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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

गीतामें वह षष्ठीका । प्रसंग है चातुर्यका ।
समुद्रार्णवमें अमृतका । उदय जैसा ॥ १० ॥
वैसा गीतार्थका है सार । विवेक सिंधुका है पार ।
योग-वैभवका भांडार । खुला है जो ॥ ११ ॥
आदि प्रकृतिका जो विश्रांतिस्थान । हुए हैं जहां शब्द-ब्रह्म भी मौन ।
अंकुरित हो फैला है गीता ज्ञान । वहांसे ही ॥ १२ ॥
ज्ञानेश्वरका देश-भाषा प्रेम—
अध्याय है यह छठा । साहित्यमें अनूठा ।
कहता मैं सुन सुभटा । चित्त देकर ॥ १३ ॥
मेरी देशीके बोल सुंदर । वे हैं अमृतसे भी मधुर ।
ऐसे सरस सरल अक्षर । जोडूंगा मैं ॥ १४ ॥
जो हैं कोमलसे अति कोमल । सप्त स्वर नादसे भी विमल ।
टूटेगा परिमलका भी बल । इन शब्दोंसे ॥ १५ ॥
इसकी सरसताका लोभ । बनायेगा कानको भी जीभ ।
होगा इंद्रिय कलहारंभ । इसे सुननेमें ॥ १६ ॥
विषय है शब्द सुनना श्रवणका । जीभ कहेगी मेरा विषय रसनाका ।
घ्राण कहेगा भाव है परिमलका । यही होगा ॥ १७ ॥
कौतुक करेंगी काव्य रसका । देख कर आंखें शब्द चित्रका ।
कहेंगी खुला है रूप-कोशका । सु-प्रदर्शन ॥ १८ ॥
संपूर्ण पद आता जहां उभर । मन दौड़ आता है वहां बाहर ।
आगे उठ आयेंगे दोनों कर । आलिंगन करने ॥ १९ ॥
अजी ! इंद्रियां ऐसे अपने भावमें । लड़ेंगी अपनेमें रसिक-पनमें ।
जैसा अकेला प्रकाशता जगतमें । सहस्रकर ॥ २० ॥
शब्दोंकी है ऐसी ही व्यापकता । जानो उसकी असाधारणता ।
भावज्ञोंको अर्थकी व्यापकता । चिंतामणिकी ॥ २१ ॥
(20) १५३ आत्म-संयमयोग

निष्काम भावसे दिये गये शब्द-भोजनका आनंद—
ऐसा है सरस शब्द भोजन । परोसा कैवल्य रसमें सान ।
किया है मैंने यह संतर्पण । निष्काम भावसे ॥ २२ ॥
अजी ! आत्म प्रकाश नित्य नया । उसको ही बना करके दिया ।
इंद्रियोंसे चुरा करके खाया । जिसने पाया वह ॥ २३ ॥
श्रवणेंद्रियोंको जिस भोजमें । बिठाना पड़ता है पंगतमें ।
खाना है अंतर्मुख हो मनमें । यह अमृतान्न ॥ २४ ॥
खोलना यहां शब्दका आच्छादन । करना अर्थ ब्रह्मका आस्वादन ।
होना फिर सुख समरसैक्य जान । सुख रूप होके ॥ २५ ॥
आयेगा जब चितमें कोमलपन । होगा तब सफल यह निरूपण ।
न तो होगा यह वाचा विहार मान । गूंगे बहरोंका ॥ २६ ॥
अजी ! जाने दो यह सब । श्रोताका चुनाव क्यों अब ।
वे सब अधिकारी अब । जो हैं निष्काम काम ॥ २७ ॥
जिनका आत्म-बोधका प्यार । करे स्वर्ग-संसार न्योच्छावर ।
न जाने अन्य माधुर्य अमर । यहांका जी ॥ २८ ॥
काक जैसे चांदनी न जानता । विषयासक्त “तत्व” न जानता ।
वैसे सदा चंद्रकिरण खाता । चकोर पक्षी ॥ २९ ॥
वैसे ज्ञानियोंका है यही आधार । अज्ञानियोंको उसमें नहीं सार ।
इसमें नहीं बोलना कछु और । रहा अधिक ॥ ३० ॥
प्रसंग आया तब कहे यह वचन । क्षमा करेंगे सभी संत सज्जन ।
कहूंगा अब मैं वह निरूपण । श्रीरंगका कहा ॥ ३१ ॥
श्री गुरुको वंदन—
आता नहीं वह बुद्धिके बोधमें । नहीं आता है शब्दके परिघमें ।
निवृत्ति-कृपाके दीप-प्रकाशमें । देखूंगा मैं ॥ ३२ ॥
दृष्टिसे जो देखा नहीं जाता । दृष्टि बिन ही वह दीखता ।
ज्ञान बल जब प्राप्त होता । अतींद्रिय जो ॥ ३३ ॥
ज्ञानेश्वरी १५४

