सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
श्री दादूवाणी-राग आसावरी 9 आसमान नूर, जमीं नूर, पाक परवरदिगार। आब नूर, बाद नूर, खूब खूबां यार ॥ 1 ॥ जाहिर बातिन, हाजिर नाजिर, दाना तूँ दीवान। अजब अजाइब, नूर दीदम, दादू है हैरान ॥ 2 ॥ २३८. रस । त्रिताल मैं अमली मतवाला माता, प्रेम मगन मेरा मन राता ॥ टेक ॥ अमी महारस भर भर पीवै, मन मतवाला जोगी जीवै ॥ 1 ॥ रहै निरन्तर गगन मंझारी, प्रेम पियाला सहज खुमारी ॥ 2 ॥ आसण अवधू अमृतधारा, जुग जुग जीवै पीवणहारा ॥ 3 ॥ दादू अमली इहि रस माते, राम रसायन पीवत छाके ॥ 4 ॥ २३९. निज उपदेश । त्रिताल सुख दुख संशय दूर किया, तब हम केवल राम लिया ॥ टेक ॥ सुख दुख दोऊ भ्रम बिचारा, इन सौं बंध्या है जग सारा ॥ 1 ॥ मेरी मेरा सुख के तांई, जाइ जन्म नर चेतै नांहीं ॥ 2 ॥ सुख के तांई झूठा बोलै, बांधे बंधन कबहूँ न खोलै ॥ 3 ॥ दादू सुख दुख संग न जाई, प्रेम प्रीति पीव सौं ल्यौ लाई ॥ 4 ॥ २४०. हैरान । वर्णभिन्न ताल कासौं कहूँ हो अगम हरि बाताँ, गगन धरणी दिवस नहिं राता ॥ टेक ॥ संग न साथी, गुरु नहिं चेला, आसन पास यों रहै अकेला ॥ 1 ॥ वेद न भेद, न करत विचारा, अवरण वरण सबन तैं न्यारा ॥ 2 ॥ प्राण न पिंड, रूप नहिं रेखा, सोइ तत्त सार नैन बिन देखा ॥ 3 ॥ जोग न भोग, मोह नहिं माया, दादू देख काल नहिं काया ॥ 4 ॥
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श्री दादूवाणी-राग आसावरी 9 241. गुरु ज्ञान । वर्ण भिन्न ताल मेरा गुरु ऐसा ज्ञान बतावै । काल न लागै, संशय भागै, ज्यों है त्यों समझावै ॥ टेक ॥ अमर गुरु के आसन रहिये, परम ज्योति तहँ लहिये । परम तेज सो दृढ़ कर गहिये, गहिये लहिये रहिये ॥ 1 ॥ मन पवना गहि आतम खेला, सहज शून्य घर मेला । अगम अगोचर आप अकेला, अकेला मेला खेला ॥ 2 ॥ धरती अम्बर चंद न सूरा, सकल निरंतर पूरा । शब्द अनाहद बाजहिं तूरा, तूरा पूरा सूरा ॥ 3 ॥ अविचल अमर अभय पद दाता, तहाँ निरंजन राता । ज्ञान गुरु ले दादू माता, माता राता दाता ॥ 4 ॥ 242. राज विद्याधर ताल मेरा गुरु आप अकेला खेलै । आपै देवै आपै लेवै, आपै द्वै कर मेलै ॥ टेक ॥ आपै आप उपावै माया, पंच तत्त्व कर काया । जीव जन्म ले जग में आया, आया काया माया ॥ 1 ॥ धरती अंबर महल उपाया, सब जग धंधै लाया । आपै अलख निरंजन राया, राया लाया पाया ॥ 2 ॥ चन्द सूर दोइ दीपक कीन्हा, रात दिवस कर लीन्हा । राजिक रिजक सबन को दीन्हा, दीन्हा लीन्हा कीन्हा ॥ 3 ॥ परम गुरु सो प्राण हमारा, सब सुख देवै सारा । दादू खेलै अनन्त अपारा, अपारा सारा हमारा ॥ 4 ॥ 243. हैरान । राज विद्याधर ताल थकित भयो मन कह्यो न जाई, सहज समाधि रह्यो ल्यौ लाई ॥ टेक ॥
