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ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

( १० ) रसादि ध्वनि किसी भी स्थिति में, बल्कि स्वप्न में भी अभिहित नहीं होता, इसलिए अलौकिक है। इस प्रकार ध्वनिकार के मत में रस ही वस्तुतः आत्मा है, वस्तु और अलङ्कार ध्वनियों का पर्यवसान सर्वथा रस के प्रति होता है, इसलिए वाच्य से उत्कृष्ट होते हैं। अतः सामान्यतः तीनों के लिए 'काव्यस्यात्मा ध्वनिः' कहा है (दे० लोचन, पृ० ४०, ४५, ५०, ५१, ७९, ८६, ९२)। स्वयं आचार्य आनन्दवर्धन ने रस की स्वशब्दवाच्यता का प्रत्याख्यान विस्तार के साथ किया है (पृ० ८१-८४)। मथितार्थ यह कि ध्वनि की प्रतिष्ठा प्रतीयमान या व्यङ्ग्य अर्थ पर है। ध्वनि व्यङ्ग्य अर्थ की प्रधानता की स्थिति में होता है। वाच्य अर्थ व्यङ्ग्य अर्थ की प्रतिष्ठा या भूमि है, इसलिए वह सर्वथा ध्वनि के प्रकरण में उपेक्ष्य नहीं। इसी कारण द्वितीय कारिका में ध्वनिकार ने प्रतीयमान अर्थ के साथ वाच्य अर्थ का समशीर्षिकया गणन किया है, यद्यपि प्रतीयमान अर्थ ही काव्य का आत्मा या सर्वस्व है। 'ध्वनि' का अर्थ ध्वन्यालोक में 'ध्वनि' शब्द का प्रयोग पाँच अर्थों में किया गया है—व्यङ्ग्य अर्थ, वाचक शब्द, वाच्य अर्थ, व्यञ्जना व्यापार और समुदाय रूप काव्य। जैसा कि आचार्य अभिनवगुप्त लिखते हैं— अर्थो वा शब्दो वा व्यापारो वा। अर्थोऽपि वाच्यो वा ध्वनतीति, शब्दोऽप्येवम्। व्यङ्ग्यो वा ध्वन्यत इति। व्यापारो वा शब्दार्थयोर्ध्वननमिति। कारिकया तु प्राधान्येन समुदाय एव काव्यरूपो मुख्यतया ध्वनिरिति प्रतिपादितम्। पृ० १०४-५ तेन वाच्योऽपि ध्वनिः वाचकोऽपि शब्दो ध्वनिः, द्वयोरपि व्यञ्जकत्वं ध्वनतीति कृत्वा। सम्मिश्रयते विभावानुभावसंवलनयेति व्यङ्ग्योऽपि ध्वनिः, ध्वन्यत इति कृत्वा। शब्दनं शब्दः शब्दव्यापारः, न चासावभिधादिरूपः, अपि त्वात्मभूतः, सोऽपि ध्वनिः। काव्यमिति- व्यपदेश्यश्च योऽर्थः सोऽपि ध्वनिः, उक्तप्रकारध्वनिचतुष्टयमयत्वात्। पृ० १४१-१४२ पञ्चधाऽपि ध्वनिशब्दार्थे येन यत्र यतो यस्य यस्मै इति बहुव्रीह्यर्थाश्रयेण यथोचितं सामानाधिकरण्यं सुयोज्यम्। पृ० १४३ 'ध्वनि' शब्द की व्युत्पत्ति के अनुसार उक्त पाँचों अर्थों में इस प्रकार योजना होगी — (१) ध्वनतीति ध्वनिः; (२) ध्वन्यत इति ध्वनिः; (३) ध्वननं ध्वनिः। प्रथम के अनुसार वाच्य अर्थ और वाचक शब्द 'ध्वनि' शब्द से अभिहित होते हैं, द्वितीय के अनुसार केवल व्यङ्ग्य रूप अर्थ ध्वनि है और तृतीय के अनुसार व्यञ्जना व्यापार ध्वनि है। 'ध्वनि' शब्द का पाँचवाँ विषय 'समुदाय रूप काव्य' है, क्योंकि ये चारों प्रकार उसमें होते हैं। इसलिए 'काव्यविशेषः स ध्वनिरिति सूरिभिः कथितः' यहाँ समुदाय रूप काव्य में 'ध्वनि' शब्द का व्यवहार है और प्रथम कारिका में 'काव्यस्यात्मा ध्वनिः' व्यङ्ग्य अर्थ की दृष्टि से कहा गया है। अन्य सभी अर्थों में व्युत्पत्तितः और व्यवहारतः 'ध्वनि' शब्द का प्रयोग होने पर भी मुख्यतः व्यङ्ग्य अर्थ ही 'ध्वनि' शब्द से अभिहित होता है और वह भी शब्द और अर्थ को अतिशयित करके चारुत्वातिशय के कारण प्रधान रूप से प्रतीयमान हो तब 'ध्वनि' कहलाता है। व्यङ्ग्य अर्थ की स्थिति में ही वाच्यादि भी 'ध्वनि' शब्द से वाच्य हो सकते हैं।

( ११ ) साथ ही यह भो समझ लेना आवश्यक है कि 'ध्वनि' को काव्य का आत्मा स्वीकार करते हुए भी ध्वनिकार काव्य में अभिव्यञ्जनीय रस के औचित्य के आधार पर शब्द और अर्थ के अलङ्कार तथा गुणों का समावेश अनिवार्य मानते हैं । इसी उद्देश्य से काव्य का विशेषण देते हुए उन्होंने लिखा है—'विविधवाच्यवाचकरचना-प्रपञ्चचारुणः काव्यस्य०' (पृ० ८९) और भी, 'काव्यस्य हि ललितोचितसन्निवेशचारुणः०' (पृ० ४५) । प्रथम उद्धरण पर लोचनकार का स्पष्ट निर्देश है कि 'तेन सर्वत्रापि ध्वनन सद्भावेऽपि न तथा व्यवहारः, आत्मसद्भावेऽपि क्वचिदेव जीवव्यवहार इत्युक्तं प्रागेव' (पृ० ९०) । केवल ध्वनन रूप आत्मा के होने पर काव्यत्व का निषेध इससे भी और स्पष्ट रूप में लोचनकार लिखते हैं—नन्वेवं 'सिंहो वटुः' इत्यत्रापि काव्यरूपता स्यात् ; ध्वनन- लक्षणस्यात्मनोऽत्रापि समनन्तरं वक्ष्यमाणतया भावात् । ननु घटेऽपि जीवव्यवहारः स्यात् ; आत्मनो विभुत्वेन तत्रापि भावात् । शरीरस्य खलु विशिष्टाधिष्ठानयुक्तस्य सत्यात्मनि जीवव्यवहारः, न यस्य कस्यचिदिति चेत्—गुणालङ्कारौचित्यसुन्दरशब्दार्थशरीरस्य सति ध्वननाख्यात्मनि काव्यरूपता- व्यवहारः । न चात्मनोऽसारता काचिदिति च समानम् । पृ० ५७; काव्यग्रहणात् गुणालङ्कारोपस्कृत- शब्दार्थपृष्ठपाती ध्वनिलक्षण 'आत्मे'त्युक्तम् । पृ० १०३ इस प्रकार प्राचीन आचार्यों द्वारा निर्दिष्ट काव्य के बाह्य तत्त्वों का उचित रूप से आदर करते हुए ध्वनि को काव्य के आत्मा के रूप में ध्वनिकार ने प्रतिष्ठित किया । इतना होते हुए भी वे स्वयं इस सिद्धान्त के प्रतिष्ठापक बनने को तत्पर नहीं। उनका ध्वनि-सिद्धान्त बुधजनों द्वारा 'समाम्नात- पूर्व' था । केवल उस 'ध्वनि' के सम्बन्ध की विप्रतिपत्तियों का निराकरण तथा उसका उदाहरणों आदि द्वारा स्पष्टीकरण सहृदयजनों के मन की प्रसन्नता के लिए उन्होंने यहाँ किया (तेन ब्रूमः सहृदयमनःप्रीतये तत्स्वरूपम्) । ध्वनि : मूल प्रेरणा किसी 'यथाकथञ्चित् प्रवृत्त' कल्पना पर यह ध्वनि-सिद्धान्त प्रवृत्त नहीं हुआ । इसके मूल में प्राचीन वैयाकरणों की उक्ति विद्यमान है । चूंकि व्याकरणशास्त्र सभी विद्याओं का मूल है अतः प्रथम विद्वान् वैयाकरण ही हुए। जैसा कि महावैयाकरण भर्तृहरि ने कहा है— उपासनीयं यत्नेन शास्त्रं व्याकरणं महत् । प्रदीपभूतं सर्वासां विद्यानां यदवस्थितम् ॥ अर्थात् महान् व्याकरणशास्त्र की यत्नपूर्वक उपासना करनी चाहिए, क्योंकि यह सभी विद्याओं के प्रदीप रूप में अवस्थित है (इसी से सभी विद्यायें प्रकाशित होती हैं) । वैयाकरणों ने श्रूयमाण वर्णों को 'ध्वनि' कहा है और यह ध्वनि (श्रूयमाण वर्ण) चूंकि व्यञ्जक होते हैं, इसी आधार पर काव्य-तत्त्वदर्शी विद्वानों ने वाच्यवाचक-सम्मिश्र शब्द रूप काव्य को भी 'ध्वनि' के अभिधान से संकेतित किया और ध्वनिकार ने इसी पक्ष के काव्यशास्त्रीय आधार पर समर्थन एवं प्रकाशन के लिए ध्वन्यालोक के रूप में अपना संरम्भ प्रस्तुत किया । लोचनकार ने ध्वनिकार के कथन को महान् वैयाकरण भर्तृहरि के श्लोक उद्धृत करते हुए 'ध्वनि' को व्यङ्ग्य, व्यञ्जक शब्द-अर्थ एवं व्यञ्जना व्यापार में चरितार्थ बताया है । इसके पूर्व कि हम

