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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

इन दोनोंके विषयोंका जब । पिता-पुत्रका संबंध-सा सब ।
कर्तव्य मान निभाते हैं तब । बद्ध न होता कर्म ॥ ६ ॥
अजी ! यह है त्याग तरुवर । मोक्ष फल देता है धनुर्धर ।
सात्विक ऐसे हैं जो मशहूर । विश्वमें सब ॥ ७ ॥
जलकर बीज जैसे । होता है निर्वंश वैसे ।
फल तज कर्म वैसे । तजा मान ॥ ८ ॥
पारसका स्पर्श जब होता । लोहका जंग मल मिटता ।
चित्तका रज-तम मिटता । सत्वसे ऐसे ॥ ९ ॥
फिर वह शुद्ध सत्व-गुण । खोलता आत्म-बोध नयन ।
मृग-जल त्रास जो अर्जुन । मिटता सांझमें जैसे ॥ २१० ॥
बुद्धि आदिके सम्मुख जैसे । रहता है विश्वाभास वैसे ।
न देख सकेंगे कोई जैसे । कभी गगन ॥ ११ ॥
न द्वेष्ट्यकुशलं कर्म कुशले नानुषज्जते ।
त्यागी सत्वसमाविष्टो मेधावी छिन्नसंशयः ॥ १० ॥
समदृष्टिसे कर्म करना—
आदि यदि प्रारब्ध बलसे । शुभ अशुभ कर्म जो वैसे ।
लय होते आकाशमें जैसे । बादल सारे ॥ १२ ॥
सदा जैसे उसकी दृष्टिसे । कर्म होते ब्रह्म-रूप वैसे ।
इसी लिये है सुख-दुःखसे । होता अछूता ॥ १३ ॥
जिसे शुभ-कर्म जानता । उसको हर्षसे करता ।
जिसको अशुभ मानता । उससे नहीं द्वेष ॥ १४ ॥
इस विषयमें उसको कहीं । संदेहका कभी काम भी नहीं ।
जैसे स्वप्नका सुख दुःख नहीं । जगने पर ॥ १५ ॥
शुभ अशुभ कर्मोंसे न रखे राग-द्वेष जो ।
सत्वमें जो पगा त्यागी ज्ञानसे छेद संशय ॥ १० ॥
७२९ सार्थ गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद योग

इस लिये कर्म और कर्ता । इस द्वैत-भावकी जो वार्ता ।
न जानता वह पांडुसुता । सात्विक त्याग ॥ १६ ॥
इस भांति वह कर्म-पार्था । तजे तो छूट जाते सर्वथा ।
अधिक बांधते है अन्यथा । तजे तो कर्म ॥ १७ ॥
न हि देहभृता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषतः ।
यस्तु कर्मफलत्यागी स त्यागीत्यभिधीयते ॥ ११ ॥
देह-धारीको कर्म अनिवार्य है—
वैसे ही जो पांडुकुमार । देहकी मूर्ति बनकर ।
रहता कर्मसे ऊबकर । वह है अनाडी ॥ १८ ॥
उकताकर मृत्तिकासे । रहेगा कहो घडा कैसे ।
तथा कपडा तंतुओंसे । कैसे रहे दूर ॥ १९ ॥
जैसे अग्नि अपनी उष्णता । त्यजेगा कैसे कह तू पार्थ ।
अथवा कैसे करेगी जोत । प्रकाशसे द्वेष ॥ २२० ॥
द्वेष कर अपनी उग्रतासे । सुगंध लायेगा हींग कहांसे ।
अथवा द्रवत्व छोड़के कैसे । रहेगा पानी ॥ २१ ॥
वैसे लेकर शरीरका आकार । करता रहता है सभी व्यवहार ।
तब कैसे है उन्माद धनुर्धर । कर्म-त्यागका ॥ २२ ॥
अपना लगाया हुवा तिलक । पुनः पुनः पोंछते स-कौतुक ।
किंतु निकालकर क्या मस्तक । लगा सकते हैं ॥ २३ ॥
वैसे विहित जो स्वयं स्वीकृत । सहज तज सकते हैं पार्थ ।
किंतु जो देह बन आया साथ । वह कर्म तजे कैसे ॥ २४ ॥
चलता जो श्वासोच्छ्वास । नींदमें भी रात-दिवस ।
न करना सा अहर्निश । चलता कर्म ॥ २५ ॥
अशक्य देहधारीको सर्वथा कर्म छोडना ।
इसीलिये फल-त्यागी त्यागी वह कहा गया ॥ ११ ॥
ज्ञानेश्वरी ७३०

An exact transcription of the page in Devanagari script:

