आरम्भ हो जाता है। यह परिवर्त्तन मुख्य रूप से श्वास का तेज होना, गालों में लालिमा का दौड़ना, किसी काम में दिल न लगना, शिश्न में हर्ष, छाती में कम्पन होता है। इस अवस्था में रक्तसचार में भी अन्तर आ जाता है। रक्तसचार की गति बढ जाती है। इतना ही नही, रक्त के अन्दर स्वय परिवर्त्तन आ जाता है। इसका प्रभाव माता के दूध पर भी पड़ जाता है। कामेच्छा के समय पिलाया दूध शिशु को हानि करता है। इन परिवर्त्तनों के कारण पुरुष के अण्ड अपना अन्तः स्राव को उत्पन्न करने का कार्य बन्द करके, बहिःस्राव पैदा करने लगते हैं। इस वीर्य के गाढ़ा होने के कारण यह शिश्न तक पहुँच जाये इसलिये इसमें पौरुष ग्रन्थि तथा शिश्न में मूत्र मार्ग की दिवारों मे रहने वाली ग्रन्थिया अपना अपना रस मिला देती हैं। यदि यह रस बहुत मिल जाये तो वीर्य पतला हो जाता है।
पा० ४] १= चिकित्सितस्थानम् २७३
पा० ४] १= चिकित्सितस्थानम् २७३ चरतो विश्वरूपस्य रूपद्रव्यं यदुच्यते ॥ ४९ ॥ मनुष्य, पशु, पक्षी आदि नाना योनियों में विचरने वाले विश्वरूप आत्मा के रूप को प्रकट करने वाला यही द्रव्यरूपी वीर्य है। इसी वीर्य के कारण आत्मा का अव्यक्त रूप स्पष्ट होता है ॥४६॥ बहलं मधुरं स्निग्धमविस्रं गुरु पिच्छिलम् । शुक्लं बहु च यच्छुक्रं फलवत्तदसंशयम् ॥ ५० ॥ येन नारीषु सामर्थ्यं वाजीवल्लभते नरः । व्रजेच्चाभ्यधिकं येन वाजीकरणमेव तत् ॥ ५१ ॥ प्रशस्त शुक्र—बहल ( घना ), मधुर ( गन्ध में, प्रतिक्रिया में मधुर, उदा- सीन ), स्निग्ध, अविस्त्र ( दुर्गन्धरहित ), गुरु, पिच्छिल ( चिक्कास से युक्त ), श्वेत वर्ण, मात्रा मे अधिक जो शुक्र होता है, वह अवश्य सन्तानोत्पत्ति मे कारण बनता है। शुक्र की प्रतिक्रिया मृदु क्षारीय है ओर यह क्षारीय ( मृदु ) माध्यम को ही पसन्द करता है। जिन औषध या आहार-विहार के कारण पुरुष घोड़े के समान स्त्रियों में रमण करने के लिये सामर्थ्यवान् बनता है, जिनके द्वारा अधिक समय तक मैथुन कर सकता है, उनको वाजीकरण कहते हैं ॥५०-५१॥ तत्र श्लोकौ—हेतुयोगापदेशस्य यागा द्वादश चोत्तमाः । यत्पूर्व मैथुनात्सेव्यं सेव्यं यन्मैथुनादनु ॥ ५२ ॥ यदा न सेव्याः प्रमदाः कृत्स्नः शुक्रांज्ञानसंशयः । निरुक्तं चेह निर्दिष्टं पुमाञ्जातबलादिके ॥ ५३ ॥ इस पाद में वाजीकरण योगों के उपदेश का कारण, बारह उत्तम प्रयोग, मैथुन से पूर्व तथा पीछे जिन वस्तुओ का सेवन करना चाहिये उनको, जब मैथुन नहीं करना चाहिये, वीर्य का सम्पूर्ण ज्ञान, वाजीकरण की निरुक्ति इस ‘पुमाञ्जातबलादिक’ पाद में कह दी है ॥ ५२-५३ ॥ इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते चिकित्सास्थाने पुमाञ्जातबलादिको नाम वाजीकरणपादश्चतुर्थः । समाप्तश्चायं द्वितीयो वाजीकरणाऽध्यायः ॥ २ ॥ तृतीयोऽध्यायः अथातो ज्वरचिकित्सितं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥ इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥ इसके आगे ‘ज्वर-चिकित्सा’ की व्याख्या करते हैं, भगवान् आत्रेय ने ऐसा उपदेश किया है ॥ १-२ ॥
२७४ चरकसंहिता [ अ० ३
विज्वरं ज्वरसंदेहं पर्यपृच्छत्पुनर्वसुम् ।
विविक्ते शान्तमासीनमग्निवेशः कृताञ्जलिः ॥ ३ ॥
देहेन्द्रियमनस्तापी सर्वरोगाग्रजो बली ।
ज्वरः प्रधानं रोगाणामुक्तो भगवता पुरा ॥ ४ ॥
तस्य प्राणिसपत्नस्य ध्रुवस्य प्रलयोदये ।
