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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

दृष्टि रहती अंतरमें । पैर रखे तो बाहरमें ।
बैठती है नासिकाग्रमें । स्थिर होके ॥ ४ ॥
दृष्टि रहती अंदर ही अंदर । आती नहीं वह हठसे बाहर ।
होती तभी अर्ध दृष्टि है स्थिर । नासिकाग्रमें ॥ ५ ॥
दिशाओंका दर्शन करना । रूप राशीकी राह देखना ।
मिटे दृष्टिकी लत संपूर्ण । अपने आपमें ॥ ६ ॥
होगा फिर कंठनाल संकुचित । चिबुक छूता कंठ अरिक्तकागर्त ।
स्थिर होके फिर दबाती सतत । वक्ष स्थलमें ॥ ७ ॥
होता फिर कंठमणि लोप । उसपे हो बंधका आरोप ।
कहलाता जालंदर आप । पांडुकुमार ॥ ८ ॥
होता है जो नाभी पर पृष्ठ । उदर हो अंदर आकृष्ट ।
अंतरंगमें खिलता कोष्ठ । हृदय-कोषका ॥ ९ ॥
स्वाधिष्ठानके उत्तरानसे । नाभिस्थानके अधोभागसे ।
बढ़ता बंध जिस नामसे । वह उड्डियान ॥ २१० ॥
प्रशान्तात्मा विगतभीर्ब्रह्मचारिव्रते स्थितः ।
मनः संयम्य मच्चित्तो युक्त आसीत मत्परः ॥ १४ ॥
इस योग-साधनका, विस्तार, परिणाम, अनुभव,—
ऐसे शरीरके बाहर । पड़ा अभ्यासका पाखर ।
मनका चांचल्य भीतर । धीमा पडता ॥ ११ ॥
कल्पना है मिटती । प्रवृत्ति भी घटती ।
तन-मनको शांति । मिलती आप ॥ १२ ॥
क्षुधा गयी है कहां । निद्रा रहती कहां ।
न है स्मरण यहां । मनमें भी ॥ १३ ॥
शांत निर्भय मच्चित्त व्रतस्थ ब्रह्मचर्यमें ।
साधके मनको नित्य मुझमें ही लगा रहे ॥ १४ ॥
१७१ आत्म-संयमयोग

मूलबंधमें रहा हुआ अपान । ऊर्ध्व आया पाकरके आकुंचन ।
पा करके अध ऊर्ध्व आकुंचन । फूल उठता वह ॥ १४ ॥
क्षुभित हो खौलके उन्मत्त । घेरेमें गरजता सतत ।
मणिपूरकको करे आघात । रह रह कर ॥ १५ ॥
फिर वह अपानका बवंडर । शोधन करता संपूर्ण शरीर ।
बालपनका सडा गला जहर । बाहर करता ॥ १६ ॥
अंदर कहीं नहीं मुड सकता । फिर उदरमें संचार करता ।
वहां वह नाम भी नहीं रखता । कफ पित्तका ॥ १७ ॥
धातुके सागर उलटता । मेदके पर्वतोंको तोडता ।
अंदरकी मज्जा निचोडता । अस्थिगत भी ॥ १८ ॥
नसोंको खुल करता । गात्रोंको ढील करता ।
साधकको भी डराता । डरना नहीं ॥ १९ ॥
रोगोंको उठाकर दिखाता । किंतु उनको मिटा भी देता ।
आप औ' पृथ्वीको सान देता । एक जीव-सा ॥ २२० ॥
एक ओर जब यह होता । वहां जो आसनकी उष्णता ।
करती है शक्तिको जागृत । कुंडलिनीकी ॥ २१ ॥
नागका पिल्ला हो जैसे । स्नान कर कुंकुमसे ।
मुडकर आया जैसे । सेज पर ॥ २२ ॥
ऐसी वह कुंडलिनी । साडेतीन घुमावनी ।
अधोमुख सर्पिनी । सोती रहती जो ॥ २३ ॥
जागृत कुंडलिनी शक्तिका कार्य विवेचन--
कडी जैसी वह विद्युल्लताकी । तह जैसी अग्निकी ज्वालाओंकी ।
सांखलसी चमकीली स्वर्णकी । रहती है पार्थ ॥ २४ ॥
सुव्यवस्थित जो सिकुडी हुई । संकुचित स्थानमें सोई हुई ।
वज्रासनके चिमटेमें फंसी हुई । होती है सावध ॥ २५ ॥
गिरा वहां मानो नक्षत्र टूटकर । या आया स्थानच्युत हो स्वयं भास्कर ।
अथवा तेज बीजमें फूटा अंकुर । प्रकाश रूप ॥ २६ ॥
ज्ञानेश्वरी १०२

