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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

"एक बहुत महत्त्वपूर्ण सन्देश-शहाबुद्दीन के पास से।" "आवो, ऊपर आ जावो।" बादशाह का संकेत पाते ही वजीर शीघ्रता से बादशाह के शयनकक्ष में पहुँच गया। तब तक बेगम उदयपुरी और दूसरी बहू बेटियाँ वहाँ पहुँच गयी थीं। बादशाह की दृष्टि जल्दी-जल्दी पत्र पर घूम गयी। वह खुशी से हँसा। उसने सोचा कि इस समाचार को राजपरिवार के अन्य लोगों को बताने में कोई हर्ज नहीं है। इसलिए उसने पत्र वजीर को दे दिया। वजीर ऊँची आवाज में पढ़ने लगा-"मेरे आका यह केवल बादशाह और खुदा की रहमत है। मैं सह्याद्रि की कठिन घाटी देवघाट को पार करने में सफल हो गया हूँ। रास्ते में सम्भाजी की गश्त लगाने वाली सेना की टुकड़ियों को मैंने जलाकर खाक कर दिया है। सैकड़ों मरगट्ठों और उनके जानवरों का कूर्मा बना दिया है। राहेरी की वाड़ी में यह शैतान सम्भा छुपा है, यह खबर मुझे मिली। तुरन्त मैं उस जहन्नमी का पीछा करते हुए उस ओर बढ़ा। मराठों के किले की तलहटी में बसी बस्ती को मैंने दिन में ही जला दिया। यह मुसीबत उसका अन्त कर देगी यह मूर्ख सम्भा के ध्यान में आ गया। वह काफिर तुरन्त बनबिलाव की तरह उछलकर भाग गया। अपनी जान किसी तरह बचाते हुए सम्भा रायगढ़ किले पर भाग गया है।" बादशाह को बड़ा सन्तोष मिला। इस सन्दर्भ में उसने अपने शाही बावर्ची को सभी के लिए शर्बत और ठंडाई ले आने के लिए आदेश दिया। यह इस तरह के पेयपान का समय नहीं था। किन्तु शहंशाह की खुशी ही तो खुदा की मेहरबानी थी। सभी ने शर्बत ग्रहण किया। बांदशाह की आँखें आनन्द से चमक रही थीं। उनमें नशा छाया हुआ था। उसके मन की आँखों के आगे कुहरे में ढके रायगढ़ की कठिन चढ़ाई और साहसपूर्वक चढ़ते हुए शहाबुद्दीन के बहादुर सिपाही दिखाई देने लगे। उसने प्रसन्न होकर सभी को सम्बोधित किया-"शहाबुद्दीन हमारे खजाने का रत्न है। उसको हम इसी समय 'फिरोजजंग' अर्थात् 'युद्धरत्न' की उपाधि देते हैं।" बादशाह की इस घोषणा से सभी प्रसन्न हो गये। अगले चार-पाँच दिनों में शहाबुद्दीन का दूसरा पत्र आया। "मैंने पाचाड़, रायरी आदि पर आक्रमण करके अब रायगढ़ से केवल दो कोस की दूरी पर डेरा डाल दिया है। सम्भा ने शक्तिशाली सरदार रूपा भोसले और हंबीरराव को बहुत बड़ी फौज के साथ भेजा था। बाण और बन्दूकों की भयंकर लड़ाई हुई। हमारे जोरदार आक्रमण से शत्रु सेना भाग खड़ी हुई। हमने सात कोस तक उनका पीछा किया। अन्त में बादशाह की फतह हुई।" इस पत्र को सभी के सामने पढ़ा गया। बादशाह ने सभी को इस खुशी का आनन्द मनाने दिया। बादशाह ने तकलीया' कहकर बैठक समाप्त की और सभी को 492 :. सम्भाजी

जाने का संकेत किया। केवल असदखान को रुकने का संकेत किया। "वजीरे-आज़म आपको क्या लगता है?" "हजरत, आने वाली खबरें इतनी अच्छी हैं कि मुझे भी लग रहा है कि यदि हम इसी गति चलते रहे तो पन्द्रह दिनों में हम अगली बैठक रायगढ़ पर ही बुलाएँगे।" बादशाह की कठोर मुद्रा और आशंकित भाव को देखकर वजीर ने अपनी जीभ काट ली। औरंगजेब ने बेचैन होकर कहा, "तुम लोग मुझ पर हमेशा इल्जाम लगाते हो कि बादशाह को खुशखबरी पर भी शंका होती है। इस सारे मामले में मुझे दो शंकाएँ हो रही हैं।" "हजरत ?" "हाँ, पागल शहाबुद्दीन कहता है कि रायगढ़ से दो कोस की दूरी पर डेरा डाल रखा है। उसी खत में यह भी कहता है कि दुश्मन का सात कोस तक पीछा किया। कभी कहता है राहेरी गाँव जलाया कभी पाचाड़। अगर वह रायगढ़ के द्वार पर पाचाड़ जला रहा था तो रायगढ़ में मराठों की फौज क्या ढोल तासे बजा रही थी?" "हाँ, और वह हंबीर मोहिते! वह तो किसी दूसरे ही इलाके में है। ऐसी खबर मिली थी। यह खबर पक्की है। मुझे तो कुछ दाल में काला लग रहा है। वजीरे आज़म आप इन बातों की फिक्र छोड़ दीजिए। इस पहेली को मैं अपने ढंग से सुलझाना चाहता हूँ।" चार दिनों के अन्दर ही अबूमुहम्मद, रात-दिन एक करके, रायगढ़ के इलाके में घूमकर आया था। वह बादशाह से मिलने के लिए बेताब हो रहा था। औरंगजेब की आँखें भी उसी के रास्ते पर अटकी हुई थीं। अबूमुहम्मद आते ही बादशाह के महल में पहुँच गया। एक साँस में ही उसने बता दिया, "हजरत, आपके बहुत से शक एकदम सही हैं। खुशी से पागल होने जैसा अभी वहाँ कुछ हुआ ही नहीं है।" "वह शहाबुद्दीन तो बार-बार कह रहा है कि उसने रायगढ़ की तलहटी में अनेक गाँव जला दिये!" बादशाह ने कहा। "जहाँपनाह! वह रायगढ़ किला बहुत मजबूत है। उसकी रक्षा पर्वत और नदियों की विस्तीर्ण घाटियाँ करते हैं। कम-से-कम तीन दिशाओं से ऐसा दिखता है जैसे अपने मजबूत पैरों को मोड़कर, सूंड़ को आसमान की ओर उठाए कोई ब्राह्मी हाथी बैठा हो। इसलिए आसपास दस कोस तक के गाँवों को लगता है कि वे उसके पास ही बसे हैं।" "और वह रायगढ़वाड़ी?" "किले के नीचे है। वहाँ संभा के अठारह कारखाने हैं। वहाँ बगल के मैदान सम्भाजी :: 493

