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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

कृतांतके जो जो हथियार क्रूर । निगलते एकेक स-चराचर ।
निगलता तू ऐसा शस्त्र भांडार । करोडोंका ॥ ९६ ॥
चतुरंग-सेना परिवार । स-अश्व-रथ पकड़कर ।
दांत न लगाते विश्वेश्वर । निगलता तू ॥ ९७ ॥
भीष्मसे ऐसा है कौन । सत्यशौर्यमें प्रवीण ।
तथा जो द्रोण ब्राह्मण । तूने चबाया ॥ ९८ ॥
ओ ! वह सहस्र-कर-कुमार । गयारे गया व्यर्थ जो कर्ण वीर ।
तथा हमारे अनेक महावीर । खा गया तू ॥ ९९ ॥
कैसा हे देव ! यह विधि विधान । मेरी मांगसे विश्व-रूप-दर्शन ।
करता वह विश्वका निकंदन । चाहता था मै शांति ॥ ४०० ॥
तूने कही पहले उपपत्ति । बताई थी यहां कुछ विभूति ।
छोडके वह मैं हो मंदमति । मांगा दर्शन ॥ १ ॥
होनी है जो त्रिकालमें भी नहीं चूकती । बुद्धि भी उसका अनुकरण करती ।
मेरे दैवमें अजी ! यही बात बधीथी । उसका उपाय क्या ? ॥ २ ॥
अमृत भी पहले हाथ आया । देवोंको उससे तोष न भया ।
फिर कालकूटको जन्म दिया । अंतमें जैसे ॥ ३ ॥
किंतु वह था जो किंचित । निराकरण योग्य बात ।
उसे किया है तब शांत । पीके शंभुने ॥ ४ ॥
जलता बवंडर अब कौन लपेटता । विष भरा आकाश कौन निगलता ।
महाकालके कालसे कौन खेलता । सामर्थ्यवान हो ॥ ५ ॥
अर्जुन ऐसे शोकमें गळता । हृदयमें अति संतप्त होता ।
मनोगत वह नहीं जानता । देवदेवेशका यहां ॥ ६ ॥
परमात्मका मनोगत—
कौरव मरते और मैं मारता । अर्जुन ऐसे मोहग्रस्त हुवा था ।
श्रीकृष्णको उसे दूर करना था । यह रूप दिखाके ॥ ७ ॥
३७१ विश्व-रूप-दर्शनयोग

अजी कोई किसीको न मारता । मैं ही सबका संहार करता ।
विश्व-रूप निमित्तसे बताता । यहां श्रीहरि ॥ ८ ॥
नहीं जाननेसे यह बात । पार्थ हुवा है व्याकुलचित्त ।
तथा कांपता रहा है व्यर्थ । देखके रूप ॥ ९ ॥
वक्त्राणि ते त्वरमाणा विशन्ति
दंष्ट्राकरालानि भयानकानि ।
केचिद्विलग्ना दशनान्तरेषु
संदृश्यन्ते चूर्णितैरुत्तमाङ्गैः ॥ २७ ॥
कहता है वह देखकर अर्जुन । कवच सह ये दोनों दल महान ।
खो जाते हैं जैसे गगनमें घन । वैसे जाते मुखमें ॥ ४१० ॥
या अया है अब कल्पांतका अंत । या हुवा है क्रुद्ध विश्वपे कृतांत ।
जो है स्वर्ग पाताळ सह जगत । निगलता आप ॥ ११ ॥
होता जब प्रतिकूल दैव । तब सभी संचित वैभव ।
जहांका तहां ही हो गलात्र । होता नष्ट ॥ १२ ॥
दोनों ओरकी एकत्रित सेना । जाती है मुखमें एक समान ।
किंतु वहांसे कभी लौटना । नहीं दीखता ॥ १३ ॥
अशोकके पात जैसे । चबाता है ऊट वैसे ।
सेना समूह व्यर्थ वैसे । मुखमें जाता ॥ १४ ॥
यहां मुकुट सह मस्तक । दांतोंमें चूर्ण होते अनेक ।
देखता मैं यह भयानक । दृश्य इस रूपमें ॥ १५ ॥
सबको तेरे ये दांत पीस रहे हैं —
जाते त्वरासे मुखमें हि तेरे
भयान जिसमें कराल दाढ ।
चिपके हुए हैं अनेक मुंड
दीखे वहां चून बना हुवा जो ॥ २७ ॥
ज्ञानेश्वरी ३७२

