सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
श्री दादूवाणी-राग रामकली 8 यों तो कसणी सांच सहेगा, झूठ सहै नहिं भाई ॥ 2 ॥ ज्यों घृत को ले ताता कीजे, ताइ ताइ तत्त कीन्हा। तत्तैं तत्त रहेगा भाई, झूठ सबै जल खीना ॥ 3 ॥ यों तो कसणी साच सहेगा, साचा कस कस लेवै । दादू दर्शन सांचा पावै, झूठे दरस न देवै ॥ 4 ॥ 192. करणी बिना कथनी । प्रतिपाल बातैं बाद जाहिंगी भइये, तुम जनि जानों बातनि पइये ॥ टेक ॥ जब लग अपना आप न जानै, तब लग कथनी काची । आपा जान सांई को जानै, तब कथनी सब साची ॥ 1 ॥ करनी बिना कंत नहीं पावै, कहे सुने का होई । जैसी कहै करै जे तैसी, पावैगा जन सोई ॥ 2 ॥ बातनि हीं जे निर्मल होवे, तो काहे को कस लीजे । सोना अग्नि दहै दस बारा, तब यहु प्रान पतीजे ॥ 3 ॥ यौं हम जाना मन पतियाना, करनी कठिन अपारा। दादू तन का आपा जारे, तो तिरत न लागे बारा ॥ 4 ॥ 193. उपदेश । पंजाबी-त्रिताल पंडित, राम मिलै सो कीजे । पढ़ पढ़ वेद पुराण बखानैं, सोई तत्त्व कह दीजे ॥ टेक॥ आतम रोगी विषम बियाधी, सोई कर औषधि सारा। परसत प्राणी होइ परम सुख, छूटै सब संसारा ॥ 1 ॥ ए गुण इन्द्री अग्नि अपारा, ता सन जलै शरीरा। तन मन शीतल होइ सदा सुख, सो जल नहाओ नीरा ॥ 2 ॥ सोई मार्ग हमहिं बताओ, जेहि पंथ पहुँचे पारा। भूलि न परै उलट नहीं आवै, सो कुछ करहु विचारा ॥ 3 ॥
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श्री दादूवाणी-राग रामकली 8 गुरु उपदेश देहु कर दीपक, तिमिर मिटे सब सूझे। दादू सोई पंडित ज्ञाता, राम मिलन की बूझे ॥ 4 ॥ 194. उपदेश । प्रतिताल हरि राम बिना सब भर्मि गये, कोई जन तेरा साच गहै ॥ टेक ॥ पीवै नीर तृषा तन भाजै, ज्ञान गुरु बिन कोइ न लहै। प्रकट पूरा समझ न आवै, तातैं सो जन दूर रहै ॥ 1 ॥ हर्ष शोक दोउ सम कर राखै, एक एक के संग न बहै। अनतहि जाइ तहाँदुख पावै, आपहि आपा आप दहै ॥ 2 ॥ आपा पर भरम सब छाड़ै, तोनि लोक पर ताहि धरै। सो जन सही साच कौं परसे, अमर मिले नहिं कबहूँ मरै ॥ 3 ॥ पारब्रह्म सूं प्रीति निरन्तर, राम रसायन भर पीवै। सदा आनन्द सुखी साचे सौं, कहै दादू सो जन जीवै ॥ 4 ॥ 195. भ्रम विध्वंसण । प्रतिताल जग अंधा नैन न सूझै, जिन सिरजे, ताहि न बूझै ॥ टेक ॥ पाहण की पूजा करै, करै आतम घाता। निर्मल नैन न आवई, दोजख दिशि जाता ॥ 1 ॥ पूजै देव दिहाड़ियां, महा-माई मानैं। प्रकट देव निरंजना, ताकी सेव न जानैं ॥ 2 ॥ भैरुं भूत सब भ्रम के, पशु प्राणी ध्यावैं। सिरजनहारा सबन का, ताको नहिं पावैं ॥ 3 ॥ आप स्वारथ मेदनी, का का नहिं करही । दादू सांचे राम बिन, मर मर दुख भरही ॥ 4 ॥ 196. अन्य उपासक विस्मयवादी भ्रम । रंग ताल
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श्री दादूवाणी-राग रामकली 8 ........................................................................................................................
