भारतकोश
संग्रह पर लौटें

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

तृतीय उद्योतः ३७१

लोचनम्
प्रकीर्णत्वप्रसिद्धत्वाभ्यां प्रकरीपताकाव्यपदेश्यतयोभयप्रकारसम्बन्धी व्यापार-
विशेषः प्रकरीपताकाशब्दाभ्यामुक्त इति । एवं प्रस्तुतफलनिर्व्हाणान्तस्या-
धिकारिकस्य वृत्तस्य पञ्चसन्धित्वं पूर्णसन्ध्यङ्गता च सर्वजनव्युत्पत्तिदायिनी
निबन्धनीया । प्रासङ्गिके त्वितिवृत्ते नायं नियम इत्युक्तम्—
'प्रासङ्गिके परार्थत्वान्न ह्येष नियमो भवेत्'
इति मुनिना । एवं स्थिते रत्नावल्यां धीरललितस्य नायकस्य धर्माविरुद्ध-
सम्भोगसेवायाम नौचित्याभावात्प्रत्युत न निस्सुखः स्यादिति श्लाघ्यत्वात्पृथ्वी-
राज्यमहाफलान्तरानुबन्धिकन्यालाभफलोद्देशेन प्रस्तावनोपक्रमे पञ्चापि
सन्धयोऽवस्थापञ्चकसहिताः समुचितसन्ध्यङ्गपरिपूर्णा अर्थप्रकृतियुक्ता दर्शिता
एव । 'प्रारम्भेऽस्मिन्स्वामिनो वृद्धिहेतौ' इति हि बीजादेव प्रभृति 'विश्रान्त-
विग्रहकथः' इति 'राज्यं निर्जितशत्रु' इति च वचोभिः 'उपभोगसेवावसरोऽयम्'
इत्युपक्षेपात्प्रभृति हि निरूपितम् । एतत्तु समस्तसन्ध्यङ्गस्वरूपं तत्पाठपृष्ठे
प्रदर्श्यमानमतितमां ग्रन्थगौरवमावहति । प्रत्येकेन तु प्रदर्श्यमानं पूर्वापरानु-
सन्धानवन्ध्यतया केवलं संमोहदायि भवतीति न विततम् । अस्यार्थस्य
यत्नावधेयत्वेनेष्टत्वात्स्वकण्ठेन यो व्यतिरेक उक्तो 'न तु केवलया' इति
के नाम से उभय प्रकार के सम्बन्ध वाला व्यापार विशेष 'प्रकरी' और 'पताका' शब्द
से कहा गया है । इस प्रकार प्रस्तुत फल के निर्वाह करने तक आधिकारिक कथानक
का पञ्चसन्धित्व और पूर्णसन्ध्यङ्गता सब लोगों को व्युत्पत्ति देनेवाली निबन्धनीय है ।
परन्तु प्रासङ्गिक इतिवृत्त ( कथानक ) में यह नियम नहीं है, यह कहा है—
'परार्थ होने के कारण 'प्रासङ्गिक' में यह नियम लागू नहीं होगा' । मुनि ने ।
ऐसी स्थिति में 'रत्नावली' में धीरललित नायक की धर्मविरुद्ध सम्भोग की सेवा में
अनौचित्य के अभाव के कारण, प्रत्युत 'सुखरहित न हो' इस दृष्टि से श्लाघ्य होने के
कारण, पृथ्वीराज्य के महाफल के बीच में प्राप्त कन्यालाभ के फल के उद्देश्य से प्रस्ता-
वना के उपक्रम में समुचित सन्ध्यङ्गों से युक्त, अर्थप्रकृतियों से युक्त एवं पांच अवस्थाओं
से युक्त पांचों सन्धियां दिखाई गई ही हैं । 'प्रारम्भेऽस्मिन् स्वामिनो वृद्धिहेतोः' इस
बीज से ही लेकर 'विश्रान्तविग्रहकथः' और 'राज्यं निर्जितशत्रु' इन कथनों से, 'उपभोग-
सेवावसरोऽयम्' इस 'उपक्षेप' से लेकर निरूपण किया है । परन्तु इन समस्त सन्धियों के
अङ्गों का स्वरूप ( रत्नावली के पाठों पर ) दिखाने से अत्यधिक ग्रन्थगौरव होगा ।
और एक-एक ( उदाहरण मात्र ) दिखाने पर पूर्वापर के अनुसन्धान के न हो पाने से
केवल सम्मोह उत्पन्न होगा, अतः विस्तार नहीं किया है । इस बात ( रसाभिव्यक्ति
की अपेक्षा से सन्धिसन्ध्यङ्गघटन ) को यत्नपूर्वक अवधेय रूप से इष्ट होने के कारण जो
व्यतिरेक 'न कि केवल०' यह कहा है उसका उदाहरण कहते हैं—न कि—। 'केवल'

३७२ सलोचन-ध्वन्यालोकः

ध्वन्यालोकः
मुखप्रतिमुखगर्भावमर्शनिर्वहणाख्यानां तदङ्गानां चोपक्षेपादीनां घटनं
रसाभिव्यक्त्यपेक्षया, यथा रत्नावल्याम्; न तु केवलं शास्त्रस्थिति-
सम्पादनेच्छया । यथा वेणीसंहारे विलासाख्यस्य प्रतिमुखसन्ध्यङ्ग-
स्य प्रकृतरसनिबन्धाननुगुणमपि द्वितीयेऽङ्के भरतमतानुसरणमात्रेच्छया
घटनम् ।
गर्भ, अवमर्श, निर्वहण नामक सन्धियों और उपक्षेप आदि उनके अङ्गों का रसाभि-
व्यक्ति की अपेक्षा से जोड़ना, जैसे 'रत्नावली' (नाटिका) में; न कि केवल शास्त्र की
मर्यादा के सम्पादन की इच्छा से। जैसे 'वेणीसंहार' में 'विलास' नामक प्रतिमुख-
सन्धि के अङ्ग का प्रकृत रस के निबन्धन के प्रतिकूल भी दूसरे अङ्क में केवल भरत के
मत के अनुसरण की इच्छा से घटन है।
लोचनम्
तस्योदाहरणमाह—न त्विति । केवलशब्दमिच्छाशब्दं च प्रयुञ्जानस्याय-
माशयः—भरतमुनिना सन्ध्यङ्गानां रसाङ्गभूतमितिवृत्तप्राशस्त्योत्पादनमेव
प्रयोजनमुक्तम् । न तु पूर्वरङ्गाङ्गवददृष्टसम्पादनं विघ्नादिवारणं वा । यथोक्तम्—
इष्टस्यार्थस्य रचना वृत्तान्तस्यानपक्षयः ।
रागप्राप्तिः प्रयोगस्य गुह्यानां चैव गूहनम् ॥
आश्चर्यवदभिख्यानं प्रकाश्यानां प्रकाशनम् ।
अङ्गानां षड्विधं ह्येतद् दृष्टं शास्त्रे प्रयोजनम्॥ इति ।
ततश्च—
समीहा रतिभोगार्था विलासः परिकीर्तितः ।
इति प्रतिमुखसन्ध्यङ्गविलासलक्षणे । रतिभोगशब्द आधिकारिकरसस्था-
यिभावोपव्यञ्जकविभावाद्युपलक्षणार्थत्वेन प्रयुक्तः, यथा तत्त्वं नाधिगतार्थ इति,
शब्द और 'इच्छा' शब्द का प्रयोग करते हुए (कारिकाकार) का यह आशय है—
भरतमुनि ने रसाङ्गभूत इतिवृत्त के प्राशस्त्य के उत्पादन को ही सन्ध्यङ्गों का प्रयोजन
कहा है 'पूर्वरङ्ग' के अङ्ग की भांति अदृष्टसम्पादन अथवा विघ्नादिवारण को (कहा
है)। जैसे, कहा है—
'शास्त्र में यह छ प्रकार का अङ्गों का प्रयोजन देखा गया है—इष्ट वस्तु की
रचना, वृत्तान्त का न टूटना, अभिनय का मनोरञ्जक होना, गुप्त बातों को प्रकट न
करना, आश्चर्यकारी बातें कहना और प्रकाशनीय का प्रकाशन करना।
इस कारण—
रतिभोग की इच्छा को 'विलास' कहा गया है।
यह प्रतिमुखसन्धि के अङ्ग 'विलास' के लक्षण में। 'रतिभोग' शब्द आधिकारिक
रस के स्थायी भाव के उपव्यञ्जक विभावादि के उपलक्षक रूप से प्रयुक्त है, (परन्तु

