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चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

४४२ चरकसंहिता [अ० ६ ऋतु के अनुकूल स्नानो से, नूतन-स्वच्छ वस्त्रो के पहिनने से, सुन्दर मित्रो तथा स्त्रिया के दर्शन से, कर्णप्रिय गाने, बजाने की ध्वनि से, आनन्द और सान्त्वना से, गुरुओ के सत्सग से, ब्रह्मचर्य से, दान से, तप से, देवताओ की भक्ति से, सत्य से, शुभाचरण से, मगलग्रारी और अहिंसात्मक कार्यों से, वैद्य ओर ब्राह्मण की पूजा से ओर शुभ-कार्यो के करने से यक्ष्मा-रोग नष्ट हो जाता है ॥ १८४-१८८ ॥ यया प्रयुक्तया चेष्टया राजयक्ष्मा पुरा जितः । ता वेदविहितामिष्टिमारोग्यार्थी प्रयोजयेत् ॥ १८६ ॥ पुरातन काल में जिस यज्ञ क्रिया से यक्ष्मा रोग जीत लिया गया हो, उस वेदविहित यज्ञ को आरोग्य का इच्छुक पुरुष करे ॥ १८६ ॥ तत्र श्लोको—प्रागुत्पत्तिनिमित्तानि प्राग्रूप रूपसंग्रहः । समासाद् व्यासतःश्चोक्त भेषजं राजयक्ष्मणः ॥ १६० ॥ नामहेतुरसाध्यत्वं साध्यत्वं कृच्छ्रसाध्यता । इत्युक्तः संग्रहः कृत्स्नो राजयक्ष्मचिकित्सिते ॥ १६१ ॥ उपसहार—राजयक्ष्मा-रोग की उत्पत्ति, कारण, प्राग्-रूप, रूप तथा चिकित्सा का सक्षेप और विस्तार से कह दिया है। राजयक्ष्मा नाम का कारण, साध्यता, असाध्यता, कष्टसाध्यता ये सब राजयक्ष्म-चिकित्सा मे सग्रह कर दिये हैं ॥ १६०-१६१ ॥ इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसस्कृते चिकित्सितस्थाने राजयक्ष्मचिकित्सित नामाष्टमोऽध्याय ॥ ८ ॥ नवमोऽध्यायः अथात उन्मादचिकित्सित व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥ इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥ इसके आगे उन्माद की चिकित्सा कहते है। भगवान् आत्रेय ने ऐसा उपदेश किया है ॥ १-२ ॥ बुद्धिस्मृतिज्ञानतपोनिवासः पुनर्वसुः प्राणभृता शरण्यः । उन्मादहेत्वाकृतिभेषजानि कालेऽग्निवेशाय शशंस पृष्टः ॥ ३ ॥ बुद्धि (अवबोध), स्मृति (स्मरण), ज्ञान (तत्त्वज्ञान), तप (द्वन्द्व सहिष्णुता व्रत, तपश्चरण आदि) इनके निवास आश्रयभूत, प्राणियों की

अ० ६ ] चिकित्सास्थानम् ४४३

अ० ६ ] चिकित्सास्थानम् ४४३ रक्षा मे श्रेष्ठ भगवान् आत्रेय ने उचित अवसर पर, अग्निवेश के प्रश्न करने पर उन्माद-रोग के कारण, लक्षण और चिकित्सा का अग्निवेश को उपदेश किया ॥३॥ विरुद्धदुष्टाशुचिभोजनानि प्रधर्षणं देवगुरुद्विजानाम् । उन्मादहेतुर्भयहर्षपूर्वो मनोऽभिघातो विषमाश्च चेष्टाः ॥४॥ उन्माद के कारण और सामान्य लक्षण—विरुद्ध ( संयोग-विरुद्ध जैसे— मछली और दूध ), विष आदि से दूषित और अपवित्र खान-पान, देव, गुरु- जन, ( माता-पिता और आचार्य ) और द्विजो (ब्राह्मणो ) का तिरस्कार, भय या हर्ष के कारण मन पर आघात होना, ( इसी प्रकार क्रोध, शोक, चिन्ता आदि से मन पर चोट पहुचना ) और शरीर की क्रियाओ का विषम होना, ये सब बाते उन्माद रोग के कारण है ॥ ४ ॥ तैरल्पसत्त्वस्य मलाः प्रदुष्टा बुद्धेर्निवासं हृदयं प्रर्दूष्य । स्रोतांस्यधिष्ठाय मनोवहानि प्रमोहयन्त्याशु नरस्य चेतः ॥ ५ ॥ सम्प्राप्ति—उपरोक्त कारणों से अल्पसत्त्व अर्थात् दुर्बल व्यक्ति मे मल ( वात आदि दोष ) प्रकुपित होकर, बुद्धि ज्ञान और स्मृति के आश्रय-स्थान हृदय को दूषित कर देते है ओर मनोवह स्रोता का आश्रय लेकर पुरुष के चित्त को शीघ्र ही माहित अर्थात् विपरीत ज्ञान वाला और विचलित कर देते है ॥५॥ धीविभ्रमः सत्त्वपरिस्रवश्च पर्याकुला दृष्टिरधीरता च । अबद्धवाक्त्वं हृदयं च शून्यं सामान्यमुन्मादगदस्य लिङ्गम् ॥ ६ ॥ लक्षण—धी-विभ्रम ( बुद्धि का भ्रश ), सत्त्वपरिस्रव ( मन की अति चञ्च- लता ), आखो मे व्याकुलता ( इधर-उधर देखना ), अधीरता, असम्बद्ध वाणी, हृदयशून्यता अर्थात् भाव से रहित हृदय होना, ये सब निज और आगन्तुज दोनो प्रकार के उन्मादो के लक्षण है ॥ ६ ॥ स मूढचेता न सुख न दुःखं नाऽऽचारधर्मौ कुत एव शान्तिम् । विन्दत्यपास्तस्मृतिबुद्धिसंज्ञो भ्रमत्ययं चेत इतस्ततश्च ॥ ७ ॥ इस मूढ चित्तवाले पुरुष को न सुख का, न दुःख का और न आचार ( मर्यादा ) का, न धर्म का ज्ञान रहता है, इसलिये चित्त को कही भी शान्ति प्राप्त नही होती । इस व्यक्ति की स्मृति, बुद्धि और सज्ञा सब नष्ट हो जाती है, यह व्यक्ति चित्त को इधर-उधर डोलाता रहता है ॥ ७ ॥ समुद्भ्रमं बुद्धिमनास्मृतीनामुन्मादमागन्तुनिजोत्थमाहुः । तस्योद्भवं पञ्चविधं पृथक् तु १ वक्ष्यामि लिङ्गानि चिकित्सितं च ॥८॥ १ 'पञ्चविधस्य भूयो' इति वा ।

लक्षण और चिकित्सा पृथक् २ कहेगे ॥ ८ ॥

४४४ चरकसंहिता [ अ० ६ बुद्धि, मन और स्मृति का भ्रंश होना ही उन्माद का स्वरूप है। कारण- भेद से उन्माद रोग दो प्रकार का है । ( १ ) निज—शरीर के दोष से उत्पन्न और ( २ ) आगन्तुज । इस उन्माद की उत्पत्ति पाच प्रकार की है । ( १ वातज, २ पित्तज, ३ कफज, ४ सन्निपातज और ५ आगन्तुज१ ) प्रत्येक के लक्षण और चिकित्सा पृथक् २ कहेगे ॥ ८ ॥ रूक्षाल्पशीतान्नविरेकधातुक्षयोपवासैरनिलोऽतिवृद्धः । चिन्तादियुक्तं हृदयं प्रदूष्य बुद्धिं स्मृति चाप्युपहन्ति शीघ्रम् ॥ ९ ॥ अस्थानहासस्मितनृत्यगीतवागङ्गविक्षेपणरोदनानि । पारुष्यकाश्यरु णवणताश्च जीर्णे बलं चानिलजस्य रूपम् ॥ १० ॥ ( १ ) वातजन्य उन्माद—रूक्ष अल्प और शीतल अन्न से, वमन या विरेचन-रूप से दोषा का निकालने वाले कमो से रस-रक्त आदि धातुओ का क्षय होने से, उपवासो से, बढ़ा हुआ वायु अल्पमत्त्व ( निर्बल ) व्यक्ति के चिन्ता, शोक क्रोध, लोभ, काम आदि से युक्त हृदय को दूषित करके, बुद्धि स्मृति का भी शीघ्र ही नष्ट ( चञ्चल, अस्थिर, बेचैन ) कर देता है । लक्षण—इसके कारण से व्यक्ति बिना स्थान ( बिना अवसर ) ही जार मे हसने लगता है, मुस्कराता है, नाचता है, रोता है, अगो का इधर-उधर चलाता है, रोता है। रोगी का शरीर कठोर, कृश, अरुण ( लाल ) वर्ण का हो जाता है, आहार के जीर्ण होने पर रोग का बल बढ जाता है, ये वातजन्य उन्माद के लक्षण है ॥ ६-१० ॥ अजीर्णकट्वम्लविदाह्यशीतैर्भोज्यैश्चितं पित्तमुदीर्णवेगम् । उन्मादमत्युग्रमनात्मवस्य हृदि श्रितं पूर्ववदाशु कुर्यात् ॥ ११ ॥ अमर्षसंरम्भविनग्नभावाः सन्तर्जनाभिद्रवणौष्ण्यरोषाः । प्रच्छायशीतान्नजलाभिलाषाः पीता च भाः पित्तकृतस्य लिङ्गम् ॥ १२ ॥ ( २ ) पित्तज उन्माद—अजीर्ण, कटु, अम्ल, विदाही और उष्ण आहार से कुपित हुआ पित्त अनात्मवान् ( अधीर, निर्बल ) पुरुष के हृदय मे स्थित १ सुश्रुत और अष्टाङ्ग-सग्रह मे विषजन्य उन्माद का मान कर छ प्रकार के उन्माद माने है। वहा कहा है-‘षडुन्मादा भवन्ति’ । परन्तु क्योकि विष की मद-सज्ञा होने से इसका निजोन्माद मे ही अन्तर्भाव करना चाहिये । जैसे— 'यथास्व तत्र भेषजम्' । सुश्रुत—'यश्च मद्यकृत प्रोक्तो विषजो रौधिरश्च य । सर्व एव मदा नर्त्तं वातपित्तकफात् त्रयात् ॥