इस शरीरके निमित्त । लगा जो कर्म सतत ।
तन हो जीवित या मृत । न छूटेगा कभी ॥ २६ ॥
इस कर्म-त्यागका प्रकार । एक ही है यहां धनुर्धर ।
न बनो फलाशाका आहार । कर्ममें कभी ॥ २७ ॥
कर्म-फल करो ईश्वरार्पण । तत्प्रसादसे बोध उद्दीपन ।
तब हो रज्जु-ज्ञान विलोपन । व्याल-शंका ॥ २८ ॥
इस भांति आत्म-बोधसे पार्थ । अविद्या सह कर्म-नाश होता ।
तथा ऐसा त्याग जो कहलाता । कर्म-त्याग ॥ २९ ॥
तभी जो इस प्रकार त्याग करता । उसको मैं सही कर्म-त्यागी मानता ।
रोगमें मूर्छाको विश्रांति कहा जाता । वैसे हैं अन्य त्याग ॥ २३० ॥
ऐसे एक कर्ममें जो थकता । दूसरेमें जा विश्रांति खोजता ।
तथा झांपड पर जो है खाता । सोटोंकी मार ॥ ३१ ॥
रहने दे यह वाग्विस्तार । त्रिलोकमें त्यागी है धनुर्धर ।
फल-त्यागसे है निष्कृती पर । ले जाता कर्म ॥ ३२ ॥
अनिष्टमिष्टं मिश्रं च त्रिविधं कर्मणः फलम् ।
भवत्यत्यागिनां प्रेत्य न तु संन्यासिनां क्वचित् ॥ १२ ॥
वैसे तो सुन यह धनंजय । त्रिविध कर्म-फल कहा गया ।
समर्थ वही है जान निश्चय । न छोडते फलाशा ॥ ३३ ॥
तीन प्रकारके कर्म-फल-
जन्म देकरके आप दुहिता । "इदं न मम" कह माता पिता ।
छूट जाते दान लेके फंसता । दामाद आप ॥ ३४ ॥
बोकर जैसे विषका खेत । सुखसे लाभ लेते हैं पार्थ ।
किंतु खर्च कर होते मृत । उसको खाकर ॥ ३५ ॥
तेहरा फल कर्मोंका मधुर कटु मिश्रित ।
उससे मुक्त संन्यासी पाते हैं त्याग-हीन जो ॥ १२ ॥
७३१ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद योग

वैसे अकर्ता मान कर्म करता । कर्ता मान जो फलाशा न धरता
उन दोनोंको बांध न सकता । केवल कर्म ॥ ३६ ॥
पकता पेड जो राह पर । उसके फलकी आशा कर ।
सदा कर्मका भी धनुर्धर । फल बांधता है ॥ ३७ ॥
किंतु करके फलाशा तजता । जगतके कार्यमें न घुसता ।
त्रिविध विश्व यह जो पूर्णता । कर्म फल है ॥ ३८ ॥
देव मानव और स्थावर । इसका नाम जगदंबर ।
ऐसे ही हैं ये तीन प्रकार । कर्म फलके ॥ ३९ ॥
एक है वही अनिष्ट । एक है जो केवल इष्ट ।
तथा एक है जो इष्टानिष्ट । त्रिविध ऐसे ॥ २४० ॥
किंतु बुद्धि बन विषयासक्त । स्वैराचारमें होकर अभ्यस्त ।
निषिद्ध कर्ममें होते प्रवृत्त । दुर्व्यवहारमें ॥ ४१ ॥
वहां है कृमिकीट लोष्ट । देह पाते हैं जो निकृष्ट ।
उसका नाम है अनिष्ट । कर्मका फल ॥ ४२ ॥
या स्वधर्मको मान देकर । अपने अधिकारानुसार ।
सुकृत करते धनुर्धर । वेदाज्ञासे ॥ ४३ ॥
देवोंके वे इंद्रादिक । देह पाते हैं अति नेक ।
कर्म-फल इष्टमें देख । उसकी प्रसिद्धी ॥ ४४ ॥
किंतु खटा मीठा मिलकर । होता है विशिष्ट रसांतर ।
स्वादमें दोनोंसे रुचिकर । होता भिन्न ही ॥ ४५ ॥
रेचक ही होके योग-वश । करता है स्तंभनका दोष ।
वैसे सत्यासत्य समस्त । जीतता असत्य ॥ ४६ ॥
सम-भागसे है शुभाशुभ । होके खड़ा अनुष्ठान भाग ।
उससे जो मनुष्यत्व-लाभ । मिश्र फल है ॥ ४७ ॥
ज्ञानेश्वरी ७३२

इस कर्म-फलसे बद्ध और मुक्तता—
ऐसे इसके त्रिविध भागमें । कर्म-फल रचा जगतमें ।
फंसे हैं जो भोगकी आशामें । उससे वे हैं बद्ध ॥ ४८ ॥
जिव्हा-चापल्य जैसे बढ़ता । वैसे भोजन मीठा लगता ।
अंतमें जो फल निकलता । रोगसे मृत्यु ॥ ४९ ॥
चोर-मैत्री तब तक भली । जब न आती एकांत-स्थली ।
वैसे होती है वेश्या भी भली । न होता स्पर्श ॥ २५० ॥
जब तक करता कर्म शरीर । मिलता जाता सन्मान धनुर्धर ।
मृत्यु समयमें घिरते आकर । कर्मके फल ॥ ५१ ॥
समर्थ होता जो महाजन । द्वारपे बैठ ले जाता धन ।
वैसे ही कर्म-फल अर्जुन । भोगने पड़ते ॥ ५२ ॥
भुट्टेसे जैसे धान झड़ता । उसी धानसे भुट्टा लगता ।
फिर भुट्टेसे धान गिरता । उससे फिर भुट्टा ॥ ५३ ॥
वैसे जो भोगसे कर्म होता । उस कर्ममें भोग लगता ।
पैर पैरको जीतता जाता । चलनेमें जैसे ॥ ५४ ॥
नांव रुकती उतार देखकर । होता वह उसका उरला तीर ।
वैसे है कर्म-फलसे धनुर्धर । नहीं है मुक्ति ॥ ५५ ॥
साध्य-साधन प्रकार फिर । करता फल-भोग प्रसार ।
ऐसे ही उलझाता संसार । अत्यागीको ॥ ५६ ॥
चमेली पुष्पका जैसे खिलना । उसका नाम ही है सूख जाना ।
वैसे फलाशासे नहीं करना । किया है ऐसे ॥ ५७ ॥
बीजका धान्य ही जब खाया जाता । किसानीका काम ही है रुकता ।
वैसे फल-त्यागसे है मिटता । कर्मका फल ॥ ५८ ॥
तब सत्व-शुद्धिके सहायसे । गुरु-कृपामृतके तुषारोंसे ।
उतरता खिले हुए बोधसे । द्वैतदैन्य ॥ ५९ ॥
तब है जगदाभासके कारण । मिटता है त्रिविध फल स्फुरण ।
वैसे ही भोक्ता-भोग्य सहज मान । होता है अस्त ॥ २६० ॥
७३३ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग