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यहां लोचनकार के कथन को और भी पल्लवित रूप दे सकें, वैयाकरणों के 'ध्वनि' के आधारभूत स्फोटवाद पर विचार कर लेना आवश्यक समझते हैं क्योंकि स्फोटवाद शब्द की सृष्टिप्रक्रिया से सम्बन्ध रखता है और हम बिना इसको समझे लोचन के निर्देश को समझ नहीं सकते। स्फोटवाद—यह वह दर्शन है जिसमें शब्द के रूप तथा उससे अर्थ के विकास का निर्णय हुआ है। इस दर्शन का प्रारम्भ कब से हुआ यह निश्चित नहीं, फिर पाणिनि के 'अष्टाध्यायी' ग्रन्थ में एक सूत्र मिलता है—'अवङ् स्फोटायनस्य' (६, १, १२३)। यहाँ किन्हीं 'स्फोटायन' नामक आचार्य का निर्देश है। इनके नाम में 'स्फोट' शब्द है और प्रथमतः उल्लेख के रूप में यही मिलता है अतः कल्पना की जाती है कि स्फोटवाद के प्रतिपादक यह स्फोटायन ही थे। जैसा कि काशिका की टीका 'पदमञ्जरी' में हरदत्त ने लिखा है— 'स्फोटोऽयनं परायणं यस्य स स्फोटायनः स्फोटप्रतिपादनपरो वैयाकरणाचार्यः ।' स्फोटवाद शब्द की नित्यता को स्वीकार करता है और यास्क, पाणिनि ने इसी सिद्धान्त को माना है। शब्द के नित्यत्व पर 'संग्रह' नामक ग्रन्थ में व्याडि ने भी विचार किया था ऐसा निर्देश मिलता है। कात्यायन और पतञ्जलि भी स्फोटवाद के समर्थक हैं। वैयाकरणों ने स्फोटवाद में शब्द को नित्य, एक तथा अखण्ड माना। उस शब्द की अभिव्यक्ति ध्वनि से होती है जिसके दो भेद हैं प्राकृत एवं वैकृत। उनके अनुसार वर्ण और पद सार्थक नहीं, बल्कि वाक्य सार्थक होता है, अर्थात् अर्थ की प्रतीति वाक्य से होती है। पतञ्जलि ने अपना मत स्पष्ट शब्दों में लिखा है— नित्याश्च शब्दाः । नित्येषु च शब्देषु कूटस्थैरविचालिभिर्वर्णैर्भवितव्यमनपायोपजन- विकारिभिः । महाभाष्य, आ० २ पतञ्जलि ने जिस शब्द का लक्षण-निर्देश किया है वह स्फोट शब्द का ही है— श्रोत्रोपलब्धिर्बुद्धिर्निग्राह्यः प्रयोगेणाभिज्वलित आकाशदेशः शब्दः । एकं च पुन- राकाशम् । महाभाष्य, अ.० २ अर्थात् शब्द की उपलब्धि श्रोत्र के माध्यम से होती है। श्रोत्र एक इन्द्रिय है जो कर्णशष्कुल्य- वच्छिन्न आकाशरूप है। तात्पर्य यह कि हमारे कर्ण देश में जितना आकाश है उसी में शब्द की उपलब्धि होती है। श्रोत्रेन्द्रिय एक आकाश ही है। फिर यहां प्रश्न होता है कि जब शब्द में निहित वर्ण अपने उच्चारण के दूसरे क्षण में नष्ट हो जाते हैं तब शब्द का ग्रहण कैसे सम्भव होगा ? इसके समाधान में बुद्धिर्निग्राह्य कहने का तात्पर्य यह है कि पूर्व-पूर्व ध्वनि से उत्पन्न संस्कार का परिपाक होने पर अन्त्य वर्ण के ज्ञान से शब्द का ग्रहण होता है। बुद्धि शब्दों को ग्रहण करती है। बुद्धि में ध्वनियां संस्कार छोड़ती जाती हैं और अन्तिम वर्ण से शब्द का ज्ञान होता है। प्रयोग से अभिज्वलित या प्रकाशित का तात्पर्य यह है कि शब्द तो सर्वदा सर्वत्र विद्यमान रहता है। किन्तु उसकी उपलब्धि उच्चारण से ही होती है। जो विद्यमान शब्द है वही ध्वनि, वर्ण या प्रयोग है। आकाश जो शब्द का आश्रय है वह जब एक है तब उसमें रहने वाला शब्द भी एक ही है। शब्द में वस्तुतः भेद नहीं होता बल्कि उसको व्यक्त करने वाली ध्वनि के तथा देश के भेद के कारण उसमें भेद आरोपित कर लेते हैं, जिस प्रकार एक ही आकाश घटाकाश, मठाकाश आदि रूप में भिन्न हो जाता है।

( १३ ) पतञ्जलि का यह शब्द 'स्फोट' रूप है। ध्वनि स्फोट का गुण है। जिस प्रकार भेरी के आघात में एक अनुरणन होता है, वही ध्वनि है। स्फोट और ध्वनि में प्रथम व्यङ्ग्य है और दूसरा व्यञ्जक। तात्पर्य यह कि ध्वनि से स्फोट रूप शब्द अभिव्यक्त होता है और अभिव्यक्त स्फोट रूप शब्द से अर्थ का ज्ञान होता है। 'वाक्यपदीय' ग्रन्थ में भर्तृहरि ने 'स्फोट' का यथावत विवेचन किया है। वही आगे के सभी वैयाकरणों का आधार हुआ है। वैयाकरणों ने 'स्फोट' शब्द का व्युत्पत्तिलभ्य अर्थ किया है—'स्फुटत्यर्थोऽस्मादिति स्फोटः' अर्थात् जिससे अर्थ स्फुटित होता है वह शब्द स्फोट कहलाता है। इस प्रकार यह एक यौगिक शब्द है। 'स्फोटचन्द्रिका' में श्रीकृष्ण ने इसे योगरूढ बताया है। कहा जा चुका है कि वैयाकरणों के अनुसार स्फोट और ध्वनि शब्द के दो भेद माने गए हैं। आचार्य भर्तृहरि ने उसे ही कहा है— द्वावुपादानशब्देषु शब्दौ शब्दविदो विदुः। एको निमित्तं शब्दानामपरोऽर्थे प्रयुज्यते॥ पुण्यराज के अनुसार इसे इस प्रकार समझ सकते हैं कि स्फोट ध्वनि रूप शब्द ६। उपादान कारण है क्योंकि उससे अर्थ का ज्ञान होता है, और दूसरे ध्वनिरूप शब्द का अर्थों में प्रयोग किया जाता है, अथवा वह शब्द-समुदाय (उपादान) जिसे ध्वनि कहते हैं, स्फोट का निमित्त अर्थात् व्यञ्जक होता है तत्पश्चात् दूसरे स्फोट रूप शब्द के अभिव्यक्त होने पर अर्थ की प्रतीति होती है। अभिप्राय यह कि श्रोता की बुद्धि में स्थित क्रमरहित शब्द स्फोट या ध्वनि शब्द के सुनते ही अभिव्यक्त होता है और वह अर्थ का बोध कराता है। इस प्रकार स्फोट व्यङ्ग्य है और ध्वनि व्यञ्जक। जिस प्रकार कारण और कार्य को कुछ दार्शनिक भिन्न मानते हैं तो कुछ अभिन्न, इसी प्रकार का मतभेद स्फोट और ध्वनि के सन्दर्भ में भी प्राचीन दार्शनिकों में हुआ। स्फोट की स्थिति बुद्धि में उस प्रकार की होती है जिस प्रकार काष्ठ में अग्नि की। उस स्थिति में वह अज्ञात रहता है। किन्तु जब कण्ठ, तालु आदि करणों के आश्रय से विवर्त की स्थिति में आता है तब ध्वनि रूप से प्रतीत होने लगता है। व्यञ्जक ध्वनि के भेद से उसमें भी भेद हो जाता है। जिस प्रकार अग्नि स्वयं को प्रकाशित करता हुआ अन्य घटादि वस्तुओं को प्रकाशित करता है, उसी प्रकार ध्वनि द्वारा व्यञ्जित स्फोट शब्द भी अपने को प्रकाशित करता हुआ अर्थ को भी प्रकाशित करता है। स्फोट और ध्वनि में तादात्म्य माना जाता है, क्योंकि यदि ऐसा न माना जाय तो किसी भी ध्वनि से किसी अर्थ का ज्ञान होना चाहिए, किन्तु ऐसा नहीं होता। फिर भी स्फोट में कोई क्रम नहीं होता तथा भेद भी नहीं होता। उसमें क्रम और भेद की प्रतीति ध्वनि की अभिव्यक्ति के क्रम से होती है। जिस प्रकार चन्द्रमा में चञ्चलता नहीं, किन्तु तरल जल में उसके प्रतिबिम्ब को देखकर उसमें भी चञ्चलता आरोपित करते हैं उसी प्रकार स्फोट में क्रम और भेद वास्तविक नहीं हैं, प्रत्युत आरोपित हैं। मनुष्य की बुद्धि में वह ब्रह्माण्डव्यापी शब्द अपने क्रमरहित एवं निर्विभाग रूप में विद्यमान रहता है और जब उच्चारण की इच्छा होती है तब उसमें एक क्रियारूपा वृत्ति होती है, फिर वह

( १४ ) उस वृत्ति के कारण वाक्य, पद आदि के रूप में आता है। स्वतः अखण्ड है, फिर भी वृत्ति के कारण भागों की तथा क्रम की उसमें सत्ता होतो है। यह ठीक उसी प्रकार होता है जिस प्रकार पक्षी के अण्डे के भीतर केवल अरूप अविभक्त एक तरल पदार्थ होता है वही विशेष स्थिति में एक रूप में आने लगता है। वैयाकरणों ने ध्वनि के दो भेद किए हैं—प्राकृत एवं वैकृत। प्राकृत अर्थात् मौलिक ध्वनि तथा वैकृत ध्वनि अर्थात् प्राकृत ध्वनि का अनुरणन रूप। प्राकृत ध्वनि में स्वभाव भेद रहता है उसी के कारण ह्रस्व, दीर्घ, प्लुत होता है। स्फोट शब्द इस काल-भेद से रहित है किन्तु इसे उसमें आरोपित करते हैं। प्राकृत ध्वनि के काल का शब्द में आरोप करके उसे व्यवहार का विषय बनाते हैं। प्राकृत ध्वनि में ह्रस्व, दीर्घ आदि गुण हैं और वैकृत ध्वनि में द्रुत, मध्य एवं विलम्बित वृत्तियाँ रहती हैं। प्राकृत ध्वनि के पश्चात् वृत्तिभेद होने पर यह ध्वनि उत्पन्न होते हैं। और जैसा कि भगवान् भर्तृहरि का कहना है— स्फोटस्य ग्रहणे हेतुः प्राकृतो ध्वनिरिष्यते । वृत्तिभेदे निमित्तत्वं वैकृतः प्रतिपद्यते ॥ स्फोट का ग्रहण प्राकृत ध्वनि से होता है। प्राकृत को स्फोट का प्रतिबिम्ब माना जाता है। यद्यपि प्राकृत ध्वनि में नित्यता नहीं है, तथापि स्फोट की नित्यता उसमें भी मान ली जाती है। प्राकृत ध्वनि के पश्चात् उत्पन्न होने वाली ध्वनि को मूल का विकार कहा जाता है और उससे ही सब प्रकार की वृत्तियों का भेद होता है। संक्षेप में इस विस्तारगम्य विषय को प्रस्तुत में इतना ही समझ लेने की आवश्यकता है। लोचनकार ने वैयाकरणों के ध्वनि को काव्य-सिद्धान्ताय ध्वनि-विचार में संगत करते हुए भगवान् भर्तृहरि के कुछ श्लोक उद्धृत किए हैं। काव्य में 'ध्वनि' शब्द से मुख्यतः व्यङ्ग्य अर्थ, व्यञ्जक शब्द-अर्थ एवं व्यञ्जनाव्यापार इन सब का ग्रहण होता है। प्रथम जो व्यङ्ग्य अर्थ 'ध्वनि' कहा जाता है वह घण्टादि के शब्द के स्थान पर अनुरणन रूप होता है और व्याकरण-दर्शन में उत्पत्तिवादियों के मतानुसार स्फोट वह शब्द है जो स्थान, प्रयत्न आदि से वायु में संयोग या विभाग के कारण उत्पन्न होता है और उस शब्द से उत्पन्न होने वाले (शब्दज शब्द अर्थात् घण्टानुरणन रूप शब्द) ध्वनि कहे जाते हैं। (ये उत्पत्तिवादी आचार्य स्फोट को नित्य नहीं मानते, बल्कि इनके अनुसार स्फोट उत्पन्न होता है अतएव अनित्य है।) श्लोक इस प्रकार है— यः संयोगवियोगाभ्यां करणैरुपजन्यते । स स्फोटः शब्दजाः शब्दा ध्वनयोऽन्यैरुदाहृताः ॥ वाक्यपदीय, १।१०३ जैसा कि वैयाकरणों का अभिमत है, नाद अर्थात् श्रूयमाण वर्ण स्फोट के अभिव्यञ्जक होते हैं और स्फोट अन्त्यबुद्धिनिर्ग्राह्य होता है। इस प्रकार श्रूयमाण वर्ण या नाद, जिन्हें 'ध्वनि' कहते हैं, क्रमशः स्फोट को बुद्धि में प्रकाशित या अभिव्यक्त करते जाते हैं। भर्तृहरि कहते हैं—