धातुवादसे जो न मिलता । लोहेमें ही वह प्राप्त होता ।
पारस यदि हाथमें आता । दैवयोगसे ॥ ३४ ॥
सद्गुरुकी जब कृपा होती है । सभी बात तब संभव होती है ।
हम पर वह कृपा अपार है । कहता ज्ञानदेव ॥ ३५ ॥
इस कृपा प्रभावसे मैं बोलूंगा । शब्दमें अरूप रूप दिखाऊंगा ।
अतींद्रियकी प्रतीति कराऊंगा । इंद्रियोंसे ॥ ३६ ॥
सुनो यश श्री औदार्य । ज्ञान वैराग्य ऐश्वर्य ।
ये जो छे गुणवर्य । रहते जहां ॥ ३७ ॥
वही है जो भगवंत । रहता निसंगके साथ ।
कहे पार्थ दत्त-चित्त । होकर सुन तू ॥ ३८ ॥
भगवान उवाच
अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः ।
स संन्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः ॥ १ ॥
एक ही स्थान पर पहुंचनेवाले दो मार्ग—
योगी तथा संन्यासी जगतमें । एक है, भिन्न माने तू मनमें ।
देखें जब दोनों विचारांतमें । एक ही है ॥ ३९ ॥
छोड दो , दो नामका आभास । वही योगी औ' वही संन्यास ।
जैसे ब्रह्ममें ना अवकाश । वैसे दोनोंमें देख ॥ ४० ॥
अजी ! भिन्न भिन्न नामसे हैं जैसे । बुलाते एक ही पुरुषको वैसे ।
अथवा जाते हैं दो भिन्न मार्गसे । एक ही स्थान ॥ ४१ ॥
अथवा जैसे उदक मात्र एक । भिन्न घटमें भरनेसे अनेक ।
वैसे हैं योगी संन्यास विषयक । भिन्न भिन्नत्व ॥ ४२ ॥
श्री भगवानने कहा
फलका आसरा छोड करे कर्तव्य कर्म जो ।
संन्यासी या वही योगी न जो निर्यज्ञ निष्क्रिय ॥ १ ॥
१५५ आत्म-संयमयोग

विश्वमें जो सकल समस्त । योगी है वह सुन तू पार्थ ।
कर्म करके भी जो आसक्त । फलमें नहीं होता ॥ ४३ ॥
भूमि जैसे उपजाती उद्बीज । बिना अहंभावके ही सहज ।
न करती कभी उसके बीज । अपेक्षा वह ॥ ४४ ॥
वैसे है कुल-धर्मका आधार । वर्ण धर्मानुसार है आचार ।
करता जो यहां स-अवसर । वही सभी ॥ ४५ ॥
करता रहता है उचित । किंतु कर्तव्य-भाव रहित ।
तथा फल विन्मुख हो चित । अन्तःकरणसे ॥ ४६ ॥
सुन तू अर्जुन मेरी बात । रहता ऐसा संन्यासी नित ।
मानो उस विश्वाससे नित । योगीश्वर ॥ ४७ ॥
तथा उचित कर्म प्रासंगिक । छोडते उसे कहके बहूक ।
किंतु तुरंत दूसरा ही एक । करते प्रारंभ ॥ ४८ ॥
जैसे एक लेप धोकर । लगाते दूसरा तन पर ।
वैसे आग्रहसे निरंतर । कष्टमें पडते ॥ ४९ ॥
अजी ! गृहस्थाश्रमका बोझ । आया जो सिरपर सहज ।
वहां संन्यासका रख साज । चलते आगे ॥ ५० ॥
तभी वे अग्नि सेवाको नहीं छोड़ते । कर्म-रेखाका उल्लंघन न करते ।
योग-सुखको हैं अनुभव करते । सहज भावसे ॥ ५१ ॥
उच्च स्थितिकी प्राप्तिकेलिये अष्टांग योगकी सीढ़ियां—
यं संन्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पांडव ।
न ह्यसंन्यस्तसंकल्पो योगी भवति कश्चन ॥ २ ॥
योगी जो है वही संन्यासी । विश्वमें एक-वाक्यता-सी ।
ध्वज गाड़के कही जैसी । शास्त्रोंने सभी ॥ ५२ ॥
संन्यास जो कहा जाता उसीको योग जान तू ।
योगी होता नहीं कोयी बिना संकल्प त्यागके ॥ २ ॥
ज्ञानेश्वरी १५६