में मराठों के दस बारह हजार की सेना हमेशा तैयार खड़ी रहती है। इस सेना पर राजधानी की रक्षा की जिम्मेदारी है। इसलिए वे कभी भी अपनी जगह से हटते नहीं हैं।'" "‘लेकिन शहाबुद्दीन तो कहता है—पाचाड़ जला दिया, वाड़ी को खाक कर दिया।’" "‘पाचाड़ की सीमा में दूर के जंगलों में बनाये गये जानवरों के कुछ तबेलों को उन्होंने लूटा, जलाया। उनकी फौज निजामपुर से गांगोली और पाचाड़ की सीमा तक स्वतन्त्रता से विचरण कर रही है, यह बात सच है। लेकिन अगर सम्भाजी की बात करें तो वे अभी तो गोवा की ओर ही हैं।’" इन बातों को सुनकर बादशाह को आश्चर्य हुआ। उसने क्रुद्ध होकर कहा, "‘यह शहाबुद्दीन इतना पागल निकला ? और काफिर मरगट्ठों ने उसे इतने दिन जीवित कैसे रहने दिया ?’" "‘जहाँपनाह ! कोलाड गाँव के ऊपरी हिस्से में देवघाट पर पहरा देने वाली मराठों की सेना को खानसाहब ने तलवार के घाट उतार दिया, निजामपुर को भी भस्म कर दिया। यह सारी बातें सच हैं। किन्तु निजामपुर के पास ही ताम्हिणी नाम का बड़ा घाट है। वहाँ घनी झाड़ियाँ, गहरी नदियाँ और भयानक घाटियाँ हैं। इसी ताम्हिणी के पीछे खानसाहब ने अपना डेरा डाल रखा है। उनकी फौज दिन में निजामपुर का फेरा लगाकर रात में ताम्हिणी में आकर छुप जाती है। इतनी ही सच्चाई है। रायगढ़ और मराठों का शेष भाग पूरी तरह स्वतन्त्र है।’" "‘बेवकूफ, कमीना कहीं का।।’" शहाबुद्दीन के बड़बोलेपन पर बादशाह को बहुत क्रोध आया। उसने गुर्राकर कहा, "‘उस कमबख्त का आज ही तबादला कर देता हूँ। युद्धभूमि से उसे वापस बुलाता हूँ।’" "‘नहीं मालिक ऐसी भूल न करें।’" अबूमुहम्मद कहने लगा, "‘जहाँपनाह, शिवाजी और सम्भा के इस इलाके में गढ़ और किले बहुत मजबूत हैं लेकिन वहाँ के सभी लोग बहादुर और ईमानदार नहीं हैं। ऐसे अनेक लोग हैं जो अपने छोटे से स्वार्थ के लिए अपना देश भी बेचने के लिए तैयार हैं ऐसे गद्दार भी बहुत हैं।’" "‘बेटे कहना क्या चाहते हो ?’" बादशाह ने शान्त स्वर में पूछा। शहाबुद्दीन साहब ने चाकड़ से लेकर पूना तक के सभी सरदारों और जमींदारों को अपने पास बुलाया है। वे उन्हें धन एवं अन्य अनेक प्रकार का लालच देकर अपनी ओर मिलाने का प्रयास कर रहे हैं। वे बड़े-बड़े मरगट्ठों को अपने जाल में फँसाने की कोशिश कर रहे हैं। मेरे आका, एक बार ये खानदानी गद्दार जहाँपनाह के हाथ में आ जाएँ तो किलों को मिटाने में ज्यादा वक्त नहीं लगेगा।’" "‘बस ! बस ! क्या तो तुम्हारा दिमाग और क्या ही गहरी सोच।’" बादशाह ने 494 :: सम्भाजी

शान्त स्वर में कहा। बाघोली घाटी से बीच के रास्ते कवि कलश की सेना रायगढ़ की ओर जा रही थी। सामने दूरी पर रायगढ़ के पीछे की बुर्ज दिखाई पड़ रही थी। उस तरफ कर्मचारियों के आवास थे। अष्ट प्रधानों के आवास से कवि कलश की दृष्टि पोतले घाटी की ओर मुड़ी, गोवा और दक्षिण कोंकण की ओर बहुत दिनों तक रहकर घोड़े, हाथी आदि राजधानी की ओर आ रहे थे। स्पष्ट रूप से रायगढ़ दिखाई पड़ते ही सैनिकों और जानवरों की गति मन्द पड़ गयी। पाँच हजार की यह बड़ी फौज घूमते-घूमते आगे बढ़ रही थी। शम्भू महाराज दो दिनों में ही वहाँ पहुँचने वाले थे। राजधानी पर मुगलों के आक्रमण की भी आशंका थी। इसलिए महाराज ने कविराज को आगे भेज दिया था। कवि कलश ने सामने अचानक सामने धूल का गुबार देखा, तीन चार सौ घुड़सवारों का एक दल अतिशय वेग से सामने आकर पहुँच गया। कवि कलश शिलेदार मुरारी डाँगे दौड़ते हुए सामने आया और अपने घोड़े की लगाम खींचते हुए चिल्लाया, "कविराज, जल्दी कीजिए रायगढ़ पर मुगलों ने आक्रमण कर दिया है।" इन शब्दों के कान पर पड़ते ही कवि कलश का अलसाया हुआ शरीर एकाएक स्फूर्त हो गया। पीठ पर बिखरे अपने बालों को समेटकर उन्होंने गाँठ बाँधी। दूसरे ही क्षण अपने पाँव रिकेब में डालते हुए कविराज ने अपनी फौज के सम्मुख गर्जना की- 'चलोऽऽ आगे बढ़ोऽऽ हरऽहर महादेव'। एक के पीछे एक जानवर दौड़ने लगे। देखते-देखते पानी की लहर की तरह उस फौज ने पोतले की घाटी को पार कर लिया। घाटी के मुखद्वार पर आते ही दूसरी ओर का प्रदेश स्पष्ट दिखाई पड़ने लगा। उसी समय कवि कलश ने अपने घोड़े को एड़ लगाई। एक क्षण में ही उनकी दृष्टि पाचाड़ और हिरकणी बुर्ज से होती हुई रायगढ़ के भव्य किले तक पहुँच गयी। किन्तु किले की तलहटी या प्रवेशद्वार के पाचाड़ के पास किसी प्रकार की गड़बड़ दिखाई नहीं पड़ रही थी। फिर कलश जी ने दूर गांगोली गाँव की ओर देखा। उस ओर आग की ऊँची लपटें दिखाई दे रही थीं। घास के गट्ठों और पुआलों के साथ-साथ घरों को जलाया जा रहा था। पूरे आसमान में धुआँ छा गया था। इसी समय मुरारी का घोड़ा दौड़ते हुए कवि कलश के घोड़े के पास पुनः आ गया। कलश ने कठोर स्वर में पूछा, "कौन है? कौन है वह शैतान?" "औरंगजेब का सरदार शहाबुद्दीन। पिछले चार पाँच दिनों से उसने मार काट और आगजनी शुरू कर रखी है।" "इतने दिन? रायगढ़ के इतने समीप पहुँचने की उसने हिम्मत कैसे की? चलो शत्रु को अभी अभी यहाँ से भगाएँगे।" सम्भाजी :: 495

"हर हर महादेवऽऽ" "छत्रपति सम्भाजी महराज की जयऽऽ" "जय शिवाजीऽऽ, जय सम्भाजीऽऽ" कवि कलश के शरीर में द्वेष, हठ, क्रोध, प्रतिशोध आदि का एक रसायन बन गया था। वे घोड़े की पीठ पर न बैठकर रिकेबों में, पाँव टिकाए, खड़े-खड़े ही घोड़े की लगाम खींचते हुए आगे की ओर झुक रहे थे और तेज आवाज में गर्जना कर रहे थे— 'चलऽऽ अरे तेज दौड़ऽऽ चलऽऽ।' घोड़ों की टापों और सेना की रणगर्जना से आकाश प्रतिध्वनित होने लगा। बादलों की भाँति गरजती वह फौज थोड़ी ही देर में गांगोली के मैदान में पहुँच गयी। सेना के आने से वहाँ के लोगों को ऐसा लगा जैसे कोई बहुत बड़ी लहर सूखी नदी के पाट में आ गयी हो। इस प्रकार किसी आक्रमण के प्रति असावधान मुगल सैनिक, 'अरे सम्भाऽऽ आया भागोऽऽ' ऐसा चिल्लाते हुए अपने घोड़ों की ओर भागने लगे। आग लगाने का काम छोड़कर मुगल झटपट अपने घोड़ों पर सवार होने लगे। तलवारें निकल गयीं। घोड़ों से घोड़े भिड़ने लगे मनुष्य मनुष्यों का गला काटते हुए आगे बढ़ने लगे। गांगोली, पानोसे और जोरगाँव से लेकर निजामपुर तक के खेतों खलिहानों में लड़ाई छिड़ गयी। कवि कलश की तलवार इतने वेग से सपासप चलने लगी, एक के बाद दूसरा सिर काटने लगी कि उनका घोड़ा देखते ही मुगल सिपाही उनके सामने से भागने लगे। अखाड़े में पोषित उनका गठीला शरीर बहुत शक्तिशाली था। वे बड़े जोश के साथ शत्रुओं का सामना कर रहे थे। अपने स्वामी की अनुपस्थिति में रायगढ़ की लाज रखना उन्हीं का दायित्व है। इस भावना से वे बहुत उत्तेजित हो गये थे। कविराज की वीरता देखकर मराठा वीरों में बहुत उत्साह आ रहा था। वे कहने लगे— "कलम चलाने वाला बहादुर कवि दाडपट्टे की तरह सर सर तलवार चला रहा है तो क्या हमें पीछे रहना चाहिए।" पिछले चार-पाँच दिनों से लूटपाट कर रहे मुगलों को ऐसे भयंकर प्रतिकार का अनुभव नहीं था। इसी असावधानी का लाभ उठाकर कवि कलश ने मैदान मार लिया। मुगलों की यह दुर्दशा देखकर, जंगलों में छुपी निवासियों की टोली बाहर आ गयी। वे कवि कलश की सेना की सहायता करने लगे। सन्ध्या के चार बजे तक मुगलों ने सामना किया। तब तक मुगलों के लगभग तीन हजार सैनिक मारे जा चुके थे। दो-तीन सौ मराठा भी शहीद हुए। सन्ध्या समय के बढ़ते अन्धकार, कवि कलश के बढ़ते दबाव और घने जंगलों की भयानकता से शहाबुद्दीन डर गया। वह जोर से चिल्लाया—"चलो कुछ देर के लिए वापस चलो!" शत्रु सेना के मुख मोड़ते ही मराठों का उत्साह और भी बढ़ने लगा। पिछले कई दिनों से जंगलों में छुपे गाँव के सन्तप्त लोग भी बाहर निकल आये और मुगलों 496 : सम्भाजी