तृतीय उद्योतः ३७३ ध्वन्यालोकः इदं चापरं प्रबन्धस्य रसव्यञ्जकत्वे निमित्तं यदुद्दीपनप्रशमने यथावसरमन्तरा रसस्य, यथा रत्नावल्यामेव । पुनरारब्धविश्रान्ते रस- स्याङ्गिनोऽनुसन्धिश्च । यथा तापसवत्सराजे । प्रबन्धविशेषस्य नाट- और यह प्रबन्ध के रसव्यञ्जक होने में अपर निमित्त है कि बीच में यथावसर रस का उद्दीपन और प्रशमन करना । जैसे 'रत्नावली' में ही । और आरम्भ किए हुए के विश्रान्त होने लगने पर फिर से अङ्गी (प्रधान) रस का अनुसन्धान कर लेना । जैसे, 'तापसवत्सराज' में । प्रबन्धविशेष नाटक आदि की रसव्यञ्जना का यह और लोचनम् प्रकृतो ह्यत्र वीररसः । उद्दीपन इति । उद्दीपनं विभावादिपरिपूरणया । यथा— 'अयं स राजा उदयणो त्ति' इत्यादि सागरिकायाः । प्रशमनं वासवदत्तातः पलायने । पुनरुद्दीपनं चित्रफलकोल्लेखे । प्रशमनं सुसङ्गताप्रवेशे इत्यादि । गाढं ह्यनवरतपरिमृदितो रसः सुकुमारमालतीकुसुमवद्भटित्येव म्लानिमवलम्बे- त । विशेषतस्तु शृङ्गारः । यदाह मुनिः— यद्वामाभिनिवेशित्वं यतश्च विनिवार्यते । दुर्लभत्वं यतो नार्या कामिनः सा परा रतिः ॥ इति । वीररसादावपि यथावसरमुद्दीपनप्रशमनाभ्यां विना झटित्येवाद्भुतफल- कल्पे साध्ये लब्धे प्रकटीचिकीर्षित उपायोपेयभावो न प्रदर्शित एव स्यात् । पुनरिति । इतिवृत्तवशादारब्धाशङ्क्यमानप्राया न तु सर्वथैवोपनता विश्रान्ति- र्विच्छेदो यस्य स तथा । रसस्येति । रसाङ्गभूतस्य कस्यापीति यावत् । तापस- वत्सराजे हि वासवदत्ताविषयो जीवितसर्वस्वाभिमानात्मा प्रेमबन्धस्तद्दिभावा- वेणीसंहार के रचयिता ने) तत्त्वार्थ को नहीं समझा । यहां (वेणीसंहार में) प्रकृत वीररस है । उद्दीपन—। विभावादि के परिपूरण द्वारा । जैसे—'यह वह राजा उदयन है' सागरिका का । प्रशमन वासवदत्ता से भागने में । पुनः उद्दीपन चित्रफलक के निर्माण में । प्रशमन सुसङ्गता के प्रवेश में, इत्यादि । खूब निरन्तर चर्वणा किया गया रस सुकुमार मालती के पुष्प की भांति झटिति म्लान हो जाता है । विशेष करके शृङ्गार । क्योंकि मुनि कहते हैं— जिस कारण कि प्रतिकूल आचरण की इच्छा, जिस कारण (सम्भोग) निवारण किया जाता है, जिस कारण नारी दुर्लभ होती है, वह कामी की गाढ़ रति है । वीररस आदि में भी यथावसर उद्दीपन और प्रशमन के बिना शीघ्र ही अद्भुत (चमत्कार) फलरूप साध्य के प्राप्त हो जाने पर प्रकटनार्थ अभिलषित उपायोपेयभाव प्रदर्शित नहीं हो पाता । फिर से—। इतिवृत्त के कारण आरम्भ हुए की आशङ्क्यमान- प्राय, न कि सर्वथा ही प्राप्त विश्रान्ति अर्थात् विच्छेद है जिसका वह । रस का—। रस के अङ्गभूत किसी का भी । 'तापसवत्सराज' में वासवदत्ता में जीवितसर्वस्व के

३७४ सलोचन-ध्वन्यालोकः

ध्वन्यालोकः कादे रसव्यक्तिनिमित्तमिदं चापरमवगन्तव्यं यदलंकृतीनां शक्तावप्या- नुरूप्येण योजनम्। शक्तो हि कविः कदाचिदलङ्कारनिबन्धने तदा- निमित्त समझना चाहिए कि शक्ति (सामर्थ्य) होने पर भी अलङ्कारों का अनुरूपता से जोड़ना। क्योंकि शक्त (समर्थ) कवि कभी अलङ्कारों के निबन्धन में उस

लोचनम् द्यौचित्यात्करुणविप्रलम्भादिभूमिका गृह्णन्समस्तेतिवृत्तव्यापी। राज्यप्रत्यापत्त्या हि सचिवनीतिमहिमोपनतया तदङ्गभूतपद्मावतीलाभानुगतयानुप्राण्यमानरूपा परमामभिलषणीयतमतां प्राप्ता वासवदत्ताधिगतिरेव तत्र फलम्। निर्वहणे हि ‘प्राप्ता देवी भूतधात्री च भूयः संबन्धोऽभूद्दर्शकेन’ इत्येवं देवीलाभप्राधान्यं निर्वार्हितम्। इयति चेतिवृत्तवैचित्र्यचित्रे भित्तिस्थानीयो वासवदत्ताप्रेमबन्धः प्रथममन्त्रारम्भात्प्रभृति पद्मावतीविवाहादौ, तस्यैव व्यापारात्। तेन स एव वासवदत्ताविषयः प्रेमबन्धः कथावशादाशङ्क्यमानविच्छेदोऽप्यनुसंहितः। तथा हि—प्रथमे तावदङ्के स्फुटं स एवोपनिबद्धः ‘तद्वक्त्रेन्दुविलोचनेन दिवसो नीतः प्रदोषस्तथा तद्गोष्ठ्यैव’ इत्यादिना, ‘बद्धोत्कण्ठमिदं मनः किमथवा प्रेमाऽस- माप्तोत्सवम्’ इत्यन्तेन। द्वितीयेऽपि ‘दृष्टिर्नामृतवर्षिणी स्मितमधुप्रस्यन्दि वक्त्रं न किम्’ इत्यादिना स एव विच्छिन्नोऽप्यनुसंहितः। तृतीयेऽपि—

अभिमान रूप (वत्सराज का) प्रेमबन्ध उसके विभावादि के औचित्य से करुण, विप्र- लम्भ आदि की भूमिकाओं को ग्रहण करता हुआ समस्त इतिवृत्त (कथानक) में व्याप्त है। सचिव की नीति की महिमा से प्राप्त एवं उसके अङ्गभूत पद्मावती के लाभ से अनुगत राज्य की प्राप्ति द्वारा अनुप्राण्यमान एवं परम अभिलषणीयतम भाव को प्राप्त वासवदत्ता की प्राप्ति ही वहां फल है। क्योंकि 'निर्वहण' (सन्धि) में 'देवी और पृथ्वी दोनों प्राप्त हो गईं और फिर से दर्शक के साथ सम्बन्ध हो गया' इस प्रकार देवी के लाभ का प्राधान्य निर्वाह किया गया है। कथानक के वैचित्र्य के इतने प्रथम मंत्र से लेकर पद्मावती के विवाह आदि चित्र में वासवदत्ता का प्रेमबन्ध भित्तिस्थानीय है, क्योंकि उसका ही व्यापार (व्याप्ति) है। इस कारण वही वासवदत्ता में प्रेमबन्ध कथा के वश विच्छेद की आशङ्का होने पर अनुसन्धान किया गया है। जैसा कि प्रथम अङ्क में स्पष्ट वही (प्रेमबन्ध) 'उसके मुखचन्द्र को देखते दिन व्यतीत किया, उस प्रकार सायंकाल भी, उसके साथ गोष्ठी से ही इत्यादि से लेकर 'यह मन उत्कण्ठा से भरा है, प्रेम में उत्सव समाप्त नहीं होता' तक रचा गया है। दूसरे (अङ्क) में भी 'क्या निगाह अमृत वर्षा करने वाली नहीं है, क्या मुख स्मित के मधु प्रवाहित करने वाला नहीं है?' इत्यादि द्वारा वही विच्छिन्न होकर भी अनुसन्धान किया गया है। तीसरे (अङ्क) में भी—

तृतीय उद्योतः ३७५

ध्वन्यालोकः
क्षिप्ततयैवानपेक्षितरसबन्धः प्रबन्धमारभते तदुपदेशार्थमिदमुक्तम् ।
( अलङ्काररचना ) में मग्न होकर रसबन्ध की अपेक्षा न करके प्रबन्ध रचना करने
लगता है, उसके उपदेश के लिए यह कहा है ।
लोचनम्
सर्वत्र ज्वलितेषु वेश्मसु भयादालीजने विद्रुते
श्वासोत्कम्पविहस्तया प्रतिपदं देव्या पतन्त्या तथा ।
हा नाथेति मुहुः प्रलापपरया दग्धं वराक्या तया
शान्तेनापि वयं तु तेन दहनेनाद्यापि दह्यामहे ॥
इत्यादिना । चतुर्थेऽपि
देवीस्वीकृतमानसस्य नियतं स्वप्नायमानस्य मे
तद्गोत्रग्रहणादियं सुवदना यायात्कथं न व्यथाम् ।
इत्थं यन्त्रणया कथंकथमपि क्षीणा निशा जाग्रते
दाक्षिण्योपहतेन सा प्रियतमा स्वप्नेऽपि नासादिता ॥
इत्यादिना । पञ्चमेऽपि समागमप्रत्याशया करुणे निवृत्ते विप्रलम्भेऽङ्कुरिते
तथाभूते तस्मिन्मुनिवचसि जातागसि मयि
प्रयत्नान्तर्गूढां रुषमुपगता मे प्रियतमा ।
प्रसीदेति प्रोक्ता न खलु कुपितेत्युक्तिमधुरं
समुद्भिन्ना पीतैर्नयनसलिलैः स्थास्यति पुनः ॥
इत्यादिना । षष्ठेऽपि 'त्वत्सम्प्राप्तिविलोभितेन सचिवैः प्राणा मया धारिताः'
सभी जगह भवनों के जल उठने पर, ( जल जाने के ) डर से सखियों के भाग जाने
पर हांफ से व्याकुल, उस प्रकार पग-पग पर गिरती-पड़ती बेचारी वह देवी 'हा नाथ'
यह बार-बार प्रलाप करती जल गई, परन्तु हम तो उस शान्त हुए भी अग्नि से आज भी
जलाए जा रहे हैं ।
इत्यादि से । चौथे ( अङ्क ) में भी—
देवी ( वासवदत्ता ) में रमे मन वाले, सपनाते हुए मेरे ( मुंह से ) उसके नाम
ग्रहण किए जाने पर यह सुमुखी ( पद्मावती ) कैसे नहीं व्यथित होगी ? इस प्रकार
कशमकश में जागते हुए किसी-किसी प्रकार रात बीती, और ( पद्मावती के प्रति )
दाक्षिण्य ( आनुकूल्य ) के कारण उपहत मैंने स्वप्न में भी उस प्रियतमा को नहीं पाया ।
इत्यादि से । पांचवें ( अङ्क ) में भी समागम की प्रत्याशा से करुण के निवृत्त और
विप्रलम्भ के अङ्कुरित होने पर—
मुनिवचन के उस प्रकार होने पर, मेरे अपराधी होने पर मेरी प्रियतमा प्रयत्न-
पूर्वक भीतर ही भीतर कुपित हो गई । 'प्रसन्न हो' यह कहने पर 'कुपित नहीं हूँ' यह
मीठे ढङ्ग से कह कर अन्तःस्तम्भित आंसुओं को धारण करेगी ।
इत्यादि से । छठे ( अङ्क ) में भी 'सचिवों ने तुम्हारी प्राप्ति के लोभ में डाल कर