अपनें कुंडल खोलकर । लीलसे ही अंग मोडकर ।
कुंडलिनी नाभिकंद पर । टूट पडती ॥ २७ ॥
बहुत दिनकी रहती भूखी । छेडनेसे होती है अति तीखी ।
आवेशसे होकर ऊर्ध्वमुखी । उठती है जो ॥ २८ ॥
वहां हृदय-कोशके निम्न । भागमें रहता जो पवन ।
उसे पकडकर अर्जुन । निगलती वह ॥ २९ ॥
अर्जुन ! मुखकी ज्वालाओंसे । निगलती ऊपर नीचेसे ।
मांस खंड संपूर्ण-रूपसे । शरीरके ॥ २३० ॥
जो जो स्थान हैं समांस । वहांका भरती ग्रास ।
लेती है दो चार ग्रास । हृदयका भी ॥ ३१ ॥
करती फिर तलुओंका शोधन । तथा ऊर्ध्व खंडका भी है भेदन ।
चाटती अंगका प्रत्येक स्थान । वह धनंजय ॥ ३२ ॥
न छोडे अपना आश्रय । नामका भी रक्त संचय ।
रखे शुद्ध चर्मवलय । अस्थिपंजरपे ॥ ३३ ॥
अस्थि-नलियोंको सोखती । शिराओंको भी चूस लेती ।
बाह्य वृद्धिको जलादेती । रोमकूपके ॥ ३४ ॥
सप्त-धातुके जो सागर । प्यारसे घोंट भर कर ।
रखती सब ,सुखाकर । ग्रीष्म कालसा ॥ ३५ ॥
नासापुटिका जों श्वास । जाता अंगुल द्वादश ।
बीचमें धर अशेष । खींचती भीतर ॥ ३६ ॥
अधो-भागसे होता तब आकुंचित । ऊर्ध्व-भागसे होता खींचाव सतत ।
उस भेंटमें केवल चक्रके दांत । रहते बचकर ॥ ३७ ॥
ऐसे होता इन दोनोंका मिलन । किंतु मध्य कुंडलिनी क्षोभ पूर्ण ।
पूछती है उनसे "तुम हो कौन ? । चलो यहां से" ॥ ३८ ॥
पार्थिव धातु वह अशेष । निगलती वह रख शेष ।
आपको भी वैसे ही अशेष । पी जाती है ॥ ३९ ॥
दोनों भूतोंको निगल कर । देती है जो तृप्तिकी डकार !
तब वह संतुष्ट होकर । रहती सुषुम्नाके पास ॥ २४० ॥
१७३ आत्म-संयमयो

तब वह तृप्तिके तोषसे । गरल उगलती मुखसे ।
उस गरलके अमृतसे । जीता प्राण ॥ ४१ ॥
उस अग्निसे निकलता अमृत । करता वह अंतर बाह्य शांत ।
खिलते तब सब गात्र गलित । अर्जुन उसके ॥ ४२ ॥
रुकते हैं नाड़िके स्रोत । नव`विध वायुका द्वैत ।
मिटता और होता मुक्त । शरीर-धर्मसे ॥ ४३ ॥

  • इडा पिंगला एक होती । तीनो गांठे जो छूट जाती ।
    छह्री झल्लियां टूट जाती । षट्चक्रोंकी ॥ ४४ ॥
    अजी ! फिर शशि और भानु । ऐसी कल्पनाका अनुमान ।
    कपास रखके भी पवन । दीखता नहीं ॥ ४५ ॥
    बुद्धिका आकार तब गलता । परिमल जो घ्राणमें रहता ।
    शक्ति संह वह है संचरता । मध्यमामें ॥ ४६ ॥
    ढलता उपरकी ओर । चंद्रामृतका सरोवर।
    जाता जो बहकर फिर । शक्ति मुखमें ॥ ४७ ॥
    उस शक्तिसे रस भरता । सर्वांगमें वह संचरता ।
    जहांका वहां सगबगाता । प्राण पवन ॥ ४८ ॥
    तपे हुए ढांचेमेंसे । मूम निकलता जैसे ।
    भरती रससे वैसे । ढले हुए ॥ ४९ ॥
    तब शरीरके आकारसे । विद्युल्लता उतरी है जैसे ।
    ऊपर त्वचा आच्छादनसे । ढकी है जो ॥ २५० ॥
    रविपर पड़ता मेघावरण । छिपते हैं तब प्रकाश किरण ।
    फटता है फिर वह आवरण । न रुकता प्रकाश ॥ ५१ ॥
    वैसा ही शुष्क है ऊपर । त्वचावरण तन पर ।
    झडे जैसा वह चोकर । तन परसे ॥ ५२ ॥
    चमकता वह फिर जैसे बिल्लोर । या रत्न बीजमें उग आया अंकुर
    वैसे अवयव कांति शोभा अपार । होती प्रस्फुटित ॥ ५३ ॥
    अथवा संध्या-रागके रंग । लेकरके बनाया है अंग ।
    अथवा स्वयंभू ज्योतिर्लिंग । आत्माका जो ॥ ५४ ॥
    ज्ञानेश्वरी १७४

या केशरसे भरा हुआ । सिद्ध रससे ढला हुआ ।
मूर्ति रूप उतरा हुआ । 'शांत-ब्रह्म ॥ ५५ ॥
अथवा आनंद त्रयका लेप । या महा सुखका प्रत्यक्ष रूप ।
या मानो संतोष-तरुका रोप । अति कोमल ॥ ५६ ॥
माना कनक-चंपककी कली । या अमृतसे ढली है पुतली ।
या वह कोमलता ही है खिली । अति कोमल हो ॥ ५७ ॥
ओससे शरद्ऋतुकी । प्रफुल्लता चंद्र-बिंबकी ।
या मूर्ति बैठी तेजकी । आसन पर ॥ ५८ ॥
योगीकी काया तब ऐसी बनती । कुंडलिनी जब चंद्रामृत पीती ।
देख डरता छूने वह देहाकृति । कृतांत भी तब ॥ ५९ ॥
बुढापा तब पीछे हठता । तारुण्यका भी वियोग होता ।
बीता हुआ बालपन आता । योगीका पार्थ ॥ २६० ॥
वयमें देखे तो वह इतनासा । कार्य उसका ब्रह्म पुरुषका-सा ।
धैर्यमें मानो मेरु पर्वत जैसा । होता निरुपम ॥ ६१ ॥
अंकुर ही है कनकद्रुमका । नित्य नूतन रत्नकी कलिका ।
वैसी ही उसकी नखाकृतिका । होता नवदर्शन ॥ ६२ ॥
उसके दांत भी नये उगते । किंतु वे अतिशय नन्हे होते ।
हीरेके कणसे वे चमकते । दुपंक्तियोंमें ॥ ६३ ॥
जैसे माणिकके कण । वे भी हो अणुसमान ।
आते हैं सर्वांगपूर्ण । रोमाग्र जो ॥ ६४ ॥
कर चरण तल । मानो हैं रातोत्पल ।
नयन जो निर्मल । कहूं कैसे ॥ ६५ ॥
मुक्ताके संपूर्ण खिल जानेसे । समेट न सकती शुक्त उसे ।
खुल जाता है फिर बंध जैसे । शुक्ति पल्लवोंका ॥ ६६ ॥
वैसे पलक पल्लवमें न समानेसे । दृष्टिके सर्वव्याप्त हो निकलनेसे ।
लिपट जाती है फिर गगनसे । जो पहले थी ॥ ६७ ॥
तन होता तब कंचनका । हलकापन आता वायुका ।
न होता अंश आप-पृथ्विका । अर्जुन वहां ॥ ६८ ॥
१७५ आत्म-संयमयोग