का पीछा करने में मराठों के साथ हो गये। गाँव के सामान्य कुत्तों के साथ गड़ेरियों के पालतू कुत्ते भी मुगलों के पीछे दौड़ पड़े। खेतों की ऊँची नीची जमीन में दौड़ते हुए मुगलों के घोड़े भी जगह जगह पर गिरने लगे। मुगलों के एक के बाद एक सिर कटने लगे। 'अल्लाऽऽ' 'खुदाऽऽ' 'भागोऽऽ' ऐसी चिल्लाहट सुनाई पड़ने लगी। मराठा सेना मुगलों का पीछा करते करते ताम्हिणी घाट की तलहटी तक पहुँच गयी। मुगलों की बची-खुची सेना घने जंगलों में छिप गयी। थके हुए मराठा सैनिक रुक गये। घोड़े सूखी घास खाने लगे। साईसों ने घोड़ों को चने खिलाने शुरू किये। घुड़सवारों ने चने के साथ गुड़ और मूँगफलियाँ खड़े खड़े ही खाया और पास के झरने से पानी पीकर पूरी तरह तृप्त हो गये। तब तक कविराज ने कुछ सूचनाएँ प्राप्त कर ली थीं। कुशल सैनिकों ने अपने हाथों में मशालें लीं और सामने के घने जंगल में घुसने का निर्णय लिया। आसपास के ग्रामीण, दर्शक और कुछ राहगीर भी मराठों के साथ हो लिये। जिस प्रकार शिकारी हाँका लगाकर बाघ को उठाते और फँसाते हैं, उसी प्रकार मराठा सेना आगे बढ़ रही थी। कवि कलश की दृष्टि कुछ खोज रही थी। उन्होंने एक नाले में पानी का बहता प्रवाह देख लिया। मशाल के प्रकाश में उन्होंने मार्ग ढूँढ़ा। काफी दूर जाने पर नाले का एक विस्तृत क्षेत्र मिला। वहाँ पानी की धारा की बगल में मुगलों का रसद भंडार था। उसमें अनाज की बोरियाँ, जानवरों के चारे और बारूद के भंडार थे। उन सभी को कलश जी ने अपने क़ब्जे में ले लिया। मुगल ऊपर के घने जंगल में छुप गये थे। लूटी हुई रसद के साथ सेना निजामपुर के समीप आ गयी। अब तक रात बहुत हो चुकी थी। चौकी पर एकत्र होकर सभी ने निर्णय लिया कि दूसरे दिन घाट में जाएँगे। पास की एक घाटी को पार करके कविराज की सेना मैदान में आ गयी। किसी ने चिल्लाकर कहा, "कविराज! उधर देखिए।" सभी की निगाहें एकाएक मुड़ गयीं। ताम्हिणी घाट की ऊँची पहाड़ियाँ वहाँ से स्पष्ट दिखाई पड़ रही थीं। सितारों की छाया में मुगलों के घोड़े दबे पाँव आगे बढ़ते दिखाई दे रहे थे। एक ने कहा, "कविराज, वह देखिए! खान डरकर घाट पर चला गया।" "जाएगा ही! उसकी सारी रसद हमारे क़ब्जे में आ गयी है, तो वह रुकेगा कैसे?" सभी लोग कविराज की प्रशंसा करने लगे, "कविराज, आज आपके शरीर में भवानी का संचार हो गया था क्या?" ऐसा पूछकर, उनकी मुक्तकंठ से प्रशंसा करने लगे। उस समय अखाड़ेबाजी से मजबूत बनी अपनी भुजाओं और छाती को गर्व से फुलाते हुए कविराज ने गर्व से कहा, "साथियो, किसी पागल हाथी को काबू में करना आसान है किन्तु किसी क्रुद्ध ब्राह्मण पर काबू पाना बहुत कठिन है।" सम्भाजी .. 497

कविराज का घोड़ा निजामपुर पहुँच गया। ग्रामवासियों और घुड़सवारों की बड़ी भीड़ लग गयी थी। दूसरी ओर की एक घाटी में कलश की सेना को एक जीवित व्यक्ति मिला था। यह औरंगजेब का सरदार था। उसके हाथ-पैर बाँधकर ग्राम पंचायत में खम्भे से बाँधा गया था। वहाँ पर सभी लोग कविराज की प्रतीक्षा कर रहे थे। उनके आते ही लोग चिल्लाने लगे- "कविराज, इस राक्षस का सिर धड़ से अलग कर दीजिए। शीघ्र ही इसका खात्मा कीजिए।" घबराये हुए लगभग पैंतीस वर्ष के गोरे चिट्टे खान की ओर कलश जी ने देखा। गरजते हुए उससे पूछा, "तेरा नाम क्या है?" "दुखलास खान हुजूर ऽऽ।" शिकार बड़ा था और नामचीन भी। कवि कलश ने उसके हाथ-पैर खोलने का आदेश दिया। मुक्त हुए खान ने कविराज के पैर पकड़ लिये। अपने प्राण बचाने के लिए वह दया की याचना करने लगा। "कविराज ऽ मारिए, मारिए इस शैतान को, नहीं तो हमीं इसके रक्त से अपनी तलवार लाल करेंगे।" घुड़सवार सैनिकों को बहुत क्रोध आ रहा था। कलश ने हाथ के संकेत से सभी को शान्त रहने को कहा। उन्होंने दुखलास खान से कहा, "चल उठ भाग, भाग जा अपनी फौज की ओर।" दुखलास खान अविश्वास मे और मराठा सैनिक असन्तोष मिश्रित आश्चर्य से कविराज की ओर देखने लगे। तब कविराज ने कड़ककर कहा, "केवल एक काम के लिए तुम्हें मुक्त कर रहा हूँ। बादशाह के पास तुम्हें जीवित भेज रहा हूँ।" "हुजूर, हुजूर हुक्मऽऽ"-पैर पकड़ते हुए दुखलास खान पूछने लगा। कविराज ने डाँटते हुए कहा, "जाओ, जाकर कहो अपने उस मूर्ख बादशाह से-तैमूरलंग के ग्यारहवें वंशज होने का अभिमान न करे। आक्रमण के नाम पर 'बैं-बैं' करती मामूली भेड़-बकरियों को सह्याद्रि के बब्बर शेरों के पास न भेजें। हमारे शम्भुमहाराज जब तक रायगढ़ के सिंहासन पर बैठे हैं, उसी समय में औरंगजेब को रायगढ़ के आस पास आकर लौट जाने के लिए कहो। केवल एक बार उसे यहाँ आने को कहो।" 498 :: सम्भाजी