३७६ सलोचन-ध्वन्यालोकः 〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰 ध्वन्यालोकः दृश्यन्ते च कवयोऽलङ्कारनिबन्धनैकरसा अनपेक्षितरसाः प्रबन्धेषु । किञ्च— अनुस्वानोपमात्मापि प्रभेदो य उदाहृतः । ध्वनेरस्य प्रबन्धेषु भासते सोऽपि केषुचित् ॥ १५ ॥ अस्य विवक्षितान्यपरवाच्यस्य ध्वनेरणुरणनरूपव्यङ्ग्योऽपि यः देखा जाता है कि कवि प्रबन्धों में रसापेक्षी न होकर अलङ्कारों के निबन्धन में ही लग जाते हैं ॥ १४ ॥ और भी—इस ध्वनि का अनुस्वानसदृश जो प्रभेद कहा गया है वह भी किन्हीं प्रबन्धों में भासित होता है ॥ १५ ॥ इस विवक्षितान्यपरवाच्य ध्वनि का अनुकरणरूपव्यङ्ग्य भी जो प्रभेद दो प्रकार का लोचनम् इत्यादिना । अलङ्कृतीनामिति योजनापेक्षया कर्मणि षष्ठी । दृश्यन्ते चेति । यथा स्वप्नवासवदत्ताख्ये नाटके— 'स्वञ्चितपक्ष्मकपाटं नयनद्वारं स्वरूपताडेन । उद्घाट्य सा प्रविष्टा हृदयगृहं मे नृपतनूजा ॥' इति ॥ १४ ॥ न केवलं प्रबन्धेन साक्षाद्व्यङ्ग्यो रसो यावत्पारम्पर्येणापीति दर्शयितु- मुपक्रमते-किञ्चेति । अनुस्वानोपमः-शब्दशक्तिमूलोऽर्थशक्तिमूलश्च, यो ध्वनेः प्रभेद उदाहृतः सः केषुचित्प्रबन्धेषु निमित्तभूतेषु व्यञ्जकेषु सत्सु व्यङ्ग्यतया स्थितः सन् । अस्येति । रसादिध्वनेः प्रकृतस्य भासते व्यञ्जकतयेति शेषः । वृत्तिग्रन्थोऽप्येवमेव योज्यः । अथ वानुस्वानोपमः प्रभेद उदाहृतो यः प्रबन्धेषु भासते अस्यापि 'द्योत्योऽलक्ष्यक्रमः क्वचित्' इत्युत्तरश्लोकेन कारिकावृत्त्योः सङ्गतिः । मुझसे प्राणों को धारण करवाया' इत्यादि से । 'अलङ्कारों का' यहां 'भोजन' की अपेक्षा से कर्म में षष्ठी है। देखे जाते हैं—। जैसे, 'स्वप्नवासवदत्त' नामक नाटक में— बन्द पक्ष्म के कवाट वाले नयन के द्वार को अपने रूप के धक्के से खोल कर वह राजकुमारी मेरे हृदय के घर में प्रवेश कर गई ॥ १४ ॥ न केवल प्रबन्ध से साक्षात् व्यङ्ग्य रस ही होता है, अपितु पारम्पर्य से भी ( व्यङ्ग्य होता है), यह दिखाने के लिए उपक्रम करते हैं—और भी—। अनुस्वान- सदृश—शब्दशक्तिमूल और अर्थशक्तिमूल, जो ध्वनि का प्रभेद कहा गया है, वह किन्हीं प्रबन्धों के निमित्तभूत व्यञ्जक होने पर व्यङ्ग्य रूप से स्थित होता हुआ। इसका— प्रकृत रसादि ध्वनि का व्यञ्जक रूप से भासित होता है, यह शेष है। वृत्तिग्रन्थ को भी इसी प्रकार लगाना चाहिए। अथवा, अनुस्वानसदृश कहा गया जो प्रभेद प्रबन्धों में भासित होता है इसका भी 'कहीं पर अलक्ष्यक्रम द्योत्य होता है' इस उत्तरश्लोक से कारिका और वृत्ति की सङ्गति होती है।

तृतीय उद्योतः ३७७ ध्वन्यालोकः प्रभेद उदाहतो द्विप्रकारः सोऽपि प्रबन्धेषु केषुचिद्द्योतते । तद्यथा मधुमथनविजये पाञ्चजन्योक्तिषु । यथा वा ममैव कामदेवस्य सह- कहा गया है वह भी किन्हीं प्रबन्धों में द्योतित होता है। वह जैसे, 'मधुमथनविजय' में पाञ्चजन्य की उक्तियों में। अथवा जैसे मेरा ही 'विषमबाणलीला' में, कामदेव के लोचनम् एतदुक्तं भवति—प्रबन्धेन कदाचिदनुरणनरूपव्यङ्ग्यो ध्वनिः साक्षाद्व्य- ज्यते स तु रसादिध्वनौ पर्यवस्यतीति। यदि तु स्पष्टमेव व्याख्यायते तदा ग्रन्थस्य पूर्वोत्तरस्यालक्ष्यक्रमविषयस्य मध्ये ग्रन्थोऽयमसङ्गतः स्यात्, नीरसत्वं च पाञ्चजन्योक्त्यादीनामुक्तं स्यादित्यलम्। लीलादाढा शुध्युड्ढासअलमहिमण्डलसञ्चिअ अज्ज। कीसमृणालाहरतुज्जआइ अङ्गम्मि ॥ इत्यादयः पाञ्चजन्योक्तयो रुक्मिणीविप्रलब्धवासुदेवाशयप्रतिषेधनाभि- प्रायमभिव्यञ्जयन्ति। सोऽभिव्यक्तः प्रकृतरसस्वरूपपर्यवसायी। सहचराः वसन्तयौवनमलयानिलादयस्तैः सह समागमे। मिअवहण्डिअरोरोणिइड्ढसो अविवेअरहिओ वि। सविण वि तुमम्मि पुणोवन्ति अ अतन्ति पंमुसिम्मि ॥ बात यह कही गई—प्रबन्ध से कहीं पर अनुरणन-रूपव्यङ्ग्य ध्वनि साक्षात् व्यञ्जित होती है, वह रसादि ध्वनि में पर्यवसित होती है। परन्तु यदि स्पष्ट ही (यथावस्थित ही) व्याख्यान करते हैं तब पूर्वोत्तर अलक्ष्यक्रमविषयक ग्रन्थ के बीच में यह ग्रन्थ असङ्गत होगा और पाञ्चजन्य की उक्ति आदि का नीरसत्व कहा जाने लगेगा। इत्यलम्। लीलादाढा शुध्युड्ढा·················································अङ्गम्मि ॥ [ लीलादाढग्गुद्धरिअसलमहीमण्डलस्सविअअस्स । कीसमृणालहरणं वि तुझ गुरु आइ अङ्गम्मि ॥ ] ( इति पाठः बालप्रियायाम् ) 'लीला से दंष्ट्रा के अग्रभाग पर सारी पृथ्वी को उठा लेने वाले तुम्हारे अङ्ग में मृणाल का आभरण भी कैसे भारी हो रहा है ? इत्यादि पाञ्चजन्य की उक्तियां रुक्मिणी के विरही वासुदेव ( श्रीकृष्ण ) के अभिलाष के आविष्करण का अभिप्राय व्यञ्जित कर रही हैं। प्रकृत रस ( विप्रलम्भ शृङ्गार ) के स्वरूप में पर्यवसन्न होने वाला वह ( अभिप्राय ) अभिव्यक्त है। सहचर अर्थात् वसन्त यौवन, मलयानिल आदि, उनके साथ समागम में। मिअवहण्डिअरोरो·························अतन्ति पंमुसिम्मि ॥ [ हुम्मि अवहत्थिअरे होणिरङ्कुसो अह विवेअरहिओ वि । सविणे वि तुमम्मि पुणो भन्ति णपसुमरामि ॥ ] ( इति पाठः बालप्रियायाम् )

