देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
| १५२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १६ |
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| शिष्योऽयं मम धर्मात्मा लोमहर्षणसम्भवः ।<br>पठिष्यति त्वया सार्धं पुराणीं संहितां शुभाम् ॥ ३८ | लोमहर्षणसे उत्पन्न मेरे शिष्य ये धर्मात्मा सूतजी भी तुम्हारे साथ इस शुभ पुराण-संहिताका अध्ययन करेंगे ॥ ३८ ॥ | | सूत उवाच<br>इत्युक्तं तेन पुत्राय मह्यं च कथितं किल ।<br>मया गृहीतं तत्सर्वं पुराणं चातिविस्तरम् ॥ ३९ | सूतजी बोले— हे मुनियो! व्यासजीने मुझसे और अपने पुत्रसे इस प्रकार कहा था, तब मैंने उस सम्पूर्ण विस्तृत पुराण-संहिताको विधिवत् पढ़ा था ॥ ३९ ॥ | | शुकोऽधीत्य पुराणं तु स्थितो व्यासाश्रमे शुभे ।<br>न लेभे शर्म धर्मात्मा ब्रह्मात्मज इवापरः ॥ ४० | उस समय भागवतपुराणका अध्ययन करके शुकदेवजी व्यासजीके पवित्र आश्रममें ही रहने लगे, परंतु दूसरे ब्रह्मापुत्र नारदकी भाँति उन धर्मात्माको वहाँ शान्ति न मिल सकी ॥ ४० ॥ | | एकान्तसेवी विकलः स शून्य इव लक्ष्यते ।<br>नात्यन्तभोजनासक्तो नोपवासरतस्तथा ॥ ४१ | एकान्तमें रहनेवाले तथा व्याकुलचित्त वे उदासीनकी भाँति दिखायी पड़ते थे। न वे अधिक भोजन करते थे और न उपवासपूर्वक ही रहते थे ॥ ४१ ॥ | | चिन्ताविष्टं शुकं दृष्ट्वा व्यासः प्राह सुतं प्रति ।<br>किं पुत्र चिन्त्यते नित्यं कस्माद्व्यग्रोऽसि मानद ॥ ४२ | इस प्रकार अपने पुत्र शुकदेवको चिन्तित देखकर व्यासजी बोले— हे पुत्र! तुम क्या चिन्ता करते रहते हो? हे मानद! तुम किसलिये व्याकुल रहते हो? | | आस्से ध्यानपरो नित्यमृणग्रस्त इवाधनः ।<br>का चिन्ता वर्तते पुत्र मयि ताते तु तिष्ठति ॥ ४३ | ऋणग्रस्त निर्धन व्यक्तिकी भाँति तुम सदा चिन्ता करते रहते हो। हे पुत्र! मुझ पिताके रहते तुम्हें किस बातकी चिन्ता हो रही है? ॥ ४२-४३ ॥ | | सुखं भुंक्ष्व यथाकामं मुञ्च शोकं मनोगतम् ।<br>ज्ञानं चिन्तय शास्त्रोक्तं विज्ञाने च मतिं कुरु ॥ ४४ | तुम मनकी ग्लानि छोड़ो; यथेष्टरूपसे सुखोपभोग करो, शास्त्रोक्त ज्ञानका चिन्तन करो और आत्मचिन्तनमें मन लगाओ ॥ ४४ ॥ | | न चेन्मनसि ते शान्तिर्वचसा मम सुव्रत ।<br>गच्छ त्वं मिथिलां पुत्र पालितां जनकेन ह ॥ ४५ | हे सुव्रत! यदि मेरे उपदेशसे तुम्हें शान्ति नहीं मिलती, तो राजा जनकके द्वारा पालित मिथिलापुरी चले जाओ। | | स ते मोहं महाभाग नाशयिष्यति भूपतिः ।<br>जनको नाम धर्मात्मा विदेहः सत्यसागरः ॥ ४६ | हे महाभाग! वे विदेह राजा जनक तुम्हारे मोहका नाश कर देंगे; क्योंकि वे सत्यसिन्धु तथा धर्मात्मा हैं ॥ ४५-४६ ॥ | | तं गत्वा नृपतिं पुत्र सन्देहं स्वं निवर्तय ।<br>वर्णाश्रमाणां धर्मांस्त्वं पृच्छ पुत्र यथातथम् ॥ ४७ | हे पुत्र! उन राजाके पास जाकर तुम अपना सन्देह दूर करो और वर्णाश्रम-धर्मके रहस्यको उनसे यथार्थरूपमें पूछो ॥ ४७ ॥ | | जीवन्मुक्तः स राजर्षिर्ब्रह्मज्ञानमतिः शुचिः ।<br>तथ्यवक्तातिशान्तश्च योगी योगप्रियः सदा ॥ ४८ | वे राजर्षि जीवन्मुक्त, ब्रह्मज्ञानका चिन्तन करनेवाले, पवित्र, यथार्थ वक्ता, शान्तचित्त तथा सदा योगप्रिय भी हैं ॥ ४८ ॥ | | सूत उवाच<br>तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य व्यासस्यामिततेजसः ।<br>प्रत्युवाच महातेजाः शुकश्चारणिसम्भवः ॥ ४९ | सूतजी बोले— परम तेजस्वी उन व्यासजीका वचन सुनकर अरणिसे उत्पन्न महातेजस्वी शुकदेवजीने उत्तर दिया। हे धर्मात्मन्! आपके द्वारा यह जो कहा |
| अ० १६ ] | प्रथम स्कन्ध | १५३ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| दम्भोऽयं किल धर्मात्मन्भाति चित्ते ममाधुना।<br>जीवन्मुक्तो विदेहश्च राज्यं शास्ति मुदान्वितः॥ ५०<br><br>वन्ध्यापुत्र इवाभाति राजासौ जनकः पितः।<br>कुर्वन् राज्यं विदेहः किं सन्देहोऽयं ममाद्भुतः॥ ५१ | जा रहा है, उससे मेरे चित्तमें शंका उठती है कि कहीं यह दम्भ तो नहीं। जीवन्मुक्त तथा विदेह होते हुए भी राजा जनक हर्षके साथ कैसे राज्य करते हैं? हे पिताजी! यह बात तो वैसे ही असम्भव है जैसे किसी वन्ध्याको पुत्र हो! अतः वे राजा जनक राज्य करते हुए भी विदेह कैसे हैं? यह मुझे अद्भुत सन्देह हो रहा है!॥४९–५१॥ |
| द्रष्टुमिच्छाम्यहं भूपं विदेहं नृपसत्तमम्।<br>कथं तिष्ठति संसारे पद्मपत्रमिवाम्भसि॥ ५२<br><br>सन्देहोऽयं महांस्तात विदेहे परिवर्तते।<br>मोक्षः किं वदतां श्रेष्ठ सौगतानामिवापरः॥ ५३ | अब मैं नृपश्रेष्ठ विदेह जनकको देखना चाहता हूँ कि वे जलमें कमलपत्रकी भाँति संसारमें कैसे रहते हैं? हे तात! उनके विदेह होनेके विषयमें मुझे बड़ा सन्देह हो रहा है! हे वक्ताओंमें श्रेष्ठ! सौगतोंकी भाँति वे भी मोक्षकी एक दूसरी परिभाषा तो नहीं हैं!॥ ५२–५३॥ |
| कथं भुक्तमभुक्तं स्यादकृतं च कृतं कथम्।<br>व्यवहारः कथं त्याज्य इन्द्रियाणां महामते॥ ५४ | हे महामते! भला भोगा हुआ भोग अभोग और किया हुआ कर्म अकर्म कैसे हो सकता है? इन्द्रियोंका सहज व्यवहार कैसे छोड़ा जा सकता है?॥ ५४॥ |
| माता पुत्रस्तथा भार्या भगिनी कुलटा तथा।<br>भेदाभेदः कथं न स्याद्यद्येतन्मुक्तता कथम्॥ ५५ | एक पुत्रका अपनी माता, पत्नी, बहन तथा किसी असती स्त्रीके साथ भेद-अभेदका सम्बन्ध क्यों नहीं होगा? और ऐसा होनेपर जीवन्मुक्तता कैसी?॥ ५५॥ |
| कटु क्षारं तथा तीक्ष्णं कषायं मिष्टमेव च।<br>रसना यदि जानाति भुंक्ते भोगाननुत्तमान्॥ ५६<br><br>शीतोष्णसुखदुःखादिपरिज्ञानं यदा भवेत्।<br>मुक्तता कीदृशी तात सन्देहोऽयं ममाद्भुतः॥ ५७ | यदि जिह्वा कटु, क्षार, तीक्ष्ण, कषाय, मधुर आदि स्वादोंको जानती है तो वे अच्छे-अच्छे पदार्थोंका रसास्वादन करते ही होंगे। यदि शीत, उष्ण, सुख-दुःखका परिज्ञान उन्हें होता होगा तो भला यह मुक्तता कैसी? हे तात! मुझे यह अद्भुत सन्देह हो रहा है!॥ ५६–५७॥ |
| शत्रुमित्रपरिज्ञानं वैरं प्रीतिकरं सदा।<br>व्यवहारे परे तिष्ठन्कथं न कुरुते नृपः॥ ५८<br><br>चौरं वा तापसं वापि समानं मन्यते कथम्।<br>असमा यदि बुद्धिः स्यान्मुक्तता तर्हि कीदृशी॥ ५९ | शत्रु और मित्रको पहचानकर उनके साथ वैर अथवा प्रीतिका व्यवहार किया जाता है, तो राज्यसिंहासनपर बैठे हुए राजा जनक शत्रुता या मित्रताका व्यवहार क्या नहीं रखते होंगे? उनके राज्यमें साधु और चोर समान कैसे समझे जाते हैं? यदि उनके प्रति समान बुद्धि नहीं है, तब भला वह जीवन्मुक्तता कैसी?॥ ५८–५९॥ |
| दृष्टपूर्वो न मे कश्चिज्जीवन्मुक्तश्च भूपतिः।<br>शङ्केयं महती तात गृहे मुक्तः कथं नृपः॥ ६० | ऐसा जीवन्मुक्त कोई राजा मेरे द्वारा पहले देखा नहीं गया। हे तात! यह बहुत बड़ी शंका है कि वे राजा जनक घरमें रहकर भी मुक्त कैसे हैं? उन |
| १५४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १७ |
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| दिदृक्षा महती जाता श्रुत्वा तं भूपतिं तथा।<br>सन्देहविनिवृत्त्यर्थं गच्छामि मिथिलां प्रति॥ ६१ | राजाके विषयमें सुनकर उन्हें देखनेकी बड़ी लालसा उत्पन्न हो गयी है। अतः सन्देह-निवृत्तिके लिये मैं मिथिलापुरी जा रहा हूँ॥ ६०-६१॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां प्रथमस्कन्धे शुकं प्रति व्यासोपदेशवर्णनं नाम षोडशोऽध्यायः॥ १६॥
<p align="center">~~~*~~~</p>अथ सप्तदशोऽध्यायः
शुकदेवजीका राजा जनकसे मिलनेके लिये मिथिलापुरीको प्रस्थान तथा राजभवनमें प्रवेश
| सूत उवाच | सूतजी बोले— |
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| इत्युक्त्वा पितरं पुत्रः पादयोः पतितः शुकः।<br>बद्धाञ्जलिरुवाचेदं गन्तुकामो महामनाः॥ १<br><br>आपृच्छे त्वां महाभाग ग्राह्यं ते वचनं मया।<br>विदेहान्द्रष्टुमिच्छामि पालिताञ्जनकेन तु॥ २ | [हे मुनियो!] पितासे यह कहकर महात्मा पुत्र शुकदेवजी उनके चरणोंपर गिर पड़े तथा हाथ जोड़कर चलनेकी इच्छासे बोले—हे महाभाग! अब आपसे आज्ञा चाहता हूँ। मुझे आपका वचन स्वीकार्य है। अतः मैं महाराज जनकद्वारा पालित मिथिलापुरी देखना चाहता हूँ॥ १-२॥ |
| विना दण्डं कथं राज्यं करोति जनकः किल।<br>धर्मे न वर्तते लोको दण्डश्चेन्न भवेद्यदि॥ ३ | राजा जनक दण्ड दिये बिना ही कैसे राज्य चलाते हैं? क्योंकि यदि दण्डका भय प्रजाओंको न हो तो लोग धर्मका पालन नहीं करेंगे॥ ३॥ |
| धर्मस्य कारणं दण्डो मन्वादिप्रहितः सदा।<br>स कथं वर्तते तात संशयोऽयं महान्मम॥ ४<br><br>मम माता त्वियं वन्ध्या तद्वद्भाति विचेष्टितम्।<br>पृच्छामि त्वां महाभाग गच्छामि च परन्तप॥ ५ | मनु आदिके द्वारा धर्माचरणका मूल कारण सदा दण्ड-विधान ही कहा गया है। इस राजधर्मका निर्वाह बिना दण्डके कैसे हो सकेगा? हे पिताजी! इस विषयमें मुझे महान् सन्देह है। हे महाभाग! यह बात वैसी ही अनर्गल प्रतीत होती है, जैसे कोई कहे कि मेरी यह माता वन्ध्या है। हे परन्तप! अब मैं आपसे अनुमति लेता हूँ और यहाँसे जा रहा हूँ॥ ४-५॥ |