अ० ९] चिकित्सास्थानम् ४४५

अ० ९] चिकित्सास्थानम् ४४५ होकर, हृदय को दूषित करके शीघ्र ही अति भयकर, तीव्र, उन्माद का उत्पन्न करता है। लक्षण--विना अवसर के ही अमर्ष अर्थात् अक्षमा, क्रोध करना, संरम्भ (किसी काम मे बहुत जल्दी करना), नगा हो जाना, संतर्जन (भर्त्सना), अभिद्रवण (भागना), शरीर का उष्ण होना, क्रोध करना, छायायुक्त स्थान की चाह, शीतल खान-पान की इच्छा का होना, शरीर मे पिलाई की झलक होना, ये सब पित्तजन्य उन्माद के लक्षण है। इस मे रोग का बल भोजन की जीर्ण- अवस्था मे अधिक होता है ॥ ११-१२ ॥ संपूर्यैर्मन्दविचेष्टितस्य सोष्मा कफो मर्मणि संप्रवृद्धः । बुद्धिं स्मृति चाप्युपहृत्य चित्तं प्रमोहयन्संजनयेद्विकारम् ॥ १३ ॥ वाक्चेष्टितं मन्दमरोचकश्च नारीविविक्तप्रियताऽतिनिद्रा । छर्दिश्च लाला च बलं च भुक्ते नखादिशौक्ल्यं च कफात्मके स्यात् ॥१४॥ (३) कफज उन्माद—मन्द चेष्टाशील (प्राय करके शयन, आसन आदि पर रहने वाले), व्यक्ति के अति भोजन करने से, ऊष्मा अर्थात् उष्णता की इच्छा सहित कफ, मर्म अर्थात् हृदय मे बढ कर, बुद्धि और स्मृति का नाश करके चित्त को मोहित कर उन्माद रोग को उत्पन्न करता है१ । लक्षण—वाणी और शरीर की चेष्टा का मन्द होना, अरोचक (अरुचि), स्त्रीसग की चाह, एकान्त, निर्जन स्थान की अभिलाषा, नीद का अधिक आना, छर्दि और लाला-स्राव, आहार के खाने पर रोग का बल बढना, नख, त्वचा, मूत्र आदि का श्वेत होना कफोन्माद के लक्षण है ॥ १३-१४ ॥ यः सन्निपातप्रभवोऽतिघोरः सर्वैः समस्तैः स तु हेतुभिः स्यात् । सर्वाणि रूपाणि बिभर्ति तादृग्विरुद्धभेषज्यविधिर्विवर्ज्यः ॥ १५ ॥ (४) सन्निपातजन्य उन्माद—तीनो दोषों से मिलकर उत्पन्न हुआ उन्माद अति दारुण होता है। इसमे वात आदि तीनो दोष कारण रूप से सम्मिलित रहते है, इसलिये इसमे सब दोषों के लक्षण भी रहते है। इसमे चिकित्सा परस्पर विरोधिनी होने के कारण यह असाध्य है ॥ १५ ॥ देवर्षिगन्धर्वपिशाचयक्षरक्षःपितॄणामभिधर्षणानि । आगन्तुहेतुर्नियमव्रतादि मिथ्याकृतं कर्म च पूर्वदेहे ॥ १६ ॥ १ कफान्माद मे उष्णता की अभिलाषा होती है। जैसा कि सुश्रुत मे कहा ह— “निद्रापरोऽल्पकथनोऽल्पभुगुष्णसेवी- रात्रौ भृश गवति चापि कफप्रयोगात् ।”

४४६ चरकसंहिता [ अ० ६ अमर्त्यवाग्विक्रमवीर्यचेष्टो ज्ञानादिविज्ञानबलादिभिर्यः । उन्मादकालोऽनियतश्च यस्य भूतोत्थमुन्मादमुदाहरेत्तम् ॥ १७ ॥ अदूषयन्तः पुरुषस्य देहं देवाद्यः स्वैश्च गुणप्रभावैः । विशन्त्यदृश्यास्तरसा यथैव छायायातपौ दर्पणसूर्यकान्तौ ॥ १८ ॥ ( ५ ) आगन्तुज उन्माद—देवता, ऋषि, गन्धर्व, पिशाच, यक्ष, राक्षस ( राक्षस और ब्रह्मराक्षस ) और पितर इन आठो ग्रहो का तिरस्कार करना, नियमपूर्वक व्रतादि का आचरण न करना और पूर्वजन्म मे उत्तम कर्म न होना ये आगन्तुज उन्माद रोग के कारण है । लक्षण—(१) जिस उन्माद-रोगी मे अमानुषीय ( दैवी ), वाणी, पराक्रम, शूरता, शरीर क्रियाये दिखाई दे, जिसका ज्ञान, बुद्धि, स्मृति, विज्ञान ( शिल्प सम्बन्धी ज्ञान ), और अमानुषी बल ( मनुष्य सीमा से अधिक ) प्रतीत हो, जिस उन्माद का काल निश्चय न हो ( कभी प्रात, कभी मध्याह्न और कभी सायकाल हो ), इस प्रकार के उन्माद को भूतोन्माद जानना चाहिये । जिस प्रकार अपने गुणो के प्रभाव से दर्पण मे छाया ( प्रतिबिम्ब ) और सूर्य कान्त- मणि मे सूर्य की किरणे प्रवेश करती है, परन्तु दिखाई नही देती, उसी प्रकार से देव आदि भी मनुष्य के शरीर को दूषित किये बिना ही अपने गुणों के प्रभाव से अतिवेग से प्रविष्ट हो जाते है । [ ये वात आदि दोषो के समान शरीर को दूषित नही करते ] ॥ १६-१८ ॥ आघातकालास्तु सपूर्वरूपाः प्रोक्ता निदानेऽथ सुरादिभिश्च । उन्मादरूपाणि पृथङ्निबोध कालं च गम्यान्पुरुषांश्च तेषाम् ॥ १९ ॥ अभिगमनीय पुरुषो पर आघात ( आक्रमण ) के काल और आगन्तुज उन्माद के पूर्वरूप ये निदान स्थान मे प्रथम कह दिये है । अब देवता आदि आठो ग्रहो के द्वारा उत्पन्न उन्माद के लक्षण, अभिगमन-काल और यह रोग जिन पुरुषों को होता है यह सब पृथक् २ सुनो । [ यद्यपि देव आदि का प्रवेश दिखाई नही देता तथापि ज्ञान, विज्ञान- शीलता आदि लक्षणो से इनका अनुमान करना चाहिये ] ॥ १६ ॥ तद्यथा—सौम्यदृष्टि गम्भीरमप्रधृष्यमकोपनमस्वप्नमभोजनाभिला- षिणमल्पस्वेद-मूत्र-पुरीष-वाचं शुभगन्धं फुल्ल-पद्म-वदनमिति देवोन्मत्तं विद्यात् ॥ २० ॥ ( १ ) देवोन्माद—दृष्टि प्रसन्न ( निर्मल आख ) हो, गम्भीर हो, लज्जाशील हो, क्रोध से रहित हो, निद्रा से रहित हो, भोजन की अभिलाषा से रहित हो,