३७८ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः चरसमागेम विषमबाणलीलायाम् । यथा च गृध्रगोमायुसंवादादौ महा- भारते ॥ १५ ॥ सहचर के समागम के प्रसङ्ग में । और जैसे 'महाभारत' में गृध्रगोमायुसंवाद आदि प्रसंग में ॥ १५ ॥ लोचनम् इत्यादयो यौवनस्योक्तयस्तत्तन्निजस्वभावव्यञ्जिकाः, स स्वभावः प्रकृ- तरसपर्यवसायी । यथा चेति । श्मशानावतीर्णं पुत्रदाहार्थमुद्योगिनं जनं विप्रल- ब्धुं गृध्रो दिवा शवशरीरभक्षणार्थी शीघ्रमेवापसरत यूयमित्याह । अलं स्थित्वा श्मशानेऽस्मिन्गृध्रगोमायुसङ्कुले । कङ्कालबहुले घोरे सर्वप्राणिभयङ्करे ॥ न चेह जीवितः कश्चित्कालधर्ममुपागतः । प्रियो वा यदि वा द्वेष्यः प्राणिनां गतिरीदृशी ॥ इत्याद्यवोचत् । गोमायुस्तु निशोदयावधि अमी तिष्ठन्तु, ततो गृध्रादपहृ- त्याहं भक्षयिष्यामीत्यभिप्रायेणावोचत् । आदित्योऽयं स्थितो मूढाः स्नेहं कुरुत साम्प्रतम् । बहुविघ्नो मुहूर्तोऽयं जीवेदपि कदाचन ॥ अमुं कनकवर्णाभं बालमप्राप्तयौवनम् । गृध्रवाक्यात्कथं बालास्त्यज्यध्वमविशङ्किताः ॥ 'मर्यादा को पार कर गया हूँ, निरङ्कुश हूँ और विवेकरहित भी हूँ, किन्तु स्वप्न में भी तुम्हारी भक्ति को नहीं याद कर पाता हूँ।' इत्यादि यौवन की उक्तियां उन-उन के अपने स्वभाव को व्यक्त करती हैं । वह स्वभाव प्रकृत रस में पर्यवसन्न होने वाला है । और जैसे—। श्मशान में पहुंचे, पुत्र को जलाने के लिए प्रयत्नशील व्यक्ति को ठगने के लिए, गीध दिन में शव के शरीर को खाने की इच्छा से 'शीघ्र ही तुम लोग चले जाओ' यह कहता है— 'गीध और सियार से भरे, अस्थिपञ्जरों से व्याप्त, घोर एवं सभी प्राणियों के लिए भयङ्कर इस श्मशान में ठहरना बेकार है, काल के धर्म (मृत्यु) को प्राप्त कोई यहां जीवित नहीं रहा है, प्रिय हो अथवा शत्रु (द्वेष्य), प्राणियों की गति इसी प्रकार है।' इत्यादि बोला । किन्तु सियार ने इस अभिप्राय से कि ये लोग रात होने तक ठहरें, तब मैं गीध से छीन कर खाऊंगा, बोला— 'हे मूढ़ लोगो, यह सूर्य अस्त नहीं हुए, अभी स्नेह करो, यह मुहूर्त बहुत विघ्नों वाला है, (बाद में) कदाचित् जी जाय । सोने के समान कान्ति वाले, यौवन को नहीं प्राप्त हुए इस बालक को बिना विचारे गीध की बात से क्यों छोड़ रहे हो।'

तृतीय उद्योतः ३७९ ध्वन्यालोकः सुप्तिङ्वचनसम्बन्धैस्तथा कारकशक्तिभिः । कृत्तद्धितसमासैश्च द्योत्योऽलक्ष्यक्रमः क्वचित् ॥ १६ ॥ सुप्, तिङ्, वचन, सम्बन्ध, कारक-शक्ति, कृत्, तद्धित, और समास से कहीं पर असंलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य ध्वनि द्योत्य होता है ॥ १६ ॥ लोचनम् इत्यादि । स चाभिप्रायो व्यक्तः शान्तरस एव परिनिष्ठिततां प्राप्तः ॥ १५ ॥ एवमलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्यस्य रसादिध्वनेर्यद्यपि वर्णेभ्यः प्रभृति प्रबन्धपर्यन्ते व्यञ्जकवर्गे निरूपिते न निरूपणीयान्तरमवशिष्यते, तथापि कविसहृदयानां शिक्षां दातुं पुनरपि सूक्ष्मदृष्ट्यान्वयव्यतिरेकावाश्रित्य व्यञ्जकवर्गमाह-सुप्तिङि- त्यादि । वयं त्वित्थमेतदनन्तरं सवृत्तिकं वाक्यं बुध्यामहे । सुबादिभिः योऽनु- स्वानोपमो भासते वक्त्रभिप्रायादिरूपः अस्यापि सुबादिभिर्व्यक्तस्यानुस्वानो- पमस्यालक्ष्यक्रमव्यङ्ग्यो द्योत्यः । क्वचिदिति पूर्वकारिकया सह संमील्य सङ्गति- रिति । सर्वत्र हि सुबादीनामभिप्रायविशेषाभिव्यञ्जकत्वमेव । उदाहरणे स त्वभिव्यक्तोऽभिप्रायो यथास्वं विभावादिरूपताद्वारेण रसादीन्व्यनक्ति । एतदुक्तं भवति—वर्णादिभिः प्रबन्धान्तैः साक्षाद्वा रसोऽभिव्यज्यते विभा- वादिप्रतिपादनद्वारेण यदि वा विभावादिव्यञ्जनद्वारेण परम्परयेति तत्र बन्ध- स्यैतत्परम्परया व्यञ्जकत्वं प्रसङ्गादादावुक्तम् । अधुना तु वर्णपदादीनामुच्यत इति । तेन वृत्तावपि 'अभिव्यज्यमानो दृश्यते' इति । व्यञ्जकत्वं दृश्यत इत्यादौ इत्यादि । वह अभिप्राय व्यक्त होकर शान्त रस में ही परिनिष्ठितता प्राप्त है ॥१५॥ इस प्रकार अलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य रसादि ध्वनि के यद्यपि वर्णों से लेकर प्रबन्धपर्यन्त व्यञ्जकवर्ग के निरूपण हो जाने पर कोई दूसरा निरूपणीय बच नहीं जाता, तथापि कवि और सहृदयों को शिक्षा देने के लिए फिर भी सूक्ष्म दृष्टि से अन्वय-व्यतिरेक का आश्रयण करके व्यञ्जकवर्ग को कहते हैं—सुप् तिङ् इत्यादि । हम तो इस प्रकार इसके बाद के वृत्तिसहित वाक्य को समझते हैं—सुप् आदि से जो वक्ता के अभिप्राय आदि के रूप में अनुस्वानसदृश ( अनुरणनरूप ) भासित होता है, सुप् आदि से व्यक्त अनुस्वानसदृश इसका भी अलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य द्योत्य होता है । 'कहीं पर' इसे पूर्व- कारिका के साथ मिला कर संगति है । सभी जगह सुप् आदि अभिप्रायविशेष के ही व्यञ्जक होते हैं । उदाहरण में वह अभिव्यक्त अभिप्राय यथानुसार विभावादिरूपता के प्रकार से रसादि को व्यञ्जित करता है । बात यह कही गई—वर्ण आदि से प्रबन्ध तक से साक्षात् रस अभिव्यक्त होता है विभावादि के प्रतिपादन के द्वारा, अथवा विभावादि के व्यञ्जन के द्वारा परम्परा से; उनमें बन्ध का इस परम्परा से व्यञ्जक पहले प्रसंगतः कहा है । अब तो वर्ण, पद आदि का कहते हैं । इसलिए वृत्ति में भी 'अभिव्यक्त होता हुआ देखा जाता है' ।

३८० सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः अलक्ष्यक्रमो ध्वनेरात्मा रसादिः सुब्विशेषैस्तिङ्विशेषैर्वचनविशे- षैः सम्बन्धविशेषैः कारकशक्तिभिः कृद्विशेषैस्तद्धितविशेषैः समासैश्चेति । चशब्दान्निपातोपसर्गकालादिभिः प्रयुक्तैरभिव्यज्यमानो दृश्यते । यथा— न्यक्कारो ह्ययमेव मे यदरयस्तत्राप्यसौ तापसः सोऽप्यत्रैव निहन्ति राक्षसकुलं जीवत्यहो रावणः । धिग्धिग्छक्रजितं प्रबोधितवता किं कुम्भकर्णेन वा स्वर्गग्रामटिकाविलुण्ठनवृथोच्छूनैः किमेभिर्भुजैः ॥ अलक्ष्यक्रम ध्वनि का आत्मा रसादि प्रयुक्त सुब्विशेष, तिङ्विशेष, वचनविशेष, सम्बन्धविशेष, कारक-शक्ति, कृद्विशेष, तद्धितविशेष और समासों से, ‘और’ ( च ) शब्द से, निपात, उपसर्ग, काल आदि से अभिव्यक्त होता हुआ देखा जाता है । जैसे— यही मेरा न्यक्कार ( अपमान ) है, कि मेरे शत्रु हैं, उसमें भी वह तापस है, वह भी यहीं पर राक्षसकुल का हनन कर रहा है, अहो ! रावण भी जी रहा है । इन्द्रजित् मेघनाद को धिक्कार है, धिक्कार है, जगाए गए कुम्भकर्ण से क्या लाभ और स्वर्ग की गांटिया को विलुण्ठन के कारण वृथा ही ( अभिमान से ) फूली इन मेरी भुजाओं से क्या लाभ ? लोचनम् च वाक्यशेषोऽध्याहार्यः विभावादिव्यञ्जनद्वारतया पारम्पर्येणेत्येवंरूपः। ममारय इति। मम शत्रुसद्भावो नोचित इति सम्बन्धानौचित्यं क्रोधविभावं व्यनक्ति अरय इति बहुवचनम् । तपो विद्यते यस्येति पौरुषकथाहीनत्वं तद्धितेन मत्वर्थीयेना- भिव्यक्तम् । तत्रापिशब्देन निपातसमुदायेनात्यन्तासम्भावनीयत्वम् । मत्कर्तृका यदि जीवनक्रिया तदा हननक्रिया तावदनुचिता। तस्यां च स कर्ता अपिशब्दे- न मनुष्यमात्रकम् । अत्रैवेति-मदधिष्ठितो देशोऽधिकरणम् निःशेषेण हन्यमा- ‘व्यञ्जकत्व दिखाई देता है’ इत्यादि में ‘विभावादि के व्यञ्जन के द्वारा परम्परा से’ इस प्रकार का वाक्यशेष अध्याहार कर लेना चाहिए। मेरे शत्रु—। ‘शत्रु’ यह बहुवचन ‘मेरे शत्रु का होना उचित नहीं’ यह सम्बन्धानौचित्य रूप क्रोध के विभाव को व्यञ्जित करता है । ‘तप विद्यमान है जिसका’ इस यत्वर्थीय तद्धित से पुरुषार्थ का अभाव अभि- व्यक्त होता है । निपातसमुदाय रूप ‘तत्रापि’ ( उसमें भी ) शब्द से अत्यन्त असम्भव- नीयता ( अभिव्यक्त होती है )। यदि मैं जी रहा हूं तब हननकार्य अनुचित है । और उस ( क्रिया ) में वह कर्ता, ‘भी’ ( अपि ) शब्द कुत्सित मनुष्यमात्र । यहीं पर—। मेरे द्वारा अधिष्ठित देश अधिकरण, निःशेष रूप से हन्यमान होने से और राक्षसबल

