सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
संग्रह पर लौटें

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

देखनेमें आश्चर्य एकैक । उसी विश्व-रूपमें जो एक ।
अनेकताका दर्शन-सुख । हुआ फल-प्रद ॥ ५ ॥
कहां हैं इसके चरण । कहां है मुकुट विस्तीर्ण ।
बढ़ती इच्छा प्रतिक्षण । देखनेकी ॥ ६ ॥
रखी वहां भाग्य-निधि पार्थ । होंगे कैसे निष्फल मनोरथ ।
रखता क्या भातेमें बाण व्यर्थ । पिनाकपाणी ॥ ७ ॥
नहीं तो ब्रह्मदेवकी गिरापर । होते हैं क्या झूटे अक्षर ।
इसीलिये साद्यंत जो है अपार । देखा विश्व-रूप ॥ ८ ॥
नहीं होता जो वेदको आकलन । उसका सकलावयव दर्शन ।
एक समय करते हैं नयन । धनंजयके ॥ ९ ॥
चरणोंसे मुकुट पर्यंत । देखता है रूप-श्रेष्ठ पार्थ ।
नाना रत्नालंकार भूषित । झलक सुंदर ॥ २१० ॥
पर-ब्रह्म बना स्वयं भूषण । सजानेके लिये अपना तन ।
उन अलंकारोंका मैं वर्णन । करूं कैसे ॥ ११ ॥
उसकी जो प्रभा अतीव उज्ज्वल । निखारती थी चंद्रादित्य मंडल ।
थी जो वह महातेजकी चित्कला । उससे प्रकटता विश्व ॥ १२ ॥
वह जो दिव्य-तेज शृंगार । किसीकी बुद्धिको हो गोचर ।
पहना हरि ने अलंकार । देखता पार्थ ॥ १३ ॥
शरीर था वही अलंकार । जो है हाथ वही हथियार ।
जो है शरीरी वही शरीर । स-चराचरमें वही ॥ १४ ॥
वही फिर ज्ञान दृष्टिसे निर्मल । देखता कर-पल्लव जो सरल ।
वहां तोडते जो कल्पांतक ज्वाल । ऐसे शस्त्र करमें ॥ १५ ॥
उसके किरणोंके स्फुलिंग । नक्षत्रोंको बनाते जो मूंग ।
उसके तेजमें छिपी आग । घुसती सिंधुमें ॥ १६ ॥
फिर कालकूट कल्लोलके तरंग । अथवा विद्युतवनके विस्फुलिंग ।
दीखते हैं कर-पल्लव अभंग । उचितायुध-युक्त ॥ १७ ॥
३५१ विश्व-रूप-दर्शनयोग

दिव्यमाल्याम्बरधरं दिव्यगन्धानुलेपनम् ।
सर्वाश्चर्यमयं देवमनन्तं विश्वतोमुखम् ॥ ११ ॥
विश्वरूपकी भयानकतासे विह्वल होकर दृष्टि मूंद लेना—
उस भयसे हटाकर दृष्टि । देखता कंठ मुकुट किरीटी ।
हुई है सुरतरुकी जो सृष्टि । मानो वहींसे ॥ १८ ॥
मूल-सिद्धीका जहां महा-पीठ । शांत कमलाका विश्राम मठ ।
ऐसे सुमनों से वह किरीट । सजा हुआ ॥ १९ ॥
मुकुट पर पुष्प स्तवक । तथा पूजा अंध जो अनेक ।
गलेमें झूलते अलौकिक । पुष्पहार ॥ २२० ॥
सूर्य तेजसे स्वर्गको लपेटना । मेरु-गिरिको सुवर्णसे ओढ़ना ।
वैसा था उसका भव्य पहनना । पीतांबर सुंदर ॥ २१ ॥
शंकरको कर्पूरसे लेपना । कैलासको पारदसे पोतना ।
अथवा सागरको ही ओढ़ना । क्षीरार्णवसे ॥ २२ ॥
अजी ! चंद्रमाकी तह खोलकर । आवरण डालना आकाशपर ।
वैसे ही था उसके सर्वांग पर । चंदन लेपन ॥ २३ ॥
स्व-प्रकाशकी आभा जिससे बढ़ती । तथा ब्रह्मानंदकी उष्णता मिटती ।
पृथ्वी है अपना अस्तित्व टिकाती । उस सुगंधसे ॥ २४ ॥
ब्रह्मा जिसका लेपन करता । अनंग भी उबटन करता ।
उस परिमलकी जो महत्ता । बखाने कौन ॥ २५ ॥
ऐसी अंगर शोभा देखकर । विस्मित-सा रहा पांडुकुमार ।
यह भी न समझा देखकर । देव बैठा है या सोया है ? ॥ २६ ॥
दृष्टि खोलकर देखता बाहर । जब वही विश्व-रूप सभी ओर ।
आंख मूंदकर देखता ऊपर । तब भी वही रूप ॥ २७ ॥
सम्मुख देखें मुख अगणित । पीछे मुड देखा हो भयग्रस्त ।
वहां भी वही मुख पाया हाथ । तथा दिव्य-रूप ॥ २८ ॥
दिव्य वस्त्र पुष्प माला भूषित दिव्य गंधसे ।
सब आश्चर्यसे पूर्ण विश्व-व्यापी अनंत जो ॥ ११ ॥
ज्ञानेश्वरी ३५२