दो गोवा की सीमा पर बाँदा गाँव में बड़ी अशान्ति फैली थी। शहजादा मुअज्जम की विशाल फौज ने वहाँ डेरा डाल रखा था। इसलिए उस गाँव का स्वरूप ही बदल गया था। शहजादा कांट द आल्होर की राह देख रहा था। वाइसराय को तत्काल आकर मिलने के लिए उसने सन्देशा भेजा था। चार दिन तक प्रतीक्षा करने के बाद भी वाइसराय का आगमन नहीं हुआ। अन्ततः उसने अपने वकील अल्बुकर्क को भेज दिया। किसी मामूली वकील के साथ औरंगजेब के शहजादे का समझौता करना असंभव था। मुअज्जम बहुत रुष्ट हुआ। किन्तु समय ऐसा था कि शिकायत करें भी तो किससे ? अल्बुकर्क कन्धे झुकाए सामने खड़ा था। उसकी लाल शेरवानी और लम्बी टोपी की ओर शहजादे ने क्रोध से देखा। मुअज्जम गुर्राया, “तुम्हारा वाइसराय अपने आप को क्या समझता है ? उसको कुछ शिष्टाचार, अदब, तमीज है कि नहीं ?” “माफी हो सरकार ! वाइसराय बीमार हैं।” “ये झूठे बहाने बन्द करो। वह सम्भा बीस हजार की फौज लेकर तुम्हारी गर्दन पर सवार था, तब जहाज मे बैठकर भागना पड़ा था, तुम्हारे इस कांट साहब को। चर्च के तलघर में बाप दादो के मुर्दों के सामने फूट-फूटकर रोना पड़ा था तुम लोगो को। वे दिन तुम लोगो को भूल गये हैं क्या ?” “हुजूर माफी चाहता हूँ।” “उस सारे संकट से किसने बचाया ? मुगल फौज ने ही न ?” “हुजूर नाराज न हों। पुर्तगालियों और मुगलों की यारी दोस्ती आगे भी पहले जैसी ही रहेगी। बताइए हमें मुगलों की क्या सेवा करनी है ?” “सूरत से आये हमारे जहाज कितने दिनों से समुद्र मे खड़े हैं ? समझौते के अनुसार हमारी नौसेना के लिए पणजी में तत्काल व्यवस्था कीजिए।” “जगह की व्यवस्था बाद में देख लेंगे हुजूर। पहले जहाजों पर लदे रसद को तो उतरवाइए।” अल्बुकर्क ने समझाते हुए कहा। “ठीक है। हम कल ही अपनी जहाजों को माडवी में उतरने का हुक्म देते हैं।” “सरकार, सरकार—मांडवी के इतने चौड़े पाट में क्यों जाते हैं ? कांट साहब की इच्छा है कि आप अपनी जहाजों को कायसूव नदी में उतारें।” पुर्तगाली वकील के उस स्वार्थपूर्ण कथन से शहजादा उत्तेजित हो गया। अपने पतले ओठों को दाँतों से दबाते हुए वह ऊँची आवाज में बोला, “तुम्हारा सम्भाजी :: 499

वाइसराय मुझे बदमाशों का सिरताज दिखता है। मांडवी में जहाजों को उतारने से तुम्हारे मालिक को पणजी शहर के लिए खतरा लग रहा है? गिरगिट की तरह रंग बदलने और साँप की तरह समय आने पर पलट जाने में माहिर है तुम्हारा वाइसराय। मुझे तो लगता है कि हमारे अब्बाजान औरंगजेब साहब को भी वाइसराय से बहुत कुछ सीख लेना चाहिए। " जिनकी सहायता के लिए मुगल इतनी दूर आए, उन फिरंगियों द्वारा ऐसा स्वागत किया जाएगा, ऐसी कल्पना शहजादे को नहीं थी। रामदरा को पार करके सावंतवाड़ी में प्रवेश करते ही मराठा फौज ने उसे जगह-जगह पर बहुत परेशान किया था। उसका बदला लेने के लिए ही वह सावंतवाड़ी, बाँदा, वंगुर्ला तक गोवा और हिन्द स्वराज्य की सीमा के गाँवों को जलाता हुआ आ रहा था। सम्भाजी महाराज की दहशत से भयभीत वाइसराय अब मन से समझौता और शान्ति चाह रहा था इसलिए शीघ्रता से पुर्तगालियों ने सम्भाजी से समझौता कर लिया। बसई और दमण के लिए चौथ कर देना स्वीकार कर लिया। इसके अतिरिक्त कांट ने लिखित रूप में स्वीकार किया था कि वे अपने क्षेत्र में मुगलों को, औरंगजेब की फौज के लिए रसद और गोला बारूद नहीं ले जाने देंगे। यह सारा ममाचार सुनकर शहजादा ने क्रोधित होकर पूछा, "सम्भाजी विजयी हो गया क्या?" प्रतिशोध की भावना से शहजादा अन्धा हो रहा था। साथ ही उसे शहजादा अकबर के डिचोली में होने की सूचना मिल गयी थी। उसने तत्काल छोटे से सुन्दर डिचोली गाँव पर आक्रमण कर दिया। अकबर वहाँ पर रुका नहीं था। परन्तु मुअज्जम ने क्रुद्ध होकर सम्भाजी महाराज और कवि कलश के सुन्दर महलों को तोपों से ध्वस्त कर दिया। कवि कलश द्वारा बड़े परिश्रम से तैयार किया गया गुलाब का बगीचा हाथियों से रौंदवा दिया। शहजादे ने भतग्राम, नार्वे जैमे गाँवों को लूटा, पिलगाँव के राममन्दिर को ध्वस्त कर दिया, मप्तकोटेश्वर के मन्दिर का कलश तोड़ दिया। गोवा की सीमा पर जहाँ तहाँ ध्वंसलीला की। उसे खबर मिली कि शहजादा अकबर ने ईरान की ओर भाग जाने के लिए एक जहाज बनवाया है जो बेगुर्ला बन्दरगाह में खड़ा है। फिर क्या था मुअज्जम ने पूरे बन्दरगाह को जलाकर खाक कर दिया। परन्तु इस कार्य से उसने सूरत से आने वाली अपनो रसद को भी नष्ट कर दिया। होशियार कांट द आल्होर ने सम्भाजी महाराज के साथ लिखित समझौता कर लिया था। समझौते के कागजातों को पुर्तगाल भेजकर खतरे में पड़े अपने वाइसराय पद को सँभाल लिया था। पणजी के तटों पर नयी तोपें लगाई गयी थीं। सम्भाजी के डर से मार्मा गोवा भेजे गये कागजात फिर से पणजी ले आये गये थे। वाइसराय 500 :: सम्भाजी