प्रकृतिं च प्रवृत्तिं च प्रभावं कारणानि च ॥ ५ ॥
पूर्वरूपमधिष्ठानं बलकालात्मलक्षणम् ।
व्यासतो विधिभेदांश्च पृथग्भिन्नस्य चाकृतिम् ॥ ६ ॥
लिङ्गमामस्य जीर्णस्य सौषधं च क्रियाक्रमम् ।
विमुञ्चतः प्रशान्तस्य चिह्नं यच्च पृथक् पृथक् ॥ ७ ॥
ज्वरावशिष्टो रक्ष्यश्च यावत्कालं यतो यतः ।
प्रशान्तः कारणैर्येिश्च पुनरावर्तते ज्वरः ॥ ८ ॥
याश्चापि पुनरावृत्ति क्रियाः प्रशमयन्ति तम् ।
जगद्धितार्थं तत्सर्वं भगवन् ! वक्तुमर्हसि ॥ ६ ॥
ज्वर (सन्ताप, बाधा) रहित, नीरोग शान्तरूप में एकान्त स्थान में बैठे
हुए पुनर्वसु से हाथ जोड़कर अग्निवेश ने अपने ज्वरसम्बन्धी सन्देह को पूछा।
हे भगवन् ! आपने निदानस्थान में देह और इन्द्रिय तथा मन को तपाने
वाला, सब रोगों में प्रथम, बलवान् तथा सब रोगों में प्रधान ज्वर को बतलाया
था। प्राणिमात्र के शत्रु, जन्म और मृत्यु के समय अवश्यम्भावी इस ज्वर की
प्रकृति, प्रवृत्ति (उत्पत्ति), कारण, पूर्वरूप, अधिष्ठान (आश्रय), बल, काल,
आत्मलक्षण (ज्वर के अपने लक्षण), विस्तार रूप में भिन्न हुए ज्वर के लक्षण,
आमज्वर के लक्षण, जीर्ण ज्वर के लक्षण, इनकी औषध, चिकित्सा क्रम, छोड़ते
हुए तथा शान्त ज्वर के पृथक् २ लक्षण, ज्वर से मुक्त व्यक्ति को कितने समय
तक किन बातों से बचना उचित है, शान्त होने पर भी किन किन कारणों से
ज्वर पुनः आ जाता है, दुबारा लौटे हुए ज्वर की चिकित्सा क्रम, जिनसे कि
यह शान्त होता है, इन सब बातों को आप जगत् की भलाई के लिये
उपदेश करे ॥ ३-९ ॥
तदग्निवेशस्य वचो निशम्य गुरुरब्रवीत् ।
ज्वराधिकारे यद्वाच्यं तत्सौम्य ! निखिलं शृणु ॥ १० ॥
ज्वरो विकारो रोगश्च व्याधिरातङ्क एव च ।
एकोऽर्थो नामपर्यायैर्विविधैरभिधीयते ॥ ११ ॥
अ० ३ ] चिकित्सतस्थानम् २७५
अ० ३ ] चिकित्सतस्थानम् २७५ तस्य प्रकृतिरुद्दिष्टा दोषाः शारीरमानसाः । देहिनं नहि निर्दोषं ज्वरः समुपसेवते ॥ १२ ॥ क्षयस्तमो ज्वरः पाप्मा मृत्युश्चोक्ता यमात्मकाः । पञ्चत्वप्रत्ययान्नॄणां क्लिश्यतां स्वेन कर्मणा ॥ १३ ॥ इत्यस्य प्रकृतिः प्रोक्ता, प्रवृत्तिस्तु परिग्रहात् । निदाने पूर्वमुद्दिष्टा रुद्रकोपाच्च दारुणात् ॥ १४ ॥ अग्निवेश के इस प्रकार कहे वचनों को सुनकर भगवान् आत्रेय ने कहा हे सौम्य ! ज्वर के विषय मे जो कुछ भी कहना है वह सब सुनो । ज्वर, विकार, रोग, व्याधि, आतक इन सब विविध नाम पर्यायों से एक ही बात कही जाती है, ये सब रोग के पर्याय हैं । शारीरिक और मानसिक दोष इस ज्वर की प्रकृति ( समवायि-कारण ) हैं । इन शारीरिक तथा मानसिक दोषों से रहित पुरुष को ज्वर नहीं आता । अपने अपने कर्मों के कारण क्लेश पाते हुए मनुष्यों को पञ्चत्व ( मृत्यु ) की प्रतीति होने से क्षय, तम, ज्वर, पाप्मा, मृत्यु ये सब रोग ( विकार ) यम रूप होते हैं। यह ज्वर की प्रकृति अर्थात् स्वाभाविक रूप है । परिग्रह ( धनादि मे ममता ) के कारण इसकी प्रवृत्ति ( उत्पत्ति ) होती है । तथा निदानस्थान में दारुण रुद्र कोप से भी ज्वर की उत्पत्ति बतलाई है । [ पारिग्रह से ज्वर की उत्पत्ति देखो जनपदोध्वंसनीय अध्याय ( विमान० अ० ३ ) 'भ्रश्यति तु कृतयुगे' इत्यादि ] ॥ १०-१४ ॥ द्वितीये हि युगे शर्वमक्रोधव्रतमास्थितम् । दिव्यं सहस्रं वर्षाणामसुरा अभिदुद्रुवुः ॥ १५ ॥ तपोविघ्नं शमीकर्तुं तपोविघ्नं महात्मनाम् । पश्यन् समर्थश्चोपेक्षां चक्रे दक्षः प्रजापतिः ॥ १६ ॥ पुनर्माहेश्वरं भागं ध्रुवं दक्षः प्रजापतिः । यज्ञेन कल्पयामास प्रोच्यमानः सुरैरपि ॥ १७ ॥ ऋचः पशुपतेर्याश्च शैव्यश्चाहुतयश्च याः । यज्ञसिद्धिप्रदास्ताभिर्हीनं चैव स इष्टवान् ॥ १८ ॥ अथोत्तीर्णव्रतो देवो बुद्ध्वा दक्षव्यतिक्रमम् । रुद्रो रौद्रं पुरस्कृत्य भावमात्मविदात्मनः ॥ १९ ॥ सृष्ट्वा ललाटे चक्षुर्वै दग्ध्वा तानसुरान् प्रभुः । बाणं क्रोधाग्निसंतप्तमसृजत्सत्रनाशनम् ॥ २० ॥ ततो यज्ञः स विध्वस्तो व्यथिताश्च दिवौकसः ।
२७६ चरकसंहिता [ अ० ३ दाहव्यथापरीताश्च भ्रान्ता भूतगणा दिशः ॥ २१ ॥ अथेश्वरं देवगणः सह सप्तर्षिभिर्विभुम् । तमृग्भिरस्तुवद्यावच्छैवे भावे शिवः स्थितः ॥ २२ ॥ शिवं शिवाय भूताना स्थित ज्ञात्वा कृताञ्जलिः । भिया भस्मप्रहरणस्त्रिशिरा नवलोचनः ॥ २३ ॥ ज्वालामालाकुलो रौद्रो ह्रस्वजङ्घोदरः क्रमात् । क्रोधाग्निरुक्तवान् देवमह कि करवाणि ते ॥ २४ ॥ तमुवाचेश्वरः क्रोधं ज्वरो लोके भविष्यसि । जन्मादौ निधने च त्वमपचारान्तरेषु च ॥ २५ ॥ दूसरे युग ( त्रेता ) में क्रोध न करने का व्रत पालन करते हुए शर्व (महादेव) के समय हज़ारों दिव्य वर्षों तक तप में विघ्नकारी असुर लोग महात्माओं के तप में विघ्न करने के लिये अनेक उपद्रव करने लगे । परन्तु इस समय समर्थशील होते हुए भी दक्ष प्रजापति ने इनकी उपेक्षा की । दक्ष ने यज्ञ की रचना की । देवताओं के कहने पर भी दक्ष प्रजापति ने महादेव के लिये यज्ञभाग ( रुद्र-भाग ) नहीं दिया । इतना ही नहीं, अपितु यज्ञ की सफलता को देने वाली पशुपति सम्बन्धी ऋचाओं तथा शिव-सम्बन्धी आहुतियों को छोड़ते हुए, उनसे रहित यज्ञ किया । इसके पश्चात् जब महादेव का व्रत पूरा हुआ, तब दक्ष प्रजापति का व्यतिक्रम (नियम भग) हुआ जान कर आत्म- ज्ञानी शिव ने अपना रौद्र रूप प्रकट किया । अपने माथे में स्थित तृतीय चक्षु को खोल कर, असुरों को जला कर भस्म कर दिया । फिर रुद्र ने क्रोधाग्नि से तपा बाण सत्र (यज्ञ) के नाश के लिये फेंका । इससे यज्ञ तो नष्ट हो गया परन्तु देवता भी दुःखित हुए । समस्त प्राणी दाह और व्यथा से चिल्लाने लगे । वे दिशाओं में भागने लगे, सब ओर तहलका मच गया । इसके पीछे सप्तर्षियों के साथ देवताओं ने ऋचाओं द्वारा भगवान् महादेव की तब तक स्तुति की जब तक कि वे अपने पुन. शिवरूप में नहीं आ गये । स्तुति से रुद्र प्रसन्न हो गये । वे रौद्र रूप को त्याग शिव रूप में आ गये । जब महादेव ने प्राणियों के कल्याण की इच्छा से शिवरूप धारण कर लिया, उस समय क्रोधाग्नि ने भयभीत होकर कहा कि मैं आपकी क्या सेवा करूँ, मुझको आदेश दीजिये । इस क्रोधाग्नि के शस्त्र भस्म थे, तीन शिर, नौ आख, ज्वालाओं से व्याप्त, रुद्र, भयंकर, छोटी जघाए, छोटा पेट था । महेश्वर ने क्रोध को कहा—ससार में प्राणियों के जन्म और मृत्यु के समय, तथा अन्य अपचारों ( ज्वर-निदान के सेवन आदि ) से तू लोक में 'ज्वर' होगा ॥ १५-२५ ॥
अ० ३ ] चिकित्सितस्थानम् २७७
अ० ३ ] चिकित्सितस्थानम् २७७
सन्तापः सारुचिस्तृष्णा चाङ्गमर्दो हृदि व्यथा।
ज्वरप्रभावो जन्मादौ निधने च महन्तमः ॥ २६ ॥
प्रकृतिश्च प्रवृत्तिश्च प्रभावश्च प्रदर्शितः ।
निदाने कारणान्यष्टौ पूर्वोक्तानि विभागशः ॥ २७ ॥
सन्ताप, अरुचि, तृष्णा, अगमर्द ( अंगों में पीड़ा अगड़ाई आदि ),