जहां संन्यस्तका संकल्प टूटता । वहीं योगका सार-तत्व मिलता ।
अनुभवसे ऐसा है जो घड़ता । वही योगी औ' संन्यासी ॥ ५३ ॥
आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते ।
योगारूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते ॥ ३ ॥
योगाचलके जो शिखरपर । चढ़ना चाहे वह निरंतर ।
कर्म-पथ सोपान धनुर्धर । न छोड़ता कभी ॥ ५४ ॥
यम नियमकी है तरायीसे । आसनादिककी पगडंडीसे ।
प्राणायाम टेकडी लांघनेसे । पहुंचता है वहां ॥ ५५ ॥
टूटा पहाड़ खड़ा प्रत्याहारका । फिसलता वहांसे पैर बुद्धिका ।
टूटता वहां बंध प्रतिज्ञाका । योगीका भी ॥ ५६ ॥
वहां अभ्यासके बलसे । वैराग्यके कसे पंजोंसे ।
चिपकके प्रत्याहारसे । हौलेसे चढ़ना ॥ ५७ ॥
पवन वाहनसे ऐसे । धारणाके राज पथसे ।
ध्यानके शिखर पारसे । होना पार ॥ ५८ ॥
फिर उस पथकी है दौड़ । मिटेगी प्रवृत्तिकी जो होड़ ।
होगा साध्य साधनका गाढ़ । आलिंगनैक्य ॥ ५९ ॥
रुकती जहां भविष्यकी प्रवृत्ति । मिटती है वहां भूतकी भी स्मृति ।
इसी भूमिका पर है होती स्थिति । कहता हूं सुन ॥ ६० ॥
इन उपायोंसे जो योगारूढ । होके परिपूर्ण अखंड प्रौढ ।
हुए उसके लक्षण प्रौढ़ । कहता हूं सुन ॥ ६१ ॥
यदाहि नेंद्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते ।
सर्वसंकल्पसंन्यासी योगारूढस्तदोच्यते ॥ ४ ॥
योगपे चढ़ जानेमें कर्म कारण है कहा ।
योगपे चढ़ जानेपे शम साधन है कहा ॥ ३ ॥
न लीप़ता कर्मसे जो विषयोंमें विरक्त है ।
संकल्प छूटते सारे योगारूढ हुआ जब ॥ ४ ॥
१५७ आत्म-संयमयोग

इंद्रियोंद्वारा सतत कर्म, अंतर्यामी नैष्कर्म्य—
अजी ! इंद्रियोंके घरमें जिसके । आना जाना नहीं विषयोंके ।
तथा कक्षमें जो आत्मबोधके । सोता रहता है ॥ ६२ ॥
आघातोंके सुखदुःखसे । जगता नहीं मानस जिसके ।
स्पर्शसे भी विषयादिकोंके । न होता स्मरण ॥ ६३ ॥
इंद्रियां जिसकी कर्ममें । रत होती दिन रातमें ।
फलाशा अंतःकरणमें । न जगती कभी ॥ ६४ ॥
देहधारी वह रहकर । करता है ऐसा व्यवहार ।
जागृत रहकर सोकर । योगारूढ ॥ ६५ ॥
अर्जुन कहता है अनंत । सुनकर होता हूं वह चकित ।
कहां उसमें यह योग्यता । आती कहांसे ॥ ६६ ॥
उद्धरेदात्मनाऽत्मानं नात्मानमवसादयेत् ।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ॥ ५ ॥
यह स्थिति स्वयं प्राप्त करनी होती है —
स्मित कर कृष्णका कहना । अचरजका तेरा बोलना ।
किसको किसका लेना देना । अद्वैतमें यहां ॥ ६७ ॥
अविवेककी शैय्या पर । अविद्या निद्रामें सोकर ।
शिशु देखे स्वप्न भयंकर । जन्म मृत्युका ॥६८ ॥
होता है फिर अकस्मात् जागृत । तब होती है स्वप्नकी व्यर्थ बात ।
आता है यही अनुभव सतत । अपनेको ही ॥ ६९ ॥
इसीलिये आप ही है अपना । घात करते रहते अर्जुन ।
चित्त देकरके देहाभिमान । जो है निरर्थक ॥ ७० ॥
उभारना अपनी आत्मा न देना गिरने कभी ।
आप ही अपना बंधु आपही शत्रु आपका ॥ ५ ॥
ज्ञानेश्वरी १५८

बन्धुरात्मात्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः ।
अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत् ॥ ६ ॥
ऐसा सोचके अहम्‌को त्यागना । फिर वस्तुका दर्शन करना ।
इससे होगा कल्याण अपना । आपने किया ऐसा ॥ ७१ ॥
नहीं तो कोशकीटक जैसे । बने अपना वैरी आप जैसे ।
तन पर आत्म-भाव रखनेसे । बनते हैं नित ॥ ७२ ॥
प्राप्ति वेलामें दैव हीनकी । चाह होती है अंधत्वकी ।
तथा अपनी ही आंखोकी । मिटती दृष्टि ॥ ७३ ॥
कभी कोई कहता भ्रमसे । यह मैं नहीं चुराया ऐसे ।
अंतःकरणमें फंसे फंदसे । अपनी कल्पनाके ॥ ७४ ॥
देखें तो वह पहले जैसा । किंतु न जानती बुद्धि ऐसा ।
स्वप्नके घावसे कोई जैसा । मरता नहीं ॥ ७५ ॥
अंग भारसे झुकके जैसे । नलिका घूमती उलटके ।
शुक बैठे उसे पकडके । न उडता शंकासे ॥ ७६ ॥
व्यर्थ ही चहूं ओर देखता । संकोचसे नली पकडता ।
वही कसकर पकड़ता । पैरोंसे शुक ॥ ७७ ॥
अपनेको बंधनमें मानकर । भावनासे स्वयं जकड़कर ।
पैरोंसे पकड़ता है कसकर । मुक्त होकर भी ॥ ७८ ॥
कारणके बिन जकड़ा हुआ । किसीसे क्या वह बंधा हुआ ।
खींचने पर भी पकड़ा हुआ । रहता सतत ॥ ७९ ॥
ऐसा रिपु है अपने आप । जिसने बढ़ाये हैं संकल्प ।
न लेता मिथ्याभिमान आप । वह है बंधु अपना ॥ ८० ॥
जीतता अपने आप आपही अपना सखा ।
छोडा यदि उसे स्वैर अपना शत्रु है बना ॥ ६ ॥
१५९ आत्म-संयमयोग

