छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
थे। महाराज ने निश्चय कर लिया कि जो कुछ होना है एक बार हो जाय। उन्होंने हँसने का अभिनय करते हुए कहा, "युवराज शम्भू यवनों से जाकर मिले कि उन्हें इस अपराध की सजा नहीं दी गयी। इसकी शिकायत लेकर मेरे पास कोई नहीं आया। किन्तु मुझे पक्का विश्वास था अण्णाजी पन्त शिकायत लेकर अवश्य आएँगे।" "हमारा इतना ही कहना है महाराज ! शम्भूराजा कास्तकारों को बहुत चाहते हैं। उनके लिए बहुत दया भाव रखते हैं। कर डुबाने वालों का कर माफ कर देते हैं।" "अण्णाजी उस सारे प्रकरण की मैंने गहराई से पूछताछ कर ली है। हमारे गुप्तचरों ने उन गरीब किसानों की सही जानकारी जब मुझे दी तो मुझे मालूम पड़ा वे किसान खाने के लिए भी मोहताज थे। यदि शम्भू ने उन्हें माफ न किया होता तो यह एक अपराध होता।" तो भी शम्भूराजा का व्यवहार अनेक बार अच्छा नहीं रहा है, महाराज।" शिवाजी महाराज चकित हो गये। उन्हें इस बात का कतई अनुमान न था कि अण्णाजी इस प्रकार का नाजुक प्रश्न भरी सभा में उठाएँगे। इन सारी बातों का मूल स्रोत अण्णाजी से जुड़ा था इसलिए इतनी स्पष्टता से बात को उठाना उचित नहीं था। इसलिए महाराज को लगा कि अब कुछ भी छुपाना ठीक नहीं हैं उन्होंने दृढ़ता से सीधे-सीधे कहा, "देखो अण्णाजी पन्त ! आप की जवान बेटी की मृत्यु जिस प्रकार दुर्घटना में हुई उसका आपको कितना गहरा दुख होगा, इसकी कल्पना हम कर सकते हैं। इस सम्बन्ध में शम्भूराजा के सम्बन्ध में पूरी जानकारी लेने का काम मैंने महारानी सोयराबाई को सौंपा था। उनकी सारी पूछताछ के बाद ऐसा कोई भी सबूत नहीं मिला कि इस दुर्घटना में शम्भू दोषी हैं।" "महाराज! आपने तो मुसलमान सूबेदार की बहू को भी साड़ी-चोली दी थी।" "उसी तरह हम आपसे वादा करते हैं अण्णाजी पन्त, शम्भू के दुर्व्यवहार का आप कोई प्रमाण प्रस्तुत कीजिए। यदि वे अपराधी सिद्ध होते हैं तो हम अपने पुत्र को उचित दंड अवश्य देंगे। उन्हें कैद करेंगे।" "महाराज! हमारी गोद का क्या हुआ?" अण्णाजी पन्त पीछे हटने को तैयार नहीं थे। "देखो, उसकी फरियाद और रंगपंचमी के दिन हुई सारी गड़बड़ी की मैंने बड़ी बारीकी से जाँच-पड़ताल कर ली है। त्र्यम्बकराव और निवासराव, पिता-पुत्र को शत्रु का साथ देते हुए रंगे हाथों पकड़ा गया। उन दोनों ने लिंगाणा के ऊपर की कालकोठरी से रात में बाहर भागने का प्रयत्न किया। इस कोशिश में वे दोनों पहाड़ 164 . सम्भाजी
के ऊपर से कालदरी में जा गिरे और चूर-चूर हो गये। इस घटना की जानकारी आप को भी है।" दरबार में बहुत तनाव का वातावरण बन गया था। महाराज के स्वाभिमानी मन के तार को अण्णाजी पन्त ने छेड़ दिया था। अण्णाजी पन्त चाहते थे कि राजाराम के विवाह के अवसर पर या किसी अन्य निमित्त से शम्भूमहाराज रायगढ़ न आ सकें। इसीलिए उन्होंने इस प्रसंग को छेड़ा था। अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए उन्होंने महाराज के क्रोध की भी चिन्ता नहीं की। इसी समय अन्तःपुर की ओर खुलने वाले दरवाजे का पर्दा हिला। उस ओर पैर-बिछुओं के बजने की आवाज महाराज ने सुनी। यह आवाज उनकी परिचित थी। महाराज ने धमकाते हुए कहा, "महारानी जी, पर्दे के पीछे से शायद आपको हमारी सारी बातें ठीक-ठीक सुनाई नहीं पड़ेंगी। आप सीधे बाहर ही आ जाइये न?" अपनी दृष्टि पैरों की ओर झुकाए सोयराबाई बाहर आ गयीं। बैठक में आकर एक ओर बैठ गयीं। महाराज ने विवादपूर्ण दृष्टि से महारानी की ओर देखा, मानो कह रहे हों कि संभाजी का एक और प्रेमी व्यक्ति आ गया। महाराज के प्रश्नों से अण्णाजी बहुत डर गये थे, किन्तु महारानी सोयराबाई के आ जाने से उनमें कुछ साहस आ गया। अन्य सभी प्रधान भारी तनाव में आ गये थे। महाराज ने अपने क्रोध को भीतर ही पी लिया। वे संयत स्वर में बोले, "देखिए शम्भूराजा जिस प्रकार हमारे पुत्र और आत्मीय हैं उसी प्रकार आप में से बहुतों के साथ हमारी जीवनभर की मित्रता है। आपने भी स्वराज्य के निर्माण में बड़ा कष्ट उठाया है। इसे हम कभी नहीं भूल सकते।" अण्णाजी पन्त ने अपने ओंठ आधे खोले। उन्होंने महारानी सोयराबाई की आँखों में झाँका। उन्हें अपने प्रति विश्वास और सहानुभूति दिखाई पड़ी। अण्णाजी पन्त में साहस आ गया। उन्होंने कहा, "महाराज ! क्या इन बातों का हम यह अर्थ निकालें कि ऐसी कोई घटना घटी ही नहीं। शम्भूराजा यवनों से जाकर मिले ही नहीं। वे वहाँ गये ही नहीं थे। श्रृंगारपुर के महल में ही बैठे थे— ?" "अण्णाजी पन्त, यह मत भूलो कि शम्भूराजा दिन दहाड़े खुल्लमखुल्ला यवनों से मिले थे। प्रश्न यह उठता है कि यवनों से मिलकर उन्होंने स्वराज्य का क्या अहित किया ? मोरोपन्त कहाँ हैं ? उन्हें बुलाइए।" "महाराज ! युवराज अल्हड़ स्वभाव के हैं। किसी को वे उपद्रवी भी लग सकते हैं। किन्तु मैं शपथपूर्वक कह सकता हूँ कि वे मन के बहुत साफ हैं।" अण्णाजी पन्त और सोयराबाई की जहरीली नजरों की चिन्ता किये बिना, बालाजी पन्त चिटणीस ने कहा। महाराज के आदेशानुसार एक गुप्त पत्र लेकर मोरोपन्त पेशवा दरबार में आये। सम्भाजी : 165
उन्होंने पत्र के साथ लगी चन्दन की डंडी महाराज के हाथ में पकड़ा दी। उसकी रेशमी डोरी खोलते हुए महाराज ने कहा, "यह देखो! कर्नाटक जाते समय मैंने शम्भू के आसपास गुप्तचरों को नियुक्त कर दिया था। शम्भू और दिलेरखान के बीच पत्राचार आरम्भ था। इसकी सूचना हमारे गुप्तचरों को थी। अनेक बार युवराज के पत्र को हस्तगत कर उसकी प्रतिलिपि गुप्तचर मेरे पास कर्नाटक भेजते थे। दिलेरखान को श्रृंगारपुर से भेजे गये शम्भू के पत्र की यह प्रतिलिपि देखिए। क्या लिखते हैं, हमारे बेटे इस पत्र में- " 'हमारे पिताजी मुझ पर भरोसा रखकर परदेश गये हैं। ऐसे में उन्हें धोखा देकर, आपके साथ मेलजोल रखना, हमारे धर्म को शोभा नहीं देता।' मित्रो ! आपको कुछ फर्क इसमें दिखाई देता है ? सत्ता के लिए अपने सगे भाइयों और बच्चों का बकरी की तरह सिर छाँट देने वाले कहाँ मुगलों के शहजादे और कहाँ यह पिता की अनुपस्थिति में राज्य की हानि करने से डरने वाला बहादुर राजकुमार ? यही अन्तर होता है मुगलों के शहजादों और मराठों के युवराज में।" महाराज की मुखमुद्रा बहुत व्यथित दिख रही थी। उन्होंने अपने सहयोगियों से कहा, "दिलेरखान से जाकर मिलने का संभाजी का अपराध, एक प्रकार का अविवेक था। जवानी का पागल नशा था। अपने बारे में झूठी कल्पनाओं का एक दौरा था, इसमें कोई शक नहीं है। किन्तु