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श्री दादूवाणी-राग आसावरी 9 .................................................................................................................................... जे कुछ कहिये सोच विचारा, ज्ञान अगोचर अगम अपारा ॥ 1 ॥ साइर बूँद कैसे कर तोलै, आप अबोल कहा कहि बोलै ॥ 2 ॥ अनल पंखि परै पर दूर, ऐसे राम रह्या भरपूर ॥ 3 ॥ अब मन मेरा ऐसे रे भाई, दादू कहबा कहण न जाई ॥ 4 ॥ 244. मल्लिका मोद ताल अविगत की गति कोइ न लहै, सब अपना उनमान कहै ॥ टेक ॥ केते ब्रह्मा वेद विचारैं, केते पंडित पाठ पढ़ें। केते अनुभव आतम खोजैं, केते सुर नर नाम रटैं ॥ 1 ॥ केते ईश्वर आसन बैठे, केते जोगी ध्यान धरैं । केते मुनिवर मन को मारैं, केते ज्ञानी ज्ञान करैं ॥ 2 ॥ केते पीर केते पैगम्बर, केते पढ़ें कुराना । केते काजी केते मुल्लां, केते शेख शयाना ॥ 3 ॥ केते पारिख अन्त न पावैं, वार पार कछु नांहीं । दादू कीमत कोई न जानैं, केते आवैं जांहीं ॥ 4 ॥ 245. मल्लिका मोद ताल ए हौं बूझि रही पीव जैसा है, तैसा कोइ न कहै रे । अगम अगाध अपार अगोचर, सुधि बुधि कोइ न लहै रे ॥ टेक ॥ वार पार कोइ अन्त न पावै, आदि अन्त मधि नांही रे । खरे सयाने भये दिवाने, कैसा कहाँ रहै रे ॥ 1 ॥ ब्रह्मा विष्णु महेश्वर बूझै, केता कोई बतावै रे । शेख मुशायक पीर पैगम्बर, है कोइ अगह गहै रे ॥ 2 ॥ अम्बर धरती सूर ससि बूझै, बाव वर्ण सब सोधै रे । दादू चक्रित है हैराना, को है कर्म दहै रे ॥ 3 ॥ इति राग आसावरी सम्पूर्ण ॥ 9 ॥ पद 32 ॥
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राग सिन्दूरा अथ राग सिन्दूरा 10 (गायन समय रात्रि 12 से 3) 246. परिचय । झपताल हंस सरोवर तहाँ रमै, सुभर हरि जल नीर। प्राणी आप पखालिये, निर्मल सदा होइ शरीर ॥ टेक॥ मुक्ताहल मन मानिया, चुगैं हंस सुजान। मध्य निरंतर झूलिये, मधुर विमल रस पान ॥ 1 ॥ भँवर कमल रस वासना, रातो राम पीवंत। अरस परस आनन्द करैं, तहँ मन सदा होइ जीवंत ॥ 2 ॥ मीन मगन मांहीं रहैं, मुदित सरोवर मांहिं। सुख सागर क्रीड़ा करैं, पूरण परिमित नांहिं ॥ 3 ॥ निर्भय तहाँ भय को नहीं, विलसैं बारम्बार। दादू दर्शन कीजिये, सन्मुख सिरजनहार ॥ 4 ॥
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श्री दादूवाणी-राग सिन्दूरा 10 247. झपताल सुख सागर में झूलबो, कश्मल झड़ै हो अपार । निर्मल प्राणी होइबो, मिलिबो सिरजनहार ॥ टेक ॥ तिहिं संजम पावन सदा, पंक न लागै प्राण । कँवल बिगासे तिहि तणौं, उपजे ब्रह्म गियान ॥ 1 ॥ आगम निगम तहँ गम करै, तत्त्वैं तत्त्व मिलान । आसन गुरु के आइबो, मुक्तैं महल समान ॥ 2 ॥ प्राणी परि पूजा करै, पूरै प्रेम विलास । सहजैं सुन्दर सेविये, लागी लै कविलास ॥ 3 ॥ रैण दिवस दीसै नहीं, सहजैं पुंज प्रकास । दादू दर्शन देखिये, इहि रस रातो हो दास ॥ 4 ॥ 248. शूल ताल अविनाशी संग आत्मा, रमे हो रैण दिन राम । एक निरंतर ते भजे, हरि हरि प्राणी नाम ॥ टेक ॥ सदा अखंडित उर बसै, सो मन जाणी ले । सकल निरंतर पूरि सब, आतम रातो ते ॥ 1 ॥ निराधार निज बैसणों, जिहिं तत आसन पूर । गुरु सिख आनन्द ऊपजै, सन्मुख सदा हजूर ॥ 2 ॥ निश्चल ते चालै नहीं, प्राणी ते परिमाण । साथी साथैं ते रहें, जाणैं जाण सुजाण ॥ 3 ॥ ते निर्गुण आगुण धरी, मांहैं कौतुकहार । देह अछत अलगो रहै, दादू सेव अपार ॥ 4 ॥ 249. शूल ताल पारब्रह्म भज प्राणिया, अविगत एक अपार ।
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श्री दादूवाणी-राग सिन्दूरा 10 अविनाशी गुरु सेविये, सहजैं प्राण अधार ॥ टेक ॥ ते पुर प्राणी तेहनो, अविचल सदा रहंत । आदि पुरुष ते आपणों, पूरण परम अनंत ॥ 1 ॥ अविगत आसण कीजिये, आपैं आप निधान। निरालम्ब भजि तेहनों, आनंद आत्मराम ॥ 2 ॥ निर्गुण निश्चल थिर रहै, निराकार निज सोइ। ते सति प्राणी सेविये, लै समाधि रत होइ ॥ 3 ॥ अमर आप रमता रमै, घट घट सिरजनहार । गुणातीत भज प्राणिया, दादू येह विचार ॥ 4 ॥ 250. शूरतान झपताल क्यूं भाजै सेवक तेरा, ऐसा सिर साहिब मेरा ॥ टेक ॥ जाके धरती गगन आकाशा, जाके चंद सूर कविलाशा। जाके तेज पवन जल साजा, जाके पंच तत्त्व के बाजा ॥ 1 ॥ जाके अठारह भार वनमाला, गिरि पर्वत दीनदयाला। जाके सायर अनन्त तरंगा, जाके चौरासी लख संगा ॥ 2 ॥ जाके ऐसे लोक अनन्ता, रचि राखै विधि बहु भंता। जाके ऐसा खेल पसारा, सब देखै कौतुकहारा ॥ 3 ॥ जाके काल मीच डर नांहीं, सो बरत रह्या सब मांहीं। मन भावै खेलै खेला, ऐसा है आप अकेला ॥ 4 ॥ जाके ब्रह्मा ईश्वर बंदा, सब मुनिजन लागे अंगा। जाके साध सिद्ध सब मांहीं, परिपूरण परिमित नांहीं ॥ 5 ॥ सोई भानै घड़ै संवारै, जुग केते कबहुँ न हारै। ऐसा हरि साहिब पूरा, सब जीवनि आतम मूरा ॥ 6 ॥ सो सबहिन की सुधि जानै, जो जैसा तैसी बानै। सर्वंगी राम सयाना, हरि करै सो होइ निदाना ॥ 7 ॥
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श्री दादूवाणी-राग सिन्दूरा 10 जे हरि जन सेवक भाजै, तो ऐसा साहिब लाजै । अब मरण माँड हरि आगे, तो दादू बाण न लागे ॥ 8 ॥ 251. झपताल हरि भजतां किमि भाजिये, भाजे भल नांहीं । भाजे भल क्यूं पाइये, पछतावै मांहीं ॥ टेक ॥ सूरा सो सहजैं भिड़ै, सार उर झेलै । रण रोकै भाजै नहीं, ते बाण न मेलै ॥ 1 ॥ सती सत साचा गहै, मरणे न डराई । प्राण तजै जग देखतां, पियड़ो उर लाई ॥ 2 ॥ प्राण पतंगा यों तजै, वो अंग न मोड़ै । जौवन जारै ज्योति सूं, नैना भल जोड़ै ॥ 3 ॥ सेवक सो स्वामी भजै, तन मन तजि आसा । दादू दर्शन ते लहैं, सुख संगम पासा ॥ 