जितात्मनः प्रशांतस्य परमात्मा समाहितः ।
शीतोष्ण सुखदुःखेषु तथा मानापमानयोः ॥ ७॥
आत्मज्ञका वर्णन —
उस स्वांतःकरणजित । सकल कामनाविसे शांत ।
परमात्म उसके सतत । रहता सपीप ॥ ८१ ॥
जलानेसे सोना हीन कस । होता है जो विशुद्ध सरस ।
वैसा जीवका ब्रह्मत्व खास । मिले संकल्प लोपसे ॥ ८२ ॥
घटाकारके मिटनेपर जैसे । घटाकाश मिलनेमें आकाशसे ।
जाना नहीं लगता अन्यत्र जैसे । वैसे अर्जुन ॥ ८३ ॥
नाश हुआ देहाहंकारका । कारणोंके सहित मूलका ।
वास सर्वत्र परमात्माका । अनादि सिद्ध है ॥ ८४ ॥
शीत उष्ण आदिका द्वंद्व । औ' सुख दुःखका चुनाव ।
मानापमान अनुभव । नहीं वहां ॥ ८५ ॥
जिस दिशामें जाता है भास्कर । प्रकाश फैलाता है उसी ओर ।
जिसका स्वरूप है वही स्थिर । दीखता सतत ॥ ८६ ॥
मेघसे गिरी वर्षाकी धार । न चुभे जैसे कभी सागर ।
वैसे शुभाशुभ योगेश्वर । नहीं अनुभवता ॥ ८७ ॥
ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा कूटस्थो विजितेन्द्रियः ।
युक्त इत्युच्यते योगी समलोष्टाश्मकाञ्चनः ॥ ८ ॥
जो है यह विज्ञानात्मक भव । सोचनेसे व्यर्थत्व अनुभव ।
फिर हुआ अपना अनुभाव । वही ज्ञान है ॥ ८८ ॥
हुवा शांत जितात्मा जो देखता ब्रह्म केवल ।
शीतोष्ण सुख औ' दुःख मानापमानमें नित ॥ ७ ॥
ज्ञान विज्ञानमें तृप्त स्थिर इंद्रिय जीतके ।
देखता सम जो योगी सोना पाषाण मृत्तिका ॥ ८ ।
ज्ञानेश्वरी १९०

मैं अमर्याद या मर्यादित । इसकी चर्चा भी हुई व्यर्थ
अनुभवमें न आता द्वैत । इसीलिये ॥ ८९ ॥
शरीर है किंतु कौतुक । परब्रह्म-धाम है नेक ।
जिन्होंने जीत लिया देख । इंद्रियोंको ॥ ९० ॥
जो है जितेंद्रिय सहज । वही योग-युक्त समझ ।
वहां छोटे मोटेका दूज । कभी नहीं ॥ ९१ ॥
सोनेका मेरु पर्वत । माटीका ढेर या पात ।
मानता समान नित । समदृष्टिसे ॥ ९२ ॥
पृथ्वीके मोलका प्रसिद्ध । रत्न पाता जो शुद्ध ।
तथा पत्थर भी असिद्ध । एक जैसा ॥ ९३ ॥
सुहृन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थद्वेष्यबंधुषु ।
साधुष्वपिच पापेषु समबुद्धिर्विशिष्यते ॥ ९
सुहृद और शत्रु । उदास और मित्र ।
भेदाभेद विचित्र । कल्पना नहीं ॥ ९४ ॥
या बंधु है कौन उसका । द्वेष करे कौन किसका ।
मैं हूँ विश्व ऐसा जिसका । हुआ अनुभव ॥ ९५ ॥
कहो कैसे फिर उसकी दृष्टि । जाने अधम उत्तम किरीटी ।
दिखाये कैसे पारस कसौटी । सोना औ' लोहकी ॥ ९६ ॥
विवर्णको सुवर्ण करता पारस । वैसे चराचरसे होता समरस ।
बुद्धिमें समता रहती है सरस । निरंतर उसकी ॥ ९७ ॥
विश्वालंकारके प्रकार । अनेक रूपके आकार ।
मूलमें स्वर्ण है धनुर्धर । परब्रह्म रूप ॥ ९८ ॥
प्राप्त जिसे ऐसा उत्तम ज्ञान । नाना प्रकार देख असमान ।
नहीं फंसता वह बुद्धिमान । आकार-जालमें ॥ ९९ ॥
शत्रु मित्र उदासीन मध्यस्थ आप्त औ' पर ।
साधु या पातकीमें भी सम-बुद्धि विशिष्ट सो ॥ ९ ॥
१६१ आत्मसंयम योग
(21)