उसी समय आपको यह भी ध्यान में रखना चाहिए कि यदि मराठी स्वराज्य का गला घोंटने और माता भवानी का सिर फोड़ने की गद्दार भावना से शम्भूराजा सचमुच पागल हो गया होता तो क्या होता? बताइए, बताइए! हमारी अनुपस्थिति में सीधे रायगढ़ पर आकर बगावत का नारा लगा देते तो ? यह भयानक समाचार पाने के बाद हमें घोड़ा दौड़ाते हुए यहाँ पहुँचने में कम-से-कम चार दिन लग जाते। तब तक कौन जाने कौन सी रामायण यहाँ घट चुकती?" महाराज की बात सुनकर सभी प्रधान चुप हो गये। अब दरबार में कोई भी कुछ बोल नहीं रहा था। महाराज की मुखमुद्रा, उनके भावभरे स्वर की गम्भीरता कुछ अलग ही लग रही थी। उन्होंने दुखी स्वर में कहा- "कुछ महीने पहले अपने दोनों पुत्रों संभाजी और राजाराम में राज्य का बँटवारा करने का मेरा विचार था। राज्य शिवाजी का हो या प्रभु रामचन्द्र का, राजा प्रधान होता है, शेष सभी अधिकारी और जनता मिट्टी के पुतले होते हैं। इसीलिए असंख्य बीमारियों ने सभी को ग्रस रखा है। आज स्वराज्य की पालकी उठाने के बदले लोग अपने-अपने स्वार्थों की टोकरियाँ ढोने में लगे हैं। परस्पर द्वेष और भेदभाव इतना बढ़ गया है कि किसी समय तोरणा किले पर किये गये मेरे मन्त्रघोष का एक भी स्वर आज बचा नहीं है। यहाँ हमारे अष्टप्रधानों में भी झगड़े हैं। एक 166 . सम्भाजी
ओर ब्राह्मणों का दल है तो दूसरी ओर चाँदसेनी कायस्थ प्रभुओं का। यहाँ दरबार में अण्णाजी दत्तो पन्त और बालाजी आवजी का सुर नहीं मिलता। ऊँच नीच के भेदभाव से मराठा जाति हमेशा के लिए पंगु हो गयी है। ऐसे अविश्वासपूर्ण दूषित वातावरण में स्वराज्य का बँटवारा करना यानी संकट के कीचड़ में और गहरे धँसना है। भविष्य में जो कुछ होगा उसका निर्णय समय स्वयं करेगा।" बड़े महाराज खड़े हो गये। प्रधानमंडल ने भी जाने की तैयारी की। उसी समय बड़े महाराज कुछ रुके। सभी की ओर देखते हुए अत्यन्त कातर स्वर में बोले— "शम्भुराजा के जन्म के समय हम प्रतापगढ़ की लड़ाई में व्यस्त थे। जिस समय शम्भुराजा का जन्म हुआ पुरन्दर के किले पर घनघोर वर्षा हो रही थी। वह छोटा सा कोमल मांस का गोला सईबाई ने मुझे और जीजा माता को सौंप दिया। अपने इस नवजात शिशु को छोड़कर बीमारी से जर्जर उसकी माँ भगवान को प्यारी हो गयी। शम्भू को जब मैंने अपने सीने से लगाया तो उसने मेरी उँगली जोर से पकड़ रखी थी। तब से अब तक मैंने और मेरे राजसी वस्त्रों के भीतर छिपे उसके पिता ने उसे बहुत समीप से जाँचा परखा है। रानी साहिब सोयराबाई, अण्णाजी पन्त! आपको हमारे शम्भुराजा क्रोधी स्वभाव के लग सकते हैं। किसी को उद्द्यत भी लग सकते हैं। किन्तु उस बात को भी हमेशा स्मरण रखें जिसकी याद मुझे जीजा माता दिलाती रहती थीं, वे कहती थीं, "शिवा! शम्भू के बाहर से दिखने वाले अनगढ़ और उद्यत स्वभाव पर कभी मत जाओ। वह खरे सोने की मुहर है। भविष्य में तुम्हारे हिन्दवी स्वराज्य पर कोई आपदा आएगी तो यही तुम्हारा पागल बेटा अपने प्राणों की बाजी लगा देगा किन्तु अपने सम्मान पर आँच नहीं आने देगा। इस बात को गाँठ बाँध लो।" चार भोगावती की घाटी और सुदूर विशालगढ़ की पगडंडियों से बादल उठते थे। म्हसाई के विस्तृत पठार से तैरते हुए आगे आते थे। उधर से आने वाले मेघों के आकार इतने चौड़े टेढ़े-मेढ़े और बिखरे हुए होते थे कि लगता था जैसे जटायु जैसा कोई विशाल पक्षी आकाश में उड़ानें भर रहा हो। कभी कभी फटे पंखों-सी मेघ- छायाएँ अशुभ के बीज बोती आती थीं और दैत्यों की भाँति आती थीं और भागते हुए सम्भाजी · 167
किले के ऊपर से निकल जाती थीं। संक्रान्ति से एक दिन पहले शम्भूराजा की महाराज से भेंट हुई थी। उसके बाद तीन-चार दिन तक उनकी चर्चाएँ निरन्तर होती रहीं। महाराज रायगढ़ की ओर निकल चुके थे। शम्भूराजा को शिवाजी महाराज के हृदय के अमृतघट से नयी ऊर्जा प्राप्त हुई थी। किन्तु यद्यपि महाराज ने उन्हें पन्हालगढ़ की सूबेदारी सौंप दी थी तथापि उन्हें ऐसा लगता था जैसे वे वहाँ मेहमान हों। एक तो उनके साथ काम करने के लिए हिरोजी फर्जन्द, जनार्दन पन्त, सुमन्त जैसे अनुभवी लोगों के साथ सोमाजी बंकी और बर्हिर्जी नाइक जैसे नौसिखिये नियुक्त किये गये थे। फर्जन्द रिश्ते में शम्भूराजा के चाचा थे परन्तु उनमें अब पहले जैसा अपनापन नहीं था। किले का अन्य प्रबन्ध अष्टप्रधानों के निर्देश से चल रहा था। ऐसी स्थिति में शम्भूराजा को परायेपन का अनुभव हो रहा था। ढाई तीन महीने पहले जब बड़े महाराज रायगढ़ के लिए प्रस्थान कर रहे थे। तब शम्भूराजा ने उनसे पूछा था—"पिताजी ! हम कितने दिनों बाद वहाँ आयें ? "पिताजी, मुझे लगता है कि मेरे सम्बन्ध में आपके मन में जो संशय उत्पन्न हुआ था। वह अभी तक मिट नहीं पाया। क्या इसे हम अपना दुर्भाग्य मानें ?" अपने को न रोक पाने के कारण शम्भूराजा ने कह दिया। शिवाजी महाराज का मन गद्गद हो गया। उन्होंने कहा, "शम्भू बेटे ! आपका हृदय कितना पाक साफ है? इसका साक्ष्य मुझे किसी और से नहीं लेना है। किन्तु रायगढ़ की जहरीली हवा अभी आपके स्वास्थ्य के अनुकूल नहीं है। समय के साथ ये जहरीले काँटे अपने आप दूर हो जाएँगे। आपस की खाइयाँ पट जाएँगी, मन परस्पर जुड़ जाएँगे। इसके बाद हम सभी रायगढ़ में एकत्र होंगे। जगदीश्वर का अभिषेक करना है, आपस में बहुत कुछ बोलना है, करना है।" उन चार दिनों में पिता पुत्र के बीच घटित दीर्घ संवाद शम्भूराजा के मानस पटल पर ताजा बना रहा। उसी बीच रायगढ़ पर राजाराम के यज्ञोपवीत संस्कार और विवाह के आयोजन का समाचार मिला। महाराज ने राजाराम का विवाह प्रतापराव की पुत्री के साथ निश्चित किया था। यह शुभ समाचार जब युवराज और युवराज्ञी को मिला तो वे बहुत प्रसन्न हुए थे। किन्तु विवाह समारोह का निमन्त्रण शम्भूराजा को नहीं आया। शम्भूराजा को पक्का विश्वास था कि आज नहीं तो कल निमन्त्रण अवश्य आएगा। किन्तु वैसा कुछ नहीं हुआ। शम्भूराजा और येसूबाई ने भी रायगढ़ जाने का निश्चय किया था। इसी बीच रायगढ़ से हिरोजी फर्जन्द, जनार्दन पन्त और अनेक छोटे-बड़े मुंशियों तक के लिए निमन्त्रण आ गये। जनार्दन पन्त के पोते विवाह में जाने के लिए सजधज कर बैठे थे। दो-ढाई साल की छोटी भवानी दौड़ती हुई आयी और येसूबाई के गले से लिपटकर 168 :: सम्भाजी