( १५ ) प्रत्ययैरनुपाख्येयैर्ग्रह्णानुगुणैस्तथा । ध्वनिप्रकाशिते शब्दे स्वरूपमवधार्यते ॥ वाक्यपदीय, १।८४ इस प्रकार व्यङ्ग्य अर्थ के व्यञ्जक शब्द-अर्थ भी प्रस्तुत काव्य-सिद्धान्त में ‘ध्वनि’ शब्द से अभिहित हैं । फिर ऐसा होता है कि वर्णों के परिमित होने से अल्पतर यत्न से उच्चारित शब्द को जब बुद्धि नहीं ग्रहण कर पाती, उस स्थिति में वक्ता का जो प्रसिद्ध उच्चारण-व्यापार से अधिक द्रुत, विलम्बित आदि वृत्तियों का भेदरूप व्यापार है उसे भी ध्वनि कहते हैं— शब्दस्योर्ध्वमभिव्यक्तेर्वृत्तिभेदे तु वैकृताः । ध्वनयः समुपोहन्ते स्फोटात्मा तैर्न भिद्यते ॥ वाक्यपदीय, १।७८ कहा जा चुका है कि ये वृत्तियां वैकृत ध्वनि में होती हैं और उच्चारण-व्यापार से ये अतिरिक्त व्यापार हैं । इसी आधार पर प्रस्तुत में ध्वनिकार ने प्रसिद्ध अभिधा, तात्पर्य और लक्षणा व्यापारों से अतिरिक्त व्यञ्जना व्यापार को भी ‘ध्वनि’ कहा है । और व्यङ्ग्य अर्थ, व्यञ्जक शब्द और अर्थ, व्यञ्जना-व्यापार ये चार ध्वनि हैं तो इनके योग से समुदायरूप काव्य भी ‘ध्वनि’ पदवाच्य होता है । वाच्यार्थ और व्यङ्ग्यार्थ का अन्तर ध्वनिकार ने स्वयं वाच्यार्थ और व्यङ्ग्यार्थ का अन्तर स्पष्ट करते हुए जिन भेदों का निर्देश किया है वे क्रमशः इस प्रकार हैं— स्वरूपभेद—इसके कारण जो वाच्य और व्यङ्ग्य का भेद है वह यह है कि कहीं वाच्य विधिरूप है तो व्यङ्ग्य निषेधरूप ( उदाहरण, पृ० ५२ ) ; कहीं वाच्य प्रतिषेधरूप है तो व्यङ्ग्य विधिरूप ( पृ० ७१ ) इत्यादि । विधि और प्रतिषेध के भिन्न होने में किसको संशय हो सकता है ? विषयभेद—वाच्य अर्थ का विषय एक व्यक्ति होता है तो व्यङ्ग्य अर्थ का विषय उससे भिन्न व्यक्ति ( उदा० पृ० ७६ ) । भिन्नसामग्रीवेद्यत्व ( निमित्तभेद )—वाच्य अर्थ को शब्द-अर्थ के नियमों के ज्ञानमात्र से, कोश-व्याकरणादि के परिचय रखने मात्र से प्रत्येक व्यक्ति जान सकता है और व्यङ्ग्यार्थ को काव्यार्थ के तत्त्वज्ञ ही, अर्थात् सहृदयजन ही जान सकते हैं । इनके अतिरिक्त ‘काव्यप्रकाश’ के पञ्चम उल्लास में आचार्य मम्मट ने अनेक कारणों का इस सन्दर्भ में निर्देश किया है, जैसे— संख्याभेद—वाच्य सभी व्यक्तियों के प्रति एकरूप होने से नियत है । किन्तु व्यङ्ग्य अर्थ नानाविध होता है, अतः अनियत है । कालभेद—पहले वाच्य अर्थ अवगत होता है पश्चात् व्यङ्ग्य अर्थ । आश्रय—वाच्य शब्द पर आश्रित है, व्यङ्ग्य शब्द, शब्द के एकदेश, उसके अर्थ, वर्ण, संघटना पर आश्रित है ।

( १६ ) कार्यभेद—वाच्य का कार्य प्रतीतिमात्र होता है और व्यङ्ग्य का कार्य चमत्कृति है । इन सभी पार्थक्य के हेतुओं को एक कारिका में साहित्य-दर्पणकार ने संगृहीत कर दिया है— बोद्धृस्वरूपसंख्यानिमित्तकार्यप्रतीतिकालनाम् । आश्रयविषयादीनां भेदाद् भिन्नोऽभिधीयते व्यङ्ग्यः ॥ यहाँ तक हम ध्वन्यालोक के मुख्य प्रतिपाद्य ध्वनि तत्त्व से सम्बद्ध अनेक तथ्यों से अवगत हो गए । साथ ही ध्वनि, जो स्वरूपतः काव्य में प्रतीयमान या व्यङ्ग्य अर्थ के प्राधान्य की स्थिति में माना जाता है, हमने यह भी देखा, कि वह केवल वाच्य की कक्ष्या से आगे नहीं, वरन्, तात्पर्य, लक्ष्य की कक्ष्याओं से भी आगे चतुर्थ कक्ष्या में रहने वाले व्यङ्ग्य अर्थ में सम्पन्न होता है । लोचन में बड़े विस्तार से व्यङ्ग्य अर्थ की चतुर्थकक्ष्याविविष्टता पर आचार्य अभिनवगुप्त ने विचार किया है । व्यङ्ग्य अर्थ के विरोध में उपस्थित तात्पर्यवृत्ति, लक्षणा, अभिहितान्वयवादी, अन्विताभिधानवादी और भट्टनायक के मत का खण्डन तर्कपूर्ण ढंग से किया है ( पृ० ५४-७० ) । हम ऊपर निर्देश कर चुके हैं कि ध्वनिकार ने रस को अलङ्कार के संकीर्ण क्षेत्र से बाहर निकाल कर मुख्यतः काव्य के आत्मा के योग्य आसन पर प्रतिष्ठित किया । किन्तु रसमात्र के ग्रहण से काव्य की उत्तमता का सर्वाङ्गीण संस्पर्श नहीं हो पाता था, क्योंकि ऐसे भी पद्य मिलते हैं जो रस से कुछ न्यून ही सही, अतिशय चमत्कार उत्पन्न करते हैं, इस दृष्टि से आचार्य आनन्द- वर्धन ने ध्वनि के रूप में उन्हें भी संगृहीत किया जिनमें वस्तु और अलङ्कार प्रधान्यतः प्रतीयमान या व्यङ्ग्य होते हैं । और साथ ही, इन ध्वनियों में भी रस-चमत्कार को ही आचार्य ने पार्यन्तिकता दी । इस प्रकार एक ओर रस अनिवार्य भी रह गया और दूसरी ओर अपनी साधारण स्थिति में काव्य की उत्कृष्टता का बाधक भी नहीं हुआ । भारतीय साहित्य-शास्त्र में रस को इस प्रकार विस्तृत भूमि देने का समग्र रूप से एकमात्र श्रेय ध्वनिकार आनन्दवर्धन को है । रस के चमत्कार को ध्वनिकार काव्य की सर्वोत्कृष्ट भूमि मानते हैं, उनके अनुसार क्रौञ्च के जोड़े के वियोग से उत्पन्न वाल्मीकि का ‘शोक’ जो ‘श्लोक’ बन गया वह दुःख की भूमि नहीं वरन् आनन्द की अलौकिक भूमि है, ‘मा निषाद०’ को पढ़कर सहृदय का मन रस की अलौकिक चर्वणा करने लगता है । काव्यस्यात्मा स एवार्थस्तथा चादिकवेः पुरा । क्रौञ्चद्वन्द्ववियोगोत्थः शोकः श्लोकत्वमागतः ॥ १।५ ध्वनि के सम्बन्ध में विरुद्ध आपत्तियां यद्यपि ध्वनिकार स्वयं को ध्वनिसिद्धान्त का पुरस्कर्ता नहीं कहते, बल्कि उनके अनुसार बुधजनों ने जिस ध्वनि को काव्य के आत्मा रूप में पहले से समाम्नात ( समाम्नातपूर्वः, सम्यग् आ समन्तात् म्नातः प्रकटितः ) किया है वह सहृदय जनों के मन की प्रीति के लिए उसके लक्षण का निरूपण करते हैं । इससे यह लक्षित होता है कि ध्वनि का सिद्धान्त ध्वनिकार से पहले भी प्रचलित था, हां उसे पुस्तक रूप देने का प्रयास सर्वप्रथम ध्वनिकार द्वारा हुआ । जैसा कि लोचन में स्पष्ट निर्देश भी किया है—‘बुधस्यैकस्य प्रामादिकमपि तथाऽभिधानं स्यात्, न तु भूयसां तद् युक्तम् ।

( २७ ) तेन बुधैरिति बहुवचनम् । तदेव व्याचष्टे—परम्परयेति । अविच्छिन्नेन प्रवाहेण तैरेतदुक्तं विनाऽपि विशिष्टपुस्तकेषु विनिवेशनादित्यभिप्रायः ।' (पृ० ११) इससे सम्भावित किया जा सकता है कि जब ध्वनिकार से पूर्व ध्वनि की मौखिक रूप में स्थिति थी तब उसका विरोध भी अवश्य रहा होगा । जैसा कि ध्वनिकार के समानकालिक मनोरथ कवि का ध्वनि-विरोधी श्लोक भी (पृ० २९) प्राप्त होता है। ध्वनिकार ने प्रथम कारिका में ध्वनि के विरोध में प्रचलित तीन विमतियों का निर्देश किया है—अभाववाद, भाक्तवाद और अनिर्वचनीयतावाद । अभाववाद सर्वथा सम्भावना पर आधारित है, अर्थात् ध्वनिकार ने ध्वनि के सम्बन्ध में अभाववादियों की सम्भावना करके इसका निर्देश किया है । दूसरा भाक्तवाद प्राचीन ग्रन्थों में वर्णित है; यद्यपि किसी प्राचीन आचार्य ने ध्वनि को मान कर भक्ति या लक्षणा का अवलम्बन नहीं किया है, फिर भी काव्य में अमुख्य वृत्ति से व्यवहार का निर्देश किया है । तीसरा अनिर्वचनीयतावाद एक रूप से ध्वनि की स्वीकृति ही है, इसलिए यह कोई प्रबल विरोधी वाद नहीं कहा जा सकता । ध्वन्यालोक में प्रथम अभाववाद को तीन रूपों में विभक्त किया है, तदनुसार अभाववादियों के प्रथम पक्ष का कहना है कि शब्द-अर्थ रूप काव्य के चारुत्वाधायक अनुप्रास-उपमा आदि अलङ्कार और माधुर्य आदि गुण तथा इन गुणों से अभिन्न वृत्तियां एवं रीतियां प्रसिद्ध हैं । इनके अतिरिक्त ध्वनि कुछ भी नहीं है । दूसरे पक्ष का कहना है कि यदि मान भी लिया जाय कि कोई ध्वनि है तो वह निर्दिष्ट प्रस्थानों में किसी रूप में अन्तर्गत है न कि इनसे सर्वथा भिन्न रूप । इसी क्रम में तृतीय अभाववादियों का कहना है यह स्वीकार करते हुए भी कि ध्वनि किसी निर्दिष्ट अलङ्कार या गुण आदि के अन्तर्गत नहीं है, तो क्यों नहीं ऐसा समझा जाय कि ध्वनि कोई ऐसा अलङ्कार आदि था जिस पर किसी का अब तक ध्यान नहीं गया । वाग्विकल्प अनन्त हैं, फिर किसी तत्त्व का अनिर्दिष्ट रह जाना कोई आश्चर्य का विषय नहीं । इस प्रकार तीनों अभाववादियों के अनुसार ध्वनि कोई भिन्न पदार्थ नहीं है । भाक्तवाद में भक्ति या लक्षणा शब्द का अमुख्य व्यापार मानी जाती है । गुणवृत्ति भी इसे कहते हैं । ध्वनि को ये लोग लक्षणा या भक्ति से अभिन्न मानते हैं और ध्वन्यर्थ को लक्ष्यार्थ की कोटि में लाते हैं । ये दूसरे विरोधी ध्वनि के विरोधी नहीं, ध्वनि के लक्षण के विरोधी हैं । इनके अनुसार ध्वनि का लक्षण भक्ति या लक्षणा के लक्षण से भिन्न नहीं । तृतीय विरोधी जो अनिर्वचनीयतावादी हैं उनके अनुसार ध्वनि कोई विलक्षण पदार्थ है । ध्वनि की स्थापना करते हुए इन तीनों विरोधों का ध्वनिकार ने प्रबल तर्कों द्वारा युक्तिसङ्गत खण्डन प्रस्तुत किया है । सबसे पहले ध्वनिकार ने प्रतीयमान व्यङ्ग्य अर्थ को वाच्य अर्थ में, अङ्गनाओं में लावण्य की भांति, सहृदय जनों के लिये आनन्ददायक निर्देश किया, तत्पश्चात् वह किस प्रकार वाच्य से भिन्न एवं उत्कृष्ट है इसका निर्देश स्वरूपभेद, विषयभेद आदि युक्तियों से किया । तब ध्वनि का लक्षण किया— यत्रार्थः शब्दो वा तमर्थमुपसर्जनीकृतस्वार्थौ । व्यङ्क्तः काव्यविशेषः स ध्वनिरिति सूरिभिः कथितः ॥ १।१३ पृ० १०२ जैसा कि अभाववादियों का कहना था कि जब ध्वनि कमनीयता की दृष्टि से कोई अतिरिक्त नहीं तो वह उक्त अलङ्कारों में ही अन्तर्भूत हो जाता है, इसके उत्तर में आनन्दवर्धन ने कहा कि २ ध्व० भू०