देखनेसे दीखना है स्वाभाविक । ना कछु इसमें विस्मय-जनक ।
किंतु न देखते भी दीखना एक । महादाश्चर्य ॥ २९ ॥
अनुग्रहकी यह कैसी करतूत । देखता या नहीं देखता वह पार्थ ।
उसके सह कर लिया आच्छादित । नारायणने ॥ २३० ॥
पड़कर विस्मय प्रवाहमें । निकलकर किनारा छूनेमें ।
उलझता आश्चर्य सागरमें । अनायास ॥ ३१ ॥
ऐसे ही उस अनंत-रूपके । अलौकिक दर्शन-कौशल्यके ।
जालमें धनंजय उलझके । हो रहा विस्मित ॥ ३२ ॥
श्री कृष्ण विश्वतोमुख स्वभावसे । दर्शनार्थी जो पार्थकी प्रार्थनासे ।
विश्वरूप हुआ है संपूर्णतासे । इस समय ॥ ३३ ॥
दीप या सूर्य-तेजमें है देखती । या आंख मूंदनेसे नहीं देखती ।
वह दिव्य-दृष्टि ऐसी नहीं थी । दी जो श्रीकृष्णने ॥ ३४ ॥
पार्थ देखता तब दोनों ओर । आंख खोलकर या मूंदकर ।
कहता नगरमें बैठकर । संजय राजासे ॥ ३५ ॥
कहता है “सुनो” यह संजय । विश्व-रूप देखता धनंजय ।
नानाभरणयुत स-विस्मय । विश्वतोमुख ॥ ३६ ॥
दिवि सूर्यसहस्रस्य भवेद्युगपदुत्थिता ।
यदि भाः सदृशी सा स्याद्भासस्तस्य महात्मनः ॥ १२ ॥
अनंत सूर्योंसे भी वह तेजस्वी रूप --
उस देवके जो अंग-प्रभाकी । बात कहनी है सो कहनेकी ।
जैसे द्वादशादित्य मिलनकी । प्रभा-सी कल्पांतमें ॥ ३७ ॥
अजी ! सहस्रावधि दिव्य-सूर्य । उदय हुए एक ही समय ।
फिर भी है वह अनुपमेय । उस दिव्य-प्रभासे ॥ ३८ ॥
प्रभा सहस्र सूर्योंकी नभमें एक हो दिखे ।
तभी उस महात्माकी प्रभासे तुल्य है नहीं ॥ १२ ॥
३५३
(45) विश्व-रूप-दर्शनयोग

सभी विद्युल्लताओका हो मिलन । तथा प्रलयाग्निके सारे सामान ।
उसीमें जो दश-तेजोंका मिलान । करने पर भी ॥ ३९ ॥
उस शरीर-कांतिके सम्मुख । पास पास आएगा देख ।
किंतु उसके सम नहीं चोख । यह निश्चित ॥ २४० ॥
ऐसा महात्म्य उसका सहज । फैलता है अंगका सब तेज ।
व्यासकी कृपासे मैं वह आज । यहां देखता हूँ ॥ ४१ ॥
तत्रैकस्थं जगत्कृत्स्नं प्रविभक्तमनेकधा ।
अपश्यद्देवदेवस्य शरीरे पाण्डवस्तदा ॥ १३ ॥
दृश्य और दृष्टाका अद्वय-भाव—
उस विश्व-रूपमें एक ओर । जगत है अपना सविस्तर ।
रहते जैसे बुल्ले ठौर ठौर । महा-सागरमें ॥ ४२ ॥
अथवा आकाशमें गंधर्व-नगर । भूतलमें पिपीलिका बांधती घर ।
तथा परमणु मेरु-पर्वतपर । उड़ते रहते हैं ॥ ४३ ॥
इस भांति विश्व अपरंपार । देव चक्रवर्तिके तन पर ।
उस अवसर पांडुकुमार । देखता है ॥ ४४ ॥
ततः स विस्मयाविष्टो हृष्टरोमा धनंजयः ।
प्रणम्य शिरसा देवं कृताञ्जलिरभाषत ॥ १४ ॥
एक विश्व वहां और एक आप । ऐसा दुजा भाव था जो अल्प स्वल्प ।
उसका भी अंतःकरणमें लोप । हुवा अचानक ॥ ४५ ॥
जागृत हुआ ब्रह्मानंद अंदर । शरीर बल खोया यहां बाहर ।
डूबा आनंद पुलकमें शरीर । अपाद्-मस्तक ॥ ४६ ॥
विश्वके जो सभी भेद जैसे घुल गये तब ।
अर्जुनने वहां देखे देहमें देवदेवके ॥ १३ ॥
फिर अर्जुन साश्चर्य हर्ष रोमांच गात्रसे ।
प्रभुसे जोडके हाथ बोला हो नत मस्तक ॥ १४ ॥
ज्ञानेश्वरी ३५४

वर्षाका जैसे प्रथम काल । सर्वांग हरा होता है शैल ।
वैसे रोम-कूपमें सकल । खिले रोमद्रुम ॥ ४७ ॥
स्पर्श होते ही चंद्रकिरण । होता सोम-कांतका द्रवण ।
तन पर वैसे स्वेद-कण । उमड़ आये ॥ ४८ ॥
फंस जानेसे जैसे अलिकुल । झूलती कमल कलि सकल ।
हृदय-आनंदोर्मियोंके बल । सिहरता वैसे ॥ ४९ ॥
कर्पूर-केलिका गर्भ-पुट जैसे । छीलकर कर्पूर चूता वैसे ।
अर्जुनके नयन-कमलोंसे । चूते अश्रुकण ॥ २५० ॥
सात्त्विकताके ये जब अष्ट भाव । परस्परमें करते हैं उछाह ।
पाता है तब ब्रह्मानंदका जीव । दिव्य-साम्राज्य ॥ ५१ ॥
उदित होते ही सुधाकर । सानंद उमड़ता सागर ।
बार बार वैसे ऊर्मि भर । आती हृदयमें ॥ ५२ ॥
अजी ! सुखानुभवके कारण । कृपासे किया था द्वैत रक्षण ।
आह भर करके प्रतिक्षण । देखता पार्थ ॥ ५३ ॥
मुख कर बैठा था जिस ओर । उसी ओर मस्तक नवाकर ।
प्रणाम किया हाथ जोड कर । औ' किया स्तवन ॥ ५४ ॥
अर्जुन उवाच
पश्यामि देवांस्तव देव देहे
सर्वांस्तथा भूतविशेषसंघान् ।
ब्रह्माणमीशं कमलासनस्थ-
मृषींश्च सर्वानुरगांश्च दिव्यान् ॥ १५ ॥
अर्जुनने कहा
हे देव देखूं तव देहमें मैं
हैं देव औ' भूत समूह सारा ।
ध्यानस्थ ब्रह्मा कमलासनस्थ
महर्षि औ' नाग हैं एक साथ ॥ १५ ॥
३५५ विश्व-रूप-दर्शनयोग