थोडे पसीने हो, थोडे ही मूत्र और मल हो, थोड़ा बोले, शोभन गन्ध हो, खिले हुए कमल के समान विकसित मुख हो, ऐसे लक्षणों वाले पुरुष को देवग्रहो से उन्मत्त हुआ जाने ॥ २० ॥ गुरुवृद्धसिद्धर्षीणामभिशापाभिचाराभिध्यानानुरूपाहारचेष्टान्याहार तैरून्मत्तं विद्यात् ॥ २१ ॥ (२) गुरु वृद्ध आदि से उत्पन्न उन्माद—गुरु, वृद्ध, सिद्ध ( इन तीन ग्रन्भेदो ) और ऋषियो के अभिशाप, अभिचार, और अभिध्यान के अनुकूल जिस रोगी की चेष्टा आदि हो, उसको गुरु, वृद्ध और सिद्ध ग्रहो से उन्मत्त हुआ जाने १ ॥ २१ ॥ अप्रसन्नदृष्टिमपश्यन्तं निद्रालु प्रतिहतवाचमनन्नाभिलाषिणमरोच- काविपाकपरीतं पितृभिरुन्मत्तं विद्यात् ॥ २२ ॥ (३) पित्तग्रह—मलिन दृष्टि, लोगो की ओर आख उठा कर न देखे, निद्राशील, निरुद्धवाक् (रुक रुक कर बोले ), अन्न की चाह न रखे, परन्तु पितृभोज्य तिल गुड़ आदि की चाह करे, अरोचक, अविपाक ( मन्दाग्नि ) युक्त हो, ऐसे पुरुष को पितृग्रहो से उन्मत्त समझे ॥ २२ ॥ चण्डं साहसिकं तीक्ष्णं गम्भीरमप्रधृष्यं मुख-वाद्य-नृत्य-गीतान्न-पान- स्नान-माल्य-धूप-गन्ध-रति रक्त-वस्त्र-बलि-कर्म-हास्य-कथानुयोगप्रियं शुभ- गन्धं च गन्धर्वोन्मत्तं विद्यात् ॥ २३ ॥ (४) गन्धर्व-ग्रह—मुख से बाजा बजावे, नाचे, गावे, खान-पान, स्नान, माला, धूप और सुगन्धित वस्तुओ की चाह करे, लाल वस्त्र, बलिकर्म, हास्य, कथा ( बातचीत ), अनुयोग ( पूछने की इच्छा ) करे और शुभ गन्ध युक्त हो, ऐसे मनुष्य को गन्धर्व-ग्रह से उन्मत्त हुआ जाने ॥ २३ ॥ असकृत्स्वप्न-रोदन-हास्यं नृत्य-गीत-वाद्य-पाठ कथान्न-पान-स्नान- माल्य-धूप-गन्ध-रति रक्त-विप्लुताक्ष द्विजाति-वैद्य-परिवादिनं रहस्य- भाषिणमिति यक्षोन्मत्तं विद्यात् ॥ २४ ॥ (५) यक्षोन्माद—बार-बार नीद ले, लेटे, रोवे, हसे, नाचे, गावे-बजावे, पाठ करे, बातचीत, खानपान, स्नान, माला, धूप, गन्ध मे इच्छा रखे, आखे लाल और भय से चकित हो, ब्राह्मण आदि द्विजो तथा वैद्यो की निन्दा करे, १ अष्टाग-सग्रह मे १८ ग्रह गिने है । जैसे—सुर, असुर, गन्धर्व, उरग, यक्ष, राक्षस, ब्रह्मराक्षस, पिशाच, प्रेत, कूष्माण्डक, ककाल, दौर्किर, बेताल, पितृ, ऋषि, गुरु, सिद्ध और वृद्ध ।

४४८ चरकसंहिता [अ० ६

एकान्त मे बातचीत करे, ऐसे प्रकृति वाले पुरुष को यक्षग्रह से उन्मत्त हुआ जाने ॥ २४ ॥ नष्टनिद्रमन्न-पान-द्वेषिणमनाहारमप्रतिबलिनं शस्त्र-शोणित-मांस-रक्त- माल्याभिलाषिणं सन्तर्जकं च राक्षसोन्मत्तं विद्यात् ॥ २५ ॥ (६) राक्षसोन्माद—रात को नींद न आये, रोगी रात को विचरे, खान- पान से द्वेप रखे, बिना आहार के भी अति बलवान् हो, शस्त्र, रक्त, मास, लाल माला की चाह करे ओर दूसरे को डाट का भय दिखावे, ऐसे व्यक्ति को राक्षस- ग्रह से उन्मत्त जाने ॥ २५ ॥ प्रहास-नृत्य-प्रधानं १ देव-विप्र-वैद्य-द्वेपावज्ञाभिः स्तुति- २ वेद-मन्त्र-शा- स्त्रोदाहरणैः काष्ठादिभिरात्मपीडनेन च ब्रह्मराक्षसोन्मत्तं विद्यात् ॥२६॥ (७) ब्रह्मराक्षस—हास्य करे और नृत्य करे, देव, ब्राह्मण और वैद्यो मे द्वेष, अनाहार तथा देवता आदि की स्तुति करे, वेद, मत्र, धर्मशास्त्र इनके अनेक उदाहरण दे, लकडी, डेले आदि से अपने शरीर को आघात पहुचावे, ऐसे व्यक्ति को ब्रह्मराक्षस से उन्मत्त समझे ॥२६॥ अस्वस्थचित्तं स्थानमलभमानं नृत्य-गीत-हासिनं बद्धाबद्धप्रलापिनं ३ संकर-कूट-मलिन-रथ्याचैल-तृणाश्म-काष्ठाधिरोहणरतिं ४ संभिन्न-रूक्ष- वर्ण-स्वरं नग्नं विधावन्तं नैकत्र तिष्ठन्तं दुःखान्यावेदयन्तं नष्टस्मृतिं च पिशाचोन्मत्तं विद्यात् ॥ २७ ॥ (८) पिशाचोन्माद—अस्वस्थ मन हो, नाचे, गावे, हसे, सम्बद्ध और असम्बद्ध बातचीत करे, संकर (झाडू से एकत्र किये धूल तिनके आदि), कूट (मिट्टी का ढेर), मैले रास्ते, मलिन वस्त्र, तिनके, पत्थर, लकडी इन पर चढने की प्रवृत्ति हो, जिसके वर्ण मिलेजुले हो, स्वर रूखा ओर एक समान न रहता हो (बदलता रहे), नगा रहे, इधर-उधर भागे, एक स्थान पर न बैठे, दूसरे के सामने अपने दुःख की कथा कहे तथा स्मृति नष्ट हो गई हो, ऐसे व्यक्ति को पिशाचग्रह से उन्मत्त समझे ॥ २७ ॥ तत्र शौचाचारं तपःस्वाध्यायकोविदं नर प्रायः शुक्लप्रतिपदि त्रयो- दश्या च देवाः, ज्ञान-शुचि-विविक्त-सेविनं धर्म-शास्त्र-श्रुति-काव्य-कुशलं प्रायः षष्टिनवम्योर्ऋषयः, मातृ-पितृगुरु-वृद्ध-सिद्धाचार्योपसेविनं प्रायो दशम्याममावास्यायां च पितरः, गन्धर्वास्तु स्तुति-गीत-वादित्र-रति पर- १ 'प्रहासनृत्यवादिन' इति । २ 'वज्ञाभिस्तुति-' इति । ३. 'बद्धप्रभाषिण' इति च । ४. 'तृणेषु आरोहण-' इति च पाठः ।