साचा राम न जाणै रे, सब झूठ बखाणै रे ॥ टेक ॥ झूठे देवा झूठी सेवा, झूठा करे पसारा। झूठी पूजा झूठी पाती, झूठा पूजणहारा ॥ 1 ॥ झूठा पाक करै रे प्राणी, झूठा भोग लगावै। झूठा आड़ा पड़दा देवै, झूठा थाल बजावै ॥ 2 ॥ झूठे वक्ता झूठे श्रोता, झूठी कथा सुणावै। झूठा कलियुग सब को मानै, झूठा भ्रम दिढ़ावै ॥ 3 ॥ स्थावर जंगम जल थल महियल, घट घट तेज समाना। दादू आतम राम हमारा, आदि पुरुष पहिचाना ॥ 4 ॥
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निज मार्ग निर्णय । चौताल मैं पंथी एक अपार का, मन और न भावै। सोई पंथ पावै पीव का, जिसे आप लखावै ॥ टेक ॥ को पंथी हिंदू तुरक के, को काहू राता। को पंथी सोफी सेवड़े, को सन्यासी माता ॥ 1 ॥ को पंथी जोगी जंगमा, को शक्ति पंथ ध्यावै। को पंथी कमड़े कापड़ी, को बहुत मनावै ॥ 2 ॥ को पंथी काहू के चलै, मैं और न जानूं। दादू जिन जग सिरजिया, ताही को मानूं ॥ 3 ॥
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साधु मिलाप मंगल । चौताल आज हमारे रामजी साधु घर आये, मंगलाचार चहुँ दिशि भये, आनन्द बधाये ॥ टेक ॥ चौक पुराऊँ मोतियां, घिस चंदन लाऊँ। पंच पदारथ पोइ के , यहु माल चढ़ाऊँ ॥ 1 ॥ तन मन धन करूँ वारनैं, प्रदक्षिणा दीजे।
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श्री दादूवाणी-राग रामकली 8
शीश हमारा जीव ले, नौछावर कीजे ॥ 2 ॥ भाव भक्ति कर प्रीति सौं, प्रेम रस पीजे । सेवा वंदन आरती, यहु लाहा लीजे ॥ 3 ॥ भाग हमारा हे सखी, सुख सागर पाया । दादू को दर्शन भया, मिले त्रिभुवन राया ॥ 4 ॥ 199. संत समागम प्रार्थना । दादरा निरंजन नाम के रस माते, कोई पूरे प्राणी राते ॥ टेक ॥ सदा सनेही राम के, सोई जन साचे । तुम बिन और न जानहीं, रंग तेरे ही राचे ॥ 1 ॥ आन न भावै एक तूं, सति साधु सोई । प्रेम पियासे पीव के, ऐसा जन कोई ॥ 2 ॥ तुम हीं जीवन उर रहे, आनन्द अनुरागी । प्रेम मगन पीव प्रितड़ी, लै तुम सौं लागी ॥ 3 ॥ जे जन तेरे रंग रंगे, दूजा रंग नांही । जन्म सुफल कर लीजिये, दादू उन मांहीं ॥ 4 ॥ 200. अत्यन्त निर्मल उपदेश । दादरा चलु रे मन ! जहाँ अमृत वना, निर्मल नीके संत जना ॥ टेक ॥ निर्गुण नांव फल अगम अपार, संतन जीवन प्राण अधार ॥ 1 ॥ सीतल छाया सुखी शरीर, चरण सरोवर निर्मल नीर ॥ 2 ॥ सुफल सदा फल बारह मास, नाना वाणी धुनि प्रकाश ॥ 3 ॥ तहाँ वास बसि अमर अनेक, तहँ चलि दादू इहै विवेक ॥ 4 ॥ 201. चौताल चलो मन माहरा, जहाँ मित्र अम्हारा ।
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श्री दादूवाणी-राग रामकली 8 तहँ जामण मरण नहिं जाणिये, नहिं जाणिये ॥ टेक ॥ मोह न माया, मेरा न तेरा, आवागमन नहीं जम फेरा ॥ 1 ॥ पिंड पड़े नहीं प्राण न छूटै, काल न लागै आयु न खूटै ॥ 2 ॥ अमर लोक तहँ अखिल शरीरा, व्याधि विकार न व्यापै पीरा ॥ 3 ॥ राम राज कोई भिड़े न भाजै, सुस्थिर रहणा बैठा छाजै ॥ 4 ॥ अलख निरंजन और न कोई, मित्र अम्हारा दादू सोई ॥ 5 ॥ 202. बेली । त्रिताल बेली आनन्द प्रेम समाइ । सहजैं मगन राम रस सींचै, दिन दिन बधती जाइ ॥ टेक ॥ सतगुरु सहजैं बाही बेली, सहज गगन घर छाया । सहजैं सहजैं कोंपल मेल्है, जाणै अवधू राया ॥ 1 ॥ आतम बेली सहजैं फूलै, सदा फूल फल होई । काया बाड़ी सहजैं निपजै, जानैं विरला कोई ॥ 