दांतोंमें फंसे हैं कुछ रत्न । कुछ चूर्ण हो गये हो भग्न ।
जिव्हा-मूलमें फंसा चूरन । कुछ दांतोंमें ॥ १६ ॥
विश्व-रूप है यह महाकाल । चबाता लोगोंकी देह सबल ।
किंतु जीव देहका शिर-कमल । रखता आवश्य ॥ १७ ॥
वैसे शरीरमें है चोख । उत्तमांग जो शिर सम्मुख ।
महाकालके मुखमें देख । शेष रहे हैं ॥ १८ ॥
कहता है फिर अपनेसे अर्जुन । अन्य गति नहीं जो कुछ हुवा है जनन ।
करते हैं वे इस मुखमें गमन । अपने आप ॥ १९ ॥
यहा हुवा है जो सृष्ट । होता है इस मुखमें प्रविष्ट ।
निगलकर सब होता पुष्ट । विश्व-रूप काल ॥ ४२० ॥
समस्त हैं जो ब्रह्मादिक । स-वेश जाते ऊंचे मुख तक ।
पड़ते हैं जाके सामान्य लोक । इसी ओरके मुखमें ॥ २१ ॥
अन्य सभी हैं जो भूत-जात । जन्मते वही होते ग्रसित ।
किंतु इनका मुख निर्भ्रांत । न छूटता कोई ॥ २२ ॥
यथा नदीनां बहवोऽम्बुवेगाः
समुद्रमेवाभिमुखा द्रवंति ।
तथा तवामी नरलोकवीरा
'विशन्ति वक्त्राण्यभिविज्वल॑ति ॥ २८ ॥
जैसे हैं महानदीके ओघ । डूबते हैं सिंधुमें अथांग ।
वैसे सभी ओरसे हैं जग । जाता इस मुखमें ॥ २३ ॥
आयुष्य पथमें प्राणि-गण । करके अहो रात्र प्रयाण ।
इस मुखमें पाते निधान । अति-वेगसे ॥ २४ ॥
जैसे नदीके जलके प्रवाह
दौडे हुए सागरमें समाते ।
वैसे समाते नर वीर सारे
सवेग तेरे जलते मुखों में ॥ २८ ॥
३७३ विश्व-रूप-दर्शनयोग

यथा प्रदीप्तं ज्वलनं पतंगा
विशन्ति नाशाय समृद्धवेगाः ।
तथैव नाशाय विशन्ति लोका-
स्तवापि वक्त्राणि समृद्धवेगाः ॥ २९ ॥
जलते पर्वत-दरीमें जैसे । पतंग-समूह पडते वैसे ।
समस्त लोक पडते वेगसे । इस मुखमें आज ॥ २५ ॥
प्राणिमात्र जो है इसमें जाता । उसका नाम भी नहीं रहता ।
जैसे सारा पानी है सोख लेता । तपा हुवा लोह ॥ २६ ॥
लेलिह्यसे ग्रसमानः समंता-
ल्लोकान्समग्रान्वदनैर्ज्वलद्भिः ।
तेजोभिरापूर्य जगत्समग्रं
भासस्तवोग्राः प्रतपंति विष्णो ॥ ३० ॥
तथा कर इतना आरोगन । नहीं होता तेरा क्षुधा-शमन ।
कैसा असामान्य यह दीपन । हुवा उदय ॥ २७ ॥
जैसे ज्वरसे उठा हुवा रोगी । या अकाल मुक्त भिक्षुक भोगी ।
वैसे तेरी जिव्हा है सदा लगी । चरनेमें ही । २८ ।
आहारका वैसे जो जो है नाम । आता तेरे निगलनेका काम ।
नहीं देखी ऐसी क्षुधा असीम । विस्मय जनक ॥ २९ ॥
उडते हुए ये जैसे पतंग
सवेग जाते जलते दियेपे ।
वैसे विनाशार्थ तेरे मुखोंमें
ये लोग सारे सवेग उड़ते ॥ २९ ॥
संसार सारा कर ग्रास होठ
तू चाटता है जलती जिभोंसे ।
लपेट सारा तव उग्र तेज
है तीन लोगोंको जला रहा जो ॥ ३० ॥
ज्ञानेश्वरी ३७४

सागरका जैसे आपोशन करना । तथा मेरु-पर्वतका कौर भरना ।
संपूर्ण ब्रह्मांड ही धरके चबाना । अपनी डाढोंसे ॥ ४३० ॥
सभी दिशाओंको निगल जाना । तारागण नभके चाट जाना ।
ऐसी सहज-लालसा धरना । यह है तेरा काम ॥ ३१ ॥
जैसे भोगसे है काम बढ़ता । ईंधनसे अग्नि धू धू करता ।
वैसे खा खा कर होठ चाटता । अधिक आशासे ॥ ३२ ॥
किया कैसा यह एक ही पसारा । जिह्वाग्रे रखा त्रिभुवन सारा ।
डाला है यह एक छोटासा कौर । वडवानलमें ॥ ३३ ॥
ऐसे हैं जो अगणित वदन । आर्थ कैसे इतने त्रिभुवन ।
इससे क्षुधा न होती सहन । बढती असह्य ॥ ३४ ॥
अजी ! है यह विश्व बेचारा । वदन-ज्वालामें पडा सारा ।
दावानलका पडा है घेरा । भेडों पर यहां ॥ ३५ ॥
विश्वका ऐसा हुआ अब । दैव कर्म नहीं आया तब ।
चराचर पर फैला सब । अकालका जाल ॥ ३६ ॥
विश्व-रूपका यह तेज-मंडल । बहुलियाका फैलाया हुआ जाल ।
मुख नहीं लाक्षाग्नि-ज्वाल । घेरता चराचरको ॥ ३७ ॥
जलाती कैसी अपनी दाहकता । इस बातको अग्नि नहीं जानता ।
किंतु जो जलता है वह जानता । नहीं बचते उसके प्राण ॥ ३८ ॥
अजी ! अपनी तीखी धारसे कैसे । न जानता शस्त्र-घात होता जैसे ।
अपना विनाश न जानता वैसे । हालाहल विष ॥ ३९ ॥
वैसे तुझको भी ज्ञात है नहीं । अपनी उग्रताकी बात सही ।
प्रत्येक मुखसे यहां हो रही । विनाश-लीला ॥ ४४० ॥
यदि तू है आत्मा एक । सकल विश्व-व्यापक ।
तब हमारा अंतक । हो आया कैसे ॥ ४१ ॥
छोडी मैंने जीवितकी आस । तू भी छोड दे संकोच खास ।
कह अपनी भानकी क्या खास । बात है आज ॥ ४२ ॥
३७५ विश्व-रूप-दर्शनयोग