जानबूझकर मुअज्जम को टाल रहा था। औरंगजेब द्वारा सूरत से भेजी गयी रसद सामग्री को मराठों ने पहले ही जगह-जगह पर लूट लिया था। बची खुची जहाजों पर पुर्तगालियों के क़ब्ज़ा कर लिया। किसी अनुशासित व्यवस्था के न होने से मुअज्जम को बहुत नुकसान उठाना पड़ रहा था। पिता औरंगजेब द्वारा भेजी गयी थोड़ी-बहुत रसद उसे मिली, लेकिन वह अधिक दिन टिकने वाली नहीं थी। चालीस हजार घोड़े, साठ हजार पैदल, तीन हजार ऊँट और उन्नीस सौ हाथियों की सेना थी। इतनी बड़ी संख्या की भोजन व्यवस्था सरल नहीं थी। अन्त में वही हुआ जो होना था। शहजादे की फौज को भोजन की कमी पड़ने लगी। प्रतिशोध की भावना से दक्षिण कोंकण के एक बड़े हिस्से को उसने जला दिया था। उसके दुष्परिणाम उसके सामने आने लगे। धन देने पर भी अनाज और चारे का मिलना असम्भव हो गया। 15 फरवरी, 1984 को शहजादे ने वापस लौटने का निर्णय ले लिया। गोवा में मुगलों के नौसैन्य दल स्थापित करने, दक्षिण कोंकण और रायगढ़ जीतने और अन्त में सम्भाजी को पकड़ने जैसे अनेक ख्वाब शहजादे ने देखे थे, ये सभी भव्य मन्सूबे थे। उसकी फौज ने पुनः रामदरा के रास्ते पर चलना शुरू किया। शहजादे का थका भूखा हाथी आगे बढ़ा। शहजादे ने सामने की ओर देखा। सामने रामदरा का प्रचंड घाट दिखाई दे रहा था। भूखी फौज को साथ लेकर उसे पार करना था।

तीन

शहाबुद्दीनखान की काली छाया रायगढ़ के परिसर से बहुत दूर ही नाचकर चली गयी थी। गोवा आक्रमण से महाराज राजधानी वापस आ गए थे। एक बार भोजन करते समय महारानी ने कहा, "महाराज, गोवा भी हाथ आ गया होता तो कैसा रहता ?'' "महारानी, हमने बहुत प्रयत्न किया। सफलता हमारे बहुत समीप आ गयी थी। किन्तु मुगलों के एक लाख जानवर और आदमी रामदरा का घाट उतरने लगे। हमें मजबूर होकर पीछे हटना पड़ा।" "यह कोई महाराज की पराजय नहीं है।" "निश्चय ही नहीं है।" शम्भूराजा ने साभिमान कहा, "उस पुर्तगाली ने सम्भाजी :: 501

हमसे ऐसी दहशत खायी है कि सोते समय भी 'संम्भाजी, सम्भाजी' कहकर बड़बड़ाता होगा।" "सुना है कि उन फिरंगियों ने आपके अनुसार समझौता कर लिया है?" "बिलकुल! एक बात अच्छी हुई येसू, अब औरंगजेब कोई भी चाल चले, जंजीरा आक्रमण में सिद्दियों की और गोवा आक्रमण में फिरंगियों की कमर हमने तोड़ दी है। आगे औरंगजेब चाहे जितना फुसलाये, वे खुलेआम उसके साथ आने का नाम नहीं लेंगे।" येसूबाई ने पूछा, "यहाँ आने से पूर्व ही यहाँ की खबरें आपके पास गोवा में कैसे पहुँचीं?" "कौन-सी खबर ? "यही कि रायगढ़ पर शहाबुद्दीन के आक्रमण का कविराज ने किस प्रकार सामना किया और किस प्रकार उसे यहाँ से खदेड़ा ?" कविराज का नाम आते ही महाराज का हृदय भर आया। उनकी आँखें चमकने लगीं। वे प्रसन्न होकर बोले, "सच कहूँ महारानी, कवि कलश की महिमा किसी दूसरे से सुनने की हमें आवश्यकता ही नहीं है। उनकी प्रेमपूर्ण निष्ठा और ईमानदारी का मूल्य हम दोनों के सिवा और कौन जान सकता है?" "दोनों कौन?" "जी हाँ! सम्भाजी के इस हृदय को और जिस भूमि पर हम आप खड़े हैं, उस मिट्टी को भी।" भोजन के बाद महारानी को राजा से कुछ कहना था। उन्होंने महाराज से कहा, "महाराज आपकी अनुपस्थिति में हमें एक कठोर निर्णय लेना पड़ा, राहुजी सोमनाथ, गंगाधर पन्त, वासुदेव पन्त और मानाजी मोरे को बन्दी बनाना था न?" "अँ हाँ", आश्चर्य से महाराज की ओर देखते हुए महारानी ने कहा, "हमारे कुछ श्रेष्ठ लोग शहाबुद्दीन से मिलने भुलसी घाट की ओर गये थे। स्वराज्य को क्षति पहुँचाना उनका उद्देश्य था। हमने अपने आदमियों को उनके पीछे लगाकर पहले स्थिति की जाँच की फिर इस प्रकार का निर्णय लिया। " गद्दारों की भीड़ के कारण महाराज और महारानी दोनों परेशान हो गये थे। पिछले कई महीने से शहाबुद्दीनखान गद्दारों के स्वागत के लिए दरवाजे खोलकर स्वागत के लिए तैयार बैठा था। पूना में आने के साथ ही उसने अनेक प्रतिष्ठित मराठों और ब्राह्मणों को बुलाकर और उनका हृदय परिवर्तन करके स्वराज्य द्रोह के लिए उन्हें तैयार किया था। इससे पहले ही कान्होजी शिर्के, यशवन्त दलवी, नागोजी माने जैसे जाने-माने मराठे मुगलों की नौकरी में चले गये थे। 502 · सम्भाजी

महारानी येसूबाई कुछ समय तक शान्त रहीं। फिर अपनी चिन्ता को व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा, "महाराज ! ये लोग आपका विरोध करने के लिए मुगलों के गुलाम नहीं बन रहे हैं। ये तो पहले से ही गद्दार हैं।" "यह बात सच है। मुगलों के समीप जाते ही इनके दिलों में हलचल शुरू हो जाती है। जागीर और धन के लोभियों से ही यह सारा खेल चल रहा है। सुपा के देशपांडे और मैसूर के जगदाले इसी लोभ में वहाँ चले गये—" "येसू, इसका एक ही रामबाण उपाय है, उस कपटी औरंगजेब का जल्द से जल्द खात्मा।" महाराज ने कहा। "महाराज, बाढ़ के पानी को घर के भीतर से शीघ्रातिशीघ्र निकाल देना चाहिए नहीं तो उसमें से सड़ांध की दुर्गन्ध आने लगती है।" "महारानी, औरंगजेब से कड़ा सामना करने के अतिरिक्त हमने पिछले अनेक वर्षों में कोई और कार्य किया है ?" महाराज कुछ दुखी स्वर में बोले, "येसू, यह सामान्य बाढ़ नहीं है। मुगलों के पाँच लाख मनुष्यों और चार लाख जानवरों का यह महासागर महाराष्ट्र पर उमड़ आया है। उसमें कुछ सूखी लकड़ियाँ भी तैर रही हैं। किन्तु आप रंचमात्र भी चिन्ता न करें। मेरी उम्र क्या है? छब्बीस वर्ष और औरंगजेब छियासठ वर्ष का। ईश्वर ने अगर इस देह को सलामत रखा तो देखना। एक न एक दिन जैसे कोई मदारी अपने प्रिय भालू को रस्मी में बाँधकर बाजार मे घुमाता है उसी तरह उस पापी औरंगजेब के पैरों मे बेड़ियाँ डालकर दक्षिण के पठारों पर हमें नचाना है।" पूना के आसपास मुगलों की घुसपैठ बढ़ती जा रही थी। अपने लोगों और किलों की रक्षा के लिए जी तोड़ कोशिश कर रहे थे। घाटियों, घाटों, मैदानों आदि सभी जगहों पर मुगल-मराठा युद्ध हो रहा था। शम्भू महाराज ने अपनी सेना में वृद्धि की थी। गद्दार मराठों पर कड़ी नजर रखने पर भी उनकी संख्या में निरन्तर वृद्धि हो रही थी। कुछ मराठे अपनी निष्ठा का केवल दिखावा करते थे। गद्दारों के स्वागत के लिए औरंगजेब रेशमी वस्त्रों की गाँठ लेकर बैठा था। एक दिन राजा के पास खंडो बल्लाल आये। उन्होंने सिर नीचा करके कहा, "महाराज, जिन मराठा सरदारों को निष्ठावान मानकर उनका गौरव करते रहे हैं वे गद्दार निकले। कारी गाँव के शिवाजी जेधे ने अहमदनगर जाकर बादशाह की गुलामी कबूल कर ली। "शिवाजी जेधे ने उस ओर जाते-जाते अपने ही देश की बर्बादी की है। उसके साथ ही उसका छोटा भाई सर्जेराव भी मुगलो की सेवा में जाने वाला था। लेकिन उसी समय राजा ने विचित्र गढ़ के सन्ताजी निंबालकर को उसके पास भेज सम्भाजी 503