2 ॥ मन हठ बेली सूखण लागी, सहजैं जुग जुग जीवै । दादू बेली अमर फल लागै, सहज सदा रस पीवै ॥ 3 ॥ 203. शब्द बाण । त्रिताल संतों ! राम बाण मोहि लागे । मारत मृग मर्म तब पायो, सब संगी मिल जागे ॥ टेक ॥ चित चेतन चिंतामणि चीन्हा, उलट अपूठा आया । मंदिर पैसि बहुरि नहिं निकसै, परम तत्त घर पाया ॥ 1 ॥ आवै न जाइ, जाइ नहिं आवै, तिहिं रस मनवा माता । पान करत परमानन्द पायो, थकित भयो चलि जाता ॥ 2 ॥ भयो अपंग पंक नहि लागै, निर्मल संग सहाई । पूर्ण ब्रह्म अखिल अविनाशी, तिहिं तज अनत न जाई ॥ 3 ॥
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श्री दादूवाणी-राग रामकली 8 सो शर लागि प्रेम प्रकाशा, प्रकटी प्रीतम वाणी। दादू दीन दयाल ही जानै, सुख में सुरति समानी ॥ 4 ॥ 204. निज स्थान निर्णय । झपताल मध्य नैन निरखूं सदा, सो सहज स्वरूप । देखत ही मन मोहिया, है तो तत्त्व अनूप ॥ टेक॥ त्रिवेणी तट पाइया, मूरति अविनाशी। जुग जुग मेरा भावता, सोई सुख राशी ॥ 1 ॥ तारुणी तट देखि हूँ, तहाँ सुस्थाना। सेवक स्वामी संग रहें, बैठे भगवाना ॥ 2 ॥ निर्भय थान सुहात सो, तहँ सेवक स्वामी। अनेक जतन कर पाइया, मैं अन्तरजामी ॥ 3 ॥ तेज तार परिमित नहीं, ऐसा उजियारा। दादू पार न पाइये, सो स्वरूप संभारा ॥ 4 ॥ 205. झपताल निकट निरंजन देखि हौं, छिन दूर न जाई । बाहर भीतर एक सा, सहजैं रह्या समाई ॥ टेक॥ सतगुरु भेद लखाइया, तब पूरा पाया। नैनन ही निरखूं सदा, घर सहजैं आया ॥ 1 ॥ पूरे सौं परचा भया, पूरी मति जागी। जीव जान जीवन मिल्या, ऐसे बड़ भागी ॥ 2 ॥ रोम रोम में रम रह्या, सो जीवन मेरा। जीव पीव न्यारा नहीं, सब संग बसेरा ॥ 3 ॥ सुन्दर सो सहजैं रहै, घट अंतरजामी। दादू सोई देखि हौं, सारों संग स्वामी ॥ 4 ॥
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श्री दादूवाणी-राग रामकली ४ २०६. परिचय उपदेश । त्रिताल सहज सहेलड़ी हे, तूँ निर्मल नैन निहारि । रूप अरूप निर्गुण आगुण में, त्रिभुवन देव मुरारि ॥ टेक ॥ बारम्बार निरख जग जीवन, इहि घर हरि अविनाशी । सुन्दरी जाइ सेज सुख विलसे, पूरण परम निवासी ॥ 1 ॥ सहजैं संग परस जगजीवन, आसण अमर अकेला । सुन्दरी जाइ सेज सुख सोवै, जीव ब्रह्म का मेला ॥ 2 ॥ मिलि आनन्द प्रीति करि पावन, अगम निगम जहाँ राजा । जाइ तहाँ परस पावन को, सुन्दरी सारे काजा ॥ 3 ॥ मंगलाचार चहुँ दिशि रोपै, जब सुन्दरी पिव पावै । परम ज्योति पूरे सौं मिल कर, दादू रंग लगावै ॥ 4 ॥ २०७. वस्तु निर्देश । त्रिताल तहँ आपै आप निरंजना, तहँ निसवासर नहि संजमा ॥ टेक ॥ तहँ धरती अम्बर नाहीं, तहँ धूप न दीसै छांहीं । तहँ पवन न चालै पानी, तहँ आपै एक बिनानी ॥ 1 ॥ तहँ चंद न ऊगै सूरा, मुख काल न बाजै तूरा । तहँ सुख दुख का गम नाहीं, ओ तो अगम अगोचर माहीं ॥ 2 ॥ तहँ काल काया नहिं लागै, तहँ को सोवै को जागै । तहँ पाप पुण्य नहिं कोई, तहँ अलख निरंजन सोई ॥ 3 ॥ तहँ सहज रहै सो स्वामी, सब घट अंतरजामी । सकल निरन्तर वासा, रट दादू संगम पासा ॥ 4 ॥ २०८. त्रिताल अवधू ! बोल निरंजन बाणी, तहँ एकै अनहद जाणी ॥ टेक ॥ तहँ वसुधा का बल नाहीं, तहँ गगन घाम नहिं छाहीं ।