अपनी उग्रताको क्यों बढ़ाता जाता । अपना ईशत्व तू क्यों नहीं स्मरता ।
विश्व संभालना यदि नहीं चाहता । मेरे लिये ही स्मर तू ॥ ४३ ॥
आख्याहि मे को भवानुग्ररूपो
नमोस्तु ते देववर प्रसीद ।
विज्ञातुमिच्छामि भवन्तमाद्यं
न हि प्रजानामि तव प्रवृत्तिम् ॥ ३१ ॥
तुम कौन हो प्रभो ! —
एक बार वेद-वेद्य । त्रिभुवनका तू आद्य ।
विनति है विश्व-वंद्य । सुन तू मेरी ॥ ४४ ॥
ऐसा कह वह वीर । चरणपे रख शिर ।
कहता है सर्वेश्वर । सुन तू विनय ॥ ४५ ॥
अपना करने समाधान । मांग विश्व-रूपका दर्शन ।
औ' एक कालमें त्रिभुवन । निगल उठा तू ॥ ४६ ॥
अजी ! कह तू तब है भी कौन । कहांसे पाये भीषण आनन ।
शस्त्र क्यों लिये इतने महान । चमकाये हैं जो ॥ ४७ ॥
तेरा रुद्र-क्रोध भडक कर । दिखाता गगनको ओछा कर ।
दिखाता है आंखें निकालकर । भयग्रस्त होता विश्व ॥ ४८ ॥
कृतांतसे क्यों इतनी होड़ । कर रहा क्यों तू ऐसा अड़ ।
कह तू मुझसे यह गूढ़ । बात जो देव ॥ ४९ ॥
सुन यह कहता अनंत । कौन तू यह पूछता पार्थ ।
औ' होता क्यों ऐसा वृद्धिगत । उग्रतासे ॥ ४५० ॥
हो कौन बोलो विकराळ रूपी
तुझे नमस्कार देवेश बोलो ।
पहचान चाहूँ देवादिदेव
जानी न जाती करती तुम्हारी ॥ ३१ ॥
ज्ञानेश्वरी ३७६

भगवान् उवाच
कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो
लोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्तः।
ऋतेऽपि त्वां न भविष्यन्ति सर्वे
येऽवस्थिताः प्रत्यनीकेषु योधाः ॥ ३२ ॥
मैं सबको संहारनेवाला काल हूं—
जान तू मैं सम्मुख हूं महाकाल। लोक-संहारार्थ बढ़ता कराल।
फैलाये हैं ये जो मुख विकराल। सबको निगलने ॥ ५१ ॥
सुनकर यह अकुलाता पार्थ। पहली बातसे मैं ही संकट-ग्रस्त।
विनय की थी तेरी मैंने अनंत। हुवा प्रकट तू काल ॥ ५२ ॥
इस पर बोलनेसे कठिन। यह निराश होगा यह जान।
सत्वर कहता देव अर्जुन। और एक बात ॥ ५३ ॥
सबका जो यह चला संहार। इसमें रहे पांडव बाहर।
सुनकर यह पांडु कुमार। संभालता प्राण ॥ ५४ ॥
मरण महा-भयसे हो मुक्त। सुनने लगा वह ध्यान-युक्त।
श्रीकृष्ण वचन हो अनुरक्त। धनंजय ॥ ५५ ॥
पांडव तुम मेरे आत्मीय जन। इसलिये तुम्हे छोड़के अर्जुन।
अन्य सबका करने निकंदन। हुवा उद्यत यहां ॥ ५६ ॥
वज्रानलमें जैसे प्रचंड। डालना जैसे नवनीतका पिंड।
मेरे मुखमें वैसे ब्रह्मांड। देखा तूने ॥ ५७ ॥
श्रीभगवानने कहा
मैं काल उठा जग-नाशकारी
संहारने सिद्ध यहां खड़ा हूँ।
तेरे बिना ये सब नष्ट होंगे
जो हैं खड़े सैनिक दोन ओर ॥ ३२ ॥
(48) ३७७ विश्व-रूप-दर्शनयोग