डालनेसे वस्त्रपर दृष्टि । दीखती सभी सूतकी सृष्टि ।
वहां है नहीं दूसरी गोष्टि । सूतके बिना ॥ १०० ॥
ऐसा प्रतीत जो है करता । अनुभव ऐसा जहां होता ।
वही समबुद्धि कहलाता । नहीं अन्य ॥ १ ॥
होता है वह तीर्थ-राज समान । उसके दर्शनसे हो समाधान ।
होता संगसे ब्रह्मभावका ज्ञान । अनिच्छुको भी ॥ २ ॥
धर्मका सारथ्य करती है उसकी गोष्टि । महा-सिद्धिको जन्म देती उसकी दृष्टि ।
स्वर्गादि सुखकी करना है नव-सृष्टि । खेल है उसको ॥ ३ ॥
यदि कोई सहज स्मरता । देते हैं वे अपनी योग्यता ।
उनकी प्रशंसा स्वभावता । देती शुभ-लाभ ॥ ४ ॥
योगी युञ्जीत सततम् आत्मानं रहसि स्थितः ।
एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रहः ॥ १० ॥
कभी अस्त न होगा ऐसे । देखा अद्वैत दिवससे ।
आप रहता है अपनेसे । अखंडित ॥ ५ ॥
इस दृष्टिसे वह विवेकी है । अर्जुन जो एकाकी रहता है ।
त्रिभुवनमें वही होनेसे है । सहज अपरिग्रही ॥ ६ ॥
ऐसे हैं जो असाधारण । प्राप्त पुरुषके लक्षण ।
सर्वज्ञताके ही कारण । श्री कृष्ण कहता ॥ ७ ॥
यह है ज्ञानियोंका बाप । सबकी दृष्टिका है दीप ।
उसका समर्थ संकल्प । रचता विश्वको ॥ ८ ॥
हाटमें है जो प्रणवके । वस्त्र बना शब्द-ब्रह्मके ।
लपेट न सका उसके । यशसे छोटा बड़ा ॥ ९ ॥
उसकी है अंगकी कांतिसे । प्रकाशते रवि-शशि ऐसे ।
विश्व क्या उसके प्रकाशसे । ओझल है पार्थ ॥ ११० ॥

इच्छा संग्रहको छोड़ चित्तको करके वश ।
आत्मामें ही सदा लीन रहा एकांत भावसे ॥ १० ॥
ज्ञानेश्वरी १६२

जिसके नामके ही सम्मुख । आकाश लगता बौना देख ।
उसका गुण तू एक एक । कैसा जानेगा ? ॥ ११ ॥
इसीलिये ऐसा वर्णन । न जाने किसके लक्षण ।
कहनेके बहाने मान । कहे हैं यहां ॥ १२ ॥
श्रीकृष्णका भक्त प्रेम --
सुनोजी द्वैतका म्यान मान । नष्ट करता है ब्रह्म-ज्ञान ।
उससे सख्य माधुरी जान । नष्ट होगी ॥ १३ ॥
इसीलिये हरिका यह बोलना । मानो हलकासा परदा रखना ।
मनके सख्य सुखको हे भोगना । द्वैत भावसे ॥ १४ ॥
जिसका सोऽहं भावका रोक । मोक्ष सुखार्थ बने जो रंक ।
उनकी दृष्टिका हे कलंक । लगेगा तेरे प्रेमको ॥ १५ ॥
इसका अहंभाव जायेगा । यदि यह मैं ही हो जायेगा।
मैं अकेला ही कैसा रहूंगा । सोचता है हरि ॥ १६ ॥
दृष्टिसे देख कर सुखी होना । या सुखसे मनसोक्त बोलना ।
या प्रेमसे आलिंगन करना । किसको फिर ॥ १७ ॥
या अपने मनकी सुंदर । बात कहें किससे मधुर ।
हुआ यदि यह धनुर्धर । मुझमें समरसैक्य ॥ १८ ॥
द्वयनीय भावसे जनार्दन । अन्योपदेश रूपसे ही मान ।
बोलनेमें किया मनमोहन । आलिंगन पार्थका ॥ १९ ॥
सुननेमें यह किंचित्कठिण । फिर भी है यह स्पष्ट ही जान ।
श्रीकृष्ण रूपकी मूर्ति अर्जुन । है ढली हुई ॥ १२० ॥
अर्जुनकी प्रशंसा —
जैसे ही आयूके अंतमें । पुत्रजन्म होता है बांझमें ।
फिर वह मोहत्रयमें । नाचने लगती है ॥ २१ ॥
ऐसा हुआ है अनंत । यह मैं नहीं कहता ।
यदि मैं नहीं देखता । प्रेमातिशय ॥ २२ ॥
१६३ आत्मसंयम-योग