यहाँ दिए गए पृष्ठ का सटीक देवनागरी पाठ प्रस्तुत है:

वह फिर सागर पारका देखता । स्वर्ग लोकका भी विचार सुनता ।
चींटीका मनोगत भी है जान लेता । सहज भावसे ॥ ६९ ॥
पवनाश्वपर भी चढता । उदक पर वह चलता ।
ऐसी सिध्दियां प्राप्त करता । प्रसंग रूप ॥ २७० ॥
जो प्राणका हाथ पकडकर । गगनकी सीढियां बनाकर ।
सुषुम्नाका जीना चढकर । आयी हृदयमें ॥ ७१ ॥
वह कुंडलिनी जगदंबा । चैतन्य चक्रवर्तीकी शोभा ।
उसने विश्व बीजका कोंब । छायामें लिया ॥ ७२ ॥
आकार वह शून्य लिंगका । आवरण है परमात्माका ।
आसरा है जो खुला प्राणका । जन्मभूमिस ॥ ७३ ॥
ऐसी जो वह कुंडलिनी । हुई है हृदय-वासिनी ।
तब अनाहतकी ध्वनी । करती है ॥ ७४ ॥
शक्तिके तनमें चिपकनेसे । बुध्दिमें चैतन्य आया है जैसे ।
उसने ध्वनी सुनी है हौलेसे । अनाहतकी ॥ ७५ ॥
पोखरमें उस नादके । रुप दीखे नाद चित्रके ।
प्रणव रूप आकारके । रेखा लेखन ॥ ७६ ॥
करनेसे इसकी कल्पना । कल्पनासे इसको जानना ।
किंतु कल्पनाका मन लाना । कहांसे अब ॥ ७७ ॥
भूल गया मैं अर्जुन । नाश न होता पवन ।
जिससे है “ख” गगन । गूंजाता वह ॥ ७८ ॥
अनाहतकी उस घन गर्जनासे । गूंज उठता है हृदयाकाश जैसे ।
ब्रह्म-स्थानके महाद्वार हैं उससे । खुलते हैं सहज ॥ ७९ ॥
वहां कमल गर्भाकार अर्जुन । महदाकाश रहता अन्य जान ।
वहां रहता कर अर्ध भोजन । अतृप्त चैतन्य ॥ १८० ॥
सदनमें उस हृदयाकाशके । वास कुंडलिनी-परमेश्वरीके ।
अर्पण करती अपने तेजके । कौर चैतन्यको ॥ ८१ ॥
शाक सह वह बुध्दिके । देकर कौर हाथके ।
द्वैतको न देख सके । ऐसा करती ॥ ८२ ॥
ज्ञानेश्वरी : १७६

ऐसी निज-कांतिको खोकर । केवळ प्राण-रूप होकर ।
ऐसी देखती है धनुर्धर । कहूंगा अब ॥ ८३ ॥
कोई पुतली ही हो पवनकी । अपनी ओढेनी स्वर्णांबरकी ।
उतार कर रखी हो निजकी । अलग करके ॥ ८४ ॥
अथवा लहरसे वायुकी । मिटी हो अभी ज्योत दीपकी ।
चमक लहर बिजलीकी । अस्त हुई गगनमें ॥ ८५ ॥
अथवा हृदय-कमल पर्यंत । गया मानो प्रकाश-जलका झोत ।
अथवा स्वर्णधार आदिसे अंत । बहती हुई ॥ ८६ ॥
फिर वह हृदयाकाशमें । समायी हो एक रूपमे ।
जैसे शक्ति शक्तिके रूपमें । समायी जाती ॥ ८७ ॥
तभी वह शक्ति ही कहलाता । केवळ प्राण वायु जो रहता ।
नाद बिंदु अब नहीं जानता । कला औ" ज्योति ॥ ८८ ॥
करना मनका निरोध । तथा प्राणका अवरोध ।
ध्यानकी न रहती साध । तब अर्जुन ॥ ८९ ॥
कल्पनाका त्याग-भोग । न रहता अनुराग ।
महा-भूतोंका सुराग । रहता नहीं ॥ २९० ॥
पिंडसे करना पिंडका ग्रास । यह है नाथ-संकेत सारांश ।
कह गया यह महोपदेश । महाविष्णु ॥ ९१ ॥
रहस्यका बांध ढा कर । यथार्थका तह खोलकर ।
रखी सन्मुख मैंने सादर । ग्राहक श्रोतोंके ॥ ९२ ॥
युञ्जन्नेवं सदाऽऽत्मानं योगी नियत मानसः ।
शांतिं निर्वाणपरमां मत्संस्थामधिगच्छति ॥ १५ ॥
शक्तिका जब तेज लोपता । देहका तब रूप मिटता ।
फिर आंखोंमें ही छिप जाता । विश्वकी वह ॥ ९३ ॥
ऐसे मगन आत्मामें होता योगी मनो-जयी ।
मोक्षसे जो भिडी शांति पाता हो मुझमें रत ॥ १५ ॥
१७७ आत्म-संयमयोग
(23)