पूछने लगी, "माताजी, रायगढ़ के विवाह में जाने के लिए वहाँ घोड़े सज रहे हैं। हम लोग कब निकलेंगे?" शम्भूराजा ने छोटी भवानी को अपने सीने से लगा लिया। अपनी रुलाई को छिपाते और भीतर-ही-भीतर पीड़ा के घूँट पीते हुए वे बोले, "बेटी, छोटे राजा की माता को हमारा वहाँ जाना पसन्द नहीं है।" उन दिन पन्हाला से अनेक घोड़े सजधज कर रायगढ़ की ओर निकल गये। यदि दूसरे लोगों को भी निमन्त्रण न आया होता तो युवराज और युवराज्ञी विवाह समारोह के लिए रायगढ़ अवश्य चले जाते। किन्तु जानबूझकर दिखाया गया यह सौतेला व्यवहार बड़ा विषाक्त था। उस दिन शम्भूराजा बहुत उदास दिखाई पड़ रहे थे। नया रेशमी कुर्ता और मोतियों की माला पहने भवानी विवाह की खुशी में इधर उधर नाचती रही और अन्ततः वैसे ही सो गयी। येसूबाई ने संभा को सँभालने का बहुत प्रयास किया। किन्तु यदि चिन्ता का भूत एक बार मन में प्रविष्ट हो जाता है तो निकलने का नाम ही नहीं लेता। वह खाली बर्तन की तरह बजता ही रहता है। शम्भूराजा ने विषाद भरे स्वर में पूछा, "येसू अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिए लोग कैसे बदल जाते हैं? कैसे टूट जाते हैं सारे रिश्ते?" "और क्या स्मरण हो रहा है, युवराज?" "हो सकता है कि ये बातें आज किसी को अच्छी भी न लगें। किन्तु इस शम्भू के बचपन का आँगन था जीजा माता की गोद, और बचपन के चैतन्य का झूला थीं हमारी सौतेली माता सोयराबाई। वह ममत्व वह प्रेम कहाँ चला गया सब कुछ?" युवराज की पीड़ा भरी स्मृतियों को सुनकर येसूबाई का भी मन व्यथित हो गया। उन्होंने दुखी मन से कहा, "सच है, कितने बदल जाते हैं दिन?" रात खाने को दौड़ती थी। केवल दिन में शम्भूमहाराज अपने मित्रों के साथ पन्हाला के बाहर निकलते थे। पन्हाला के पश्चिम में तीन मील लम्बा म्हमाई का पठार था। उस पर आठ दस छोटी बड़ी पहाड़ियों के होने के कारण भीतरी भाग में अनेक खाइयाँ बन गयी थीं। काली चट्टानों के इन पहाड़ों की तलहटी में अनेक छुपने लायक जगहें बन गयी थीं। इनमें हजारों की संख्या में सैनिक रहते थे। इन सैनिकों को पन्हाला के बाहर का क्षेत्र दिखाई पड़ता था किन्तु गुफाओं की भाँति बनी जगह बाहर के लोगों को दिखाई नहीं देती थी। शम्भूराजा इन जगहों को 'बारद्वारी' कहते थे। वहाँ पहुँचकर शम्भूराजा अपने मित्रों से अभिमानपूर्वक कहते थे, "अपने सह्याद्रि के पहाड़ों-पत्थरों में ऐसी कितनी ही बारद्वारी खाइयाँ हैं। यह क्षेत्र बहुत ही कठिन और अजेय है। ये हमारे पहाड़ पत्थर अपना पेट चीर कर बड़ी सम्भाजी . 169
सहजता से हमें छिपा लेंगे। जहाँ सूर्य की किरणें तक नहीं पहुँच पातीं वहाँ इन पत्थर की दीवारों को भेद कर पापी औरंगजेब कैसे पहुँच सकेगा?'' रात को पलँग के अत्यन्त कोमल बिछौने पर भी शम्भुराजा को नींद नहीं आती थी। उनकी बेचैनी के कारण येसूबाई की चिन्ता भी बढ़ जाती थी। जब शम्भुराजा को कर्मचारियों और अधिकारियों की बात स्मरण होती तो उन्हें विषाद की जगह क्रोध आ जाता था। आवेश के स्वर में युवराज कहते, "आजकल हमारे फर्जन्द चाचा को भी जाने क्या हो गया है। जिस समय आगरा के महल से पिताजी निकले थे तब कुछ घंटों के लिए उन्होंने अपनी जगह पर फर्जन्द चाचा को सुला दिया था। क्योंकि फर्जन्द चाचा ठीक उन्हीं की तरह दिखाई देते थे। युवराज्ञी, उस समय मेरे बालमन को लगा था कि यदि ऐसा कोई प्रसंग घटित हुआ तो पिताजी की जगह को फर्जन्द चाचा भर देंगे। किन्तु आजकल तो हमें टालना ही उन्हें अच्छा लगता है।" "जाने दें! आप अधिक चिन्ता न करें। यहाँ पन्हाला पर पिताजी के साथ खुलकर बातें हुई हैं न? उनका हृदय निर्मल है तो अन्य लोगों की चिन्ता क्यों करें?'' येसूबाई ने कहा। "नहीं, येसू राज्य के कार्य व्यापार को चलाने के लिए कर्मचारियों की नियुक्ति करनी पड़ती है। किन्तु अनेक बार बेड़ ही खेत खाने लगती है।" चर्चा के दौरान येसूबाई ने कहा, "जब से सोयराबाई के छोटे भाई हंबीरराव स्वराज्य के सेनापति बन गये हैं तब से हमारी सासूजी को आसमान छोटा लगने लगा है। वे तो आजकल खुलकर कहती भी हैं कि-'शेर जैसा मेरा भाई स्वराज्य का सेनापति बन गया है तो बेटा राजाराम सिंहासन तक क्यों नहीं पहुँच पाएगा?'" शम्भुराजा ने कुछ नहीं कहा। तब येसूबाई उनसे पूछने लगीं, "क्या स्वामी को यह बात सच लगती है? हंबीरराव उनकी इस प्रकार सहायता करेंगे?'' "क्यों नहीं, येसू? यदि करोड़ों की सम्पत्ति का राज्य अपने भांजे को मिल रहा हो तो कौन सा मामा ऐसा नहीं करेगा? आज नहीं तो कल हंबीर मामा अपनी बहन के पक्ष में जाएँगे ही। यह तो काले पत्थर की लकीर की तरह स्पष्ट है।" विवाह का समारोह पूरा करके लोग शीघ्र ही पन्हाला आ गये। राजाराम के प्रति असीम ममता के कारण शम्भुराजा उनकी कुशल क्षेम पूछे बिना नहीं रह सके। लोगों ने बताया कि विवाह का कार्य समाप्त होने पर बड़े महाराज को प्रतापराव की बहुत याद आयी। वे बेचैन और विचलित हो गये। कुछ लोगों ने शम्भुराजा को बताया कि विवाह के ऐन मौके पर विवाह मंडप में ही राजाराम रुष्ट हो गये। यह कहकर कि-'हमारी शादी में शम्भू दादा को क्यों नहीं बुलाया गया?' क्रोध करने लगे। वे तो विवाह वेदी पर बैठने को तैयार ही न थे। हंबीर मामा ने उन्हें किसी 170 .. सम्भाजी
प्रकार यह कहकर तैयार किया कि 'शम्भूराजा आज ही पहुँचने वाले हैं।' तब जाकर कहीं छोटे युवराज विवाह के लिए तैयार हुए। यह कहानी सुनते सुनते शम्भूराजा का कलेजा तिलमिला रहा था। दूसरे दिन शम्भूराजा चन्दन के पीढ़े पर भोजन करने बैठे थे। उनके साथ जोत्याजी कतूरकर और अन्य मित्र भी साथ बैठे थे। इसी समय जनार्दन पन्त सुमन्त के घर से लड्डुओं से भरी टोकरी लेकर आये। येसूबाई ने तत्काल पहचान लिया कि यह रायगढ़ से आयी विवाह से सम्बद्ध भेंट है। उन्होंने आँखों के संकेत से टोकरी अन्दर रखने को कहा। किन्तु जो सेवक टोकरी लेकर आया था, उसकी समझ में कुछ नहीं आया। यह देखकर येसूबाई शीघ्रता से उठीं और टोकरी लेकर अन्दर जाने लगीं। उसी समय शम्भूराजा के कठोर शब्द उनके कानों में पड़े— "येसू क्या छिपा रही हो? क्यों छिपा रही हो? मंगल कार्य की मिठाई कहीं ऐसे छिपा कर रखी जाती है? ले आओ वे लड्डू और पूरी पंक्ति में बाँटो।" शम्भूराजा का वह रुद्रावतार देखकर येसूबाई झटपट लड्डू बाँटने लगीं। शम्भूराजा ने टोकरी से एक लड्डू उठाकर येसूबाई के हाथ में रख दिया। अपने आँसू को छुपाने का प्रयास करते हुए शम्भूराजा ने कहा "जोत्याजी येसूबाई! लड्डू खाओ, खाओ, कड़वे हों या मीठे, खाओ अब भले ही थाली में जहर के लड्डू परोसे तो भी उसे मीठा मानकर खाना होगा। येसू! अब हमारे सामने दूसरा कोई विकल्प रह गया है क्या?"