4 ॥ 252. चेतावनी । रुद्र ताल सुन तूँ मना रे, मूरख मूढ़ विचार, आवै लहरि बिहावणी, दमै देह अपार ॥ टेक ॥ करिबो है तिमि कीजिये रे, सुमिर सो आधार ॥ 1 ॥ चरण बिहूणो चालबो रे, संभारी ले सार ॥ 2 ॥ दादू तेहज लीजिये रे, सांचो सिरजनहार ॥ 3 ॥ 253. (गुजराती) रुद्र । ताल रे मन साथी माहरा, तूनें समझायो कै बारो रे । रातो रंग कसुंभ के, तैं बिसार्यो आधारो रे ॥ टेक ॥ स्वप्ना सुख के कारणे, फिर पीछे दुख होई रे ।
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श्री दादूवाणी-राग सिन्दूरा 10 दीपक दृष्टि पतंग ज्यों, यों भ्रमि जले जनि कोई रे ॥ 1 ॥ जिह्वा स्वारथ आपने, ज्यूं मीन मरे तज नीरो रे। मांहैं जाल न जाणियो, तातैं उपनों दुःख शरीरो रे ॥ 2 ॥ स्वादैं ही संकट पर्यो देखत ही नर अंधो रे। मूरख मूठी छाड़ि दे, होइ रह्यो निर्बंधो रे ॥ 3 ॥ मान सिखावणि माहरी, तू हरि भज मूल न हारी रे। सुख सागर सोई सेविये, जन दादू राम सँभारी रे ॥ 4 ॥ इति राग सिन्दूरा सम्पूर्ण ॥ 10 ॥ पद 8 ॥
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अथ राग देवगांधार ११ (गायन समय प्रातः 6 से 9) 254. विनती अनन्य शरण । त्रिताल शरण तुम्हारी आइ परे । जहाँ तहाँ हम सब फिर आये, राखि राखि हम दुखित खरे ॥ टेक॥ कस कस काया तप व्रत कर कर, भ्रमत भ्रमत हम भूल परे । कहुँ शीतल कहुँ तप्त दहे तन, कहुँ हम करवत सीस धरे ॥ 1 ॥ कहुँ वन तीरथ फिर फिर थाके, कहुँ गिरि पर्वत जाइ चढ़े । कहुँ शिखर चढ़ परे धरणि पर, कहुँ हत आपा प्राण हरे ॥ 2 ॥ अंध भये हम, निकट न सूझै, ताथैं तुम्ह तज जाइ जरे । हा हा ! हरि अब दीन लीन कर, दादू बहु अपराध भरे ॥ 3 ॥
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श्री दादूवाणी-राग देवगांधार 11 255. पतिव्रत उपदेश । त्रिताल बौरी ! तूँ बार बार बौरानी। सखी ! सुहाग न पावै ऐसे, कैसे भरमि भुलानी ॥ टेक॥ चरणों चेरी चित नहिं राख्यो, पतिव्रत नांहि न जान्यो । सुन्दरि सेज संग नहिं जानै, पीव सौं मन नहिं मान्यो ॥ 1 ॥ तन मन सबै शरीर न सौंप्यो, शीश नाइ नहिं ठाढ़ी। इकरस प्रीति रही नहिं कबहुँ, प्रेम उमंग न बाढ़ी ॥ 2 ॥ प्रीतम अपनो परम सनेही, नैन निरख न अघानी। निशि-वास आनिउर अंतर, परम पूज्य नहिं जानी ॥ 3 ॥ पतिव्रत आगे जिन जिन पाल्यो, सुन्दरी तिन सब छाजै। दादू पीव बिन और न जानै, ताहि सुहाग विराजै ॥ 4 ॥ 256. उपदेश चेतावनी । रंग ताल मन मूरखा ! तैं योंही जन्म गँवायो, सांई केरी सेवा न कीन्हीं, इहि कलि काहे को आयो ॥ टेक॥ जिन बातन तेरो छूटिक नाँहीं, सोइ मन तेरे भायो। कामी ह्वै विषया संग लागो, रोम रोम लपटायो ॥ 1 ॥ कुछ इक चेति विचारि देखो, कहा पाप जीय लायो। दादू दास भजन करलीजे, स्वप्नै जगडहकायो ॥ 2 ॥ इति राग गूजरी (देवगांधार) सम्पूर्णः ॥ 11 ॥ पद 3 ॥