उसमें नहीं रहेगा कुछ शेष । जान तू होगा यह सब अ-दोष ।
सेनाकी चली है बकवास । व्यर्थकी जान तू ॥ ५८ ॥
बनाकर जो यह सैन्य मिलन । करते हैं विरावेशका गर्जन ।
देखते काल पर विजय स्वप्न । अपने गदा-दंडसे ॥ ५९ ॥
कहते सृष्टि पर सृष्टि करेंगे । प्रतिज्ञासे महाकालको जीतेंगे ।
तथा जगतका हम बनाएंगे । एक ही कौर ॥ ४६० ॥
जगतको हम निगलेंगे । आकाशको धर जलायेंगे ।
तीर पर हम नचायेंगे । विश्वका प्राण ॥ ६१ ॥
ऐसी यह चतुरंग संपदा । करती है महाकालसे स्पर्धा ।
अपने पराक्रमका है मद । करते व्यर्थका ॥ ६२ ॥
बोलते हैं तलवारसे भी तीखा । दीखते हैं आगसे भी दाहक ।
मारनेमें कालकूटसे भी अधिक । भयानक मानते ॥ ६३ ॥
किंतु ये सब गंधर्व-नगर माल । जान तू ये हैं गेडुरीके शोर पोल ।
अथवा सब हैं ये आलेखके फल । दीखते हैं बडे ॥ ६४ ॥
अथवा यह मृगजलमें महापूर । सेना नहीं वस्त्रके सांप बनाकर ।
रखा है यहां बंड सजधजाकर । धनंजय ॥ ६५ ॥
तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्व
जित्वा शत्रून्भुङ्क्ष्व राज्यं समृद्धम् ।
मयैवैते निहताः पूर्वमेव
निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन् ॥ ३३ ॥
यहां जो संचलित बल । मैंने ग्रास लिया सकल ।
अब चित्रके-से बेताल । निर्वीर्य हैं ये ॥ ६६ ॥
इनका जीवन सूत्र कबका टूट चुका है—
इसीलिये उठ पा ले तू कीर्ति
होके जयी राज्य समृद्ध भोग ।
मैंने हने हैं सब ही कभी के
निमित्त हो केवल सव्यसाची ॥ ३३ ॥
ज्ञानेश्वरी ३७८

टूटा सूत्र जो था नचानेवाला । गुड्डा खंभे पर नाचनेवाला ।
खींचते ही गिरेगा अलबेला । वैसे ही यहां ॥ ६७ ॥
नष्ट करने सैन्यका आकार । न लगेगा समय धनुर्धर ।
इसीलिये उठकर सत्वर । हो बुद्धिमान ॥ ६८ ॥
तूने जब गोग्रहणके समय । मोहनास्त्र छोड़ा तब धनंजय ।
भीरु उत्तरने भी होके निर्भय । विवस्त्र किया सबको ॥ ६९ ॥
हुए हैं आज ये उससे भी तेजोहीन । अनायास युद्ध चल आया स-सम्मान ।
पा लो यश जीत कर शत्रुको अर्जुन । अकेला लडके ॥ ४७० ॥
तना नहीं है यहां कोरा यश । होगा सकल राज्य वैभव तेरे वश ।
मुझसे मारे ये पहले ही अब शेष । निमित्त हो सव्यसाची ॥ ७१ ॥
द्रोणं च भीष्मं च जयद्रथं च
कर्णं तथान्यानपि योधवीरान् ।
मया हतांस्त्वं जहि मा व्यथिष्ठा ।
युध्यस्व जेतासि रणे सपत्नान् ॥ ३४ ॥
दोनों सेनाओंमें केवल पांडव ही बचेंगे—
द्रोणकी परवाह न कर । भीष्मका भय भी तू न धर ।
न सोच तू कैसे कर्ण पर । पाऊं विजय ॥ ७२ ॥
कौन उपाय जयद्रथ पर । करना उसकी चिंता न कर ।
तथा यहां हैं जो जो महावीर । प्रसिद्ध महारथी ॥ ७३ ॥
ये एक एक तू अर्जुन । चित्रके ही सिंह मान ।
गीले हाथ लीप लोपन । करना इनका ॥ ७४ ॥
ये द्रोण ये भीष्म जयद्रथादि
या कर्ण या अन्य महान योद्धा ।
मैंने हने जो उनको तु मार
निःशंक जूझो जय मान तेरी ॥ ३४ ॥
३७९ विश्व रूप-दर्शनयोग

इस पर क्या रहा है अर्जुन । दीखती यह युद्धकी सेना ।
भास मात्र है बल-तेज-हीन । किया मैंने पहले ही ॥ ७५ ॥
यहां तूने देख लिया सब । मेरे मुख सुन लिया अब ।
तभी जीवन मिटा है अब । रहा भूसा ॥ ७६ ॥
अब तू ऊठ धनुर्धर । मेरे मारे हुओंको मार ।
व्यर्थका ही शोक न कर । अब तू यहां ॥ ७७ ॥
जैसे कहीं एक निशान करना । स-कौतुक उसपे तीर चलाना ।
इसी भांति यहां देख तू अर्जुन । निमित्त मात्र है ॥ ७८ ॥
अजी ! तेरे विरुद्ध जो भया । उसे कभीका शेर खा गया ।
अभी विजय काल है आया । यशको लूट ले ॥ ७९ ॥
साभिमान फूले थे जो दायाद । तथा हुए थे विश्व-दुर्मद ।
किया उनका अनायास वध । धनंजयने ॥ ४८० ॥
ऐसी यह विजय गाथा । गायेगी वांग्मय-सरिता ।
लिखो अब इसको पार्थ । विश्व-पट पर ॥ ८१ ॥
सञ्जय उवाच
एतच्छ्रुत्वा वचनं केशवस्य
कृताञ्जलिर्वेपमानः किरीटी ।
नमस्कृत्वा भूय एवाह कृष्णं
सगद्गदं भीतभीतः प्रणम्य ॥ ३५ ॥
ऐसी जो यह अपूर्व कथा । जिसका अपूर्ण मनोरथ ।
कहता संजय कुरुनाथ । कहे ज्ञानदेव ॥ ८२ ॥
संजयने कहा
श्रीकृष्णसे यों सुनके किरीटी
जो हाथ जोडे भयभीत होके ।
कर वंदना यों पुनश्च बोले
नमा हुवा गद्गद भावपूर्ण ॥ ३५ ॥
ज्ञानेश्वरी ३८०