अ० ९ ] २६ चिकित्सितस्थानम् ४४६

अ० ९ ] २६ चिकित्सितस्थानम् ४४६ दार-गन्ध-माल्य-प्रियं शोचाचारं द्वादश्या चतुर्थ्यां च, सत्त्व-बल-रूप- गर्व-शौर्य-युक्तं माल्यानुलेपनं हास्यप्रियमतिवाक्करणं प्रायः शुक्लैकादश्यां सप्तम्यां च यक्षाः, स्वाध्याय-तपो-नियमोपवास-व्रतचर्या-देव-यति-गुरु-पू- जारति नष्टशौचं ब्रह्मवादिनं शूरमानिनं देवतागार-सलिल-क्रीडनरति प्रायः शुक्लपञ्चम्यां पूर्णचन्द्रदर्शने च ब्रह्मराक्षसाः, रक्षःपिशाचास्तु हीन-सत्त्व- पिशुन-क्रौण-लुब्धं प्रायो द्वितीयातृतीयाष्टमीषु पुरुषं छिद्रमवेक्ष्याभिधर्ष- यन्ति१ । इत्यपरिसंख्येयानां ग्रहाणामाविष्कृततमा ह्यष्टावेते व्या- ख्याताः ॥ २८ ॥ आगमन काल—इनमे शौच ( शुचि, पवित्र ) आचार वाले, तप और वेदाध्ययन मे पण्डित पुरुष के छिद्र ( त्रुटि अवकाश ) को ढूंढकर प्रायः शुक्ल- पक्ष की प्रतिपदा या त्रयोदशी के दिन उसको देवग्रह आक्रान्त करते हैं। ऋषि- ग्रह—स्नान, पवित्र द्रव्य, एकान्तस्थान सेवी, धर्मशास्त्र, वेद मे कुशल व्यक्ति को प्राय करके छठी या नवी तिथि के-दिन आक्रान्त करते है। पितृग्रह-प्रायः माता, पिता, गुरु, वृद्ध, सिद्ध और आचार्य की सेवा करने वाले में त्रुटि देखकर दशमी या अमावस्या-तिथि मे आक्रमण करते है। गन्धर्वग्रह— स्तुति, गाने-बजाने मे रत, परस्त्री, गन्ध और माला के प्रिय, पवित्र आचार वाले व्यक्ति मे छिद्र देखकर प्राय बारहवी या चौदहवी तिथि मे आक्रमण करते है। यक्षग्रह—सत्त्व, बल, रूप, अहकार, शौर्य से युक्त माला, अगराग और हास्य के प्रिय, अतिवाक्पटु व्यक्ति मे छिद्र पाकर प्रायः करके शुक्लपक्ष की एकादशी या सतमी मे आक्रमण करते है। ब्रह्मराक्षस-स्वाध्याय, तप, नियम उपवास, ब्रह्मचर्य, देवता, सन्यासी और गुरुओ की पूजा न करने वाले, भ्रष्टा- चार, अपवित्र, अपने को ब्राह्मण और अब्राह्मण कहने वाले अर्थात् अब्राह्मण होने पर ब्राह्मण और ब्राह्मण होने पर अब्राह्मण कहने वाले, अपने को शूर गिनने वाले, मन्दिर और पानी मे क्रीडा करने वाले मे छिद्र देखकर पञ्चमी या पौर्णमासी के दिन आक्रमण करते है। राक्षस और पिशाच—प्रायः दुर्बल, छली स्वभाववाले, चोर, लोभी, धूर्त्त पुरुष मे छिद्र पाकर द्वितीया, तृतीया और अष्टमी के दिन आक्रमण करते है। [ सुश्रुत मे कहा है—देवग्रह पौर्णमासी मे, असुर सन्ध्याकालो मे, गन्धर्व प्राय अष्टमी मे यक्ष प्रतिपदा मे, पितृ-जन कृष्णपक्ष मे, सर्प पञ्चमी मे, राक्षस रात्रि मे और पिशाच चतुर्दशी मे आक्रमण करते हैं। ] १ प्रतिवाक्य ‘धर्षयन्ति’ इति क्रियापद च पठ्यते क्वचित् ।

४५० चरकसंहिता [ अ० ६ ग्रह असंख्य हैं, उनमें ये ही आठ ग्रह अधिक दीखने से मुख्य हैं, इसलिये इन्हीं आठ ग्रहो की व्याख्या की है ॥ २८ ॥ सर्वेष्वपि तु खल्वेतेषु यो हस्तावुद्यम्य रोषसंरम्भात्रिःसङ्गमन्वेष्वा- त्मनि वा पातयेत् स ह्यसाध्यो ज्ञेयः, तथा यः साश्रुनेत्रो मेढ्रप्रवृत्तरक्तः क्षतजिह्वः प्रस्रुतनासिकश्छिद्यमानमर्मा प्रतिहन्यमानपाणिः सततं विक्कू- जन् दुर्वर्णस्तृषार्तः पूतिगन्धिश्च हिंसार्थमुन्मत्तो ज्ञेयस्तं परिवर्जयेत् ॥२६॥ इन सब भूतोन्मादों मे जो पुरुष क्रोध के वेग के कारण हाथों को ऊंचा उठा कर बिना किसी शंका या संकोच के, बिना ज्ञान के अपने या पराये पर मारने के लिये पटके तो उसे असाध्य समझना चाहिये । इसी प्रकार से जिस रोगी की आंखो से आंसू बहे, लिंग-इन्द्रिय से रक्त आता हो, जीभ कट जाये, नासिका से पानी बहता हो, त्वचा फट जाये, मारने के लिये दोनो हाथ उठा रक्खे हों, निरन्तर कराहता ( अव्यक्त शब्द करता ) रहता हो, देखने मे भद्दा कुरूप, प्यासा, शरीर से दुर्गन्ध आती हो, उसे हिंसार्थी उन्माद रोगी ( पागल ) समझे, वह रोगी असाध्य है । [ चरकोषस्कार मे साध्य-असाध्य के विषय मे लिखा है कि—इन सब भूतोन्मादो मे उन्माद का प्रयोजन हिंसा, रति और पूजा है । इनमे से हिंसार्थी उन्माद असाध्य है और रति और पूजा के निमित्त हुए उन्माद साध्य है।]॥२६॥ रत्यर्चनकामोन्मादिनौ तु भिषगभिचाराभिशापाभ्यां बुद्ध्वा तद- ज्ञोपहारबलिमिश्रेण मन्त्रभैषज्यविधिनोपक्रमेत् ॥ ३० ॥ रति और पूजन के लिए उत्पन्न उन्माद मे वैद्य को चाहिये कि अभिचार और अभिशाप को समझ कर इनके अग भूत जो उपहार ( बलि आदि ) हो, उसके साथ मन्त्र विधि और भैषज्य विधि (घृतपान आदि) द्वारा चिकित्सा करे॥३०॥ तत्र द्वयोरपि निजागन्तुनिमित्तयोरुन्मादयोः समासविस्तराभ्यां भेषजविधि व्याख्यास्यामः ॥ ३१ ॥ इसके आगे निज और आगन्तुज दोनो प्रकार के उन्मादो का सक्षेप और व स्तार से चिकित्सा का उपदेश करेगे ॥ ३१ ॥ उन्मादे वातजे पूर्वं स्नेहपानं विशेषवित् । कुर्यादावृतमार्गे तु सस्नेहं मृदु शोधनम् ॥ ३२ ॥ कफपित्तभवेऽप्यादौ वमनं सविरेचनम् । स्निग्धस्विन्नस्य कर्तव्यं शुद्धे संसर्जनक्रमः ॥ ३३ ॥ वात आदि दोषों के भेदों को जाननेवाले वैद्य वातजन्य उन्माद की

अ० ९ ] चिकित्सितस्थानम् ४५१

अ० ९ ] चिकित्सितस्थानम् ४५१ उत्पन्नावस्था मे घृत का पान करावे । क्योकि कफ पित्त द्वारा मार्ग के अवरुद्ध होने से प्रथम वमन, विरेचन रूपी शोधन करना उचित है। शोधन स्नेहयुक्त और मृदु हो इससे वायु का प्रकोप नही होता । कफ और पित्त से उत्पन्न उन्मादो मे भी रोगी का स्नेहन और स्वेदन करके वमन और विरेचन देना उचित है। रोगी के शुद्ध होने पर पेया विलेपी रूप से अन्न सेवन का क्रम चालू करे ॥ ३२-३३ ॥ निरूहान् स्नेहबस्तींश्च १ शिरसश्च विरेचनम् । ततः कुर्याद्यथादोषं तेषां भूयस्त्वमाचरेत् ॥ ३४ ॥ हृदिन्द्रियशिरःकोष्ठे संशुद्धे वमनादिभिः । मनःप्रसादमाप्नोति स्मृतिं संज्ञां च विन्दति ॥ ३५ ॥ पीछे से निरूह ( आस्थापन ), स्नेह बस्ति ( अनुवासन ), शिरोविरेचन करावे । दोष के अधिक होने पर दोषानुसार बार बार वमन, विरेचन करावे । वमन आदि कार्यों से हृदय ( छाती ), चक्षु आदि इन्द्रियो के, शिर, कोष्ठ ( आमाशय-पक्वाशय ) के शुद्ध होने पर रोगी का मन प्रसन्न हो जाता है, वह स्मृति और संज्ञा ( ज्ञान ) को प्राप्त करता है ॥ ३४-३५ ॥ शुद्धस्याऽऽचारविभ्रंशे तीक्ष्णं नावनमञ्जनम् । ताडनं च मनोबुद्धिदेहसंतर्जनं हितम् ॥ ३६ ॥ शोधन करने पर भी यदि रोगी मे आचार की अपवित्रता हो तो तीक्ष्ण नस्य, तीक्ष्ण अञ्जन, दण्ड आदि से पीटना, मन, बुद्धि और शरीर को उद्विग्न करने वाले कार्य करने हितकारी हैं ॥ ३६ ॥ यः शक्तो विनयेत्पट्टैः संयम्य सुदृढैः सुखैः । अपेतलोष्ठकाष्ठाद्यैः संरोध्यश्च तमोगृहे ॥ ३७ ॥ तर्जनं त्रासनं दानं सान्त्वनं हर्षणं भयम् । विस्मयो विस्मृतेर्हेतोर्नयन्ति प्रकृतिं मनः ॥ ३८ ॥ जो उन्माद-रोगी नम्रता से वश मे आ सके उसको सुदृढ और सुखकारक जिनसे उसे देह मे पीड़ा या व्रण न हो ऐसे वस्त्रों से बाध कर अन्धकारयुक्त घर मे बन्द कर दे । घर मे से ढेले, लकड़ी आदि सब हटा देवे जिससे ये न चुभे न किसी प्रकार की चोट लगे । तर्जन ( डाट डपट ), करना, दान, हर्षोत्पादन, आश्वासन, भयदिखाना, विस्मय ( चकित करना ), आदि क्रियाओं से विस्मृत हुआ मन ( विमूढ चित्त ) पुनः प्रकृति में आ जाता है ॥३७-३८॥ १. 'निरूहणस्नेहबस्ती' इति वा ।