दिया। विचार-विमर्श कर उसके हृदय परिवर्तन के लिए कहा। गद्दारों के इस बर्ताव से शम्भूमहाराजा कुछ दिनों तक बहुत चिड़चिड़े हो गये थे। उनके स्वभाव की सरलता नष्ट हो गयी थी सारे शरीर में कठोरता और कड़ुआहट भर आयी थी। महारानी येसूबाई ने कहा, "महाराज, थोड़ा धैर्य धारण करें।" "येसू अगर कोई छोटा बच्चा हठ करने लगे तो उसके मुँह में चुटकी भर शक्कर डालकर उसे बहलाया जा सकता है। किन्तु यदि बड़े लोग कृतघ्नतापूर्वक विश्वासघात करने लगें तो उनका क्या किया जाए?" शम्भूराजा हर दिशा में चिन्तित थे। उन्होंने खंडो बल्लाल, रामचन्द्र पन्त अमात्य और कवि कलश की सहायता से मराठा सरदारों और वतनदारों की एक सूची तैयार की। औरंगजेब से मिलने वाले सरदारों मनाना शुरू किया। कुछ लोगों को स्तुतिपरक पत्र भेजे गये। बहुतों की प्रशंसा की गयी। कवि कलश और खंडो बल्लाल बहुतों से स्वयं जाकर मिले। इससे जेधे जैसे लोग जो शत्रु से जा मिले थे उन्हें भी अपनी मातृभूमि की याद आने लगी। यह सूचना मिलते ही राजा ने खंडो बल्लाल को अपने पास बुलाया और तत्काल पत्र लिखवाया— "पहले आपने ही गद्दारी की। हमारे राज्य में वतनदार के रूप में आपने ईमानदारी का व्यवहार नहीं किया। इतने दिनों हमारे अन्न पर पलकर भी नमकहरामी की। आपकी बुद्धि इस तरह भ्रष्ट हुई कि चार दिन के मेहमान मुगलों से जा मिले। मुगलों ने भी आपका आदर नहीं किया। इसलिए अब आप फिर मुड़कर देख रहे हैं। एकनिष्ठता, ईमानदारी जैसे शब्दों में पवित्रता की सुगन्ध होती है, उसका भी कुछ ध्यान रखिये, किसी बदचलन स्त्री की भाँति एक ही समय दस देहलीजें लाँघने की बुरी आदत छोड़ दीजिये।" चार वर्ष बीत चुके थे। शम्भूमहाराज और औरंगजेब का युद्ध समाप्त होने का नाम नहीं ले रहा था। एक दोपहर की शान्त बेला में शम्भूमहाराज ने महारानी येसूबाई से कहा— "येसू न औरंगजेब की फतह हो रही है और न हमें ही विजयश्री प्राप्त हो रही है। इस तरह यह युद्ध कब तक चलता रहेगा? कभी कभी मुझे लगता है कि यह कलियुग ही हम दोनों के साथ खिलवाड़ कर रहा है।" कहते कहते महाराज रुक गये। पिछले संघर्ष के, कुछ क्षण उन्हें स्मरण होने लगे। जंजीरा की खाड़ी में अथक परिश्रम से बनाया गया वह पुल, जो पूर्ण होने के समीप पहुँच गया था, उनकी आँखों के सामने खड़ा हो गया। कल्याण में मुगल फौज के उत्पात से जंजीरे की योजना दर किनार हो गयी थी। गोवा की चर्च के कंगूरे पर भगवा झंडा फहराने का समय एकदम समीप आ गया था, किन्तु उसी 504 सम्भाजी

समय मुअज्जम की एक लाख की फौज रामदरा उतरने लगी। उन सभी दिनों का स्मरण महाराज को होने लगा। उन्होंने कहा-- ‘‘येसूरानी जब हम गोवा से जल्दबाजी में वापस आ रहे थे और सावन्तवाड़ी के तालाब में अपनी विशाल फौज का प्रतिबिम्ब देखा तो हमारी आँखें भर आयी थीं। वह नियति हमारे साथ ऐसा खिलवाड़ क्यों करती है? यह तो ऐसा हो रहा है कि हम शिखर को पदाक्रान्त करने के लिए शिखर तक दौड़ लगाएँ और वहाँ पहुँचने पर शिखर ही ढहकर गिर जाए। यह तो ऐसे ही हो रहा है जैसे गहचे में खेल रहे बच्चे की गेंद छुपाकर कोई दुष्ट उसे परेशान करे। यह कलियुग हमारे पास तक पहुँचे यश को बार बार टुकड़े टुकड़े कर दे रहा है। यह मेरे साथ ऐसा विचित्र खेल क्यों खेल रहा है?’’ चार शहजादा मुअज्जम की फौज रामदरा का दुर्गम घाट चढ़ रही थी। बेगुर्ला के इलाके में शाही फौज की दशा पहले ही बहुत दयनीय हो चुकी थी। अभी भी आगे तीन मील की सँकरे रास्ते वाली खड़ी चढ़ाई थी। रास्ते के दोनों ओर कँटीली झाड़ियों के घने जंगल थे। दक्षिण कोंकण की शुष्क हवा मुगल सिपाहियों और जानवरों को अनुकूल नहीं पड़ रही थी। कई जानवर बीमार होकर मृत्यु के शिकार बने। तीन-चार महीनों में अनाज का भंडार समाप्त हो चुका था। शम्भूमहाराज यद्यपि स्वयं रायगढ़ चले गये थे किन्तु सेना की अनेक टुकड़ियाँ उन्होंने पीछे नियुक्त कर रखी थीं। घने जंगलों में छुपकर बैठे ये मराठा वीर शान्त नहीं बैठे थे। वे अवसर देखकर मुगल सेना पर तूफान की तरह टूट पड़ते थे और उन्हें भारी क्षति पहुँचाकर जंगलों में गायब हो जाते थे। अब तक मुगल सेना का बहुत नुकसान हो चुका था। अन्ततः अनेक रोगों से ग्रस्त होकर मनुष्य और जानवर बड़ी संख्या में मरने लगे तब शहजादे की विवश होकर घाट से लौट जाने का निर्णय लेना पड़ा। उस प्रतिकूल जलवायु वाले क्षेत्र में मुगल सेना युद्ध करने के लिए तैयार न थी। मुगल सेना का मनोबल टूट चुका था। परिस्थितियों के थपेड़ों से जूझता शहजादा कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं कर सम्भाजी :: 505