सर्वत्र सभी तू ही तू भरा है प्रभो—
कहता है प्रभो तेरी जय जय । तब कृपासे ही यह धनंजय ।
दर्शन कर सका इस समय । यह विश्व-रूप ॥ ५५ ॥
सच ही प्रभो तूने भला किया । हृदय यह आनंदित भया ।
तू ही है यह मैंने देख लिया । आश्रय विश्वका ॥ ५६ ॥
अनेक वन जैसे मंदार पर । श्वापदों सह लगे हैं ठौर ठौर ।
वैसे ही यहाँ तेरे शरीर पर । भुवन हैं अनेक ॥ ५७ ॥
अथवा गोदमें आकाशके । दीखते हैं मंडल ग्रहोंके ।
होते हैं झुण्ड पक्षी-कुलके । वृक्ष पर ॥ ५८ ॥
उसी भांति हे चक्रधर । विश्वात्मक तेरा शरीर ।
स्वर्गकेलिये भी है घर । देव गणोंके ॥ ५९ ॥
स्वामी ! महाभूतोंका पंचक । देखता हूं मैं यहां अनेक ।
तथा भूत-ग्राम जो अनेक । भूत-सृष्टिके ॥ २६० ॥
तुझमें दीखता है सत्य-लोक । बैठा है ब्रह्म-देव चतुर्मुख ।
वहां उस ओर कैलास एक । देखता मैं ॥ ६१ ॥
भवानी सह महादेव । तुझमें तू दीखता केशव ।
एकांशमें तुझमें ये सर्व । दीखते यहां ॥ ६२ ॥
वैसे ही कश्यपादि ऋषि-कुल । दीखते इस मूर्तिमें सकल ।
दीखते हैं यहां सप्त पाताल । शेष-नाग सह ॥ ६३ ॥
अथवा मानो त्रिभुवन-पति । तेरे अंगांगकी एकेक भित्ति ।
चतुर्दश भुवन चित्राकृति । सजाती है ॥ ६४ ॥
तथा यहां दीखते जो जो लोक । मानो चित्र रचना है अनेक ।
गोचर होता यहां अलौकिक । तेरा गांभीर्य ॥ ६५ ॥
ज्ञानेश्वरी ३५६

अनेकबाहूदरवक्त्रनेत्रं
पश्यामि त्वां सर्वतोऽनन्तरूपम् ।
नान्तं न मध्यं न पुनस्तवादिं
पश्यामि विश्वेश्वर विश्वरूप ॥ १६ ॥

देखता मैं दिव्य चक्षुसे । जहां तहां सभी ओरसे ।
भुजदंडमें भरे जैसे । महा आकाश ॥ ६६ ॥
वैसे एक ही निरंतर । देखनेसे हैं तेरे कर ।
करते संपूर्ण व्यापार । एक कालमें ॥ ६७ ॥
तथा ब्रह्मका है विस्तार । खोलता ब्रह्मांड भांडार ।
वैसा दीखता उदर । तेरा असीम ॥ ६८ ॥
कहते हैं सहस्रशीर्ष पुरुष । देखता मैं अनंत-शीर्ष पुरुष ।
लगता पर-ब्रह्म हो आया मुख । इसं समय ॥ ६९ ॥
जहां तहां देखता तेरे वदन । विश्व-रूपमें जो है विराजमान ।
वहीं दीखते हैं अनंत नयन । पंक्ति बद्ध हो ॥ २७० ॥
रहने दो यह स्वर्ग पाताल । तथा धरणी दिशा अंतराल ।
इसी रूपमें भरा है सकल । मूर्तिमय हो ॥ ७१ ॥
कहीं नहीं है तेरे बिन । परमाणु-सा रिक्त स्थान ।
यह देख कहता मन । कितना व्यापक तू ॥ ७२ ॥
नाना प्राणि जात सहित । भरे हुए जो महाभूत ।
तूने व्यापलिये अनंत । देखता मैं ॥ ७३ ॥

विश्व-रूपके संबंधमें अर्जुनकी जिज्ञासा—

अनेक आंखें मुख हाथ पेट
जहां तहां देखूं अनंत मूर्ति ।
दीखे नहीं अंत न मध्य मूल
विश्वेश्वरा जो तव विश्वरूप ॥ १६ ॥