हृदय में पीड़ा का अनुभव होना यह ज्वर का प्रभाव है । ये लक्षण अपथ्य
सेवन से उत्पन्न ज्वर के हैं । जन्म तथा मृत्यु के समय होने वाला ज्वर महा-
तम होता है । इस प्रकार से प्रकृति, प्रवृत्ति और प्रभाव कह दिये हैं। निदान-
स्थान में ज्वर के आठ कारण विभाग रूप में प्रथम कहे जा चुके हैं ॥२६-२७॥
आलस्यं नयने सास्त्रे जृम्भग् गौरवं क्लमः ।
ज्वलनातपवाय्वम्बुभक्तिद्वेषावनिश्चितौ ॥ २८ ॥
अविपाकास्यवैरस्ये हानिश्च बलवर्णयो ।
शीलवैकृतमल्प च ज्वरलक्षणमग्रजम् ॥ २६ ॥
केवलं समनस्कं च ज्वराधिष्ठानमुच्यते ।
शरीरं, बलकालस्तु निदाने संप्रदर्शितः ॥ ३० ॥
ज्वर का पूर्वरूप—आलस्य, आंखों में आंसू, जम्भाई, शरीर में भारीपन,
क्लम, आग, धूप, वायु, पानी, भोजन में अनिश्चित रूप से इच्छा और द्वेष का
होना, अपचन, मुख की विरसता, बल और वर्ण की हानि, स्वभाव का परिवर्त्तन
ये ज्वर के सक्षिप्त पूर्वरूप है । सम्पूर्ण शरीर और मनोयुक्त शरीर ही ज्वर का
आश्रय-स्थान है । ज्वर का बल-काल निदान स्थान में दिखा दिया है ॥२८-३०॥
ज्वरप्रत्यात्मिकं लिङ्गं संतापो देहमानसः ।
ज्वरेणाविशता भूतं न हि किंचिन्न तप्यते ॥ ३१ ॥
ज्वर का अपना स्वरूप—देह और मन का सन्ताप ही ज्वर का अपना
स्वरूप है । ज्वर से आक्रान्त होने पर प्राणि का कोई भी ऐसा अंग नहीं होता,
जो कि तपता नहीं, गरम नहीं होता । अपितु सारा शरीर अन्दर और बाहर से
गरम हो जाता है ॥ ३१ ॥
द्विविधो विधिभेदेन ज्वरः शारीरमानसः ।
पुनश्च द्विविधो दृष्टः सौम्यश्चाग्नेय एव च ॥ ३२ ॥
अन्तर्वेगो बहिर्वेगो द्विविधः पुनरुच्यते ।
प्राकृतो वैकृतश्चैव साध्यश्चासाध्य एव च ॥ ३३ ॥
पुनः पञ्चविधो दृष्टो दोषकालबलाब्लात् ।
२७८ चरकसंहिता [ अ० ३ संततः सततोऽन्येद्युस्तृतीयकचतुर्थकौ ॥ ३४ ॥ पुनराश्रयभेदेन धातूनां सप्तधा मतः । भिन्नः कारणभेदेन पुनरष्टविधो ज्वर ॥ ३५ ॥ विधि-भेद से ज्वर दो प्रकार का है । एक शारीर ज्वर और दूसरा मानस ज्वर । फिर भी ज्वर दो प्रकार का देखा जाता है । जैसे-सौम्य और आग्नेय । वेग के अभिप्राय से भी दो प्रकार का है । अन्तर्वेग और बहिर्वेम । प्राकृत और वैकृत । साध्य और असाध्य भेद से भी ज्वर दो प्रकार का है । दोष और काल के बल-अबल के भेद से ज्वर पाच प्रकार का देखा गया है । जैसे-सन्तत, सतत, अन्येद्युष्क, तृतीयक और चतुर्थक । रस आदि सात धातुओं के भेद से ज्वर सात प्रकार का है । जैसे-रसज, रक्तज, मासज, मेदज, अस्थिज, मज्जाज और शुक्रज । कारण भेद से ज्वर आठ प्रकार का है । जैसे-वातज, पित्तज, कफज, पित्त-कफज, वात-कफज, वात-पित्तज, और सन्निपातज तथा आगन्तुज ॥३२-३५ ॥ शारीरो जायते पूर्वं देहे मनसि मानसः । वैचित्त्यमरतिर्ग्लानिर्मनसस्तापलक्षणम् ॥ ३६ ॥ इन्द्रियाणां च वैकृत्यं देहसन्तापलक्षणम् । वातपित्तात्मकः शीतमुष्णं वातकफात्मकः ॥ ३७ ॥ इच्छत्युभयमेतत्तु ज्वरो व्यामिश्रलक्षणः । योगवाही परं वायु संयोगादुभयार्थकृत् ॥ ३८ ॥ दाहकृत्तेजसा युक्तः शीतकृत्सोमसंश्रयात् । शारीरिक ज्वर वातादि दोष के कारण प्रथम शरीर में उत्पन्न हो जाता है । पीछे से मन आक्रान्त होता है । परन्तु मन में उत्पन्न होने वाला ज्वर प्रथम मन में होता है, पीछे से शरीर में आता है । मानस ज्वर के लक्षण-चित्त का विक्षिप्त होना, बेचैनी, ग्लानि का होना है । शारीरिक ज्वर में इन्द्रियों में विकृति उत्पन्न हो जाती है (अभिलषित विषय भी तब अच्छे नहीं लगते) । वात- पित्तजन्य ज्वर में उष्णता की चाह करता है । मिश्रित लक्षणों वाले ज्वर में शीत और उष्ण दोनों की चाह करता है । वायु अतियोगवाही है—सयोग के कारण दोनों कार्य करता है । पित्त के साथ मिलने से उष्णिमा, कफ के साथ मिलने से शीतलता को उत्पन्न करता है ॥ ३६-३८ ॥ अन्तर्दाहोऽधिकस्तृष्णा प्रलापः श्वसनं भ्रमः ॥ ३९ ॥ सन्धयस्थिशूलमस्वेदो दोषवच्र्चोविनिग्रहः ।
अ० ३ ] चिकित्सितस्थानम् २७९ अन्तर्वेगस्य लिङ्गानि ज्वरस्यैतानि लक्षयेत् ॥ ४० ॥ अन्तर्वेग ज्वर के लक्षण—शरीर के अन्दर दाह, प्यास का अधिक होना, प्रलाप, श्वास का तेज़ी से चलना, चक्कर आना, सन्धियों और अस्थियों म शूल, पसीने का आना, दोषों तथा वर्च (मल) का रुक जाना, बाहर न आना, ये अन्तर्वेग ज्वर के लक्षण हैं ॥ ३६-४० ॥ सन्तापोऽभ्यधिको बाह्यस्तृष्णादीनां च मार्दवम् । बहिर्वेगस्य लिङ्गानि सुखसाध्यत्वमेव च ॥ ४१ ॥ बहिर्वेग ज्वर के लक्षण—ज्वर में बाह्य ताप अधिक रहता है, तृष्णा, प्रलाप आदि लक्षण थोड़ी मात्रा में होते हैं, यह ज्वर सुखसाध्य है ॥४१॥ प्राकृतः सुखसाध्यस्तु वसन्तशरदुद्भवः । कालप्रकृतिमुद्दिश्य प्राच्यते प्राकृतो ज्वरः ॥ ४२ ॥ उष्णमुष्णन संवृद्ध पित्तं शरदि कुप्यति । चितः शीते कफश्चैव वसन्ते समुदीर्यते ॥ ४३ ॥ वसन्त और शरद् ऋतु में उत्पन्न होने वाला प्राकृत ज्वर सुखसाध्य है। वसन्त में उत्पन्न होनेवाला कफज्वर, शरद् में उत्पन्न होने वाला पित्तज्वर है। [ वर्षाऋतु में होनेवाला वातज्वर प्राकृत होते हुए भी सुखसाध्य नहीं है।] यहाँ पर काल-स्वभाव को देखकर ही यह प्राकृत ज्वर कहा जाता है। सञ्चित हुआ उष्ण गुणवाला पित्त धूप आदि की उष्णिमा के कारण शरद् ऋतु में कुपित होता है। इसी प्रकार से शीतकाल में सञ्चित कफ वसन्त ऋतु में कुपित होता है ॥ ४२-४३ ॥ वर्षास्वम्लविपाकाभिरोषधीभि १सवारिभिः । सञ्चितं पित्तमुद्रिक्तं२ शरद्यादित्यतेजसा ॥ ४४ ॥ ज्वरं संजनयत्याशु तस्य चानुबलः कफः । प्रकृत्यैव विसर्गाच्च तत्र नानशनाद्भयम् ॥ ४५ ॥ प्राकृत पैत्तिक ज्वर—वर्षाऋतु में ओषधियों और जलों के अम्लविपाकी होने से सञ्चित पित्त शरद् ऋतु में सूर्य के तेज से प्रकुपित होकर शीघ्र ज्वर को उत्पन्न करता है। काल के स्वभाव तथा विसर्ग के कारण इस ज्वर के साथ कफ का अनुबन्ध हो जाता है। अतः प्रकृति स्वभाव तथा विसर्ग काल होने से लंघन करने पर भी कोई नुकसान नहीं होता ॥ ४४-४५ ॥ १. 'रद्भिरोषधिभिस्तथा' इति च पाठः । २. 'पित्तमुत्क्लिष्टं' इति च ।
२८० चरकसंहिता [ अ० ३ अद्भिदोषधिभिश्चैव मधुराभिञ्चितः कफः । हेमन्ते सूर्यसन्तप्तः स वसन्ते प्रकुप्यति ॥ ४६ ॥ वसन्ते श्लेष्मणा तस्माज्ज्वरः समुपजायते । आदानमध्ये तस्यापि वातपित्तं भवेदनु ॥ ४७ ॥ आदावन्ते च मध्ये च बुद्ध्वा दोषबलाबलम् । शरदूसन्तयोर्विद्वाञ्ज्वरस्य प्रतिकारयेत् ॥ ४८ ॥ कालप्रकृतिमुद्दिश्य निर्दिष्टः प्राकृतो ज्वरः । मधुर रस, जल और ओषधियों द्वारा हेमन्त ऋतु में संचित कफ, वसन्त- ऋतु में सूर्य की गरमी द्वारा कुपित होता है । इसलिये वसन्तऋतु में कफजन्य ज्वर उत्पन्न होता है । जिससे यह आदान काल का मध्यवर्ती समय होता है, इसलिये वायु और पित्त भी इस कफ के अनुबन्ध बन जाते हैं। इससे इस समय भी थोड़ा लंघन करने से कोई भय नहीं रहता । कफ और पित्त दोनों द्रव धातु हैं, अतः ये लंघन को सहन कर सकते हैं। इसलिये वैद्य को चाहिये कि शरद् तथा वसन्त ऋतु में उत्पन्न प्राकृत ज्वर की चिकित्सा काल के आदि, अन्त और मध्य में दोष के बलाबल को देखकर करे । वसन्त के प्रारम्भ में कफ प्रबल, मध्य में मध्यबल, और अन्त में निर्बल, शरद् के प्रारम्भ में पित्त प्रबल, मध्य में मध्यबल और अन्त में निर्बल होता है । इस प्रकार काल की प्रकृति के उद्देश्य से प्राकृत ज्वर को कह दिया है ॥ ४६-४८ ॥ प्रायेणानिलजो दुःखः कालेष्वन्येषु वैकृतः ॥ ४६ ॥ वर्षाऋतु में होनेवाला वातजन्य ज्वर प्राकृत होते हुए भी प्रायः कष्टसाध्य होता है । इसी प्रकार अन्य कालों मे ( शरद् ऋतु में कफजन्य या वसन्त में पित्तजन्य ) उत्पन्न वैकृत ज्वर विरुद्ध चिकित्सा होने से कष्टसाध्य है ॥ ४६ ॥ हेतवो विविधास्तस्य निदाने संप्रदर्शिताः । बलवत्स्वल्पदोषेषु ज्वर. साध्योऽनुपद्रवः ॥ ५० ॥ इस वैकृत ज्वर के निदान कारणों को निदानस्थान में कह दिया है । बलवान् तथा अल्प दोषवाले पुरुषों मे उपद्रवों से रहित ज्वर साध्य है ॥ ५०॥ हेतुभिर्बहुभिर्जातो बलिभिर्बहुलक्षणः । ज्वरः प्राणान्तकृद्धश्च शीघ्रमिन्द्रियनाशनः ॥ ५१ ॥ जो ज्वर बहुत प्रबल कारणों को लेकर उत्पन्न होता है, बहुत से लक्षणों से युक्त हो शीघ्र इन्द्रिय-शक्तियों को नष्ट कर देता है, वह ज्वर प्राणनाशक होता है ॥ ५१ ॥
अ० ३ ] चिकित्सितस्थानम् २८१
अ० ३ ] चिकित्सितस्थानम् २८१ सप्ताहाद्वा दशाहाद्वा द्वादशाहात्तथैव च । सप्रलापभ्रमश्वासस्तीक्ष्णो हन्याज्ज्वरो नरम् ॥ ५२ ॥ प्रलाप, भ्रम ( चक्कर आना ), श्वास इन लक्षणों से युक्त तीक्ष्ण ज्वर सात दिन में, वातजन्य दस दिन में, पित्तजन्य और बारह दिन में कफजन्य ज्वर घातक होता है ॥ ५२ ॥ ज्वरः क्षीणस्य शूनस्य गम्भीरो दीर्घरात्रिकः । असाध्यो बलवान् यश्च केशसीमन्तकृज्ज्वरः ॥ ५३ ॥ क्षीण और शोष से युक्त व्यक्ति में गम्भीर और दीर्घकाल तक रहने वाला ज्वर असाध्य होता है । बलवान् ज्वर तथा जिसके कारण बालों में सीमंत ( माग ) पड़ जाती है, वह ज्वर भी असाध्य है ॥ ५३ ॥ स्रोतोभिर्विस्तृता दोषा गुरवो रसवाहिभिः । सर्वगात्रानुगा स्तब्धा ज्वरं कुर्वन्ति सन्ततम् ॥ ५४ ॥ प्रकुपित और आम सहित होने से गुरु वातादि दोष रसवाही स्रोतों द्वारा फैलकर सम्पूर्ण अंगों ( शरीर ) में पहुंच कर जड हो जाते हैं, इससे सन्तत ज्वर उत्पन्न होता है ॥ ५४ ॥ दशाहं द्वादशाहं वा सप्ताहं वा सुदुःसहः । स शीघ्रं शीघ्रकारित्वात्प्रशमं याति हन्ति वा ॥ ५५ ॥ कालदूष्यप्रकृतिभिर्दोषस्तुल्यो हि सन्ततम् । निष्प्रत्यनीकः कुरुते तस्माज्ज्ञेयः सुदुःसहः ॥ ५६ ॥ यथा धातुं तथा मूत्रं पुरीषं चानिलादयः । युगपच्चानुपद्यन्ते नियमात् सन्तते ज्वरे ॥ ५७ ॥ स शुद्ध्या वाप्यशुद्ध्या वा रसादीनामशेषतः । सप्ताहादिषु कालेषु प्रशमं याति हन्ति वा ॥ ५८ ॥ यदा तु नातिशुध्यन्ति न वा शुध्यन्ति सर्वशः । द्वादशैते समुद्दिष्टाः सन्ततस्याऽऽश्रय स्तदा ॥ ५६ ॥ विसर्गं द्वादशे कृत्वा दिवसेऽव्यक्तलक्षणम् । दुर्लभोपशमः काल दीर्घमप्यनुवर्तते ॥ ६० ॥ इति बुद्ध्वा ज्वरं वैद्य उपक्रामेत्त सन्ततम् । क्रियाक्रमविधौ युक्तः प्रायः प्रागपतर्पणै. ॥ ६१ ॥ यह दुःसह सन्तत ज्वर शीघ्रकारी होने के कारण दस दिन में (पित्तजन्य होने से), बारह दिन में (कफजन्य होने से), अथवा सात दिन में (वातजन्य