वह पहिले जैसे रहता । अवयवोंसे भी पूर्ण होता ।
किंतु ऐसा हलका रहता । हवासे बना हो ॥ ९४ ॥
अथवा कर्दलीका है सार । खड़ा आप छाल खोलकर ।
या आकाश ही स-शरीर । खड़ा रहा हो ॥ ९५ ॥
ऐसा होता जब शरीर । कहलाता वह खेचर ।
पद मिलता चमत्कार । स-शरीर यह ॥ ९६ ॥
साधक करता जब यह स्थिति पार । तब होते जो उसके पदके आकार ।
उस पर सिद्धियां रमती हैं आकर । अणिमादिक ॥ ९७ ॥
किंतु क्या क्या करती हैं सिद्धियां । सुन तू यह बात धनंजय ।
लोप हो जाते भूत-चतुष्टय । देहके देहमें ॥ ९८ ॥
पृथ्विको आप गलाता । आपको तेज सुखाता ।
तेजको वायु सोखता । हृदयाकाशमें ॥ ९९ ॥
फिर आकाश अकेला रहता । किंतु शरीरका आकार लेता ।
वह भी अंतमें लय होता । मूर्ध्याकाशमें ॥ ३०० ॥
तब कुंडलिनी नाम मिटता । मारुता ऐसा नाम है मिलता ।
किंतु शक्तित्व बना ही रहता । शिवमें मिलने तक ॥ १ ॥
जालंधरको लांघकर । काकी मुखको तोड़कर ।
मूर्धन्यके पर्वतपर । चढ़ जाती है ॥ २ ॥
ॐकारकी पीठपर फिर । पद रख वह उठ कर ।
पश्यंति गिरा पीछे छोडकर । बढ जाती है ॥ ३ ॥
अर्ध तन्मात्रा फिर वेगमें । मूर्धन्याकाशके अंतरंगमें ।
मानो सरिता है सागरमें । मिल जाती है ॥ ४ ॥
ब्रह्मरंध्रमें फिर स्थिर होकर । सोऽहं भावके बाहें पसारकर ।
परमात्म-लिंगालिंगनमें सत्वर । दौड़ जाती है ॥ ५ ॥
पंच-महाभूतका परदा उठता । शिव-शक्तिका तब अद्वैत घडता ।
गगन सह सबका लय हो जाता । उस समरसैक्यमें ॥ ६ ॥
मेघ रूपसे हुआ जो द्वैत । धारा रूपसे आ मिला नित ।
जैसे आप ही मिलता नित । अपनेसे ही ॥ ७ ॥
ज्ञानेश्वरी १७८

वैसे तन रूपसे रहा द्वैत । त्यज शक्ति-शिव शिवमें रत ।
वह एकत्व अपनेमें नित । आप ही आप ॥ ८ ॥
रहा था क्या कभी द्वैत । या स्वयंसिद्ध अद्वैत ।
विचारमें भी यह बात । आती ही नहीं ॥ ९ ॥
लय हुआ गगनमें गगन । अनुभव करता है चिंतन ।
प्रत्यय जिसका उसे महान । बोध है यह ॥ ३१० ॥
इससे उस स्थितिका वर्णन । शब्दसे न हो सकता कथन ।
जब शब्दमें उलझता मन । होता है संवाद ॥ ११ ॥
करनेसे है सहज विचार । कथनका कहती अधिकार ।
रही भाषा वैखरी अति दूर । इस स्थितिसे ॥ १२ ॥
भ्रू-लताकी पिछली ओर । न धरता रूप मकार ।
प्रवेशमें कष्ट होते घोर । प्राणको भी ॥ १३ ॥
गगनमें होता प्राण प्रवेश । न रहता शब्दका अवशेष ।
उसमें भी लय होता आकाश । महाशून्यमें ॥ १४ ॥
कहां महासागर महाशून्यका । उसमें न लगे ठाव आकाशका ।
वहां कैसे शब्द-नांवके डांडका । लगे सुराग ॥ १५ ॥
तब यह कहना शब्दसे । तथा सुनना भी जो कानसे ।
असंभव है जान. तू इसे । पांडुकुमार ॥ १६ ॥
जब कभी दैवयोगसे । सानुभव पाना है इसे ।
आपमें समरसैक्यसे । आप हो रहना ॥ १७ ॥
हुआ है जो उसमें ही एक । कहना क्या उसका अधिक ।
कहना वही एक ही एक । व्यर्थका ही ॥ १८ ॥
शब्दमात्र है पीछे हठता । संकल्पका नाम न रहता ।
वायु भी नहीं भी तर आता । विचारका वहां ॥ १९ ॥
वह है उन्मनीका लावण्य । तथा है तुर्याका सु-तारुण्य ।
अनादि और जो है अगण्य । परम-तत्व ॥ ३२० ॥
आकारका जो प्रांत । मोक्षका जो एकांत ।
जहां आदि औ' अंत । हुए विलीन ॥ २१ ॥
१७९ आत्म-संयमयोग