| सूत उवाच<br>तं दृष्ट्वा गन्तुकामं च शुकं सत्यवतीसुतः।<br>आलिङ्ग्योवाच पुत्रं तं ज्ञानिनं निःस्पृहं दृढम्॥ ६ | **सूतजी बोले—**इस प्रकार शुकदेवजीको जनकपुर जानेका इच्छुक देखकर व्यासजीने अपने ज्ञानी एवं निःस्पृह पुत्रका दृढ़ आलिंगन करके कहा— ॥ ६॥ |
| व्यास उवाच<br>स्वस्त्यस्तु शुक दीर्घायुर्भव पुत्र महामते।<br>सत्यां वाचं प्रदत्त्वा मे गच्छ तात यथासुखम्॥ ७<br><br>आगन्तव्यं पुनर्गत्वा ममाश्रममनुत्तमम्।<br>न कुत्रापि च गन्तव्यं त्वया पुत्र कथञ्चन॥ ८ | **व्यासजी बोले—**हे महामते! हे पुत्र! तुम्हारा कल्याण हो, हे शुक! तुम दीर्घायु होओ। हे तात! तुम मुझे यह सत्य वचन देकर सुखपूर्वक जाओ कि यहाँसे जाकर मेरे इस उत्तम आश्रममें पुनः आओगे। हे पुत्र! तुम वहाँसे कहीं और कभी भी मत चले जाना॥ ७-८॥ |
| सुखं जीवामि पुत्राहं दृष्ट्वा ते मुखपङ्कजम्।<br>अपश्यन्दुःखमाप्नोमि प्राणस्त्वमसि मे सुत॥ ९ | हे पुत्र! मैं तुम्हारा मुखकमल देखकर ही सुखपूर्वक जीता हूँ और तुम्हें न देखनेपर दुःखी रहता हूँ। हे सुत! तुम्हीं मेरे प्राण हो॥ ९॥ |
| अ० १७ ] | प्रथम स्कन्ध | १५५ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| दृष्ट्वा त्वं जनकं पुत्र सन्देहं विनिवर्त्य च।<br>अत्रागत्य सुखं तिष्ठ वेदाध्ययनतत्परः ॥ १० | हे पुत्र! वहाँ राजर्षि जनकसे मिलकर और अपना सन्देह दूर करके फिर उसके बाद यहाँ आकर वेदाध्ययनमें रत रहते हुए सुखपूर्वक रहो ॥ १० ॥ |
| सूत उवाच<br>इत्युक्तः सोऽभिवाद्यार्थं कृत्वा चैव प्रदक्षिणाम्।<br>चलितस्तरसातीव धनुर्मुक्तः शरो यथा ॥ ११ | **सूतजी बोले—**व्यासजीके ऐसा कहनेपर शुकदेवजी अपने पिताको प्रणाम तथा उनकी प्रदक्षिणा करके शीघ्र ही इस प्रकार चल पड़े जैसे धनुषसे छूटा हुआ बाण ॥ ११ ॥ |
| सम्पश्यन्विविधान्देशाँल्लोकांश्च वित्तधर्मिणः।<br>वनानि पादपांश्चैव क्षेत्राणि फलितानि च ॥ १२<br><br>तापसांस्तप्यमानांश्च याजकान्दीक्षयान्वितान्।<br>योगाभ्यासरतान्योगिवानप्रस्थान्वनौकसः ॥ १३<br><br>शैवान्पाशुपतांश्चैव सौराञ्छाक्तांश्च वैष्णवान्।<br>वीक्ष्य नानाविधान्धर्माञ्जगामातिस्मयन्मुनिः ॥ १४ | मार्गमें चलते हुए अनेक समृद्धिशाली देशों, नागरिकों, वनों, वृक्षों, फले-फूले खेतों, तप करते हुए तपस्वीजनों, दीक्षा लिये हुए याजकजनों, योगाभ्यासमें तत्पर योगीजनौं, वनमें रहनेवाले वानप्रस्थों, वैष्णव, पाशुपत, शैव, शाक्त एवं सूर्योपासक और अनेक धर्मा-वलम्बियोंको देखकर वे शुकदेवमुनि अति विस्मयमें पड़ गये ॥ १२—१४ ॥ |
| वर्षद्वयेन मेरुं च समुल्लङ्घ्य महामतिः।<br>हिमाचलं च वर्षेण जगाम मिथिलां प्रति ॥ १५ | इस प्रकार वे महामति शुकदेवजी लगभग दो वर्षोमें मेरुपर्वत और एक वर्षमें हिमालयको पार करके मिथिला-देशमें पहुँचे ॥ १५ ॥ |
| प्रविष्टो मिथिलां मध्ये पश्यन्सर्वर्द्धिमृत्तमाम्।<br>प्रजाश्च सुखिताः सर्वाः सदाचाराः सुसंस्थिताः ॥ १६ | जब वे मिथिलामें प्रविष्ट हुए, तब उन्होंने वहाँकी श्रेष्ठ ऐश्वर्यसम्पदाको देखा तथा वहाँकी सारी प्रजाको सुखी एवं सदाचारसम्पन्न देखा ॥ १६ ॥ |
| क्षत्रा निवारितस्तत्र कस्त्वमत्र समागतः।<br>किं ते कार्यं वदस्वेति पृष्टस्तेन न चाब्रवीत् ॥ १७<br><br>निःसृत्य नगरद्वारात्स्थितः स्थाणुरिवाचलः।<br>विस्मितोऽतिहसंस्तस्थौ वचो नोवाच किञ्चन ॥ १८ | वहाँ द्वारपालने उन्हें रोका और पूछा—तुम कौन हो और कहाँसे आये हो, तुम्हारा क्या कार्य है; बताओ। ऐसा पूछनेपर भी शुकदेवजी मौन रहे, कुछ बोले नहीं। वे नगरद्वारसे बाहर जाकर स्थाणुकी तरह खड़े हो गये और थोड़ी देरमें आश्चर्यचकित होकर हँसते हुए वहीं स्थित हो गये, पर किसीसे कुछ बोले नहीं ॥ १७-१८ ॥ |
| प्रतीहार उवाच<br>ब्रूहि मूकोऽसि किं ब्रह्मन्किमर्थं त्वमिहागतः।<br>चलनं च विना कार्यं न भवेदिति मे मतिः ॥ १९ | **द्वारपालने पूछा—**हे ब्रह्मन्! बोलिये, आप गूँगे तो नहीं हैं। आपका किस हेतु यहाँ आना हुआ है? मेरे विचारमें तो कोई कहीं भी निष्प्रयोजन नहीं जाता ॥ १९ ॥ |
| राजाज्ञया प्रवेष्टव्यं नगरेऽस्मिन्सदा द्विज।<br>अज्ञातकुलशीलस्य प्रवेशो नात्र सर्वथा ॥ २० | हे विप्र! इस नगरमें राजाकी आज्ञा पाकर ही कोई प्रवेश कर सकता है। अज्ञात कुल तथा शीलवाले व्यक्तिका प्रवेश यहाँ कदापि नहीं होता है ॥ २० ॥ |
| तेजस्वी भासि नूनं त्वं ब्राह्मणो वेदवित्तमः।<br>कुलं कार्यं च मे ब्रूहि यथेष्टं गच्छ मानद ॥ २१ | हे मानद! आप निश्चय ही तेजस्वी एवं वेदवेत्ता ब्राह्मण प्रतीत हो रहे हैं। इसलिये आप अपने कुल तथा प्रयोजनके विषयमें मुझे बता दें और फिर अपने इच्छानुसार चले जायें ॥ २१ ॥ |
| १५६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १७ |
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| शुक उवाच<br>यदर्थमागतोऽस्म्यत्र तत्प्राप्तं वचनात्तव।<br>विदेहनगरं द्रष्टुं प्रवेशो यत्र दुर्लभः॥ २२ | **शुकदेवजी बोले—**मैं जिस कार्यके लिये यहाँ आया था, वह तुम्हारे कथनमात्रसे ही पूरा हो गया। मैं विदेहनगर देखने आया था, परंतु यहाँ तो प्रवेश ही दुर्लभ है॥ २२॥ |
| मोहोऽयं मम दुर्बुद्धेः समुल्लङ्घ्य गिरिद्वयम्।<br>राजानं द्रष्टुकामोऽहं पर्यटन्समुपागतः॥ २३ | मुझ अज्ञानीकी यह भूल थी, जो दो पर्वतोंको लाँघकर महाराजसे मिलनेकी इच्छासे घूमते हुए यहाँ चला आया॥ २३॥ |
| वञ्चितोऽहं स्वयं पित्रा दूषणं कस्य दीयते।<br>भ्रामितोऽहं महाभाग कर्मणा वा महीतले॥ २४ | मैं तो स्वयं अपने पिताद्वारा ही ठगा गया हूँ। इसमें किसी अन्यको ही क्या दोष दिया जाय? अथवा हे महाभाग! यह मेरे दुर्भाग्यका ही दोष है, जिसके कारण इस भूमिपर मुझे इतना चक्कर काटना पड़ा॥ २४॥ |
| धनाशा पुरुषस्येह परिभ्रमणकारणम्।<br>सा मे नास्ति तथाप्यत्र सम्प्राप्तोऽस्मि भ्रमात्किल॥ २५ | इस संसारमें लोगोंका भ्रमण करनेका उद्देश्य धनोपार्जन ही है, किंतु मुझे उसकी कोई इच्छा नहीं है। मैं तो केवल भ्रमवश ही यहाँ आ गया हूँ॥ २५॥ |
| निराशस्य सुखं नित्यं यदि मोहे न मज्जति।<br>निराशोऽहं महाभाग मग्नोऽस्मिन्मोहसागरे॥ २६ | आशारहित पुरुषको ही सर्वदा सुख प्राप्त होता है, यदि वह मोहमें न पड़े। किंतु हे महाभाग! मैं तो निराश होकर भी, न जानें क्यों इस मोहसागरमें निमग्न हो रहा हूँ!॥ २६॥ |
| क्व मेरुर्मिथिला क्वेयं पद्भ्यां च समुपागतः।<br>परिश्रमफलं किं मे वञ्चितो विधिना किल॥ २७ | कहाँ सुमेरुपर्वत और कहाँ यह मिथिलापुरी! पैदल ही चलकर मैं यहाँ आया हूँ। इस परिश्रमका फल मुझे क्या मिला? प्रारब्धने ही मुझे ठगा है। |
| प्रारब्धं किल भोक्तव्यं शुभं वाप्यथवाशुभम्।<br>उद्यमस्तद्वशे नित्यं कारयत्येव सर्वथा॥ २८ | प्रारब्धका भोग अवश्य ही भोगना पड़ता है, चाहे वह शुभ हो या अशुभ। उद्योग भी तो सदा उसी दैवके अधीन ही रहता है; वह जैसा चाहे वैसा कराता है॥ २७-२८॥ |
| न तीर्थं न च वेदोऽत्र यदर्थमिह मे श्रमः।<br>अप्रवेशः पुरे जातो विदेहो नाम भूपतिः॥ २९ | यहाँ न कोई तीर्थ है न ज्ञानप्राप्ति होनी है, जिसके लिये यह मेरा परिश्रम हुआ। मैं तो महाराज जनकका ‘विदेह’ नाम सुनकर उत्सुकतासे यहाँ आया था, किंतु उनके नगरमें तो प्रवेश करना भी निषिद्ध है॥ २९॥ |
| इत्युक्त्वा विररामाशु मौनीभूत इव स्थितः।<br>ज्ञातो हि प्रतिहारेण ज्ञानी कश्चिद् द्विजोत्तमः॥ ३०<br><br>सामपूर्वमुवाचासौ तं क्षत्ता संस्थितं मुनिम्।<br>गच्छ भो यत्र ते कार्यं यथेष्टं द्विजसत्तम॥ ३१ | इतना कहकर शुकदेवजी चुप हो गये और मौन होकर खड़े रहे। द्वारपालको लगा कि ये कोई ज्ञानी श्रेष्ठ ब्राह्मण हैं। तब उसने वहाँ खड़े मुनिसे शान्तिपूर्वक निवेदन किया—हे द्विजश्रेष्ठ! आपका जहाँ कार्य हो, वहाँ यथेष्ट चले जाइये॥ ३०-३१॥ |
अ० १७] प्रथम स्कन्ध १५७
अ० १७] प्रथम स्कन्ध १५७
| अपराधो मम ब्रह्मन्नन्निवारितवानहम्।<br>तत्क्षन्तव्यं महाभाग विमुक्तानां क्षमा बलम्॥ ३२ | हे ब्रह्मन्! मैंने जो आपको रोका था, वह मेरा अपराध हुआ। उसके लिये आप क्षमा करें; क्योंकि हे महाभाग! मुक्तजनोंका तो क्षमा ही बल है॥ ३२॥ |
| शुक उवाच<br>किं तेऽत्र दूषणं क्षत्तः परतन्त्रोऽसि सर्वदा।<br>प्रभुकार्यं प्रकर्तव्यं सेवकेन यथोचितम्॥ ३३<br>न भूपदूषणं चात्र यदहं रक्षितस्त्वया।<br>चोरशत्रुपरिज्ञानं कर्तव्यं सर्वथा बुधैः॥ ३४ | **शुकदेवजी बोले—**हे द्वारपाल! इसमें तुम्हारा क्या दोष है; तुम तो सर्वदा पराधीन हो। सेवकको तो स्वामीकी आज्ञाका यथोचित पालन करना ही चाहिये। तुमने मुझे जो रोका इसमें राजाका भी कोई दोष नहीं है; क्योंकि बुद्धिमानोंको चोर और शत्रुओंका सम्यक् ज्ञान रखना चाहिये॥ ३३-३४॥ |
| ममैव सर्वथा दोषो यदहं समुपागतः।<br>गमनं परगेहे यल्लघुतायाश्च कारणम्॥ ३५ | यह सर्वथा मेरा ही दोष है, जो मैं यहाँ आ गया। [बिना बुलाये] दूसरेके घर जाना लघुताका कारण होता है॥ ३५॥ |
| प्रतीहार उवाच<br>किं सुखं द्विज किं दुःखं किं कार्यं शुभमिच्छता।<br>कः शत्रुहितकर्ता को ब्रूहि सर्वं ममाद्य वै॥ ३६ | **द्वारपालने कहा—**हे विप्र! सुख क्या है, दुःख क्या है, कल्याण चाहनेवाले पुरुषका क्या कर्तव्य है? शत्रु कौन है और मित्र कौन है? आप मुझे यह सब बताइये॥ ३६॥ |