२८२ चरकसंहिता [ अ० ३ होने से ) शीघ्र शान्त हो जाता है, अथवा रोगी को मार देता है । सन्तत ज्वर के दुःसह होने का कारण—काल, दूष्य (रस आदि धातु) और प्रकृति के वातादि दोषों के तुल्य होने से सन्तत ज्वर कष्टसाध्य होता है । सन्तत ज्वर में वात आदि दोष जिस प्रकार से रस आदि धातुओं में पहुँचते हैं, उसी प्रकार से युगपत् रूप में मूत्र तथा मल में भी पहुचते हैं। यह सन्तत ज्वर रस आदियो के सर्वथा शुद्ध होने पर या अशुद्धावस्था में सप्ताह आदि काल के अन्दर या तो स्वय शान्त हो जाता है, अथवा मार देता है। जिस समय सन्तत ज्वर के बाहर आश्रय (तीन दोष, सात धातु और मल तथा मूत्र ) अत्यन्त शुद्ध नही होते अथवा कुछ शुद्ध हो जाते हैं और कुछ अशुद्ध रहते हैं, तब बारहवें दिन अस्पष्ट लक्षणों से ज्वर उतर जाता है, परन्तु कष्टसाध्य होकर दीर्घ काल तक चलता रहता है । सन्तत ज्वर को इस प्रकार से समझ कर चिकित्सा आरम्भ करनी चाहिये । चिकित्सा में भी प्रथम अपतर्पण (लङ्घन) आरम्भ करना चाहिये ॥ ५७-६१ ॥ रक्तधात्वाश्रय प्रायो दोषः सततक ज्वरम् । सप्रत्यनीकः कुरुते कालवृद्धिक्षयात्मकम् ॥ ६२ ॥ अहोरात्र सततको द्वौ कालावर्तते । विरोधी दोष प्रायः करके रक्त-धातु में आश्रित होकर काल में बढ़ने वाले और काल में घटने वाले (क्षीण होने वाले ) सतत ज्वर को उत्पन्न करते हैं। यह ज्वर समय पर बढ़ता है और समय पर घटता है । काल प्रकृति और दूष्य इनमे से किसी एक का बल प्राप्त करक सतत ज्वर दिन रात में (२४ घण्टे में) दो बार आता है ॥ ६२-॥ कालप्रकृतिदूष्याणां प्राप्यवान्यतमद्बलम् ॥ ६३ ॥ दोषो मेदोवहा रुद्ध्वा नाडीरन्येद्युक ज्वरम् । सप्रत्यनीकः कुरुते एककालमहर्निशं ॥ ६४ ॥ दोषोऽस्थिमज्जगः कुर्यात्तृतीयकचतुर्थ कौ । काल प्रकृति और दूष्य इनमें से किसी एक के विरोधी होने पर दोष मेदोवहा नाड़ियों को रोक कर अन्येद्युष्क ज्वर को उत्पन्न करते हैं। यह दिन रात में एक बार आता है। अस्थि और मज्जा मे दोष पहुच कर तृतीयक और चतुर्थक ज्वर को उत्पन्न करते हैं । ॥ ६३-६४-॥ गतिद्वये॑कान्तरान्येद्युर्दोषस्योक्ताऽन्यथा परैः ॥ ६५ ॥ रक्तमेवाभिसंसृज्य कुर्यादन्येद्युक ज्वरम् । मांसस्रोतांस्यनुसृतो जनयेत्तु तृतीयकम् ॥ ६६ ॥
अ० ३ ] चिकित्सास्थानम् २८३
अ० ३ ] चिकित्सास्थानम् २८३ ज्वरं दोषः संसृतो हि मेदो मार्गं चतुर्थकम् । अन्येद्युष्कः प्रतिदिनं दिनं क्षिप्त्वा तृतीयकः ॥ ६७ ॥ दिनद्वयं यो विश्राम्य प्रत्येति स चतुर्थकः । अधिशेते यथा भूमि बीजं काले च रोहति ॥ ६८ ॥ अधिशेते तथा धातु दोषः काले च कुप्यति । स वृद्धि बलकाल च प्राप्य दोषस्तृतीयकम् ॥ ६९ ॥ चतुर्थकं च कुरुते प्रत्यनीकबलक्षयात । कृत्वा वेगं गतबलाः स्वे स्वे स्थाने व्यवस्थिताः ॥ ७० ॥ पुनर्विवृद्धाः काले ज्वरयन्ति नर मलाः । दोषों की गति—प्रति दिन, एक दिन के अन्तर से और दो दिन के अन्तर से कही गई है । जब प्रति दिन ज्वर आता है उसे अन्येद्युष्क कहते है, एक दिन के अन्तर से आवे तो 'तृतीयक' और दो दिन अंतर से आवे ता 'चतुर्थक' कहते हैं । अन्येद्युष्क ज्वर प्रति दिन लौट कर आता है, तृतीयक ज्वर एक दिन छोड़ कर आता है, चतुर्थक ज्वर दो दिन पीछे लौट कर आता है । जिस प्रकार कि बीज भूमि में पड़ा रहता है और अपने समय पर उगता है, इसी प्रकार से वातादि दोष रस, रक्तादि धातुओं में पड़े रहते हैं और समय पाकर प्रकुपित होते हैं । दोष, बल और काल की सहायता पाकर विरोधी बल के क्षीण होने पर तृतीयक और चतुर्थक ज्वर को उत्पन्न करते हैं । ज्वर वेग को उत्पन्न करके निर्बल हुए दोष अपने अपने स्थानों में पहुच जाते हैं । अपने अनुकूल परिस्थिति ( काल ) में ज्वर को पुन: उत्पन्न कर देते हैं ॥ ६५-७०- ॥ कफपित्तात् त्रिकग्राही पृष्ठाद् वातकफात्मकः ॥ ७१ ॥ वातपित्ताच्छिरोग्राही त्रिविधः स्यात्तृतीयकः । तृतीयक ज्वर तीन प्रकार का है । जिस तृतीयक ज्वर मे प्रथम त्रिक स्थान ( कूल्हे ) में वेदना होती है, वह कफ-पित्त के कारण होता है । जिस तृतीयक ज्वर में पीठ में वेदना प्रथम होती है वह वात-कफजन्य है । जिस तृतीयक ज्वर मे शिर में वेदना प्रथम होती है, वह वात-पित्तजन्य है । इस प्रकार से यह तृतीयक ज्वर तीन प्रकार है ॥ ७१- ॥ चतुर्थको दर्शयति प्रभावं विविध ज्वरः ॥ ७२ ॥ जङ्घाभ्यां श्लैष्मिकः पूर्व शिरस्तोऽनिलसंभवः । विषमज्वर एवान्यश्चतुर्थकविपर्ययः ॥ ७३ ॥ त्रिविधो धातुरेकैको द्विधातुस्थः करोत्ययम् !
२८४ चरकसंहिता [ अ० ३ चतुर्थक ज्वर दो प्रकार से अपना प्रभाव दिखाता है, अतः वह दो प्रकार का है। जिस ज्वर में आक्रमण जंघाओं की ओर से या पाव से होता है वह कफजन्य है और जिसमें शिर पर सबसे प्रथम आक्रमण होता है वह वायुजन्य है। ^१चातुर्थक ज्वर का ही एक विपर्यय (भेद) विषम ज्वर है। यह तीन धातु-वात, पित्त, कफ में से किसी एक धातु के दो धातुओं में स्थिति होने से होता है। इस ज्वर मे एक दिन आक्रमण नहीं होता, फिर अगले दो दिन होता है और फिर एक दिन नहीं होता ॥ ७२-७३- ॥ प्रायशः संनिपातेन दृष्टः पञ्चविधो ज्वरः ॥ ७४ ॥ सन्निपाते तु यो भूयान् स दोषः परकीर्तितः । प्रायः करके ( कहीं कहीं अपवाद भी होता है), सन्तत, सतत, अन्येद्युष्क, तृतीयक, चतुर्थक और सनिपात (त्रिदोष) से उत्पन्न यह पाच प्रकार का ज्वर होता है। संनिपात के समय जो भी दोष प्रबल होता है, उसी के नाम से उस ज्वर को कहते हैं दूसरे दोषों का भी अनुबन्ध थोड़ा बहुत रहता है ॥७४-॥ ऋत्वहोरात्रदोषाणां मनसश्च बलाबलात् ॥ ७५ ॥ कालमर्थवशाच्चैव ज्वरस्तं तं प्रपद्यते । ऋतु, दिन, रात, दोष और मन के बल-अबल के कारण तथा अर्थवश (प्राक्तन कर्म) के कारण उस उस समय में ज्वर होता है। [जैसे-ऋतु के बलाबल से वर्षाकाल से वर्षाकाल में उत्पन्न वातप्रधान सतत ज्वर विरोधी शरद् ऋतु में अन्येद्युष्क रूप में आ जाता है। अहोरात्र वसन्त काल के मध्य दिवसों मे उत्पन्न वातिक चतुर्थक ज्वर पिछले दिनों में बलवान् होकर तृतीयक हो जाता है। मन के बल से ज्वर अन्य रूप में आ जाता है। कहा भी है “विषाद का करना भी रोग को बढ़ाने वाला है”।] ॥ ७५ ॥ गुरुत्वं^२ दैन्यमुद्वेगः सदनं छर्द्यरोचकौ ॥ ७६ ॥ रसस्थिते बहिस्तापः साङ्गमर्दो विजृम्भणम् । रक्तोत्था^३ पिडकास्तृष्णा सरक्तं ष्ठीवनं मुहुः ॥ ७७ ॥ दाहरागभ्रम^४ मदाः प्रलापो रक्तसंस्थिते । अन्तर्दाहोऽधिकस्तृष्णा ग्लानिः संसृष्टविट्कता^५ ॥ ७८ ॥ १. हारीत संहिता में पित्तजन्य चतुर्थक ज्वर भी माना है। २. ‘शैत्यमु’ इति च पाठः । ३ 'रक्तोष्ठः' इति च पाठः । ४ 'श्रम' इति पाठ. । ५. 'अन्त- र्दाहः सतृण्मोहः सग्लानिः सृष्टविट्कता' इति वा पाठ. ।