( १८ ) उक्त अलङ्कार तो वाच्य-वाचक मात्र पर आश्रित हैं और ध्वनि व्यङ्ग्य व्यञ्जकभाव पर, ऐसी स्थिति में कैसे अन्तर्भाव हो सकता है, साथ ही वे अलङ्कार आदि तो वाच्य और वाचक के चारुत्वहेतु होने के कारण उस ध्वनि के अङ्गभूत हैं और यह अङ्गी है । लक्ष्यार्थ को ध्वन्यर्थ मानने वाले भाक्तवादियों का खण्डन करते हुए ध्वनिकार का पक्ष है कि जिस प्रकार वाच्यार्थ नियत होता है उस प्रकार लक्ष्यार्थ भी एक सीमा में होता है, जब कि ध्वन्यर्थ के लिए कोई नियमन अनिवार्य नहीं। तात्पर्य यह कि लक्ष्यार्थ जब भी होगा वाच्यार्थ से सम्बद्ध होगा। गङ्गा का लक्ष्यार्थ तट अवश्य ही प्रवाहरूप वाच्यार्थ से सम्बद्ध होना चाहिए। इस प्रकार लक्ष्यार्थ भी एक होता है, जब कि व्यङ्ग्यार्थ अनेक भी हो सकता है। दूसरे यह कि (प्रयोजनवती ) लक्षणा में प्रयोजन का अंश सर्वथा व्यङ्ग्य ही होता है, यदि उसे भी लक्ष्य मान लिया जाय तो उसका प्रयोजन क्या होगा ? अनवस्था होगी । तीसरे यह कि रसादि किसी स्थिति में लक्ष्य नहीं हो सकते, क्योंकि मुख्यार्थ की बाधा में लक्षणा होती है। रसादि वाच्यार्थ के अवगत होने के पश्चात् मुख्यार्थबाध के अभाव में भी वाच्यार्थ से भिन्न रूप में व्यञ्जित होने के कारण सर्वथा व्यङ्ग्य ही होते हैं, ऐसी स्थिति में सर्वथा लक्ष्य अर्थ से नहीं काम चल सकता । व्यङ्ग्य अर्थ और उसके लिए व्यञ्जना शक्ति अवश्य स्वीकार करनी होगी । इस प्रकार ये तीन पक्ष ध्वनि के विरोध में ध्वन्यालोक में ही निर्दिष्ट हैं। किन्तु ध्वन्यालोक के निर्माण के पश्चात् भी उसका प्रबल विरोध हुआ । फिर भी आचार्य आनन्दवर्धन का प्रभाव परवर्ती शास्त्रीय विचारधारा पर अप्रतिहत रूप से लक्षित होता है, यह उनकी स्थापनाओं की सर्वाङ्गपूर्णता का ही ज्वलन्त प्रमाण है। आगे हम ध्वनि के विरोधी आचार्यों, की चर्चा करेंगे । ध्वन्यालोक : स्वरूपस्थिति ध्वन्यालोक तीन भागों में विभक्त है—कारिका, वृत्ति और उदाहरण । काव्यमाला प्रथम सं० के अनुसार कारिकाएँ १२६ हैं, किन्तु काशी चौखम्बा संस्करण के अनुसार उनकी व्यवस्थित संख्या ११६ है । कारिकाओं के व्याख्यान रूप में वृत्ति-भाग है जो गद्य में है, कहीं-कहीं वृत्ति में परिकर-श्लोक, संक्षेप-श्लोक, संग्रह-श्लोक भी हैं। उदाहरण भाग पूर्ववर्ती कवियों के ग्रन्थों से उद्धृत और आनन्दवर्धन के स्वनिर्मित ग्रन्थों के पद्यों का है। सम्पूर्ण ग्रन्थ चार उद्योतों में विभक्त है । प्रथम उद्योत की प्रथम कारिका मन्दाक्रान्ता में, चतुर्थ और षष्ठ उपजाति में, त्रयोदश आर्या में है; तृतीय उद्योत में चार आर्याएँ हैं। इनके अतिरिक्त प्रथम तीन उद्योतों में श्लोक छन्द है । किन्तु चतुर्थ उद्योत की १७ कारिकाओं में अन्तिम तीन पद्य क्रमशः रथोद्धता, मालिनी और शिखरिणी-छन्दों में हैं । अब भी मूल ध्वन्यालोक, उसकी कारिका और वृत्ति के शुद्ध पाठों के सम्बन्ध में विद्वानों में मतभेद बना हुआ है, जैसा कि प्रो० शिवप्रसाद भट्टाचार्य ने चतुर्थ उद्योत की कारिकाओं को बाद का निर्माण बताया है तथा और अनेक अटकल लगाये हैं । काव्यमाला संस्करण के पृ० १४४ (अथवा १७८) पर वृत्ति ग्रन्थ में यह आर्या मुद्रित है— 'इति काव्यार्थविवेको योऽयं चेतश्चमत्कृतिविधायी । सूरिभिरनुसृतसारैरस्मदुपज्ञो न विस्मार्यः ॥' इति ।

( १६ ) काव्यमाला संस्करण के मूलाधार तीन पाण्डुलिपियों में से दो में यह आर्या नहीं है, जैसा कि वहाँ सम्पादकों का निर्देश है ( इयमार्या क-ख पुस्तकोर्नास्ति ) । म० म० काणे महाशय के अनुसार उन्हें प्राप्त अन्य पाँच पाण्डुलिपियों में यह आर्या नहीं है । इसलिए यह निश्चित ही Spurious है । ध्वन्यालोक का संक्षिप्त विषय-निर्देश ध्वन्यालोक का लक्ष्य ध्वनि का सर्वाङ्गीण प्रतिपादन एवं स्थापना है । प्रथम उद्योत में, ध्वनि के सम्बन्ध में तीन विमतियों की सम्भावना करके उनका निराकरण किया है । वाच्य अर्थ से प्रतीयमान का भेद और प्राधान्य प्रतिपादित करके ध्वनि काव्य का लक्षण प्रस्तुत किया गया है । द्वितीय उद्योत में, ध्वनि काव्य के भेदों का निरूपण है । इसी क्रम में असंलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य के रूप में रसादि ध्वनि की चर्चा की गई है । रसवदलङ्कार से रसध्वनि का भेद-निर्देश किया है एवं गुण और अलङ्कार का लक्षण प्रस्तुत किया है । रस के अनुसार गुणों की व्यवस्था की गई है । रस की दृष्टि से, विशेष रूप से शृङ्गार में रूपक आदि अलङ्कारों के ग्रहण और त्याग की समीक्षा उदाहरणों द्वारा की है । शब्दशक्तिमूलसंलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य के प्रसङ्ग में, श्लेष और शब्दशक्तिमूल ध्वनि का भेद निर्देश किया है । विस्तार से ध्वनि के अन्य भेदों का सोदाहरण प्रतिपादन किया है । तृतीय उद्योत में ध्वनि के द्वितीय उद्योत में व्यङ्ग्य के प्रकार से लक्षित भेदों का व्यञ्जक के प्रकार से सोदाहरण निर्देश किया है । अलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य ध्वनि का वर्ण, पद, पदावयव, वाक्य, सङ्घटना और प्रबन्ध में भी लक्षित होने का निर्देश किया है । सङ्घटना का स्वरूप-निरूपण और गुणों के साथ उसका सम्बन्ध विस्तार के साथ प्रस्तुत किया है । प्रबन्धरूप अलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य ध्वनि के नियोजन का प्रकार रसादि की व्यञ्जकता के अनुसार बताया है । कथा-शरीर के निर्माण में औचित्य के ध्यान की अनिवार्यता का निर्देश करते हुए औचित्यबन्ध का रस का उपनिषद् कहा है और अनौचित्य का रसभङ्ग का प्रकार कारण बताया है । फिर रस के विरोधियों का परिहार बताया है । मीमांसक के साथ वाक्य के व्यञ्जकत्व को लेकर विचार, व्यञ्जकत्व एवं गौणत्व का स्वरूपतः और विषयतः भेद, व्यङ्ग्य और व्यञ्जक का स्वरूप-विवेक आदि विषयों की विस्तार से चर्चा है । पुनः, काव्य के दूसरे प्रकार गुणीभूतव्यङ्ग्य का स्वरूप-निर्देश करते हैं । ध्वनि में व्यङ्ग्य की स्थिति प्राधान्यतः होती है और द्वितीय भेद में गुणीभावतः । इनके अतिरिक्त काव्य का तृतीय भेद है, जो चित्र कहलाता है । चतुर्थ उद्योत में, प्रतिभा के आनन्त्य का विस्तार से निरूपण है । ध्वनि के भेदों के आधार पर प्रतिभावान् कवि प्राचीन अर्थ भाव, उक्ति आदि में नवीन चमत्कार उत्पन्न कर सकता है । इस प्रकार आचार्य ने काव्यक्षेत्र को अनन्तता निर्दिष्ट की है । आनन्दवर्धनाचार्य ध्वन्यालोककार आचार्य आनन्दवर्धन का समय बहुत कुछ निर्धारित है । 'राजतरङ्गिणी' में कल्हण ने अवन्तिवर्मा के साम्राज्य में प्रसिद्ध होने वाले कवि के रूप में उनका उल्लेख किया है— मुक्ताकणः शिवस्वामी कविरानन्दवर्धनः । प्रथां रत्नाकरश्चागात् साम्राज्येऽवन्तिवर्मणः ॥ ५।३४

( २० )