| शुक उवाच<br>द्वैविध्यं सर्वलोकेषु सर्वत्र द्विविधो जनः।<br>रागी चैव विरागी च तयोश्चित्तं द्विधा पुनः॥ ३७<br>विरागी त्रिविधः कामं ज्ञातोऽज्ञातश्च मध्यमः।<br>रागी च द्विविधः प्रोक्तो मूर्खश्च चतुरस्तथा॥ ३८<br>चातुर्यं द्विविधं प्रोक्तं शास्त्रजं मतिजं तथा।<br>मतिस्तु द्विविधा लोके युक्तायुक्तेति सर्वथा॥ ३९ | **शुकदेवजी बोले—**सभी लोकोंमें सर्वत्र द्वैविध्य रहता है। इसलिये मनुष्य भी दो प्रकारके हैं—एक रागी और दूसरा विरागी। उन दोनोंके मन भी दो प्रकारके होते हैं। उनमें भी विरागी तीन प्रकारके होते हैं—ज्ञात, अज्ञात एवं मध्यम। रागी भी दो प्रकारके कहे गये हैं—मूर्ख तथा चतुर। चातुर्य भी दो प्रकारका कहा गया है—शास्त्रजनित तथा बुद्धिजनित। इसी प्रकार लोकमें बुद्धि भी युक्त और अयुक्त-भेदसे दो प्रकारकी होती है॥ ३७–३९॥ |
| प्रतीहार उवाच<br>यदुक्तं भवता विद्वन्नार्थज्ञोऽहं द्विजोत्तम।<br>तत्सर्वं विस्तरेणाद्य यथार्थं वद सत्तम॥ ४० | **द्वारपालने कहा—**हे विद्वन्! हे विप्रवर! आपने जो कुछ कहा है, उसे मैं भलीभाँति नहीं समझ पाया। अतएव हे श्रेष्ठ! आप फिरसे विस्तारपूर्वक इस विषयको यथार्थरूपसे समझाइये॥ ४०॥ |
| शुक उवाच<br>रागो यस्यास्ति संसारे स रागीत्युच्यते ध्रुवम्।<br>दुःखं बहुविधं तस्य सुखं च विविधं पुनः॥ ४१ | **शुकदेवजी बोले—**इस संसारमें जिसको राग है, वह निश्चय ही रागी कहलाता है। उस रागीको अनेक प्रकारके सुख एवं दुःख आते ही रहते हैं॥ ४१॥ |
| धनं प्राप्य सुतान्दारान्मानं च विजयं तथा।<br>तदप्राप्य महद्दुःखं भवत्येव क्षणे क्षणे॥ ४२ | धन, पुत्र, कलत्र, मान-प्रतिष्ठा और विजय प्राप्त करके ही सुख प्राप्त होता है। इनके न मिलनेपर प्रतिक्षण महान् दुःख होता ही है॥ ४२॥ |
| १५८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १७ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| कार्यस्तस्य सुखोपायः कर्तव्यं सुखसाधनम्।<br>तस्यारातिः स विज्ञेयः सुखविघ्नं करोति यः॥ ४३<br><br>सुखोत्पादयिता मित्रं रागयुक्तस्य सर्वदा।<br>चतुरो नैव मुह्येत मूर्खः सर्वत्र मुह्यति॥ ४४ | अतः जैसे सुख प्राप्त हो सके, वैसा उपाय करना चाहिये और सुखके साधनका संग्रह करना चाहिये। जो उस सुखमें विघ्न डाले, उसे शत्रु समझना चाहिये। जो रागी पुरुषके सुखको सर्वदा बढ़ाये, वही मित्र है। चतुर मनुष्य मोहमें फँसता नहीं है; किंतु मूर्ख सर्वत्र आसक्त रहता है॥ ४३-४४॥ |
| विरक्तस्यात्मरक्तस्य सुखमेकान्तसेवनम्।<br>आत्मानुचिन्तनं चैव वेदान्तस्य च चिन्तनम्॥ ४५<br><br>दुःखं तदेतत्सर्वं हि संसारकथनादिकम्।<br>शत्रवो बहवस्तस्य विज्ञस्य शुभमिच्छतः॥ ४६<br><br>कामः क्रोधः प्रमादश्च शत्रवो विविधाः स्मृताः।<br>बन्धुः सन्तोष एवास्य नान्योऽस्ति भुवनत्रये॥ ४७ | विरागी तथा आत्माराम पुरुषको एकान्तवास, आत्म-चिन्तन तथा वेदान्तशास्त्रका अनुशीलन करनेसे ही सुख होता है। सांसारिक विषयोंकी चर्चा आदि—यह सब उनके लिये दुःखरूप है। कल्याण चाहनेवाले विद्वान् पुरुषके लिये बहुत शत्रु हैं; काम, क्रोध, प्रमाद आदि अनेक प्रकारके शत्रु बताये गये हैं; किंतु व्यक्तिका सच्चा बन्धु तो एकमात्र सन्तोष ही है; तीनों लोकोंमें दूसरा कोई भी नहीं है॥ ४५-४७॥ |
| सूत उवाच<br>तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य मत्वा तं ज्ञानिनं द्विजम्।<br>क्षत्ता प्रवेशयामास कक्षां चातिमनोरमाम्॥ ४८ | **सूतजी बोले—**शुकदेवजीकी बात सुनकर उन्हें ज्ञानी द्विज समझकर उसने शुकदेवजीको एक अत्यन्त रमणीय कक्षसे प्रवेश कराया॥ ४८॥ |
| नगरं वीक्षमाणः संस्त्रैविध्यजनसङ्कुलम्।<br>नानाविपणिद्रव्याढ्यं क्रयविक्रयकारकम्॥ ४९<br><br>रागद्वेषयुतं कामलोभमोहाकुलं तथा।<br>विवदत्सजनाकीर्णं वसुपूर्णं महत्तरम्॥ ५०<br><br>पश्यन्स त्रिविधाँल्लोकान्प्रासरद् राजमन्दिरम्।<br>प्राप्तः परमतेजस्वी द्वितीय इव भास्करः॥ ५१<br><br>निवारितश्च तत्रैव प्रतीहारेण काष्ठवत्।<br>तत्रैव च स्थितो द्वारि मोक्षमेवानुचिन्तयन्॥ ५२ | तीन प्रकारके नागरिकजनोंसे भरे हुए; अनेक प्रकारके क्रय-विक्रयकी वस्तुओंसे सजी दूकानोंवाले; राग-द्वेष, काम, लोभ, मोहसे युक्त एवं परस्पर वाद-विवादमें संलग्न श्रेष्ठीजनोंसे सुशोभित और धन-धान्यसे परिपूर्ण विशाल नगरको देखते हुए शुकदेवजी चले। इस तरह तीन प्रकारके लोगोंको देखते हुए शुकदेवजी राजभवनकी ओर बढ़े। इस प्रकार द्वितीय सूर्यके समान परम तेजस्वी शुकदेवजी द्वारपर पहुँचे; द्वारपालने उन्हें अन्दर जानेसे रोका। तब वे काष्ठके समान वहीं द्वारपर खड़े हो गये और मोक्षसम्बन्धी विषयपर विचार करने लगे॥ ४९-५२॥ |
| छायायामातपे चैव समदर्शी महातपाः।<br>ध्यानं कृत्वा तथैकान्ते स्थितः स्थाणुरिवाचलः॥ ५३ | धूप तथा छायाको समान-समझनेवाले महातपस्वी शुकदेवजी वहाँ एकान्तमें ध्यान करके इस प्रकार खड़े रहे मानो कोई अचल स्तम्भ हो॥ ५३॥ |
| तं मुहूर्तादुपागत्य राज्ञोऽमात्यः कृताञ्जलिः।<br>प्रावेशयत्ततः कक्षां द्वितीयां राजवेश्मनः॥ ५४ | थोड़ी देर बाद राजमन्त्रीने हाथ जोड़े हुए स्वयं आकर उन्हें राजभवनके दूसरे कक्षमें प्रवेश कराया॥ ५४॥ |
| अ० १७ ] | प्रथम स्कन्ध | १५९ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तत्र दिव्यं मनोरम्यं पुष्पितं दिव्यपादपम्।<br>तद्वनं दर्शयित्वा तु कृत्वा चातिथिसत्क्रियाम्॥ ५५<br><br>वारमुख्याः स्त्रियस्तत्र राजसेवापरायणाः।<br>गीतवादित्रकुशलाः कामशास्त्रविशारदाः॥ ५६<br><br>ता आदिश्य च सेवार्थं शुकस्य मन्त्रिसत्तमः।<br>निर्गतः सदनात्तस्माद्व्यासपुत्रः स्थितस्तदा॥ ५७<br><br>पूजितः परया भक्त्या ताभिः स्त्रीभिर्यथाविधि।<br>देशकालोपपन्नेन नानानेनाति तोषितः॥ ५८ | वहाँ एक दिव्य रमणीय उपवन था, जिसमें विविध प्रकारके पुष्पोंसे लदे दिव्य वृक्ष सुशोभित हो रहे थे। उस वनको दिखाकर मन्त्रीने उनका यथोचित आतिथ्य सत्कार किया। वहाँ राजाकी सेवा करनेवाली अनेक वारांगनाएँ थीं, वे नृत्य-गानमें कुशल तथा कामशास्त्रमें निपुण थीं। शुकदेवजीकी सेवाके लिये उन्हें आदेश देकर राजमन्त्री उस भवनसे निकल गये और शुकदेवजी वहीं स्थित रहे। उन वारांगनाओंने परम भक्तिके साथ उनकी पूजा की और देशकालानुसार उपलब्ध अनेक प्रकारके भोजनसे उन्हें सन्तुष्ट किया॥ ५५–५८॥ |
| ततोऽन्तःपुरवासिन्यस्तस्यान्तःपुरकाननम् ।<br>रम्यं संदर्शयामासुरङ्गनाः काममोहिताः॥ ५९<br><br>स युवा रूपवान्कान्तो मृदुभाषी मनोरमः।<br>दृष्ट्वा ता मुमुहुः सर्वास्तं च काममिवापरम्॥ ६० | तत्पश्चात् अन्तःपुरनिवासिनी कामिनी स्त्रियोंने उन्हें अन्तःपुरका वन दिखाया, जो अत्यन्त रमणीय था। वे युवा, रूपवान्, कान्तिमान्, मृदुभाषी एवं मनोरम थे। दूसरे कामदेवके समान उन शुकदेवजीको देखकर वे सभी मुग्ध हो गयीं॥ ५९–६०॥ |
| जितेन्द्रियं मुनिं मत्वा सर्वाः पर्यचरंस्तदा।<br>आरणेयस्तु शुद्धात्मा मातृभावमकल्पयत्॥ ६१ | मुनिको जितेन्द्रिय जानकर वे सब उनकी परिचर्या करने लगीं। अरणिनन्दन शुद्धात्मा शुकदेवजीने उन्हें माताके समान समझा॥ ६१॥ |
| आत्मारामो जितक्रोधो न हृष्यति न तप्यति।<br>पश्यंस्तासां विकारांश्च स्वस्थ एव स तस्थिवान्॥ ६२ | वे आत्माराम तथा क्रोधको जीतनेवाले शुकदेवजी न हर्षित होते थे और न दुःखी। उनकी चेष्टाओंको देखकर भी वे शान्तचित्त होकर स्थित रहे॥ ६२॥ |
| तस्मै शय्यां सुरम्यां च ददुर्नार्यः सुसंस्कृताम्।<br>परार्ध्यास्तरणोपेतां नानोपस्करसंवृताम्॥ ६३<br><br>स कृत्वा पादशौचं च कुशपाणिरतन्द्रितः।<br>उपास्य पश्चिमां सन्ध्यां ध्यानमेवान्वपद्यत॥ ६४ | तब उन स्त्रियोंने उनके लिये सुरम्य, कोमल तथा बहुमूल्य आस्तरण और नानाविध उपकरणोंसे सुसज्जित शय्या बिछायी। शुकदेवजी हाथ-पाँव धोकर हाथमें कुश लेकर सावधान हो सायंकालीन सन्ध्योपासन सम्पन्न करके भगवान्के ध्यानमें लग गये॥ ६३–६४॥ |
| याममेकं स्थितो ध्याने सुष्वाप तदनन्तरम्।<br>सुप्त्वा यामद्वयं तत्र चोदतिष्ठत्ततः शुकः॥ ६५<br><br>पाश्चात्यं यामिनीयामं ध्यानमेवान्वपद्यत।<br>स्नात्वा प्रातःक्रियाः कृत्वा पुनरास्ते समाहितः॥ ६६ | इस प्रकार एक प्रहरतक ध्यानावस्थित होकर वे शयन करने लगे। दो प्रहर शयन करके पुनः वे शुकदेवजी उठ गये। रात्रिके चौथे प्रहरमें वे पुनः ध्यानमें स्थित रहे; तदनन्तर स्नान करके प्रातःकालीन क्रियाएँ सम्पन्न करके पुनः समाधिस्थ हो गये॥ ६५–६६॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां प्रथमस्कन्धे
शुकस्य राजमन्दिरप्रवेशवर्णनं नाम सप्तदशोऽध्यायः॥ १७॥
| १६० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १८ |
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अथाष्टादशोऽध्यायः
शुकदेवजीके प्रति राजा जनकका उपदेश
| सूत उवाच | सूतजी बोले— |
|---|---|