सत्य-लोकका तब गंगा जल । खुलता जैसे कर कल-कल ।
वैसी खुली है वाग्धारा विशाल । बोलनेमें ॥ ८३ ॥
या जैसे महामेघका गर्जन । होते हैं एक कालमें गूंजन ।
या करें क्षीर-सागर मंथन । करता मंदराचल ॥ ८४ ॥
ऐसा गंभीर महा-नाद । कर ये वाक्य विश्व कंद ।
बोला है जो वह अगाध । अनंत रूप ॥ ८५ ॥
सुनी ये बात अर्जुनने किंचित । सुखाया भयावेग बहुत ।
न जाने सुख या भयसे हे पार्थ । कांपने लगा ॥ ८६ ॥
बोलनेमें भर आय कंठ । सहज जुडे कर संपुट ।
पुनः पुनः रखता ललाट । चरणों पर जो ॥ ८७ ॥
तथा कुछ भी नहीं बोला जाता । बोलनेमें वह गद्गद् होता ।
सुख या भयसे नहीं जानता । आप ही करें निर्णय ॥ ८८ ॥
किंतु सुना मैने देवकी बात । ऐसा कैसा हुवा है यह पार्थ ।
मैंने शब्द पर किया है अर्थ । श्लोकके यहां ॥ ८९ ॥
वैसे ही भय भीत जो अर्जुन । करता हरि पादमें वंदन ।
तथा करता है वह कथन । इस भांतिसे ॥ ९० ॥
अर्जुन उवाच
'स्थाने हृषीकेश तव प्रकीर्त्या
जगत्प्रहृष्यत्यनुरज्यते च ।
रक्षांसि भीतानि दिशो द्रवन्ति
सर्वे नमस्यंति च सिद्धसंघाः ॥ ३६ ॥
अर्जुनने कहा
है योग्य जो कीर्तनसे तुम्हारे
संसार आनंद औ' प्रेम पाता ।
डरे हुए राक्षस भागते हैं
औ' पूजता सिद्ध समूह सारा ॥ ३६ ॥
३८१ विश्व-रूप-दर्शनयोग

अर्जुनका किया हुवा विराट स्तवन --
अर्जुन सुन मैं हूं काल । निगलना है मेरा खेल ।
श्रीकृष्ण तेरे यह बोल । मैं मानता हूं ॥ ९१ ॥
किंतु तू है जो महाकाल । आज विश्व-स्थितिका वेळ ।
तब क्यों संहारका खेल । यह जानता नहीं ॥ ९२ ॥
कैसे शरीरका तारुण्य तोडना । तथा कैसे वहां वार्धक्य है लाना ।
ऐसे सोचकर करनेसे न होना । स्वाभाविक है ॥ ९३ ॥
जब चार प्रहर नहीं होता । किसी भी समय क्या है अनंता ।
माध्यान्ह समय क्यों जो सविता । अस्त होगा क्या ? ॥ ९४ ॥
तू है अखंडित काल । तुझे भी है तीन वेळ ।
वे भी हैं अति सबल । अपने समयमें ॥ ९५ ॥
होने लगती जब उत्पत्ति । तब लय स्थिति जो भूलती ।
जब लय स्थिति बन आती । न उत्पत्ति प्रलय ॥ ९६ ॥
आता है जब प्रलयका वेळ । उत्पत्ति स्थितिका है अस्त काल ।
इसे टाळ न सकता है काल । जो अनादि सिद्ध ॥ ९७ ॥
आज स्थिति-कालमें है यह जग । भोगके बहारमें करता भोग ।
अब तू निगल सकता है जग । ऐसा जँचता नहीं ॥ ९८ ॥
तब संकेतसे कहता बोल । आया है इस सेनाका ही काल ।
दिखाया यह प्रत्यक्ष सकल । तुझको अभी ॥ ९९ ॥
अर्जुनकी क्षमा याचना --
पाया जब यह संकेत । देखता तब सब पार्थ ।
संपूर्ण रूपसे जगत । स्वाभाविक है ॥ ५०० ॥
तब कहता है वह अर्जुन । सूत्रधार तू रूपका महान ।
आया है पूर्व स्थितिमें संपूर्ण । सभी यह विश्व ॥ १ ॥
अजी ! दुःख सागरमें जो पडता । उनको जिस भांति तू उभारता ।
स्मरण्गा मैं सदा यह कीर्ति-कथा । श्रीकृष्ण तेरी ॥ २ ॥
ज्ञानेश्वरी ३८२