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श्री दादूवाणी-राग रामकली 8 तहँ चंद सूर नहिं जाई, तहँ काल काया नहिं भाई ॥ 1 ॥ तहँ रैणि दिवस नहिं छाया, तहँ बाव वर्ण नहिं माया। तहँ उदय अस्त नहिं होई, तहँ मरै न जीवै कोई ॥ 2 ॥ तहँ नाहीं पाठ पुराना, तहँ आगम निगम नहिं जाना। तहँ विद्या वाद न जाना, नहिं तहाँ जोग अरु ध्याना ॥ 3 ॥ तहँ निराकार निज ऐसा, तहँ जाण्या जाइ न जैसा। तहँ सब गुण रहिता गहिये, तहँ दादू अनहद कहिये ॥ 4 ॥ २०९. प्रसिद्ध साधु प्रतिपाल बाबा! को ऐसा जन जोगी । अंजन छाड़ै रहै निरंजन, सहज सदा रस भोगी ॥ टेक ॥ छाया माया रहै विवर्जित, पिंड ब्रह्माण्ड नियारे। चंद सूर तैं अगम अगोचर, सो कह तत्त्व विचारे ॥ 1 ॥ पाप पुण्य लिपै नहीं कबहूँ, द्वै पख रहिता सोई। धरणि आकाश ताहि तैं ऊपरि, तहाँ जाइ रत होई ॥ 2 ॥ जीवण मरण न बांछै कबहूँ, आवागमन न फेरा। पानी पवन परस नहिं लागै, तिहिं संग करै बसेरा ॥ 3 ॥ गुण आकार जहाँ गम नाहीं, आपै आप अकेला। दादू जाइ तहाँ जन जोगी, परम पुरुष सौं मेला ॥ 4 ॥ २१०. परिचय पराभक्ति । राज विद्याधर ताल जोगी जान जान जन जीवै । बिन ही मनसा मन हि विचारै, बिन रसना रस पीवै ॥ टेक ॥ बिनही लोचन निरख नैन बिन, श्रवण रहित सुन सोई। ऐसे आतम रहै एक रस, तो दूसर नाम न होई ॥ 1 ॥ बिन ही मार्ग चलै चरण बिन, निहचल बैठा जाई।
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श्री दादूवाणी-राग रामकली 8 बिन ही काया मिलै परस्पर, ज्यों जल जलहि समाई ॥ 2 ॥ बिन ही ठाहर आसण पूरे, बिन कर बैन बजावै । बिन ही पावों नाचै निशिदिन, बिन जिभ्या गुण गावै ॥ 3 ॥ सब गुण रहिता सकल बियापी, बिन इंद्री रस भोगी । दादू ऐसा गुरु हमारा, आप निरंजन जोगी ॥ 4 ॥ २11. रूपक ताल इहै परम गरु योगं, अमी महारस भोगं ॥ टेक॥ मन पवना स्थिर साधं, अविगत नाथ अराधं, तहँ शब्द अनाहद नादं ॥ १ ॥ पंच सखी परमोधं, अगम ज्ञान गुरु बोधं, तहँ नाथ निरंजन शोधं ॥ २ ॥ सद्गुरु मांहि बतावा, निराधार घर छावा, तहँ ज्योति स्वरूपी पावा ॥ ३ ॥ सहजैं सदा प्रकाशं, पूरण ब्रह्म विलासं, तहँ सेवक दादू दासं ॥ ४ ॥ २12. (गुजराती) अनभई । त्रिताल मूने येह अचंभो थाये । कीड़ीये हस्ती विडान्यो, तेन्नें बैठी खाये ॥ टेक ॥ जाण हु तो ते बैठो हारे, अजाण तेन्नें ता वाहे । पांगुलोउ जाबा लाग्यो, तेन्नें कर को साहे ॥ १ ॥ नान्हो हुतो ते मोटो थायो, गगन मण्डल नहिं माये । मोटे रो विस्तार भणीजे, ते तो केन्नें जाये ॥ २ ॥ ते जाणे जे निरखी जोवे, खोजी नें वलीमांहे । दादू तेन्नों मर्म न जाणें, जे जिह्वा विहूणों गाये ॥ ३ ॥ इति राग रामकली सम्पूर्ण ॥ 8 ॥ पद 46 ॥
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राग आसावरी www.dadooram.org अथ राग आसावरी ९ (गायन समय प्रातः 6 से 9) २13. उत्तम स्मरण । ब्रह्म ताल तूँ ही मेरे रसना, तूँ ही मेरे बैना, तूँ ही मेरे श्रवना, तूँ ही मेरे नैना ॥ टेक ॥ तूँ ही मेरे आतम कँवल मंझारी, तूँ ही मेरी मनसा, तुम पर वारी ॥ 1 ॥ तूँ ही मेरे मन ही, तूँ ही मेरे श्वासा, तूँ ही मेरे सुरतैं प्राण निवासा ॥ 2 ॥ तूँ ही मेरे नखशिख सकल शरीरा, तूँ ही मेरे जियरे ज्यों जल नीरा ॥ 3 ॥ तुम बिन मेरे अवर को नांही,
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श्री दादूवाणी-राग आसावरी 9