३५७ विश्व-रूप-दर्शनयोग

ऐसा तू कहांसे आया है। बैठा है खड़ा या सोया है।
तेरी आकृति कितनी है। किस मांके उदरमें ? ॥ ७४ ॥
तेरा रूप कैसा वय कितना । तेरे आदि औ' अंतकी भावना ।
तू किस भांति है यह जानना । चाहता अब ॥ ७५ ॥
देख लिया मैने यह संपूर्ण । तू ही है अपना स्थान श्रीकृष्ण ।
न तू किसीका औ' न है कारण । अनादि सिद्ध तू ॥ ७६ ॥
न तू बैठा है न खड़ा है । न छोटा है या न बड़ा है।
नीचे ऊपर सर्वत्र है । केवल तू ही ॥ ७७ ॥
रूपमें है तू अपनासा । वयमें भी तू है तुझ-सा ।
उदर पीठ भी परेशा । तेरा तू है ॥ ७८ ॥
क्या कहना है अब बात । तुझमें तू पूर्ण अनंत ।
बार बार सोचके ज्ञात । हुवा यह मुझको ॥ ७९ ॥
किंतु तेरे इस रूपमें एक । रह गया व्यंग कहता देख ।
आदि मध्य अंतका निकष । नहीं दीखता ॥ २८० ॥
देखा मैंने सर्वत्र कहीं । इन बातोंका पता नहीं ।
तुझमें तीनों कहीं नहीं । ये विशुद्ध रूप ॥ ८१ ॥
ऐसा आदि मध्यांत रहित । विश्वेश्वर तू अपरिमित ।
देखा है मैंने आज तत्वतः । विश्व-रूप ॥ ८२ ॥
तू है ऐसा महा विश्व-रूप । तेरे तनमें हैं अन्य रूप ।
तभी नाना वस्त्र अपरूप । पहने हैं तूने ॥ ८३ ॥
अथवा नाना रूप द्रुमांकुर । तेरे स्वरूप-महाचल पर ।
दिव्यालंकार फल पुष्प धर । उमड आये हैं ॥ ८४ ॥
अथः तू है स्वरूप सागर । अनेक रूप मात्र ये लहर ।
या तू एक महा-वृक्ष सुंदर । फला रूप-फलोंसे ॥ ८५ ॥
भूतोंसे भरा जैसे भूतल । या नक्षत्रोंसे नभ-मंडल ।
वैसे तू मूर्ति-मय सकल । बना स्वामी ॥ ८६ ॥
ज्ञानेश्वरी ३५८

तेरा एकेक अंग-प्रांत । होता जाता है त्रि-जगत ।
विश्व-रूप ऐसा है मूर्त । रोम रोममें भरा ॥ ८७ ॥
लगाकर तू ऐसा विश्व-पसारा । कौन कहांसे ले आया है शरीर ।
सोच देखा तो सारथी तू हमारा । वही जो जनार्दन ॥ ८८ ॥
सोचना हूं तब तू मुकुंद । ऐसा ही व्यापक सर्वदा ।
भक्तानुकंपार्थ तू हो मुग्ध । बना है सारथी ॥ ८९ ॥
चतुर्भुज तू शाम मनमोहन । देखकर होते हैं तृप्त नयन ।
करनेमें तब प्रेमालिंगन । आना भुजाओंमें ॥ २९० ॥
ऐसी सुंदर मूर्ति तू स्रूप । भक्तसे हो आता है विश्व-रूप ।
किंतु हमारी दृष्टि है सलेप । देखते हम सामान्य ॥ ९१ ॥
गयी है अब दृष्टिकी मलीनता । सहज दी तूने दृष्टिमें दिव्यता ।
इसीलिये जाना मैंने यथार्थता । महिमा तेरी ॥ ९२ ॥
उस मरियलके उस पार । छिपा था रूप जो ना ओर छोर ।
वह सम्मुख आया भयंकर । पहचाना मैंने ॥ ९३ ॥
किरीटिनं गदिनं चक्रिणं च
तेजोरार्शि सर्वतो दीप्तिमन्तम् ।
पश्यामि त्वां दुर्निरीक्ष्यं समन्ताद्
दीप्तानलार्कद्युतिमप्रमेयम् ॥ १७ ॥
वही मुकुट जो पस्तक पर । दीखता है यहां धरणी धर ।
अज है उसका तेज अपार । है अति विस्मय ॥ ९४ ॥
प्रभो गदा चक्र किरीट धारी
प्रकाश सर्वत्र भरा प्रचंड ।
देखा न जाता वह अप्रमेय
जला रहे सूरज अग्नि ज्योति ॥ १७ ॥
३५९ विश्व-रूप-दर्शनयोग

भक्त मनोरथार्थ विश्व-रूप बना ऋषिकेश—
ऊपरका जो यह हाथ । चक्रचलानेमें है रत ।
वह चिन्ह स्पष्ट है तात । विश्व-मूर्तिका ॥ ९५ ॥
वहीं दूसरे हाथमें गदा । नीचेका हाथ है निरायुध ।
रास संभालते है गोविंद । सरसाते जो ॥ ९६ ॥
तथा उसी वेगसे तू सहसा । मेरे मनोरथार्थ ऋषीकेश ।
विश्व-रूप बना है विश्वेश । जानता हूं मैं ॥ ९७ ॥
किंतु है क्या यह अतिओज । मौका है न सोचनेका आज ।
हुवा है मेरा चित्त अबूझ । अतिशय तात ॥ ९८ ॥
यह विश्व-रूप है भी या नहीं । सोच ऐसा श्वास चलता नहीं ।
अंग-प्रभाकी जो यह नवाई । भरी है सर्वत्र ॥ ९९ ॥
इस तेजसे नयन झुलसता । सूर्य मलिन खद्योतसा भासता ।
ऐसी तीव्र है जिसकी अद्भुतता । यहां आज ॥ ३०० ॥
यह मानो महा-तेजका महार्णव । विश्वको डुबो देता है कर तांडव ।
युगांतका वज्रपात जैसे देख । ढक देता है ॥ १ ॥
अथवा संहार तेजकी जो ज्वाल । तोड़के मंडप बांधा अंतराल ।
दिव्य-चक्षुसे अब नभ-मंडल । देखा नहीं जाता ॥ २ ॥
अधिकाधिक प्रकाश उज्ज्वल । जलाता बनकर महाज्वाल ।
देखनेसे होती दृष्टि व्याकुल । दिव्यता होने पर भी ॥ ३ ॥
अथवा महा-प्रलयका प्रचंड । होता है जो कालाग्निरुद्रमें गूढ़ ।
उस तीसरे नयनके प्रगाढ़ । खुले हैं पलक ॥ ४ ॥
तथा फैला यह प्रकाश । पंचाग्नि-ज्वालाओंके पाश ।
करते ब्रह्मांडका शोष । अळकर ॥ ५ ॥
तेजाराशी है जो ऐसी अद्भुत । देखता मैं आज ही हो चकित ।
तेरी कांतिकी व्याप्ति है अनंत । विश्व-रूप ॥ ६ ॥
ज्ञानेश्वरी ३६०