बूह्लर और जैकोबी के अनुसार अवन्तिवर्मा का राज्यकाल ८५५-८८३ ई० था । अब कुछ विद्वानों ने अवन्तिवर्मा के पुत्र शङ्करवर्मा ( ८८३-९०२ ई० ) के साथ भी आनन्दवर्धन की समसामयिकता सिद्ध करने का प्रयत्न किया है । क्योंकि आनन्दवर्धन के जीवनकाल का ठीक सङ्केत प्राप्त नहीं । वह तो अवन्तिवर्मा के राज्यकाल के आधार पर निश्चित होता है । कवि के रूप में आनन्दवर्धन ने प्रसिद्धि अवन्तिवर्मा के राज्यकाल में प्राप्त की थी । और जब उन्होंने ध्वन्यालोक का निर्माण किया तब निश्चित ही वह प्रौढ़ एवं वयःप्राप्त हो चुके होंगे, क्योंकि उन्होंने अपने सभी काव्य-निर्माणों का उल्लेख ‘ध्वन्यालोक’ में किया है । इसलिए उनका शङ्करवर्मा के काल में भी विद्यमान रहना युक्तिसङ्गत है । और भी, जैसा कि आनन्दवर्धन ने राजा यशोवर्मा द्वारा रचित ‘रामाभ्युदय’ नाटक का उल्लेख एवं उसके एक पद्य ‘कृतककुपितैः०’ का उल्लेख किया है ( पृ० ३३३ ), और यशोवर्मा को विद्वानों ने शङ्करवर्मा से अभिन्न माना है । न्यायमञ्जरी के रचयिता भट्टजयन्त शङ्करवर्मा के समसामयिक थे । जयन्तभट्ट ने आनन्दवर्धन के ध्वनिसिद्धान्त का खण्डन ‘न्यायमञ्जरी’ में किया है— एतेन शब्दसामर्थ्यमहिम्ना सोऽपि वारितः । यमन्यः पण्डितंमन्यः प्रपेदे कञ्चन ध्वनिम् ॥ विधेर्निषेधावगतिर्विधिबुद्धिर्निषेधतः । यथा— 'भम धम्मिअ वीसत्थो मा स्म पान्थ गृहं विश । मानान्तरपरिच्छेद्यवस्तुरूपोपदेशिनाम् ॥ शब्दानामेव सामर्थ्यं तत्र तत्र तथा तथा । अथवा नेदृशी चर्चा कविभिः सह शोभते । विद्वांसोऽपि विमुह्यन्ति वाक्यार्थगहनेऽध्वनि ॥ पृ० ४५ यह सम्भव है कि आनन्दवर्धन जयन्त के पहले, किन्तु समकालिक थे और साथ ही शङ्करवर्मा के भी समकालिक थे । इस प्रकार आनन्दवर्धन का समय ९०२ ई० माना जा सकता है ( दे० ध्व० प्रथम उद्योत, विष्णुपद भट्टाचार्य की भूमिका ) । और भी, ध्वन्यालोक में उद्भट का उल्लेख है जिनका समय ८०० ई० माना जाता है, तथा आनन्दवर्धन का राजशेखर ( लगभग ९००-९२५ ) ने उल्लेख किया है । इस प्रकार उनके साहित्यिक निर्माणों का समय ८६०-८९० ई० के बीच होना चाहिए ( दे० म० म० काणे, History of Sanskrit poetics तु० सं०, पृ० २०२ ) । आनन्दवर्धन के वंश के सम्बन्ध में कुछ भी विदित नहीं है । केवल ‘देवीशतक’ के अन्त में उल्लेख है कि वह ‘नोण’ के पुत्र थे, वह स्वयं लिखते हैं— देव्या स्वमोद्गमादिष्टदेवीशतकसंज्ञया । देशितानुपमामाधात्ततो नोणसुतो नुतिम् ॥ का० मा० नवम : निर्णय सा० ‘देवीशतक’ की रचना उन्होंने ‘विषमबाणलीला’ और ‘अर्जुनचरित’ के बाद में की थी, जैसा कि इस पद्य से विदित होता है—

( २१ ) येनानन्दकथायां त्रिदशानन्दे च ललिता वाणी । तेन सुदुष्करमेतत् स्तोत्रं देव्याः कृतं भक्त्या ॥ ‘काव्यानुशासनविवेक’ में हेमचन्द्र ने भी आनन्दवर्धन के ‘देवीशतक’ का उद्धरण देते हुए उन्हें ‘नोणसुत’ कहा है (पृ० २२५) । श्री विष्णुपद भट्टाचार्य के अनुसार ‘India office Library' की पाण्डुलिपि की तृतीय उद्योत के अन्त की पुष्पिका में आनन्दवर्धन के पिता नोण या नाणोपाध्याय प्रमाणित होते हैं, और चतुर्थ उद्योत की भूमिका में ‘जोणोपाध्याय’ नाम मिलता है । आनन्दवर्धन के ग्रन्थ—देवीशतक, विषमबाणलीला, अर्जुनचरित ये तीन काव्यग्रन्थ हैं । अन्तिम दो का उल्लेख ‘ध्वन्यालोक’ में मिलता है (२।१, २।२७; पृ० ३८८) । देवीशतक के अन्तिम उपर्युक्त श्लोक के व्याख्यान में कैयट ने भी आनन्दवर्धन की विषमबाणलीला और अर्जुन- चरित, दोनों कृतियों का निर्देश किया है । तथा पीटर्सन की द्वितीय रिपोर्ट के अनुसार, जैसा कि श्री विष्णुपद भट्टाचार्य ने लिखा है, ‘सारसमुच्चय’ नामक ग्रन्थ में आनन्दवर्धन की ‘विषमबाणलीला’ का उल्लेख है । आनन्दवर्धन के दार्शनिक निर्माणों का सङ्केत वृत्तिग्रन्थ एवं उस पर लोचन से मिलता है । जैसा कि आचार्य आनन्दवर्धन ने ध्वनि की अनिर्वचनीयता मानने वालों (‘केचिद् वाचां स्थितम- विषये तत्त्वमूचुस्तदीयम्’) को उत्तर देते हुए लिखा है—‘यत्तु अनिर्देश्यत्वं सर्वलक्षणविषयं बौद्धानां प्रसिद्धं तत्तन्मतपरीक्षायां ग्रन्थान्तरे निरूपयिष्यामः’ (पृ० ५५५) । इस पर लोचनकार लिखते- हैं—‘ग्रन्थान्तर इति विनिश्चयटीकायां धर्मोत्तर्यां या वृत्तिरमुना ग्रन्थकृता कृता तत्रैव तद्व्याख्यातम् ।’ इससे निश्चित होता है कि आचार्य ने बौद्धदार्शनिक आचार्य धर्मोत्तर की ‘विनिश्चयटीका’ पर ‘वृत्ति’ रूप से व्याख्यान प्रस्तुत किया था । ‘प्रमाणविनिश्चय’ आचार्य धर्मकीर्ति द्वारा लिखित बौद्धन्याय का एक ग्रन्थ है, और आचार्य धर्मोत्तर ने उस पर ‘प्रमाणविनिश्चयटीका’ लिखी थी । आचार्य धर्मोत्तर का समय म० म० सतीशचन्द्र विद्याभूषण के अनुसार ४४७ ई० है । आचार्य धर्मकीर्ति का उल्लेख ध्वन्यालोक में मिलता है—‘लावण्यद्रविणव्ययो न गणितः...तथा चायं धर्मकीर्तेः श्लोक इति प्रसिद्धिः । सम्भाव्यते च तस्यैव । यस्मात् अनध्यवसितावगाहन०’ (पृ० ५२१) । इसके अतिरिक्त, जैसा कि आचार्य अभिनवगुप्त ने निर्देश किया है, आनन्दवर्धन का एक और दार्शनिक ग्रन्थ ‘तत्त्वालोक’ था, जो अद्वैतसिद्धान्तसम्बन्धी निर्माण लगता है—‘तदुत्तीर्णत्वे तु सर्वं परमेश्वराद्वयं ब्रह्मेत्यस्मच्छास्त्रकारेण न न विदितं तत्त्वालोकग्रन्थं विरचयतेत्यास्ताम् । (पृ० ६७); ‘एतच्च ग्रन्थ- कारेण तत्त्वालोके वितत्योक्तमिह त्वस्य न सुहृद्योऽवसर इति नास्माभिर्दर्शितम्’ (पृ० ५३३) । इस प्रकार यह अत्यन्त विलक्षण बात है कि हमारे आचार्य कवि-आलोचक के साथ प्रथम श्रेणी के दार्शनिक भी थे । यह बात स्वयं उनके इस पद्य से भी पूर्णतः प्रमाणित होती है— यथा ममैव— ‘या व्यापारवती रसान् रसयितुं काचित्कवीनां नवा, दृष्टिर्या परिनिष्ठितार्थविषयोन्मेषा च वैपश्चिती । ते द्वे अप्यवलम्ब्य विश्वमनिशं निर्वर्णयन्तो वयं श्रान्ता नैव च लब्धमब्धिशयन, त्वद्भक्तितुल्यं सुखम् ॥ पृ० ५४१

( २२ ) लोचनकार आचार्य अभिनवगुप्त जिस अभिनवगुप्त को यहाँ हम चर्चा करने जा रहे हैं उन्हें माधवाचार्य के 'शङ्कर-दिग्विजय' में निर्दिष्ट किसी शाक्त भाष्यकार अभिनवगुप्त नामक व्यक्ति से भिन्न समझना चाहिए, जिनका शास्त्रार्थ शङ्कराचार्य से हुआ था और वह पराजित हुए थे । १ वह कामरूप (आसाम) के निवासी थे। हमारे लोचनकार एवं अभिनवभारतीकार आचार्य अभिनवगुप्त काश्मीरनिवासी तथा शैव थे। विद्वानों ने अनेक प्रामाणिक परिशीलनोँ के पश्चात् काश्मीरी आचार्य अभिनवगुप्त का काल ९५० ई० से लेकर १०२५ ई० तक निश्चित किया है। कहा जाता है कि 'अभिनवगुप्त' नाम उनका गुरुओं का दिया हुआ है, अपना नाम कुछ और ही था। इस सम्बन्ध में कुछ आख्यान भी बताये जाते हैं। आचार्य मम्मट ने इन्हें 'श्रीमदाचार्याभिनवगुप्तपादाः' कहा है। इस पर काव्यप्रकाश की 'बालबोधिनी' टीका में वामनाचार्य ने एक आख्यान भी दिया है (उस व्याख्यान का आधार कोई प्राप्त नहीं है)। यद्यपि यह बात बहुत कुछ मान्य है कि आचार्य का नाम 'अभिनवगुप्त' उनके गुरुओं द्वारा प्रदत्त होगा, जैसा कि वे 'तन्त्रालोक' में लिखते हैं— “अभिनवगुप्तस्य कृतिः सेयं यस्योदिता गुरुभिराख्या ॥” १-१५० दक्षिण-भारत के नृत्य-शास्त्रियों में 'गुप्तपाद' (सर्प) के आधार पर आचार्य को 'शेषावतार' समझा जाता है। पूर्वज—आचार्य अभिनवगुप्त के पूर्वज मूलतः काश्मीर के निवासी न थे। इनके जन्म से प्रायः २०० वर्ष पूर्व अर्थात् अष्टम शताब्दी में कन्नौज से वहाँ गये थे। यशोवर्मा (७३०-७४०) अष्टम शताब्दी में कन्नौज का और ललितादित्य (७२५-७६१) काश्मीर का, समकालीन शासक थे। जैसा कि 'राजतरङ्गिणी' में वर्णन है, दोनों में युद्ध हुआ था और यशोवर्मा पराजित हुआ था। अन्तर्वेदी (गङ्गा-यमुना के बीच के प्रदेश) के विद्वान् अत्रिगुप्त की विद्वत्ता से प्रभावित होकर ललितादित्य ने उन्हें काश्मीर में बसाया। अन्तर्वेदी के अन्तर्गत ही कन्नौज का राज्य था। २ फिर आचार्य अभिनवगुप्त ने अन्य पूर्वजों का निर्देश न कर अपने पितामह वराहगुप्त का उल्लेख किया है। वराहगुप्त के पुत्र एवं अभिनवगुप्त के पिता नृसिंहगुप्त थे, जिन्हें लोग 'चुखुलक' भी कहते थे। चाचा थे वामन गुप्त (इनका उल्लेख 'अभिनवभारती' में इनके रचित एक श्लोक के साथ किया है)। क्षेमगुप्त, उत्पलगुप्त, अभिनवगुप्त, चक्रकगुप्त और पद्मगुप्त ये चचेरे भाई थे। गुरु—आचार्य ने अपने विभिन्न शास्त्र के विभिन्न गुरुओं का स्मरण अतिशय श्रद्धापूर्वक अपने ग्रन्थों में किया है। कुछ उनके प्रसिद्ध गुरुओं के नाम इस प्रकार हैं—१. नृसिंहगुप्त (पिता, व्याकरणशास्त्र के गुरु), २. वोमनाथ (द्वैताद्वैत तन्त्र के गुरु), ३. भूतिराजतनय (द्वैतवादी शैव सम्प्रदाय के गुरु), ४. लक्ष्मणगुप्त (प्रत्यभिज्ञा, क्रम तथा त्रिक दर्शन के गुरु), ५. भट्ट इन्दुराज (ध्वनि-सिद्धान्त के गुरु) ६. भूतिराज (ब्रह्मविद्या के गुरु), ७. भट्टतोत (नाट्यशास्त्र के गुरु)। १. तदनन्तरमेष कामरूपानधिगत्याभिनवोपशब्दगुप्तम् । अजयत् किल शाक्तभाष्यकारं स च भग्नॊ मनसेदमालुलोचे ॥ 'शङ्करदिग्विजय' १५।१५८ २. अन्तर्वेद्यामत्रिगुप्ताभिधानः प्राप्योत्पत्तिं प्राविशत् प्राग्द्यजन्मा । श्रीकाश्मीरांश्र्वन्द्रचूड़ावतंसैरैभिःसंख्याकैः पावितोपान्तमागान् ॥ परात्रिंशिका विवरण, २८०