| श्रुत्वा तमागतं राजा मन्त्रिभिः सहितः शुचिः।<br>पुरः पुरोहितं कृत्वा गुरुपुत्रं समभ्यगात्॥ १ | शुकदेवजीको आया हुआ सुनकर पवित्रात्मा राजा जनक अपने पुरोहितको आगे करके मन्त्रियोंसहित उन गुरुपुत्रके पास गये॥ १॥ |
| कृत्वार्हणां नृपः सम्यग् दत्तासनमनुत्तमम्।<br>पप्रच्छ कुशलं गां च विनिवेद्य पयस्विनीम्॥ २ | महाराज जनकने उन्हें बड़े आदरसे उत्तम आसन देकर विधिवत् सत्कार करनेके पश्चात् एक दूध देनेवाली गौ प्रदान करके उनसे कुशल पूछा॥ २॥ |
| स च तां नृपपूजां वै प्रत्यगृह्णाद्यथाविधि।<br>पप्रच्छ कुशलं राज्ञे स्वं निवेद्य निरामयम्॥ ३ | शुकदेवजीने भी राजाकी पूजाको यथाविधि स्वीकार किया और अपना कुशल बताकर राजासे भी कुशल-मंगल पूछा॥ ३॥ |
| कृत्वा कुशलसंप्रश्नमुपविष्टं सुखासने।<br>शुकं व्याससुतं शान्तं पर्यपृच्छत पार्थिवः॥ ४<br>किं निमित्तं महाभाग निःस्पृहस्य च मां प्रति।<br>जातं ह्यागमनं ब्रूहि कार्यं तन्मुनिसत्तम॥ ५ | इस प्रकार कुशल-प्रश्न करके सुखदायी आसनपर बैठे हुए शान्तचित्तवाले व्यासपुत्र शुकदेवजीसे महाराज जनकने पूछा—हे महाभाग! मेरे यहाँ आप निःस्पृहका आगमन किस कारण हुआ? हे मुनिश्रेष्ठ! उस प्रयोजन को बताइये?॥ ४-५॥ |
| शुक उवाच | शुकदेवजी बोले— |
|---|---|
| व्यासेनोक्तो महाराज कुरु दारपरिग्रहम्।<br>सर्वेषामाश्रमाणां च गृहस्थाश्रम उत्तमः॥ ६<br>मया नाङ्गीकृतं वाक्यं मत्वा बन्धं गुरोरपि।<br>न बन्धोऽस्तीति तेनोक्तो नाहं तत्कृतवान्पुनः॥ ७ | महाराज! मेरे पिता व्यासजीने मुझसे कहा कि विवाह कर लो; क्योंकि सब आश्रमोंमें गृहस्थ-आश्रम ही श्रेष्ठ है। गुरुरूप पिताकी आज्ञाको बन्धनकारक मानकर मैंने उसे स्वीकार नहीं किया। उन्होंने समझाया कि गृहस्थाश्रम बन्धन नहीं है, फिर भी मैंने उसे स्वीकार नहीं किया॥ ६-७॥ |
| इति सन्दिग्धमनसं मत्वा स मुनिसत्तमः।<br>उवाच वचनं तथ्यं मिथिलां गच्छ मा शुचः॥ ८<br>याज्योऽस्ति जनकस्तत्र जीवन्मुक्तो नराधिपः।<br>विदेहो लोकविदितः पाति राज्यमकण्टकम्॥ ९ | इस प्रकार मुझे संशययुक्त चित्तवाला समझकर मुनिश्रेष्ठ व्यासने तथ्ययुक्त वचन कहा—तुम मिथिला चले जाओ, खेद न करो। वहाँ राजर्षि जनक रहते हैं, वे याज्ञिक एवं जीवन्मुक्त राजा हैं। संसारमें विदेह नामसे विख्यात वे वहाँ निष्कण्टक राज्य कर रहे हैं॥ ८-९॥ |
| कुर्वन् राज्यं तथा राजा मायापाशैर्न बध्यते।<br>त्वं बिभेषि कथं पुत्र वनवृत्तिः परन्तप॥ १० | हे पुत्र! महाराज जनक राज्य करते हुए भी मायाके जालमें नहीं बँधते, तब हे परन्तप! तुम वनवासी होते हुए भी क्यों भयभीत हो रहे हो?॥ १०॥ |
| पश्य तं नृपशार्दूलं त्यज मोहं मनोगतम्।<br>कुरु दारान्महाभाग पृच्छ वा भूपतिं च तम्॥ ११<br>सन्देहं ते मनोजातं कथयिष्यति पार्थिवः।<br>तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य मामेहि तरसा सुत॥ १२ | उन नृपश्रेष्ठ विदेहको देखो और अपने मनमें उठते हुए मोहका त्याग करो। हे महाभाग! विवाह करो, अन्यथा जाकर उन राजासे ही पूछो। वे राजा तुम्हारे मनमें उत्पन्न सन्देहका समाधान कर देंगे। तत्पश्चात् हे पुत्र! उनकी बात सुनकर तुम शीघ्र ही मेरे पास चले आना॥ ११-१२॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—6 A
| अ० १८ ] | प्रथम स्कन्ध | १६१ |
|---|
| सम्प्राप्तोऽहं महाराज त्वत्पुरे च तदाज्ञया।<br>मोक्षकामोऽस्मि राजेन्द्र ब्रूहि कृत्यं ममानघ॥ १३<br><br>तपस्तीर्थव्रतेज्याश्च स्वाध्यायस्तीर्थसेवनम्।<br>ज्ञानं वा वद राजेन्द्र मोक्षं प्रति च कारणम्॥ १४ | हे महाराज! मैं उन्हींके आदेशसे आपकी पुरीमें आया हूँ। हे राजेन्द्र! हे अनघ! मैं मोक्षका अभिलाषी हूँ, अतः जो कार्य मेरे लिये उचित हो, वह बताइये॥ १३॥<br>हे राजेन्द्र! तप, तीर्थ, व्रत, यज्ञ, स्वाध्याय, तीर्थसेवन और ज्ञान—इनमेंसे जो मोक्षका साक्षात् साधन हो, वह मुझे बताइये॥ १४॥ | | जनक उवाच<br>शृणु विप्रेण कर्तव्यं मोक्षमार्गाश्रितेन यत्।<br>उपनीतो वसेदादौ वेदाभ्यासाय वै गुरौ॥ १५<br><br>अधीत्य वेदवेदान्तान्दत्त्वा च गुरुदक्षिणाम्।<br>समावृत्तस्तु गार्हस्थ्ये सदारो निवसेन्मुनिः॥ १६<br><br>न्यायवृत्तिस्तु सन्तोषी निराशी गतकल्मषः।<br>अग्निहोत्रादिकर्माणि कुर्वाणः सत्यवाक्शुचिः॥ १७<br><br>पुत्रं पौत्रं समासाद्य वानप्रस्थाश्रमे वसेत्।<br>तपसा षड्रिपूञ्जित्वा भार्यां पुत्रे निवेश्य च॥ १८<br><br>सर्वानग्नीन्यथान्यायमात्मन्यारोप्य धर्मवित्।<br>वसेत्तुर्याश्रमे श्रान्तः शुद्धे वैराग्यसम्भवे॥ १९<br><br>विरक्तस्याधिकारोऽस्ति संन्यासे नान्यथा क्वचित्।<br>वेदवाक्यमिदं तथ्यं नान्यथेति मतिर्मम॥ २० | **जनकजी बोले—**मोक्षमार्गावलम्बी विप्रको जो करना चाहिये, उसे सुनिये। उपनयनसंस्कारके बाद सर्वप्रथम वेदशास्त्रका अध्ययन करनेहेतु गुरुके सांनिध्यमें रहना चाहिये। वहाँ वेद-वेदान्तोंका अध्ययन करके दीक्षान्त गुरुदक्षिणा देकर वापस लौटे मुनिको विवाह करके पत्नीके साथ गृहस्थीमें रहना चाहिये। [गृहस्थाश्रममें रहते हुए] न्यायोपार्जित धनका अर्जन करे, सर्वदा सन्तुष्ट रहे और किसीसे कोई आशा न रखे। पापोंसे मुक्त होकर अग्निहोत्र आदि कर्म करते हुए सत्यवचन बोले और [मन, वचन, कर्मसे सदा] पवित्र रहे। पुत्र-पौत्र हो जानेपर [समयानुसार] वानप्रस्थ-आश्रममें रहे। वहाँ तपश्चर्याद्वारा [काम, क्रोध, लोभ, मद, मोह और मात्सर्य—इन] छहों शत्रुओंपर विजय प्राप्त करके अपनी स्त्रीरक्षाका भार पुत्रको सौंप देनेके पश्चात् वह धर्मात्मा सब अग्नियोंका अपनेमें न्यायपूर्वक आधान कर ले और सांसारिक विषयोंके भोगसे शान्ति मिल जानेके बाद हृदयमें विशुद्ध वैराग्य उत्पन्न होनेपर चौथे आश्रमका आश्रय ले ले। विरक्तको ही संन्यास लेनेका अधिकार है, अन्य किसीको नहीं—यह वेदवाक्य सर्वथा सत्य है, असत्य नहीं—ऐसा मेरा मानना है॥ १५—२०॥ | | शुकाष्टचत्वारिंशद्वै संस्कारा वेदबोधिताः।<br>चत्वारिंशद् गृहस्थस्य प्रोक्तास्तत्र महात्मभिः॥ २१<br><br>अष्टौ च मुक्तिकामस्य प्रोक्ताः शमदमादयः।<br>आश्रमादाश्रमं गच्छेदिति शिष्टानुशासनम्॥ २२ | हे शुकदेवजी! वेदोंमें कुल अड़तालीस संस्कार कहे गये हैं। उनमें गृहस्थके लिये चालीस संस्कार महात्माओंने बताये हैं। मुमुक्षुके लिये शम, दम आदि आठ संस्कार कहे गये हैं। एक आश्रमसे ही [क्रमशः] दूसरे आश्रममें जाना चाहिये, ऐसा शिष्टजनोंका आदेश है॥ २१-२२॥ | | शुक उवाच<br>उत्पन्ने हृदि वैराग्ये ज्ञानविज्ञानसम्भवे।<br>अवश्यमेव वस्तव्यमाश्रमेषु वनेषु वा॥ २३ | **शुकदेवजी बोले—**चित्तमें वैराग्य और ज्ञान-विज्ञान उत्पन्न हो जानेपर अवश्य ही गृहस्थादि आश्रमोंमें रहना चाहिये अथवा वनोंमें॥ २३॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—6 A
| १६२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १८ |
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| जनक उवाच | जनकजी बोले— |
|---|---|
| इन्द्रियाणि बलिष्ठानि न नियुक्तानि मानद।<br>अपक्वस्य प्रकुर्वन्ति विकारांस्ताननेकंशः॥ २४ | हे मानद! इन्द्रियाँ बड़ी बलवान् होती हैं, वे वशमें नहीं रहतीं। वे अपरिपक्व बुद्धिवाले मनुष्यके मनमें नाना प्रकारके विकार उत्पन्न कर देती हैं॥ २४॥ |
| भोजनेच्छां सुखेच्छां च शय्येच्छामात्मजस्य च।<br>यती भूत्वा कथं कुर्याद्विकारे समुपस्थिते॥ २५ | यदि मनुष्यके मनमें भोजनकी, शयनकी, सुखकी और पुत्रकी इच्छा बनी रहे तो वह संन्यासी होकर भी इन विकारोंके उपस्थित होनेपर क्या कर पायेगा?॥ २५॥ |
| दुर्जयं वासनाजालं न शान्तिमुपयाति वै।<br>अतस्तच्छमनार्थाय क्रमेण च परित्यजेत्॥ २६ | वासनाओंका जाल बड़ा ही कठिन होता है, वह शीघ्र नहीं मिटता। इसलिये उसकी शान्तिके लिये मनुष्यको क्रमसे उसका त्याग करना चाहिये॥ २६॥ |
| ऊर्ध्वं सुप्तः पतत्येव न शयानः पतत्यधः।<br>परिव्रज्य परिभ्रष्टो न मार्गं लभते पुनः॥ २७ | ऊँचे स्थानपर सोनेवाला मनुष्य ही नीचे गिरता है, नीचे सोनेवाला कभी नहीं गिरता। यदि संन्यास-ग्रहण कर लेनेपर भ्रष्ट हो जाय तो पुनः वह कोई दूसरा मार्ग नहीं प्राप्त कर सकता॥ २७॥ |
| यथा पिपीलिका मूलाच्छाखायामधिरोहति।<br>शनैः शनैः फलं याति सुखेन पदगामिनी॥ २८<br><br>विहङ्गमस्तरसा याति विघ्नशङ्कामुदस्य वै।<br>श्रान्तो भवति विश्रम्य सुखं याति पिपीलिका॥ २९ | जिस प्रकार चींटी वृक्षकी जड़से चढ़कर शाखापर चढ़ जाती है और वहाँसे फिर धीरे-धीरे सुखपूर्वक पैरोंसे चलकर फलतक पहुँच जाती है। विघ्न-शंकाके भयसे कोई पक्षी बड़ी तीव्र गतिसे आसमानमें उड़ता है और [परिणामतः] थक जाता है, किंतु चींटी सुखपूर्वक विश्राम ले-लेकर [अपने अभीष्ट स्थानपर] पहुँच जाती है॥ २८-२९॥ |
| मनस्तु प्रबलं काममजेयमकृतात्मभिः।<br>अतः क्रमेण जेतव्यमाश्रमानुक्रमेण च॥ ३० | मन अत्यन्त प्रबल है; यह अजितेन्द्रिय पुरुषोंके द्वारा सर्वथा अजेय है। इसलिये आश्रमोंके अनुक्रमसे ही इसे क्रमशः जीतनेका प्रयत्न करना चाहिये॥ ३०॥ |