तृतीय उद्योतः ३८१ ध्वन्यालोकः अत्र हि श्लोके भूयसा सर्वेषामप्येषां स्फुटमेव व्यञ्जकत्वं दृश्य- ते । तत्र 'मे यदरयः' इत्यनेन सुप्सम्बन्धवचनानामभिव्यञ्जकत्वम् । 'तत्राप्यसौ तापस' इत्यत्र तद्धितनिपातयोः । 'सोऽप्यत्रैव निहन्ति राक्षसकुलं जीवत्यहो रावणः' इत्यत्र तिङ्कारक शक्तीनाम् । 'धिग्वि- क्छक्रजितम्' इत्यादौ श्लोकार्धे कृत्तद्धितसमासोपसर्गाणाम् । एवंवि- इस श्लोक में बहुशः इन सभी का व्यञ्जकत्व दिखाई देता है। उनमें से 'कि मेरे शत्रु हैं' इससे सुप्, सम्बन्ध और वचन का अभिव्यञ्जकत्व है। 'उनमें भी वह तापस है' यहां तद्धित और निपात का । 'वह भी यहीं पर राक्षसकुल का हनन कर रहा है, अहो रावण जी रहा है !' यहां तिङ् और कारक-शक्तियों का। 'इन्द्रजित् (मेघनाद) को धिक्कार है' इत्यादि श्लोकार्ध में कृत्, तद्धित, समास और उपसर्ग लोचनम् नतया राक्षसबलं च कर्मेति तदिदमसंभाव्यमानमुपनतमिति पुरुषकारासम्प- त्तिर्ध्वन्यते तिङ्कारकशक्तिप्रतिपादकैश्च शब्दैः । रावण इति त्वर्थान्तरसङ्क्रमि- तवाच्यत्वं पूर्वमेव व्याख्यातम् । धिग्धिगिति निपातस्य शक्रं जितवानित्याख्या- यिकेयमिति उपपदसमासेन सहकृतः स्वर्गेत्यादिसमासस्य स्वपौरुषानुस्मरणं प्रति व्यञ्जकत्वम् । ग्रामटिकेति स्वार्थिकतद्धितप्रयोगस्य स्त्रीप्रत्ययसहितस्या- बहुमानास्पदत्वं प्रति, विलुण्ठनशब्दे विशब्दस्य निर्दयावस्कन्दनं प्रति व्यञ्जक- त्वम् । वृथाशब्दस्य निपातस्य स्वात्मपौरुषनिन्दां प्रति व्यञ्जकता । भुजैरिति बहुवचनेन प्रत्युत भारमात्रमेतदिति व्यज्यते । तेन तिलशस्तिलशोऽपि विभ- ज्यमानेऽत्र श्लोके सर्व एवांशो व्यञ्जकत्वेन आतीति किमन्यत् । एतदर्थप्रदर्श- नस्य फलं दर्शयति-एवमिति । एकस्य पदस्येति यदुक्तं तदुदाहरति-यथात्रेति । (राक्षसकुल) कर्म, यह सम्भव नहीं होकर सम्भव हो रहा है, इस प्रकार पौरुष का अभाव तिङ् और कारकशक्ति के प्रतिपादक शब्दों से ध्वनित हो रहा है। 'रावण' (कम्पित कर देने वाला) यह अर्थान्तर सङ्क्रमितवाच्यत्व पहले ही व्याख्यान किया जा चुका है। 'शक्र को जीता है' यह आख्यायिका है, इस उपपद समास का साथ देने वाला 'धिक्, धिक्' इस निपात (व्यञ्जक है), स्वर्ग० इत्यादि समास अपने पौरुष के अनुस्मरण के प्रति व्यञ्जक है। 'ग्रामटिका (गउंटिया) इस स्त्री प्रत्यय सहित स्वार्थिक तद्धित प्रयोग का अबहुमानास्पदत्व के प्रति और 'विलुण्ठन' शब्द में 'वि' शब्द का निर्दयतापूर्वक अवस्कन्दन (आक्रमण) के प्रति व्यञ्जकत्व है। निपात 'वृथा' शब्द की अपने पौरुष की निन्दा के प्रति व्यञ्जकता है। 'भुजाओं से' इस बहुवचन से 'प्रत्युत यह भार मात्र है' यह व्यक्त होता है। इस प्रकार तिल-तिल विभाग करने पर इस श्लोक में सभी अंश व्यञ्जक रूप में प्रतीत होता है, और क्या ? इस अर्थ के प्रदर्शन का फल दिखाते हैं—इस प्रकार—। 'एक पद का' जो कहा है उसका उदाहरण देते

३८२ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः धस्य व्यञ्जकभूयस्त्वे च घटमाने काव्यस्य सर्वातिशायिनी बन्ध- च्छाया समुन्मीलति । यत्र हि व्यङ्ग्यावभासिनः पदस्यैकस्यैव ताव- दाविर्भावस्तत्रापि काव्ये कापि बन्धच्छाया किमुत यत्र तेषां बहूनां समवायः । यथात्रानन्तरोदितश्लोके । अत्र हि रावण इत्यस्मिन् पदे- ऽर्थान्तरसंक्रमितवाच्येन ध्वनिप्रभेदेनालङ्कृतेऽपि पुनरनन्तरोक्तानां का। इस प्रकार के (प्रयोग का) बहुशः व्यञ्जकत्व के घटित होने से काव्य की सर्वातिशायिनी बन्धच्छाया समुन्मीलित होती है। जहां कि व्यङ्ग्य को अवभासित करने वाले एक ही पद का आविर्भाव है वहाँ भी काव्य में बन्धच्छाया है, जहां उन बहुतों का समवाय है (वहां) क्या कहना ? जैसा कि अभी उदाहृत श्लोक में। यहां ‘रावण’ इस पद के ध्वनि के प्रभेद अर्थान्तरसङ्क्रमितवाच्य के द्वारा अलंकृत होने पर लोचनम् अतिक्रान्तं न तु कदाचन वर्तमानतामवलम्बमानं सुखं येषु ते काला इति, सर्व एव न तु सुखं प्रति वर्तमानः स कोऽपि काललेश इत्यर्थः । प्रतीपान्युप- स्थितानि वृत्तानि प्रत्यावर्तमानमनानि तथा दूरभावीन्यपि प्रत्युपस्थितानि निक- टतया वर्तमानानि भवन्ति दारुणानि दुःखानि येषु ते । दुःखं बहुप्रकारमेव प्रतिवर्तमानाः सर्वे कालांशा इत्यनेन कालस्य तावन्निर्वेदमभिव्यञ्जयतः शान्त- रसव्यञ्जकत्वम् । देशस्याप्याह-पृथिवी श्वः श्वः प्रातः प्रातर्दिनादिनं पापीय- दिवसाः पापानां सम्बन्धिनः पापिष्ठजनस्वामिका दिवसा यस्यां सा तथो- क्ता । स्वभावत एव तावत्कालो दुःखमयः तत्रापि पापिष्ठजनस्वामिकपृथिवी- लक्षणदेशदौरात्म्याद्विशेषतो दुःखमय इत्यर्थः । तथा हि श्वः श्व इति दिनादिनं गतयौवना वृद्धस्त्रीवदसंभाव्यमानसंभोगा गतयौवनतया हि यो यो दिवस आगच्छति स स पूर्वपूर्वापेक्षया पापीयान् निकृष्टत्वात् । यदि वेयसुनन्तोऽयं हैं—जैसे यहां—। वे समय जिनमें सुख अतिक्रान्त हो गया है, न कि वर्तमानता को अवलम्बन कर रहा है, अर्थात् सभी, न कि सुख के प्रति वर्तमान वह कोई भी काललेश। जिन (समयों) में प्रतिकूल दारुण दुःख गये भी पुनः लौटे हुए और दूर काल में होने- वाले भी निकट रूप से वर्तमान मालूम होते हैं। बहुत प्रकार के ही दुःख को प्रवर्तित करते हुए सभी कालांश हैं, इस प्रकार निर्वेद की व्यञ्जना करते हुए काल का शान्त- रसव्यञ्जकत्व है। देश का भी कहते हैं—पृथिवी हर सुबह, दिन-दिन पापीयदिवसा है अर्थात् पापों के सम्बन्धी, पापिष्ठ जन स्वामी हैं जिनमें ऐसे दिवसों वाली है। अर्थात् स्वभावतः ही दुःखमय है, उसमें भी स्वामी के रूप में पापिष्ठ जनों वाले पृथ्वि के रूप में देश के दौरात्म्य के कारण विशेष रूप से दुःखमय है। जैसा कि दिन-दिन गतयौवना स्त्री की भांति असम्भाव्यमान सम्भोग वाली। यौवन के चले जाने पर जो-जो दिन आता है वह-वह पूर्व-पूर्व की अपेक्षा पापीयान् होता है, क्योंकि निकृष्ट होता है।