त्वमक्षरं परमं वेदितव्यं
त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम् ।
त्वमव्ययः शाश्वतधर्मगोप्ता
सनातनस्त्वं पुरुषो मतो मे ॥ १८ ॥
अनादिमध्यान्तमनन्तवीर्यम्
अनन्तबाहुं शशिसूर्यनेत्रम् ।
पश्यामि त्वां दीप्तहुताशवक्त्रम्
स्वतेजसा विश्वमिदं तपन्तम् ॥ १९ ॥
तेरे तेजसे सारा विश्व संतप्त है प्रभो—
हे देव तू है अक्षर । त्रिअर्थ मात्रासे पर ।
श्रुति है जिसका घर । ढूंढती है ॥ ७ ॥
आकारका तू आयतन । विश्व निक्षेपका निधान ।
वह अव्यय तू गहन । अविनाशी जो ॥ ८ ॥
धर्मका है तू जीवन । अनादि नित्य-नूतन ।
सैंतीसवा तू महान । पुरुष विशेष ॥ ९ ॥
तू है आदि मध्यांत रहित । सर्व सामर्थ्यसे तू है अनंत ।
विश्व-बाहु तू अपरिमित । विश्व-चरण तू ॥ ३१० ॥
असीम तू अक्षर जाननेका
तू ही महा आश्रय विश्वका है ।
तू राखता शाश्वत-धर्म नित्य
मैं जानता तू परमात्म तत्व ॥ १८ ॥
अनादि मध्यांत अनंत शक्ति
अनेक भुजा मुख अग्नि-ज्योति ।
आंखें दिखे उज्ज्वल चन्द्र सूर्य
स्वतेजसे तू जगको तपाता ॥ १९ ॥
(46) ३६१ विश्व-रूप-दर्शनयोग

मानो सूर्य चंद्रकी जो कला । तेरी कोप-प्रसाद लीला ।
कृपा दृष्टिसे कर संभाल । कोप कटाक्षसे क्रोध ॥ ११ ॥
इस भांति मैं अब देखता । प्रख्याग्नि तेज-सा अनंत ।
तेरे बदनकी जो दिव्यता । विस्मित होकर ॥ १२ ॥
आगसे धधकते पर्वत । निकलती ज्वालायें अद्भुत ।
जैसे चाटते हैं दाढं दांत । ज्वाला जिव्हा ॥ १३ ॥
इस बदनकी जो है ऊब । तथा सर्वांग-कांतिकी प्रभा ।
करती विश्वमें अति क्षोभ । अकुलाहट भरा ॥ १४ ॥
द्यावापृथिव्योरिदमंतरं हि
व्याप्तं त्वयैकेन दिशश्च सर्वाः ।
दृष्ट्वाद्भुतं रूपमुग्रं तवेदं
लोकत्रयं प्रव्यथितं महात्मन् ॥ २० ॥
जो देख अकुला रहा त्रिलोक —
भूलोक और पाताल । पृथ्वी तथा अंतराल ।
दश दिशायें आकुल । है दिशा चक्र ॥ १५ ॥
तुझसे है जो यह संपूर्ण एक । भरा हुवा देखता मैं सकौतुक ।
गगन सह डूबा है, भयानक । विश्व-रूपमें ॥ १६ ॥
या रस लहरोंसे अद्भुत । चतुर्दश भुवन हैं व्याप्त ।
वैसे मैं हो अत्यंत विस्मित । देखूं क्या क्या ॥ १७ ॥
अनाकलित व्याप्ति जो असाधारण । सही न जाती रूपकी उग्रता-तीक्ष्ण ।
सुख गया दूर, यहां विश्वके प्राण । निकले भयसे ॥ १८ ॥
सभी दिशा विस्तृत अंतरिक्ष
सर्वत्र तू एक हि छा रहा है ।
तेरा यही अद्भुत उग्र रूप
जो देख अकुला रहा त्रिलोक ॥ २० ॥
ज्ञानेश्वरी ३६२

तुझको देखकर हे विश्वेश्वर । न जाने आया कैसे भय उभर ।
डूब रहा है अब दुःख सागर । लहरियोंमें त्रिलोक ॥ १९ ॥
वैसे तुझ महात्माका दरशन । वहां क्या है भय दुःखका स्थान ।
जिससे न होता सुखका ज्ञान । इसका भान है मुझे ॥ ३२० ॥
जब तक तेरा रूप नहीं देखा । तब तक जगको संसार चोखा ।
देखने पर विजय विष चरखा । हुई अरुचि ॥ २१ ॥
आगे रूप नहीं होता आकलन । जिससे नहीं होता प्रेमालिंगन ।
पीछे दीखता है संसार मलिन । ऐसा उभय संकट ॥ २२ ॥
तभी पीछे हठे तो संसार । जो है रुकावट अनिवार ।
आगे तू अनिवार अपार । न होता आकलन ॥ २३ ॥
ऐसा है उभय संकटग्रस्त । त्रिभुवन होता है अतित्रस्त ।
मेरा मत हुव ऐसा निश्चित । यह रूप देखके ॥ २४ ॥
संतापसे जो ऐसा झुरसा हुआ । उपशमार्थ सिंधुपे आया हुआ ।
तरंग तांडव देख डरा हुआ । रहता है जैसे ॥ २५ ॥
ऐसा हुआ यह विश्व समस्त । तुझे देख तड़पनेमें रत ।
उससे भला पैर तीर प्राप्त । ज्ञान-संपन्न देव ॥ २६ ॥
अमी हि त्वां सुरसंघा विशन्ति
केचिद्भीताः प्राञ्जलयो गृणन्ति ।
स्वस्तीत्युक्त्वा महर्षिसिद्धसंघाः
स्तुवन्ति त्वां स्तुतिभिः पुष्कलाभिः ॥ २१ ॥
अविद्या-सिंधु और स्वर्ग संसार फंदोंसे मुक्तिके लिये तेरी प्रार्थना—
ये देव सारे तुझमें समाये
कोई भयग्रस्त हो बद्ध-हस्त ।
मांगल्य गाके तब सिद्ध-संत
स्तवते तुझीको अनेक भांति ॥ २१ ॥
३६३ विश्व-रूप-दर्शनयोग