रहा था। उसके चेहरे पर उदासी छा गयी थी। रामदरा घाट की चढ़ाई मुगल सेना के लिए वस्तुतः श्मशान घाट की ही यात्रा थी। रुग्ण होने के कारण अनेक हाथी, ऊँट और घोड़े घाट पर चढ़ते-चढ़ते गिरकर दम तोड़ रहे थे। ऊँटों को केवल रेगिस्तानी रेत और उत्तर की मुलायम मिट्टी की ही आदत थी। यहाँ के पथरीले रास्तों और पहाड़ों में वे हैरान हो गये थे। अनेक ऊँटों ने इस चढ़ाई पर ही अपने प्राण छोड़ दिये। अनेक हाथियों और घोड़ों के कंकाल वहीं पर बिखर गये। जानवरों की लाशों से उठने वाली दुर्गन्ध से दूसरे लोग और पशु बीमार पड़ने लगे। उन्हें उल्टियाँ आने लगीं। उन्हें अनेक प्रकार की बीमारियाँ होने लगीं। इसी बीच मराठों की सेनाएँ घने जंगलों से निकलकर उन पर तूफानी आक्रमण करती थीं और उनकी कमर तोड़कर जंगलों में छिप जाती थीं। इस दुर्दैवी घाट को पार करने में मुगल सेना को आठ दिन लग गये। सेना का बुरा हाल था। चालीस हजार सैनिकों में केवल नौ-दस हजार सैनिक ही बचे थे। जो बचे थे उन्हें सैनिक तो क्या आदमी कहना भी मुश्किल था। वे तो मात्र चलती- फिरती लाश थे। जिनके घोड़े मर गये थे उनके पास नया घोड़ा खरीदने के लिए पैसा नहीं था जिनके पास पैसे थे उन्हें नये घोड़े मिल नहीं रहे थे। लोग इतने कमजोर हो गये थे कि किसी प्रकार साँस ले रहे थे। अपने पुत्र की दुर्दशा का समाचार बादशाह को मिला। उसने तत्काल शहजादे की फौज की सहायता के पच्चीस हजार अशर्फियाँ, पाँच ऊँट, पच्चीस खच्चरों और सौ घोड़े पर लदी रसद और वस्त्र भेजा। किन्तु इससे कोई विशेष अन्तर नहीं पड़ा। शहजादे के नये कपड़े भी काले पड़ गये थे। व्याधियों की काली छाया उसके शरीर पर भी दिखाई देने लगी थी। एक मरियल घोड़े पर बैठा शहजादा मुअज्जम बादशाह के तम्बू के पास पहुँच गया। जनानखाने की औरतें उसकी ओर करुण भाव से देखने लगीं। उसका शरीर जर्जर हो गया था। एक भिखारी की अवस्था में शहजादे को देखकर अनेक लोगों की आँखों में आँसू आ गये। वजीर असदखान मुअज्जम के सामने आया। रिश्ते में शहजादा उसके पोते की तरह था। अपने तम्बू में ले जाकर उसने मुअज्जम को फलाहार कराया। किन्तु मुअज्जम का शरीर इतना रुग्ण था कि मीठी-चीजें भी उसे जहर की तरह कड़वी लग रही थीं। मुअज्जम को धीरज बँधाते हुए असदखान उसे बादशाह के भव्य तम्बू में लेकर गया। औरंगजेब मुअज्जम को रुष्ट निगाह से देख रहा था। अपने बायें हाथ से सफेद दाढ़ी को सहलाते हुए और दूसरे हाथ से जयमाला को छाती से छुआते हुए उसने मुअज्जम की ओर देखा। 'इतनी दुर्दशा होने पर मेरा बाप कुछ पूछ नहीं रहा 506 : सम्भाजी

है' यह सोचकर मुअज्जम को बहुत बुरा लगा। जोर से हाँफते हुए उसने रुआँसी आवाज में कहा, "अब्बाजान बहुत तकलीफ हुई। वहाँ की खराब हवा..." "बेटे तकलीफ तो होगी ही। निश्चित किये गये रास्ते को बदल देने से खराब हालत तो होंगे ही।" अपने पिता के व्यंग्य को शहजादे ने पहचान लिया। उसने बड़ी मासूमियत से कहा, "आपको कोई गलतफहमी..." "गलतफहती कैसी? हमारा पहला मकसद क्या था? पूना की ओर से शहाबुद्दीन कोंकण में पहुँच रहा था और आपको राजापुर पोलादपुर से होते हुए महाड़ पहुँचना था। वहाँ पर आप और शहाबुद्दीन को इकट्ठा होकर रायगढ़ पर आक्रमण करना था। यही निश्चित किया गया था।" "अब्बाजान पर्याप्त रसद न मिल पाने से सेना में अकाल पड़ गया। उस पुर्तगाली कांटसाहब ने हमें फँसाया।" "मुअज्जम, इन सारी बातों को यहाँ पर बन्द करो।" बादशाह गुर्राया- "खाली इतना बता दो कि कोंकण के बताये गये रास्ते को छोड़कर आपके पाँव रामदरा की ओर कैसे मुड़ गये?" "लेकिन जहाँपनाह...?" "आप अन्धे तो नहीं थे। फिर आपकी आँखों-पट्टी किसने बाँध रखी थी ? कौन? कौन था वह जादूगर? रायगढ़ पर रहने वाला? सम्भा?" औरंगजेब का स्पष्ट प्रश्न सुनकर शहजादा निराश हो गया। उसका मन हुआ कि बादशाह का पैर पकड़कर वह फूट फूट कर रोये। परन्तु इस समय उसके शरीर में उतनी भी शक्ति नहीं बची थी। रुआँसी आवाज में वह बोला, "अब्बाजान रहम कीजिए। हमारी जिन्दगी की यह दुर्दशा देखकर भी ऐसा जानलेवा मजाक न करें।" "बेटे जहाँ हवा भी नहीं पहुँचती वहाँ भी मेरे जासूस पहुँच जाते हैं। यह बात शहजादा होने के नाते आपको अवश्य मालूम होगी।" औरंगजेब ने उदासभाव से कहा, "वहाँ रहते हुए उस सम्भा के जासूस आपको दो-बार मिले थे।" "कबूल अब्बाजान। राजनीति में अपने दुश्मन को नष्ट करने के लिए हर कोई ऐसे खेल खेलता है बात इतनी-सी है कि ऐसे किसी लालच का शिकार आपका शहजादा नहीं हुआ।" "क्या पता!" "ऐसा कैसे हो सकता है अब्बाजान?" मुअज्जम की मीठी आवाज सन्तप्त हो गयी। उसने रुष्ट स्वर में कहा, "यदि सम्भा के दूतों का हमारे डेरे में आना आपको दिख जाता है तो जब पन्द्रह दिन तक हम रामदरा घाट चढ़ रहे थे, सम्भा के सैनिक हमारे ऊपर आक्रमण कर रहे थे, हमारी चमड़ी उधेड़ रहे थे, अपने बाणों से सम्भाजी :. 507

हमारी आँखें फोड़ रहे थे तो बादशाह को क्यों नहीं दिखाई पड़ा?'' क्रोध से अपने ओंठ चबाते हुए गरजा, "लड़ने वाले बहादुर अपने मित्रों के क्षेत्र में सेना लेकर नहीं जाते। उन्हें कष्ट देना ठीक नहीं। इसी इरादे से आप पहाड़, पोलादपुर की ओर गये ही नहीं—छोड़ो उस बात को! पहले यह बताओ कि वह पैसा कहाँ है?'' "अब्बाजान पैसा तो सारा समाप्त हो गया। इसीलिए तो हमारी सेना की यह दुर्दशा हुई।'' "वह नहीं, कहाँ है सम्भा द्वारा दी गयी रिश्वत?'' मुअज्जम को सूझ नहीं रहा था कि अपने शंकालु पिता के इस प्रश्न क्या उत्तर दे? इसलिए निराश होकर वह अपने शिविर में चला गया। वहाँ अपनी खिड़कियाँ, दरवाजे बन्द करके अपने आप से बातें करने लगा। वह एक पागल की भाँति अपने को कोसने लगा। अपने आप से ही वह बोला, "जाते समय तकलीफ, वहाँ पहुँचने पर मुसीबत, आते समय जानलेवा मुसीबत, यहाँ लौटने पर ऐसा लांछन। या खुदा! कैसी फूटी तकदीर है हमारी?'' पाँच सखूबाई निंबालकर शम्भूमहाराज मे सात वर्ष बड़ी थीं। उन्हें शम्भूमहाराज के प्रति बड़ी ममता थी। किन्तु अम्बिकाबाई के पति को कर्नाटक की सूबेदारी मिल जाने के बाद गृह कलह आरम्भ हो गया। एक दिन शम्भूराजा के जीजा महादजी निंबालकर और सखूबाई जिद करने लगे। युद्धभूमि में हजारों के सामने दृढ़ और अविचल बने रहने वाले शम्भूमहाराज गृह कलह के कारण विचलित हो गये थे। उनके भीतर हलचल मची हुई थी। सखूबाई का यही कहना था, "आपने जो व्यवहार महाड़िक परिवार के साथ किया है वही हमारे माथ भी होना चाहिए। "ऐसा क्या दे दिया है हमने उन्हें?'' महाराज ने पूछा। "जिंजी और कर्नाटक की सूबेदारी।" "दीदीजी आपको कोई गलतफहमी हुई है! हमने हरजी महाराज को कर्नाटक की सूबेदारी दी है, जागीर नहीं ? सखूबाई बहुत नाराज नजर आ रही थीं। उन्होंने झटके से कहा, "शम्भूराजा, रिश्तेदारों के बीच ऐसा भेद-भाव अखिर 508 :: सम्भाजी