देखो कैसा है यह अचरज । कहां उपदेश औ' कहां झुंज ।
परंतु यहां है प्रेमका भोज । नाचता जो ॥ २३ ॥
अजी ! लाज लज्जा है प्रेममें । तथा थकान है व्यसनमें ।
भ्रम नहीं जो पगलाईमें । यह होगा कैसे ॥ २४ ॥
इसका भावार्थ है ऐसा । पार्थ भक्तिका आश्रयसा ।
सुख श्रंगारके मानस-सा । दर्पण रूपमें ॥ २५ ॥
ऐसा है यह पुण्य पवित्र । विश्वमें भक्ति बीज सुक्षेत्र ।
तभी है श्रीकृष्ण-कृपा पात्र । त्रिभुवनमें ॥ २६ ॥
आत्म निवेदनकी नींवका । आधार पीठ है जो सख्यका ।
पार्थ है अधिष्ठान उसका । मुख्य देवता ॥ २७ ॥
पास ही है प्रभु उसका वर्णन । छोड़ करते हैं भक्त-गुणगान ।
भाता है ऐसा स्वभावका अर्जुन । श्रीहरिको सहज ॥ २८ ॥
भजती जैसे पतिको प्रीतिसे । पाती मान्यता प्रीतिकी पतिसे ।
वर्णन ऐसी सतीका पतिसे । होना स्वाभाविक ॥ २९ ॥
अर्जुनका ऐसा गुणगान । चाहता विशेष मेरा मन ।
त्रिभुवनका भाग्य महान् । पार्थमें बसता ॥ १३० ॥
जिसके प्रेमके कारण । निर्गुण हो आता सगुण ।
तथा सकल गुणपूर्ण । अनुभवता प्रेम-पीड़ा ॥ ३१ ॥
श्रोताओंकी ओरसे वक्ताका यशोगान--
कहते तब श्रोता हमारा भाग्य । कैसा बोलना यह सहज योग्य ।
शब्द शोभा आयी पाकर विजय । नाद-ब्रह्मपर ॥ ३२ ॥
आश्चर्यजी गगनमें देश-भाषाके । प्रकार प्रकटते साहित्य रंगके ।
खिल आयी हिंदी ऐसे अलंकारके । वैभवानंदमें ॥ ३३ ॥
छटकी है ज्ञान चांदनी कैसी । भावार्थ दे प्रिय शीतलतासी ।
खिली श्लोकार्थ कुमुदिनी ऐसी । सहज रूपसे ॥ ३४ ॥
ज्ञानेश्वरी १६४

चाह होती इससे निरिच्छोंमें । मन होता वचन सुननेमें ।
तथा डुलते हैं अंतरंगमें । ज्ञान प्रकाशसे ॥ ३५ ॥
ज्ञानेश्वर कृत कृष्ण वर्णन-
निवृत्तिशासने यह जाना । फिर कहा ध्यान सब देना ।
पांडव कुलमें कृष्ण दिन । हुआ उदय ॥ ३६ ॥
देवकीके उदरमें जन्म लिया । यशोदाने सायास पालन किया ।
पांडव कुलके वह काम आया । इस समय ॥ ३७ ॥
तभी सेवा करता बहु समय । अवसर देख करता विनय ।
पड़ा नहीं ऐसा प्रयास अवश्य । विषय जाननेमें ॥ ३८ ॥
अर्जुनकी उत्कट जिज्ञासा -
जाने दो कहते संत जन । विषय कहो सत्वर महान ।
सन्त लक्षण मुझमें अर्जुन । कहता नहीं है ॥ ३९ ॥
किया तो संत लक्षणका विचार । “अयोग्य मैं” निःसंदेह “यह सारा” ।
किंतु तेरा उपदेश सुनकर । बनूंगा अवश्य ॥ १४० ॥
यदि तू मन करेगा । तब मैं ब्रह्म बनूंगा ।
जो कहो अभ्यास करूंगा । निःसंदेह ॥ ४१ ॥
न जानता देव यह किसका बखान । सुनकर करे अंतःकरण स्तब्ध ।
इन लक्षणसे पूर्ण जो संत महान । कैसे होंगे जी ॥ ४२ ॥
यह लक्षण मुझमें क्या आयेगा । इतना तू मुझे अपना पायेगा ।
श्रीकृष्ण कहता “अवश्य ही होगा” । रिमत करके ॥ ४३ ॥
जब तक संतोष नहीं मिलता । सुखका सर्वत्र अभाव रहता ।
जब वह समाधान है मिलता । सुखाभाव कहाँ ॥ ४४ ॥
जो है सर्वेश्वरका सेवक । वह होगा ब्रह्म सकौतुक ।
हुआ है यह फलकारक । दैवयोगसे ॥ ४५ ॥
सहस्र जन्मोंमें इंद्रादिकके । मिलन नहीं होता जिसके ।
आधीन वह कितना पार्थके । कथनमें अधीर ॥ ४६ ॥
१६५ आत्मसंयमयोग