तेरे शरीरका यह जो तेज । जलाता है सारे कर्मका बीज ।
जिससे तुझमें मिलते निज । सद्भावनासे ॥ २७ ॥
तथा जो हैं सहज भय-भीत । होकर तेरे पथके अमित ।
गाते हैं तेरी प्रार्थनाके गीत । कर जोड करके ॥ २८ ॥
देव ! डूबे हैं अविद्या-सिंधुमें । फंसे हैं विषय-विष-जालमें ।
फंसे हैं स्वर्ग-संसार फंडोंमें । दोनों ओरसे ॥ २९ ॥
ऐसे हमको करनेमें मुक्त । कौन हैं त्रिभुवनमें समस्त ।
आये हैं हम सो शरणागत । कहते हैं ये ॥ ३० ॥
तथा महर्षि अथवा सिद्ध । विद्याधर संघ जो विविध ।
गाते हैं तेरा ही स्वस्तिवाद । तथा शुभ-स्तवन ॥ ३१ ॥
रुद्रादित्या वसवो ये च साध्या
विश्वेऽश्विनौ मरुतश्चोष्मपाश्च ।
गंधर्वयक्षासुरसिद्धसंघा
वीक्षन्ते त्वां विस्मिताश्चैव सर्वे ॥ २२ ॥
रुद्र-आदित्योंके ये समुदाय । वसु साध्य आदि ये देव ।
अश्विनी विश्वे-देव स-वैभव । मरुत भी वहां ॥ ३२ ॥
सुनो अग्नि तथा गंधर्व । यक्ष राक्षस गण सर्व ।
महेंद्रादि जो मुख्य देव । तथा सिद्धादिक ॥ ३३ ॥
ये सब धर अपना स्वस्थान । विस्मित करते अवलोकन ।
महा-मूर्तिका है दिव्य-दर्शन । देखता हूँ मैं ॥ ३४ ॥
आदित्य विश्वे वसु रुद्र साध्य
कुमार दोनों पितृ-देव वायु ।
गंधर्व दैत्यों सह यक्ष सिद्ध
सारे तुझे विस्मित देखते हैं ॥ २२ ॥
ज्ञानेश्वरी
३६४

फिर देखते हैं क्षणक्षण । विस्मययुत अंतःकरण ।
नत-मस्तक हो समर्पण । करते निज मुकुट ॥ ३५ ॥
जय घोषके कलरव मधुर । गूंजते हैं स्वर्गमें जो सुंदर ।
रखे हैं ललाट पर सुंदर । कर संपुट नमनार्थ ॥ ३६ ॥
वह नम्रता-वृक्ष बन सकळ । खिला सात्विक वसंतसे सकाळ ।
तभी उस कर-संपुटमें फल । लगा यह तेरा ॥ ३७ ॥
रूपं महत्ते बहुवक्त्रनेत्रं
महाबाहो बहुबाहूरुपादम् ।
बहूदरं बहुदंष्ट्राकरालं
दृष्ट्वा लोकाः प्रव्यथितास्तथाहम् ॥ २३ ॥
नयनोंका हुवा यह भाग्योदय । या जीवोंका सुख सुकाळ उदय ।
तभी हुवा तेरे रूपका सदय । भव्य दर्शन ॥ ३८ ॥
रूप है जो यह लोक-व्यापक । चहूं ओरसे देखता सम्मुख ।
देवोंके लिये भी जो भयानक । देखके चौंकते हैं ॥ ३९ ॥
ऐसा एक किंतु है विचित्र । तथा भयानक हैं वक्त्र ।
बहु लोचन तथा सशस्त्र । भुजा असंख्य ॥ ३४० ॥
अनेक जो चारु-चरण । बहु उदर नाना-वर्ण ।
प्रति वदन मद-पूर्ण । आवेशसे ॥ ४१ ॥
अथवा महा-प्रलय समय । पाशमें बांधकर यमराय ।
प्रलयाग्नि जलाता भयमय । जहां तहां सर्वत्र ॥ ४२ ॥
या संहार त्रिपुरारिका यंत्र । या प्रलय-भैरवका जो क्षेत्र ।
अनेक युगांत शक्तिका पात्र । आगे किये विनाशाथर्य ॥ ४३ ॥
विशाल है रूप असंख्य नेत्र
करालं दाढें मुख हाथ पैर ।
अनेक हैं ऊरु विशाल पेट
ये देख हूँ व्याकुल लोक मैं भी ॥ २३ ॥
३६५ विश्व-रूप-दर्शनयोग