संन्याससे मूल अविद्या रहती ही नहीं—
सधता ज्ञान-प्रधान ऐसा । जिसका संन्यास है वीरेशा ।
फल-भोगके कष्टसे जैसा । होता है मुक्त ॥ ६१ ॥
तथा संन्यासमें है एक बात । आत्म-रूपमें दृष्टि होती रत ।
वहां कर्म दूसरा ऐसे पार्थ । दीखेगा कैसे ॥ ६२ ॥
ढह जाती है सब सारी दीवार । मिटते चित्र माटीमें मिलकर
वैसे ही नहीं रहता है अंधार । उदय होते ही ॥ ६३ ॥
न रही रूपकी काया जब । कहांसे दीखेगी छाया तब ।
कहांसे दिखेगा प्रतिबिंब । दर्पण ही नहीं ॥ ६४ ॥
जहां नहीं निद्राको ही स्थान । आयेगा वहां कहांसे स्वप्न ।
फिर कैसे कहे कहो कौन । स्वप्न मिथ्या या सत्य ॥ ६५ ॥
उसी भांति संन्यासमें यहां । मूल अविद्या न रही जहां ।
उसका व्यापार रहा कहां । तथा करे कौन ॥ ६६ ॥
तभी इस संन्यासमें एक । कर्मकी बात कैसी है देख ।
किंतु अविद्या देहमें एक । रहती है जो ॥ ६७ ॥
कर्तृत्वके बल पर पार्थ । आत्मा होती शुभाशुभमें प्रवृत्त ।
तथा दृष्टि-भेदके स्थानपे स्थित । रहती है वह ॥ ६८ ॥
होता जैसे पूर्व पश्चिम । वैसे है आत्मा और कर्म ।
ऐसी भिन्नता है सुवर्म । जान तू यह ॥ ६९ ॥
अथवा नभ और बादल । तथा सूर्य और मृगजल ।
पृथ्वी और वायुमें निर्मल । होती है भिन्नता ॥ २७० ॥
ओढकर नदीका नीर । बैठता नदीमें पत्थर ।
उन दोनोंमें धनुर्धर । जानता तू भेद ॥ ७१ ॥
जलकुंभी होती जलके पास । किंतु जलसे भिन्न होती खास ।
कालिख रहती दीपके पास । किंतु होती क्या दीप ॥ ७२ ॥
ज्ञानेश्वरी ७३४

यदि चंद्रमें होता कलंक । किंतु चंद्रसे न होता एक ।
अलग दृष्टि और आंख । अतिशय वैसे ॥ ७३ ॥
जैसे है पथ और पथिक । नदीतल और है उदक ।
दर्पण और जैसे दर्शक । भिन्न है जितने ॥ ७४ ॥
उतना ही भिन्न है मान । आत्मा और कर्म अर्जुन ।
किंतु है अज्ञान कारण । दीखता एक ॥ ७५ ॥
सूर्यसे विकास उपजता । भ्रमरसे सुगंध भोगाता ।
किंतु जलमें स्वस्थ रहता । कमल जैसे ॥ ७६ ॥
बार बार कहता हूं सुन । आत्मामें कर्म-भासका कारण ।
भिन्न ही है पांच जो अर्जुन । कारण रूप ॥ ७७ ॥
पंचैतानि महाबाहो कारणानि निबोध मे ।
सांख्ये कृतान्ते प्रोक्तानि सिद्धये सर्वकर्मणाम् ॥ १३ ॥
कर्मके जो पंचकारण । जानता होगा तू अर्जुन ।
करते हैं सांख्यकथन । मुक्त कंठसे ॥ ७८ ॥
वेद-राजाकी राजधानीमें । सांख्यवेदांतके भुवनमें ।
घोष करते उच्च स्वरमें । गूंजा करके ॥ ७९ ॥
जगतमें है कर्म-सिद्धार्थ । पांच कारण जान ये पार्थ ।
उसमें फंसना अनुचित । आत्मराजको ॥ २८० ॥
कृष्णार्जुन गुरुशिष्य प्रेमका वर्णन—
ऐसा यह शास्त्र-कथन । प्रसिद्ध है जान अर्जुन ।
मुझसे तू इसको सुन । चित्त देकर ॥ ८१ ॥
अन्योंके मुखसे सुनना । ऐसा कष्ट क्या है अर्जुन ।
चिद्रत्न मैं तेरे आधीन । रहते हुए ॥ ८२ ॥
जान तू मुझसे पार्थ प्राज्ञोंका कर्म-निर्णय ।
सीधे ही करते कर्म उसके पांच कारण ॥ १३ ॥
७३५ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग

अजी ! सम्मुख है दर्पण । करते अपना रूप दर्शन ।
देखना क्यों दूसरोंके नयन । कह तू पार्थ ॥ ८३ ॥
भक्त जैसे जहां जब देखता । उसको वैसे वहां जो दीखता ।
ऐसा मैं जब सम्मुख रहता । तेरा खिलौना बन ॥ ८४ ॥
ऐसे भावनावेगसे जब । बोलते थे देख वहां तब ।
देहभान भूलकर सब । डुलता है अर्जुन ॥ ८५ ॥
चंद्र-किरणका जब भरमार । पडता चंद्रमणि-पहाडपर ।
पिघलके होता जैसे सरोवर । उसी भांति ॥ ८६ ॥
तब सुख तथा सुखानुभूति । इन भावोंकी तोडकर भित्ति ।
बन गया वह अर्जुनाकृति । सुख केवल ॥ ८७ ॥
श्रीकृष्ण होनेसे अति समर्थ । यथावत हुवा सहज स्थित ।
तब होने सहजस्थित पार्थ । करता प्रयास ॥ ८८ ॥
व्यक्तित्व जहां अर्जुनसा । गया प्रज्ञा सह डूबसा ।
आया ऐसा महा पूरसा । आनंदका तब ॥ ८९ ॥
कहता है देव अजी हे पार्थ । पूर्ण रूपसे हो सहज-स्वस्थ ।
सांस भर डुलता है पार्थ । अपना मस्तक ॥ २९० ॥
कहता तब जानता तू उदार । तेरे साथमें भिन्न शरीरधर ।
ऊब चुका तब एकत्वमें भर- । जाना चाहता था ॥ ९१ ॥
मेरे प्रेमसे तू ऐसा । पूर्ण करता लालसा ।
रोकती क्या जीव दशा । इस प्रकार ॥ ९२ ॥
श्रीकृष्ण हंस तब भला कहता । अबतक तू यह नहीं जानता ।
पगले ! चंद्र चंद्रिकामें भिन्नता । रहती क्या कभी ॥ ९३ ॥
तथा कहनेमें यह भाव । डर जाते हैं हम पांडव ।
मन भायेका क्रोध-भाव । बढाता है प्रेम ॥ ९४ ॥
यहां है जो परस्पर भिन्नता । तभी ऐसे जीवनकी शक्यता ।
रहने दे ऐसे ये बोल पार्था । इस विषयके ॥ ९५ ॥
ज्ञानेश्वरी ७३६

अब कैसा प्रसंग चला था । क्या बोल रहे थे हम पार्था ।
सब कर्मोंकी जहां भिन्नता । आत्मामें है ॥ ९६ ॥
तब कहता हरिसे अर्जुन । कहता तू सहज मेरा मन ।
प्रारंभ किया उचित श्रीकृष्ण । मेरी समस्याका ॥ ९७ ॥
कर्म-सिद्धिके पांच कारण—
जो है सभी कर्मका बीज । कारण पंचक जो तुझ ।
'करूंगा मैं तुझसे आज' । कहा था मैने ॥ ९८ ॥
तथाँ है जो कर्म कारणसे । संबंध नहीं है आत्मासे ।
कहा था अब तूने ऐसे । वह भी कहना ॥ ९९ ॥
तब विश्वेश्वर कहता । संतोष-चित्तसे हे पार्थ ।
हमसे जिद्द कर बैठता । ऐसा मिलता कौन ॥ ३०० ॥
करूंगा सरल निरूपण । कहता तब यह श्रीकृष्ण ।
किंतु चुकाना पडेगा ऋण । तुझे इस बातका ॥ १ ॥
तब अर्जुन कहता देव । भूल गया क्या पिछले भाव ।
इस बातमें रखता ठाव । मैं तू पनका ॥ २ ॥
कहता है तब श्रीकृष्ण । कहूंगा अब जो वचन ।
मनोयोग पूर्वक सुन । पांडुकुमार ॥ ३ ॥
यह सच है धनुर्धर । कर्म जिस पर है स्थिर ।
वे सब आत्मासे बाहर । कारण हैं पांच ॥ ४ ॥
इन पांचोंके ही कारण । कार्यारंभ होते हैं जान ।
इससे कर्ममें है जान । हेतु भी पांच ॥ ५ ॥
यहां है आत्म-तत्व उदासीन । वह ना हेतु या न उपादान ।
न बनता है आप संवहन । कार्य-सिद्धिका ॥ ६ ॥
शुभाशुभ अंशमें वहां जैसे । उत्पन्न हो जाते हैं कर्म ऐसे ।
रात और दिवस आकाशसे । बनते रहते ॥ ७ ॥
(36) ७३७ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग

तोय तेज तथा धूम । यहां वायुसे संगम ।
होनेसे है अभ्रागम । न जानता गमन ॥ ८ ॥
अनेक काष्ठोंसे नांव बनती । केवटसे वह चलाई जाती ।
वैसे ही वायुसे वह चलती । उदक है साक्षी ॥ ९ ॥
जैसे एक मृत्तिकाका पिंड । व्यय हो कर बनता भांड ।
जब घुमाता है एक दंड । भ्रमण चक्र ॥ ३१० ॥
यह कर्तृत्व कुलालका । वहां क्या रहा है पृथ्वीका ।
बिन आधारके किसीका । कह तू संबंध ॥ ११ ॥
सूर्य-उदयके साथ सदैव । सभी व्यापार चलते पांडव ।
इसमें सविताका क्या कर्तृत्व । रहता है कह तू ॥ १२ ॥
ऐसे पांच हेतुका मिलन । होते हैं यहां पांच कारण ।
उगती कर्म-लता अर्जुन । आत्मा स्वतंत्र ॥ १३ ॥
अब मैं वह सब भिन्न भिन्न । करता हूं पांचोंका विवेचन ।
तुला कर देख लेते हैं जान । मोतियां जैसे ॥ १४ ॥
अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम् ।
विविधाश्च पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पंचमम् ॥ १४ ॥
१ कर्म-सिद्धिका कारण, देह—
ऐसे हैं ये सब लक्षण । सुन तू जो कर्म कारण ।
देह है पहला कारण । कहता हूं मैं ॥ १५ ॥
देहको कहते हैं अधिष्ठान । कहता सुन इसका कारण ।
स्व-भोग सह जीवका है स्थान । यह शरीर ॥ १६ ॥
बना कर इंद्रियोंके दस हाथ । उससे श्रमकर दिवस रात ।
प्रकृतिसे भोग पाता है पार्थ । इस स्थानपे ॥ १७ ॥
अधिष्ठान अहंकार तथा विविध साधन ।
भिन्न भिन्न क्रिया पार्थ करते दैव पांचवा ॥ १४ ॥
ज्ञानेश्वरी ७३८