इस कीर्ति-स्मरणसे सदैव । भोगते महा-सुखका वैभव ।
हर्षामृत उर्मिपर स-भाव । डुलते जाते ॥ ३ ॥
अजी ! जीनेसे है यह जग । तुझसे करता अनुराग ।
तथा करनेसे दुष्ट-भंग । अधिकाधिक ॥ ४ ॥
किंतु त्रिभुवनके राक्षस । भय खाते तेरा हृषीकेश ।
तथा भागते हैं दिशा दस । अमर्याद ॥ ५ ॥
और ये सुर सिद्ध किन्नर । अथवा सभी सचराचर ।
देख तुझको है नमस्कार । करते सहर्ष ॥ ६ ॥
कस्माच्च ते न नमेरन्महात्मन्
गरीयसे ब्रह्मणोऽप्यादिकर्त्रे ।
अनंत देवेश जगन्निवास
त्वमक्षरं सदसत्तत्परं यत् ॥ ३७ ॥
अजी ! यहां किस कारण । राक्षस ये जो नारायण ।
न झुकते तव चरण । भागते सदैव ॥ ७ ॥
और यह तुझको क्या पूछना । इतना तो हमको भी जानना ।
सूर्योदय बाद कैसे रहना । अंधःकारका साध्य ॥ ८ ॥
तू है स्वयं-प्रकाशका आगर । और हुवा है अब जो गोचर ।
तभी निशाचरोंका है अंधार । मिटा सहज ॥ ९ ॥
अब तक जो थे हम जन । न जानते थे तेरी महान ।
महिमा उसका हुवा ज्ञान । इसी समय ॥ ५१० ॥
प्रभो न क्यों ये तुझको नमेंगे
आधार तू ब्रह्मका आदि-कर्ता
अनंत देवेश जगन्निवास
है या नहीं के पर है परेश ॥ ३७ ॥
३८३ विश्व-रूप-दर्शनयोग

जहांसे विविध सृष्टि-माळ । फैलती भूत-ग्रामकी बेळ ।
ब्रह्म जो तेरी इच्छाका फळ । प्रसवता है ॥ ११ ॥
देव ! निःसीमत्व सर्वोदित । देव ! निःसीममें गुण अनंत ।
देव ! निःसीमागम्य सतत । देवेंद्र देवका ॥ १२ ॥
तू है जगत्त्रयका जो आश्रय । अक्षर सदाशिव है निश्चय ।
तू ही सत-असतका प्रश्रय । उससे परेका ॥ १३ ॥
त्वमादिदेवः पुरुषः पुराण
स्त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम् ।
वेत्तासि वेद्यं च परं च धाम
त्वया ततं विश्वमनंत रूप ॥ ३८ ॥
प्रकृति पुरुषका तू आदि । तू ही महत्तत्वकी अवधी ।
स्वयं तू है जो आदि अनादि । पुरातन पुराण ॥ १४ ॥
तू सकळ विश्वका जीवन । जीव मात्रका तू ही निधान ।
भूत और भविष्यका ज्ञान । तेरे ही करमें ॥ १५ ॥
श्रुतिका तू है लोचन । स्वरूप सुख अभिन्न ।
त्रिभुवन आयतन- । का आयतन तू ॥ १६ ॥
इसीलिये तू परम । तू ही रहा महा धाम ।
कल्पांतमें महद्ब्रह्म । तुझमें विलीन ॥ १७ ॥
वास्तवमें तू ही है देव । विश्व विस्तारता सदैव ।
अनंत रूप देवदेव । अवर्णनीय ॥ १८ ॥
देवादि तू, देव पुराण आत्मा
संसारका अंतिम आसरा तू ।
तू जानता है तुझ मोक्ष-धाम
विस्तारिता विश्व अनंत रूप ॥ ३८ ॥
ज्ञानेश्वरी ३८४

वायुर्यमोऽग्निर्वरुणः शशांकः
प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च ।
नमो नमस्तेऽस्तु सहस्रकृत्वः
पुनश्च भूयोऽपि नमो नमस्ते ॥ ३९ ॥
नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते
नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व ।
अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वं
सर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः ॥ ४० ॥
एक तू क्या नहीं है देव । तथा कहां नहीं तू देव ।
जहां जैसे ही तू है देव । नमस्कार मेरा ॥ १९ ॥
वायु है तू अनंत । यम तू नियमित ।
भूतमात्रमें नित । बसता तू अग्नि ॥ ५२० ॥
वरुण और तू सोम । सृष्टा तथा तू है ब्रह्म ।
पितामहका परम । आदि जनक तू ॥ २१ ॥
और जहां जो जो कुछ है । रूप है अथवा नहीं है ।
नमन जहां जैसा भी है । जगन्नाथ तुझको ॥ २२ ॥
तू अग्नि तू वायु समस्त देव
प्रजापते ब्रह्म-पिता सु-श्रेष्ठ ।
तुझे नमस्कार सहस्र बार
पुनः पुनः और पुनः पुनः है ॥ ३९ ॥
आगे कि पीछे सब ओर देव
सदा नमस्कार जहां जहां तू ।
उत्साह सामर्थ्य अनंत तेरा
सभी बना तू तुझमें सभी है ॥ ४० ॥
(49) ३८५ विश्व-रूप-दर्शनयोग