| गृहस्थाश्रमसंस्थोऽपि शान्तः सुमतिरात्मवान्।<br>न च हृष्येन्न च तपेल्लाभालाभे समो भवेत्॥ ३१ | गृहस्थ-आश्रममें रहते हुए भी जो शान्त, बुद्धिमान् एवं आत्मज्ञानी होता है, वह न तो प्रसन्न होता है और न खेद करता है। वह हानि-लाभमें समान भाव रखता है॥ ३१॥ |
| विहितं कर्म कुर्वाणस्त्यजंश्चिन्तान्वितं च यत्।<br>आत्मलाभेन सन्तुष्टो मुच्यते नात्र संशयः॥ ३२ | जो पुरुष शास्त्रप्रतिपादित कर्म करता हुआ, सभी प्रकारकी चिन्ताओंसे मुक्त रहता हुआ आत्मचिन्तनसे सन्तुष्ट रहता है; वह निःसन्देह मुक्त हो जाता है॥ ३२॥ |
| पश्याहं राज्यसंस्थोऽपि जीवन्मुक्तो यथानघ।<br>विचरामि यथाकामं न मे किञ्चित्प्रजायते॥ ३३ | हे अनघ! देखिये, मैं राजकार्य करता हुआ भी जीवन्मुक्त हूँ; मैं अपने इच्छानुसार सब काम करता हूँ, किंतु मुझे शोक या हर्ष कुछ भी नहीं होता॥ ३३॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—6 B
| अ० १८ ] | प्रथम स्कन्ध | १६३ |
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| भुञ्जानो विविधान्भोगान्कुर्वन्कार्याण्यनेकresource? | जिस प्रकार मैं अनेक भोगोंको भोगता हुआ तथा अनेक कार्योंको करता हुआ भी अनासक्त हूँ, उसी प्रकार हे अनघ! आप भी मुक्त हो जाइये ॥ ३४ ॥ | | भुञ्जानो विविधान्भोगान्कुर्वन्कार्याण्यनेकresource? <br> भविष्यामि यथाऽहं त्वं तथा मुक्तो भवानघ ॥ ३४ | |
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| भुञ्जानो विविधान्भोगान्कुर्वन्कार्याण्यनेकresource? |
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भुञ्जानो विविधान्भोगान्कुर्वन्कार्याण्यनेकशः ।<br>भविष्यामि यथाऽहं त्वं तथा मुक्तो भवानघ ॥ ३४
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| भुञ्जानो विविधान्भोगान्कुर्वन्कार्याण्यनेकशः ।<br>भविष्यामि यथाऽहं त्वं तथा मुक्तो भवानघ ॥ ३४ | जिस प्रकार मैं अनेक भोगोंको भोगता हुआ तथा अनेक कार्योंको करता हुआ भी अनासक्त हूँ, उसी प्रकार हे अनघ! आप भी मुक्त हो जाइये ॥ ३४ ॥ |
| कथ्यते खलु यद्दृश्यमदृश्यं बध्यते कुतः ।<br>दृश्यानि पञ्चभूतानि गुणास्तेषां तथा पुनः ॥ ३५ | ऐसा कहा भी जाता है कि जो यह दृश्य जगत् दिखायी देता है, उसके द्वारा अदृश्य आत्मा कैसे बन्धनमें आ सकता है ? पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु एवं आकाश—ये पंचमहाभूत और गन्ध, रस, रूप, स्पर्श एवं शब्द—ये उनके गुण दृश्य कहलाते हैं ॥ ३५ ॥ |
| आत्मा गम्योऽनुमानेन प्रत्यक्षो न कदाचन ।<br>स कथं बध्यते ब्रह्मन्निर्विकारो निरञ्जनः ॥ ३६ | आत्मा अनुमानगम्य है और कभी भी प्रत्यक्ष नहीं होता। ऐसी स्थितिमें हे ब्रह्मन् ! वह निरंजन एवं निर्विकार आत्मा भला बन्धनमें कैसे पड़ सकता है ? |
| मनस्तु सुखदुःखानां महतां कारणं द्विज ।<br>जाते तु निर्मले ह्यस्मिन्सर्वं भवति निर्मलम् ॥ ३७ | हे द्विज ! मन ही महान् सुख-दुःखका कारण है, इसीके निर्मल होनेपर सब कुछ निर्मल हो जाता है ॥ ३६-३७ ॥ |
| भ्रमन्सर्वेषु तीर्थेषु स्नात्वा स्नात्वा पुनः पुनः ।<br>निर्मलं न मनो यावत्तावत्सर्वं निरर्थकम् ॥ ३८ | सभी तीर्थोंमें घूमते हुए वहाँ बार-बार स्नान करके भी यदि मन निर्मल नहीं हुआ तो वह सब व्यर्थ हो जाता है। |
| न देहो न च जीवात्मा नेन्द्रियाणि परन्तप ।<br>मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः ॥ ३९ | हे परन्तप ! बन्धन तथा मोक्षका कारण न यह देह है, न जीवात्मा है और न ये इन्द्रियाँ ही हैं, अपितु मन ही मनुष्योंके बन्धन एवं मुक्तिका कारण है ॥ ३८-३९ ॥ |
| शुद्धो मुक्तः सदैवार्त्मा न वै बध्येत कर्हिचित् ।<br>बन्धमोक्षौ मनःसंस्थौ तस्मिञ्छान्ते प्रशाम्यति ॥ ४० | आत्मा तो सदा ही शुद्ध तथा मुक्त है, वह कभी बँधता नहीं है। अतः बन्धन और मोक्ष तो मनके भीतर हैं, मनकी शान्तिसे ही शान्ति है ॥ ४० ॥ |
| शत्रुमित्रमुदासीनो भेदाः सर्वे मनोगताः ।<br>एकात्मत्वे कथं भेदः सम्भवेद् द्वैतदर्शनात् ॥ ४१ | शत्रुता, मित्रता या उदासीनताके सभी भेदभाव भी मनमें ही रहते हैं। इसलिये एकात्मभाव होनेपर यह भेदभाव नहीं रहता; यह तो द्वैतभावसे ही उत्पन्न होता है ॥ ४१ ॥ |
| जीवो ब्रह्म सदैवाहं नात्र कार्या विचारणा ।<br>भेदबुद्धिस्तु संसारे वर्तमाना प्रवर्तते ॥ ४२ | ‘मैं जीव सदा ही ब्रह्म हूँ’—इस विषयमें और विचार करनेकी आवश्यकता ही नहीं है। भेदबुद्धि तो संसारमें आसक्त रहनेपर ही होती है ॥ ४२ ॥ |
| अविद्येयं महाभाग विद्या चैतन्निवर्तनम् ।<br>विद्याविद्ये च विज्ञेये सर्वदैव विचक्षणैः ॥ ४३ | हे महाभाग ! बन्धनका मुख्य कारण अविद्या ही है। इस अविद्याको दूर करनेवाली विद्या है। इसलिये ज्ञानी पुरुषोंको चाहिये कि वे सदा विद्या तथा अविद्याका अनुसन्धानपूर्वक अनुशीलन किया करें ॥ ४३ ॥ |
| विनातपं हि छायाया ज्ञायते च कथं सुखम् ।<br>अविद्यया विना तद्वत्कथं विद्यां च वेत्ति वै ॥ ४४ | धूपके बिना छायाके सुखका ज्ञान कैसे हो सकता है, उसी प्रकार अविद्याके बिना विद्याका ज्ञान कैसे किया जा सकता है ॥ ४४ ॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ] — 6 C
Let's double-check the text on:
शुद्धो मुक्तः सदैवार्त्माorसदैवात्मा? In the image:शुद्धो मुक्तः सदैवात्मा(wait, let's look atसदैवार्त्मा- there is no repha, it isसदैवात्मा).तस्मिञ्छान्ते- yes,तस्मिञ्छान्ते.गम्योऽनुमानेन- yes.यद्दृश्यमदृश्यं- yes.ह्यस्मिन्सर्वं- yes.सम्भवेद् द्वैतदर्शनात्- yes.विनातपं- yes.विद्या चैतन्निवर्तनम्- yes.
All looks very accurate.| अ० १८ ] | प्रथम स्कन्ध | १६३ | | :--- | :---: | ---: |
| भुञ्जानो विविधान्भोगान्कुर्वन्कार्याण्यनेकResource? No: <br>भुञ्जानो विविधान्भोगान्कुर्वन्कार्याण्यनेकresource? <br>भुञ्जानो विविधान्भोगान्कुर्वन्कार्याण्यनेकशः ।<br>भविष्यामि यथाऽहं त्वं तथा मुक्तो भवानघ ॥ ३४ | जिस प्रकार मैं अनेक भोगोंको भोगता हुआ तथा अनेक कार्योंको करता हुआ भी अनासक्त हूँ, उसी प्रकार हे अनघ ! आप भी मुक्त हो जाइये ॥ ३४ ॥ | | कथ्यते खलु यद्दृश्यमदृश्यं बध्यते कुतः ।<br>दृश्यानि पञ्चभूतानि गुणास्तेषां तथा पुनः ॥ ३५ | ऐसा कहा भी जाता है कि जो यह दृश्य जगत् दिखायी देता है, उसके द्वारा अदृश्य आत्मा कैसे बन्धनमें आ सकता है ? पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु एवं आकाश—ये पंचमहाभूत और गन्ध, रस, रूप, स्पर्श एवं शब्द—ये उनके गुण दृश्य कहलाते हैं ॥ ३५ ॥ | | आत्मा गम्योऽनुमानेन प्रत्यक्षो न कदाचन ।<br>स कथं बध्यते ब्रह्मन्निर्विकारो निरञ्जनः ॥ ३६ | आत्मा अनुमानगम्य है और कभी भी प्रत्यक्ष नहीं होता। ऐसी स्थितिमें हे ब्रह्मन् ! वह निरंजन एवं निर्विकार आत्मा भला बन्धनमें कैसे पड़ सकता है ? | | मनस्तु सुखदुःखानां महतां कारणं द्विज ।<br>जाते तु निर्मले ह्यस्मिन्सर्वं भवति निर्मलम् ॥ ३७ | हे द्विज ! मन ही महान् सुख-दुःखका कारण है, इसीके निर्मल होनेपर सब कुछ निर्मल हो जाता है ॥ ३६-३७ ॥ | | भ्रमन्सर्वेषु तीर्थेषु स्नात्वा स्नात्वा पुनः पुनः ।<br>निर्मलं न मनो यावत्तावत्सर्वं निरर्थकम् ॥ ३८ | सभी तीर्थोंमें घूमते हुए वहाँ बार-बार स्नान करके भी यदि मन निर्मल नहीं हुआ तो वह सब व्यर्थ हो जाता है। | | न देहो न च जीवात्मा नेन्द्रियाणि परन्तप ।<br>मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः ॥ ३९ | हे परन्तप ! बन्धन तथा मोक्षका कारण न यह देह है, न जीवात्मा है और न ये इन्द्रियाँ ही हैं, अपितु मन ही मनुष्योंके बन्धन एवं मुक्तिका कारण है ॥ ३८-३९ ॥ | | शुद्धो मुक्तः सदैवात्मा न वै बध्येत कर्हिचित् ।<br>बन्धमोक्षौ मनःसंस्थौ तस्मिञ्छान्ते प्रशाम्यति ॥ ४० | आत्मा तो सदा ही शुद्ध तथा मुक्त है, वह कभी बँधता नहीं है। अतः बन्धन और मोक्ष तो मनके भीतर हैं, मनकी शान्तिसे ही शान्ति है ॥ ४० ॥ | | शत्रुमित्रमुदासीनो भेदाः सर्वे मनोगताः ।<br>एकात्मत्वे कथं भेदः सम्भवेद् द्वैतदर्शनात् ॥ ४१ | शत्रुता, मित्रता या उदासीनताके सभी भेदभाव भी मनमें ही रहते हैं। इसलिये एकात्मभाव होनेपर यह भेदभाव नहीं रहता; यह तो द्वैतभावसे ही उत्पन्न होता है ॥ ४१ ॥ | | जीवो ब्रह्म सदैवाहं नात्र कार्या विचारणा ।<br>भेदबुद्धिस्तु संसारे वर्तमाना प्रवर्तते ॥ ४२ | ‘मैं जीव सदा ही ब्रह्म हूँ’—इस विषयमें और विचार करनेकी आवश्यकता ही नहीं है। भेदबुद्धि तो संसारमें आसक्त रहनेपर ही होती है ॥ ४२ ॥ | | अविद्येयं महाभाग विद्या चैतन्निवर्तनम् ।<br>विद्याविद्ये च विज्ञेये सर्वदैव विचक्षणैः ॥ ४३ | हे महाभाग ! बन्धनका मुख्य कारण अविद्या ही है। इस अविद्याको दूर करनेवाली विद्या है। इसलिये ज्ञानी पुरुषोंको चाहिये कि वे सदा विद्या तथा अविद्याका अनुसन्धानपूर्वक अनुशीलन किया करें ॥ ४३ ॥ | | विनातपं हि छायाया ज्ञायते च कथं सुखम् ।<br>अविद्यया विना तद्वत्कथं विद्यां च वेत्ति वै ॥ ४४ | धूपके बिना छायाके सुखका ज्ञान कैसे हो सकता है, उसी प्रकार अविद्याके बिना विद्याका ज्ञान कैसे किया जा सकता है ॥ ४४ ॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ] — 6 C