क्यों?'' शम्भुमहाराज अत्यन्त गम्भीर हो गये। येसूबाई की समझ में नहीं आ रहा था कि क्या कहें? तब सखूबाई रुष्ट स्वर में स्वयं को ही दोष देकर कहने लगी, "सारी भूल मुझसे हुई। मैंने ही निंबालकर को मिन्नत करके रोका। मैंने कहा-छोटा भाई राजा बन रहा है तो मुगलों की चाकरी क्यों करना?" "अब अपने किये कराये का फल भोगो..." महादजी ने कहा। "शम्भुमहाराज यदि आपने महाड़िकों को कुछ न दिया होता तो हम भी अपना मुँह कभी न खोलते। किन्तु बिना किसी त्याग या सेवा के उन्होंने दक्षिण का सूबा प्राप्त कर लिया और हम पागल की तरह देखते रहे।" "दिल्ली के बादशाह से जागीर मिली थी, लेकिन आप हमें भाई के स्वराज्य में खींचकर ले आयीं। हमारे लिए तो स्वार्थी स्वजनों से वह मुगल ही अच्छा था।" महादजी ने गुर्राते हुए कहा। महादजी और बहन सखूबाई की बातें तीर की तरह चुभ रही थीं। अन्त में शंभुमहाराज ने कहा, "दीदीजी हमारा हिंदवी स्वराज्य जनता का मन्दिर है। पिताजी ऐसा ही मानते थे और मैं भी उसी दृष्टि से स्वराज्य की ओर देखता हूँ। आप चाहे जितना भी हठ करें, हम अलग से कोई जागीर किसी को दे नहीं सकते।" दीदी सखूबाई और महादजी चुप हो गये। दूसरे दिन उनकी पालकियाँ रायगढ़ से नीचे उतरकर चली गयीं। सम्भाजी :: 509

दक्षिण अभियान एक एक दिन सुबह-सुबह शहरबानू ने अपने ससुर औरंगजेब से भेंट की इजाजत माँगी। इससे बादशाह को कुछ आश्चर्य हुआ। शहरबानू ही नहीं किसी भी पुत्रवधू को यदि किसी चीज की आवश्यकता होती थी तो वह अपनी माँग उदयपुरी बेगम के सामने रखती थी। वैसे शहरबानू बहुत सुन्दर थी। वह बीजापुर की शहजादी थी। शहजादा आजम के साथ उसका विवाह हुआ था। छाती तक खिंचे हुए महीन घूँघट में भी उसकी आँखें विलक्षण रूप से चमकती थीं। इस अचानक भेंट का उद्देश्य स्पष्ट करते हुए शहरबानू ने धीमे स्वर में कहा— "जिल्लेसुभानी, आपकी सल्तनत मेरे लिए मक्का-मदीना है फिर भी मुझे लगता है कि मेरे अब्बाजान की नगरी बीजापुर और मुगलों के बीच किसी प्रकार का झगड़ा नहीं होना चाहिए। इसके लिए मैंने बुरहानपुर से आगे बढ़ने से पहले ही सर्जाखान को एक सन्देश भेजा है। मैंने उन्हें समझाया है कि बादशाह की फौज की मदद करो और काफिरों को मिटा दो।" "बहुत खूब बेटी!" सहज रूप से बादशाह के मुख से निकला। बादशाह का स्वर ठंडा था— "तुम्हारा दिल पाक है किन्तु बीजापुर वालों का दिमाग ठिकाने पर नहीं है।" बादशाह ने बगल की मेज पर रखी कागज की थैलियों की ओर शहरबानू का ध्यान आकर्षित करते हुए कठोर शब्दों में कहा, "बेटी, ये कुतुबशाह, आदिलशाह और उस सम्भा के आपसी पत्र हैं जिसे हमारे थानेदारों और जासूसों ने इकट्ठा किया है। मुझे दक्खन में न घुसने देने का और मदण्णा तथा सम्भा जैसे काफिरों की औलादों की रक्षा करना इन बेवकूफों का इरादा है। बेटी तुम्हारी कोशिश के लिए शुक्रिया, लेकिन उस आदिलशाह में तो हमारे पत्रों का उत्तर देने की भी तमीज नहीं है। एक न एक दिन हमें बीजापुर को खाक करना ही पड़ेगा।" बादशाह को कोर्निस करते हुए और उसे बिना पीठ दिखाए, रुष्टभाव से वहाँ 510 :: सम्भाजी

चली गयी। बादशाह ने बीजापुर के सम्बन्ध में वजीर से सहज ही पूछा, "असदखान! काफिरों के मददगार उस आदिल शाह पर कब आक्रमण करना है?" "पिछले कई दशकों में आक्रमण करने की हिम्मत किसी ने की नहीं, फतह की बात तो बहुत दूर की है।" "क्या?" बादशाह का चेहरा तमतमा गया। "बादशाह सलामत! उस नापाक शहर के चारों ओर अतिशय मजबूत ढाई मील की तटबन्दी है। उसके साथ बहुत गहरी खाई है। उस तटबन्दी के भीतर एक और तटबन्दी है जो फौलाद की तरह मजबूत है उनके बुर्जों पर 'मालिक-ए-मैदान' जैसी बड़ी बड़ी तोपें हैं। ये तोपें बहुत दूर तक मार करने वाली हैं।" बादशाह ने कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की। केवल आसमान की ओर एक बार देखा। उसी दोपहर को शहंशाह की बैठक में जुल्फिकारखान दौड़ते हुए आया और कहने लगा, "जिल्लेसुभानी, बहुत अच्छी खबर है, उस सम्भा के चार बड़े सरदार विद्रोही हो गये हैं। आपसे मिलने के लिए बाहर इन्तजार कर रहे हैं।" बादशाह ने हाथ के संकेत से स्वीकृति प्रदान की। तब थोड़ी ही देर में कान्होजी शिर्के जगदेव राय, अर्जोजी और अचलोजी आकर बादशाह के सामने खड़े हो गये। उन्होंने जमीन पर माथा टेककर बादशाह को साष्टांग प्रणाम किया। "क्या चाहते हो?" बादशाह ने सीधा प्रश्न किया। "माई बाप, हमी नहीं, बहुत से मराठे खानदान उस सम्भाजी से रुष्ट हैं। उसके पास कोई न्याय व्यवस्था बची नहीं है।" कान्होजी ने अत्यन्त दीन वाणी में कहा। "तुम्हारे हिन्दवी स्वराज्य का क्या है?" "किस स्वराज्य की बात कर रहे हैं माई-बाप? वह तो पानी का बुलबुला है। किसी भी समय फूट जाएगा। शिवाजी ने काशी से ब्राह्मण बुलाकर अपने ऊपर फूलों की वर्षा करवाई और राजा बनने का नाटक किया। लेकिन इस तरह का दिखावा कितने दिन चलेगा?" "असल में क्या चाहते हो, आप लोग?" "दूसरा कुछ नहीं हम पहले के वतनदार है। उस जागीर को हमारे और हमारे बाल बच्चों के नाम कर दीजिए। हम मराठे मालिक नहीं, किसी का मांडलिक बनने के लिए जन्म लेते हैं।" "बहुत खूब! शिर्के तुम बहुत चतुर दिखाई पड़ते हो। गणोजी तुम्हारे कौन लगते हैं?" "सगे चचेरे भाई।" उन चारों सरदारों ने कुछ भी न माँगने की होशियारी दिखाई थी। किन्तु सम्भाजी :: 511