अध्याय ८: अक्षरब्रह्मयोग

वैसे जहां तहां चहूं ओर। तेरे वदन हैं भयंकर।
वहां सिंहसे दांत प्रखर। दीखते क्रोधाग्निसे ॥ ४४ ॥
देख जैसे काल रात्रिका अंधार। करते हैं पिशाच घोर संचार।
वैसे वदनमें प्रलय रुधिर। भरे हैं दांत ॥ ४५ ॥
कालने किया है जैसे युद्ध-निमंत्रण। उन्मत्त हुआ सर्व संहारक मरण।
वैसे दीखते हैं मुखमें भय लक्षण। तेरे आज ॥ ४६ ॥
बेचारे उस त्रिभुवन पर। सहज दृष्टि डाली इक बार।
वह दुःख कालिंदी तट पर। हो गया है वृक्ष ॥ ४७ ॥
रूप है यह महा-मृत्युका सागर। उठते हैं उसमें दुर्वातां भंवर।
त्रैलोक्य-जीवित डोंगी खाती चक्कर। उलटी आंधीमें ॥ ४८ ॥
क्रोधसे तू यदि यह कहता। लोगोंकी बात क्यों व्यर्थ करता।
इसमें तेरा क्या आता जाता। भोग तू ध्यान सुख ॥ ४९ ॥
देव ! लोगोंकी बात क्या साधारण। किया है यह परदा स-कारण।
कांप रहे हैं मेरे स-देहप्राण। देखकर रूप ॥ ३५० ॥
संहार-रुद्र भी घबड़ाता जिससे। मृत्यु भी छिप जाता जिसके डरसे।
ऐसा महाबली मैं कांपता भयसे। ऐसा किया तूने ॥ ५१ ॥
महामारीका यह कराल रूप। भयको जो छिपाने लगता आप।
इसको कहना यदि विश्व-रूप। आश्चर्य है यह ॥ ५२ ॥
नभःस्पृशं दीप्तमनेकवर्णं
व्यात्ताननं दीप्तविशालनेत्रम् ।
दृष्ट्वा हि त्वां प्रव्यथितान्तरात्मा
धृतिं न विन्दामि शमं च विष्णो ॥ २४ ॥
आकाश भेदे बहुरंगवाले
खुले मुखोंके विशाल नेत्र।
ज्वलंत तू देव तुझ देख जीव
अधीर होता सुख शांति खोता ॥ २४ ॥
ज्ञानेश्वरी ३६६

महाकालसे हठ छोड़कर । अनेक मुख जो क्रोधसे भर ।
आकाशको ओछा मान विस्तार । दिखाते हैं अपना ॥ ५३ ॥
नभ-विस्तार न करता आकलन । त्रिलोक पवन न करता वेष्टन ।
जिसमेंसे ज्वाला निकलती महान । धधकती हुई ॥ ५४ ॥
इनमें हैं विविध आकार । वैसे ही हैं वर्णके प्रकार ।
प्रलयाग्नि भी लेता आधार । इन मुखोंका ॥ ५५ ॥
इतना है इनके अंगका तेज । इनसे राख होता विश्व सहज ।
एक मुखमें मुख उनमें तेज । दांत औ' दाढ भी ॥ ५६ ॥
हुवा यहां मानो वायुको धनुर्वात । समुद्र हुवा महापूरमें पतित ।
विषाग्नि मारनेमें हुवा प्रवृत्त । बड़वानलको ॥ ५७ ॥
पीता है जैसे अग्नि हालाहल । मृत्यु मरनेमें सन्नद्ध है नवल ।
संहार तेज आज निगलता खोल । मुख बन कर ॥ ५८ ॥
किंतु कैसे हैं ये विशाल । जैसे टूटा हुवा अंतराल ।
मानो आकाशका ही बिल । पड़ा है यह ॥ ५९ ॥
या वसुंधराको बगलमें दबाकर । हिरण्याक्ष घुसा जब पाताल गव्हर ।
पाताल कुहर खोला हाटकेश्वर । वक्त्र दीखते ऐसे ॥ ३६० ॥
तेरे मुखोंका ऐसा विकास । उसमें जिह्वाओंका आवेश ।
विश्व बनता अधूरा ग्रास । इसीलिये नहीं खाता ॥ ६१ ॥
तथा पातालव्यालोंका फूत्कार । विष ज्वाला जा छूती हैं अंबर ।
वैसी फैली है जिव्हा भयंकर । बदन-दरीमें ॥ ६२ ॥
प्रलय-विद्युतके झुंड लेकर । सजाये हैं जैसे गगन शिखर ।
मुखमें दीखते हैं दांत प्रखर । तथा दाढ भी वैसे ॥ ६३ ॥
जैसे ललाट परके अंचलमें । भयको ही डराते हैं अंधारमें ।
महा-मृत्युके हैं आवेग वेगमें । अंगार-सी आंखें ॥ ६४ ॥
ऐसा ले यह महा-भयका भोज । यहां क्या करने आया है तू काज ।
समझ न पा करके यह मुझ । मरण भय आया है ॥ ६५ ॥
३६७ विश्व रूप-दर्शनयोग

देव ! विश्व रूप देखनेकी आस । उसका प्रतिफल है यह खास ।
उसको देखा है मैंने स-हव्यास । हुईं अब आंखें शांत ॥ ६६ ॥
शरीर है यह नाशवंत पार्थिव । उसका नहीं है यहां विशेष भाव ।
अविनाशी चैतन्यका न रहा ठाव । जीने मरनेका ॥ ६७ ॥
भयमें है वैसे अंग कांपता । बढता है तब मन तापता ।
अथवा बुद्धिका बल हिलता । गलता अभिमान ॥ ६८ ॥
इन सबसे जो है निराला । केवल जो आनंदैककळ ।
वह अंतरात्मा भी निश्चळ । कांपता यहां ॥ ६९ ॥
लगा साक्षात्कारका वेध । नष्ट किया है सब बोध ।
ऐसा गुरु-शिष्य संबंध । मिलेगा कहां ॥ ३७० ॥
देवेश ! तेरा जो यह दर्शन । शिथिल करता अंतःकरण ।
उसको संभालनेमें जतन । करता हूं मैं ॥ ७१ ॥
धैर्य जो मेरा संपूर्ण खो गया । तूने यह विश्व-रूप दिखाया ।
तथा मुझको है उलझा दिया । उपदेशमें ॥ ७२ ॥
यहां आसरा पानेमें जीव । करता है चारों ओर धांव ।
उसको नहीं मिलता ठाव । इस रूपमें ॥ ७३ ॥
विश्व-रूप ऐसा महामार । निर्जीव करता है चराचर ।
तब रहे कैसे मौन होकर । देव देवेश ॥ ७४ ॥
दंष्ट्राकरालानि च ते मुखानि
दृष्ट्रैव कालानलसन्निभानि ।
दिशो न जाने न लभे च शर्म
प्रसीद देवेश जगन्निवास ॥ २५ ॥
कल्पांत अग्नीसम दीखतें है
प्रचंड मुख औ' कराल दाढ ।
दिशा न सूझे मुख-शांति नाशे
प्रसन्न हो तू जगके निवास ॥ २५ ॥
ज्ञानेश्वरी ३६८