| १६४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १८ | | :--- | :--- |
| गुणा गुणेषु वर्तन्ते भूतानि च तथैव च।<br>इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु को दोषस्तत्र चात्मनः॥ ४५ | गुणोंमें गुण, पंचभूतोंमें पंचभूत तथा इन्द्रियोंके विषयोंमें इन्द्रियाँ स्वयं रमण करती हैं; इसमें आत्माका क्या दोष है?॥ ४५॥ | | मर्यादा सर्वरक्षार्थं कृता वेदेषु सर्वशः।<br>अन्यथा धर्मनाशः स्यात्सौगतानामिवानघ॥ ४६<br><br>धर्मनाशे विनष्टः स्याद्वर्णाचारोऽतिवर्तितः।<br>अतो वेदप्रदिष्टेन मार्गेण गच्छतां शुभम्॥ ४७ | हे पवित्रात्मन्! सबकी सुरक्षाके लिये वेदोंमें सब प्रकारसे मर्यादाकी व्यवस्था की गयी है। यदि ऐसा न होता तो नास्तिकोंकी भाँति सब धर्मोंका नाश हो जाता। धर्मके नष्ट हो जानेपर सब कुछ नष्ट हो जायगा और सब वर्णोंकी आचार-परम्पराका उल्लंघन हो जायगा। इसलिये वेदोपदिष्ट मार्गपर चलनेवालोंका कल्याण होता है॥ ४६-४७॥ | | शुक उवाच<br>सन्देहो वर्तते राजन्न निवर्तति मे क्वचित्।<br>भवता कथितं यत्तच्छृण्वतो मे नराधिप॥ ४८ | शुकदेवजी बोले—हे राजन्! आपने जो बात कही उसे सुनकर भी मेरा सन्देह बना हुआ है; वह किसी प्रकार भी दूर नहीं होता॥ ४८॥ | | वेदधर्मेषु हिंसा स्यादधर्मबहुला हि सा।<br>कथं मुक्तिप्रदो धर्मो वेदोक्तो बत भूपते॥ ४९<br><br>प्रत्यक्षेण त्वनाचारः सोमपानं नराधिप।<br>पशूनां हिंसनं तद्वद्भक्षणं चामिषस्य च॥ ५०<br><br>सौत्रामणौ तथा प्रोक्तः प्रत्यक्षेण सुराग्रहः।<br>द्यूतक्रीडा तथा प्रोक्ता व्रतानि विविधानि च॥ ५१ | हे भूपते! वेदधर्मोंमें हिंसाका बाहुल्य है, उस हिंसामें अनेक प्रकारके अधर्म होते हैं। [ऐसी दशामें] वेदोक्त धर्म मुक्तिप्रद कैसे हो सकता है? हे राजन्! सोमरस-पान, पशुहिंसा और मांस-भक्षण तो स्पष्ट ही अनाचार है। सौत्रामणियज्ञमें तो प्रत्यक्षस्वरूपसे सुराग्रहणका वर्णन किया गया है। इसी प्रकार द्यूतक्रीड़ा एवं अन्य अनेक प्रकारके व्रत बताये गये हैं॥ ४९-५१॥ | | श्रूयते स्म पुरा ह्यासीच्छशबिन्दुर्नृपोत्तमः।<br>यज्वा धर्मपरो नित्यं वदान्यः सत्यसागरः॥ ५२<br><br>गोप्ता च धर्मसेतूनां शास्ता चोत्पथगामिनाम्।<br>यज्ञाश्च विहितास्तेन बहवो भूरिदक्षिणाः॥ ५३ | सुना जाता है कि प्राचीन कालमें शशबिन्दु नामके एक श्रेष्ठ राजा थे। वे बड़े धर्मात्मा, यज्ञपरायण, उदार एवं सत्यवादी थे। वे धर्मरूपी सेतुके रक्षक तथा कुमार्गगामी जनोंके नियन्ता थे। उन्होंने पुष्कल दक्षिणावाले अनेक यज्ञ सम्पादित किये थे॥ ५२-५३॥ | | चर्मणां पर्वतो जातो विन्ध्याचलसमः पुनः।<br>मेघाम्बुप्लावनाज्जाता नदी चर्मण्वती शुभा॥ ५४ | [उन यज्ञोंमें] पशुओंके चर्मसे विन्ध्यपर्वतके समान ऊँचा पर्वत-सा बन गया। मेघोंके जल बरसानेसे चर्मण्वती नामकी शुभ नदी बह चली॥ ५४॥ | | सोऽपि राजा दिवं यातः कीर्तिरस्याचला भुवि।<br>एवं धर्मेषु वेदेषु न मे बुद्धिः प्रवर्तते॥ ५५ | वे राजा भी दिवंगत हो गये, किंतु उनकी कीर्ति भूमण्डलपर अचल हो गयी। जब इस प्रकारके धर्मोंका वर्णन वेदमंत्रोंमें/वेदमें है, तब हे राजन्! मेरी श्रद्धाबुद्धि उनमें नहीं है॥ ५५॥ | | स्त्रीसङ्गेन सदा भोगे सुखमाप्नोति मानवः।<br>अलाभे दुःखमत्यन्तं जीवन्मुक्तः कथं भवेत्॥ ५६ | स्त्रीके साथ भोगमें पुरुष सुख प्राप्त करता है और उसके न मिलनेपर वह बहुत दुःखी होता है तो ऐसी दशामें भला वह जीवन्मुक्त कैसे हो सकेगा?॥ ५६॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—6 D
| अ० १९] | प्रथम स्कन्ध | १६५ |
|---|
| जनक उवाच | जनकजी बोले— |
|---|---|
| हिंसा यज्ञेषु प्रत्यक्षा साहिंसा परिकीर्तिता।<br>उपाधियोगतो हिंसा नान्यथेति विनिर्णयः॥ ५७ | यज्ञोंमें जो हिंसा दिखायी देती है, वह वास्तवमें अहिंसा ही कही गयी है; क्योंकि जो हिंसा उपाधियोगसे होती है वही हिंसा कहलाती है, अन्यथा नहीं—ऐसा शास्त्रोंका निर्णय है॥ ५७॥ |
| यथा चेन्धनसंयोगादग्नौ धूमः प्रवर्तते।<br>तद्वियोगात्तथा तस्मिन्निर्धूमत्वं विभाति वै॥ ५८<br>अहिंसां च तथा विद्धि वेदोक्तां मुनिसत्तम।<br>रागिणां सापि हिंसैव निःस्पृहाणां न सा मता॥ ५९ | जिस प्रकार [गीली] लकड़ीके संयोगसे अग्निसे धुआँ निकलता है, उसके अभावमें उस अग्निमें धुँआ नहीं दिखायी देता, उसी प्रकार हे मुनिवर! वेदोक्त हिंसाको भी आप अहिंसा ही समझिये। रागीजनोंद्वारा की गयी हिंसा ही हिंसा है, किंतु अनासक्त जनोंके लिये वह हिंसा नहीं कही गयी है॥ ५८-५९॥ |
| अरागेण च यत्कर्म तथाहङ्कारवर्जितम्।<br>अकृतं वेदविद्वांसः प्रवदन्ति मनीषिणः॥ ६० | जो कर्म रागरहित तथा अहंकाररहित होकर किया जाता हो, उस कर्मको वैदिक विद्वान् मनीषीजन न किये हुएके समान ही कहते हैं॥ ६०॥ |
| गृहस्थानां तु हिंसैव या यज्ञे द्विजसत्तम।<br>अरागेण च यत्कर्म तथाहंकारवर्जितम्॥ ६१<br>साहिंसैव महाभाग मुमुक्षूणां जितात्मनाम्॥ ६२ | हे द्विजश्रेष्ठ! रागी गृहस्थोंके द्वारा यज्ञमें जो हिंसा होती है, वही हिंसा है। हे महाभाग! जो कर्म रागरहित तथा अहंकारशून्य होकर किया जाता है, वह जितात्मा मुमुक्षुजनोंके लिये अहिंसा ही है॥ ६१-६२॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां प्रथमस्कन्धे शुकस्य जनकोपदेशवर्णनं नामाष्टादशोऽध्यायः॥ १८॥
अथैकोनविंशोऽध्यायः
शुकदेवजीका व्यासजीके आश्रममें वापस आना, विवाह करके सन्तानोत्पत्ति करना तथा परम सिद्धिकी प्राप्ति करना
| शुक उवाच | शुकदेवजी बोले— |
|---|---|
| सन्देहोऽयं महाराज वर्तते हृदये मम।<br>मायामध्ये वर्तमानः स कथं निःस्पृहो भवेत्॥ १<br>शास्त्रज्ञानं च सम्प्राप्य नित्यानित्यविचारणम्।<br>त्यजते न मनो मोहं स कथं मुच्यते नरः॥ २ | हे महाराज! मेरे हृदयमें यह शंका हो रही है कि मायामें लिप्त रहते हुए कोई मनुष्य निःस्पृह कैसे हो सकता है? शास्त्रका ज्ञान प्राप्त करके नित्यानित्यका विचार करनेपर भी चित्तसे मोह नहीं दूर होता। तब भला वह मनुष्य मुक्त कैसे हो सकेगा?॥ १-२॥ |
| अन्तर्गतं तमश्छेत्तुं शास्त्राद् बोधो हि न क्षमः।<br>यथा न नश्यति तमः कृतया दीपवार्तया॥ ३<br>अद्रोहः सर्वभूतेषु कर्तव्यः सर्वदा बुधैः।<br>स कथं राजशार्दूल गृहस्थस्य भवेत्तथा॥ ४ | मनुष्यके मनमें स्थित मोहको दूर करनेके लिये केवल शास्त्रबोध ही समर्थ नहीं हो सकता, जैसे केवल दीप जलानेकी बात करनेसे अन्धकार दूर नहीं होता। अतः बुद्धिमान् मनुष्योंको चाहिये कि वे कभी किसीसे द्वेष-भाव न रखें, परंतु हे नृपश्रेष्ठ! गृहस्थसे वह कैसे सम्भव है?॥ ३-४॥ |
| १६६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १९ |
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| वित्तैषणा न ते शान्ता तथा राज्यसुखैषणा।<br>जयैषणा च सङ्ग्रामे जीवन्मुक्तः कथं भवेः॥ ५ | अभी भी आपकी धनप्राप्तिकी कामना, राज्यसुख तथा युद्धमें विजय प्राप्त करनेकी अभिलाषा शान्त नहीं हुई है, तब आप जीवन्मुक्त कैसे हो सकते हैं? ॥ ५॥ | | चौरेषु चौरबुद्धिस्तु साधुबुद्धिस्तु तापसे।<br>स्वपरत्वं तवाप्यस्ति विदेहस्त्वं कथं नृप॥ ६ | अभी भी चोरोंके प्रति चौरबुद्धि तथा तपस्वीके प्रति साधुबुद्धि आपकी है ही। अपने-परायेका भेदभाव भी अभी आपमें है, तो फिर हे राजन्! आप विदेह कैसे? ॥ ६॥ | | कटुतीक्ष्णकषायाम्लरसान्वेत्सि शुभाशुभान्।<br>शुभेषु रमते चित्तं नाशुभेषु तथा नृप॥ ७ | अभी आप कटु, तिक्त, कसैले एवं खट्टे रसोंका तथा भले-बुरेका ज्ञान रखते ही हैं। हे राजन्! आपका चित्त शुभ कर्मोंमें रमता है, अशुभ कर्मोंमें नहीं। | | जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तिश्च तव राजन् भवन्ति हि।<br>अवस्थास्तु यथाकालं तुरीया तु कथं नृप॥ ८ | जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति—ये अवस्थाएँ अभी आपको समयानुसार होती ही हैं; तब भला आपको तुरीयावस्था कैसे प्राप्त होती होगी? ॥ ७-८॥ | | पदात्यश्वरथेभाश्च सर्वे वै वशगा मम।<br>स्वाम्यहं चैव सर्वेषां मन्यसे त्वं न मन्यसे॥ ९ | हे राजन्! घोड़े, रथ, हाथी तथा पैदल सैनिक—ये सब मेरे अधीन हैं और मैं इन सबका स्वामी हूँ—ऐसा आप अपनेको मानते हैं या नहीं? | | मिष्टमत्सि सदा राजन्मुदितो विमनास्तथा।<br>मालायां च तथा सर्पे समदृक् क्व नृपोत्तम॥ १० | आप मधुर भोजनको प्रसन्नतापूर्वक अथवा बेमनसे खाते ही होंगे। हे नृपश्रेष्ठ! आप माला और सर्पमें क्या समान दृष्टिवाले हैं? ॥ ९-१०॥ | | विमुक्तस्तु भवेद्राजन् समलोष्टाश्मकाञ्चनः।<br>एकात्मबुद्धिः सर्वत्र हितकृत्सर्वजन्तुषु॥ ११ | हे राजन्! विमुक्त पुरुष तो वह कहलाता है, जो मिट्टीके ढेले और स्वर्णको समान समझता हो, सब जीवोंमें एकात्मबुद्धि रखता हो तथा जीवमात्रका उपकार करता हो॥ ११॥ | | न मेऽद्य रमते चित्तं गृहदारादिषु क्वचित्।<br>एकाकी निःस्पृहोऽत्यर्थं चरेयमिति मे मतिः॥ १२ | मेरा मन घर-स्त्री आदिमें कभी नहीं लगता। इसलिये अकेले ही निःस्पृह भावसे मैं सदा विचरण करता रहूँ—यही मेरा विचार है॥ १२॥ | | निःसङ्गो निर्ममः शान्तः पत्रमूलफलाशनः।<br>मृगवद्विचरिष्यामि निर्द्वन्द्वो निष्परिग्रहः॥ १३ | निःसंग, ममतारहित और शान्त होकर केवल पत्र, मूल, फल इत्यादि ग्रहण करता हुआ मैं निर्द्वन्द्व एवं अपरिग्रही होकर मृगकी भाँति स्वच्छन्द विचरण करूँगा॥ १३॥ | | किं मे गृहेण वित्तेन भार्यया च सुरूपया।<br>विरागमनसः कामं गुणातीतस्य पार्थिव॥ १४ | हे पार्थिव! गृह, धन तथा रूपवती स्त्रीसे मुझ विरक्तचित्त और गुणातीतका क्या प्रयोजन है? ॥ १४॥ | | चिन्त्यसे विविधाकारं नानारागसमाकुलम्।<br>दम्भोऽयं किल ते भाति विमुक्तोऽस्मीति भाषसे॥ १५ | आप अनेक प्रकारकी राग-द्वेषयुक्त बातें सोचते हैं, फिर भी 'मैं विमुक्त हूँ'—ऐसा आप कहते हैं। यह सब मुझे तो केवल आपका दम्भ ही जान पड़ता है। | | कदाचिच्छत्रुजा चिन्ता धनजा च कदाचन।<br>कदाचित्सैन्यजा चिन्ता निश्चिन्तोऽसि कदा नृप॥ १६ | आपको कभी शत्रुकी, कभी धनकी तथा कभी सेनाकी चिन्ता रहती ही है, तब हे राजन्! आप निश्चिन्त कहाँ? ॥ १५-१६॥ |