तृतीय उद्योतः ३८३ ध्वन्यालोकः व्यञ्जकप्रकाराणामुद्भासनम् । दृश्यन्ते च महात्मनां प्रतिभाविशेषभा- जां बाहुल्येनैवंविधा बन्धप्रकाराः । यथा महर्षेर्व्यासस्य— अतिक्रान्तसुखाः कालाः प्रत्युपस्थितदारुणाः । श्वः श्वः पापीयदिवसा पृथिवी गतयौवना ॥ अत्र हि कृत्तद्धितवचनैरलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्यः, 'पृथिवी गतयौवना' इत्यनेन चात्यन्ततिरस्कृतवाच्यो ध्वनिः प्रकाशितः । एषां च सुबादीनामेकैकशः समुदितानां च व्यञ्जकत्वं महाकवी- नां प्रबन्धेषु प्रायेण दृश्यते । सुबन्तस्य व्यञ्जकत्वं यथा— तालैः शिञ्जललयसुभगैः कान्तया नर्तितो मे यामध्यास्ते दिवसविगमे नीलकण्ठः सुहृद्वः ॥ भी अभी कहे गए व्यञ्जक प्रकारों का उद्भासन है । प्रतिभाविशेष वाले महात्माओं के बहुशः इस प्रकार के बन्धप्रकार देखे गए हैं । जैसे, महर्षि व्यास का—सुख के समय समाप्त हो गए और दुःख के समय उपस्थित हैं, गतयौवना पृथिवी के उत्तरोत्तर बुरे दिन आ रहे हैं । यहां कृत्, तद्धित और वचन से अलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य और 'गतयौवना पृथिवी' से अत्यन्त तिरस्कृतवाच्य ध्वनि प्रकाशित है । इन सुप् आदि का अलग-अलग और मिल कर व्यञ्जकत्व महाकवियों के प्रबन्धों में प्रायः देखा जाता है । सुबन्त का व्यञ्जकत्व, जैसे— मेरी प्रियतमा द्वारा वलय के झंकारों से सुन्दर तालियां बजा कर नचाया गया तुम्हारा सुहृद मयूर सन्ध्याकाल में जिस ( वासयष्टि ) पर बैठता है । लोचनम् शब्दो मुनिनैव प्रयुक्तो णिजन्तो वा । अत्यन्तेति । सोऽपि प्रकारोऽस्यैवाङ्गता- मेतीति भावः । सुबन्तस्येति । समुदितत्वे तूदाहरणं दत्तं व्यस्तत्वे चोच्यत इति भावः । तालैरिति बहुवचनमनेकविधं वैदग्ध्यं ध्वनत् विप्रलम्भोद्दीपकतामेति । अथवा इयसुन्त शब्द का मुनि ने ही प्रयोग किया है ( यह आर्ष प्रयोग है ), या णिजन्त है । अत्यन्त—। भाव यह कि वह भी प्रकार इसी का अङ्ग हो जाता है । सुबन्त का—। भाव यह कि मिल कर ( व्यञ्जकत्व ) में तो उदाहरण दे दिया, अब अलग-अलग ( व्यञ्जकत्व ) में कहते हैं । तालियां—यह बहुवचन अनेक विध वैदग्ध्य को ध्वनित करता हुआ विप्रलम्भ का उद्दीपक हो रहा है ।

३८४ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः तिङन्तस्य यथा— अवसर रोउं चिअ णिम्मिआईं मा पुंस मे हअच्छीईं । दंसणमेत्तुम्मुत्तेहिं जहिं हिअअं तुह ण णाअम् ॥ यथा वा— मा पन्थं रुन्धीओ अवेहि बालअ अहोसि अहिरीओ । अम्हेअ णिरिच्छाओ सुण्णघरं रक्खिदव्वं णो ॥ तिङन्त का, जैसे— हटो, मेरी हत आंखें रोने के लिए ही बनी हैं, ( इन्हें ) मत बढ़ावो, दर्शनमात्र से उन्मत्त जिन्होंने तुम्हारे इस प्रकार के हृदय को नहीं जाना । अथवा जैसे— नासमझ रास्ता मत रोको, हटो, अहो, तुम तो निर्लज्ज हो । हम परतन्त्र हैं, क्योंकि हमें अपने सूने घर की रखवाली करनी है । लोचनम् अपसर रोदितुमेव निर्मिते मा पुंसय हते अक्षिणी मे । दर्शनमात्रोन्मत्ताभ्यां याभ्यां तव हृदयमेवंरूपं न ज्ञातम् ॥ उन्मत्तो हि न किञ्चिज्जानातीति न कस्याप्यत्रापराधः दैवेनेत्थमेव निर्माणं कृतमिति । अपसर मा वृथा प्रयास कार्षीः दैवस्य विपरिवर्तयितुमशक्यत्वा-दिति तिङन्तो व्यञ्जकः तदनुगृहीतानि पदान्तराण्यपीति भावः । मा पन्थानं रुधः अपेहि बालक अप्रौढ अहो असि अह्रीकः । वयं परतन्त्रा यतः शून्यगृहं मामकं रक्षणीयं वर्तते ॥ इत्यत्रापेहीति तिङन्तमिदं ध्वनति—त्वं तावदप्रौढो लोकमध्ये यदेवं प्रकाश-यसि । अस्ति तु सङ्केतस्थानं शून्यगृहं तत्रैवागन्तव्यमिति । 'अन्यत्र व्रज बालक' अप्रौढ बुद्धे स्नान्तीं मां कि प्रकर्षेणालोकयेत्येतत् । भो इति सोल्लुण्ठ-माह्वानम् । जायाभीरुकाणां सम्बन्धितटमेव न भवति । अत्र जायातो ये क्योंकि उन्मत्त कुछ नहीं समझता, इसलिए यहां किसी का अपराध नहीं, दैव ने ऐसा ही निर्माण किया है । भाव यह कि हटो, व्यर्थ प्रयास मत करो, दैव का परिवर्तन नहीं किया जा सकता, इस प्रकार तिङन्त व्यञ्जक है और उसके द्वारा अनुगृहीत पदान्तर भी ( व्यञ्जक ) हैं । यहां 'हटो' यह तिङन्त यह ध्वनित करता है—तुम अप्रौढ़ हो, लोगों के बीच इसे खोल दोगे, सङ्केतस्थान शून्य गृह है, वहीं आना । हे अप्रौढ़ बुद्धि वाले बाल अन्यत्र चले जाओ, स्नान करती हुई मुझे क्यों गुरेर कर देखता है 'अरे' ( भो ), यह सपरिहास आह्वान है । पत्नी से डरने वालों का यह तट ही नहीं होता । यहां पत्नी से जो डरने

तृतीय उद्योतः ३८५ ध्वन्यालोकः सम्बन्धस्य यथा— अण्णत्त वच्च बालअ हा अन्ति किं मं पुलोएसिएअम् । भो जाआभीरुआणं तडं विअण होई ॥ कृतकप्रयोगेषु प्राकृतेषु तद्धितविषये व्यञ्जकत्वमावेद्यत एव । अवज्ञातिशये कः । समासानां च वृत्त्यौचित्येन विनियोजने । निपा- तानां व्यञ्जकत्वं यथा— अयमेकपदे तया वियोगः प्रियया चोपनतः सुदुःसहो मे । नववारिधरोदयादहोभिर्भवितव्यं च निरातपार्द्धरम्यैः ॥ सम्बन्ध का जैसे— नासमझ, यहां से हट जा, स्नान करती हुई मुझे क्यों गुरेर कर देखता है, अरे, पत्नी से डरने वालों का यह तट नहीं है ! प्राकृतों में 'क' ( प्रत्यय ) के प्रयोग किए जाने पर तद्धित के विषय में व्यञ्जकत्व प्रतीत किया ही जाता है । ( यहां ) अवज्ञातिशय में 'क' ( प्रयुक्त है ) । और वृत्ति के औचित्य के अनुसार योजना करने पर समासों का ( व्यञ्जकत्व होता है ) । निपातों का व्यञ्जकत्व, जैसे— यह एक साथ ही प्रिया के साथ असह्य मेरा वियोग उपस्थित हो गया और नये बादलों के उमड़ पड़ने से दिन भी आतपरहित, छोटे और रम्य होने लगे । लोचनम् भीरवस्तेषामेतत्स्थानमिति दूरापेतः सम्बन्ध इत्यनेन सम्बन्धेनेर्ष्यातिशयः प्रच्छन्नकामिन्याभिव्यक्तः । कृतकेति कग्रहणं तद्धितोपलक्षणार्थम् । कृतः कप्रत्य- यप्रयोगो येषु काव्यवाक्येषु यथा जायाभीरुकाणामिति । ये ह्यरसज्ञा धर्म- पत्नीषु प्रेमपरतन्त्रास्तेभ्यः कोऽन्यो जगति कुत्सितः स्यादिति कप्रत्ययोऽव- ज्ञातिशयद्योतकः । समासानां चेति । केवलानामेव व्यञ्जकत्वमावेद्यत इति सम्बन्धः । वाले हैं उनका यह स्थान है, यह सम्बन्ध दूरापेत ( अर्थात् बिलकुल नहीं ) है, इस ( षष्ठ्यर्थ ) सम्बन्ध से प्रच्छन्न कामिनी ने ईर्ष्यातिशय अभिव्यक्त किया । 'क' के प्रयोग—। 'क' ग्रहण तद्धित के उपलक्षणार्थ है, किया गया है 'क' प्रत्यय का प्रयोग जिन काव्यवाक्यों में, जैसे 'जायाभीरुकाणाम्' जो अरसज्ञ अपनी धर्मपत्नियों में ही प्रेम- परतन्त्र होते हैं, उनसे ( बढ़कर ) कौन दूसरा संसार में कुत्सित होगा ? इस अवज्ञा- तिशय का 'क' प्रत्यय द्योतक है । समासों का—। सम्बन्ध यह है कि केवल ( समासों ) का ही व्यञ्जकत्व सूचित किया जाता है । २५ ध्व०