सबका नाश करनेवाली दैवी शक्ति—
फूटा महा-मृत्युका मशक । ऐसे जो तेरे मुख अनेक ।
नाचते हैं आंखोंके सम्मुख । फैले हुए ॥ ७५ ॥
दांत औ' डाढोंकी खुली कतार । ओंठ न छिपा सकते प्रखर ।
प्रलय-शस्त्रोंका पडा है घेर । लगा है जैसे ॥ ७६ ॥
तक्षमें भरा हालाहल जहर । काल-रात्रिमें हुवा भूत-संचार ।
या आया वज्राग्नि-अग्न्यस्त्र धर । वैसा यह रूप ॥ ७७ ॥
वैसे ही तेरा वदन बिकराल । उसमें मृत्यु-रसका रेलारेल ।
फिर आवेश उमडता विपुल । हम पर ही ॥ ७८ ॥
संहार-कालका चंडानिल । महाकल्पका प्रलयानल ।
हुवा दोनोंका संहार-मेल । फिर न जलेगा क्या ॥ ७९ ॥
वैसे तेरे ये संहारमुख । देखा हुवा मेरा धैर्य खाख ।
भूला मैं अब दिशा भी देख । तथा अपनेको भी ॥ ३८० ॥
विश्व-रूप देखा क्षण काल । तथा पडा सुखका अकाल ।
समेट ले तू रूप विशाल । जो है अस्त-व्यस्त ॥ ८१ ॥
ऐसा करेगा तू यह यदि जानता । विश्व-रूपकी मैं बात भी क्यों करता ।
रक्षा कर तू प्राणकी परम-पिता । इस स्वरूप प्रलयसे ॥ ८२ ॥
भगवानका हेतु अर्जुनका मोह —-
यदि तू स्वामी है हमारा अनंत । रक्षण कर डाल बन जीवित ।
समेटले फैलाव अपरमित । महा-मृत्युका ॥ ८३ ॥
सुन तू सकल देवोंका परम देव । चैतन्य तू तुझमें बसता विश्व सर्व ।
भूला तू सबको जीवन देना सदैव । और लगा संहारमें ॥ ८४ ॥
प्रसन्न हो त्वरित देवराय । समेट ले अपना महाकाय ।
उद्धार कर मेरा भय-मय । मृत्यु वशासे ॥ ८५ ॥
करता हूं पुनः पुनः ऐसा विनय । हुआ है इतना भय-ग्रस्त हृदय ।
विश्व रूप देख कर खाया भय । मैने जनार्दन ॥ ८६ ॥
३६९ विश्व-रूप-दर्शनयोग
(47)

हुवा अमरावति पर आक्रमण । किया है मैने अकेलेने निवारण ।
ऐसा मैं महाकालको भी कठिन । डरानेमें ॥ ८७ ॥
किंतु हे यह प्रसंग दुर्धर । मृत्युको भी तूने निगलकर ।
भर लिया है मेरा भी जो कौर । विश्व सह सकल ॥ ८८ ॥
ऐसा नहीं था अब प्रलय काल । बनकर आया है तू महाकाल ।
बेचारा बना त्रिभुवन सकल । अल्पायुषी आज ॥ ८९ ॥
विधि-विधान है यह विपरीत । उठा हुवा बिघ्न करनेमें शांत ।
मह-विघ्न उठ आया अकल्पित । विश्व-प्रलयका ॥ ३९० ॥
बात नहीं यह काल्पनिक । खेलकर तू अनंत-मुख ।
सैन्यका कौर लेता है देख । चहूं ओरसे तू ॥ ९१ ॥
अमी च त्वां धृतराष्ट्रस्य पुत्राः
सर्वे सहैवावनिपालसंघैः ।
भीष्मो द्रोणः सूतपुत्रस्तथासौ
सहास्मदीयैरपि योधमुख्यैः ॥ २६ ॥
ये सब कुरु-कुलके वीर । अंध धृतराष्ट्रके कुमार ।
गये रे गये स-परिवार । तेरे कराल मुखमें ॥ ९२ ॥
तथा आये हैं यहां जो देश देशके । इनके सहायक हो दौड़ दौड़के ।
न रहेंगे ये तेरे कौर बनके । नाम कहनेको भी ॥ ९३ ॥
मद-मस्त हाथियोंके जो झुंड । निगलता तू पकड पकड़ ।
तथा योद्धाओंको भी धड़ाधड । निगलता जाता ॥ ९४ ॥
शातघ्निके संहारक । पदचारी जो कटक ।
भरता है तेरा मुख । पता न चलता ॥ ९५ ॥
अहा ! सभी ये धृतराष्ट्र पुत्र
लेके सभी राज समूह साथ ।
ये भीष्म ये द्रोण ये सूत पुत्र
औ' वीर सारे अपने अनेक ॥ २६ ॥
ज्ञानेश्वरी ३७०