| अ० १९ ] | प्रथम स्कन्ध | १६७ |
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| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| वैखानसा ये मुनयो मिताहारा जितव्रताः।<br>तेऽपि मुह्यन्ति संसारे जानन्तोऽपि ह्यसत्यताम्॥ १७ | स्वल्पाहारी, अटल व्रतवाले जो वैखानस मुनि हैं, वे इस संसारकी अनित्यताको जानते हुए भी इसमें आसक्त हो जाते हैं॥ १७॥ |
| तव वंशसमुत्थानां विदेहा इति भूपते।<br>कुटिलं नाम जानीहि नान्यथेति कदाचन॥ १८ | हे राजन्! आपके वंशमें उत्पन्न सभी राजाओंका नाम विदेह—यह हो जाता है, इसमें भी आप धोखा समझिये, दूसरा कुछ नहीं॥ १८॥ |
| विद्याधरो यथा मूर्खो जन्मान्धस्तु दिवाकरः।<br>लक्ष्मीधरो दरिद्रश्च नाम तेषां निरर्थकम्॥ १९<br><br>तव वंशोद्भवा ये ये श्रुताः पूर्वे मया नृपाः।<br>विदेहा इति विख्याता नामतः कर्मतो न ते॥ २० | जिस प्रकार किसी मूर्खका नाम विद्याधर, जन्मान्धका नाम दिवाकर तथा सतत दरिद्री मनुष्यका नाम लक्ष्मीधर रखना निरर्थक है, उसी प्रकार पूर्वकालमें आपके वंशमें उत्पन्न जिन-जिन राजाओंको मैंने सुना है, वे नामसे ही विदेह प्रसिद्ध हुए हैं कर्मसे नहीं॥ १९-२०॥ |
| निमिनामाभवद्राजा पूर्वं तव कुले नृप।<br>यज्ञार्थं स तु राजर्षिर्वसिष्ठं स्वगुरुं मुनिम्॥ २१<br><br>निमन्त्रयामास तदा तमुवाच नृपं मुनिः।<br>निमन्त्रितोऽस्मि यज्ञार्थं देवेन्द्रेणाधुना किल॥ २२<br><br>कृत्वा तस्य मखं पूर्णं करिष्यामि तवापि वै।<br>तावत्कुरुष्व राजेन्द्र सम्भारं तु शनैः शनैः॥ २३ | हे नृप! आपके कुलमें पहले निमि नामके राजा हो चुके हैं। उन राजर्षिने एक बार अपने गुरु वसिष्ठमुनिको यज्ञके लिये निमन्त्रित किया। उस समय वसिष्ठजीने उनसे कहा कि आपसे पहले इन्द्रने मुझे यज्ञके लिये आमन्त्रित कर रखा है। इन्द्रका यज्ञ सम्पन्न कराकर मैं आपका भी यज्ञ पूर्ण करूँगा। अतः हे राजेन्द्र! तब तक आप धीरे-धीरे यज्ञ-सामग्री एकत्र कराइये॥ २१—२३॥ |
| इत्युक्त्वा निर्ययौ सोऽथ महेन्द्रयजने मुनिः।<br>निमिरन्यं गुरुं कृत्वा चकार मखमुत्तमम्॥ २४ | ऐसा कहकर वसिष्ठमुनि इन्द्रका यज्ञ करानेके लिये चले गये और महाराज निमिने किसी दूसरेको आचार्य बनाकर अपना उत्तम यज्ञ सम्पन्न कर लिया॥ २४॥ |
| तच्छ्रुत्वा कुपितोऽत्यर्थं वसिष्ठो नृपतिं पुनः।<br>शशाप च पतत्वद्य देहस्ते गुरुलोपक॥ २५ | यह सुनकर वसिष्ठजी राजापर अत्यन्त क्रोधित हुए और उन्हें शाप देते हुए बोले—'हे गुरुका परित्याग करनेवाले! तुम्हारा शरीर नष्ट हो जाय'॥ २५॥ |
| राजापि तं शशापाथ तवापि च पतत्वयम्।<br>अन्योन्यशापात्पतितौ तावेव च मया श्रुतम्॥ २६ | यह सुनकर महाराज निमिने भी शाप दिया कि आपका भी शरीर नष्ट हो जाय। इस प्रकार वे दोनों एक-दूसरेके शापसे नष्ट हो गये—ऐसा मैंने सुना है॥ २६॥ |
| विदेहेन च राजेन्द्र कथं शप्तो गुरुः स्वयम्।<br>विनोद इव मे चित्ते विभाति नृपसत्तम॥ २७ | हे राजेन्द्र! विदेह होकर भी राजाने अपने गुरुको स्वयं शाप क्यों दे डाला! हे नृपश्रेष्ठ! यह तो मेरे मनमें परिहास-जैसा प्रतीत हो रहा है॥ २७॥ |
| जनक उवाच<br>सत्यमुक्तं त्वया नात्र मिथ्या किञ्चिदिदं मतम्।<br>तथापि शृणु विप्रेन्द्र गुरुर्मम सुपूजितः॥ २८ | जनकजी बोले—हे विप्रवर! आपने ठीक ही कहा है; इसमें मिथ्या कुछ भी नहीं है—ऐसा मैं मानता हूँ। फिर भी आप मेरी बात सुनें। हे विप्रेन्द्र! |
१६८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० १९
१६८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० १९
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| पितुः सङ्गं परित्यज्य त्वं वनं गन्तुमिच्छसि।<br>मृगैः सह सुसम्बन्धो भविता ते न संशयः॥ २९ | गुरु व्यासजी मेरे परम पूज्य हैं। उन अपने पिताका साथ त्याग करके आप वनमें जाना चाहते हैं। वहाँ भी तो मृग आदि पशुओंके साथ आपका स्नेह-सम्बन्ध रहेगा ही; इसमें सन्देह नहीं है॥ २८-२९॥ |
| महाभूतानि सर्वत्र निःसङ्गः क्व भविष्यसि।<br>आहारार्थं सदा चिन्ता निश्चन्तः स्याः कथं मुने॥ ३० | पृथ्वी, जल आदि महाभूत तो सर्वत्र ही विद्यमान हैं। तब आप निःसंग कैसे हो पायेंगे ? और फिर हे मुने! भोजन आदिकी भी चिन्ता रहेगी ही, तो आप निश्चिन्त कैसे रहेंगे ?॥ ३०॥ |
| दण्डाजिनकृता चिन्ता यथा तव वनेऽपि च।<br>तथैव राज्यचिन्ता मे चिन्तयानस्य वा न वा॥ ३१ | जिस प्रकार आपको वनमें दण्ड और मृगचर्मकी चिन्ता बनी रहेगी, उसी प्रकार मुझ विचारशील राजाको भी राज्यसम्बन्धी चिन्ता तो होगी ही॥ ३१॥ |
| विकल्पोपहतस्त्वं वै दूरदेशमुपागतः।<br>न मे विकल्पसन्देहो निर्विकल्पोऽस्मि सर्वथा॥ ३२ | आप ही भ्रममें पड़कर यहाँतक दूर देशमें आये हैं। मुझे किसी प्रकारका विकल्परूपी सन्देह नहीं है; क्योंकि मैं तो सर्वथा निर्विकल्प हूँ॥ ३२॥ |
| सुखं स्वपिमि विप्राहं सुखं भुञ्जामि सर्वथा।<br>न बद्धोऽस्मीति बुद्ध्याहं सर्वदैव सुखी मुने॥ ३३<br><br>त्वं तु दुःखी सदैवासि बद्धोऽहमिति शङ्कया।<br>इति शङ्कां परित्यज्य सुखी भव समाहितः॥ ३४ | हे विप्र! मैं सुखसे भोजन करता हूँ और सुखपूर्वक शयन करता हूँ। हे मुने! 'मैं बद्ध नहीं हूँ' इस भावनासे मैं सर्वदा सुखी रहता हूँ। [इसके विपरीत] 'मैं बद्ध हूँ'—इस शंकासे आप सर्वदा दुःखी ही रहते हैं, अतः आप इस शंकाको छोड़कर सदा सुखी एवं स्वस्थ हो जाइये॥ ३३-३४॥ |
| देहोऽयं मम बन्धोऽयं न ममेति च मुक्तता।<br>तथा धनं गृहं राज्यं न ममेति च निश्चयः॥ ३५ | यह शरीर मेरा है—यही बन्धनका कारण है; यह मेरा नहीं है—ऐसा निश्चय ही मुक्ति है। यह गृह, सम्पत्ति, राज्य मेरा नहीं है—ऐसा मेरा दृढ़ निश्चय है॥ ३५॥ |
| सूत उवाच<br>तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य शुकः प्रीतमनाभवत्।<br>आपृच्छ्य तं जगामाशु व्यासस्याश्रममुत्तमम्॥ ३६ | सूतजी बोले—महाराज जनककी बात सुनकर शुकदेवजी हर्षित हुए और उनसे आज्ञा लेकर व्यासजीके उत्तम आश्रमके लिये चल पड़े॥ ३६॥ |
| आगच्छन्तं सुतं दृष्ट्वा व्यासोऽपि सुखमाप्तवान्।<br>आलिङ्ग्याघ्राय मूर्धानं पप्रच्छ कुशलं पुनः॥ ३७ | व्यासजीने अपने ज्ञानी पुत्रको आते देखकर सुख प्राप्त किया। उन्होंने शुकदेवजीको हृदयसे लगाकर तथा उनका सिर सूँघकर उनकी कुशलता पूछी॥ ३७॥ |
| स्थितस्तत्राश्रमे रम्ये पितुः पार्श्वे समाहितः।<br>वेदाध्ययनसम्पन्नः सर्वशास्त्रविशारदः॥ ३८<br><br>जनकस्य दशां दृष्ट्वा राज्यस्थस्य महात्मनः।<br>स निर्वृतिं परां प्राप्य पितुराश्रमसंस्थितः॥ ३९ | सब शास्त्रोंमें कुशल एवं वेदाध्ययनमें तत्पर श्रीशुक-देवजी अपने पिताके साथ उस रमणीय आश्रममें सावधान होकर रहने लगे। राज्य करते हुए महात्मा जनककी वह विदेहावस्था देखकर शुकदेवजी परम शान्तिको प्राप्तकर अपने पिताके आश्रममें ही स्थित हो गये॥ ३८-३९॥ |
| अ० १९ ] | प्रथम स्कन्ध | १६१ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| पितॄणां सुभगा कन्या पीवरी नाम सुन्दरी।<br>शुकश्चकार पत्नीं तां योगमार्गस्थितोऽपि हि॥ ४०<br>स तस्यां जनयामास पुत्रांश्चतुर एव हि।<br>कृष्णं गौरप्रभं चैव भूरिं देवश्रुतं तथा॥ ४१<br>कन्यां कीर्तिं समुत्पाद्य व्यासपुत्रः प्रतापवान्।<br>ददौ विभ्राजपुत्राय त्वणुहाय महात्मने॥ ४२ | योगमार्गमें स्थित रहते हुए भी शुकदेवजीने पितरोंकी पीवरी नामकी सौभाग्यवती सुन्दर कन्याको पत्नीरूपमें स्वीकार कर लिया। उन्होंने उससे कृष्ण, गौरप्रभ, भूरि और देवश्रुत नामक चार पुत्र उत्पन्न किये। साथ ही उन प्रतापी व्याससुत शुकदेवजीने कीर्ति नामकी एक कन्या उत्पन्न करके उस कन्याका विवाह विभ्राजके पुत्र महात्मा अणुहके साथ कर दिया॥ ४०—४२॥ |