विश्वका है जो मूल । योगद्रुमका फल ।
आनंदका केवल । चैतन्य ही है ॥ २२ ॥
महाभूतका जो बीज । महातेजका जो तेज ।
एवं अर्जुन है निज- । रूप मेरा ॥ २३ ॥
यह है जो चतुर्भुज साकार । लिया उसकी शोभाने आकार ।
नास्तिकोंसे परास्त देखकर । भक्तवृंद ॥ २४ ॥
वह अनिर्वचनीय महासुख । बनते हैं वे स्वयं महापुरुष ।
टिके रहते हैं जिनके निष्कर्ष । अंतिम - सिद्धि तक ॥ २५ ॥
हमने कहा जो अब साधन । जिसने किया तन मूर्तिमान ।
हुआ है वह हमारे समान । निश्चित रूपसे ॥ २६ ॥
अर्जुनका संदेह—
पर-ब्रह्मके रससे । ढला शरीर सांचेसे ।
दीखते हैं सारे ऐसे । अंगांग ॥ २७ ॥
अंतरंगमें अनुभावका प्रकाश । जिससे लुप्त होता है जगदाभास ।
अर्जुन कहता सच है यह भाष । तब श्रीकृष्णसे ॥ २८ ॥
आपने कहा जो साधन । ब्रह्म प्राप्तिका वह स्थान ।
इससे होगा समाधान । निश्चय ही ॥ २९ ॥
होते जो अभ्यासमें दृढ-चित्त । वही पाते हैं ब्रह्मत्व निश्चित ।
कथनका है यह मतितार्थ । जाना आपका ॥ ३० ॥
सुनकर है यह बात । बोध लेता है यह चित्त ।
अनुभूतिसे अनुरक्त । कैसे न होगा ॥ ३१ ॥
इसीलिये यहां कहीं । अन्यथा कुछ भी नहीं ।
थोडासा चित दे यही । मेरी बातमें ॥ ३२ ॥
अब जो योग कहा तुमने । स्वीकार किया मेरे मनने ।
योग्यता हीनत्वसे अपने । आचरण नहीं होता ॥ ३३ ॥
योग्यता है जो मेरी सहज । उससे सिद्ध हो योगी राज ।
तब मैं सुखसे करूँ आज । अभ्यास इसका ॥ ३४ ॥
ज्ञानेश्वरी १८०

अध्याय ५: संन्यासयोग

नही तो प्रभुने कहा जैसे । अपनेसे नही होता वैसे ।
बनता जो निज योग्यतासे । पूछते वही हम ॥ ३५ ॥
अंतरंगका यह धारणा । पूछनेका यही कारण ।
देना प्रभु इस पर ध्यान । स्वस्थ चित्तसे ॥ ३६ ॥
अजी तुमने यह सुना ? । तुमने जो कही साधना ।
चाहे जिसने अनुष्ठान । किया तो चलेगा क्या ? ॥ ३७ ॥
या योग्यता बिना नहीं । ऐसा भी कछु है कहीं ।
ऐसा कभी हुआ कहीं । पूछता हूं कृष्ण ॥ ३८ ॥
श्रेष्ठ काज यह महा-निर्वाण । इसे छोड़ जो होते साधारण ।
वह भी होते योग्यता कारण । जगतमें सिद्ध ॥ ३९ ॥
योग्यता जो कहलाती । प्रकृतिके आधीन होती ।
योग्य हो कर की जाती । फलती प्रारंभमें ॥ ३४० ॥
वैसी है जो योग्यता । न मिले हाठमें तथा ।
योग्योंकी खान सर्वथा । होती नहीं ॥ ४१ ॥
किंतु होता जो अल्पसा विरक्त । तथा देह-धर्ममें जो संयत ।
ऐसा साधक है जो व्यवस्थित । अधिकारी है ॥ ४२ ॥
श्रीकृष्ण द्वारा इंद्रिय निग्रहका निरूपण-
इस युक्तिसे योग्यता । पायेगा तू सुन पार्थ ।
ऐसी जो असुविधता । दूर की उसकी ॥ ४३ ॥
फिर कहे वह पार्थ । है यह ऐसी व्यवस्था ।
अनियतको सर्वथा । योग्यता नहीं ॥ ४४ ॥
नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नतः ।
न चाति स्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन ॥ १६ ॥
न योग अधिक खाके तथा भोजन छोडके ।
वैसे ही अति निद्रासे या मात्र जगते हुये ॥ १६ ॥
१८१ आत्म-संयमयोग

युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु ।
युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा ॥ १७ ॥
रसनेन्द्रियका जो अंकित होता । निद्राको जो अपने प्राण बेचता ।
योगमें वह नहीं है कहलाता । अधिकारी कभी ॥ ४५ ॥
या आग्रह वश होकर । भूख-प्यासको रोककर ।
या आहारको तोड़कर । करता दमन ॥ ४६ ॥
तथा निद्रासे विमुख होकर । दुराग्रहसे उन्मत्त होकर ।
शरीरका अधिकार खोकर । योग हो कैसे ॥ ४७ ॥
विषय सेवनकी तीव्र आस । विरोधका यह भाव है खास ।
तथा पूर्ण विरोध स आबेश । यह भी न करना ॥ ४८ ॥
अन्नका सेवन करना । हित मित युक्त ही खाना ।
क्रियाचरण करना । नियमित ॥ ४९ ॥
संयत वचन बोलना । नियमित डग भरना ।
निद्राका सन्मान करना । यथोचित ॥ ५० ॥
करना है यदि जागरण । उसका भी होना परिमाण ।
जिससे हो धातु नियमन । अनायास ॥ ५१ ॥
देना ऐसे युक्तियुक्त । इंद्रियोंको जो वांछित ।
रहता इससे चित्त । सदा संतुष्ट ॥ ५२ ॥
यदा विनियतं चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते ।
निःस्पृहःसर्वकामेभ्यो युक्त इत्युच्यते तदा ॥ १८ ॥
खाना औ' जगना सोना फिरना अन्य कार्य भी ।
इसे जो करता योग्य योग है दुःख नाशक ॥ १७ ॥
आत्मामें लीन होता है पूर्ण संयत चित्त जो ।
होती है वासना शांत योगी तोयुक्त जान तू ॥ १८ ॥
ज्ञानेश्वरी १८२