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अथ राग (कल्हेरौ) कालिंगड़ा 12 (गायन समय प्रभात 3 से 6) 257. (गुजराती) विनती। रंग ताल वाल्हा, हूँ ताहरी, तूँ माहरो नाथ । तुम सौं पहली प्रीतड़ी, पूरबलो साथ ॥ टेक ॥ वाल्हा मैं तूँ म्हारो ओलखियो रे, राखिस तूँनें हृदा मंझारि । हूँ पामूं पीव आपणों रे, त्रिभुवन दाता देव मुरारि ॥ 1 ॥ वाल्हा मन माहरो मन मांही राखिस, आत्म एक निरंजन देव । चित मांहैं चित सदा निरंतर, येणी पेरे तुम्हारी सेव ॥ 2 ॥ वाल्हा भाव भक्ति हरि भजन तुम्हारो, प्रेमें पूरि कँवल विगास। अभि-अंतर आनन्द अविनाशी, दादू नी एह्रैं पूरवी आस ॥ 3 ॥
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श्री दादूवाणी-राग कलिंगड़ा 12 258. (गुजराती) उपदेश चेतावनी। वर्ण भिन्नताल वारीवार कहूँ रे गहिला, राम राम कांइ विसाऱ्यो रे । जनम अमोलक पामियो, एह्वो रतन कांई हाऱ्यो रे ॥ टेक ॥ विषया बाह्यो नें तहँ धायो, कीधो नहिं मारो वाऱ्यो रे । माया धन जोई नें भूल्यो, सर्वस येणें हाऱ्यो रे ॥ 1 ॥ गर्भवास देह दमतो प्राणी, आश्रम तेह संभाऱ्यो रे । दादू रे जन राम भणीजे, नहिं तो जथा विधि हाऱ्यो रे ॥ 2 ॥ इति राग कालिंगडा सम्पूर्णः ॥ 12 ॥ 2 पद ॥
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राग परजिया www.dadooram.org अथ राग परजिया (परज) 13 (गायन समय रात्रि 3 से 6) 259. परिचय । खेमटा ताल नूर रह्या भरपूर, अमी रस पीजिये, रस मांही रस होइ, लाहा लीजिये ॥ टेक ॥ प्रकट तेज अनन्त, पार नहिं पाइये । झिलमिल झिलमिल होइ, तहाँ मन लाइये ॥ 1 ॥ सहजैं सदा प्रकाश, ज्योति जल पूरिया । तहाँ रहें निज दास, सेवक सूरिया ॥ 2 ॥ सुख सागर वार न पार, हमारा वास है । हंस रहें ता मांहिं, दादू दास है ॥ 3 ॥ इति राग परजिया सम्पूर्णः ॥ 13 ॥ पद 1 ॥
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राग भवानी www.dadooram.org अथ राग भांणमली (भवानी) 14 (गायन समय मध्यरात्रि, राग मंजरी मतानुसार) 260. (गुजराती) विनती । कौव्वाली ताल मारा वाल्हा रे ! तारे शरणि रहेश । बीनतड़ी वाल्हा नें कहतां, अनंत सुख लहेश ॥ टेक ॥ स्वामी तणों हूँ संग न मेलूं, बिनतड़ी कहेश । हूँ अबला तूँ बलवंत राजा, तारा बना वहेश ॥ 1 ॥ संग रहूँ तां सब सुख पामूं, अंतर थैं दहेश । दादू ऊपर दया करीनें, आवो एणढ़ वेश ॥ 2 ॥
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श्री दादूवाणी-राग भवानी 14