पाँच
फागुन की अमावस्या तिथि आयी। उस शाम को सूर्य डूबने से पहले ग्रहण ग्रस्त हो गया। पन्हालगढ़ से कुछ उत्साही लोग सूर्य ग्रहण देख रहे थे। शम्भूराजा ने उस ओर दृष्टि दौड़ाई। वे अपने महल के छज्जे पर खड़े थे। उसी समय येसूबाई वहाँ दौड़ती हुई आयीं। पीछे से युवराज का हाथ खींचते हुए कहने लगीं, "अन्दर चलिए। कहते हैं कि ग्रहण के समय सूर्य की ओर देखना अशुभ माना जाता है।" चार दिन बाद एक दिन शम्भूराजा अत्यन्त चिन्तित मुद्रा में महल की ओर लौटे। स्वागत के लिए येसूबाई दरवाजे पर खड़ी थीं। उन्हें देखकर येसूबाई ने चिन्तित स्वर में पूछा, "आज सवारी इतनी गम्भीर क्यों है?"
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"क्या कहते हैं?" येसूबाई ने साड़ी के पल्लू को अपनी ठुड्डी पर रखते हुए पूछा? "इतना ही नहीं रायगढ़ पर प्रतिदिन कोई-न-कोई नयी घटना घट रही है। पिताजी की बीमारी का सोयराबाई ने बहुत लाभ उठाया है। समझ में नहीं आता कि उनके मस्तिष्क में क्या चल रहा है। उन्होंने रायगढ़ पर अपना शिकंजा कसने की शुरुआत कर दी है।" "ऐसा? क्या कह रहे हैं?" "हाँ! वहाँ पर पूरी तरह भय और आशंका का वातावरण फैल गया है। गढ़ के द्वार तो बन्द रहते ही हैं, अन्य ड्योढ़ियाँ भी शायद ही कभी खोली जाती हों। कड़ी नाकेबन्दी के कारण किले में किसी भी व्यक्ति का प्रवेश सम्भव नहीं है। येसू, अपने रायगढ़ पर कोई विलक्षण राजनीति रंग ले रही है।" युवराज के चेहरे का रंग एकदम उड़ गया था। येसूबाई ने पलक झपकते ही युवराज का भाव पढ़ लिया। उन्होंने कहा, "मुझे लगता है कि यहाँ अधिक समय गँवाने की अपेक्षा यही अच्छा होगा कि वहाँ के लिए निकल पड़ें।" बिना किसी दुविधा में पड़े आगे निर्णय लेना आवश्यक था। युवराज ने कवि कलश के लिए संगमेश्वर की ओर पत्र भेज दिया था। शृंगारपुर की ओर भी घोड़े दौड़ा दिये गये थे। युवराज ने अपने ससुर पिलाजीराव शिर्के को सावधान रहने का संकेत दे दिया था। चैत्र की पूर्णिमा आयी। यह हनुमान जयन्ती का दिन था। युवराज भोर में ही उठे और स्नानादि से निवृत्त होकर हनुमान मन्दिर चले गये। युवराज और युवराज्ञी ने हनुमानजी की महापूजा की। किन्तु आज एक पोरिषा ऊँची हनुमानजी की पाषाण मूर्ति कुछ अलग ही दिखाई दे रही थी। हनुमानजी का सिन्दूर चर्चित मुख बहुत क्रुद्ध दिखाई पड़ रहा था। आज प्रातःकाल से ही येसूबाई का मन बहुत अशान्त था। उन्हें भविष्य का कोई अनिष्ट भयभीत कर रहा था। उनका मन कहीं भी नहीं लग रहा था। दोपहर में उन्होंने घबराये स्वर में युवराज से कहा, "मुझे ससुरजी की बड़ी चिन्ता हो रही है।" "पिताजी की तबीयत की इतनी चिन्ता क्यों कर रही हो? वे तो सिद्ध पुरुष हैं। दीर्घायु होंगे ही और अभी उनकी उम्र ही क्या हुई है? पचास पूरा करने में भी अभी एक महीना बाकी है। मुझसे और तुमसे इस मराठी माटी को उनकी अधिक आवश्यकता है।" सन्ध्या समय कवि कलश युवराज के महल में प्रविष्ट हुए। उनके पीछे ही संभाजी राजा के दो जासूस भी महाड़ और रायगढ़ वाड़ी से लौटकर आये। दोनों जासूस बहुत घबराये हुए दिख रहे थे। जासूसों ने घबराये स्वर में कहा, "हमें तो क्या, किसी को भी रायगढ़ में प्रवेश नहीं मिल रहा है। कुछ लोग कह रहे थे कि 172 :: सम्भाजी
महाराज को गुड़घी रोग हो गया है।'' ''कुछ लोग दबे स्वर में यह भी कह रहे थे कि सोयराबाई ने महाराज पर विष प्रयोग किया है।'' दूसरे जासूस ने कहा। जासूसों की खबरें संभाजी राजा शान्तिपूर्वक सुन रहे थे। गर्म साँस छोड़ते हुए उन्होंने कवि कलश से कहा, ''कविराज स्वराज्य का चक्र उल्टी-सीधी दिशा में घूम रहा है। तैयार हो जाइए और सावधानी बरतिए ! पिताजी के स्वास्थ्य का ठीक- ठीक समाचार ले आने के लिए जितनी जल्दी सम्भव हो जासूसों को रायगढ़ भेजिए।'' चैती पूनम का दिन था। आठ दिनों तक तीव्र ज्वर से पीड़ित होने के कारण महाराज परलोकवासी हो गये। शिवाजी महाराज के आकस्मिक निधन के कारण रायगढ़ विषाद में डूब गया। बुर्ज झुक गये। दरवाजों की कमानें झुकी हुई दिखने लगीं। गंगा सागर से लेकर काली हौज तक अनेकानेक तालाबों, बावड़ियों और झरनों का पानी फीका लगने लगा। इस वज्राघात से मराठा राज्य की मानो कमर ही टूट गयी। यह भी प्रश्न था कि आसपास के शत्रु आक्रमण कर सकते थे। स्थिति समझ में नहीं आ रही थी। किले पर अष्टप्रधानों में कोई भी अनुभवी बुजुर्ग व्यक्ति मौजूद नहीं था। इसीलिए कान्होंजी भांडवलकर, दादूजी सोमनाथ और महारानी सोयराबाई इस दुखद समाचार को छुपा रहे थे। राजाराम के हाथों किसी प्रकार अन्त्येष्टि कर्म कराया गया। कारवार की ओर युद्ध पर निकले अण्णाजी दत्तो जल्दी ही वापस लौट आये। उनके पीछे ही नासिक त्र्यम्बकेश्वर से पेशवा मोरोपन्त भी वापस आ गये। राज्य रावण का हो या राम का, प्रशासन के अधिकारी इस बात का ध्यान तो रखते ही हैं कि उनका स्थान और अधिकार सुरक्षित बना रहे। यही कारण था कि रायगढ़ के सचिव अण्णाजी दत्तो बहुत बेचैन थे। वे सोचते थे-''यहाँ जो भी होगा देखा जाएगा किन्तु यदि एकबार संभाजी गद्दी पर बैठ गये तो उनके लिए कुछ ठीक न होगा। उनके पक्ष वालों का भी ऐसा ही सोचना था। अण्णाजी की नींद उड़ गयी थी। आज तक उन्होंने संभाजी राजा से द्वेष करने और चार लोगों में उनके सम्बन्ध में अनाप-शनाप बकने का एक भी अवसर खाली नहीं जाने दिया था। अण्णाजी की तानाशाही प्रजा से प्राप्त धन के घोटालों, परस्पर जारी की गयी सनदें, गलत ढंग से संचित किया गया धन आदि की पूरी जानकारी शम्भूराजा को थी। इसीलिए अण्णाजी जब भी सामने पड़ते थे तो शम्भूराजा कहते थे, ''अपश्यतः पश्चातामात्यान्पश्यते-यह देखो पैसा लूटने वाले अमात्य आ गये।'' सम्भाजी 173