( २३ ) भट्ट इन्दुराज आचार्य अभिनवगुप्त के काव्यशास्त्रीय गुरु थे। सम्भवतः आचार्य को इन्होंने ध्वन्यालोक पढ़ाया था और उन्हें अपने विचारों से अवगत किया था। आचार्य ने इनकी अनेक रचनाएँ उद्धृत की हैं और 'लोचन' के आरम्भ में इन्हें सादर स्मरण किया है। आचार्य के अनुसार ये 'विद्वत्कविसहृदयचक्रवर्ती' थे। बूह्लर महाशय को काश्मीर-रिपोर्ट के अनुसार भगवद्गीता की अपनी व्याख्या में अभिनवगुप्त ने भट्ट इन्दुराज को कात्यायन गोत्र से सम्बद्ध, सौचुक का पौत्र तथा भूतिराज का पुत्र कहा है। लोचन में 'ध्वनिरत्र श्लोकेऽस्मद्गुरुभिर्व्याख्यातः', 'इत्याशयोऽत्र ग्रन्थेऽस्मद्गुरुभिर्निरूपितः', 'अस्मद्गुरुवस्त्वाहुः' आदि निर्देशों से विद्वानों का अनुमान है कि आचार्य के गुरु ने कोई ध्वन्यालोक पर व्याख्यान ही लिखा होगा। कुछ विद्वानों ने उद्भट के व्याख्याता प्रतीहारेन्दुराज से इन भट्ट इन्दुराज को अभिन्न समझा है। महामहोपाध्याय काणे महाशय ने इसका खण्डन करते हुए कहा है कि एक तो प्रतीहारेन्दुराज ने ध्वनि-सिद्धान्त को स्वीकार नहीं किया है, जब कि भट्टेन्दुराज ध्वनि-सिद्धान्त के व्याख्याता के रूप में 'लोचन' में निर्दिष्ट हैं। दूसरे अपने गुरु भट्ट इन्दुराज के लिए अभिनवगुप्त ने कहीं भी 'प्रतीहार' की उपाधि का प्रयोग नहीं किया है। प्रतीहारेन्दुराज के गुरु मुकुल ('अभिधावृत्तमातृका' के रचयिता) थे। अभिनव ने अपने गुरु के गुरु उत्पलदेव की चर्चा की है किन्तु मुकुल की नहीं की। और भी, प्रतीहारेन्दुराज की टीका में उनका रचित एक श्लोक भी नहीं है, जबकि 'लोचन' में उनके अनेक श्लोक उद्धृत हैं। 'अभिनवभारती' में अभिनवगुप्त ने भट्ट इन्दुराज की गणना वाल्मीकि, व्यास और कालिदास के नामों के साथ की है (भाग २, पृ० २९३)। इस प्रकार प्रती- हारेन्दुराज कोई मात्र आलोचक ही सिद्ध होते हैं, कवि नहीं। आचार्य के दूसरे और एक साहित्यिक गुरु थे भट्ट तौत, जिनसे उन्होंने नाट्यशास्त्र का अध्ययन किया था। 'लोचन' के उल्लेख के अनुसार भट्ट तौत ने 'काव्यकौतुक' नाम का ग्रन्थ लिखा था तथा उस पर व्याख्यान 'विवरण' नाम से आचार्य अभिनवगुप्त ने प्रस्तुत किया था— 'स चायमस्मदुपाध्यायभट्टतौतेन काव्यकौतुके, अस्माभिश्च तद्विवरणे बहुतरकृत- निर्णयपूर्वपक्षसिद्धान्त इत्यलं बहुना।' पृ० ४३४ 'लोचन' में भट्टतौत के नाम से यह श्लोकार्ध भी उद्धृत है— 'नायकस्य कवेः कर्तुः समानोऽनुभवस्ततः।' पृ० ९२ 'अभिनवभारती' के अन्त में आचार्य कहते हैं— 'द्विजवरतोतनिरूपित-सन्ध्यध्यायार्थतत्त्वघटनेयम् । अभिनवगुप्तेन कृता शिवचरणाम्भोजमधुपेन' ॥ जीवन—आचार्य अभिनवगुप्त, जैसा कि जयरथ ने 'तन्त्रालोक' की टीका में निर्देश किया है, अपने माता-पिता के 'योगिनोभू' पुत्र थे। बाल्यकाल में माता के गत हो जाने, फिर पितृ-वियोग से आचार्य का जीवन अतिशय नीरस हो गया और फलतः वे दार्शनिक हो गए। यह एक बहुत बड़े साधक थे और काश्मीर की किंवदन्ती के अनुसार श्रीनगर और गुलमर्ग के बीच मगम नाम के स्थान से पांच मील की दूरी पर स्थित 'भैरवगुफा' में साधना करते थे। सम्भवतः उन्होंने अन्तिम श्वास भी वहीं ली।

( २४ ) आचार्य अभिनवगुप्त के जीवन, ग्रन्थ आदि विषयों पर विस्तृत मौलिक अनुसन्धान के लिए आकलनीय है डा० कान्तिचन्द्र पाण्डेय का अंग्रेजी में लिखा—'अभिनवगुप्त' (चौखम्बा प्रकाशन ) । 'लोचन'—'ध्वन्यालोक' पर आचार्य अभिनवगुप्त की यह टीका इसी नाम से प्रसिद्ध है, किन्तु विभिन्न पाण्डुलिपियों में इसे सहृदयालोकलोचन और काव्यालोकलोचन भी कहा है। आचार्य को परवर्ती ग्रन्थकारों ने 'लोचनकार' के नाम से स्मरण किया है, स्वयं आचार्य ने 'लोचन' नाम की सार्थकता इन शब्दों में निर्दिष्ट की है— किं लोचनं विनाऽऽलोको भाति चन्द्रिकयाऽपि हि । तेनाभिनवगुप्तोऽत्र लोचनोन्मीलनं व्यधात् ॥ पृ० १७१ साहित्यशास्त्र में 'लोचन' व्याख्यान का स्थान 'महाभाष्य' के सदृश है। 'लोचन' से पूर्व 'ध्वन्यालोक' पर 'चन्द्रिका' नाम की व्याख्या लिखी गई थी, जैसा कि ऊपर उद्धृत श्लोक में आचार्य ने उसका संकेत किया है—भाति चन्द्रिकयाऽपि हि । उन चन्द्रिकाकार का उल्लेख 'लोचन' में अनेक स्थलों पर है ( पृ० ४३४; ४५१ ) । चन्द्रिकाकार सम्भवतः अभिनवगुप्त के ही कोई सम्बन्धी थे। 'इत्यलं पूर्ववंश्यैः सह विवादेन' कहते हुए कई स्थलों पर लोचनकार ने अपने पूर्व के किसी टीकाकार की आलोचना भी की है। महिमभट्ट ने भी 'व्यक्तिविवेक' में 'चन्द्रिका' व्याख्या की सूचना दी है— ध्वनिवर्त्मन्यतिगहने स्खलितं वाण्याः पदे पदे सुलभम् । रभसेन यत्प्रवृत्ता प्रकाशकं चन्द्रिकाद्यदृष्ट्वैव ॥ 'चन्द्रिका' ईसा की ९००-९५० शती में लिखी गई होगी। कारिकाकार और वृत्तिकार ध्वन्यालोक का कारिकाभाग और वृत्तिभाग भिन्न कर्ताओं द्वारा रचित हैं अथवा दोनों एक कर्ता के निर्माण हैं, इस सम्बन्ध में आधुनिक विद्वानों का बहुत पहले से तीव्र मतभेद है। इस समस्या का श्रीगणेश डॉ० बूहलर ने 'कश्मीर रिपोर्ट' में इन शब्दों में किया था— “From Abhinavagupta's ṭīkā it appears that verses ( कारिका ) are the composition of Some older writer, whose name is not given. But it is remarkable that they contain no मङ्गलाचरण” ( पृ० ६५, श्री विष्णुपद भट्टाचार्य के ध्व० पर introduction से उद्धृत ) । तत्पश्चात् ध्वन्यालोक के काव्यमाला संस्करण ( निर्णयसागर प्रेस, बम्बई ) के सम्पादकों (श्री पं० दुर्गाप्रसाद आदि ) ने भी अपने वक्तव्य में कारिकाभाग का नाम 'ध्वनि' और वृत्तिभाग का नाम 'आलोक' मानते हुए दोनों ग्रन्थों को आचार्य अभिनवगुप्त के 'लोचन' के उल्लेखों के आधार पर भिन्नकर्तृक ही स्वीकार किया है। फिर महामहोपाध्याय (अब भारतरत्न ) श्री पी० वी० काणे महाशय ने अपने सुप्रसिद्ध अलङ्कार-साहित्य के इतिहास में भिन्नकर्तृकत्व की समस्या उठाई है और अनेक अन्तर्बाह्य प्रमाणों के आधार पर भिन्नकर्तृकत्व के पक्ष का स्थापन किया है। डॉ० सुशीलकुमार डे महाशय ने भी अपने अलङ्कार-साहित्य के इतिहास में कारिका भाग को