२६१. (गुजराती) जलद त्रिताल चरण देखाड़ तो प्रमाण । स्वामी माहरे नैणें निरखूं, मांगू येज मान ॥ टेक ॥ जोवूं तुझनें आशा मुझनें, लागूं येज ध्यान । वाहलो मारो मलो रे सहिये, आवे केवल ज्ञान ॥ 1 ॥ जेणी पेरें हूँ देखूं तुझने, मुझनें आलो जाण । पीव तणी हूँ पर नहिं जाणूं, दादू रे अजाण ॥ 2 ॥ २६२. (गुजराती) जलद त्रिताल ते हरि मलू मारो नाथ ! जोवा ने मारो तन तपे, केवी पेरें पामूं साथ ॥ टेक ॥ ते कारण हूँ आकुल व्याकुल, ऊभी करूं विलाप । स्वामी मारो नैणें निरखूं, ते तणों मनें ताप ॥ 1 ॥ एक वार घर आवे वाहला, नव मेलूं कर हाथ। ये वीनती सांभल स्वामी, दादू तारो दास ॥ 2 ॥ २६३. रंगताल ते केम पामिये रे, दुर्लभ जे आधार। ते बिना तारण को नहीं, केम उतरिये पार ॥ टेक ॥ केवी पेरें कीजे आपणो रे, तत्व ते छे सार । मन मनोरथ पूरे मारा, तन नो ताप निवार ॥ 1 ॥ संभान्यो आवे रे वाहला, वेला ये अवार। विरहणी विलाप करे, तेम दादू मन विचार ॥ 2 ॥ इति राग भांणमली सम्पूर्णः ॥ 14 ॥ पद 4 ॥
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राग सारंग अथ राग सारंग 15 (गायन समय मध्य दिन) 264. गुरु ज्ञान सूर । फख्ता ताल हो ऐसा ज्ञान ध्यान, गुरु बिना क्यों पावै । वार पार, पार वार, दुस्तर तिर आवै हो ।। टेक ।। भवन गवन, गवन भवन, मन ही मन लावै । रवन छवन, छवन रवन, सतगुरु समझावै हो ।। 1 ।। क्षीर नीर, नीर क्षीर, प्रेम भक्ति भावै । प्राण कँवल विकस विकस, गोविन्द गुण गावै हो ।। 2 ।। ज्योति जुगति बाट घाट, लै समाधि ध्यावै । परम नूर परम तेज, दादू दिखलावै हो ।। 3 ।।
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श्री दादूवाणी-राग सारंग 15 265. केवल विनती । पंजाबी त्रिताल तो निबहै जन सेवक तेरा, ऐसे दया कर साहिब मेरा ॥ टेक ॥ जो हम तोरैं, तो तूँ जोरै, हम तोरैं, पै तूँ नहिं तोरै ॥ 1 ॥ हम विसरैं, पै तूँ न विसारै, हम बिगरैं, पै तूँ न बिगारै ॥ 2 ॥ हम भूलैं, तूँ आन मिलावै, हम बिछुरैं, तूँ अंग लगावै ॥ 3 ॥ तुम्ह भावै सो हम पै नाँहीं, दादू दर्शन देहु गुसांईं ॥ 4 ॥ 266. काल चेतावनी । पंजाबी त्रिताल माया संसार की सब झूठी । मात पिता सब ऊभे भाई, तिनहिं देखतां लूटी ॥ टेक ॥ जब लग जीव काया में थारे, ख्रिण बैठी ख्रिण ऊठी । हंस जु था सो खेल गया रे, तब तैं संगति छूटी ॥ 1 ॥ ए दिन पूगे आयु घटानी, तब निचिन्त होइ सूती । दादू दास कहै ऐसी काया, जैसी गगरिया फूटी ॥ 2 ॥ 267. माया मध्य मुक्ति । त्रिताल ऐसे गृह में क्यों न रहै, मनसा वाचा राम कहै ॥ टेक ॥ संपति विपति नहीं मैं मेरा, हर्ष शोक दोउ नांही । राग द्वेष रहित सुख दुःख तैं, बैठा हरि पद मांही ॥ 1 ॥ तन धन माया मोह न बांधे, वैरी मीत न कोई । आपा पर सम रहै निरन्तर, निज जन सेवग सोई ॥ 2 ॥ सरवर कमल रहै जल जैसे, दधि मथ घृत कर लीन्हा। जैसे वन में रहे बटाऊ, काहू हेत न कीन्हा ॥ 3 ॥ भाव भक्ति रहै रस माता, प्रेम मगन गुण गावै । जीवत मुक्त होइ जन दादू, अमर अभय पद पावै ॥ 4 ॥