३८६ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः इत्यत्र चशब्दः । यथा वा — मुहुराङ्गुलिसंवृताधरोष्ठं प्रतिषेधाक्षरविक्लवाभिरामम् । मुखमंसविवर्ति पक्ष्मलाक्ष्याः कथमप्युन्नमितं न चुम्बितं तु ॥ अत्र तुशब्दः । निपातानां प्रसिद्धमपीह द्योतकत्वं रसापेक्षयोक्त- मिति द्रष्टव्यम् । उपसर्गाणां व्यञ्जकत्वं यथा— नीवाराः शुकगर्भकोटरमुखभ्रष्टास्तरूणामधः प्रस्निग्धाः क्वचिदिङ्गुदीफलभिदः सूच्यन्त एवोपलाः । विश्वासोपगमादभिन्नगतयः शब्दं सहन्ते मृगा- स्तोयाधारपथाश्च वल्कलशिखानिष्यन्दलेखाङ्किताः ॥ यहां 'और' शब्द । अथवा, जैसे— बार-बार अङ्गुलियों से ढंके गए अधरोष्ठ वाले, निषेध के अक्षर ( 'नहीं' आदि ) और व्याकुलता से अभिराम ( उस ) पक्ष्मल आँखों वाली ( शकुन्तला ) के कंधे पर मुड़े हुए मुख को किसी प्रकार ऊपर उठा लिया, परन्तु चूम नहीं सका । यहां 'तु' शब्द । यद्यपि निपातों का द्योतकत्व प्रसिद्ध है तथापि यहां ( उनका द्योतकत्व ) रस की अपेक्षा से समझना चाहिए । उपसर्गों का व्यञ्जकत्व, जैसे— नीवार सुग्गों के खोड़लों के अग्रभाग से गिर कर वृक्षों के नीचे पड़े हैं । कहीं पर चिकने पत्थर सूचित करते हैं कि इनसे इंगुदी के फलों का भेदन किया जाता है । हिरण विश्वस्त हो जाने से अभिन्नगति होकर शब्द को सहन करते हैं और जल के बहाव के मार्ग वल्कलों ( वृक्ष की छालों ) के अग्रभाग से टपकती हुई बूंदों की रेखा से अंकित हैं । लोचनम् चशब्द इति जातावेकवचनम् । द्वौ चशब्दावेवमाहतुः काकतालीयन्यायेन गण्डस्योपरि स्फोट इतिवत्तद्वियोगश्च वर्षासमयश्च सममुपगतौ एतदलं प्राणहर- णाय । अत एव रम्यपदेन सुतरामुद्दीपनविभावत्वमुक्तम् । तुशब्द इति । पश्चा- त्तापसूचकस्सन् तावन्मात्रपरिचुम्बनलाभेनापि कृतकृत्यता स्यादिति ध्वनतीति भावः । प्रसिद्धमपीति। वैयाकरणादिगृहेषु हि प्राक्प्रयोगस्वातन्त्र्यप्रयोगाभावात्- 'और' शब्द जाति में एकवचन है । दो 'और' ( 'च' ) शब्द इस प्रकार कहते हैं—काकतालीयन्याय से गण्ड के ऊपर फोड़े की भांति उसका वियोग और वर्षाकाल दोनों साथ ही प्राप्त हो गए हैं, यह प्राणहरण के लिए काफी है । अतएव 'रम्य' पद से सुतरां उद्दीपन विभाव को कहा है । 'तु' शब्द—। भाव यह कि पश्चात्ताप का सूचक होता हुआ उतने मात्र परिचुम्बन के लाभ से भी कृतकृत्यता ही यह ध्वनित करता है । प्रसिद्ध है तथापि—। भाव यह कि वैयाकरण आदि के घरों में ( धातु के ) पहले

तृतीय उद्योतः ३८७ ध्वन्यालोकः इत्यादौ। द्वित्राणां चोपसर्गाणामेकत्र पदे यः प्रयोगः सोऽपि रसव्यक्त्यनुगुणतयैव निर्दोषः। यथा—'प्रभ्रश्यत्युत्तरीयत्विषि तमसि समुद्वीक्ष्य वीतावृतीन्द्राग्जन्तून्' इत्यादौ। यथा वा—'मनुष्यवृत्त्या समुपाचरन्तम्' इत्यादौ। इत्यादि में। दो-तीन उपसर्गों का भी एक पद में जो प्रयोग है वह भी रस की व्यञ्जना के अनुगुण रूप से ही निर्दोष है। जैसे—उत्तरीय की भांति अन्धकार के विगलित हो जाने पर सद्यः जन्तुओं को आवरण से रहित देखकर०, इत्यादि में (समुद्वीक्ष्य = देखकर इस स्थल में)। अथवा, जैसे—मनुष्य के व्यापार से समुपा- चरण करते हुए को०, इत्यादि में। लोचनम् षष्ठ्याद्यश्रवणालिङ्गसंख्याविरहाच्च वाचकवैलक्षण्येन द्योतका निपाता इत्युद्धो- ष्यत एवेति भावः। प्रकर्षेण स्निग्धा इति प्रशब्दः प्रकर्षं द्योतयन्निङ्गुदीफलानां सरसत्वमाचक्षाण आश्रमस्य सौन्दर्यातिशयं ध्वनति। 'तापसस्य फलविशेष- विषयोऽभिलाषातिरेको ध्वन्यते' इति त्वसत्; अभिज्ञानशाकुन्तले हि राज्ञ इयमुक्तिर्न तापसस्येत्यलम्। द्वित्राणामित्यनेनाधिक्यं निरस्यति। सम्यगुच्चै- र्विशेषेणोेक्षितत्वे भगवतः कृपातिशयोऽभिव्यक्तः। मनुष्यवृत्त्या समुपाचरन्तं स्वबुद्धिसामान्यकृतानुमानाः। योगीश्वरैरप्यसुबोधमीश त्वां बोद्धुमिच्छन्त्यबुधाः स्वतकैः॥ सम्यग्भूतमुपांशुकृत्वा आ समन्ताच्चरन्तमित्यनेन लोकानुजिघृक्षातिशय- स्तत्तदाचरतः परमेश्वरस्य ध्वनितः। ही प्रयोग होने, स्वतन्त्र रूप से प्रयोग न होने, षष्ठी आदि के श्रवण न होने और लिङ्ग तथा संख्या के न होने के कारण निपात शब्द वाचक शब्द से विलक्षण रूप से द्योतक घोषित किए गए हैं। (प्रस्निग्धाः) अर्थात् 'प्रकर्षेण स्निग्धाः' इसमें 'प्र' शब्द प्रकर्ष द्योतित करता और इङ्गुदीफलों का सरसत्व कहता हुआ आश्रम के अतिशय सौन्दर्य को ध्वनित करता है। 'तापस का फलविशेष के सम्बन्ध में अभिलाषातिरेक ध्वनित होता है' यह (व्याख्यान) गलत है, क्योंकि 'अभिज्ञानशाकुन्तल' में यह राजा की उक्ति है, न कि तापस की, इत्यलम्। दो-तीन इस (कथन) से आधिक्य का निरास करते हैं। (समुद्वीक्ष्य = देखकर) सम्यक् अर्थात् उच्चैः, विशेष रूप से ईक्षित (दृष्ट) होने में भगवान् (सूर्य) का कृपातिशय अभिव्यक्त होता है। मनुष्य के व्यापार से समुपाचरण करते हुए, योगीश्वरों द्वारा भी दुर्बोध आपको हे ईश, अपनी सामान्य बुद्धिसे अनुमान करके अबुध जन अपने तर्कों से जानना चाहते हैं। 'सम्यक् भूतमुपांशुकृत्वा आ समन्तात् चरन्तं' इससे तत् तत् का आचरण करते हुए परमेश्वर का लोकानुग्रह का इच्छातिशय अभिव्यक्त किया।