ऐसा हो सानुराग चित्त । स्तुति करता पांडुसुत ।
आगे पीछे नमन नित । कहता नमस्ते ॥ २३ ॥
पुनः देखता साद्यंत । श्रीमूर्त्ति जो है सतत ।
तथा कहता है पार्थ । नमस्ते देव ॥ २४ ॥
देख देख कर सतत । प्रसन्न होता पार्थ-चित्त ।
कहता है वह हो नत । नमस्कार देव ॥ २५ ॥
यहां चराचरमें समस्त । देखता उसीको अखंडित ।
तथा करता है प्रणिपात । नमस्कार देव ॥ २६ ।
वह रूप ऐसा अद्भुत । आश्चर्य स्फूर्त जो अनंत ।
पुनः पुनः कहता पार्थ । नमस्कार देव ॥ २७ ॥
अन्य स्तवन न सूझता । शांत रहना भी न होता ।
ऐसा प्रेम भाव जगता । कहता नमस्कार ॥ २८ ॥
वास्तवमें ऐसा ही बार बार । नमन करता सहस्र बार ।
फिर कहता है श्री चक्रधर । प्रणाम तेरे सम्मुख ॥ २९ ॥
देवका पेट पीठ है नहीं । इससे हमें लाभ भी नहीं ।
फिर भी तेरी पीठको सही । नमस्कार स्वामी ॥ ५३० ॥
रहा है तू मेरे पीछेसे । तभी पीछे कहता तुझसे ।
सम्मुख विमुख विश्वसे । होता नहीं तेरा ॥ ३१ ॥
भिन्न भिन्न अब अवयव । नहीं जान सकता मैं देव ।
तभी नमन तुझको सर्व- । सर्वात्मक स्वामी ॥ ३२ ॥
देव ! तू अनंत बल-धाम । नमन है अमित विक्रम ।
सकल काल सर्वत्र सम । सर्वेश देव ॥ ३३ ॥
अजी ! संपूर्ण अवकाशमें जैसे । आकाश ही आकाश रहता ऐसे ।
सर्वत्वमें तू सर्व-व्यापी है वैसे । हुआ सर्व-सर्व ॥ ३४ ॥
अथवा तू है केवल । सब ही सब अखिल ।
क्षीरार्णवमें कल्लोल । क्षीरका जैसे ॥ ३५ ॥
ज्ञानेश्वरी ३८६

इसीलिये हे देव । भिन्न नहीं तू सर्व ।
हुआ है अनुभव । सर्व सर्व तू है ॥ ३६ ॥
सखेति मत्वा प्रसभं यदुक्तं
हे कृष्ण हे यादव हे सखेति ।
अजानता महिमानं तवेदं
मया प्रमादात्प्रणयेन वापि ॥ ४१ ॥
किंतु तू है ऐसा महान । हमें नहीं इसका भान ।
या तुझे आप्त ही मान । किया बर्ताव ॥ ३७ ॥
हुई यह बड़ी अनुचित बात । लिया मैंने संमार्जनमें अमृत ।
कामधेनु देकर किया स्वीकृत । गर्दभ-शावक ॥ ३८ ॥
चट्टान मिला था हमको पारसका । तोड़के आधार बनाया मकानका ।
औ' काटकर बनाया सुर-तरुका । खोंडा बगियामें ॥ ३९ ॥
हाथ लगी थी चिंतामणिकी खान । किया जो गोरु हांकनेका साधन ।
वैसे तेरी समीपताके कारण । खोया महत्व ॥ ५४० ॥
यह क्या युद्ध तथा इसका मूल्य । परंतु है तू परब्रह्म अमूल्य ।
फिर भी आज दिया है तुझे कार्य । सारथी बनाके ॥ ४१ ॥
उन कौरवोंके घर । शिष्टाईमें चक्रधर ।
बेचा है तू सर्वेश्वर । सामान्य बातमें ॥ ४२ ॥
योगियोंका तू समाधिसुख । यह नहीं जानता मैं मूर्ख ।
तेरा उपरोध मैं सन्मुख । तुझसे ही करता ॥ ४३ ॥
समान माना अविनीत होके
हे कृष्ण हे यादव हे सखा जो ।
न जानके ये महिमा तिहारी
प्रमाद् या प्रेमसे ही पुकारा ॥ ४१ ॥
३८७ विश्व-रूप-दर्शनयोग

यच्चावहासार्थमसत्कृतोऽसि
विहारशय्यासनभोजनेषु ।
एकोऽथवाप्यच्युत तत्समक्षं
तत्क्षामये त्वामहमप्रमेयम् ॥ ४२ ॥
हे आदि अनादि पुरुष ! तुझसे हंसी-विनोद किया क्षमा कर —
इस विश्वका तू अनादिमूल । जहां जब मिला हंसीके बोल ।
बोला सगाईके नाते केवल । विनोदसे बहु ॥ ४४ ॥
आते थे हम जब तेरे सदन । पाते थे तुझसे ही बहु सम्मान ।
तो भी अति लगावसे जनार्दन । बैठते थे रूठके ॥ ४५ ॥
समझाना हमारे पांव छूकर । तुझसे है इस भांति चक्रधर ।
बैठते जैसे हटके रूठ कर । ऐसे किया बहुत ॥ ४६ ॥
आत्मीय-जन भावके नाते । उलटे हो हम थे बैठते ।
ऐसे प्रकार किसे सोहते । भूल हुयी स्वामी ॥ ४७ ॥
अरे ! कलावाजी कर देवसे । आखाडेमें भिडते थे मस्तीसे ।
सतरंजमें आ अति-क्रोधसे । लड़ते थे देव ॥ ४८ ॥
जो चाहा जो तुझसे मांगना । तुझको ही उपदेश करना ।
“तुझसे क्या हमारा ! ” भी बोलना । हमारी उदंडता ॥ ४९ ॥
ऐसे हैं हमारे अनंत अपराध । त्रिलोकमें नहीं समाते अगाध ।
तेरे चरण छू लेता कर सौगंध । था यह सब अज्ञानसे ॥ ५५० ॥
भोजनके समय देव । रखते स्मरण सदैव ।
किंतु मूर्ख मैं जो सगर्व । अडके बैठता ॥ ५१ ॥
खेला फिरा साथ जीमा कि सोया
एकांतमें या सबके समक्ष ।
तथा हंसी की तुझ तुच्छ माना
क्षमा करो भान तेरा किसे है ॥ ४२ ॥
ज्ञानेश्वरी ३८८