तूँ ही मेरी जीवनि दादू मांही ॥ 4 ॥ 214. अनन्य शरण । झूमरा तुम्हारे नाम लाग हरि ! जीवन मेरा । मेरे साधन सकल नाम निज तेरा ॥ टेक ॥ दान पुन्य तप तीरथ मेरे, केवल नाम तुम्हारा । यह सब मेरे सेवा पूजा, ऐसा बरत हमारा ॥ 1 ॥ यह सब मेरे वेद पुराणा, सुचि संयम है सोई । ज्ञान ध्यान येही सब मेरे, और न दूजा कोई ॥ 2 ॥ काम क्रोध काया वश करना, ये सब मेरे नामा । मुक्ता गुप्ता परगट कहिये, मेरे केवल रामा ॥ 3 ॥ तारण तिरण नांव निज तेरा, तुमही एक आधारा । दादू अंग एक रस लागा, नांव गहै भव पारा ॥ 4 ॥ 215. चतुस्ताल हरि केवल एक अधारा, सोई तारण तिरण हमारा ॥ टेक ॥ ना मैं पंडित पढ़ि गुणि जानूं , ना कुछ ज्ञान विचारा । ना मैं अगमी ज्योतिग जानूं, ना मुझ रूप सिंगारा ॥ 1 ॥ ना तप मेरे इन्द्रिय निग्रह, ना कुछ तीरथ फिरणां । देवल पूजा मेरे नाहीं, ध्यान कछू नहिं धरणां ॥ 2 ॥ योग युक्ति कछु नाहीं मेरे, ना मैं साधन जानूं । औषधि मूली मेरे नाहीं, ना मैं देश बखानूं ॥ 3 ॥ मैं तो और कछू नाहिं जानूं, कहो और क्या कीजे । दादू एक गलित गोविन्द सौं, इहि विधि प्राण पतीजे ॥ 4 ॥ 216. परिचय चतुस्ताल
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श्री दादूवाणी-राग आसावरी 9 पीव घर आवनो ए, अहो ! मोहि भावनो ते ॥ टेक ॥ मोहन नीको री हरी, देखूंगी अँखियाँ भरी । राखूं हौं उर धरी प्रीति करी खरी, मोहन मेरो री माई । रहूँ हौं चरणौं धाई, आनन्द बधाई, हरि के गुण गाई ॥ 1 ॥ दादू रे चरण गहिये, जाइने तिहाँतो रहिये । तन मन सुख लहिये, विनती गहिये ॥ 2 ॥ 217. त्रिताल हाँ माई ! मेरो राम बैरागी, तजि जनि जाइ ॥ टेक ॥ राम विनोद करत उर अंतर, मिलिहौं बैरागिनि धाइ ॥ 1 ॥ जोगिन ह्रै कर फिरूँगी विदेसा, राम नाम ल्यौ लाइ ॥ 2 ॥ दादू को स्वामी है रे उदासी, रहिहौं नैन दोइ लाइ ॥ 3 ॥ 218. उपदेश चेतावनी । राज मृगांक ताल रे मन ! गोविन्द गाइ रे गाइ, जन्म अविरथा जाइ रे जाइ ॥ टेक ॥ ऐसा जनम न बारम्बारा, तातैं जप ले राम पियारा ॥ 1 ॥ यहु तन ऐसा बहुरि न पावै, तातैं गोविन्द काहे न गावै ॥ 2 ॥ बहुरि न पावै मानुष देही, तातैं कर ले राम सनेही ॥ 3 ॥ अब के दादू किया निहाला, गाइ निरंजन दीनदयाला ॥ 4 ॥ 219. काल चेतावनी । राज मृगांक ताल मन रे ! सोवत रैन बिहानी, तैं अजहूँ जात न जानी ॥ टेक ॥ बीती रैन बहुरि नहीं आवे, जीव जाग जनि सोवे । चारों दिशा चोर घर लागे, जाग देख क्या होवे ॥ 1 ॥ भोर भयो पछतावन लागे, मांहीं महल कुछ नांहीं । जब जाइ काल काया कर लागे,तब सोधे घर मांहीं ॥ 2 ॥
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श्री दादूवाणी-राग आसावरी 9 जाग जतन कर राखो सोई, तब तन तत्त न जाई । चेतन पहरे चेतत नांहीं, कहि दादू समझाई ॥ ३ ॥ २२०. राज विद्याधर ताल देखत ही दिन आइ गये, पलट केश सब श्वेत भये ॥ टेक ॥ आई जुरा मीच अरु मरणा, आया काल अबै क्या करणा । श्रवणों सुरति गई नैन न सूझै, सुधि बुधि नाठी कह्या न बूझै ॥ १ ॥ मुख तैं शब्द विकल भई वाणी, जन्म गया सब रैन बिहाणी । प्राण पुरुष पछतावण लागा, दादू अवसर काहे न जागा ॥ २ ॥ २२१. उपदेश । राज विद्याधर ताल हरि बिन हां, हो कहूँ सचु नांहीं, देखत जाई विषय फल खाहीं ॥ टेक ॥ रस रसना के मीन मन भीरा, जल तैं जाइ यों दहै शरीरा ॥ १ ॥ गज के ज्ञान मगन मद माता, अंकुँए डोरि गहै फँद गाता ॥ २ ॥ मर्कट मूठी मांहिं मन लागा, दुख की राशि भ्रमै भ्रम भागा ॥ ३ ॥ दादू देखु हरि सुखदाता, ताको छाड़ि कहाँ मन राता ॥ ४ ॥ २२२. उदीक्षण ताल सांई बिना संतोष न पावै, भावै घर तजि वन वन धावै ॥ टेक ॥ भावै पढ़ि गुनि वेद उचारै, आगम निगम सबै विचारै ॥ १ ॥ भावै नव खंड सब फिर आवै, अजहूँ आगै काहे न जावै ॥ २ ॥ भावै सब तजि रहै अकेला, भाई बन्धु न काहू मेला ॥ ३ ॥ दादू देखै सांई सोई, साच बिना संतोष न होई ॥ ४ ॥ २२३. मनोपदेश चेतावनी । उदीक्षण ताल मन माया रातो भूले । मेरी मेरी कर कर बौरे, कहा मुग्ध नर फूले ॥ टेक ॥
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श्री दादूवाणी-राग आसावरी 9 माया कारण मूल गँवावै, समझ देख मन मेरा। अंत काल जब आइ पहूँता, कोई नहीं तब तेरा ॥ 1 ॥ मेरी मेरी कर नर जाणै, मन मेरी कर रहिया। तब यहु मेरी काम न आवै, प्राण पुरुष जब गहिया ॥ 2 ॥ राव रंक सब राजा राणा, सबहिन को बोरावै। छत्रपति भूपति तिन के संग, चलती बेर न आवै ॥ 3 ॥ चेत विचार जान जिय अपने, माया संग न जाई। दादू हरि भज समझ सयाना, रहो राम ल्यौ लाई ॥ 4 ॥ 224. काल चेतावनी । ललित ताल रहसी एक उपावनहारा, और चलसी सब संसारा ॥ टेक ॥ चलसी गगन धरणि सब चलसी, चलसी पवन अरु पानी। चलसी चंद सूर पुनि चलसी, चलसी सबै उपानी ॥ 1 ॥ चलसी दिवस रैण भी चलसी, चलसी जुग जम वारा। चलसी काल व्याल पुनि चलसी, चलसी सबै पसारा ॥ 2 ॥ चलसी स्वर्ग नरक भी चलसी, चलसी भूचणहारा। चलसी सुख दुःख भी चलसी, चलसी कर्म विचारा ॥ 3 ॥ चलसी चंचल निहचल रहसी, चलसी जे कुछ कीन्हा। दादू देख रहै अविनाशी, और सबै घट खीना ॥ 4 ॥ 225. त्रिताल इहि कलि हम मरणे को आये, मरण मीत उन संग पठाये ॥ टेक ॥ जब तैं यहु हम मरण विचारा, तब तैं आगम पंथ सँवारा ॥ 1 ॥ मरण देख हम गर्व न कीन्हा, मरण पठाये सो हम लीन्हा ॥ 2 ॥ मरणा मीठा लागे मोहि, इहि मरणे मीठा सुख होहि ॥ 3 ॥ मरणे पहली मरे जो कोई, दादू सो अजरावर होई ॥ 4 ॥
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श्री दादूवाणी-राग आसावरी 9 226. त्रिताल रे मन मरणे कहा डराई, आगे पीछे मरणा रे भाई ॥ टेक ॥ जे कुछ आवै थिर न रहाई, देखत सबै चल्या जग जाई ॥ 1 ॥ पीर पैगम्बर किया पयाना, सेख मुसायक सबै समाना ॥ 2 ॥ ब्रह्मा विष्णु महेश महाबलि, मोटे मुनि जन गये सबै चलि ॥ 3 ॥ निहचल सदा सोई मन लाइ, दादू हर्ष राम गुण गाइ ॥ 4 ॥ 227. वस्तु निर्देश निर्णय । मल्लिका मोद ताल ऐसा तत्त्व अनुपम भाई, मरै न जीवै, काल न खाई ॥ टेक ॥ पावक जरै न मार्यो मरई, काट्यो कटै न टार्यो टरई ॥ 1 ॥ आखिर खिरै न लागै काई, सीत घाम जल डूब न जाई ॥ 2 ॥ माटी मिलै न गगन विलाई, अघट एक रस रह्या समाई ॥ 3 ॥ ऐसा तत्त्व अनुपम कहिये, सो गहि दादू काहे न रहिये ॥ 4 ॥ 228. मनोपदेश । मल्लिका मोद ताल मन रे सेव निरंजन राई, ताको सेवो रे चित लाई ॥ टेक ॥ आदि अन्तै सोई उपावै, परलै लेहि छिपाई । बिन थँभा जिन गगन रहाया, सो रह्या सबन में समाई ॥ 1 ॥ पाताल मांही जे आराधै, वासुकि रे गुण गाई । सहस्त्र मुख जिह्वा द्वै ताके, सो भी पार न पाई ॥ 2 ॥ सुर नर जाको पार न पावैं, कोटि मुनि जन ध्याई । दादू रे तन ताको है रे, जाको सकल लोक आराही ॥ 3 ॥ 229. जीव-उपदेश । भंग ताल निरंजन जोगी जान ले चेला, सकल वियापी रहै अकेला ॥ टेक ॥ खपर न झोली डंड अधारी, मढ़ी न माया लेहु विचारी ॥ 1 ॥