४५२ चरकसंहिता [ अ० ९ प्रदेहोत्साद्नाभ्यङ्गधूमाः पानं च सर्पिषः । प्रयोक्तव्यं मनोबुद्धिस्मृतिसंज्ञाप्रबोधनम् ॥ ३६ ॥ प्रदेह, उत्सादन ( उबटन ), अभ्यग ( तैल मर्दन ), धूम और घृतपान ये सब वस्तुए मन, बुद्धि, स्मृति और सज्ञा को प्रबुद्ध करती है, इनका प्रयोग करना उचित है ॥ ३६ ॥ सर्पिःपानादिरागन्तौर्मन्त्रादिश्चेष्यते विधिः । आगन्तुज उन्माद मे रति तथा अर्चना की कामना से उत्पन्न उन्मादो मे घृतपान आदि भेषजविधि तथा ओषधि, मणि, मगल, बलि आदि मत्र विधि का प्रयोग करे । अतः सिद्धतमान्योगाञ्छृणून्मादविनाशनान् ॥ ४० ॥ हिङ्गुसौवर्चलव्योषैर्द्विपलांशैर्धृताढकम् । चतुर्गुणे गवां मूत्रे सिद्धमुन्मादनाशनम् ॥ ४१ ॥ अब विस्तार से अति सिद्ध ( परीक्षित ) फलप्रद उन्मादनाशक योगों को सुनो— ( १ ) हींग, सौवर्चल ( सचल ), व्योष ( सोंठ, मरिच, पिप्पली ), इनमे प्रत्यक दो पल परिमित लेकर इनके कल्क से, घी एक आढक और गाय का मूत्र चार आढक लेकर घृतपाक करे, यह घृत उन्माद का नाशक है ॥ ४०-४१ ॥ विशाला त्रिफला कौन्ती देवदार्वेल्ववालुकम् । स्थिराऽनन्ता रजन्यौ द्वे शारिवे द्वे प्रियङ्गु कम् ॥ ४२ ॥ नीलोत्पललमाञ्जिष्ठादन्तीदाडिमकेशरम् । तालीशपत्रं बृहती मालत्याः कुसुमं नवम् ॥ ४३ ॥ विडङ्गं पृश्निपर्णी च कुष्ठं चन्दनपद्मकौ । कल्कैः कर्षसमैरेतैर्विंशत्यष्टाभिरेव च ॥ ४४ ॥ चतुर्गुणे जले सम्यक् १ घृतप्रस्थं विपाचयेत् । अपस्मारे ज्वरे कासे श्वासे मन्देऽनले क्षये २ ॥ ४५ ॥ वातरक्ते ३ प्रतिश्याये तृतीयकचतुर्थके । छर्द्यशौमूत्रकृच्छ्रेषु विसर्पोपहतेषु च ॥ ४६ ॥ कण्डू-पाण्ड्वामयोन्माद-विष-मेह-गदेषु च । भूतोपहतचित्तानां गद्गदानामरेतसाम् ४ ॥ ४७ ॥ १. 'पक्त्वा' इति । २ 'मन्देऽनलक्षये' इति । ३ 'वातरोगे' इति । ४ 'मचेतसाम्' इति च पाठः ।

अ० ९ ] चिकित्सास्थानम् ४५३

शस्तं स्त्रीणां च वन्ध्यानां धन्यमायुर्बलप्रदम् । अलक्ष्मीपापरक्षोघ्नं सर्वग्रहविनाशनम् ॥ ४८ ॥ कल्याणकमिदं सर्पिः श्रेष्ठं पुंसवनेषु च । इति कल्याणकं घृतम् । ( २ ) कल्याणक घृत—विशाला ( गवाक्षी ), त्रिफला ( हरड़, बहेड़ा, आँवला ), कौन्ती ( रेणुका और 'कान्ता' पाठ मे—मोटी इलायची ), देवदारु, एलवालुक ( एलुआ ), स्थिरा ( शालपर्णी ), नत ( तगर ), हल्दी, दारु-हल्दी, अनन्तमूल, कृष्णसारिवा, फूल प्रियगु, नीला कमल, छोटी इलायची, मजीठ, दन्तीमूल, अनार, नागकेसर, तालीशपत्र, बड़ी कटेरी, मालती ( चमेली के नये फूल ), वायबिडङ्ग, पृश्निपर्णी, कूठ, लाल चन्दन, पद्माख इन अट्ठाईस ओषधियो मे प्रत्येक एक कर्ष लेकर इनके कल्क द्वारा, घी एक प्रस्थ, पानी चार प्रस्थ लेकर घृत पाक करे¹। यह कल्याणक नाम का घृत अपस्मार, ज्वर, कास, शोष, मन्दाग्नि, क्षय, वातरक्त, प्रतिश्याय, तृतीयक, चतुर्थक ज्वर, छर्दि, अर्श, मूत्रकृच्छ्र, वीसर्प, कण्डू, पाण्डु-रोग, उन्माद, विष और प्रमेह रोगो मे हितकारी है, भूतो से आक्रान्त चित्त वाले अव्यक्त वाणी वाले, अल्प शुक्र पुरुषो और वन्ध्या स्त्रियो के लिये प्रशस्त है। यह कल्याणक घृत धन के लिये हितकारी, कल्याणकारी, आयुप्रद, बलप्रद तथा सब प्रकार के ग्रहो से उत्पन्न रोगो का नाशक है ॥४२-४८॥ एभ्य एव स्थिरादीनि जले पक्त्वैकविंशतिम् ॥ ४९ ॥ रसे तस्मिन्पचेत्सर्पिर्गूढक्षीरे चतुर्गुणे । वीरा-द्विमाष-काकोली-स्वयंगुप्तर्षभकद्धिभिः ॥ ५० ॥ मेदया च समैः कल्कैस्तत्स्यात्कल्याणकं महत् । बृंहणीयं विशेषेण सन्निपातहरं परम् ॥ ५१ ॥ इति महाकल्याणकं घृतम् । ( ३ ) महाकल्याणक घृत—इन विशाला आदि अट्ठाईस वस्तुओ आर स्थिरा आदि इक्कीस द्रव्यो से क्वाथ विधि से क्वाथ करे। इसमे पहिली बार ब्याई ( खारके की ) गाय का दूध, घी से चतुर्गुण मिलावे। फिर वीरा ( पृश्नि- पर्णी या शतावरी ), द्विमाष ( मूगपर्णी और माषपर्णी ), काकोली, कौंच,

१. चरकोपस्कार मे—'कान्ता' पाठ है। अष्टाङ्ग सङ्ग्रह मे भी—बड़ी इलायची का ग्रहण है जैसे—'वरा विशाला भद्रैला देवदार्वेलवालुकैरि'ति । 'कौन्ती' पाठ निर्णयसागर की प्रति मे है।