शिवाजी महाराज का नारा सर्वकल्याण का था किन्तु उनके कुछ अधिकारियों का झुकाव अपना उल्लू सीधा करने की ओर था। इसीलिए वसूली की पूरी राशि सरकारी खजाने तक नहीं पहुँच पाती थी। यही नहीं, जब फ्रांसीसी, अंग्रेज पुर्तगाली आदि विदेशी अतिथि किले पर आते थे तो दरबारी अधिकारी ललचाये रहते थे कि महाराज के साथ उन्हें भी कुछ उपहार मिल जाय। बीस-बाईस वर्ष के तरुण शम्भूराजा को यह सब असह्य था। वे क्रोध से भन्नाये रहते थे परिणामस्वरूप अधिकारी उनके असन्तुष्ट रहते थे। शिवाजी महाराज के स्वर्गवास के बाद अन्य इष्ट मित्र दरबारी अण्णाजी से दबी जबान में पूछने लगे, “क्यों अण्णाजी अब शम्भूमहाराज गद्दी पर विराजमान होंगे तो आपका क्या होगा?'' अपने भविष्य की चिन्ता ने अण्णाजी को पागल कर दिया था। अण्णाजी अच्छी तरह जानते थे कि अपने बेटे को गद्दी पर बिठाने के लिए सोयराबाई शम्भूराजा का विरोध करेंगी किन्तु केवल बुद्धि और षड्यन्त्र के सहारे राज्य खड़े नहीं होते। राज्य के लिए बाहुबल की आवश्यकता होती है। स्वराज्य के सेनापति हंबीरराव मोहिते का पड़ाव कराड के समीप पड़ा था। अण्णाजी ने उन्हें तत्काल सन्देश भेजा, "आपके भांजे राजाराम साहब को गद्दी पर बिठाने का हमारा पक्का इरादा है। वे आपकी सात पीढ़ियों का उद्धार कर देंगे। किन्तु आपके सहयोग के बिना हम अपने प्रयत्न में सफल नहीं हो सकते।" सुदैव से दो ही दिनों में हंबीरराव का उत्तर आ गया- "मन्त्रीजी! आप स्वयं इतने ज्ञानी और तीव्र बुद्धि वाले हैं। स्वराज्य के किस वृक्ष मे कितने पत्ते हैं, इसका हिसाब किताब आपके पास है। आपके नेतृत्व में ही मेरे भांजे का कल्याण होगा। इस सिपाही को इससे अधिक और क्या चाहिए?'' हंबीरराव की लिखित सम्मति से अण्णाजी कुछ अधिक ही प्रसन्न हो गये। उनके पक्ष को इससे बड़ा बल मिला। किले पर आने के बाद वे सोयराबाई से दो तीन बार मिल चुके थे। अब तो उनकी जेब में हंबीरराव का पत्र भी आ गया था। इसीलिए महारानी सोयराबाई के महल की ओर जाते समय उनके पैरों में विलक्षण तीव्रता आ गयी थी। महाराज की मृत्यु के बाद सप्त महल सूना सूना दिखाई देने लगा था। किन्तु रनिवास के बाहर एक महल के सामने अण्णाजी को अधिक प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ी। दासी द्वारा सूचित करने पर महारानी सोयराबाई थोड़े ही समय में उपस्थित हो गयीं। पति के स्वर्गवास से उनका मन टूट गया था। किन्तु अपने के भविष्य की चिन्ता में वे व्याकुल हो रही थीं। वर्तमान परिस्थिति से बिना विचलित हुए उन्होंने किले पर और किले के बाहर कड़ा बन्दोबस्त कर रखा था। अण्णाजी को महारानी का जोश, सामर्थ्य और इरादा अच्छी तरह मालूम था। इसलिए उन्हें पूरा विश्वास था 174 :: सम्भाजी
कि उनकी मनोवांछित योजना अवश्य पूरी होगी। महारानी आकर सामने पलँग पर बैठ गयीं। अण्णाजी पन्त बड़ी आत्मीयता से अभिवादन करके कहने लगे- "महारानी! अब अधिक समय गँवाना किसी के भी लिए अच्छा नहीं है। बाहर प्रजा उलझन में पड़ गयी है, सेना भी बेहाल हो रही है। उन्हें यदि समय पर निश्चित आदेश दिया गया तो ठीक रहेगा।" "इतनी शीघ्रता करनी होगी क्या?" "शीघ्रता? महारानी महाराज की मृत्यु के समाचार को जितना ही छुपाया जा रहा है, यह समाचार उतनी ही तीव्र गति से बाहर फैल रहा है। इसके साथ ही सिंहासन को अधिक समय तक खाली रखना अराजकता को निमन्त्रित करना है।" सोयराबाई और भी चिन्ताग्रस्त हो गयीं। उनकी वेदना छिप नहीं पायी। दीर्घ निःश्वास छोड़ते हुए उन्होंने पूछा- "किसको बिठाएँ सिंहासन पर? शम्भूराजा के बदले यदि हमने राजाराम को गद्दी पर बिठाया तो क्या प्रजा इसे स्वीकार करेगी? वरिष्ठ लोग इससे सहमत होंगे क्या?" "आप ऐसे ऐन मौके पर इस प्रकार पीछे क्यों हट रही हैं? सोयराबाई को स्मरण दिलाते हुए अण्णाजी ने कहा, "आपने बड़े महाराज को बहुत समीप से देखा है। क्या उन्होंने कभी भी शम्भूराजा को राज्य देने की बात कही? क्या आपको ऐसा कोई प्रसंग स्मरण है?" "किन्तु उन्हें राज्य नहीं देना है ऐसा भी तो महाराज ने कभी नहीं कहा।" अण्णाजी ने अपने रेशमी रूमाल से पसीने से तर चेहरे को पोंछ लिया। सोयराबाई को अधिक सचेत करते हुए उन्होंने कहा, "महारानी जी आप ही सोचिए बड़े महाराज के अन्तिम आठ दिनों से हवा किस दिशा में बह रही है?" सोयराबाई कुछ सम्भ्रम के साथ बोलीं, "उन दिनों तो महाराज अर्धचेतन अवस्था में रहते थे। बीच-बीच में कुछ स्मरण करते हुए कहने लगते थे- 'शम्भू को बुला लीजिए, मेरे शम्भू को बुला लीजिए'।" "बुला लेने का मतलब यह थोड़े ही होता है कि गद्दी पर बिठाइए। मृत्यु के समय मनुष्य की जान छटपटाती है, बाल बच्चों की याद आती है। इससे अधिक इसमें कुछ नहीं है।" अण्णाजी की इन बातों से सोयराबाई और भी दृढ़ दिखाई देने लगीं। अपने को न रोक पाने के कारण अण्णाजी चिन्तातुर होकर बोले, "महारानी जी कृपा कीजिए, जल्दी कीजिए। राज्यारोहण के निर्णय में आप विलम्ब कर रही हैं। महाराज की मृत्यु का समाचार छिपाने से बाहर लोगों में कुछ अलग ही शंका फैल रही है।" "कैसी आशंकाएँ?" सम्भाजी :: 175
इधर-उधर देखते हुए अण्णाजी ने धीमे कि तेज स्वर में कहा, "बाहर लोगों की जिह्वाएँ कुछ अधिक ही हिलने लगी हैं। वे कह रहे हैं कि राज्य के लोभ ने महारानी को अन्धा कर दिया है। उन्होंने ही महाराज को विष दे दिया है। सोयराबाई ने ही महाराज को मार डाला।" इससे सोयराबाई बहुत क्षुब्ध हुई। किन्तु समय गँवाने से कोई लाभ न था। तत्परता से भविष्य का निर्णय लेना आवश्यक था। उसी दिन दोपहर को निजी दरबार में रामचन्द्र नीलकंठ, न्यायाधीश प्रह्लाद और राहुजी सोमनाथ जैसे विशिष्ट लोग चर्चा के लिए एकत्र हुए। चर्चा आरम्भ हुई। बहुत समय बीत जाने पर पेशवा मोरोपन्त पिंगले वहाँ नहीं आये। वैसे भी अण्णाजी को मोरोपन्त पर भी विश्वास न था। नासिक से रायगढ़ आने में भी पन्त को विलम्ब हुआ था। अण्णाजी पहले पहुँच गये थे। शम्भूराजा के विरोधियों को एकत्र करने का सुअवसर मिला था। इससे अण्णाजी मन ही मन बहुत प्रसन्न थे। बैठक में मोरोपन्त के सम्मिलित न होने से कुछ लोगों की दृष्टि वक्र होने लगी। लोग सशंक होने लगे। अण्णाजी दत्तो बेचैन होकर उठ गये। वे अब तक मोरोपन्त के पास तीन बार दूत भेज चुके थे। किन्तु फिर भी वे नहीं आये। इससे अण्णाजी बहुत बेचैन हो गये। अन्ततः परिस्थिति के असह्य हो जाने पर उन्होंने राहुजी सोमनाथ से कहा, "अब आप उठिए। साथ में सेना लेकर मोरोपन्त