( २५ ) किसी प्राचीन लेखक का निर्माण माना है, जिसकी वृत्ति आनन्दवर्धनाचार्य द्वारा लिखी गई है । और भी, जिन विद्वानों ने कारिका और वृत्ति भागों का भिन्नकर्तृकत्व माना है उनमें प्रसिद्ध हैं— श्री सोवानी ( Sovani ) प्रो० शिव प्रसाद भट्टाचार्य, श्री के० गोडा वर्मा आदि । इसके विपरीत, दोनों भागों को अभिन्नकर्तृक मानने वाले विद्वानों का एक प्रबल दल भी हुआ, जिसमें प्रसिद्ध हैं—स्व० म० म० कुप्पुस्वामी शास्त्री, डॉ० सातकरी मुकर्जी, डॉ० शङ्करन्, डॉ० कान्तिचन्द्र पाण्डेय, डॉ० कृष्णमूर्ति और प्रो० मनकद् आदि । जैसा कि ऊपर डॉ० बूहलर और काव्यमाला सं० के सम्पादकों का निर्देश किया गया है, इस समस्या का मूल कारण है आचार्य अभिनवगुप्त का ‘ध्वन्यालोक’ पर ‘लोचन’ व्याख्यान, जिसमें अनेक स्थलों में कारिकाकार ( ˚कृत् ) और वृत्तिकार ( ˚कृत् ) को भिन्न रूप में निर्देश किया गया है और साथ ही वृत्तिग्रन्थ के रचयिता को ‘ग्रंथकार’ और कारिकाग्रन्थ के रचयिता को मूलग्रन्थकार ( ˚कृत् ) तथा कारिकाग्रन्थ को ‘मूलकारिका’ कहा गया है । म० म० काणे महाशय ने अपने ‘History of Sanskrit Poetics’ ( तृतीय सं० पृ० १६५ ) में ‘लोचन’ टीका के महत्त्वपूर्ण स्थलों को, जिनसे कारिकाकार और वृत्तिकार का भेद प्रतीत होता है, इस क्रम से उद्धृत किया है— १. ‘अत एव मूलकारिका साक्षात्तन्निराकरणार्था न श्रूयते । वृत्तिकृत्तु निराकृतमपि प्रमेयशय्यापूरणाय कण्ठेन तत्पक्षमनूद्य निराकरोति—येऽपीत्यादिना ।···तत्र ( तेनात्र ) प्रथमोद्योते ध्वनेः सामान्यलक्षणमेव कारिकाकारेण कृतम् । द्वितीयोद्योते कारिकाकारो- ऽवान्तरविभागं विशेषलक्षणं च विदधदनुवादमुखेन मूलविभागं द्विविधं सूचितवान् । तदाशयानुसारेण तु वृत्तिकृदत्रैवोद्योते मूलविभागमवोचत्०’ । पृ० १७० २. ‘न चैतन्मयोक्तम् , अपि तु कारिकाकाराभिप्रायेणेत्याह तन्नेति । भवति मूलतो द्विभेदत्वं कारिकाकारस्यापि सम्मतमेवेति भावः ।’ पृ० १७३ ( इस सं० में काशी चौखम्बा सं० के अनुसार ‘न चैतन्मयोत्सूत्रमुक्तम्’ पाठ है । ) ३. ‘उक्तमेव ध्वनिस্বরূপं तदाभासविवेकहेतुतया कारिकाकारोऽनुवदतीत्यभिप्रायेण वृत्तिकृदुपस्कारं ददाति ।’ पृ० ३०९ ४. ‘एतत्तावत्त्रिभेदत्वं न कारिकाकारेण कृतम् । वृत्तिकारेण तु दर्शितम् । न चेदानीं वृत्तिकारो भेदप्रकटनं करोति । ततश्चेदं कृतमिदं क्रियत इति कर्तृभेदे का सङ्गतिः ?’ पृ० ३१२ ५. ‘कारिकाकारेण पूर्वं व्यतिरेक उक्तः । न च सर्वथा न कर्तव्योऽपि तु बीभत्सादी कर्तव्य एवेति पश्चादन्वयः । वृत्तिकारेण त्वन्वयपूर्वको व्यतिरेक इति शैलीमनुसर्तुमन्वयः पूर्वमुपात्तः ।’ पृ० ३२९ ६. ‘प्रतिपादितमेवैषामलम्बनम्’ ध्व० के इस कथन पर ‘लोचन’ का निर्देश है— ‘अस्मन्मूलग्रन्थकृतेत्यर्थः ।’ पृ० ३४० ७. ‘एवमादौ विषये यथौचित्यात्यागस्तथा दर्शितमेवाग्रे’ इस ध्व० पर ‘लोचन’ का कथन है—‘दर्शितमेवेति । कारिकाकारेणेति भूतप्रत्ययः ।’ पृ० ३४७

( २६ ) ८. 'यद्यप्यर्थानन्त्यमात्रे हेतुर्वृत्तिकारेणोक्तः, तथापि कारिकाकारेण नोक्त इति भावः।' पृ० ५६५ इनके अतिरिक्त भी 'लोचन' में अनेक स्थल हैं, जिनमें 'वृत्तिकार' शब्द का उल्लेख है, किन्तु उनसे कारिकाकार और वृत्तिकार के भेद का विचार गतिशील नहीं होता, जितना कि इन उद्धरणों से होता है । अपने पक्ष की पुष्टि में इन स्थलों को दोनों दल के पण्डितों ने अपने अनुसार लगाया है । प्रधान रूप से यहाँ भिन्नकर्तृकत्ववादियों में म० म० काणे के अनुसार तथा अभिन्नकर्तृकत्ववादियों में डॉ० सातकरी मुकर्जी के अनुसार हम विचार करेंगे । डॉ० सातकरी मुकर्जी (भूतपूर्व अध्यक्ष, संस्कृत-विभाग, कलकत्ता विश्वविद्यालय, वर्तमान में डाइरेक्टर, नालन्दा पालि इन्स्टिच्यूट, बिहार) का लेख 'A dissertations on the identity of the author of the Dhvanyaloka' B. C. vol. I Part पृ० १७९ में प्रकाशित है (१९४५) । म० म० काणे के पक्षों का विशेषतः खण्डन करते हुए डॉ० मुकर्जी ने ध्वन्यालोक के कारिका और वृत्ति भागों के अभिन्नकर्तृकत्व पक्ष का बड़ी दृढ़ता से समर्थन किया है, यद्यपि वे अपने पक्ष के समर्थन में 'आग्रह' का अवलम्बन नहीं करते और न कि चाहते हैं कि यह प्रश्न स्थगित हो जाय ( I do not think the question to be a closed one and I propose to record the results of my reflections which may serve to stress the need of re-consideration and re-assessment of the problem with all its relevent issues') । इसी प्रकार म० म० काणे भी अपने पक्ष के विपरीत अभिन्नकर्तृकत्व के प्रमाणित हो जाने पर प्रसन्न होना चाहते हैं ('I should be glad if ultimately it be proved that the same person is the author of both Karikas and Vṛtti') । अस्तु, यह प्रथमतः निर्देश करना आवश्यक है कि भेदवादियों अर्थात् कारिका और वृत्ति के भिन्न- कर्तृकत्ववादियों के पक्ष के मूल में 'लोचन' के भेद-निर्देश के स्थल हैं और अभेदवादियों के पक्ष के मूल में आनन्दवर्धन के परवर्ती ग्रन्थकारों के वक्तव्य हैं, जिनके अनुसार आचार्य आनन्दवर्धन ही 'ध्वनिकार' हैं तथा कारिका और वृत्तिग्रन्थ के प्रणेता हैं। इस प्रकार 'लोचन' के जिस भेद-व्यवहार को म० म० काणे भिन्नकर्तृकत्व की सिद्धि का साधन, समझते हैं उसे डॉ० मुकर्जी 'functional' मानते हैं। 'लोचन' इस निर्णय में इसलिए सबसे अधिक महत्त्व रखता है कि वह 'ध्वन्यालोक' के निर्माण के १५० वर्ष पश्चात् निर्मित हुआ है । म० म० काणे ने सबसे पहले 'लोचन' के उन स्थलों की ओर ध्यान आकृष्ट किया है जिनमें वृत्तिकार को 'ग्रन्थकृत' या 'ग्रन्थकार' निर्देश किया गया है और कारिका के रचयिता के लिए 'मूलग्रन्थकृत' (ऊपर निर्दिष्ट 'अस्मन्मूलग्रन्थकृता') कहा गया है । ध्वन्यालोक की प्रथम कारिका की वृत्ति में लिखा है—'तथा चान्येन कृत एवात्र श्लोकः- यस्मिन्नस्ति त वस्तु०' इत्यादि । पृ० २७-२९ इस पर 'लोचन' का निर्देश है—'तथा चान्येनेति । ग्रन्थकृत्समानकालभाविना मनो- रथनाम्ना कविना ।'

( २७ ) जाकोबी महाशय ने कारिकाओं के लेखक ध्वनिकार को इस प्रमाण के आधार पर कल्हण की 'राजतरङ्गिणी' (४।४९७ और ६७१) के अनुसार कश्मीर के जयापीड और उसके उत्तराधिकारी ललितापीड (७८०-८१३ ई०) के राज्यकाल में हुए मनोरथ कवि का समसामयिक माना है। 'राजतरङ्गिणी' का श्लोक इस प्रकार है— मनोरथः शङ्खदत्तश्चटकः सन्धिमांस्तथा । बभूवुः कवयस्तस्य वामनाद्याश्च मन्त्रिणः ॥ ४९७ यदि यह विचार मान लिया जाय तो आचार्य आनन्दवर्धन का, जिनका समय नवम शताब्दी के अन्तिम चरण में निश्चित माना गया है, मनोरथ का समकालीन होना असम्भव है। दूसरे यह कि अवन्तिवर्मा के समय आचार्य आनन्दवर्धन कवि के रूप में प्रसिद्ध थे, ध्वन्यालोक उनकी निश्चित रूप से अनेक काव्य-रचनाओं के पश्चात् की कृति है, जैसा कि उसमें उद्धृत उनकी काव्य-रचनाओं के नाम तथा श्लोकों से अवगत होता है। इस प्रकार कितना भी मनोरथ का जीवनकाल अधिक होगा, आनन्दवर्धन के 'ध्वन्यालोक' के निर्माणकाल तक उसे पहुँचाना हास्यास्पद होगा। इस प्रकार जाकोबी महाशय और म० म० काणे के अनुसार वृत्तिकार आनन्दवर्धन के पूर्व किसी ध्वनिकार (मूल कारिकाओं के रचयिता) का होना प्रमाणित होता है। किन्तु 'ध्वन्यालोक' के 'मनोरथ' को जयापीड के समकालिक 'मनोरथ' से अभिन्न स्वीकार करने में कोई पुष्ट प्रमाण नहीं है, बल्कि इसके विपरीत यह तथ्य उद्धृत किया गया है कि प्रायः 'लोचन' में वृत्तिकार को 'ग्रन्थकृत' या 'ग्रन्थकार' भी कहा गया है१ (और कारिकाकार को मूल ग्रन्थकार), इस स्थिति में जब लोचनकार 'ग्रन्थकृत्समानकालभाविना मनोरथनाम्ना कविना' लिखते हैं तब निश्चित ही उनका संकेत वृत्तिकार आनन्दवर्धन से है। इसका स्पष्टीकरण डॉ० सुशीलकुमार डे ने अपने अलङ्कार-शास्त्र के इतिहास के अध्ययन में प्रस्तुत किया है। डॉ० डे के अनुसार इस कठिनाई के निराकरण के लिए दो बातें माननी होंगी—१. कि कल्हण ने, जैसा कि पिशेल तर्क करते हैं, जयापीड-ललितापीड के राज्यकाल में मनोरथ को निर्दिष्ट करते हुए गलती की है, अथवा २. कि अभिनवगुप्त ने कारिकाकार को वृत्तिकार के साथ गड़बड़ा दिया है। अस्तु, कल्हण की मनोरथ के मूल किसी ध्वनिकार के समकालिक होने की कल्पना निश्चित रूप से प्रमाणित नहीं की जा सकी है। अतः इस आधार को दृढ़ नहीं कहा जा सकता। हम ऊपर कह चुके हैं कि लोचनकार के भेदक उल्लेखों के आधार पर ही ध्वन्यालोक के कारिका भाग को भिन्नकर्तृक समझने का झगड़ा खड़ा हुआ और इसी आधार पर ही यह भी सिद्ध करने का प्रयत्न म० म० काणे आदि विद्वानों ने किया कि केवल अभिनवगुप्त ही दोनों ग्रन्थों को भिन्न और भिन्नकर्तृक नहीं मानते थे, बल्कि अभिनवगुप्त ने यह भी दिखाने का प्रयत्न किया है कि स्वयं वृत्तिकार भी कारिकाकार को अपने से भिन्न समझ कर लिखते हैं, जब कि सम्पूर्ण ध्वन्यालोक को आनन्दवर्धनकृत मानने वाले वाले विद्वानों के अनुसार लोचनकार अभिनवगुप्त के भेदसाधक उल्लेख वस्तुतः अपने व्याख्यानों को सुगम करने के लिए हैं ('In order to faciliate १. 'आनन्द इति च ग्रन्थकृतो नाम तेन स एवानन्दवर्धनाचार्य एतच्छास्त्रद्वारेण०' (पृ० ४१); 'समासोक्त्याक्षेपयोरेकमेवोदाहरणं व्यतरद् ग्रन्थकृत' (पृ० ११५); 'एवमभिप्रायद्वयमपि साधार- णोक्त्या ग्रन्थकृत्यरूपयत्' (पृ० ११७); 'अत एव ग्रन्थकारः सामान्येन०' (पृ० १६६)।