| अणुहस्य सुतः श्रीमान्ब्रह्मदत्तः प्रतापवान्।<br>ब्रह्मज्ञः पृथिवीपालः शुककन्यासमुद्भवः॥ ४३<br>कालेन कियता तत्र नारदस्योपदेशतः।<br>ज्ञानं परमकं प्राप्य योगमार्गमनुत्तमम्॥ ४४<br>पुत्रे राज्यं निधायाथ गतो बदरिकाश्रमम्।<br>मायाबीजोपदेशेन तस्य ज्ञानं निर्गलम्॥ ४५ | शुकदेवजीकी कन्यासे उत्पन्न अणुहके पुत्र श्रीमान् ब्रह्मदत्त हुए जो बड़े प्रतापी, ब्रह्मज्ञानी एवं पृथ्वीके रक्षक थे। वे कुछ समयके बाद देवर्षि नारदके उपदेशसे और परमश्रेष्ठ ब्रह्मतत्त्वका ज्ञान पाकर योगमार्गका आश्रय लेकर राज्यका भार अपने पुत्रको सौंपकर बदरिकाश्रम चले गये। वहाँ नारदजीके कृपाप्रसादसे प्राप्त मायाबीजके उपदेशसे उन्हें निर्बाध तथा तत्क्षण मुक्तिदायक ज्ञान उत्पन्न हुआ॥ ४३—४५ १/२॥ |
| नारदस्य प्रसादेन जातं सद्यो विमुक्तिदम्।<br>कैलासशिखरे रम्ये त्यक्त्वा सङ्गं पितुः शुकः॥ ४६<br>ध्यानमास्थाय विपुलं स्थितः सङ्गपराङ्मुखः।<br>उत्पपात गिरेः शृङ्गात्सिद्धिं च परमां गतः॥ ४७<br>आकाशगो महातेजा विरराज यथा रविः।<br>गिरेः शृङ्गं द्विधा जातं शुकस्योत्पतने तदा॥ ४८<br>उत्पाता बहवो जाताः शुकश्चाकाशगोऽभवत्।<br>अन्तरिक्षे यथा वायुः स्तूयमानः सुरर्षिभिः॥ ४९<br>तेजसातिविराजन्वै द्वितीय इव भास्करः। | उधर शुकदेवजी भी अपने पिताका साथ त्यागकर कैलासके सुरम्य शिखरपर चले गये और निःसंग भावसे अविचल ध्यान लगाकर स्थित हो गये। कुछ ही दिनोंमें उन्हें परम सिद्धि प्राप्त हो गयी और वे पर्वतके शिखरसे उड़ गये तथा महातेजस्वी वे शुकदेवजी आकाशमें जाकर सूर्यके समान सुशोभित होने लगे। तब शुकदेवजीके उड़ते ही पर्वत-शिखर दो भागोंमें विभाजित हो गया। शुकदेवजीके आकाशमें जाते ही अनेक प्रकारके उत्पात होने लगे। ऋषियोंके द्वारा स्तुति किये जाते हुए वे शुकदेवजी अन्तरिक्षमें वायुकी भाँति स्थित हो गये। वे अपने तेजसे दूसरे सूर्यकी भाँति देदीप्यमान हो रहे थे॥ ४६—४९ १/२॥ |
| व्यासस्तु विरहाक्रान्तः क्रन्दन्पुत्रेति चासकृत्॥ ५०<br>गिरेः शृङ्गे गतस्तत्र शुको यत्र स्थितोऽभवत्।<br>क्रन्दमानं तदा दीनं व्यासं मत्वा श्रमाकुलम्॥ ५१<br>सर्वभूतगतः साक्षी प्रतिशब्दमदात्तदा।<br>तत्राद्यापि गिरेः शृङ्गे प्रतिशब्दः स्फुटोऽभवत्॥ ५२ | इसी बीच पुत्रके वियोगसे व्यग्र होकर व्यासजी बार-बार 'हा पुत्र! हा पुत्र!' कहते हुए उस पर्वतकी चोटीपर पहुँचे, जहाँ शुकदेवजी रहते थे। थके हुए व्यासजीको दीन भावसे करुण क्रन्दन करते हुए देखकर सभी जीवोंमें साक्षीरूपसे विद्यमान परमात्माने प्रतिध्वनिके रूपमें उत्तर दिया। आज भी उस पर्वतके शृंगपर वैसी ही प्रतिध्वनि स्पष्ट सुनायी देती है॥ ५०—५२॥ |
| १७० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २० | | :--- | :--- |
| रुदन्तं तं समालक्ष्य व्यासं शोकसन्वितम्।<br>पुत्र पुत्रेति भाषन्तं विरहेण परिप्लुतम्॥ ५३<br>शिवस्तत्र समागत्य पाराशर्यमबोधयत्।<br>व्यास शोकं मा कुरु त्वं पुत्रस्ते योगवित्तमः॥ ५४<br>परमां गतिमापन्नो दुर्लभां चाकृतात्मभिः।<br>तस्य शोको न कर्तव्यस्त्वयाऽशोकं विजानता॥ ५५<br>कीर्तिस्ते विपुला जाता तेन पुत्रेण चानघ। | अपने प्रिय पुत्र शुकदेवके विरहमें ‘हा पुत्र! हा पुत्र!’ कहकर विलाप करते हुए व्यासजीको शोक-सन्तप्त देखकर साक्षात् शंकरजी वहाँ आकर उन्हें सान्त्वना देने लगे—‘हे व्यासजी! आप शोक मत कीजिये; आपके पुत्र श्रेष्ठ योगवेत्ता हैं। उन्होंने अकृतात्माओंके लिये भी दुर्लभ परमगति प्राप्त कर ली है। अतः ब्रह्मज्ञान रखनेवाले आपको उन [ब्रह्मज्ञानी] शुकदेवके लिये चिन्ता नहीं करनी चाहिये; हे पवित्रत्मन्! शुकदेवके समान पुत्रके द्वारा आपकी महान् कीर्ति हुई है’॥ ५३-५५ ½ ॥ | | व्यास उवाच<br>न शोको याति देवेश किं करोमि जगत्पते॥ ५६<br>अतृप्ते लोचने मेऽद्य पुत्रदर्शनलालसे। | व्यासजी बोले—‘हे देवेश! हे जगत्पते! मैं क्या करूँ, शोक दूर नहीं हो रहा है; पुत्र-दर्शनकी लालसावाले मेरे नेत्र अतृप्त हैं’॥ ५६ ½ ॥ | | महादेव उवाच<br>छायां द्रक्ष्यसि पुत्रस्य पार्श्वस्थां सुमनोहराम्॥ ५७<br>तां वीक्ष्य मुनिशार्दूल शोकं जहि परन्तप। | महादेवजी बोले—‘अब आप अपने पुत्रकी रमणीय छाया अपने पास सर्वदा विद्यमान देखेंगे। हे मुनिवर! हे परन्तप! उस छायाको देखकर आप अपना शोक दूर कीजिये’॥ ५७ ½ ॥ | | सूत उवाच<br>तदा ददर्श व्यासस्तु छायां पुत्रस्य सुप्रभाम्॥ ५८<br>दत्त्वा वरं हरस्तस्मै तत्रैवान्तरधीयत।<br>अन्तर्हिते महादेवे व्यासः स्वाश्रममभ्यगात्॥ ५९<br>शुकस्य विरहेणापि तप्तः परमदुःखितः॥ ६० | **सूतजी बोले—**तदनन्तर व्यासजीने अपने पुत्र शुकदेवकी ओजस्विनी छाया देखी। उन्हें वरदान देकर शंकरजी वहीं अन्तर्धान हो गये। महादेवजीके अन्तर्हित हो जानेपर व्यासजी भी अपने आश्रमको लौट आये। शुकदेवजीके वियोगसे सन्तप्त होकर वे अत्यन्त दुःखी रहने लगे॥ ५८-६०॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां प्रथमस्कन्धे शुकस्य विवाहादिकार्यवर्णनं नामैकोनविंशोऽध्यायः॥ १९॥
अथ विंशोऽध्यायः
सत्यवतीका राजा शन्तनुसे विवाह तथा दो पुत्रोंका जन्म, राजा शन्तनुकी मृत्यु, चित्रांगदका राजा बनना तथा उसकी मृत्यु, विचित्रवीर्यका काशिराजकी कन्याओंसे विवाह और क्षयरोगसे मृत्यु, व्यासजीद्वारा धृतराष्ट्र, पाण्डु और विदुरकी उत्पत्ति
| ऋषय ऊचुः<br>शुकस्तु परमां सिद्धिमाप्तवान्देवसत्तमः।<br>किं चकार ततो व्यासस्तन्नो ब्रूहि सविस्तरम्॥ १ | ऋषियोंने कहा—[हे सूतजी!] शुकदेवजीको जब परम सिद्धि प्राप्त हो गयी तब देवश्रेष्ठ व्यासजीने क्या किया? यह सब विस्तारपूर्वक हमसे कहिये॥ १॥ | | सूत उवाच<br>शिष्या व्यासस्य येऽप्यासन्वेदाभ्यासपरायणाः।<br>आज्ञामादाय ते सर्वे गताः पूर्वं महीतले॥ २ | **सूतजी बोले—**उस समय व्यासजीके जितने वेदपाठी शिष्य थे, वे सब व्यासजीकी आज्ञा पाकर पहले ही भूमण्डलमें इधर-उधर चले गये थे॥ २॥ |
| अ० २० ] | प्रथम स्कन्ध | १७१ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| असितो देवलश्चैव वैशम्पायन एव च।<br>जैमिनिश्च सुमन्तुश्च गताः सर्वे तपोधनाः॥ ३<br><br>तानेतान्वीक्ष्य पुत्रं च लोकान्तरितमप्युत।<br>व्यासः शोकसमाक्रान्तो गमनायाकरोन्मतिम्॥ ४ | असित, देवल, वैशम्पायन, जैमिनि और सुमन्तु आदि सभी तपोधन मुनि चले गये थे। उन ऋषियोंको अन्यत्र तथा अपने पुत्र शुकदेवको अन्तरिक्षमें गया हुआ देखकर शोकाकुल व्यासजीने वहाँसे चले जानेका विचार किया॥ ३-४॥ |
| सस्मार मनसा व्यासस्तां निषादसुतां शुभाम्।<br>मातरं जाह्नवीतीरे मुक्तां शोकसमन्विताम्॥ ५ | उसी समय व्यासजीने मन-ही-मन निषादकन्या अपनी कल्याणकारिणी माताका स्मरण किया, जिन्हें उन्होंने शोकावस्थामें गंगाजीके तटपर ही छोड़ दिया था॥ ५॥ |
| स्मृत्वा सत्यवतीं व्यासस्त्यक्त्वा तं पर्वतोत्तमम्।<br>आजगाम महातेजा जन्मस्थानं स्वकं मुनिः॥ ६ | अपनी माता सत्यवतीका स्मरण करके उस श्रेष्ठ पर्वतको त्यागकर महातेजस्वी व्यासजी अपने जन्मस्थानपर चले आये॥ ६॥ |
| द्वीपं प्राप्याथ पप्रच्छ क्व गता सा वरानना।<br>निषादास्तं समाचख्युर्दत्ता राज्ञे तु कन्यका॥ ७<br><br>दाशराजोऽपि सम्पूज्य व्यासं प्रीतिपुरःसरम्।<br>स्वागतेनाभिसत्कृत्य प्रोवाच विहिताञ्जलिः॥ ८ | इस प्रकार उन्होंने उस द्वीपपर जाकर लोगोंसे पूछा कि 'वे सुन्दर मुखवाली [मेरी माता] कहाँ चली गयीं?' तब निषादोंने बताया कि उस कन्याका तो निषादराजने राजा [शन्तनु]-से विवाह कर दिया। तत्पश्चात् निषादराजने व्यासजीका प्रेमपूर्वक पूजन एवं सत्कार करके हाथ जोड़कर कहा—॥ ७-८॥ |
| दाशराज उवाच<br>अद्य मे सफलं जन्म पवित्रं नः कुलं मुने।<br>देवानामपि दुर्दर्शं यज्जातं तव दर्शनम्॥ ९ | दाशराज बोला—हे मुने! मेरा जन्म सफल हो गया और हमारा कुल पवित्र हो गया जो कि आज देवताओंके लिये दुर्लभ आपका दर्शन प्राप्त हुआ॥ ९॥ |
| यदर्थमागतोऽसि त्वं तद् ब्रूहि द्विजसत्तम।<br>अपि दारा धनं पुत्रास्त्वदायत्तमिदं विभो॥ १० | हे विप्रवर! आप जिस कामसे आये हैं, वह बताइये। हे विभो! धन, पुत्र, कलत्र आदि—यह सब आपके अधीन है॥ १०॥ |
| सरस्वत्यास्तटे रम्ये चकाराश्रममण्डलम्।<br>व्यासस्तपःसमायुक्तस्तत्रैवास समाहितः॥ ११ | [निषादराजके प्रार्थना करनेपर] व्यासजीने सरस्वती नदीके सुन्दर तटपर अपना आश्रम बनाया और सावधान-चित्त हो वे पुनः तप करते हुए वहाँ रहने लगे॥ ११॥ |
| सत्यवत्याः सुतौ जातौ शन्तनोरमितद्युतेः।<br>मत्वा तौ भ्रातरौ व्यासः सुखमाप वने स्थितः॥ १२ | अपूर्व तेजस्वी महाराज शन्तनुको सत्यवतीके गर्भसे दो पुत्र उत्पन्न हुए। इन दोनोंको अपना भाई मानकर वनवासी व्यासजी अत्यन्त प्रसन्न हुए॥ १२॥ |
| चित्राङ्गदः प्रथमो रूपवाञ्छत्रुतापनः।<br>बभूव नृपतेः पुत्रः सर्वलक्षणसंयुतः॥ १३<br><br>विचित्रवीर्यनामासौ द्वितीयः समजायत।<br>सोऽपि सर्वगुणोपेतः शन्तनोः सुखवर्धनः॥ १४ | उनमें राजाका पहला पुत्र चित्रांगद रूपवान्, शत्रुओंको कष्ट देनेवाला तथा सभी शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न था। शन्तनुके दूसरे पुत्रका नाम विचित्रवीर्य था। वह भी सर्वगुणसम्पन्न एवं शन्तनुके लिये सुखवर्द्धक हुआ॥ १३-१४॥ |