की हवेली पर जाइए और उन्हें नजरबन्द कीजिए। इसके बिना उनके जैसे अभिमानी व्यक्ति का अहंकार उतरेगा नहीं।" इसी समय दुबले-पतले गेहुँए रंग के मोरोपन्त पेशवा सामने आकर खड़े हो गये। अण्णाजी के कुछ शब्द उनके कानों से टकरा गये थे। इसी से मोरोपन्त की भूरी आँखें कुछ तिरछी हो गयी थीं। उन्होंने शम्भूराजा के विरोध में एकत्र इन दिग्गजों को देखा और कुछ पीछे हटकर नम्रतापूर्वक नीचे बैठ गये। "बोलो भाइयो, बोलो। समय बहुत कठिन है। सीमा पर शत्रु खड़ा है। ऐसे समय में विवेकपूर्ण निर्णय लेना ही श्रेयस्कर होगा।" अण्णाजी पन्त जोर-जोर से कहने लगे, "अभी एक वर्ष पहले ही जो व्यक्ति मुगलों से जा मिला, जिसने अपने भूपालगढ़ जैसे मजबूत किले को खोद खोदकर गिराया, जिसने अपने पिता के राज्य से गद्दारी की, क्या ऐसे स्वराज्य द्रोही के हाथों में यह स्वराज्य सौंपना है?" अण्णाजी दत्तो के सारे तर्क सभी को बेजोड़ लगे। किन्तु अपनी धीमी और शान्त आवाज में अण्णाजी को रोकते हुए मोरोपन्त ने प्रश्न किया—"हम कहते हैं थोड़ा धीरज रखिए इतनी उतावली किस बात की?" "उतावली?" नीचे बैठे अण्णाजी उठकर खड़े हो गये और कहा, "क्यों? आप शम्भूराजा के आने की प्रतीक्षा कर रहे हैं क्या?" 176 सम्भाजी
अण्णाजी ने बहुत चिल्ल-पों मचाई किन्तु प्रधान मंडली में से कोई भी उनके सहयोग के लिए तत्काल तैयार नहीं हुआ। अण्णाजी भी कच्चे गुरु के चेले न थे। वे बड़े उस्ताद थे। स्वराज्य के नाम पर उन्होंने बहुत धन जोड़ रखा था। इसीलिए अन्य प्रधान सोचते थे कि शम्भूराजा के सामने यदि अण्णाजी का कच्चा-चिट्ठा खुलता है तो खुलने दो, हमें उससे क्या? प्रधानों और अधिकारियों का उदासीन प्रतिसाद अण्णाजी को बहुत अखरा। वे दाँत से ओंठ काटते हुए और अपनी नुकीली मूँछों पर हाथ फेरते हुए बोले, "चलो हमें दिखाई पड़ रहा है कि आप लोगों को शम्भूराजा की चाटुकारिता करना ही अच्छा लगेगा। आप लोग खुशी से उनकी चाकरी करो। मुझे तो यहाँ एक पल के लिए भी चैन नहीं आएगा। उसकी अपेक्षा हाथ में कटोरा और लाठी लेकर काशी यात्रा करना मुझे अधिक अच्छा लगेगा।" अण्णाजी ने फिर से एकबार सब पर नजर डाली। किन्तु किसी का भी समर्थन न मिलने से निराश हो गये। महारानी सोयराबाई की समझ में आ गया कि बैठक में अण्णाजी अकेले पड़ रहे हैं। उन्हें लगा कि राजमाता होकर भी उनके सारे मनोरथ टूट जाएँगे! राजमाता बनकर दरबार में बैठना तो दूर उन्हें अपने साथियों का साथ भी नहीं मिल रहा था। उन्हें देखकर ऐसा लग रहा था मानो यात्रियों के साथ से छूटकर अकेले काशी यात्रा को निकली हों। फिर दरबारियों को आड़े हाथों लेती हुई बोलीं, "अण्णाजी पन्त क्या केवल अपने भले के लिए यह सब कह रहे हैं? आज महाराज के स्वर्गवासी होने से स्वराज्य के जहाज के डूबने का समय आ गया है। ऐसे समय में भले-बुरे की चिन्ता न करने वाले शम्भूराजा के पाप में सने पैर यदि सिंहासन पर पहुँच गये तो कैसे अनर्थ होगा? इसकी कल्पना किसी ने की है क्या?" स्वयं महारानी ने नेतृत्व सँभाला तो बैठक में हवा की दिशा ही बदल गयी। वैसे सभी कर्मचारी शम्भूराजा से किसी-न-किसी कारण दुखी थे। इसलिए अब उन सभी को शम्भूराजा में कोई-न-कोई दोष दिखाई देने लगा। जो शान्त स्वभाव के थे, वे भी मौका देखकर शम्भूराजा की शिकायत करने लगे। न्यायाधीश प्रह्लाद निराजी ने कहा, "बड़े महाराज मात्र पुत्रमोह के कारण उन्हें बुरा नहीं कहते थे। मैं दावे के साथ कहता हूँ कि उनके जैसे उग्र स्वभाव वाले व्यक्ति के लिए राज्य सँभालना बहुत कठिन है।" "इसीलिए कहता हूँ जल्दी कीजिए। औरंगजेब जैसा शत्रु दरवाजे पर खड़ा है। आक्रमण होने से पहले राजाराम के हाथों में सारा कार्यभार सौंप दीजिए और निश्चिन्त हो जाइए। इसी में हम सब का कल्याण है।" अण्णाजी ने सुझाव दिया। सभी को शांत करके महारानी कड़े शब्दों में कहने लगीं-"घर की बात को सम्भाजी :: 177
दरबार में कहना उचित नहीं है। किन्तु समय ऐसा आ गया है कि चुप बैठना पाप होगा। हमारे सौभाग्य अलंकार बड़े महाराज ने इस विषय पर मुझसे अनेक बार चर्चा की है। उनके विचार से शम्भू उग्र स्वभाव का ऐसा तरुण है जिसके भीतर अनेक दुर्गुणों और व्यसनों का भंडार भरा है। वह व्यवहार में उद्धत और गैरजिम्मेदार है। औरंगाबाद और बहादुरगढ़ पर रहकर आने के बाद उसका खान पान, आचार- विचार, मुसलमानों की विलासी आदतें आदि उसमें भर गयी हैं। यदि ऐसी उद्धत और विलासी प्रवृत्ति का युवक गद्दी पर आ जाय तो राज्य टूट जाएगा, डूब जाएगा।'' सोयराबाई और अण्णाजी की कहानियों से बैठक का रूप ही बदल गया। राजाराम को गद्दी पर बिठाकर उनके नाम से कार्यभार सँभालने का निर्णय लिया गया। मोरोपन्त की भूरी आँखें चमक उठीं। उन्होंने शान्त स्वर में कहा, "हमने तो राजाजी का नमक खाया है। उन्हीं की सौगन्ध खाकर स्पष्ट रूप से कहता हूँ कि ज्येष्ठ पुत्र के जीवित होते हुए क्रिया कर्म के लिए उसे न बुलाना, उत्तराधिकार में रोड़े अटकाना, धर्मशास्त्र के नियमों को नकारना जैसी बातें मुझे बिलकुल पसन्द नहीं हैं।'' "सुनिए, यह किसी एक का नहीं पूरे राजमण्डल का निर्णय है।" अण्णाजी ने क्रुद्ध होकर कहा। "भाइयो आप जैसा भी चाहे वैसा निर्णय लेने का आपको अधिकार है। परन्तु इस पाप कर्म में आप मुझे न घसीटें।" मोरोपन्त की इस भूमिका से सभी के चेहरे का रंग उड़ गया। महारानी सोयराबाई तो कुछ अधिक ही बेचैन हो उठीं। अण्णाजी को लगा कि उनके अब तक के सारे प्रयत्नों पर पानी फिर जाएगा। अण्णाजी ने क्रोधावेश में सन्तप्त होकर कहा, "पेशवा, आपको इस बात का ध्यान है कि आप क्या बोल रहे हैं?" "अण्णाजी पन्त आप अपने दिमाग को शान्त रखें तो ठीक होगा।" अपने स्वर को बिना जरा भी विचलित करते हुए मोरोपन्त ने कहा, "राजाराम का विरोध करने का कोई कारण नहीं है। परन्तु भाइयो, यह समय कठिन परीक्षा का है। कल यदि दिल्लीश्वर औरंगजेब की फौज पानी के पहाड़ की तरह आकर अपने राज्य पर बरस गयी तो उसकी नाक में नकेल कौन डालेगा?" "वाह! मोरोपन्तजी, इसका मतलब हम सभी नामर्द हैं और सिर्फ आपके शम्भूराजा अकेले बड़े बहादुर हैं।" अण्णाजी ने उपहास करते हुए कहा। "हाँ, हाँ, शम्भूराजा ही सच्चे बहादुर हैं। मराठी राज्य में उनकी बराबरी 178 :: सम्भाजी