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श्री दादूवाणी-राग सारंग 15 २6४. परिचय उपदेश । त्रिताल चल-चल रे मन तहाँ जाइये । चरण बिन चालिबो, श्रवण बिन सुनिबो, बिन कर बैन बजाइये ॥ टेक ॥ तन नाहीं जहाँ, मन नाहीं तहँ, प्राण नहीं तहँ आइये । शब्द नहीं जहाँ, जीव नहीं तहँ, बिन रसना मुख गाइये ॥ 1 ॥ पवन पावक नहीं, धरणी अंबर नहीं, उभय नहीं तहँ लाइये । चन्द नहीं जहाँ, सूर नहीं तहँ, परम ज्योति सुख पाइये ॥ 2 ॥ तेज पुंज सो सुख का सागर, झिलमिल नूर नहाइये । तहँ चल दादू अगम अगोचर, तामैं सहज समाइये ॥ 3 ॥ इति राग सारंग सम्पूर्णः ॥ 15 ॥ पद 5 ॥
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अथ राग टोडी (तोडी) 16 (गायन समय दिन 6 से 12) 269. स्मरण उपदेश । राज मृगांक ताल सो तत सहजैं सुषमन कहणा, साँच पकड़ मन जुग जुग रहणा ।। टेक ।। प्रेम प्रीति कर नीका राखै, बारम्बार सहज नर भाषै ।। 1 ।। मुख हिरदै सो सहज संभारै, तिहि तत रहणा कदे न विसारै ।। 2 ।। अन्तर सोई नीका जाणै, निमिष न बिसरै ब्रह्म बखाणै ।। 3 ।। सोई सुजाण सुधा रस पीवै, दादू देखि जुग जुग जीवै ।। 4 ।। 270. नाम महिमा । राज मृंगाक ताल नाँव रे नाँव रे, नाँव रे नाँव रे,
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श्री दादूवाणी-राग टोडी(तोडी) 16 सकल शिरोमणि नाँव रे, मै बलिहारी जाँव रे ॥ टेक ॥ दुस्तर तारै, पार उतारै, नरक निवारै नाँव रे ॥ 1 ॥ तारणहारा, भवजल पारा, निरमल सारा नाँव रे ॥ 2 ॥ नूर दिखावै, तेज मिलावै, ज्योति जगावै नाँव रे ॥ 3 ॥ सब कुछ दाता, अमृत राता, दादू माता नाँव रे ॥ 4 ॥ 271. केवल विनती । राज विद्याधर ताल राइ रे राइ रे, सकल भुवनपति राइ रे, अमृत देहु अघाइ रे राइ ॥ टेक ॥ प्रगट राता, प्रगट माता, प्रगट नूर दिखाइ रेराइ ॥ 1 ॥ सुस्थिर ज्ञाना, सुस्थिर ध्याना, सुस्थिर तेज मिलाइ रेराइ ॥ 2 ॥ अविचल मेला, अविचल खेला, अविचल ज्योति समाइ रे राइ ॥ 3 ॥ निहचल बैना, निहचल नैना, दादू बलि बलि जाइ रे राइ ॥ 4 ॥ 272. रसिक अवस्था । सवारी ताल हरि रस माते मगन भये । सुमिर सुमिर भये मतवाले, जामण मरण सब भूल गये ॥ टेक ॥ निर्मल भक्ति प्रेम रस पीवैं, आन न दूजा भाव धरैं । सहजैं सदा राम रंग राते, मुक्ति वैकुंठैं कहा करैं ॥ 1 ॥ गाइ गाइ रस लीन भये हैं, कछू न मांगैं संत जना । और अनेक देहु दत्त आगै, आन न भावै राम बिना ॥ 2 ॥ इक टग ध्यान रहैं ल्यौ लागे, छाकि परे हरि रस पीवैं । दादू मगन रहैं रस माते, ऐसे हरि के जन जीवैं ॥ 3 ॥ 273. (गुजराती) केवल विनती । सवारी ताल ते मैं कीधेला राम ! जे तैं वाज्या ते ।
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