४५४ चरकसंहिता [अ० ६ ऋषभ और ऋद्धि तथा मेदा इनको परस्पर सम भाग लेकर इनके कल्क से घृतपाक करे, यह महाकल्याणक घृत है ॥ ४६-५१ ॥ जटिला पूतना केशी चारटी मर्कटी वचाम् । त्रायमाणां जया वीरा चोरकं कटुरोहिणीम् ॥ ५२ ॥ कायस्था शूकरी छत्रामतिच्छत्रा पलङ्कषाम् । महापुरुषदान्ता च वयःस्था नाकुलीद्वयम् ॥ ५३ ॥ कटम्भरा वृश्चिकाली स्थिरा चाऽऽहृत्य तैर्घृतम् । सिद्धं चातुर्थकोन्मादग्रहापस्मारनाशनम् ॥ ५४ ॥ महापैशचिक नाम घृतमेतद्यथाऽमृतम् । बुद्धिस्मृतिकरं चैव बालाना चाङ्गवर्धनम् ॥ ५५ ॥ इति महापैशचिकं घृतम् । (४) महापैशचिक घृत—जटिला (जटामासी), पूतना (हरड), केशी (भूतकेशी), चारटी (पद्मचारिणी अथवा ब्रह्मयष्टि), कर्कटी (कौच), वच, त्रायमाणा, जया (अरण्डि), वीरा (पृश्निपर्णी या काकोली), चोरक (सुगन्धित द्रव्य, इसे भूटानी लोग बेचते है) कुटकी, कायस्था (सुरसा वा क्षीरकाकोली), शूकरा (वाराही कन्द वा विधारा), छत्रा (धनिया), अतिच्छत्रा (सौंफ), पलङ्कषा (लाख या गुग्गुल), महापुरुषदान्ता (शतावरी), वयस्था (आवला), नाकुली द्वय (दोनो रास्ना अथवा सपाक्षी और सर्पगन्धा), कटम्भरा (कटभी), वृश्चिकाली (बिच्छू बूटी), स्थिरा (शालपर्णी), इन को लाकर इनके क्वाथ और कल्क से घृत सिद्ध करे । यह घृत चतुर्थक ज्वर उन्माद, ग्रह, अपस्मार को नष्ट करता है। यह महापैशार्चिक नामक घृत अमृत के समान बुद्धि, स्मृति- कारक, तथा नालको के अगो को बढाने वाला है ॥ ५२-५५ ॥ लशुनाना शतं त्रिशदभया त्र्यूषणात्पलम् । गवा चर्ममसीप्रस्थमाढकं क्षीरमूत्रयोः ॥ ५६ ॥ पुराणसर्पिषः प्रस्थमेभिः सिद्धं प्रयोजयेत् । हिङ्गुचूर्णपलं शीते दत्त्वा च मधुमाणिकाम् ॥ ५७ ॥ तद्दोषगन्तुसम्भूतालुन्मादान्विषमज्वरान् । अपस्मारांश्च हन्त्याशु पानाभ्यञ्जननावनैः ॥ ५८ ॥ इति लशुनाद्यं घृतम् । (५) लशुनाद्य घृत—लहसुन एक सौ, हरड़ तीस, मिलित सोठ, मरिच, पिप्पली एक पल, गाय का चमड़ा जलाकर तैयार की राख एक प्रस्थ, गाय

अ० ९ ] चिकित्सास्थानम् ४५५

अ० ९ ] चिकित्सास्थानम् ४५५ का दूध एक आढक, गाय का मूत्र एक आढक, पुरातन (दस साल पुराना) घृत एक प्रस्थ, इन सब से यथाविधि घृत पाक करे । सिद्ध होने पर छान कर ठण्डा होने पर इसमे हींग का चूर्ण एक पल और शहद दो कुडव मिला देवे । यह घृत पान, अभ्यङ्ग, नस्य मे प्रयोग करने से दोषजन्य, आगन्तुज उन्माद रोग, विषमज्वर और अपस्मार को शीघ्र नष्ट करता है ॥ ५६-५८ ॥ लशुनस्याविनष्टस्य तुलाधे निस्तुषीकृतम् । तदर्धं दशमूलस्य द्वयाढकेऽपां विपाचयेत् ॥ ५९ ॥ पादशेषे घृतप्रस्थं लशुनस्य रसं तथा । कोलमूलकवृक्षाम्लमातुलुङ्गाद्रकै रसैः ॥ ६० ॥ दाडिमाम्लसुरामस्तुकाञ्जिकाम्लैस्तदर्धिकैः । साधयेत् त्रिफलादारुलवणव्योषदीप्यकैः ॥ ६१ ॥ यवानीचव्यहिङ्ग्वम्लवेतसैश्च पलार्धिकैः । सिद्धमेतत्पिबेच्छूलगुल्माशोजठरापहम् ॥ ६२ ॥ ब्रध्नपाण्ड्वामयप्लीहयोनिदोषज्वरकृमीन् । वातश्लेष्मामयान्त्सर्वानुन्मादं चापकर्षति ॥ ६३ ॥ इति द्वितीयं लशुनाद्यं घृतम् । (६) लशुनाद्य घृत (२)—रस, गन्ध आदि से युक्त लहसुन को छिलके रहित करके उसकी गिरी ५० पल, मिलित दशमूल २५ पल, इनको दो आढक जल मे पकावे । जब चौथाई रह जाये तो वस्त्र से छान ले । फिर पुरातन घृत एक प्रस्थ, लशुन का रस १ प्रस्थ, बेर मूली, वृक्षाम्ल (समाक दान), बिजौरा, अदरक, अनार का रस, सुरा, मस्तु, काजी ये प्रत्येक आधा प्रस्थ, त्रिफला, देवदारु, सैन्धानमक, त्रिकटु, अजमोदा, दीप्यक (जीरा), चव्य, हींग, अम्ल- वेत प्रत्येक आधा पल, लेकर घृत सिद्ध करे । यह सिद्ध हुआ घृत शूल, गुल्म, अर्श, उदर रोग, ब्रध्न, पाण्डु-रोग, प्लीहा, योनि दोष, ज्वर, कृमि और वात-कफ रोगो और उन्माद को नष्ट करता है ॥ ५६-६३ ॥ हिङ्गुना हिङ्गुपर्ण्या च सकायस्थावयस्थया । सिद्धं सर्पिर्हितं तद्वद्वयःस्थाहिङ्गुचौरकैः ॥ ६४ ॥ केवलं सिद्धमेभिर्वा पुराणं पाययेद् घृतम् । पाययित्वोत्तमा यात्रा श्वभ्रे रुन्ध्याद् गृहेऽपि वा ॥ ६५ ॥ विशेषतः पुराणं च घृतं त पाययेद्भिषक् । हींग, हिंगुपर्णी (वेणुपत्री या डीकामारी), कायस्था (हरड़), वयस्था (आवला), इनके कल्क से सिद्ध घृत अथवा वयस्था (आवला), हींग, चोरक

४५६ चरकसंहिता [ अ० ६ ( सुगन्धित द्रव्य ) इनसे सिद्ध घृत उन्माद रोग मे हितकारी है, ये दो योग हैं । अथवा हीग, सौवर्चल, त्रिकटु द्वारा पुरातन घृत को सिद्ध करके पिलावे उन्माद रोगी को घी की उत्तम मात्रा ( जो कि २४ घण्टे अर्थात् दिन-रात मे जीर्ण हो ) पिला कर पानी रहित गढे या घर मे बन्द कर देवे१ ॥६४-६५॥ उग्रगन्धं पुराणं स्याद्दशवर्षस्थितं घृतम् ॥ ६६ ॥ लाक्षारसनिभं शीतं तद्धि सर्वग्रहापहम् । मेध्यं विरेचनेऽपथ्यं प्रपुराणमतः परम् ॥ ६७ ॥ त्रिदोषघ्नं पवित्रत्वाद्विशेषाद् ग्रहमोक्षणम् । गुणकर्माधिकं स्थानादास्वादात्कटुतिक्तकम् ॥ ६८ ॥ नासाध्यं नाम तस्यास्ति यत्स्याद्वर्षशतस्थितम्२ । दृष्टं स्पृष्टमथाघ्रातं तद्धि सर्वग्रहापहम् । अपस्मारग्रहोन्मादवतां शस्तं विशेषतः ॥ ६६ ॥ ( ७ ) पुरातन घृत—जो घी दस साल पुराना हो जाये, जिसमे कि तीव्र गन्ध आने लगे, जिसका रग लाख के समान लाल हो जाये, वह शीतवीर्य होता है, उसका नाम पुराना घृत है । दस वर्ष के पीछे घृत अति पुरातन हो जाता है इसको 'प्र-पुराण' कहते हैं । वह त्रिदोषनाशक पवित्र होने से खासकर ग्रह रोगो को नष्ट करता है, पीने से अधिक गुणशाली है, स्वाद मे कटु-तिक्त रस है, कान, आख के रोगो को नष्ट करता, विषनाशक और पवित्र करने वाला है । और बारह साल पुराने घृत से कोई भी रोग असाध्य नही है । इसके देखने, छूने ओर सूघने से वीसर्प और ग्रह-रोग नष्ट होते है । वह अपस्मार, विष, उन्माद और वायु रोगों मे अमृत के समान प्रशस्त है ॥६६-६६॥ एतैरौषधवर्गैर्वा विधेयत्वं न गच्छति । अञ्जनोत्सादनालेपान्नावनादींश्च योजयेत् ॥ ७० ॥ शिरीषो मधुकं हिङ्गु लशुनं तगरं वचा । कुष्ठं च बस्तमूत्रेण पिष्टं स्यान्नावनाञ्जनम् ॥ ७१ ॥ इति नस्याञ्जनम् । १उत्तम मात्रा का लक्षण—दिन रात्रि भर मे बिना दोष उत्पन्न किये जो जीर्ण हो सके वह मात्रा कुष्ठ, विष, उन्माद ग्रह, अपस्मार को नाश करती है । एक दिन रात मे जीर्ण होने वाली स्नेह की उत्तमा मात्रा, पूरे दिन मे जीर्ण होने वाली मध्यमा और आधे दिन मे जीर्ण होनेवाली ह्रस्वमात्रा कहाती है । २. 'यत्स्याद् द्वादशवार्षिकम्' इति च पाठः ।