२. छत्रपति पद पर राज्याभिषेक, बुरहानपुर विजय एवं स्वराज्य की सुदृढ़ता
दूसरा कोई नहीं कर सकता।'' मोरोपन्त ने बड़े विश्वास मे साफ-साफ कहा, "यहीं मत रुकिए जरा बाहर भी झाँक कर देखिए कि वहाँ क्या चल रहा है? वहाँ किले के बाहर मुख्य द्वार के पास पाचाड़, रायगढ़वाड़ी से लेकर महाड़ तक हजारों की संख्या में प्रजा एकत्र हो रही है। प्रजा जोरदार माँग कर रही है कि—'शम्भुराजा को ही गद्दी पर बिठाइए।' सेना में तो युवराज का ही हुक्म चलता है। समय की माँग को पहचानिए, अपनी बुद्धि को ठिकाने रखिए।'' मोरोपन्त के स्पष्ट कथन से अण्णाजी के पक्षधर घबरा गये। इसी समय एक गद्दी पर बैठे हुए बालाजी पन्त चिटणीस आगे बढ़े और उत्साहित होकर कहने लगे, "अब सच ही कहना है तो '' अण्णाजी पन्त ने बालाजी को बीच में ही रोकते हुए कहा, "रुकिए, आप कुछ मत बोलिए। हमें सब मालूम है।'' उन्होंने मोरोपन्त की ओर रुख करके कहा, "तो पन्त आपको सेना का डर है। आप भूल गये क्या? सोयराबाई के छोटे भाई हंबीरराव मोहिते हमारे सेनापति हैं। "किले पर जो करोड़ों का रत्न भंडार और खजाना है वह हमारे अधिकार में है। सेनापति हमारे हैं। महारानी भी हमारे पक्ष में हैं। यह सब छोड़कर पन्तजी आप जाएँगे कहाँ ? उस कवि कलश के पास ?'' अण्णाजी ने कहा। अण्णाजी एक मंजे हुए अभिनेता की भाँति अपनी भूमिका निभा रहे थे। बात करते करते कभी अपनी आँखों को वर्तुलाकार घुमाते कभी माथे की पगड़ी को उतार कर जमीन पर फेंकते। इस बीच उन्होंने दो बार अपनी शिखा को खोला और फिर से बाँधा। उन्होंने राजाराम के गद्दी पर बैठने के फायदों को फिर से दुहराया। संभाजी के दुर्व्यवहार, बुरी आदत और क्रोधी स्वभाव का पहाड़ा एक बार फिर दोहराया। एक बार पुनः कवि कलश के सम्बन्ध में उन्होंने कहा— "अरे, एक बार शम्भुराजा के उस बदमाश कवि कलश को रायगढ़ पर आने तो दो। वह जादूगर जब भैंस की गीली खाल पर बैठकर नराधम की तरह जारण मारण क्रिया करता रहेगा, मन्त्र-तन्त्र के आवेश में सुई और आलपिन से खाँसी काली गुड़िया की तरह थिरक थिरक कर नाचने लगेगा तब तुम लोगों का मस्तिष्क ठिकाने पर आएगा।'' कवि कलश से जुड़े अज्ञात भय से सभी घबरा गये। अन्त में बड़ी मेहनत के बाद अण्णाजी ने अपना वांछित फल अपनी झोली में डाल लिया। उनके प्रस्ताव पर अन्ततः मोरोपन्त ने भी हामी भर दी। अण्णाजी पन्त और महारानी सोयराबाई ने अन्ततः चैन की साँस ली। सारी राजनीति अन्त में उनके मनोनुकूल हो गयी थी। उन्हें लगा कि अब सब ठीक हो गया है। राजाराम का राज्यारोहण प्रायः निश्चित हो गया था। परन्तु सभी के सामने सम्भाजी :: 179
गम्भीर प्रश्न यह था कि शम्भूराजा का क्या किया जाय? उनको बन्दी बनाये बिना एक दिन भी राज्य चलाना सम्भव नहीं था। "लिखिए पन्त, अभी का अभी लिखिए।" महारानी सोयराबाई ने कहा, "जनार्दन पन्त सुमन्त को आदेश भेजिए कि वे युवराज को पकड़कर वहीं पन्हाला के बन्दीगृह में डाल दें। उस काँटे को व्यर्थ में यहाँ ले आने की आवश्यकता नहीं है।" मोरोपन्त ने सभी की ओर दृष्टि घुमाई फिर मीठी मुस्कान बिखेरते हुए उन्होंने अण्णाजी से कहा, "अण्णाजी पन्त! आप अपनी उतावली में राज्य के कानून भी भूल गये हैं क्या? कोई भी किलेदार या सूबेदार बालाजी आवजी चिटणीस के हस्ताक्षर और उनकी मुद्रा देखे बिना हुक्म की तामील नहीं करेगा।" मोरोपन्त की बात सुनकर अण्णाजी का सिर घूमने लगा। उन्हें पसीना छूट गया। सोयराबाई की दृष्टि बैठक में बालाजी आवजी को ढूँढ़ने लगी। परन्तु बालाजी बैठक से कब के जा चुके थे। यह बात ध्यान में आते ही सभी चिन्तित हो गये। छह महल के चिराग जल रहे थे। रनिवास से थोड़ी दूरी पर जो जंगली झाड़ियाँ और पेड़ पौधे थे उनसे होकर जोर की हवा चल रही थी। हिरकणी बुर्ज से झींगुरों की किर्रऽऽ किर्रऽऽ सुनाई पड़ रही थी। रनिवास के बाहर बैठक में केवल अण्णाजी पन्त और सोयराबाई बैठे थे। दोनों बहुत तनावग्रस्त थे। अण्णाजी दत्तो ने रुष्ट होकर कहा, "इस बालाजी चिटणीस के गले यह निर्णय कौन उतारेगा? उन्हें तो पहले से ही शम्भूराजा से बहुत लगाव है।" सोयराबाई बेचैन हो गयीं। उन्होंने कहा, "उन्हें आने के लिए सन्देश भेजा है न? मुझे विश्वास है कि मेरा आदेश वे अवश्य मानेंगे।" थोड़ी ही देर में ताड़ की तरह लम्बे बालाजी पन्त बैठक में प्रविष्ट हुए। उन्होंने झुककर सोयराबाई का अभिवादन किया। सोयराबाई ने राज्य की कठिनाइयों का पहाड़ा बड़े मीठे शब्दों में पढ़ा और कहा-'चिटणीस! आपके हस्ताक्षर का पत्र जाना चाहिए।' बालाजी ने कहा, "जब तक हमारी जान में जान है, यह सम्भव नहीं है।" 180 :: सम्भाजी
"किन्तु यदि आपकी मुहर के साथ पत्र नहीं जाएगा तो कोई भी किलेदार शम्भूराजा को कैद करने का साहस नहीं करेगा।" सोयराबाई ने चिटणीस से बार-बार प्रार्थना की। किन्तु सोयराबाई की प्रार्थनाओं और धमकियों का बालाजी आवजी पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। महारानी से क्षमायाचना करते हुए उन्होंने बड़े आदर से कहा, "हम इस प्रकार कैसे लिख सकते हैं? हमने तो सरकार का नमक खाया है। संभाजी राजा तो हमारे स्वामी हैं।" "फिर भी हम जैसा कहेंगे वैसा हुक्मनामा आपको लिखना पड़ेगा।" अण्णाजी और सोयराबाई ने कठोर स्वर में कहा। "आप हमारे ऊपर व्यर्थ दबाव न डालें। हमारी ओर से यह पाप कभी न होगा।" बालाजी ने स्पष्ट रूप से अपनी अस्वीकृति व्यक्त की। महारानी जी यह सारा मामला हमारी परम्पराओं के विरुद्ध है। बालाजी पन्त आदेश लिखने के लिए तैयार नहीं हुए। वे अपने निर्णय से टस से मस नहीं हो रहे थे। रात समाप्त होने को आयी। समय बीतता जा रहा था। किन्तु बालाजी कुछ भी सुनने को तैयार न थे। तब सोयराबाई ने अत्यन्त कठोर स्वर में पूछा, "चिटणीस! युवराज को कैद करने का आदेश आप लिख रहे हैं या नहीं?" अण्णाजी दत्तो मर्म पर आघात करते हुए बोले, "बालाजी पन्त अब आप बूढ़े हो चुके हैं। आपके