पार्थका यह कहना । मुझको है ब्रह्म होना ।
श्रीकृष्णने यह सुना । पूर्ण रूपसे ॥ ४७ ॥
श्रीकृष्ण कहते तब अपनेमें । ब्रह्मत्वका दोहद हुआ इसमें ।
वैराग्य आया बुद्धिके उदरमें । बनके गर्भ ॥ ४८ ॥
किंतु दिन है अभी अपूर्ण । वैराग्य बसंतमें भरा पूर्ण ।
बौरा आया है भावका महान । सोऽहम्‌के ॥ ४९ ॥
प्राप्ति फल अब फलेगा । इसमें समय न लगेगा ।
पूर्ण हुआ इसका विराग । जाना श्रीहरिने ॥ १५० ॥
अब यह जो कर्म करेगा । इसको प्रारंभमें फलेगा ।
इसीलिये कहा हुआ होगा । अभ्यास इससे ॥ ५१ ॥
ज्ञानेश्वरका पंथराज—
श्रीहरि ऐसा सोचकर । कहते हैं सु अवसर ।
: अर्जुन सुन तू सत्वर । पंथराज ॥ ५२ ॥
जडमें वहां प्रवृत्ति वृक्षके । फल लगे करोडों निवृत्तिके ।
पथिक हैं जहां इस पथके । महेश भी ॥ ५३ ॥
योगी-वृंदके अनुभव परसे । उस सूक्ष्म-पथ पर चलनेसे ।
मूर्ध्नि आकाश मार्ग इस कारणसे । हुआ सुलभ ॥ ५४ ॥
आत्म-बोधके सरल पथपर । गये सीधे वे सानंद दौडकर ।
अन्य सकल मार्ग छोड़कर । जो हैं अज्ञानके ॥ ५५ ॥
फिर ऐसे महर्षी आये । साधक थे सिद्ध भये ।
आत्मविद् हो महती पाये । इस पंथसे ॥ ५६ ॥
यह मार्ग जो देखता । भूख प्यास भी भूलता ।
रात दिन न जानता । चलनेमें यहां ॥ ५७ ॥
चलते चलते जहां पग पड़ता । वहां मोक्ष सुखका भांडार खुलता ।
कहीं यदि गलत पग भी पड़ता । वह है स्वर्ग सुखका ॥ ५८ ॥
पूर्वाभिमुख हो चलना । पश्चिमको जा पहुंचना ।
मनको स्थिर ही रखना । चलना यहां ॥ ५९ ॥
ज्ञानेश्वरी १६६

इस भाँतिसे है जाना । गंतव्य स्वयं हो जाना ।
इसे भला क्या कहना । जानेगा तू ॥ १६० ॥
“देव !” तब पार्थ कहता । “मुझे तू कब उभारता ।”
आर्त सागरमें डूबता । हूं इस समय ॥ ६१ ॥
श्रीकृष्ण तब ऐसा कहता । उतावला हो क्यों बोलता ।
अपने आप मैं हूँ कहता । तब तू क्यों पूछता वही ॥ ६२ ॥
शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः ।
नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम् ॥ ११ ॥
योग साधनका स्थान ऐसा होना चाहिए—
अब जो मैं एक विशेष कहूंगा । अनुभवसे वह काम आयेगा ।
उसके लिये योग्य ऐसा लगेगा । स्थान एक ॥ ६३ ॥
जहां होता सहज समाधान । न रहता उठनेका भी भान ।
वैराग्य होता जहां बलवान । देखते वह ॥ ६४ ॥
वह हो संतोंका वसतिस्थान । संतोषका हो आवास महान ।
जहां हो चित सदा धैर्यवान । तथा उत्साही भी ॥ ६५ ॥
अभ्यास होता सहज जहां । अनुभव होता आप वहां ।
ऐसी रम्यता वसती वहां । अखंडित ॥ ६६ ॥
वहां जानेसे ही पार्थ । नास्तिकको मनोरथ ।
तपस्यामें हो सु-स्वस्थ । अंतःकरण ॥ ॥ ६७ ॥
सहज ही वहां जानेसे । सहसा बैठ जानेसे ।
करें न मन उठनेसे । सकामका भी ॥ ६८ ॥
करता वह घुमक्कडको भी स्थिर । आनेसे सहज उस स्थान पर ।
जागृत करता वैराग्य सत्वर । थपकियां देके ॥ ६९ ॥
पवित्र देशके स्थान लगाना स्थिर आसन ।
दर्भ चर्म तथा वस्त्र ऊंचा नीचा न हो वह ॥ ११ ॥
१६७

राज्य सुखका त्याग करना । ऐसा कहे विलासीका भी मन ।
एकांतमें यहीं बैठा रहना । ऐसा ही लगे ॥ १७० ॥
स्थान वह ऐसा हो उत्तम । तथा अत्यंत पवित्रतम ।
प्रकटे अधिष्ठान परम । नयनोंमें वहां ॥ ७१ ॥
देखना औ एक विशेष लक्षण । होना वहां साधक-वसति-स्थान ।
न होना जन संचार प्रच्छन्न । अर्जुन वहां ॥ ७२ ॥
वहां अमृतके समान । पक्व फल वृक्ष अर्जुन ।
फलते रहे अनुदिन । सभी ओर ॥ ७३ ॥
पग पगमें बहे नीर । वर्षा ऋतुमें भी पवित्र ।
ऐसे जो सहज निर्झर । सुलभ हो वहां ॥ ७४ ॥
आतप भी हो कोमल । सौम्यता भासे शीतल ।
पवन अति निश्चल । मंदमंद हो ॥ ७५ ॥
अधिक तर हो निःशब्द । न करें आकुल श्वापद ।
शुक तथा न हो षट्पद । उस स्थानमें ॥ ७६ ॥
स्रोत समीप हो हंस । वैसे दो चार सारस ।
कूजन करें आस पास । कोयल कभी कभी ॥ ७७ ॥
किंतु जो निरंतर नहीं । आवे जावे कभी कहीं ।
मोरको अपनी ना नहीं । उस स्थानमें ॥ ७८ ॥
परंतु अवश्य ही अर्जुन । ऐसा ठाव खोजके रखना ।
वहां निगूढ़सा मठ होना । या शिवालय ॥ ७९ ॥
इन दोनोंमें एक । भाता है जो अधिक ।
एकांतमें अधिक । बैठा रहना ॥ १८० ॥
देखें कैसा है यह स्थान । स्थिर रहता है क्या मन ।
रहा तो लगाना आसन । इस भांति ॥ ८१ ॥
योग साधनामें आसन ऐसा होना चाहिये--
वहां शुद्ध मृगचर्म एक बिछाना । उसपे धौत वस्त्रकी तह डालना ।
उसके तलमें कोमलसे बिछाना । कुशांकुर ॥ ८२ ॥
१६८