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श्री दादूवाणी-राग आसावरी 9 सींगी मुद्रा विभूति न कंथा, जटा जाप आसन नहिं पंथा ॥ 2 ॥ तीरथ व्रत न वनखंड वासा, मांग न खाइ नहीं जग आसा ॥ 3 ॥ अमर गुरु अविनाशी जोगी, दादू चेला महारस भोगी ॥ 4 ॥ 230. उपदेश । भंग ताल जोगिया बैरागी बाबा, रहै अकेला उनमनि लागा ॥ टेक ॥ आतम जोगी धीरज कंथा, निश्चल आसण आगम पंथा ॥ 1 ॥ सहजैं मुद्रा अलख अधारी, अनहद सींगी रहणि हमारी ॥ 2 ॥ काया वन-खंड पांचों चेला, ज्ञान गुफा में रहै अकेला ॥ 3 ॥ दादू दर्शन कारण जागे, निरंजन नगरी भिक्षा मांगे ॥ 4 ॥ 231. समता ज्ञान । ललित ताल बाबा, कहु दूजा क्यों कहिये, तातैं इहि संशय दुख सहिये ॥ टेक ॥ यहु मति ऐसी पशुवां जैसी, काहे चेतत नांहीं । अपना अंग आप नहिं जानै, देखै दर्पण मांही ॥ 1 ॥ इहि मति मीच मरण के तांई, कूप सिंह तहँ आया । डूब मुवा मन मरम न जाना, देखि आपनी छाया ॥ 2 ॥ मद के माते समझत नांहीं, मैगल की मति आई । आपै आप आप दुख दीया, देखी आपनी झांई ॥ 3 ॥ मन समझे तो दूजा नांहीं, बिन समझे दुख पावै । दादू ज्ञान गुरु का नांहीं, समझ कहाँ तैं आवै ॥ 4 ॥ 232. ललित ताल बाबा, नांहीं दूजा कोई । एक अनेक नाम तुम्हारे, मोपै और न होई ॥ टेक ॥ अलख इलाही एक तूँ, तूँ ही राम रहीम ।
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श्री दादूवाणी-राग आसावरी 9 तूँ ही मालिक मोहना, केशव नाम करीम ॥ 1 ॥ सांई सिरजनहार तूँ, तूँ पावन तूँ पाक। तूँ कायम करतार तूँ, तूँ हरि हाजिर आप ॥ 2 ॥ रमता राजिक एक तूँ, तूँ सारंग सुबहान । कादिर करता एक तूँ, तूँ साहिब सुलतान ॥ 3 ॥ अविगत अल्लह एक तूँ, गनी गुसांई एक। अजब अनुपम आप है, दादू नाम अनेक ॥ 4 ॥ 233. समर्थाई । रंग ताल जीवत मारे मुये जिलाये, बोलत गूंगे गूंग बुलाये ॥ टेक ॥ जागत निशि भर सोई सुलाये, सोवत रैनि सोई जगाये ॥ 1 ॥ सूझत नैनहुँ लोइन लीये, अंध विचारे ता मुख दीये ॥ 2 ॥ चलते भारी ते बिठलाये, अपंग विचारे सोई चलाये ॥ 3 ॥ ऐसा अद्भुत हम कुछ पाया, दादू सतगुरु कहि समझाया ॥ 4 ॥ 234. प्रश्न । रंग ताल क्यों कर यह जग रच्यो, गुसांई ? तेरे कौन विनोद बन्यो मन मांहीं ? टेक ॥ कै तुम आपा प्रकट करना, कै यहु रचले जीव उधरना ॥ 1 ॥ कै यहु तुम को सेवक जानैं, कै यहु रचले मन के मानैं ॥ 2 ॥ कै यहु तुम को सेवक भावै, कै यहु रचले खेल दिखावै ॥ 3 ॥ कै यहु तुम को खेल पियारा, कै यहु भावै कीन्ह पसारा ॥ 4 ॥ यहु सब दादू अकथ कहानी, कहि समझावो सारंग-पाणी ॥ 5 ॥ उत्तर की साखी दादू परमारथ को सब किया, आप स्वारथ नांहिं । (15-50) परमेश्वर परमारथी, कै साधू कलि मांहिं ॥ 1 ॥
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खालिक खेलै खेल कर, बूझै विरला कोइ। (21-37) लेकर सुखिया ना भया, देकर सुखिया होइ ॥ 2 ॥ 235. समर्थाई । झपताल हरे ! हरे !! सकल भुवन भरे, जुग जुग सब करे। जुग जुग सब धरे, अकल सकल जरे, हरे हरे ॥टेक॥ सकल भुवन छाजै, सकल भुवन राजै, सकल कहै। धरती अम्बर गहै, चंद सूर सुधि लहै, पवन प्रकट बहै ॥ 1 ॥ घट घट आप देवै, घट घट आप लेवै, मंडित माया। जहाँ तहाँ आप राया, जहाँ तहाँ आप छाया, अगम निगम पाया ॥ 2 ॥ रस मांही रस राता, रस मांहीं रस माता, अमृत पीया। नूर मांही नूर लीया, तेज मांही तेज कीया, दादू दर्श दीया ॥ 3 ॥ 236. परिचय उपदेश । चौताल पीव पीव, आदि अंत पीव । परसि परसि अंग संग, पीव तहाँ जीव ॥टेक॥ मन पवन भवन गवन, प्राण कँवल मांहि। निधि निवास विधि विलास, रात दिवस नांहि ॥ 1 ॥ सास वास आस पास, आत्म अंग लगाइ। ऐन बैन निरख नैन, गाइ गाइ रिझाइ ॥ 2 ॥ आदि तेज अंत तेज, सहजैं सहज आइ। आदि नूर अंत नूर, दादू बलि बलि जाइ ॥ 3 ॥ 237. (फारसी) चौताल नूर नूर अव्वल आखिर नूर । दायम कायम कायम दायम, हाजिर है भरपूर ॥टेक॥
श्री दादूवाणी-राग आसावरी 9 आसमान नूर, जमीं नूर, पाक परवरदिगार। आब नूर, बाद नूर, खूब खूबां यार ॥ 1 ॥ जाहिर बातिन, हाजिर नाजिर, दाना तूँ दीवान। अजब अजाइब, नूर दीदम, दादू है हैरान ॥ 2 ॥ २३८. रस । त्रिताल मैं अमली मतवाला माता, प्रेम मगन मेरा मन राता ॥ टेक ॥ अमी महारस भर भर पीवै, मन मतवाला जोगी जीवै ॥ 1 ॥ रहै निरन्तर गगन मंझारी, प्रेम पियाला सहज खुमारी ॥ 2 ॥ आसण अवधू अमृतधारा, जुग जुग जीवै पीवणहारा ॥ 3 ॥ दादू अमली इहि रस माते, राम रसायन पीवत छाके ॥ 4 ॥ २३९. निज उपदेश । त्रिताल सुख दुख संशय दूर किया, तब हम केवल राम लिया ॥ टेक ॥ सुख दुख दोऊ भ्रम बिचारा, इन सौं बंध्या है जग सारा ॥ 1 ॥ मेरी मेरा सुख के तांई, जाइ जन्म नर चेतै नांहीं ॥ 2 ॥ सुख के तांई झूठा बोलै, बांधे बंधन कबहूँ न खोलै ॥ 3 ॥ दादू सुख दुख संग न जाई, प्रेम प्रीति पीव सौं ल्यौ लाई ॥ 4 ॥ २४०. हैरान । वर्णभिन्न ताल कासौं कहूँ हो अगम हरि बाताँ, गगन धरणी दिवस नहिं राता ॥ टेक ॥ संग न साथी, गुरु नहिं चेला, आसन पास यों रहै अकेला ॥ 1 ॥ वेद न भेद, न करत विचारा, अवरण वरण सबन तैं न्यारा ॥ 2 ॥ प्राण न पिंड, रूप नहिं रेखा, सोइ तत्त सार नैन बिन देखा ॥ 3 ॥ जोग न भोग, मोह नहिं माया, दादू देख काल नहिं काया ॥ 4 ॥
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श्री दादूवाणी-राग आसावरी 9 241. गुरु ज्ञान । वर्ण भिन्न ताल मेरा गुरु ऐसा ज्ञान बतावै । काल न लागै, संशय भागै, ज्यों है त्यों समझावै ॥ टेक ॥ अमर गुरु के आसन रहिये, परम ज्योति तहँ लहिये । परम तेज सो दृढ़ कर गहिये, गहिये लहिये रहिये ॥ 1 ॥ मन पवना गहि आतम खेला, सहज शून्य घर मेला । अगम अगोचर आप अकेला, अकेला मेला खेला ॥ 2 ॥ धरती अम्बर चंद न सूरा, सकल निरंतर पूरा । शब्द अनाहद बाजहिं तूरा, तूरा पूरा सूरा ॥ 3 ॥ अविचल अमर अभय पद दाता, तहाँ निरंजन राता । ज्ञान गुरु ले दादू माता, माता राता दाता ॥ 4 ॥ 242. राज विद्याधर ताल मेरा गुरु आप अकेला खेलै । आपै देवै आपै लेवै, आपै द्वै कर मेलै ॥ टेक ॥ आपै आप उपावै माया, पंच तत्त्व कर काया । जीव जन्म ले जग में आया, आया काया माया ॥ 1 ॥ धरती अंबर महल उपाया, सब जग धंधै लाया । आपै अलख निरंजन राया, राया लाया पाया ॥ 2 ॥ चन्द सूर दोइ दीपक कीन्हा, रात दिवस कर लीन्हा । राजिक रिजक सबन को दीन्हा, दीन्हा लीन्हा कीन्हा ॥ 3 ॥ परम गुरु सो प्राण हमारा, सब सुख देवै सारा । दादू खेलै अनन्त अपारा, अपारा सारा हमारा ॥ 4 ॥ 243. हैरान । राज विद्याधर ताल थकित भयो मन कह्यो न जाई, सहज समाधि रह्यो ल्यौ लाई ॥ टेक ॥
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