अ० ६ ] चिकित्सास्थानम् ४५७

अ० ६ ] चिकित्सास्थानम् ४५७ तद्वद् व्योषं हरिद्रे द्वे मञ्जिष्ठाहिङ्गुसर्षपाः । शिरीषबीजं चोन्मादग्रहापस्मारनाशनम् ॥ ७२ ॥ इति नस्यमञ्जनम् । (८) यदि उन्माद रोगी उपरोक्त ओषधि समूहों से वश मे न आवे, वह कहा न माने, तब (१) हिंगु, कल्याणक आदि घृतो मे वर्णित ओषधियों से अञ्जन, उत्सादन (उबटन), आलेप और नस्य करे । (२) शिरीष के बीज, मुलहठी, हींग, लहसुन, तगर, वच, कूठ, इन सब को बकरी के मूत्र मे पीस कर इसका नस्य और अञ्जन दे। (३) इसी प्रकार से व्योष (त्रिकटु, सोंठ, मरिच, पिप्पली), हल्दी, दारु-हल्दी, मजीठ, हींग, सरसो, सिरस के बीज इनको बकरी के मूत्र मे पीस कर नस्य और अञ्जन करे यह उन्माद, ग्रह और अपस्मार रोगो को नष्ट करता है ॥७०-७२॥ पिष्ट्वा तुल्यमपामार्गहिङ्गनी१ हिङ्गुपत्रिकाम् । वत्तिः स्यान्मरिचार्धांशा पित्ताभ्या गोशृगालयोः ॥ ७३ ॥ तयाऽञ्जयेदपस्मारभूतोन्मादज्वरार्दितान् । भूतातानमरातांश्च नरार्ताँश्च गोमये ॥ ७४ ॥ मरिचं चाऽऽतपे मास सपित्त स्थितमञ्जनम् । वैकृतं पश्यतः कार्य दोषभूतहतस्मृतेः ॥ ७५ ॥ इत्यञ्जनम् । (४) अपामार्ग (चिरचिटा) के बीज, हींग और हींगुपत्रि प्रत्येक एक एक भाग, काली मिर्च आधा भाग, इनको गाय और गीदड के पित्त के साथ पीस कर वर्ती बनावे । इस वर्त्ती को अपस्मार, उन्माद तथा ज्वर रोगी, भूत और देवताओ से पीडित व्यक्तियो मे तथा नेत्र रोगो मे प्रयोग करे। (५) वात आदि दोष के कारण से अथवा भूतो के कारण से यदि दृष्टि विकृत हो गई हो तो काली मिरच को गाय और शृगाल के पित्त मे एक मास तक व्याप्त करके धूप मे रखे, फिर इसका अञ्जन करे ॥७३-७५॥ सिद्धार्थको वचा हिङ्गुकरञ्जे देवदारु च । मञ्जिष्ठा त्रिफला श्वेता कटभीत्वक् कटुत्रिकम् ॥ ७६ ॥ समांशानि प्रियंगुश्च शिरीषो रजनीद्वयम् । बस्तमूत्रेण पिष्टोऽयमगदः पानमञ्जनम् ॥ ७७ ॥ नस्यमालेपनं चैव स्नानमुद्वर्तनं तथा । १. 'अपामार्ग हिङ्गुल' इति वा पाठः ।

अपस्मार-विषोन्माद-कृत्यालक्ष्मीज्वरापहः ॥ ७८ ॥ भूतेभ्यश्च भयं हन्ति राजद्वारे च शस्यते । ( ६ ) सिद्धार्थ ( श्वेत सरसो ), वच, हींग, करञ्ज, देवदारु, मजीठ, त्रिफला, श्वेता ( श्वेत अपराजिता ), कटभी ( वापुभा ), त्वक् ( दालचीनी ), त्रिकटु ( सोठ, मरिच, पिप्पली ), प्रियङ्गु, शिरीष के बीज, हल्दी, दारुहल्दी इन सबका समान भाग लेकर बकरी के मूत्र मे पीस ले। यह अगद पान, नस्य, आलेपन, अञ्जन, उद्वर्त्तन ओर स्नान मे प्रयोग करने पर अपस्मार, विष, उन्माद, कृत्या ( मारण क्रिया ), अलक्ष्मी ओर ज्वर को नष्ट करता है। इस अगद के पानादि से भूतो से भय नहीं रहता। राजसभा मे सफलता मिलता है ॥ ७६-७८ ॥ सर्पिरेतेन सिद्ध वा सगोमूत्रं तदर्थकृत् ॥ ७९ ॥ प्रसेके पीनसे गन्धैर्धूमवर्ति कृता पिबेत् । वैरेचनिकधूमोक्तेः श्वेताद्यैर्वा सहिङ्गुभिः ॥ ८० ॥ ( १० ) सिद्धार्थक आदि वस्तुओ द्वारा गोमूत्र मे सिद्ध किया घृत भी यही फल देता है, मुख से पानी बहने पर, पीनस मे, उन्माद मे गन्ध-वस्तुओ ( दाह ज्वर चिकित्सा मे कथित अगरु आदि वस्तुओ ) से बनी धूमवर्त्ति तथा सूत्र- स्थान मे कथित श्वेता, ज्योतिष्मती आदि वैरेचनिक वस्तुओ को हींग के साथ धूमवर्त्ती करके प्रायोगिक धूम विधि से पीवे १ ॥ ७६-८० ॥ शल्लकालूकमार्जारजम्बूकवृकबस्तजैः । मूत्र-पित्तःशकृल्लोम-नखैश्चर्मभिरेव च ॥ ८१ ॥ सेकाञ्जनं प्रधमनं नस्यं धूमं च कारयेत् । वातश्लेष्मात्मके प्रायः— ( ११ ) शल्लक ( शजार ), उल्लू, बिल्ली, गीदड, भेडिया, बकरा इन पशुओ के मूत्र, पित्त, शकृत् ( मल ), लोम, नख, चमडे से परिषेक, अञ्जन, प्रधमन ( विरेचन चूर्ण रूप नस्य ), नस्य, धूम, वातजन्य और कफजन्य उन्माद मे प्रायः करके करना चाहिये ॥८१-॥ पैत्तिके च प्रशस्यते ॥ ८२ ॥ तिक्तकं जीवनीय च सर्पिः स्नेहश्च मिश्रकः । शीतानि चान्नपानानि मधुराणि मृदूनि च ॥ ८३ ॥ १ वैरेचनिक धूम—'श्वेता ज्योतिष्मती चैव हरितालमन शिला। गन्धाश्चागुरुपत्राद्या धूमो मूर्धविरेचने' ॥