३८८ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः निपातानामपि तथैव। यथा—‘अहो बतासि स्पृहणीयवीर्यः’ इत्यादौ। यथा वा— ये जीवन्ति न मान्ति ये स्म वपुषि प्रीत्या प्रनृत्यन्ति च प्रस्यन्दिप्रमदाश्रवः पुलकिता दृष्टे गुणिन्यूर्जिते। हा धिक्कष्टमहो क्व यामि शरणं तेषां जनानां कृते नीतानां प्रलयं शठेन विधिना साधुद्विषः पुष्यता॥ इत्यादौ। पदपौनरुक्त्यं च व्यञ्जकत्वापेक्षयैव कदाचित्प्रयुज्यमानं शोभा- मावहति। यथा— यद्वञ्चनाहितमतिर्बहुचाटुगर्भं कार्योन्मुखः खलजनः कृतकं ब्रवीति। निपातों का भी उसी प्रकार। जैसे—'अहो तुम स्पृहणीय पराक्रम वाले हो!' इत्यादि में। अथवा, जैसे— गुणीजन की वृद्धि देख कर आनन्द के अश्रु प्रवाहित करने वाले एवं पुलकित होने वाले जो व्यक्ति जीवित हैं, (खुशी के मारे) जो अपने शरीर में अंट नहीं पाते, प्रीति से नृत्य करने लग जाते हैं, उन जनों के लिए, जिन्हें दुष्टों को प्रश्रय देने वाले शठ विधाता ने समाप्त कर डाला है, किसकी शरण में जाऊं? हा धिक् कष्टम्! इत्यादि में। पदपौनरुक्त्य भी व्यञ्जकत्व की अपेक्षा से ही कदाचित् प्रयुज्यमान होकर शोभा प्राप्त करता है। जैसे— जो कि धोखा देने में लगी बुद्धि वाला, काम निकालने वाला दुष्ट जन बहुत लोचनम् तथैवेति। रसव्याञ्जकत्वेन द्वित्राणामपि प्रयोगो निर्दोष इत्यर्थः। श्लाघा- तिशयो निर्वेदातिशयश्च अहो बतेति हा धिगिति च ध्वन्यते। प्रसङ्गात्पौन- रुक्त्यान्तरमपि व्यञ्जकमित्याह—पदपौनरुक्त्यमिति। पदग्रहणं वाक्यादेरपि उसी प्रकार—। अर्थात् रसके व्यञ्जक रूप से दो-तीन (निपातों) का प्रयोग निर्दोष है। 'अहो' 'बत' 'हा' 'धिक्' से श्लाघातिशय और निर्वेदातिशय ध्वनित होते हैं। प्रसङ्ग से 'पौनरुक्त्यान्तर भी व्यञ्जक है, यह कहते हैं—पदपौनरुक्त्य—। 'पद' ग्रहण वाक्यादि का भी यथासम्भव उपलक्षण है। समझते हैं—। 'वे ही सब कुछ

तृतीय उद्योतः ३८९ ध्वन्यालोकः तत्साधवो न न विदन्ति विदन्ति किन्तु कर्तुं वृथाप्रणयमसय न पारयन्ति ॥ इत्यादौ । कालस्य व्यञ्जकत्वं यथा— समविसमर्णिविसेसा समन्तओ मन्दमन्दसंआरा । अइरा होहिन्ति पहा मणोरहाणं पि दुल्लंघा ॥ [ समविषमनिर्विशेषाः समन्ततो मन्दमन्दसञ्चाराः । अचिराद्भविष्यन्ति पन्थानो मनोरथानामपि दुर्लङ्घ्याः ॥ इति छाया ] खुशामद से भरी बनावटी बात करता है उसे साधुजन नहीं समझते हैं यह नहीं, समझते हैं, किन्तु वे लोग उसके आग्रह को व्यर्थ करने में समर्थ नहीं हो पाते । इत्यादि में । काल का व्यञ्जकत्व, जैसे— शीघ्र ही चारों ओर ( वर्षाकाल में पानी भर जाने के कारण ) मार्ग सम और विषम के भेद से रहित, अत्यन्त मन्द सञ्चार योग्य एवं मनोरथों के भी दुर्लङ्घ्य हो जायेंगे । लोचनम् यथासम्भवमुपलक्षणम् । विदन्तीति । त एव हि सर्वं विदन्ति सुतरामिति ध्वन्यते । वाक्यपौनरुक्त्यं यथा—'पश्य द्वीपादन्यस्मादपि' इति वचनानन्तरं 'कः सन्देहः ? द्वीपादन्यस्मादपि' इत्यनेनेप्सितप्राप्तिरविघ्नितैव ध्वन्यते । 'किं किम् ? स्वस्था भवन्ति मयि जीवति' इत्यनेनामर्षातिशयः । 'सर्वक्षितिभृतां नाथ दृष्टा सर्वाङ्गसुन्दरी' इत्युन्मादातिशयः । कालस्येति । तिङन्तपदानुप्रविष्टस्याप्यर्थकलापस्य कारककालसंख्योपग्रह- रूपस्य मध्येऽन्वयव्यतिरेकाभ्यां सूक्ष्मदृशा भागगतमपि व्यञ्जकत्वं विचार्य- ठीक-ठीक समझते हैं, यह ध्वनित होता है । वाक्यपौनरुक्त्य, जैसे—( 'रत्नावली' में ) 'द्वीपादन्यस्मादपि' इस वचन के बाद 'कः सन्देहः द्वीपादन्यस्मादपि' इससे ईप्सित वस्तु की प्राप्ति विघ्नरहित ही है यह ध्वनित होता है । 'किं किं ? स्वस्था भवन्ति मयि जीवति' इससे अमर्षातिशय ( ध्वनित होता है ) । सर्वक्षितिभृतां नाथ दृष्टा सर्वाङ्गसुन्दरी' यह ( वक्ता का ) उन्मादातिशय ध्वनित होता है । काल का—। भाव यह कि कारक, काल, संख्या, उपग्रह रूप तिङन्त पद में अनुप्रविष्ट अर्थसमूह के बीच अन्वय-व्यतिरेक के द्वारा सूक्ष्म दृष्टि से भागगत ( अर्थात् कारक आदि चारों के एकदेश भूत कालगत ) भी व्यञ्जकत्व का विचार करना चाहिए ।

३९० सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः अत्र ह्यचिराद्भविष्यन्ति पन्थान इत्यत्र भविष्यन्तीत्यस्मिन् पदे प्रत्ययः कालविशेषाभिधायी रसपरिपोषहेतुः प्रकाशते । अयं हि गाथार्थः प्रवासविप्रलम्भशृङ्गारविभावतया विभाव्यमानो रसवान् । यथात्र प्रत्ययांशो व्यञ्जकस्तथा क्वचित्प्रकृत्यंशोऽपि दृश्यते । यथा— तद्गेहं नतभित्ति मन्दिरमिदं लब्धावगाहं दिवः सा धेनुर्जरती चरन्ति करिणामेता घनाभा घटाः । स क्षुद्रो मुसलध्वनिः कलमिदं सङ्गीतकं योषिता- माश्चर्यं दिवसैर्द्विजोऽयमीयतीं भूमिं समारोपितः ॥ अत्र श्लोके दिवसैरित्यस्मिन् पदे प्रकृत्यंशोऽपि द्योतकः । सर्व- नाम्नां च व्यञ्जकत्वं यथानन्तरोक्ते श्लोके । अत्र च सर्वनाम्नामेव यहां 'शीघ्र ही मार्ग हो जायेंगे' इसमें 'हो जायेंगे' इस पद में प्रत्यय कालविशेष का अभिधान करने वाला एवं रसपरिपोष का हेतु प्रकाशित होता है । यह गाथार्थ प्रवास विप्रलम्भ शृङ्गार के विभाव के रूप में विभाव्यमान होकर रसवान् हो जाता है । जैसे यहां प्रत्ययांश व्यञ्जक है वैसे कहीं पर प्रकृत्यंश भी देखा जाता है । जैसे— झुकी भीतों वाला वह घर (और कहां) यह आकाश का अवगाहन करने वाला (आलीशान) भवन; वह बूढ़ी गाय (और कहां) यह हाथियों का झुण्ड घूम रहा है; वह मूसल की क्षुद्र आवाज (और कहां) यह महिलाओं का अव्यक्त-मधुर सङ्गीत; आश्चर्य है कि (कुछ ही) दिनों में यह ब्राह्मण इस अवस्था तक पहुंचा दिया गया ! इस श्लोक में 'दिनों में' ('दिवसैः') इस पद में प्रकृत्यंश भी द्योतक है । सर्व- नामों का व्यञ्जकत्व जैसे अभी कहे गए (इस) श्लोक में । यहां सर्वनामों के ही व्यञ्जकत्व को कवि ने मन में रख कर 'क्व' इत्यादि शब्द का प्रयोग नहीं किया है । लोचनम् मिति भावः । रसपरिपोषेति । उत्प्रेक्ष्यमाणो वर्षासमयः कम्पकारी किमुत वर्तमान इति ध्वन्यते । अंशांशिकप्रसङ्गादेवाह—यथात्रेति । दिवसार्थो ह्यत्रात्यन्तासम्भाव्यमानतामस्यार्थस्य ध्वनति । सर्वनाम्नां चेति । प्रकृत्यंशस्य चेत्यर्थः । तेन प्रकृत्यंशेन सम्भूय सर्वनामव्यञ्जकं दृश्यत इत्युक्तं रसपरिपोष—। उत्प्रेक्ष्यमाण कम्पकारी वर्षा समय क्या वर्तमान है ? यह ध्वनित होता है । अंशांशिक प्रसंग से ही कहते हैं—जैसे यहाँ—। यहाँ 'दिवस' का अर्थ इस अर्थ की अत्यन्त असम्भाव्यमानता ध्वनित करता है । सर्वनामों का—। अर्थात् प्रकृत्यंश का । उस प्रकृत्यंश के साथ मिलकर सर्वनाम व्यञ्जक