बाहर जब युक्ति सधती । अंतरमें सुख-वृद्धि होती ।
ऐसी योग-सिद्धि बढ़ती । अनायास ॥ ५३ ॥
जैसा भाग्यका उदय होता । उद्यमका निमित्त मिलता ।
ऐश्वर्य सर्वस्व घर आता । अपने आप ॥ ५४ ॥
युक्तियुक्त सदा लिलासे । अभ्यासकी चालढालसे ।
खिलता है आत्म-सिद्धिसे । उसका अनुभव ॥ ५५ ॥
रहता है जो युक्तियुक्त । होता है सदा भाग्यवंत ।
जिससे होता अलंकृत । मुक्त भावसे ॥ ५६ ॥
यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता ।
योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मनः ॥ १९ ॥
होता जहां युक्ति-योगका मिलन । वहां है प्रयागका संगमस्थान ।
क्षेत्र संन्यास लेकरके मन । बसता है यहां ॥ ५७ ॥
उसको योग-युक्त करना । प्रसंगसे यह भी जानना ।
दीप-ज्योतिकी यह तुलना । निर्वात-स्थलकी ॥ ५८ ॥
इस अभ्याससे मन निश्चल बनता है—
अब तेरा मन जान कर । कहते हम पांडुकुमार ।
सुन तू वह चित्त देकर । बात जो भली ॥ ५९ ॥
जब तू उसे पाना चाहता । किंतु अभ्यासमें दक्ष न होता ।
तब कठिनाईसे क्यों डरता । इसकी भला ॥ ३६० ॥
अर्जुन यहां कष्ट नहीं जान । करता यह ग्रह यदि मन ।
हौवा बनाती इंद्रियां दुर्जन । व्यर्थ ही इसका ॥ ६१ ॥
आयूको जो स्थिर करती । जीवनको भी लौटा लाती ।
उसे नहीं क्या शत्रु मानती । रसनेंद्रिय ॥ ६२ ॥
निर्वात स्थलमें जैसे जलता दीप निश्चल ।
आत्मान्वेषक योगीके चित्तकी उपमा कही ॥ १९ ॥
१८४ आत्म-संयमयोग

ऐसा जो कुछ भी है हितका । रहा है इंद्रियोंके दुखका ।
ऐसे नहीं योगके सरीखा । सरल कछु ॥ ६३ ॥
यत्रोपरमते चित्तं निरुद्धं योगसेवया ।
यत्र चैवाऽऽत्मनात्मानं पश्यन्नात्मनि तुष्यति ॥ २० ॥
सुखमात्यन्तिकं यत्तद्बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम् ।
वेत्ति यत्र न चैवायं स्थितश्चलति तत्त्वतः ॥ २१ ॥
तभी आसनकी दृढ़तासे । कहा सभी अभ्यास तुझसे ।
हुआ तो हो निरोध इससे । इंद्रियोंका ॥ ६४ ॥
अन्यथा जब इस योगसे । इंद्रियोंका निग्रह होनेसे ।
निकलता चित्त अपनेसे । मिलन हेतु ॥ ६५ ॥
जब वह विषयोंसे निवृत्त होता । अपनेमें अपनेको ही है देखता ।
पहचान करके तब है कहता । सोऽहम् ब्रह्म ॥ ६६ ॥
इसी पहचानमें । सुखके साम्राज्यमें ।
चित्त समरसमें । विलीन होता ॥ ६७ ॥
इससे भिन्न कुछ भी नहीं । इसे इंद्रियां जानती नहीं ।
वह अपनेमें आप वही । बन जाता मन ॥ ६८ ॥
यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः ।
यस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते ॥ २२ ॥
अवरुद्ध चित्तका है संचार मिटता सब ।
आत्मासे मिलके आत्मा तोषता निजमें स्वयं ॥ २० ॥
भोगके इंद्रियातीत बुद्धि-गम्य महा-सुख ।
डिगे नहीं जहां जाके तत्वज्ञ लेश-मात्र भी ॥ २१ ॥
न माने अन्य जो लाभ श्रेष्ठ है इस लाभसे ।
दुःखके भारसे भारी न कांपे रहके वहां ॥ २२ ॥
ज्ञानेश्वरी १८४

इस निश्चलताके सम्मुख दुःख नहीं रहता --
फिर मेरुसे भी बहुत । यातनाके बडे पर्वत ।
पडनेपर भी चित्त । टूटता नहीं ॥ ६९ ॥
या शस्त्रसे तोड़ा तन । अग्निमें जला बदन ।
चित्त है सुखमें लीन । अविचल ॥ ३७० ॥
अपनेमें होकर रत । भूल जाता देहको चित्त ।
सुखरूप होके सतत । रहता अपनेमें ॥ ७१ ॥
तं विद्याद् दुःखसंयोगवियोगं योगसंज्ञितम् ।
स निश्चयेन योक्तव्यो योगोऽनिर्विण्णचेतसा ॥ २३ ॥
उस सुखमें होकर लीन । भूलता विषय-सुख मन ।
संसार सुखमें अनुदिन । उलझाया जो ॥ ७२ ॥
वह है योगिका सौभाग्य । स्वसंतोषका है साम्राज्य ।
ज्ञान भानका है उद्देश्य । पांडुकुमार ॥ ७३ ॥
योगाभ्याससे वह सतत । देखना पडता मूर्तिमंत ।
देखनेसे बनता स्वगत । एकरूप ॥ ७४ ॥
संकल्प प्रभवान्कामांस्त्यक्त्वा सर्वानशेषतः ।
मनसैवेन्द्रियग्रामं विनियम्य समन्ततः ॥ २४ ॥
जो वास्तविक हितका है वह इंद्रियोंको दुःखदायक लगता है—
किंतु यह योग अर्जुन । एक ढंगसे आसान ।
संकल्पको दिखाता महान । पुत्रशोक ॥ ७५ ॥
उसको कहते योग दुःखका जो वियोग है ।
दृढ निश्चयसे पाना वह योग उमंगसे ॥ २३ ॥
संकल्पजन्य जो काम तजके पूर्ण रूपसे ।
मनसे ही इंद्रियोंको विषयोंसे निकालना ॥ २४ ॥
१८५
(24) आत्म-संयमयोग