परंतु अवश्य ही अर्जुन । ऐसा ठाव खोजके रखना ।
वही निगूढसा मठ होना । या शिवालय ॥ ज्ञा. ६-१७९

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होना है वे स-कोमल समान । एकसे सहज रखना जान ।
रचना करें एकसी समान । भूमिपर ॥ ८३ ॥
थोड़ा भी यदि वह ऊंचा होगा । उससे शरीर अस्थिर होगा ।
थोड़ासा यदि वह नीचा होगा । आयेगा भूमि दोष ॥ ८४ ॥
इसीलिये ऐसा न करना । आसन सम भावका होना ।
ऐसा आसन तैयार करना । धनुर्धर ॥ ८५ ॥
तत्रैकाग्रं मनः कृत्वा यतचित्तेन्द्रियक्रियः ।
उपविश्यासने युञ्ज्याद्योगमात्मविशुद्धये ॥ १२ ॥
योग-साधनाका प्रारंभ ऐसा करना—
करना प्रारंभ अनुष्ठान । एकाग्र कर अंतःकरण ।
करके श्री गुरुका स्मरण । अनुभवसे ॥ ८६ ॥
ऐसे स्मरणके आदरसे । अहंकारके घुल जानेसे ।
भर जाता है सात्विकतासे । साधक वहां ॥ ८७ ॥
वासनाका विस्मरण होता । इंद्रियोंका चांचल्य मिटता ।
वैसेही तब स्थिरत्व आता । अंतःकरणमें ॥ ८८ ॥
संतुलन ऐसा स्वाभाविक । होने तक रुके क्षण एक ।
बैठो इस बोधमें क्षणिक । आसन पर ॥ ८९ ॥
अंग ही अंगको सचेत करता । जैसे पवनको पवन करता ।
वैसे अनुभवोंका उदय होता । ऐसे समय ॥ १९० ॥
प्रवृत्ति मुडती है पीछेको । समाधि उतरती आगेको ।
अभ्यास पहुंचे पूर्णताको । आसन पर ॥ ९१ ॥
मुद्राका महत्व है ऐसे । कहता हूँ उसीको कैसे ।
भिडाके रान औ' जांघसे । पलथी मारना ॥ ९२ ॥
करके मन एकाग्र रोक चित्तेंद्रिय क्रिया ।
करे आसन पे बैठ योजना आत्म-शुद्धिकी ॥ १२ ॥
(22) १६९ आत्म-संयमयोग

चरण तलको मोड़कर । आधार चक्रके तल पर ।
रखना ऐसे ही सटाकर । सुस्थिर हो बैठे ॥ ९३ ॥
दहिनेको नीचे रखना । उससे सीवन दबाना ।
उसपे सहज रखना । वामपाद ॥ ९४ ॥
गुद औ' शिश्नके मध्यमें । चार अंगुलके स्थानमें ।
डेढ़ औ' डेढ़ अंगुलमें । छोड़ करके ॥ ९५ ॥
रहता है स्थान अंगुल एक । उसे एडीके उत्तराग्रसे देख ।
दबाकर अंग उस पर रख । तौल करके ॥ ९६ ॥
उठाया या नहीं यह जाने नहीं । उतना ही पृष्ठांश उठावो कहीं ।
उठावो गुल्फद्वय भी वैसे ही । उसी समय ॥ ९७ ॥
तब शरीरका ढांचा पार्थ । पूर्ण रूपसे सुन सर्वथा ।
होता ऐडीसे लेकर माथा- । तक स्वयंभू जैसे ॥ ९८ ॥
यह तू जान अर्जुन । मूलबंधका लक्षण ।
वज्रासन भी है गौण । इसका नाम ॥ ९९ ॥
ऐसा आधार मूल पड़ता । उतरनेका मार्ग ढूंढता ।
तब है ऊर्ध्व गतिको पकड़ता । संकुचित अपान ॥ २०० ॥
समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलं स्थिरः ।
संप्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन् ॥ १३ ॥
सहज कर संपुट । वाम चरणमें बैठ ।
बाहुमूल दीखें ऊठ । सहज रूपसे ॥ १ ॥
उभरे हुए भुज मूलमें । मस्तक रखना स्थिरतामें ।
किवाड जैसे नेत्र द्वारमें । चाहते लगने ॥ २ ॥
ऊपरके पलक मिटते । नीचेके पलक हैं फैलते ।
जिससे अर्धोन्मिलिन होते । नेत्रद्वय ॥ ३ ॥
शरीर सम-रेखामें रखना स्थिर निश्चल ।
रख नासाग्रमें दृष्टि कभी न देखना कहीं ॥ १३ ॥
ज्ञानेश्वरी १७०