निलोबा, खंडोबा जैसे दो छोटे बच्चे हैं। वे फिर से जंजीरे पर जाकर चाकरी तो नहीं करेंगे। उनकी रोटी तो रानी जी के ही हाथ में है। क्यों व्यर्थ में टाँग अड़ा रहे हो? अपने ही हाथों अपने भोजन में मिट्टी मिला रहे हो?" हुक्मनामा लिखे बिना अण्णाजी और महारानी उठने को तैयार ही न थे। रात्रि के बीतने के साथ बालाजी पर भावनात्मक और मानसिक दबाव बढ़ रहा था। वे हाथ जोड़कर धीर-गम्भीर स्वर में बोले, "आप लाख समझाइए किन्तु ये बातें हमारी समझ में नहीं आतीं। यह पाप मुझसे नहीं होगा।" बातें करते-करते बालाजी के सामने अतीत का दृश्य प्रस्तुत हो गया। राजापुर में बेरोजगारी का दिन काटते हुए बालाजी नामक युवक का वह पत्र याद आया। उस पत्र की लिखावट याद आयी जिसने शिवाजी महाराज का मन मोह लिया था। उस स्मृति के सगुण-साकार होते ही बालाजी पन्त गद्गद हो गये। आँखों के आँसू पोंछते हुए उन्होंने कहा, "जिन अक्षरों ने मेरे जैसे अनाथ को हिन्दवी स्वराज्य के चिटणीस पद की ऊँचाई तक पहुँचाया, उन्हीं अक्षरों से धोखा कैसे करूँ? साक्षात् शिवपुत्र संभाजी राजा को कैद करने का हुक्म लिखने का पाप कैसे करूँ? नहीं, नहीं ऐसा नहीं होगा। अण्णाजी पन्त आप भले ही मेरे हाथों की अँगुलियों को काट डालिए पर ऐसे गलत काम के लिए हमारी कलम नहीं चलेगी।" आधी रात को अण्णाजी दत्तो ने बालाजी को ही गिरफ्तार कर उनकी जायदाद सम्भाजी :: 181
को जब्त कर लेने की धमकी दी। परन्तु बालाजी उस धमकी से भी नहीं डरे। अन्त में अण्णाजी ने अपनी कूटबुद्धि का उपयोग किया। मध्यममार्ग का सुझाव दिया। तब आँखों के आँसू पोंछते हुए बालाजी ने कहा, "ठीक है, अण्णाजी ! आप का इतना हठ है तो मेरे बेटे से आवजीबाबा के अक्षरों में पत्र लिखवाइये। परन्तु इस प्रकार की गद्दारी भी मुझे ठीक नहीं लगती। शम्भुराजा हमारे ऊपर कितना विश्वास करते हैं। उनके हृदय को, मन को कैसा लगेगा?" सात शम्भुराजा की दृष्टि जब सामने वाली सज्जा कोठी की ओर जाती तो उन्हें सामने वाली प्रचंड खाई दिखाई पड़ती। उन्हें तत्काल शिवाजी महाराज का स्मरण हो आता। पिता की चिन्ता में उनके पेट में बल पड़ने लगते। आज उन्हें लग रहा था कि सज्जा कोठी ने मन को घेर लिया है। इसलिए उन्होंने अपना घोड़ा बाहर निकाला। कवि कलश और जोत्याजी केसकर के घोड़े उनके साथ दौड़ते हुए निकले। ये तीनों घोड़े दौड़ाते हुए बाघ दरवाजे की ओर गये। समीप के एक बुर्ज के पास पत्थर की एक बड़ी शिला देखकर तीनों व्यक्ति वहीं रुक गये। दूर की ढलान से एक सर्पिल पगडंडी ऊपर आती थी। रास्ते के दोनों ओर झाड़ियों के अनेक झुरमुट बिखरे पड़े थे। ऊपर खड़े शम्भुराजा की दृष्टि सहज भाव से नीचे की ओर गयी। उन्हें निचली पगडंडी से दो व्यक्ति ऊपर की ओर आते दिखाई दिये। खड़ी चढ़ाई पर चढ़ते घोड़ों का दम फूलता था इसलिए दोनों अपने अपने घोड़ों की लगाम पकड़े धीरे-धीरे किन्तु बड़े इतमीनान से ऊपर चढ़ रहे थे। बीच का एक घास का मैदान समाप्त हुआ। पहाड़ का अधिकांश हिस्सा चढ़कर वे दोनों ऊपर पहुँच रहे थे। अब उन दोनों की आकृतियाँ स्पष्ट दिखाई दे रही थीं। संभाजी राजा अपनी पारखी नजर से उन दोनों को देखने लगे। उनमें से एक था खंडोजी नाइक और दूसरा गणोजी कावले। वे दोनों ही मँजे हुए जासूस थे। पन्हाला, विशाल गढ़ से रायगढ़ तक उनका निरन्तर आना-जाना लगा रहता था। युवराज को पक्का विश्वास था कि वे आज निश्चित रूप से रायगढ़ की ओर से आ रहे होंगे। किसी तरह चढ़ाई समाप्त हुई। दोनों जासूस दम लेते हुए सामने देखने लगे। 182 सम्भाजी
उनके सामने शम्भूराजा और कवि कलश भयंकर दैत्य की तरह खड़े दिखाई पड़े। वे दोनों घबरा गये। उनके पैर काँपने लगे। वे क्या बोले, कुछ समझ में नहीं आ रहा था। तब शम्भूराजा ने ही उनसे पूछा, "कल दोपहर को ही रायगढ़ से निकले हैं न?" "हाँ जी!" खंडोजी ने किसी प्रकार उत्तर दिया। खंडोजी और गणोजी की चोर नजर काँप उठी। खंडोबा ने अपनी कमर में बँधा दुपट्टा खोला। उसमें से निकालकर एक पत्र शम्भूराजा को दिया। शम्भूराजा ने वहीं पर रेशमी गाँठ खोली। खड़े खड़े ही पत्र को पढ़ा। एक कल्पित आह्लाद के अतिरिक्त उसमें कोई और बात नहीं थी। किन्तु उसकी लिखावट हमेशा की तरह बालाजी आवजी चिटणीस के हाथों की नहीं थी। आवजी की लिखावट उनके अक्षर को सभी दरबारी और युवराज अच्छी तरह पहचानते थे। "सरकार हमें जल्दी है, हम निकलते हैं।" ऐसा कहकर दोनो गुप्तचर बाले किले की ओर चलने को हुए। शम्भूराजा को पूरा मामला कुछ विचित्र सा लग रहा था। उन्होंने उन गुप्तचरों को रोका- "अरे! रुको, रुको आपको इतनी भी क्या जल्दी है?" "दिन के उजाले में ही किलेदार को मिलना है।" खंडोजी ने सूचित किया। शम्भूराजा ने अपनी भेदक दृष्टि दोनों पर डाली। उन्हें अँगुलियों के संकेत से अपने पास बुलाया। दोनों जासूस यन्त्रवत् वापस लौटे। भय से काँपते हुए उन्होंने युवराज का पुनः अभिवादन किया और खड़े हो गये। दोनों को पसीना छूट रहा था। शम्भूराजा ने डाँट कर पूछा, "कावले! अपनी कमर में क्या खोंसा हुआ है?" "कुछ नहीं जी! कुछ नहीं। यह तो अपनी प्रतिदिन की डाक है। किलेदार के नाम से भेजी गयी है।" गणोजी बात धैर्यपूर्वक कर रहा था। किन्तु उसके थरथराते पैर उसे धोखा दे रहे थे। संशय अधिक गहराने पर युवराज ने अपने साथियों को संकेत किया। कवि कलश और जोत्याजी ने जासूसों के सारे कागजात हस्तगत कर लिए। उसमें एक पत्र किलेदार विट्ठल त्र्यम्बकजी के नाम था और दूसरा हवलदार बहिर्जी नाइक के नाम। शम्भूराजा की दृष्टि पत्र के गूढ़ शब्दों पर घूमने लगी। "यहाँ स्थिति बहुत चिन्ताजनक है। जैसा बन्दोबस्त होगा वैसी सूचना आपको देते रहेंगे। परन्तु किसी भी स्थिति में शम्भुमहाराज को किले से बाहर न निकलने देना। युवराज को बन्दी बनाकर बड़ी सावधानी से रहिए। यहाँ का कोई समाचार महाराज तक नहीं पहुँचना चाहिए। आगे समय पर यथायोग्य आदेश मिलते रहेंगे।" शम्भूराजा के क्रोध का पारा एकदम चढ़ गया। उनकी सन्तप्त आँखों का सामना करने का साहस जासूसों में नहीं था। घबराहट के कारण वे और भी सहम सम्भाजी : १०३