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his coments')। और डॉ० मुकर्जी समझते हैं कि कारिकाकार को वृत्तिकार से भिन्न समझने का विश्वास परम्परागत हो गया है। जो भी हो, ध्वन्यालोक के सम्बन्ध में यह विवाद अब तक किसी उभयसम्मत तर्क के अभाव में समाप्त नहीं हुआ है। (१) म० म० काणे ने 'लोचन' के जिन अंशों को उद्धृत किया उनमें द्वितीय, षष्ठ और सप्तम अंशों को वे अधिक महत्त्वपूर्ण मानते हैं। द्वितीय अंश (पृ० १७३) का प्रसंग यह है कि प्रथम उद्योत में वृत्तिभाग में ध्वनि के दो भेदों (अविवक्षितवाच्य और विवक्षितान्यपरवाच्य) की चर्चा की गई है (पृ० १४३), कारिका भाग में इनका निर्देश नहीं है। और, द्वितीय उद्योत के आरम्भ में प्रथम कारिका में ध्वनि के प्रथम भेद को दो प्रभेदों में विभक्त किया गया है। अभिन्नकर्तृत्ववादी डॉ० मुकर्जी अभिनवगुप्त के निरूपण को पृथक् करके, इससे समझते हैं कि कारिका प्रथम उद्योत में दिए गए विभाग को पहले से मानती है और साथ ही मुकर्जी साहब इस अनुमान को स्वाभाविक बताते हैं कि कारिकाकार वृत्तिकार से अभिन्न हैं। दूसरे शब्दों में, ग्रन्थकार वृत्ति और कारिका को एक दूसरे से भिन्न नहीं करते हैं। यही कारण है कि द्वितीय उद्योत की प्रथम कारिका में एकाएक अविवक्षितवाच्य का भेद ही करने लगे, इसके पूर्व कुछ नहीं संकेत किया। यदि हम द्वितीय उद्योत की प्रथम कारिका के अवतरण के रूप में दिए गए आनन्द- वर्धन के निर्देशों की परीक्षा करें तो यह स्पष्ट होगा कि उन्होंने कारिका और वृत्ति को भिन्न नहीं किया है बल्कि प्रथम उद्योत में प्रस्तुत भेद की संगति बैठाते हैं—'इस प्रकार अविवक्षितवाच्य और विवक्षितान्यपरवाच्य के रूप से ध्वनि दो प्रकार से प्रकाशित (हो चुका) है, उनमें (वहां) अविवक्षितवाच्य के प्रभेद के प्रतिपादन के लिए यह कहते हैं (पृ० १७३)।' डॉ० मुकर्जी प्रस्तुत में 'लोचन' के आधार पर अपने पक्ष की पुष्टि में 'मया वृत्तिकारेण सत्ता' पर अधिक जोर देते हैं और इसका अर्थ करते हैं—'by me in the capacity of वृत्तिकार।' इस प्रकार मुकर्जी साहब के अनुसार आचार्य अभिनवगुप्त 'सत्ता' द्वारा भिन्नकर्तृत्व के बजाय अभिन्नकर्तृत्व का संकेत करते हैं, अन्यथा यह प्रयोग अधिक (redundant) था। इसके विपरीत, भिन्नकर्तृत्ववादी म० म० काणे प्रस्तुत लोचनांश के 'अभिप्राय' और 'कारिका- कार-सम्मत' प्रयोगों को अपने पक्ष की पुष्टि के अनुकूल समझते हैं, उनके अनुसार 'न चैतन्मयोक्तम्, अपि तु कारिकाकाराभिप्रायेणेत्याह—तत्रेति' इसका अर्थ होगा 'This is not what I, the वृत्तिकार, have stated out of my own head, but I have stated it in accordance with the intention of the author of the Karikas'; 'भवति मूलतो द्विभेदत्वं कारिकाकारस्यापि सम्मतमेवेति' (ध्वनि is first of two kinds, and this is also approved of by the कारिकाकार)। यदि कारिकाकार और वृत्तिकार एक हैं तो वृत्तिकार को क्या कहने की आवश्यकता थी कि वे कारिकाकार के अभिप्राय का अनुसरण करते हैं और उन वृत्तिकार ने जो कहा है वह कारिकाकार का सम्मत है। एक ही व्यक्ति जब दो बातें कह रहा है तब 'सम्मति' का प्रश्न नहीं उठता है। इसी प्रकार एक दूसरे प्रसंग में, जहाँ शङ्का होती है कि यदि संघटना गुणों का आश्रय नहीं है तो किस आधार पर ये रहते हैं?, समाधान करते हुए कहा है कि 'प्रतिपादितमेवैषामालम्बनम्' अर्थात् 'इनका आलम्बन (आश्रय, आधार) प्रतिपादित हो ही चुका है' (पृ० ३४०), इस वृत्ति पर लोचन है 'अस्मन्मूलग्रन्थकृतेत्यर्थः' अर्थात् (वृत्तिकार का तात्पर्य है

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कि) 'हमारे मूल ग्रन्थ के रचयिता द्वारा (प्रतिपादित हो चुका है)।' यहाँ यदि वृत्तिकार कारिका- कार भी होते तो कहते 'मत्कृतकारिकायां०' अर्थात् मेरी कारिका में यह प्रतिपादित हो चुका है । अपने इस मन्तव्य की पुष्टि में म० म० काणे महाशय लोचन के उन स्थलों को उद्धृत करते हैं जिनमें वृत्तिकार ने अपने कहे हुए के सम्बन्ध में 'मया' का प्रयोग किया है, (जैसे, 'उक्तमिति, मयैवेत्यर्थः' पृ० ५२८; 'उक्तमिति संग्रहार्थं मयैवेत्यर्थः' पृ० ५५५) । इसी प्रकार प्रस्तुत में भी कारिकाकार से अभिन्न वृत्तिकार को 'मत्कृतकारिकायां' लिखना चाहिए था । अपने निबन्ध में डॉ० मुकर्जी ने विस्तार के साथ यह सिद्ध किया है कि 'लोचन' में जो कारिकाकार और वृत्तिकार को पृथक् निर्देश किया गया है वह एक नियम का विषय है, जिससे च्युत होना अक्षम्य अपराध माना जाता था। म० म० काणे जानना चाहते हैं कि यह नियम उन्होंने कहाँ पाया, जिसे वे इतनी सशक्त भाषा में प्रस्तुत करते हैं। डॉ० कृष्णमूर्ति डॉ० मुकर्जी के विचार से पूर्णतया सहमत हैं। इन दोनों डॉक्टरों से काणे महोदय यह प्रार्थना करते हैं कि वे अपने विस्तृत अध्ययन से कम से कम एक भी स्थल निर्देश करें जहाँ सूत्र या कारिका तथा उस पर वृत्ति एक ही व्यक्ति द्वारा लिखे गए हैं और टीकाकार 'प्रतिपादितमिवैषामालम्बनं' जैसे वृत्ति-ग्रन्थ का व्याख्यान 'अस्मन्मूल- ग्रन्थकृता' से करता है। म० म० काणे इस 'अस्मन्मूलग्रन्थकृता' के निर्देश को एक महत्त्वपूर्ण निर्णायक अंश मानते हैं, क्योंकि 'लोचन' में कहीं भी 'ग्रन्थकृत' शब्द का प्रयोग कारिकाकार के लिए असन्दिग्ध रूप से नहीं हुआ है। मेरे विचार में यद्यपि इस विवाद का इतने निर्देश मात्र से निराकरण नहीं होता है, क्योंकि अभिन्नकर्तृत्ववादी डॉ० मुकर्जी जिस भेद को 'Matter of form' समझते हैं, भिन्नकर्तृत्ववादी म० म० काणे उसे ही अपना साधक प्रमाण समझते हैं, फिर भी 'लोचन' का 'अस्मत्' प्रयोग एक निर्णय की ओर अवश्य अनुधावन करता है और यह सही है कि 'ग्रन्थकार' का प्रयोग 'लोचन' में केवल वृत्तिकार के लिए आया है। ('ग्रन्थकृत्समकालभाविना मनोरथनाम्ना कविना' इस अंश में प्रयुक्त 'ग्रन्थकार' शब्द सन्दिग्ध है, क्योंकि 'मनोरथ' कवि को निश्चित रूप से नहीं कहा जा सका है कि वह जयापीड़-ललितापीड़ के समय का मनोरथ था) । म० म० काणे अपने पक्ष के साधक प्रमाण के रूप में ध्व० के मंगल-श्लोक 'स्वेच्छाकेसरिणः०' को उद्धृत करते हैं, जिसे 'लोचन' में 'वृत्तिकार' का कहा गया और प्रथम कारिका 'काव्यस्यात्मा०' को 'आदिवाक्य' कहा गया है। काणे महाशय के अनुसार यदि कारिका और वृत्तिग्रंथ का कर्ता एक है तो 'लोचन' ने मङ्गल-श्लोक को 'कारिकाकार' अथवा 'ग्रंथकार' शब्द के साथ क्यों नहीं सूचित किया ? और यह अनेक स्थलों से विदित होता है कि 'ग्रंथकार' शब्द से लोचनकार का अभिप्राय वृत्तिकार से है और वह भी आनन्दवर्धनाचार्य से (आनन्द इति च ग्रन्थकृतो नाम । तेन स आनन्द- वर्धनाचार्य एतच्छास्त्र०, पृ० ४१) । (२) सप्तम अंश 'दर्शितमेवाग्रे०' (पृ० ३४७) है, इसे आचार्य आनन्दवर्धन ने 'औचित्य के (अ) त्याग' के सम्बन्ध में विचार करते हुए लिखा है। तात्पर्य यह कि 'इसे आगे (ऊपर) दिखा चुके हैं' (Has been dealt with), इस पर व्याख्यान करते हुए अभिनवगुप्त लिखते हैं 'कारिकाकारेणेति भूतप्रत्ययः' अर्थात् कारिकाकार ने इसे दिखा दिया है, इसी कारण यहाँ 'भूतकाल' का प्रयोग है, (भविष्य का नहीं)। काणे महाशय का कहना है कि यदि कारिका और वृत्ति दोनों ग्रन्थ एक ही व्यक्ति की कृतियाँ होतीं तो 'दर्शितं' के स्थान पर वृत्तिकार को 'दर्शयिष्यते'