अ० ९ ] चिकित्सितस्थानम् ४५९

अ० ९ ] चिकित्सितस्थानम् ४५९ (१२) पित्तजन्य उन्माद मे तिक्त वस्तुओ से तथा जीवनीय-गण की ओषधियो से सिद्ध घृत का पान, तथा मिश्रक स्नेह (यमक) का प्रयोग करे । इसी प्रकार से शीतल, मधुर, लघु खान-पान देने चाहिये ॥८२-८३॥ शङ्खे केशान्तसन्धौ वा मोक्षयेऽज्ञो भिषक् सिराम् । उन्मादे विषमे चैव ज्वरेऽपस्मार एव च ॥ ८४ ॥ (१३) शस्त्र कर्म को जानने वाले वैद्य को चाहिये कि उन्माद, अपस्मार आर विषम-ज्वर म, शख प्रदेश, कान, ललाट क मध्य मे ओर केशो के अन्तिम भाग के सन्धि स्थान मे स्थित सिरा का वेधन करे १ ॥ ८४ ॥ घृतमासविदृप्तं वा निवाते स्थापयेत्सुखम् । त्यक्त्वा मतिस्मृतिभ्रंशं संज्ञां लब्ध्वा प्रमुच्यते ॥ ८५ ॥ (१४) अथवा रोगी को कल्याणक घृत आदि ओर मास से तृप्त कराके सामने की वायु से रहित घर म आराम के साथ रखे । इस प्रकार करने से बुद्धि और स्मृति के भ्रश को छोड़ कर रोगी सज्ञा (चेतना) को प्राप्त कर लेता है और उन्माद रोग से मुक्त हा जाता है ॥ ८५ ॥ आश्वासयेत्सुहृद्द्वा तं वाक्यैर्धर्मार्थसंहितैः । ब्रूयादिष्टविनाशं वा दर्शयेदद्भुतानि वा ॥ ८६ ॥ (१५) मित्र लोग धर्म, अर्थयुक्त वचनो से आश्वासन देवे, इष्ट वस्तु के नाश को कहे, आश्चर्यकारक वस्तुओ को दिखावे ॥ ८६ ॥ बद्धं सर्षपतैलाक्तं न्यसेद्रोत्तानमातपे । कपिकच्छ्वाऽथवा तप्तलोहतैलजलैः स्पृशेत् ॥ ॥ ८७ ॥ कशाभिस्ताडयित्वा वा सुबद्धं विजने गृहे । रुन्ध्याच्चेतो हि विभ्रान्तं व्रजत्यस्य यथा शमम् ॥ ८८ ॥ (१६) शरीर पर सरसो का तैल लगाकर, हाथ, पाव बाध कर पीठ के भार धूप मे लेटावे । कौच या गरम लोहे, गरम तैल या गरम जल से स्पर्श करे । कशा (कोडो) से पीटे, बाधे, एकान्त घर मे बन्द रखे । इस प्रकार करने से रोगी का विक्षिप्त चित्त शान्त हो जाता है ॥ ८७-८८ ॥ सर्पेणोद्धृतदंष्ट्रेण दान्तैः सिंहैर्गजैश्च तम् । त्रासयेच्छस्त्रहस्तैर्वा तस्करैः शत्रुभिस्तथा ॥ ८९ ॥ अथवा राजपुरुषा बहिर्नीत्वा सुसंयतम् । त्रासयेयुर्वधेनैनं तर्जयन्तो नृपाज्ञया ॥ ९० ॥ १ सुश्रुते—शखकेशान्तसन्धिगतामुरोऽपागललाटेषु चोन्मादे ।

४६० चरकसंहिता [ अ० ९ देहदुःखभयेभ्यो हि परं प्राणभयं महत्। तेन याति शमं तस्य सर्वतो विप्लुतं मनः॥ ९१॥ (१७) विष का दाढ निकाले हुए सर्प से, दान्त (पले हुए, नम्र) सिंह और हाथी अथवा हाथ मे शस्त्र लिये हुए चोरो या शत्रुओ से उसको डरावे। अथवा राजकर्मचारी इसको बाहर लेजा कर, इसके हाथ पाव बाध कर मारने का भय दिखाये और कहे राजा ने तुम्हारे वध की आज्ञा दी है। क्योकि कषादि के ताडन रूपी शरीर-क्लेश से प्राणो का भय कही अधिक होता है, इस कारण से विक्षिप्त मन शान्त हो जाता है॥ ८६-९१॥ इष्टद्रव्यविनाशात्तु मनो यस्योपहन्यते। तस्य तत्सदृशप्राप्तिशान्त्याश्वासः शम नयेत् ॥ ९२ ॥ काम-शोक-भय-क्रोध-हर्षेर्ष्या-लोभ-सम्भवान्। परस्परप्रतिद्वन्द्वैरेभिरेव शमं नयेत्॥ ९३॥ इष्ट वस्तु के नाश होने से जिसका मन विक्षिप्त हुआ हो, उस रोगी को उस वस्तु के समान वस्तु की प्राप्ति से, सान्त्वना तथा आश्वासन द्वारा शान्त करे। काम, शोक, मद, क्रोध, हर्ष, ईर्ष्या और लोभ के कारण त जिसका मन विक्षिप्त हुआ हो तो परस्पर विरुद्ध द्वन्द्वो से वह शान्त हो जाता है। कामजन्य उन्माद क्रोध से, क्रोधजन्य काम से, भयजन्य और शोकजन्य क्रोध ओर काम से, शान्त हो जाते है ॥ ९२ ६३॥ बुद्ध्वा देशं वयःसात्म्य दोषं कालं बलाबले। चिकित्सितमिदं कुर्यादुन्मादं भूतदोषजे ॥ ९४॥ देवर्षिपितृगन्धर्व्वैरुन्मत्तस्य तु बुद्धिमान्। वर्जयेदञ्जनादीनि तीक्ष्णानि क्रूरकर्म च॥ ९५॥ सर्पिष्पानादि तस्येह मृदुभैषज्यमाचरेत्। पूजा बल्युपहाराश्च मन्त्राञ्जनविधींस्तथा ॥ ९६॥ शान्तिकर्मेष्टिहोमाश्च जपस्वस्त्ययनानि च। वेदोक्तान् नियमांश्चापि प्रायश्चित्तानि चाऽऽचरेत् ॥ ९७॥ दोषजन्य (निज) और आगन्तुज उन्माद मे देश, वय, सात्म्य, दोष, काल, बल और अबल की परीक्षा करके उपरोक्त चिकित्सा करे। बुद्धिमान् वैद्य को चाहिये कि देवग्रह, ऋषिग्रह, पितृग्रह, गन्धर्वग्रह इनसे आक्रान्त उन्माद रोगी मे तीक्ष्ण अञ्जन आदि तथा क्रूर कर्मों का प्रयोग न करे। इनकेलिये घृत आदि कोमल ओषधि का प्रयोग करे १। १ सुश्रुत मे भी कहा है—न च रूक्ष प्रयुञ्जीत प्रयोग देवताग्रहे। ऋ ते पिशाचादन्यत्र प्रतिकूल न चाचरेत् ॥

अ० ९ ] चिकित्सितस्थानम् ४६१

अ० ९ ] चिकित्सितस्थानम् ४६१ दैवव्यपाश्रय चिकित्सा—पूजा, बलि कर्म, उपहार कर्म, मन्त्र, अजनविधि, शान्ति कर्म, यज्ञ, होम, जप, मगलकर्म, वेदोक्त नियम, प्रायश्चित्त आदि सेवन करे ॥ ९४-९७ ॥ भूतानामधिपं देवमीश्वरं जगतः प्रभुम् । पूजयन् प्रयतो नित्य जयत्युन्मादजं भयम् ॥ ९८ ॥ रुद्रस्य प्रमथा नाम गणा लोके चरन्ति ये । तेषा पूजा च कुर्वाण उन्मादेभ्यो विमुच्यते ॥ ९९ ॥ बलिभिर्मङ्गलैर्होमैरौषध्यगदधारणैः । सत्याचारतपोज्ञानप्रदाननियमव्रतैः ॥ १०० ॥ देवगुह्यकविप्राणां गुरूणां पूजनेन च । आगन्तुः प्रशमं याति सिद्धैर्मन्त्रौषधैस्तथा ॥ १०१ ॥ नित्य प्रति भूतों ( प्राणियो ) के अधिपति, जगत् के ईश्वर-महेश्वर का पूजन करने से उन्माद का भय नही रहता । रुद्र के 'प्रमथ' नामक जो गण लोक मे विचरते हैं, उनकी प्रतिदिन पूजा करने से आगन्तुज उन्माद से मनुष्य मुक्त हो जाता है । बलि कर्म से, मागलिक कार्यों से, होम से, ओषधियां और अगदो के धारण करने से, सत्य आचार से, तप से, ज्ञान से, दान से, नियम, व्रत के पालन से, देवता, गाय, ('गुह्यक', पाठ हो तो यक्ष), ब्राह्मण, गुरु-जनों के पूजन से, सिद्ध फलदायक मन्त्र तथा ओषधियां से आगन्तुज-उन्माद शान्त होता है ॥ ९८-१०१ ॥ यच्चोपदेक्ष्यते किंचिदपस्मारचिकित्सिते । उन्मादे तच्च कर्तव्यं सामान्याद्धेतुदूष्ययोः ॥ १०२ ॥ निवृत्तामिषमद्यो यो हिताशी प्रयतः शुचिः । निजागन्तुभिरुन्मादैः सत्त्ववान् न स युज्यते ॥१०३॥ उन्माद और अपस्मार रोग मे हेतु और दूष्य की समानता है । इसलिये अपस्मार चिकित्सा मे जो कुछ विशेष कहेगे वह सब इस उन्माद मे भी वर- तना चाहिये । मांस और मद्य के सेवन से पृथक्, पथ्यभोजी, अन्दर और बाहर से पवित्र तथा सत्त्वगुण से युक्त और जो जितेन्द्रिय व्यक्ति होता है, वह निज और आगन्तुज दोनो प्रकार के उन्मादों से मुक्त रहता है॥१०२-१०३॥ प्रसादश्चेन्द्रियार्थानां बुद्ध्यात्ममनसां तथा । धातूनां प्रकृतिस्थत्वं विगतोन्मादलक्षणम् ॥ १०४ ॥ उन्माद से छूटने के लक्षण—इन्द्रियों तथा इनके विषयो मे निर्मलता, बुद्धि, आत्मा और मन की प्रसन्नता, वात आदि धातुओ का अपनी स्वाभाविक