सुनकर हुवा वासनाका अंत । इंद्रियोंको देख नियममें स्थित ।
शोक विव्हल होकर होगा मृत । अपने आप ॥ ७६ ॥
यदि वैराग्यने यह किया । संकल्पका झमेला ही गया ।
धृति घरमें बुद्धि निर्भय । रहेगी सुखसे ॥ ७७ ॥
शनैः शनैरुपरमेद्बुद्ध्या धृतिगृहीतया ।
आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किंचिदपि चिन्तयेत् ॥२५॥
यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरं ।
ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत् ॥ २६ ॥
जब हो धृति-धीका बसति स्थान । अनुभव पथसे चलके मन ।
कर लेता अपना प्रतिष्ठापन । आत्म-भुवनमें ॥ ७८ ॥
होती है इस भांति । आत्म-तत्वकी प्राप्ति ।
यह भी असाध्य होती । सुनो अन्य मार्ग ॥ ७९ ॥
करेगा जो एक नियम निश्चित । उसकी सीमामें ही रहो सतत ।
तन मनसे उसकी आज्ञा रत । रहना निष्ठासे ॥ ३८० ॥
इससे हुआ यदि स्थिर-चित्त । माना सहज हुआ कार्य कृतार्थ ।
नहीं तो छोड़ देना चित्तको मुक्त । अपने मार्गसे ॥ ८१ ॥
फिर चित्त जहां जावेगा । वहांसे नियम्य लायेगा ।
इससे स्थैर्यका बनेगा । अभ्यास उसको ॥ ८२ ॥
प्रशांत मनसं ह्येनं योगिनं सुखमुत्तमम् ।
उपैति शान्तरजसं ब्रह्मभूतमकल्मषम् ॥ २७ ॥
होना शनै शनै शांत बुद्धिसे धैर्य-पूर्वक ।
आत्माको मनमें रोप न करें अन्य चिंतन ॥ २५ ॥
फूटे जहां जहांसे तो मन चंचल अस्थिर ।
वहांसे धरके लाना आत्मामें करना स्थिर ॥ २६ ॥
प्रशांत मन निष्पाप ब्रह्म-रूप बना हुवा ।
विकार शांत योगी जो पाता है सुख उत्तम ॥ २७ ॥
ज्ञानेश्वरी १८६

फिर कुछ कालान्तरसे । उस स्थैर्यके कारणसे ।
पास आयेगा सहजसे । आत्म-स्वरूपके ॥ ८३ ॥
उसे देख मन होता तद्रूप । फिर डूबेगा अद्वैतमें द्वैत ।
होगा ऐक्य तेजसे प्रकाशित । त्रिभुवन सारा ॥ ८४ ॥
दीखते जो गगनमें भिन्न । होते वे भेद जब बिलीन ।
तब भरा रहता गगन । त्रिलोकमें जैसा ॥ ८५ ॥
जिसका जब ऐसा लय होता । तब मात्र चैतन्य ही रहता ।
ऐसी सुलभतासे प्राप्त होता । महासुख ॥ ८६ ॥
युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी विगतकल्मषः ।
सुखेन ब्रह्मसंस्पर्शमत्यन्तं सुखमश्नुते ॥ २८ ॥
सर्वत्र परमात्म दर्शनका सहज मार्ग--
ऐसी सुगम योग-स्थितिका । अनुभव है बहुत जनका ।
संकल्पकी सब संपत्तिका । करके त्याग ॥ ८७ ॥
सब वे अनायाससे ऐसे । विलीन हुए पर-ब्रह्मसे ।
होता जैसे लवण पानीसे । अभिन्न रूप ॥ ८८ ॥
मिलन होता है इस रूपमें । समरसके महा-सदनमें ।
दीखता है तब त्रिभुवनमें । महा-दीपोत्सव ॥ ८९ ॥
यह है अर्जुन अपने ही पगसे । चलना अपनी ही पीठपर जैसे ।
यह है असंभव यदि तुझसे । कहता हूँ अन्य मार्ग ॥ ३९० ॥
सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि ।
ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः ॥ २९ ॥
ऐसा निष्पाप जो योगी आत्मामें स्थिर होकर ।
सुखसे भोगता नित्य ब्रह्मानंद अपार जो ॥ २८ ॥
भूतोंमें पूर्ण है आत्मा आत्मामें भूत है भरे ।
देखता योगसे युक्त सर्वत्र सम दर्शन ॥ २९ ॥
१८७ आत्म-संयमयोग