उसके भोगके कारण । शरीर बिन अन्य स्थान ।
नहीं होनेसे अधिष्ठान । कहते शरीरको ॥ १८ ॥
यह चौबीस ही तत्वोंका । कुटुंब गृह है बस्तीका ।
छूटना है बंध मोक्षका । उलझन यहीं ॥ १९ ॥
अथवा जो हैं अवस्थात्रय । अधिष्ठान जान धनंजय ।
इसीलिये जान यह काय । कहलाता अधिष्ठान ॥ ३२० ॥
२ कर्म-सिद्धिका कारण, कर्ता=अहंकार—
तथा कर्ता यह दूसरा । कर्म कारण धनुर्धर ।
प्रतिबिंबसा है अपार । चैतन्यका जो ॥ २१ ॥
आकाशसे बरसता है नीर । उससे जो बनता सरोवर ।
तथा बिंबित होता तदाकार । आकाश जैसे ॥ २२ ॥
अथवा राजा निद्रासे भरकर । स्वयं आप विस्मृतिमें डूबकर ।
स्वप्नमें अनुभवता धनुर्धर । दरिद्री जैसे ॥ २३ ॥
वैसे अपनेको भूलकर । चैतन्य देहाकार लेकर ।
अनुभवता है देहाकार । आत्मस्वरूप ॥ २४ ॥
ऐसे ही विचारोंके कारण । प्रसिद्ध है जीव ऐसा जान ।
बंधकर वह सह तन । संपूर्ण रूपसे ॥ २५ ॥
प्रकृति करती है जो कर्म । कहता है मैंने किया सभ्रम ।
वहां यह कर्ता ऐसा नाम । लेता है जीव ॥ २६ ॥
३ कर्म-सिद्धिका कारण, विविध साधन—
होती है जो एकही वैसी । दीखती है चोरी हुईसी ।
पलकोंमेंसे दृष्टि जैसी । चवरोंके बाल ॥ २७ ॥
यह घरमें रहता एक । दीपका वह अवलोक ।
गवाक्षोंके-भेदसे अनेक । दीखता जैसे ॥ २८ ॥
वैसे बुद्धिका जानना । श्रोत्रादि भेदसे नाना ।
बाहर इंद्रियपन । होता है व्यक्त ॥ २९ ॥
७३९ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग

यह पृथग्विध कारण । यहां जो कर्मका कारण ।
तीसरा है जान अर्जुन । इंद्रियां जो ॥ ३३० ॥
४ कर्म-सिद्धिका कारण, भिन्न भिन्न क्रिया—
होता है जैसे एक ही नीर । पूर्व पश्चिममें बहकर ।
कहलाता है पांडुकुमार । नदी नद जैसे ॥ ३१ ॥
तथा जैसे एकही पुरुष । अनुकरणसे नव रस ।
होता जैसे नवविध भास । उसी प्रकार ॥ ३२ ॥
प्राण वायुकी अखंड क्रिया शक्ती । अन्यान्य स्थान पर जो बिखुरती ।
अन्यान्य नामसे पहचानी जाती । शतरूप लेकर ॥ ३३ ॥
जब वह वाणीमें आती । तब वाक्शक्ति कहलाती ।
जब हाथोंमें उतरती । बनती व्यापार ॥ ३४ ॥
तथा चरणोंमें आकर । वही गति कहलाकर ।
उतरती है अधोद्वार । होती क्षरण ॥ ३५ ॥
नाभिकंदसे जो हृदय । करता प्रणव उदय ।
कहलाती है धनंजय । वह प्राण ॥ ३६ ॥
फिर है ऊर्ध्वके अर्जुन । आवागमनके कारण ।
कहलाता वही उदान । उसी प्रकार ॥ ३७ ॥ •
अधोरंध्रसे वह बहता । अपान नामसे जाना जाता ।
वही जब व्यापक हो जाता । कहलाता व्यान ॥ ३८ ॥
खाया हुवा अन्नका रस । शरीर भरता सरस ।
नहीं छोडता है विशेष । शरीर भाग ॥ ३९ ॥
सभी व्यापार जो ऐसे । होते हैं क्रिया कर्म ऐसे ।
कहते समान ऐसे । धनुर्धर ॥ ३४० ॥
उबासी छींक डकार । ऐसे होते जो व्यापार ।
नाग कूर्मादि कृकर । भिन्न नामसे ॥ ४१ ॥
ज्ञानेश्वरी ७४०

एवं वायुकी यह चेष्टा । एकही होती है सुभट ।
व्यापार भेदसे पलटा । होता है जो ॥ ४२ ॥
भिन्न भिन्न कार्यास्तव । वायुशक्ति जो पांडव ।
भिन्न होती है सदैव । कारण चौथा ॥ ४३ ॥
५ कर्म-सिद्धिका कारण, दैव—
ऋतुओंमें शरद सुंदर । शरदमें भी है सुधाकर ।
उसमें है योग धनुर्धर । पूर्णिमाका ॥ ४४ ॥
या वसंतमें भला आराम । आराममें भी प्रिय-संगम ।
उसमें भी होता आगम । उपचारोंका ॥ ४५ ॥
नाना कमलमें धनुर्धर । विकसन होता है सुंदर ।
उसमें भी होता है उभार । परागका ॥ ४६ ॥
वाचाका सौंदर्य है कवित्व । तथा कवित्वमें रसिकत्व ।
रसिकत्वमें है परतत्व । स्पर्श जैसे ॥ ४७ ॥
सभी वृत्तियोंका वैभव । बुद्धिही एक है पांडव ।
बुद्धिकी शोभा नित्य नव । सामर्थ्य इंद्रियोंका ॥ ४८ ॥
इंद्रिय मंडलका वैभव । शृंगार एक ही है पांडव ।
वह है जो अधिष्ठात्री दैव- । अनुकूलता ॥ ४९ ॥
तभी चक्षु आदि जो दस इंद्रिय । उन पर अनुग्रह धनंजय ।
सूर्यादि देवताओंका समुदाय । रहता है सदा ॥ ३५० ॥
ऐसा जो देव-वृंद अर्जुन । कहा पांचवा कर्म कारण ।
जानना यहां ऐसा श्रीकृष्ण । कहता है जो ॥ ५१ ॥
ऐसी जो सब कर्म खान । उसकी उत्पत्तिका कारण ।
बुद्धिगम्य हो ऐसा अर्जुन । कहा है यहां ॥ ५२ ॥
अब जिन हेतुके कारण । बढ़ती है जो कर्मकी खान ।
उसका सभी हेतु अर्जुन । कहूंगा मैं पांच ॥ ५३ ॥
७४१ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग

शरीरवाङ्मनोभिर्यत् कर्म प्रारभते नरः ।
न्याय्यं वा विपरीतं वा पञ्चैते तस्य हेतवः ॥ १५ ॥
विश्वमें प्रत्येक बातका उद्देश्य होता है—
आता जब जब वसंत । होता नव-पल्लवका हेत ।
नव-पल्लव पुष्प हेत । पुष्प देता है फल ॥ ५४ ॥
या वर्षाको लाते मेघ । मेघसे वृष्टि प्रसंग ।
वृष्टिसे मिलते भोग । सस्य-सुखके ॥ ५५ ॥
या सूर्य अरुणको प्रसवता । अरुणसे सूर्य उदय होता ।
सूर्यसे सब विश्व उजलता । दिवस रूप ॥ ५६ ॥
वैसे ही है हेतु जो मन । संकल्प-भावका अर्जुन ।
संकल्प है वाचाका जान । जलाता दीप ॥ ५७ ॥
फिर वह वाचाकी मशाल । दिखाती कर्म-मार्ग सकल ।
सो खोलता कर्ता टंकसाल । कर्तृत्वकी तब ॥ ५८ ॥
शरीरादि यहां समुदाय । शरीर हेतु है धनंजय ।
होता है जैसे लोहका कार्य । लोहसे ही ॥ ५९ ॥
अथवा तंतुओंका ताना जैसे । मिलकर तंतुओंके बानेसे ।
कहलाता जब कपडा ऐसे । केवल हैं तंतु ॥ ३६० ॥
वैसे ही है मानवके देहका । रचता हेतु कर्म-मनादिका ।
रत्नसे ही बनता है रत्नका । उपहार जैसे ॥ ६१ ॥
यहां जो शरीरादि कारण । हेतु कैसे होता यह ज्ञान ।
जानना चाहता तो अर्जुन । सुन तू अब ॥ ६२ ॥
कारण और हेतुके मिलनसे कर्म-निर्माण होता है—
अथवा सूर्य प्रकाशके जैसा । हेतु कारण सूर्य ही है वैसा ।
या ईखका कांड है ईख जैसा । बढनेका कारण ॥ ६३ ॥
काया वाचा मनसे जो विश्वमें करता नर ।
धर्म या अधर्मका हो उसके पांच हेतु हैं ॥ १५ ॥
ज्ञानेश्वरी ७४२

वाग्देवताका अनेक वर्णन । वाचा ही करती है ऐसे जान ।
अथवा वेद ही प्रतिष्ठापन । करते वेदोंका ॥ ६४ ॥
वैसे ही कर्मका शरीरादिक । कारण जानते हैं स्वाभाविक ।
किंतु यही हेतु नहीं है चूक । इस स्थानपे ॥ ६५ ॥
तथा देहादिक जो कारण । तथा देहादि हेतु मिलन ।
होनेसे सभी कर्म निर्माण । होते उसके ॥ ६६ ॥
सब जो वह शास्त्र सम्मत । मार्ग अनुसरता है पार्थ ।
तब न्यायसे है न्यायोचित । होता है हेतु ॥ ६७ ॥
जैसे वर्षा नीरका बडा बहाव । सहज शालि-खेतमें जाता पांडव ।
सोखकर होता है वह अतीव । लाभ दायक ॥ ६८ ॥
या निकला रोषसे अकस्मात । द्वारकाकी राहपे चला पार्थ ।
चलना उसका न होता पार्थ । थकने पर भी ॥ ६९ ॥
होनेसे हेतु कारण मिलन । होता जहां अंधा कर्म उत्पन्न ।
उसे मिले शास्त्रोचित नयन । होता है न्याय ॥ ३७० ॥
दूधमें आया बडा उफान । तथा वह गिर गया जान ।
उसे यज्ञ कहना अर्जुन । नहीं उचित ॥ ७१ ॥
वैसे शास्त्र-सम्मतिके बिन । किया हुवा नहीं अकारण ।
तब चुराया हुवा जो धन । दानमें गया क्या ॥ ७२ ॥
बावन वर्णपर कौन । मंत्र है कह तू अर्जुन ।
नहीं उच्चारता बावन । वर्णको कौन यहां ॥ ७३ ॥
किंतु मंत्रकी कुशलता । जब तक नहीं जानता ।
उच्चार फल नहीं पाता । उसी प्रकार ॥ ७४ ॥
कारण हेतु योगसे । होता जो अचानकसे ।
शास्त्रकी सो कसौटीसे । नहीं उतरता ॥ ७५ ॥
तबभी सब कर्म होता ही है । किंतु वह होना योग्य नहीं है ।
वह जो अन्याय ही अन्याय है । ऐसाही मानना ॥ ७६ ॥
७४३ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग

तत्रैवं सति कर्तारमात्मानं केवलं तु यः ।
पश्यत्यकृतबुद्धित्वान्न स पश्यति दुर्मतिः ॥ १६ ॥
आत्मा कभी कर्ता नहीं होता—
एवं कर्मके हैं पांच कारण । वैसेही पांच हेतु हैं अर्जुन ।
उसमें कहां आत्माका दर्शन । होता है तुझको ॥ ७७ ॥
नहीं होता सूर्य जैसे रूप अर्जुन । चक्षुरूपसे कराता प्रकाशमान ।
वैसे ही आत्मा नहीं होता कर्म जान । कराता वह प्रकट ॥ ७८ ॥
दर्पणमें जो है जैसे देखता । दर्पण औ' प्रतिबिंब न होता ।
किंतु इनको है प्रकाश देता । देखकर जो ॥ ७९ ॥
अथवा अहोरात्र सविता । न होके करता पांडुसुता ।
वैसे आत्मा नहीं कर्म कर्ता । किंतु दिखाता है ॥ ३८० ॥
किंतु देहाहंकारके भ्रमसे । बुद्धिके देह ही मैं माननेसे ।
आत्म-विषयमें उसको जैसे । हुई मध्य रात्री ॥ ८१ ॥
जिसने चैतन्य ईश्वर ब्रह्म । किया हो देह ही सीमा परम ।
उसको आत्मा कर्ता ऐसा भ्रम । होता निश्चित ॥ ८२ ॥
किंतु आत्मा ही है कर्म-कर्ता । ऐसा भी निश्चय नहीं होता ।
शरीर ही मैं हूं कर्म-कर्ता । मानता सत्य ॥ ८३ ॥
आत्मा ही मैं कर्मातीत । सर्व कर्म साक्षीभूत ।
यह जो यथार्थ बात । न सुने कानसे ॥ ८४ ॥
इसीलिये अमाप आत्माको जहां । देहमें ही सीमित करता यहां ।
उलूक रातकोही दिवस जहां । मानता है वैसे ॥ ८५ ॥
जिसने आकाशका कहीं । सच्चा सूर्य देखा ही नहीं ।
वह गढेके बिंबकोही । मानके सूर्य ॥ ८६ ॥
वहां जो शुद्ध आत्माको कर्ता मान बसा हुवा ।
संस्कार हीन जो मूढ न जाने तत्त्व दुर्मति ॥ १६ ॥
ज्ञानेश्वरी ७४४

डबरेका उत्पन्न होना । सूर्यकी उत्पत्ती मानना ।
उसके नाशमें नाशना । कांपनेसे कंप ॥ ८७ ॥
अजी ! सोता जब नहीं जगता । तब स्वप्नको ही सत्य जानता ।
रज्जू न जान सांपसे डरता । इसमें क्या विस्मय ॥ ८८ ॥
जब है आंखोंमें ही कामला । तब चंद्र भी दीखता पीला ।
मृग भी नहीं क्या मृगजल । देख भ्रमते हैं ॥ ८९ ॥
शास्त्र या गुरुका नाम धनुर्धर । रखता है गांवकी सीमाके पार ।
लेकर वह मूर्खताका ही आधार । जीता रहता है ॥ ३९० ॥
उस देहाभ्र - दृष्टिके कारण । आत्मापे पड़ता देहावरण ।
अभ्रवेग चंद्रमें आरोपण । करते हैं जैसे ॥ ९१ ॥
फिर इस मान्यताके कारण । देहकी बंदिशालामें अर्जुन ।
कर्मकी वज्रगांठमें बंधन । भोगता आप ॥ ९२ ॥
सुग्गा जैसे नलिका पर । आप बंधित मानकर ।
वस्तुतः स्वतंत्र होकर । फंसता है जैसे ॥ ९३ ॥
वैसे ही आत्म-स्वरूपपर । प्रकृति-गुणोंको थोप कर ।
कल्पकोटि तक धनुर्धर । कर्ममें फंसता ॥ ९४ ॥
किंतु जो कर्ममें रहता । कर्म उसको नहीं छूता ।
वडवानल जैसे होता । समुद्रोदकमें ॥ ९५ ॥
ऐसे जो कर्ममें भी अलिप्त । रहता कर्म कर सतत ।
जानना उसको कैसे पार्थ । कहता हूं अब ॥ ९६ ॥
करनेसे मुक्तका विचार । खुलता अपना मुक्ति-द्वार ।
दीप-प्रकाशमें देखकर । पाते वस्तु जैसे ॥ ९७ ॥
जैसे जैसे पोंछते हैं दर्पण । अपना आपको होता दर्शन ।
या पानीमें मिलकर लवण । होता पानी जैसे ॥ ९८ ॥
देखता है जब उलटकर । प्रतिबिंब बिंबको धनुर्धर ।
तब देखता सब मिटकर । रहता बिंब मात्र ॥ ९९ ॥
७४५ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग

वैसे खोया हुवा आप यदि पाना । संत जनोंमें ही वह देख लेना ।
इसीलिये है सुनना और गाना । संतोंका चरित्र ॥ ४०० ॥
वैसे कर्ममें भी रहके कर्ममें । लिप्त नहीं होता सब विषयमें ।
रहती जैसे चर्म-चक्षु चाममें । अलिप्त दृष्टि ॥ १ ॥
इस प्रकार जो मुक्त है । उसका रूप दिखाना है ।
हाथ उठाके कहना है । उपपत्तिको ॥ २ ॥
यस्य नाहंकृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते ।
हत्वापि स इमान् लोकान्न हंति न निबद्ध्यते ॥ १७ ।
अविद्या-निद्रामें डूब कर । विश्व-स्वप्नका जो व्यवहार ।
भोगता था प्रबुद्ध धनुर्धर । अनादि जो ॥ ३ ॥
महावाक्यसे तब पुकारकर । गुरु अनुग्रहके सामर्थ्यपर ।
जगाते हाथ रख मस्तक पर । या थपकाते ॥ ४ ॥
आत्मानुभवीका अनहंकारी देह भाव—
तभी विश्व-स्वप्नकी माया । नींद छोड़के धनंजया ।
सहसा जगा जो अद्वय । आनंदमें ही ॥ ५ ॥
मृगजलके तब पूर । दीखते थे जो निरंतर ।
खो जाते जैसे चंद्रकर । फैलते ही ॥ ६ ॥
या बालत्व जब बीतता । हौवा कभी नहीं डराता ।
या स्वयंपाक नहीं बनता । आग बुझने पर ॥ ७ ॥
अथवा जगने पर जैसे । सपना नहीं दीखता वैसे ।
न होती अहं ममता उसे । पांडुकुमार ॥ ८ ॥
देखनेके लिये मानो अंधार । घुसता सुरंगमें भी भास्कर ।
फिर भी न दीखता वहां पर । अंधार उसको ॥ ९ ॥
नहीं जिसे अहंभाव बुद्धिमें लिप्तता नहीं ।
मारके विश्वको सारे न मारता न बंधता ॥ १७ ॥
ज्ञानेश्वरी ७४६

वैसे जो आत्मत्वसे भरित । देखता जो कुछ भी समस्त ।
द्रष्टा-दृश्यत्व परिवर्तित । होता अपनेमें ॥ ४१० ॥
लगती जिसको आग । अग्नि ही बनता अंग ।
दाह्य दाहक विभाग । रहता नहीं ॥ ११ ॥
वैसे ही जो कर्म है भिन्न । लाता आत्मापे कर्तापन ।
जाता है आभास-बंधन । तब जो रहता ॥ १२ ॥
इस आत्म-स्थितिका जो राव । जाने क्या फिर देहका ठाव ।
प्रलयांबुधि पूर पांडव । मानता क्या ओघ ॥ १३ ॥
वैसे ही संपूर्ण अहंता । शरीर कैसे लपेटता ।
सूर्य-प्रभा होगी क्या सीमित । सूर्य बिंबमें ॥ १४ ॥
मथकर निकाला जो नवनीत । फिर छासमें डाला तो पार्थ ।
रहता है जिस भांति अलिप्त । उसी प्रकार ॥ १५ ॥
जैसे जो अग्नि काष्ठमें रहता । जब वह काष्ठसे भिन्न होता ।
फिर क्या काष्ठ-पेटीमें रहता । सिकुड करके ॥ १६ ॥
या जो रात्रीके गर्भसे । निकला भास्कर जैसे ।
बात वह सुने कैसे । रातकी कभी ॥ १७ ॥
तथा जो ज्ञाता ज्ञेयपन । निगल बैठा है अर्जुन ।
उसे देहाहंताका भान । होगा कैसे ॥ १८ ॥
जहां कहींसे गगन । भर रहा है संपूर्ण ।
भर रहना लक्षण । सहज उसका ॥ १९ ॥
ऐसा वह जो करता । वह सबं जो स्वयं होता ।
फिर कौन उसे लोपता । कर्तापनसे ॥ ४२० ॥
देहाहंकार आत्म-बोधमें विलय होनेके बाद—
न रहता आकाश बिन ठाव । उसी भांति सागरको प्रवाह ।
तथा ध्रुवका उठना पांडव । रहता कहां ॥ २१ ॥
७४७ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग

उसका देहाहंकारका भाव । बोधमें विलय हुवा पांडव ।
फिर भी जो शरीरका स्वभाव । होते हैं कर्म ॥ २२ ॥
चलकर रुकता यदि चंड मारुत । फिर भी वृक्षोंमें रहता कंप भारत ।
तथा संदूकमें होता कर्पूर समाप्त । किंतु रहती सुगंध ॥ २३ ॥
हो जाता है संगीतका कार्यक्रम । किंतु चित्तपे रहता परिणाम ।
बहाव बह जाता है किंतु नम । रहता है भूमिका ॥ २४ ॥
अस्त होने पर भी सूर्यका । रहती है संध्याकी भूमिका ।
तथा ज्योति दीप्ति सकौतुक । दीखती है ॥ २५ ॥
लक्ष-भेद होने पर । दौडता रहता तीर ।
जब तक धनुर्धर । रहती शक्ति ॥ २६ ॥
चक्र पर मटका बन जाता । कुम्हार उसको उठा भी लेता ।
किंतु चक्र जो फिरता रहता । पहली गतिसे ॥ २७ ॥
वैसे ही देहाभिमान मिट जाता । जिस स्वभावसे है देह बनता ।
वही है देहको चेष्टित करता । अपने आप ॥ २८ ॥
संकल्प बिन जैसे स्वप्न दीखता । बनमें न लगता वृक्ष उगता ।
अथवा गंधर्व-नगर बनता । बनाये बिना ही ॥ २९ ॥
वैसे आत्माके उद्यम बिन । देहादि जो है पांच कारण ।
अपने आपही है अर्जुन । करते हैं कर्म ॥ ४३० ॥
विदेहावस्थामें किये गये मुक्त-कर्म-
रहते हैं जो प्राचीन संस्कार । पांच कारण हेतु धनुर्धर ।
कराते कर्म अनेक प्रकार । शरीरादिसे ॥ ३१ ॥
उन कर्ममेंसे फिर । होता है विश्व-संहार ।
या नव-विश्व सुंदर । होता सृजन ॥ ३२ ॥
किंतु कुमुद जैसे सूखता । या कमल कैसे विकसता ।
यह दोनों रवि न देखता । उसी प्रकार ॥ ३३ ॥
ज्ञानेश्वरी ७४८