जाके देवके अंतरगृहमें । खेलते शंका न लाता मनमें ।
इतना क्या लुढ़कता शैय्यामें । साथ ही देष ॥ ५२ ॥
कृष्ण कहके ही पुकारता । यादव कह तुझे देखता ।
अपनी सौगंध भी खिलाता । जाते हुए तुझे ॥ ५३ ॥
एकासन पर देव ! बैठना । सदैव तेरी अवज्ञा करना ।
अति-स्नेहसे ऐसा बरतना । हुवा देव ॥ ५४ ॥
इसीलिये यह क्या क्या सब । कहूं मैं स्वामी तुझसे अब ।
मैं हूं अपराध ढेर सब । रहा अनंत ॥ ५५ ॥
प्रभो तेरे संन्मुख या विमुख । की हैं भली बुरी बाते अनेक ।
मां जैसे निभाती है शिशुकी चूक । वैसे निभा लेना मुझे ॥ ५६ ॥
जब कभी ले आती है सरिता । गंदा पानीका प्रवाह बहता ।
तब कैसे सागर समा लेता । उलघास नहीं अन्य ॥ ५७ ॥
वैसे प्रीति या स-प्रमाद । मुझसे हुआ जो विरोध ।
या बोला कुछ भी मुकुंद । उपहासकी बात ॥ ५८ ॥
तथा देवके क्षमत्वसे क्षमा । आधार है जो सब भूत-ग्राम ।
इसीलिए हे श्री पुरुषोत्तम । तुझसे मांगता अल्प ॥ ५९ ॥
तभी कर तू अप्रमेय । शरणागत धनंजय ।
जिसे तूने अपना लिया । क्षमा कर अपराध ॥ ५६० ॥
पितासि लोकस्य चराचरस्य
त्वमस्य पूज्यश्च गुरुर्गरीयान् ।
न त्वत्समोऽस्त्यभ्यधिकः कुतोऽन्यो
लोकत्रयेऽप्यप्रतिमप्रभाव ॥ ४३ ॥
तू है पिता स्थावर जंगमोंका
तू है बड़ा ही गुरु पूजनीय ।
त्रिलोकमें ना तुझ तुल्य कोई
कहांसे आवे अनुपमप्रभावी ॥ ४३ ॥
३८९
विश्व-रूप-दर्शनयोग

मुझे हुआ अब इसका ज्ञान । आता देवकी महिमा महान् ।
देव है यहां उत्पत्ति स्थान । चराचरका सब ॥ ६१ ॥
हरिहरादि जो है समस्त । उनका तू परम दैवत ।
वेदोंका भी है जो ज्ञानदात । तू ही आदि-गुरु ॥ ६२ ॥
गंभीर है तू श्रीराम । विविध भूतैक सम ।
सकल गुण अप्रतिम । अद्वितीय ॥ ६३ ॥
कोई नहीं है तेरे समान । यह कहनेका क्या कारण ।
तुझसे ही हुआ है गगन । उसमें समाया विश्व ॥ ६४ ॥
ऐसे तेरे समान है अन्य कोई । कहनेमें वाणी अत्यंत लजाई ।
वहां अधिककी क्या बात आई । कहनेकी देव ॥ ६५ ॥
इसीलिये त्रिभुवनमें तू एक । कोई नहीं तुझसे अधिक ।
तेरा महिमा ही ऐसे अलौकिक । नहीं होता बखान ॥ ६६ ॥
तस्मात्प्रणम्य प्रणिधाय कायं
प्रसादये त्वामहमीशमीड्यम् ।
पितेव पुत्रस्य सखेव सख्युः
प्रियः प्रियायार्हसि देव सोढुम् ॥ ४४ ॥
ऐसे कह कर जो अर्जुन । करता दंडवत नमन ।
आया सात्विकताका उफान । लहराकर ॥ ६७ ॥
कहता तब प्रसीद प्रसीद । वाचा होती है अतीव गद्गद् ।
उभार ले तू मुझे अपराध- । सागरसे देव ॥ ६८ ॥
विश्व-सुहृदको सगा मान । नहीं किया उचित सन्मान ।
तुझ ईश्वरमें सा-भिमान । किया प्रभुत्व ॥ ६९ ॥
इसीलिये मैं करता प्रणाम
प्रसन्न हो तू स्तवनीय देव ।
क्षमा करो जी मुझ पुत्र मान
सखा सखाको प्रिय ज्यों प्रियाको ॥ ४४ ॥
ज्ञानेश्वरी. ३९०