मैं हूं जैसे सकल देहमें । वैसे हैं सकल ही मुझमें ।
विचार करना हे इसमें । कुछ नहीं अन्य ॥ ९१ ॥
यह है ऐसा ही बना हुआ । परस्पर सभी घुला हुआ ।
किंतु बुद्धिसे है माना हुआ । होना सब ॥ ९२ ॥
यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति ।
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति ॥ ३० ॥
नहीं तो भी अर्जुन । एकत्वकी भावना ।
सर्वभूत अभिन्न । भजते मुझे ॥ ९३ ॥
जीव-जातिका अनेकपन । न मानता जो अंतःकरण ।
सर्वत्र एकत्व अनुदिन । मानता मेरा ॥ ९४ ॥
वह है मुझमें ही विलीन । व्यर्थका ऐसा वचन ।
न कहने पर भी तू जान । वह है मैं ही ॥ ९५ ॥
जैसे दीप और प्रकाश । वैसे हैं दोनों समरस ।
उसका है मुझमें वास । मेरा उसमें ॥ ९६ ॥
जैसे पानीमें है भीनापन । या गगनमें है पोलापन ।
मेरे लावण्यसे लूनापन । पाता हे वह ॥ ९७ ॥
सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः ।
सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते ॥ ३१ ॥
जिसकी ऐक्यकी दृष्टिमें । मैं ही समस्त हूँ सबमें ।
जैसे दीखता है पटमें । सूत सर्वत्र ॥ ९८ ॥
सबमें मुझको देख मुझमें देखता सब ।
वियोग न उसे मेरा मुझे न उसका कभी ॥ ३० ॥
भजता है मुझे एक स्थिर हो सब भूतमें ।
कैसे भी रहता योगी रहता मुझमें वह ॥ ३१ ॥
ज्ञानेश्वरी १८८

जैसे होते हैं गहनोंके विविध आकार । किंतु न होते सुवर्णके नाना प्रकार ।
ऐसी है जिस एकताकी स्थिति स्थिर । की है अपनी ॥ ९९ ॥
अथवा वृक्षके होते जितने दल । उतने नहीं होते गाछ विपुल ।
अद्वय प्रकाशमें खुला है सकल । द्वैतमत जिसका ॥ ४०० ॥
यदि वह पंचात्मकमें बसता । फिर भी उसमें नहीं है फंसता ।
अनुभवसे है उसकी क्षमता । मेरे समान ॥ १ ॥
मेरा समस्त व्यापक पन । करता जो स्वानुभव पान ।
कहे बिना ही व्यापक जान । हुआ वह सहज ॥ २ ॥
यदि वह शरीरमें है । शरीरका बोध नहीं है ।
उस स्थितिका वर्णन है । शब्दातीत ॥ ३ ॥
आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन ।
सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः ॥ ३२ ॥
उसका वर्ण असाधारण । देखता वह अपने समान ।
स-चराचरके है अनुदिन । पांडुकुमार ॥ ४ ॥
सुखदुःखादिक वर्म । या शुभ अशुभ कर्म ।
ऐसे दोनो मनो-धर्म । न जानता वह ॥ ५ ॥
ये सम विषम भाव । अन्य विविधता सर्व ।
मानो जैसे अवयव । अपने ही ॥ ६ ॥
कहना क्या है भिन्न भिन्न । यह त्रिलोक ही संपूर्ण ।
मैं स्वयं हूं इसका ज्ञान । हुआ सहज ॥ ७ ॥
अजी ! इसको भी है एक तन । कहते हैं इसको सुखी दुखी जन ।
किंतु हमारा यह मत जान । वह है परब्रह्म ही ॥ ८ ॥
अपनेमें विश्वको देखना । तथा आप ही है विश्व होना ।
कर यह साम्य उपासना । अर्जुन तू ॥ ९ ॥

सर्वत्र समबुद्धीसे देखें आत्म समान जो ।
सुख दुःख सम माने योगी उत्तम मानना ॥ ३२ ॥
१८९ आत्म-संयमयोग

इसीलिये मैं तुझसे सतत । कहता हूं रहो साम्यमें रत ।
साम्यसे बड़ा नहीं कुछ प्राप्त । रहता त्रिभुवनमें ॥ ४१० ॥
अर्जुन उवाच
योऽयं योगस्त्वया प्रोक्तः साम्येन मधुसूदन ।
एतस्याहं न पश्यामि चञ्चलत्वात्स्थितिं स्थिराम् ॥ ३३ ॥
चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम् ।
तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम् ॥ ३४ ॥
चंचल मनको कैसे स्थिर किया जाय--
कहता है “देव !” अर्जुन । तू कहता है सकरुण ।
किंतु मनकी उलझन । टिकने नहीं देती ॥ ११ ॥
यह कैसा कितना है मन । इसका नहीं होता है भान ।
किंतु छोटा माना त्रिभुवन । भटकनेमें इसके ॥ १२ ॥
तब यह ऐसा होगा जी कैसा । मर्कट समाधि लगाये कैसा ।
अंधड रोकनेसे रुके कैसा । लगता असंभव ॥ १३ ॥
अजी ! वह बुद्धिको है छलता । उसके निश्चयको है टालता ।
धीरजको छकाकर भागता । झांसा देकर ॥ १४ ॥
विवेकको है भरमाता । तृप्तिको चाहकी लव लगाता ।
आसनस्थको भी मटकाता । दश दिशामें ॥ १५ ॥
पकडनेसे जो अधिक उछलता । निग्रहको अपना साथी बना लेता ।
अपना स्वप्न छोडनेकी शक्यता । न दीखती मनकी ॥ १६ ॥
अर्जुनने कहा
अब तू मुझसे बोला साम्य योग जनार्दन ।
दीखे न इसका स्थैर्य क्यों कि चंचल है मन ॥ ३३
मन चंचल अत्यंत प्रमत्त बलवान जो ।
दीखे दुष्कर वायुसा निग्रह उसका मुझे ॥ ३४ ॥
ज्ञानेश्वरी १९०